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Monday, November 30, 2015

अलहदा लोगों के सर्वाइवल की जगह की तलाश में ‘तमाशा’ -सुदीप्ति सत्‍यानंद

सुदीप्ति सत्‍यानंद के फेसबुक स्‍टेटस से स्‍पष्‍ट था कि उन्‍हें 'तमाशा' देखनी है और पूरी संभावना थी कि वह उन्‍हें पसंद भी आएगी। फिल्‍म देखने के पहले और देखने के बाद के उन्‍के स्‍टेटस इसकी स्‍पष्‍ट जानकारी देते हैं। फिल्‍मों पर इरादतन लिखना सहज नहीं होता। मैंने सुदीप्ति से आग्रह किया था कि वह इस फिल्‍म पर लिखें। कुछ और दोस्‍तों से भी कहा है। यहां सुदीप्ति का आलेख पढें। आप लिखना चाहें तो स्‍वागत है। उसे brahmatmaj@gmail.com पर भेज दें।

सुदीप्ति के फेसबुक स्‍टेटस
पहली बार चेतावनी दे रही हूँ-
जो भी तमाशा की कहानी लिखेगा/गी ब्लाक कर दूँगी। हालाँकि इम्तियाज़ खुद कह रहे हैं सेम कहानी पर हम देख ना लें तब तक समीक्षा लिखें कहानी नहीं।

बहुत दिनों के बाद एक ऐसी फ़िल्म देखी जो दिलो-दिमाग पर छा गयी।  
रॉकस्टार फैन होने के बाद और इसमें रिपिटेड सीन दिखने के बाद भी लगता है कि 'तमाशा' इम्तियाज़ अली की अब तक की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म है।
देखिए जरूर, इससे ज्यादा अभी कुछ नहीं कहूँगी।

 'तमाशा' उनको पसंद आएगी क्या जिन्होंने बजरंगी भाईजान को हिट कराया और तनु-मनु रिटर्न्स की शान में कसीदे काढ़े? एक दिन बीतने पर मैं इम्तियाज़ के लिए परेशान हो रही हूँ। श्रेष्ठता और सफलता का आँकड़ा इतना सरल नहीं होता।

-सुदीप्ति

-सुदीप्ति

तमाशा ज़ारी रहता है, बस करने वाले बदल जाते हैं. और इस तमाशे में तो कहानी भी नहीं, बस कहन का एक तरीका है, सलीका है. कुछ दृश्य हैं, जिनमें जीवन है. लम्बी कविता है, जिसमें लय है, सौन्दर्य है, दर्शन है. रंगीन कल्पना की ऊँची उड़ान है. मूर्त और अमूर्त के बीच का, सच और आवरण के बीच का, मिथ और यथार्थ के बीच का द्वंद्व भी है, संतुलन भी. 
   
जब इम्तियाज़ ने इस टैग लाइन के साथ अपनी फिल्म शुरू की व्हाई दी सेम स्टोरी?’— तो हमारे जैसे सिने-प्रेमियों को लगा कि यह अपने ऊपर लगने वाले आरोप (कि उनकी हर फिल्म की कहानी एक ही होती है) का एक एरोगेंट जवाब है. लेकिन फिल्म के शुरूआती दस-पंद्रह मिनट देखने के बाद यह स्पष्ट हुआ कि नहीं, यह अपनी कहानी के बारे में नहीं, बल्कि दुनिया की तमाम कहानियों के बारे में कहा गया सूत्र वाक्य है. मुझे लगता है कि इम्तियाज़ अपने ऊपर लगने वाले आरोप से थोड़े त्रस्त हो गए होंगे, जिसका जवाब इस फिल्म की शुरुआत में दिया है. लेकिन क्या ही खूबसूरत जवाब है! कोई ऐसा क्रिएटिव जवाब दे तो हम क्यों न आरोप लगाएं भला? वाकई कहानी एक ही होती है, भाव और किरदार एक ही होते हैं, बस बताने/दिखाने का नजरिया और निभानेवाले बदल जाते हैं. अलग लोग और बदली हुई स्थितियों से कहानी थोड़ी बदली दिखती है, पर मूल तो एक ही है.

तमाशा में नायक कल्पनाशील कथा-सर्जक और वाचक है. जब हम उसकी नज़र से दुनिया के सभी महा आख्यानों को देखते हैं तो दरअसल हम इम्तियाज़ के नज़रिए से देख रहे होते हैं. दुनिया की तमाम महागाथाओं को एक फलक पर समेटने का यह कौशल ही इस फिल्म का चरम है. अगर आपको देखना हो कि दुनिया के तमाम महा आख्यानों को सबसे संक्षिप्त रूप में कैसे दिखाया और सुनाया जा सकता है तो आप तमाशा देखिये. किसी कहानी का चरम जरुरी नहीं कि उसका अंत ही हो. क्लाईमेक्स की पुरानी अवधारणा से बाहर निकल कर, और रोमांस के चलताऊ मुहावरे से हट कर फिल्म को देखते हैं तो तमाशा का चरम शुरू के दस-पंद्रह मिनटों में पा लेते हैं. शुरुआत ही कुछ ऐसी ऊँचाई पर ले जाती है जहाँ के बाद सिर्फ ढलान ही है, और कुछ हो भी नहीं सकता. पहाड़ की चोटी से आसमान छूने की कोशिश के बाद और क्या बचता है? कहानी वहां भी कुछ नहीं है, पर एक निर्देशक के रूप में इम्तियाज़ स्पष्ट कर देते हैं कि वे जो कह रहे हैं, वह इतना सरल नहीं है. उस तक पहुँचने के लिए दर्शक को भी चलना पड़ेगा. कुछ दर्शक यह सोचते हुए बैठे रहते हैं कि नहीं, यह भूमिका है, असली फिल्म तो बाद में शुरू होगी. यही चूक हो जाती है. जोकर और उसका तमाशा ही असल है, बाकी उसे सिद्ध करने की जद्दोजहद.

