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Saturday, April 29, 2017

दरअसल : निस्‍संग रहे विनोद खन्‍ना



दरअसल....
निस्‍संग रहे विनोद खन्‍ना
-अजय ब्रह्मात्‍मज
इस धरा पर कुछ व्‍यक्तियों की मौजूदगी हमें ताकत और ऊर्जा देती है। बात अजीब सी लग सकती है,लेकिन माता-पिता की तरह संपर्क में आए ऐसे लोग हमें अनेक स्‍तरों पर सिंचित कर रहे होते हैं। विनोद खन्‍ना से कुछ ऐसा ही रिश्‍ता था। आज उनकी मौत की खबर ने निष्‍पंद कर दिया। यों लगा कि मेरी जिंदगी के मिताब से चंद पन्‍ने फाड़ कर किसी ने हवा में उड़ा दिए। अब यह किताब उन पन्‍नों के बिना ही रहेगी।
2011 की गर्मियों की बात है। हेमामालिनी अपनी बेटी एषा देओल को लेकर टेल मी ओ खुदा निर्देशित कर रही थीं। फिल्‍म के एक अहम किरदार में विनोद खन्‍ना भी थे। मुंबई से मीडिया की टीम शूटिंग कवरेज के लिए बुलाई गई थी। अब तो यह चलन ही बंद हो गया है। बहरहाल,ऐसी यात्राओं में फिल्‍म यूनिट के सदस्‍यों से अनौपचारिक मुलाकातें होती हैं। तय हुआ कि विनोद खन्‍ना बातचीत के लिए तैयार हैं। निश्चित समय पर हमारी बैठक हुई। नमस्‍कार करने के बाद उनके सामने बैठते ही मुझे काठ मार गया। जुबान तालु से चिपक गई। मैं उन्‍हें निहारता रहा। मुझे अवाक देख कर वे भी चौंके,लेकिन उन्‍होंने ताड़ लिया कि मैं फैन मोमेंट में फ्रीज हो गया हूं। उन्‍होंने कंधे पर हाथ रखा और अपनी नजरें फेर कर कुछ और बातें करने लगे। उन्‍होंने मुझे सहज किया और अपने कीमती समय की परवाह नहीं की। वे पास में बैठे रहे। उस दोपहर कोई बात नहीं हो सकी और उसके बाद की मुलाकातों में भी कोई बात नहीं हो सकी। भेंट-मुलाकात के और भी अवसर आए। उन्‍होंने मेरी भावनाओं और आदर का हमेशा मुस्‍करा कर स्‍वागत किया। विनोद खन्‍ना फिल्‍म इंडस्‍ट्री के अकेले शख्‍स रहे,जिनसे मैं बातचीत नहीं कर सका।
उनसे यह रिश्‍ता 1971 में ही बना गया था। फारबिसगंज के एक स्‍कूल में दाखिले के साथ मुझे हॉस्‍टल में डाल दिया गया था। उम्‍मीद थी कि मैं वार्डेन की निगरानी में पढ़ाई पर ध्‍यान दूंगा। तब दशहरे के आसपास फारबिसगंज में बड़ा मेला लगता था। उसमें सरकश और नौटंकी के साथ नई फिल्‍में देखने का मौका मिलता था। उस साल मेले में मेरा गांव मेरा देश लगी थी। फिल्‍म में डकैत बने जब्‍बर सिंह का आकर्षण इतना जबरदस्‍त था कि मैंने दस बार से ज्‍यादा यह फिल्‍म देखी। फिल्‍म के सारे संवाद और दृश्‍य आज भी कौंधते हैं। हिंदी की सर्वाधिक लोकप्रिय फिल्‍म शोले की प्रेरणा मेरा गांव मेरा देश ही रही। जब्‍ब्‍र सिंह को नए अवतार में गब्‍बर सिंह का नाम मिला। मेरा गांव मेरा देश लगातार देखने से विनोद खन्‍ना की खास छवि दिमाग में बस गई,जो फिल्‍म पत्रकारिता में सक्रिय होने और सैकड़ों फिल्‍म कलाकारों के इंटरव्‍यू और बातचीत के बावजूद नहीं मिट सकी। विनोद खन्‍ना को देखते ही मैं 1971 में लौट जाता था। एक फैन बन जाता था।
विनोद खन्‍ना से मिलने-मिलाने का सिलसिला उनके राजनीति में सक्रिय होने के बाद तक रहा। बाद में उनके बेटे अक्षय खन्‍ना से अच्‍छा परिचय होने पर उनके बारे में कई व्‍यक्तिगत जानकारियां मिलीं। सभी लिखते और बताते हैं कि राहुल और अक्षय के बचपन में वे उन्‍हें छोड़कर रजनीश की शरण में चले गए थे। कहा जाता है कि वे अच्‍छे पिता नहीं थे। इस धारणा के विपरीत अक्षय ने हमेशा अपने पिता की तारीफ की। उनके समर्पण की बातें कीं। विनोद खन्‍ना ने हमेशा अपने दिल की सुनी। अपने फैसलों पर अडिग रहे और कभी किसी फैसले को लेकर अफसोस नहीं जाहिर किया।
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के वे वाहिद स्‍टार है,जिन्‍होंने अपने उत्‍कर्ष के दिनों में संन्‍यास ले लिया और जब लौटे तो रजनीश के लाख बुलाने पर भी लौट कर आश्रम नहीं गए। फिल्‍म,अध्‍यात्‍म और राजनीति तीनों ही क्षेत्रों में वे शीर्षस्‍थ रहे। ग्‍लैमर जगत के शोरगुल में रहने के बावजूद कहीं न कहीं वे एक सिद्ध पुरुष की तरह आजीवन निस्‍संग रहे।

