Search This Blog

Thursday, April 27, 2017

रोज़ाना : सुनील शेट्टी का 'स्वस्थ भारत'

रोज़ाना

सुनील शेट्टी का 'स्वस्थ भारत'                                
- अजय ब्रह्मात्मज

गोवा में 'इंडियाज़ असली चैंपियन' की शूटिंग कर रहे सुनील शेट्टी का रंग धूप और गर्मी की वजह से गाढ़ा हो गया है। अगले महीने से ऐंड टीवी पर आने वाले इस शो के मेजबानी में तल्लीन सुनील शेट्टी को मनमाफिक काम मिला है। 12 प्रतिभागियों के साथ गोवा में लगातार शूटिंग कर रहे सुनील शेट्टी चाहते हैं कि दर्शक उनके शो से कुछ सीखें। 12 प्रतिभागियों के माध्यम से सुनील शेट्टी दर्शकों के बीच शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने का संदेश भी देना चाहते हैं। उनकी पहल पर इस शो के साथ 'स्वस्थ भारत अभियान' जोड़ दिया गया है। ध्वनि और उद्देश्य में यह 'स्वच्छ भारत अभियान' से मिलता-जुलता है। सुनील मानते हैं कि स्वच्छता और स्वास्थ्य का सीधा संबंध है।

पिछले कुछ समय से सुर्खियों से गायब सुनील शेट्टी ने काम से छुट्टी ले रखी थी। उनके पिता सख्त बीमार थे। पिता की तीमारदारी में दिल-ओ-जान से लगे सुनील शेट्टी ने लगभग तीन सालों तक खुद को लाइमलाइट से बाहर रखा। पिता के दिवंगत होने के बाद उन्होंने अपनी सक्रियता बढ़ाई। मिल रहे ऑफर में से उन्होंने टीवी शो 'इंडियाज़ असली चैंपियन' चुना। सुनील शेट्टी के मुताबिक यह शो उ के दिल और जीवन के करीब है। काम लोगों को याद होगा कि संजय दत्त और सलमान खान के पहले युवकों के बीच सुनील शेट्टी का क्रेज था। एक्शन फिल्मों में अपने सुगठित शरीर की वजह से वह काफी पसंद किए जाते थे। आज भी हिंदी समाज के अंदरूनी इलाकों में सुनील शेट्टी का जादू कायम है। उनकी फिल्में आज भी खूब देखी जाती हैं। कस्बों और छोटे शहरों के दर्शक उनके मुरीद हैं।

सुनील शेट्टी के 'स्वस्थ भारत अभियान' और टीवी शो में 'शरीर चुस्त और दिमाग दुरुस्त' पर जोरबड़िया जा रहा है। शिवम शरीर के अभ्यास और वृंदा दिमाग के प्रयास का प्रशिक्षण दे रहे हैं। सुनील की टीम का मानना है कि आज सभी की सबसे बड़ी परेशानी दिमागी है। नियमित कसरत और जिम जाने के बाद भी लोग बीमार पड़ रहे हैं। अधिकांश व्याधियां जीवन शैली से सम्बंधित हैं,जिन्हें योग के प्राणायाम से बहुत आसानी से संशोधित किया जा सकता है। बीमारी और ताकत दोनों ही पहले दिमाग में पैदा होती है। बाद में शरीर उसका अनुपालन करता है। सुनील शेट्टी कहते हैं कि साधारण अनुशासन और अभ्यास से हु। स्वस्थ राह सकते हैं। इस लिहाज से यह अनोखा शो ह्योग,जो मनोरंजन के साथ दर्शकों की सेहत का भी ख्याल रखेगा।



रोज़ाना : क्‍यों नहीं होती दक्षिण भारत के फिल्‍मकारों की चर्चा



रोज़ाना
क्‍यों नहीं होती दक्षिण भारत के फिल्‍मकारों की चर्चा
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हिंदी सिनेमा की चर्चा और खबरों के बीच हमारा ध्‍यान दक्षिण भारत की भाषाओं की फिल्‍मों की ओर कम ही जाता है। हम वहां के कलाकारों और निर्देशकों से अपरिचित हैं। तमिल फिल्‍मों के रजनीकांत और कमल हासन के अलावा हम तेलुगू,कन्‍नड़ और मलयालम के कलाकरों के नाम तक नहीं जानते। हालांकि टीवी पर इन दिनों दक्षिण भारतीय भाषाओं की डब फिल्‍मों की बहार है। पिछले साल तूलुगू के पावर स्‍टार पवन कल्‍याण ने बताया था कि बनारस भ्रमण के दौरान वे इस तथ्‍य से चौंक गए कि वहां की गलियों में भी लोगों ने उन्‍हें पहचाल लिया। पता चला के टीवी के जरिए ही उनकी यह पहचान बनी थी। भारत सरकार और प्रदेशों के सिनेमा संबंधी मंत्रालय देश में ही सभी भाषाओं की फिल्‍मों के आदान-प्रदान और प्रदर्शन में यकीन नहीं रख्‍ते। पिछले साल बिहार सरकार में फिल्‍म वित्‍त निगम के अध्‍यक्ष बनने पर गंगा कुमार प्रादेशिक भाषाओं की फिल्‍मों का फस्टिवल किया था। ऐसी कोशिशें हर प्रदेश में होनी चाहिए।
हाल ही में तेलुगू के श्रेष्‍ठ फिल्‍मकार के विश्‍वनाथ को दादा साहेब फालके पुरस्‍कार से सम्‍ममानित करने की घोषणा हुई है। इस घोषणा के बावजूद हिंदी पत्र-पत्रिकाओं और न्‍यूज चैनलों पर उनके बारे में न के बराबर ही लिखा और बताया गया। के विश्‍वनाथ का पूरा नाम काशीनाधुनी विश्‍वनाथ है। 1930 में पैदा हुए के विश्‍वनाथ तेलुगू समाज में प्रात: स्‍मरणीय नाम हैं। हिंदी फिल्‍मों में अभी ऐसी कोई हस्‍ती नहीं है,जिन्‍हें इस स्‍तर का आदर हासिल हो।  1960 से सक्रिय के विश्‍वनाथ ने पचास से अधिक फिल्‍मों का निर्देशन किया है। उनकी प्रमुख फिल्‍मों में शंकरभरणम,सागर संगमम,स्‍वाति मुतयम,स्‍वयंकृषि और सिरी सिरी मुवा उल्‍लेखनीय हैं। हिंदी के दर्शकों को उनकी ईश्‍वर याद होगी। अनिल कपूर और विजया शांति की यह फिल्‍म के विश्‍वनाथ की ही तेलुगू फिल्‍म की रीमेक थी। के विश्‍वनाथ ने तूलुगू,तमिल और हिंदी में फिल्‍में निर्देशित की हैं।
के विश्‍वनाथ तेलुगू सिनेमा को आम दर्शकों के बीच ले आए। उन्‍होंने अपनी फिल्‍मों में परिचित किरदारों को पेश किया। तेलुगू समाज के पाखंड को उन्‍होंने पर्दे पर बेनकाब किया। सजग चेतना के फिल्‍मकार के विश्‍वनाथ मानते हैं कि सिनेमा से समाज में बदलाव लाश जा सकता है। उन्‍होंने आर्ट फिल्‍में बनाने का दावा नहीं किया। उन्‍की फिल्‍में मध्‍यमार्गी कही जा सकती हैं। मनोरंजन के उद्देश्‍य को पूरा करती उनकी फिल्‍मों में निहित संदेश अवश्‍य रहता था।
फिल्‍म निदेशालय दादा साहेब फालके से सम्‍मानित फिल्‍मकार और कलाकारों की चुनिंदा फिल्‍मों का प्रदर्शन सभी प्रदेशों की राजधानियों और प्रमुख शहरो में आयोजित करे तो हम अने देश की सिनेमाई विविधता और खूबियों से परिचित हो सकते हें।

