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Friday, October 28, 2016

फिल्‍म समीक्षा : ऐ दिल है मुश्किल




उलझनें प्‍यार व दोस्‍ती की
ऐ दिल है मुश्किल
-अजय ब्रह्मात्‍मज
बेवजह विवादास्‍पद बनी करण जौहर की फिल्‍म ऐ दिल है मुश्किल चर्चा में आ चुकी है। जाहिर सी बात है कि एक तो करण जौहर का नाम,दूसरे रणबीर कपूर और ऐश्‍वर्या राय बच्‍चन की कथित हॉट केमिस्‍ट्री और तीसरे दीवाली का त्‍योहार...फिल्‍म करण जौहर के प्रशंसकों को अच्‍छी लग सकती है। पिछले कुछ सालों से करण जौहर अपनी मीडियाक्रिटी का मजाक उड़ा रहे हैं। उन्‍होंने अनेक इंटरव्‍यू में स्‍वीकार किया है कि उनकी फिल्‍में साधारण होती हैं। इस एहसास और स्‍वीकार के बावजूद करण जौहर नई फिल्‍म में अपनी सीमाओं से बाहर नहीं निकलते। प्‍यार और दोस्‍ती की उलझनों में उनके किरदार फिर से फंसे रहते हैं। हां,एक फर्क जरूर आया है कि अब वे मिलते ही आलिंगन और चुंबन के बाद हमबिस्‍तर हो जाते हैं। पहले करण जौहर की ही फिल्‍मों में एक लिहाज रहता था। तर्क दिया जा सकता है कि समाज बदल चुका है। अब शारीरिक संबंध वर्जित नहीं रह गया है और न कोई पूछता या बुरा मानता है कि आप कब किस के साथ सो रहे हैं?
ऐ दिल है मुश्किल देखते हुए पहला खयाल यही आता है कि इस फिल्‍म को समझने के लिए जरूरी है कि दर्शकों ने बॉलीवुड की अच्‍छी खुराक ली हो। फिल्‍मों,फिल्‍म कलाकारों,गायकों और संगीतकारों के नाम और काम से नावा‍किफ दर्शकों को दिक्‍कत हो सकती है। करण जौहर की इस फिल्‍म में प्‍यार और दोस्‍ती का एहसास बॉलीवुड के आकाश में ही उड़ान भर पाता है। पहले भी उनकी फिल्‍मों में हिंदी फिल्‍मों के रेफरेंस आते रहे हैं,लेकिन इस बार फिल्‍मों की छौंक की अधिकता फिल्‍म के मनोरंजन का स्‍वाद बिगाड़ रही है। करण जौहर सीमित कल्‍पना के लेखक-निर्देशक हैं।  उनकी फिल्‍मों को जंक फूड के तर्ज पर जंक फिल्‍म कहा जा सकता है। इसकी पैकेजिंग खूबसूरत रहती है। नाम और टैग लाईन आकर्षक होते हैं। उनका चटपटा स्‍वाद चटखारे देता है। लेकिन जैसा कहा और माना जाता है कि जंक फूड सेहत के लिए अच्‍छा नहीं होता,वैसे ही जंक फिल्‍म मनोरंजन के लिए सही नहीं है।
इस फिल्‍म में लखनऊ थोड़ी देर के लिए आया है। पूरी फिल्‍म मुख्‍य रूप से लंदन में शूट की गई है। कुछ सीन विएना में हैं। मजेदार तथ्‍य है कि ऐसी फिल्‍मों के किरदारों के आसपास केवल हिंदीभाषी किरदार ही रहते हैं। स्‍थानीय समाज और देश से उनका रिश्‍ता नहीं होता। इस फिल्‍म के दो प्रमुख किरदारों अयान और सबा को ब्रिटिश पासपोर्ट होल्‍डर दिखाया गया है। करण जौहर की फिल्‍मों के किरदार यों भी अमीर ही नहीं,बहुत अमीर होते हैं। उनकी इमोशनल मुश्किलें होती हैं। वे रिश्‍तों में ही रिसते और पिसते रहते हैं। ऐ दिल है मुश्किल में अयान मोहब्‍बत की तलाश में भटकता रहता है। फिल्‍म में चित्रित उसके संपर्क में आई दोनों लड़कियां उसे टूट कर प्‍यार करती है,लेकिन अयान अंदर से खाली ही रहता है। उसका यह खालीपन उसे मोहब्‍बत से महरूम रखता है।
करण जौहर की फिल्‍मों में कॉस्‍ट्यूम का खास महत्‍व होता है। इस फिल्‍म में भी उन्‍होंने अपने कलाकारों को आकर्षक परिधानों में सजाया है। उन्‍हें भव्‍य परिवेश में रख है। भौतिक सुविधाओं से संपन्‍न उनके किरदार समाज के उच्‍च वर्ग का प्रतिनिधित्‍व करते हैं। ऐसे किरदार मध्‍यवर्गीय और निम्‍नमध्‍यवर्गीय दर्शकों को सपने और लालसा देते हैं। यकीन करें करण जौहर की फिल्‍में दर्शकों को बाजार का कंज्‍यूमर बनाती हैं। उनकी लक-दक और बेफिक्र जिंदगी आम दर्शकों को आकर्षित करती है।
करण जौहर ने इस बार रणबीर कपूर,अनुष्‍का शर्मा और ऐश्‍वर्या राय बच्‍चन को प्रमुख भूमिकाओं में रख है। वे अपने लकी स्‍टार शाह रूख खान को बहाने से ले आते हैं। एक सीन में आलिया भट्ट भी दिखाई दे जाती हैं। रणबीर कपूर और ऐश्‍वर्या राय बच्‍चन के बीच की केमिस्‍ट्री तमाम प्रचार के बावजूद हॉट नहीं लगती। रणबीर कपूर और अनुष्‍का शर्मा के बीच की केमिस्‍ट्री और अंडरस्‍टैंडिंग ज्‍यादा वर्क करती है। रणबीर कपूर ने प्‍यार में थके-हारे और अधूरे युवक के किरदार को अच्‍छी तरह निभाया है। वे कमजोर दिखने वाले दृश्‍यों में सचमुच लाचार दिखते हैं। उन्‍होंने अयान के अधूरेपन को अच्‍दी तरह व्‍यक्‍त किया है। अनुष्‍का शर्मा किरदार और कलाकार दोनों ही पहलुओं से बाजी मार ले जाती हैं। अलीजा का फलक बड़ा और अनेक मोड़ों से भरा है। अनुष्‍का शर्मा उन्‍हें पुरअसर तरीके से निभाती हैं। ऐश्‍वर्या राय बच्‍चन के हिस्‍से अधिक सीन नहीं आए हैं,लेकिन उन्‍हें खूबसूरत और प्रभावशाली संवाद मिले हैं। उर्दू के ये संवाद भाव और अर्थ से पूर्ण हैं। इस नाज-ओ-अंदाज की शायरा फिल्‍मों से लेकर जिंदगी में आ जाए तो शायरी के कद्रदान बढ़ जाएं। यों वह अपना दीवान बायीं तरफ से पलटती हैं(शायद निर्देशक और कलाकार को खयाल नहीं रहा होगा कि उर्दू की किताबें दायीं तरफ से पलटी जाती हैं)। भाषा के व्‍यवहार की एक भूल खटकती है,जब एक संवाद में मक्खियों के मंडराने का जिक्र आता है। मंडराते तो भंवरे हैं। मक्खियां  भिनभिनाती हैं।
फिल्‍म का गीत-संगीत प्‍यार और दोस्‍ती के एहसास के अनुरूप दर्द,ख्‍वाहिश और मोहब्‍बत की भावनाओं से भरा है। फिल्‍म में जहां-तहां पुराने गानों का भी इस्‍तेमाल हुआ है। फिल्‍म में एक सबा शायरा और अयान गायक है,इसलिए गानों को फिल्‍म में पिरोने की अच्‍छी गुंजाइश रही है।
अवधि- 158 मिनट
तीन स्‍टार

फिल्‍म समीक्षा : शिवाय




एक्‍शन और इमोशन से भरपूर
शिवाय
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अजय देवगन की शिवाय में अनेक खूबियां हैं। हिंदी में ऐसी एक्‍शन फिल्‍म नहीं देखी गई है। खास कर बर्फीली वादियों और बर्फ से ढके पहाड़ों का एक्‍शन रोमांचित करता है। हिंदी फिल्‍मों में दक्षिण की फिल्‍मों की नकल में गुरूत्‍वाकर्षण के विपरीत चल रहे एक्‍शन के प्रचलन से अलग जाकर अजय देवगन ने इंटरनेशनल स्‍तर का एक्‍शन रचा है। वे स्‍वयं ही शिवाय के नायक और निर्देशक हैं। एक्‍शन दृश्‍यों में उनकी तल्‍लीनता दिखती है। पहाड़ पर चढ़ने और फिर हिमस्‍खलन से बचने के दृश्‍यों का संयोजन रोमांचक है। एक्‍शन फिल्‍मों में अगर पलकें न झपकें और उत्‍सुकता बनी रहे तो कह सकते हैं कि एक्‍शन वर्क कर रहा है। शिवाय का बड़ा हिस्‍सा एक्‍शन से भरा है,जो इमोशन को साथ लेकर चलता है।
फिल्‍म शुरू होती है और कुछ दृश्‍यों के बाद हम नौ साल पहले के समय में चले जाते हैं। शिवाय पर्वतारोहियों का गाइड और संचालक है। वह अपने काम में निपुण और दक्ष है। उसकी मुलाकात बुल्‍गारिया की लड़की वोल्‍गा से होती है। दोनों के बीच हंसी-मजाक होता है और वे एक-दूसरे को भाने लगते हैं। तभी हिमपात और तूफान आता है। इस तूफान में शिवाय और वोल्‍गा फंस जाते हैं। बर्फीले तूफान से बचने के लिए वे वे अपने तंबू में घुसते है। वह तंबू एक दर्रे में लटक जाता है। यहीं दोनों का सघन रोमांस और प्रेम होता है। चुंबन-आलिंगन के साथ उनकी प्रगाढ़ता दिखाई जाती है। लेखक संदीप श्रीवास्‍तव ने नायक-नायिका प्रेम की अद्भुत कल्‍पना की है। कह सकते हैं कि हिंदी फिल्‍मों में पहली बार ऐसा प्रेम दिखा है। आम हिंदी फिल्‍मों की तरह ही नायिका गर्भवती हो जाती है। वोल्‍गा अभी मां बनने के लिए तैयार नहीं है,लेकिन शिवाय को संतान चाहिए। आखिरकार वोल्‍गा इस शर्त पर राजी होती है कि वह प्रसव के बाद बच्‍चे का मुंह देखे बगैर अपने देश लौट जाएगी।
कहानी इसी अलगाव से पैदा होती है। घटनाएं जुड़ती हैं और फिल्‍म आगे बढ़ती है। शिवाय अपनी बेटी का नाम गौरा रखता है। बाप-बेटी के बीच गहरा रिश्‍ता है। दोनों एक-दूसरे पर जान छिड़कते हैं। गौरा को मां की कमी नहीं महसूस होती। एक भूकंप के बाद अचानक मां का पत्र उसके हाथ लगता है। वह जिद कर बैठती है कि उसे मां से मिलना है। शिवाय आरंभिक इंकार के बाद बुल्‍गारिया जाने के लिए राजी हो जाता है। बाप-बेटी बुल्‍गारिया पहुंचते हैं,लेकिन मां ने अपना ठिकाना बदल लिया है। वे भारतीय दूतावास की मदद लेने आते हैं तो वहां एक बिहारी अधिकारी मिलते हैं। उनके इंट्रोड्यूसिंग सीन में बिहारी लहजे और स्‍वभाव पर जोर दिया गया है,जो बाद में लेखक,निर्देशक और कलाकार भूल जाते हैं। बहरहाल,बुल्‍गारिया में कुछ अप्रत्‍याशित घटता है और शिवाय को फिर से एक्‍शन मोड में आ जाने का मौका मिलता है। एक्‍शन और इमोशन से लबरेज इस फिल्‍म में चाइल्‍ड ट्रैफिकिंग का मुद्दा भी आ जुड़ता है। उसकी भयावहता और इंटरनेशनल तार से भी हम वाकिफ होते हैं। पता चलता है कि कैसे सिर्फ 72 घंटों में गायब किए गए बच्‍चों को ठिकाना लगा दिया जाता है।
अजय देवगन की यह फिल्‍म एक्‍शन और इमोशन के लिए देखी जा सकती है। अजय देवगन ने एक्‍शन का मानदंड बढ़ा दिया है। चूंकि वे पहली फिल्‍म से ही एक्‍शन में प्रवीण है,वे इस रोल और एक्‍शन में जंचते हैं। उन्‍होंने एक्‍शन के साथ अपनी अदाकारी के जलवे भी दिखाए हैं। नाटकीय और इमोशनल दृश्‍यों में उनकी आंखें और चेहरे के भाव बोलते हैं। वोल्‍गा बनी एरिका कार के हिस्‍से कम सीन आए हैं। उन्‍हें मुख्‍य रूप से खूबसूरत दिखना था। वह दिखी हैं। अभिनय और दृश्‍य के लिहाज से सायशा को अधिक स्‍पेस मिला है। पहली फिल्‍म होने के बावजूद वह अपनी मौजूदगी दर्ज करती है। वह अच्‍छी लगती हैं। उन्‍होंने अपने किरदार के द्वंद्व को समझा और पेश किया है। बेटी गौरा की भूमिका में एबिगेल एम्‍स बहुत एक्‍सप्रेसिव हैं। एबिगेल मूक किरदार में है,लेकिन वह अपने एक्‍सप्रेशन और अंदाज से सारे इमोशन बखूबी जाहिर करती हैं।
अजय देवगन की शियाय में शिव का धार्मिक या आध्‍यात्मिक पक्ष नहीं है। शिवाय की शिव में श्रद्धा है और उसके स्‍वभाव में शैवपन है। बाकी वह ट्रैडिशनल भारतीय पुरुष है,जो परिवार,संतान और पारिवारिक मूल्‍यों को तरजीह देता है। देखें तो वोल्‍गा पश्चिम की लड़की है। वे ऐसे इमोशन में यकीन नहीं करती है। वह बेटी को सौंप कर शिवाय की जिंदगी से निकल जाती है। हालांकि बाद में लेखक ने उसकी ममता जगा दी है,फिर भी वह शिवाय और गौरा के साथ नहीं आती। शिवाय इमोशनल फिल्‍म है,लेकिन हिंदी फिल्‍मों के प्रचलित मैलोड्रामा से बचती है।
अजय देवगन का प्रयास सराहनीय है। उन्‍होंने हर स्‍तर पर फिल्‍म की हद बढ़ाई है।
अवधि- 172 मिनट
साढ़े तीन स्‍टार

