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Friday, February 26, 2016

फिल्‍म समीक्षा : अलीगढ़



साहसी और संवेदनशील
अलीगढ़
-अजय ब्रह्मात्‍मज

हंसल मेहता की अलीगढ़ उनकी पिछली फिल्‍म शाहिद की तरह ही हमारे समकालीन समाज का दस्‍तावेज है। अतीत की घटनाओं और ऐतिहासिक चरित्रों पर पीरियड फिल्‍में बनाना मुश्किल काम है,लेकिन अपने वर्त्‍तमान को पैनी नजर के साथ चित्रबद्ध करना भी आसान नहीं है। हंसल मेहता इसे सफल तरीके से रच पा रहे हैं। उनकी पीढ़ी के अन्‍य फिल्‍मकारों के लिए यह प्रेरक है। हंसल मेहता ने इस बार भी समाज के अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के व्‍यक्ति को चुना है। प्रोफेसर सिरस हमारे समय के ऐसे साधारण चरित्र हैं,जो अपनी निजी जिंदगी में एक कोना तलाश कर एकाकी खुशी से संतुष्‍ट रह सकते हैं। किंतु हम पाते हैं कि समाज के कथित संरक्षक और ठेकेदार ऐसे व्‍यक्तियों की जिंदगी तबाह कर देते हैं। उन्‍हें हाशिए पर धकेल दिया जाता है। उन पर उंगलियां उठाई जाती हैं। उन्‍हें शर्मसार किया जाता है। प्रोफेसर सिरस जैसे व्‍यक्तियों की तो चीख भी नहीं सुनाई पड़ती। उनकी खामोशी ही उनका प्रतिकार है। उनकी आंखें में उतर आई शून्‍यता समाज के प्रति व्‍यक्तिगत प्रतिरोध है।
प्रोफेसर सिरस अध्‍ययन-अध्‍यापन से फुर्सत पाने पर दो पैग ह्विस्‍की,लता मंगेशकर गानों और अपने पृथक यौन व्‍यवहार के साथ संतुष्‍ट हैं। उनकी जिंदगी में तब भूचाल आता है,जब दो रिपोर्टर जबरन उनके कमरे में घुस कर उनकी प्रायवेसी को सार्वजनिक कर देते हैं। कथित नैतिकता के तहत उन्‍हें मुअत्‍तल कर दिया जाता है। उनकी सुनवाई तक नहीं होती। बाद में उन्‍हें नागरिक अधिकारों से भी वंचित करने की कोशिश की जाती है। उनकी अप्रचारित व्‍यथा कथा से दिल्‍ली का युवा और जोशीला रिपोर्टर चौंकता है। वह उनके पक्ष से पाठकों को परिचित कराता है। साथ ही प्रोफेसर सिरस को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक भी करता है। प्रोफेसर सिरस बेमन से कोर्ट में जाते हैं। तब के कानूनी प्रावधान से उनकी जीत होती है,लेकिन वे जीत-हार से आगे निकल चुके हैं। वे सुकून की तलाश में बेमुरव्‍वत जमाने से चौकन्‍ने और चिढ़चिढ़े होने के बावजूद छोटी खुशियों से भी प्रसन्‍न होना जानते हैं।
पीली मटमैली रोशनी और सांवली छटा के दृश्‍यों से निर्देशक हंसल मेहता प्रोफेसर सिरस के अवसाद को पर्दे पर बखूबी उतारते हैं। उन्‍होंने उदासी और अवसन्‍न्‍ता को अलग आयाम दे दिया है। पहले दृश्‍य से आखिरी दृश्‍य तक की फीकी नीम रोशनी प्रोफेसर सिरस के अंतस की अभिव्‍यक्ति है। हंसल मेहता के शिल्‍प में चमक और चकाचौंध नहीं रहती। वे पूरी सादगी से किरदारो की जिंदगी में उतरते हैं और भावों का गागर भर लाते हैं।दरअसल,कंटेंट की एकाग्रता उन्‍हें फालतू साज-सज्‍जा से बचा ले जाती है। वे किरदार के मनोभावों और अंतर्विरोधों को कभी संवादों तो कभी मूक दूश्‍यों से जाहिर करते हैं। इस फिल्‍म में उन्‍होंने मुख्‍य कलाकारों की खामोशी और संवादहीन अभिव्‍यक्ति का बेहतरीन उपयोग किया है। वे प्रोफेसर सिरस का किरदार गढ़ने के विस्‍तार में नहीं जाते। शाहिद की तरह ही वे प्रोफेसर सिरस के प्रति दर्शकों की सहानुभूति नहीं चाहते। उनके किरदार हम सभी की तरह परिस्थितियों के शिकार तो होते हैं,लेकिन वे बेचारे नहीं होते। वे करुणा पैदा करते हैं। दया नहीं चाहते हैं। वे अपने तई संघर्ष करते हैं और विजयी भी होते हैं,लेकिन कोई उद्घोष नहीं करते। बतौर निर्देशक हंसल मेहता का यह संयम उनकी फिल्‍मों का स्‍थायी प्रभाव बढ़ा देता है।
अभिनेताओं में पहले राजकुमार राव की बात करें। इस फिल्‍म में वे सहायक भूमिका में हैं। अमूमन थोड़े मशहूर हो गए कलाकार ऐसी भूमिकाएं इस वजह से छोड़ देते हेंकि मुझे साइड रोल नहीं करना है। अलीगढ़ में दीपू का किरदार निभा रहे राजकुमार राव ने साबित किया है कि सहायक भूमिका भी खास हो सकती है। बशर्ते किरदार में यकीन हो और उसे निभाने की शिद्दत हो। राजकुमार के लिए मनोज बाजपेयी के साथ के दृश्‍य चुनौती से अघिक जुगलबंदी की तरह है। साथ के दृश्‍यों में दोनों निखरते हैं। राजकुमार राव के अभिनय में सादगी के साथ अभिव्‍यक्ति का संयम है। वे एक्‍सप्रेशन की फिजूलखर्ची नहीं करते। मनोज बाजपेयी ने फिर से एक मिसाल पेश की है। उन्‍होंने जाहिर किया है कि सही स्क्रिप्‍ट मिले तो वे किसी भी रंग में ढल सकते हैं। उन्‍होंने प्रोफेसर सिरस के एकाकीपन को उनकी भंगुरता के साथ पेश किया है। उनकी चाल-ढाल में एक किस्‍म का अकेलापन है। मनोज बाजपेयी ने किरदार की भाव-भंगिमा के साथ उसकी हंसी,खुशी और उदासी को यथोचित मात्रा में इस्‍तेमाल किया है। उन्‍होंने अभिनय का मापदंड खुद के साथ ही दूसरों के लिए भी बढ़ा दिया है। उन्‍होंने यादगार अभिनय किया है। फिल्‍म के कुछ दृश्‍यों में वे कविता की तरह संवादों के बीच की खामोशी में अधिक एक्‍सप्रेसिव होते हैं।
निश्चित ही यह फिल्‍म समलैंगिकता के प्रश्‍नों को छूती है,लेकिन यह कहीं से भी उसे सनसनीखेज नहीं बनाती है। समलैंगिकता इस फिल्‍म का खास पहलू है,जो व्‍यक्ति की चाहत,स्‍वतंत्रता और प्रायवेसी से संबंधित है। हिंदी फिल्‍मों में समलैंगिक किरदार अमूमन भ्रष्‍ट और फूहड़ तरीके से पेश होते रहे हैं। ऐसे किरदारों को साधरण निर्देशक मजाक बना देते हैं। हंसल मेहता ने पूरी गंभीरता बरती है। उन्‍होंने किरदार और मुद्दा दोनों के प्रति संवेदनशील रवैया अपनाया है। लेखक अपूर्वा असरानी की समझ और अपनी सोच से उन्‍होंने समलैंगिकता और सेक्‍शन 377 के प्रति दर्शकों की समझदारी दी है। अलीगढ़ साहसिक फिल्‍म है।
अवधि- 120 मिनट
स्‍टार- साढ़े चार स्‍टार

