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Thursday, August 31, 2017

रोज़ाना : बेलौस और बेलाग सलीम खान



रोज़ाना
बेलौस और बेलाग सलीम खान
-अजय ब्रह्मात्‍मज
सलमान खान जिन बातों के लिए बदनाम हैं,उनमें से एक आदत उनके पिता सलीम खान में भी है। सलमान ने अपने पिता से ही यह सीखा होगा। बस पिता की तरह वे उसे अपना हुनर नहीं बना पाए। सलीम खान हर मुद्ददे पर बेलाग दोटूक बालते हैं। उनके बयानों और बातों में कोई डर नहीं रहता। विवादास्‍पद मुद्दों पर भी अपनी राय रखने से वे नहीं हिचकते। मेरा व्‍यक्तिगत अनुभव है कि उनके जवाब विस्‍तृत होते हैं,जिसमें सवाल के हर पहलुओं के साथ उन संभावित सवालों के भी जवाब होते हैं जो बाद में पूछ जा सकते हैं। आज के मीडियाकर्मियों के लिए उनके जवाबों में से प्रासंगिक पक्तियां छांट पाना मुश्किल काम होता है। एक बार मैंने उनका नंबर मांगा और पूछा कि कब फोन करना ठीक होगा। और क्‍या वे फोन उठाते या बुलाने पर आ जाते हैं। उनका जवाब था,मैं तो रौंग नंबर पर आधे घंटे बातें करता हूं। आप फोन करना। खाली रहा तो उठा लूंगा।
यह दीगर सच्‍चाई है कि वे मीडिया से बातें करना अधिक पसंद नहीं करते। बेटे सलमान खान की फिल्‍म रिलीज हो या वे किसी विवाद में उलझे हों तो स्‍पष्‍टीकरण देने आ जाते हैं। करीबी बताते हैं कि उनके बेटे आज भी उनसे बहुत घबराते हैं। अपनी फिल्‍में उन्‍हें दिखाने में हिचकते हैं,क्‍योंकि वे फिल्‍म की कमियां बता देते हैं। सलमान खान की पिछली फिल्‍म ट्यूबलाइट के नहीं चलने का उन्‍हें अंदेशा था। उनकी राय में सलमान खान की प्रचलित इमेज से अलग किरदार होने की वजह से उनके प्रशंसक बिदक गए। उन्‍हें अपना सल्‍लू भाई नहीं दिखा। पिछले दिनों एक इंटरव्‍यू में उन्‍होंने स्‍पष्‍ट शब्‍दों में कहा कि फिल्‍म अच्‍छी थी,लेकिन सलमान खान के उपयुक्‍त नहीं थी। अगर इसमें कोई और स्‍टार होता तो फिल्‍म चल जाती। सलमान खान की फिल्‍म में एक्‍शन और लव नहीं हो और वह लाचार एवं पिटा दिखे तो उसके प्रशंसक कैसे बर्दाश्‍त करेंगे?
इसी इंटरव्‍यू में उन्‍होंने अक्षय की खुली तारीफ की है। उनकी राय में केवल अक्षय कुमार ने समय के साथ खुद को अच्‍छी तरह बदला है। वे परिष्‍कृत हुए हैं। उनकी राय में अजय देवगन,आमिर खान और सलमान खान में भी परिष्‍कार आया है,लेकिन अक्षय कुमार का सफर तो अकल्‍पनीय है। आज वे ऐसे अभिनेता के तौर पर उभरे हैं,जो किसी भी विषय की फिल्‍म कर सकते हैं।
इन दिनों कौन अपने बेटों को छोड़ किसी और की तारीफ करता है? यह सलीम खान की ही सलाहियत है जो वे अक्षय कुमार की उपलब्धियों पर गौर करते हैं।

Wednesday, August 30, 2017

रोज़ाना : बारिश के बहाने गाए तराने



रोज़ाना
बारिश के बहाने गाए तराने
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हर मानसून में दो-तीन बार ऐसा होता है कि बारिश की बूंदें समुद्र की लहरों के साथ मिल कर मुंबई शहर के पोर-पोर  को आगोश में लेने के लिए बेताब थीं। दो दिनों चल रही बूंदाबांदी ने मूसलाधार रूप लिया और शहर के यातायात को अस्‍त-व्‍यस्‍त कर दिया। देापहर होने तक पुलिस महकमे से चेतावनी जारी हो गई। संदेश दिया गया कि बहुत जरूरी न हो तो घर से नहीं निकलें। सुबह दफ्तरों को निकल चुके मुंबईकरों के लिए घर लौटना मुश्किल काम रहा। सोशल मीडिया पर अनेक संदेश आने लगे। सभी बारिश में फंसे अपने दोस्‍तों को घर बुलाने लगे। गणेश पूजा के पंडालों ने मुंबईकरों के लिए चाय-पानी और भोजन की खास व्‍यवस्‍था की। यही इस शहर का मिजाज है। बगैर आह्वान के ही सभी नागरिक अपने तई तत्‍पर रहते हैं मदद के लिए।
हिंदी फिल्‍मों में बारिश की ऐसी आपदा नहीं दिखती। फिल्‍मों में बारिश रोमांस अज्ञेर प्रेम का पर्याय है। शुरू से ही बादलों के गरजने और बिजली के चमकने के साथ अकस्‍मात बारिश होने लगती है। हीरो-हीरोइन बारिश का आनंद उठाने के साथ रोमांटिक खयालों में खो जाते हैं। उनके सोए और अनकहे जज्‍बात बारिश के बहाने तराने के रूप में गूंजने लगते हैं। पहले हीरो-हीरोइन की नजदीकियां बढ़ाने और दिखाने के लिए बारिश के दृश्‍य रखने का चलन आम था। ऐसे दृश्‍यों में दोनों की गीली चाहत बरसात में भीग कर भड़कने लगती है। हीरोइन पहले साड़ी और अब किसी भी लिबास में तरबतर होकर हीरो के साथ-साथ पुरुष दर्शकों लुभाती है। समर्थ और अनुभवी फिल्‍मकारों ने इसे सौंदर्य से परिपूर्ण रखा तो चालू फिल्‍मकारों ने कल्‍पना के अभाव में देह प्रदर्शन से दर्शकों को उत्‍तेजित किया। अप्रोच जो भी रहा,निशाने पर फिल्‍म की हीरोइनें रहीं। उन्‍हें मादक अंदाज में पेश कर दर्शकों की दबी और कुंठित भावनाओं को सुलगाया गया। यह अचानक नहीं हुआ है कि अब हिंदी फिल्‍मों में बारिश के दृश्‍य और गाने नहीं के बराबर हो गए हैं। फिल्‍मों में रोमांस का नजरिया और रवैया बदल चुका है।
हिंदी फिल्‍मों में बरसात के गानों पर रिसर्च होना चाहिए। ज्‍यादातर गानों में रोमांस के साथ हीरो-हीरोइन की कामुक इच्‍छाओं को शब्‍द दिया गया है। यों लगता है कि बरसों की दबी ख्‍वाहिश पूरा करने का वक्‍त आ गया है। रिमझिम गिरे सावन,सुलग सुलग जाए मन,बरखा रानी जरा जम के बरसो,भीगी भीगी रुत में तुम हम हम तुम,भीगी भीगी रातों में ऐसी बरसातों में,गी आज सावन की ऐसी झड़ी है जैसे अनेक गीतों के उदाहरण लिए जा सकते हैं। कुछ फिल्‍मों में जरूर बारिश का रिश्‍ता खेती और खुशहाली से जोड़ा गया,लेकिन ऐसी फिल्‍में और दृश्‍य बेहद कम हैं।
  