Wednesday, April 26, 2017

रोज़ाना : लौट आई हैं प्रियंका चोपड़ा

रोज़ाना
लौट आई हैं प्रियंका चोपड़ा
-अजय ब्रह्मात्मज
अमेरिका में अभिनय अभियान का पहला चक्र पूरा कर प्रियंका चोपड़ा मुंबई लौट आई हैं। पिछले शनिवार को मुंबई लौटी प्रियंका चोपड़ा अभी दोस्तों से मिल रही हैं और ज़्यादातर शामें पार्टियों में बिता रही हैं। एक अरसे के बाद दोस्तों से मिल रही प्रियंका के पास सुनने-बताने के लिए बहुत कुछ है। रितः सिधवानी ने उनकी वापसी पर दी पार्टी में : दिल धड़कने दो' के कलाकार रणवीर सिंह और निर्देशक ज़ोया अख्तर को भी बुलाया था। रणवीर और प्रियंका की अच्छी छनती है। पर्दे पर दोनों ने भाई-बहन और पति-पत्नी की भूमिकाएं भी निभाई हैं। माना जाता है कि दीपिका पादुकोण और प्रियंका चोपड़ा में कड़ी टक्कर है,लेकिन रणवीर और प्रियंका की दोस्ती एक अलग स्तर की है।
प्रियंका चोपड़ा अपने कैरियर में अभी खास मोड़ पर हैं। अपना उत्कर्ष देने के पहले ही उनके कैरियर में हॉलीवुड का विक्षेप आया। अमेरिका जाकर उन्होंने 'क्वांटिको' टीवी शो के दो सीजन और एक फ़िल्म 'बेवाच' की। फ़िल्म की रिलीज बाकी है। फ़िल्म आने के बाद सही अंदाज लगेगा कि हॉलीवुड में उनके लिए संभावनाओं के पट पूरी तरह से खुलते हैं या नहीं? फिलहाल यही खुशी की बात है कि दीपिका और प्रियंका ने हॉलीवुड की मेनस्ट्रीम फिल्मों से दस्तक दी। हिंदी फिल्मों के कलाकार एक अरसे से इंटरनेशनल प्रोजेक्ट कर रहे हैं,लेकिन अभी तक किसी की पुरज़ोर मौजूदगी जाहिर नहीं हुई है। जानकार बताते हैं कि हॉलीवुड और हिंदी सिनेमा के बीच कलाकारों और तकनीशियनों की आवाजाही और बढ़ेगी। हाल ही में राजकुमार राव ने 'राब्ता' का अपना लुक शेयर किया। उनके इस लुक का प्रोस्थेटिक मेकअप हॉलीवुड के आर्टिस्ट ने भारतीय टीम के सहयोग से तैयार किया।

प्रियंका चोपड़ा फ़िल्म प्रोडक्शन में आ गयी हैं।उनकी माँ प्रोडक्शन देख रही हैं। माँ- बेटी ने एक भोजपुरी और एक मराठी फिल्म का निर्माण किया है। अभी मराठी जितनी सराही जा रही है,उतनी ही भोजुरी कि निंदा हुई थी। प्रियंका की माँ भोकपुरी भाषी हैं,फिर भी उन्हें किसी ने बरगला दिया। प्रियंका चोपड़ा के पास अभी कोई हिंदी फिल्म नहीं है। वह थोड़ी दुविधा में हैं।हॉलीवुड के आफर के लिए वह खुद को खाली रख रही हैं।कई बार ऐसे इंतज़ार में कलाकार खुद का ही नुकसान कर लेते हैं। पुरानी कहावत है...दुविधा में दोनों गए,माया मिली न राम। प्रियंका चोपड़ा ने हिंदी फिल्मों के बाहरी इंतज़ार से बेहतर अपना प्रोडक्शन आरम्भ कर दिया है।वह कल्पना चावला के जीवन पर एक बॉयोपिक की तैयारी कर रही हैं। इसका निर्देशन प्रिया मिश्रा करेंगी। यह उम्दा निर्णय है,क्योंकि हिंदी की प्रचलित फिल्मों में प्रियंका के लिए फिल्में लिखनी होंगी। उम्र और अनुभव से वह सामान्य फिल्में नहीं कर सकतीं। और उनके बाद नई अभिनेत्रियों की कामयाब टुकड़ी आ चुकी है।

Saturday, April 22, 2017

रोज़ाना : अनारकली... को मिल रहे दर्शक



रोज़ाना
अनारकली... को मिल रहे दर्शक
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हाल ही में अनारकली ऑफ आरा के निर्माता संदीप कपूर और निर्देशक अविनाश दास ने सोशल मीडिया पर शेयर किया कि उनकी फिल्‍म पांचवें हफ्ते में प्रवेश कर गई है। दिल्‍ली और मुंबई के कुछ थिएटरों में वह अभी तक चल रही है। रांची और जामनगर में वह इस हफ्ते लगी है। किसी स्‍वतंत्र और छोटी फिल्‍म की यह खुशखबर खुद में बड़ी खबर है। हम सभी जानते हैं कि छोटी फिल्‍मों का वितरण और प्रदर्शन एक बड़ी समस्‍या है। पीवीआर के साथ होने पर भी अनारकली ऑफ आरा केवल 277 स्‍क्रीन में रिलीज हुई थी। इस सीमित रिलीज को भी उम्‍त कंपनी ने कायदे से प्रचारित और प्रदर्शित नहीं किया था।
मजेदार तथ्‍य है कि मुंबई में अंधेरी स्थित पीवीआर के एक थिएटर में इम्तियाज अली ने यह फिल्‍म देखी। फिल्‍म देखने के बाद उन्‍होंने निर्देशक अविनाश दास के साथ सेल्‍फी लेने के लिए फिल्‍म के पोस्‍टर या स्‍टैंडी की खाज की तो वह नदारद...उन्‍होंने ताकीद की तो थिएटर के कर्मचारियों ने स्‍टैंडी का इंतजाम किया। तात्‍पर्य यह कों की रुचि कैसी बढ़गी? बहरहाल,अनारकली ऑफ आरा दर्शकों के समर्थन से अभी तक थिएटर में बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया और जॉली एलएलबी2 के साथ टिकी है।
फिल्‍म के विषय के अनुरूप संभावित दर्शकों को टारगेट किया जाता तो इस फिल्‍म को ज्‍यादा दर्शक मिले होते। हर फिल्‍म के खास दर्शक होते हैं। अगर उन दर्शकों के बीच फिल्‍म पहुंच जाए तो उसे लाभ होता है। अनारकली ऑफ आरा मुख्‍य रूप से दिल्‍ली और मुंबई में रिलीज की गई। फिल्‍म के विषय के मुताबिक इसे मझोले और छोटे शहरों में आक्रामक प्रचार के साथ प्रदर्शित किया जाता तो आंकड़े कुछ और होते। दर्शक तो अब भी संकेत दे रहे हैं। अगर इसे नए उत्‍साह और प्रचार के साथ नए शहरों में रिलीज किया जाए तो अवश्‍य ही दर्शक मिलेंगे। अनारकली ऑफ आरा नया उदाहरण पेश करेगी।
सीमित बजट और साधनों के साथ बनी यह फिल्‍म अपने कंटेंट और स्‍वरा भास्‍कर की अदाकारी की वजह से खूब पसंद की गई है। हाल-फिलहाल में किसी दूसरे फिल्‍मकार पर पत्र-पत्रिकाओं में इतना लिखा भी नहीं गया है। यह फिल्‍म आम दर्शकों को टच करती है। सहमति के सवाल को प्रासंगिक संदर्भ में सटीक तरीके से उठाती ंयह फिल्‍म हिंदी सिनेमा के देशज स्‍वर को मुखर करती है। यही वजह है कि इस फिल्‍म के दर्शक बढ़ रहे हैं।
अनारकली ऑफ आरा भाषा,परिवेश और अदाकारी के लि‍हाज से बिहार लक्षणों की खांटी हिंदी फिल्‍म है।