फिल्‍म समीक्षा : तेरे बिन लादेन-डेड और अलाइव



टुकड़ों में हंसी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पहली कोशिश मौलिक और आर्गेनिक होती है तो दर्शक उसे सराहते हैं और फिल्‍म से जुड़ कलाकारों और तकनीशियनों की भी तारीफ होती है। अभिषेक शर्मा की 2010 में आई तेरे बिन लादेन से अली जफर बतौर एक्‍टर पहचान में आए। स्‍वयं अभिषेक शर्मा की तीक्ष्‍णता नजर आई। उम्‍मीद थी कि तेरे बिन लादेन-डेड और अलाइव में वे एक स्‍ता ऊपर जाएंगे और पिछली सराहना से आगे बढ़ेंगे। उनकी ताजा फिलम निराश करती है। युवा फिल्‍मकार अपनी ही पहली कोशिश के भंवर में डूब भी सकते हैं। अभिषेक शर्मा अपने साथ मनीष पॉल को भी ले डूबे हैं। टीवी शो के इस परिचित चेहरे को बेहतरीन अवसर नहीं मिल पा रहे हैं। क्‍या उनके चुनाव में ही दोष है ?
ओसामा बिन लादेन की हत्‍या हो चुकी है। अमेरिकी राष्‍ट्रपति को उसका वीडियो सबूत चाहिए। इस कोशिश में अमेरिकी सीआईए एजेंट ओसामा जैसे दिख रहे अभिनेता पद्दी सिंह के साथ मौत के सिक्‍वेंस शूट करने की प्‍लानिंग करता है। वह निर्देशक शर्मा को इस काम के लिए चुनता है। शर्मा को लगता है कि तेरे बिन लादेन का सारा क्रेडिट अली जफर ले गए। इस बार वह खुद को लाइमलाइट में रखना चाहता है। एक स्‍थानीय दहशतगर्द खलील भी है। यहां से ड्रामा शुरू होता है,जो चंद हास्‍यास्‍पद दृश्‍यों और प्रहसनों के साथ क्‍लाइमेक्‍स तक पहुंचता है। लेखक ने फिल्‍म को रोचक बनाए रखने के लिए घटनाएं भर दी हैं। कुछ-कुछ मिनटों के बाद हंसाने की कोशिश की जाती है। निस्‍संदेह कुछ सीन सुंदर और कॉमिकल बन पड़े हैं,लेकिन पिछली फिल्‍म की तरह उनका सम्मिलित प्रभाव गाढ़ा नहीं होता। फिल्‍म टुकड़ों में ही दृश्‍य संरचना में बांध पाती है।
मनीष पॉल भरपूर कोशिश करते हैं कि वे किरदार में रहें। हम उन्‍हें इतनी बार टीवी शो में अनेक भाव मुद्राओं में देख चुके हैं कि वे खुद को ही दोहराते नजर आते हैं। उनके लुक की निरंतरता पर भी ध्‍यान नहीं दिया गया है। एक ही सफर में उनके बाल छोटे-बड़े होते रहते हैं। शो होस्‍ट और किरदार के परफारमेंस हल्‍का फर्क होता है। मनीष पॉल ने उस पर ध्‍यान नहीं दिया है और निर्देशक ने इसकी ताकीद नहीं की है। इस फिल्‍म में उनकी प्रतिभा का सदुपयोग नहीं हो पाया है। प्रद्युम्‍न सिंह का किरदार एकआयामी है। वे उसे निभा ले जाते हैं। अफसोस कि अली जफर की मौजूदगी फिल्‍म में कुछ नहीं जोड़ती। शुरू में कंफ्यूजन भी होता है। पियूष मिश्रा अपने आधे-अधूरे किरदार को आधे-अधूरे तरीके से ही निभाते हैं। यकीनन वे इस फिल्‍म को याद नहीं रखना चाहेंगे। सिकंदर खेर सभी कलाकारों के बीच कुछ अलग ऊर्जा के साथ दिखते हैं। उन्‍होंने अपनी भूमिका के साथ न्‍याय किया है।
फिल्‍म में तात्‍कालिक प्रभाव के लिए शेट्टी सिस्‍टर्स और पियूष मिश्रा की गायकी का भी गैरजरूरी इस्‍तेमाल किया गया है।ओसामा और अमेरिकी राष्‍ट्रपति से संबंधित लतीफों में नयापन नहीं है।
अवधि-110 मिनट
स्‍टार- ढाई स्‍टार

दरअसल : फितूर में कट्रीना कैफ



-अजय ब्रह्मात्‍मज
अभिषेक कपूर की पिछली रिलीज फितूर दर्शकों को पसंद नहीं आई। फिल्‍म पसंद न आने की सभी की वजहें अलग-अलग हो सकती हैं। फिर भी सभी की नापसंद में एक समानता दिखी। कट्रीना कैफ का काम अधिकांश को पसंद नहीं आया। कुछ ने तो यहां तक कहा कि उन्‍होंने बुरा काम किया है। वह फिरदौस के किरदार में कतई नहीं जंची। अभिषेक कपूर ने उन्‍हें जिस तरह पेश किया,वह भी दर्शकों को नागवार गुजरा। किरदार ढंग से संवर नहीं पाया। व‍ह जिस रंग-ढंग के साथ पर्दे पर दिखा,उसे भी कट्रीना संवार नहीं सकीं। कट्रीना की कुछ बदतरीन फिल्‍मों में फितूर शामिल रहेगी।
मैंने खुद अभिषेक कपूर से कट्रीना की पसंद की वजह पूछी थी? मेरे सवाल में यह संदेह जाहिर था कि कट्रीना ऐसी गहन भूमिकाओं के योग्‍य नहीं हैं। तब अभिषेक कपूर ने स्‍पष्‍ट शब्‍दों में अपना तर्क दिया था। उनका कहना था, फिल्म देखेंगे तो आपको लगेगा कि मेरा फैसला सही है। मैं उनके चुनाव के कारण नहीं देना चाहता। मेरे बताने से धारणा बदलने वाली नहीं है। यह तो देख कर ही हो सकता है। कुछ लोगों में अलग तरह की खूबी होती है। खासकर फिल्म में मेरे किरदार की है,जिसे कट्रीना निभा रही हैं। किरदार और कट्रीना की छवि में थोड़ी समानता है। यह जरूरी है कि हम एक्टरों को मौका दें। पहली बार वह भी अपने कम्फर्ट जोन से बाहर आई हैं। एक बार किसी को मौका देकर देखना चाहिए। वह कर सकता है या नहीं। यह पहले देखना चाहिए। मैंने देखा है कि कट्रीना के उच्चारण की आलोचना होती है,लेकिन एक्टर केवल अपने उच्चारण से नहीं जाना जाता है। एक्टर अपनी पूरी ऊर्जा के लिए पहचाना जाता है। मुझे उच्चारण इतना आवश्यक नहीं लगता है। एक हद के बाद भाषा भी महत्व नहीं रखती है। अगर आप के इमोशन सही हैं तो भाषा बाधक नहीं बनती है। आप जो महसूस कर रहे हैं,वह सही तरीके से दर्शकों तक पहुंचना जरूरी है। कट्रीना में वह काबिलियत है। इस फिल्म में वह अपनी आलोचनाओं को खत्म करती नजर आएंगी।
फिलम रिलीज होने के बाद अभिषेक कपूर के सारे तर्क आधारहीन निकले। दरअसल,फिरदौस के चरित्र में भी कमियां थीं। 21 वीं सदी में इस तरह के किरदार स्‍वीकार नहीं हो सकते। अभिषेक कपूर ने परीकथा और परिस्थिति को बेमेल पैदा किया था। किरदार ढंग से गढ़ा नहीं गया हो तो दर्शक उससे जुड़ नहीं पाते। एक फांक रह जाती है। कट्रीना कैफ की संबसे बड़ी दिक्‍कत संवाद अदायगी है। सभी जानते हैं कि वह हिंदी नहीं बोल पाती हैं। इतने सालों के अभ्‍यास और कीर्ति के बावजूद भाषा सीखने और उसके अभ्‍यास पर उन्‍होंने ध्‍यान नहीं दिया हैं। जिन फिल्‍मों में उन्‍हें गुडि़या या शोपीस बन कर पेश होना होता है,उनमें तो वह अपनी अदा और अंदाज से संभाल लेती हैं। वह बला की खूबसूरत हैं,लेकिन अदा से अदायगी में आने पर उनका हुस्‍न भी काम नहीं आता। खासकर फितूर जैसी फिल्‍मों में उनकी कमियां उजागर हो जाती हैं। उच्‍चारण दोष तो आदित्‍य रॉय कपूर के संवादों में भी था,लेकिन वे भ्रष्‍ट भाषा बोल पा रहे थे। उन्‍हें संवादों से अधिक प्रतिक्रिया और मनोभावों से काम लेना था।
कट्रीना की दूसरी बड़ी समस्‍या यह हुई कि इस फिल्‍म में उन्‍हें तब्‍बू के साथ आना पड़ा। दर्शकों को मां-बेटी के बीच बड़ा फर्क दिखा। जब आप समर्थ कलाकारों के साथ एक फ्रेम में आते हैं तो पता चलता है कि आप कितने व्‍यर्थ हैं। दर्शकों को कट्रीना की इस व्‍यर्थता का अहसास इस फिल्‍म में हुआ। साथ के दृश्‍यों में तो वह कमजोर पड़ीं ही। यहां तक कि टेलीफोन पर हो रही बातचीत में भी वह तब्‍बू के करीब नहीं पहुंच सकीं। ऐसी फिल्‍में प्रस्‍तुति में अपूर्ण होते हुए भी किसी कलाकार की औकात जाहिर कर देती हैं। कट्रीना की अयोग्‍यता इसलिए भी उभर कर सामने आई कि फितूर फिल्‍म में भी कमियां थीं।
संवाद अदायगी में फिल्‍म की भाषा के लहजे,उच्‍चारण,ठहराव,जोर और विराम पर ध्‍यान देने की जरूरत होती है। इसके साथ ही प्रयुक्‍त शब्‍दों के अर्थ की जानकारी हो तो बोलने में भावार्थ अभिनय में बहुत कुछ जुड़ जाता है।