Tuesday, August 29, 2017

रोज़ाना : नू का न्‍यू तन का टन



रोज़ाना
नू का न्‍यू तन का टन
-अजय ब्रह्मात्मज
माता-पिता ने नाम रखा था नूतन। स्‍कूल में सहपाठी मजाक उड़ाते थे,इसलिए नूतन ने अपने नाम में नू का न्‍यू और तन का टन कर लिया...इस तरह वह नतन से न्‍यूटन हो गया। अमित मासुरकर की फिल्‍म न्‍यूटन में राजकुमार राव शीर्षक भूमिका निभा रहे हैं। उनके साथ रघुवीर यादव,संजय मिश्र,पंकज त्रिपाठी और अंजलि पाटिल मुख्‍य भूमिकाओं में हैं। राजकुमार राव ने हाल ही में रिलीज हुई बरेली की बर्फी में प्रीतम विद्रोही के रोल में दर्शकों का दिल जीता है। हर किरदार के रंग में ढल कर अलग अंदाज में पेश आ रहे राजकुमार राव इस फिल्‍म में एक नए रंग में दिखेंगे। 
 
हिंदी में ऐसी फिल्‍में कम बनती हैं,जो समसामयिक और राजनीतिक होने के साथ मनोरंजक भी हों। न्‍यूटन अमित मासुरकर का साहसी प्रयास है,जिसे आनंद एल राय का जोरदार समर्थन मिल गया है। इस फिल्‍म से जुड़ने के संतोष के बारे में आनंद एल राय कहते हैं,यह फिल्‍म मेरी जरूरत है। इस फिल्‍म से मुझे मौका मिल रहा है कि मैं समाज को कुछ रिटर्न कर सकूं। मेरे लिए ऐसी फिल्‍में लाभ-हानि से परे हैं। इसके पहले निल बटे सन्‍नाटा से जुड़ने पर ऐसा ही संतोष हुआ था। मुझे लगता है कि न्‍यूटन जैसी फिल्‍मों से जुड़ने पर मेरी रीढ़ सीधी हो जाती है। एक ताकत मिलती है। मेरा मुख्‍य काम और फिल्‍में दुनियादारी के प्रभाव में है। उससे निकलने और स्‍वार्थहीन तरीके से कुछ कर पाने का एहसास और मौका देती हैं ऐसी फिल्‍में।

न्‍यूटन को बर्लिन फिल्‍म फेस्टिवल में पुरस्‍कार मिला था। उसके बाद यह फिल्‍म चालीस फेस्टिवल में जा चु‍की है। हर फेस्टिवल से सराहना बटोरने के बाद अब यह देश के सिनेमाघरों में पहुंच रही है। अमित मासुरकर ने इसे रियलिस्‍ट तरीके से शूट किया है। हिंदी फिल्‍मों के ढांचे में रहते हुए यह फिल्‍म वास्‍तविकता का एहसास देगी। अमित मासुरकर के लिए यह फिल्‍म लोकतंत्र के सिद्धांत और व्‍यवहार में प्रचलित फर्क को नायक न्‍यूटन के नजरिए से दर्शाती है। हर बार चुनाव के दिन मतदान केंद्र पर होने वाली घटनाओं की खबरें बताती रहती हैं कि मतदान के दिन लोकतंत्र के कई रूप नजर आते हैं। लोकतंत्र के एक रूप को न्‍यूटन में हम देखेंगे। फिल्‍म का नायक न्‍यूटन एक ईमानदार और कर्तव्‍यनिष्‍ठ युवक है। वह अपने जीवन और कार्य में आदर्श व्‍यवहार करता है। सरकारी दफ्तर में क्‍लर्क की नौकरी कर रहे न्‍सूटन की इलेक्‍शन ड्यूटी लग जाती है। इस ड्यूटी का तत्‍परता से निभाने में वह भारतीय लाकतंत्र और राजनीति के सूक्ष्‍म पहलुओं से परिचित होता है।

Monday, August 28, 2017

दरअसल : सृजन और अभिव्‍यक्ति की आजादी



दरअसल...
सृजन और अभिव्‍यक्ति की आजादी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

ठीक चार महीने पहले भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा गठित श्‍याम बेनेगल की अध्‍यक्षता में गठित कमिटी ने अपनी रिपोर्ट दे दी थी। सीबीएफसी(सेट्रल फिल्‍म सर्टिफिकेशन बोर्ड) की कार्यप्रणाली और प्रमाणन प्रिया में सुधार के लिए गठित इस कमिटी में श्‍याम बेनेगल के साथ कमल हासन,राकेश ओमप्रकाश मेहरा,पियूष पाडे,भावना सोमैया,गौतम घोष,नीना लाठ और के संजय मूर्ति थे। कमिटी की छह बैठकें हुईं। कमिटी ने फिल्‍म से संबंधित संस्‍थाओं,संगठनों और जिम्‍मेदार व्‍यक्तियों से सलाह मांगी थी। एनएफडीसी के सहयोग से आम दर्शकों के साथ भी विमर्श हुआ। उनकी रायों पर भी विचार किया गया। मिली हुई सलाहों के परिप्रेक्ष्‍य में सीबीएफसी की वर्तमान संरचना,कार्यप्रणाली और प्रमाणन प्रकिया पर हर पहलू से विचार-विमर्श करने के बाद कमिटी ने अपनी रिपोर्ट सौंपी।
सीबीएफसी को बोलचाल की भाषा में सेंसर बोर्ड कह दिया जाता है। यही चलन में है। आम धारणा है कि सेंसर बोर्ड का काम रिलीज हो रही फिल्‍मों को देखना और जरूरी कांट-छांट बताना है। फिल्‍म सर्किल में भी सेंसर शब्‍द ही प्रचलित है। सर्टिफिकेशन को सेंसर समझने की वजह से कई स्‍तरों पर चूकें होती रही हैं। दूसरी तरफ पिछले महीनों में हुए विवादों में सर्टिफिकेशन के उन्‍नेख और चर्चा से यह भ्रामक धारणा भी बनी कि सीबीएफसी किसी ीाी सूरत में काट-छांट की सलाह नहीं दे सकती। सभी दसिनैमेटोग्राफ एकट 1952 का उल्‍लेख करते हैं और कहते हैं कि यह 65 साल पुराना हो गया है। इसे अंग्रेजों के समय से चले आ रहे सिनेमैटोग्राफ एक्‍ट के आधार पर बनाया गया था। गौर करें तो ज्‍यादातर एक्‍ट अंग्रेजों के समय के जारी एक्‍ट के ही परिवर्द्धि और संशोधित रूप हैं। सीबीएफसी की कार्यप्रणाली और प्रमाणन प्रकिया में उसके बाद आए द सिनेमैटोग्राफ एक्‍ट(सर्टिफिकेशन),1983 और 1991 में केंद्रीय सरकार द्वारा जारी दिशानिर्देशों का भी पालन किया जाता है। 1991 के दिशानिर्देश में स्‍पष्‍ट लिखा गया है कि हिंसा,सेक्‍स,डिस्क्रिमिनेशन आदि के दृश्‍यों में काट-छांट के निर्देश दिए जा सकते हैं। गौर करें तो पिछले अध्‍यक्ष और उसके पहले के अध्‍यक्ष इन नियमों की सुविधानुसार व्‍याख्‍या कर छूट देते  और काट-छांट करते रहे हैं।
श्‍याम बेनेगल कमिटी ने सभी पहलुओ ंपर विचार किया है। कमिटी ने स्‍पष्‍ट सलाह दी है कि सृजन और अभिव्‍यक्ति की पूरी आजादी सभी को मिलनी चाहिए। फिल्‍मों में किसी प्रकार की काट-छांट की सलाह देना वास्‍तव में सृजनकार(फिल्‍मकार) पर अंकुश लगाना है। सीबीएफसी मोरल कंपास की भूमिका नहीं निभा सकता। यह उसका काम भी नहीं है। उन्‍होंने 1991 में दिए पांच दिशानिर्देशों पर फिर से विचार करने की सलाह दी है। समय के साथ उन्‍हें बदलने या उनकी नई व्‍याख्‍या की जरूरत है। सामाजिक बदलाव के अनुरूप ही मूल्‍य और मानक तय किए जा सकते हैं। उन्‍होंने यह भी सलाह दी है कि डायरेक्‍ट कट यानी फिल्‍म की मूल प्रति नेशनल फिल्‍म आर्काइव में रखी जानी चाहिए। प्रमाणन की जरूरतों और हिदायतों की वजह से फिल्‍में मूल स्‍वरूप में रिलीज नहीं हो पातीं। इसके अलावा कमिटी ने शोध और अध्‍ययन की सलाह दी है कि समूह और अकेले में फिल्‍में देखने का व्‍यक्ति असर किस रूप में भिन्‍न होता है या नहीं होता है।
अभी सारी फिल्‍में चार श्रेणियों में प्रमाणित की जाती हैं। U,UA,A और S(विशेष समूह के लिए)... अभी अधिकांश निर्माताओं की कोशिश अपनी फिल्‍म को U या UA श्रेणी में लाने की रहती है। इसी के लिए उन्‍हें कोट-छांट की सलाह दी जाती है। श्‍याम बेनेगल कमिटी ने प्रमाणन की UA और A श्रेणियों को दो उपश्रेणियों में बांटने की सलाह दी है। UA12+ और UA15+ तथा A और A-C ...पहली उपश्रेणियां 12 और 15 ाशय साल के दर्शकों को ध्‍यान में रख कर की गई है। A तो स्‍पष्‍ट है। A-C  से आशय  A(कॉशन) है...यानी इस झेणी के दर्शक सचेत रहें कि फिल्‍म में हिंसा और सेक्‍स की मुखरता होगी।
अगर श्‍याम बेनेगल कमिटी की रिपोर्ट पर हूबहू अमल होता है तो यह भारतीय फिल्‍मों के प्रमाणन में बड़ी क्रांति होगी।

