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Saturday, September 30, 2017

रोज़ाना : मां के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीकी -अजय ब्रह्मात्‍मज



रोज़ाना
मां के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीकी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले दिनों मां-बेटे की एक तस्‍वीर सोशल मीडिया पर घूम रही थी। इस तस्‍वीर में नवाजुद्दीन सिद्दीकी एक बुजुर्ग औरत के साथ खड़े हैं। उन्‍होंने अपनी बुजुर्ग औरत के बाएं कंधे को हथेली से कस के थाम रखा है। बुजुर्ग औरत ने नवाजुद्दीन के दाएं कंधे को अपनी हथेली से थाम रखा है। गौर करने पर पता चलता है कि वह बुजुर्ग औरत और कोई नहीं नवाजुद्दीन की मां हैं। उनका नाम मेहरू‍िनिसा सिद्दीकी है। उन्‍हें इस साल बीबीसी ने भारत की 100 प्रभावशाली महिलाओं में चुना है। नवाजुद्दीन सिउद्दीकी मां को मिले इस सम्‍मान से खुश हैं। वे इस सम्‍मनान को विशेष और अपने सभी सम्‍मानों से श्रेष्‍ठ मानते हैं।
नवाजुद्दीन सिद्दीकी बेहिचक बतोते हैं कि उनकी मां अनपढ़ थीं। नौ बच्‍चों के लालन-पालन के साथ उन्‍होंने पढाई-लिखाई सीखी। बच्‍चों के स्‍कूल जाने के साथ उनमें भी पढ़ाई की उमंग जागी। नवाजुद्दीन कहते हैं कि उनकी मां ने हमेशा पढ़ाई-लिखाई पर ध्‍याान देने की हिदायत दी। साथ ही यह भी समझाया कि जिस फील्‍ड में भी जाना हो,उसकी ट्रेनिंग लेनी चाहिए। मां की सीख से ही नवाजुद्दीन एनएसडी पहुंचे। उनके समर्थन और आर्शीवाद से उन्‍होंने हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में पैर टिकाने के लिए लंबा संघर्ष किया। आज वे तन कर खड़े हैं। अपनी खास पहचान के साथ कामयाब हैं। उनकी इस कामयाबी का श्रेय मां को भी जाता है।
ऐसी प्रेरणादायी मां पर गर्व तो होना ही चाहिए। मध्‍यवर्गीय परिवारों से आए सफल कलाकार क्‍या आम जीवन के दूसरे क्षेत्रों के कामयाब व्‍यक्ति भी अपनी गरीब पृष्‍ठभूमि के बारे में बातें करने से हिचकिचाते हैं। अपने परिवार और मां-बाप को चर्चा और उल्‍लेख से बाहर रखते हैं। इस संदर्भ में नवाजुद्दी सिद्दीकी की तारीफ करनी होगी कि उन्‍होंने अपनी पृष्‍ठभूमि को कभी ढांप के नहीं रखा। उसके बारे में बातें कीं और अपने भाई-बहनों की तरक्‍की के लिए मदद की। आज वे देश के परिचित स्‍टार हैं। अपनी मेहनत और योग्‍यता से समृद्धि हासिल की है। इस समृद्धि में उन्‍होंने परिजनों को शामिल किया है।
नवाजुद्दीन की मां अपने गांव में बच्‍चों की पढ़ाई पर ध्‍ययान देती हैं। खुद भी पढ़ाती हैं। उन्‍होंने अभी तक 300 से अधिक बच्‍चों को पढ़ाया है। ऐसी मांएं प्रेरणा बनती हैं। बेटे की कामयाबी से उनका भी रुतबा बढ़ा होगा। उससे भी बड़ी बात है कि बेटे ने उन्‍हें साथ रखा है और उन पर गर्व करता है। इस तस्‍वीर में दोनों की आंखों की चमक उनके मन के भाव जाहिर करती है। दोनों आश्‍वस्‍त और आबद्ध हैं। धन्‍य है नवाजुद्दीन और उनकी मां।

रोज़ाना : मां के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीकी



रोज़ाना
मां के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीकी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले दिनों मां-बेटे की एक तस्‍वीर सोशल मीडिया पर घूम रही थी। इस तस्‍वीर में नवाजुद्दीन सिद्दीकी एक बुजुर्ग औरत के साथ खड़े हैं। उन्‍होंने अपनी बुजुर्ग औरत के बाएं कंधे को हथेली से कस के थाम रखा है। बुजुर्ग औरत ने नवाजुद्दीन के दाएं कंधे को अपनी हथेली से थाम रखा है। गौर करने पर पता चलता है कि वह बुजुर्ग औरत और कोई नहीं नवाजुद्दीन की मां हैं। उनका नाम मेहरू‍िनिसा सिद्दीकी है। उन्‍हें इस साल बीबीसी ने भारत की 100 प्रभावशाली महिलाओं में चुना है। नवाजुद्दीन सिउद्दीकी मां को मिले इस सम्‍मान से खुश हैं। वे इस सम्‍मनान को विशेष और अपने सभी सम्‍मानों से श्रेष्‍ठ मानते हैं।
नवाजुद्दीन सिद्दीकी बेहिचक बतोते हैं कि उनकी मां अनपढ़ थीं। नौ बच्‍चों के लालन-पालन के साथ उन्‍होंने पढाई-लिखाई सीखी। बच्‍चों के स्‍कूल जाने के साथ उनमें भी पढ़ाई की उमंग जागी। नवाजुद्दीन कहते हैं कि उनकी मां ने हमेशा पढ़ाई-लिखाई पर ध्‍याान देने की हिदायत दी। साथ ही यह भी समझाया कि जिस फील्‍ड में भी जाना हो,उसकी ट्रेनिंग लेनी चाहिए। मां की सीख से ही नवाजुद्दीन एनएसडी पहुंचे। उनके समर्थन और आर्शीवाद से उन्‍होंने हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में पैर टिकाने के लिए लंबा संघर्ष किया। आज वे तन कर खड़े हैं। अपनी खास पहचान के साथ कामयाब हैं। उनकी इस कामयाबी का श्रेय मां को भी जाता है।
ऐसी प्रेरणादायी मां पर गर्व तो होना ही चाहिए। मध्‍यवर्गीय परिवारों से आए सफल कलाकार क्‍या आम जीवन के दूसरे क्षेत्रों के कामयाब व्‍यक्ति भी अपनी गरीब पृष्‍ठभूमि के बारे में बातें करने से हिचकिचाते हैं। अपने परिवार और मां-बाप को चर्चा और उल्‍लेख से बाहर रखते हैं। इस संदर्भ में नवाजुद्दी सिद्दीकी की तारीफ करनी होगी कि उन्‍होंने अपनी पृष्‍ठभूमि को कभी ढांप के नहीं रखा। उसके बारे में बातें कीं और अपने भाई-बहनों की तरक्‍की के लिए मदद की। आज वे देश के परिचित स्‍टार हैं। अपनी मेहनत और योग्‍यता से समृद्धि हासिल की है। इस समृद्धि में उन्‍होंने परिजनों को शामिल किया है।
नवाजुद्दीन की मां अपने गांव में बच्‍चों की पढ़ाई पर ध्‍ययान देती हैं। खुद भी पढ़ाती हैं। उन्‍होंने अभी तक 300 से अधिक बच्‍चों को पढ़ाया है। ऐसी मांएं प्रेरणा बनती हैं। बेटे की कामयाबी से उनका भी रुतबा बढ़ा होगा। उससे भी बड़ी बात है कि बेटे ने उन्‍हें साथ रखा है और उन पर गर्व करता है। इस तस्‍वीर में दोनों की आंखों की चमक उनके मन के भाव जाहिर करती है। दोनों आश्‍वस्‍त और आबद्ध हैं। धन्‍य है नवाजुद्दीन और उनकी मां।

फिल्‍म समीक्षा - जुड़वां 2

फिल्‍म रिव्‍यू

जुड़वां 2

-अजय ब्रह्मात्‍मज



20 साल पहले 9 से 12 शो चलने के आग्रह और लिफ्ट तेरी बद है की शिकायत का मानी बनता था। तब शहरी लड़कियों के लिए 9 से 12 शो की फिल्‍मू के लिए जाना बड़ी बात होती थी। वह मल्‍टीप्‍लेक्‍स का दौर नहीं था। यही कारण है कि उस आग्रह में रोमांच और शैतानी झलकती थी। उसी प्रकार 20 साल पहले बिजली ना होने या किसी और वजह से मैन्‍युअल लिफ्ट के बंद होने का मतलब बड़ी लाचारी हो जाती थी। पुरानी जुड़वां के ये गाने आज भी सुनने में अच्‍छे लग सकते हैं,लेकिन लंदन में गाए जा रहे इन गीतों की प्रसंगिकता तो कतई नहीं बनती। फिर वही बात आती है कि डेविड धवन की कॉमडी फिल्‍म में लॉजिक और रैलीवेंस की खोज का तुक नहीं बनता।