जीवन में संतुष्‍ट होना बहुत जरूरी : राजकुमार राव




-अजय ब्रह्मात्‍मज  
प्रतिभावान राजकुमार राव की अगली पेशकश ‘अलीगढ़़’ है। समलैंगिक अधिकारों व व्‍यक्ति की निजता को केंद्र में लेकर बनी इस फिल्‍म में राजकुमार राव पत्रकार दीपू सेबैस्टिन की भूमिका में हैं। दीपू न्‍यूज स्‍टोरी को सनसनीखेज बनाने में यकीन नहीं रखता। वह खबर में मानव अधिकारों को पुरजोर तरीके से रखने का पैरोकार है। 
राजकुमार राव अपने चयन के बारे में बताते हैं, ‘दीपू का किरदार तब निकला, जब मनोज बजापयी कास्ट हो रहे थे। उस वक्‍त हंसल मेहता सर की दूसरे एक्टरों से भी बातें हो रही थीं। नवाज से बातें हुईं। और भी एक्टरों के नाम उनके दिमाग में घूम रहे थे। जैसे कि नाना पाटेकर। वह सब केवल दिमाग में चल रहा था। तब दीपू का किरदार फिल्म में था ही नहीं। जहन में भी नहीं थी। केवल एक हल्का स्केच दिमाग में था। जब स्क्रिप्ट तैयार हुई तब पता चला कि दीपू तो प्रिंसिपल  कास्ट है। जैसे वो बना हंसल ने तय कर लिया कि यह राजकुमार राव का रोल है। हंसल मेहता के मुताबिक उन्‍हें मेरे बिना फिल्म बनाने की आदत नहीं है। दरअसल हम दोनों की जो कला है, कला में आप विस्तार करते हो। अपने भीतर के कलाकार को उभारने का मौका मिलता है। एक कलाकार के जरिए। दूसरे कलाकार के जरिए। एक दूसरे से बांटने का काम होता है। उनके लिए मैं सिग्नेचर बन चुका हूं।
वे मुझ पर काफी भरोसा करते हैं। ठीक वैसे, जैसे किसी पिता को अपने लायक बेटे पर होता है। सर का औऱ मेरा एक कनेक्शन है। वह केवल फिल्म तक नही है। वह सिर्फ डायरेक्टर और एक्टर का नहीं है। वह उसके भी आगे है। बहुत आगे। हम हर तरह की बात करते हैं। हम मस्ती करते हैं। पार्टी करते हैं। गोसिप करते हैं। फिल्म पर ढेर सारी बातें करते हैं। जब मैं सर के साथ काम करता हूं तो बतौर एक्टर बहुत चैलेंज महसूस करता हूं। वह इस तरह के किरदार मेरे लिए लिखते हैं। मुझे करने का मौका देते हैं। एक्टर के तौर पर मुझे बहुत मजा आता है। मेरे जितने भी बेहतरीन काम रहे हैं। जैसे शाहिद। मैं मानता हूं कि उसमें हंसल सर सबसे ऊपर आते हैं। मैंने कई फिल्में की लेकिन उन सब चीजों का मौका मुझे सर के साथ ही आता है। हंसल सर ऐसा एक माहौल देते हैं। एक स्पेस देते हैं कि बतौर एक्टर मैं बहुत खुला हुआ महसूस करता हूं। मुझे लगता है कि मैं किसी को कुछ दिखाने के लिए नहीं कर रहा हूं। मैं केवल अपने लिए काम कर रहा हूं।
मनोज बाजपयी प्रोफेसर सिरस की भूमिका में हैं। प्रोफेसर सिरस को समलैंगिकता के आरोप में अलीगढ़ युनिवर्सिटी से निकाला जाता है। राजकुमार राव सिरस के बारे में अपनी सोच जाहिर करते हैं, ‘प्रोफेसर सिरस मेरे लिए एक ऐसा बंदा है जो जिंदगी को जीना जानता है। उसमें कमाल का टैलेंट हैं।वह आइडियल आदमी है। हम सभी कहीं ना कहीं दूसरों पर निर्भर करते हैं अपनी खुशी के लिए या फिर अपना दुख बांटने के लिए। वहीं वह ऐसा आदमी है जो अपनी दुनिया में बहुत खुश है। उसको जीवन से ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। उसके लिए उसका संगीत या यूं कह सकते हैं कि वह अपने स्पेस में बेहद खुश है। इस किरदार से मैंने एक शब्द सीखा कि जीवन में कंटेंट होना बहुत जरूरी है। नहीं तो दिमाग को तो कुछ ना कुछ चाहिए ही रहता है। हमें अपने रोज के जीवन में कुछ ना कुछ चाहिए ही रहता है। कभी गाड़ी .कभी घर को कभी नए दोस्त।
दीपू सेबैस्टियन एक ऐसा इंसान है जिसे कुछ नहीं चाहिए। उसे केवल अपना स्पेस चाहिए। यह सोसायटी उसे वह भी देने को तैयार नहीं है। उससे सबकुछ छिन लिया जा रहा है। मैंने सिरस से यहीं सीखा। मनोज बाजपयी सर उनके साथ मेरा खास नाता है। जब मैं बड़ा हो रहा था तो मैंने शूल देखकर बड़ा हो रहा था। उनका एक प्रभाव मुझ पर रहा है। वह बतौर एक्टर मुझ पर हावी रहे हैं। उनकी परफॉरमेंस से मैं प्रभावित हो जाता था। एक तरफ शाहरूख खान की डीडीएलजे देखकर उनकी भी नकल करता था। वैसा बनना चाह रहा था। दूसरा मैं शूल देख रहा था। मैं मनोज सर की नकल करता था। मुझ पर उनका बहुत बड़ा प्रभाव रहा है। वह आज तक है।

Thursday, February 25, 2016

अपने मिजाज का सिनेमा पेश किया - सनी देओल




-अजय ब्रह्मात्‍मज

 हिंदी फिल्‍म जगत में 50 पार खानत्रयी का स्‍टारडम बरकरार है। सनी देओल अगले साल साठ के हो जाएंगे। इसके बावजूद वे अकेले अपने कंधों पर फिल्‍म की सफलता सुनिश्चित करने में सक्षम हैं। ’घायल वंस अगेन’ इसकी नवीनतम मिसाल है।

- दर्शकों से मिली प्रतिक्रिया से आप कितने संतुष्ट हैं?
इस फिल्म के बाद मेरी खुद की पहचान बनी है। वह पहले भी थी, लेकिन मेरे लिए अभी यह बनाना जरूरी था। कई सालों से मैं सिनेमा में कुछ कर भी नहीं रहा था। जो एक-दो फिल्मों में अच्छा काम किया, वे फिल्में भी अटकी हुई थी। उनका काम शुरू नहीं हो रहा था। इसके अलावा मैं जो भी कर रहा था, हमेशा एक सरदार ही था। कई सालों से लोग मुझे एक ही रूप में देख रहे थे। नॉर्मल रूप किरदार में नहीं देख पा रहे थे। यह सारी चीजें थी, जो मेरे साथ नहीं थी। मेरी इस फिल्म से अलग शुरुआत हुई है। हांलाकि मुझे इतनी बड़ी सफलता नहीं मिली है, पर मेरे लिए इतना काफी है। क्योंकि इस फिल्म से मेरे काम को सराहा जा रहा है। लोग मेरी वापसी को पसंद कर रहे हैं।
-आप इस फिल्म के एक्टर सनी देओल की सफलता मानते हैं या डायरेक्टर सनी देओल की?
मेरे लिए मैंने डायरेक्टर पूरी फिल्म बनाई है। मैंने बतौर एक्टर अपना किरदार निभाया है। एक्‍टर के तौर में यह करता आया हूं। इस बार डायरेक्टर की सीट पर बैठ कर काम किया है। यह काम लोगों को पसंद आया है। लोग इस फिल्म को एक बार देखें या बार-बार देखें, इस फिल्म में लोगों को कुछ ना कुछ अलग देखने को मिलेगा। मैंने इस फिल्म में वहीं किया है जैसा सिनेमा मुझे पसंद है। अब मुझे यकीन हो गया है कि मेरा अनुभव इसको करने के पहले और बाद में काम आएगा। मुझे इस फिल्म से सीखने को मिला है। उस अनुभव को मैं अपने बेटे के साथ करूंगा। इंटरटेनमेंट में आपको असभ्यता या अश्लील चीजों का इस्तेमाल करना आवश्यक नहीं है। हमारी फिल्म फैमली के लिए इंटरटेनमेंट रही।
-मोहल्ला अस्सी का क्या स्टेटस  है?
अभी यही कोशिश है कि अगले महीने के अंत में उसे रिलीज कर लें। मगर हफ्ते दस दिन उस पर निर्णय ले लिया जाएगा। मैं मीडिया को इस बारे में जानकारी दूंगा। इस फिल्म के के बारे में वैसे भी बहुत सारी चीजें हो चुकी हैं। कहीं ना कहीं लोग इस फिल्म के बारे में जानते हीं है। यह फिल्म एक सेक्टर से जुड़ी हुई है। यह फिल्म चलेगी या नहीं। मुझे नहीं पता, लेकिन इस फिल्म को सराहा जरूर जाएगा।लोग इस फिल्म की प्रशंसा जरूर करेंगे।

आप ने फिल्म के लिए हां कहीं थी तब से लेकर अब तक काफी कुछ हो चुका है। इससे आपकी हां पर कोई फर्क तो नहीं पड़ा है ना?
जी नहीं। मैंने हां कहने के बाद उसी समय फिल्म का काम खत्म कर लिया था। हमारी पूरी टीम की एनर्जी उस फिल्म है। हम सभी ने उत्साहित होकर अपना काम खत्म किया था।
सुनने में यह भी आया था कि आपने यह फिल्म सबसे कम समय में खत्म की है?
जी बिल्कुल। हमारा विषय भी उपन्यास पर आधारित है।यह कोई छिपा हुआ विषय नहीं है। उसी फिल्म को हमने डॉक्‍टर चंद्रप्रकाश द्विवेद्वी साहब के साथ मिलकर फिल्म के रूप में बनाया है। सारे एक्टर अच्छे हैं। इस वजह से किरदार उभर कर आया है।

-संस्कृत शिक्षक को ट्रांसफॉर्म करने में आपको क्या करना पड़ा?
इसमें अलग ही सनी देओल है। आप को एक्टर के तौर पर अच्छा लगेगा। जब यह विषय मेरे पास आया था। मैं खुद डरा हुआ था। मैं यह सोच रहा था कि कर पाऊंगा या नहीं। मगर मैं और डॅाक्टर साहब कई सालों से काम कर किया है। मैंने तभी सोचा था कि करते हैं। एक छलांग मारते हैं। मैं भी एक बार काम शुरू करने पर कर चीजें खुद आती हैं। हां, इस फिल्म में मुझे मेरे किरदार के बारें में ए बी सी डी कुछ पतानहीं था। इस वजह से थोड़ा़ डर लग रहा था।

-जब शूट हो रही थी। उससे बात फैली कि धमेंद्रजी के करियर में एक सत्यकाम है।वैसे ही सनी जी के जीवन में यह फिल्म एक सत्यकाम साबित होगी?
तुलना अच्छी लगती है, लेकिन वैसा हो तब ना। मेरा किरदार दिलचस्प है। इस किरदार के साथ हर कोई जुड़ सकता है। यह किरदार के जीवन का अनुभव है।कहीं ना कहीं हर आदमी के साथ वह मोड़ आताहै । जो किरदार के साथ फिल्म में होगा। इस वजह से हर आदमी मेरे किरदार से जुड़ाव महसूस करेगा।