रोज़ाना : शब्‍दों से पर्दे की यात्रा



रोज़ाना
शब्‍दों से पर्दे की यात्रा
-अजय ब्रह्मात्‍मज
सिनेमा और साहित्‍य के रिश्‍तों पर लगातार लिखा जाता रहा है। शिकायत भी रही है कि सिनेमा साहित्‍य को महत्‍व नहीं दिया जाता। साहित्‍य पर आधारित फिल्‍मों की संख्‍या बहुत कम है। प्रेमचंद से लेकर आज के साहित्‍यकारों के उदाहरण देकर बताया जाता है कि हिंदी फिल्‍मों में साहित्‍यकारों के लिए कोई जगह नहीं है। शुरू से ही हिदी एवं अन्‍य भारतीय भाषाओं के कुछ साहित्‍यकार हिंदी फिल्‍मों के प्रति अपने प्रेम और झुकाव का संकेत देते रहे हैं,लेकिन व्‍यावहारिक दिक्‍कतों की वजह से वे फिल्‍मों के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते। उनके असंतोष को बहुत गंभीरता से लिया जाता है। तालमेल न हो पाने के कारणों की गहराई में कोई नहीं जाता।
हिंदी फिल्‍में लोकप्रिय संस्‍कृति का हिस्‍सा हैं। लोकप्रिय संस्‍कृति में चित्रण और श्लिेषण में दर्शकों का खास खशल रखा जाता है। कोशिश यह र‍हती है कि अधिकाधिक दर्शकों तक पहुंचा जाए। उसके लिए आमफहम भाषा और और परिचित किरदारों का ही सहारा लिया जाता है। लेखकों को इस आम और औसत के साथ एडजस्‍ट करने में दिक्‍कत होती है। उन्‍हें लगता है कि उनके सृजन की कदर नहीं की जा रही है। कॉमन शिकायत है कि कृति की आत्‍मा मर गई। उसका खयाल नहीं रखा गया। हिंदी के शब्‍दों को पर्दे पर लाने की और भी दिक्‍कतें हैं। इन दिनों सबसे बड़ी दिक्‍कत यही है कि अंग्रेजी में पढ़-लिखे और काम कर रहे फिल्‍मकार और लेखक भारतीय भाषाओं की कामचलाऊ जानकारी रखते हैं। उनके पढ़ने और लिखने की दुनिया में भारतीय भाषाएं नहीं हैं। लिहाजा अगर वे कभी साहित्‍य के बारे में सोचते भी हैं तो उन्‍हें अंग्रेजी में लिखी किताबें ही सूझती हैं।
मुंबई में पिछले गुरूवार को मामी(मुंबई एकेडमी ऑफ मूविंग इमेजेज) के तत्‍वावधान में लेखकों,प्रकाशको,विशेषज्ञों और फिल्‍मकारों की बैठक हुई। इसमें लेखकों और प्रकाशकों ने अपनी किताबों की विषयवस्‍तु के बारे में बताया। ऐसी खबर है कि सोनम कनूर और हंसल मेहता समेत अनेक फिल्‍मकारों ने इन किताबों में रुचि दिखाई और उनके अधिकार हासिल किए। मामी की इस पहल का स्‍वागत होना चाहिए। ऐसे मंच मिलें तो शब्‍दों और पर्दे के बीच की दूरी कम होगी। विश्‍व सिनेमा में साहित्‍य पर आधारित फिल्‍में बनती रही हैं। दर्शकों की पसंद बनने के साथ उन्‍हें पुरस्‍कार भी मिले हैं। भात में बांग्‍ला और कन्‍न्‍ड़ भाषाओं की फिल्‍मों में साहित्‍य पर ध्‍यान दिया जाता है। हिंदी फिल्‍मों में साहित्‍य के प्रति फिल्‍मकारों की ललक खत्‍म सी हो गई है।
अगर यह सर्वे किया जाए कि किस फिल्‍मकार ने हाल में कोन सी हिंदी किताब पढ़ी है तो परिणाम हैरतअंगेज होंगे।  

