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Saturday, June 24, 2017

फिल्‍म समीक्षा : ट्यूबलाइट



फिल्‍म रिव्‍यू
यकीन पर टिकी
ट्यूबलाइट
-अजय ब्रह्मात्‍मज

कबीर खान और सलमान खान की तीसरी फिल्‍म ट्यूबलाइट भारज-चीन की पृष्‍ठभूमि में गांधी के विचारों और यकीन की कहानी है। फिल्‍म में यकीन और भरोसा पर बहुत ज्‍यादा जोर है। फिल्‍म का नायक लक्ष्‍मण सिंह बिष्‍ट मानता है कि यकीन हो तो चट्टान भी हिलाया जा सकता है। और यह यकीन दिल में होता है। लक्ष्‍मण सिंह बिष्‍ट के शहर आए गांधी जी ने उसे समझाया था। बाद में लक्ष्‍मण के पितातुल्‍य बन्‍ने चाचा गांधी के विचारों पर चलने की सीख और पाठ देते हैं। फिल्‍म में गांधी दर्शन के साथ ही भारतीयता के सवाल को भी लेखक-निर्देशक ने छुआ है। संदर्भ 1962 का है,लेकिन उसकी प्रासंगिकता आज की है।
यह प्रसंग फिल्‍म का एक मूल भाव है। भारत-चीन युद्ध छिड़ने के बाद अनेक चीनियों को शक की नजरों से देखा गया। फिल्‍म में ली लिन के पिता को कैद कर कोलकाता से राजस्‍थान भेज दिया जाता है। ली लिन कोलकाता के पड़ोसियों के लांछन और टिप्‍पणियों से बचने के लिए अपने बेटे के साथ कुमाऊं के जगतपुर आ जाती है। पश्चिम बंगाल से उत्‍तराखंड का ली लिन का यह प्रवास सिनेमाई छूट है। बहरहाल,जगतपुर में लक्ष्‍मण ही उन्‍हें पहले देखता है और उन्‍हें चीनी समझने की भूल करता है। बाद में पता चलता है कि ली लिन के परदादा चीन से आकर भारत बस गए थे। और अब वे भारतीय हैं। लेकिन ठीक आज की तरह उस दौर में भी तिवारी जैसे लोग नासमझी और अंधराष्‍ट्रभक्ति में उनसे घृणा करते हैं। उन पर आक्रमण करते हैं। फिल्‍म में प्रकारांतर से कबीर खान संदेश देते हैं कि भारत में कहीं से भी आकर बसे लोग भारतीय हैं। ली लिन कहती है... मेरे परदादा चीन से हिंदुस्‍तान आए थे। मेरे पापा,मेरी मां,मेरे पति हम सब यहीं पैदा हुए हैं,लेकिन जंग सब बदल देता है। लोगों की नजर में हम अब दुश्‍मन बन गए हैं। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह हमारा घर है,कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम इस मुल्‍क से उतनी ही मोहब्‍बत करते हैं जितनी कि तुम या तुम्‍हारा भाई... गौर करने की जरूरत है कि हम आज जिन्‍हें दुश्‍मन समझ रहे हैं और उन्‍हें देश से निकालने की बात करते हैं। वे दूसरे भारतीयों से कम नहीं हैं। ट्यूबलाइट के इस महत्‍वपूर्ण संदेश में फिल्‍म थोड़ी फिसल जाती है। कथा विस्‍तार,दृश्‍य विधान,प्रसंग और किरदारों के चित्रण में फिल्‍म कमजोर पड़ती है।
