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Friday, January 29, 2016

फिल्‍म समीक्षा : साला खड़ूस

खेल और ख्‍वाब का मैलोड्रामा
-अजय ब्रह्मात्‍मज
    हर विधा में कुछ फिल्‍में प्रस्‍थान बिंदु होती हैं। खेल की फिल्‍मों के संदर्भ में हर नई फिल्‍म के समय हमें प्रकाश झा की हिप हिप हुर्रे और शिमित अमीन की चक दे इंडिया की याद आती है। हम तुलना करने लगते हैं। सुधा कोंगरे की फिल्‍म साला खड़ूस के साथ भी ऐसा होना स्‍वाभाविक है। गौर करें तो यह खेल की अलग दुनिया है। सुधा ने बाक्सिंग की पृष्‍ठभूमि में कोच मदी(आर माधवन) और बॉक्‍सर(रितिका सिंह) की कहानी ली है। कहानी के मोड़ और उतार-चढ़ाव में दूसरी फिल्‍मों से समानताएं दिख सकती हैं,लेकिन भावनाओं की जमीन और परफारमेंस की तीव्रता भिन्‍न और सराहनीय है।
    आदि के साथ देव(जाकिर हुसैन) ने धोखा किया है। चैंपियन बॉक्‍सर होने के बावजूद आदि को सही मौके नहीं मिले। कोच बनने के बाद भी देव उसे सताने और तंग करने से बाज नहीं आता। देव की खुन्‍नस और आदि की ईमानदारी ने ही उसे खड़ूस बना दिया है। अभी कर्तव्‍यनिष्‍ठ और ईमानदार व्‍यक्ति ही घर,समाज और दफ्तर में खड़ूस माना जाता है। देव बदले की भावना से आदि का ट्रांसफर चेन्‍नई करवा देता है। चेन्‍नई में आदि की भिड़ंत मदी से होती है। मछवारन मदी में उसे उसकी बड़ी बहन और बॉक्‍सर लक्‍स(मुमताज सरकार) से अधिक एनर्जी और युक्ति दिखती है। मदी में आदि को खुद जैसी आग का अहसास होता है। वह उसे बॉक्सिंग के गुर सिखाता है और कंपीटिशन के लिए तैयार करता है। साला खड़ूस में दोनों के रिश्‍तों(शिष्‍य-गुरू) के साथ खेल की दुनिया की राजनीति और अंदरूनी कलह पर भी ध्‍यान दिया गया है। दोनों एकदूसरे से प्रभावित भी होते हैं।
    देश में बाक्सिंग का स्‍तर सुधारने के लिए खड़ूस आदि किसी भी स्‍तर तक जा सकता है। वह मदी के लिए सब कुछ करता है। कहीं न कहीं वह उसके जरिए अपने अधूरे ख्‍वाब पूरे करना चाहता है। आदि की यह निजी ख्‍वाहिश स्‍वार्थ से प्रेरित लग सकती है,लेकिन आखिरकार इसमें बॉक्सिंग का हित जुड़ा है। मदी की अप्रयुक्‍त और कच्‍ची ऊर्जा को सही दिशा देकर आदि उसे सफल बॉक्‍सर तो बना देता है,लेकिन देव की अड़चनें नहीं रुकतीं। स्थिति ऐसी आती है कि फायनल मैच के पहले आदि को सारे पदों से त्‍यागपत्र देने के साथ ही अनुपस्थित रहने का निर्णय लेना पड़ता है। फायनल मैच और उसके पहले के कई दृश्‍यों में भी फिल्‍म मैलोड्रैमैटिक होती है। भावनाओं का ज्‍वार हिलोरें मारता है। इन दृश्‍यों की भावुकता दर्शकों को भी द्रवित करती है,लेकिन इस बहाव से अलग होकर सोचें तो साला खड़ूस की तीव्रता इन दृश्‍यों में शिथिल होती है।
    आदि की भूमिका में हम एक अलग आर माधवन से परिचित होते हैं। उन्‍हें हम रोमांटिक और सॉफ्ट भूमिकाओं में देखते रहे हैं। इस फिल्‍म में वे अपनी प्रचलित छवि से बाहर आए हैं और इस भूमिका में जंचे हैं। केवल चिल्‍लाने और ऊंची आवाज में बोलने के दृश्‍यों में उनके संवाद थोड़े अनियंत्रित और अस्‍पष्‍ट हो जाते हैं। भावार्थ तो समझ में आ जाता है। शब्‍द स्‍पष्‍ट सुनाई नहीं पड़ते। परफारमेंस के लिहाज से उनके अभिनय का नया आयाम दिखाई पड़ता है। नयी अभिनेत्री रितिका सिंह का स्‍वच्‍छंद अभिनय साला खड़ूस में जान भर देता है। अपनी खुशी,गुस्‍से और बाक्सिंग के दृश्‍यों में वह बेधड़क दिखती हैं। रियल लाइफ बॉक्‍सर होने की वजह से उनके आक्रमण और बचाव में विश्‍वसनीयता झलकती है। कास्टिंग डायरेक्‍टर मुकेश छाबड़ा की भी तारीफ करनी होगी कि उन्‍होंने किरदारों के लिए उपयुक्‍त कलाकारों का चुनाव किया है। छोटी भूमिकाओं में आए ये कलाकार फिल्‍म के अंति प्रभाव को बढ़ा देते हैं। जूनियर कोच के रुप में आए नासिर और मदी की मां की भूमिका निभा रही अभिनेत्री बलविंदर कौर के उदाहरण दिए जा सकते हैं।
    फिल्‍म में मदी के अंदर आया रोमांटिक भाव पूरी फिल्‍म के संदर्भ में गैरजरूरी लग सकता है,लेकिन उसकी पृष्‍ठभूमि और कंडीशनिंग के मद्देनजर यह प्रतिक्रिया स्‍वाभाविक है। निर्देशक ने संयम से कायम लिया है। उन्‍होंने दोनों के ऊपर कोई रोमांटिक गीत नहीं फिल्‍माया है। स्‍वानंद किरकिरे और संतोष नारायण ने फिल्‍म की थीम के मुताबिक गीत-संगीत रचा है।
अवधि- 109 मिनट
स्‍टार- साढ़े तीन स्‍टार

फिल्‍म समीक्षा : मस्‍तीजादे



बड़े पर्दे पर लतीफेबाजी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

 मिलाप झावेरी की मस्‍तीजादे एडल्‍ट कामेडी है। हिंदी फिल्‍मों में एडल्‍ट कामेडी का सीधा मतलब सेक्‍स और असंगत यौनाचार है। कभी सी ग्रेड समझी और मानी जाने वाली ये फिल्‍में इस सदी में मुख्‍यधारा की एक धारा बन चुकी हैं। इन फिल्‍मों को लेकर नैतिकतावादी अप्रोच यह हो सकता है कि हम इन्‍हें सिरे से खारिज कर दें और विमर्श न करें,लेकिन यह सच्‍चाई है कि सेक्‍स के भूखे देश में फिल्‍म निर्माता दशकों से प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष तरीके से इसका इस्‍तेमाल करते रहे हैं। इसके दर्शक बन रहे हैं। पहले कहा जाता था कि फ्रंट स्‍टाल के चवन्‍नी छाप दर्शक ही ऐसी फिल्‍में पसंद करते हैं। अब ऐसी फिल्‍में मल्‍टीप्‍लेक्‍श में दिख रही हैं। उनके अच्‍छे-खासे दर्शक हैं। और इस बार सनी लियोन के एक विवादित टीवी इंटरव्‍यू को जिस तरीके से परिप्रेक्ष्‍य बदल कर पेश किया गया,उससे छवि,संदर्भ और प्रासंगिकता का घालमेल हो गया।
       बहरहाल,मस्‍तीजादे ह्वाट्स ऐप के घिसे-पिटे लतीफों को सीन बना कर पेश करती है। इसमें सेक्‍स एडिक्‍ट और समलैंगिक किरदार हंसी और कामेडी करने के लिए रखे गए हैं। एडल्‍ट कामेडी में कामेडी का स्‍तर निरंतर गिरता जा रहा है। मस्‍तीजादे में भी इसका बेरोक पतन हुआ है। सेक्‍स के इशारे,किरदारों की शारीरिक मुद्राएं,महिला किरदारों के अंगों का प्रदर्शन और द्विअर्थी संवादों में गरिमा की उम्‍मीद नहीं की जा सकती। मस्‍तीजादे में यह और भी फूहड़ और भद्दा है।
        फिल्‍म के हर दृश्‍य में सनी लियोन का इस्‍तेमाल हुआ है। उनके प्रशंसकों के लिए लेखक-निर्देशक ने उन्‍हें डबल रोल में पेश किया है। उनके साथ असरानी,सुरेश मेनन और शाद रंधावा हैं। मुख्‍य कलाकारों में ऐसी फिल्‍मों के लिए मशहूर तुषार कपूर के साथ वीर दास हैं। दोनों ही अभिनेताओं ने अपने तई फूहड़ हरकतें करने में निर्देशक की सोच का साथ दिया है। निर्देशक ने सनी लियोन से डबल रोल में डबल नग्‍नता परोसी है। फिल्‍म की कोई ठोस कहानी नहीं है। उसके अभाव में लेखकों ने केवल सीन और लतीफे जोड़े हैं।
     ऐसी फिल्‍मों के शौकीन भी मस्‍तीजादे से निराश होंगे। फिल्‍म आखिर फिल्‍म तो होनी चाहिए। एडल्‍ट लतीफे और सीन तो अभी थोड़े खर्चे में मोबाइल पर भी उपलब्‍ध हैं।
अवधि-107 मिनट
स्‍टार- एक स्‍टार
     

