Search This Blog

Thursday, March 31, 2016

दरअसल : शॉर्ट फिल्‍मों के बढ़ते प्‍लेटफार्म

-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले दिनों यशराज फिल्‍म्‍स के बैनर तले वाई फिल्‍म्‍स ने छह शॉर्ट फिल्‍मों के एक पैकेज की जानकारी दी। इसके तहत प्रेम से संबंधित छह शॉर्ट फिल्‍में पेश की जाएंगी,जिनमें सुपरिचित कलाकार काम करेंगे। हालांकि इनके लेखन और निर्देशन से कुछ नई प्रतिभाएं जुड़ी हैं,लेकिल यशराज फिल्‍म्‍स के बैनर की वजह से यह पैकेजिंग आकर्षक हो गई। पैकेजिंग को आकर्षक बनाने के लिए हर शॉर्ट फिल्‍म के साथ एक म्‍यूजिक वीडियो भी जोड़ा गया। अच्‍छा प्रचार हुआ। सभी पत्र-पत्रिकाओं ने इस पर ध्‍यान और कवरेज दिया। यशराज फिल्‍म्‍स की वजह से यह रिलीज चर्चा में रही। अगर इन शॉर्ट फिल्‍मों के कंटेंट की बात करें तो वह बहुत संतोषजनक रहा। प्रचार के अनुरूप इसके दर्शक नहीं बने।
अगर थोड़ा अलग ढंग से विचार करें तो यशाराज फिल्‍म्‍स की यह  पहल कुछ नए संकेत दे रही है। माकेटिंग और बिजनेस के क्षेत्र में देखा गया है कि छोटी कोशिशों की चर्चा और कामयाबी को बड़ी कंपनियां हथिया लेती हैं। उन्‍हें बड़े स्‍तर पर बाजार में भेजती हैं और ट्रैडिशनल ग्राहकों को कंफ्यूज करने के साथ ही कुछ नण्‍ ग्राहक तैयार करती हैं। अंतिक प्रभाव में ऐसी कोशिशें किसी शगूफे या घटना से अधिक महत्‍व नहीं रखतीं। बड़े शहरों और महानगरों में फाइव स्‍टार होटल साल में एक-दो बार स्‍ट्रीट फूड के फेस्टिवल करती हैं। उनका इरादा अपने नियमित ग्राहकों को स्‍ट्रीट फूड का स्‍वाद और माहौल देना होता है। कभी ऐसे फेस्टिवल में स्‍ट्रीट फूड चखने का मौका मिला हो तो आप ने पाया होगा कि उनका स्‍वाद गलियों,चौराहों और बाजारों के स्‍वाद का मुकाबला नहीं कर पाता। कुछ ऐसा ही यशराज फिल्‍म्‍स की शॅर्ट फिल्‍मों के साथ हुआ। कलाकारों और मेकिंग की आकर्षक पैकेजिंग के बावजूद यह प्रयास दर्शकों को लुभाने में सफल नहीं रहा। अभी यह समाप्‍त नहीं हुआ है,लेकिन इसके लोकप्रिय होने की संभावना नहीं दिख रही है।