मंदबुद्धि लक्ष्‍मण और भरत अनाथ है। बन्‍ने चाचा ही उनकी देखभाल करते हैं।  भारत-चीन युद्ध के दौरान भरत फौज में भर्ती हो जाता है और मोर्चे पर चला जाता है। लक्ष्‍मण को यकीन है कि जंग जल्‍दी ही खत्‍म होगी और उसका भाई जगतपुर लौटेगा। इस यकीन के दम पर ही उसकी दुनिया टिकी है। बीच में उसके भाई की मौत की गलत खबर आ जाती है। सभी के साथ श्रद्धांजलि देने के बाद लक्ष्‍मण का यकीन दरक जाता है,लेकिन फिल्‍म तो संयोगों का जोड़ होती है। लेखक और निर्देशक मिलवाने की युक्ति निकाल ही लेते हैं। भोले किरदार लक्ष्‍मण के यकीन के विश्‍वास‍ को मजबूत करते हैं।
कबीर खान ने पिछली फिल्‍म बजरंगी भाईजान की तरह ही इस फिल्‍म में भी सलमान खान को सरल,भोला और निर्दोष चरित्र दिया है। इस फिल्‍म में भी एक बाल कलाकार है,जो लक्ष्‍मण के चरित्र का प्रेरक बनता है। इस बार पाकिस्‍तान की जगह चीन है,लेकिन पिछली फिल्‍म की तरह लक्ष्‍मण को उस देश में जाने की जरूरत नहीं पड़ती। सब कुछ सीमा के इसी पार घटता है। फिल्‍म में युद्ध के दृश्‍य बड़े सतही तरीके से फिल्‍मांकित किए गए हैं। जगतपुर गांव और शहर से परे पांचवें से सातवें दशक के हिंदुस्‍तान की ऐसी बस्‍ती है,जहां शहरी सुविधाएं और ग्रामीण रिश्‍ते हैं। पीरियड गढ़ने में कई फांक नजर आती है,जिनसे कमियां झलकती हैं। लेखक-निर्देशक का जोर दूसरी बारीकियां से ज्‍यादा मुख्‍य किरदारों के बात-वयवहार पर टिका है। उसमें वे सफल रहे हैं। यह फिल्‍म पूर्वार्द्ध में थोड़ी शिथिल पड़ी है। निर्देशक लक्ष्‍मण को दर्शकों से परिचित करवाने में अधिक समय लेते हैं।
51 साल के सलमान खान और उनसे कुछ छोटे सोहेल खान अपनी उम्र को धत्‍ता देकर 25-27 साल के युवकों की भूमिका में जंचने की कोशिश करते हैं,लेकिन उनकी कद-काठी धोखा देती है। ट्यूबलाइट के सहयोगी किरदारों में आए ओम पुरी,मोहम्‍मद जीशान अय्यूब,यशपाल शर्मा,जू जू और माटिन रे टंगू फिल्‍म की जमीन ठोस की है। वे अपनी भाव-भंगिमाओं से फिल्‍म के कथ्‍य को प्रभावशाली बनाते हैं। खास कर जू जू और माटिन बेहद नैचुरल और दिलचस्‍प हैं।
अवधि- 136 मिनट
*** तीन स्‍टार