रोज़ाना : बाहुबली का बिज़नेस

रोज़ाना

बाहुबली का बिज़नेस
-अजय ब्रह्मात्मज

उम्मीद तो थी कि एस एस राजामौली की 'बाहुबली' को देश भर में जबरदस्त ओपनिंग मिलेगी। वही हुआ भी। पहले दिन ही देश भर से आ रही खबरें उत्साहजनक हैं। पहले दिन के रिकॉर्डतोड़ कलेक्शन से जाहिर है कि देश के दर्शक उम्मीद और भरोसा बन जाने पर केवल राजनीतिक पार्टियों को ही नही,फिल्मों को भी समर्थन दे सकते हैं। 2015 में आई 'बाहुबली' ने चौंकाया था। तब इस फ़िल्म को मिली प्रतिक्रिया अप्रत्याशित थी। उत्तर भारत के दर्शकों ने परिवार के साथ 'बाहुबली' देखी थी और बार-बार देखी थी। राजामौली ने 'बाहुबली2' की योजना पहली फ़िल्म की कामयाबी के बाद नहीं बनाई थी। वे पहले से ही दो फिल्मों के तौर पर 'बाहुबली' की प्लानिंग की थी। दक्षिण की फ़िल्म इंडस्ट्री में योजना और अनुशासन है। हिंदी फिल्मों की तरह दक्षिण की भाषाओं में 'मौका पर चौका' मारने का फैशन नहीं है।
'बाहुबली' के बिजनेस से ट्रेड पंडित गदगद हैं। उन्‍हें लिखने और बताने के लिए एक नया उदाहरण मिल गया है। प्रारंभिक अनुमान है कि यह फिल्‍म पहले ही दिन 100 करोड़ का आंकड़ा पार कर लेगी। हिंदी में यह फिल्‍म 'धूम 3' और 'प्रेम रतन धन पायो' के पहले दिन के कलेक्‍शन का रिकार्ड तोड़ सकती है। 'धूम 3' ने नियमित रिलीज में 33 करोड़ का कलेक्‍शन किया था और 'प्रेम रतन ध पायो' का कलेक्‍शन 39.5 करोड़ रहा था। ट्रेड पंडित बता रहे हैं कि 'बाहुबली 2' का हिंदी कलेक्‍शन 38 से 40 करोड़ तक हो सकता है। तेलुगू में यह फिल्‍म 55 करोड़ का आंकड़ा पहले ही दिन पार कर रही है। तमिल में 20 करोड़ और ओवरसीज में लगभग 10 करोड़ के कलेक्‍शन से यह भारत की पहली फिल्‍म होगी,जिसने पहले दिन ही 100 करोड़ का कलेक्‍शन कर लिया हो।
फिल्‍म सभी भाषाओं में पसंद आ रही है। खास कर इसकी भव्‍यता और वीएफएक्‍स की तारीफ हो रही है। दो साल से पूछे जा रहे सवाल का जवाब भी दर्शकों को मिल रहा है...हां,फिल्‍म देखेंगे तो पता चल जाएगा कि कटप्‍पा ने बाहुबली को क्‍यों मारा? राजामौली ने 'बाहुबली 2' की माउंटिंग पहले से बड़ी की है। उन्‍होंनेद भव्‍यता को विस्‍तार और ऊंचाई दी है। पहले दिन के कलेक्‍शन से स्‍पष्‍ट है कि यह फिल्‍म भारत में सर्वाधिक बिजनेस का रिकार्ड स्‍थापित करेगी। यकीन करें,इसके बाद महंगी और भव्‍य फिल्‍मों का फैशन आ सकता है। पाठकों को पता होगा कि एम टी वासुदेवन की कृति पर आधारित 'भीम' की तैयारियां चल रही हैं,जिसकी लागत 1000 करोड़ है।
हिंदी में ऐसी बड़ी और पीरियड फिल्‍म की तरफ फिल्‍मकारों का ध्‍यान नहीं हैं। हालांकि करण जौहर और अन्‍य फिल्‍मकार मिथक और इतिहास पर आधारित बड़ी फिल्‍मों की घोषणाएं करते रहे हैं। 'बाहुबली' की कामयाबी सिर्फ तेलुगू नहीं,भारतीय फिल्‍म इंडस्‍ट्री के लिए गौरव की बात है। इसकी कामयाबी में हिंदी दर्शकों का उल्‍लेखनीय योगदान है।

विनोद खन्ना के बारे में महेश भट्ट


विनोद खन्ना के बारे में महेश भट्ट

सुबह टेलीफोन की घंटी बजी। टीवी के एक रिपोर्टर की आवाज़ थी। उसने विनोद खन्ना साहब के इंतकाल की खबर दी। उसने कहा, आपको स्टू़डियो में ट्रांसफर करती हूं - आप उनके बारे में कुछ बताएंगे? ये ख़बर सुनते ही न जाने क्यूं मैंने फोन बंद कर दिया और हज़ारों यादें एक साथ ज़हन में घूम गयीं।

विनोद खन्ना और मेरा सफर एक साथ ही शुरू हुआ था। "मेरा गांव मेरा देश" में मैं प्रोडक्शन असिस्टेंट था। मुझे वह दिन आज भी याद है, जब राज खोसला साहब ने उनका पहला शाॅट लिया था। डकैत ड्रामा की इस फिल्म में वे अपने साथियों के साथ आते हैं और घोड़े से उतर कर चलते हुए एक दरवाज़े के पास जाते हैं। दरवाज़े को लात मार कर खोलते हैं और अंदर घुस जाते हैं। उस शाॅट के ख़तम होते ही राज खोसला साहब ने कहा कि यह लड़का स्टार है। यह हिंदुस्तान में आग लगा देगा। राज खोसला के उस कथन में उनका अपना सालों का अनुभव बोल रहा था। फिल्म सेट पर स्टार से दूसरे तीसरे असिस्टेंट की दोस्ती हो जाती है। वही उन्हें शाॅट के लिए बुलाता है, शाॅट समझाता है - तो एक अपनापा हो जाता है। पहले ही दिन से हमारा उनके साथ एक रिश्ता बन गया था। उन्होंने कभी ये फीलिंग नहीं दी कि वे स्टेटस में मुझसे बड़े हैं। उन्होंने हमेशा बराबरी की नज़र से मुझे देखा। हमारी दोस्ती खिलती गयी।

उन्ही दिनों एक सज्जन मेरे पास आये। उन्हें निर्माता बनना था। निर्देशक के रूप में मुझे चुनने के साथ फिल्म शुरू करने का आॅफर दिया। यह 1971 की बात है। उस निर्माता को मेरे दोस्त जाॅनी बख्शी ले आये थे। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या तुम फिल्म डायरेक्ट कर सकते हो? मेरा जवाब था, अगर मैं नहीं बना सकता तो कोई नहीं बना सकता। उन्होंने पूछा, हीरो किसे लोगे? मैंने तपाक से कहा, विनोद खन्ना। मैंने आत्मविश्वास से कह दिया, जबकि मैंने विनोद से कोई बात नहीं की थी। बाद में विनोद खन्ना को बताया और "मुक्ति" नाम की वह फिल्म शुरू हुई। उसमें शत्रुघ्न सिन्हा भी थे, लेकिन उन दिनों जैसा कि होता था - निर्माता पैसे नहीं जुटा सका और तीन दिनों की शूटिंग के बाद फिल्म बंद हो गयी।

उस फिल्म के बंद होने के बावजूद हमारा रिश्ता कायम रहा। इसी बीच उनकी मां का निधन हुआ। विनोद बहुत ही उदास हो गये। मां की मौत ने उन्हें बिल्कुल तोड़ दिया। ज़िंदगी के रहस्यों और गुत्थियों को समझने में उनका समय बीतने लगा। उन दिनों मैं रजनीश के संपर्क में था। मैं अपनी ज़िंदगी की दुविधाओं से निकलने की कोशिश में रजनीश तक पहुंचा था। मेरी फिल्म "मंज़िलें और भी हैं" रीलीज़ होकर फ्लाॅप हो गयी थी। मुझे कोई फिल्म नहीं दे रहा था। दोनों निराश दोस्त रजनीश की आध्यात्मिक दुनिया में सुकून पा रहे थे। हम दोनों रजनीश के पास जाने लगे। फिर उन्होंने भी संन्यास ले लिया और हम दोनों का रिश्ता गाढ़ा होता गया। उन्हीं दिनों हमलोगों ने "लहू के दो रंग" फिल्म बनायी। उसका भी किस्सा अजीब है। उस फिल्म के निर्माता का एक दिन फोन आया कि भई तुम्हें डायरेक्टर के तौर पर लेना है, मुझे बिल्कुल नहीं मालूम कि तुम कैसे डायरेक्टर हो - लेकिन मेरा हीरो विनोद खन्ना चाहता है कि तुम ही डायरेक्ट करो। विनोद खन्ना के कहने से वो फिल्म बन गयी और हमारी दोस्ती और भी अधिक प्रगाढ़ हो गयी।