फिल्‍म समीक्षा : कैदी बैंड



फिल्‍म रिव्‍यू
लांचिंग का दबाव
कैदी बैंड
-अजय ब्रह्मात्‍मज
दो दूनी चार के निर्देशक हबीब फैजल ने यशराज फिल्‍म्‍स की टीम में शामिल होने के बाद कैदी बैंड के रूप में तीसरी फिल्‍म निर्देशित की है। पहली फिल्‍म में उन्‍होंने जो उम्‍मीदें जगाई थीं,वह लगातार छीजती गई है। इस बार उन्‍होंने अच्‍छी तरह से निराश किया है। उनके ऊपर दो नए कलाकारों को पेश करने की जिम्‍मेदारी थी। इसके पहले इशकजादे में भी उन्‍होंने दो नए कलाकारों अर्जुन कपूर और परिणीति चोपड़ा को इंट्रोड्यूस किया था। उत्‍तर भारत की पृष्‍छभूमि में बनी इशकजादे ठीे-ठीक सी फिल्‍म रही थी। दावत-ए-इश्‍क को वह नहीं संभाल पाए थे। यशराज फिल्‍म्‍स के साथ तीसरी पेशकश में वे असफल रहे।
पहली जिज्ञासा यही है कि इस फिल्‍म का नाम कैदी बैंड क्‍यो है? फिल्‍म में अंडरट्रायल कैदियों के बैंड का नाम सेनानी बैंड है। फिल्‍म का नाम सेनानी बैंड ही क्‍यों नहीं रखा गया? वैसे जलर महोदय सेनानी नाम के पीछे जो तर्क देते हैं,वह स्‍वतंत्रता सेनानियों के महत्‍व को नजरअंदाज करता है। जेल से छूटने की आजादी की कोशिश में लगे कैदियों को सेनानी कहना स्‍वतंत्रता सेनानियों का राजनीतिक दर्जा कम करना है। इसके अलावा फिल्‍म में यह नहीं बताया जाता कि चित्रित सेंट्रल जेल किस शहर में है। देश के सभी सेंट्रल जेल शहरों या खास नाम से जाने जाते हैं। इस फिलम की शुरुआत में बताया जाता है कि उत्‍तर पूर्व के माछंग लालन 54 सालों तक अंडरट्रायल(विचाराधीन कैदी) के रूप में कैद रहे। उनकी व्‍यथा और जेल में खर्च हुए समय की भरपाई नहीं हो सकी। आज भी अनेक कारणों से हजारों कैदी भारतीय जेलों में बंद हैं और न्‍याय की उम्‍मीद में दिन बिता रहे हैं। यों लगता है कि फिल्‍म अंडरट्रायल की गंभीर समस्‍या को मुद्दा बनाएगी। ऐसा कुछ नहीं होता। यह संजू और बिंदू की प्रेमकहानी भर रह जाती है।
संजय(आदर जैन) और बिंदू(अन्‍या सिंह) अंडरट्रायल हैं। निम्‍नमध्‍यवर्गीय परिवारों से आए दोनों के बात-व्‍यवहार में अपने वर्ग विशेष के ल.ाण नहीं दिखते। वे हिंदी फिल्‍मों के आम नायक-नायिका की तरह बिहेव करते हैं। दो नए कलाकारों की लांचिंग का दबाव है हबीब फैजल पर। इस दबाव के साथ यशराज फिल्‍म्‍स के साथ लांच हो को गुमान नए कलाकारों को पर्दे पर सहज नहीं रहने देता। पहले फ्रेम से ही वे हीरो-हीरोइन दिखने लगते हैं। वे अपने किरदारों का आत्‍मसात करने की कोशिश ही नहीं करते। आदर जैन अपने ममेरे भाई रणवीर कपूर के भयंकर प्रभाव में हैं। लुक की समानता तो है ही। अन्‍या सिंह में आत्‍मविश्‍वास है। उनमें संभावना है। फिल्‍म में इंटरवल के पहले बने कैदी बैंड के दो महिला सदस्‍यों को अचानक गायब कर दिया जाता है। एक लाइन में बता दिया जाता है कि एक का ट्रांसफर दूसरे जेल में हो गया और एक को उसका दूतावास छुड़ा कर ले गया। ऐसा तो टीवी धारावाहिकों में होता है,जब किरदार अचानक गायब हो जाते हैं।
फिल्‍म के प्रोडक्‍शन में कामचलाऊ रवैया अपनाया गया है। जेंल का सेट हो या बाहर के दृश्‍य...हर जगह यह लापरवाही दिखती है। एक दृश्‍य में तो दीवार पर मुख्‍य रूप से यशराज फिल्‍म्‍स के ही पोस्‍टर दिखाई देते हैं। फिल्‍म की संवाद अदायगी में उच्‍चारण की अशुद्धता खटकतर है। सचिन अंगड़ाइयां को अंगड़ांइयां बोलते हैं और एक किरदार पांच को पान्‍च बोलता है। आनुनासिक शब्‍दों के उच्‍चारण में आधे न्‍ का उच्‍चारण आम हो गया है। ऐसा रोमन में लिखे संवादों की वजह से हो रहा है,जिसमें पांच के लिए Paanch लिखा जाता है और अंग्रेजी पढ़ कर आए कलाकार N अपने उच्‍चारण में ले आते हैं।
अवधि- 110 मिनट
** दो स्‍टार

Thursday, August 24, 2017

रोज़ाना : दिलीप साहब की जीवन डोर हैं सायरा बानो



रोज़ाना
दिलीप साहब की जीवन डोर हैं सायरा बानो
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कल सायरा बानो का जन्‍मदिन था। हिंदी फिल्‍मों की यह मशहूर अदाकारा शादी के बाद धीरे-धीरे दिलीप कुमार के आसपास सिमट कर रह गईं। बीमार और अल्‍जाइमर के शिकार दिलीप कुमार के साए की तरह उनके साथ हर जगह मौजूद सायरा बानों को देख कर तसल्‍ली होती है। तसल्‍ली होती है कि कुछ संबंध वक्‍त के साथ और मजबूत होते हैं।
11 अक्‍टूबर 1966 को दोनों की शादी हुई। तब सायरा बानो की उम्र महज 22 थी और दिलीप कुमार 44 के थे। अटकलें लगाने के लिए कुख्‍यात फिल्‍म इंडस्‍ट्री में कहा जाता रहा कि यह बेमेल शादी लंबे समय तक नहीं चलेगी। आज हम देख रहे हैं कि शादी के 50 सालों के बाद भी दोनों न केवल एक साथ हैं,बल्कि एक-दूसरे से बेपनाह मोहब्‍बत करते हैं। पिछले कुछ समय से दिलीप कुमार पूरी तरह से सायरा बानो पर निर्भर हैं,लेकिन कभी सायरा बानो के चेहरे पर कोई शिकन नहीं दिखाई देती। व‍ह अपने कोहिनूर के साथ दमकती और मुस्‍कराती रहती हैं। जी हां,सायरा बानो दिलीप कुमार को अपनी जिंदगी का कोहिनूर मानती हैं।
यों लगता है कि सायरा बानो की हथेली में रिमोट की तरह बटन लगे हुए हैं। सार्वजनिक स्‍थानों पर दिलीप साहब का बाएं हाथ की हथेली वह अपनी हथेली में थामे रहती हैं। जैसे ही कोई सामने आता है या कोई और बात होती है तो हथेलियां जुंबिश करती हैं। बगैर कुछ कहे ही दिलीप साहब सब समझ लेते हैं और फिर जरूरत के अनुसार मुस्‍कराते और बोलते हैं। सायरा बानो की हथेली दिलीप साहब को सब कुछ बता देती है। जरूरत पड़ने पर वह उनके कानों में कुछ फुसफुसाती हैं और दिलीप साहब की आंखों में चमक के साथ होठों पर मुस्‍कान तैर जाती है। इधर तबियत बिगड़ने से दिलीप साहब को बार-बार अस्‍पताल जाना पड़ा है। सायरा हमेशा उनके साथ रहीं। दिलीप साहब की देखभाल के साथ उन्‍होंने उनके प्रशंसकों का भी बराबर खयाल रख। अस्‍पताल से उनकी तबियत में हो रहे सुधार की लगातार जानकारी देती रहीं। पिछले दिनों शाह रुख खान ने दिलीप साहब से मुलाकात की तो उन्‍होंने ही तस्‍वीरें शेयर कीं।
सायरा बानो की जिंदगी दिलीप साहब के आसपास और उनकी सोच में ही गुजरी है। 12 साल की उम्र से उनकी दीवानी सायरा बानो आखिरकार दिलीप साहब की जिंदगी में आईं। समर्पित बीवी की भूमिका में आने से पहले उन्‍होंने अभिनय की ल्रबी सफल पारी खेली। दिलीप कुमार के साथ भी कुछ यादगार फिल्‍में कीं। अब तो उन्‍हें फिल्‍मों से संन्‍यास लिए भी चालीस से अधिक साल हो गए।    