शुरुआत में मुझे राजकपूर के जोकर की याद आई. बस याद. झलक जैसी कुछ. फिर शिमला की वादियों के इस कल्पनाशील बच्चे के बचपने में खोकर मैं अपने बचपन में पहुँच गयी. वे फिल्में आपके दिल के करीब आसानी से पहुँच जाती हैं, जिनसे आपका अपना जीवन जुड़ जाता है. व्यक्तिगत तौर पर जानती हूँ कि कहानी के प्रेमी, कहानी को चाहने वाले, कहानी की कल्पनाशीलता में रहते हैं. मैं भी बचपन में एक कहानी-खोर की तरह की श्रोता थी. कहानी के आगे भूख-प्यास सब ख़त्म. कहानी के झांसे में कोई मुझसे कुछ भी करवा सकता था. सुनकर, पढ़कर और दिमाग चाटकर कहानियों में जीती थी. कार्टून वाली पीढ़ी इस कहानी वाले बचपन से कम रिलेट कर पायेगी खुद को. आज भी तमाम पौराणिक कहानियों का जरा भी ज़िक्र आते ही अच्छा-खासा सुना सकती हूँ, पर यह याद नहीं होता कि कहाँ पढ़ी या सुनी थी; क्योंकि वह कभी आरंभिक बचपन में हुआ होगा. तो कहानी की दुनिया में विचरता हमारा नायक मुझे तो बेहद अपना लगा. जो कहानियां उसने एक रहस्यमय कथा-वाचक से सुनी, उसे अलहदा अंदाज़ में सुनाने वाला बन सकता है या नहीं, वह बाद की बात है. एक बच्चे के दिमाग में चलने वाली कथा का सिनेमाई चित्रण इस फिल्म को विशिष्ट बना देता है. रंगों और परिदृश्य का चयन, घर और स्कूल के जाने-पहचाने वातावरण में कल्पना के घोड़े दौड़ाने की यह कलाकारी सामान्य में असामान्य है, इसलिए आसान नहीं है.

ज्यादातर लोगों को कोर्सिया भर पसंद आया. मालूम नहीं क्यों भला? अगर यह कहूँ कि वह फिल्म का सबसे चलताऊ, आसान और खिलंदड़ा हिस्सा है तो कई लोग नाराज़ भी हो सकते हैं. नयनाभिराम प्राकृतिक दृश्य, नायक-नायिका की आकर्षक जोड़ी, दोनों की सहज प्रेमिल केमेस्ट्री और चुटीले-नमकीन संवाद यही है कोर्सिया का हिस्सा. मुझे उस हिस्से में दूसरी फिल्मों के दृश्यों के दुहराव दिखे. यह कहना गलत नहीं होगा कि हमारे समय की फिल्मों का एक सामान्य मुहावरा बन गया है नायक-नायिका को किसी बाहरी लोकेशन पर ले जाओ और वहाँ एक-दूसरे के आकर्षण में प्यार या प्यार जैसा कुछ तो हो ही जाना है. प्यार हो जाने भर में साथ के सिवा उस अलग जगह की स्वछंद मस्ती एक उत्प्रेरक की तरह होती है. इसमें भी कुछ ऐसा, और कुछ रहस्य और अनचीन्हे का जादू है. सच कहूं तो मुझे लगा कि साथ से भी ज्यादा दवाब इस बात का था कि फिर कभी नहीं मिलेंगे. नायिका के निर्णय और कोर्सिया में उसके अंतिम संवाद को ध्यान से सुन कर देखिए, “फिर कभी नहीं मिलेंगे” इस भाव से वह अपने खिंचाव को ठहराव देना चाहती है. इसी वादे से या इसी तरह हतप्रभ रहते हुए वे अलग हो जाते हैं. यहाँ तक कोर्सिया में जो हुआ, वह इम्तियाज़ का अंदाज़ कम था, लेकिन जो आगे होता है वह उनकी अपनी ख़ास शैली है. प्रेम के मुहावरे में आख्यानों को पढ़ने वाले इम्तियाज़ ही राम-कथा के केन्द्र में विरह को देख-दिखा सकते हैं, तो उनका अंदाज़ अलग ही होना चाहिए न?

जहाँ तक मैं समझ पाई हूँ, इम्तियाज़ की फिल्मों में दीवानगी वाली मुहब्बत के अहसास तक कोई एक (नायक/नायिका) पहुंचता है, लेकिन दूसरे पर थोपता नहीं उसे. दूसरे के वहाँ पहुँचने का इंतजार और उसकी यात्रा ही असली प्रेम-कथा होती हैं उनकी. यही मूल होता है इम्तियाज़ की फिल्मों में कि लोग मिलते हैं, मिलकर लगाव होता है और उस भाव को लोग ज़ज्ब होने देते हैं कि यह क्षणिक है या शाश्वत. अगर वह सच्चा है तो भी सामने वाला खुद उस सचाई तक पहुँचे. उसे जबरन खींच नहीं लिया जाता रिश्ते में, धकेल नहीं दिया जाता प्रेम में जो रॉकस्टार में भी था. इम्तियाज़ के यहाँ प्यार एक ऐसी चीज़ है, जिसमें किसी को ऊँगली या बांह पकड़ के खींचा नहीं जा सकता. एक आग का दरिया है, तैर के जाना है वाली बात होती है. दुनिया की तमाम उदात्त प्रेमकथाओं की परंपरा में जुड़ती एक और दृश्य-कथा जैसी चीज. वो कोर्सिया में मिलना और बिछड़ना और बिछड़ते समय अपने वादे को कायम रखना... नायिका अलग होकर भी हो नहीं पाती. साल-दर-साल गुज़र जाते हैं और फिर किस तरह वे मिलते हैं, ये सब फानी बातें हैं जो आप फिल्म देखकर जान जाएंगे. यही तो कहानी है, अगर कोई है तो! फिर जब वे मिलते हैं तो भी नहीं मिलते. क्यों? मिथ और यथार्थ की जो दुरुहता है वो यहीं से शुरू होती है.