Friday, April 21, 2017

दरअसल : पक्ष और निष्‍पक्ष



दरअसल...
पक्ष और निष्‍पक्ष
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले दिनों सोनू निगम अपने पक्ष को रखने की वजह से चर्चा में रहे। उसके कुछ दिनों पहले सुशांत सिंह राजपूत अपना पक्ष नहीं रखने की वजह से खबरों में आए। फिल्‍म जगत के सेलिब्रिटी आए दिन अपने पक्ष और मंतव्‍य के कारण सोशल मीडिया,चैनल और पत्र-पत्रिकाओं की सुर्खियों में रहते हैं। कुछ अपने अनुभवों और मीडिया मैनेजर के सहयोग से बहुत खूबसूरती से बगैर विवादों में आए ऐसी घटनाओं से डील कर लेते हैं। और कुछ नाहक फंस जाते हैं। अभी एक नया दौर है,जब सारे मंतव्‍य राष्‍ट्रवाद और सत्‍तासीन राजनीतिक पार्टी के हित के नजरिए से आंके जाते हैं। नतीजतन अधिकांश सेलिब्रिटी किसी भी मुद्दे पर अपना पक्ष रखने से बचते हैं। वे निष्‍पक्ष और उदासीन होने का नाटक करते हैं। आप अकेले में मिले तो ऑफ द रिकॉर्ड वे अपनी राय शेयर करते हैं,लेकिन सार्वजनिक मंचों से कुछ भी कहने से कतराते हैं।
कुछ समय पहले सहिष्‍णुता के मसले पर आमिर खान और शाह रूख खान के खिलाफ चढ़ी त्‍योरियां सभी को याद होंगी। गौर करें तो एक जिम्‍मेदार नागरिक के तौर पर उन्‍होंने अपना सहज पक्ष रखा था,लेकिन उन्‍हें लोकप्रिय राजनीति के समर्थकों की नाराजगी का शिकार होना पड़ा। उसके बाद से फिल्‍म सेलिब्रिटी ने खामोश रहने या कुछ न कहने का ढोंग ओढ़ लिया है। डर से वे जरूरी मुद्दों पर स्‍वीकृत राय रखने से भी हिचकते हें। राब्‍ता के ट्रेलर लांच में एक पत्रकार के यह पूछने पर कि कुलभूषण जाधव को पाकिस्‍तान में मिली फांसी की सजा पर आप सभी की क्‍या राय है? उन्‍होंने कुछ भी कहने के बजाए सवाल को टाला। यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर दो राय की गुंजाइश नहीं है। एक स्‍वर से पूरा देश चाहता है कि कुलभूषण जाधव सुरक्षित भारत लौटें। भारत सरकार इस मसले को गंभीरता से ले रही है। अपनी नादानी में ट्रेलर लांच में शरीक फिल्‍म स्‍टारों ने चुप्‍पी साधी। सवाल को टाला और दोबारा जोर देने पर भिड़ गए कि इस मुद्ृदे की हमें सही जानकारी नहीं है। यह भी कहा गया कि ट्रेलर लांच में ऐसे सवाल नहीं पूछे जाने चाहिए।
अगला सवाल बनता है कि सार्वजनिक व्‍यक्तियों से कोई सवाल कब पूछा जाए? ऐसी कोई संहिता नहीं है। सार्वजनिक मंचों पर किसी इवेंट में ही ऐसे सवाल पूछे जा सकते हैं। मुमकिन है कि सेलिब्रिटी किसी मुद्दे से वाकिफ न हों। वैसे ममामले पर वे ईमानदारी से अपनी अनभिज्ञता जाहिर कर सकते हैं,लेकिन कन्‍नी काटना तो उचित नहीं है। अब तो ऐसा समय आ गया है कि सभी सेलिब्रिटी को आसपास की घटनाओं और गतिविधियों पर नजर रखनी होगी। उन्‍हें तैयार रहना होगा। जरूरत पड़े तो उन्‍हें सामान्‍य ज्ञान और सामयिक घटनाओं की अद्यतन जानकारी के लिए सलाहकार भी रखनी होगी। सेलिब्रिटी होने के बाद उनसे अपेक्षा बढ़ जाती है कि वे सभी विषयों की सामान्‍य जानकारी रखें। इन दिनों तो फोरम और सेमिनार में चिंतको,अध्‍येताओं और विचारकों के साथ उन्‍हें बुलाया जाने लगा है। उनके व्‍यावहारिक ज्ञान को भी महत्‍व दिया जा रहा है।
यह तटस्‍थ्र या निष्‍पक्ष रहने का समय नहीं है। निष्‍पक्षता वास्‍तव में विवादों से बचने का कवच है। अमिताभ बच्‍चन अपने ब्‍लॉग पर हमेशा सेलिब्रिटी होने की चुनौतियों पर लिखते हैं। वे मानते हैं कि हमें इसके लिए तैयार रहना चाहिए। गालियों और निंदा के रूप में मिले खट्टे बादामों का भी स्‍वाद लेना चाहिए। सच में सेलिब्रिटी घोर असुरक्षित व्‍यक्ति होता है,जो हर वक्‍त सभी के निशाने पर रहता है। सेलिब्रिटी की निजता लगभग खत्‍म हो जाती है। हमेशा उसकी स्‍क्रूटनी चल रही होती है। जाहिर है कि ऐसी स्थिति में उन्‍हें अपना पक्ष मजबूत रखना चाहिए और उसके लिए सामाजिक सरोकार बढ़ाना चाहिए।

Thursday, April 20, 2017

फिल्‍म समीक्षा : नूर



फिल्‍म रिव्‍यू
बेअसर और बहकी
नूर
-अजय ब्रह्मात्‍मज
जब फिल्‍म का मुख्‍य किरदार एक्‍शन के बजाए नैरेशन से खुद के बारे में बताने लगे और वह भी फिल्‍म आरंभ होने के पंद्रह मिनट तक जारी रहे तो फिल्‍म में गड़बड़ी होनी ही है। सुनील सिप्‍पी ने पाकिस्‍तानी पत्रकार और लेखिका सबा इम्तियाज के 2014 में प्रकाशित उपन्‍यास कराची,यू आर किलिंग मी का फिल्‍मी रूपांतर करने में नाम और परिवेश के साथ दूसरी तब्‍दीलियां भी कर दी हैं। बड़ी समस्‍या कराची की पृष्‍ठभूमि के उपन्‍यास को मुंबई में रोपना और मुख्‍य किरदार को आयशा खान से बदल कर नूर राय चौधरी कर देना है। मूल उपन्‍यास पढ़ चुके पाठक मानेंगे कि फिल्‍म में उपन्‍यास का रस नहीं है। कम से कम नूर उपन्‍यास की नायिका आयशा की छाया मात्र है।
फिल्‍म देखते हुए साफ पता चलता है कि लेखक और निर्देशक को पत्रकार और पत्रकारिता की कोई जानकारी नहीं है। और कोई नहीं तो उपन्‍यासकार सबा इम्तियाज के साथ ही लेखक,निर्देशक और अभिनेत्री की संगत हो जाती तो फिल्‍म मूल के करीब होती। ऐसा आग्रह करना उचित नहीं है कि फिल्‍म उपन्‍यास का अनुसरण करें,नेकिन किसी भी रूपांतरण में यह अपेक्षा की जाती है कि मूल के सार का आधार या विस्‍तार हो। इस पहलू से चुनील सिन्‍हा की नूर निराश करती है। हिंदी में फिल्‍म बनाते समय भाषा,लहजा और मानस पर भी ध्‍यान देना चाहिए।
नूर महात्‍वाकांक्षी नूर राय चौधरी की कहानी है। वह समाज को प्रभावित करने वाली स्‍टोरी करना चाहती है,लेकिन उसे एजंसी की जरूरत के मुताबिक सनी लियोनी का इंटरव्‍यू करना पड़ता है। उसके और भी गम है। उसका कोई प्रेमी नहीं है। बचपन के दोस्‍त पर वह भरोसा करती है,लेकिन उससे प्रेम नहीं करती। नौकरी और मोहब्‍बत दोनों ही क्षेत्रों में मनमाफिक न होने से वह बिखर-बिखरी सी रहती है। एक बार वह कुछ कोशिश भी करती है तो उसकी मेहनत कोई और हड़प लेता है। बहरहाल,उसका विवेक जागता है और मुंबई को लांछित करती अपनी स्‍टोरी से वह सोशल मीडिया पर छा जाती है। उसे अपनी स्‍टोरी का असर दिखता है,फिर भी उसकी जिंदगी में कसर रह जाती है। फिल्‍म आगे बढ़ती है और उसकी भावनात्‍मक उलझनों को भी सुलझाती है। इस विस्‍तार में धीमी फिल्‍म और बोझिल हो जाती है।
अफसोस है कि नूर को पर्दे पर जीने की कोशिश में अपनी सीमाओं को लांघती सोनाक्षी सिन्‍हा का प्रयास बेअसर रह जाता है। नूर में बतौर अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्‍हा कुछ नया करती हैं। वह अपने निषेधों को तोड़ती है। खिलती और खुलती हैं,लेकिन लेखक और निर्देशक उनकी मेहनत पर पानी फेर देते हैं। 21 वीं सदी की मुबई की एक कामकाजी लड़की की दुविधाओं और आकांक्षाओं की यह फिल्‍म अपने उद्देश्‍य तक नहीं पहुंच पाती।
अवधि- 116 मिनट
** दो स्‍टार

रोज़ाना : सबा इम्तियाज की ‘नूर’