भईया जी सुपरहिट के बारे में?
पूरी कोशिश है कि अगले महीने उसकी शूटिंग खत्म हो जानी चाहिए। मार्च के बाद ही मैं उस बारे में साफ बता पाऊंगा। इसके साथ कई अलग तरह का किरदार करना चाहूंगा।


किरदार ने निखारा मेरा व्‍यक्तित्‍व - मनोज बाजपेयी




-अजय ब्रह्मात्‍मज
अलीगढ़ का ट्रेलर आने के बाद से ही मनोज बाजपेयी के प्रेजेंस की तारीफ हो रही है। ऐसा लग रहा है कि एक अर्से के बाद अभिनेता मनोज बाजपेयी अपनी योग्‍यता के साथ मौजूद हैं। वे इस फिल्‍म में प्रो. श्रीनिवास रामचंद्र सिरस की भूमिका निभा रहे हैं।
- इस फिल्‍म के पीछे की सोच क्‍या रही है ?
0 एक आदमी अपने एकाकी जीवन में तीन-चार चीजों के साथ खुश रहना चाहता है। समाज उसे इतना भी नहीं देना चाहता। वह अपनी अकेली लड़ाई लड़ता है। मेरी कोशिश यही रही है कि मैं दुनिया के बेहतरीन इंसान को पेश करूं। उसकी अच्‍छाइयों को निखार कर लाना ही मेरा उद्देश्‍य रहा है।
-किन चीजों के साथ खुश रहना चाहते थे प्रोफेसर सिरस?
0 वे लता मंगेशकर को सुनते हैं। मराठी भाषा और साहित्‍य से उन्‍हें प्रेम है1 वे कविताओं में खुश रहते हैं। अध्‍ययन और अध्‍यापन में उनकी रुचि है। वे अलीगढ़ विश्‍वविद्यालय औा अलीगढ़ छोड़ कर नहीं जाना चाहते। वे अपनी जिंदगी अलग ढंग से जीना चाहते हैं।
-एक अंतराल के बाद आप ऐसी प्रभावशाली भूमिका में दिख रहे हैं?
0 अंतराल इसलिए लग रहा है कि मेरी कुछ फिल्‍में रिलीज नहीं हो पाई हैं। पोस्‍ट प्रोडक्‍शन में समय लग गया। सात उचक्‍के,मिसिंग,ट्रैफिक और दुरंतो फिल्‍में शूट हो चुकी हैं। अगले दो-तीन महीनों में ये रिलीज होंगी।तेवर के बाद लगभग साल हो गया है। अब फिल्‍में आ रही हैं।
-प्रोफेसर सिरस को कैसे आत्‍मसात किया। किन चीजों पर अधिक ध्‍यान रहा?
0 प्रोफेसर सिरस को अकेले रहने से तकलीफ नहीं है। एकाकी जीवन जी रहे व्‍यक्ति की चाल-ढाल बदल जाती है। उनके एकाकीपन को जाहिर करने के लिए मैंने उनकी आंखों की शून्‍यता पकड़ी। वे निष्‍पंद दिखाई पड़ते हें। उनकी आंखों से उनका व्‍यक्तित्‍व प्रकट हो। मुश्किल प्रक्रिया रही,लेकिन मुझे खुशी है कि लोग उसे देख और समझ पा रहे हैं। यह प्रक्रिया जादुई रही।प्रोफेसर सिरस को समाज ने कमरे तक सीमित कर दिया है। हद तो तब होती है,जब वे उसके कमरे में भी घुस जाते हैं। फिल्‍म यहीं से शुरू होती है।
-कलाकार भी एकाकी होते हैं। मैंने देखा है कि वे भीड़ में रहने पर भी खुद में लीन रहते हैं। आप क्‍या कहेंगे?
0 कलाकार निजी दुनिया में रहता है। जरूरी नहीं कि वह अकेला हो। समय और अभ्‍यास से कलाकार उसे चुन लेता है। लोगों की तेज नजरों से बचने के लिए वह एक कवच पहन लेता है। अमूमन ऐसा होता है कि कलाकार सभी पर संदेह करने लगते हैं। उसे लगता है कि उसे अच्‍छे-बुरे काम को ढंग से जांचा नहीं जा रहा है। आप देखेंगे कि कलाकारों की तारीफ और आलोचना में लोग अति कर देते हैं।
-फिर वास्‍तविकता का अंदाजा कैसे होता है?
0 अगर कलाकार खुद से झूठ न बोले। वह अपने ही झांसे में न रहे। अपना काम देख कर वह समझ सकता है कि वह कीां चूक गया। मैं अपनी फिल्‍में कम देखता हूं। मुझे अपनी भूलों और चूकों से परेशानी होती है। मेरे लिए अपनी फिल्‍में देखना प्रताड़ना होती है। हमारे टीचर बैरी जॉन और एनके शर्मा जैसे मित्र होते हैं। वे यिलिटी चेक करवा देते हैं।
-हंसल मेहता के बारे में बताएं?
0 उनसे 22 साल पुरानी दोस्‍ती है। फिल्‍ममेकर के तौर पर वे अलग जोन में आ गए हैं। पहले वे दिशाहीन थे। वे अपनी आवाज या कॉलिंग की तलाश में थे। वह उन्‍हें मिल गया है। अपने विषय और क्राफ्ट पर उनकी पकड़ बढ़ गई है। वे सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों पर लगातार लिखते और बोलते रहे हैं,इसलिए वह स्‍पष्‍टता फिल्‍मों में दिख रही है।
-कलाकार और किरदार में संगति कैसे बैठती है?
0 जब तक आप केवल संवाद बोलते रहेंगे,तब तक पैक अप के बाद आप सब कुछ भूलते रहेंगे। अगर संवादों के पार जाते हैं तो हर किरदार एक गहरा निशान छोड़ जाता है। प्रोफेसर सिरस की भूमिका निभाने के बाद मैं ज्‍यादा बेहतरीन इंसान हो गया हूं।
-समलैंगिकता अभी तक समाज में स्‍वीकार नहीं है। सेक्‍शन 377 का मामला कोर्ट में है। क्‍या कहेंगे?
0 सेक्‍शन 377 पर फैसला आने दें। मुझे लगता है कि समय के साथ समाज को अधिक खुला और उदार होना चाहिए। अगर कानून उनके पक्ष में आ जाएगा तो समाज भी धीरे-धीरे स्‍वीकार कर लेगा।

Sunday, February 21, 2016

नीरजा सी ईमानदारी है सोनम में : राम माधवानी




-अजय ब्रह्मात्‍मज
लिरिल के ऐड में प्रीति जिंटा के इस्‍तेमाल से लेकर हरेक फ्रेंड जरूरी होता है जैसे पॉपुलर ऐड कैंपेन के पीछे सक्रिय राम माधवानी खुद को एहसास का कारोबारी मानते हैं। वे कहते हैं, हमलोग ऐड  फिल्‍म और दूसरे मीडियम से फीलिंग्‍स का बिजनेस करते हैं। अपनी नई फिल्‍म नीरजा के जरिए वे दर्शकों को रूलाना, एहसास करना, एहसास देना और सोचने पर मजबूर करना चाहते हैं। लेट्स टॉक के 14 सालों बाद उनकी फिल्‍म नीरजा आ रही है।
-         पहली और दूसरी फिल्‍म के बीच में 14 सालों का गैप क्‍यों आया। क्‍या अपनी पसंद का को‍ई विषय नहीं मिला या दूसरी दिक्‍कतें रहीं?
विषय तो कई मिले। मैंने कोशिशें भी कीं। अपनी फिल्‍मों के साथ कई लोगों से मिला। बातें हुईं, लेकिन कुछ भी ठोस रूप में आगे नहीं बढ़ सका। फिल्‍म इंडस्‍ट्री में मेरी अच्‍छी जान-पहचान है। वे लोग मेरी इज्‍जत भी करते हैं। उनमें से कुछ ने मुझे ऑफर भी दिए, जिन्‍हें मैंने विनम्रता से ठुकरा दिया। मेरी पसंद की फिल्‍मों में बजट, स्क्रिप्‍ट और एक्‍टर की समस्‍या रही। अभी कह सकता हूं कि यूनिवर्स मुझसे कुछ और करवाना चाह रहा था। मैं नीरजा के लिए अतुल कसबेकर का नाम लेना चाहूंगा। उन्‍होंने यह फिल्‍म मुझे ऑफर की।
-नीरजा पर सहमति कैसे बनी?
अतुल ने जब इस फिल्‍म का प्रस्‍ताव दिया तो मैंने इसे एक चुनौती के रूप में लिया। देश के आम दर्शकों की तरह ही मैंने नीरजा के बारे में सुन और पढ़ रखा था। फिल्‍म बनाने की बात आई, तब परेशानी बढ़ी। इस फिल्‍म से प्रसून जोशी जुड़े। बाकी टीम में वही लोग हैं, जिनके साथ मैं ऐड फिल्‍में करता रहा हूं। फिल्‍म की शूटिंग के दौरान मैंने आमिर खान, अनिल कपूर और राजकुमार हिरानी जैसे मित्रों की भी मदद ली। उनकी सलाहों से मुझे लाभ हुआ।
-         नीरजा में ऐसी क्‍या बात थी कि आप निर्देशन के लिए राजी हो गए?
इस फिल्‍म के बारे में मैंने दुबारा नहीं सोचा। प्रस्‍ताव मिलते ही हां करने की वजह यही थी कि मैं नीरजा की कहानी पर्दे पर लाने को तैयार हो गया। दो सालों के रिसर्च और लेखन के बाद नीरजा की कहानी में मेरी रूचि बढ़ती गई। नीरजा के बारे में ज्‍यादातर लोग यही जानते हैं कि वह एक अपह्रत विमान में एयरहोस्‍टेस थी। और यात्रियों की जान बचाने में उसकी जान चली गई थी। नीरजा की कहानी का यह उत्‍कर्ष उसके जीवन के दूसरे फैसलों का परिणाम था। हमने उस लड़की को नजदीक से देखा और जाना कि उसमें यह बहादुरी कहां से आई। वह एक ईमानदार पत्रकार की संवेदनशील बेटी थी। पिता और परिवार से मिले जीवन-मूल्‍यों को उसने अपनाया और उन पर अमल किया। चुनौती और परीक्षा की घड़ी में वह नहीं डरी। अपने कर्तव्‍य का पालन करते हुए उसने जान तक दे दी।
-नीरजा के किरदार के लिए सोनम कपूर ही क्‍यों?
सोनम से मैं मिलता रहा हूं। उनके व्‍यक्तित्‍व में बेसिक ईमानदारी और सादगी है। ग्‍लैमर और चमक-दमक के बावजूद इनकी झलक उनकी मौजूदगी में दिखती है। सोनम को नीरजा में ढालने में अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ी।