जो है और नहीं है; जो मेरे भीतर है और मुझे मालूम है; जो मुझे मालूम है लेकिन मुझे नहीं मानना है; जो मैं मानता हूँ लेकिन तुम्हारे सामने नहीं स्वीकार सकता... जाने कितने द्वंद्व, कितने टुकड़ों में हम जीते हैं! जो हम हैं लेकिन हो नहीं सकते यह सच हमारे जीवन का कैसा कडवा सच हो सकता है इसे जानना है तो तमाशा देखिये. हमारे इर्द-गिर्द अधिकतर लोग बेवजह आक्रामक या कुंठा में दिखते हैं. कभी आपने उनपर सोचा है? जो लोग अपने भीतर अपनी इच्छाओं, अपनी चाहनाओं को बाकी दुनिया की तमाम शर्तों के दवाबों से दबा कर रखते हैं, उनकी इच्छाओं के बोनसाई की मुड़ी-तुड़ी डालियाँ कैसे उनको बीच-बीच में तबाह करती हैं, कैसे उनके मन को छलनी कर देती हैं और ऐसे में जो आक्रोश वे अपनों को दिखा नहीं सकते, वह भीतर की घुटन कैसे अकेले में या शीशे के सामने निकलती है इसे जानना हो तो देखिये यह फिल्म. कई बार हम नहीं जानते कि हम क्या चाहते हैं और वह किये जाते हैं जो दूसरे हमसे चाहते हैं. वह बेवजह की विनम्रता हमें भीतर से कैसा खोखला और आक्रामक बनाती है, यह तमाशा में देखना एक हद तक डरावना है.

यह एक ऐसी प्रेम कहानी है, जहाँ इस प्रेम में कोई दूसरा बाधक नहीं, जब एक ही दो हो तब क्या किया जाए? जब अपने स्व को कोई स्वीकारे नहीं तो क्या? जब जतन से खुद को खोल में छिपा रखा हो और एक दिन कोई बेहद करीब आ उस खोल को उधेड़ दे और हम लज्जा से अपने को भी ना देख सके तो? जरुरी नहीं है दूसरे का प्यार; उसकी कदर, उसका समझना जरुरी है, अपने को पहचानना जरुरी है. इसीलिए जब कथा-वाचक वेद से कहता “तू अपनी कहानी मुझसे जानना चाहता है, कायर, धोखेबाज़!” तो फिर उसे समझ आ जाता है कि अपने तक पहुँच कर ही अपनी कहानी जान सकता है. कुन-फाया-कुन में एक पंक्ति है, “कर दे मुझे मुझसे ही रिहा/ अब मुझको भी हो दीदार मेरा”. यह जो अपनी गिरफ्त है, खुद की जकड़न है, उस जकड़न और गिरफ्त की झलक दिखाने वाले के प्रति एक रोष पहले उभरता है, और फिर कृतज्ञता. वही कृतज्ञता स्टेज परफोर्मेंस के अंत में दिखती है.

मेरे लिए यह पहुँचना और मुक्ति मनचाहे कैरियर की नहीं. वह तो सामान्यीकरण है. वह सतही है. यह सतत द्वन्द्व इस बात का है कि हम वास्तव में क्या हैं? क्या होना चाहते हैं और क्या बनकर रहते हैं? हमारी कल्पना और हमारी वास्तविकता जीवन को दुरूह या सरल बनाती है. वही डॉन है, वही वेद है. लेकिन नहीं कह सकते हैं कि वही मोना डार्लिंग है और वही तारा है. तारा मोना का अभिनय कर रही है और मोना होते हुए भी बहुत कुछ तारा है, लेकिन डॉन होते हुए वेद कहीं भी नहीं. होना ही नहीं चाहता. दोनों दो हैं. वेद होते हुए वह डॉन को स्वीकार नहीं करना चाहता. यही असल और अभिनय का सच है.

