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Tuesday, October 17, 2017

रोज़ाना : कुंदन शाह की याद



रोज़ाना
कुंदन शाह की याद
-अजय ब्रह्मात्‍मज
मुंबई में चल रहे मामी फिल्‍म फेस्टिवल में कुंदन शाह निर्देशित जाने भी दो यारो का खास शो तय था। यह भी सोचा गया था कि इसे ओम पुरी की श्रद्धांजलि के तौर दिखाया जाएगा। फिल्‍म के बाद निर्देशक कुंदन शाह और फिल्‍म से जुड़े सुधीर मिश्रा,विधु विनोद चापेड़ा और सतीश कौशिक आदि ओम पुरी से जुड़ी यादें शेयर करेंगे। वे जाने भी दो यारो के बारे में भी बातें करेंगे। इस बीच 7 अक्‍टूबर को कुंदन शाह का आकस्मिक निधन हो गया। तय कार्यक्रम के अनुसार शो हुआ। भीड़ उमड़ी। फिल्‍म के बाद का सेशन ओम पुरी के साथ कुंदन शाह को भी समर्पित किया गया। ज्‍यादातर बातचीत कुंदन शाह को ही लेकर हुई। एक ही रय थी कि कुंदन शाह मुंबई की फिल्‍म इंडस्‍ट्री की कार्यप्रणाली में मिसफिट थे। वे जैसी फिल्‍में करना चाहते थे,उसके लिए उपयुक्‍त निर्माता खोज पाना असंभव हो गया है।
कुछ बात तो है कि उनकी जाने भी दो यारो 34 सालों के बाद आज भी प्रासंगिक लगती है। आज भी कहीं पुल टूटता है तो तरनेजा-आहूजा जैसे बिजनेसमैन और श्रीवास्‍तव जैसे अधिकारियों का नाम सामने आता है। और आज भी कोई सुधीर व विनोद बहल का बकरा बनता है। साहित्‍य से तुलना करें तो कुंदन शाह की जाने भी दो यारो देखना कहीं न कहीं हरिशंकर पारसाई और शरद जोशी को पढ़ने जैसा है। गुदगुदी होती है,हंसी आती है,लेकिन साथ ही मन छलनी होता है। कुंदन शाह ने अपने समय के यथार्थ को चुटीले और नुकीले अंदाज में पेश किया। यह फिल्‍म क्रिएटिव सनकीपन और धुन की मिसाल है।
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में कैमरे के आगे-पीछे विख्‍यात हो चुकी तमाम हस्तियां इस फिल्‍म से जुड़ती चली गई थीं। सभी पर धुन सवार थी। कभी 72 झांटे लगातार शूटिंग चल रही है। नसीरूद्दीन शाह सेट पर ही सो रहे हैं और शॉट आने पर हाथ-मुह धोकर तैयार हो जाते हैं। कैमरामैन विलोद प्रधान क्रेन पर ही झपकी लेते हैं। सुबह आलू-गोभी की सब्‍जी बनती है तो शाम में गोभी-आलू की सब्‍जी परोसी जाती है। एक्‍टर को देने के लिए पर्याप्‍त पैसे नहीं हैं तो प्रोडक्‍शन इंचार्ज विधु विनोद पोपड़ा मेकअप कर के सेट पर खड़े हो जाते हैं। निर्देशक चौंकते हैं कि ऐसा क्‍यों? उन्‍हें बताया जाता है कि 2000 रुपए बचा लिए गए हैं। कम दर्शकों को मालूम होगा कि इस फिल्‍म में अनुपम खेर का एक पूरा सीक्‍वेंस था। एडीटिंग में उसे काट दिया गया,जबकि वह अनुपम खेर की पहली फिल्‍म थी...सारांश्‍ के भी पहले। यह अलग बात है कि जाने भी दो यारो में नहीं दिखने की वजह से भी उन्‍हें सारांश मिली महेश्‍ा भट्ट उस रोल में किसी नए कलाकार को लेना चाहते थे। जाने भी दो यारो के अनेक किस्‍से हैं। उन्‍हें समेटते हुए एक और किताब आनी चाहिए।

Saturday, October 14, 2017

रोजाना : एक उम्मीद है अनुपम खेर की नियुक्ति

रोजाना
उम्मीद है अनुपम खेर की नियुक्ति
-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दिनों एफटीआईआई में अनुपम खेर की नियुक्ति हुई। उनकी इस  नियुक्ति को लेकर सोशल मीडिया पर लगातार प्रतिक्रियाएं और फब्तियां चल रही हैं। सीधे तौर पर अधिकांश इसे भाजपा से उनकी नज़दीकी का परिणाम मान रहे हैं। यह स्वाभाविक है। वर्तमान सरकार के आने के पहले से अनुपम खेर की राजनीतिक रुझान स्पष्ट है। खासकर कश्मीरी पंडितों के मामले में उनके आक्रामक तेवर से हम परिचित हैं। उन्होंने समय-समय पर इस मुद्दे को भिन्न फोरम में उठाया है। कश्मीरी पंडितों के साथ ही उन्होंने दूसरे मुद्दों पर भी सरकार और भाजपा का समर्थन किया है। उन्होंने सहिष्णुता विवाद के समय अवार्ड वापसी के विरोध में फिल्मी हस्तियों का एक मोर्चा दिल्ली में निकाला था। उसके बाद से कहा जाने लगा कि अनुपम खेर की इच्छा राज्य सभा की सदस्यता है।
इस नियुक्ति को उनकी नज़दीकी माना जा सकता है। यह कहीं से गलत भी नहीं है। कांग्रेस और दूसरी सरकारें भी अपने समर्थकों को मानद पदों पर नियुक्त करती रही हैं। कांग्रेस राज में समाजवादी और वामपंथी सोच के कलाकार और बुद्धिजीवी सत्ता का लाभ उठाते रहे हैं। तख्ता पलटा है तो तख्तियां बदल रही हैं। अब उन पर नए नाम लिखे जा रहे हैं। सरकार की सोच के मुताबिक नीतियां बदली जा रही हैं। नए फैसले लिए जा रहे हैं। कुछ सालों के बाद पता चलेगा कि परिणाम क्या हुआ? तब तक विरोधियों और आलोचकों को सब्र से काम लेना चाहिए। दूसरी सोच से प्रेरित सारे कामों को नकारना उचित नहीं है।
एफटीआईआई में अनुपम खेर की नियुक्ति स्वागतयोग्य कदम है। सारांश से रांची डायरीज तक कि सैकड़ों फिल्मों के लंबे सफर में हम अनुपम खेर की प्रतिभा के साक्षी रहे हैं। उनके अभिनय क्षमता के बारे इन दो राय नहीं हो सकती। याद करें तो गजेंद्र चौहान की नियुक्ति को अनुपम खेर ने गलत कहा था और स्पष्ट शब्दों में ताकीद की थी के गजेंद्र चौहान किसी भी तरह इस पद के योग्य नहीं है। इस लिहाज से उनकी नियुक्ति सर्वथा उचित है।अपने अनुभव और संपर्क से वे एफटीआईआई में नई रवानी ला सकते हैं।सरकारी सहयोग से चल रहे इस संस्थान में देश के सुदूर कोने से प्रतिभाएं आती हैं। उन्हें अपनी प्रतिभा निखारने के मौके मिलता है। अनुपम खेस से गुजारिश रहेगी कि वे एफटीआईआई  की सैटेलाइट गतिविधियां आरम्भ करें। फिल्मी हस्तियों के सहयोग से देश भर में फिल्मों से संबंधित स्क्रिप्ट और तकनीकी वर्कशॉप हों। अनुपम खेर एक बड़ी उम्मीद हैं। ऐसी संस्थाओं में अनुपम जैसे व्यक्तियों और महानुभावों की दरकार है।