अभिनेता राजकुमार राव और निर्देशक हंसल मेहता की बातचीत




अजय ब्रह्मात्‍मज

( हंसल मेहता और राजकुमार राव की पहली मुलाकात शाहिद की कास्टिंग के समय ही हुई थी। दोनों एक-दूसरे के बारे में जान चुके थे,लेकिन कभी मिलने का अवसर नहीं मिला। राजकुमार राव बनारस में गैंग्‍स ऑफ वासेपुर की शूटिंग कर रहे थे तब कास्टिंग डायरेक्‍टर मुकेश छाबड़ा ने उन्‍हें बताया था कि हंसल मेहता शाहिद की प्‍लानिंग कर रहे हैं। राजकुमार खुश हुएफ उन्‍हें यह पता चला कि लीड और ऑयोपिक है तो खुशी और ज्‍यादा बढ़ गई। इधर हंसल मेहता को उनके बेटे जय मेहता ने राजकुमार राव के बारे में बताया। वे तब अनुराग कश्‍यप के सहायक थे। एक दिन मुकेश ने राजकुमार से कहा कि जाकर हंसल मेहता से मिल लो। मुकेश ने हंसल को बताया कि राजकुमार मिलने आ रहा है। तब तक राजकुमार उनके दफ्तर की सीढि़यां चढ़ रहे थे। हंसल मेहता के पास मिलने के सिवा कोई चारा नहीं था। दोनों मानते हैं कि पहली मुलाकात में ही दोनों के बीच रिश्‍ते की बिजली कौंधी। अब तो हंसल मेहता को राजकुमार राव की आदत हो गई है और राजकुमार राव के लिए हंसल मेहता डायरेक्‍टर के साथ और भी बहुत कुछ हैं।)
राजकुमार राव और हंसल मेहता की तीसरी फिल्‍म है अलीगढ़। दोनों के बीच खास समझदारी और अंतरंगता है। स्थिति यह है कि हंसल अपनी फिल्‍म उनके बगैर नहीं सोच पाते और राजकुमार राव उन पर खुद से ज्‍यादा यकीन करते हैं। झंकार के लिए यह खास बातचीत...यहां राजकुमार राव के सवाल हैं और जवाब दे रहे हैं हंसल मेहता।
-सिटीलाइट्स के बाद जब ईशानी ने आप का यह कहानी भेजी तो ऐसा क्‍यों लगा कि इसी पर फिल्‍म बनानी चाहिए? उन दिनों तो आप ढेर सारी कहानियां पढ़ रहे थे?
0 मैं कहानी के इंतजार में था। कई विचारों पर काम कर रहा था। सच कहूं तो मैं कहानियां ,खोजता नहीं। कहानियां ख्‍ुद ही मेरे पास आ जाती हैं। उस वक्‍त उनका मेल आ गया।वह भी जंक मेल में चला गया था। पढ़ते ही वह विचार मुझे प्रभावित कर गया। फिर भी उन्‍हें फोन करने के पहले मैंने तीन-चार घंटे का समय लिया।
-क्‍श्या लिखा था उन्‍होंने मेल में ?
0 उन्‍होंने प्रोफेसर सिरस के बारे में लिखा था कि एएमयू में ऐसे एक प्रोफेसर थे,जिनका इंतकाल हो गया था। उन्‍हें सेक्‍सुअलिटी के मुद्दे पर सस्‍पेंड कर दिया गया था। बेसिक थॉट था। प्रोफेसर सिरस से संबंणित कुछ आर्टिकल थे। मैंने उसी शाम ईशानी को बुलाया। ईशानी स्क्रिप्‍ट लिखने के लिए तैयार नहीं थी। तभी हमलोग सिटीलाइट्स की एडीटिंग कर रहे थे। मैंने अपने एडीटर अपूर्वा असरानी से पूछा कि क्‍या तुम लिखोगे? अपूर्वा कूद पड़ा। वह पहले से जानता था मुद्दे के बारे में। मैंने शैलेष सिंह को निर्माता के तौर पर जोडा। फिल्‍म पर काम शुरू हो गया। लिखने के दौरान ही तुम्‍हारे कैरेक्‍टर दीपू सैबेस्टियन का जन्‍म हुआ। हमें अकेली जिंदगी जी रहे प्रोफेसर सिरस की कहानी कहने के लिए कोई चाहिए था। फिर यह सिरस और दीपू की कहानी बन गई।
- शाहिद पर काम करते समय हम ने कहां सोचा था कि उसे नेशनल अवार्ड मिल जाएगा। अभी अजीगढ़ चर्चा में है। क्‍या निर्माण के दौरान यह अहसास था कि समलैंगिक अधिकारों की यह फिल्‍म ऐसी प्रासंगिक हो जाएगी? व्‍यक्ति सिरस से बढ़ कर अब यह एक सामाजिक विषय की फिल्‍म हो गई है।
0 हमेशा मेरी कोशिश रहती है कि मानव अधिकारों की कहानी पूरी जिम्‍मेदारी के साथ कहें। हम उन पर फिल्‍में क्‍यों बनाते हैं,क्‍योंकि वे समाज के बहुसंख्‍यकों से अलग हैं। हम उन्‍हें अल्‍पसंख्‍यक कहते हैं। चाहे वे मुसलमान हों या माइग्रैंट हों या होमोसेक्‍सुअल हों। मेरी कोशिश रहती है कि मैं उन्‍हें इंसान की तरह पेश करूं और उनके अधिकारों की बात करूं। समाज में उनकी मौजूदगी को रेखांकित करना ही ऐसी फिल्‍मों का ध्‍येय हो जाता है। जब हम लिख रहे थे तो सेक्‍शन 377 पर कोई बात करने को तैयार नहीं था। संसद ने चुप्‍पी साध ली थी। संसद यों भी निष्क्रिय ही रहता है। सड़क और संसद में बड़ा अंतर आ गया है। सभी चाहते हैं कि यह लॉ हटे। अब सुप्रीम कोर्ट लोगों की इच्‍छाओं पर ध्‍यान दे रहा है। अलीगढ़ अब उस लड़ाई का हिस्‍सा बन गई है।
- इस फिल्‍म का मकसद क्‍या है ?
0 सीधी सी बात है कि एक व्‍यक्ति अपने बंद कमरे में क्‍या कर रहा है,यह उसका निजी मामला है। दो व्‍यक्ति राजीखुशी क्‍या कर रहे हैं,उससे स्‍टेट का क्‍या लेनादेना है अगर वे समाज को नुकसान नहीं पहुंचा रहे हैं। हम फिल्‍म में यही दिखा रहे हैं। एक व्‍यक्ति की जिंदगी  कुछ लोगों ने तबाह कर दी।
-अगर आ से पूछूं कि बीच के दौर के हंसल मेहता और आज के हंसल मेहता में क्‍या अंतर दिखता है?
0 हर फिल्‍म में सेंसर से लड़ाई। फिल्‍म की रिलीज का संघर्ष... इसके बावजूद मैं थकता नहीं। बीच की फिल्‍मों में मैं थक जाता था। उनमें कहने के लिए कुछ नहीं रहता था। इन फिल्‍मों से मुझे ऊर्जा मिलती है। एक मकसद मिल गया है मुझे। उस दौर में मैं फिल्‍मों से अपने खाली समय भर रहा था। उन फिल्‍मों की एक भूमिका रही। मुझे असफलता मिली। उसकी वजह से मैंने अंदर झांका। और ऐसी फिल्‍मों की तरफ लौटा।