Wednesday, August 23, 2017

रोज़ाना : बड़े पर्दे पर बाप-बेटी



रोज़ाना
बड़े पर्दे पर बाप-बेटी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हिंदी फिल्‍मों और हिंदी समाज में बाप की छवि एक निरंकुश की रही है। खास कर बेटियों के मामले में वे अधिक कठोर और निर्मम माने जाते हैं। इधर बाप-बेटी के रिश्‍तों में थेड़ी अंतरंगता आई है,लेकिन अभी तक वह खुलापन नहीं आया है। बेटियां आपने पिता से सीक्रेट शेयर करने में संकोच करती हैं। यों हिंदी समाज की सोच और दायरे में में वे मां से भी अपने दिल की बातें छिपा जाती हैं। बचपन से उन्‍हें उचित-अनुचित की ऐसी परिभाषाओं में पाला जाता है कि वे कथित मर्यादा में दुबकी रहती हैं। फिर भी पिछले दशक में इस रिश्‍ते में आ रहे धीमे बदलाव को महसूस किया जा सकता है।
हाल ही में एक फिल्‍म आई बरेली की बर्फी। इसमें हमें बाप-बेटी के बीच का बदला हुआ प्‍यारा रिश्‍ता दिखा। बरेली के एकता नगर के नरोत्‍तम मिश्रा की बेटी है बिट्टी। यह कहना सही नहीं होगा कि उन्‍होंने उसे बेटों की तरह पाला। फिल्‍म के वॉयस ओवर में लेखक भी चूक गए। उन्‍होंने बिट्टी को नरोत्‍तम मिश्रा का बेटा कहा,क्‍योंकि आदतन उन्‍हें बेटे की उम्‍मीद थी। बहरहाल,हम देखते हैं कि नरोत्‍तम मिश्रा और बिट्टी के बीच अच्‍छी समझदारी है। वे बिट्टी के फैसलों का समर्थन करते हैं। इसकी वजह से कई बार उन्‍हें मां की झिड़की सुनाई पड़ती है। आम घरों में भी बाप यह उलाहना सुनते हैं आप ही ने सिर चढ़ा रखा है। बिगाड़ दिया है बेटी को। नरोत्‍तम मिश्रा को फर्क नहीं पड़ता कि वह किस के साथ बाइक पर बैठ कर जा रही है। या ऑफिस से निकलने के बाद वह कहां जाती है? फिल्‍म की शुरुआत में ही डिब्‍बी में सिगरेट नहीं मिलने पर वे बीवी सुशीला से कहते हैं कि बिट्टी से मांग लाओ। बीवी चौंकती हैं तो वे सहज भाव से कहते है,पीती है
हिंदी फिल्‍मों में बेटियों या महिला किरदारों को आधुनिक और प्रगतिशील दिखाने के घिसे-पिटे टोटके हैं। उनमें सिगरेट और शराब पीना भी है। बरेली की बर्फी भी इस टोटके का इस्‍तेमाल करती है,लेकिन उसे सामान्‍य शौक की तरह ही दिखाया गया है। बाप-बेटी के रिश्‍ते की तीव्रता हमें बेटी के साथ खड़े नरोत्‍तम मिश्रा में दिखती है। पारंपरिक पिता की बेटी की शादी जैसी चिंताओं के बावजूद वे बिट्टी पर कभी दबाव नहीं डालते। उसके दोस्‍तों का घर में स्‍वागत करते हैं। उनके साथ बैठते हैं। उन्‍हें एंटरटेन करते हैं।
हिंदी फिल्‍मों में बाप-बेटी का यह रिश्‍ता दुर्लभ है। इस फिल्‍म के प्रदर्शन के बाद सोशल मीडिया पर बेटियां पोस्‍ट कर रही है...काश,उन्‍हें भी नरोत्‍तम मिश्रा जैसे पिता मिलते? कहना नहीं होगा कि इस पिता को पंकज त्रिपाठी बहुत बारीकी के साथ चरितार्थ किया है। बेटी कृति सैनन भी बराबर सहयोग देती हैं।

Monday, August 21, 2017

कोएक्‍टर से प्रतिस्‍पर्धा नहीं करता-दीपक डोबरियाल



कोएक्‍टर से प्रतिस्‍पर्धा नहीं करता-दीपक डोबरियाल
-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले दिनों आई हिंदी मीडियम में उन्‍होंने श्‍याम प्रकाश की भूमिका से दर्शकों को रुला कर उनका दिल जीता। दीपक डोबरियाल ने इसके पहले तनु वेड्स मनु की दोनों फिल्‍मों में दर्शकों कां हंसने का मौका दिया था। रुलाने और हंसाने की इस काशिश में दीपक विभिन्‍न किरदारों के साथ पर्दे पर आना चाहते हैं। उनकी दो फिल्‍में जल्‍द ही दर्शकों के बीच होंगी।
- कौन कौन सी फिल्‍में आ रही हैं आप की?
0 अक्षत वर्मा की काला कांडी आएगी। उन्‍होंने इसके पहले डेहली बेली लिखी थी। वे अलग तरह से सोचते और लिखते हैं। फिल्‍ममेकिंग भी उनकी अलग है। उसके पहले रंजीत तिवारी की लखनऊ सेंट्रल आ जाएगी। इसके निर्माता निखिल आडवाणी हैं। उसमें फरहान अख्‍तर मेन लीड में हैं। वह कैदियों के बैंड ग्रुप पर है। एक और फिल्‍म की है कुलदीप पटवाल
- काला कांडी के बारे में अभी क्‍या बता सकेंगे?
0 काला कांडी एक शहर की कहानी है।  उस शहर की एक रात की कहानी है। उसमें तीन कहानियां एक साथ आगे बढ़ती हैं। बररिश की रात है। रोमांस,उन्‍माद और रियलाइजेशन की ये कहानियां एक-दूरे को काटती और जुड़ती हैं। मैं और विजय राज एक कहानी के हिस्‍से हैं।
- कुलदीप पटवाल क्‍या फिल्‍म है?
0 रेमी कोहली की फिल्‍म है यह। जल्‍दी ही यूके,कनाडा और अमेरिका में रिलीज होगी1 वह पॉलिटिकल थ्रिलर है। गुलशन देवैया,राईमा सेन,परवीन दबास और अनुराग अरोड़ा हैं। बाद में भारत में रिलीज होगी। पूरी फिल्‍म दिल्‍ली में शूट की गई है। कुलदीप पटवाल सीएम के मर्डर चार्ज में फंसा आम आदमी है। पॉलिटिक्‍स कैसे आम आदमी की जिंदगी तबाह कर देती है। यही फिल्‍म है।
- लखनऊ सेंट्रल में आप क्‍या कर रहे हैं?
0 मैं बंगाली किरदार विक्‍टर चट्टोपाध्‍याय के किरदार में हूं1 वह किसी क्राइम में जेल आ गया है। वह हार्ड कोर क्रिमिनल नहीं है। उससे अपराध हो गया है। अब वह जेल में है। यह किरदारों की फिल्‍म है। इसमें इनामुलहक,राजेश शर्मा और फरहान अख्‍तर भी हैं। सभी के लगभग बराबर सीन हैं। हालांकि रंजीत तिवारी की यह पहली फिल्‍म है,लेकिन उन्‍होंने किसी अनुभवी डायरेक्‍टर की तरह सभी से काम लिया।
- हिंदी मीडियम में आप की बहुत तारीफ हुई है। क्‍या ऐसी तारीफ की उम्‍मीद थी?
0 ऐसी तारीफ के बारे में नहीं सोचा था। तनु वेड्स मनू पीछे रह गई। मेरे लिए खुशी की बात है। अप्रत्‍याशित है। यह तारीफ इरफान भाई के साथ काम करने की वजह से हुई। लोग कहते हैं कि उनके सामने एक्‍टर खड़े नहीं हो पाते हैं। लोगों ने मुझ से पूछा कि आप कैसे इतने सहज रहे? मैं यही कहता हूं कि इसमें उन्‍हीं का योगदान है। उन्‍होंने मुझे सहज रखा। उनकी वजह से रेंज ही बदल गई।
- एक्‍टर ही बताते हैं कि साथ के एक्‍टर से सहयोग मिले तो सीन निखर जाते हैं...
0 बिल्‍कुल...सोचने की बात है कि इरफान भाई ने मुझे इतना सपोर्ट क्‍यों किया? उन्‍हों देखा कि सीन बन रहा है। निखर रहा है। उन्‍होंने कह दिया था कि दीपक जो भी इम्‍प्रूवाइज कर रहा है,उसे करने दो। मुझे पंद्रह दिनों का अवकाश मिल रहा था,लेकिन मैं लौट कर नहीं आया। मैं वहीं अपने किरदार में रहा। मैंने प्रोडक्‍शन हाउस से कह दिया था कि मैं अपने खर्चे से रह लूंगा। उसकी नौबत नहीं आई। इरफान भाई ने मेरी शिद्दत देखी। उन्‍होंने पूरा माहौल पॉजीटिव रखा। केमिस्‍ट्री नहीं बन पाती,तब एक्‍टर को सीन में अपनी प्रेजेंस की लंबाई दिखने लगती है। इस फिल्‍म के दरम्‍यान हम ऐसे घुलमिल गए थे इन बातों का खयाल ही नहीं आया। मैं खुद भी नहीं देखता। सैफ अली खान,आर माधवन और इरफान के साथ यही विश्‍वास काम आया।
-यह भी तो होता है कि कोएक्‍टर हावी होने या सीन चुराने की कोशिश करता है?
0 फिर तो सीन और कैरेक्‍टर टूट जाते हैं। ध्‍यान कहीं और टिक जाता है। ऐसा करते समय आप कैरेक्‍टर छोड़ कर एक्‍टर से कंपीटिशन करने लगते हैं। कैरेक्‍टर तो कहीं और रह गया। ऐसे में मजा नहीं आता। मैं कोएक्‍टर से प्रतिस्‍पर्धा नहीं करता।
-आगे की क्‍या योजनाएं है?
0 इन फिल्‍मों की रिलीज के बाद देखूंगा। अभी स्क्रिप्‍ट पड़ रहा हूं। कुछ नया फायनल नहीं किया है।