Thursday, October 27, 2016

दरअसल : खतरनाक है यह उदासी



-अजय ब्रह्मात्‍मज
मालूम नहीं करण जौहर की ऐ दिल है मुश्किल देश भर में किस प्रकार से रिलीज होगी? इन पंक्तियों के लिखे जाने तक असंमंजस बना हुआ है। हालांकि केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह और महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री देवेन्‍द्र फड़नवीस ने करण जौहर और उनके समर्थकों को आश्‍वासन दिया है कि किसी प्रकार की गड़बड़ी नहीं होने दी जाएगी। पिछले हफ्ते ही करण जौहर ने एक वीडियो जारी किया और बताया कि वे आहत हैं। वे आहत हैं कि उन्‍हें देशद्रोही और राष्‍ट्रविरोधी कहा जा रहा है। उन्‍होंने आश्‍वस्‍त किया कि वे पड़ोसी देश(पाकिस्‍तान) के कलाकारों के साथ काम नहीं करेंगे,लेकिन इसी वीडियो में उन्‍होंने कहा कि फिल्‍म की शूटिंग के दरम्‍यान दोनों देशों के संबंध अच्‍छे थे और दोस्‍ती की बात की जा रही थी।
यह तर्क करण जौहर के समर्थक भी दे रहे हैं। सच भी है कि देश के बंटवारे और आजादी के बाद से भारत-पाकस्तिान के संबंध नरम-गरम चलते रहे हैं। राजनीतिक और राजनयिक कारणों से संबंधों में उतार-चढ़ाव आता रहा है। परिणामस्‍वरूप फिल्‍मों का आदान-प्रदान प्रभावित होता रहा है। कभी दोनों देशों के दरवाजे बंद हो जाते हैं तो कभी अमन की आशा के गीत गाए जाते हैं। इस तथ्‍य से इंकार नहीं किया जा सकता है कि समान इतिहास और साझा संस्‍कृति के कारण दोनों देशों में अनेक सांस्‍कृतिक समानताएं हैं। फिल्‍मों के मामले में आजादी के बाद से भारत का बाजार बढ़ा है। हिंदी फिल्‍में बहुत अच्‍छा कारोबार कर रही हैं। इस संदर्भ में पाकिस्‍तन की फिल्‍म इंडस्‍ट्री की कमर टूट चुकी है। सीमित बाजार के कारण फिल्‍मों की क्‍वालिटी और उनके निर्माण पर असर पड़ा है। वैध्‍-अवैध तरीके से हिंदी फिल्‍में पाकिस्‍तान में जाती रही हैं। वहां के दर्शक इन फिल्‍मों को देखते रहे हें। महेश भट्ट की पहल से पाकिस्‍तानी कलाकारों का भात आगमन आरंभ हुआ। वहां की प्रतिभाओं को यहां काम मिले। पाकिस्‍तान में भी लंबे अर्से के बाद हिंदी फिल्‍मों का प्रदर्शन आरंभ हुआ। धीरे-धीरे हिंदी की बड़ी फिल्‍में पाकिस्‍ताने से 10-15 करोड़ का व्‍यवसाया करने लगीं। साथ ही वहां के कलाकारों को भारत की फिल्‍मों में काम मिलने लगा। ताजा विवाद के बावजूद इसमें कोई शक नहीं है कि फवाद खान हिंदी फिल्‍मों के दर्शकों के बीच अत्‍यंत लोकप्रिय हैं।
कला और संस्‍कृति के मामले में संकीर्ण नजरिए से काम नहीं चल सकता। हम पाकिस्‍तानी शायरो,साहित्‍यकारों,गायको,कव्‍वालों और कलाकारों के फन का मजा लेते रहे हैं। इसी प्रकार भारतीय कलाकार पाकिस्‍तान में लोकप्रिय हैं। तुलना की जाए तो भारत का पासंग बड़ा हुआ ही मिलेगा। कई मित्र सवाल करते हैं कि भारत में जिस प्रकार से पाकिस्‍तानी कलाकरों को धन और सम्‍मनान दिया जाता है,वैसा ही धन या मान-सम्‍मान पाकिस्‍तान में भारतीय कलाकारों को नहीं मिलता। यह सच है,लेकिन हमें इस सच्‍चाई की जड़ में जाना चाहिए। गौर करने पर पाएंगे कि पाकिस्‍तान का मनोरंजन बाजार व प्रभाव छोटा है। लता मंगेशकर जैसी नामचीन कलाकार को बुलाकर वे प्रभावशाली कार्यक्रम नहीं कर सकते। ऐसे कार्यक्रम की लागत ही भारी पड़ेगी। संगीत और फिल्‍मों का भारतीय बाजार बड़ा है। फिर भी भारतीय कलाकारों के छोटे-मोटे कार्यक्रम पाकिस्‍तान में होते रहते हैं। पता ही होगा कि ताजा प्रसंग में राजू उपाध्‍याय ने अपनी यात्रा रद्द की। अनेक भारतीय कलाकारों ने पाकिस्‍तान की निजी और आधिकारिक यात्राएं की हैं और सभी खुश व संतुष्‍ट होकर लौटे हैं।
ऐ दिल है मुश्किल में फवाद खान की मौजूदगी को लेकर महाराष्‍ट्र की एक राजनीतिक पार्टी ने फतवा दिया कि वे इस फिल्‍म को रिलीज नहीं होने देंगे। अभी माहौल कुछ ऐसा है कि उग्र राष्‍ट्रवाद की हवा में ज्‍यादातर को लग रहा है कि पाकिस्‍तानी कलाकारों को निकालने या काम न देने से हम पाकिस्‍तान को जवाब दे रहे हैं या सबक सिख रहे हैं। दरअसल,ऐसा कर हम आतंकवादियों के इरादों को पानी दे रहे हें। वे यही चाहते हैं कि दोनों देशों के बीच दुश्‍मनी का माहौल बना रहे। होना तो यह चाहिए था कि ऐसे फतवों का हर स्‍तर पर विरोध होता। आम दर्शक और सरकारें इसका संज्ञान लेतीं। ऐसी ताकतों को चेतावनी देतीं कि उन्‍हें कानूनव्‍यवस्‍था भंग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। जनता और सरकार की उदासी इस बार खतरनाक रही। उम्‍मीद है कि आगे इसका दोहराव नहीं होगा।





















Tuesday, October 25, 2016

मुझे हारने का शौक नहीं : आलिया भट्ट

विस्‍तृत बातचीत की कड़ी में इस बार हैं आलिया भट्ट। आलिया ने यहां खुलकर बातें की हैं। आलिया के बारे में गलत धारणा है कि वह मूर्ख और भोली है। आलिया अपनी उम्र से अधिक समझदार और तेज-तर्रार है। छोटी उम्र में बड़ी सफलता और उससे मिले एक्‍सपोजर ने उसे सावधान कर दिया है।



23 की उम्र आमतौर पर खेल-कूद की मानी जाती है। मगर उस आयु की आलिया भट्ट अपने काम से वह मिथक ध्‍वस्‍त कर रही हैं। वह भी लगातार। नवीनतम उदाहरण ‘उड़ता पंजाब’ का है। ‘शानदार’ की असफलता को उन्होंने मीलों पीछे छोड़ दिया है। उनके द्वारा फिल्म में निभाई गई बिहारिन मजदूर की भूमिका को लेकर उनकी चौतरफा सराहना हो रही है। देखा जाए तो उन्होंने आरंभ से ही फिल्‍मों के चुनाव में विविधता रखी है। वे ऐसा सोची-समझी रणनीति के तहत कर रही हैं।

     आलिया कहती हैं, ‘मैं खेलने-कूदने की उम्र बहुत पीछे छोड़ चुकी हूं। मैं इरादतन कमर्शियल व ऑफबीट फिल्मों के बीच संतुलन साध रही हूं। इस वक्त मेरा पूरा ध्‍यान अपनी झोली उपलब्धियों से भरने पर है। हालांकि मैं किसी फिल्म को इतना गंभीर तरीके से नहीं लेती हूं कि मरने और जीने का मामला हो जाएं। कई बार एक्टर स्क्रीन पर अपने आप को इतना गंभीर लेने लगता है कि उसकी की भी झलक देखने को मिलती है। मैं किरदार में घुस जाती हूं। उसके बाद किरदार में बन जाने का अपना मजा आता है। जब मैंने ‘उड़ता पंजाब’ साइन की थी, तब मुझे पता था कि यहां पर परफॉरमेंस का काफी स्कोप है। अगर मैं उसे ठीक तरीके से ना करूं तो मेरे लिए बुरा होगा। मैं बहुत घबराई हुई थी। इस किरदार में काफी मुश्किलें थी। कुछ भी हो सकता था, पर मेरे लिए सब कुछ सकारात्मक रहा। मेरे लिए खुशी एकतरफ है। 

     खुद ही हदें पार करने की सोच मेरी परवरिश का नतीजा है। मेरे परिवार में मां हैं। पापा हैं। पूजा है। हर कोई अपने आप के साथ मुकाबला करता है। मैं भी अपने आप से ही मुकाबला करती हूं। मैं यह नहीं कह रही कि तोल-मोल कर काम कर रही हूं, पर अपने आप को चैलेंज करने के लिए हदें तोड़ने के लिए मैं काम करती हूं।अगर किसी ने मुझे कुछ कहा और मैंने कहा कि नहीं कर सकती।तब मैं सोचूंगी कि आखिर मैंने ना क्यों कहा। अब तो मुझे करना ही पड़ेगा। यह पाना हाई या थ्रिल है। यह डर वाली बात मुझे पापा से मिली है। पापा इतने बोल्ड हैं। वे कहा करते हैं कि अगर कोशिश नहीं करोंगे तो जीत कैसे मिलेगी। वैसे तो मैं बहुत स्पर्धावादी हूं। मुझे हारने का शौक नहीं है। जैसे शानदार को लेकर मुझे हार महसूस हुई। तब मुझे लगा कि मेरे साथ ऐसा नहीं हो सकता। तब पापा ने मुझसे एक बात कही थी। उन्होंने कहा कि द बेस्ट रिवेंज इज़ मैसिव सक्सेस। मैंने उसे अपने कमरे की दीवार पर लगा दिया था। मुझे पता था। उसके बाद मुझे बढ़त जरूर मिलेगा। मैं कोशिश करना नहीं छोड़ सकती। मुझे डरना नहीं है। डर से काम नहीं होता है।
     लोगों को ‘स्‍टूडेंट ऑफ द ईयर’ में अलग आलिया दिखी थी। हाइवे में लगा कि थोड़ा बदलाव हुआ है। पर अभी भी किरदार में बनने में आलिया को थोड़ा वक्त लगेगा। इसमें भी निर्देशक के पास थोड़ा सा समय नहीं रहता है। हुआ क्या कि ‘उड़ता पंजाब’ के किरदार में उसके बैठने चलने थोड़ी सी कमी दिखी। जो आगे ठीक होगा। यह जो कमी है इसे आलिया की ईमानदार कोशिश ने ढक दिया। कई बार आप फेल हो जाते हो फिर भी माता-पिता नहीं डाटते हैं, क्योंकि आपकी कोशिश सही होती है। इस पर आलिया अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करती हैं, ‘हर किरदार में कुछ ना कुछ कमी रहेगी। यह मेरा मानना है कि यह होना भी चाहिए। अगर पऱफेक्ट काम हुआ तो उसमें बढ़त का स्कोप नहीं होगा। वह थोड़ा सा इन ह्यूमन भी लगता है। जब भी आप कोई परफेक्ट काम देखेंगे तो आप का इमोशनल कनेक्ट नहीं होगा, क्योंकि वह किताब की तरह सही है। एक थोड़ा सा ढिलमिल रहना चाहिए। मेरे पापा मुझ से कहते हैं कि एक एक्टर में वल्नरबिलिटी रहनी चाहिए। जो नए लोगों में होती है। इस वजह से वह स्क्रीन पर ताजा दिखते हैं। दस फिल्म के बाद भले ही वह बदल जाता है। सच कहूं तो मैं यह कभी नहीं खोना चाहती हूं। मैं चाहती हूं कि हर फिल्म में मुझे दस गलतियां दिखें। जिसे मैं तभी नहीं बदलूंगी, बल्कि आगे के किरदारों में बदल सकती हूं। पापा और पूजा दोनों बहुत स्मार्ट हैं मेरे लिए। रहा सवाल मां का तो हम तीनों में कुछ बातें समान हैं। वे हैं आजादखयाली, आत्मगौरव और लडऩे की क्षमता। पूजा और मैं फेमिनिस्ट हैं। हमारे लिए औरत होना ग्रेटेस्ट बात है। हम दोनों इसमें यकीन करते हैं। हमें कोई डोर मैट नहीं बना सकता। पूजा बहुत सपोर्टिव हैं।

     मेरे लिए फिल्म जगत में करियर बनाना एक स्‍वर्गिक अनुभव रहा। मैं ढेर सारी जिंदगी जी रही हूं। विभिन्न तबके से आई लड़कियों के सुख-दुख को महसूस कर पा रही हूं। मिसाल के तौर पर इसी फिल्म में एक सीन था , जब पहली बार वह लोग उसे उठा कर लेकर जाते हैं वह स्केप करने की कोशिश करती है। पहली बार सब उन्हें थोड़ा सा रेप वाला सीन हो जाता है। वह उसे इंजेक्ट करते हैं। तब मैंने अभिषेक से पूछा था कि मेरी आत्मा का उद्देश्य इस सीन में क्या है, क्योंकि यह इतना भयानक सीन है। एक लड़की के लिए इस हालात में होना भयानक है। उन्होंने कहा कि एक बस एक निराशा के साथ आप को स्केप होना है। एक और सीन था, जिसमें वह छत की तरफ भागती हुई जाती है इस सोच से कि वह गुद जाएगी। मैं बहुत असहज थी उस हालात को लेकर। मैंने एक जानवर की तरह रिएक्ट किया। हमने पूरे दिन उसकी शूटिंग की। अंत में मुझे याद है कि पैकअप के बाद एक घंटे मेरे हाथ कांप रहे थे। उस सीन में मुझे मजा आया। इसमें आशाहीन होकर करने की पूरी कोशिश थी।

     ठीक इसी तरह ‘हाईवे’ के दौरान इम्तियाज अली से मिले अनुभव ने मुझे सींचा। मैं उसे शब्दों में बयान नहीं कर सकती। हर अगला सीन पिछले सीन से अधिक इंटरेस्टिंग रहता था। उसमें एक्टिंग नहीं करनी पड़ी थी। खुद के अतीत को जिया था। इम्तियाज के सीन रियल होते हैं। उस फिल्म को करते हुए लग रहा है कि मैं ही वीरा ही हूं। मुझे सबसे ज्यादा इमोशन पर ध्यान देना था। सच कहूं तो ऐसी फिल्म का मुझे कभी खयाल ही नहीं आया था। मैंने केवल भाषा और अन्य सामान्य चीजों की तैयारी की थी। बाकी सेट पर मैं खाली स्लेट की तरह गई थी। मैंने एक्टिंग की खास ट्रेनिंग नहीं ली थी। पहली फिल्म में करण से ट्रेनिंग मिली और इसमें इम्तियाज सर से मिल रही है। मेरी ट्रेनिंग आगे बढ़ गई है। मैं सेट पर ही खुद को तैयार करती हूं। भूल होती है तो डायरेक्टर सुधार देते हैं। मैं क्ले हूं और डायरेक्टर आर्टिस्ट हैं। वे मुझे जिस रूप में बदल दें। मैं तैयारी में ज्यादा यकीन नहीं करती।मैं कहीं भी सो सकती हूं। कहीं भी लेट सकती हूं। मुझे कुछ भी गंदा नहीं लग रहा। बाल खराब हो जाएंगे। कपड़े मैले हो जाएंगे। इन बातों की फिक्र ही नहीं है। मैं हूं ही ऐसी।