अगर आप इन दुरुहताओं से परे फिल्म देखना चाहते हैं तो भी समाधान है आपके लिए. जाइए, और कोर्सिया से लेकर दिल्ली तक के सुन्दर दृश्यों में दो जानदार अभिनेताओं का परफोर्मेंस देखिये. रणवीर अपने समय के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता बन चुके हैं. उनका अंदाज़, उनके तेवर, पल-पल बदलते चेहरे के रंग और मध्य-वर्गीय सपनों की विवशता को देखिये. दीपिका इसीलिए मुझे पसंद है कि उनको खुद को कहानी के हिसाब से ढालना आता है. उनका किरदार लव-आजकल, जवानी-दीवानी, कॉकटेल जैसी फिल्मों के चरित्रों जैसा ही हो जाता, अगर उनको संजीदगी से संभालना नहीं आता. कोर्सिया के रंग-बिरंगे गाने में उन्होंने दिखा दिया कि एक ही फ्रेम में सबसे फ्रंट पर ना होकर, दूसरे के क्लोजअप में रहते हुए भी कैसे अपना महत्व बढ़ा लिया जाता है. इस फिल्म में उनकी भूमिका सहायक की थी, नेपथ्य की थी, जिसे बेहद खूबसूरती से निभाया.
अंत में, कहना चाहूंगी कि रॉकस्टार से तमाशा की तुलना उचित नहीं है. एक ही निर्देशक और अभिनेता की होने के कारण दोनों की तुलना कर दें, यह सही नहीं है. फिर भी जो लोग रॉकस्टार को इम्तियाज़ की बेस्ट फिल्म मानते हैं, उनके लिए कहना चाहूंगी कि तमाशा एक अलग, अलहदा और आगे निकली हुई, एक दार्शनिक धरातल की फिल्म है. रॉकस्ट्रार में कुछ कमियाँ हैं, जबकि तमाशा में संतुलन है. दोनों फिल्मों में फ्रेम में रणवीर ही हैं, पर यहाँ बैकग्राउंड में रह कर उसे और खूबसूरती से उभार देती हैं दीपिका. जबकि पहली फिल्म में नायिका का मजबूत चरित्र एक लचर अदाकारा के हाथों पिट गया. वहां गाने और संगीत बहुत ख़ास हैं, लेकिन एक फिल्म सिर्फ उम्दा गाने भर तो नहीं!
इस फिल्म को कहानी नहीं, कल्पनाशीलता के लिए देखा जाना चाहिए. इस दुनिया में जो अलहदा लोग हैं, वे कहाँ सर्वाईव करते हैं? करते भी हैं या नहीं करते हैं? नहीं करते हैं तो कहाँ रह जाते हैं और किन हालात में जीते हैं? देखिये और समझिये कि मध्य वर्ग, उसकी सोच और उसके सपने और प्रतिभा कैसे संघर्षों में खप जाने को मजबूर हैं. इस फिल्म में यात्राएं बहुत तरह की हैं. सबसे आसान कोर्सिया की है. फिर कोर्सिया में जो होता है, वहीँ रहता है; पर होता क्या है जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी. देख आइये.





Friday, November 27, 2015

फिल्‍म समीक्षा : तमाशा



-अजय ब्रह्मात्‍मज
प्रेम और जिंदगी की नई तकरीर
    इम्तियाज अली ने रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण जैसे दो समर्थ कलाकारों के सहारे प्रेम और अस्मिता के मूर्त-अमूर्त भाव को अभिव्‍यक्ति दी है। सीधी-सपाट कहानी और फिल्‍मों के इस दौर में उन्‍होंने जोखिम भरा काम किया है। उन्‍होंने दो पॉपुलर कलाकारों के जरिए एक अपारंपरिक पटकथा और असामान्‍य चरित्रों को पेश किया है। हिंदी फिल्‍मों का आम दर्शक ऐसी फिल्‍मों में असहज हो जाता है। फिल्‍म देखने के सालों के मनोरंजक अनुभव और रसास्‍वादन की एकरसता में जब भी फेरबदल होती है तो दर्शक विचलित होते हैं। जिंदगी रुटीन पर चलती रहे और रुटीन फिल्‍मों से रुटीन मनोरंजन मिलता रहे। आम दर्शक यही चाहते हैं। इम्तियाज अली इस बार अपनी लकीर बदल दी है। उन्‍होंने चेहरे पर नकाब चढ़ाए अदृश्‍य मंजिलों की ओर भागते नौजवानों को लंघी मार दी है। उन्‍हें यह सोचने पर विवश किया है कि क्‍यों हम सभी खुद पर गिरह लगा कर स्‍वयं को भूल बैठे हैं?