Thursday, February 18, 2016

कुछ तो बदल सकूं यह दुनिया - सोनम कपूर




-अजय ब्रह्मात्‍मज
सोनम कपूर नीरजा में शीर्षक भूमिका में दिखेंगी। निर्देशक राम माधवानी ने फिल्‍म का खयाल आते ही सोनम के नाम पर विचार किया था। सोनम ने नीरजा की कहानी और स्क्रिप्‍ट सुनी तो तुरंत हां कह दी। साेनम इस बातचीत में बता रही हैं अपनी सहमति की वजह और नीरजा फिल्‍म और व्‍यक्ति के बारे में...
-बताएं कि कैसे यह फिल्‍म आप तक पहुंची ?
0 तकरीबन ढाई साल पहले मुझे इस फिल्‍म की जानकारी मिली। मुझे बताया गया कि राम माधवानी इसे मेरे साथ ही करना चाहते हैं। स्क्रिप्‍ट पढ़ते समय ही मुझे रुलाई आ गई। मैंने राम माधवानी के बारे में सुन रखा था कि वे ऐड वर्ल्‍ड का बड़ा नाम हैं। नीरजा की कहानी बहुत स्‍ट्रांग है। वह एक साधारण लड़की थी। उनके पिता एक जर्नलिस्‍ट थे। उनकी मां हाउस वाइफ थीं। वह खूबसूरत थी तो उसे माडलिंग के असाइनमेंट मिल जाते थे। उनके टाइम में एयर होस्‍टेस के जॉब के साथ ग्‍लैमर जुड़ा हुआ था। वह एयर होस्‍टेस बनना चाहती थ। उनके डैड बहुत ओपन माइंड के थे। उन्‍होंने हां कर दी। घर में सभी उसे लाडो बुलाते थे। वह परिवार की लाडली थी।
-लगता है नीरजा के बारे में काफी रिसर्च किया है आप ने...
0 अपने किरदार को जानना जरूरी होता है। वह सिद्धांतवादी लड़की थी। मेरे खयाल में उनकी परवरिश ही ऐसी थी। वह अपने पिता के समान थी। वह अन्‍याय नहीं बर्दाश्‍त कर पाती थीं। इस घटना के चार हफ्ते पहले वह हाइजैक ट्रेनिंग के लिए गई थीं। आने पर उन्‍होंने मां को सब बताया तो उनकी मां ने दूसरी आम मां की तरह समझाया कि तेरा जहाज हाइजैक हो तो तुम भाग जाना। तुम बहादुरी मत दिखाना। नीरजा ने तब कहा था कि सभी मां तुम्‍हारी तरह सोचने लगेंगी तो देश का क्‍या होगा? वह मां से नाराज हो गई थी। नीरजा की मां रमा आंटी ने मुझे बताया था कि जहाज के हाइजैक की खबर सुनते ही उन्‍हें लग गया था कि वह वापिस नहीं आएगी। वही हुआ। उसने हाइजैक कोड पायलट को दिया तो पायलट निकल गए। फिर वह हेड हो गई तो वही कप्‍तान बन गईं। उन्‍होंने अपनी ड्यूटी निभाई। खुद ही विमान के सभी यात्रियों को बचाने की जिम्‍मेदारी ले ली। उस मुश्किल घड़ी में एक साधारण लड़की ने असाधारण काम कर दिया। उनकी जिंदगी उदाहरण है कि सच के साथ रह कर ड्यूटी पूरी करें तो असाधारण काम कर सकते हें।   
- नीरजा के नाम के अवार्ड समारोह में आप चंडीगढ़ गई थीं। वहां का अनुभव कैसा रहा?
0 मैं दुविधा में थी कि मुझे क्‍यों सम्‍मान मिल रहा है। मैं तो एक अभिनेत्री हूं,जिसने नीरजा की भूमिका निभाई है। वहां आए सभी लोग मुझे नीरजा का प्रतिरूप समझ रहे थे। उसी दिन लोहड़ी भी थी।
-फिल्‍म अभिनेत्रियों के बारे में धारणा है कि उनकी जिंदगी में चमक तो है,लेकिन वह नकली सी है। ऐसे में रियल लड़कियों से मिल कर कैसा लगता है?
0 मुझे आश्‍चर्य होता है कि मेरी फैंस में लड़कियों की तादाद अच्‍छी-खासी है। वे मुझे हर रूप में पसंद करती हैं। सच है कि हमारी जिंदगी ककून जैसी है। जिंदगी की खुरदुरी सच्‍चाइयां हमें छू नहीं पातीं। मैं कोशिश करती हूं कि अपनी फिल्‍मों और पर्सनैलिटी के जरिए थोड़ा फर्क तो ले आऊं। मेरी बातें सभी ध्‍यान से सुनते हैं,इसलिए मुझे जब भी मौका मिलता है मैं सही बात करती और कहती हूं। मैं आज की लड़की की तरह पेश आती हूं। मन की बात कहती हूं। साथ ही ऐसी भूमिकाएं निभाने की खोज में रहती हूं,जिसका समाज पर असर हो।
-क्‍या नीरजा और सोनम में समानताएं हैं?
0 हम सभी को नेक काम करने,सच की राह पर चलने और समाज का भला सोचने की बात सिखाई जाती है। जिंदगी में प्रवेश करने के बाद हम अपने-अपने अनुभवों से हम कुंद और कठोर हो जाते हैं। स्क्रिप्‍ट पढ़ते समय मुझे अपने किशोर उम्र की बातें याद आ गईं। नीरजा के चेहरे पर एक नूर और गर्मजोशी थी। मैंने नीरजा की आत्‍मा छूने की कोशिश की। सच कहूं तो नीरजा की थोड़ी क्‍वालिटी मेरे अंदर आ गई1 जो समानताएं थीं,वे मजबूत हो गईं।
-क्‍या आप ने महसूस किया है कि आप अपने किरदारों को अपनी पर्सनैलिटी से कोमल और प्रिय बना देती हैं? उन पर एक मृदुल परत पड़ जाती है।
0 आप बताएं कि यह अच्‍छी बात है कि बुरी बात है? यों मेरे करीबी लोग कहते हैं कि में अपने किरदारों की तरह ही लगने लगती हूं। मैं पूछती भी हूं कि ऐसा है क्‍या? आप जो कह रहे हें,कुछ वैसी ही बात आनंद राय ने भी कही थी। उसी वजह से उन्‍होंने मुझे रांझणा में जोया का किरदार दिया। रांझणा में निगेटिव होने के बावजूद दर्शकों ने जोया से नफरत नहीं की।
- निर्देशक राम माधवानी के बारे में कुछ बताएं?
0 उनके निर्देशन में मॉडर्न आउटलुक और स्‍टायल है। वे तो रियल टाइम में शूट करना चा‍हते थे। वह मुमकिन नहीं था। फिर भी यह फिल्‍म रियल के करीब है। उन्‍होंने नीरजा की दिलेरी और मर्म को छुआ है।

Wednesday, February 17, 2016

दरअसल : खलनायक बन जाते हैं थिएटर एक्‍टर



-अजय ब्रह्मात्‍मज
    ऐसा नहीं कह सकते कि यह किसी साजिश के तहत होता है,लेकिन यह भी सच है कि ऐस होता है। थिएटर से फिल्‍मों में आए ज्‍यादातर एक्‍टर आरंभिक सफलता के बाद खलनायक की भूमिकाओं में सिमट कर रह जाते हैं। लंबे समय से यही होता आ रहा है। आठवें दशक के आरंभ में राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय से आए ओम शिवपुरी समर्थ अभिनेता थे। छोटी-मोटी भूमिकाओं से उन्‍होंने पहचान बनाई। बाद में मुख्‍यधारा की फिल्‍मों में उन्‍हें मुख्‍य रूप से खलनायक की भूमिकाओं में ही इस्‍तेमाल किया गया। कभी-कभार चरित्र भूमिकाओं में भी हम ने उन्‍हें देखा। इस तरह उनकी बहुमुखी प्रतिभा का सदुपयोग नहीं हो पाया। उनके बाद अमरीश पुरी,मोहन आगाशे,अनुपम खेर,परेश रावल,आशीष विद्यार्थी,आशुतोष राणा,मुकेश तिवारी,मनोज बाजपेयी,इरफान खान,यशपाल शर्मा,जाकिर हुसैन,गोविंद नामदेव,के के मेनन,नीरज काबी,पंकज त्रिपाठी,दिब्‍येन्‍दु भट्टाचार्य,राजकुमार राव और मानव कौल जैसे अनेक नाम इस सूची में शामिल किए जा सकते हैं।
    दरअसल,हिंदी फिल्‍मों के नायक(हीरो) के खास प्रतिमान बन गए है। इस प्रतिमान के साथ उनकी उम्र भी जुड़ जाती है। गौर करें तो हिंदी फिल्‍मों में ज्‍यादातर अभिनेता 19 से 25 की उम्र में हीरो के तौर चुन लिए जाते हैं। अगर वे फिल्‍म इंडस्‍ट्री से हों तो पूरी तैयारी के साथ उनकी लांचिंग होती है। अमिताभ बच्‍चन और शाह रुख खान जैसे अपवाद कम ही होते हैं। थिएटर से आए ज्‍यादातर एक्‍टर पहले अवसर के पूर्व थिएटर में कई साल बिता चुके होते हैं। प्रशिक्षित एक्‍टर दो-तीन सालों की ट्रेनिंग और पढ़ाई के बाद मुंबई की तरफ मुखातिब होते हैं। फिल्‍मों की राह और प्रवेश की संभावना खोजने में कुछ महीने और साल निकल जाते हैं। जब तक पहला मौका मिलता है,तब तक वे हीरो बन पाने की उम्र पार कर चुके होते हैं। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री की एक सच्‍चाई यह भी है कि हीरो के तौर पर स्‍थापित होने के बाद वे 50 की उम्र तक भी हीरों की भूमिकाओं के लिए उचित और स्‍वीकृत रहते हैं। हिंदी फिल्‍मों के निर्माता 30 से अधिक उम्र के आउटसाइडर अभिनेताओं को कम ही मौके देते हैं।
    यह सच है कि खलनायक की भूमिकाओं के लिए जब नामों पर विचार हाता है तो हिंदी फिल्‍मों के निर्माताओं को थिएटर एक्‍टर का ही खयाल आता है। नई फिल्‍मों की कास्टिंग में सपोर्टिव और निगेटिव भूमिकाओं के लिए कास्टिंग डायरेक्‍टर थिएटर बैकग्राउंड के एक्‍टर ही चुनते हैं। निस्‍संदेह प्रशिक्षित अभिनेता छोटी से छोटी भूमिकाओं को भी खास बना देते हैं। अदाकारी में माहिर ये अभिनेता अपनी भाव-भंगिमाओं से किरदारों को बखूबी निभाते हैं। हर साल एक-दो ऐसे अभिनेता उभरते हैं,जो तुरंत ही खल भूमिकाओं तक सीमित हो जाते हैं। वहां उनकी तारीफ होती है। और वे चाहने पर भी मनोज बाजपेयी या इरफान खान की तरह खींची गई हद नहीं तोड़ पाते। आप कभी मनोज या इरफान से बातें करें और वे खुलें तो ऐसे अनेक किस्‍से पता चलेंगे जिनमें उन्‍हें खल भूमिकाओं के लिए बाध्‍य किया गया। मना करने पर उन्‍हें बहिष्‍कृत किया गया।
पिछले सालों में राजनीति में मनोज बाजेयी न शानदार खल भूमिका से करारा जवाब दिया तो एक बार फिर उन्‍हें खल भूमिकाओं की हद में बांधने की कोशिश की गई। उन्‍हें मुश्किल फैसला लेना पड़ा कि वे निरंतर खल भूमिकाएं नहीं करेंगे। कमोेश यही हाल थिएटर से अधिकोश एक्‍टर का है। वे मजबूरी में पिसते और सिमटते जाते हैं। मानव कौल समर्थ अभिनेता हैं,लेकिन हम देख रहे हैं कि उन्‍हें फिर से खल भूमिकाएं ही दी जा रही हैं। पंकज त्रिपाठी किसी भी प्रकार की भूमिका के लिए सक्षम हैं, लेकिन उनकी भी घेराबंदी आरंभ हो चुकी है। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री थ्‍िाएटर एक्‍टर की प्रतिभा का उपयोग तो करती है,लेकिन उन्‍हें नायक या प्रमुख किरदार बनाने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाती। सिनेमा बदल रहा है। फिर भी थिएटर एक्‍टर के प्रति फिल्‍मकारों का रवैया नहीं बदल पा रहा है।