हिंदी फिल्‍मों के दर्शकों को अच्‍छी तरह मालूम है कि वरुण धवन की जुड़वां 2 1997 में आई सलमान खान की जुड़वां की रीमेक है। ओरिजिनल और रीमेक दोनों के डायरेक्‍टर एक ही निर्देशक डेविड धवन है। यह तुलना भी करना बेमानी होगा कि पिछली से नई अच्‍छी या बुरी है। दोनों को दो फिल्‍मों की तरह देखना बेहतर होगा।सलमान खान,करिश्‍मा कपूर और रंभा का कंपोजिशन बरुण धवन,तापसी पन्‍नू और जैक्‍लीन फर्नाडिस से बिल्‍कुल अलग है। दसरे इस बार पूरी कहानी लंदन में है। और हो,बहनों की भूमिकाएं छांट दी गई हैं। डेविड धवन ने पूरी फिल्‍म का फोकस अपने बेटे वरुण धवन पर रखा है। कोशिश यही है कि वह जुड़वां 2 से सनमान खान के स्‍टारडम की लीग में आ जाए। अगर यह औसत फिल्‍म आम तरुण दर्शकों को पसंद आ गई तो वरुण अपनी पीढ़ी के पहले सुपरस्‍टार हो जाएंगे।

फिल्‍म नाच-बानों और उछल-कूद से भरी है। सभी किरदार लाउड हैं। उनके बीच एक कंपीटिशन सा चल रहा है। यहां तक कि दो मिजाज के प्रेम और राजा भी आखिरकार लगभग एक जैसी छिदोरी हरकत करने लगते हैं। हिंदी फिल्‍मों का यह दुर्भाग्‍य ही है कि हमें छिदोरे नायक ही पसंद आते हैं। ऐसे नायक फिल्‍म की नायिकाओं को तंग करते हैं। छेड़खानी उनका पहला स्‍वभाव होता है। इन नायकों के लिए नायिका किसी वस्‍तु से अधिक नहीं होती। इसके अलावा फिल्‍म में दूसरे किरदारो(मोटे,तोतले,अफ्रीकी आदि) का मजाक उड़ाने में कोई झेंप नहीं महसूस की जाती। नस्‍लवादी और पुरुषवादी टिप्‍पणियों पर हंसाया जाता है। इस लिहाज से जुड़वां 2 पिछड़े खयालों और शिल्‍प की फिल्‍म है।

वरुण धवन ने प्रेम और राजा के जुड़वां किरदारों में अलग होने और दिखने की सफल कोशिश की है। दोनों भाइयों की आरंभिक भिन्‍नता एक समय के बाद घुलमिल जाती है। कंफ्यूजन बढ़ाने और हंसी लाने के लिए शायद स्‍क्रीनप्‍ले की यही जरूरत रही होगी। वरुण धवन की मेहनत बेकार नहीं गई है। फिल्‍म की सीमाओं में उन्‍होंने बेहतर प्रदर्शन किया है। वे तरुण दर्शकों को लुभाने की हर कोशिश करते हैं। तापसी पन्‍नू तो डेविड धवन की ही खोज हैं। बीच में दमदार भूमिकाओं की कुछ फिल्‍में करने के बाद वह अपने मेंटर की फिल्‍म में लौटी हैं,जो स्‍टारडम की तरफ उनका सधा कदम है। उन्‍होंने हिंदी फिल्‍मों की सफल स्‍टार होने के सभी लटके-झटके अपनाए हैं। वे बेलौस तरीके किरदार से नहीु जुड़ पातीं। इस मामले में जैक्‍लीन फर्नांडिस आगे हैं। जैक्‍लीन की सबसे बड़ी दिक्‍क्‍त और सीमा है कि वह प्रियंका चोपड़ा की नकल करती रहती हैं। लंबे समय के बाद लौटे राजपाल यादव कोशिशों के बावजूद वरुण से उम्र में बड़े और मिसफिट लगते हैं। अनुपम खेर,जॉनी लीवर,उपासना सिंह,मनोज पाहवा और सचिन खेडेकर इस फिल्‍म को बासी बनाते हैं। दर्शक इनके एकरंगी अभिनय से उकता चुके हैं। यकीन करें इनकी जगह नए कलाकार होते तो दृश्‍य अधिक रोचक होते।

मुबई के किरदार लंदन की परवरिश व पृष्‍ठभूमि के बाद जब पंजाबी गीत के बोल और ढोल पर ठ़मके लगाते हैं तो वे जुड़वां 2 को संदर्भ से ही काट देते हैं। हिंदी फिल्‍मों के निर्देशकों को पंजबी गीतों की गति और ऊर्जा के मोह से निकलना चाहिए।

अवधि 150 मिनट

** दो स्‍टार

Friday, September 29, 2017

दरअसल : मध्‍यवर्गीय कलाकारों के कंधों का बोझ



दरअसल...
मध्‍यवर्गीय कलाकारों के कंधों का बोझ
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हिंदी फिल्‍मों में मध्‍यवर्गीय पृष्‍ठभूमि के परिवारों से आए कलाकारों की संख्‍या बढ़ रही है। दिल्‍ली,पंजाब,उत्‍त्‍रप्रदेश,राजस्‍थान,उत्‍तराखंड,हिमाचल प्रदेश,बिहार और झारखंड से आए कलाकारों और तकनीशियनों हिंदी फिल्‍म इंढस्‍ट्री में जगह बनानी शुरू कर दी है। ठीक है कि अभी उनमें से कोई अमिताभ बच्‍च्‍न या शाह रूख खान की तरह लोकप्रिय और पावरफुल नहीं हुआ है। फिर भी स्थितियां बदली हैं। मध्‍यवर्गीय परिवारों से आए कलाकारों की कामयाबी के किससों से नए और युवा कलाकारों की महात्‍वाकांक्षाएं जागती हैं। वे मुंबई का रुख करते हैं। आजादी के 7व सालों और सिनेमा के 100 सालों के बाद की यह दुखद सच्‍चाई है कि मुंबई ही हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री की राजधानी बनी हुई है। उत्‍तर भारत के किसी राज्‍य ने हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के लिए संसाधन जुटाने या सुविधाएं देने का काम नहीं किया।
बहरहाल, हम बात कर रहे थे हिंदी फिल्‍मों में आए मध्‍यवर्गीय कलाकारों की कामयाबी की। लगभग सभी कलाकारों ने यह कामयाबी भारी कदमों से पूरी की है। किसी से भी बाते करें। संघर्ष और समर्पण का भाव एक सा मिलेगा। हम सभी जानते हैं कि उत्‍तर भारत में आज भी कोई किशोर-किशोरी फिल्‍मों में जाने की बात करे तो उसके साथ परिवार का क्‍या रवैया होता है? उनके प्रति सख्‍ती बढ़ जाती है। तंज कसे जाने लगते हैं। अगर वह ड्रामा या थिएटर में एक्टिव हो रहा हो तो दबाव डाला जाता है कि वह उसे छोड़ दे,क्‍योंकि उसमें कोई भविष्‍य नहीं है। सकल मध्‍यवर्गीय परिवारों में भविष्‍य का तात्‍पर्य सुरक्षित करियर और जीवन है। आप 10 से 5 की बंधी-बंधयी नौकरी कर लें। ऊपरी आमदनी हो तो अतिउत्‍तम। खयाल रहे कि पेंशन वाली नौकरी हो। इन दबावों से बचजे-निकलते कोई निकल आया तो तानों की शुरूआत हो जाती है। गली-मोहल्‍ले में कहा जाने लगता है कि फलां बाबू का बेटा अमिताभ बच्‍चन बनने गया है या फलां बाबू की बेटी को लगता है कि वही अगली कंगना रनोट होगी। सभी को उन युवक-युवतियों की असफल वापसी का इंतजार रहता है। अजीब समाज है अपना। सपनों को पंक्‍चर करने में माहिर इस समाज में अपनी उम्‍मीदों को बचाए रखना भी एक संघर्ष है।
बात आगे बढ़ती है। ये कलाकार सिर्फ अपनी लिद की बदौलत मुंबई आ धमकते हैं। धक्‍के खाते हैं। खाली पेट रहते हैं। सिर्फ अपनी आंखों की चमक बरकरार रखते हैं। संघर्षशील कलाकारों की अक्षुण्‍ण ऊर्जा पर कभी बात होनी चाहिए। मुंबई में उनके साथी ही उनके हमराज,हमखयाल और बुरे दिनों के दोसत बनते हैं। किसी प्रकार एक-दो काम मिलता है। कुछ पैसे आते हैं। फिल्‍में रिलीज होती हैं। पत्र-पत्रिकाओं में तस्‍वीरें छपती हैं। फिर भी यह कहना बंद नहीं होता कि अभी देखिए आगे क्‍या होता है? परिवार भी आश्‍वस्‍त नहीं रहता कि कुछ हो ही जाएगा। दूसरे दबी इच्‍छा रहती है कि बेटा या बेटी आज के सफलतम स्‍टारों की तरह चमकने लगे,जबकि उसे गर्दिश में रखने या धूमिल करने की उनकी कोशिशें जारी रहती है।
फिर एक दौर आता है। उनमें से कुछ कलाकार पहले टिमटिमाते और फिर चमकने लगते हैं। उनकी इस कौंध के साथ ही कंधों पर रिश्‍तेदारी उगने लगती है। न जाने कहां-कहां से परिचितों और रिश्‍तदारों की भीड़ मंडराने लगती है। होता यह है कि पहचान और नाम होते ही इन कलाकारों से इन रिश्‍तेदारों की भौतिक उम्‍मीदें बढ़ जाती हैं। उनके परिवारों के अधिकांश सदस्‍य उनकी तरह संपन्‍न और प्रभावशाली नहीं होते,इसलिए उन पर नैतिक दबाव बढ़ता है कि वे मित्रों और परिजनों की आर्थिक एवं अन्‍य मदद करें। यकीन करें बाहर से आए सभी कलाकारों को अपने परिवारों से मिले गडढोंंको भरने मेंही आधी एनर्जी और आमदनी खर्च हो जाती है। निश्चिंत होकर काम करने के बजाए उन्‍हें सभी परिजनों की अपेक्षाओं के दबाव में रहना पड़ता है। इस अपेषित दायित्‍व से उनके कंधे झ़ुकते हैं और करियर भी।