Thursday, January 28, 2016

दरअसल : मोबाइल पर मूवी



-अजय ब्रह्मात्‍मज


    स्‍मार्ट फोन के आने और प्रचलन से हिंदी सिनेमा का भारी नुकसान हुआ है। अभी लोग फोन में डाटा कार्ड लगाते हैं। उस डाटा कार्ड में पसंद की फिल्‍में लोड कर ली जाती हैं। लाेग आराम से फिल्‍में देखते हैं। पिछले दिनों दीपिका पादुकोण ने अपनी उड़ान में किसी सहयात्री को मोबाइल पर बाजीराव मस्‍तानी देखते हुए देखा। उन्‍होंने आपत्‍त‍ि भी की। यह आम बात है। मुंबई के लोकल ट्रेनों और बसों में आए दिन यात्री फिल्‍म रिलीज के दिन ही अपने मोबाइल पर फिल्‍में देखते नजर आते हैं।

मोबाइल फोन के स्‍क्रीन दो इंच से लेकर आठ इंच तक के होते हें। साधारण स्‍मार्ट फोन भी अब ऑडियो-वीडियो के लिए उपयुक्‍त हो गए हैं। मैंने तो देखा है कि सामान्‍य मोबाइलधारी अपने छोटे मोबाइल के छोटे स्‍क्रीन पर भी फिल्‍में देखते रहते हैं। उन्‍हें कोई परेशानी नहीं होती। फिल्‍म पत्रकारिता से जुड़े मेरे साथी नई फिल्‍मों के ट्रेलर और लुक पहली बार अपने स्‍मार्ट फोन पर ही देखते हैं। बेसिक जानकारी मिल जाने पर घर या दफ्तर पहुंच कर वे तसल्‍ली से पुन: देखते हैं। तात्‍पर्य यह है कि मोबाइल का स्‍क्रीन अब इस योग्‍य हो चुका है कि वह कंटेंट की जानकारी दे दे। और फिर मैंने यह भी देखा है कि कुछ लोग अपनी पसंद की फिल्‍में बार-बार देखते हैं।

मेरी बिल्डिंग में मेरी उम्र के एक सिक्‍युरिटी गार्ड हैं। प्राय: देर रात में फिल्‍मी पार्टियों और शो से लौटने पर मैं उन्‍हें मोबाइल पर फिल्‍में देखते पाता हूं। वे रजिस्‍टर पर मोबाइल फोन को औंधे टिका देते हैं और फिल्‍में देखने के साथ आने-जाने वालों पर भी नजर रखते हें। उनकी प्रिय फिल्‍म है शोले। एक बार मैंने उनसे पूछा कि इस दो इंच के स्‍क्रीन पर वे फिल्‍म का मजा कैसे लेते हैं ? उन्‍होंने अपनी तर्जनी उंगली से ललाट के किनारे दो-तीन बार ठोका और कहा फिल्‍म यहां चलती रहती है। मोबाइल तो सिर्फ याद दिलाता है कि कोन सा सीन है। वास्‍तव में यह रोचक अध्‍ययन का विषय है कि देखी हुई फिल्‍में बार-बार देखते समय एक आम दर्शक के रसास्‍वादन की क्‍या प्रक्रिया होती होगी? क्‍या मोबाइल पर फिल्‍में देख रहे सारे लोगों की रुचि और रसास्‍वादन में कोई फर्क भी है? तकनीकी रूप से दक्ष लोग बता सकते हैं कि मोबाइल से देखी गई फिल्‍मों की मानसिक ग्राह्यता किस स्‍तर की होती है।

मोबाइल पर फिल्‍में देखने के अनेक कारण हैं। महानगरों में समय और पैसों की कमी एक बड़ा कारण है। घर-दफ्तर के आवागमन में फिल्‍में देखने से अतिरिक्‍त समय नहीं खर्च करना पड़ता। बीस से तीस रुपए में नई फिल्‍में फोन पर डाउनलोड या अपलोड हो जाती हैं। सुना है कि मूवी की शेयरिंग भी होती है। मोबाइल पर मूवी देख रहे दर्शकों को इस बात का अहसास भी नहीं रहता कि वे कोई गैरकानूनी काम कर रहे हैं। वे किसी अपराध में शामिल हैं। सभी के पास अपने तर्क और कारण हैं। गौर करें तो वे एक स्‍तर पर वाजिब भी लगने लगते हैं।

हाल ही में आरा निवासी एक दर्शक मिले। संस्‍कारी और भोले किस्‍म के उस दर्शक ने मुझे बताया कि वह बड़े आराम और अधिकार से मोबाइल की दुकान से अपनी पसंद की फिल्‍में ले लेता है। उसने तर्क दिया... आप नर्द फिल्‍मों के बारे में अपने अखबार में बताते हैं। उनके स्‍टार और निर्माता-निर्देशक के इंटरव्‍यू छापते हैं। आप के अखबार से हमें सारी जानकारियां मिल जाती हैं। रिलीज के दिन वह फिल्‍म मेरे शहर में नहीं लगती। अब मैं फिल्‍म देखने के लिए तो पटना नहीं जाऊंगा न? आप निर्माताओं से पूछिए और मुझे बताइए कि वे मेरे शहर में अपनी फिल्‍म का प्रदर्शन क्‍यों नहीं सुनिश्चित करते? क्‍या मुझे पहले दिन या जल्‍दी से जल्‍दी फिल्‍में देखने का हक नहीं है। मेरे जैसे आम दर्शकों को निर्माता और वितरक क्‍यों वंचित रखते हैं? भाई,हम ने तो फिल्‍में देखने का रास्‍ता निकाल लिया है। अब यह गलत है या सही,यह आप सभी सोचते रहें।


Saturday, January 23, 2016

गीत-संगीत में पिरोए हैं कश्‍मीरी अहसास - स्‍वानंद किरकिरे



   
-अजय ब्रह्मात्‍मज
    पशमीना घागों से कोई ख्‍वाब बुने तो उसके अहसास की नजुकी का अंदाजा लगाया जा सकता है। कच्‍चे और अनगढ़ मोहब्‍बत के खयालों की शब्‍दों में कसीदाकारी में माहिर स्‍वानंद किरकिरे फितूर के गीतों से यह विश्‍वास जाहिर होता है कि सुदर और कामेल भवनाओं की खूबसूरत बयानी के लिए घिसे-पिटे लब्‍जों की जरूरत नहीं होती। स्‍वानंद किरकिरे ने अमित त्रिवेदी के साथ मिल कर फितूर का गीत-संगीत रख है। उनकी साला खड़ूस भी आ रही है। शब्‍दों के शिल्‍पकार स्‍वानंद किरकिरे से हुई बातचीत के अंश...
       स्‍वानंद किरकिरे बताते हैं, अभिषेक कपूर और अमित त्रिवेदी के साथ मैाने काय पो छे की थी। उस फिल्‍म के गीत-संगीत को सभी ने पसंद किया था। फितूर में एक बार फिर हम तीनों साथ आए हैं। फितूर का मिजाज बड़ा रोमानी है। ऊपर से काश्‍मीर की पृष्‍ठभूमि की प्रेमकह कहानी है। उसका रंग दिखाई देगा। उसमें एक रुहानी और सूफियाना आलम है। फितूर इंटेंस लव स्‍टोरी है,इसलिए बोलों में गहराई रखी गई है। गानों के रंग में भी फिल्‍म की थीम का असर दिखेगा। मैंने शब्‍दों को बुनते समय कश्‍मीरी अहसास के लिए वहां के लब्‍ज डाले हैं।
    शब्‍दों की यह शिल्‍पकारी तो अधिक मेहनत और जानकारी चाहती होगी। स्‍वानंद हंसने लगते हैं। फिर कहते हैं,शब्‍दकार की मेहनत दिमागी होती है। वह कहां दिखाई पड़ती है। जानकाी तो रहती ही है,लेकिन अनुभव काम आता है। शब्‍दों के चुनाव के लिए खयालों की उड़ान लगानी होती है। फिल्‍मी और घिसे-पिटे शब्‍दों से बचने के साथ यह भी देखना पड़ता है कि प्रयोग किए गए शब्‍दों से भाव न उलझे। इस फिल्‍म के सिलसिले में मैं काश्‍मीर भी गया था। वहां का संगीत सुना। पशमीना घागों में टेंडर लव की बात है। टेंडर लव कितना मुलायम और गर्म होता है। पशमीना में वह भाव आ जाता है। एक गीत में अगर फिरदौस बर्रूए-जमीनस्तो, हमीनस्त, हमीनस्त, हमीनस्तो।' का मैंने इस्‍तेमाल किया है। काश्‍मीर की खूबसूरती की इससे बेहतर अभिव्‍यक्ति नहीं हो सकती। मैंने एक गीत में पहले इस मशहूर पंक्ति के भाव और अर्थ को लेकर कुछ शब्‍दों को जोड़ा था। अभिषेक को लगा कि उसमें वह प्रभाव पैदा नहीं हो रहा है। वह अनुवाद लग रहा है।फिर यह तय हुआ कि मूल पंक्ति ही रखते हैं।
    स्‍वानंद मानते हैं कि अभिषेक कपूर,इम्तियाज अली और राजकुमार हिरानी जैसे फिल्‍मकारों के साथ काम करने का मजा है कि आप पर बाजार के हिसाब से ही लिखने का दबाव नहीं रहता। वे कहते हैं, उनके साथ कुछ अलग काम करने के मौके मिलते हैं। इस फिल्‍म में तो अमित त्रिवेदी का साथ मिला। अमित बहुत सुलझे और मौलिक संगीत निर्देशक हैं। वे कहानी के अंदर से धुनें निकालते हैं। साथ ही वे प्रयोगधर्मी हैं। आप उनकी कोई भी फिल्‍म देख लें। हमीनस्‍त गीत मैंने पहले लिख लिया था। अमित ने बाद में उसे संगीत से सजाया। यह आजकल कम होता है। इस गीत में काश्‍मीर की विडंबना भी सुनाई पड़ेगी। होने दो बतिया मेरे दिल के करीब है।
    स्‍वानंद किरकिरे अपनी अगली फिल्‍म साला खड़ूस का भी जिक्र करते हैं। वे कहते हैं, इस फिल्‍म के गाने भी अव्च्‍छे हैं। नए संगीतकार हैं संतोष नारायण। उनके साथ मजा आया। मैंने राजकुमार हिरानी से कहा था कि मुझे कुछ ओरिजिनल लिखने का मौका देना। मैं तमिल गीतों के आधार पर नहीं लिखूंगा। उन्‍होंने मेंरी बात मानी। आप सभी फिल्‍म देख कर बताएं कि कैसे हैं गीत?