दरअसल,शॉर्ट फिल्‍में लघु पत्रिकाओं की तरह युवा और नई प्रतिभाओं का सामूहिक प्रयास होती हैं। शॉट्र फिल्‍मों की वर्त्‍तमान लोकप्रियता के पहले युवा निर्देशकों को टीवी ऐसा प्‍लेटफॉर्म दे रहा था। अभी के ज्‍यादातर पॉपुर निर्देशक इसी रास्‍ते से आए हैं। पिछले दशे के अंत से शॉर्ट फिल्‍मों के अनेक प्‍लेटफॉर्म वजूद में आए हैं। यू ट्यूब और अन्‍य वीडियों प्‍लेटफॉर्म इसमें भारी मददगार हो रहे हैं। अभी तो शॉर्ट फिल्‍मों के फेस्टिवल भी आयोतजत हो रहे हैं। कतिपय लोकप्रिय कलाकार अपने खाली समय का उपयोग ऐसी फिल्‍मों में करते हैं और खुद को मांजते हैं। युवा निर्देशकों के लिए यह कारगर जरिया है। वे अपनी प्रतिभा,योग्‍यता और क्षमता का परिचय ऐसी छोटी फिल्‍मों से देते हैं। और फिर फीचर फिल्‍म का मौका पाते हें। पिछले साल उभरे निर्देशक नीरज घेवन का उदाहरण सामने हैं। अभी तो कारपोरेट के अधिकारी,स्‍टूडियों और स्‍थापित कलाकार भी युवा निर्देशकों को शॉर्ट फिल्‍मों के माध्‍यम से अपना नमूना पेश करने की हिदायत देते हैं।
यकीनन,शॉर्ट फिल्‍मों के प्‍लेटफार्म बढ़ गए हैं। कम लागत और निवेश से शॉर्ट फिल्‍में तैयार होती हैं। सही पेशगी हो जाए तो उनकी चर्चा होती है। माना जाता है कि ऐसे निर्देशक फीचर फिल्‍में भी कर सकते हैं। यह कुछ-कुछ उपन्‍यास लिखने के पहले की वैसी तैयारी है,जब लेखक कहानियों में हाथ आजमाता है। अगर उसे सराहना और तारीफ मिलती है तो बड़े फलक पर कुछ लिखता है। फिल्‍मों की क्रिएटिव दुनिया में मौका पाना और खुद के लिए जगह बना लेना आसयान नहीं होता। शॉर्ट फिल्‍मों की लोकप्रियता से एक और फायदा होगा कि छोटे शरों और कस्‍बों की कहानियां भी ग्‍लोबल स्‍तर पर देखी जा सकेंगी। उनमें से जो बेहतर होंगी,वे बाद में फीचर फिल्‍म का भी रूप ले सकती हैं। हां,बीच-बीच में बड़े खिलाड़ी युवा प्रतिभाओं के इस खेल में भंडोल पैदा करने आते रहेंगे।