Friday, February 12, 2016

फिल्‍म समीक्षा : फितूर



सजावट सुंदर,बुनावट कमजोर
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अभिषेक कपूर की फितूर चार्ल्‍स डिकेंस के एक सदी से पुराने उपन्‍यास ग्रेट एक्‍पेक्‍टेशंस का हिंदी फिल्‍मी रूपांतरण है। दुनिया भर में इस उपन्‍यास पर अनेक फिल्‍में बनी हैं। कहानी का सार हिंदी फिल्‍मों की अपनी कहानियों के मेल में है। एक अमीर लड़की,एक गरीब लड़का। बचपन में दोनों की मुलाकात। लड़की की अमीर हमदर्दी,लड़के की गरीब मोहब्‍बत। दोनों का बिछुड़ना। लड़की का अपनी दुनिया में रमना। लड़के की तड़प। और फिर मोहब्‍बत हासिल करने की कोशिश में दोनों की दीवानगी। समाज और दुनिया की पैदा की मुश्किलें। अभिषेक कपूर ने ऐसी कहानी को कश्‍मीर के बैकड्राप में रखा है। प्रमुख किरदारों में कट्रीना कैफ,आदित्‍य रॉय कपूर,तब्‍बू और राहुल भट्ट हैं। एक विशेष भूमिका में अजय देवगन भी हैं।
अभिषेक कपूर ने कश्‍मीर की खूबसूरत वादियों का भरपूर इस्‍तेमाल किया। उन्‍होंने इसे ज्‍यादातर कोहरे और नीम रोशनी में फिल्‍मांकित किया है। परिवेश के समान चरित्र भी अच्‍छी तरह प्रकाशित नहीं हैं। अभिषेक कपूर की रंग योजना में कश्‍मीर के चिनार के लाल रंग का प्रतीकात्‍मक उपयोग किया गया है। पतझड़ में कश्‍मीर के चिनार लाल हो जाते हैं। अभिषेक कपूर ने अपने किरदारों को चिनार के पत्‍तों का लाल रंग देने के साथ पतझड़ का मौसम भी दिया है। इस परिवेश और हालात में कोई भी खुश नहीं है। पूरी फिल्‍म में एक उदासी पसरी हुई है। यही वजह है कि खूबसूरत दिखने के बावजूद फिल्‍म में स्‍पंदन और सुगंध नहीं है।
अभिषेक कपूर ने फिरदौस की भूमिका कट्रीना कैफ को सौंप दी है। अपनी खूबसूरती और अपीयरेंस से वह नाच-गानों और चाल में तो भाती हैं,लेकिन जब संवाद अदायगी और भावों को व्‍यक्‍त करने की बात आती है तो वह हमेशा फिसल जाती हैं। उनकी मां हजरत की की भूमिका में तब्‍बू हैं। उनकी भाषा साफ है और भावों की अदायगी में आकर्षण है। हालांकि फिल्‍म में यह बताया जाता है कि वह बचपन में ही पढ़ाई के लिए लंदन चली गई थी,फिर भी लहते और अदायगी में कशिश तो होनी चाहिए थी। तबबू और कट्रीना कैफ के साथ के दृश्‍यों में यह फर्क और रूपष्‍ट हो जाता है। आदित्‍य रॉय कपूर नूर की भूमिका में ढलने की पूरी कोशिश करते हैं,लेकिन उनके व्‍यक्तित्‍व का शहरी मिजाज आड़े आता है। कश्‍मीरी सलाहियत नहीं है उनकी चाल-ढाल में। प्रचार किया गया था कि इस फिल्‍म के लिए वर्कशॉप किए गए थे। फिर ये कलाकार क्‍यों नहीं निखर पाए? नायक और नायिका दोनों निराश करते हैं।
दरअसल, यह फिल्‍म ठहरी झील में बंधे शिकारे की तरह प्रकृति का नयनाभिरामी रूप तो दिखाती है,लेकिन जीवन में गति और लय नहीं है। कश्‍मीर की राजनीति और स्थिति सिर्फ धमाकों से जाहिर होती है। ऐसा लगता है कि किरदारों के जीवन हालात से अप्रभावित हैं। फिल्‍म के एक डॉयर्लाग में कलाकार,समाज और राजनीति के संबंधों की बात कही भर जाती है। वास्‍तविकता में फिल्‍म उससे परहेज करती है। आतंकवादी के रूप में आए अजय देवगन अचानक गायब होते हैं और फिर नमदार होते हैं तो नूर की जिंदगी में उनकी भूमिका का इतना ही औचित्‍य समझ में आता है कि बानक नूर ने उन्‍हें कभी खाना खिलाया था।
अभिषेक कपूर ने कहानी आगे बढ़ाने में घटनाएं जोड़ने की पूरी आजादी ली है। वे उन्‍हें जोड़ने और कार्य-कारण संबंध बिठाने पर अधिक ध्‍यान नहीं देते। नतीजतन फिल्‍म बिखरी हुई लगती है। कथा के घागे उलझे हुए हैं और किरदारों के संबंध भी स्‍पष्‍ट नहीं हैं। श्रीनगर,दिल्‍ली,पाकिस्‍तान और लंदन के बीच ये चरित्र आते-जाते रहते हैं। उनके आवागमन पर भी सावधानी नहीं बरती गई है।
फिल्‍म के गीत-संगीत पर काफी मेहनत की गई है। वह बेहतरीन भी है। स्‍वानंद किरकिरे और अमित त्रिवेदी ने स्‍थानीय खूबियों को गीत-संगीत में तरजीह दी है।
अभिषेक कपूर की फितूर की सजावट आकर्षक और सुंदर है,लेकिन उसकी बनावट में कमी रह गई है। यह फिल्‍म आंखों को अच्‍छी लगती है। प्रोडक्‍शन बेहतरीन है।
अवधि- 132 मिनट
स्‍टार ढाई स्‍टार

मेहनत से मंजिल खुद आयी करीब-दिव्‍या खोसला कुमार




-अजय ब्रह्मात्‍मज
दिव्‍या खोसला कुमार का एक परिचय यह है कि वह टीसीरिज के सर्वेसर्वा भूषण कुमार की पत्‍नी हैं। यह परिचय उन पर इस कदर हावी है कि उनके व्‍यक्तित्‍व के अन्‍य पहलुओं पर लोगों की नजर नहीं जाती। एक आम धारणा है कि चूंकि वह भूषण कुमार की पत्‍नी हैं,इसलिए उन्‍हें सुविधाएं मिल जाती हैं। और अब नाम भी मिल रहा है। इस धारणा से अलग सचचाई यह है कि दिव्‍या ने पहले अपने म्‍यूजिक वीडियो और फिर अपनी फिल्‍म से साबित किया है कि वह सक्षम फिल्‍मकार हैं। यारियां के बाद उनकी सनम रे आ रही है।

-फिल्‍म निर्देशन में आप ने खुद को बहुत जल्दी साध लिया।
0 जी मैं मानती हूं कि हमें जिस मंजिल पर पहुंचना होता है,वह हो ही जाता है। लोगों कुछ भी कहें,मैं आपको बताऊं कि मुझे काम करते हुए सोलह साल हो गए हैं। ऐसा नहीं है कि सब कुछ तुंरत हो गया। यारियां के समय सबको लगा कि यह लड़की नई है। सच यह है कि उस फिल्म को बनाने में मैंने सालों की मेहनत लगाई है। अपनी फिल्‍म पर मुझे विश्वास था। फिल्म हिट हुई। क्रिएटिव इंसान के तौर पर मेरा विकास हुआ है। पहली फिल्म बनाते समय मेरे सामने काफी अड़चने आयी। स्किप्ट में अड़चन आयी। कास्टिंग में डेढ़ साल लग गए। मैंने नए कलाकार खोजें। उन्‍हें एक साल की ट्रेनिंग दी। यह सब करने में काफी समय लग गया। यारियां रिलीज होने के दो महीने बाद ही मैंने और मेरे लेखक संजीव दत्ता ने सनम रे की स्किप्ट पूरी कर ली थी। मेरे जीवन में कोई ऐसी चीज है,जो मुझे आगे बढ़ने की हिम्मत देती है। मेरे ख्याल से जब हम बहुत मेहनत करते हैं तो मंजिल खुद हम तक पहुंच जाती है। बीच में कोई खड़ा नहीं हो पाता है।