Friday, October 13, 2017

दरअसल : सारागढ़ी का युद्ध



दरअसल...
सारागढ़ी का युद्ध
-अजय ब्रह्मात्‍मज

तीन दिन पहले करण जौहर और अक्षय कुमार ने ट्वीट कर बताया कि वे दोनों केसरी नामक फिल्‍म लेकर आ रहे हैं। फिल्‍म के निर्देशक अनुराग सिंह रहेंगे। यह फिल्‍म बैटल ऑफ सारागढ़ी पर आधारित होगी। चूंकि सारागढ़ी मीडिया में प्रचलित शब्‍द नहीं है,इसलिए हिंदी अखबारों में ‘saragarhi’ को सारागरही लिखा जाने लगा। फिल्‍म इंडस्‍ट्री में भी अधिकांश इसे सारागरही ही बोलते हैं। मैं लगातार लिख रहा हूं कि हिंदी की संज्ञाओं को अंग्रेजी के साथ हिंदी में भी लिखा जाना चाहिए। अन्‍यथा कुछ पीढि़यों के बाद इन शब्‍दों के अप्रचलित होने पर सही उच्‍चारण नहीं किया जाएगा। देवनागरी में लिखते समय लोग सारागरही जैसी गलतियां करेंगे। दोष हिंदी के पत्रकारों का भी है कि वे हिंदी का आग्रह नहीं करते। अंग्रेजी में आई विस्‍प्तियों का गलत अनुवाह या प्यिंतरण कर रहे होते हैं।
बहरहाल,अक्षय कुमार और करण जौहर के आने के साथ सारागढ़ी का युद्ध पर फिल्‍म बनाने की तीसरी टीम मैदान में आ गई है। करण जौहर की अनुराग सिंह निर्देशित फिल्‍म का नाम केसरी रखा गया है। इसके पहले अजय देवगन ने भी इसी पृष्‍ठभूमि पर एक फिल्‍म की घोषणा की थी। कहते हैं अगस्‍त महीने में करण जौहर और काजोल के बीच पुन: दोस्‍ती हो जाने के बाद अपनी फिल्‍म विलंबित कर दी। वे करण जौहर की फिल्‍म से टकराना नहीं चाहते। पिछली फिल्‍म के समय दोनों के बीच बदमजगी हो चुकी है। सारागढ़ी का युद्ध की पृष्‍ठभूमि पर ही राजकुमार संतोषी की फिल्‍म निर्माणाधीन है। इस फिल्‍म में रणदीप हुडा केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं। अक्षय कुमार,अजय देगन और रणदीप हुडा के स्‍टारडम,अभिनय दक्षता और करिअर को ध्‍यान में रखें तो अजय देवगन ईशर सिंह की भूमिका के लिए उपयुक्‍त लगते हैं। यह ठीक है कि रणदीप हुडा अपने किरदारों पर मेहनत करते हैं। वे ईशर सिंह को भी जीवंत कर सकते हैं। अक्षय कुमार का तो जादुई समय चल रहा है। वे हर प्रकार की भूमिका में जंच रहे हैं।
सारागढ़ी का युद्ध है क्‍या?‍ पिछली सदियों के युद्धों में से एक सारागढ़ी का युद्ध वीरता और साहस के लिए विख्‍यात है।

अविभाजित भारत में अंग्रेजों ने अपन स्थिति मजबूत करने के साथ सीमाओं की चौकसी आरंभ कर दी थी। हमेशा की तरह उत्‍र पश्चिमी सीमांत प्रांत की तरफ से आक्रमणकारियों का खतरा जारी था। उनसे बचाव के लिए लॉकफोर्ट और गुलिस्‍ता फोट्र बनाए गए थे। दुर्गम इलाका होने और दोनों फरेर्ट के गीच संपर्क स्‍‍थापित करने के उद्देश्‍य से दोनों फोर्ट के बीच में सारागढ़ी पोस्‍ट बनार्ब गई थी। पोस्‍ट पर तैनात सैनिक मुस्‍तैदी से आततायी लश्‍करों पर नजर रखते थे।
12 सितंबर 1897 की घटना है। सारागढ़ी पोस्‍ट पर तैनात सैनिकों ने देखा की अफगानों का लश्‍कर पोस्‍अ की तरफ बड़ा चला आ रहा है। वहां से सैनिकों ने गुलिस्‍तान फोर्ट पर हेलिकॉग्राफ से मदद के लिए संदेश भेजा,लेकिन वहां मौजूद अंग्रेज फौजी अधिकारी मदद करने में असमर्थ रहा। आक्रमणकारी लश्‍कर में 10,000 से अधिक सैनिक थे। ऐसी स्थिति में सारागढ़ी पोस्‍ट पर मौजूद 21 जवानों की अुकड़ी ने हवलदार ईशर सिंह के नेतृत्‍व में पोस्‍ट की रक्षा के लिए लढ़ने का फैसला किया। दिन भर युद्ध चला। यह अलग बात है कि इस युद्ध में वे खेत आए,लेकिन उन्‍होंने अपने शौर्य और साहस से अफगान सैनिकों के दांत खट्टे कर दिए थे। उन्‍होंने उन्‍हें दिन भी उलझाए रख। इन जांबाज सैनिकों की बहादुरी की तारीफ ब्रिटिश संसद में हुई और क्‍चीन विक्‍टोरिया ने सभी सैनिकों को वीरता पुरस्‍कार से सम्‍मनित किया। उन्‍हें जमीनों के साथ ईनाम भी दिए गए। सारागढ़ी के युद्ध और स्‍मारक पर मीडिया में लिखा जाना चाहिए।
सारागढ़ी का युद्ध पर फिल्‍म बनना गौरव की बात है,लेकिन एक साथ तीन फिल्‍मों का बनना कुछ सालों पहले भगत सिंह के जीवन पर बनी छह फिल्‍मों की याद दिला रहा है।


सात सवाल : विनीत कुमार सिंह



विनीत कुमार सिंह

अजय ब्रह्मात्‍मज
सात सवाल

विनीत कुमार सिंह की फिल्म ‘मुक्काबाज’ का गुरुवार को मुंबई में आयोजित मुंबई फिल्‍म फेस्टिवल में एशिया प्रीमियर हुआ। इससे पहले फिल्‍म को टोरंटो इंटरनेशनल फिल्‍म फेस्टिवल में प्रदर्शित किया जा चुका है। वर्ष 1999 से हिंदी सिनेमा में सक्रिय विनीत उसमें श्रवण की केंद्रीय भूमिका में दिखेंगे। फिल्‍म के निर्देशक अनुराग कश्‍यप हैं। विनीत से हुई बातचीत के अंश :  
1-यहां तक के सफर में आपने काफी धैर्य और उम्मीद कायम रखी। इन्हें कैसे कायम रख पाए?
मैं वह काम करना चाहता था, जिसमें सहज रहूं। साथ ही उसे करने में मुझे आनंद की प्राप्ति हो। डॉक्टर बनने के लिए मैंने काफी मेहनत की थी। तब जाकर फल मिला था। अभिनय करने पर खुशी की अनुभूति स्‍वत: हुई। मैं उससे थकता नहीं हूं। शूटिंग के दौरान घर जाने के लिए घड़ी नहीं देखता। यकीन था कि यहां पर मेहनत करुंगा तो बेहतर पाऊंगा। पापा ने भी हमेशा कहा कि हारियो न हिम्मत बिसारियो न हरिनाम। यानी जो हिम्मत नहीं हारता है उसे रास्ते मिल जाते हैं। इन्‍ही सब वजहों से धैर्य कायम रहा।

2-आपके अभिनय के सफर की शुरुआत कैसे हुई?
मैंने वर्ष 1999-2000 के आस-पास अभिनय में कदम रखा था। मैंने एक टैलेंट हंट शो जीता था। वहां से अभिनय के सफर का आगाज हुआ। मेरी पहली फिल्म ‘पिता’ थी। वह वर्ष 2002 में रिलीज हुई थी। 

3-कहा जा रहा है कि आपको ‘मुक्‍काबाज’ में पूरा स्पेस मिला है ठीक वैसे ही जैसे नवाजुद्दीन सिद्दिकी को ‘गैंग्‍स ऑफ वासेपुर’ में मिला था?
बहुत सारे लोग अच्छा काम कर रहे हैं। मैं उन्हें देखता रहता हूं।  उनके लिए खुश भी होता हूं। खुद वैसा काम करने की कोशिश में था। मैं काम मांग सकता हूं, पर निर्णय मेरे हाथ में नहीं है। ‘मुक्‍काबाज’ में मुझे काम करने की स्वतंत्रता मिली। मैं अलग-अलग तरह की स्क्रिप्ट चाहता हूं। ताकि मेरे काम की वैरायटी से लोग वाकिफ हो सकें।

4-अनुराग कश्यप के बारे में क्या कहना चाहेंगे जो आप जैसे कलाकारों साथ भरोसे पर काम करते हैं?
अनुराग नहीं होते तो शायद हम छोटे-मोटे रोल में सिमटे होते। लोग हमारी प्रतिभा से कभी वाकिफ नहीं हो पाते। उनमें भरोसा करने की क्षमता कहां से आती है उसकी मुझे कोई जानकारी नहीं है। मैं उनके साथ काम करता हूं। मुझे पता है कि वह अपने संघर्ष के दिनों को भूले नहीं हैं। वह हमारी तकलीफों न सिर्फ समझते हैं बल्कि महसूस करते हैं। वह यथासंभव मदद भी करते भी हैं। मैंने देखा है कि नवोदित कलाकार हो या तकनीशियन सभी से प्यार से पेश आते हैं। मेल-मुलाकात के बाद उसे भूलते नहीं हैं। उनकी यही खासियत हम जैसे कलाकारों के लिए उम्मीद की अलख जगाए रखती है।

5-दर्शकों तक अभी ‘मुक्‍काबाज’ नहीं पहुंची है। इंडस्ट्री के जानकारों को इसकी जानकारी है। कहा जा रहा है कि आपको बेहतरीन मौका मिला है। क्या यह आपके करियर की टर्निंग प्वाइंट फिल्म होगी?
फेस्टिवल या एडीटिंग में जिस किसी ने फिल्म देखी है उनकी प्रतिक्रियाएं मुझे लगातार मिल रही हैं। ऐसा रिस्पांस मुझे पहले कभी नहीं मिला। 