फिल्‍म समीक्षा : रॉकी हैंडसम



एक्‍शन से भरपूर
-अजय ब्रह्मात्‍मज
निशिकांत कामत निर्देशित रॉकी हैंडसम 2010 में आई दक्षिण कोरिया की फिल्‍म द मैन फ्रॉम नोह्वेयर की हिंदी रीमेक है। निशिकांत कामत के लिए रितेश शाह ने इसका हिंदीकरण किया है। उन्‍होंने इसे गोवा की पृष्‍ठभूमि दी है। ड्रग्‍स,चाइल्‍ड ट्रैफिकिंग,आर्गन ट्रेड और अन्‍य अपराधों के लिए हिंदी फिल्‍म निर्देशकों को गोवा मु‍फीद लगता है। रॉकी हैंडसम में गोवा सिर्फ नाम भर का है। वहां के समुद्र और वादियों के दर्शन नहीं होते। पूरी भागदौड़ और चेज भी वहां की नहीं लगती। हां,किरदारों के कोंकण और गोवन नामों से लगता है कि कहानी गोवा की है। बाकी सारे कार्य व्‍यापार में गोवा नहीं दिखता।
बहरहाल, यह कहानी रॉकी की है। वह गोवा में एक पॉन शॉप चलाता है। उसके पड़ोस में नावोमी नाम की सात-आठ साल की बच्‍ची रहती है। उसे रॉकी के अतीत या वर्त्‍तमान की कोई जानकारी नहीं है। वह उसे अच्‍छा लग्ता है। वह रॉकी से घुल-मिल गई है। उसे हैंडसम बुलाती है। नावोमी की मां ड्रग एडिक्‍ट है। किस्‍सा कुछ यों आगे बढ़ता है कि ड्रग ट्रैफिक और आर्गन ट्रेड में शामिल अपराधी नावोमी का अपहरण कर लेते हें। दूसरों से अप्रभावित रहने वाला खामोश रॉकी हैंडसम रिएक्‍ट करता है। वह उस बच्‍ची की तलाश में निकलता है। इस तलाश में वह अपराधियों के अड्डों पर पहुंचता है। उनसे मुठभेड़ करता है। पुलिस को सुराग देता है। उसका आखिरी मुकाबला केविन परेरा से होता है। इस दरम्‍यान वह नृशंस तरीके से अपराधियों को कूटता और मारता है। उनकी जान लेने में उसे संकोच नहीं होता।
रॉकी हैंडसम एक्‍शन फिल्‍म है। एक्‍शन के लिए रॉकी और नावोमी के बीच के इमोशनल रिश्‍ते का सहारा लिया गया है। उस रिश्‍ते की प्रगाढ़ता को लेखक-निर्देशक हिंदी फिल्‍मों के प्रचलित तरीके से नहीं दिखा पाए हैं। नतीजतन फिल्‍म में इमोशन की कमी लगती है। रॉकी हैंडसम देखते हुए लगता है कि जापानी और दक्षिण कोरियाई हिंसक और एक्‍शन फिल्‍मों का भारतीयकरण करते समय हमें भारतीय भाव-अनुभाव का पुट डालना चाहिए। सिर्फ एक्‍शन से दर्शक जुढ़ नहीं पाते। निशिकांत कामत ने हिंदी फिल्‍मों की एक्‍शन फिल्‍मों के ढांचे का इस्‍तेमाल नहीं किया है,लेकिन वे दक्षिण कोरियाई फिल्‍म की थीम को तरीके से भारतीय जमीन पर रोप भी नहीं पाए है।
हम जॉन अब्राहम की खूबियों और सीमाओं से परिचित हैं। निशिकांत कामत ने उनका बखूबी इस्‍तेमाल किया है। उन्‍होंने जॉन का निम्‍नतम संवाद दिए हैं,लेकिन बाकी किरदार बोर करने की हद तक बड़बड़ करते हैं। एक्‍शन दृश्‍यों में जॉन अब्राहम की गति और चपलता देखने लायक है। बाकी हिंदी फिल्‍मों के एक्‍शन हीरो की तरह वे दुश्‍मनों को मार कर भी खुश नजर नहीं आते। उनके लिए यह रेगुलर मशीनी काम है। नावोमी तक पहुंचने के लिए किसी भी प्रकार की हिंसा से उन्‍हें गुरेज नहीं है। फिल्‍म में केविन परेरा की भूमिका में फिल्‍म के निर्देशक निशिकांत कामत ही हैं। उन्‍के अभिनय और मैनरिज्‍म में  पिछली सदी के आठवें-नौवें दशक के खलनायकों की झलक है। उनकी शैली में एक साथ कुलभूषण खरबंदा,अमरीश पुरी और अजीत की झलक मिलती है। यों बाकी फिल्‍म की पटकथा और संरचना भी पुरानी फिल्‍मों जैसी है। नतीजतन,एक्‍शन का नयापन पुरानी फिल्‍मों के फार्मेट में उभर कर नहीं आ पाता।
फिर भी एक्‍शन,मारधाड़ और पर्दे पर खून-खराबे के शाकीन दर्शकों को यह फिल्‍म पसंद आएगी। हर फिल्‍म में लव और इमोशन की चाहत रखनेवाले दर्शक निराश हो सकते हैं। निशिकांत कामत ने एक नई काशिश जरूर की है और उन्‍हें जॉन अब्राहम का बराबर सहयोग मिला है।
अवधि- 126 मिनट
स्‍टार- ढाई स्‍टार