Sunday, August 20, 2017

फिल्‍म समीक्षा : वीआईपी 2



फिल्‍म रिव्‍यू
प्रतिभाओं का दुरुपयोग
वीआईपी2
-अजय ब्रह्मात्‍म्‍ज
सौंदर्या रजनीकांत निर्देशित वीआईपी2 शायद रजनीकांत के वारिस की खोज है। परिवार के ही एक सदस्‍य धनुष को रजनीकांत की तरह की फिल्‍म में लाकर यही कोशिश की गई है। अफसोस धनुष में रजनीकांत की अदा और करिश्‍मा नहीं है। फिल्‍म में जब वे मुस्‍टंडे गुंडों को धराशायी करते हैं तो वह हंसी आती है। इसी प्रकार कैरेक्‍अर के लिए खास मैनरिज्‍म दिखाने में भी वे संघर्ष करते नजर आते हैं।
कह सकते हैं कि तमिल की मेनस्‍ट्रीम पॉपुलर शैली में बनी यह फिल्‍म हिंदी दर्शकों को वहां की फिल्‍मों की गलत छवि देगी। रजनीकांत की फिल्‍में इतनी लचर और स्‍तरहीन नहीं होतीं। उनकी खास शैली होती है,जिसे उन्‍होंने सालों की मेहनत और दर्शकों के प्रेम से हासिल किया है। धनुष अलग श्रेणी के अभिनेता हैं। उन्‍हें इस सांचे में ढालने में सौंदर्या रजनीकांत पूरी तरह से असफल रही हैं।
रघुवरण ईमानदार इंजीनियर है। कर्मठ और जमीर का पक्‍का रघुवरण कभी कोई गलत काम नहीं कर सकता। अपनी प्रतिभा से वह किसी को भी ललकार सकता है। संयोग से इस बार उसे वसुंधरा का सामना करना पड़ता है। वसुंधरा ने भी अपनी मेहनत,लगन और जिद से कंपनी खंड़ी की है। कामयाबी ने उसे अकड़ दी है। उसे बर्दाश्‍त नहीं होता कि एक साधारण इंजीनियर उसके ऑफर को ठुकरा दे। उसके लिए यह अहं की लड़ाई है तो रघुवरण अपने सिद्धांतो से डिगने के लिए तैयार नहीं है। इस मुठभेड़ में दोनों का नुकसान होता है। फिल्‍म का क्‍लाइमेक्‍स नाटकीय है। दोनों जब व्‍यक्ति के तौर पर मिलते हैं तो उन्‍हें लगता है कि वे मिजाज और सोच में एक से हैं।
ऐसी फिल्‍में हिंदी में भी बनती रही हैं,जिसमें किसी जिद्दी और अहंकार में नकचढ़ी नायिका को सीधा-सादा और ईमानदार नायक सही रोस्‍ते पर ले आता है। सही रास्‍ते का निर्णय नायक का होता है। इस फिलम की निर्देशक महिला हैं। उन्‍हें ऐसे घिसे-पिटे विषय से गेचैनी नहीं हुई। इतना ही नहीं फिल्‍म में औरतों और बीवियों के बारे में भद्दी टिप्‍पणियां की गई हैं। हंसाने के लिए महिलाविरोधी ऐसी टिप्‍पणियों का इस्‍तेमाल हिंदी फिल्‍मों में आम था।
धनुष और काजोल की प्रतिभा का दुरूपयोग करती वीआईपी2 अत्‍यंत साधारण फिल्‍म है।
अवधि- 129 मिनट
डेढ़ स्‍टार *1/2

फिल्‍म समीक्षा : बरेली की बर्फी



फिल्‍म समीक्षा
बदली है रिश्‍तों की मिठास
बरेली की बर्फी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
शहर बरेली,मोहल्‍ला- एकता नगर, मिश्रा सदन,पिता नरोत्‍तम मिश्रा,माता- सुशीला मिश्रा।
नरोत्‍तम मिश्रा का बेटा और सुशीला मिश्रा की बेटी बिट्टी मिश्रा। पिता ने बेटे की तरह पाला और माता ने बेटी की सीमाओं में रखना चाहा। बिट्टी खुले मिजाज की बरेली की लड़की है। अपने शहर में मिसफिट है। यही वजह है कि उसे लड़के रिजेक्‍ट कर के चले जाते हैं। मसलनृएक लड़के ने पूछ लिया कि आप वर्जिन हैं ना? तो उसने पलट कर उनसे यही सवाल कर दिया। लड़का बिदक गया। दो बार सगाई टूट चुकी है। माता-पिता की नजरों और परेशानी से बचने का उसे आसान रास्‍ता दिखता है कि वह घर छोड़ दे। भागती है,लेकिन ट्रेन के इंतजार में करेली की बर्फी उपन्‍यास पढ़ते हुए लगता कि उपन्‍यास की नायिका बबली तो हूबहू वही है। आखिर उपन्‍यासकार प्रीतम विद्रोही उसके बारे में कैसे इतना जानते हैं? वह प्रीतम विद्रोही से मिलने की गरज से घर लौट आती है।
बरेली की बर्फी उपन्‍यास का भी एक किससा है। उसके बारे में बताना उचित नहीं होगा। संक्षेप में चिराग पांडे(आयुष्‍मान खुराना) ने अपनी प्रमिका की याद में वह उपन्‍यास लिख है। पहचान और पकड़े जाने के डर से किताब पर उन्‍होंने अपने दब्‍बू दोस्‍त प्रीतम विद्रोही का नाम छाप दिया...तस्‍वीर भी। बेचारे प्रीतम की ऐसी धुनाई हुई कि उन्‍हें अपना शहर छोड़ना पड़ा। उधर बिट्टी प्रीतम को खोजते-खोजत चिराग से टकरा गई। दिलजले आशिक का दिल बिट्टी पर आ गया,लेकिन बिट्टी तो प्रीतम प्‍यारे की तलाश में थी।
बरेली जैसे शहर के ये किरदार भारत के किसी और शहर में कमोबेश इसी रंग में मिल सकते हैं। फिल्‍म के लेखक नितेश तिवारी ने किरदारों को सही सीन और प्रसंग दिए हैं। उन्‍हें विश्‍वसनीय बनाया है और उन्‍हें उपयुक्‍त संवाद दिए हैं। चरित्रों को गढ़ने में वे पारंगत हैं। उन्‍होंने किरदारों की छोटी-छोटी हरकतों और बातों से इसे सिद्ध किया है। नितेश मिवारी की स्क्रिप्‍ट का समुचित फिल्‍मांकन किया है अश्विनी अरूयर तिवारी ने। और उन्‍हें कलाकारों का भरपूर सहयोग मिला है। परिचित कलाकारों के साथ कुछ अनजान कलाकार भी दिखे हैं। अनजान कलाकार प्रतिभाशाली हो और किरदार के अनुरूप उनकी कास्टिंग हुई हो तो फिल्‍म निखर जाती है। चिराग पांडे के दोस्‍त और प्रीतम विद्रोही की मां सबूत हैं। दोनों कलाकार जंचे हैं। वे याद रह जाते हैं।
इस फिल्‍म की खूबसूरती इसका परिवेश है। वह खूबसूरती गाड़ी हो जाती अगर किसी भी रेफरेंस से फिल्‍म के समय की जानकारी मिल जाती। मुमकिन है नितेश तिवारी ऐसे रेफरेंस से बचे हों। बहरहाल,फिल्‍म के संवाद देशज और कस्‍बाई हैं। किरदारों की चिंताएं,मुश्किलें और उम्‍मीदें देसी दर्शकों की परिचत हैं। बिट्टी जैसी लड़कियां छोटे शहरों में बड़ी तादाद में उभरी हैं। शहर और मध्‍यवर्ग की मर्यादाओं को तोड़ती ये लड़कियां महानगरीय दर्शकों को चिचित्र लग सकती हैं। उनके व्‍यवहार और रिश्‍तों की जटिलताओं के साथ उनकी आकांक्षाओं को हमें शहर के परिवेश के दायरे में ही देखना होगा। नितेश तिवारी और अश्विनी अरूयर तिवारी ने कुछ छूटें ली हैं। उन्‍हें किरदारों को मजबूत बनाने के लिए ऐसा करना पड़ है।
पंकज त्रिपाठी और सीमा पाहवा फिल्‍म के आधार किरदार हैं। दोनों ने बिट्टी को वर्तमान व्‍यक्तित्‍व दिया है। उनसे मिली आजादी और हद में ही बिट्टी खिली है। छोटे शहर के बाप-बेटी के बीच का ऐसा रिश्‍ता हिंदी फिल्‍मों में नहीं दिखा है। कृति सैनन ने बिट्टी के जज्‍बात को आत्‍मसात किया है। अभिनय के स्‍तर पर निर्देशक और कोएक्‍टर के सान्निध्‍य में उन्‍होंने कुछ नया किया है। अगर उनके लुक पर थोड़ा काम किया जाता तो और बेहतर होता। आयुष्‍मान खुराना अपने किरदार में हैं। चिराग पांडे को उन्‍होंने उसके संकोच,सोच और दुविधाओं के साथ पर्दे पर उतारा है। वहीं राजकुमार राव दब्‍बू प्रीतम विद्रोही की भूमिका में सही लगे हैं। उन्‍हें इस फिल्‍म में रंग बदलने के मौके मिले हैं। उन्‍होंने हर रंग की छटा बिखेरी है।
अवधि-122 मिनट
साढ़े तीन स्‍टार ***1/2