Friday, January 22, 2016

फिल्‍म समीक्षा : जुगनी


प्रेमसंगीत
-अजय ब्रह्मात्‍मज
शेफाली भूषण की फिल्‍म जुगनी में बीबी सरूप को देखते हुए लखनऊ की जरीना बेगम की याद आ गई। कुछ महीनों पहले हुई मुलाकात में उनकी म्‍यूजिकल तरक्‍की और खस्‍ताहाल से एक साथ वाकिफ हुआ था। फिल्‍म में विभावरी के लौटते समय वह जिस कातर भाव से पैसे मांगती है,वह द्रवित और उद्वेलित करता है। पारंपरिक संगीत के धनी साधकों के प्रति समाज के तौर पर हमारा रवैया बहुत ही निराशाजनक है। मां के हाल से वाकिफ मस्‍ताना ने जुगनी के साथ किडनी का तुक मिलाना सीख लिया है। आजीविका के लिए बदलते मिजाज के श्रोताओं से तालमेल बिठाना जरूरी है। फिर भी मस्‍ताना का मन ठेठ लोकगीतों में लगता है। मौका मिलते ही वह अपनी गायकी और धुनों से विभावरी को मोहित करता है। मस्‍ताना की निश्‍छलता और जीवन जीने की उत्‍कट लालसा से भी विभावरी सम्‍मोहित होती है।
जुगनी के एक कहानी तो यह है कि विभावरी मुंबई में फिल्‍म संगीतकार बनना चाहती है। उसे एक फिल्‍म मिली है,जिसके लिए मूल और देसी संगीत की तलाश में वह पंजाब के गांव जाती है। वहीं बीबी सरूप से मिलने की कोशिश में उसकी मुलाकात पहले उनके बेटे मस्‍ताना से हो जाती है। यह ऊपरी कहानी है।  गहरे उतरें तो सतह के नीचे अनेक कहानियां तैरती दिखती हैं। विभावरी के लिविंग रिलेशन और काम के द्वंद्व,बीबी सरूप की बेचारगी,मस्‍ताना और प्रीतो का प्रेम,मस्‍ताना के दादा जी की खामोश मौजूदगी,मस्‍ताना के दोस्‍त की इवेंट एक्टिविटी,मस्‍ताना और विभावरी की संग बीती रात,विभावरी का पंजाब जाना और मस्‍ताना का मुंबई आना...हर कहानी को अलग फिल्‍म का विस्‍तार दिया जा सकता है। मस्‍ताना भी विभावरी के प्रति आकर्षित है। उसका आकर्षण देह और प्रेम से अधिक भविष्‍य की संभावनाओं को लेकर है। रात साथ बिताने के बाद विभावरी और मस्‍ताना की भिन्‍न प्रतिक्रियाएं दो मूल्‍यों और वर्जनाओं को आमने-सामने ला देती हैं। दोनों उस रात को अपने साथ लिए चलते हैं,लेकिन अलग अहसास के साथ।
शेफाली भूषण ने शहरी लड़की और गंवई लड़के की इस सांगीतिक प्रेमकहानी में देसी खुश्‍बू और शहरी आरजू का अद्भुत मेल किया है। दोनों शुद्ध हैं,लेकिन उनके अर्थ और आयाम अलग हैं। फिल्‍म किसी एक के पक्ष में नहीं जाती। देखें तो विभावरी और मस्‍ताना दोनों कलाकार अपन स्थितियों में मिसफिट और बेचैन हैं। संगत में दोनों को रुहानी सुकून मिलता है। उसे प्रेम,यौनाकर्षण या दोस्‍ती जैसे परिभाषित संबंधों और भावों में नहीं समेटा जा सकता है।
फिल्‍म की खोज क्लिंटन सेरेजो और सिद्धांत बहल हैं। एक के सहज संगीत और दूसरे के स्‍वाभाविक अभिनय का प्रभाव देर तक रहता है। क्लिंटन सेरेजो का संगीत इस फिल्‍म की थीम के मेल में है। उन्‍होंने परंपरा का पूरा खयाल रखा है। फिल्‍म की खासियत इसकी गायकी भी है,जिसे विशाल भारद्वाज,ए आर रहमान और स्‍वयं क्लिंटन की आवाजें मिली हैं। सिंद्धांत बहल के अभिनय में सादगी है। सुगंधा गर्ग और अनुरीता झा अपनी भूमिकाओं में सशक्‍त हैं। सुगंधा ने विभावरी के इमोशन की अभिव्‍यक्ति में कोताही नहीं की है। अनुरीता झा ने प्रीतो की अकुलाहट और समर्पण को सुदर तरीके से पेश किया है। बीबी सरूप की संक्षिप्‍त लेकिन दमदार भूमिका में साधना सिंह की मौजूदगी महसूस होती है।
अवधि- 105 मिनट
स्‍टार- साढ़े तीन स्‍टार
  

फिल्‍म समीक्षा : क्‍या कूल हैं हम 3

फूहड़ता की अति
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कुछ फिल्‍में मस्‍ती और एडल्‍ट कामेडी के नाम पर जब संवेदनाएं कुंद करती हैं तो दर्शक के मुह से निकलता है- -क्‍या फूल हैं हम? फूल यहां अंग्रेजी का शब्‍द है,जिसका अर्थ मूर्ख ही होता है। उमेश घडगे निर्देशित क्‍या कूल हैं हम एडल्‍ट कामेडी के संदर्भ में भी निराश करती है। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के परिचित नाम मुश्‍ताक शेख और मिलाप झवेरी इसके लेखन से जुड़े हैं। अभी अगले हफ्ते फिर से मिलाप झावेरी एक और एडल्‍ट कामेडी लेकर आएंगे,जिसका लेखन के साथ निर्देशन भी उन्‍होंने किया है। क्‍या कूल हैं हम की तीसरी कड़ी के रूप में आई इस फिल्‍म में इस बार रितेश देशमुख की जगह आफताब शिवदासानी आ गए हैं। फिल्‍म की फूहड़ता बढ़ाने में उनका पूरा सहयोग रहा है।
कन्‍हैया और रॉकी लूजर किस्‍म के युवक हैं। जिंदगी में असफल रहे दोनों दोस्‍तों को उनके तीसरे दोस्‍त मिकी से थाईलैंड आने का ऑफर मिलता है। मिकी वहां पॉपुलर हिंदी फिल्‍मों के सीन लेकर सेक्‍स स्‍पूफ तैयार करते हैं। पोर्न फिल्‍मों के दर्शक एक वीडियो से वाकिफ होंगे। मिकी का तर्क है कि वह ऐसी फिल्‍मों से हुई कमाई का उपयोग सोमालिया के भूखे बच्‍चों के लिए भोजन जुटाने में करता है। गनीमत है उसने भारत में चैरिटी नहीं की। मिकी,रॉकी और कन्‍हैया के साथ और भी किरदार हैं। वे सब किसी न किसी रूप सेक्‍स के मारे हैं। यह फिल्‍म ऐसी ही फूहड़ कामेडी के सहारे चलती है।
इस बार फिल्‍म के दृश्‍यों और किरदारों के व्‍यवहार में अधिक फूहड़ता दिखी। संवादों और प्रसंगों में संभवत: सेंसर के वर्त्‍मान रवैए की वजह से एक आवरण रहा है। अश्‍लीलता पेश करने के नए गुर सीख रहे हैं हमारे लेखक-निर्देशक। देखें तो पिछले कुछ सालों में हिंदी फिल्‍मों की मुख्‍यधारा में एडल्‍ट कामेडी शामिल करने की कोशिशें चल रही हैं। पहले भी इस जोनर की फिल्‍में बनती थीं,लेकिन उनमें कहानी के साथ ठोस किरदार भी रहते थे। अब शक्ति कपूर और तुषार कपूर के लतीफों पर लेखक स्‍वयं भले ही हंस लें। दर्शकों को हंसी नहीं आती। फिल्‍म का पहला जोक ही दशकों पुराना है।
अवधि- 131 मिनट
स्‍टार एक स्‍टार