     मैं सफलता को सिर न चढऩे भी नीं देती। हालांकि ग्लैमर जगत में काम करने वालों के लिए अहंकारी बनने के आसार ज्यादा रहते हैं। वजह प्रशंसकों से मिलने वाला बेशुमार प्यार। उनसे मिलने वाली तारीफ आप का दिमाग खराब कर सकती है। लिहाजा मैं खुद को स्टार की तरह नहीं देखती हूं। मैं यहां अपना काम कर रही हूं। कोई मुझ पर एहसान नहीं कर रहा है। साथ ही मैं एक्टिंग कर किसी पर एहसान नहीं कर रही हूं। मैं सिर्फ एक सम्मान चाहती हूं। कम समय में स्टारडम से उत्साहित होना गलत है। मैं कभी अपनी असफलता को दिल में जगह नहीं दूंगी, क्योंकि मुझे पता है कि वह मुझे बदल सकता है। असफलता के साथ सफलता भी आप को नकारात्मक शक्ल दे सकती है। मैं उसी हिसाब से सोच कर काम करती हूं। स्टारडम कभी मुझ पर हावी नहीं होगा। कभी हुआ भी तो मेरे पिता मुझे संभाल लेंगे।

     पहले जब आप बच्चे होते हो तो टीवी में दिखते हो। मुझे नहीं पता था कि सिनेमा सिनेमा है। मुझे केवल गोविंदा और करिश्मा कपूर नजर आते थे। वह दोनों रास्तों और बाकी जगहों पर नाच रहे हैं। सिनेमा से जुड़ी पहली याद तो वही थी। उससे पहले कार्टून थे। मेरे लिए सिनेमा हिंदी फिल्म इंडस्ट्री है। मैं केवल इसके बारे में बात करूंगी। हां। उसकी जो स्कोप है। जो लार्जर देन लाइफ अहसास है वह मुझे काम करने के बाद महसूस हुआ। मुझे पता चला कि क्या क्या हो सकता है। खासकर अभी। अभी मैं सिनेमा को लेकर ओपन हुई हूं। अब मैं हिंदी फिल्मों के अलावा हॅालीवुड की फिल्में भी देखती हूं। अब मैं पहले से ज्यादा हॅालीवुड, फ्रेंच और मराठी सिनेमा देख रही हूं। अभी मैंने ‘सैराट’ देखी। मुझे यह बहुत ज्यादा पसंद आयी। मैं बहुत सुरक्षित होकर कह सकती हूं कि सिनेमा मेरा पहला प्यार है।मेरे लिए सबसे कंफर्ट सिनेमा है। मैं महसूस करती हूं कि हमारी पीढ़ी के साथ चलते चलते सिनेमा और अधिक विकसित हो रहा है। पता नहीं भविष्य में क्या होगा।

     जब आप देखते हो कि सारी दुनिया आइडिया और परफॉर्म  के स्तर पर ऐसा काम कर रही है। हिंदी सिनेमा में आकर आप को अलग तरीके से सारी चीजें करनी प़ड़़ती है वह कितना संघर्षशील रहता है। इस सवाल के जवाब में आलिया कहती हैं, ‘आप कोई भी फिल्म जैसे गोलमाल या बजरंगी भाई जान कर रहे हो, उसे भी आप पूरी शिद्दत के साथ करोंगे। वह भी किरदार है। वह किरदार मुश्किल है। मैं नहीं मानती कि यह परफॉरमेंस का हिस्सा नहीं है। कॅामेडी मुझे सबसे ज्यादा कठिन लगता है। इंटेस कठिन है ही। पर कॅामेडी सबसे अधिक मुश्किल है। आप दूसरे लोगों से प्रभावित होने के लिए उन्हें देखते हैं। हम सोचते हैं कि यह इस तरह का काम कर रहे हैं तो शायद हमें भी मेहनत करनी पड़ेगी।अगर ऐसे डांस करें तो मुझे बेहतर करना है। एक मासूमियत है मेहनत है। किसी का एक्शन अच्छा लगा। मुझे लगता है कि जितना एक्सपोज करोगे। हालांकि आप की खुद की एक प्रेरणा होनी चाहिए।‘

     मुझे हिंदी फिल्मों की ढेर सारी चीजें रिझाती हैं। मेरे ख्याल से काम करने का तरीका हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का अच्छा लगता है। एक परिवार सा है। शायद हॅालीवुड या कहीं औऱ यह टेक्‍निकल है। वहां निर्देशक या एक्टर लोग साथ में बैठकर खाना नहीं खाते। साथ में बैठकर बात नहीं करते हैं। मैंने अपने परिवार में देखा है कि निर्माता अपना घऱ गिरवी रखकर फिल्म बनाते हैं। वह करो या मरो वाली स्थिति होती है। जिस पैशन और जिस प्यार के साथ हिंदी फिल्म बनती है वह कहीं और नहीं बन सकती है। यह मुझे सबसे खास लगता है। रहा सवाल कमी का तो यहां लेखकों की कमी है। स्क्रीनप्ले की कमी है। एक लॅाजिक की कमी है। बहुत होता है। यही सबसे आकर्षण वाली चीज है कि जब मुझे कोई कहता है कि आलिया तुम इतने अलग अलग किरदार कैसे निभा रही हो। मैं कहती हूं कि एक्टर को वही करना चाहिए ना। यह मुझे आकर्षित करता है कि लोग अलग अलग किरदार को नया समझते हैं। वह यह नहीं मानते कि एक्टर का काम एक ही पार्ट नहीं बल्कि नया नया पा

     मैं बचपन से शांत रही हूं। मैंने कभी शैतानी नहीं की। बचपन में कभी किसी को तंग नहीं किया। मुझे आम लड़कियों की तरह लिपस्टिक या पाउडर लगाने का शौक नहीं था। मां ही कभी कभार फेसपैक लगाने को बोलती थी। हफ्ते में एक बार बालों में तेल लगाती थी। कभी-कभी मॉम चुपके से भी तेल डाल देती थी। हालांकि छोटी होने के बावजूद मैं अपने पहनने-ओढऩे को लेकर बेहद सजग रहती थी। मैं खूब खेलती थी। मेरे परिजन भी कहा करते थे कि बचपन का पूरा लुत्फ ले लो। हां अभिनेत्री बनने के बाद खान-पान की आदतों पर अंकुश रख रही हूं।

     मेरी मॉम बहुत अंडरस्टैंडिंग रही हैं। उनकी खासियत है कि वे सामने वाले को बातचीत में बेहद सहज कर देती हैं। जिससे तालमेल बेहतर हो जाता है। मैंने उनसे यह चीज सीखी है। वे पूरे परिवार को साथ लेकर चलती हैं। वह परिवार में सभी की भावनाओं की कद्र करती है। दूसरी चीज कि वह बहुत अनुशासित हैं। हर शाम को टहलने जाती है। स्वीमिंग और योग करती है। खानपान का ध्यान रखती हैं। हर कोई कुछ पलों को इंज्‍वाय करना चाहता है। उसमें भी सहयोग करती हैं। उनकी जिंदगी बेहद संतुलित है। इसका श्रेय मेरे नाना-नानी को भी जाता है। दोनों बहुत अनुशासित और हेल्दी लाइफ जीते हैं। यही चीजें मैं उनसे सीख रही हूं। इसके अलावा उनकी समय पर आने की सीख का मैं हमेशा ध्यान रखती हूं। बाकी हमारा रिश्ता टिपिकल मॉम बेटी का ही है। मॉम बेवजह रोक-टोक नहीं करती। मैं मेरी बहन और मॉम तीनों साल में एक बार छुट्टियां मनाने विदेश जाते हैं। वहां हम दोस्तों की तरह खूब मस्ती करते हैं। मैं उनसे निजी और प्रोफेशनल हर प्रकार की बातें शेयर करती हूं। वे लिबरल मॉम हैं। वे सचेत भी करती रहती हैं। कहती रहेंगी कि अगर देर हो जाए मुझे सूचित कर दिया करो। ताकि किसी समस्या में फंसी तो वे वहां मदद के लिए पहुंच सकेंगी। यह भी कि रात में बारह बजे ऑटो से चलने की जरूरत नहीं। वे खुद लेने आ जाएंगी। खुद की सुरक्षा के लिए यह जरूरी है। फ्रीडम के साथ जिम्मेदारी भी आती है। उन्होंने यह बात मुझे भली-भांति सिखाया है।


      



Friday, October 21, 2016

फिल्‍म समीक्षा : 31 अक्‍टूबर



खौफनाक रात की कहानी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
आधुनिक भारत का वह काला दिन था। देश की प्रधानमंत्री इं‍दिरा गांधी को उनके अंगरक्षकों ने ही गोली मार दी थी। शाम होते-होते पूरी दिल्‍ली में सिख विरोधी दंगा फैल गया था। घरों-गलियों में सिखें को मरा गया था। अंगरक्षकों के अपराध का परिणाम पूरे समुदाय को भुगतना पड़ा था। इस दंगे में सत्‍ताधारी पार्टी के अनेक नामचीन नेता भी शामिल थे। अनेक जांच आयोगों की रिपोटों के बावजूद अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है। 31 अक्‍टूबर के अगले कुछ दिनों तक चले इस दंगे में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2186 सिखों की जानें गई थीं,जबकि अनुमान 9000 से अधिक का है। 32 साल होने को आए। दंगों से तबाह हुए परिवारों को अब भी उम्‍मीद है कि अपराधियों और हत्‍यारों को सजा मिलेगी। भारतीय राजनीति और समाज का सच इस उम्‍मीद के विपरीत है। यहां सत्‍ताधारी पार्टियों के उकसाने पर धार्मिक दंगे-फसाद होते हैं। सरकारें बदल जाती है,तब भी अपराधी पकड़े नहीं जाते। हताशा होती है विभिन्‍न राजनीतिक पार्टियों की इस खूनी मिलीभगत से।
फिल्‍म के नायक देवेन्‍दर को अभी तक उम्‍मीद है कि न्‍याय मिलेगा,जबकि उसकी बीवी तेजिन्‍दर ने हालात स्‍वीकार कर लिया है। उसे कोई उम्‍मीद नहीं है। वह देवेन्‍दर की फाइल फाड़ देती है,जिसमें उस दंगे की अखबारी कतरनें हैं। देश में अनेक देवेन्‍दर और तेजिन्‍दर के परिवार होंगे। 31 अक्‍टूबर फिल्‍म उसी खौफनाक रात की कहानी है। एक मध्‍यवर्गीय परिवार के किरदारों को लेकर हैरी सचदेवा ने इसका निर्माण किया है। फिल्‍म के निर्देशक शिवाजी लोटन पाटिल हैं। सीमित बजट में बनी यह फिल्‍म लेखक-निर्देशक के नेक इरादों के बावजूद उस रात के खौफ की झलक भर दे पाती है। लेखक-निर्देशक ने सपाट तरीके से इसे पेश किया है। फिल्‍म में स्थिति की गहराई और नाटकीयता नहीं है। इस विषय पर बनी फिल्‍म के लिए आवश्‍यक सम्‍यक अंतर्दृ‍ष्टि की कमी लेखन,निर्देशन और दृश्‍य संयोजन में दिखाई देती है। सच है कि ऐसे विषयों की फिल्‍में सीमित बजट में नहीं बनाई जा सकतीं। 31 अक्‍टूबर देखते हुढ तकलीफ होती है कि एक जरूरी फिल्‍म सरोकारी जल्‍दबाजी और संसाधनों की कमी की शिकार हो गई।
निस्‍संदेह फिल्‍म को सरोकार मानवीय और बड़ा है। यह प्रासंगिक भी है। हम देख सकते हैं कि कैसे उन्‍मादी समूह किसी एक धार्मिक समुदाय के खिलाफ होकर समाज में तबाही ला सकता है। ऐसे माहौल में पुलिस और प्रशासन दंगाइयों के साथ हो जाएं तो भयंकर तबाही हो सकती है। सिख विरोधी दंगों के साक्ष्‍य और रिपोर्ट इसके गवाह हैं।31 अक्‍टूबर मे देवेन्‍दर के परिवार के जरिए हम सिर्फ एक घर,एक परिवार और एक गली से गुजरते हैं। यही एकांगिता फिल्‍म की कमी बन गई है।
खौफ और अविश्‍वास के उस दौर में भी कुछ लोग ऐसे थे,जो दोस्‍ती और मानवीयता के लिए जान की बाजी लगाने से पीछे नहीं हटे। फिल्‍म उन्‍हें भी लेकर चलती है,लेकिन सद्भाव का प्रभाव स्‍थापित नहीं कर पाती। तकनीकी रूप से यह कमजोर फिल्‍म है। छायांकन से लेकर अन्‍य तकनीकी मामलों की कमियां फिल्‍म को बेअसर करती हैं।
 31 अक्‍टूबर उस भयावह रात की यादें ताजा करती है,जो इंदिरा गांधी की हत्‍या के बाद दिल्‍ली और देश की काली कथा बनी। अगर यह फिल्‍म भाईचारे और सद्भाव के संदेश को प्रभावशाली तरीके से कहानी में पिरोती तो आज की पीढ़ी के लिए सबक हो सकती थी। इस इरादे और उद्देश्‍य में यह फिल्‍म असफल रहती है।
सोहा अली खान और वीर दास ने अपने तई मेहनत की है,लेकिन वे स्क्रिप्‍ट की सीमाओं में ही रह जाते हैं। सहयोगी किरदारों में आए कलाकार प्रभावहीन हैं।
अवधि- 102 मिनट
दोस्‍टार