रोज़ाना : आयटम नंबर की लोकप्रियता


रोज़ाना
आयटम नंबर की लोकप्रियता
-अजय ब्रह्मात्‍मज

फिल्‍म इंडस्‍ट्री में माना जाता है कि गुरु दत्‍त निर्देशित आर पार में शकीला पर फिल्‍मांकित बाबूजी धीरे चलना हिंदी सिनेमा का पहला आयटम नंबर है। यह फिल्‍म 1954 में आई थी। गीत मजरूह सुल्‍तानपुरी ने लिखे थे,जिसे आपी नरूयर ने संगीत से संवारा था। उसके बाद वैजयंती माला ने अपन ही फिल्‍मों में कुछ ऐसे डांस नंबर किए,जिन्‍हें आयटम नंबर कहा जा सकता है। हम अभी आयटम नंबर को जिस रूप और अर्थ में जानते हैं,उसकी शुरुआत हावड़ा ब्रिज के गीत मेरा नाम चिन चिन चू से होती है। हेलन ने अपनी नृत्‍य प्रतिभा और चपल बंग संचालन से अयटम नंबर को एक कल्‍ट बना दिया। मदमस्‍त संगीत के बीट पर उन्‍हें पर्दे पर लहराते देखना अनोख व रोमांचक अनुभव होता था। कस्‍बों के सिनेमाघरों में उनकी फिल्‍में लगती थीं तो रिक्‍शे पर प्रचार के लिए निकले उद्घोषक यह बताना नहीं भूलते थे कि इसमें हेलन का डांस है। तब सिनेमा के शौकीनों की मांग पर डांस नंबर दो बार भी दिखा दिए जाते थे।
डांस नंबर कहें या आयटम नंबर...दर्शकों की ललक हमेशा ऐसे गीत-नृत्‍य की ओर रही है। नौटंकी के दिनों में भी यह परंपरा थी। नाटक के बीच में राहत के लिए नर्तकियां के डांस नंबर और विदूषकों के हंसी-मजाक रखे जाते थे। उन्‍हें ही हिंदी फिल्‍मों ने अपनाया। हंसी-मजाक यानी कामेडी के पैरेलल ट्रैक तो अभी बंद हो गए हैं,लेकिन बाजार की जरूरत और खपत के कारण आयटम नंबर की मांग बड़ गई है।
पहले साल में बमुश्किल दो-तीन फिल्‍मों में ही आयटम नंबर होते थे। अभी उनकी मांग बढ़ गई है। ऐसा नहीं है कि केवल बी या सी ग्रेड की फिल्‍मों में आयटम नंबर होते हैं। अभी तो ए ग्रेड की फिल्‍मों में भी आयटम नंबर रखे जाते हैं। मेनस्‍ट्रीम की पॉपुलर हीरोइनें भी आयटम नंबर करने में नहीं हिचकतीं। हां,मशहूर और अनुभवी निर्देशक की फिल्‍मों में आयटम नंबर के इस्‍तेमाल में सौंदर्यबोध और सुरुचि का खयाल रखा जाता है। बाकी फिल्‍मों में ज्‍यादातर आयटम नंबर दर्शकों की उत्‍तेजना के लिए होते हें। इन फिल्‍मों के निर्माता-निर्देशक मानते हैं कि आयटम नंबर की वजह से उनके दर्शक बढ़ जाते हैं।
इन दिनों दस में से एक फिल्‍म में आयटम नंबर तो रहता ही है। 2016 में लगभीग डेढ़ दर्जन फिल्‍मों में आयटम नंबर थे।आयटम नंबर के लिए सनी लियोनी सबसे उपयुक्‍त मानी जाती हैं। उसकी खास वजहें हें। शाह रुख खान की फिल्‍म रईस में लैला ओ लैला की धुनों पर नाचती सनी लियोनी को देखने दर्शक आए। आजकल फिल्‍म के प्रमोशन में भी आयटम नंबर का इस्‍तेमाल किया जाता है।