फिल्‍म समीक्षा : एयरलिफ्ट

मानवीय संवेदना से भरपूर

-अजय ब्रह्मात्‍मज
हिंदी फिल्‍में आम तौर फंतासी प्रेम कहानियां ही दिखाती और सुनातीं हैं। कभी समाज और देश की तरफ मुड़ती हैं तो अत्‍याचार,अन्‍याय और विसंगतियों में उलझ जाती हैं। सच्‍ची घटनाओं पर जोशपूर्ण फिल्‍मों की कमी रही है। राजा कृष्‍ण मेनन की एयरलिफ्ट इस संदर्भ में साहसिक और सार्थक प्रयास है। मनोरंजन प्रेमी दर्शकों को थोड़ी कमियां दिख सकती हैं,पर यह फिल्‍म से अधिक उनकी सोच और समझ की कमी है। फिल्‍में मनोरंजन का माध्‍यम हैं और मनोरंजन के कई प्रकार होते हैं। एयरलिफ्ट जैसी फिल्‍में वास्‍तविक होने के साथ मानवीय संवेदना और भावनाओं की सुंदर अभिव्‍यक्ति हैं।
एयरलिफ्ट 1990 में ईराक-कुवैत युद्ध में फंसे 1,70,000 भारतीयों की असुरक्षा और निकासी की सच्‍ची कहानी है। (संक्षेप में 1990 मेंअमेरिकी कर्ज में डूबे ईराक के सद्दाम हुसैन चाहते थे कि कुवैत तेल उत्‍पादन कम करे। उससे तेल की कीमत बढ़ने पर ईराक ज्‍यादा लाभ कमा सके। ऐसा न होने पर उनकी सेना ने कुवैत पर आक्रमण किया और लूटपाट के साथ जानमान को भारी नुकसान पहुंचाया। कुवैत में काम कर रहे 1,70,000 भारतीय अचानक बेघर और बिन पैसे हो गए। ऐसे समय पर कुवैत में बसे कुछ भारतीयों की मदद और तत्‍कालीन विदेश मंत्री इंद्र कुमार गुजराल की पहल पर एयर इंडिया ने 59 दिनों में 488 उड़ानों के जरिए सभी भारतीयों की निकासी की। यह अपने आप में एक रिकार्ड है,जिसे गिनीज बुक में भी दर्ज किया गया है।) एयरलिफ्ट के नायक रंजीत कटियाल वास्‍तव में कुवैत में बसे उन अग्रणी भारतीयों के मिश्रित रूप हैं। राजा कृष्‍ण मेनन ने सच्‍ची घटनाओं को काल्‍पनिक रूप देते हुए भी उन्‍हें वास्‍विक तरीके से पेश किया है। चरित्रों के नाम बदले हैं। घटनाएं वैसी ही हैं। दर्शक पहली बार बड़े पर्दे पर इस निकासी की रोमांचक झलक देखेंगे। निर्देशक और उनके सहयोगियों तब के कुवैत को पर्दे पर रचने में सफलता पाई है। उल्‍लेखनीय है कि उन्‍होंने यह सफलता सीमिज बजट में हासिल की है। हालीवुड की ऐसी फिल्‍मों से तुलना न करने लगें,क्‍योंकि उन फिल्‍मों के लिए बजट और अन्‍य संसाधनों की कमी नहीं रहती।
एयरलिफ्ट रंजीत कटियाल,उनकी पत्‍नी अमृता और बच्‍ची के साथ उन सभी की कहानी है,जो ईराक-कुवैत युद्ध में नाहक फंस गए थे। शातिर बिजनेसमैन रंजीत के व्‍यक्तित्‍व और सोच में आया परिवर्त्‍तन पत्‍नी तक को चौंकाता है। वह समझती है कि उसका पति बीवी-बच्‍ची की जान मुसीबत में डाल कर मसीहा बनने की कोशिश कर रहा है। क्रूर,अमानवीय और हिंसक घटनाओं का चश्‍मदीद गवाह होने पर रंजीत का दिल पसीज जाता है। कुवैत से खुद निकलने की कोशिश किनारे रह जाती है। वह देशवासियों की मुसीबत की धारा में बहने लगता है। हम जिसे देशभक्ति कहते ह,वह कई बार अपने देशवासियों की सुरक्षा की चिंता से पैदा होता है। दैनिक जीवन में आप्रवासी भारतीय सहूलियतों और कमाई के आदी हो जाते हैं। कभी ऐसी क्राइसिस आती है तो देश याद आता है। एयरलिफ्ट में निर्देशक ने अप्रत्‍यक्ष तरीके से सारी बातें कहीं हैं। उन्‍होंने देश के राजनयिक संबंध और राजनीतिक आलस्‍य की ओर भी संकेत किया है। कुवैत में अगर रंजीत थे तो देश में कोहली भी था,जिसका दिल भारतीयों के लिए धड़कता था।एयरलिफ्ट देशभक्ति और वीरता से अधिक मानवता की कहानी है,जो मुश्किल स्थितियों में आने पर मनुष्‍य के भाव और व्‍यवहार में दिखता है।
एयरलिफ्ट में अक्षय कुमार ने मिले अवसर के मुताबिक खुद का ढाला और रंजीत कटियाल को जीने की भरसक सफल कोशिश की है। उन्‍हें हम ज्‍यादातर कामेडी और एक्‍शन फिल्‍मों में देखते रहे हैं। एयरलिफ्टमें वे अपनी परिचित दुनिया से निकलते हैं और प्रभावित करते हैं। समर्थ व्‍यक्ति की विवशता आंदोलित करती है। फिल्‍म के कुछ दृश्‍यों में उनके यादगार एक्‍सप्रेशन हैं। बीवी अमृता की भूमिका में निम्रत कौर के लिए सीमित अवसर थे। उन्‍होंने मिले हुए दृश्‍यों में अपनी काबिलियत दिखाई है। पति के विरोध से पति के समर्थन में आने की उनकी यह यात्रा हृदयग्राही है। अस फिल्‍म में इनामुलहक ने ईराकी सेना के कमांडर की भूमिका को जीवंत कर दिया है। भाषा और बॉडी लैंग्‍वेज को चरित्र के मुताबिक पूरी फिल्‍म में कायदे से निभा ले जाने में कामयाब हुए हैं। छोटी भूमिकाओं में आए किरदार भी याद रह जाते हैं।
एयरलिफ्ट की खूबी है कि यह कहीं से भी देशभक्ति के दायरे में दौड़ने की कोशिश नहीं करती। हां,जरूरत के अनुसार देश,राष्‍ट्रीय ध्‍वज,भारत सरकार सभी का उल्‍लेख होता है। एक खास दृश्‍य में झंडा देख कर हमें उस पर गुमान और भरोसा भी होता है। यह फिल्‍म हमें अपने देश की एक बड़ी घटना से परिचित कराती है।
अवधि-124 मिनट
स्‍टार-चार स्‍टार

Thursday, January 21, 2016

दरअसल : पुरस्‍कारों का है मौसम



-अजय ब्रह्मात्‍मज
    हिंदी फिल्‍मों के पुरस्‍कारों का मौसम चल रहा है। समारोहों का आयोजन हो रहा है। कुछ हो चुके और कुछ अगले महीनों में होंगे। यह सिलसिला मई-जून तक चलता है। उसके बाद राष्‍ट्रीय पुरस्‍कारों की घोषणा होती है। राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार के साथ ग्‍लैमर और चमक-दमक नहीं जुड़ा हुआ है,इसलिए मीडिया कवरेज में उस पर अधिक ध्‍यान नहीं दिया जाता। बाकी पुरस्‍कारों में परफारमेंस,नाच-गाने और हंसी-मजाक से मनोरंजक माहौल बना दिया जाता है। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के अनेक सितारों की मौजूदगी पूरे माहौल में चकाचौाध लगाती है। इन समारोहों और आयोजनों को स्‍पांसर मिलते हैं। इसकी वजह से ये आयोजन बड़े पैमाने पर भव्‍य तरीके से डिजायन किए जाते हैं। इन अवार्ड समारोहों के टीवी पार्टनर होते हैं। वे कुछ समय के बाद इसका टीवी प्रसारण करते हैं और विज्ञापनों से पैसे कमाते हैं। दरअसल,स्‍पांसर और विज्ञापनों से मिल रहे पैसों पर ही आयोजकों की नजर रहती है। सभी अपने अवार्ड समारोह की अच्‍छी पैकेजिंग करते हैं। इस पैकेजिंग के लिए पुरस्‍कार और विजेता तय किए जाते हैं।
    कभी पुरस्‍कार समारोहों के टीवी प्रसारण देखें तो आयोजकों की मंशा भी ध्‍यान में रखें। पुरस्‍कृत फिल्‍मों और कलाकारों पर गौर करें। आप पाएंगे कि जिन्‍हें पुरस्‍कार मिल रहे हैं,वे पुरस्‍कार के काबिल नहीं हैं। उनकी श्रेणी में नामांकित दूसरे कला‍कारों का प्रदर्शन अच्‍छा रहा था। उलझन होती है,गुस्‍सा आता है,लेकिन अगले ही पल किसी स्‍टार के परफारमेंस से गुस्‍सा काफूर हो जाता है। ये आयोजन काबिलियत से ज्‍यादा सहूलियत की वजह से चलते हैं। कौन आया,किस ने परफार्म किया और स्‍टारडम के हिसाब से किस का बाजार गर्म है ? पिछले दिनों एक अवार्ड समारोह में जाने का मौका मिला। मैंने देखा कि पुरस्‍कारों को अलग-अलग नाम देकर अवार्ड समारोह में आए छोटे-बड़े स्‍टारों को उपकृत किया जा रहा है। सभी खुश हैं। क्‍या ऐसे स्‍टार घर लौटने के बाद अपनी ट्राफी निहार कर खुश होते हैं और उन्‍हें अपनी बैठकी में सजाते हैं? हो सकता है रुतबा दिखाने के लिए वे सजा भी लेते हों,फिर भी वे स्‍वयं सच्‍चाई से परिचित होंगे।
    इतने सारे पुरस्‍कारों के बजाए अगर किसी एक पर सभी की सहमति हो और उसे राष्‍ट्रीय पहचान मिले तो अवार्ड के नाम पर चल रहा सर्कस समाप्‍त हो। फिलहाल ऐसा होता नहीं दिख रहा ह। याद करें जब केवल फिल्‍मफेअर और स्‍क्रीन अवार्ड थे तो संदेहों के बावजूद सर्कस तो नहीं होता था। अभी तो स्‍टार परफारमेंस पर जोर रहता है। उन्‍हें मोटी रकम दी जाती है। अवार्ड समारोहों की सफलता ऐसे परफारमेंस की गिनती से की जाती है। टीवी प्रसारण के पूर्व प्रचार में भी इन परफारमेंस की झलक दिखा कर दर्शक जुटाए जाते हैं। अगर पुरस्‍कार परफारमेंस में तब्‍दील हो जाएंगे तो उनकी यह नियति स्‍वाभाविक है। वक्‍त आ गया है कि सभी मिल इैठें और पुरस्‍कारों को ग्‍लैमर से निकाल कर गरिमा प्रदान करें। कहीं से तो शुरूआत करनी ही होगी। अभी तो सभी एक-दूसरे की नकल में ज्‍यादा हल्‍के और छिछोरे होते जा रहे हैं।
    एक बेहतीन सुझाव यह हो सकता है कि राष्‍ट्रीय पुरस्‍कारों को लाकप्रिय स्‍वरूप दिया जाए। अभी देश की सभी भाषाओं में से श्रेष्‍ठ चुन कर पुरष्‍कृत किया जाता है। पुरस्‍कारों का झुकाव ज्‍यूरी की रुचि और संबंध से निर्देशित हो जाता है। सभी भाषाओं की फिल्‍मों को पुरस्‍कार में प्रतिनिधित्‍व देने के उपक्रम किसी भी भाषा के साथ न्‍याय नहीं हो पाता। अगर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय सभी भाषाओं के लिए सारे पुरस्‍कार सुनिश्चित करे और सभी भाषाओं के लिए अलग पुरस्‍कार हों तो हर भाषा की योग्‍य प्रतिभाओं को पहचान मिल सकती है। हिंदी,बांग्‍ला,तमिल,तेलुगू,मराठी और मलयालम भाषओं की फिल्‍म इंडस्‍ट्री बड़ी है। पंजाबी और भोजपुरी में भी पर्याप्‍त फिल्‍में बन रही हैं। इन पुरस्‍कारों से उन्‍हें सम्‍मन के साथ दिशा भी मिलेगी।