Thursday, September 28, 2017

रोजाना : ’83 की जीतं पर बन रही फिल्‍म



रोजाना
83 की जीतं पर बन रही फिल्‍म
-अजय ब्रह्मात्‍मज
याद नहीं कब कोई इतना रोचक इवेंट हुआ था। मुंबई में कल कबीर खान निर्देशित 83 की घोषणा के इवेंट में क्रिकेटरों की मौजूदगी ने समां बांध दिया। इस मौके पर उनकी यादों और बेलाग उद्गारों ने हंसी की लहरों से माहौल को तरंगायित रखा। सभी के पास 1983 के वर्ल्‍ड कप के निजी किस्‍से थे। उन किस्‍सों में खिलाढि़यों की मनोदशा,खिलंदड़पन और छोटी घटनाओं के हसीन लमहों की बातें थीं। सभी ने बेहिचक कुछ-कुछ सुनाया। पता चला कि अनुशासित खेल के आगे-पीछे उच्‍छृंखलताएं भी होती हैं। तब न तो क्रिकेट में भारत की शान थी,न खिलाढि़यों का नाम था और न ही आज की जैसी पापाराजी मीडिया थी। खिलाडि़यों ने हंसी-मजाक में ही जितना बताया,उससे लगा कि आज के खिलाड़ी ज्‍यादा तेज निगाहों के बीच रहते हैं। उनकी छोटी सी हरकत भी बड़ा समाचार बन जाती है।
सभी जानते हैं कि 83 की ऐतिहासिक जीत ने भारत में क्रिकेट का माहौल बदल दिया। क्रिकेट के इतिहास और क्रिकेट खिलाडि़यों के जीवन का यह निर्णायक टर्निंग पाइंट रहा। सन् 2000 के 17 साल पहले और 17 साल बाद के सालों को जोड़कर देखें तो इन 34 सालों में भी 83 की जीत की खुशी कम नहीं हुई है। हालांकि उसके बाद भारत ने और भी वर्ल्‍ड कप जीते। फायनल अधिक रोमांचक हुए,लेकिन 1983 की जीत का अलग महत्‍व है और रहेगा। किसी का बचपन तो किसी की जवानी,किसी के लिए महज क्रिकेट तो किसी के लिए कहानी...1983 में वर्ल्‍ड कप के साथ कपिल देव की गर्व से मुस्‍कराती तस्‍वीर हर क्रिकेटप्रेमी के मन में खुश और उम्‍मीद का संचार करती है। कबीर खान इसी खुशी और उम्‍मीद को कैमरे में कैद करने जा रहे हैं। वे 1983 के वर्ल्‍ड कप की जीत की तैयारी,मुश्किलों और विजय की कहानी उन खिलाडि़यों के जरिए जाहिर करेंगे। इसमें सिर्फ मैदान,पिच और क्रिकेट ही नहीं होगा। इस फिल्‍म में उन खिलाडि़यों की जिंदगी भी होगी।
भारतीय समाज में सिनेमा और क्रिकेट की लोकप्रियता से सभी वाकिफ हैं। 83 में दोनों का मिलन होगा। अभी नहीं मालूम कि कबीर खना क्‍या शिल्‍प अपनाएंगे? फिलहाल कपिल देव की कप्‍तानी भूमिका के लिए रणवीर सिंह को चुना गया है। मोहिंदर अमरनाथ,सुनील गावस्‍कर,कीर्ति आजाद,यशपाल शर्मा,श्रीकांत,रोजर बिन्‍नी,बलविंदर सिंह संधू,संदीप पाटिज,सईद किरमानी,मदन लाल,र‍वि शास्‍त्री,दिलीप वेंगसरकर,सुनील वालसन और मैनेजर मान सिंह के लिए उपयुक्‍त कलाकारों का चुनाव होना है। कास्टिंग डायरेक्‍टर मुकेश छाबड़ा के लिए यह सच्‍ची बड़ी चुनौती होगी।
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में बॉयोपिक और पीरियड फिल्‍मों के लिए खेल-खिनाड़ी की फिल्‍में मुफीद मानी जा रही हैं। उन पर विवाद की संभावनाएं कम होती है। साथ ही उनकी लोकप्रियता और पसंदगी में पार्टी-पॉलिटिक्‍स आड़े नहीं आती। अभी की घोर निराशा के दौर में आम दर्शकों के लिए 83 की जीत पर बन रही फिल्‍म सामूहिक खुशी होगी। वे सभी आनंदित होंगे।

Wednesday, September 27, 2017

रोज़ाना : स्‍वरा की त्‍वरा



रोज़ाना
स्‍वरा की त्‍वरा
-अजय ब्रह्मात्‍मज

स्‍वरा भास्‍कर से पहली मुलाकात उनकी पहली फिल्‍म की शूटिंग के दरम्‍यान हुई थीं। प्रवेश भारद्वाज बिहार की पकड़ुआ शादी पर नियति नाम की फिल्‍म बना रहे थे। उस फिल्‍म की नायिका हैं स्‍वरा भास्‍कर। हैं इसलिए कि नियति अभी तक अप्रदर्शित है। प्रवेश भारद्वाज बिहार की पृष्‍ठभूमि की इस फिल्‍म की शूटिंग बिहार में नहीं कर सकते थे,इसलिए उन्‍होंने भोपाल में बिहार का लोकेशन खोजा था। प्रकाश झा ने तो बाद में अपनी फिल्‍मों में भोपाल को बिहार में तब्‍दील किया। स्‍वरा भास्‍कर 2009 में आई माधोलाल कीप वाकिंग में हिंदी दर्शकों को नजर आईं। इस छोटी फिल्‍म में वह पहचान बनाने में सफल रहीं। उसके बाद का उनका सफर धीमे कदमों से जारी रहा। पिछले दिनों जागरण फिल्‍म फेस्टिवल में उन्‍हें अनारकली ऑफ आरा के लिए सर्वश्रेष्‍ठ अभिनेत्री का पुरस्‍कार मिला। उन्‍हें पिछले साल निल बटे सन्‍नाटा के लिए भी यही पुरस्‍कार मिल चुका है।
स्‍वरा भास्‍कर ऐसी छोटी व कथ्‍यपूर्ण फिल्‍मों में बतौर नायिका एक कदम धरती हैं तो उनका दूसरा कदम मेनस्‍ट्रीम कमर्शियल फिल्‍मों में सहनायिका की भूमिकाओं को संभाल रहा होता है। उनहोंने दोनों के बीच सुदर संतुलन बना रखा है। दमदार अभिनेत्री के तौर पर अपनी पहचान के साथ वह कायम हैं। ऐसा लगता है कि वह ग्‍लैमर की दुनिया का हिस्‍सा बन चुकी हैं,लेकिन फिल्‍मों के चुनाव की तरह स्‍वरा छवि और स्‍वभाव के दोनों पाटों को साध रही हैं। एक ग्‍लैमरस अभिनेत्री की सभी जरूरतों को वह जिम्‍मेदारी और संलग्‍नता के साथ निभाती हैं। साथ ही निजी जिंदगी में किसी दवि की परवाह नहीं करते हुए हर ज्‍वलंत मुद्दे पर आने विचार रखती हैं। हस्‍तक्षेप करती हैं और कई बार तो उनकी पहलकदमी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के उनके मित्रों को झटका देती हैं। स्‍वरा स्‍वतंत्र स्‍वभाव की समर्थ अभिनेत्री हैं।
स्‍वरा की त्‍वरा देखते ही बनती है। फिल्‍मों में अपने किरदारों को निभाते समय उनके इस स्‍वतंत्र स्‍वभाव का स्‍पष्‍ट प्रभावव दिखता है। वे चालू किस्‍म के खांकों में बंधे किरदारों को भी नए आयाम दे जाती हैं,इसलिए सहेली और बहन के साधारण किरदारों को भी वह मानीखेज बना देती हैं। बतौर नायिका उनकी फिल्‍मों में एक-दो गलत चुनावों को नजरअंदाज कर दें तो उनमें एक पैटर्न देखा जा सकता है। उन्‍होंने संघर्षरत महिलाओं के किरदारों को स्‍वर दिया है। शहरी मध्‍यवर्गीय परिवेश में पली-बढ़ी स्‍वरा ने ने अपनी सोच-समझ के दायरे का विस्‍तार किया है। अनुभूति के स्‍तर पर वह ऐसी महिलाओं से जुड़ाव महसूस करती हैं। उनकी अदाकारी में इसके निशान खोजे जा सकते हैं। हिंदी फिल्‍मों की हीरोइनें को आम तौर पर सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर खामोश रहती हैं। गूंगी हो जाती हैं,जबकि स्‍वरा की सोशल मीडिया पर सक्रिय और वाचाल रहती हैं। वह अपनी बात कहती हैं और जवाब भी देती हैं। 