Thursday, October 20, 2016

दरअसल : फिल्‍म गीतकारों को दें महत्‍व



-अजय ब्रह्मात्‍मज
2016 के लिए साहित्‍य का नोबेल पुरस्‍कार अमेरिकी गायक और गीतकार बॉब डिलन को मिला है। इस खबर से साहित्यिक समाज चौंक गया है। भारत में कुछ साहित्‍यकारों ने इस पर व्‍यंग्‍यात्‍मक टिप्‍पणी की है। उन्‍होंने आशंका व्‍यक्‍त की है कि भविष्‍य में भारत में साहित्‍य और लोकप्रिय साहित्‍य का घालमेल होगा। वहीं उदय प्रकाश ने अपने फेसबुक वॉल पर स्‍टेटस लिखा... बॉब डिलन के बाद क्या हम हिंदी कविता के भारतीय जीनियस गुलज़ार जी के लिए सच्ची उम्मीद बांधें ?’ ऐसी उम्‍मीद गलत नहीं है। हमें जल्‍दी से जल्‍दी इस दिशा में विचार करना चाहिए। हिंदी फिल्‍मों के गीतकारों और कहानीकारों के सृजन और लेखन को रेखांकित कर उन्‍हें पुरस्‍कृत और सम्‍मानित करने की दिशा में पहल करनी चाहिए।
हिंदी कहानीकार तेजेन्‍द्र शर्मा दशकों से हिमायत कर रहे हैं कि शैलेन्‍द्र के गीतों का साहित्यिक दर्जा देकर उनका अध्‍ययन और विश्‍लेषण करना चाहिए। उन्‍हें पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए। उनके इस आग्रह को साहित्‍यकार और हिंदी के अध्‍यापक सिरे से ही खारिज कर देते हैं। हिंदी में धारणा बनी हुई है कि अगर कोई लोक्रिपय माध्‍यम में कर रहा है तो वह साहित्यिक और सांस्‍कृतिक महत्‍व का नहीं है। उन्‍होंने साहित्‍य के प्रति पारंपरिक और शुद्ध्‍तावादी दृष्टिकोण अपना रखा है। कविता,कहानी,उपन्‍यास ,नाटक और रेखाचित्र के अलावा किसी और प्रकार के लेखन में शब्‍दों का उपयोग कर रहे श्‍िल्पियों को साहित्‍यकार नहीं मानने का संकीर्ण रिवाज चला आ रहा है। फिल्‍मी गीतकारों में नरेन्‍द्र शर्मा,साहिर लुधियानवी,मजरूह सुल्‍तानपुरी,शैलेन्‍द्र आदि से लेकर इरशाद कामिल,स्‍वानंद किरकिरे,राज शेखर और वरूण ग्रोवर जैसे दर्जनों गीतकार हैं,जिनके गीतों में साहित्‍य की स्‍पष्‍ट झलक है। उन्‍होंने फिल्‍मों के खास सिचुएशन के लिए लिखते समय भी अभिव्‍यक्ति और कल्‍पना को उदात्‍त रखा। ऐसे सैकड़ों गीत मिल जाएंगे। विविध भारती के अनाउंसर युनूस खान हिंदी फिल्‍मों के ललित गीतों के संकलन और विश्‍लेषण का नेक काम कर रहे हैं। हमें अपना संकोच खत्‍म करना चाहिए।
साहित्‍य और लोकप्रिय साहित्‍य में शब्‍द ही मूल धुरी है। शब्‍दों के प्रयोग-उपयोग से ही सभी अपनी भावनाएं और विचार व्‍यक्‍त करते हैं। भावों की उदात्‍तता और व्‍यापकता ही लिखे,बोले या गाए शब्‍दों को साहित्‍य का रूप देती है। इस लिहाज से बॉब डिलन का रचना संसार पिछले पांच दशकों से अमरिकी समाज को झिंझाोड़ रहा है। उन्‍होंने समानता,न्‍याय और शांति को बोल और स्‍वर दिया है। नागरिक अधिकारों से लेकर अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता जैसे मसलों पर वे मुखर रहे। उन्‍होंने अमेरिकी सत्‍ता को अपने शब्‍दों से चुनौती दी। अमेरिकी समाज के युवकों को विरोध करना सिखया और न्‍याय के पक्ष में खड़े रहने का आह्वान किया। अमेरिकी समाज ने उन्‍हें ध्‍यान से सुना और उनकी वाणी को गुनगुनाया। बॉब डिलन के गीतों की अनुगूंज पूरी दुनिया में सुनाई पड़ी। सभी ने उसे स्‍वीकार किया।
भारत में हम सभी हिंदी फिल्‍मों को गुनगुनाते हैं। अपने सुख-दुख के मुताबिक गीतों को चुनते और गुनगुनाते हैं। हम सभी के अपने प्रिय गीत हैं,जिन्‍हें हम अपने एकांत में गुनगुनाते हें। हिंदी फिल्‍मों के गीतों ने देश के करोड़ों युवकों को प्रेरित किया है। उनका संबल बना है। वक्‍त आ गया है कि हमारे साहित्‍यकार और अभिव्‍यक्ति की संस्‍थाएं अपने पुराने विचार और रवैए बदलें। हम फिल्‍मों के गीतकारों और कहानीकारों को नए नजरिए से देखना आरंभ करें।
हिंदी फिल्‍मों के अनेक गीतकार और कहानीकारों का साहित्‍य की दुनिया में भी दखल रहा है। हम उनके बारे में बातें करते समय उनकी रचनाओं को फिल्‍मी और साहित्यिक में बांट देते हैं। जो किताबों में आ गया है,वह साहित्‍य है। जो फिल्‍मों में आया,वह साहित्‍य नहीं है। गुलजार की ही बाते करें तो साहित्‍यकार उन्‍हें फिल्‍मी गीतकार मानते हैं और फिल्‍मों में उन्‍हें साहित्‍यकार समझा जाता है। सच तो यह है कि गुलजार और उन जैसे दूसरे गीतकारों को हम महत्‍व देना सीखें। उन्‍हें साहित्यिक सम्‍मनों और पुरस्‍कारों से नवाजे। लोकप्रिय माध्‍यमों में सृजनरत रचनाकारों को साहित्‍यकारों की पंगत में शामिल करें।   

Tuesday, October 18, 2016

हिंदी टाकीज 2(9) :हम सब का हीरो बन गया भीखू म्‍हात्रे -डॉ. नवीन रमण



हिंदी टाकीज2 का सिलसिला थम सा गया था। लंबे समय के बाद एक संस्‍मरण मिला तो लगा कि इसे हिंदी टाकीत सीरिज में पोस्‍ट किया जा सकता है। डाॅ. नवीन रमण ने सत्‍या और मल्‍टीप्‍लेक्‍स की पहली फिल्‍म की यादें यहां लिखी हैं।
डॉ नवीन रमण समालखा, हरियाणा के मूल निवासी हैं। हिन्दी सिनेमा में पीएच.डी. का शोध कार्य किया है । हरियाणवी लोक साहित्य और पॉपुलर गीतों पर अध्ययन और स्वतंत्र लेखन करते हैं । सोशल मीडिया पर राजनीतिक एवं सांस्कृतिक आंदोलन-कर्ता के तौर पर निरंतर सक्रियता रहती है । दिल्ली विश्वविद्यालय में अस्थायी अध्यापन में कार्यरत रहे हैं । वर्तमान समय में जनसंदेश वेब पत्रिका की संपादकीय टीम के सदस्य है।


-डॉ. नवीन रमण
साल 1998। हिंदी सिनेमा में यह साल जिस तरह एक खास अहमियत रखता है। कारण है रामगोपाल वर्मा की सत्या फिल्म, जिसने हिंदी सिनेमा को एक नया आयाम दिया।  ठीक उसी तरह यह साल मेरी जिंदगी में भी अहमियत रखता है। यह वह साल था जब मैंने गिर-पड़ कर बारहवीं की परीक्षा पास की थी और दिल्ली में एडमिशन लेने के लिए समालखा(हरियाणा) से विदआउट टिकट ट्रेन में आ गया था। इधर-उधर धक्के खाने के बाद किसी ने सलाह दी कि साकेत के पास मालवीय नगर में अरविंदो क़ॉलेज में एडमिशन हो सकता है। बस फिर क्या था,डीटीसी और ब्लू लाइन में लटकते-झटकते मालवीय नगर पहुंच गए। सुबह वाले कॉलेज में एडमिशन संभव नहीं हुआ। शाम वाले में संभावना थी और उसके खुलने में भी समय था। मेरे साथ आए दोस्त ने कहा कि चलो तब तक पीवीआर में फिल्‍म देख आते हैं। हम चार जने सीधे पीवीआर पहुंचे। मुश्किल से 10 मिनट का रस्ता कॉलेज से था।
पहली बार एक ऐसा सिनेमाहाल देखा,जिसमें एक साथ कई फिल्में लगी हुई थी और टिकट शायद 100रु से कुछ ऊपर थी। और जिन सुंदर लड़कियों को फैशनेबल कपड़ों में फिल्मों में देखते थे। वो वहां फिल्म देखने आई हुई थी। इस मल्टीप्लेक्स के सामने हमारे समालखा और पानीपत-सोनीपत के सिनेमाघर एकदम खटारा लग रहे थे। पॉपकोर्न की उड़ती महक ने हमारी भूख बढ़ा दी थी। उससे बीस कदम की दूरी पर खड़े छोले-कुलछे वाले से हमने चार प्लेट लगाने का कहा और बैग में से अपनी लस्सी की बोतल व रोटियां निकाल लीं। पेट भर जाने के बाद हमने सिनेमाघर के चारों ओर टहलना शुरू कर दिया। क्योंकि इतनी महंगी टिकट पर हम फिल्म नहीं देख सकते थे। सो हमने उसके आस-पास देखने का मन बनाया और टाइम पास करने लगे।
यह मुठभेड़ पहली बार थी किसी मल्टीप्लेक्स से। आगे से जितना आलीशान था पीछे से उतना ही हमारे अपने सिनेमाघरों जैसा। उधर टहलते हुए पता चला कि ठीक पीछे जो ये एक खिड़की है इस पर कुछ टिकट मिलती हैं। वो भी सात रु की। पर उसके लिए पहले से ही लाइन में लगना पड़ता है। 7रु की टिकट हमारे औकात में थी। पर लाइन में लगना हमने कभी सीखा नहीं था। वो भी जवानी की उस दहलीज पर खड़े होकर कौन सीख पाता है। वो हमारे भीखू महात्रे टाइप दिन थे। टिकट खिड़की के ठीक सामने एक फुटी दिवार बनी हुई थी। हम चारों दोस्त उस पर बैठकर खिड़की के खुलने का इंतजार करने लगे। खिड़की के लेफ्ट में लड़कों की लाइन लगी थी और राइट में लड़कियों की।
पीवीआर साकेत में चार पर्दे थे। यानी चार सिनेमाघर एक साथ।सबसे बड़ा चार नंबर वाला ही था। ज्यादातर हिंदी फिल्में उसी में लगती थी। सत्या फिल्म भी उसी में लगी थी। मेरा एक दोस्त फिल्मों को डायरेक्‍टर के हिसाब से देखता था। उसे रामगोपाल वर्मा पसंद था। उसने कहा फिल्म बढ़िया होनी चाहिए। हमारा सवाल पहला यही था कि हीरो-हीरोइन कौन है? उसके पास इस सवाल का कोई संतोषजनक जवाब नहीं था। पर पोस्टर देखकर लग रहा था कि फिल्म बढ़िया होनी चाहिए। आखिर हमारे अंदर का डॉन उसमें दिख रहा था। तब हम लड़ने के लिए तैयार रहते थे और मौका बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। शरीर में ताकत नई-नई बननी शुरू हुई थी और सुबह-शाम की कसरत और दौड़ मांसपेशियों में कसावट के साथ-साथ शरीर को उकसाती रहती थी। हमने मिलकर निर्णय किया कि फिल्म देखते हैं। एडमिशन तो कल आकर पूछ लेंगे। सलाह हुई कि पहले की तरह दो जने लाइन में लगे हुए लड़कों को पीछे धकेलेंगे और बाकी के दो टिकट लेंगे। जहां तक हो सके मारपीट नहीं करेंगे,क्योंकि दिल्ली में पुलिस तुरंत आ जाती है। सो ठीक वैसा ही हुआ। एकाध लड़का विरोध करने ही लगा था कि वह हमारी हरियाणवी बोली की कड़क सुनकर शांत हो गया और हमने चार टिकट ले ली। टिकट लेकर जब मेन गेट से अंदर घुसे तो इस घुसने में काफी कुछ बदल गया था। जब पोस्टर देखने घुसे थे तो थोड़ा डर और झिझक दोनों थी। पर इस बार आत्मविश्वास बढ़ा हुआ था। लड़कियों के परफ्यूम की खुशबू उनकी देह की खुशबू जान पड़ रही थी। आंखें उन पर से हटने का नाम नहीं ले रही थी। इतनी गोरी टांगे पहली बार देखी थी। इससे पहले ब्लू फिल्मों में ही देखी थी। पर यहां इन टांगों को देखने का अलग ही अहसास था। मन तो कर रहा था कि उन गोरी टांगों पर हाथ फेरने का। सुनते थे कि एकदम से संगमरमर जैसा अहसास होता है पर हमने तो कभी ताजमहल के संगमरमर पर भी हाथ नहीं फेरा था। हां उस नकली के मिलने वाले ताजमहल पर जरूर फेरा था। हाथ फिसलता था उस पर। इन कल्पनाओं के साथ-साथ नाक में से एक खुशबू जबरदस्ती प्रवेश कर रही थी।वह थी पॉपकोर्न की महक। पॉपकार्न की महक में ही मजा आ रहा था। रेट पता किया तो सुलग कर रह गई। इतना तो घर वाले महीने का खर्च नहीं देते थे। खैर खुशबू से ही काम चला लिया। जैसे लड़कियों को देखने भर से काम चला लिया था।
चार नंबर वाले थियेटर में जब हम घुसे तो उसके अंदर भी वही महक थी जो बाहर खड़ी लड़कियों में से आ रही थी। यहां हमारे सिनेमाहाल की तरह पेशाब की बदबू नहीं आ रही थी बल्कि महक ही महक उठी हुई थी। टिकट चैक करने वाले ने बताया ये अगली लाइन की टिकट है। तब समझ आया कि ये सात रु वाली अगली तीन लाइन की टिकट हैं। पीछे की सीटों पर बैठे अमीर लोग फैमिली के साथ आए हुए थे और 7रु वाले दोस्तों के साथ या अकेले। हम चारों पर सीट पर जैसे ही बैठे। एकदम गद्देदार सीट और वो आगे की तरफ सरकी तो हम डर गए कि ये क्या टूट गई। फिर ध्यान से देखा कि ये ऐसी ही है। समालखा के हाल में तो लकड़ी की ही सीट थी पानीपत-सोनीपत वालों में उन लकड़ी वाली सीटों पर फोम लगाकर टिकट महंगी कर रखी थी। पर ये तो वाकई मजेदार सीट थी। फिल्म शुरू हुई और जैसे ही फिल्म में पहली गोली चली। तब लगा साऊंड सिस्टम का कमाल। एकदम ऐसा लगा जैसे हमारे पास ही किसी ने गोली चला दी हो। हम सब का हीरो बन गया भीखू म्हात्रे। और हम सब उसके फैन।
2008 से लेकर 2016 में मनोज बाजपेयी की भीखू म्हात्रे वाली छवि हमारे अंदर आज भी यूं ही बसी हुई है। आज भी लगता है मनोज वाजपेयी इससे दमदार अभिनय शायद कभी कर नहीं पाएगे। एक अभिनेता के लिए यह अच्छी बात नहीं है पर क्या किया जा सकता है। एक फिल्म से हमारे फिल्मी जीवन के सारे हीरो-विलेन को बाहर फेंकने वाले मनोज बाजपेयी को देखते ही भीखू म्हात्रे अपने आप जीवित हो उठता है। कुछ तो भंयकर था उस किरदार में जो हमें अपनी गिरफ्त से आजाद नहीं होने देता। फिल्म देखते हुए लगता ही नहीं कि हम मुबंई पर केंद्रित फिल्म देख रहे हैं। ऐसा लगता है मानो हम मुबंई के अंडरवर्ल्ड की दुनिया के साथ जी-मर रहे हैं। रील रियल लगे। यही फिल्म की सबसे बड़ी कसौटी होती है। जिस पर फिल्म एकदम खरी उतरती है। अपराध जगत से आप घृणा करने के बजाय उसकी ओर आकर्षित हो और प्यार करने लगे। यह आसान नहीं है। दरअसल पॉवर की भूख हम सबमें होती है और फिल्म उसे ही सहजता से परोस देती है।एकदम सहज हम जैसे किरदार। हम जैसा जीवन, शैली और नौटंकियां। सब कुछ।
फिल्म देखने के बाद एकदम से मन हुआ कि हम सब दोस्त भी भीखू की तरह गैंग बना लेते हैं। दिमाग कुछ ओर सोचने को तैयार ही नहीं था। मुबंई का डॉन भीखू म्हात्रे। यह वह डायलॉग था जो हमें कई दिन तक सुनाई देता था और हम जिसे बहुत दिन तक बोलते रहते थे। एक डायलॉग से हम डॉन होने का अहसास पा लेते थे।
गोली मार भेजे में-यह महज गाना भर नहीं था। इस गाने पर हम कितनी बार शादियों में और न जाने कहां-कहां नाचे हैं। यह गाना नाचने के लिहाज से नहीं था पर उस आक्रामकता को अभिव्यक्ति देता था जो हम सब दोस्तों में उबाले मारती रहती थी। यह गाना हमारे जेहन में अटक गया था-गोली मार भेजे में। कल्लू मामा और भीखू म्हात्रे दोनों हमें अपनी आगोश में लिए उड़ रहे थे। मुझे याद है कि हम साकेत से लेकर समालखा तक पूरे रस्ते फिल्म पर ही बात करते रहे थे। उस दिन हमारा किसी से पंगा हो जाता तो फिल्म का पूरा जोश उस पर पक्का निकल जाता। तब हम भीखू म्हात्रे बने हुए थे।हम सब हम सब नहीं थे।
दरअसल दिल्ली के पीवीआर साकेत में मैंने यह पहली फिल्म देखी थी। यह मेरी मल्टीप्लेक्स में भी पहली फिल्म थी और दिल्ली में देखी जाने वाली पहली फिल्म भी। मात्र 7रु में। ये वो दिन थे जब हम भी अपराध की दुनिया से मोहित थे। और फिल्म तो कमाल की थी ही। मल्टीप्लेक्स और फिल्म दोनों ने हमें अलग ही दुनिया में ले जाकर छोड़ दिया था। उसके बाद दूसरे सिनेमाघरों में फिल्म देखने में वो मजा नहीं आता था। यह मल्टीप्लेक्स में सस्ती दर पर फिल्म देखने का सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक वो सात रु वाली 10रु के बाद बंद नहीं हो गई। साकेत पीवीआर के पीछे मिलने वाली वो टिकट खिड़की और वहां हुए लड़ाई-झगड़े हम कभी नहीं भूल पाएंगे। हमारे देखते-देखते वहां भी कितना कुछ बदल गया था। देखते-देखते हम उस खिड़की के डॉन बन गए थे। हमें वहां झगड़ना नहीं पड़ता था। सब जान गए थे हमें। तब हमसे लड़के आकर कहने लगे थे भइया हमें भी टिकट दिलवा दीजिए। इस सबकी हमने कीमत भी चुकाई थी और कीमत पाई भी थी। कितनी बार हमने अपनी आर्थिक हालत ठीक करने के लिए यह सात और दस वाली टिकट आगे जाकर 80 से लेकर 100 तक में बेची थी। आज सोचता हूं तो अजीब-सा लगता है कि हम टिकट भी ब्लैक किया करते थे। तब वो हमारे लिए बहुत ही सामान्य-सी बात थी। एक बार तो झगड़े में मैंने वहां एक का सिर ही फोड़ दिया था और वहां पुलिस से भागम-दौड़ में एक दोस्त मे अपने और मेरे सारे ऑरिजनल सर्टिफिकेट खो दिए थे। जिन्हें हम एडमिशन लेने के लिए लाए हुए थे। मेरा दोस्त हार मान कर घर बैठ गया पर मैंने हार नहीं मानी और अरविंदो सांध्य कॉलेज में एडमिशन ले कर माना। बहुत धक्के खाए। जुगाड़ भिड़ाए पर हार नहीं मानी। आखिर सत्या से यही तो सीखा था कि हासिल करने का जज्बा होना चाहिए। इसी जज्बे की देन है कि पढ़ने का यह सिलसिला पीएचडी करने तक के मुकाम को हासिल कर पाया। अगर हार मान गया होता था अपने दोस्त की तरह बारहवीं पास ही रह जाता। और यह क्या महज संयोग ही रहा होगा कि मैंने अपना पीएचडी का शोध भी फिल्मों पर ही किया। शोध भले ही बहुत गुणवत्ता भरा काम न हो पर फिल्मों ने मेरे जीवन को बहुत बदला तो है ही,दिया भी बहुत कुछ है। मुझे जिंदगी ने इतना नहीं रुलाया जितना मैं फिल्में देखते हुए रोया हूं और आज भी रोता हूं। गांव में हम जब छोटे थे तो मैं फिल्म वाला खेल ही ज्यादा खेलता था। जिसका डायरेक्टर और पटकथा लेखक भी मैं ही होता था। शायद यह छुपा हुआ सपना भी कभी पूरा हो सके। भविष्य का किसे पता है? पर उसके अंकुर तो झलक मारते ही रहते हैं। देखते है क्या होता है?