Wednesday, January 20, 2016

हर जिंदगी में है प्रेम का फितूर - अभिेषेक कपूर

फितूर की कहानी चार्ल्‍स डिकेंस के उपन्यास ग्रेट एक्सपेक्टेशंस पर आधारित है। सोचें कि यह उपन्यास क्लासिक क्यों है? क्‍योंकि यह मानवीय भावनाओं से परिपूर्ण है। दुनिया में हर आदमी इमोशन के साथ जुड़ जाता है। जब दिल टूटता है तो आदमी अपना संतुलन खो बैठता है। अलग संसार में चला जाता है। पागल हो जाता है। मुझे लगा कि इस कहानी से दर्शक जुड़ जाएंगे। हम ने उपन्‍यास से सार लेकर उसे अपनी दुनिया में अपने तरीके से बनाया है। इस फिल्‍म में व्‍यक्तियों और हालात से बदलते उनके रिश्‍तों की कहानी है।

यह फिल्म केवल प्रेम कहानी नहीं है। यह कहानी प्यार के बारे में है। प्यार और दिल टूटने की भावनाएं बार-बार दोहराई जाती हैं। कोई भी इंसान ऐसे मुकामों से गुजरे है तो थोड़ा हिल जाए। आप किसी से प्यार करते हैं तो अपने अंदर किसी मासूम कोने में उसे जगह देते हो। वहां पर वह आकर आपको अंदर से तहस-नहस करने लगता है। वहां पर आपको बचाने के लिए कोई नहीं होता है। वह प्यार आपको इस कदर तोड़ देता है कि आपका खुद पर कंट्रोल नहीं रह जाता। यह दो सौ साल पहले हुआ और दो सौ साल बाद भी होगा । केवलसाल बदलते हैं। मानवीय आचरण नहीं बदलते हैं।

फितूर में कश्‍मीर
कश्मीर को हमने राजनीतिक बैकड्राप की तरह नहीं रखा है। ट्रेलर में जो डॉयलाग आता है,उसके अलावा फिल्म में कुछ राजनीतिक नहीं है। कश्मीर का इस्तेमाल हमने खूबसूरती के लिए किया है। कश्मीर के चिनार के पेड़ हर साल नवंबर में पतझड़ से पहले लाल हो जाते हैं। मेरे लिए उससे खूबसूरत कुछ नहीं है।
जब मैं बड़ा हो रहा था तो मैंने देखा कि फिल्‍मों में खूबसूरती के लिए कश्मीर का ही इस्तेमाल होता है। यह मेरी चाह थी कि मैं कश्मीर को अपनी फिल्म में दिखाऊं। हमने श्रीनगर के बाहर की शूटिंग नहीं की है। श्रीनगर में निशात बाग है और डल लेक भी है। इन दोनों लोकेशन के बीच फिल्म का फर्स्ट एक्ट है।

तकलीफ होती है कश्‍मीरियों को देख कर
कश्मीर भारत का हिस्सा जरूर है। वहां के लोग मुझे बहुत तकलीफ में नजर आए। वहां के लोग हर दिन संघर्ष करते हैं। यह मेरी निजी राय है। हम सब हमेशा कश्मीर की खूबसूरती की बात करते हैं। वहां पर हमेशा सेना तैनात रहती है। कितनी तकलीफ होती है। आपके घर के बाहर सेना की लाइन लगी हुई है। आपकी जांच होती रहती है। मैं समझता हूं कि सुरक्षा के लिहाज से यह जरूरी है। कुल मिलाकर तकलीफ कश्मीरी को ही हो रही है। देश एक हैं। केबल टीवी के जरिए वे देखते हैं कि बाकी देश और देशों में क्या हो रहा है। पूरे देश में फिल्में लगती हैं,लेकिन वहां थिएटर नहीं है। यह सब देख के मुझे बहुत दुख होता है।

फिल्‍म की कहानी
इंसान जब पैदा होता है तो वह खाली ब्लैकबोर्ड की तरह होता है। उसके अनुभव और आस पास का माहौल उसे शख्सियत देते हैं। कोई आदमी पैदा होते ही अच्छा या बुरा नहीं होता है। अनुभव उसे अच्छा या बुरा बनाते हैं। उनमें से ही एक अनुभव प्यार है। कुछ लोगों के प्यार का अनुभव अच्छा होता है,जो उन्हें और बेहतर इंसान बनाता है। अगर किसी इंसान का दिल टूटता है तो उसके व्यक्तित्व में खरोंच आ जाती है। उस खरोंच से इंसान निगेटिव बन जाता है। वह हर चीज में शक करने लगता है। प्यार की एनर्जी ही ऐसी है। सही चैनल से आए तो आपको कमाल का इंसान बना देती है। अगर उसने आपको गलत तरीके से टच कर लिया तो सब कुछ निगेटिव हो जाता है। यह निगेटिविटी संक्रामक होती है। फैलती है।

कट्रीना कैफ का चुनाव
फिल्म देखेंगे तो आपको लगेगा कि मेरा फैसला सही है। मैं उनके चुनाव के कारण नहीं देना चाहता। मेरे बताने से धारणा बदलने वाली नहीं है। यह तो देख कर ही हो सकता है। कुछ लोगों में अलग तरह की खूबी होती है। खासकर फिल्म में मेरे किरदार की है,जिसे कट्रीना निभा रही हैं। किरदार और कट्रीना की छवि में थोड़ी समानता है। यह जरूरी है कि हम एक्टरों को मौका दें। पहली बार वह भी अपने कम्फर्ट जोन से बाहर आई हैं। एक बार किसी को मौका देकर देखना चाहिए। वह कर सकता है या नहीं। यह पहले देखना चाहिए। मैंने देखा है कि कट्रीना के उच्चारण की आलोचना होती है,लेकिन एक्टर केवल अपने उच्चारण से नहीं जाना जाता है। एक्टर अपनी पूरी ऊर्जा के लिए पहचाना जाता है। मुझे उच्चारण इतना आवश्यक नहीं लगता है। एक हद के बाद भाषा भी महत्व नहीं रखती है। अगर आप के इमोशन सही हैं तो भाषा बाधक नहीं बनती है। आप जो महसूस कर रहे हैं,वह सही तरीके से दर्शकों तक पहुंचना जरूरी है। कट्रीना में वह काबिलियत है। इस फिल्म में वह अपनी आलोचनाओं को खत्म करती नजर आएंगी।

तब्‍बू का चुनाव
सच कहूं तो फिल्‍म लिखते समय सबसे पहले मेरे दिमाग में तब्बू ही थी। मैंने तब्बू को २०१३ में एक मैसेज भेजा था कि मैं एक कहानी पर काम कर रहा हूं। आप उस किरदार के लिए परफेक्ट हैं। एक आइडिया भेजा था। हमने एक दूसरे के कुछ मैसेज भी किए थे। फिर जैसे कहानी बनती गई। किरदार बनते गए। फिर रेखा जी आ गईं। मुझे तीन किरदारों के माहौल के लिए वह सही लगा। फिर से बदलाव हुआ और  अंत में तब्बू ही फिल्म कर रही हैं। वह तीन दिनों में मेरे पास आ गईं। वह सीधे सेट पर ही आ गई। मुझे उनके साथ तैयारी का मौका ही नहीं मिला। ऐसे किरदार के लिए एक्‍टर तीन महीने तैयारी में लगाते हैं। ऐसे किरदार परतें होती हैं। यह फिल्म मेरे लिए कठिन रही। यह फिल्म ज्‍यादातर बिटवीन द लाइन है। किरदारों को भी उसी तरह तैयार करना था।

आदित्य राय कपूर
उनमें मासूमियत है। उन्होंने ज्यादा काम नहीं किया है। उसका मजा ही कुछ और है। जब ऐसा कोई एक्टर आता है तो वह खुले दिमाग से आता है। वह किरदार में अलग-अलग तरीके से ढलने की कोशिश करता है। हम उसका हाथ पकड़ के बातचीत करते थे। खूब चर्चा करते थे। इस फिल्म से उसकी ग्रोथ होगी। उसे भी नया अनोखा अनुभव मिला है। यह आगे उसके काम आएगा। उसकी अंदरूनी मासूमियत मुझे सबसे खास लगती है।

लव स्‍टोरी बनाने की ख्‍वाहिश
मैंने कुल तीन फिल्में बनायी है। यह चौथी फिल्म है। मुझे हमेशा से था कि लव स्टोरी बनाऊंगा। लव स्टोरी में मुझे रॉमकॉम नहीं बनाना था। वह हल्की होती है। ऐसी कहानियों में मेरा पेट नहीं भरता। मैं अपनी फिल्मों में जान लगा देना चाहता हूं। ऐसा न लगे कि टेबल टेनिस बॉल के साथ फुटबाल खेल रहे हैं। मुझे फुटबाल खेलने का शौक है। मुझे चाहिए कि कहानी में जान हो, जिसे बनाने में संघर्ष करना पड़े। मैं हमेशा यादगार फिल्में बनाना चाहता हूं। मेरी कोशिश यही रहती है। यह फिल्म प्यार के संघर्ष की कहानी है। खासकर दिल टूटने की। यह कहानी १९८० से लेकर अब तक की है। हम फिल्म में फ्लैश बैक से वर्तमान में जाते हैं। थोड़ी एपिक की तरह दिखेगी।