Tuesday, September 26, 2017

रोज़ाना : संजय दत्‍त की प्रभावहीन वापसी



रोज़ाना
संजय दत्‍त की प्रभावहीन वापसी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में यह पुराना चलन है। कोई भी लोकप्रिय स्‍टार किसी वजह से कुछ सालों के लिए सक्रिय न रहे तो उसकी वापसी का इंतजार होने लगता है। अभिनेत्रियों के मामले में उनकी शादी के बाद की फिल्‍म का इंतजार रहता है। मामला करीना कपूर का हो तो उनके प्रसव की बाद की फिल्‍म से वापसी की चर्चा चल रही है। सभी को उनकी वीरे दी वेडिंग का इंतजार है। इस इंतजार में फिल्‍म से जुड़ी सोनम कपूर गौण हो गई हैं। हिंदी फिल्‍मों में अभिनेताओं की उम्र लंबी होती है। उनके करिअर में एक अंतराल आता है,जब वे अपने करिअर की ऊंचाई पर पहुंचने के बाद हीरो के तौर पर नापसंद किए जाने लगते हैं तो उनकी वापसी  वे किरदार बदल कर लौटते हैं। अमिताभ बच्‍चन के साथ ऐसा हो चुका है। एक समय था जब बतौर हीरो दर्शक्‍उन्‍हें स्‍वीकार नहीं कर पा रहे थे। लेखक और निर्देशक उनके लिए उपयुक्‍त फिल्‍म लिख और सोच नहीं पा रहे थे। उस संक्रांति दौर से निकलने के बाद आज अमिताभ बच्‍चन के लिए खास स्‍पेस बन चुका है। उनके लिए अलग से फिल्‍में लिखी जा रही है। ऐसा सौभाग्‍य और सुअवसर सभी अभिनेताओं को नहीं मिल पाता।

संजय दत्‍त के जेल से लौटने के बाद निर्माता-निर्देशकों में होड़ लगी थी कि कौन उन्‍हें सबसे पहले साइन करता है। सभी उनकी वापसी को भुनाने में आगे निकल जाना चाहते थे। इस होड़ में संदीप सिंह ने बाजी मारी। उन्‍होंने ओमंग कुमार के साथ संजय दत्‍त की भूमि की घोषणा कर दी। घोषणा के बाद से भूमि से संबंधित हर मीडिया कवरेज में इसी बात पर जोर दिया गया कि यह उनकी वापसी की फिल्‍म है। खुद संजय दत्‍त भी इस भ्रम के शिकार हुए कि उनकी वापसी की फिल्‍म में दर्शकों की गहरी रुचि है। उन्‍होंने वासी की फिल्‍म के लिए भूमि के चुनाव के समर्थन में बड़ी-बड़ी बातें कीं।  यों लग रहा था कि बहुत ही धमाकेदार वापसी होने जा र‍ही है।फिल्‍म आई तो भूमि ने सभी को निराश किया। संजय दत्‍त्‍के प्रशंसक भी नाखुश दिखे। उन्‍हें लगा कि निर्देशक ने उनके प्रिय अभिनेता के साथ न्‍याय नहीं किया। गौर करें तो संजय दत्‍त से ही चूक हुई। उन्‍होंने सही ढंग की फिल्‍म नहीं चुनी। इस फिल्‍म में तमाम प्रयासों के बावजूद वे प्रभावहीन दिखे। फिल्‍म की मेकिंग और संजय दत्‍त् के किरदार के साथ निर्देशक का ट्रीटमेंट दर्श्‍कों को पसंद नहीं आया।इसी विषय पर आई हिंदी फिल्‍मों में भूमि सबसे कमजोर फिल्‍म साबित हुई। सच को क्रूर अंदाज में दिखाने पर भी दर्शक बिदक जाते हैं। भूमि के साथ तो और भी दिक्‍क्‍तें रहीं।

Saturday, September 23, 2017

फिल्‍म समीक्षा : न्‍यूटन



फिल्‍म रिव्‍यू
न्‍यूटन
-अजय ब्रमात्‍मज
अमित वी मासुरकर की न्‍यूटन मुश्किल परिस्थितियों की असाधारण फिल्‍म है। यह बगैर किसी ताम-झाम और शोशेबाजी के देश की डेमोक्रेसी में चल रही ऐसी-तैसी-जैसी सच्‍चाई को बेपर्दा कर देती है। एक तरफ आदर्शवादी,नियमों का पाबंद और दृढ़ ईमानदारी का सहज नागरिक न्‍यूटन कुमार है। दूसरी तरफ सिस्‍टम की सड़ांध का प्रतिनिधि वर्दीधारी आत्‍मा सिंह है। इनके बीच लोकनाथ,मलको और कुछ अन्‍य किरदार हैं। सिर्फ सभी के नामों और उपनामों पर भी गौर करें तो इस डेमाक्रेसी में उनकी स्थिति,भूमिका औरर उम्‍मीद से हम वाकिफ हो जाते हें। न्‍यूटन 2014 के बाद के भारत की डेमोक्रेसी का खुरदुरा आख्‍यान है। यह फिल्‍म सही मायने में झिंझोड़ती है। अगर आप एक सचेत राजनीतिक नागरिक और दर्शक हैं तो यह फिल्‍म डिस्‍टर्ब करने के बावजूद आश्‍वस्‍त करती है कि अभी तक सभी जल्‍दी से जल्‍दी अमीर होने के बहाव में शामिल नहीं हुए हैं। हैं कुछ सिद्धांतवादी,जो प्रतिकूल व्‍यक्तियों और परिस्थितियों के बीच भी कायम हैं। उन्‍हें दुनिया पागल और मूर्ख कहती है।
सिंपल सी कहानी है। नक्‍सल प्रभावित इलाके में चुनाव के लिए सरकारी कर्मचारियों की एक मंडली सुरक्षाकर्मियों के साथ भेजी जाती है। सुरक्षाकर्मियों के अधिकारी आत्‍मा सिंह(पंकज त्रिपाठी) हैं।  चुनाव अधिकारी न्‍यूटन कुमार(राजकुमार राव) हैं। उनके साथ तीन कर्मचारियों की टीम है,जिनमें एक स्‍थानीय शिक्षिका मलको भी है। हम सिर्फ न्‍यूटन कुमार की बैकस्‍टोरी जानद पाते हैं। नूतन कुमार को अपने नाम के साथ का मजाक अच्‍छा नहीं लगता था,इसलिए उसने खुद ही नू को न्‍यू और तन को टन कर अपना नाम न्‍यूटन रख लिया है। एक तो वह नाबालिग लड़की से शादी के लिए तैयार नहीं होता है। दूसरे व‍ह पिता की दहेज की लालसाओं के खिलाफ है। चुनाव के लिए निकलने से पहले की एक ब्रिफिंग में अपने सवालों से वह ध्‍यान खींचता है। वह अधिकारी उसे बताते हैं कि उसकी दिक्‍कत ईमानदारी का घमंड है। अभी की भ्रष्‍ट दुनिया में सभी ईमानदार घमंडी और अक्‍खड़ घोषित कर दिए जाते हैं,क्‍योंकि वे सब चलता है में यकीन नहीं करते। वे का्रतिकारी परिवर्तन की वकालत या हिमायत भी नहीं करते। वे अपने व्‍यवहार में ईमानदारी की वजह से क्रांतिकारी हो जाते हैं।
अमित वी मासुरकर और मयंक तिवारी की तारीफ बनती है कि वे बगैर किसी लाग-लपेट के जटिल राजनीतिक कहानी रचते हैं। वे उन्‍हें दुर्गम इलाके में ले जाते हैं। इस इलाके में नक्‍सली प्रभाव और सिस्‍टम के दबाव के द्वंद्व के बीच जूझ और जी रहे आदि नागरिक आदिवासी हैं। उनके प्रति सिस्‍टम के रवैए को हम आत्‍मा सिंह की प्रतिक्रियाओं से समझ लेते हैं,जबकि उनमें न्‍यूटन की आस्‍था डेमोक्रेसी की उम्‍मीद देती है। हंसी,तनाव और हड़बोंग के बीच मुख्‍य रूप से कभी आमने-सामने खड़े और कभी समानांतर चलते न्‍यूटन कुमार और आत्‍मा सिंह हमारे समय के प्रतिनिधि चरित्र हैं। डेमोक्रेसी में सबसे निचले स्‍तर पर चल रहे खेल का उजागर करती यह फिल्‍म देश के डेमोक्रेटिक सिस्‍टम की सीवन उधेड़ देती है। लेखकों ने किसी भी दृश्‍य में संवाद या प्रतिक्रिया से यह जाहिर नहीं होने दिया है कि वे कुछ सवाल उठा रहे हैं। यह उनके लेखन की खूबी है कि किरदारों के बगैर पूछे ही दर्शकों के मन में सवाल जाग जाते हैं। न्‍यूटन कुमार का जिद्दी व्‍यक्तित्‍व राजनीतिक सवालों का जरिया बन जाता है।
राजकुमार राव और पंकज त्रिपाठी दोनों ही 2017 की उपलब्धि हैं। दोनों ने अपने सधे अभिनय से कई फिल्‍मों में बहुआयामी किरदारों को जीवंत किया है। न्‍यूटन में एक बार फिर दोनों का हुनर जलवे बिखेर रहा है। राजकुमार राव ने न्‍यूटन के जटिल और गुंफित चरित्र को सहज तरीके से चित्रित किया है। किसी भी दृश्‍य में वे अतिरिक्‍त मुद्राओं का उपयोग नहीं करते। वे उपयुक्‍त भावों के किफयती एक्‍टर हैं। पंकज त्रिपाठी उन्‍हें बराबर का साथ देते हैं। पंकज की अदाकारी देखते समय पलक झपकाने में अगर उनकी झपकती पलकें मिस हो गईं तो किरदार की बारीकी छूट सकती है। वे अनेक दृश्‍यों में सिर्फ आंख,होंठ और भौं से बहुत कुछ कह जाते हैं। अंजलि पाटिल के रूप में हिंदी फिल्‍मों को एक समर्थ अभिनेत्री हासिल हुई है। किरदार में उनकी मौजूदगी देखते ही बनती है। इस फिल्‍म के सहयोगी किरदारों में स्‍थानीय कलाकारों का स्‍वाभाविक अभिनय फिल्‍म के प्रभाव को बढ़ता है।
अवधि - 106 मिनट
**** चार स्‍टार