    वेद और तारा वर्तमान पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं। परिवार और समाज ने उन्‍हें एक राह दिखाई है। उस राह पर चलने में ही उनकी कामयाबी मानी जाती है1 जिंदगी का यह ढर्रा चाहता है कि सभी एक तरह से रहें और जिएं। शिमला में पैदा और बड़ा हुआ वेद का दिल किस्‍सों-कहानियों में लगता है। वह बेखुदी में बेपरवाह जीना चाहता है। इसी तलाश में भटकता हुआ वह फ्रांस के कोर्सिका पहुंच गया है। वहां उसकी मुलाकात तारा से होती है। तारा और वेद संयोग से करीब आते हैं,लेकिन वादा करते हैं कि वे एकदूसरे के बारे में न कुछ पूछेंगे और न बताएंगे। वे झूठ ही बोलेंगे और कोशिश करेंगे कि जिंदगी में फिर कभी नहीं मिलें। वेद की बेफिक्री तारा को भा जाती है। उसकी जिंदगी में बदलाव आता है। उन दोनों के बीच स्‍पार्क होता है,लेकिन दोनों ही उसे प्‍यार का नाम नहीं देते। जिंदगी के सफर में वे अपने रास्‍तों पर निकल जाते हैं। तारा मोहब्‍बत की कशिश के साथ लौटती है और वेद जिंदगी की जंग में शामिल हो जाता है। एक अंतराल के बाद फिर से दोनों की मुलाकात होती है। तारा पाती और महसूस करती है कि बेफिक्र वेद जिंदगी की बेचारगी को स्‍वीकार कर मशीन बन चुका है। वह इस वेद को स्‍वीकार नहीं पाती। वेद के प्रति अपने कोमल अहसासों को भी वह दबा जाती है। तारा की यह अस्‍वीकृति वेद को अपने प्रति जागरूक करती है। वह अंदर झांकता है। वह भी महसूस करता है कि प्रोडक्‍ट मैनेजर बन कर वह दुनिया की खरीद-फरोख्‍त की होड़ में शामिल हो चुका है,क्‍योंकि अभी कंट्री और कंपनी में फर्क करना मुश्किल हों गया है। कंट्री कंपनी बन चुकी हैं और कंपनी कंट्री।
    इम्तियाज की तमाशा बेमर्जी का काम कर जल्‍दी से कामयाब और अमीर होने की फिलासफी के खिलाफ खड़ी होती है। रोजमर्रा की रुटीन जिंदगी में बंध कर हम बहुत कुछ खो रहे हैं। तारा और वेद की जिंदगी इस बंधन और होड़ से अलग नहीं है। उन्‍हें इस तरह से ढाला जाता है कि वे खुद की ख्‍वाहिशों से ही बेखबर हो जाते हैं। इम्तियाज अली के किरदार उनकी पहले की फिल्‍मों की तरह ही सफर करते हैं और ठिकाने बदलते हैं। इस यात्रा में मिलते-बिछुड़ते और फिर से मिलते हुए उनकी कहानी पूरी होती है। उनके किरदारों में बदलाव आया है,लेकिन शैली और शिल्‍प में इम्तियाज अधिक भिन्‍नता नहीं लाते। इस बार कथ्‍य की जरूरत के अनुरास थ्रिएटर और रंगमंचीय प्रदर्शन के तत्‍व उन्‍होंने फिल्‍म में शामिल किए हैं। कलाकरों के अंतस और आत्‍मसंघर्ष को व्‍यक्‍त करने के लिए उन्‍हें इसकी जरूरत पड़ी है। संभावना थी कि वे संवादों में दार्शनिक हो जाते,लेकिन उन्‍होंने आमफहम भाषा और संवादों में गहरी और परिवर्तनकारी बातें कही हैं।
       यह फिल्‍म रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण के परफारमेंस पर निर्भर करती है। उन दोनों ने कतई निराश नहीं किया है। वे स्क्रिप्‍ट की मांग के मुताबिक आने दायरे से बाहर निकले हैं और पूरी मेहनत से वेद और तारा को पर्दे पर जीवंत किया है। यह नियमित फिल्‍म नहीं है,इसलिए उनके अभिनय में अनियमितता आई है। छोटी सी भूमिका में आए इश्‍तयाक खान याद रह जाते हैं। उनकी मौजूदगी वेद को खोलती और विस्‍तार देती है। तमाशा हिंदी फिल्‍मों की रेगुलर और औसत प्रेमकहानी नहीं है। इस प्रेमकहानी में चरित्रों का उद्बोधन और उद्घाटन है। वेद और तारा एक-दूसरे की मदद से खुद के करीब आते हैं।
       फिल्‍म का गीत-संगीत असरकारी है। इरशाद ने अपने गीतों के जरिए वेद और तारा के मनोभावों को सटीक अभिव्‍य‍क्ति दी है। एआर रहमान ने पार्श्‍व संगीत और संगीत में किरदारों की उथल-पुथल को सांगीतिक आधार दिया है। फिलम को बारीकी से देखें तो पता चलेगा कि कैसे पार्श्‍व संगीत कलाकारों परफारमेंस का प्रभाव बढ़ा देता है। तमाशा के गीतों में आए शब्‍द भाव और अर्थ की गहराई से संपन्‍न हैं। इरशाद की खूबी को एआर रहमान के संगीत ने खास बना दिया है।
अवधि-151 मिनट
स्‍टार-साढ़े तीन स्‍टार  