उनकी फितरत में कुछ ऐसी बातें थीं। वे हमेशा पूछते रहते थे कि ज़िंदगी का माजरा क्या है - हम कहां से आये हैं - हमें जाना कहां है - कर क्या रहे हैं। ऋषि-मुनियों की बातें सिर्फ शब्द हैं या वे कहीं पहुंचाती भी हैं! ऱजनीश के रहते हुए मेरा भ्रम टूट गया था। मैंने उनके कपड़े उतार फेंके थे और माला कमोड में डाल कर फ्लश कर दिया था। विनोद इस बात से बहुत दुखी हुए। उन्होंने मुझे बुलाया और कहा कि भगवान तुमसे बहुत नाराज़ हैं। कह रहे हैं, माला मुझे लाके देता - उसने मेरा अपमान किया है। मैं तो उसे बर्बाद कर दूंगा। दोस्त के रूप में विनोद खन्ना इस बात से बहुत चिंतित थे। क्योंकि तब तक वे रजनीश के गहन प्रभाव में थे। मैंने विनोद को यही कहा था कि मैं सारी दुनिया से झूठ बोल सकता हूं लेकिन खुद से नहीं बोल सकता। मैंने विनोद से कहा - मेरे अंदर ईर्ष्या है। मैं भयभीत हूं। मैं प्रेम करता हूं। रजनीश के शब्दों में मुझे शांति नहीं मिल रही है। अब उन्हें मुझे तबाह करना है तो कर दें। अब मैं उस दुकान पर नहीं लौटूंगा जहां सिर्फ वादे होते हैं और मेरे अंदर कुछ घटता नहीं है। वहां से हमारी सोच में फर्क आया। दोस्ती में दरार आयी। हमारे बीच जो गोंद थी, वह कहीं सूख गयी। हमारे फासले बढ़ते गये। सभी जानते हैं कि विनोद रजनीश के साथ अमरीका चले गये और उनके विश्वसनीय बने। उन्हीं दिनों "शत्रुता" फिल्म के सिलसिले में मैं अमेरिका गया था। वहां मैं विनोद से मिलने गया। विनोद ने मुझे बताया कि रजनीश ने उनसे कहा है कि महेश में वो बात ही नहीं थी - तुममें वह बात है, जिससे तुम शिखर तक जा सकते हो। मैंने फिर से विनोद को समझाया कि तुम्हारा गुरु तुम्हें बोगस कंपटीशन में डाल रहा है। मैं बहुत ही मामूली आदमी हूं। मुझसे कंपटीशन करके तुम अपनी ज़िंदगी बर्बाद मत करो। तुम्हें सुख मिल रहा है तो सुख भोगो।

बाद में रजनीश से विमुख होकर वह लौटे और पूरी शिद्दत से लौटे। उनमें विश्वास था कि वे फिर से खुद को खड़ा कर लेंगे और दुनिया की रेस में शामिल हो जाएंगे। उन्होंने यह किया भी। उनकी इंसाफ़ हिट हुई। मेरे साथ उन्होंने जुर्म की। हम दोनों के बीच याराना तो रहा, लेकिन उसकी तीव्रता कम हो चुकी थी। रजनीश से अलग होने पर भी विनोद उनकी सोच पर अमल करते रहे। हमारे रास्ते अलग हो चुके थे। वे पाॅलीटिक्स की दुनिया में चले गये। उनकी दुनिया बदल गयी। हम दोनों ने मिलने की कई कोशिशें की, लेकिन ज़िदगी की दौड़ में हाथ छूट जाते हैं तो फिर से नहीं मिलते।

बीमार पड़ने पर उनका फोन आया था। आवाज़ में मुस्कुराहट नहीं थी। हालांकि वे कहते रहे कि वे ठीक हैं। लेकिन मैं उनकी आवाज़ की खनक पहचानता था। उनके "ठीक" कहने ने मुझे उदास कर दिया। उनके उस ठीक के पीछे एक पूरा संवाद था, जिसने बहुत कुछ मुझे कह दिया। बाद में भी वे फोन करते थे। उनके फोन देर रात में आया करते थे। मुझे पता है कि अंतिम समय तक उन्होंने शराब नहीं छोड़ी थी। दो-तीन पेग के बाद उन्हें मेरी याद आती थी और हम दोनों के बीच बातें होती थीं। इसके बावजूद हम उस स्पेस में लौट नहीं पाये, जहां एक दूसरे का सहारा बनते।

मेरे लिए विनोद खन्ना, जो बाहरी दुनिया के लिए सुपर स्टार और एक्शन हीरो थे, उनके बहुत अंदर एक मासूम, कमज़ोर और नाज़ुक शख्सीयत रहती थी। वह आजीवन ज़िंदगी के रहस्यों में घिरे रहे और जवाब की तलाश में भटकते रहे। जवाब न उन्हें मिले, न मुझे मिले। वे कहते रहे कि मैं अपने जवाबों से तृप्त हूं और मैं कहता रहा कि मैं अतृप्त हूं। पिछले दिनों आयी उनकी कृशकाय तस्वीर देख कर मैं कांप गया था। दिख गया था कि अब वे कुछ दिनों के मेहमान हैं।

Friday, April 28, 2017

फिल्‍म समीक्षा : बाहुबली कन्‍क्‍लूजन



फिल्‍म रिव्‍यू
बाहुबली कंक्‍लूजन
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कथा आगे बढ़ती है...
राजमाता शिवगामी फैसला लेती हैं कि उनके बेटे भल्‍लाल की जगह अमरेन्‍द्र बाहुबली को राजगद्दी मिलनी चाहिए। इस घोषणा से भल्‍लाल और उनके पिता नाखुश हैं। उनकी साजिशें शुरू हो जाती हैं। राज्‍य के नियम के मुताबिक राजगद्दी पर बैठने के पहले अमरेन्‍द्र बाहुबली कटप्‍पा के साथ देशाटन के लिए निकलते हैं। पड़ोस के कुंतल राज्‍य की राजकुमारी देवसेना के पराक्रम से प्रभावित होकर वे उन्‍हें प्रेम करने लगते हैं। उधर राजमाता भल्‍लाल के लिए देवसेना का ही चुनाव करती हैं। दोनों राजकुमारों की पसंद देवसेना स्‍वयं अमरेन्‍द्र से प्रेम करती है। वह उनकी बहादुरी की कायल है। गलतफहमी और फैसले का ड्रामा चलता है। भल्‍लाल और उसके पिता अपनी साजिशों में सफल होते हैं। अमरेन्‍द्र को राजमहल से निकाल दिया जाता है। राजगद्दी पर भल्‍लाल काबिज होते हैं। उनकी साजिशें आगे बढ़ती हैं। वे अमरेन्‍द्र बाहुबली की हत्‍या करवाने में सफल होते हैं। पिछले दो सालों से देश में गूंज रहे सवाल कटप्‍पा ने बाहुबली को क्‍यों मारा का जवाब भी मिल जाता है। फिल्‍म यहीं खत्‍म नहीं होती। पच्‍चीस साल के सफर में महेन्‍द्र बाहुबली राजगद्दी के उम्‍मीदवार के रूप में उभरते हैं।
भव्‍य और विशाल परिकल्‍पना
2015 में आई बाहुबली ने अपनी भव्‍य और विशाल परिकल्‍पना से पूरे देश के दर्शकों को सम्‍मोहित किया था। बाहुबली 2 भव्‍यता और विशालता में पहली से ज्‍यादा बड़ी और चमकदार हो गई है। सब कुछ बड़े पैमाने पर रचा गया है। यहां तक कि संवाद और पार्श्‍व संगीत भी सामान्‍य से तेज और ऊंची फ्रिक्‍वेंसी पर है। कभी-कभी सब कुछ शोर में बदल जाता है। फिल्‍म का पचास से अधिक प्रतिशत एक्‍शन है। फिल्‍म की एक्‍शन कोरियोग्राफी के लिए एक्‍शन डायरेक्‍टर और कलाकार दोनों ही बधाई और सराहना के पात्र हैं। उन्‍होंने लेखक के विजयेन्‍द्र प्रसाद की कल्‍पना को चाक्षुष उड़ान दी है। वीएफएक्‍स और तकनीक की मदद से निर्देशक एसएस राजमौली ने भारतीय सिनेमा को वह अपेक्षित ऊंचाई दी है,जिस पर सभी भारतीय दर्शक गर्व कर सकते हैं। हालीवुड के भव्‍य फिल्‍मों के समकक्ष बाहुबली का नाम ले सकते हैं। कहानी की दृश्‍यात्‍मक अभिव्‍यंजना श्रेष्‍ठ और अतुलनीय है। इस पैमाने पर दूसरी कोई भारतीय फिल्‍म नजर नहीं आती।
बड़ी है,काश बेहतर भी होती
बाहुबली 2 निस्‍संदेह पहली से बड़ी है। लागत,मेहनत और परिकल्‍पना हर स्‍तर पर वह लंबे डेग भरती है। दर्शकों को आनंदित भी करती है,क्‍योंकि इसके पहले इस स्‍तर और पैमाने का विजुअल और वीएफएक्‍स नहीं देखा गया है। पर थोड़ा ठहिकर या सिनेमाघर से निकल कर सोचें तो यह आनंद मुट्ठी में बंधी रेत की तरह फिसल जाती है। राजगद्दी के लिए वही बचकाना द्वंद्व,राजमहल के छल-प्रपंच,राजमहल की चारदीवारी के अंदर फैली ईर्ष्‍या और शौर्य दिखाती असंभव क्रियाएं...एक समय के बाद द,श्‍य संरचना में दोहराव आने लगता है। तीर-कमान के युग में मशीन और टेलीस्‍कोप का उपयोग उतना ही अचंभित करता हे,जितान गीतों और संवादों में संस्‍कृत और उर्दू का प्रयोग...थोड़ी कोशिश और सावधानी से इनसे बचा जा सकता था।
कथा काल्‍पनिक
बाहुबली का राज्‍य कल्‍पना पर आधारित है। इसका कोई ऐतिहासिक साक्ष्‍य नहीं है। फिल्‍म के संवादों में गंगा,कृष्‍ण,शिव आदि का उल्‍लेख होता है। गणेश की मूर्तियां दिखाई पड़ती हैं। फिर भी यह तय करना मुश्किल होता है कि यह भारत के काल्‍पनिक अतीत की किस सदी और इलाके की कहानी है। रंग,कद-काठी,वास्‍तु और परिवेश से वे विंध्‍यांचल के दक्षिण के लगते हैं। बाहुबली की कल्‍पना को दर्शन,परंपरा और भारतीय चिंतन का आधार भी मिलता तो यह फिल्‍म लंबे समय तक याद रखी जाती। वीएफएक्‍स के विकास और तकनीकी अविष्‍कारों के इस युग में पांच-दस साल के अंदर इससे बड़ी कल्‍पना और भव्‍यता मुमकिन हो जाएगी। भारतीय फिल्‍मों का अवश्‍यक ततव है इमोशन...इस फिल्‍म में इमोशन की कमी है। वात्‍सल्‍य,प्रेम और ईर्ष्‍या के भावों को गहराई नहीं मिल पाती। सब कुछ छिछले और सतही स्‍तर पर ही घटित होता है।
कलाकार और अभिनय
कास्‍ट्यूम और एक्‍शन ड्रामा में कलाकारों के अभिनय पर कम ध्‍यान जाता है। फिर भी राणा डग्‍गुबाटी,प्रभाष और अनुष्‍का शेट्टी पीरियड लबादों में होन के बावजूद एक हद तक आकर्षित करते हैं।
अवधि- 148 मिनट
साढ़े तीन स्‍टार ***1/2