Friday, August 18, 2017

फिल्‍म समीक्षा : पार्टीशन 1947



फिल्‍म रिव्‍यू
पार्टीशन 1947
-अजय ब्रह्मात्‍मज
देश के बंटवारे का जख्‍म अभी तक भरा नहीं है। 70 सालों के बाद भी वह रिस रहा है। भारत,पाकिस्‍तान और बांग्‍लादेश बंटवारे के प्रभाव से निकल ही नहीं पाए हैं। पश्चिम में द्वितीय विश्‍वयुद्ध और अन्‍य ऐतिहासिक और राजनीतिक घटनाओं पर फिल्‍में बनती रही हैं। अपने देश में कम फिल्‍मकारों ने इस पर ध्‍यान दिया। गर्म हवा और पिंजर जैसी कुछ फिल्‍मों में बंटवारे और विस्‍थापन से प्रभावित आम किरदारों की कहानियां ही देखने को मिलती हैं। गुरिंदर चड्ढा की फिल्‍म का नाम ही पार्टीशन 1947 है। भारत में नियुक्‍त ब्रिटेन के अंतिम वायसराय लार्ड माउंटबेटेन के दृष्टिकोण से चित्रित इस फिल्‍म में ऐतिहासिक दस्‍तावेजों का भी सहारा लिया गया है। कुछ दस्‍तावेज तो हाल के सालों में सामने आए हैं। उनकी पृष्‍ठभूमि में बंटवारे का परिदृश्‍य ही बदल जाता है।
गुरिंदर चड्ढा ने लार्ड माउंटबेटेन और उनके परिवार के सदस्‍यों के साथ आलिया और जीत की प्रेमकहानी भी रखी है। यह फिल्‍म दो स्‍तरों पर साथ-साथ चलती है। 1947 में आजादी के ठीक पहले चल रही राजनीतिक गतिविधियों के बीच दो सामान्‍य किरदारों(हिंदू लड़का,मुस्लिम लड़की) की मौजूदगी फिल्‍म को आवश्‍यक विस्‍तार देती है। दिक्‍कत यह है कि गुरिंदर दोनों कहानियों के बीच अपेक्षित तालमेल नहीं बिठा पातीं। दूसरे,उन्‍होंने ऐतिहासिक किरदारों के अनुरूप कलाकार नहीं चुने हैं। चुने गए कलाकार अधिक मेहनत करते भी नहीं दिखते। केवल जिन्‍ना के रूप में डेंजिल स्मिथ अपने किरदार में दिखते हैं। नीरज कबी जैसे समर्थ अभिनेता भी बापू की भूमिका में चूक गए हैं। नेहरू,पटेल और अन्‍य नेताओं के चरित्रांकन पर ध्‍यान नहीं दिया गया है। माउंटबेटेन और उनके परिवार के सदस्‍यों के रूप में दिख रहे कलाकार फिर भी संतुष्‍ट करते हैं। जीत(मनीष दयाल) और आलिया(हुमा कुरेशी) अपने किरदारों का निभा ले जाते हैं। उन्‍हें ढंग के सीन नहीं मिल पाए हैं। वायसराय हाउस में उनकी चहलकदमी के बीच की गिले-शिकवे और प्रेम की बातें होती हैं। अरूणोदय सिंह यहां भी किरदार से बाहिर दिखते हैं। ओम पुरी की उपस्थिति भर है।
गुरिंदर चड्ढा की यह कोशिश पार्टीशन के बारे में एक नई जानकारी देती है कि जिन्‍ना और चर्चिल के बीच पहले ही डील हो गई थी। लॉर्ड माउंटबेटेन को केवल लीपापोती के लिए भेजा गया था। यह तथ्‍य फिल्‍म में उभर कर नहीं आ पाता। फिल्‍म में 1947 के परिवेश और वेशभूषा के साथ प्रोपर्टी पर अधिक ध्‍यान नहीं दिया गया है। चलताऊ किस्‍म से पार्टीशन के सीन पुराने फुटेज के साथ जोड़ कर दिखा दिए गए हैं। कोशिश है कि 1947 दिखे,लेकिन पीरियड क्रिएट नहीं हो पाया है।
हिंदी में रिलीज की गई इस फिल्‍म में लिपसिंक और डबिंग की भी समस्‍या है। उसकी वजह से फिल्‍म अपने असर में कमजोर होती है।
ऐसी कमजोर फिल्‍मों की वजह से भी गंभीर और जरूरी विषयों पर फिल्‍में बनाने से निर्माता हिचकते हैं।
अवधि- 106 मिनट
ढाई स्‍टार **1/2

दरअसल : पिछले 70 सालों की प्रतिनिधि 50 फिल्‍में



दरअसल...
पिछले 70 सालों की प्रतिनिधि 50 फिल्‍में
-अजय ब्रह्मात्‍मज
आजादी के 70 सालों में हिंदी सिनेमा ने प्रगति के साथ विस्‍तार किया है। हर विधा में फिल्‍में बनी हैं। उन्‍हें दर्शकों ने पसंद किया। कुछ फिल्‍में रिलीज के समय अधिक नहीं सराही गईं,लेकिन समय बीतने के साथ उनका महत्‍व और प्रभाव बढ़ता गया। सात दशकों में हिंदी सिनेमा की अनेक उपलब्धियां हासिल कीं। हालीवुड के बढ़ते प्रभाव के बावजूद हिंदी और अन्‍य भाषाओं की भारतीय फिल्‍में टिकी हुई हैं। इसे बालीवुड नाम से भी संबोधित किया जाता है। हालांकि यह नाम हिंदी सिनेमा के व्‍यापक परिप्रेक्ष्‍य को नहीं समेट पाता,फिर भी यह प्रचलित हो चुका है तो अधिक गुरेज करने की जरूररत नहीं है। नाम कोई भी लें हिंदी सिनेमा की खास पहचान है। उसकी विविधता अचंभित करती है। दर्शकों ने अपनी पसंद से हमेशा चौंकाया है।
आजीदी के 70 साल पूरे होने के मौके पर मैंने फेसबुक के जरिए अपने पाठकों और परिचितों से उनकी पसंद की किसी एक फिल्‍म के बारे में पूछा था। 500 से अधिक व्‍यक्तियों ने अपनी पसंद जाहिर की। 50 फिल्‍मों की यह सूची सिर्फ उनकी पसंद के आधर पर तैयार की गई है। इस सूची में शामिल सभी फिल्‍मों को कम से कम दो मत मिले हैं। कुछ फिल्‍मों की संस्‍तुति ज्‍यादा दर्शकों ने की। मदर इंडिया,रंग दे बसंती,शोले,दो बीघा जमीन,प्‍यासा,गाइड, और जागते रहो को 10 या उससे अधिक व्‍यक्तियों ने पसंद किया। प्‍यासा सर्वाधिक प्रिय फिल्‍म रही। उसे 24 व्‍यक्तियों का समर्थन मिला। पूरी सूची पर नजर डालें तो पाएंगे कि पसंद में विविधता रही है। एक तर फ उन्‍होंने शोले और दबंग जैसी फिल्‍में पसंद कीं तो दूसरी तर फ गर्म हवा और पिंजर को भी सूचीबद्ध करने में पीछे नहीं रहे।
दर्शकों की पसंद की सूची यहां पढ़ सकते हैं। देखें कि इस सूची में से आ पे कितनी फिल्‍में देखी हैं। यह कोई मानक सूची नहीं है,लेकिन इतना तो पता चलता है कि अभी के दर्शक क्‍या पसंद कर रहे हैं? 3 इडियट,अं‍कुर,बैंडिट क्‍वीन,बोर्डर,चक दे इंडिया,दो बीघा जमीन,दो आंखें बारह हाथ,गैंग्‍स ऑफ वासेपुर,गर्म हवा,गाइड जागते रहो,क्रांति,लगान,मदर इंडिया,मुगलेआजम,प्‍यासा,पिंजर,पूरब और पश्चिम,रंग दे बसंती,शोले,टॉयलेट एक प्रेम कथा,स्‍वदेस,तारे जमीं पर,तीसरी कसम,श्री 420,शहीद,सारांश,पीके,पान सिंह तोमर,निशांत,नदिया के पार,मृत्‍युदंड,कागज के फूल,मेरा नाम जोकर,मैं आजाद हूं,इंडियन,गुलामी,एक डाक्‍टर की मौत,ब्‍लैक फ्रायडे,बावर्ची,बंदिनी,बाहुबली,अलीगढ़,अमर प्रेम,भाग मिल्‍खा भाग,उपकार,दबंग,दंगल, और सत्‍यकाम
इस सर्वे में सभी उम्र के दर्शकों ने हिस्‍सा लिया। सोयाल मीडिया पर पुरुष ज्‍यादा है,इसलिए उनका अनुपात ज्‍यादा रहा। मुझे लगता है कि ऐसे सर्वे में लड़कियां हिस्‍सा लें तो फिल्‍मों की सूची बदल सकती है। मुझे आश्‍चर्य हुआ कि पीकू और पिंक किसी की पसंद नहीं रही। दूसरा आश्‍चर्य यह भी रहा कि टॉयलेट एक प्रेम कथा को पांच ने पसंद किया। दिलवाले दुल्हिनया ले जाएंगे और हम आप के है कौन भी दर्शकों की पसंद में शामिल नहीं हैं। करण जौहर की भी उन्‍होंने उपेक्षा की,जबकि नीरज घेवन की मसान को दर्शकों ने पसंद किया। मनोरंजन के लोकतंत्र में पसंद-नापसंद की कसौटी अलग होती है। यह सूची यह भी संकेत देती है कि लंबे समय में किस तरह की फिल्‍में दर्शकों की पसंद बनती हैं।

अगर आप ने इस सूची की कोई फिल्‍म नहीं देखी हो तो अवश्‍य देखें। इसके साथ ही आप अपनी पसंद की फिल्‍म के बारे में हमें लिख भेजें। फिल्‍में हमारे दैनंदिन जीवन का हिस्‍सा हैं। हम उनसे आनंदित होते हैं। कुछ सीखते-समझते हैं। कई बार जाने-अनजाने हम नायक-नायिका को अपने जीवन में उतारना चाहते हैं। सिर्फ फैशन और स्‍टायल में ही नहीं। यह प्रभाव दर्शन और जीवन शैली पर भी पड़ता है।