6-फिल्म ‘मुक्‍काबाज’ के बारे में बताएं।
यह बॉक्सिंग करने वाले लड़के की कहानी है। उसके अपने सपने हैं। वह उसी समाज का हिस्सा है जिसमें हम रहते हैं। खिलाडिय़ों को ढेरों सुविधाएं देने के दावे होते है, लेकिन सच दिखता है। उसका उस पर कैसा असर होता है? दरअसल, सफल खिलाड़ी की कहानी स्वर्ण अक्षरों में लिखी जाती है। हालांकि एक सफल खिलाड़ी के पीछे बहुत ऐसे लोग होते हैं जो बेहतर होते हुए भी असफल हैं। उनकी कहानी कहने-सुनने में किसी की रूचि नहीं होती। उनका दर्द लोगों को पता नहीं चलता। क्योंकि उसमें ग्लैमर नहीं होता। सफल लोग कुछ ही हैं मगर उसकी दौड़ में शामिल लोगों की संख्‍या बहुत ज्‍यादा है। ‘मुक्‍काबाज’ वैसे ही लोगों की कहानी है। उसमें लवस्टोरी भी है। 

-आप भी खिलाड़ी रहे हैं...
0 मैं खुद बॉस्केटबॉल का खिलाड़ी रहा हूं। मेरा जूनियर बॉस्केटबॉल टीम का कप्तान था। कुछ और खिलाड़ी उससे बेहतर रहे हैं। वह बचपन से अच्छे खिलाड़ी थे। उनका ध्यान कभी किसी की गुडबुक में आना नहीं रहा। खेल में ही उनकी दुनिया रची-बसी रही। उनकी वह जीवनशैली कुछ अधिकारियों को खटकती थी। खेलने की उस उम्र में वे जोश में होते थे मगर  दुनियादारी से दूर। तब उन लोगों को खुश करने में चूक जाते थे जिनके हाथ में निर्णय होता है। वे उनकी आंखों में गढ़ने लगते हैं। ऐसे खिलाड़ी कई बार बेबाकी से कुछ बोल जाते हैं। यही बात उनके लिए नासूर बन जाती है। उसकी कीमत चुकानी पड़ती है। 27-28 साल की उम्र में होश आने पर उनका करियर खत्म हो जाता है। ज्‍यादातर खिलाडि़यों से यह गलती होती है। यह सब चीजें भी फिल्‍म का हिस्‍सा होंगी।  

Thursday, October 12, 2017

रोज़ाना : मामी हो चुका है नामी



रोज़ाना
मामी हुआ चुका है नामी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
आज से दस साल पहले इफ्फी (इंटरनेशनल फिल्‍म फेस्टिवल ऑफ इंडिया) के वार्षिक आयोजन के लिए देश भर के सिनेप्रेमी टूट पड़ते थे। उन दिनों केंद्रीय फिल्‍म निदेशालय का यह यह आयोजन एक साल दिल्‍ली और अगले साल दूसरे शहरों में हुआ करता था। गोवा में इफ्फी का स्‍थायी ठिकाना बना और उसके बाद यह लगामार अपना प्रभाव खोता जा रहा है। अभी देश में अनेक फिल्‍म फेस्टिवल आयोजित हो रहे हैं। उनमें से एक मामी(मुंर्अ एकेडमी आॅफ मूविंग इमेजेज) है। इस साल 19 वां फिल्‍म फेस्टिवल आयोजित हो रहा है। इस आयोजन के लिए देश भर के सिनेप्रेमी मुंबई धमक रहे हैं।
दोदशक पहले मुंबई के फिल्‍म इंडस्‍ट्री की हस्तियों और सिनेप्रेमियों को फिल्‍म फस्टिवल का खयाल आया। इफ्फी में नौकरशाही की दखल और गैरपेशवर अधिकारियों की भागीदारी से नाखुश सिनेप्रेमियों और फिल्‍मकारों का इसे पूर्ण समर्थन मिला। उन्‍हें यह एहसास भी दिलाया गया कि यह फेस्टिवल सिनेमा के जानकारों की देखरेख में संचालित होता है। उसका असर दिखा। फिल्‍मों के चयन से लेकर विदेशी फिल्‍मकारों और कलाकारों की शिरकत में दुनिया के नामी व्‍यक्तियों को निमंत्रित किया गया। देश के स्‍वतंत्र निर्माताओं की फिल्‍मों को तरजीह दी गई। 21 वीं सदी में उभर रही नए तेवर की फिल्‍मों को इस फेस्टिवल में सम्‍मान मिला। नतीजा यह हुआ कि प्रतिष्‍ठा और लोकप्रियता में मामी ने इफ्फी का स्‍थान हासिल कर लिया। अब यह फेस्टिवल देश भर के सिनेप्रेमियों के सालाना कैलेंडर में शामिल है।
जरूरी है कि मामी की तरह के फिल्‍म फस्टिवल देश की प्रमुख शहरों में आयोजित हों। उनमें कलाकार और फिल्‍मकार भी शामिल हों। सिनेमाई चेतना के बाद ही फिल्‍मों का संस्‍कार हो सकता है। हम रोना राते रहते हैं कि हिंदी और अन्‍य भारतीय भाषाओं में अच्‍छी फिल्‍में नहीं बन रही हैं। गौर करें तो भारतीय समाज और मीडिया में सिनेमा को कभी आदर से देखा ही नहीं गया। सिनेमा का मतलब गॉसिप और रसदार खट्टी-मीठी कहानिसां हो गई हैं। इन दिनों तो कलाकारों के अभिनय और श्ल्पि से अधिक उनकी जीवनशैली पर बातें होती हैं। ऐसे माहौल में बेहतर सिनेमा का विकास असंभव है। दर्शक तो कम होंगे ही।
अभी तकनीकी सुविधाओं की वजह से हर कोई विश्‍व भर का सिनेमा घर बैठे देख सकता है। सवाल होता है कि फिर फिल्‍म फेस्टिवल के आयोजन में क्‍या तुक है? तुक है। फिल्‍म फस्टिवल में दर्शकों की साूहिकता और फिल्‍मों के बारे में चल रही चर्चाएं और गोष्ठियां हमारे रसास्‍वादन को समृद्ध करती हैं। हमें बेहतर फिल्‍में देखना और उन्‍हें सराहना सिखाती हैं। जागरण फिल्‍म फेस्टिवल के तहत 16 शहरों में दर्शकों से मेलजोल में मैंने पाया है कि वे लाभान्वित होने के साथ मुखर भी होते हैं। वे सिनेमा के प्रति सीरियस होते हैं। और कुछ तो फिल्‍में बनाने के लिए निकल पड़ते हैं।