Thursday, April 27, 2017

रोज़ाना : सुनील शेट्टी का 'स्वस्थ भारत'

रोज़ाना

सुनील शेट्टी का 'स्वस्थ भारत'                                
- अजय ब्रह्मात्मज

गोवा में 'इंडियाज़ असली चैंपियन' की शूटिंग कर रहे सुनील शेट्टी का रंग धूप और गर्मी की वजह से गाढ़ा हो गया है। अगले महीने से ऐंड टीवी पर आने वाले इस शो के मेजबानी में तल्लीन सुनील शेट्टी को मनमाफिक काम मिला है। 12 प्रतिभागियों के साथ गोवा में लगातार शूटिंग कर रहे सुनील शेट्टी चाहते हैं कि दर्शक उनके शो से कुछ सीखें। 12 प्रतिभागियों के माध्यम से सुनील शेट्टी दर्शकों के बीच शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने का संदेश भी देना चाहते हैं। उनकी पहल पर इस शो के साथ 'स्वस्थ भारत अभियान' जोड़ दिया गया है। ध्वनि और उद्देश्य में यह 'स्वच्छ भारत अभियान' से मिलता-जुलता है। सुनील मानते हैं कि स्वच्छता और स्वास्थ्य का सीधा संबंध है।

पिछले कुछ समय से सुर्खियों से गायब सुनील शेट्टी ने काम से छुट्टी ले रखी थी। उनके पिता सख्त बीमार थे। पिता की तीमारदारी में दिल-ओ-जान से लगे सुनील शेट्टी ने लगभग तीन सालों तक खुद को लाइमलाइट से बाहर रखा। पिता के दिवंगत होने के बाद उन्होंने अपनी सक्रियता बढ़ाई। मिल रहे ऑफर में से उन्होंने टीवी शो 'इंडियाज़ असली चैंपियन' चुना। सुनील शेट्टी के मुताबिक यह शो उ के दिल और जीवन के करीब है। काम लोगों को याद होगा कि संजय दत्त और सलमान खान के पहले युवकों के बीच सुनील शेट्टी का क्रेज था। एक्शन फिल्मों में अपने सुगठित शरीर की वजह से वह काफी पसंद किए जाते थे। आज भी हिंदी समाज के अंदरूनी इलाकों में सुनील शेट्टी का जादू कायम है। उनकी फिल्में आज भी खूब देखी जाती हैं। कस्बों और छोटे शहरों के दर्शक उनके मुरीद हैं।

सुनील शेट्टी के 'स्वस्थ भारत अभियान' और टीवी शो में 'शरीर चुस्त और दिमाग दुरुस्त' पर जोरबड़िया जा रहा है। शिवम शरीर के अभ्यास और वृंदा दिमाग के प्रयास का प्रशिक्षण दे रहे हैं। सुनील की टीम का मानना है कि आज सभी की सबसे बड़ी परेशानी दिमागी है। नियमित कसरत और जिम जाने के बाद भी लोग बीमार पड़ रहे हैं। अधिकांश व्याधियां जीवन शैली से सम्बंधित हैं,जिन्हें योग के प्राणायाम से बहुत आसानी से संशोधित किया जा सकता है। बीमारी और ताकत दोनों ही पहले दिमाग में पैदा होती है। बाद में शरीर उसका अनुपालन करता है। सुनील शेट्टी कहते हैं कि साधारण अनुशासन और अभ्यास से हु। स्वस्थ राह सकते हैं। इस लिहाज से यह अनोखा शो ह्योग,जो मनोरंजन के साथ दर्शकों की सेहत का भी ख्याल रखेगा।