Friday, September 22, 2017

दरअसल : फिल्‍मों और फिल्‍मी दस्‍तावेजों का संरक्षण



दरअसल....
फिल्‍मों और फिल्‍मी दस्‍तावेजों का संरक्षण
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कहते हैं कि रंजीत मूवीटोन के संस्‍थापक चंदूलाल शाह जुए के शौकीन थे। जुए में अपनी संपति गंवाने के बाद उन्‍हें आमदनी का कोई और जरिया नहीं सूझा तो उन्‍होंने खुद ही रंजीत मूवीटोन में आग लगवा दी ताकि बीमा से मिले पैसों से अपनी जरूरतें पूरी कर सकें। हमें आए दिन समाज में ऐसे किस्‍से सुनाई पड़ते हैं,जब बीमा की राशि के लिए लोग अपनी चल-अचल संपति का नुकसान करते हैं। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में ऐसी अनेक कहानियां प्रचलित हैं। मेहनत और प्रतिभा से उत्‍कर्ष पर पहुंची प्रतिभाएं ही उचित निवेश और संरक्षण की योजना के अभाव में एकबारगी सब कुछ गंवा बैठती हैं। कई बार यह भी होता है कि निर्माता,निर्देशक और कलाकारों के वंशज विरासत नहीं संभाल पाते। वे किसी और पेशे में चले जाते हैं। बाप-दादा के योगदान और उनकी अमूल्‍य धरोहरों का महत्‍व उन्‍हें मालूम नहीं रहता। वे लगभग मुक्‍त होने की मानसिकता में सस्‍ती कीमतों या रद्दी के भाव में ही सब कुछ बेच देते हैं। 
पिछले दिनों राज कपूर निर्मित आर के स्‍टूडियो में आग लग गई। इस आग में स्‍टेज वन जल कर खाक हो गया। इस स्‍टेज पर स्‍वयं राज कपूर,मनमोहन देसाई और सुभाष घई ने अनेक फिल्‍मों की शूटिंग की थी। आग लगने के बाद ऋषि कपूर ने सही ट्वीट किया था कि स्‍टूडियों तो फिर से बन जागा,लेकिन राज कपूर की फिल्‍मों से जुड्री सामग्रियों और कॉस्‍टयूम नहीं लाए जा सकते। यह एक ऐसी क्षति है,जिसकी कीमत रूपयों में नहीं आंकी जा सकती। मुमकिन है कि फिल्‍म देख कर हम फिर से वैसे कॉस्‍ट्यूम तैयार कर ले,लेकिन उनमें मौलिक होने का रोमांस और एहसास कहां से भरेंगे? इस नुकसान के लिए एक हद तक कपूर खानदान जिम्‍मेदार है। आरके स्‍टूडियो की संपत्ति और धरोहरों पर उनका मालिकाना अधिकार है। उनके रख-रखाव और संरक्षण की भी जिम्‍मेदारी उनकी थी। मैंने खुद आरके स्‍टूडियों में सामग्रियों के संरक्षण का बदहाल इंतजाम देखा है। वहां के स्‍टूडियो फ्लोर किराए पर दिए जाते थे,लेकिन उनकी सुरक्षा की समुचित व्‍यवस्‍था नहीं थी। लापरवाही तो रही है। इसके लिए फिल्‍म बिरादरी और राष्‍ट्रीय फिल्‍म अभिलेखागार के अधिकारियों को ठोस कदम उठाने होंगे। ऐसे नियम-कानून बनाने होंगे,जिनके तहत सरकरी संस्‍थाएं फिल्‍मी हस्तियों से जुड़ी सामग्रियों का अधिग्रहण कर सकें।
भारतीय राष्‍ट्रीय फिल्‍म अभिलेखागार पुणे में स्थित है।  इसके राष्‍ट्रीय फिल्‍म विरासत मिशन के तहत दुर्लभ फिल्‍म और गैर फिल्‍मी सामग्रियों का संरक्षण किया जाता है। इस मिशन का लक्ष्‍य परिरक्षण,संरक्षण्‍,डिजिटिलीकरण और देश की समृद्ध फिल्‍म सामग्रियों का जतन करना है। सोरे लक्ष्‍य और उद्देश्‍य कागजी रह गए हैं। मैंने पाया है कि फिल्‍म इंडस्‍ट्री के नामवर और सक्रिय सदस्‍य भी राष्‍ट्रीय अभिलेखागार की मौजूदगी और कार्य से वाकिफ नहीं हैं। अधिकांश निर्माताओं का यह भी नहीं मालूम कि कायदे से उन्‍हें अपनी फिल्‍म का एक प्रिट वहां भेज देना चाहिए। फिल्‍मों से संबंधित अन्‍य सामग्रियों और दस्‍तावेजों को संभालने के लिए उन्‍हें दे देना चाहिए। अभी तो शिवेंद्र सिंह ड़गरपुर ने निजी कोशिश से फिल्‍म हेरिटेज का काम शुरू किया है। प्राण के परिवार ने उन्‍हें प्राण से संबंधित सारी सामग्रियां सौंप दी हैं। शिवेंद्र सिंह ड़ंगरपुर ने फिल्‍म विरासत के संरक्षण का महती कार्य अपने हाथों में लिया है। अभी उनके जैसे दर्जनों व्‍यक्तियों की जरूरत है जो देश में बिखरी विरासत को समेट सकें।
इसके साथ ही हमें अपने इतिहास के प्रति जागरूक होना होगा। भविष्‍य के लिए अतीत का जाना हमेशा जरूरी होता है। जो समाज अपने अतीत का संरक्षण नहीं कर सकता,उसका कोई भविष्‍य नहीं हो सकता। हमें फिल्‍म निर्माताओं को यह तमीज सिखानी होगी कि वे अपनी ही चीजों की कीमत समझें और उनके संरक्षण पर ध्‍यान दें। पहली फिल्‍म से ही जरूरी सामग्रियों का दस्‍तावेजीकरण आरंभ कर दें। नौ साल,पच्‍चीस साल या पचास साल पूरे होन पर करोंड़ों की पार्टी करने से बेहतर है कि लाखों खर्च कर यादों को बचा लें। आनेवाली पीढि़यों की जरूरतों का खयाल करें। साथ ही खुद के लिए अमरता हासिल करें।