है सबसे जरूरी समझ जिंदगी की - अनुष्‍का शर्मा



विस्‍तृत बातचीत की सीरिज में इस बार अनुरूका शर्मा। अनुष्‍का शर्मा की विविधता गौरतलब है। अपनी निंदा और आलोचना से बेपरवाह वह प्रयोग कर रही हैं। साहसी तरीके से फिल्‍म निर्माण कर रही हैं। वह आगे बढ़ रही हैं।

-अजय ब्रह्मात्‍मज
मुझे स्वीकार किया जा रहा है। यह बहुत बड़ी चीज है। इसके बिना मेरी मेहनत के कोई मायने नहीं होंगे। हम लोग एक्टर हैं। हमारी सफलता इसी में है कि लोग हमारे काम के बारे में क्या सोचते हैं? चाहे वह अप्रत्यक्ष सफलता हो या प्रत्यक्ष सफलता हो। इससे हमें और फिल्में मिलती हैं। यह हमारे लिए जरूरी है। मैं बचपन से ऐसी ही रही हूं। मुझे हमेशा कुछ अलग करने का शौक रहा है। यही मेरा व्यक्तित्व है। फिल्‍मों में आरंभिक सफलता के बाद मुझे एक ही तरह के किरदार मिलें। वे मैंने किए। लेकिन मुझ में कुछ अलग करने की भूख थी। मैंने सोचा कि अब मुझे कुछ अलग तरह का किरदार निभाना है। मैंने सोचा कि कुछ अलग फिल्में करूंगी,जिनमे अलग किरदार हों या फिर अलग पाइंट दिखाया जा रहा हो। कोई अलग सोच हो। यह एक सचेत कोशिश थी। बीच में ऐसी कई फिल्में आईं, जिनमें मुझे लगा कि कुछ करने के लिए नहीं हैं। उन फिल्मों ने अच्छा बिजनेस किया। मुझे लगा कि मैं उनमें कुछ नया नहीं कर रही हूं तो मैंने वे फिलमें छोड़ दीं। कह सकती हूं कि मैंने जागरूक होकर अपना काम किया है। 

दूसरी तरफ ज्ञान पाने की मेरी जिज्ञासा रहती है। हर वक्त कुछ नया सीखने में मेरी रूचि रहती है। किसी चीज के बारे में कुछ नया समझ सकूं। इससे जीवन की मेरी समझ बढ़ती है। एक इंसान के तौर पर मेरा विकास होता है।  फिल्मों के जरिए हमें इसे बेहतरीन तरीके से पेश करने का मौका मिलता है। हम अलग-अलग किरदार प्ले करते हैं। इन किरदारों को निभाने के लिए काफी रिसर्च करना पड़ता है। सीखने को मिलता है। इससे अलग लाइफ के बारे में हमें पता चलता है। जब मैंने एनएच 10 की, मैंने जाना कि गुडगांव में जहां मॉल खत्म होते हैं, उसके बाद जिंदगी बिल्कुल अलग है। मेरी अधिकतर फिल्में रियल होती हैं। यह मेरे लिए सबसे बड़ी चीज है। हां, आप फिल्मों में अच्छ करो। पैसे कमाओ। फेम पा लो। वह सब ठीक है। इन सबके साथ जब तक आपकों अंदर से ग्रोश महसूस नहीं होगा, बेहतर इंसान बनने का अहसास नहीं होगा, जीवन की समझ बेहतर नहीं होगी तो सारी उपल‍ब्धियां बेमानी हो जाएंगी। पैसा और बाकी चीजों के मायने नहीं रहेंगे। 

मैं सुल्तान के उदाहरण से समझाना चाहूंगी। लोगों को लगता है कि सारे रेसलर एक जैसे लगते हैं। वे साइज में बहुत बड़े होते हैं। मुझे भी ऐसा ही लगता था। मैंने ज्यादा रेसलिंग नहीं देखी थी। चैनलों पर चलते-फिरते ही रेसलिंग देखा होगा। आदित्य चोपड़ा ने मुझे फिल्म दी तो मैं बहुत डर गई थी। मैंने सोचा कि कैसे करूंगी? यह कैसे होगा? मैं लोगों का नजरिया कैसे बदल पाऊंगी? इस विषय पर पहले कोई फिल्म बनी भी नहीं है। ऊपर से आप फिमेल रेसलर हैं। मुझे पता था कि इस रोल में जोश और उत्‍साह है,पर चुनौती भी थी। लोगों की सोच ब्रेक करना मेरे लिए जरूरी हो गया। मैंने फिर रिसर्च किया। समझने की कोशिश की। आखिर यह कैसे होता है? मुझे पता चला कि अलग–अलग वजन कैटेगरी में रेसलर मुकाबला करते हैं। कम वजन की कैटेगरी भी होती है। मैंने इंटरनेशनल रेसलर को करीब से देखा। उनमें से कुछ का शरीर मेरे जैसा था,लेकिन वे शरीर से मजबूत थीं। मैंने सोचा कि यही रास्ता मुझे लेना है। उसके बाद फिल्म का पहला टीजर आया तो लोगों ने कहा कि यह रेसलर लग रही है। मैंने कहा कि बस मेरा काम हो गया।

आप मेरे किरदार को देख लीजिए। वह आज की माडर्न भारतीय लड़की को पेश करती है। वह गांव में रहती है। भारत में ऐसी कई महिला रेसलर हैं, जो गांव से आती हैं। हरियाणा के गांव से महाराष्ट्र के गांव से,यूपी और पंजाब के गांव से ।  उन्हें रेसलिंग के साथ अपने घर के रोजमर्रा के काम भी करने होते हैं। घर के काम के साथ वह अपनी ट्रेनिंग भी करती हैं। यह संतुलन बनाना बहुत ही बड़ी चीज है। आपकी महत्वाकांक्षा है। साथ में घरेलू काम भी है। आरफा आज की लड़की है।

हम लड़कियों को खुद को साबित करना पड़ता है। यह पता नहीं क्यों होता है? पर सारी लड़कियां ऐसे सोचती हैं। कई सालों से यह हो रहा है। कुछ चीजें लड़कों की स्‍वीकार्य है। पर लड़कियों के लिए संदेह रहता है कि वह कर पाएंगी क्या? आप रेसलिंग ही देख लें। उन्हें लड़कों के साथ लढ़ना पड़ता है। वह मुकाबला करती हैं। अगर लड़कों से जीत गईं तो उन्हें मजबूत मान लिया जाता है। समझा जाता है कि वह आगे बढ़ेगी। ऐसी मुश्किलें हैं। मेरे किरदार के लिए भी यह कठिन रहा।
खुद के प्रति मुझे कभी संदेह नहीं रहा। ऐसे संदेह और विचार तब आते हैं, जब आपके मन में स्पष्टता ना हो। मैं कोई भी काम करने से पहले सोचती हूं। मैं ऐसे ही कोई काम नहीं कर लेती हूं। मुझे पता है कि किस तरह की फिल्में मुझे करनी हैं? अपना करियर कैसे शेप करना है। इसे लेकर मैं हमेशा से स्‍पष्‍ट रही हूँ। इस वजह से कभी खुद पर सेल्फ डाउट नहीं आता है। हां, किरदार को लेकर कभी हो जाता है। जैसे सुल्तान को लेकर मैं डरी हुई थी। मैं सोच रही थी कि क्या मैं लोगों को बता पाऊंगी कि मैं रेसलर हूं? यह होता है, पर यही चीज आपको खुश करती है। फिर आप एक्स्ट्रा मेहनत करते हो। किसी भी हालत को सकारात्मक तरीके से देखने की सोच होनी चाहिए। मेरी हमेशा से यही सोच रही है। मैं एक्टर के तौर पर जो ग्रो कर रही हूं ,मेरा करियर सही दिशा में जा रहा है। एक इंसान के तौर पर भी ग्रोथ जरूरी है।

अपने फैसलों में मुझे हमेशा परिवार का साथ मिला। फिल्‍मों के बारे में अपने पापा से जाकर पूछ नहीं सकती कि मैं इस हालत में फंसी हूं, तो मैं क्या करूं? वे मुझे नहीं बता पायेंगे।हां,अगर मैं उन्हें लाइफ के बारे में कुछ कहूं या जानना चाहूं तो वे मुझे गाइड करेंगे। मुझे उनसे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। फिल्‍म प्रोफेशन में वे मेरी मदद नहीं कर सकते। निश्चित तौर पर सारे फैसले मैं ही ले रही हूं। मुझे ही तय करना है कि जो कर रही हूं, वह सही कर रही हूं। एनएच 10 के समय हर वजह थी कि मुझे वह फिल्‍म नहीं करनी चाहिए। लोगों ने कहा कि यह एडल्ट और डार्क फिल्म है। अंदर से जो सहमति की आवाज आती है उसी की राह पर आगे बढ़ती हूं। इसमें कई बार गिरती भी हूं। गिरने को मैं कभी अपनी खामी के तौर पर नहीं देखती हूं। मैं इन सब बातों को ऐसे सोचती हूं कि मेरे पास खुला मंच है। मैं खुद अपना रास्ता चुन सकती हूं। मैं रिस्क लेती हूं। आगे बढ़ती हूं। मैंने हमेशा से रिस्क ली है। इसमें मुझे मजा आता है। मुझे लगता है कि अंदर से जो मेरे मन को लगा मैंने वही किया। मैं किसी और की नहीं सुनती हूं। मेरा भाई भी ऐसा ही है। हमारी सोच और परवरिश एक जैसी है। दुनिया को देखने का हमरा नजरिया एक ही है। हम दोनों अलग समय पर पैदा हुए हैं। इसके बावजूद हम दोनों जुड़वा हैं। सब लोग यही कहते हैं। हमारे साथ काम करने वालों को यही लगता है कि हम एक जैसे हैं। मैंने अपने भाई के साथ प्रो़डक्शन कपंनी खोली। उसमें हमें अच्छी फिल्में ही बनानी हैं। सिनेमा को कुछ नया देना है।हमें नए लोगों के साथ काम करना है। हम उस रास्ते में निकल पड़े हैं।