रोज़ाना
सबा इम्तियाज की नूर
-अजय ब्रह्मात्‍मज

इस हफ्ते रिलीज हो रही सोनाक्षी सिन्‍हा की नूर 2014 में प्रकाशित पाकिस्‍तानी अंग्रेजी उपन्‍यास कराची,यू आर किलिंग मी का फिलमी रूपांतरण है। सबा इमित्‍याज का यह उपन्‍यास पाकिस्‍तान के शहर कराची की पृष्‍ठभूमि में एक महिला पत्रकार की रचनात्‍मक और भावनात्‍मक द्वंद्वों पर आधारित है। उपन्‍यास में कराची शहर,वहां की मुश्किलें और मीडिया हाउस की अंदरूनी उठापटक के बीच अपने वजूद की तलाश में आगे बढ़ रही आयशा खान का चित्रण है। यह उपन्‍यास लेखिका सबा इमित्‍याज के जीवन और अनुभवों पर आधारित है। सबा पेशे से पत्रकार हैं। फिलहाल वह जार्डन में रहती हैं और अनेक इंटरनेशनल अखबारों के लिए लिखती हैं। कराची,यू आर किलिंग मी उनका पहला उपन्‍यास है। अभी वह नो टीम ऑफ एंजेल्‍स लिख रही हैं।
सबा इम्तियाज सभी पाकिस्‍तानी लड़कियों की तरह हिंदी फिल्‍मों की फैन हैं। वह हिंदी फिल्‍में देखती हैं। जब भारतीय निर्माताओं ने फिल्‍म के लिए उनके उपन्‍यास के अधिकार लिए तो वह बहुत खुश हुईं। उन्‍होंने तब इसकी परवाह भी नहीं की कि उनके उपन्‍यास पर आधारित फिल्‍म की नायिका कौन होगी? सबा यही मानती हैं कि कराची और मुंबई महानगर हैं। दक्षिण एशिया के सभी महानगरों की हालत लगभग एक जैसी है,इसलिए उनकी समस्‍याएं भी एक जैसी हैं। सब को उम्‍मीद है कि कराची की पृष्‍ठभूमि के उपन्‍यास का मुंबई की पृष्‍ठभूमि की फिल्‍म में उचित रूपसंतरण किया गया होगा।
नूर इस लिहाज से उल्‍लेखनीय है कि यह महानगर में अपनी अस्मिता की खोज में निकली आधुनिक महानगरीय लड़की की कहानी कहती है। उसकी समस्‍याएं दफ्तर तक ही सीमित नहीं हैं। उसे अपनी जिंदगी में प्‍यार की भी तलाश है। वह नौकरी और मोहब्‍बत दोनों में अच्‍छा करना चाहती है। उपन्‍यास कराची,यू आर किलिंग मी में कराची की आयशा खान फिल्‍म नूर में मुंबई नूर बन चुकी है। फिल्‍मी रूपांतरण में सबा का योगदान नहीं है। इसकी स्े्रिप्‍ब्ट फिल्‍म के निर्देशक सुनील सिप्‍पी ने शिखा शर्मा और अलथिया डेलास-कौशल की मदद से लिखी है। संवाद इशिता मोइत्रा ने लिखे हैं। पाकिस्‍तानी परिवेश से भारतीय परिवेश में आ चुकी आयशा खान की यह तब्‍दीली रोचक होगी।
रोचक तो यह भी है कि नूर की रिलीज के कुछ हफ्तों के बाद हाफ गर्लफ्रेंड आ रही है। दोनों फिल्‍में पाकिस्‍तान और भारत पॉपुलर अंग्रेजी उपन्‍यासों पर आधारित हैं।
@brahmatmajay


Wednesday, April 19, 2017

रोज़ाना : अशांत सुशांत



रोज़ाना
अशांत सुशांत
-अजय ब्रह्मात्‍मज
दिनेश विजन की फिल्‍म राब्‍ता के ट्रेलर लांच पर सुशांत सिंह राजपूत और फिल्‍म पत्रकार भारती प्रधान के बीच हुई झड़प के मामले में सोशल मीडिया और मीडिया दो पलड़ों में आ गया है। सुशांत का पलड़ा भारी है। फैंस और मीडिया फैंस उनके समर्थन में उतर आए हैं। ऐसा लग रहा है कि गलती भारती प्रधान से ही हुई। अगर उस लांच के वीडियों को गौर से देखें तो पूरी स्थिति स्‍पष्‍ट होगी।
हुआ यों कि सवाल-जवाब के बीच एक टीवी पत्रकार ने कुलभूषण जाधव के बारे में सवाल पूछा,जिन्‍हे कथित जासूसी के अपराध में पाकिस्‍तान ने फांसी की सजा सुनाई है। इस सवाल को सुनते ही थोड़ी देर के लिए खामोशी छा गई। फिर कृति सैनन ने निर्देशक दिनेश विजन का फुसफुसाकर सुझााया कि इस सवाल का जवाब नहीं दिया जाएं। दिनेश विजन ने कहा कि अभी हमलोग इस पर बातें ना करें। सवालों का सिलसिला आगे बढ़ गया। मंच के ठीक सामने बैठी सीनियर भारती प्रधान को यह बात नागवार गुजरी। उन्‍होंने खड़े होकर सवाल किया कि राष्‍ट्रीय महत्‍व के इस सवाल से कैसे बच सकते हैं? मौजूद फिल्‍म स्‍टारों का इसका जवाब देना चाहिए। सुशांत ने कमान संभाली और जवाब नहीं देने के तर्क देने लगे। वही घिसा-पिटा जवाब कि हमें इस विषय की पूरी जानकारी नहीं है। भारती प्रधान ने फिर से जोर दिया तो सुशांत बिफर गए। शब्‍दों को चबाते हुए उन्‍होंने भारती से पूछा कि क्‍या आप राष्‍ट्रीय मुद्दों के सभी सवालों के उत्‍तर दे सकती हैं? सामान्‍य बातचीत अभद्र और एकतरफा हो गई। टी सीरिज के भूषण कुमार ने मामले की नजाकत को समझा और उन्‍होंने सुशांत को शांत किया।
सवाल ही कि पहली बार ही फिल्‍म स्‍टार और निर्देशक कह देते कि हम इस मुद्दे पर नहीं बोलना चाहते या हमें सही जानकारी नहीं है। वैसे देश के जागरूक नागरिक और एक्‍टर होने के नाते उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे सभी समसामयिक घटनाओं से वाकिफ रहें। ऐसे इवेंट में ही पत्रकारों को गैरफिल्‍मी जरूरी मुद्ददों पर सवाल करने के मौके मिलते हैं। बच्‍चन और खान जैसे अनुभवी स्‍टार सवालों को ढंग से डील कर लेते हैं। नए स्‍टार अहंकार और स्‍टारडम के नशे में जरूरी सवालों का मजाक बनाते हैं और उन्‍हें टालते हैं। सुशांत को अशांत होने की जरूरत नहीं थी।  

Tuesday, April 18, 2017

रोज़ाना : अशोभनीय प्रयोग



रोज़ाना
अशोभनीय प्रयोग
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले दिनों श्रीजित मुखर्जी निर्देशित बेगम जान आई। बेगम जान में विद्या बालन नायिका हैं और फिल्‍म के निर्माता हैं विशेष फिल्‍म्‍स के महेश भट्ट और मुकेश भट्ट। इस फिल्‍म ने विद्या बालन और महेश भट्ट के अपने प्रशंसकों को बहुत निराश किया।