Wednesday, September 20, 2017

रोजाना : मुश्किलें बढ़ेंगी कंगना की

रोजाना
मुश्किलें बढ़ेंगी कंगना की
-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले हफ्ते रिलीज हुई कंगना रनोट की फिल्म सिमरन दर्शकों को बहुत पसंद नहीं आई है। कंगना के प्रशंसक भी इस फिल्म से नाखुश हैं। उन्हें कुछ ज्यादा बेहतर की उम्मीद थी। इस फिल्म में कंगना रनोट का निजी व्यक्तित्व और सिमरन का किरदार आपस में गड्ड-मड्ड हुए हैं। फिल्म देखते समय दोनों एक दूसरे को ग्रहण लगाते हैं या ओवरलैप करते हैं। नतीजा यह होता है कि हम वास्तविक कंगना और फिल्मी सिमरन के झोल में फंस जाते हैं। सिमरन में हमेशा की तरह कंगना रनोट का काम का काम बढ़िया है,लेकिन फिल्म कहीं पहुंच नहीं पाती है और निराश करती है। ज्यादातर समीक्षकों ने कंगना के काम की तारीफ की है ,जबकि फिल्म उन्हें पसंद नहीं आई है।
ऐसा माना जा रहा है कि 'सिमरन' को अपेक्षित प्रशंसा और कामयाबी नहीं मिलने से कंगना रनोट की मुश्किलें बढ़ेंगी। सभी मानते हैं कि फिल्में नहीं चलती हैं तो फिल्में मिलनी भी कम होती हैं। जो लोग  यह मान रहे हैं कि पहले 'रंगून' और अभी 'सिमरन' के नहीं चलने से कंगना को फिल्में नहीं मिल पाएंगी, वह सरलीकरण के धारणा से ग्रस्त हैं । सच्चाई यह है कि दो-चार फिल्मों के फ्लॉप होने से कंगना के स्तर के स्टार के कैरियर में ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। उन्हें फिल्में में मिलती रहती हैं और कंगना रनोट ने तो घोषणा कर रखी है कि 'मणिकर्णिका' के बाद वह अपनी फिल्में खुद ही डायरेक्ट करेंगी। वह लेखन और निर्देशन के प्रति गंभीर हैं। समर्थ अभिनेत्री के तौर पर उन्होंने खुद को स्थापित किया है। उन्होंने तीन बार राष्ट्रीय पुरस्कार भी हासिल किया है।
दरअसल कंगना की मुश्किलें दूसरे किस्म की होंगी सिमरन की रिलीज के पहले उन्होंने अपने टीवी इंटरव्यू में जिस ढंग से खुलकर बातें की और ढेर सारे राज और रहस्य उद्घाटित किए कौन से फिल्मी हस्तियां सहम गई है। पिछले दिनों एक पॉपुलर फिल्म स्टार ने स्वीकार किया कि अगर भविष्य में उन्हें कंगना रनोट के साथ कोई फिल्म मिलेगी तो  वे ना कर देंगे। वह ऐसी अभिनेत्री के साथ काम नहीं करना चाहेंगे जिसकी मौजूदगी में बात-व्यवहार को लेकर अधिक सावधानी बरतनी पड़े।हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भी समाज के विभिन्न क्षेत्रों की तरह बहुत कुछ दवा छुपा और रहस्य में रहता है उनके बारे में सभी जानते हैं लेकिन इंडस्ट्री के बाहर कोई उनकी चर्चा नहीं करता। यहां तक कि मीडिया के लोग भी ऐसे रहस्यों के मामले में अपनी आंखें और मुंह बंद रखते हैं। हिंदी फिल्मों के सभी पॉपुलर स्टार से संबंधित कुछ स्याह किस्से हैं, जो सभी कहते सुनते हो शेयर करते हैं। लेकिन उनके बारे में लेखों और संस्मरणों में कोई नहीं लिखता। एक समझदारी के तहत सब कुछ रोशनी के पीछे ढका रहता है। कंगना रनोट ने अपने वक्तव्यों से ऐसे रहस्यों को प्रकाशित कर दिया है। यही उनकी मुश्किलों का सबब बन गया है। फिल्म इंडस्ट्री का कुनबा उन्हें शक की निगाह से देखता है और आपसी मेलजोल से उन्हें दूर रखता है। अनजाने ही कंगना रनोट को अलग-थलग करने की कोशिशें आरंभ हो गई हैं। अब देखना है की कंगना रनोट इन मुश्किलों से कैसे निबटती हैं?

रोज़ाना : जितनी बची है,बचा लो विरासत



रोज़ाना
जितनी बची है,बचा लो विरासत
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले दिनों राज कपूर निर्मित आरके स्‍टूडियो में भीषण आग लगी। अभी तक कोई ठोस और आधिकारिक विवरण नहीं आया है कि इस आग में क्‍या-क्‍या स्‍वाहा हो गया? स्‍वयं ऋषि कपूर ने जो ट्वीट किया,उससे यही लगता है कि राज कपूर की फिल्‍मों से जुड़ी यादें आग की चपेट में आ गईं। उन्‍होंने ट्वीट किया था कि स्‍टूडियो तो फिर से बन जाएगा,लेकिन आरके फिल्‍म्‍स की फिल्‍मों से जुड़ी स्‍मृतियों और कॉस्‍ट्यूम की क्षति पूरी नहीं की जा सकती। ऋषि कपूर बिल्‍कुल ने सही लिखा। कमी यही है कि कपूर परिवार के वारिसों ने स्‍मृतियों के रख-रखाव का पुख्‍ता इंतजाम नहीं किया था। एक कमरे में सारे कॉस्‍ट्यूम आलमारियों में यों ठूंस कर रखे गए थे,ज्‍यों किसभ्‍ कस्‍बे के ड्राय क्लिनर्स की दुकान हो। हैंगर पर लदे हैंगर और उनसे लटकते कॉस्‍ट्यूम। पूछने पर तब के ज्म्म्ेिदार व्‍यक्ति ने कहा था कि कहां रखें? जगह भी तो होनी चाहिए।
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री अपनी विरासत के प्रति शुरू से लापरवाह रही है। निर्माता और अभिनेता भी अपनी फिल्‍मों के दस्‍तावेज सहेजने में रुचि नहीं रखते। फिल्‍म निर्माता सक्रिय हो या निष्क्रिय...उनके प्रोडक्‍शन हाउस में कोई ऐसा विभाग और जिम्‍मेदार व्‍यक्ति नहीं होता जो अपनी ही फिल्‍में और उनसे संबंधित सामग्रियां को संभाल कर रखे। अधिकांश निर्माताओं को यह भी पता नहीं है कि देश में राष्‍ट्रीय फिल्‍म अभिलेखागार(एनएफएआई) जैसी एक सरकारी संस्‍था है,जो फिल्‍म दस्‍तावेजों के संरक्षण और रख-रखाव का कार्य करती है। अब तो कुछ निजी संग्रहकर्ता भी आ गए हैं। ऐसे व्‍यक्ति और संगठन फिल्‍मी सामग्रियों की खरीद-बिक्री नहीं करतीं। उनका संरक्षण करती हैं।
आरके स्‍टूडियो में लगी आग को खतरे की घंटी के रूप में लेना चाहिए। राष्‍ट्रीय फिल्‍म अभिलेखागार के अधिकारी और संबंधित मंत्रालय इस संबंध में अभियान चलाए। सभी को बताने-समणने की जरूरत है कि फिल्‍मी सामग्रिया और यादें हमारी बहुमूल्‍य थाती हैं,जिन पर केवल उस प्रोडक्‍शन हाउस या परिवार का अधिकार नहीं है। उन्‍हें सामूहिक विरासत और राष्‍ट्रीय धरोहर का दर्जा मिलना चाहिए। अभी सब कुछ नष्‍ट नहीं हुआ है। अभी कुछ पुराने स्‍टूडियो हैं और कुछ पुराने प्रोडक्‍शन हाउस के जर्जर दफ्तर...हमें वहां बची विरासत को बचाने के प्रयास में लग जाना चाहिए। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में सक्रिय व्‍यक्तियों के बीच जागरूकता लाने की भी जरूरत है। वे सचेत रहेंगे तो किसी दुर्घटना और आपदा की स्थिति में भी बहुमूल्‍य सामग्रियों का संरक्षण किया जा सकेगा।
फिलहाल आरके स्‍टूडियो में लगी आग में नष्‍ट हुई साग्रियों का ब्‍योरा आए तो नुकसान की वास्‍तविकता पता चले। फिल्‍म इंडस्‍ट्री को लगे जागें और विरासत के प्रति लापरवाही खत्‍म करें।  