मैंने हमेशा अलग चीज ही की है। मॉडलिंग  के समय मैं दसवीं क्लास में थी। मैं क्लास में दूसरे या तीसरे स्थान पर आती थी। उस समय भी मां –पापा को लोग कहते थे कि बेटी से क्या करवा रहे हो? वह पढ़ाई कैसे करेगी। पर मुझे हमेशा लगता था कि मैं कर सकती हूं। मैंने किया और करके दिखाया। मैं अपने आप को पुस करती हूं। एक ही तो जीवन मिला है । इसमें निजी बढ़त बहुत जरूरी है। कुछ और लोग भी बहुत बढ़िया काम कर रहे हैं। मैं उनकी सराहना करती हूं। पर मुझे जो सही लगता है मैं वही करती हूं। मैं किसी को फॉलो नहीं कर सकती। ऐसा करने पर मुझे अंदर से अजीब अहसास होगा। मैं खुद को ऐसा बना रही हूं कि किसी चीज से ना डर पाऊं। अपने आप पर शक करना और डरना। मैं इनसे निकल जाना चाहती हूं।

बचपन में मैं फिल्में नहीं देखती थी। हम आर्मी बैक ग्राउंड से थे। हमारे .यहां ऐसा नहीं था कि हर शुक्रवार को बाहर फिल्में देखने जायेंगे। आर्मी के बच्चों में कई सारी एक्टिविटी होती थी। हमारे पास करने को बहुत कुछ हुआ करता था। मैंने ज्यादा फिल्में नहीं देखी हैं। बहुत बड़ी फिल्में ही देखा करती थी। मुझ पर फिल्मों का प्रभाव नहीं था। 80 या 90  की फिल्में मुझे बताई जाएं तो समझ नहीं आता है, क्योंकि मैंने उस समय की फिल्में नहीं देखी हैं। अभी भी मैं ज्यादा फिल्में नहीं देखती हूं। ऐसा नहीं है कि मैं सारी फिल्में देखती हूं। मैं दर्शक के तौर पर अधिक फिल्में देखती हूं। अब थोड़ी समझ ज्यादा आ गई है। अब समझ में आने लगा है कि कैसे कोई सीन हुआ होगा। पर ज्यादातर आम दर्शक के तौर पर देखती हूं। मैं फिल्मों के अनुसार अपने कपड़े या हेयरस्टाइल नहीं बनाती थी। मैं किरदार पर ध्यान देती थी। जैसै कुछ कुछ होता है में मुझे काजोल का किरदार अच्छा लगा था। वह बहुत फन किरदार था। जब किसी किरदार के साथ रिलेट करती थी तो थिएटर से बाहर निकलते ही मैं वैसा व्यवहार करने लग जाती थी। कम से कम घर पहुंचने तक उस किरदार में रहती थी। शुरू से ही फिल्मों में मैंने किरदार से जुड़ाव महसूस किया है। इस वजह से अब तक मेरी दिलचस्पी किरदार के लिए रहती है। मैं जो भी फिल्म करती हू, उसमें अपना किरदार स्ट्राग रखना चाहती हूं। किरदार र्निभाने के लिए मुझे नहीं लगता है कि ढेर सारी फिल्में देखने की जरुरत है। उसके लिए जीवन के अनुभव की जरुरत है। किसी भी मामले में आप जब अपने दायरे को छोटा कर लेते हैं तो आप अपनी सोच छोटी कर लेते हैं। जीवन का अनुभव बहुत जरूरी है। वही मुझे एक सोच और समझ देता है। मैं अपने किरदारों में वह समझ डाल पाती हूं। 

आजकल लेखन पर ज्यादा फोकस दिया जा रहा है। हमारी प्रोडक्शन कपंनी तो कर ही रही है। कई बार कुछ लोगों की सफलता के बाद भी चीजें होने लगती हैं। पिछले कुछ समय में जिन फिल्मों ने अच्छा किया है,उनकी लेखनी अच्छी रही है। अब रीमिक्स से फिल्में नहीं चल रही हैं। अब किरदार और कहानी डेवलप किया जा रहा है। यह बहुत जरूरी है। मैंने हमेशा से ही लेखकों की इज्जत की है। किसी फिल्म के लिए लेखक सबसे ज्यादा महत्व रखते हैं। उन्हीं का सहयोग होता है। वे सबसे ज्यादा अनुभव करते हैं। वे लिखते हैं। हम उसी पर काम करते हैं।

जब हम देश के बाहर किसी से मिलते हैं और उन्हें लगता है कि हिंदी फिल्मों में केवल नाच-गाना है। कोई गंभीरता नहीं है। जब मुझे कोई कहता है कि आप बॉलीवुड अभिनेत्री हैं। और कहने में उसका लहजा व्‍यंग्‍यात्‍मक होता है तो मैं उनसे कहती हूं कि हम लोग भिन्न तरह की फिल्में बनाते हैं। हिंदी सिनेमा बहुत खास है। हम इतनी फिल्में बनाते हैं। हिंदी फिल्में लोगों को प्रभावित करती हैं। हम अपने दर्शकों को खुशी दे पाते हैं। हिंदी का आम दर्शक खुशी चाहता है।

हमारी फिल्‍मों को बाहर अपनाया जा रहा है। हमारी फिल्‍में इंटरनेशनल स्‍तर पर रिलीज हो रही है। लंच बाक्स उनमें से है। मैं स्पेन के रास्तों से गुजर रही थी वहां पर लंच बाक्स का पोस्टर लगा हुआ था। मुझे इतना गर्व महसूस हुआ। मैंने सोचा कि अच्छा है। जैसे हम उनकी फिल्में देख रहे हैं,वैसे वे हमारी फिल्में देख रहे हैं।

मेरे ख्याल मैं बदलाव  के दौर में आई हूं। मेरी पहली फिल्म में फीमेल एडी और असिस्टेंड थी। कैमरामैन लड़किया थीं। मेरे समय पर नेहा थी,जो अभी कैमरामैन बन गई हैं। वह फिल्में कर रही हैं। पिछले कुछ समय से महिला प्रधान फिल्में आई हैं। यह बहुत ही अच्छा दौर है। हमारे लिए सकारात्मक है। देखिए फिल्म सफल होंगी तभी आगे बनेंगी।अंत में तो यह सब बिजनेस पर ही टिका हुआ है। जब भी कोई फिल्म अच्छा करती है तो और फिल्में बनती हैं। डर निकल जाता है। लोग अधिक फिल्में बनाने लगे हैं। अब लडकियों के लिए किरदार लिखें जा रहे हैं। उन्‍हें मजबूत किरदार मिल रहे हैं। धीरे धीरे यह और बढे़गा। यह तभी बढे़गा,जब हम फिल्मों में मजबूत महिला किरदार देखेंगे।

Monday, October 17, 2016

खुदपसंदी यहां ले आई - स्‍वरा भास्‍कर




स्‍वरा भास्‍कर से यह विस्‍तृत बातचीत है। किसी अभिनेत्री को चंद सवालों और जवाबों में नहीं समझा जा सकता। फिर भी उनकी सोच,समझ और काम की झलक मिलती है। इस सीरिज में और भी इंटरव्‍यू आएंगे....

 -निल बटे सन्नाटा से ही शुरू करते हैं। जीत जैसा ना कहें लेकिन इस फिल्म का लोगों पर असर रहा ही है?इस फिल्म के बारे में बोलते हुए आप अपनी बात पर आएं?

0निल बटे सन्नाटा का ब्रीफ यही है कि जब यह फिल्म मुझे मिली मैं उत्साहित थी। मैंने सोचा कि लीड में टाइटल पार्ट और इतना एक दम नायक जैसा रोल। इससे पहले मेरी दो –तीन फिल्में आ चुकी थी। जहां में सहायक भूमिका का किरदार निभा रही थी। लेकिन जब इस फिल्म के लिए मुझे पता चला कि पंद्रह साल की बच्ची की मां का रोल है, तो हल्की सी कड़वाहट मेरे अंदर पैदा हुई।मैंने सोचा कि यार, पता नहीं क्या करना पड़ेगा हीरोईन बननेके लिए। लीड भी मिल रहा है तो मां के किरदार के लिए। सच कहूं तो मेरी सोच यही थी। पर मैंने जब स्क्रिप्ट पढ़ी तो मुझे लगा कि इस फिल्म को मना नहीं करना चाहिए। मैंने सोचा कि रिस्क है। पर कोई बात नहीं। इस फिल्म के लिए मुझे मना नहीं करना चाहिए। फिल्म शुरू होने के बाद मेरे मन में इस फिल्म को लेकर किसी प्रकार का संदेह नहीं था।मेरे मन में कोई भी दुविधा नहीं थी। फिल्म रिलीज हुई। मेरे ख्याल से हम नसीब वाले थे कि हमें आनंद एल राय और इरोस का प्लेटफार्म मिल गया। ऐसा नहीं है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में छोटी फिल्में नहीं बनती हैं। मेरे ख्याल से आजकल चैलेंज यह होगया है कि छोटी फिल्म को बिना किसी बड़े स्टार के कैसे रिलीज किया जाएं। लोगों तक कैसे पहुंचाया जाएं। दुर्भाग्यवश यह बहुत बड़ा स्टेप है। आजकल लगने लगा है कि फिल्म बनाने से ज्यादा फिल्म रिलीज करना मुश्किल है। हमारी फिल्म के लिए आनंद राय का आना और इरोस का आना बहुत अच्छा साबित हुआ है। हमें खड़े होने के लिए टांगे मिल गई थी। नील बट्टे की बेसिकली यह जर्नी रही। हम सब इस फिल्म को लेकर उत्साहित थे। हमें अपने फिल्म के कंटेंट पर और सिनेमा पर पूरा भरोसा था। हम जिस तरह के रिएक्शन की उम्मीद दर्शकों सेनहीं कर रहे थे. हमें फिल्म के लिए उतनी बेहतरीन प्रतिक्रया मिली। इसकी शुरुआत पोस्टर लांच से हुई।मतलब, जिस तरह की सकारात्मक और प्रेरणात्मक बातें हुई। मैं आज तक किसी एक इंसान से नहीं मिली हूं जिसे फिल्म पसंद नहीं आई। इसके साथ जो लोग फिल्म के समीक्षक हैं, उन्हें भी फिल्म भा गई। उनके दिल को छू गई। इस फिल्म को नंबर को लेकर जो आपस में बातें हुई हैं, ये तो होता है कि फिल्म कितना करेंगी।कितना कमाएगी। यह तो छोटी सी फिल्म थी। आप देखें तो तनु वेड्स मनु रिटर्न्स जैसे फिल्म 2100 स्क्रीन पर रिलीज़ होती है। रांझणा 1500 स्क्रीन पर रिलीज़ होती है। तो नील बट्टे तीन सौ स्क्रीन पर रिलीज हुई। या साढे़ तीन सौ स्क्रीन पर। यह पहले हफ्ते की बात है। दूसरे हफ्ते में और कम हो गई। लेकिन आज सातवे हफ्ते भी यह फिल्म चल रही है। मेरे दोस्ते के माता-पिता हाल ही में थिएटर इस फिल्म को देखने गए थे।उन्होंने कहा कि बुधवार और गुरुवार को पहला शो छोड़कर पूरा शो फुल है। ये एक ही शो लगा है। मेरे ख्याल से मैंने यह उम्मीद नहीं की थी। यह फिल्म बावजूद एक फार्मूला के , डिस्ट्रीब्यूटर के लॉजिक के ,ट्रेड के लॉजिक के यह फिल्म खड़ी हुई है। मैं कह रही हूं कि पैसा उतना ही कमायेंगी,जितनी स्क्रीन और प्रिंट आप रिलीज करोंगे। जितने छोटे पैमाने पर फिल्म रिलीज होगी, आपके कलेक्शन आयेंगे। इतने छोटे पैमाने पर भी आप छह करोड बना रहे हो।दो करोड़ आपका सेटेलाइट पर बिक रहा है। वह भी अकेले खड़े होंगे। आप इन सारी चीजों को परखे तो छोटी फिल्म भी आपको दस करोड़ देरही है। जिसको आपने लीमिटेड रिलीज दी थी।यह अपने आप में बड़ी चीज है। मेरे लिए नंबर से बड़ी चीज यह है कि पचासवें दिन भी लोग फिल्म देख रहे हैं। सात आठ हफ्ते फिल्म अपने दम पर आगे चल रही है।इस उम्मीद पर कि लोग यह फिल्म देखने आ रहे हैं। एक्सिबिटर ने फिल्म लगा रखी है।इरोस तो फोन लगा के फिल्म रखने के लिए कह रहा है। ये मुझे लगा रहा है कि एक्सिबिटर को लग रहा है कि दर्शक आ रहे हैं.फिल्म लगाए रखते हैं। ऐसी फिल्म का हिस्सा होना मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है। 

-कैसा रहा यह सफर?
0 मेरी पहली फिल्म २०१० में माधेलाल कीप वाकिंग रिलीज हुई थी। पिछले छह साल में मेरे लिए नील बट्टे सन्नाटा आज तक की सबसे बड़ी फिल्म होगी। यह मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि  है। मैं अपने आप को बार बार जबरदस्ती बोल रही हूं कि यह तुम्हारी सोलो हिट है। मेरे ख्याल से यह एक इंडस्ट्री है जहां मैं अपने आप को आउट साइडर महसूस करती हूं। हां ,दोस्त अच्छे हैं। सोनम मेरी बहुतअच्छी दोस्त हैं। मैं उससे बहुत प्यार करती हूं। लेकिन काम के हिसाब से अभी भी अपने आप को बाहरी अहसास करती हूं। जैसे लोग गांव से शहर काम खोजने नहीं आते हैं। मैं भी वैसे ही सोचती हूं कि गांव से यहां शहर काम की तलाश में आयी हूं। हम आज भी कोई चकाचौंध से आंखेंचौधिया जाती हैं। यह मैं अपने आप से बार बारकह रही हूं कि यह तुम्हारी सोलो हिट है।तुम भी अब उस लिस्ट में शामिल हो,जहां पीकू, क्वीन मर्दानी और मेरी कॅाम है। कुल मिलाकर यह नील बट्टे सन्नाटाका पूरा मामला है।