Thursday, November 26, 2015

दरअसल : कब काउंट होंगे हिंदी प्रदेश

-अजय ब्रह्मात्‍मज
    सभी जानते हैं कि हिंदी फिल्‍मों का बिजनेस मुख्‍य रूप से मुंबई और कुछ हद तक दिल्‍ली के कारोबार से आंका जाता है। अगर किसी फिल्‍म ने इन टेरिटरी में अच्‍छा कलेक्‍शन किया है तो कहा और माना जाता है कि फिल्‍म सफल है। फिल्‍मों की सफलता का यह मापदंड बन गया है। मुंबई और दिल्‍ली के मल्‍टीप्‍लेक्‍स में मौजूद दर्शकों की भीड़ काउंट होती है। यह भीड़ महानगरों के सिनेमाघरों में ऊंची दरों की टिकट लेकर कुल कलेक्‍शन का बहुगुणित करती है। फिल्‍में 100 करोड़ और उससे ज्‍यादा के कारोबार से रिकार्ड बनाती हैं।
    दो हफ्ते पहले रिलीज हुई सरज बड़जात्‍या की फिल्‍म प्रेम रतन धन पायो की बात करें तो इस फिल्‍म ने पहले दिन अपेक्षा के मुताबिक दर्शकों को आकर्षित किया। फिल्‍म का कलेक्‍शन 40.35 करोड़ रहा। अगले दिन स्‍पष्‍ट हो गया कि शहरी मानसिकता के दर्शकों का यह फिल्‍म पसंद नहीं आई। अगले दिन फिल्‍म का कलेक्‍शन गिर कर 31.05 करोड़ हो गया। लगभग 25 प्रतिशत की जमा गिरावट से स्‍पष्‍ट है कि मल्‍टीप्‍लेक्‍स के दर्शक घटे। इस फिल्‍म का रविवार का कलेक्‍शन 28.30 करोड़ हो गया था। और सोमवार से तो इसमें आधी गिरावट आ गई। फिल्‍म का पहले दिन का कलेक्‍शन ही इतना विशाल था कि गिरतेगिरते भी इस फिल्‍म ने दूसरी फिल्‍मों की तुलना में अच्‍छा बिजनेस कर लिया। हां,प्रेम रतन धन पायो ने पहले दिन जो संकेत दिया था और बाद में वह फलीभूत होता तो यह फिल्‍म बड़ा रिकार्ड कायम करती।
    बहरहाल, आंकड़ों और बिजनेस के इस खेल में एक रोचक तथ्‍य उभर कर सामने आया। इस फिल्‍म के बिजनेस के अखिल भारतीय आंकड़ों का अध्‍ययन मजेदार है। राजस्‍थान,उत्‍तर प्रदेश,बिहार और मध्‍यप्रदेश में यह फिल्‍म सिनेमाघरों में टिकी हुई है। मेट्रो और मल्‍टीप्‍लेक्‍स में जैसी भारी गिरावट छोटे शहरो (पटना,लखनऊ और जयपुर छोटे शहर माने जाते हैं) और सिंगल स्‍क्रीन में नहीं है। वहां यह फिल्‍म अभी तक दर्शकों को आकर्षित कर रही है। वे परिवारों के साथ इस फिल्‍म का आनंद ले रहे हें। मुंबई के ट्रेड पंडित अपने विश्‍लेषणों में इसका उल्‍लेख नहीं करते। वे नहीं बतााते कि हिंदी प्रदेशों के दर्शकों को यह फिल्‍म पसंद आई है। सूरज बड़जात्‍या की विवाह के साथ भी ऐसा ही हुआ था। हिंदी प्रदेशों में चली इस फिलम को ट्रेड पंडितों ने मुंबई के कलेक्‍शन के आधार पर फ्लॉप घोषित कर दिया था।
कलेक्‍शन और 100 करोड़ी बिजनेस अपनी जगह ठीक हक्‍,लेकिन हमें अब यह भी धन में रखना चाहिए कि किसी फिलम को कितने दर्शक देख रहे हैं। मल्‍टीप्‍लेक्‍स और सिंगल स्‍क्रीन के टिकट दर में भारी अंतर रहता है। 200 सीटों के मल्‍टीप्‍लेक्‍स के एक शो का कलेक्‍शन सिंगल स्‍क्रीन के 1000 सीटों के कलेकशन की तुलना में ज्‍यादा हो सकता है,लेकिन फिल्‍म ट्रेड में इन 800 दर्शकों के अंतर को रेखांकित नहीं किया जा रहा है। अब हमें आंकड़ों के साथ यह भी बताना चाहिए कि किसी फिल्‍म को कितने दर्शकों ने देखा। अंग्रेजी में इसे फुटफॉल कहा जाता है यानी कितने पांव सिनेमाघरों में पहुंचे। प्रेम रतन ध पायो के दर्शकों की संख्‍या ज्‍यादा हो रही है लेकिन उसी अनुपात में उसे बड़ी हिट नहीं माना जा रहा है,क्‍योंकि छोटे शहरों और सिंगल स्‍क्रीन से आया कलेक्‍शन मोटी रकम में तब्‍दील नहीं हो रहा है।
         प्रेम रतन ध पायो इस मायने में भी अनोखी फिल्‍म है कि इसने शुद्ध देशी दर्शकों के साथ विदेशी दर्शकों को भी आकर्षित किया है। ठीक है कि यह फिल्‍म भारत के बड़ शहरों में अधिक पसंद नहीं की गई,लेकिन इस तथ्‍य से इंकार करना सही नहीं होगा कि इसने हिंदी प्रदेशों के दर्शकों को मुग्‍ध किया है। पारिवारिक मूल्‍यों और भावनात्‍मक लगाव के इस फिल्‍म के दर्शक हैं। बस,हमारे शहरी ट्रेड पंडित,समीक्षक और विश्‍लेषक उन पर गौर हीं कर रहे हैं। आखिर हिंदी प्रदेशों के दर्शक कब काउंट होंगे ?
 