Wednesday, October 11, 2017

रोज़ाना - पचहत्‍तर के अमिताभ बच्‍चन



दरअसल...
75 के अमिताभ  बच्‍चन
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अगले शुक्रवार से पहले अमिताभ बच्‍चन 75 के हो जाएंगे। उनका जन्‍म 11 अक्‍टूबर 1942 को हुआ था।
दो दिनों पहले उभरते और पहचान बनाते एक्‍टर इश्‍त्‍याक खान से मुलाकात हुई। उन्‍होंने पिछले दिन अमिताभ बच्‍चन के साथ एक ऐड की शूटिंग की थी। जिज्ञासावश मैंने पूछा कि कैसा अनुभव रहा और उनके बारे में क्‍या कहना चाहेंगे? इश्‍त्‍याक ने तपाक से जवाब दिया, इस उम्र में इतना काम कर चुकने के बाद भी सेट पर उनकी तत्‍परता चकित करती है। उन्‍होंने क्‍या-क्‍या नहीं कर लिया है,लेकिन उस ऐड में भी उनकी संलग्‍नता से लग रहा था कि वह उनका पहला काम हो। वही उत्‍साह और समर्पण...हम जैसे एक्‍टर अनेक कारणों से अपनी एकाग्रता खो देते हैं। अमिताभ बच्‍चन 75 के उम्र में किसी प्रकार की चूक से बचना चाहते हैं। अमिताभ बच्‍चन की इस खासियत को सभी दोहराते हैं। सेट पर वे खाने-पीने,आराम करने,मेकअप करने और जरूरी एक्‍सरसाइज करने के अलावा अपने वैन में नहीं बैठते। उनके हाथों में स्क्रिप्‍ट रहती है। वे अपनी पंक्तियों को दोहराते रहते हैं। कोएक्‍टर के साथ रिहर्सल करने में रुचि रखते हैं। निर्देशकों के निर्देश से इधर-उधर नहीं जाते। वे अपनी फिल्‍मों और कामयाबी का सारा ज्ञेय निर्देशकों को देते हैं। इधर दो सालों से वे लेखक की महत्‍ता और केंद्रीय योगदान के बारे में बोलने लगे हैं।
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में 75 पार कर चुके कई अभिनेत्री-अभिनेता हैं,लेकिन उनमें से कोई भी अमिताभ बच्‍चन की तरह सक्रिय नहीं है। बाज दफा सोचना पड़ता है कि उम्र बढ़ने के साथ उनके काम की गति बढ़ती गई है। इन दिनों वे रोबोट की तरह काम करने लगे हैं। सुबह से देर रात वे एक्टिव रहते हैं। एक बार अभिषेक बच्‍चन ने मजाक में कहा था कि मेरे डैड घर आने के बाद भी कुछ समय तक अमिताभ बच्‍चन ही रहते हैं...तात्‍पर्य यह था कि अमिताभ बच्‍चन पूरी ऊर्जा और लगन से अपनी छवि को जीते हैं। तदनुकूल व्‍यवहार करते हैं। उनके जीवन में सब कुछ पना-तुला और व्‍यवस्थित है। मेरा अनुभव रहा है कि वे टाल-मटोल करते ही नहीं हैं। आप इंटरव्‍यू और मुलाकात के लिए आग्रह करें तो कुछ घंटों के अंदर जवाब आ जाता है कि वह हो पाएगा या नहीं? उन्‍होंने कभी देखते,सोचते हैं,बताते हैं जैसी क्रियाओं का इस्‍तेमाल नहीं किया। 75वीं सालगिरह के मौके पर बातचीत का आग्रह संदेश भेजने पर उनकी दो पंकित्‍यों के उत्‍तर में तीन बार क्षमा शब्‍द का इस्‍तेमाल था। यह शालीनता और विनम्रता दुर्लभ है।
अमिताभ बच्‍चन अपनी फिल्‍मों और विज्ञापनों के साथ कई सामाजिक कार्यों में भी व्‍यस्‍त रहते हैं। भारत सरकार से लेकर यूएन जैसी इंटरनेशनल संस्‍थाओं के लिए मुफ्त में अपनी सेवाएं देते हैं। वे हर मौके पर हर जगह उपलब्‍ध रहते हैं। टाइम मैनेजमेंट उनसे सीखना चाहिए। मुंबई की अस्‍त-व्‍यस्‍ज ट्रैफिक में भी उन्‍हें कहीं विलंब से पहुंचते नहीं देखा गया। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में पुरानी कहावत है कि आप अमिताभ बच्‍चन से अपनी घड़ी मिला सकते हैं।
हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में निष्‍णात अमिताभ लिखते समय अंग्रेजी शब्‍दों को रोमन में लिखना पसंद करते हैं। इसी प्रकार हिंदी शब्‍दों को कभी रोमन में नहीं लिखते। उन्‍हं अपनी स्क्रिप्‍ट हिंदी में चाहिए होती है। स्क्रिप्‍ट में लिखे संवादों में वे अपनी संवाद अदायगी की सुविधा के लिहाज से पॉज लगाते हैं। शूटिंग में कैमरे के सामने जाने के पहले वे अपने दृश्‍यों और संवादों को अच्‍छी तरह समझ लेते हैं। उन्‍हें सेट पर कभी किसी निर्देशक से उलझते नहीं देखा गया। अमिताभ बच्‍चन फिल्‍मों और अन्‍य वीडियो सामग्रियों की डबिंग का काम सुबह में करना पसंद करते हैं। ज्‍यादातर नौजवान जब तलक पहली खय पीने की युक्ति में लगे रहते हैं,तब तक अमिताभ बच्‍चन एक-दो काम निबटा चुके होते हैं। देर रात तक उन्‍हें काम करते हुए देखा जा सकता है। उनके ब्‍लॉग,फेसबुक और ट्ीटर की देर रात की एंट्री से यह जाहिर है।
अमिताभ बच्‍चन दीर्घायु हों और ताजिंदगी सक्रिय रहें। हां,वे अपने अभिनय की शैली और फिल्‍मों के बारे में भी विस्‍तार से बताने का कष्‍ट करें।

Sunday, October 8, 2017

बाबूजी के बेटे - अजय ब्रह्मात्‍मज



अमिताभ बच्चन से हुई यादगार साहित्यक बातचीत : 
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अमिताभ बच्चन अपने बाबूजी की बातों का उल्लेख करते समय सिर्फ एक कवि के बेटे होते हैं। उन्हें अपनी विशाल छवि याद नहीं रहती। बाबूजी की रचनाओं के प्रति उनके कौतूहल और गर्व को उनके ब्लॉग और ट्वीट में पढ़ा जा सकता है। 

वर्ष 2008 की बात है। उनके बाबूजी हरिवंश राय बच्चन की जन्म शताब्दी का साल था। अचानक ख्याल आया कि क्यों न उनके बाबूजी हरिवंश राय बच्चन के बारे में बातें की जाएं। मैंने आग्रह के संदेश के साथ इंटरव्यू का विषय भी बता दिया। पूरी बातचीत उनके कवि और साहित्यकार बाबूजी हरिवंश राय बच्चन के बारें में होंगी। वह सहर्ष तैयार हो गए । स्थान, समय और तारीख निश्चित हो गई। 
हालांकि वह भी औपचारिक मुलाकात थी,लेकिन मैं परेशान था कि फिल्म इंडस्ट्री के ख्यातिलब्ध कद्दावर स्टार को इस मुलाकात में मैं क्या भेंट कर सकता हूं? ऊहापोह और असमंजस के बीच मैंने तय किया कि जेएनयू में अपने सीनियर और मित्र गोरख पांडे की कविता समझदारों का गीतले चलूं। दो पृष्ठों की इस कविता में गोरख पांडे ने कथित समझदारों के विरोधाभास और पाखंड को भावपूर्ण गहराई के साथ व्यक्त किया है। दो पृष्ठों की गोरख पांडे की कविता की वह भेंट मेरे लिए तब अमूल्य हो गई,जब मैंने देखा कि अगले दिन उनके ब्लॉग की 218वीं प्रविष्टि में उस कविता की स्कैन कॉपी लगी है। साथ में उस कविता का अंग्रेजी अनुवाद भी है। संभवत: किसी समकालीन हिंदी कवि का अमिताभ बच्चन द्वारा किया गया यह अकेला अनुवाद है। 
अमिताभ बच्चन से मेरी मुलाकातें पहले हो चुकी थीं। वरिष्ठ फिल्म पत्रकार सुमंत मिश्र के इंटरव्यू में मैं भी उनके साथ जलसा गया था। उसके बाद भी दैनिक जागरण के फिल्म प्रभारी के तौर पर उनके अनेक इंटरव्यू किए। वे सारे इंटरव्यू पहले जलसा और बाद में उनके कार्यालय जनक में होते रहे। इस बार उन्होंने प्रतीक्षा में बुलाया था। प्रतीक्षा उनका जलसा से पहले का आवास है। वहां वे अपने माता-पिता के साथ रहा करते थे। उनके पिता और मां की मुंबई की सारी यादें प्रतीक्षा में रची- बसी हैं। उनके माता-पिता ने प्रतीक्षा में ही अंतिम सांसें ली थीं। बाबूजी का कमरा उनके मृत्यु के दिन की तरह जस का तस रखा हुआ है। प्रतीक्षा के आंगन के बरामदे में हमारी एक घंटे लंबी बातचीत में अमिताभ बच्चन की साहित्यक अभिरूचि और बाबूजी की रचनाओं के प्रति लगाव की झलक मिलती है। मैंने हरिवंश राय बच्चन के एक कथन की याद दिलाते हुए उनसे पूछा कि कभी उनके पुस्तकालय में  आग लग जाए तो वह क्या लेकर भागेंगे? अमिताभ बच्चन ने एक पंक्ति में जवाब दिया था- मैं तो उनकी रचनावली लेकर भागूंगा।
कम लोग जानते होंगे कि अमिताभ बच्चन के शयन कक्ष से लेकर कार्यालक तक बच्चन रचनावली का पूरा सेट रहता है।  वह कभी शूट पर कुछ दिनों के लिए बाहर जाते हैं तो बच्चन रचनावली का सेट भी निजी और आवश्यक सामग्री के तौर पर उनके साथ रहता है। जीवन के हर पहलू और प्रश्न पर उद्धरित करने के लिए अमिताभ बच्चन अपने बाबूजी की रचनाओं से उपयुक्त पंक्तियां खोज निकालते हैं। वह अपने बाबूजी की रचनाओं से प्रेम करते हैं। उनकी योजनाओं में बाबूजी की स्मृति में संग्रहालय स्थापित करना भी है। वह हरिवंश राय बच्चन से संबंधित सारी सामग्री एकत्र कर रहे हैं। सभी जानते हैं कि हरिवंश राय बच्चन निरंतर पत्राचार करते थे। अभी उनके भेजे गए पत्रों को जहां तहां से एकत्र किया जा रहा है। आप कभी उनसे उनके बाबूजी के समय कवि सम्मेलनों और उनके समकालीनों की बातें करें तो वह घंटों अबाध बातें कर सकते हैं। बाबूजी के बारे में उनसे की गई बातचीत दो हिस्सों में दैनिक जागरण के साहित्यिक परिशिष्ट पुनर्नवामें छपी थी। स्वयं अमिताभ बच्चन ने 2012 में सालों बाद उस इंटरव्यू के लिंक अपने ब्लॉग 1608वीं प्रविष्टि में दिए थे और उनके बारे में लिखा था। फिल्म पत्रकारिता के लंबे प्रवास में अमिताभ बच्चन से की गई वह साहित्यिक बातचीत मेरे लिए अमूलय और विस्मरणीय है। 
उसदोपहर उन्‍होंने बाबूजी की यादों से संबंधित सारी चीजें उत्‍साह के साथ दिखाई थीं। उन्‍हें छूते और बताते हुए वे विह्वल हो रहे थे। पहली बार मैा सुपरस्‍टार अमिताभ बच्‍चन की कवि और साहित्‍यकार हरिवंश राय बच्‍चन के बेटे अमिताभ बच्‍चन से मिल रहा था।