बेगम जान पंजाब में कहीं कोठा चलाती है। उसे वहां के राजा साहब की शह हासिल है। आजादी के समय देश का बंटवारा होता है। रेडक्लिफ लाइन बेगम जान के कोठे को चीरती हुई निकलती है। भारत और पाकिस्‍तान के अधिकारी चाहते हैं कि बेगम जान कोठा खाली कर दे। 11 लड़कियों के साथ कोठे में रह रही बेगम जान अधिकारियों के जिस्‍म के पार्टीशन कर देने का दावा करती है,लेकिन ताकत उसके हाथ से निकलती जाती है। आखिरकार वह कोठे में लगी आग में बची हुई लड़कियों के साथ जौहर कर लेती है। आत्‍म सम्‍मान की रक्षा की इस कथित मध्‍ययुगीन प्रक्रिया को 1947 गौरवान्वित करते हुए दोहराना एक प्रकार की पिछड़ी सोच का ही परिचायक है। उनकी बेबसी और लाचारगी के चित्रण के और भी तरीके हो सकते थे। प्रगतिशील महेश भट्ट का यह विचलन सोचने पर मजबूर करता है,क्‍योंकि इस फिल्‍म की रिलीज के पहले उन्‍होंने कहा था कि वे अपनी पुरानी लकीर का विस्‍तार कर रहे हैं। विशेष फिल्‍म्‍स के 30 वें साल में वे फिर से अर्थ और सारांश की जमीन पर लौटना चाहते हैं।
इतना ही नहीं फिल्‍म के एक किरदार का नाम कबीर रखा गया है। वह खल चरित्र है। वह जनेऊ पहनता है और उसने खतना भी करवा रखा है। जरूरत के अनुसार पैसे लेकर वह हिंदू और मुसलमान दोनों की तरफ से दंगे-फसाद करवाता है। ऐसे किरदार का नाम कबीर रखने का क्‍या तात्‍पर्य हो सकता है? कवि और सामाजिक संत के रूप में हम कबीर को जानते हैं। उन्‍होंने अपनी रचनाओं में दोनों धर्मों के कट्टरपंथियों की आलोचना की है। ऐसे सेक्‍युलर संत का नाम एक भ्रष्‍ट ग़ुंडे को देकर महेश भट्ट और श्रीजित मुखर्जी ने कबीर की प्रतिष्‍ठा और योगदान का धूमिल किया है। कबीर हमारी सांस्‍कृतिक और साहित्यिक प्रतिमा(आयकॉन) हैं। उनके नाम के साथ ऐसा भद्दा कृत्‍य अशोभनीय है।
फिल्‍मकारों को ऐसे प्रयोगों में अतिारक्‍त सावधानी बरतनी चाहिए।  

Saturday, April 15, 2017

रोज़ाना : अपवाद हैं अभय देओल



रोज़ाना
अपवाद हैं अभय देओल
-अजय ब्रह्मात्‍मज  

देओल परिवार के अभय देओल अपने चचेरे भाइयों सनी देओल और बॉबी देओल से मिजाज में अलग हैं। उनकी जीवन शैली और फिल्‍मों की पसंद-नापसंद में साफ फर्क दिखता है। स्‍टार परिवार से होने के बावजूद उनमें स्‍टारों के नखरे नहीं हैं। वे दिखावे में नहीं रहते। पंजाबी परिवारों के गुणों-अवगुणों से भी वे दूर हैं। पढ़ाई के लिए विदेश में रहने और वहां हर रंग व वर्ण के दोस्‍तों के साथ बिताई जिंदगी ने उनकी पारंपरिक सोच बदल दी। भारत लौटने और सोचा न था जैसी फिल्‍म से शुरूआत करने के साथ ही उन्‍होंने स्‍पष्‍ट कर दिया था कि उनमें देओल परिवार के फिल्‍मी और पंजाबी लक्षण नहीं हैं।
अभय देओल ने आउट ऑफ बॉक्‍स फिल्‍में कीं। जिंदगी ना मिलेगी दोबारा जैसी कमर्शियल फिल्‍म में उनकी असहजता आसानी से देखी जा सकती है। कुछ अलग और बेहतरीन करने की कोशिश में उन्‍हें अभी तक बड़ी कामयाबी नहीं मिली है,लेकिन अपने फसलों और बयानों से उन्‍होंने हमेशा जारि किया कि दूसरे स्‍टारसन की तरह लकीर के फकीर नहीं हैं। 2014 में उन्‍होंने अपनी फिल्‍म वन बा टू डिजीटल रिलीज कर सकेत दे दिया था कि मनोरंजन की दुनिया किधर खिसक रही है। तब इंडस्‍ट्री के पंडितों ने उनकी खिल्‍ली उड़ाई थी और कहा था कि उनका दिमाग फिर गया है।
फिल्‍म इंडस्‍ट्री में जब भी कोई कुछ नया करना चाहता है तो उसका मखौल उड़ाया जाता है। आरंभिक प्रयासों में सफलता नहीं मिले तो मखौल ही व्‍यक्ति का मुहावरा और परिख्‍य बन जाता है। हाल ही में गोरेपन के ऐड और एंडोर्समेंट करनेवाले फिल्‍म कलाकारों के बारे में उन्‍होंने अपनी रय जाहिर की तो उनकी प्रशंसा हुई,लेकिन सोनम कपूर ने नाराजगी में एषा देओल के एक ऐड की तस्‍वीर लगा कर सवाल किए। सोनम कपूर की इस बचकानी हरकत पर अभय देओल ने शांतचित्‍त भाव से कहा कि यह भी गलत है। अभय देओल मानते हें कि फिल्‍म कलाकरों को ऐसे विज्ञापनों का हिस्‍सा नहीं बनना चाहिए।
गोरापन एक गंथि है,जो भारतीय समाज में गोरों(अंग्रेजों) के दो सदी के शासन में मजबूत हुआ। भारतीय शास्‍त्रों और रीतिकाल की रचनाओं में श्‍याम वर्ण की तारीफ मिलती है। हमारे आदर्श और पूज्‍य राम और कृष्‍ण भी तो श्‍याम वर्ण के थे।

Friday, April 14, 2017

दरअसल : पहचान का संकट है चेतन जी



दरअसल...
पहचान का संकट है चेतन जी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
चेतन जी,
जी हमारा नाम माधव झा है। हमें मालूम है कि आप हिंदी बोल तो लेते हैं,लेकिन ढंग से लिख-पढ़ नहीं सकते। आप वैसे भी अंगेजी लेखक हैं। बहुते पॉपुलर हैं। हम स्‍टीवेंस कालिज में आप का नावेल रिया के साथ पढ़ा करते थे। खूब मजा आता था। प्रेमचंद और रेणु को पढ़ कर डुमरांव और पटना से निकले थे। कभी-कभार सुरेन्‍द्र मोहन पाठक और वेदप्रकाश शर्मा को चोरी से पढ़ लेते थे। गुलशन नंदा,कर्नल रंजीत और रानू को भी पढ़े थे। आप तो जानबे करते होंगे कि गुलशन नंदा के उपन्‍यास पर कैगो ना कैगो फिल्‍म बना है। अभी जैसे कि आप के उपन्‍यास पर बनाता है। हम आप के उपन्‍यास के नायक हैं माधव झा। हम तो खुश थे कि हमको पर्दा पर अर्जुन कपूर जिंदा कर रहे हैं। सब अच्‍छा चल रहा था।
उस दिन ट्रेलर लांच में दैनिक जागरण के पत्रकार ने मेरे बारे में पूछ कर सब गुड़-गोबर कर दिया।  उसने आप से पूछ दिया था कि झा लोग तो बिहार के दरभंगा-मधुबनी यानी मैथिल इलाके में होते हैं। आप ने माधव झा को डुमरांव,बक्‍सर का बता दिया। सवाल तो वाजिब है। आप मेरा नाम माधव सिंह या माधव उपाध्‍याय भी कर सकते थे। मेरा सरनेम झा ही क्‍यों रखा? और झा ही रखा तो हमको दरभंगा का बता देते। दरभंगा में भी तो राज परिवार है। उसी से जोड़ देते। हमको लगता है कि आप का कोई झा दोस्‍त रहा होगा। मेरे बहाने आप ने उससे कोई पुराना हिसाब पूरा किया है। अब जो भी हो...हम तो फंस गए। हमारे पहचान का संकट हो गया है।
उस पत्रकार को जवाब देने के लिए आप ने जो कमजोर तर्क जुटाए,वह पढ़ लीजिए...हम अक्षरश: लिख रहे हैं...
यह लड़का पटना इंग्लिश सीखने आता है। मुझे ऐसी जगह चाहिए थी जो पटना से अधिक दूर ना हो। असके लिए मैंने लिबर्टी ली। बुक में जो है,वही यहां भी है।(यानी फिल्‍म में)
आय एम वेरी हैप्‍पी कि आप हमारी फिल्‍म को इतनी बारीकी से देखते हैं। बक्‍सर में झा कम होते हैं। ऐसा नहीं है कि जीरो होते हैं। इंडिया में कोई आदमी कहीं रह सकता है। लेकिन योर पाइंट इज राइट।
मुझे क्रिएटिव लिबर्टी लेना था। मैं चाहता था कि वह कैरेक्‍टर वीकएंड पर पटना आए। इंग्लिश सीख कर जाए। इसके लिए मुझे पास वाली जगह चाहिए थी। दरभंगा जरा दूर है। वहां से वीकएंड में पटना करना जरा मुश्किल है।
साफ लग रहा है कि आप ने सवाल सुनने के बाद जवाब सोचा और हमारे पहचान के संकट को और बढ़ा दिए। कहीं ना कहीं आप का रिसर्च कमजोर था। अब गलती कर गए हैं तो अपने को सही ठहराने के लिए लाजिक जुटा रहे हैं। रिसर्च करते तो पता चल जाता कि डुमरांव पटना से जादे पास नहीं है। चेतन जी,पटना से डुमरांव 110 किलोमीटर है और दरभंगा 127 किलोमीटर है। आने-जाने में बराबरे टाइम लगता है। लालू जी के समय तो सड़क इतना खराब था कि तीन घंटा से जादा ही लगता था पटना पहुंचने में। वैसे आपने भी उपन्‍यास में तीन घंटा बताया है। उतना ही टाइम दरभंगा से भी लगता था।
डुमरांव के हिसाब से हमारा भाषा भोजपुरी तो सहीये बताए,लेकिन झा लोग की पहचान मैथिली भाषा से है। हमको तो साफ लगता है कि सरनेम देने में आप से चूक हो गया। और सजा हम भुगत रहे हैं। इंटरनेट के रिसर्च से ऐसी भूल होता है। टिवंकल खन्‍न भी तो द लिजेंड ऑफ लक्ष्‍मी प्रसाद में छठ के प्रसाद में बनाना फ्राय करवा चुकी हैं। बताइए,छठ में बनाना फ्राय?
जगह की कमी से एतना ही लिख रहे हैं,बाकी शिकायत तो और भी है।
आपका,
माधव झा
(हाफ गर्लफ्रेंड का हीरो)