रोज़ाना : क्‍यों नहीं होती दक्षिण भारत के फिल्‍मकारों की चर्चा



रोज़ाना
क्‍यों नहीं होती दक्षिण भारत के फिल्‍मकारों की चर्चा
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हिंदी सिनेमा की चर्चा और खबरों के बीच हमारा ध्‍यान दक्षिण भारत की भाषाओं की फिल्‍मों की ओर कम ही जाता है। हम वहां के कलाकारों और निर्देशकों से अपरिचित हैं। तमिल फिल्‍मों के रजनीकांत और कमल हासन के अलावा हम तेलुगू,कन्‍नड़ और मलयालम के कलाकरों के नाम तक नहीं जानते। हालांकि टीवी पर इन दिनों दक्षिण भारतीय भाषाओं की डब फिल्‍मों की बहार है। पिछले साल तूलुगू के पावर स्‍टार पवन कल्‍याण ने बताया था कि बनारस भ्रमण के दौरान वे इस तथ्‍य से चौंक गए कि वहां की गलियों में भी लोगों ने उन्‍हें पहचाल लिया। पता चला के टीवी के जरिए ही उनकी यह पहचान बनी थी। भारत सरकार और प्रदेशों के सिनेमा संबंधी मंत्रालय देश में ही सभी भाषाओं की फिल्‍मों के आदान-प्रदान और प्रदर्शन में यकीन नहीं रख्‍ते। पिछले साल बिहार सरकार में फिल्‍म वित्‍त निगम के अध्‍यक्ष बनने पर गंगा कुमार प्रादेशिक भाषाओं की फिल्‍मों का फस्टिवल किया था। ऐसी कोशिशें हर प्रदेश में होनी चाहिए।
हाल ही में तेलुगू के श्रेष्‍ठ फिल्‍मकार के विश्‍वनाथ को दादा साहेब फालके पुरस्‍कार से सम्‍ममानित करने की घोषणा हुई है। इस घोषणा के बावजूद हिंदी पत्र-पत्रिकाओं और न्‍यूज चैनलों पर उनके बारे में न के बराबर ही लिखा और बताया गया। के विश्‍वनाथ का पूरा नाम काशीनाधुनी विश्‍वनाथ है। 1930 में पैदा हुए के विश्‍वनाथ तेलुगू समाज में प्रात: स्‍मरणीय नाम हैं। हिंदी फिल्‍मों में अभी ऐसी कोई हस्‍ती नहीं है,जिन्‍हें इस स्‍तर का आदर हासिल हो।  1960 से सक्रिय के विश्‍वनाथ ने पचास से अधिक फिल्‍मों का निर्देशन किया है। उनकी प्रमुख फिल्‍मों में शंकरभरणम,सागर संगमम,स्‍वाति मुतयम,स्‍वयंकृषि और सिरी सिरी मुवा उल्‍लेखनीय हैं। हिंदी के दर्शकों को उनकी ईश्‍वर याद होगी। अनिल कपूर और विजया शांति की यह फिल्‍म के विश्‍वनाथ की ही तेलुगू फिल्‍म की रीमेक थी। के विश्‍वनाथ ने तूलुगू,तमिल और हिंदी में फिल्‍में निर्देशित की हैं।
के विश्‍वनाथ तेलुगू सिनेमा को आम दर्शकों के बीच ले आए। उन्‍होंने अपनी फिल्‍मों में परिचित किरदारों को पेश किया। तेलुगू समाज के पाखंड को उन्‍होंने पर्दे पर बेनकाब किया। सजग चेतना के फिल्‍मकार के विश्‍वनाथ मानते हैं कि सिनेमा से समाज में बदलाव लाश जा सकता है। उन्‍होंने आर्ट फिल्‍में बनाने का दावा नहीं किया। उन्‍की फिल्‍में मध्‍यमार्गी कही जा सकती हैं। मनोरंजन के उद्देश्‍य को पूरा करती उनकी फिल्‍मों में निहित संदेश अवश्‍य रहता था।
फिल्‍म निदेशालय दादा साहेब फालके से सम्‍मानित फिल्‍मकार और कलाकारों की चुनिंदा फिल्‍मों का प्रदर्शन सभी प्रदेशों की राजधानियों और प्रमुख शहरो में आयोजित करे तो हम अने देश की सिनेमाई विविधता और खूबियों से परिचित हो सकते हें।

Wednesday, April 26, 2017

रोज़ाना : लौट आई हैं प्रियंका चोपड़ा

रोज़ाना
लौट आई हैं प्रियंका चोपड़ा
-अजय ब्रह्मात्मज
अमेरिका में अभिनय अभियान का पहला चक्र पूरा कर प्रियंका चोपड़ा मुंबई लौट आई हैं। पिछले शनिवार को मुंबई लौटी प्रियंका चोपड़ा अभी दोस्तों से मिल रही हैं और ज़्यादातर शामें पार्टियों में बिता रही हैं। एक अरसे के बाद दोस्तों से मिल रही प्रियंका के पास सुनने-बताने के लिए बहुत कुछ है। रितः सिधवानी ने उनकी वापसी पर दी पार्टी में : दिल धड़कने दो' के कलाकार रणवीर सिंह और निर्देशक ज़ोया अख्तर को भी बुलाया था। रणवीर और प्रियंका की अच्छी छनती है। पर्दे पर दोनों ने भाई-बहन और पति-पत्नी की भूमिकाएं भी निभाई हैं। माना जाता है कि दीपिका पादुकोण और प्रियंका चोपड़ा में कड़ी टक्कर है,लेकिन रणवीर और प्रियंका की दोस्ती एक अलग स्तर की है।
प्रियंका चोपड़ा अपने कैरियर में अभी खास मोड़ पर हैं। अपना उत्कर्ष देने के पहले ही उनके कैरियर में हॉलीवुड का विक्षेप आया। अमेरिका जाकर उन्होंने 'क्वांटिको' टीवी शो के दो सीजन और एक फ़िल्म 'बेवाच' की। फ़िल्म की रिलीज बाकी है। फ़िल्म आने के बाद सही अंदाज लगेगा कि हॉलीवुड में उनके लिए संभावनाओं के पट पूरी तरह से खुलते हैं या नहीं? फिलहाल यही खुशी की बात है कि दीपिका और प्रियंका ने हॉलीवुड की मेनस्ट्रीम फिल्मों से दस्तक दी। हिंदी फिल्मों के कलाकार एक अरसे से इंटरनेशनल प्रोजेक्ट कर रहे हैं,लेकिन अभी तक किसी की पुरज़ोर मौजूदगी जाहिर नहीं हुई है। जानकार बताते हैं कि हॉलीवुड और हिंदी सिनेमा के बीच कलाकारों और तकनीशियनों की आवाजाही और बढ़ेगी। हाल ही में राजकुमार राव ने 'राब्ता' का अपना लुक शेयर किया। उनके इस लुक का प्रोस्थेटिक मेकअप हॉलीवुड के आर्टिस्ट ने भारतीय टीम के सहयोग से तैयार किया।

प्रियंका चोपड़ा फ़िल्म प्रोडक्शन में आ गयी हैं।उनकी माँ प्रोडक्शन देख रही हैं। माँ- बेटी ने एक भोजपुरी और एक मराठी फिल्म का निर्माण किया है। अभी मराठी जितनी सराही जा रही है,उतनी ही भोजुरी कि निंदा हुई थी। प्रियंका की माँ भोकपुरी भाषी हैं,फिर भी उन्हें किसी ने बरगला दिया। प्रियंका चोपड़ा के पास अभी कोई हिंदी फिल्म नहीं है। वह थोड़ी दुविधा में हैं।हॉलीवुड के आफर के लिए वह खुद को खाली रख रही हैं।कई बार ऐसे इंतज़ार में कलाकार खुद का ही नुकसान कर लेते हैं। पुरानी कहावत है...दुविधा में दोनों गए,माया मिली न राम। प्रियंका चोपड़ा ने हिंदी फिल्मों के बाहरी इंतज़ार से बेहतर अपना प्रोडक्शन आरम्भ कर दिया है।वह कल्पना चावला के जीवन पर एक बॉयोपिक की तैयारी कर रही हैं। इसका निर्देशन प्रिया मिश्रा करेंगी। यह उम्दा निर्णय है,क्योंकि हिंदी की प्रचलित फिल्मों में प्रियंका के लिए फिल्में लिखनी होंगी। उम्र और अनुभव से वह सामान्य फिल्में नहीं कर सकतीं। और उनके बाद नई अभिनेत्रियों की कामयाब टुकड़ी आ चुकी है।