सोच-समझ में ग्‍लोबल,फिल्‍में लोकल
भारत जैसा कोई देश नहीं है। हॉलीवुड सारी दुनिया को टेक ओवर कर चुका है। दुनिया में कही पर फिल्म इंडस्ट्री खड़ी नहीं हो पा रही,हर देश में हॉलीवुड अपनी जगह बना चुका है भारत के आलावा। भारत पर अभी हॉलीवुड का जादू नहीं चल रहा है। यहां पर स्टार वॉर जैसी फिल्में आती हैं। मगर दिलवाले और बाजीराव मस्तानी उसे टक्कर देती हैं। और जीत जाती हैं। यह इसलिए नहीं कि हमारी फिल्में बहुत कमाल की है। हमारे देशवासी ही ऐसे ही हैं। वे अपनी सभ्यता-संस्‍कृति देखने के लिए हिंदी फिल्मों का चुनाव करते हैं। इसमें ही वे बहुत खुश है। हमारी इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री अपने बलबूते पर चल रही है। यह सब मजाक नहीं है। हमारी फिल्में समाज का आईना है। हम जैसी भी फिल्में परोसें,दर्शक अपने लिए कुछ ना कुछ निकाल ही लेते हैं। वे अपनी पसंद की फिल्में देखते हैं। राजकपूर और बिमल रॉय कमाल की फिल्में बनाते थे। उनमें कहानियां होती थी। भारतीयता होती थी। उन फिल्मों को बनाने में वक्त लगता था। साल में एक या दो फिल्में आती थीं। मैं भी भारतीय फिल्में ही बनाना चाहता हूं। मैं हॉलीवुड की फिल्में नहीं बनाना चाहता। मुझे वहां की सभ्यता ही नहीं पसंद है। 


फिल्‍म का संगीत
अमित त्रिवेदी ने संगीत दिया है। वह काइ पो छे में भी मेरे साथ थे। वह प्रतिभाशाली हैं। इस फिल्म का संगीत कहानी से ही निकला है। हमने अलग से नहीं सोचा था। हमने कोई स्टाइल के बारे में नहीं सोचा था। फिल्म तय करती है। हम तो गुलाम है। फिल्म ही बताती है कि कपड़े और खूबसूरती क्या होनी चाहिए। किरदार और संगीत कैसे होने चाहिए।



Tuesday, January 19, 2016

मिसाल है मंटो की जिंदगी - नंदिता दास


अभिनेत्री नंदिता दास ने 2008 में फिराक का निर्देशन किया था। इस साल वह सआदत हसन मंटो के जीवन पर आधारित एक बॉयोपिक फिल्म की तैयारी में हैं। उनकी यह फिल्म मंटो के जीवन के उथल-पुथल से भरे उन सात सालों पर केंद्रित है,जब वे भारत से पाकिस्तान गए थे। नंदिता फिलहाल रिसर्च कर रही हैं। वह इस सिलसिले में पाकिस्तान गई थीं और आगे भी जाएंगी।

 - मंटो के सात साल का समय कब से कब तक का है?
0 यह 1945 से लेकर तकरीबन 1952 का समय है। इस समय पर मैैंने ज्यादा काम किया। उनके जीवन का यह समय दिलचस्प है। हमें पता चलता है कि वे कैसी मुश्किलों और अंतर्विरोधों से गुजर रहे थे।

- यही समय क्यों दिलचस्प लगा आप को?
0 वे बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री के साथ थे। प्रोग्रेसिव रायटर मूवमेंट का हिस्सा थे। इस बीच हिंदू-मुस्लिम दंगे हो गए थे। उस माहौल का उन पर क्या असर पड़ा? उन्होंने कैसे उस माहौल के अपनी कहानी में ढाला। वे क्यों बॉम्बे छोड़ कर चले गए,जब कि वे बॉम्बे से बहुत ज्यादा प्यार करते थे। उन्होंने एक बार कहा था कि मुझे कोई घर मिला तो वह बम्बई था। यह अलग बात है कि उनका जन्म अमृतसर में हुआ था। वे दिन उनके लिए मुश्किल थे। बम्बई में उन्हें पैसा मिला। काम मिला। इज्जत मिली। वे अच्छी जिंदगी जी रहे थे। वह नहीं जाना चाहते थे। वह पाकिस्तान नहीं जाना चाहते थे। धीरे-धीरे वे कौन से हालात हुए कि वे चले गए। देखें तो आज भी वही मसले हैैं। उन्होंने बहुत लड़ाई लड़ी। छह बार उन पर केस दर्ज हुआ। आज भी हम उन्हीं सब चीजों का सामना कर रहे हैैं। फिल्मों को काटा जा रहा है। किताबों पर रोक लग रही है।  हम लड़ रहे हैैं। यह सब बेवकूफी हो रही है। मंटो आज के माहौल में बेहद प्रासंगिक है।
 
-पिछले कुछ सालों में हिंदी में उनकी किताबें आयी हैैं। मुझे नहीं लगता है कि जितना मंटो को पढ़ा गया है,उतना किसी और लेखक को पढा गया होगा?
0 खासकर 2012 में जब उनका जन्मशती समारोह हुआ।  तब बहुत लोगों ने उनके बारे में लिखा। अब युवा वर्ग भी उन्हें बहुत पढ़ रहे हैैं। रिसर्च के दौरान मैैंने देखा कि मुंबई में ऐसे मंटो ग्रुप हैैं,जो उनकी कहानियों पर नाटक करते हैैं। कई उर्दू गु्रप हैैं जो उनकी कहानियां पढ़ते हैैं। पाकिस्तान में तो कई सालों तक मंटो को कैसे देखा जाए इस पर चर्चा हो रही थी। वे मंटो का स्ािान निर्धाििरत नहीं कर पा रहे थे। आखिरकार 2012 में उन्हें अवार्ड दिया गया। उन पर स्टैम्प बनाया गया। एक फिल्म भी बनायी गई।  मंटो पर लोगों की दिलचस्पी बढ़ गई है। मेरी फिल्म में मंटो के बंबई और लाहौर के जीवन को लेना जरूरी है।

-मंटो से आपका परिचय कब हुआ?
0 कॉलेज के दिनों  मेरा उनसे परिचय हुआ था। मेरे पास उनकी दस्तावेज किताब का पूरा कलेक्शन है। दिल्ली में एक ग्रुप ने मंटो की दस्तावेज पर नाटक किया था। मुझे वह बहुत ही अच्छा लगा। उसके बाद मैैंने दस्तावेज का पूरा कलेक्शन ही खरीद लिया। मैैं उसे बीच-बीच में पढ़ती थी। जब मैैं फिल्मों में काम करने लगी तो सोचा कि इस पर फिल्म बनानी चाहिए। शार्ट फिल्म भी बन सकती है। कुछ कारणों की वजह से वह हुआ नहीं। कुछ कहानियां मैंने सोची भी थी। मैैंने फिर फिराक बनायी। मैैं कोई फुल टाइम डायरेक्टर तो हूं नहीं कि निर्देशन के लिए कहानी खोजी। मैैंने मंटो को पढ़ा तो पाया कि उनकी जिंदगी मिसाल है। उनकी कहानियों से भी बढ़कर उनकी असल जिंदगी है।
-जो आपने कहा कि उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति को भी पत्र लिखे थे।
0 जी,अंकल सैम के नाम ¸ ¸ ¸ वे पत्र आज भी प्रासंगिक है। इस तरह की बहुत सारी चीजें हैैं। मैैंने 2013 के शुरुआत में इस पर गंभीर होकर काम आरंभ किया। काफी चीजें निकलती गई। 2014 के बीच में मैैंने कई चीजें पढ़ी। मैैंने पाया कि कुछ रचनाओं का उर्दू से हिंदी में अनुवाद नहीं किया गया है। मुझे उर्दू पढ़ने नहीं आती है। मुझे लगा कि लिखने के लिए को रायटर लेना चाहिए। मैैंने तब तक काफी काम कर लिया था। मैैंने डोर के लेखक अली को अपने साथ लिया। उमैैंने उनके साथ मंटो का काम पूरा किया। पिछले साल मैैंने न्यूयार्क के एक विश्वविद्यालय से चार महीने का फेलोशिप किया था। मैैं अपने पांच साल के बेटे को ले गई थी। उस दौरान मैैं अली से मिली।
-आप की फिल्म में रचनाओं से निकले मंटो रहेंगे?
0 उन्होंने बहुत सारी चीजें अपने बारे में लिखी हैैं। उनकी एक कहानी है मुरली की धुन। इसमें उन्होंने अपने दोस्त श्याम के बारे में लिखा है। उनके साथ सहायक कहानी है। यह उनके बारे में है। मैैं उनके पूरे परिवार से मिली। उनकी बारीकियों पर काम किया। वे कैसे बैठते थे। अपनी बेटियों के साथ उनका कैसा रिश्ता था। वह अपने बच्चों को कविताएं सुनाते थे। रिश्तों या समाज के बारे में वे माडर्न खयाल थे। मंटो के बारे में लोग उतना जानते नहीं हैैं।

-कास्ट को लेकर क्या सोचा है।
0 मेरी अभी इरफान खान से बातचीत चल रही है। वह अपनी दिलचस्पी दिखा रहे हैैं। जब तक पूरी तरह हां ना कहें तब तक कुछ कहां नहीं जा सकता।

-इरफान तो कई साल पहले से मंटो करना चाहते थे।  उन्हें इसका प्रस्ताव भी मिला था। वह उसकी तैयारी भी कर रहे थे।
0 अच्छा। उनकी जबान में कहूं तो उन्होंने कहा था कि कब्र से निकल कर भी मंटो का किरदार निभाने के लिए तैयार रहेंगे। मैैंने उनको कहां कि आप अभी कर लो। कब्र से निकलने की क्या जरूरत है। मेरी उनसे मुलाकात हुई है। उन्होंने फर्स्ट ड्राफ्ट लिया है।