Saturday, October 7, 2017

रोज़ाना : निर्देशक बनने की ललक



रोज़ाना
निर्देशक बनने की ललक
-अजय ब्रह्मात्‍मज
फिल्‍मों में निर्देशक को कैप्‍टन ऑफ द शिप कहते हैं। निर्देशक की सोच को ही फिल्‍म निर्माण से जुड़े सभी विभागों के प्रधान अपनाते हैं। वे उसमें अपनी दक्षता और योग्‍यता के अनुसार जोड़ते हैं। उनकी सामूहिक मेहनत से ही निर्देशक की सोच साकार होकर फिल्‍म के रूप में सामने आती है। निर्देशक की सोच नियामक भूमिका निभाती है। फिल्‍म निर्माण से जुड़े सभी कलाकार और तकनीशियन एक न एक दिन निर्देशक बनने का सपना रखते हैं। उन सभी में यह ललक बनी रहती है। इन दिनों यह ललक कुछ ज्‍यादा ही दिख रही है।
पहले ज्‍यादातर व्‍यक्तियों की दिशा और सीमा तय रहती थी। वे सभी अपनी फील्‍ड में महारथ हासिल कर उसके उस्‍ताद बने रहते थे। हां,तब भी कुछ क्रिएटिव निर्देशक बनते थे। गौर करे तो पाएंगे कि उन सभी को कुछ खास कहना होता था। कोई ऐसी फिल्‍म बनानी होती थी,जो चलन में ना हो। बाकी सभी अपनी फील्‍ड में ध्‍यान देते थे। पसंदीदा निर्देशक के साथ आजीवन काम करते रहते थे। महबूब खा,बिमल राय,राज कपूर और बीआर चोपड़ा जैसे दिग्‍गजों की टीम अंत-अंत तक साथ में का म करती रही। अभी किसी भी प्रोडक्‍शन हाउस में आप चले जाएं। आप पाएंगे कि वहां इंटर्न का काम रहे युवा प्रतिभा के पास खुद की एक स्क्रिप्‍ट,जिसे वह निर्देशित करना चाहता है। इसमें कोई बुराई नहीं है। नई प्रतिभाओं को अवसर मिलने चाहिए और नई प्रतिभाओं को कोशिश करते रहना चाहिए।
मुश्किल तब होती है,जब किसी एक फील्‍ड में माहिर व्‍यक्ति बगैर पूरी तैयारी के सिर्फ निर्देशक बनने की हड़बड़ी में डायरेक्‍टर्स चेयर पर विराजमान हो जाता है। मैंने देखा है कि एक बार निर्देशक का ठप्‍पा लगने के बाद वे अपनी फील्‍ड के लिए अयोग्‍य मान लिए जाते हैं। यही धारणा बनती है कि उनका ध्‍यान खास विधा की तरफ नहीं रहेगा। वे अपनी जुगत भिड़ाने में लगे रहेंगे। ऐसा देखा भी गया है कि किसी एक विभाग के सहायक अपे काम पर पूरा ध्‍यान देने के बजाय कलाकारों और निर्माताओं से संपर्क बढ़ाने में लगे रहते हैं। मौका मिलते ही वे उन्‍हें अनी स्क्रिप्‍ट सुना देते हैं। पांस सही गिरा तो उनका काम बन जाता है। अन्‍यथा उन पर नजर रखी जाने लगती है। वे शक के दायरे में आ जाते हैं।
भारतीय समाज में रोजगार और अवसर की असुरक्षा की वजह से ऐसा हो रहा है। कायदे से होना तो यह चाहिए कि अपनी फील्‍ड में पारंगत होने के बाद खुद को निर्देशन के योग्‍य समझने और कुछ खास कहने की की जरूरत महसूस करने के बाद ही निर्देशन की तरफ बढ़ना चाहिए। अभी आप आसपास देखें ले,ाक,गीतकार,कास्टिंग डायरेक्‍टर,म्‍यूजिक डायरेक्‍टर,कैमरामैन...सभी के सभी निर्देशक बनने की ललक लिए विचर रहे हैं। 

Friday, October 6, 2017

फिल्‍म समीक्षा : शेफ




फिल्‍म समीक्षा
रिश्‍तों की नई परतें
शैफ
-अजय ब्रह्मात्‍मज
यह 2014 में आई हालीवुड की फिल्‍म शेफ की हिंदी रीमेक है। रितेश शाह,सुरेश नायर और राजा कृष्‍ण मेनन ने इसका हिंदी रुपांतरण किया है। उन्‍होंने विदेशी कहानी को भारतीय जमीन में रोपा है। मूल फिल्‍म देख चुके दर्शक सही-सही बता सकेगे कि हिंदी संस्‍करण्‍ में क्‍या छूटा है या क्‍या जोड़ा गया है? हिंदी में बनी यह फिल्‍म खुद में मुकम्‍मल है।
रोशन कालरा चांदनी चौक में बड़े हो रहे रोशन कालरा के नथुने चांदनी चौक के छोले-भठूरों की खुश्‍बू से भर जाते थे तो वह मौका निकाल कर रामलाल चाचा की दुकान पर जा धमकता था। उसने तय कर लिया था कि वह बड़ा होकर बावर्ची बनेगा। पिता को यह मंजूर नहीं था। नतीजा यह हुआ कि 15 साल की उम्र में रोशन भाग खड़ा हुआ। पहले अमृतसर और फिर दूसरे शहरों से होता हुआ वह अमेरिका पहुंच जाता है। वहां गली किचेन का उसका आइडिया हिंट हो जाता है। सपनों का पीछा करने में वह तलाकशुदा हो चुका है। उसका बेटा अपनी मां के साथ रहता है,जिससे उसकी स्‍काइप पर नियमित बात होती है।
गली किचेन की एक छोटी सी घटना में उसे अपनी नौकरी से ाथ धोना पड़ता है। उसी देने बेटे की फरमाइश आती है कि वह पहली बार स्‍टेज शो करने जा रहा है। क्‍या वे आ सकेंगे? असमंजस में डूबे रोशन की दुविध उसकी दोस्‍त खत्‍म करती है,जिसने उसी दिन रोशन की जगह किचने की कमान संभाली है। पुरुष-स्‍त्री की यह दोस्‍ती हिंदी फिल्‍मों के पर्दे पर बिल्‍कुल नई है। बहरहाल,रोशन बेटे के स्‍टेज शो के लिए कोच्चि पहुंचता है। वहीं वह तलाकशुदा बीवी के घर ही ठहरता है। आगे की कहानी यहां से बढ़ती है,जो भावनाओं के ज्‍वार-भाटा को समेटते हुए बाप-बेटे की अंतरंगता में खत्‍म होती है।
इस फिल्‍म में पैशन को फालो करने की बात बहुत खूबसूरत अंदाज में कही गई है। साथ ही उपभोक्‍ता समाज में दरकते संबंधों को भी चिह्नित किया गया है। एक बाप अपने बेटे की उच्‍च शिक्षा के लिए धन जुटाने की कोशिश और अपनी लगन में इस कदर डूब चुका है कि वह अपने बेटे के बचपन की हिलोरों से दूर जा चुका है। उसे डांटने-समझाने की उम्र में वह उसके साथ नहीं रह पाता। रोशन फिल्‍म के अंत तक आते-आते न केवल अपने बेटे से जुड़ता है,अल्कि अपने पिता को भी खाना पकाने की काबिलियत से गर्वीला एहसास देता है। फिल्‍म में रिश्‍तों की बुनावट आज की है। सभी अलग-थलग है,लेकिन किसी के मन में कटुता और मलाल नहीं है। तलाकशुदा जोड़े अक्‍सर बाद की मुलाकातों में मीन-मेख ही निकालते रहते हैं। यहां रोशन और उसकी बीवी की परस्‍पर समझदारी प्रभावित करती है। दोनों एक-दूसरे का खयाल रखते हैं और उनकी आगे की जिंदगी सुगम करने की कोशिश करते हैं।
यह फिल्‍म रिश्‍तों के खट्टे-मीठे अनुभवों को व्‍यवहार और आचरण में बड़े प्‍यार से ले आती है। फिल्‍म का विस्‍तार केरल,दिल्‍ली,अमृतसर और अमेरिका है,लेकिन सफर में पता ही नहीं चलता की कहानी ने गियर बदल लिया। लेखक और संवाद लेखक ने फिल्‍म को मुलायम और सटीक बना दिया है। रितेश शाह के संवादों में 21 वीं सदी के दूसरे दशक के एहसास के शब्‍दार्थ हैं। वे रिश्‍तों की नई परतों से परिचित कराते हैं।
फिल्‍म में उपयुक्‍त कलाकारों का चयन भी उल्‍लेखनीय है। उत्‍तर-दक्षिण के किरदारों और परिवेश को जोड़ती यह फिल्‍म अखिल भारतीय अपील रखती है। कलाकारों में सैफ अली खान एक ठहराव के साथ मौजूद हैं। पत्‍नी की भूमिका में पद्म प्रिया जंचती है। बांग्‍लादेशी दोस्‍त के रूप में चंदन रॉय सान्‍याल ने विश्‍वसनीय सहयोग ि‍दया है। अेटे की भूमिका में धनीश करर्तिक उल्‍लेखनीय हैं। रोशन के पिता की छोटी भूमिका में रामगोपाल बजाज की आंखें अलग से सवाल करती और बोलती हैं।
यह फिल्‍म अपने अप्रोच में शहरी है। कुछ संवाद अंग्रेजी में हैं।
अवधि- 130 मिनट
***1/2 साढ़े तीन स्‍टार
 