-सब मानते हैं कि इनको सब परोसा हुआ मिल गया है।
0 देखिए। मैं आपको एक बात बता देती हूं। मैंने एक सीनियर पत्रकार को सनम रे की शूटिंग पर लद्दाख बुलाया था। मुझे काम करते देखने के बाद चलते समय उन्‍होंने कहा कि मेरे मन में आप के प्रति सम्‍मान बढ़ गया है। उन्‍होंने साफ कहा कि मुझे तो यही लगता रहा था कि यारियां के गाने किसी और ने शूट किए होंगे। अब मैंने सोच लिया है कि आगे से सबको अपनी फिल्म के सेट पर जरूर बुलाऊंगी। यारियां के सारे गाने मैंने कोरियोग्राफ किए थे। सनम रे के भी सारे गाने मैंने कोरियोग्राफ किए हैं।

-क्‍या आप बचपन से ही कहानियां बना लेती हैं? क्रिएटिविटी में कब से दिलचस्‍पी हुई?
0 अधिकतर लोग कहते हैं कि फिल्मेकर बनने के लिए बहुत ज्यादा फिल्में देखनी पडती हैं। मैंने कभी इतनी फिल्में नहीं मैंने बचपन से किताबें बहुत पढ़ी हैं। मैंने अनगिनत कहानियां और किताबें पढ़ी हैं। उनसे इतनी जानकारी मिली है।

- आप किस तरह की किताबें पढ़ती थीं?
 0 मेरे पुस्तकालय में जितनी किताबें थी। मैंने सब पढ़ ली थीं। मेरी क्रिएटिविटी वहीं से आयी है। हम बचपन में जो सीखते हैं, बड़े होने पर वह काम आता है। मेरे लिए वही काम आ रहा है। मेरी कल्पना में जो चित्र बनते हैं. उनके पीछे आपके अचेतन मन में ज्ञान का भंडार होता है। मैंने ज्‍यादातर अंग्रेजी में मैंने किताबें पढ़ी हैं।

- मुंबई आने के बाद आपने मॉडलिंग की। फिल्में की। बड़ी फिल्म में कास्ट हुई थीं। वह कैसे संभव हुआ था?
0 अठारह साल की उम्र में मैंने मॉडलिंग शुरू की थी। बीस साल की उम्र में मेरा कॉलेज खत्म हुआ। फिर मैं मुबई शिफ्ट हुई। यहां मॉडलिंग के साथ म्यूजिक वीडियो में काम किया। कई डायरेक्टर ने मुझे इस वीडियो में देखा। मुझे फिर फोन आए। तीन-चार ऑडिशन हुए। उन्हें मेरे जैसा ही लुक चाहिए था। वह मेरे लिए काम कर गया। इस तरह मुझे वह फिल्म मिल गई।

- फिर आपकी शादी भूषण कुमार से हो गई। अपनी शादीशुदा जीवन को पर्याप्त समय देने के बाद आप ने फिल्‍मों में कदम रखा?
0 हम भारतीय महिलाएं हैं। भारतीय महिला कितनी महत्तवाकांक्षी क्यों ना हो जाएं। चाहे जितना करियर पर फोकस करें पर उनका पहला फोकस परिवार ही होता है। यह जरूरी है। हमें अपनी बुनियाद मजबूत रखनी चाहिए। मैंने अपनी शादी को बहुत साल दिए। अभी ग्यारह साल होने वाले हैं। विश्वास नहीं होता। जब रिश्ते को इतने साल हो जाते हैं , हम एक दूसरे को समझने लगते हैं। मेरे पति जानते हैं कि मैं कैसी महिला हूं। मैं क्या करना चाहती हूं। एक समय के बाद अपने आप परिवार भी ओपन हो जाता है। मैंने कभी उनकी किसी बात को मना नहीं किया। उन्होंने जैसा चाहा मैंने वैसा किया। मेरे ख्याल से जब आप परिवार में घुल जाते हैं तो बाकी चीजें आसान हो जाती है।

-इस फिल्म को लेकर कितना यकीन है?
0 पिछली बार युवा वर्ग मेरे साथ था। इस बार लव स्टोरी है। इस बार प्रेमीयुगल मेरे साथ होंगे। यह मजबूत पाइंट है। मेरी कहानी में बढ़त हुई है। फिल्ममेकर होने के नाते मेरा विकास हुआ है। मैं दर्शकों की सोच को समझ सकती हूं। मीडियम को समझती हूं। पता है कि लोगों के दिलों को कैसे छू सकती हूं। एक फिल्म के बाद थोड़ी समझ आ जाती है। यों दबाव भी रहता है। जितनी निडर मैं पहली बार थी. उतनी अब नहीं हूं। इस बार डर है मुझे। सनम रे पहली फिल्म से बेहतर फिल्म बनी है। यह मुझे पता है।

-क्या है फिल्म में?
यह भावपूर्ण लव स्टोरी है। यह दो लोगो की कहानी है। इसमें बताया गया है कि प्यार क्या है। प्यार का मतलब फूल देने औऱ हाथ पकड़ने से ज्यादा है। इसमें पुलकित सम्राट आकाश की भूमिका निभा रहे हैं। यामी गौतम श्रुति का किरदार निभा रही हैं। साथ में उर्वशी रौतेला आकांक्षा की भूमिका निभा रही हैं।

-यह कोई त्रिकोणीय प्रेम कहानी है।
जी नहीं। यह एक पवित्र प्रेम कहानी है।

-दिव्या के लिए प्यार क्या है?
मैं अभी तक खोज रही हूं। आप जिंदगी भर खोजते रहते हैं कि प्यार क्या है? मैं वहीं खोजने की कोशिश कर रही हूं। इस फिल्म के जरिए मैं वहीं पता लगाते की कोशिश कर रही हूं कि प्यार क्या है?

-यानि यह फिल्म आपकी खोज है?
जी हां। फिल्म में प्रेमियों को कई सारे जवाब मिलेंगे। फिल्म यह भी बताती है कि खुशी क्या है? यंगस्टर को लगता है कि करियर में मनचाहा पाकर आपको खुशी मिल जाती है। पर ऐसा होता नहीं है। बल्कि संघर्ष बढ़ जाता है। कई लोग धैर्य खो देते हैं। जीवन भर खुशी की तलाश करते रहते हैं। मैंने इस फिल्म में खुशी भी खोजने की कोशिश की है।

-फिल्म इडंस्ट्री में ऐसे कौन से डायरेक्टर हैं जिनके काम से आप प्रभावित होती हैं?
0 मैं बहुत पीछे नहीं जाऊंगी। मेरे लिए संजय लीला भंसाली से बेहतरीन डायरेक्टर कोई नहीं है। उनके अलावा यश चोपड़ा जी का नाम लूंगी। जिस तरीके से उन्होंने प्यार की तलाश की।

-दिव्‍या का बाहरी दुनिया से कितना परिचय है ?
0 मैंने भी बहुत दुनिया देखी। कई जगहों पर ट्रेवल कर चुकी हूं। अनुभव हैं मेरे पास। दिल्ली से आयी थी तो एक साल में मैंने सात घर बदले थे। लोकल ट्रेन में चलती थी। मैं कभी खुद को भूषण की पत्नी नहीं समझती। वह रोब नहीं है। सेट पर भी मेहनत से काम करती हूं। हर चीज का अनुभव होना जरूरी है। अनुभन ना होने पर इंसान होने के नाते बढ़त नहीं होती है। अनुभव हमें आगे बढ़ना सीखाता है। मैं लड़कियों को हौसाल देना चाहती हूं। अब महिलाओं के लिए रास्ते आसान हो गए हैं। माता-पिता का साथ बेटियों को मिल रहा है। ससुराल वाले भी बहु को आगे बढ़ाने में मदद कर रहे हैं। खुली सोच समाज में विकसित हो रही है। कई बार लगता था कि शादी हो गई सब खत्म। मेरी शादी के बाद भी लोगों को लगा था कि यह इंडस्ट्री से चली गई है। 

-फिल्म की बात करें। आपने तीनों किरदारों के लिए कलाकारों को कैसे चुना ?
0 मेरे फिल्म के हीरो का किरदार पुलकित निभा रहे हैं। पुलकित की आंखों में उदासी दिखती है। मुझे वहीं चाहिए था। मुझे ऐसा एक्टर नहीं चाहिए था जिसके चेहरे पर खुशी हो। जिसने अपने जीवन में काफी कुछ पा लिया हो। फिल्‍म में पुलकित का किरदार संतुष्ट नहीं है। मतलबी है। वह लगातार अपने में गुम रहता है। मुझे ऐसा ही एक्टर चाहिए था।  यामी के किरदार के लिए मुझे खुशमिजाज लड़की चाहिए थी,जो आजाद रहती है,जिसे किसी की नहीं पड़ी है। यामी में मुझे यही बात दिखी। इस फिल्म में ऋषि कपूर जी भी हैं। वह पिता की सहायक भूमिका में हैं। उनके साथ काम करना अपने आप में बड़ी बात है। उनके साथ सेट पर काम करें पता चला कि वह क्यों सुपरस्टार हैं? सुपरस्टार की क्या खूबी होती है? उर्वशी का किरदार एक आधुनिक लड़की का है। मैंने सोचा कि उनके पास वह लुक है। वह आज की लड़की लगती है।

-कैसा संगीत है?
0 यह लव स्टोरी है। प्यार के गाने ज्यादा है। कई सारे गीतकार हैं। कई लोगों ने मिलकर संगीत दिया है। भूषण जी ने बनवाया है. उनका सेंस संगीत के मामले है अच्छा है। इस फिल्म के सारे गाने मैंने कोरियोग्राफ किए हैं। इस फिल्म के दो गाने पहले से ही पसंद किए जा रहे हैं।