Sunday, November 22, 2015

तारा की स्पिरिट समझती हूं-दीपिका पादुकोण




-अजय ब्रह्मात्‍मज
इम्तियाज अली के निर्देशन में दीपिका पादुकोण की दूसरी फिल्‍म है तमाशा। इसमें वह अपने पूर्व प्रेमी रणबीर कपूर के साथ हैं। दोनों की पिछली फिल्‍म ये जवानी है दीवानी बेहद सफल रही थी। निर्देशक दोनों के निजी जीवन के प्रेम और अलगाव को फिल्‍म की स्क्रिप्‍ट में ले आते हैं और दीपिका पादुकोण और रणबीर कपूर बगैर ना-नुकूर के उन्‍हें पर्दे पर निभाते हैं। पहले ऐसा मुमकिन नहीं था। पर्सनल संबंधों और प्रोफेशनल जरूरतों का यह नया संयुक्‍त आयाम है। अब के कलाकार अलग होने के बाद भी स्‍क्रीन पर बेलाग लगाव दिखाते हैं। वे पूर्व संबंधों के बोझ लेकर नहीं चलते। दीपिका पादुकोण ने तमाशा में तारा की भूमिका निभाई है।
- कौन है तारा ?
0 तारा साधारण और मामूली सी लड़की है। वह अपनी जिंदगी में मस्‍त है। वह कामकाजी है। उसका ब्‍वाम्‍य फ्रेंड है। वह अच्‍छे परिवार से आती है। उसे अपनी जिंदगी से कोई शिकायत नहीं है। वह वेद से मिलती है तो उसे कुछ हो जाता है। ऐसा लगता है कि अंदार से कुछ खुल जाता है। वेद से मिलने के पहले वह कुछ अलग थी। मिलने के बाद वह कुछ और हो जाती है। बेहतर तरीके से...  
-वेद से प्रभावित क्‍यों होती है तारा?
0 वह खुद तो वेद से प्रभावित होती है,साथ ही वह वेद पर भी सकारात्‍मक प्रभाव डालती है। हम सभी के साथ ऐसा होता है। हम अपनी जिंदगी में अनेक लोगों से मिलते हैं,लेकिन कुछ का असर रह जाता है। पर्सनैलिटी,एनर्जी,पॉजीटिविटी कुछ भी प्रभावित कर देती है और हम में बदलाव आता है। तारा और वेद के साथ भी यही होता है। वह वेद की जिंदगी में कैटलिस्‍ट का काम करती है। वह उसमें जिंदगी का संचार करती है।
-वेद और तारा के जरिए क्‍या कहना चाह रहे हैं इम्तियाज अली ?
0 हमारे समाज में युवक-युवतियों पर अनेक दबाव रहते हैं। आप को यह बनना है,वह करना है। यह हासिल करना है। हमेशा हम पर कोई न कोई रोल निभाने का दबाव रहता है। इतनी अपेक्षाएं रखी जाती हैं कि हम खुद से अपेक्षाएं रखने लगते हें। हम दूसरों के अनुसार जीने लगते हें। इस फिल्‍म में इम्तियाज अली का एक ही संदेश है- बी योरसेल्‍फ। मैं तो फिल्‍म इंडस्‍ट्री से अनेक उदाहरण दे सकती हूं कि उन्‍होंने पढ़ाई कुछ और की,लेकिन अभी फिल्‍मों में अच्‍छा कर रहे हैं। वे सब कुछ छोड़ कर आए और फिल्‍मों पर ध्‍यान दिया। कुछ लोग जिंदगी की एकरसता में फंस जाते हैं। वे हिम्‍मत नहीं कर पाते। कुछ अपनी जिंदगी का निरीक्षण करते हैं और वर्त्‍तमान से तौबा कर नई कोशिश करते हैं। यही तमाशा है।
-वेद और तारा की जिंदगी गुंथी हुई है फिर ?
0 पहले वेद तारा की जिंदगी में जोश भरता है। बताता है कि जिंदगी कितली मजेदार हो सकती है। बाद में तारा उसे अहसास दिलाती है कि वह वास्‍तव में क्‍या है ?
-तारा की मुलाकात कैसे होती है वेद से ?
0 तारा अपनी जिंदगी में मस्‍त है। वह अपने परिवार के साथ रहती है। आजाद खयालों की लड़की है। वह एस्ट्रिक्‍स कॉमिक्‍स की फैन है। एस्ट्रिक्‍स कॉमिक्‍स इन कोर्सिका पढ़ने के बाद वह वहां जाने के लिए बेताब है। कोर्सिका में ही वेद से उसकी मुलाकात होती है। तारा ने जिंदगी का रस नहीं खोया है।
-क्‍या कभी तारा जैसी लड़की से आप मिली हैं या खुद को उसके करीब पाती हैं ?
0 हां,मैं तारा जैसी लड़कियों से मिली हूं। मैं खुद वैसी नहीं हूं। मैं शुरू से ही अपने मन का काम कर रही हूं। मेरी जिंदगी में तारा जैसा कंफ्ल्क्टि नहीं रहा है। मरे मां-पिता ने कभी कोई दबाव नहीं डाला। मैं जो करना चाहती थी उसी के लिए उन्‍होंने प्रोत्‍साहित किया। फिल्‍म के संदेश से मैं जुउ़ाव महसूस करती हूं। मेरे पिता हमेशा कहते हैं कि जिंदगी में वही करो जो करना चाहती हो। जिसके लिए पैशन और एक्‍साइटमेंट हो।
- आज के भारतीय समाज में आजाद खयाल लड़की होना और अपनी मर्जी का करिअर चुनना कितना आसान है ?
0 मेरी फ्रेंड्स सर्किल में ऐसी लड़कियां हें। उन्‍होंने पढ़ाई की। पढ़ाई में अव्‍वल रहीं और फिर दबाव में आकर शादी कर ली। वे जो करना चाहती थी,वह नहीं कर सकीं।
-तारा और दीपिका से मैं जानना चाहता हूं कि हासिल करने की जिद में कुछ खोया भी है क्‍या ?
0 नहीं। मैं खुश हूं। मेरा एक ही रिग्रेट है कि मैं जिस इंडस्‍ट्री में हूं,वह मुंबई में है। मेरे मां-पिता बंगलुरु में रहते हैं। एक ही इच्‍छा है कि सुबह आंखें खोलूं तो वे मेरे सामने हों। मां आकर जगाएं। पिता के साथ चाय पी लूं। कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। हमलोग साथ रहने की कोशिश करते हैं।
- एक महीने के अंदर इम्तियाज अली और संजय लीला भंसाली दोनों के साथ आप की दूसरी फिल्‍म आ रही है। दोनों के साथ हम दीपिका की कौन सी नई खूबी से परिचित होंगे ?
0 तमाशा में तारा के स्पिरिट को मैंने पहली बार पर्दे पर जिया। मैंने तारा या उसके आसपास का किरदार भी पहले नहीं निभाया है। मैं हमेशा रणबीर और इम्तियाज के साथ काम करना चाहती थी। मैंने दोनों के साथ अलग-अलग काम किया है।रॉकस्‍टार के लिए नहीं चुने जाने पर मुझे बुरा लगा था। रहमान सर के साथ भी यह मेरी पहली फिल्‍म होगी।
-संगीतकार से एक्टिंग में किस तरह की मदद मिलती है ?
0 बहुत ज्‍याद। खास कर ऐसी फिल्‍म में...जिसमें बैकग्राउंड स्‍कोर या म्‍यूजिक स्‍कोर का खास उपयोग किया गया है। गानों पर परफार्म करने में मजा आता है। हमलोगों ने इस फिल्‍म के गानों पर सीन की तरह परफार्म किया है। अगर फिल्‍म देखते वक्‍त गाना अच्‍छा लगे तो उसका श्रेय एक्‍टर को मिलता है लेकिन मेहनत तो संगीतकार की होती है। म्‍यूजिक सीन और परफारमेंस को प्रभाव बढ़ा देता है।

Saturday, November 21, 2015

नए रंग-ढंग में रंगी, सजी और धजी ‘रंगोली’