Sunday, September 17, 2017

अच्‍छाई से बड़ी कोई चीज नहीं - भूमि पेडणेकर



अच्‍छाई से बड़ी कोई चीज नहीं-भूमि पेडणेकर
-अजय ब्रह्मात्‍मज
टॉयलेट एक प्रेम कथा में भूमि पेडणेकर की बहुत तारीफ हो रही है। इस तारीफ से उनकी मां खुश हैं। भूमि के फिल्‍मों में आने के बाद से मां की ख्‍वाहिश रही कि बेटी को जया भदुड़ी,शबाना आजमी और स्मिता पाटिल की कड़ी की अभिनेत्री माना जाए। ऐसा प्‍यार मिले।
- कैसे एंज्‍वॉय कर रहे हो आप टॉयलेट एक प्रेम कथा की कामयाबी और उसमें अपने काम की तारीफ से?
0 मैं तो एकदम से सन्‍न रह गई थी। मेरी पहली फिल्‍म छोटी थी। मैंने पहली बार प्रमोशन में ऐसे हिस्‍सा लिया। बड़े पैमाने पर सब कुछ चल रहा था। समझने की कोशिश कर रही थी कि मेरे साथ क्‍या हो रहा है? अब संतोष का एहसास है। फिल्‍म और मेरा काम लोगों को पसंद आया। दूसरे हफ्ते से मैं थिएटरों में जाकर दर्शकों की प्रतिक्रियाएं देख-सुन रही हूं।
- किन दृश्‍यों में दर्शक ज्‍यादा तालियां बजा रहे हैं?
0 सेकेड हाफ में मेरा एक मोनोलॉग है। जहों दादी मो के सामने गांव की औरतों को कुछ बता रही हूं। इंटरवल सीन है। जब केशव को डेटॉल लगा रही हूं। फिल्‍म के संदेश के साथ हमारी प्रेम कहानी के दृश्‍यों को दर्शक समझ रहे हैं1 पहली बार जब खेले में शौच के लिए जाती हूं। वह दृश्‍य भी खास है। सब मिला कर खुश हूं।
-क्‍या आप के अनुभव के दायरे में जया जैसी लड़कियां रही हैं?
0 मेरे संपर्क में कोई नहीं है। मेरी मां सातवें दशक की जया थीं। उस समय लड़कियां ज्‍यादा दबाव में रहती थीं। फिर भी मां और मौसी में जबरदस्‍त जोश था। मैंने उन दोनों से प्रेरणा ली। मेरी मां अपने समय में यूथ मूवमेंट में शामिल रही थीं। अपने हकों के लिए उन्‍होंने लड़ाई की। मेरी मां और पापा के परिवारों में प्रगतिशील सोच रही है।
-लेखक और निर्देशक से क्‍या सहायता मिली?
0 मेरी अभी तक की फिल्‍में पूरे रिसर्च के बाद लिखी गई हैं। टॉयलेट एक प्रेम कथा के लेखकों के पास सारी जानकारियां थीं। सब कुछ स्क्रिप्‍ट में था। भी नारायण सिंह गोरखपुर के हें। वे इस फिल्‍म की भाषा और मिट्टी जानते हैं। मेरे लिए आसान रहा।
-क्‍या कभी खूले में शौच की मजबूरी रही?
0 बचपन में कई बार...पूना या गोवा जाते समय रोडट्रिप में ऐसा होता था। तब हाईवे पर टॉयलेट नहीं थे। एक बार चिपलूण में एक घर का दरवाजा खटखटाया था कि हमें टॉयलेट का इस्‍तेमाल करने दें। घर की महिलाएं चौंक गई थीं।
-क्‍या स्क्रिप्‍ट पढ़ते समय अंदाजा हो गया था कि जया स्‍ट्रांग किरदार है?
0बिल्‍कुल... तब मुझे पता नहीं था कि इसमें अक्षय कुमार होंगे। मरे लिए लव स्‍टोरी बहुत खूबसूरत थी।  यह तो लग गया था कि जया औरतों को प्रेरित करेगी। मेरे मन में अक्षय सर के लिए इतना आदर है। उन्‍होंने मुझे पूरा महत्‍व दिया। जया के किरदार को चमकने दिया। मुझे मौका कदया।
-तो आप को इंतजार का फल मिला...दम लगा के हईसा के बाद आप ने अच्‍छी स्क्रिप्‍ट का इंतजार किया...धैर्य बनाए रखीं?
0 अब कह सकती हूं कि हां। तब तो सभी को लग रहा था कि मैं कोई फिल्‍म क्‍यों नहीं साइन कर रही हूं। लोग कह रहे थे कि फिल्‍म कर लो। मेरा मानना है कि सही फिल्‍में होनी चाहिए। संख्‍या बढ़ाने से क्‍या फायदा? में अपने परिवार को श्रेय दूंगी। उन्‍होंने पूरा सपोर्ट किया। मेरी मां का सहयोग रहा। उन्‍होंने मुझे कहा कि मैं शुभ मंगल सावधान करूं। यशराज फिल्‍म्‍स से होने का फायदा रहा।
-अपनी उपलब्धियों से घर में भाव बढ़ता है। कई बार दफ्तर में भी बढ़ता है। आप यशराज फिल्‍म्‍स में एक कर्मचारी थीं। अभी आप अभिनेत्री हैं। आप के और दूसरे कर्मचारियां के व्‍यवहार में कोई फर्क आया है क्‍या?
0 सभी मेरे परिचित है। मेरे प्रति उनका प्रेम रहा है। उनके साथ मेरे संबंधों में बदलाव नहीं आया है। शुरू में कुछ ने हाय-हेलो करना बंद कर दिया।फिर मैंने पहल की।मैंने कभी किसी को अनदेखा नहीं किया। मैं सभी से मिलती हूं। नया रिलेशन इवॉल्‍व हो गया है। अक्षय सर के साथ काम करने के बाद समझ गई हूं कि अच्‍छाई से बड़ी कोई चीज नहीं है।आयुष्‍मान से कितना सीखा है मैंने।
-शुभ मंगल सावधान के बारे में बताएं?
0 बहुत ही अलग किरदार है सुगंधा का। दिल्‍ली में पली-बढ़ी लड़की है। उसने सुरक्षित जिंदगी जी है। अपने पति को लेकर उसके अनेक अरमान हैं। वह कंपलीट रिलेशशिप में यकीन करती है।मुझे डायरेक्‍टर प्रसन्‍ना ने समझाया कि उन्‍हें क्‍या नहीं चाहिए और क्‍या चाहिए? उन्‍होंने तमिल की अपनी फिल्‍म को ही हिंदी दर्शकों के लिए बनाया है। इस फिल्‍म के किरदार हमें अपने घरों में मिल जाएंगे। इसमें एक समस्‍या है,लेकिन वह केवल लड़के की समस्‍या नहीं है। कई बार रिश्‍ते समस्‍याओं से बड़े होते हैं। फिल्‍म में लड़ी अपने पार्टनर के साथ खड़ी मिलती है,जब उसका कंफीडेंस लो है।वह उसके साथलड़ती है। इस फिल्‍म में किरदार की अपूर्णता को सेलिब्रेट किया गया है। बहुत ही प्रोग्रेसिव फिल्‍म है।
-फिल्‍म के निर्माता आनंद राय के साथ कैसा अनुभव रहा?
0 उनके साथ बहुत मजा आया। उन्‍होंने साफ-सुथरी फिल्‍म बनाने में गाइड किया। उनके साथ काम करने का मन था। उम्‍मीद है कि जल्‍दी ही उनके निर्देशन में काम करने का मौका मिले। वे मेरे विशलिस्‍ट में थे।
-और कौन है?
0शिमित अमीन,विशाल भारद्वाज,जोया अख्‍तर,नितेश तिवारी,शकुन बत्रा,शुजीत सरकार...इतने सारे हैं। जोया के साथ एक शॅर्ट फिल्‍म कर ली है।
-अभिषेक चौबे की अगली फिल्‍म के बारे में क्‍या कहेंगी?
0उसके बारे में अभी कुछ बताना जल्‍दबाजी होगी।
-क्‍या केवल डिग्‍लैम रोल ही करने हैं?
0 नहीं,मैं टिप टिप बरसर पानी भी गाना चाहती हूं। मैं ठोस किस्‍म की भूमिकाएं करती रहूंगी। हर तरीके के किरदार चाहिए। रियल लाइफ में मैं ग्‍लैमरस लड़की हूं। आम लड़कियों की सारी खासियतें हैं मुझ में...

Saturday, September 16, 2017

फिल्‍म समीक्षा : लखनऊ सेंट्रल

फिल्‍म रिव्‍यू

लखनऊ सेंट्रल

-अजय ब्रह्मात्‍मज



इस फिल्‍म के निर्माता निखिल आडवाणी हैं। लेखक(असीमअरोड़ा के साथ) और निर्देशक रंजीत तिवारी हैं। कभी दोनों साथ बैठ कर यह शेयर करें कि इस फिल्‍म को लिखते और बनाते समय किस ने किस को कैसे प्रभावित किया तो वह ऐसे क्रिएटिव मेलजोल का पाठ हो सकता है। यह एक असंभव फिल्‍म रही होगी,जिसे निखिल और रंजीत ने मिल कर संभव किया है। फिल्‍म की बुनावट में कुछ ढीले तार हैं,लेकिन उनकी वजह से फिल्‍म पकड़ नहीं छोड़ती। मुंबई में हिंदी फिल्‍म बिरादरी के वरिष्‍ठों के साथ इसे देखते हुए महसूस हुआ कि वे उत्‍तर भारत की ऐसी सच्‍चाइयों से वाकिफ नहीं हैं। देश के दूसरे नावाकिफ दर्शकों की भी समान प्रतिक्रिया हो सकती है। कैसे कोई मान ले कि मुरादाबाद का उभरता महात्‍वाकांक्षी गायक भेजपुरी के मशहूर गायक मनोज तिवारी को अपनी पहली सीडी भेंट करने के लिए जान की बाजी तक लगा सकता है?

केशव गिरहोत्रा(हिंदी फिल्‍मों में नहली बार आया है यह उपनाम) मुराबाद के लायब्रेरियन का बेटा है। उसे गायकी का शौक है। उसका ख्‍वाब है कि उसका भी एक बैंड हो। तालियां बाते दर्शकों के बीच वह आए तो सभी उसका नाम पुकार रहे हों। उसके आदर्श हैं मनोज तिवारी। इसी मनोज तिवारी से मिलने की बेताबी में वह एक आईएएस अधिकारी की हत्‍या के संगीन अपराध में फंस जाता है। आईएएस अधिकारी के परिजन चाहते हैं कि उसे फांसी की सजा मिले। वे हाईकोर्ट में अपील करते हैं। केशव को मुरादाबाद से लखनऊ भेजा जाता है। मुरादाबाद से लखनऊ स्‍थानांतरण की प्रक्रिया में केशव की संयोगवश एनजीओ एक्टिविस्‍ट गायत्री कश्‍यप से मुलाकात हो जाती है। केशव को भान हो गया है कि गायत्री पर जिम्‍मेदारी है कि वह लखनऊ जेल के कैदियों को लेकर एक बैंड बनाए,जो इंटर जेल बैंड प्रतियोगिता में हिस्‍सा ले सके। केशव खुद को वालंटियर करता है और गायत्री से वादा करता है कि वह बैंड के लिए जरूरी बाकी तीन कैदी खोज लेगा। हम साथ-साथ जेल के अंदर कैदियों के बीच समूह और दादागिरी की लड़ाई भी देखते हैं। जेलर श्रीवास्‍तव के पूर्वाग्रह से परिचित होते हैं। अंदाजा लग जाता है कि श्रीवास्‍तव पूरी ताकत और साजिश से केशव के सपने को साकार नहीं होने देगा।