फिल्‍म समीक्षा : बेगम जान



फिल्‍म रिव्‍यू
बेगम जान
अहम मुद्दे पर बहकी फिल्‍म
-अजय ब्रह्मात्‍मज

फिल्‍म की शुरूआत 2016 की दिलली से होती है और फिल्‍म की समाप्ति भी उसी दृश्‍य से होती है। लगभग 70 सालों में बहुत कुछ बदलने के बाद भी कुछ-कुछ जस का तस है। खास कर और तों की स्थिति...फिल्‍म में बार-बार बेगम जान औरतों की बात ले आती है। आजादी के बाद भी उनके लिए कुछ नहीं बदलेगा। यही होता भी है।
बाल विधवा हुई बेगम जान पहले रंडी बनती है और फिर तवायफ और अंत में पंजाब के एक राजा साहब की शह और सहाता से कोठा खड़ी करती है,जहां देश भर से आई लड़कियों को शरण मिलती है। दो बस्तियों के बीच बसा यह कोठा हमेशा गुलजार रहता है। इस कोठे में बेगम जान की हुकूमत चलती है। दुनिया से बिफरी बेगम जान हमेशा नाराज सी दिखती हैं। उनकी बातचीत में हमेशा सीख और सलाह रहती है। जीवन के कड़े व कड़वे अनुभवों का सार शब्‍दों और संवादों में जाहिर होता रहता है। कोइे की लड़कियों की भलाई और सुरक्षा के लिए परेशान बेगम जान सख्‍त और अनुशासित मुखिया है।
आजादी मिलने के साथ सर सिरिल रेडक्लिफ की जल्‍दबाजी में खींची लकीर से पूर्व और पश्चिम में देश की विभाजन रेखा खिंच जाती है। नक्‍शे पर रेखा खींचते समय रेडक्लिफ का एहसास भी नहीं रहता कि वे अहम मुद्ददे पर कैसी अहमक भूल कर रहे हैं। उन्‍होंने तो रेखा खींच दी और चुपके से ब्रिटेन लौट गए,लेकिन पंाब और बंगाल में विभाजन की विभीषिका में लाखें बेघर हुए और लाखों को जान-माल की हानि हुई। इसी में बेगम जान का कोठा भी तबाह हुआ और कोठे की लड़कियों को आधुनिक पद्मसवती बनी बेगम जान के साथ जौहर करना पड़ा।
लेखक-निर्देशक श्रीजित मुखर्जी ने फिल्‍म के मुद्दे को सही संदर्भ और परिवेश में उठाया,लेकिन बेगम जान की कहते-कहते वे कहीं भटक गए। उन्‍हें नाहक जौहर का रास्‍ता अपनाना पड़ा और पृष्‍ठभूमि में त्रवो सुबह कभी तो आएगी गीत बजाना पड़ा। अपने उपसंहार में यह फिल्‍म दुविधा की शिकार होती है। अहम मुद्दे पर अहमकाना तो नहीं,लेकिन बहकी हुई फिल्‍म हमें मिलती है।
बेगम जान का किरदार एकआयामी और बड़बोला है। वह निजी आवेश में स्थितियों से टकरा जाती है। उसे राज साहब से भी मदद नहीं मिल पाती। लोकतंत्र आने के बाद राजा साहब की रियासत और सियासत में दखल पहले जैसी नहीं रह गई है। रेडक्लिफ लाइन को बेगम जान के इलाके में लागू करवाने के लिए तैनात श्रीवास्‍तव और इलियास कंफ्यूज और भवुक इंसान हैं,लेकिन वे बेरहमी से काम लेते हैं। बाद में उनका पछतावा पलले नहीं पड़ता। इतने ही संवेदनशील थे तो उन्‍हें कबीर की मदद लेने की जरूरत क्‍यों पड़ी? और कबीर का किरदार...माफ करें भट्ट साहब और श्रीजित कबीर समन्‍य और समरसता के प्रतीक हैं। उनके नाम के किरदार से ऐसी अश्‍लील और जलील हरकत क्‍यों? इसे सिनैमैटिक लिबर्टी नहीं कहा जा सकता।
बहरहाल, विद्या बालन ने बेगम जान के किरदार को तन-मन दिया है। उन्‍होंने उसके रुआब और शबाब को संजीदगी से पर्दे पर उतारा है। उनकी संवाद अदायगी और गुस्‍सैल अदाकारी बेहतरी है। उनका किरदार दमदार है,लेकिन अंतिम फैसले में वह आदर्श के बावजूद कमजोर पड़ जाती है। यह विद्या की नहीं,लेखक-निर्देशक की कमजोरी है। सहयोगी किरदारों की छोटी भूमिकाओं में अभिनेत्रियों(दर्जन भर)े ने बेहतर काम किया है। मास्‍टरजी और सुजीत बने अभिनेताओं विवेक मुश्रान और पितोबोस का काम यादगार है।
फिल्‍म में चित्रित होली रंगीन और आह्लादपूर्ण हैं। रंगों की ऐसी छटा इन दिनों विरले ही दिखती है। फिल्‍म भावुकता और संवादों से ओतप्रोत है,जो संयुक्‍त रूप आलोडि़त तो करती है,लेकिन कहीं पहुंचाती नहीं है।
अवधि- 134 मिनट
*** तीन स्‍टार

Thursday, April 13, 2017

रोज़ाना : धरम जी समझ सकते हैं...