Thursday, October 5, 2017

रोज़ाना : खलनायक बना प्रेमी



रोज़ाना
खलनायक बना प्रेमी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण का प्रेम छिपा नहीं है। दोनों फिल्‍मी पार्टियों और अंतरंग मित्रों के इवेंट में एक साथ नजर आते हैं। वे अपनी अंतरंगता जाहिर करने में भी नहीं झिझकते। दीपिका पादुकोण ऐसे अवसरों पर शांत और सौम्‍य दिखती हैं,जबकि रणवीर सिंह अपनी छवि के अनुरूप उत्‍कट और उत्‍साही प्रेमी के रूप में आकर्षित करते हैं। दोनों अपने करिअर के उठान पर हैं। वे सधी गति से आगे बढ़ रहे हैं। संजय लीला भंयसाली की पद्मावती में वे तीसरी बार एक साथ नजर आएंगे। फर्क यह रहेगा कि इस बार प्रेमी के आवेश में होने के बावजूद वे खलनायक के रोल में रहेंगे। संजय लीला भंसाली की ही रामलीला-गोलियां की रासलीला और बाजीराव मस्‍तानी में हम उन्‍हें उद्दाम प्रेमी के रूप में देख चुके हैं। दोनों ही फिल्‍मों में उनकी जोड़ी पसंद की गई।
देखा गया है कि पर्देपर नायक-नायिका की भूमिका निभा रहे निजी जीवन में एक-दूसरे के करीब या प्रेमी हों तो उनके बीच की केमिस्‍ट्री फिल्‍म के दृश्‍यों में बिखरी दिखती है। ऐसी अनेक जोडि़यों की फिल्‍मों के नाम गिनाए जा सकते हैं। निश्चित ही अभिनेता-अभिनेत्री की अंतरंगता भावमुद्राओं में साफ झलकती है। कई बार ऐसा भी हुआ है कि फिल्‍म बनने के दौरान या किसी और वजह से अभिनेता-अभिनेत्री की निकटता नहीं रही तो भी पर्दे पर रोमांटिक दृयों को करते समय वे भान नहीं होने देते कि उनके बीच लकीर खींच चुकी है। हाल ही में जग्‍गा जासूस देखते समय एहसास नहीं हुआ कि रण्‍बीर कपूर और कट्रीना कैफ अलग हो चुके हैं। फिल्‍म के दृश्‍यों और संवादों के अलावा वे एक-दूसरे की तरफ देखते भी नहीं थे...बात करने का तो सवाल ही नहीं उठता।
एक तीसरा पहलू भी दिखा। रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण निजी जीवन में अलग होनो के बाद ये जवानी है दीवानी और तमाशा में एक साथ आए। उन्‍होंने रत्‍ती भर एहसास नहीं होन दिया कि उनके बीच अब पहले जैसी बात नहीं रही। दोनों ने पूरे प्रोफेशनल तरीके अपने किरदारों को निभाया और दृश्‍यों की जरूरत के मुताबिक प्रेम भी बरसाया। दोनां फिल्‍मों में दोनों को दर्शकों ने पसंद किया। आज के दौर में अब संबंध विच्‍छेद होने पर भी पहले जैसी कटुता नहीं रहती। पहले तो हीरोइनों को फिल्‍म से निकलवाने या हीरो के साथ काम करने से इंकार करने के किस्‍से आम हैं। इन दिनों भूतपूर्व प्रेमी पर्दे पर प्रेम का अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हैं।
पद्मसवतीद्ध में रणवीर सिंह की चुनौती अलग रही है। इस फिल्‍म में वे सुल्‍तान अलाउद्दी खिलजी की भूमिका में हैं। खिलजी पद्मावती से प्रेम करता है,लेकिन पद्मावती उसे बिल्‍कुल नापसंद करती है। अपने सतीत्‍व की रक्षा के लिए वह जौहर भी कर लेती है। देखना रोचक होगा कि निजी जीवन में प्रेम के झूले पर सवार रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण पर्दे पर कैसे घृणा,वितृष्‍णा और खल भाव को ला पाते हैं? शॉट के पहले तक लाड़ बरसा रहे प्रेमी कैसे शॉट में एक-दूसरे के खिलाफ शब्‍द उगल रहे होंगे? रणवीर सिंह के लिए थोड़ा आसान होगा,क्‍योंकि खिलजी तो पद्मावती के प्रेम में बिंधा था। मुश्किल दीपिका पादुकोण की होगी,क्‍योंकि पद्मावती ख्लिजी को फूटी आंख भी नहीं सुहाता था।   

Wednesday, October 4, 2017

रोज़ाना : वरुण धवन की भाषा और आवाज





रोज़ाना
वरुण धवन की भाषा और आवाज
-अजय ब्रह्मात्‍मज
फिलहाल अपनी पीढ़ी के अभिनेताओं में वरुण धवन सबसे आगे निकलते नजर आ रहे हैं। उनकी पिछली फिल्‍म जुड़वां 2 ने जबरदस्‍त बिजनेस किया है। सोमवार तक के चार दिनों में इस फिल्‍म ने 75 करोड़ से अधिक का कलेक्‍शन कर वरुण धवन के स्‍टारडम को ठोस आधार दे दिया है। 2012 में आई स्‍टूडेंट ऑफ द ईयर से अभी तक के पांच सालों में वरुण धवन ने वैरायटी फिल्‍में दी हैं। उनकी फिल्‍में सफल भी हो रही हैं। इसी पांच साल में उन्‍होंने एक फ्रेंचाइजी ....दुल्‍हनिया फिल्‍म भी कर ली है। जल्‍दी ही वे शुजित समरकार और सशराज फिल्‍म्‍स की फिल्‍मों में भी नजर आएंगे। कह सकते हैं कि वे इन दिनों बड़े बैनरों और बेहतरीन डायरेक्‍टर के साथ फिल्‍में कर रहे हैं।
पिछले हफ्ते आई फिल्‍म में हम ने उन्‍हें सलमान खान और गोविंदा के मिक्‍स अवतार में देखा। गौर करें तो उनके पिता डेविड धवन ने गोविंदा और सलमान खान के साथ हिंदी फिलमों की कामेडी का नई दिशा दी थी। उसमें एक नयापन तो था। और फिर दोनों सिद्धहस्‍त कलाकारों की कॉमिक टाइमिंग और द्विअर्थी संवादों के खास दर्शक थे। वैस दर्शक आज भी मौजूद हैं। हां,बीस साल पहले के सिंगल स्‍क्रीन के दर्शक अब मल्‍टीप्‍लेक्‍स में आ गए हैं। संवादों में शिष्‍टता का दबाव बड़ा है,लेकिन दृश्‍यों का भेंडपान बदस्‍तूर जारी है। सुधी दर्शक खिन्‍न होकर भिन-भिन करते रहें। सच्‍चाई यही है कि जुड़वां 2 के बिजनेस ने डेविड धवन का खोश आत्‍मविश्‍वास लौटा दिया है। उनके बेटे वरुण धवन के दर्शक बढ़ गए हैं।
इस कामयाबी के बीच वरुण धवन की भाषा और आवाज खटकती है। जुड़वां और उसके पहले की फिल्‍मों में भी उनका उच्‍चारण दोष स्‍पष्‍ट है। अंग्रेजी मीडियम से पढ़ कर आए फिल्‍म कलाकारों की हिंदी में भाषा का ठेठपन नहीं रहता। हां,अभ्‍यास से वे उसे हासिल कर सकते हैं,लेकिन उसके लिए उन्‍हें जिम में जाने जैसी तत्‍परता और नियमितता निभानी पड़ेगी। साथ ही उनकी आवाज किरदारों के अनुकूल नहीं हो पाती। वे इस पर मेहनत करते भी नहीं दिखते। हिंदी ट्यूटर और वॉयस इंस्‍ट्रक्‍टर रख कर दोनों कमियों को दूर किया जा सकता है। अगर वरुण धवन को हिंदी फिल्‍मों में लंबी पारी खेलनी है। खानत्रयी और अमिताभ बच्‍चन जैसी दीर्घ लोकप्रियता हासिल करनी है तो उन्‍हें अपनी भाषा और आवज पर धान देना होगा। मुंबईकरों की हिंदी में और , और , और के भिन्‍न उच्‍चारण की दिक्‍कतें आम हैं। वे शब्‍दों के आखिरी अक्षर पर लगे अनुस्‍वार का सही उच्‍चारण नहीं कर पाते। हैं को है बोलना आम है। बोलते समय सही ठहराव और उतार-चढ़ाव से संवाद का प्रभाव और आकर्षण बढ़ता है। हिंदी का अभ्‍यास हो तो संवादों में आवश्‍यक भाव लाया जा सकता है।