Saturday, April 22, 2017

रोज़ाना : अनारकली... को मिल रहे दर्शक



रोज़ाना
अनारकली... को मिल रहे दर्शक
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हाल ही में अनारकली ऑफ आरा के निर्माता संदीप कपूर और निर्देशक अविनाश दास ने सोशल मीडिया पर शेयर किया कि उनकी फिल्‍म पांचवें हफ्ते में प्रवेश कर गई है। दिल्‍ली और मुंबई के कुछ थिएटरों में वह अभी तक चल रही है। रांची और जामनगर में वह इस हफ्ते लगी है। किसी स्‍वतंत्र और छोटी फिल्‍म की यह खुशखबर खुद में बड़ी खबर है। हम सभी जानते हैं कि छोटी फिल्‍मों का वितरण और प्रदर्शन एक बड़ी समस्‍या है। पीवीआर के साथ होने पर भी अनारकली ऑफ आरा केवल 277 स्‍क्रीन में रिलीज हुई थी। इस सीमित रिलीज को भी उम्‍त कंपनी ने कायदे से प्रचारित और प्रदर्शित नहीं किया था।
मजेदार तथ्‍य है कि मुंबई में अंधेरी स्थित पीवीआर के एक थिएटर में इम्तियाज अली ने यह फिल्‍म देखी। फिल्‍म देखने के बाद उन्‍होंने निर्देशक अविनाश दास के साथ सेल्‍फी लेने के लिए फिल्‍म के पोस्‍टर या स्‍टैंडी की खाज की तो वह नदारद...उन्‍होंने ताकीद की तो थिएटर के कर्मचारियों ने स्‍टैंडी का इंतजाम किया। तात्‍पर्य यह कों की रुचि कैसी बढ़गी? बहरहाल,अनारकली ऑफ आरा दर्शकों के समर्थन से अभी तक थिएटर में बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया और जॉली एलएलबी2 के साथ टिकी है।
फिल्‍म के विषय के अनुरूप संभावित दर्शकों को टारगेट किया जाता तो इस फिल्‍म को ज्‍यादा दर्शक मिले होते। हर फिल्‍म के खास दर्शक होते हैं। अगर उन दर्शकों के बीच फिल्‍म पहुंच जाए तो उसे लाभ होता है। अनारकली ऑफ आरा मुख्‍य रूप से दिल्‍ली और मुंबई में रिलीज की गई। फिल्‍म के विषय के मुताबिक इसे मझोले और छोटे शहरों में आक्रामक प्रचार के साथ प्रदर्शित किया जाता तो आंकड़े कुछ और होते। दर्शक तो अब भी संकेत दे रहे हैं। अगर इसे नए उत्‍साह और प्रचार के साथ नए शहरों में रिलीज किया जाए तो अवश्‍य ही दर्शक मिलेंगे। अनारकली ऑफ आरा नया उदाहरण पेश करेगी।
सीमित बजट और साधनों के साथ बनी यह फिल्‍म अपने कंटेंट और स्‍वरा भास्‍कर की अदाकारी की वजह से खूब पसंद की गई है। हाल-फिलहाल में किसी दूसरे फिल्‍मकार पर पत्र-पत्रिकाओं में इतना लिखा भी नहीं गया है। यह फिल्‍म आम दर्शकों को टच करती है। सहमति के सवाल को प्रासंगिक संदर्भ में सटीक तरीके से उठाती ंयह फिल्‍म हिंदी सिनेमा के देशज स्‍वर को मुखर करती है। यही वजह है कि इस फिल्‍म के दर्शक बढ़ रहे हैं।
अनारकली ऑफ आरा भाषा,परिवेश और अदाकारी के लि‍हाज से बिहार लक्षणों की खांटी हिंदी फिल्‍म है।

Friday, April 21, 2017

दरअसल : पक्ष और निष्‍पक्ष



दरअसल...
पक्ष और निष्‍पक्ष
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले दिनों सोनू निगम अपने पक्ष को रखने की वजह से चर्चा में रहे। उसके कुछ दिनों पहले सुशांत सिंह राजपूत अपना पक्ष नहीं रखने की वजह से खबरों में आए। फिल्‍म जगत के सेलिब्रिटी आए दिन अपने पक्ष और मंतव्‍य के कारण सोशल मीडिया,चैनल और पत्र-पत्रिकाओं की सुर्खियों में रहते हैं। कुछ अपने अनुभवों और मीडिया मैनेजर के सहयोग से बहुत खूबसूरती से बगैर विवादों में आए ऐसी घटनाओं से डील कर लेते हैं। और कुछ नाहक फंस जाते हैं। अभी एक नया दौर है,जब सारे मंतव्‍य राष्‍ट्रवाद और सत्‍तासीन राजनीतिक पार्टी के हित के नजरिए से आंके जाते हैं। नतीजतन अधिकांश सेलिब्रिटी किसी भी मुद्दे पर अपना पक्ष रखने से बचते हैं। वे निष्‍पक्ष और उदासीन होने का नाटक करते हैं। आप अकेले में मिले तो ऑफ द रिकॉर्ड वे अपनी राय शेयर करते हैं,लेकिन सार्वजनिक मंचों से कुछ भी कहने से कतराते हैं।
कुछ समय पहले सहिष्‍णुता के मसले पर आमिर खान और शाह रूख खान के खिलाफ चढ़ी त्‍योरियां सभी को याद होंगी। गौर करें तो एक जिम्‍मेदार नागरिक के तौर पर उन्‍होंने अपना सहज पक्ष रखा था,लेकिन उन्‍हें लोकप्रिय राजनीति के समर्थकों की नाराजगी का शिकार होना पड़ा। उसके बाद से फिल्‍म सेलिब्रिटी ने खामोश रहने या कुछ न कहने का ढोंग ओढ़ लिया है। डर से वे जरूरी मुद्दों पर स्‍वीकृत राय रखने से भी हिचकते हें। राब्‍ता के ट्रेलर लांच में एक पत्रकार के यह पूछने पर कि कुलभूषण जाधव को पाकिस्‍तान में मिली फांसी की सजा पर आप सभी की क्‍या राय है? उन्‍होंने कुछ भी कहने के बजाए सवाल को टाला। यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर दो राय की गुंजाइश नहीं है। एक स्‍वर से पूरा देश चाहता है कि कुलभूषण जाधव सुरक्षित भारत लौटें। भारत सरकार इस मसले को गंभीरता से ले रही है। अपनी नादानी में ट्रेलर लांच में शरीक फिल्‍म स्‍टारों ने चुप्‍पी साधी। सवाल को टाला और दोबारा जोर देने पर भिड़ गए कि इस मुद्ृदे की हमें सही जानकारी नहीं है। यह भी कहा गया कि ट्रेलर लांच में ऐसे सवाल नहीं पूछे जाने चाहिए।
अगला सवाल बनता है कि सार्वजनिक व्‍यक्तियों से कोई सवाल कब पूछा जाए? ऐसी कोई संहिता नहीं है। सार्वजनिक मंचों पर किसी इवेंट में ही ऐसे सवाल पूछे जा सकते हैं। मुमकिन है कि सेलिब्रिटी किसी मुद्दे से वाकिफ न हों। वैसे ममामले पर वे ईमानदारी से अपनी अनभिज्ञता जाहिर कर सकते हैं,लेकिन कन्‍नी काटना तो उचित नहीं है। अब तो ऐसा समय आ गया है कि सभी सेलिब्रिटी को आसपास की घटनाओं और गतिविधियों पर नजर रखनी होगी। उन्‍हें तैयार रहना होगा। जरूरत पड़े तो उन्‍हें सामान्‍य ज्ञान और सामयिक घटनाओं की अद्यतन जानकारी के लिए सलाहकार भी रखनी होगी। सेलिब्रिटी होने के बाद उनसे अपेक्षा बढ़ जाती है कि वे सभी विषयों की सामान्‍य जानकारी रखें। इन दिनों तो फोरम और सेमिनार में चिंतको,अध्‍येताओं और विचारकों के साथ उन्‍हें बुलाया जाने लगा है। उनके व्‍यावहारिक ज्ञान को भी महत्‍व दिया जा रहा है।
यह तटस्‍थ्र या निष्‍पक्ष रहने का समय नहीं है। निष्‍पक्षता वास्‍तव में विवादों से बचने का कवच है। अमिताभ बच्‍चन अपने ब्‍लॉग पर हमेशा सेलिब्रिटी होने की चुनौतियों पर लिखते हैं। वे मानते हैं कि हमें इसके लिए तैयार रहना चाहिए। गालियों और निंदा के रूप में मिले खट्टे बादामों का भी स्‍वाद लेना चाहिए। सच में सेलिब्रिटी घोर असुरक्षित व्‍यक्ति होता है,जो हर वक्‍त सभी के निशाने पर रहता है। सेलिब्रिटी की निजता लगभग खत्‍म हो जाती है। हमेशा उसकी स्‍क्रूटनी चल रही होती है। जाहिर है कि ऐसी स्थिति में उन्‍हें अपना पक्ष मजबूत रखना चाहिए और उसके लिए सामाजिक सरोकार बढ़ाना चाहिए।