रोज़ाना
धरम जी समझ सकते हैं...
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कल सभी अखबारों में खबर थी कि सलमान खान अपनी आत्‍मकथा नहीं लिखेंगे या यों कहें कि नहीं लिख सकते। आशा पारेख की खालिद मोहम्‍मद लिखित आत्‍मकथा द हिट गर्ल के विमोचन के अवसर पर सलमान खान ने यह बयान दिया। उन्‍होंने आशा पारेख जैसी सेलिब्रिटी की तारीफ की। उन्‍होंने कहा कि आत्‍मकथा लिखना बहादुरी का काम है। मुझ से तो लाइफ में ना हो। धरम जी समझ सकते हैं.... इसके बाद हॉल में तालियां बजीं। लोग हंसे और खिलखिलाए। सलमान खान शरमाए। होंठ पोंछे और शरारती निगाहों से हॉल में मौजूद लोगों को देखा। फिर से तालियां बजीं। लगभग 20 सेकेंड के इस अंतराल में सलमान खान ने कुछ नहीं कहा,लेकिन लोगों ने सब कुछ समझ लिया। दरअसल,सलमान खान जैसी सेलिब्रिटी जब वाक्‍य अधूरा छोड़ते हैं तो आगे के शब्‍द और उनका आशय भी लोग समझ लेते हैं।
आत्‍मकथा किसी भी व्‍यक्ति का वस्‍तुनिष्‍ट और निष्‍पक्ष जीवन इतिहास है,जिसे वह खुद लिखता या लिखवाता है। पहले के कवि और शायर अपनी रचनाओं में खुद के बारे में लिख देते थे। हिंदी में आत्‍मकथा की शुरूआत साहित्‍य की अन्‍य विधाओं की तरह भारतेन्‍दु हरिश्‍चंद्र से हुई। उन्‍होंने एक कहानी : कुछ आपबीती कुछ जगबीती नाम से आत्‍मकथा लिखी थीं। राहुल सांकृत्‍यायन और हरिवंश राय बच्‍चन की आत्‍मकथाएं मशहूर हैं। गांधी,नेहरू,राजेन्‍द्र प्रसाद की आत्‍मकथाओं से भी हम परिचित हैं। फिल्‍मी हस्तियों में आत्‍मकथा लिखने का चलन इधर बढ़ा है। ज्‍यादार फिल्‍मी हस्तियों ने दूसरे लेखकों से अपनी आत्‍कथाएं कलमबद्ध की हैं। देव आनंद ने रोमांसिंग विद लाइफ खुद लिखी थी। लिखें तो हिंदी-अंग्रेजी में दक्ष अमिताभ बच्‍चन की आत्‍मकथा रोचक होगी। खानत्रयी में अभी तक शाह रूख खान की जीवनियां आई हैं,जिनमें अनुपमा चोपड़ा की किंग ऑफ बॉलीवुड श्रेष्‍ठ है। तीनों खानों के लबे करिअर और जीवन को समेटती किताबे आनी चाहिए।
सलमान खान धरम जी के बहाने जो सकेत दे रहे थे...वास्‍तव में वह उनकी जिंदगी के रोमांस और उथल-पुथल पूर्ण जिंदगी की तरफ इशारा करता है। एक बार एक पत्रकार ने सलमान खान से उनकी हीरोइनों के बारे में एक फीचर के लिए बातचीत करने की कोशिश की तो तो मुंहफट सलमान खान का सवाल था,क्‍या बताऊं? किस के साथ कब....
फिर भी सलमान खन समेत सभी फिल्‍मी हस्तियों को अपनी आत्‍मकथा या जीवनी लिखनी-लिखवानी चाहिए। अगर वे स्‍वयं न कर पाएं तो फिल्‍म शोधार्थियों को इस दिशा में प्रयास करना चाहिए।
@brahmatmajay

Wednesday, April 12, 2017

रोज़ाना : शीघ्र सेहतमंद हों अमित जी



रोज़ाना/अजय ब्रह्मात्‍मज
शीघ्र सेहतमंद हों अमित जी
हर रविवार की शाम को प्रशंसक और दर्शक खिंचे चले आते हैं। धीरे-धीरे व्‍यक्तियों का समूह बढ़ता और और एक भीड़ में तब्‍दील हो जाता है। यह भीड़ अपने प्रिय अभिनेता की एक झलक और विनम्र नमस्‍कार पाने के लिए उतावली रहती है। मुंबई के उपनगर जुहू के इलाके में हर रविवार को लोगों का हुजूम अमिताभ बच्‍चन के नए आवास जलसा के सामने एकत्रित होता है। पिछले कई सालों से यह सिलसिला चल रहा है। अगर अमिताभ बच्‍चन मुंबई में हों तो वे बिना नागा हाजिर होते हैं। लकड़ी के बने अस्‍थायी चबूतरे पर खड़े होकर वे सभी का अभिवादन स्‍वीकार करते हैं। पिछले रविवार 9 अप्रैल को अस्‍वस्‍थ होने की वजह से वे अपने प्रशंसकों से मुखातिब नहीं हो सके। उन्‍हें इसका अफसोस रहा और उन्‍होंने ट्वीटर,ब्‍लॉग और फेसबुक पर अपने विस्‍तारित परिवार(एक्‍सटेंडेड फमिली) से माफी मांगी।
इस साल अक्‍तूबर में 75 के हो रहे अमिताभ बच्‍चन कई पहलुओं से मिसाल हैं। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के सक्रिय कलाकारों में से एक अमिताभ बच्‍चन के दायित्‍व,कर्तव्‍य और मंतव्‍य को देख-सुन कर अचरज ही होता है कि वे कैसे इतने अलर्ट और जागरूक बने रहते हैं। पिछले रविवार को उनके पेट में इंफेक्‍शन हो गया था। सभी जानते हैं कि उनका पेट इंफेक्‍टेड है और खान-पान में उन्‍हें संयम का पालन करना पड़ता है। कहते हें न,ंहम सभी के अंदर मानवोचित गुण्‍-अवगुण होते हैं,जो सारे आवरण,मास्‍क और प्रतिष्‍ठा के बावजूद जाहिर हो जाते हैं। जी हां,अमिताभ बच्‍चन ने मिर्चीदार पित्‍जा खा लिया था। यकीनन उन्‍हें अपने परिजनों से डांट भी पड़ी होगी,लेकिन यह कितना स्‍वाभाविक है। याद करे,हमारे घरों के बुजुर्ग भी कैसे परहेज का उल्‍लंघन करते हैं और बीमार पड़ जाते हैं। अमिताभ बच्‍चन के साथ भी यही हुआ।
बहाहाल,अभी वे स्‍वस्‍थ हैं। हम तो यही चाहेंगे कि वे जल्‍दी से जल्‍दी सेहतकुद होकर काम पर लौटें। अपने विस्‍तारित परिवार से मिलें। अगले रविवार 16 अप्रैल को प्रशंसकों से मिलें। अमिताभ बच्‍चन की रामगोपाल वर्मा निर्देशित सरकार 3 अगले माह आ रही है। अमिताभ बच्‍चन पुराने आक्रोशित तेवर के साथ दिखेंगे। वे जल्‍दी ही आमिर खान के साथ अगली फिल्‍म की शूटिंग आरंभ करेंगे। हाल ही में हमने नीतेश तिवारी निर्देशित ठंडे तेल की एक ऐड फिल्‍म में उनका खिलंदड़ रूप देखा।
@brahmatmajay

Tuesday, April 11, 2017

रोज़ाना : मॉडर्न क्लासिक ‘ताल’ का खास शो


रोज़ाना/ अजय ब्रह्मात्‍मज
    मॉडर्न क्लासिक ताल का खास शो
महानगर मुंबई और इतवार की शाम। फिर भी सुभाष घई का निमंत्रण हो तो कोई कैसे मना कर सकता है? उत्‍तर मुंबई के उपनगर से दक्षिण मुंबई मुखय शहर में जाना ही पहाड़ चढ़ने की तरह है। इसके बावजूद खुद को रोकना मुश्किल था,क्‍योंकि सुभाष धई ने अपन फिल्‍म ताल देखने का निमंत्रण दिया था। सुभाष घई अब सिनेमाघर के बिजनेस में उतर आए हैं। वे पुराने सिनेमाघरों का जीर्णोद्धार कर उन्‍हें नई सुविधाओं से संपन्‍न कर रहे हें। उन्‍हें मुंबई के फोर्ट इलाके में स्थित न्‍यू एक्‍स्‍लेसियर सिंगल स्‍क्रीन में आधुनिक प्रोजेकशन और साउंड सिस्‍टम बिठा दिया है। उसयकी सज-धज भी बदल दी है। इसी सिनेमाघर में वे 1999 में बनी अपनी फिल्‍म ताल दिखा रहे थे। इस खास शो में उनके साथ म्‍यूजिक डायरेक्‍टर एआर रहमान, कैमरामैन कबीर लाल, कोरियोग्राफर श्‍यामक डावर, संवाद लेखक जावेद सिद्दीकी व गायक सुखविंदर सिंह भी मौजूद रहेथ।
फिल्‍ममेकिंग की रोचक और खास प्रक्रिया है। एक डायरेक्टर अपने विजन के अनुसार कलाकारों और तकनीशियन की टीम जमा करता है और फिर महीनों, कई बार सालों में अपनी सोच को सेल्‍युलाइड पर उतारने की कोशिश करता है। लोकप्रिय, चर्चित और देखी हुई क्‍लासिक की रचना और निर्माण प्रक्रिया से वाकिफ होने पर फिल्‍म के दृश्‍य खुलते हैं। उनके साथ जुड़ी घटनाओं को जानने पर हर दृश्‍य का रोमांच बढ़ जाता है। ताल शोमैन सुभाष घई की म्‍यूजिकल लवस्टोरी है।
मिस वर्ल्‍ड ऐश्‍वर्या राय के सौंदर्य से प्रेरित ताल में नृत्‍य और संगीत का नया आकर्षण था। एआर रहमान के लयपूर्ण संगीत की ताजगी आज भी कानों में रस घोलती है। लगातार 17 दिनों तक सुभाष घई के दिन और एआर रहमान की रातों की मेहनत से ताल का संगीत तैयार हुआ था। आनंद बख्‍शी के गीतों को रहमान ने संगीत से संवारा। शब्‍दों में लय और गति जोड़ी। श्‍यामक डावर ने उसी लय और गति को नृत्‍य में उतार दिया। ताल में ऐश्‍वर्या राय की नृत्‍य मुद्राएं भित्ति चित्रों की रूपसियों और अप्सराओं की याद दिलाती हैं।
    ताल हर लिहाज से 20 वीं सदी की मॉडर्न क्लासिक हिंदी फिल्‍म है।
@brahmatmajay