-उनकी कद-काठी मिलती है?
0 हां, बिल्कुल सही। वह उकडू  बैठकर कर सकते हैैं। हमने मंटो को नहीं सुना है। इरफान की स्टाइल शायद उनसे मेल खाती है। मंटो की जिंदगी नाटकीय थी। इरफान की एक्टिंग उसी तरह है। मैैं उत्साहित हूं।

Monday, January 18, 2016

अच्‍छा लगा अक्षय का साथ - निम्रत कौर


-अजय ब्रह्मात्‍मज
निम्रत कौर ने लंचबाक्‍स के बाद कोई फिल्‍म साइन नहीं की। इस बीच में उन्‍होंने अमेरिकी पॉलिटिकल थ्रिलर होमलैंड में काम किया। हिंदी में वह मनपसंद फिल्‍म के इंतजार में रही। आखिरकार उन्‍हें एयरलिफ्ट मिली। उसके बाद अजहर की भी बात चली,लेकिन किसी वजह से वह उस फिल्‍म से अलग हो गईं। एयरलिफ्ट में वह अक्षय कुमार के साथ हैं। इस फिल्‍म के लिए उनके चुनाव में दैनिक जागरण की अप्रत्‍यक्ष भूमिका है। दरअसल 2014 के पांचवें जागरण फिल्‍म फेस्टिवल के उद्घाटन समारोह में अक्षय कुमार और निम्रत कौर की पहली मुलाकात हुई थी। अक्षय ने कहा था कि हम साथ काम करेंगे,जबकि निम्रत ने समझा था कि यह महज औपचारिक आश्‍वासन होगा। अभी दोनों की फिल्‍म एयरलिफ्ट रिलीज हो रही है।

-कैसे आई एयरलिफ्ट आपके पास?
0 एयरलिफ्ट मेरे पास 2014 के अंत में आई थी।  निखिल आडवाणी ने मुझे कॉल किया। उन्होंने मुझे स्क्रिप्ट बताई। उन्होंने एक और दिलचस्प बात बताई। उन्होंने कहा कि मेरे दिमाग में एक पोस्टर है। उसमें अक्षय और निमरत साथ में हैं। मैं तुम दोनों को लेकर उत्साहित हूं। मुझे आप दोनों के बीच खास केमिस्ट्री दिख रही है। मुझे यह सुन कर बहुत अच्छा लगा था।

 -निखिल ने आपके बारे में सोचा। स्क्रिप्ट में अपने लिए क्या उम्मीद कर रही थीं?
0 सच कहूं तो अक्षय के साथ काम करना मेरे लिए दिलचस्प था। मेरी दूसरी फिल्म के लिए अलग तरह के हालात थे। मैं जिस स्पेस से आती हूं, उसे स्वंतत्र सिनेमा कहा जाता है। इस फिल्म का विषय गंभीर है। मेरी पिछली फिल्म भी गंभीर विषय पर थी। दर्शकों को अगली फिल्म में भी वैसी ही उम्मीद होती है। यह कहानी हीरो केंद्रित है। एक ही इंसान के ईद-गिर्द घूमती रहती है। मैं उनकी पत्नी के किरदार में हूं। यह वैसा किरदार नहीं है,जो कहानी में नया मोड़ लाए। फिर भी उसके अपने संघर्ष हैं,जो मेरे लिए रोचक है। उसे लगता है कि पति हीरो बन रहा है तो हमारी सुरक्षा दांव पर लगेगीं। फिल्म में धीरे-धीरे उसका दिल बदलता है। दिलचस्प सफर है मेरा।

-आप के किरदार का नाम क्या है।
0 अमृता कटियाल। पहले किरदार का नाम कुछ और था। मुझे बताया गया कि पंजाबी कपल है। फिर मैंने यह नाम चुना। मुझे यह नाम पंजाबी सा लगता है। पहले मेरे किरदार का नाम दिव्या था। मुझे दिव्या पंजाबी नाम नहीं लगता है। नाम से जुड़ना रोचक होता है। मजे की बात होती है कि मेरे लिए हमेशा अपने किरदार का नाम जानना दिलचस्प होता है। दूसरे नाम से जब मुझे पुकारा जाता है तो बढ़िया लगता है। मेरा बस चले तो अपने सारे किरदारों के नाम खुद चुना करूं।

-किस तरह की हाउस वाइफ का किरदार निभा रही है?
0 मैं पति से असहमत रहती हूं। मैंने रंजीत कटियाल की एक अलग साइड देखी है। वह बहुत ही मतलबी किस्म के इंसान हैं। अपने काम को कैसे आगे ले जाने की फिक्र में लगे रहते हैं। कुवैत के बहुत बड़े बिजनेसमैन हैं। शुरू में रंजीत को ऐसा दिखाया गया है कि वह भारत से जुड़ा हुआ नहीं है। एक हालात उन्हें देशभक्त बना देती है। इतनी बड़ी घटना को वह खुद संभालता है। अमृता को पहले यकीन नहीं होता कि वह सचमुच दूसरों के लिए कुछ कर रहे हैं। वह जानना चाहती है कि सच्ची बात क्या है?
-कितना लंबा और कीमती रहा यह इंतजार? आपके दर्शक आपको पर्दे पर देखना चाहते थे?
0 यह तो फिल्म देखने के बाद पता चलेगा। अब तक की प्रतिक्रिया अच्छी है। हमें साथ देखकर लोग पसंद कर रहे हैं। अक्षय के साथ काम करना आपको कहीं और ले जाता है। हमें प्रोमो में पसंद किया जा रहा है,जो उत्साहित करता है। मेरे हिसाब से इतना इंतजार मैंने नहीं किया । यह जानबूझ कर नहीं होता है। 2014 में मैं होमलैंड में व्यस्त रही। उसके बाद डेट की समस्या रही। कुछ ना कुछ होता रहा। मैं फिल्‍में नहीं कर पाई।

-निम्रत इस वक्त करियर में क्या करना चाहती है?
0 मैं नहीं जानती कि किस तरह की फिल्म करना चाहती हूं। कुछ भी ऐसा,जिसे करने पर क्रिएटिव मजा आए। वह कमर्शियल भी हो सकता है। या कुछ और। कुछ ऐसा जो मैंने कभी नहीं किया हो। जैसे कि कॉमेडी। एक बेहतरीन फन मस्ती वाली फिल्म। हां, तो मैं निजी तौर पर मस्ती वाला काम करना चाहती हूं।

-अक्षय कुमार के साथ कैसा अनुभव रहा?
0 अक्षय से मेरा मिलना जागरण फिल्म फेस्टिवल में हुआ था। हम स्टेज पर साथ बैठे हुए थे। उस दिन उनसे एक अनौपचारिक वाइब आ रही थी। वह अपने स्टारडम को लेकर बचाव में रहते हैं। वह ऐसा सोचते हैं कि उन तक पहुंचना दूसरे व्यक्ति के लिए मुश्किल ना हो। वह इसके लिए मिलने के थोड़ी देर बाद कुछ कर देते हैं,जिस से आपको समझ में आ जाए कि उनसे बात करना आसान है। हम उस दिन लिफ्ट में साथ में नीचे आए थे। हंसी-मजाक कर रहे थे। उन्होंने बड़े प्यार से बात की थी। उन्होंने लंचबाक्स भी देखी थी। अच्छी मुलाकात रही। उसके बाद फिल्म फाइनल होने के बाद हम मिले। उनका सेंस ऑफ हयूमर गजब का है। हम पंजाबी में बातें करते हैं। मातृभाषा में किसी से बात करना हमेशा सुखद होता है। वह खरी पंजाबी बोलते हैं।

-कभी ऐसा हुआ कि आपने उन्हें मुश्किल हालात में डाल दिया हो।
0 जी नहीं। ऐसा मौका नहीं मिला।

- राजा मेनन कैसे निर्देशक हैं? मैंने उनकी काफी तारीफ सुनी है?
0 हां। वह अच्छे इंसान हैं। वह बहुत कॉफी पीते हैंं। हर वक्त ब्लैक कॉफी पीते रहते हैं। उनका सहज ज्ञान और निरीक्षण बढ़िया है। यह उनकी यूए पी है। वह जान लेते हैं कि सामने वाला क्या सोच रहा है। वह कई बार मुझे बॉडी कंट्रोल करना बता देते थे। यहां पर यह पार्ट कंट्रोल करके देखे।
-होमलैंड की कैसी प्रतिक्रिया रही? मुझे लगता है कि आप हो या इर फान या प्रियंका चोपड़ा...आप सभी को यथोचित सम्‍मान अपने देश में नहीं मिला,जबकि आप तीनों ने विदेशों में जगह बनाई।
0 हां सर यह इसलिए है कि भारतीय दर्शक क्वांटिको और होमलैंड के बारे में नहीं जानता। लोग हमें और वहां के हमारे काम को नहीं जानते। उनके लिए हमारे काम का कोई मायने नहीं है। मैं प्रेस मीट में जाती हूं। वहां पर बी होमलैंड का जिक्र नहीं होता है। मुझे बुरा नहीं लगता।

-यह सवाल इसलिए भी बनता है कि आप तीनों आउटसाइडर हैं। आप तीनों ने बाहर से आकर अपना मुकाम बनाया है। 
0 सच कहूं तो मैं अपने आप को दूर ही रखती हूं। मैं कभी अंदर घुसने की कोशिश नहीं करती हूं। साइड में अपना काम करती रहती हूं। वह मेरे लिए फायदेमंद होगा या नहीं,पता नहीं?