Friday, June 23, 2017

दरअसल : भारत में जू जू,चीन में आमिर खान



दरअसल...
भारत में जू जू,चीन में आमिर खान
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कबीर खान निर्देशित ट्यूबलाइट में चीन की अभिनेत्री जू जू दिखाई पड़ेंगी। यह पहला मौका होगा जब किसी हिंदी फिल्‍म में पड़ोसी देश की अभिनेत्री सलमान खान जैसे लोकप्रिय सितारे के साथ खास किरदार निभाएंगी। पिछले कुछ सालों से भारत और चीन के बीच फिल्‍मों के जरिए आदन-प्रदान बढ़ा है। कुछ फिल्‍मों का संयुक्‍त निर्माण हुआ है। कुछ निर्माणाधीन हैं। चीन में दंगल की कामयाबी ने हमारी तरफ से दरवाजे पर चढ़ाई गई कुंडी खोल दी है। दरवाजा खुला है। अभी तक भारत में चीनी सामानों को दोयम दर्जे के सस्‍ते प्रोडक्‍ट का का माना और मखौल उड़ाया जाता है। चीन के राष्‍ट्रपति तक ने भारत के प्रधानमंत्री से दंगल की तारीफ की। हिंदी-चीनी भाई-भाई नारे की अनुगूंज अब कहीं नहीं सुनाई पड़ती। 21 वीं सदी में दोनों देशों की सिनेमाई दोस्‍ती नई लहर के तौर पर आई है। हिंदी-चीनी सिनेमाई भाई का नारा बुलंद किया जा सकता है।
जू जू को हिंदी में झू झू और चू चू भी लिखा जा रहा है। हम दूसरे देशों की भाषा के शब्‍दों के प्रति लापरवाही की वजह से सही उच्‍चरित शब्‍द की खोज नहीं करते। हिंदी ध्‍वनि प्रधान भाष है। थोड़ी मेहनत की जाए तो हिंदी में दुनिया की हर भाषा का करीबी उच्‍चरण किया जा सकता है। बहरहाल,जू जू में एक जू उनका पारिवारिक सरनेम है। और उनके जू नाम का मतलब मोती है। मोती की चमक और शुद्धता है जू जू के व्‍यक्तित्‍व में। जू जू अगले महीने 33 साल की हो जाएंगी। चीन के पेइचिंग शहर में एक सैनिक परिवार में पैदा हुई जू जू बचपन से कलात्‍मक रुझान की हैं। उन्‍होंने छोटी उम्र में पियानो बजाना सीखा। बता दें कि चीन में लगभी सभी बच्‍चे कोई न कोई वाद्य यंत्र बजाना सीखते हैं। चीन में आर्थिक उदार नीति आने के बाद पियानो का आकर्षण बढ़ा है। सांस्‍कृतिक क्राति के दौर में पियानों जैसे वाद्य यंत्र पर पाबंदी सी लगी थी। गाने-बजाने की शौकीन जू जू भारत की अनेक प्रतिभाओं की तरह ही एक म्‍यूजिकल कंटेस्‍ट से सामने आईं। उन्‍होंने चीन में एमटीवी के शो होस्‍अ किए और अपने रुझान का दायरा बढ़ाती गईं। 2011 में आई छन तामिंग की फिल्‍म वु चिड़ न्‍वी रन सिन(औरतें क्‍या चाहती हैं) से उनके एक्टिंग करिअर की शुरुआत हुई। 2012 में उन्‍‍हें हालवुड की द मैन विद द आयन फिस्‍ट फिल्‍म मिल गई। फिल्‍मों और टीवी शो से इंटरनेशनल पहचान हासिल कर चुकी जू जू ने 2016 में ट्यूबलाइट साइन की। वह भारत आईं और उन्‍होंने हिंदी भी सीखी।
जू जू का भारत में कैसा स्‍वागत होगा? यह तो कुछ घंटों के बाद पता चल जाएगा। हिंदी-चीनी सिनेमाई भाई के संदर्भ में हाल में चीन में मिली आमिर खान की पहचान और सफलता उल्‍लेखनीय है। किसी भी भारतीय कलाकार को चीन में ऐसी कमर्शियल कामयाबी नहीं मिली थी। वैसे चीन में राज कपूर और उनकी फिल्‍म आवारा के बारे में 35-40 से अधिक उम्र के सभी नागरिक जानते हैं। अमेरिकी फिल्‍मों के प्रवेश के पहले भारतीय फिल्‍में ही चीनी दर्शकों के विदेशी मनोरंजन के लिए उपलब्‍ध थीं। उनमें राज कपूर शीर्ष पर रहे। दंगल ने आमिर खान की पहचान मजबूत कर दी है। राजकुमार हिरानी की 3 इडियट ने सबसे पहले चीनी दर्शकों को आमिर खान के प्रति आकर्षित किया। बता दें कि 2009 में आई 3 इडियट का अधिकांश चीनियों ने पायरेटेड फार्मेट में देखा। यह फिल्‍म वहां के युवकों के बीच खूब पसंद की गई। उन्‍हें रैंचो अपने बीच का ही युवक लगा था। फिर धूम 3 की रिलीज तक चीन में थिएटर का्रति आ चुकी थी। सिनेमाघरों के संख्‍या मशरूम की तर बड़ी। आमिर खन की धूम 3 को चीन में अच्‍छी रिलीज मिली। इस फिल्‍म में एक्‍शन और अदाकारी से आमिर खान से चीनी दर्शकों के दिल में जगह बना ली। उनकी पीके भी वहां पॉपुलर रही। और अब दंगल ने तो सारे रिकार्ड तोड़ दिए। अभी तो कहा जा रहा है कि चीन का हर फिल्‍मप्रेमी आमिर खान को पहचानता है। उसने दंगल देख रखी है।
जू जू और आमिर खान दोनों देशों के बीच सांस्‍कृतिक दोस्‍ती के नए राजदूत हैं। जू जू अपनी व्‍यस्‍तता की वजह से ट्यूबलाइट के प्रचार में शामिल नहीं हो सकी,लेकिन आमिर खान दंगल के लिए चीन गए थे। उम्‍मीद है कि आगे यह सहयोग और संपर्क बढ़ेगा।