-स्वरा जब इंडस्ट्री में आयी तो उससे पहले उनका सिनेमा से कैसा एसोसिएशन था?
0 सर मेरा वैसा ही एसोसिएशन था जैसा भारत में रहने वाले मीडिल क्लास के बच्चे देखते हैं। हम बॅालीवुड से इस देश में बचनहीं सकते हैं। मुझे लगता है कि हम मेरी नानी के जमाने से नहीं बच सकते थे। मेरी नानी भी फिल्मों की उतनी ही शौकीन है जितनी की मेरी मां और में खुद हूं। यह सच में फिल्मों का आल इंडिया अनुभव है। मेरे मामले में भी यही रहा है। हमारे घर में कैबल बहुत देरी से आया। हम चित्रहार और सुपरहीट मुकाबला डीडी के शो से मेरा फिल्मों से राबता हुआ। और जो डीडी पर फिल्में आती थी। मैंने ज्यादातर हिंदी फिल्में ही देखी। इनमें गोविंदा की फिल्में हीरो नंबर वन और आंखें यहसब देखा। हमने हॅाल में बहुत कम फिल्में देखी हैं।हमारे घर में हॅालमें देखने की ऐसी कोई परंपरा नहीं थी। बाहर जाकर देखना कम था।हम आपके है कौन हमारी पहली फिल्म थी।जो हमने हॅाल में देखा था।उसके बाद थोड़ा शुरू हुआ।लेकिन हर हफ्ते वाला सीन नहीं था।
कॉलेज में आकर इंटरनेशनल सिनेमा और दिल्ली में इफी में फिल्में देखी। उससे मैं इंटरनेशनल सिनेमा से जुड़ी।उसमें मेरी मां सिनेमा पढ़ाने लगी। मैं स्कूल में थी, उन्होंने पीएचडी की। कभी कभार उनके लैकचर में बैठ जाते थे। उससे मुझे रिजनल सिनेमा के बारे में पता चला। लेकिन उस तरीके से मैं बहुत ही साधारण सी दर्शक थी। ज्यादातर बॅालीवुड ही देखा।वही देखते हुए मन में विचार आया कि मुझे भी हिंदी फिल्म का हिस्सा बनना है।

-क्या विचार आया?
0 एक तो इसका खुद का कारण है ,खुदपसंदी।अपनी शक्ल सबको अच्छी लगती है।यह शक्ल और बड़ी हो जाएं और बड़ी स्क्रीन पर देखें ।इसे हजारों लोग देखें, तो और अच्छा लगता है। परफ़ॉर्मर के तौर पर मेरे लिए जो चीज़ दिलचस्प थी।  मैंने इसे तुरंत महसूस नहीं किया , वह यह कि मैं समझने लगी कि मेरी ट्रेनिंग शास्त्रीय नृत्य में हुई है। शास्त्रीय नृत्य शैली दर्शकों से दूर है। उसमें भाषा की दूरी है। वह भी पूराने तमिल में। तकनीक इतने हाई हैं कि सबको उसका मतलब नहीं समझ में आता है। फिर एक शारीरिक दूरी है। यह सब पार करने के बाद आप दर्शकों तक पहुंचते हैं। नाट्य शास्त्र के फ्रेम में देखें तो रस बाद में उत्पन्न होता है। मैं फिल्में देखने लगी तो पता चला कि यह कितना अन्तरंग माध्यम है। कैमरे की आंख पास शरीर के पास आ जाती है। इतना पास कि आप सांस भी ले तो वह भी दर्ज हो जाएगा। उसे भी एक्टिंग में शामिल कर लिया जाताहै। मुझे परफ़ॉर्मर के तौर पर यह मोहक लगा।  

-आपको किसी सीन से पता चला?
0 जी नहीं।यह कोई सीन नहीं था।यह मुझे धीरे-धीरे समझ में आ गया। यह वह सबसे बड़ी गलतफहमी थी।जिसकी वजह से मैं मुंबई आयी।  मैं जब यहां आयी।मैंने काम करना शुरू किया। मैंने पायाकि यह कहीं सेभी एक्टर का मीडियम नहीं है। यह निर्देशक का मीडियम है उसके साथ तकनीकी का मीडियम है। एक एक्टर के तौर पर आपके पास इतनी आजादी नहीं है, कि आप एक सीन के पांच टेक लें।उनमें से कौन सा टेक सीन के लिए चुनना है वह आजादी भी आपके पास नहीं है। देखा जाएं तो खुदपसंदी और गलतफहमी के मिश्रण पर मैं मुंबई आ गई। अब मैं अपनी औकाद समझ रही हूं। इस तरीके से मैं मुंबई आयी।यह मेरे लिए कठिन और मजेदार रहा। कभी कभार मैं थकावट महसूस करती हूं। सोचती हूं कि अब बस हो गया। पर सचकहूं तो यहां काम करने की संतुष्टि सबसे अधिक है। अंग्रेजी में कहते हैं ,आर्ट्स फॉर आर्ट्स सेक । यह मुझे नहीं लगता। यहां पर ऐसा नहीं है। हर कलाकार अपनी कला को दर्शकों के सामने रख रहा है।आप कितना ही सच्चा काम कर लों। अब महान गायक तानसेन भी दरबार में सबके सामने गाते थे। मैं किसी के टैलेंट पर कुछ नहीं कह रही हूं। यहां पर बिना दर्शकों के कलाकार नहीं है। दर्शकों की प्रतिक्रया कलाकार के लिए अमूल्य है। फिर हमें लगता है कि करते रहो।थकते रहो।कोई बात नहीं। मुझे लगता है कि मैंने अपने खुद की शर्तो पर काम किया है। मेरा अपना व्यक्तित्व  है। हां।मैंने रेड कारपेट पर चलना । यह सारी चीजें सीखी हैं। इसे रेड कारपेट का सलीका कहते हैं। या ग्लैमर इंडस्ट्री का अपना एक सलीका कह लें। या फिर एक बड़ा लोन लेकर एक बड़ी गाड़ी ले ली। ताकि स्टार की तरह इवेंट पर पहुंच सकूं। पर मेरा स्वभाव नहीं बदला है। मैं अपनी शर्तो पर काम कर रही हूं। कभी सफलता मिलती है कभी असफलता।यह चलता ही रहता है। मैं अपने कामसे खुश हूं। मैं खुश होकर अपने स्पेस में काम कर रही हूं।नील बट्टे ने मुझे आत्मविश्वास दिया है।

-लेकिन एक मीडिल क्लास तबके से पूरी समझ के साथ जो लड़की आ रही हैं। वह अपनी बात रख रही हैं। भले ही उसका इस्तेमाल नहीं कर पा रही हूं। ऐसे में अंदर में एक कनफ्लिक्ट रहता होगा।
0 सर, पहले बहुत कनफ्लिक्ट  था। बहुत गु्स्सा आता था। एक तरह की फिल्में देखकर।फिर ऐसी ही फिल्मों में काम मिलने लगा तो गुस्सा कम हो गया। जब तकहम उस चीज से जुड़ते नहीं हैं, तब तक वही सोच रहती है।जुड़ने के बाद हमें असलीयत समझ में आने लगती है। जैसे हम कहते हैं ना कि यार कितनी खराब फिल्म है। क्या बना दिया है।फिर जब आप फिल्मों में काम करने लगें।उनसे जुड़ने लगे तो आपको अहसास होगा कि यार गंदी फिल्मों में भी मेहनत लगती है। आप थोड़े सोफ्ट हो जाते हो। आपके अंदर संवेदनशील नजरिया हो जाता है। मेरे साथ वह हुआ है। और एक नम्र पन भी होता है।कभी कभार जो समीक्षक होता है, वह हर चीज को ना कर दे। एक निगेटिव कर देने का व्यवहार होता है। वैसे ही आउटसाइडर होने का गुस्सा होता है। जैसे कहते हैं ना अपनी फिल्म के रिलीज के दो तीन हफ्ते पहले से सारी फिल्में अच्छी लगने लगती है।सब सकारात्मक गो जाता है। पर आप जो कह रहे हैं ना जो चीज समझौता की है।

-समझौता नहीं। कई बार हम काम को संतुष्ट रखने के लिए करते हैं। हम जो लिख रहे हैं.पढ़ रहे हैं। वह हम नहीं चाहते हैं। निजी तौर पर हम उस पर विश्वास नहीं करते हैं।पर जब करते हैं तो प्रोफेशनली तरीके से करते हैं.लोगों को भी मजा आने लगता है। हमें लगता है कि शायद हम अपना काम ठीक से कर रहे हैं। लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि यह काम हम नहीं करने आए थे। इस तरह का संघर्ष कभी पैदा होता है क्या?
0 काम को लेकर मेरे साथ ऐसा कभी नहीं हुआ है।मैंने कभी नहीं सोचा है कि यह करने आए थे क्या।इसकी वजह मेरा फिल्मों का चुनाव रहा है। अगर आप कुल मिलाकर देखें तो मैंने ऐसा कभी कुछ नहीं किया है जिसके लिए मुझे शर्मींदा होना पड़े़। मेरी खराब फिल्मों के लिए भी मेरी यही सोचहै। मेरी कई फिल्में खराब हैं। जो तकनीकी तौर पर खराब हो जो उस तरीके से नहीं निकली।  मैं उनको लेकर भी शर्मीदा नहीं हूं। एक एक्टर जो होता है ना वह हर चीजों से कुछ ना कुछ सीख लेता है। मेरी बुरी फिल्मों ने भी मुझे अच्छा एक्टर बनाने में मदद की है। मुझे याद है कि मेरे पास स्क्रिप्ट आयी थी। इसमें यह था कि सारी गलतियों कामकाजी महिलाओं की ही होती है। मैंने पढ़कर रहा कि ऐसा काम मुझे नहीं करना है। मुझे गलत लग रहा है। कहानी के अनुमान सेमैं सहमत नहीं हूं। एक दूसरी फिल्म मेरे पास आयी थी।इसमें डायलॅाग था कि कुत्ते और बांगलादेशी कहीं पर भी घुस सकते हैं।मैंने कहा कि मैं यह डायलॅाग नहीं बोल सकती हूं। मुझे कहा गया कि आप नहीं बोलों पर कोई और एक्टर बोल देगा। मैने लढ़ कर वह लाइन निकलवा दी। मैंने कहा कि यह लाइन ही गंदी है। किसीको भी नहीं बोलना चाहिए।मतलब उस टाइप का है.जहां मैं बहस कर लेती हूं।राझंणा के समय मेरे जीवन में बहुत बड़ा क्राइसेस आया था। मेरी बहुत लड़ाई हुई अपने करीबी दोस्तों से। जेएनयू के जो मेरे करीबी दोस्त थे, वह मुझे कहने लगे कि तुम यह फिल्म कर कैसे सकती हो। वो उसवक्त थोड़ाऐसा लगा कि क्या सच में मैंने इतनी बड़ी गलती कर दी। बाद में मुझे लगा कि नहीं। फिल्में राजनीतिक मत पर नहीं हो सकती हैं। फिल्मों का काम निजी जीवन के मुद्दें में है। हम जिसे ग्रे कहते हैं ना, उसका विस्तार करना ।
मैं यह मानती हूं।राझंणा मैंने लिखी नहीं है।इस वजह से यह मेरी जिम्मेदारी नहीं है। एक्टर के तौर पर मेरा काम अपने किरदार को अच्छे से करने का है। लेकिन उसके बाद भी मुझे कहा गयाकि तुम यह फिल्म कैसे कर सकतीथी। मैंने कहा कि मैं करसकती थी। मेरे लिए राझंणा में सबसे जरूरी यह था कि जोया कभी डरी नहीं। मेरे लिए यह सकारात्मकचीज है। आज तक जितनी भी हिंदी फिल्में बनी हैं,उसमें लड़का पीछा कर रहा है और लड़की अंत में लड़के को हां कह देती है।ऐसी कई फिल्में हैं। राझंणा में आपने स्टोकिंग दिखाई है। कम से कम अंत तक अपने मना करने पर डटी रही।लड़की जब अंत में कहती है किमुझे तुमसेप्यार हो रहा है तो कुंदन कहता है कि तुम झूठ कह रही हो। मेरे लिए यह दिलचस्प था।
मैं ना सर अब अपने आप को संतुलित जगह पर महसूस कर रही हूं। मैं इसे बनाएं रखूं यही उम्मीद है।आप ऐसे हालात में कब पहुंचते हैं जहां पर ना चाहतेहुए भी आपको काम करते रहना पड़े।ऐसे हालात तब आते हैं जब आपकी आर्थिक जरुरत हो या आपका सपना इस तरह आप पर हावी हो कि आप सोचें कि कुछ भी करके मुझे स्टार बन जाना है। मेरे अंदर सेअब यह धीरे धीरे जा रहा है। मैंने यह महसूस किया है कि स्टार बनना अपने हाथ में नहीं है।यह मुमकिन नहीं है कि इंडस्ट्री में आयाहुआ हर इंसान सलमान या शाह रूख खान बन जाएं। अच्छा एक्टर बनना अपने हाथमें है।जो अपने हाथ में है, उस काम पर हमें मेहनत करनी चाहिए। जोचीज आपके हाथ में नहीं है उसके लिए खून जलाकर कोई मतलब नहीं है।

-एक टाइम ऐसा आता है कि दर्शकों को आपकी हर बात अच्छी लगने लगती है।आप कुछ गलत कहों तो उसे भी दर्शक सही मानतेहैं।जो कलाकार पॉपुलर हो रहा है , वह इस प्यार की मात्रा को सही तरीके से समझ पाता है. कई लोग गलती करने लगते हैं।
0 मेरे साथ ऐसा हुआ ही नहीं है। मुझे हमेशा दर्शकों का साथ ,उनका प्यार और प्रतिक्रयाएं सकारात्मक तरीके से मेरे पास आती रही हैं। मैं जैसी हूं उस हिसाब से अब चीजें बदली हैं।अब सोशल मीडिया का दायरा बढ़ गयाहै। मेरे साथ यह दिलचस्प हुआ कि जैसे –जैसे मेरी पॉपुलैरिटी  बढ़ी। पहचान मिलने लगी।वैसे ही देश में होने वाले मुद्दें पर कमेंट करने पर मुझे गालियां भी पड़ी। मुझे इस तरह का सामना हुआ है। अब जैसे मैंने किसी राजनीतिक मसले पर ट्विट किया तो हफ्ते भर में मुझे ढेर सारी गालियां सुननी पड़ती हैं। मुझे ऐसी प्रतिक्रिया भी मिली है कि मैं रंगोली का बहुत बड़ा फैन था।अब तुम्हारे कारण नहीं देखूंगा। यह भी सुना है कि मैं तुम्हारे काम से और एक्टिंग से प्यार करता हूं।पर तुम्हारे राजनीतिक रैवेये से नफरत करता हूं।अब इस पर आप कैसेक्या  कर सकते हैं। मुझे कभी बह जाने का मौका ही नहीं मिला। एक जो अहसास है कि सब मुझसे प्यार करते हैं। यह हुआ ही नहीं। मैं ऐसा नहीं कह रही हूं कि लोग मुझे प्यार नहीं करते। मैं यह किसी असुरक्षा की भावना से नहीं कह रही हूं। यह मैं इतनी गालियां खाती है अपने दूसरे पहलू के लिए। मैं उनकी सोच समझती हूं। मैं भी फिल्मी परिवार से नहीं हूं।मैं भी दर्शक हुआ करती थी।मैं जानती हूं कि वह अहसास क्या है।वह अहसास नहीं एक टाल –मटोल है। वह खदु अपनी भावनाएं नहीं समझ पा रहे हैं। हम खुद उन की भावनाएं समझ नहीं पा रहे हैं। उनका जो प्रेम है वह आपके लिए नहीं है। वह आपके छवि के लिए है,जो स्क्रीन पर है। लेकिन आपकी यह छवि केवल स्क्रीन पर है। उसके बाद तो आप जो खुद हो वैसे भी आप नहीं रहते हो।