Thursday, April 20, 2017

फिल्‍म समीक्षा : नूर



फिल्‍म रिव्‍यू
बेअसर और बहकी
नूर
-अजय ब्रह्मात्‍मज
जब फिल्‍म का मुख्‍य किरदार एक्‍शन के बजाए नैरेशन से खुद के बारे में बताने लगे और वह भी फिल्‍म आरंभ होने के पंद्रह मिनट तक जारी रहे तो फिल्‍म में गड़बड़ी होनी ही है। सुनील सिप्‍पी ने पाकिस्‍तानी पत्रकार और लेखिका सबा इम्तियाज के 2014 में प्रकाशित उपन्‍यास कराची,यू आर किलिंग मी का फिल्‍मी रूपांतर करने में नाम और परिवेश के साथ दूसरी तब्‍दीलियां भी कर दी हैं। बड़ी समस्‍या कराची की पृष्‍ठभूमि के उपन्‍यास को मुंबई में रोपना और मुख्‍य किरदार को आयशा खान से बदल कर नूर राय चौधरी कर देना है। मूल उपन्‍यास पढ़ चुके पाठक मानेंगे कि फिल्‍म में उपन्‍यास का रस नहीं है। कम से कम नूर उपन्‍यास की नायिका आयशा की छाया मात्र है।
फिल्‍म देखते हुए साफ पता चलता है कि लेखक और निर्देशक को पत्रकार और पत्रकारिता की कोई जानकारी नहीं है। और कोई नहीं तो उपन्‍यासकार सबा इम्तियाज के साथ ही लेखक,निर्देशक और अभिनेत्री की संगत हो जाती तो फिल्‍म मूल के करीब होती। ऐसा आग्रह करना उचित नहीं है कि फिल्‍म उपन्‍यास का अनुसरण करें,नेकिन किसी भी रूपांतरण में यह अपेक्षा की जाती है कि मूल के सार का आधार या विस्‍तार हो। इस पहलू से चुनील सिन्‍हा की नूर निराश करती है। हिंदी में फिल्‍म बनाते समय भाषा,लहजा और मानस पर भी ध्‍यान देना चाहिए।
नूर महात्‍वाकांक्षी नूर राय चौधरी की कहानी है। वह समाज को प्रभावित करने वाली स्‍टोरी करना चाहती है,लेकिन उसे एजंसी की जरूरत के मुताबिक सनी लियोनी का इंटरव्‍यू करना पड़ता है। उसके और भी गम है। उसका कोई प्रेमी नहीं है। बचपन के दोस्‍त पर वह भरोसा करती है,लेकिन उससे प्रेम नहीं करती। नौकरी और मोहब्‍बत दोनों ही क्षेत्रों में मनमाफिक न होने से वह बिखर-बिखरी सी रहती है। एक बार वह कुछ कोशिश भी करती है तो उसकी मेहनत कोई और हड़प लेता है। बहरहाल,उसका विवेक जागता है और मुंबई को लांछित करती अपनी स्‍टोरी से वह सोशल मीडिया पर छा जाती है। उसे अपनी स्‍टोरी का असर दिखता है,फिर भी उसकी जिंदगी में कसर रह जाती है। फिल्‍म आगे बढ़ती है और उसकी भावनात्‍मक उलझनों को भी सुलझाती है। इस विस्‍तार में धीमी फिल्‍म और बोझिल हो जाती है।
अफसोस है कि नूर को पर्दे पर जीने की कोशिश में अपनी सीमाओं को लांघती सोनाक्षी सिन्‍हा का प्रयास बेअसर रह जाता है। नूर में बतौर अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्‍हा कुछ नया करती हैं। वह अपने निषेधों को तोड़ती है। खिलती और खुलती हैं,लेकिन लेखक और निर्देशक उनकी मेहनत पर पानी फेर देते हैं। 21 वीं सदी की मुबई की एक कामकाजी लड़की की दुविधाओं और आकांक्षाओं की यह फिल्‍म अपने उद्देश्‍य तक नहीं पहुंच पाती।
अवधि- 116 मिनट
** दो स्‍टार

रोज़ाना : सबा इम्तियाज की ‘नूर’



रोज़ाना
सबा इम्तियाज की नूर
-अजय ब्रह्मात्‍मज

इस हफ्ते रिलीज हो रही सोनाक्षी सिन्‍हा की नूर 2014 में प्रकाशित पाकिस्‍तानी अंग्रेजी उपन्‍यास कराची,यू आर किलिंग मी का फिलमी रूपांतरण है। सबा इमित्‍याज का यह उपन्‍यास पाकिस्‍तान के शहर कराची की पृष्‍ठभूमि में एक महिला पत्रकार की रचनात्‍मक और भावनात्‍मक द्वंद्वों पर आधारित है। उपन्‍यास में कराची शहर,वहां की मुश्किलें और मीडिया हाउस की अंदरूनी उठापटक के बीच अपने वजूद की तलाश में आगे बढ़ रही आयशा खान का चित्रण है। यह उपन्‍यास लेखिका सबा इमित्‍याज के जीवन और अनुभवों पर आधारित है। सबा पेशे से पत्रकार हैं। फिलहाल वह जार्डन में रहती हैं और अनेक इंटरनेशनल अखबारों के लिए लिखती हैं। कराची,यू आर किलिंग मी उनका पहला उपन्‍यास है। अभी वह नो टीम ऑफ एंजेल्‍स लिख रही हैं।
सबा इम्तियाज सभी पाकिस्‍तानी लड़कियों की तरह हिंदी फिल्‍मों की फैन हैं। वह हिंदी फिल्‍में देखती हैं। जब भारतीय निर्माताओं ने फिल्‍म के लिए उनके उपन्‍यास के अधिकार लिए तो वह बहुत खुश हुईं। उन्‍होंने तब इसकी परवाह भी नहीं की कि उनके उपन्‍यास पर आधारित फिल्‍म की नायिका कौन होगी? सबा यही मानती हैं कि कराची और मुंबई महानगर हैं। दक्षिण एशिया के सभी महानगरों की हालत लगभग एक जैसी है,इसलिए उनकी समस्‍याएं भी एक जैसी हैं। सब को उम्‍मीद है कि कराची की पृष्‍ठभूमि के उपन्‍यास का मुंबई की पृष्‍ठभूमि की फिल्‍म में उचित रूपसंतरण किया गया होगा।
नूर इस लिहाज से उल्‍लेखनीय है कि यह महानगर में अपनी अस्मिता की खोज में निकली आधुनिक महानगरीय लड़की की कहानी कहती है। उसकी समस्‍याएं दफ्तर तक ही सीमित नहीं हैं। उसे अपनी जिंदगी में प्‍यार की भी तलाश है। वह नौकरी और मोहब्‍बत दोनों में अच्‍छा करना चाहती है। उपन्‍यास कराची,यू आर किलिंग मी में कराची की आयशा खान फिल्‍म नूर में मुंबई नूर बन चुकी है। फिल्‍मी रूपांतरण में सबा का योगदान नहीं है। इसकी स्े्रिप्‍ब्ट फिल्‍म के निर्देशक सुनील सिप्‍पी ने शिखा शर्मा और अलथिया डेलास-कौशल की मदद से लिखी है। संवाद इशिता मोइत्रा ने लिखे हैं। पाकिस्‍तानी परिवेश से भारतीय परिवेश में आ चुकी आयशा खान की यह तब्‍दीली रोचक होगी।
रोचक तो यह भी है कि नूर की रिलीज के कुछ हफ्तों के बाद हाफ गर्लफ्रेंड आ रही है। दोनों फिल्‍में पाकिस्‍तान और भारत पॉपुलर अंग्रेजी उपन्‍यासों पर आधारित हैं।
@brahmatmajay