रंजीत तिवारी ने जेल के अंदर बैंड की टीम बनने का ड्रामा रोमांचक दृश्‍यों के साथ रचा है। कैदियों की नोंक-झोंक और उनकी आदतें हमें उनके अलग-अलग व्‍यक्त्त्वि की जानकारी दे देती हैं। निर्देशक की पसंद और कास्टिंग डायरेक्‍टर के सुझावों की दाद देनी होगी कि सहयोगी भूमिकाओं में सक्षम कलाकारों का चुनाव किया गया है। विक्‍टर चट्टोपाध्‍याय(दीपक डोबरियाल),पुरुषोत्‍तम मदन पंडित(राजेश शर्मा),परमिंदर सिंह गिल(जिप्‍पी ग्रेवाल) और दिक्‍क्‍त अंसारी(इनामुलहक) ने अपने किरदारों से बैंड और फिल्‍म को बहुरंगी बनाया है। सभी किरदारों की एक बैक स्‍टोरी है। गंभीर अपराधों की सजा भुगत रहे ये कैदी बीच में एक बार पैरोल मिलने पर परिवारों के बीच लौटने पर महसूस करते हैं कि वे अब उनके काबिल नहीं रह गए हैं। यहां से उन चारों का प्‍लान बदल जाता है। इन चारों के साथ रवि किशन,रोनित राय और वीरेन्‍द्र सक्‍सेना अपनी भूमिकाओं में जंचे हैं। फरहान अख्‍तर की अतिरिक्‍त तारीफ की जा सकती है। उन्‍होंने छोटे शहर के युवक को आत्‍मसात किया है।

फिल्‍म के क्‍लाइमेक्‍स के टिवस्‍ट को निर्देशक ने अच्‍छी तरह बचा कर रखा है,लेकिन वहां तक पहुंचने की बोझिल राह चुन ली है। फिल्‍म क्‍लाइमेक्‍स के पहले ढीली हो जाती है। हिंदी फिल्‍मों की यह सामान्‍य समस्‍या है। फिल्‍म अपनी अन्विति में बिखर जाती है और अंत दुरूह हो जाता है। यह दिक्‍कत लखनऊ सेंट्रल में भी है। फिर भी रंजीत तिवारी उत्‍तर भारत की एक खुरदुरी कहानी कीने में सफल रहे हैं। फिल्‍म में समाज में मौजूद राजनीति और अप्रत्‍यक्ष रूप से जातीय दुराग्रह की छाया भी है। चूंकि लेखक-निर्देशक का जोर कहीं और है,इसलिए वे वहां रके नहीं हैं और न गहरे संवादों से उन्‍हें रेखांकित किया है।

फिल्‍म का गीत-संगीत थोड़ा कमजोर है। इस संगीत प्रधान फिल्‍म में उत्‍तर भारतीय संगीत का सुर और स्‍वर रहता तो थीम और प्रभावशाली हो जाता। क्‍लाइमेक्‍स में पंजाबी धुन का गीत बेअसर रहता है। 

अवधि 135 मिनट

*** ½ साढ़े तीन स्‍टार 

फिल्‍म समीक्षा : सिमरन



फिल्‍म रिव्‍यू
अभिनेत्री की आत्‍मलिप्‍तता
सिमरन
-अजय ब्रह्मात्‍मज

हंसल मेहता निर्देशित सिमरन देखते समय शीर्षक भूमिका निभा रही कंगना रनोट की वर्तमान छवि स्‍वाभाविक रूप से ध्‍यान में आ जाती है। ज्‍यादातर पॉपुलर स्‍टार की फिल्‍मों में उनकी छवि का यह प्रभाव काम करता रहता है। कंगना रनोट अपने टीवी इंटरव्‍यू में निजी जिंदगी और सामाजिक मामलों पर अपना पक्ष स्‍पष्‍ट शब्‍दों में रख रही थीं। इन विवादास्‍पद इंटरव्‍यू से उनकी एक अलग इमेज बनी है। सिमरन के शीर्षक किरदार की भूमिका में उनकी छवि गड्डमड्ड हुई है। फिल्‍म के अनेक दृश्‍यों में ऐसा लगता है कि अभी तो कंगना को इंटरव्‍यू में यही सब बोलते सुना था।
बहरहाल,सिमरन प्रफुल्‍ल पटेल की कहानी है। प्रफ़ुल्‍ल पटेल अमेरिका के अटलांट शहर में अपने मां-बाप के साथ रहती है। उसका तलाक हो चुका है। विधवा विलाप के बजाए व‍ह जिंदगी को अपने अंदाज में जीना चाह रही है। मध्‍यवर्गीय गुजराती मां-बाप की एक ही ख्‍वाहिश है कि वह फिर सेशादी कर ले और सेटल हो जाए। रोज की खिच-खिच से परेशान प्रफुल्‍ल एक अलग घर लेना चाहती है। उसने कुछ पैसे जमा कर रखे हैं। संयोग ऐसा बनता है कि इसी बीव वह अपनी सहेली के साथ लास वेगास पहुंच जाती है। वहां के एक कैसिनो में पहली रात कुछ जीतने के बाद अगले दिन वह सब कुछ हार जाती है। फिर से बाजी आजमाने के लिए व‍ह कर्ज में मोटी रकम लेती है। मोटी रकम भी हारने के बाद उसकी जिंदगी मुश्किल मोड़ पर आ जाती है। इस फिल्‍म में संयोगों की भरमार है। इस बार वह रिटेल शॉप के गलले से कुछ नगद लेकर भागने में कामयाब हो जाती है। अनजाने में की गई चोरी ही उसकी आदत बन जाती है। व‍ह लिपस्टिक बैंडिट के नाम से कुख्‍यात हो जाती है। और फिर आगे की घटनाएं अविश्‍वसनीय तरीके से बढ़ती हैं।
सिमरन देखने से पता चलता है कि अमरिका के बैंकों की सिक्‍युरिटी इतनी लचर है कि महज एक हुडी पहन कर जेब में हाथ हिला कर ही कैशियर और बैंक कर्मचारियों को डराया जा सकता है। कहीं यह फिल्‍म देख कर भारत में कोई ऐसा दुस्‍साहस न करे। नाहक पकड़ा जाएगा। वहां की पुलिस भी हर बार कार से भाग रही प्रफुल्‍ल को नहीं पहचान और पकड़ पाते। अंत में वह घिरती भी है तो पीछा कर रही पुलिस की आंखों में धूल झोंक कर भाग जाती है। बाद में आत्‍मसमर्पण करते समय वह जो कारण बताती है,उससे हंसी आ सकती है,लेकिन वह भारतीय सोच की विडंबना भी है।
सिमरन विदेश में पली-बढ़ी और भारतीय दकियानूसी संस्‍कारों से निकलने की छटपटाहट में भटकी प्रफुल्‍ल पटेल की कहानी है। अपनी जड़ों से कटी ऐसी लड़कियों और लड़कों की की स्‍वतंत्रता की चाहत उन्‍हें भ्रष्‍ट और आसान रास्‍तों पर ले जाती है। प्रफुल्‍ल उन लाखों युवाओं की प्रतिनिधि चरित्र है। लेखक-निर्देशक ने एक इंडेपेंडेट लड़की के मिसएडवेंचर को बहुत अच्‍छी तरह चरित्र में उकेरा है। इस चरित्र को गढ़ने में स्‍वयं कंगना का भी योगदान है। इस चरित्र को निभाने में बतौर अभिनेत्री कंगना की आत्‍मलिप्‍तता उन्‍हें निर्देशक के नियंत्रण से बाहर कर देती है। यह फिल्‍म की सबसे बड़ी कमजोरी है। सहायक किरदार गौण भूमिकाओं में रह जाते हैं। मां-बाप और मंगेतर की भूमिका निभा रहे किरदार अपनी ईमानदारी के बावजूद बहुत कुछ जोड़ नहीं पाते। हमें उनसे सहानुभूति मात्र होती है। विदेशों की पृष्‍ठभूमि पर बनी सभी फिल्‍मों की आम समस्‍या है कि उनमें वहां का समाज अनुपस्थित रहता है। सिमरन उसी कड़ी में शामिल हो गई है,जबकि हंसल मेहता के निर्देशन से उम्‍मीद थी कि यह फिल्‍म प्रफुल्‍ल की दुविधाओं और विसंगतियों को उचित संदर्भ देगी। व्‍यक्ति चरित्रों के चित्रण में माहिर हंसल मेहता इस फिल्‍म में निराश करते हैं।
फिल्‍म में कंगना ही कंगना हैं। चरित्र की एकांगिता के बावजूद वह प्रभावित करती हैं। कुछ दृश्‍यों में असंयमित भाव प्रदर्शन से वह कंफ्यूज दिखती हैं। इस फिल्‍म में गुजराती संवादों का प्रचुर इस्‍तेमाल हुआ है। पश्चिम भारत के दर्शक तो गुजराती समझ लेंगे,लेकिन दूसरे इलाकों के दर्शकों को दिक्‍क्‍त होंगी। ध्‍येय तो समझ में आ जाता है,लेकिन शब्‍द पल्‍ले नहीं पड़ते।
अवधि 125 मिनट
*** तीन स्‍टार