Tuesday, October 3, 2017

रोज़ाना : नसीरुद्दीन शाह का नजरिया



रोज़ाना
नसीरुद्दीन शाह का नजरिया
-अजय ब्रह्मात्‍मज

कई बार नसीरूद्दीन शाह का इंटरव्‍यू पढ़ते और सुनते समय ऐसा लगता है कि एक असाधारण एक्‍टर औसत सी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में फंस गया है। वह बेमन से सारे काम कर रहा है। हिदी फिल्‍मों के साथ उनका रिश्‍ता सहज नहीं है। उन्‍हें फिल्‍म इंडस्‍ट्री की अधिकांश बातें और रवायतें अच्‍छी नहीं लगतीं। वे मौका मिलते ही शिकायती ल‍हजे में गलतियां गिनाने और कमियां बताने लगते हैं। उन्‍हें पढ़ते-सुनते समय एहसास जागता है कि आखि सब कुछ इतना गलत और कमतर है तो वे यहां क्‍यों फंसे हुए हैं? क्‍यों साधारण और कई बार घटिया भूमिकाओं की फिल्‍में करते हैं?

आठवें दशक मेंश्‍याम बेनेगल केनेतृत्‍व में जारी और प्रशंसित पैरेलल सिनेमा हिंदी फिल्‍मों केइतिहास का उल्‍लेखनीयहिस्‍सा रहा है। इसदौर में अनके यथार्थवादी फिल्‍मकार आए,जिन्‍होंने मेनस्‍ट्रीम सिनेमा केकमर्शियल स्‍टारों के पैरेलल दमदार कलाकारों को लेकर भावपूर्ण और सारगर्भित फिल्‍में बनाईं। नसीरूद्दीन शाह,शबाना आजमी,स्मिता पाटिल और ओम पुरी उस दौर के प्रमुख कलाकार रहे। उनकी सफलता और पहचान ने थिएटर में सक्रिय कलाकारों को फिल्‍मों में आने की हिम्‍मत दी। पैरेलल फिल्‍मों से पहचान और प्रतिष्‍ठा हासिल करने के बावजूद नसीरूद्दीन साहब कभी उस दौर और सिनेमा के प्रति कृतज्ञता नहीं जाहिर करते। मौका मिलते ही वे दोष भी मढ़ते हैं। कमियां बतानी चाहिए,लेकिन खुद के काम और संलग्‍नता से साफ मुकर जाने को क्‍या कहेंगे?

इन दिनों वे पुरानी फिल्‍मों की कमियों के बारे में खुल कर बोलने लगे हैं। उनकी कुछ बातों का ठोस आधार है,लेकिन उनका यह कहना कि मुझे उस समय भी गलत लग रहा था...यह बात पचती नहीं। उम्र बढ़ने और अनुभव होने के बाद हम अपनी जवानी के कामों को अलग और क्रिटिकल नजरों से देखने लगते हैं। हमें अपनी भूलें और कमजोरियां समझ में आती हैं। यह आज की दृष्टि होती है। यह कहना कि मुझे उसी समय कमी दिखरही थी,कहीं न कहीं सोच और समझदारी का विरोधाभासजाहिर करती है। गलत लगने के बावजूद संलग्‍न रहना तो एक प्रकार से अपनी ईमानदारी से समझौता करना हुआ। संदेह होता है कि या तो आप उस समय ईमानदार नहीं थे या अभी नहीं हैं।

भला नसीरूद्दीन साहब की काबिलियत से कौन इंकार कर सकता है? उन्‍होने अनेक सार्थक और महत्‍वपूर्ण फिल्‍में की हैं। अपने समकालीनों और आगे-पीछे की पीढ़ी में भी उनका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं दिखता। उनका योगदार अनपैरेलल है। वे अभिनय के आदर्श और मानक हैं। कभी रिसर्च हो और रेफरेंस खोजे जाएं तो पताचलेगा कि नसीर साहब ने हिंदी फिल्‍मों में अभिनय की शैनी को निर्णायक ढंग से प्रभावित किया है। वे फिल्‍मों के साथ रंगमंच पर भी सक्रिय हैं। वे अनुकरणीय कार्य कर रहे हैं। बस,उनकी नकारात्‍मकता उनकी विशाल छवि के आड़े आती है।

Saturday, September 30, 2017

रोज़ाना : मां के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीकी -अजय ब्रह्मात्‍मज



रोज़ाना
मां के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीकी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले दिनों मां-बेटे की एक तस्‍वीर सोशल मीडिया पर घूम रही थी। इस तस्‍वीर में नवाजुद्दीन सिद्दीकी एक बुजुर्ग औरत के साथ खड़े हैं। उन्‍होंने अपनी बुजुर्ग औरत के बाएं कंधे को हथेली से कस के थाम रखा है। बुजुर्ग औरत ने नवाजुद्दीन के दाएं कंधे को अपनी हथेली से थाम रखा है। गौर करने पर पता चलता है कि वह बुजुर्ग औरत और कोई नहीं नवाजुद्दीन की मां हैं। उनका नाम मेहरू‍िनिसा सिद्दीकी है। उन्‍हें इस साल बीबीसी ने भारत की 100 प्रभावशाली महिलाओं में चुना है। नवाजुद्दीन सिउद्दीकी मां को मिले इस सम्‍मान से खुश हैं। वे इस सम्‍मनान को विशेष और अपने सभी सम्‍मानों से श्रेष्‍ठ मानते हैं।
नवाजुद्दीन सिद्दीकी बेहिचक बतोते हैं कि उनकी मां अनपढ़ थीं। नौ बच्‍चों के लालन-पालन के साथ उन्‍होंने पढाई-लिखाई सीखी। बच्‍चों के स्‍कूल जाने के साथ उनमें भी पढ़ाई की उमंग जागी। नवाजुद्दीन कहते हैं कि उनकी मां ने हमेशा पढ़ाई-लिखाई पर ध्‍याान देने की हिदायत दी। साथ ही यह भी समझाया कि जिस फील्‍ड में भी जाना हो,उसकी ट्रेनिंग लेनी चाहिए। मां की सीख से ही नवाजुद्दीन एनएसडी पहुंचे। उनके समर्थन और आर्शीवाद से उन्‍होंने हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में पैर टिकाने के लिए लंबा संघर्ष किया। आज वे तन कर खड़े हैं। अपनी खास पहचान के साथ कामयाब हैं। उनकी इस कामयाबी का श्रेय मां को भी जाता है।
ऐसी प्रेरणादायी मां पर गर्व तो होना ही चाहिए। मध्‍यवर्गीय परिवारों से आए सफल कलाकार क्‍या आम जीवन के दूसरे क्षेत्रों के कामयाब व्‍यक्ति भी अपनी गरीब पृष्‍ठभूमि के बारे में बातें करने से हिचकिचाते हैं। अपने परिवार और मां-बाप को चर्चा और उल्‍लेख से बाहर रखते हैं। इस संदर्भ में नवाजुद्दी सिद्दीकी की तारीफ करनी होगी कि उन्‍होंने अपनी पृष्‍ठभूमि को कभी ढांप के नहीं रखा। उसके बारे में बातें कीं और अपने भाई-बहनों की तरक्‍की के लिए मदद की। आज वे देश के परिचित स्‍टार हैं। अपनी मेहनत और योग्‍यता से समृद्धि हासिल की है। इस समृद्धि में उन्‍होंने परिजनों को शामिल किया है।
नवाजुद्दीन की मां अपने गांव में बच्‍चों की पढ़ाई पर ध्‍ययान देती हैं। खुद भी पढ़ाती हैं। उन्‍होंने अभी तक 300 से अधिक बच्‍चों को पढ़ाया है। ऐसी मांएं प्रेरणा बनती हैं। बेटे की कामयाबी से उनका भी रुतबा बढ़ा होगा। उससे भी बड़ी बात है कि बेटे ने उन्‍हें साथ रखा है और उन पर गर्व करता है। इस तस्‍वीर में दोनों की आंखों की चमक उनके मन के भाव जाहिर करती है। दोनों आश्‍वस्‍त और आबद्ध हैं। धन्‍य है नवाजुद्दीन और उनकी मां।