-वैसे कहना नहीं चाहिए। पर जो फिल्म परिवार से आते हैं, वह इसे जी रहे हैं। आफ स्क्रीन उनकी अपनी कोई छवि नहीं है। ना वह चाहते हैं उस छवि को तोड़ना। वह उसे शो करते हैं। लेकिन जो आउटसाइडर हैं,उन्हें लंबे समय तक उस छवि में रहना होता है। उन्हें हर दर्द महसूस होता है।खैर, यह बहुत लंबा मामला है।
0 मेरे ख्याल से वह कभी नहीं जाएगा।क्योंकि आप वह याद नहीं जाती है। मैं हमेशा बोलती हूं कि कैसे मैंने यह कमाया है मुझे याद है। स्पोर्ट बॉय जो मेरे पीछे खड़ा है वह मेरी कमाई है। वह बंदा जोमेरी चेयर बैठने के लिए खींच रहा है। मुझे आडिशन की समय की बात याद है जब लोग कहा करते थे कि तुम लीड मटैरियल नहीं हो।मुझे लगता है कि यह वाली बातें शाहरुख,अक्षय कुमार और विशाल भरद्वाज को याद होगी। इसके लिए एक्टर होना जरूरी नहीं है। यह सारी चीजें इंडस्ट्री के कलाकार और आउटसाइडर कलाकार में अंतर है। कभी कभी ना मैं स्टार बच्चे को देख कर कहती हूं कि जो पैसा पॅावर इनसाइडर वाला जो विश्वास आता है ना वह अलग चीज है। यह हम आउटसाइडर में है ही नहीं। मुझे इससे कोई मतलब भी नहीं है। मैं आज उनके जैसी एक्टर नहीं हूं क्योंकि मैं वहां पैदा नहीं हुई थी। मैं जहां पैदा हुई थी।वहां मेरी एक किस्म की शिक्षा और सफर रहा है। मैंने नौकरी की है।दस जगह घूमी हूं तब जाकर मैं यहां पर आयी हूं। इस वजह से मैं आज नील बट्टे सन्नाटा का किरदार कर पा रही हूं। मुझे यहां पर वह प्रशंसा मिल रही है।एक्टर के तौर पर मुझे यह बात याद रखनी चाहिए।

-जब आप एक्टर बनने का सोच रही थी। या आयी थी तो उस समय ऐसी कौन सी अभिनेत्रियां थी, जिनको देखकर आप सोच रही थी कि कुछ इनकी तरह मेरा मामला हो जाएं?
0 मैं शाह रूख बनना चाहती थी। मैं कोई अभिनेत्री बनने नहीं आयी थी। मगर मेरे जहन में कोई रोल मॅाडल रहा ही नहीं। मैंने जिनको एडमायर किया है,तब मुझे कोई अभिनेत्री के बारे में पता ही नहीं था।अब मैं देखती हूं तो लगता है कि मेरिल स्ट्रीप और ओरजिनियल मोरे। यह दोनों बहुत ही बेहतरीन अदाकार हैं।पर उम्र के बावजूद काम कर रही हैं। एक साठ साल के ऊपर हैं।एक पचाससाल के ऊपर हैं। पर आज तककाम कर रही हैं। मुझे हॅालीवुड की यह बात अच्छी लगती है.वहां पर भी उम्र का शोषण तंत्र है। जैसे मुंबई में हैं। मैं रोज सुबह उठकर देखती हूं कि मेरे चार बाल सफेद हो गए। या कितने बाल सफेद हुए हैं। इसके अलावा मुंबई में यहां के सिनेमा में। मुझे रानी मुखर्जी।उन्होंने हर तरह का काम किया है।आज से समय में बात करूं तो प्रियंका चोपड़ा हैं। मुझे लगता है कि वह जबर्दस्त महिला हैं। वह आगे बढ़ती ही जा रही हैं। उनको कोई रोक नहीं सकता है। अभिनेत्री की बातकरूं तो मुझे दिव्या दत्ता पसंद हैं। वह हमारे इंडस्ट्री की सबसेबेहतरीन अभिनेत्री हैं। इनके अलावा कोई नहीं था। मेरे मन में माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूं वैसी कोई अहसासनहीं था। मैं शाह रुख जैसा बनना चाहती थी। ठीक है।

-हिंदी सिनेमा का जिस तरह से शुरुआत से लेकर अब तक स्तर बढ़ा है। एक तो दर्शकों के साथ होता है दूसरा मेकर्स के साथ होता है।उस हिसाब से देखते हुए हम लोग हिंदी सिनेमा को कहां पा रहे हैं? यह तराजू पर तौलने की बात नहीं है।हम केवल किस रास्ते पर जा रहे हैं? इसके बारे में आप क्या सोचती हैं?
0 मुझे लगता है कि भारतीय सिनेमा के लिए यह बहुत ही दिलचस्प दौर है। जोसत्तर का दशक था। न्यू वेव वह बहुत ही कमाल का पल था। पचास और साठ का दशक गोल्डम पीरियड था। मेरे ख्याल से यह वो चीज नहीं हो रही है। पर वैसा ही नया हिंदी सिनेमा में उत्पन्न हो रहा है। हमारे लिए उत्साहित समय है।आज जिस तरह सेइंडस्ट्री नई कहानी , नए चेहरों के प्रति, नए कहानी कहने के प्रति जो खुली है. वह कमाल की चीज है। नवाज जैसा एक चेहरा अपने खुद के बल पर एक स्टार है। ऐसी कई कहानियां है। हमारे देश में एक सैराट जैसी फिल्म बनी, जोकि एक रिजनल फिल्म है। जो हिंदी सिनेमा का दर्शक है, वह कितनी सारी तादाद में सैराद देखकर आया।ऐसेकई सारे उदाहरण हैं। मुझे रिजनल सिनेमा के बारे में इतना पता नहीं है। तमिल सिनेमा में यही हो रहा है।मराठी सिनेमा की अपनी एक सभ्यता रही है। बाकी सब रिजनल में भी बढ़त हो रही है। मुझे ज्यादा पता नहीं है। इतना ज्ञान नहीं है। यह अच्छी चीज है।अगर हम यह आइडिया छोड़ दे कि हमारी स्पर्धा सौ करोड़ वाली फिल्म से है, या बड़ेस्टार से है।ऐसा सोचे कि हम उन्हें तबाह करदेंगे। पर नहीं।हम क्यों करे ऐसा। वो अपनी इकोनोमी है। वह चलती रहेगी।हमें भारत ने हम जिस किस्म के लोग है.हमारे नेता और अभिनेता लार्जर देन लाइफ लगें।हमारे अंदर वह ख्वाहिश है। भक्ति भाव है। हम शुरू से ही ऐसे ही लोग हैं। वो अपनी जगह पर रहेंगी। और इसे रहना भी चाहिए। यह इंटरटेनमेंट ही है। मैं भी जाती हूं हंस कर आती हूं। हैपी न्यू ईयर में मुझे बहुत मजा आयाथा। मगर आप अगर यह प्रतियोगिता छोड़कर सिनेमा बनाओं और अपने दम पर बनाना चाहिए। मेर ख्याल से निर्माताओं और डिस्ट्रीब्यूटर  में एक विश्वास आ जाएं। यह तभी होगा जब उन्हें दिखाई पड़ेगा कि फिल्में काम करें। फिल्में आठ हैं पर उसके धंधे का एंगल ज्यादा है। पिछले दो साल में सबसे सकारात्मकऔर उत्साहितचीज जोहुई है। वह यह है कि पीकू, एनएच टैन,पीकू ,नीरजा और नील बट्टे स्नाटा जैसी फिल्में। छोटीफिल्में। बडे़ स्टार नहीं हैं। महिला प्रधान फिल्में हैं। इनमें कोई मेल स्टार नहीं है।फीमेल स्टार हैं। यह फिल्में पैसा कमा रही हैं। यह कमाल की बात है।इससे बड़ा उदारहरण नहीं है। हमारा सिनेमा देखने वाले दर्शक बदल रहे हैं। समयबदल रहा है। आज नील बट्टे सन्नाटा अपना पचासवां दिन सेलिब्रेट केवल अपने दम पर कर रही है। इस पर इरोस ने दूसरे हफ्ते के बाद प्रमोशन नहीं हुआ है. पेपर में एड तक दूसरे हफ्ते के बाद नहीं चली हैं। किसी किस्म का निर्माता की तरफ से कोई प्रचार हुआ है। यह शेयर दर्शकों की दिलचस्पी है। मुझे उम्मीद हैकि यह अच्छा समय आगे बढ़ेगा। यह जो सेंसर शिप वाला मामला चला, यह और बढ़िया चीज है।

-आपकी जो कोशिश है उसको सराहा जा रहा है। कई बार लोग समझ नहीं पाते हैं?
0 मुझे ऐसा नहीं लगता सर।मैं नील बट्टे सन्नाटा की बात करूंगी। वह इसलिए भी कि मैं इस फिल्म से जुड़ी रही।हां. लिसेन अमाया मेरी एक और फिल्म आयी थी। उसे इस तरह की प्रतिक्रया नहीं मिली।यह फिल्म भी प्यारी थी। मुझे नहीं पता कि इस फिल्म को नील बट्टे सन्नाटा जैसी प्रशंसा नहीं मिली।मुझे नहीं पता क्यों। मैं इस फिल्म में इतना शामिल नहीं हुई थी। लेकिन उसको भी लोगों ने देखा। यह फिल्म भी दिल्ली में चार हफ्ते चली है। ऐसानहीं है कि छोटी फिल्मों के लिए कठिनाई नहीं है। हमारे लिए चुनौती क्या है। जैसे कहते हैं ना छोटी मछली को बड़ी मछली की जरुरत पड़ती है।लंचबाक्स को कऱण जौहर की आवश्यकता थी।नील बट्टे सन्नाटा को आनंद एल राय की। क्या हम उस कगार पर कभी आयेंगे कि इन छोटी फिल्मों को बड़े मेकर्स की जरुरत नहीं पड़ेगी।

-या इन छोटी फिल्मों को बड़े मेकर्स शुरू से ही साथ में ले लें।
0 यह हो रहा है सर।एकाध फिल्मों के लिए। जैसेकि आनंद सर को देख लीजिए। वह छोटी फिल्मों को कोप कर रहे हैं। हम बदलाव की औऱ हैं। ऐसा नहीं है कि कुछ बदल नहीं रहा है। मेरा कहना है कि सबसे ज्यादा खेल बदलने वाले दर्शक हैं।निर्माता औऱ एक्टर तो कुछ भी नहीं हैं। एक्टर का कुछ नहीं है। मुझे जो फिल्म का प्रस्ताव मिलेगा मैं कर लूंगी। कल को रोहित शेट्टी मुझे फिल्म दें।मैं कूद के कर लूंगी। मुझे वहां से काम नहीं मिल रहा है।मिलता तो उछल कर करदेती है। दर्शकों के दिमाग को बदलने का असर सोशल मीडिया पर है।इसका बहुत बड़ा प्रभाव है।

-छोटी फिल्में केवल शहरों को ही प्रभाव में ला पाता होगा।
0 सर, अभी तो छोटी फिल्में मल्टीप्लेक्स में ही चल रही हैं। आप नील बट्टे का ही कलेक्शन देख लें।

-निल बटे पटना में रिलीज नहीं हुई?
पटना में हुई थी। केवल एक हफ्ते में।

-नहीं पहुंची थी। फेसबुक पर इतना शोर हुआ था। फिल्म वहां रिलीज ही नहीं हुई।
0 अच्छा सर। मैंने देखा ही नहीं। पर सर कलेक्शन आप देख लीजिए। नील बट्टे ने दिल्ली ,मुंबई और बैग्लोर ।खासकर बैंगलोर में भरपूर कलेक्शन किया है।मल्टीप्लेक्स सेहै।

-महेश भट्ट से मैंने कहा था कि आपके पैरों की कालीन नए बच्चों ने छिन ली।तो उन्होंने कहा था कि जब तक इनकी फिल्में जौनपुर में नहीं कमाएंगी।तब तक मुझे कोई खतरा नहीं है।
 0 सही बात है सर।

-वह तो दोनों चीजें समझते हैं। वह अच्छी और बुरी फिल्मों को समझते हैं। दूसरी बात यह है कि आप चाहों तो 0 इसे साबित कर सकते हो। जो नवाज,स्वरा, रिचा ये सारे लोग मैनस्ट्रीम फिल्में में छोटे रोल कर लेते हैं। छोटी फिल्मों में लीड रोल करते हैं। वह चर्चित हो रहेहैं। वह यह निरंतर कर रहे हैं।
सर।निरंतर ही होगा।मजबूरी का नाम महात्मा गांधी। बिल्कुल महेश भट्टवाली बात है।आपको अगर एक वास्तवित और लंबी उम्र वाला करियर चाहिए तो कमर्शियल स्पेस क्रेक करना ही पड़ेगा।

-बीस साल पहले क्या होता था। स्मिता पाटील एक किस्म की फिल्में किया करती थी। एक फर्क लेकर आती थी। अभी की लड़कियां उस तरीके का अंतर नहीं ला पाती हैं?
0 क्योंकि यह फर्क सिनेमा में नहीं रहा।अब पैरलल सिनेमा वाली कैटगरी नहीं रहा।आपका पीकू एक तरीके से वह ना पैरलल है ना तो कमर्शियल है। अब उस तरह का आर्ट सिनेमा बन नहीं रहा है। ना वो निर्माता रहा। ना वो एनएफडीसी रहा।अब वो नहीं रहा।अब दौर अलग है। मेरे लिए यह बहुत ही सचेत करने वाला चुनाव है। मुझेलगता है कि मजबूरी का नाम महात्मा गांधी है। दर्शक कमर्शियल फिल्मों के हैं। आज मैं जब अपनी गाड़ी चलाकर डीएन नगर के सिग्नल पर रुकतीहूं तो भीख मांगने वाली बच्ची कहती है कि वो देखों सलमान की बहन।जब कि नील बट्टे सन्नाटा थिएटर में लगी हुई है। यह सच्चाई है। मेरी पहचान यह तो वहां से आ रहा है। यह हमें करते रहना पड़ेगा। अगर मुझे लंबा करियर चाहिए तो। हर वो एक फिल्म मुझे नील बट्टे जैसी फिल्मों की तरह और फिल्में दे रही हैं। एक्टर की तौर पर मैं कभी किसी फिल्म को पढ़कर यह नहीं सोचा है कि यह कमर्शियल है या नहीं। मैंने केवल अपना रोल देखा है। मुझे नहीं पता था कि प्रेम रतन छोटी फिल्म होगी या बड़ी हिट होगी। ये सलमान की फिल्म है या नहीं। मुझे इतना पता था कि यह फिल्म रविवार तक पूरा भारत देख लेगा। इसमें मेरा बहुत अच्छा रोल होगा।

-हां अनुभव के लिए काम आता है।
0 जी सर।अनुभव मिलता है। मैं तो हर तरह का रोल करना चाहती हूं। मैं तो इंतजार कर रही हूं कोई मुझे आइटंम गाना नहीं दे रहा है।

-उसमें भी बुरा क्या है?
0 जी। अविनाश दास कीअनारकली में मेरा अनुभव अच्छा रहा।एक तरह से मुझे आइटम गाना करने को मिला। एक तरीके से बेहतरीन कहानी।इसमें कंटेंट भी है और कमर्शियल एंगल भी है। मेरे लिए बहुत उत्साहित फिल्म है अनारकली।