Thursday, June 22, 2017

पवन श्रीवास्तव की 'लाइफ ऑफ़ एन आउटकास्ट'



भारत में इंडी सिनेमा ,अब पहले के मुकाबले अधिक मज़बूत हुआ है .बेहतर कहानी ,बिना किसी दबाव के कहने की चाहत रखने वाले तमाम फिल्ममेकर्स इंडी सिनेमा के माध्यम से अपनी कहानियां, दर्शकों तक पहुंचा पाने में सफल हो रहे हैं .भारत में बनने वाला बहुसंख्यक इंडी सिनेमा, शहरी कहानियों और शहर के दर्शकों को ध्यान में रख कर बनाया जाता है . गांव अभी भी इंडी सिनेमा की कहानियों में जगह कम बना पा रहे हैं .असल मायने में सिनेमा स्वतंत्र और लोकतांत्रिक तभी हो पायेगा जब हर भौगोलिक क्षेत्र से बहुतायत में कहानियां ,पर्दे पर आना शुरू हों, उनका अपना दर्शक वर्ग हो .
इस कोशिश में स्टूडियो सर्वहारा ,दलित मुद्दे पर केंद्रित फिल्म ”लाइफ ऑफ़ एन आउटकास्ट” बना रहा है . पवन श्रीवास्तव इस फिल्म के निर्देशक हैं .उत्तर प्रदेश के दलित व्यक्ति के जीवन के तीस साल को इस फिल्म में दिखाया गया है . इस फिल्म का शूट पूरा किया जा चुका है . ये फिल्म अभी पोस्ट प्रोडक्शन फेज़ में है .फिल्म के पोस्ट प्रोडक्शन को पूरा करने के लिए स्टूडियो सर्वहारा ने मजदूर दिवस के दिन ,क्राउड फंडिंग कैंपेन की शुरुआत की थी .इस फिल्म को दस भाषाओं में सबटायटल और रिलीज से पहले पांच सौ गांव में स्क्रीन किया जायेगा .
इंडी सिनेमा को बनाने की प्रक्रिया काफी चुनौतीपूर्ण और रोमांचक होती है .बजट की बुनियादी समस्या प्री प्रोडक्शन से लेकर फिल्म को दर्शकों तक पहुंचा पाने में आती रहती है . फिल्म बनाना ,डिजिटल समय में भी काफी खर्चीली कला है .इस वजह से कास्टिंग, मेकअप, कॉस्ट्यूम, कैमरा, साउंड जैसी चीज़ों को करने के लिए गैरपारंपरिक तरीकों के साथ ही कला को जनवादी मानने वाले कलाकारों को साथ में जोड़ लेना बहुत जरुरी हो जाता है .
”लाइफ ऑफ़ एन आउटकास्ट” की शूटिंग एक गांव में हुयी है . इंडी सिनेमा बिना सहयोग के शूट कर पाना मुमकिन नहीं होता .हमने रेकी के दौरान से ही गांव के लोगों को फिल्म से जोड़ना शुरू कर दिया. उनके बहुत सारे सवाल थे, उन्हें विश्वाश नहीं हो रहा था कि, गांव में सिनेमा कैसे बन सकता है .एक तरह का काम्प्लेक्स उनके भीतर था . हमने उन्हें फिल्म की कहानी ,सिनेमा का गांव में नहीं बनना ,गांव के पात्र या कहानियां सिनेमा में क्यों नहीं नज़र आते हैं ,गांव के लोगों को हमारी मदद क्यों करनी चाहिए, जैसे विषयों पर बात किया , और उन्हें सहयोग के लिए राज़ी कर लिया .