Friday, March 25, 2016

दरअसल : खेलेंगे हम होली



-अजय ब्रह्मात्‍मज

फिल्‍मों की होली में मौज-मस्‍ती,छेड़खानी और हुड़दंग पर जोर रहता है। खासकर नायक-नायिका के बीच अबीर,रंग और पिचकारी का उपयोग ठिठोली के लिए ही होता है। रुठने और मनाने के एक उपक्रम और प्रयोजन के रूप में फिल्‍मकार इसका इस्‍तेमाल करते रहे हें। चूंकि यह सामूहिकता का पर्व है,इसलिए प्रेमियों को झ़ुंड में एकांत का बहाना मिल जाता है। उन्‍हें नैन-मटक्‍का और रंग- गुलाल लगाने के बहाने बदन छूने का बहाना मिल जाता है। चालीस पार कर चुके पाठक अपने किशोरावस्‍था में लौटें तो महसूस करेंगे कि होली की यादों के साथ उन्‍हें गुदगुदी होने लगती है। उन्‍हें कोमल प्रेमी-प्रेमिका का कोमल स्‍पर्श याद आने लगता है। लड़के-लड़कियों के बीच आज की तरह का संसंर्ग नहीं होता था। अब तो सभी एक-दूसरे को अंकवार भरते हैं। पहले होली ही मिलने और छूने का बहाना होता था। हंसी-मजाक में ही दिल की बातें कह देने का छूट मिल जाती थी। कोई शरारत या जबरदस्‍ती नागवार गुजरी तो कह दो-बुरा ना मानो होली है।
हिंदी फिल्‍मों में आरंभ से ही रंगो का यह त्‍योहार पूरी चमक के साथ आता रहा है। फिल्‍मों के रंगीन होने के बाद निर्माता-निर्देशकों ने रंग और गुलाल की रंगीन छटाओं से पर्दे को इंद्रधनुषी बना दिया।कुछ फिल्‍मकारों ने होली के दृश्‍यों और प्रसंगों को अपनी कहानियों में पिरोया और उसे फिलम का अनिवार्य हिस्‍सा बना दिया तो कुछ फिल्‍मकारों के लिए होली भी आयटम बना रहा। होली के दृश्‍यों को लंबा करने के लिए हमेशा गीतों की जरूरत पड़ी। गीत आए तो उनके साथ नाच और गाना भी लाजिमी हो गया। शायद ही कोई फिलम हो जिसमें होली हो और होली के गीत न हों। इन गीतों के महत्‍व और प्रभाव का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि गांव-समाज के होली आयोजनों में इन फिल्‍मी गीतों का ही सहारा रहता है। बिरज में होली खेलत नंदलाल से लेकर लेट्स प्‍ले होली तक हम हासेली गीतों को अपनी बिल्डिंगो,सोसायटी और मोहल्‍लों में डीजे के साउंड सिटम पे सुनते और रंगों से सराबोर होते हैं। अमिताभ बच्‍चन की आवाज में सिलसिला का गीत रंग बरसै तो होली का राष्‍ट्रीय गीत ही बन गया है। गौर करें तो इन सभी गीतों के मूल में छेड़खानी का भाव है।
अभी हिंदी फिल्‍मों में होली के दृश्‍य कम हो गए हैं। दरअसल,हिंदी फिल्‍मों में भातीयता और सामजिकता के कम होने से तीज-त्‍योहारों पर निर्देशको का ध्‍यान नहीं जाता। संजय लीला भंसाली की गोलियों की रासलीला-रामलीला- में होली का प्रसंग था। इस फिल्‍म में होली के बहाने ही दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह के बीच चुंबन की संभावना जुटाई गई। इसी प्रकार ये जवानी है दीवानी में दीपिका पादुकोण ने बलम पिचकारी के असर का बखान करते हुए रणवीर कपूर के साथ प्रेम-मिचौली की। 2016 की किसी फिल्‍म में अभी तक होली के गानों या दृश्‍यों की कोई खबर नहीं आई है।
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में राज कपूर और उनके बाद अमिताभ बच्‍चन के यहां की होली मशहूर रही है। उनके बाद के पॉपुलर स्‍टारों ने एकाध बार होली का आयोजन किया,लेकिन वे उसे वार्षिक आयोजन नहीं बना सके। सच्‍चाई यह है कि हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री खेमों में बंट चुकी है। इनसाइडर और आउटसाइडर का परोक्ष संघर्ष तेज है। ऊपरी तौर पर एक परिवार का दावा करने वाली इस इंडस्‍ट्री का प्रवेश द्वार तो एक ही है,लेकिन घर के अंदर दीवारें खींच गई हैं और चूल्‍हे अलग हो चुके हैं। यही कारण है कि कोई होली मिलन का आह्वान नहीं कर पा रहा है। डर है कि भीड़ नहीं उमड़ी तो हेठी हो जाएगी। कुछ सालों पहले एक-दो बड़े स्‍टारों ने कोशिश तो की थी कि वे अमिताभ बच्‍चन की परंपरा को आगे बढ़ाएं,लेकिन वे विफल रहे।