रोज़ाना : मां के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीकी



रोज़ाना
मां के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीकी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले दिनों मां-बेटे की एक तस्‍वीर सोशल मीडिया पर घूम रही थी। इस तस्‍वीर में नवाजुद्दीन सिद्दीकी एक बुजुर्ग औरत के साथ खड़े हैं। उन्‍होंने अपनी बुजुर्ग औरत के बाएं कंधे को हथेली से कस के थाम रखा है। बुजुर्ग औरत ने नवाजुद्दीन के दाएं कंधे को अपनी हथेली से थाम रखा है। गौर करने पर पता चलता है कि वह बुजुर्ग औरत और कोई नहीं नवाजुद्दीन की मां हैं। उनका नाम मेहरू‍िनिसा सिद्दीकी है। उन्‍हें इस साल बीबीसी ने भारत की 100 प्रभावशाली महिलाओं में चुना है। नवाजुद्दीन सिउद्दीकी मां को मिले इस सम्‍मान से खुश हैं। वे इस सम्‍मनान को विशेष और अपने सभी सम्‍मानों से श्रेष्‍ठ मानते हैं।
नवाजुद्दीन सिद्दीकी बेहिचक बतोते हैं कि उनकी मां अनपढ़ थीं। नौ बच्‍चों के लालन-पालन के साथ उन्‍होंने पढाई-लिखाई सीखी। बच्‍चों के स्‍कूल जाने के साथ उनमें भी पढ़ाई की उमंग जागी। नवाजुद्दीन कहते हैं कि उनकी मां ने हमेशा पढ़ाई-लिखाई पर ध्‍याान देने की हिदायत दी। साथ ही यह भी समझाया कि जिस फील्‍ड में भी जाना हो,उसकी ट्रेनिंग लेनी चाहिए। मां की सीख से ही नवाजुद्दीन एनएसडी पहुंचे। उनके समर्थन और आर्शीवाद से उन्‍होंने हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में पैर टिकाने के लिए लंबा संघर्ष किया। आज वे तन कर खड़े हैं। अपनी खास पहचान के साथ कामयाब हैं। उनकी इस कामयाबी का श्रेय मां को भी जाता है।
ऐसी प्रेरणादायी मां पर गर्व तो होना ही चाहिए। मध्‍यवर्गीय परिवारों से आए सफल कलाकार क्‍या आम जीवन के दूसरे क्षेत्रों के कामयाब व्‍यक्ति भी अपनी गरीब पृष्‍ठभूमि के बारे में बातें करने से हिचकिचाते हैं। अपने परिवार और मां-बाप को चर्चा और उल्‍लेख से बाहर रखते हैं। इस संदर्भ में नवाजुद्दी सिद्दीकी की तारीफ करनी होगी कि उन्‍होंने अपनी पृष्‍ठभूमि को कभी ढांप के नहीं रखा। उसके बारे में बातें कीं और अपने भाई-बहनों की तरक्‍की के लिए मदद की। आज वे देश के परिचित स्‍टार हैं। अपनी मेहनत और योग्‍यता से समृद्धि हासिल की है। इस समृद्धि में उन्‍होंने परिजनों को शामिल किया है।
नवाजुद्दीन की मां अपने गांव में बच्‍चों की पढ़ाई पर ध्‍ययान देती हैं। खुद भी पढ़ाती हैं। उन्‍होंने अभी तक 300 से अधिक बच्‍चों को पढ़ाया है। ऐसी मांएं प्रेरणा बनती हैं। बेटे की कामयाबी से उनका भी रुतबा बढ़ा होगा। उससे भी बड़ी बात है कि बेटे ने उन्‍हें साथ रखा है और उन पर गर्व करता है। इस तस्‍वीर में दोनों की आंखों की चमक उनके मन के भाव जाहिर करती है। दोनों आश्‍वस्‍त और आबद्ध हैं। धन्‍य है नवाजुद्दीन और उनकी मां।

फिल्‍म समीक्षा - जुड़वां 2

फिल्‍म रिव्‍यू

जुड़वां 2

-अजय ब्रह्मात्‍मज



20 साल पहले 9 से 12 शो चलने के आग्रह और लिफ्ट तेरी बद है की शिकायत का मानी बनता था। तब शहरी लड़कियों के लिए 9 से 12 शो की फिल्‍मू के लिए जाना बड़ी बात होती थी। वह मल्‍टीप्‍लेक्‍स का दौर नहीं था। यही कारण है कि उस आग्रह में रोमांच और शैतानी झलकती थी। उसी प्रकार 20 साल पहले बिजली ना होने या किसी और वजह से मैन्‍युअल लिफ्ट के बंद होने का मतलब बड़ी लाचारी हो जाती थी। पुरानी जुड़वां के ये गाने आज भी सुनने में अच्‍छे लग सकते हैं,लेकिन लंदन में गाए जा रहे इन गीतों की प्रसंगिकता तो कतई नहीं बनती। फिर वही बात आती है कि डेविड धवन की कॉमडी फिल्‍म में लॉजिक और रैलीवेंस की खोज का तुक नहीं बनता।

हिंदी फिल्‍मों के दर्शकों को अच्‍छी तरह मालूम है कि वरुण धवन की जुड़वां 2 1997 में आई सलमान खान की जुड़वां की रीमेक है। ओरिजिनल और रीमेक दोनों के डायरेक्‍टर एक ही निर्देशक डेविड धवन है। यह तुलना भी करना बेमानी होगा कि पिछली से नई अच्‍छी या बुरी है। दोनों को दो फिल्‍मों की तरह देखना बेहतर होगा।सलमान खान,करिश्‍मा कपूर और रंभा का कंपोजिशन बरुण धवन,तापसी पन्‍नू और जैक्‍लीन फर्नाडिस से बिल्‍कुल अलग है। दसरे इस बार पूरी कहानी लंदन में है। और हो,बहनों की भूमिकाएं छांट दी गई हैं। डेविड धवन ने पूरी फिल्‍म का फोकस अपने बेटे वरुण धवन पर रखा है। कोशिश यही है कि वह जुड़वां 2 से सनमान खान के स्‍टारडम की लीग में आ जाए। अगर यह औसत फिल्‍म आम तरुण दर्शकों को पसंद आ गई तो वरुण अपनी पीढ़ी के पहले सुपरस्‍टार हो जाएंगे।

फिल्‍म नाच-बानों और उछल-कूद से भरी है। सभी किरदार लाउड हैं। उनके बीच एक कंपीटिशन सा चल रहा है। यहां तक कि दो मिजाज के प्रेम और राजा भी आखिरकार लगभग एक जैसी छिदोरी हरकत करने लगते हैं। हिंदी फिल्‍मों का यह दुर्भाग्‍य ही है कि हमें छिदोरे नायक ही पसंद आते हैं। ऐसे नायक फिल्‍म की नायिकाओं को तंग करते हैं। छेड़खानी उनका पहला स्‍वभाव होता है। इन नायकों के लिए नायिका किसी वस्‍तु से अधिक नहीं होती। इसके अलावा फिल्‍म में दूसरे किरदारो(मोटे,तोतले,अफ्रीकी आदि) का मजाक उड़ाने में कोई झेंप नहीं महसूस की जाती। नस्‍लवादी और पुरुषवादी टिप्‍पणियों पर हंसाया जाता है। इस लिहाज से जुड़वां 2 पिछड़े खयालों और शिल्‍प की फिल्‍म है।

वरुण धवन ने प्रेम और राजा के जुड़वां किरदारों में अलग होने और दिखने की सफल कोशिश की है। दोनों भाइयों की आरंभिक भिन्‍नता एक समय के बाद घुलमिल जाती है। कंफ्यूजन बढ़ाने और हंसी लाने के लिए शायद स्‍क्रीनप्‍ले की यही जरूरत रही होगी। वरुण धवन की मेहनत बेकार नहीं गई है। फिल्‍म की सीमाओं में उन्‍होंने बेहतर प्रदर्शन किया है। वे तरुण दर्शकों को लुभाने की हर कोशिश करते हैं। तापसी पन्‍नू तो डेविड धवन की ही खोज हैं। बीच में दमदार भूमिकाओं की कुछ फिल्‍में करने के बाद वह अपने मेंटर की फिल्‍म में लौटी हैं,जो स्‍टारडम की तरफ उनका सधा कदम है। उन्‍होंने हिंदी फिल्‍मों की सफल स्‍टार होने के सभी लटके-झटके अपनाए हैं। वे बेलौस तरीके किरदार से नहीु जुड़ पातीं। इस मामले में जैक्‍लीन फर्नांडिस आगे हैं। जैक्‍लीन की सबसे बड़ी दिक्‍क्‍त और सीमा है कि वह प्रियंका चोपड़ा की नकल करती रहती हैं। लंबे समय के बाद लौटे राजपाल यादव कोशिशों के बावजूद वरुण से उम्र में बड़े और मिसफिट लगते हैं। अनुपम खेर,जॉनी लीवर,उपासना सिंह,मनोज पाहवा और सचिन खेडेकर इस फिल्‍म को बासी बनाते हैं। दर्शक इनके एकरंगी अभिनय से उकता चुके हैं। यकीन करें इनकी जगह नए कलाकार होते तो दृश्‍य अधिक रोचक होते।

मुबई के किरदार लंदन की परवरिश व पृष्‍ठभूमि के बाद जब पंजाबी गीत के बोल और ढोल पर ठ़मके लगाते हैं तो वे जुड़वां 2 को संदर्भ से ही काट देते हैं। हिंदी फिल्‍मों के निर्देशकों को पंजबी गीतों की गति और ऊर्जा के मोह से निकलना चाहिए।

अवधि 150 मिनट

** दो स्‍टार