Sunday, April 9, 2017

अलहदा है बेगम का फलसफा’ : महेश भट्ट




 -अजय ब्रह्मात्‍मज
श्रीजित मुखर्जी का जिक्र मेरे एक रायटर ने मुझ से किया था। उन्‍होंने कहा कि वे भी उस मिजाज की फिल्‍में बनाते रहे हैं, जैसी ‘अर्थ’, ‘सारांश ‘जख्‍म’ थीं। उनके कहने पर मैंने ‘राजकहानी’ देखी। उस फिल्‍म ने मुझे झिझोंर दिया। मैंने सब को गले लगा लिया। मैंने मुकेश(भट्टसे कहा कि ‘राज   राज रीबूट’ हमने बहुत कर लिया। अब ‘राजकहानी’ जैसी कोई फिल्‍म करनी चाहिए। मुकेश को भी फिल्‍म अच्छी लगी। श्रीजित ने अपनी कहानी भारत व पूर्वी पाकिस्‍तान में रखी थी। रेडक्लिफ लाइन बेगम जान के कोठे को चीरती हुई निकलती है। यह प्लॉट ही अपने आप में बड़ा प्रभावी लगा। हमें लगा कि इसे पश्विमी भारत में शिफ्ट किया जाए तो एक अलग मजा होगा। हमने श्रीजित को बुलाया। फिर उन्होंने 32 दिनों में दिल और जान डालकर ऐसी फिल्‍म बनाई की क्या कहें।
   मेरा यह मानना है कि हर सफर आप को आखिरकार अपनी जड़ों की ओर ले जाता है। बीच में जरूर हम ऐसी फिल्‍मों की तरफ मुड़े़, जिनसे पैसे बनने थे। पैसा चाहिए भी। फिर भी लगातार फिल्‍म बनाने के लिए, पर रूह को छूने वाली आवाजें सुनाने  वाली कहानियां भी जरूरी हैं। यह जज्‍बा इस फिल्‍म में देखने को मिलने वाला है। कहानी जिस समय में सेट है उस वक्त की दुनिया दिखाने के लिए हम झारखंड के बीहड़ इलाके में गए और शूट किया। मुझे यकीन है कि लोग ‘बेगम जान’ की आत्‍मा और सादगी से यकीनन जुड़ेंगे।
   जो रवायत ‘सारांश’, ‘अर्थ’  ‘जख्‍म’ की है, यह उसी का विस्‍तार है। पिछले एक-डेढ दशक में हमने सफलता तो बड़ी अर्जित कर ली थी, पर हर तरफ से उसी किस्‍म की फिल्‍में बनाने की फरमाइशें आती थीं।राजकहानी’ में हमें हमारी तलाश खत्‍म होती दिखी। मौजूदा पीढी भी बड़ी भावुक है। ऊर्जावान तो वे हैं हीं, जो उनकी अपनी है। लिहाजा वे किसी चीज की जो व्‍याख्‍या करते हैं, वह अलहदा निकल कर आती है। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ‘बेगम जान’ से एक नई दास्तान शुरू होगी।
इत्‍तफाकन सेंसर बोर्ड भी इससे प्रभावित हुआ। वरना ‘उड़ता पंजाब’ व अन्य हार्ड हिटिंग फिल्‍मों पर उनका रवैया देख तो हम चिं‍तित थे कि कहीं इस फिल्‍म को भी अतिरिक्‍त कतरब्‍योंत न झेलनी पड़े। लिहाजा हमने ‘ सर्टिफिकेट के लिए ही अप्‍लाई किया था, पर जब उन्होंने वह फिल्‍म देखी और जिस तरह की प्रतिक्रिया दी, वह देख हमें बड़ा ताज्‍जुब हुआ। वे भावुक हो गए। बड़े हिचकते हुए कहा कि गालियों को जरा तब्‍दील कर लिया जाए बस। इस तरह देखा जाए तो ‘बेगम जान’ ने सेंसर बोर्ड के साथ कमाल का अनुभव हमें दिया। खुद पहलाज निहलानी ने हमें फोन कर कहा कि बोर्ड वाले इस फिल्‍म की बड़ी तारीफें कर रहे हैं। ऐसा इसलिए कि हमने जिन सिद्धांतों के मद्देनजर यह फिल्‍म बनाई, वे मजबूत थे। नतीजतन, इसे सेंसर की मार नहीं झेलनी पड़ी।
जैसे ‘बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया। मनोरंजक होते हुए भी उसने बात तो कह दी न। वह देख,जब आप सिनेमाघरों से निकलते हैं तो लगता है कि हमारी बच्चियों के साथ जुल्‍म हो गया है। औरतों की आजादी की इज्‍जत की ही जानी चाहिए। यह बहुत अहम मैसेज है, पर एंटरटेनिंग तरीके से है। मतलब साफ है। आप इस दौर में इमेजेज दिखा कर घर-दुकान नहीं चला सकते। अब सेक्‍स वगैरह नहीं चलेगा। संचार के बाकी माध्‍यमों ने उसकी जरूरत पूरी कर दी है। सेक्‍स कहानी का हिस्‍सा हो तो बात बनेगी। मसलन, ‘जिस्‍म2। उसमें सेक्‍स  कहानी का हिस्‍सा था। उसे इरादतन नहीं परोसा गया था। हम दर्शकों को उल्‍लू नहीं बना सकते।
पार्टिशन को लेकर ढेर सारी कहानियां हैं, जिन्‍हें हम जीना नहीं चाहते। गिन कर पांच फिल्‍में बनी हैं उस मसले पर। हालांकि हमारी फिल्‍म शुरू होती है आज के कनॉट प्लेस से। उसके बाद हम हिंदुस्तान के बंटवारे की ओर जाते हैं। रेडक्लिफ लाइन पर जाते हैं। औरतों के सिद्धांत व उनके हक की बातें करते हैं। तो हम विशुद्ध पार्टिशन की बात नहीं करते हैं। हम औरतों के अधिकार की आवाज को पुरजोर तरीके से उठा रहे हैं। यह बदकिस्‍मती है हमारी कि औरतें तब भी गुलाम थीं, अब भी उन्हें पूरी आजादी नहीं दी गई है। इससे बुरी बात और क्या होगी कि वे अपनी जिस्‍म की भी मालकिन नहीं।
फिल्‍म में ढेर सारी अभिनेत्रियां हैं। बेगम जान के लिए विद्या ही हमारी पहली च्‍वॉइस थीं। गौहर खान व इला अरूण भी हैं। इला के साथ काम कर बड़ा मजा आया। बेगम जान का फलसफा अलग है। इक मर्द उसकी मंजिल नहीं है। वह न हो तो भी वह खुद को अधूरी नहीं मानेगी। वह वेश्‍या है, मगर छाती नहीं पीटती कि उसके साथ अत्‍याचार हुआ है। वह कोठे को काम की तरह लेती है।
अमिताभ बच्चन का वॉयस ओवर इसलिए इस्तेमाल हुआ कि हम ऐसी आवाज चाहते थे, जिन्‍हें लोग सुनें। लोग इमोशन की गहराई में उतर सकें। हमने उनसे गुजारिश की तो उन्होंने बड़े विनीत भाव से उस ख्‍वाहिश को स्‍वीकारा। हालांकि उनके संग मेरा अतीत बहुत अच्छा नहीं रहा है। अमर सिंह के चलते हमारे रिश्‍ते में खटास आई थी। शाह रुख मामले में हमने एक स्‍टैंड लिया था! तब अमर सिंह के चलते हम दोनों के बीच जरा सी कड़वाहट थी, मगर मुकेश साथ उनके संबंध अच्छे रहे हैं। बच्चन जी खुद भी आलिया की बड़ी तारीफ करते रहते हैं। तो हम कब तलक मन में दूरियां पाले रखते।