इस फिल्म के लाइन प्रोडूसर, शूट कॉर्डिनेटर, कुछ आर्टिस्ट गांव से हैं . सिनेमा टेलीविज़न के माध्यम से इन सभी लोगों तक पहुंचा था ,पर पहली बार प्रोडक्शन के स्तर पर ये सभी लोग शामिल हुए थे . राधिका, इस फिल्म की कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर हैं . फिल्म में दलित व्यक्ति के जीवन के तीस साल के सफर को दिखाया गया है।सिनेमा में इस तरह की कहानियों को कहने के लिए कॉस्ट्यूम एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है।हमारी फिल्म के करैक्टर ग्रामीण परिवेश के हैं।तीस साल में कपड़ों के ट्रेंड में बहुत बदलाव आता है। बजट को ध्यान में रखते हुए कॉस्ट्यूम का काम करना काफी मुश्किल था .
राधिका ने गांव के लोगों से बात करना शुरू किया। उन्हें फिल्म के बारे में बताया, फिल्म में कॉस्ट्यूम इतना क्यों जरूरी है, इसके बारे में बताया। राधिका ने बात करके हर पीरियड के पहनावे को बरीखी से समझा। महिलाओं से मेकअप में आये बदलाव को समझा। सभी को विश्वाश में लेने के बाद ,गांव के लोगों से कॉस्ट्यूम लेना शुरू किया .
क्राउड फंडिंग कैंपेन, इमोशनल जर्नी जैसा होता है. बहुत सारे नए रिश्ते बनते हैं, अनजान लोग फिल्म के बारे में पूरी जिम्मेदारी ले लेने का अहसास कराते हैं . पुराने या रोज मिलने वाले लोग सपोर्ट नहीं कर पाते तो दुःख भी होता है . किसी दिन बहुत अच्छा सपोर्ट मिलता है और किसी दिन मन मुताबिक नहीं होता .यही इस कैंपेन की सुंदरता भी है, कुछ भी इस कैंपेन में निश्चित नहीं रहता .
क्राउड फंडिंग कैंपेन, अमूमन फंडिंग वेबसाइट या सोशल मीडिया पर चलाया जाता है .हम इसमें प्रयोग कर रहे हैं . इसी प्रक्रिया में स्टूडियो सर्वहारा और बैचलर्स किचन के विनीत कुमार ने मिल कर “सिनेमा वाया बैचलर्स किचन” नाम का इवेंट शुरू किया है . इसके पीछे मकसद है ,आप खायेंगे तो हम सिनेमा बनायेंगे .इवेंट में बैचलर अपनी किचन में खाना बनाएगा ,आने वाले अतिथियों को फिल्म के क्राउड फंडिंग में सहयोग करना होगा . विनीत ,बीते रविवार को इस कड़ी का पहला इवेंट कर चुके हैं . आने वाले दिनों में बैचलर्स, सिनेमा के लिए, अपने किचन में खाना बनायेंगे. इंडी सिनेमा और क्राउड फंडिंग के लिहाज़ से इस तरह के प्रयोग बहुत महत्त्वपूर्ण हैं .
 ”लाइफ ऑफ़ एन आउटकास्ट” के पोस्ट प्रोडक्शन के लिए चार लाख रुपये की जरुरत है .पचास दिनों के कैंपेन के पहले तीस दिनों में लगभग दो लाख रुपये आ गए हैं. फिल्म को अब तक सत्तर से अधिक प्रोड्यूसर और चार को-प्रोड्यूसर का साथ मिला है. आप इस फिल्म को अपना सहयोग वेबसाईट www.studiosarvahara.com पर जा कर दे सकतें हैं.