Friday, January 15, 2016

फिल्‍म समीक्षा : चॉक एन डस्‍टर



-अजय ब्रह्मात्‍मज
जयंत गिलटकर की फिल्‍म चॉक एन डस्‍टर में शबाना आजमी और जूही चावला हैं। उन दोनों की वजह से फिल्‍म देखने की इच्‍छा हो सकती है। फिल्‍म सरल और भावुक है। नैतिकता का पाठ देने की कोशिश में यह फिल्‍म अनेक दृश्‍यों में कमजोर हो जाती है। लेखक-निर्देशक की सीमा रही है कि सीधे तौर पर अपनी बात रखने के लिए रोचक शिल्‍प नहीं गढ़ा है। इस वजह से चॉक एन डस्‍टर नेक उद्देश्‍यों के बावजूद सपाट हो गई है।
    चॉक एन डस्‍टर शिक्षा के व्‍यवसायीकरण पर पर बुनी गई कहानी है। कांता बेन स्‍कूल के शिक्षक मुख्‍य किरदार हैं। इनमें ही विद्या,मनजीत,ज्‍योति और चतुर्वेदी सर हैं। वार्षिक समारोह की तैयारी से शुरूआत होती है। जन्‍दी ही हम कामिनी गुप्‍ता(दिव्‍या दत्‍ता) से मिलते हैं। वह मैनेजमेंट के साथ मिल कर वर्त्‍तमान शिक्षकों के खिलाफ साजिश रचने में धीरे-धीरे कामयाब होती हैं। मामला तब बिगड़ता है,जब वह पहले विद्या और फिर ज्‍योति को बेवजह हटाती हैं। प्रतिद्वंद्वी स्‍कूल के निदेशक इस मौके का फायदा उठाते हैं। बात मीडिया तक पहुंचती है और अभियान आरंभ हो जाता है। इस अभियान में विद्या के पुराने छात्रों समेत दूसरे छात्र भी शामिल होते हैं। आखिरकार तय होता है कि एक लाइव क्विज कांटेस्‍ट से उनकी योग्‍यती की जांच होगी। यहां हमें अतिथि भूमिका में ऋषि कपूर के दर्शन होते हैं।
    फिल्‍म का वह हिस्‍सा भावुक और संवेदनशील है,जब पुराने छात्र शिक्षकों के प्रति हमदर्दी और समर्थन जाहिर करते हैं। देश-विदेश के कोने-कोने से आ रहे समर्थन से श्क्षिकों की महत्‍ता का अहसास होता है और उनके प्रति संवेदना जागती है। इसके अलावा दस सावालों के क्विज में ऋषि कपूर अपनी मौजूदगी से ऊर्जा भर देते हैं। कल को अगर उन्‍हें कोई टीवी शो मिले तो वे अच्‍छे होस्‍ट साबित हो सकते हैं।
    यह फिल्‍म शबाना आजमी और जूही चावला की वजह से देखी जा सकती है। उन्‍होंने साधारण दृश्‍यों को भी अपनी अदाकारी से रोचक बना दिया है। साथ में दिव्‍या दत्‍ता हैं। हांलांकि उनका किरदार एकआयामी है,लेकिन उन्‍होंने अपनी भवें तनी रखी हैं और अपनी नकारात्‍मकता से शबाना आजमी और जूही चावला को परफारमेंस के मौके देती हैं। फिल्‍मों में प्रभावी खलनायक भी नायक या नायिका को मजबूत करता है। रिचा चड्ढा की थोड़ी देर के लिए ही आती हैं,लेकिन अपनी संजीदगी और मौजूदगी से सार्थक योगदान करती हैं।
    चॉक एन डस्‍टर तकनीक,प्रस्‍तुति और शिल्‍प में थोड़ी परानी लगती है। कहानी धीमी गति से आगे बढ़ती है। और फिर कुछ दृश्‍यों में अटक जाती है। हां,कामकाजी महिलाओं के पारिवारिक और पति से संबंधों को यह फिल्‍म बड़े ही सकारात्‍मक तरीके से पेश करती है। विद्या और ज्‍योति के अपने पतियों से रिश्‍ते आधुनिक हैं। पति भी उनके संघर्ष में शामिल मिलते हैं।

अवधि- 137 मिनट
स्‍टार ढाई स्‍टार   

Thursday, January 14, 2016

दरअसल : सेंसर की दिक्‍कतें

-अजय ब्रह्मात्‍मज
       हाल ही में भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने श्‍याम बेनेगल के नेतृत्‍न में एक समिति का गठन किया है,जो सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्‍म सर्टिफिकेशन (सीबीएफसी) के कामकाज और नियमों की समीक्षा कर सुझाव देगी। प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी के विजन के अनुसार यह समिति कार्य करेगी। उसके सुझावों के क्रियान्‍वयन से उम्‍मीद रहेगी कि सेंसर को लेकर चल रहे विवादों पर विराम लगेगा। सबसे पहले तो यह स्‍पष्‍ट कर लें कि 1 जून 1983 तक प्रचलित सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्‍म सेंसर का नाम बदल कर सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्‍म सर्टिफिकेशन कर दिया गया था,लेकिन अभी तक सभी इसे सेंसर बोर्ड ही कहते और लिखते हैं। यहीं से भ्रम पैदा होता है। सीबीएफसी के अध्‍यक्ष,सदस्‍य और अधिकारी सेंसर यानी कट पर ज्‍यादा जोर देते हैं। वे स्‍वयं को सेंसर अधिकार ही मानते हैं। अभी के नियमों के मुताबिक भी सीबीएफसी का काम केवल प्रमाण पत्र देना है। फिल्‍म के कंटेंट के मुताबिक यह तय किया जाता है कि उसे यू,यूए,ए या एस प्रमाण पत्र दिया जाए।
    ताजा विवाद पिछले साल जनवरी में सीबीएफसी के अध्‍यक्ष पहलाज निलानी की नियुक्ति से आरंभ होता है।  केंद्र में भाजपा की सरकार आने के बाद स्‍वाभाविक था कि सरकार और मंत्री के पसंद का कोई व्‍यक्ति इस पद के लिए चुना जाए। पिछली सरकारें भी ऐसा करती रही थीं। इस बार विरोधियों की भवें इसलिए तनीं कि पहलाज निलानी की बतौर फिल्‍मकार खास पहचान नहीं है। संक्षेप में माना गया कि वे इस पद के योग्‍य नहीं हैं। उनकी नियुक्ति के साथ बोर्ड के कुछ पुराने सदस्‍यों ने इस्‍तीफा दे दिया। उनकी जगह नए सदस्‍यों की नियुक्ति हुई। ऐसा लगा कि फिर से सब कुछ सामान्‍य हो जाएगा,लेकिन वर्त्‍तमान अध्‍यक्ष की मनमानी और नियमों की भ्रमित व्‍याख्‍या से गड़बडि़यां आरंभ हुईं। अभी ताजा स्थिति यह है कि बोर्ड के सदस्‍य फिल्‍में देखने नहीं जाते। अध्‍यक्ष और अधिकारी के सहायक भी फिल्‍मों के प्रमाण पत्र देने का काम कर रहे हैं।
    नए अध्‍यक्ष ने मौजूदा नियमों की ही नई व्‍याख्‍या की और सबसे पहले ऐसे शब्‍दों की सूची जारी की,जिनका इस्‍तेमाल फिल्‍मों में नहीं किया जा सकता। अपशब्‍द और गाली-गलौज के इन शब्‍दों पर गहरी आपत्ति के साथ सख्‍ती बरती गई। अनेक फिल्‍मकारों को अपनी फिल्‍मों से ऐसे शब्‍द हटाने या मूक करने पड़े। चुंबन और हिंसा के दृश्‍यों की लंबाई और अवधि पर अनावश्‍यक बातें हुईं। फिल्‍मकारों ने अपनी जल्‍दीबाजी में ऐसे बेजा निर्देशों को मान भी लिया। सीबीएफसी बोर्ड के एक सदस्‍य के मुताबिक अगर कोई फिल्‍मकार सीबीएफसी के सुझावों को कोर्ट में चुनौती दे दे तो बोर्ड के माफी मांगने तक की नौबत आ सकती है। शेखर कपूर की फिल्‍म बैंडिट क्‍वीन का उदाहरण लें। इस फिल्‍म के दृश्‍यों और संवादों पर आपत्तियां हुई थीं तो मामला ट्रिब्‍यूनल तक गया था और आखिरकार शेखर कपूर अपनी फिल्‍म रिलीज कर सके थे। सवाल उठता है कि अगर कोर्ट ने सालों पहले इन गालियों और दृश्‍यों को दिखाए जाने की अनुमति दे दी थी तो 21 वीं सदी में अधिक उदारता दिखाने के बजाए बोर्ड संकीर्ण रवैया क्‍यों अपना रहा है ?
गौर करें तो समस्‍या मौजूद नियमों में नहीं है। समस्‍या उसकी व्‍याख्‍या में है। वर्त्‍तमान अध्‍यक्ष उन नियमों की संकीर्ण व्‍याख्‍या  कर रहे हैं और मार्गदर्शक निर्देशों का सही पालन नहीं कर रहे हें। उन मार्गदर्शक निर्देशों के तहत ही 2014 से पहले फिल्‍में रिलीज होती रही हैं। अभी अचानक दिक्‍कतें पैदा होने लगी हैं। श्‍याम बेनेगल के नेतृत्‍व में आई समिति निश्चित ही प्रासंगिक सुझाव देगी। श्‍याम बेनेगल तो लंबे अर्से से सेंसरशिप के खिलाफ बोलते रहे हैं। वे सेल्‍फ सेंसरशिप की वकालत भी करते रहे हैं। यह देखना रोचक होगा कि वे प्रधानमंत्री के विजन के तहत क्‍या सुझाव देते हैं और उन्‍हें कितनी जल्‍दी लागू किया जाता है। बता दें कि बीच मेकं एक मुद्गल समिति भी बनी थी। उसके सुझाव अभी तक ठंडे बस्‍ते में पड़े हैं।      देखा जाए तो देश को फिल्‍म प्रमाणन के ऐसे नियमों और अधिनियमों की जरूरत है,जिनसे फिल्‍मकारों को क्रिएटिव स्‍वतंत्रता मिले। वे अपनी कल्‍पनाओं को उड़ान दे सकें और इंटरनेशनल स्‍तर पर बन रही फिल्‍मों की बराबरी कर सकें।