Wednesday, April 19, 2017

रोज़ाना : अशांत सुशांत



रोज़ाना
अशांत सुशांत
-अजय ब्रह्मात्‍मज
दिनेश विजन की फिल्‍म राब्‍ता के ट्रेलर लांच पर सुशांत सिंह राजपूत और फिल्‍म पत्रकार भारती प्रधान के बीच हुई झड़प के मामले में सोशल मीडिया और मीडिया दो पलड़ों में आ गया है। सुशांत का पलड़ा भारी है। फैंस और मीडिया फैंस उनके समर्थन में उतर आए हैं। ऐसा लग रहा है कि गलती भारती प्रधान से ही हुई। अगर उस लांच के वीडियों को गौर से देखें तो पूरी स्थिति स्‍पष्‍ट होगी।
हुआ यों कि सवाल-जवाब के बीच एक टीवी पत्रकार ने कुलभूषण जाधव के बारे में सवाल पूछा,जिन्‍हे कथित जासूसी के अपराध में पाकिस्‍तान ने फांसी की सजा सुनाई है। इस सवाल को सुनते ही थोड़ी देर के लिए खामोशी छा गई। फिर कृति सैनन ने निर्देशक दिनेश विजन का फुसफुसाकर सुझााया कि इस सवाल का जवाब नहीं दिया जाएं। दिनेश विजन ने कहा कि अभी हमलोग इस पर बातें ना करें। सवालों का सिलसिला आगे बढ़ गया। मंच के ठीक सामने बैठी सीनियर भारती प्रधान को यह बात नागवार गुजरी। उन्‍होंने खड़े होकर सवाल किया कि राष्‍ट्रीय महत्‍व के इस सवाल से कैसे बच सकते हैं? मौजूद फिल्‍म स्‍टारों का इसका जवाब देना चाहिए। सुशांत ने कमान संभाली और जवाब नहीं देने के तर्क देने लगे। वही घिसा-पिटा जवाब कि हमें इस विषय की पूरी जानकारी नहीं है। भारती प्रधान ने फिर से जोर दिया तो सुशांत बिफर गए। शब्‍दों को चबाते हुए उन्‍होंने भारती से पूछा कि क्‍या आप राष्‍ट्रीय मुद्दों के सभी सवालों के उत्‍तर दे सकती हैं? सामान्‍य बातचीत अभद्र और एकतरफा हो गई। टी सीरिज के भूषण कुमार ने मामले की नजाकत को समझा और उन्‍होंने सुशांत को शांत किया।
सवाल ही कि पहली बार ही फिल्‍म स्‍टार और निर्देशक कह देते कि हम इस मुद्दे पर नहीं बोलना चाहते या हमें सही जानकारी नहीं है। वैसे देश के जागरूक नागरिक और एक्‍टर होने के नाते उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे सभी समसामयिक घटनाओं से वाकिफ रहें। ऐसे इवेंट में ही पत्रकारों को गैरफिल्‍मी जरूरी मुद्ददों पर सवाल करने के मौके मिलते हैं। बच्‍चन और खान जैसे अनुभवी स्‍टार सवालों को ढंग से डील कर लेते हैं। नए स्‍टार अहंकार और स्‍टारडम के नशे में जरूरी सवालों का मजाक बनाते हैं और उन्‍हें टालते हैं। सुशांत को अशांत होने की जरूरत नहीं थी।  

Tuesday, April 18, 2017

रोज़ाना : अशोभनीय प्रयोग



रोज़ाना
अशोभनीय प्रयोग
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले दिनों श्रीजित मुखर्जी निर्देशित बेगम जान आई। बेगम जान में विद्या बालन नायिका हैं और फिल्‍म के निर्माता हैं विशेष फिल्‍म्‍स के महेश भट्ट और मुकेश भट्ट। इस फिल्‍म ने विद्या बालन और महेश भट्ट के अपने प्रशंसकों को बहुत निराश किया।

बेगम जान पंजाब में कहीं कोठा चलाती है। उसे वहां के राजा साहब की शह हासिल है। आजादी के समय देश का बंटवारा होता है। रेडक्लिफ लाइन बेगम जान के कोठे को चीरती हुई निकलती है। भारत और पाकिस्‍तान के अधिकारी चाहते हैं कि बेगम जान कोठा खाली कर दे। 11 लड़कियों के साथ कोठे में रह रही बेगम जान अधिकारियों के जिस्‍म के पार्टीशन कर देने का दावा करती है,लेकिन ताकत उसके हाथ से निकलती जाती है। आखिरकार वह कोठे में लगी आग में बची हुई लड़कियों के साथ जौहर कर लेती है। आत्‍म सम्‍मान की रक्षा की इस कथित मध्‍ययुगीन प्रक्रिया को 1947 गौरवान्वित करते हुए दोहराना एक प्रकार की पिछड़ी सोच का ही परिचायक है। उनकी बेबसी और लाचारगी के चित्रण के और भी तरीके हो सकते थे। प्रगतिशील महेश भट्ट का यह विचलन सोचने पर मजबूर करता है,क्‍योंकि इस फिल्‍म की रिलीज के पहले उन्‍होंने कहा था कि वे अपनी पुरानी लकीर का विस्‍तार कर रहे हैं। विशेष फिल्‍म्‍स के 30 वें साल में वे फिर से अर्थ और सारांश की जमीन पर लौटना चाहते हैं।
इतना ही नहीं फिल्‍म के एक किरदार का नाम कबीर रखा गया है। वह खल चरित्र है। वह जनेऊ पहनता है और उसने खतना भी करवा रखा है। जरूरत के अनुसार पैसे लेकर वह हिंदू और मुसलमान दोनों की तरफ से दंगे-फसाद करवाता है। ऐसे किरदार का नाम कबीर रखने का क्‍या तात्‍पर्य हो सकता है? कवि और सामाजिक संत के रूप में हम कबीर को जानते हैं। उन्‍होंने अपनी रचनाओं में दोनों धर्मों के कट्टरपंथियों की आलोचना की है। ऐसे सेक्‍युलर संत का नाम एक भ्रष्‍ट ग़ुंडे को देकर महेश भट्ट और श्रीजित मुखर्जी ने कबीर की प्रतिष्‍ठा और योगदान का धूमिल किया है। कबीर हमारी सांस्‍कृतिक और साहित्यिक प्रतिमा(आयकॉन) हैं। उनके नाम के साथ ऐसा भद्दा कृत्‍य अशोभनीय है।
फिल्‍मकारों को ऐसे प्रयोगों में अतिारक्‍त सावधानी बरतनी चाहिए।