- अमित कर्ण
भारतीय टेली जगत आठवें दशक का एहसानमंद रहेगा। वजह ‘रंगोली’, ‘रामायण’, ‘महाभारत’, ‘हम लोग’, ‘बुनियाद’ जैसे आयकॉनिक शो थे। उनका इंतजार पूरा परिवार करता था। वे जोरदार मनोरंजन करते थे। साथ ही ज्ञान और मनोरंजन की भरपूर खुराक भी देते थे। ‘रंगोली’ तो गानों का खजाना हुआ करता था। खासकर, उस जमाने में जब घर में डीवीडी प्लेयर्स या मोबाइल नहीं थे। तब दूरदर्शन ही था, जो हर नई फिल्म के गाने हम तक पहुंचाया करता था। आज आईट्यून्स के जमाने में वही ‘रंगोली’ एक बार नए तेवर और कलेवर के साथ 15 नवंबर को लौंच हुई है। उसे स्वरा भास्कर होस्ट कर रही हैं। शो में प्रयोग मुंबई दूरदर्शन केंद्र के एडीजी मुकेश शर्मा और एडीपी शैलेष श्रीवास्तव के हैं। मुकेश शर्मा इन दिनों फिल्म्स डिवीजन के भी मुखिया हैं। दोनों मिलकर ‘रंगोली’ को नई ऊंचाइयों पर ले जाना चाहते हैं। शो को रीना पारिक ने लिखा है। वे बालाजी टेलीफिल्म्स की डायलॉग रायटर भी हैं।
    शो से जुडऩे के बारे में स्वरा भास्कर ने बताया , ‘दो अहम कारण हैं। एक  यह कि एक्टर होने के नाते लालची हूं। हर तरह काम करना चाहती हूं। दूसरा यह कि दूरदर्शन की रीच बाकी सैटेलाइट चैनलों से कई गुना ज्यादा है। ऊपर से ‘रंगोली’ अपने आप में आयकॉनिक प्रोग्राम है। ऐसे में यह मुझे लाखों-करोड़ों दिलों के पास ले जा रही है। फिर इससे मेरी यादें भी जुड़ी हैं। मेरे घर में केबल काफी लेट आया था तो ‘रंगोली’ के जरिए ही मैं हिंदी फिल्मों व गानों तक पहुंच पाई। इससे पहले ‘संविधान’ में मैंने एंकरिंग की थी। ये ऐसे कार्यक्रम हैं, जिनसे आप के ज्ञान में इजाफा भी होता है। इसलिए इसे न करने का तो कोई कारण ही नहीं था। शो में हमने मस्ती, शरारत के तत्व ज्यादा मिलाए हैं। दर्शकों के संग दोस्ताना व्यवहार रख रही हूं। दूरदर्शन के मौजूदा अधिकारी भी बड़े लचीले हैं। वे कंटेंट को नौकरशाही के डंडे से नहीं हांक रहे।’
    ‘रंगोली’ की प्रोड्यूसर व डायरेक्टर शैलेष श्रीवास्तव बताती हैं, ‘हमारी कोशिश हर वर्ग का दिल जीतने की है। नए-पुराने लोकप्रिय, कल्ट गानों को समेटने की कोशिश की गई है ताकि लोगों को ऐसा शो मिल सके, जिसे पूरा परिवार साथ बैठकर देख सके। उनकी संडे की सुबह का आगाज बढिय़ा हो। हां, इसका मतलब यह नहीं कि ‘साड़ी के फॉल सा..’ जैसे गानों को वरीयता दी जाएगी। हम शो के स्तर से समझौता नहीं करना चाहते। तभी इससे पहले एनएफडीसी, अमित खन्ना व धीरज कुमार के प्रॉडक्शन हाऊस के साथ मिलकर बनाया था। आज की तारीख में ‘रंगोली’ जैसे प्रोग्राम के लिए गानों की स्क्रूटनी काफी चैलेंजिंग होती है। सब उम्र वर्ग को अपील व कनेक्ट करने वाले गाने बन नहीं रहे। साथ ही जो बड़ी म्यूजिक कंपनियां हैं, उनका रवैया सहयोगात्मक नहीं है। यशराज और टी-सीरिज अपने गानों की कीमत बहुत ज्यादा मांगती हैं।’
    इस शो को स्वरा भास्कर बहुत उम्दा तरीके से होस्ट कर रही हैं। उनके अलावा मेरे जहन में साक्षी तंवर भी थीं। शो को पॉपुलर बनाने के लिए हम प्रयोग करने को ओपन हैं। हम फिल्म प्रमोशन करने के लिए भी इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल बखूबी करने देने को राजी हैं। हम शो की मेकिंग का एवी(ऑडियो-विजुअल) भी डालना चाहते हैं।
    शो की क्रिएटिव रायटर रीना पारिक के मुताबिक, ‘इस जमाने की पूरी युवा पीढ़ी का बचपन इस शो से जुड़ा रहा है। इसके अलावा ‘चित्रहार’ के जरिए गाने हम तक पहुंचते थे। आज भी दूर-दराज के इलाकों में दूरदर्शन एकमात्र जरिया है। उन लोगों की एंटरटेनमेंट भूख को मिटाने के लिए ‘रंगोली’ की अवधारणा तैयार की गई। मेरी कोशिश गानों की मेकिंग से जुड़ी हर बारीकी को उभार कर सामने लाना है। मिसाल के तौर पर शाह स्ख खान गिटार काफी यूज करते हैं तो राजकपूर सिम्फनी। ऐसे ही देव आनंद साहब माउथ ऑर्गन इस्तेमाल करते थे। उन सबकी बैक स्टोरी क्या रही है, यह इस बार की ‘रंगोली’ का केंद्र है। फिर जिन पर गाने फिल्माए गए हैं, उनकी रचनात्मक क्षमता को भी सामने लाने की मेरी कोशिश है। जैसे धर्मेंद्र, मनोज कुमार, मीना कुमारी बड़े अच्छे रायटर व शायर रहे हैं। फरहान अख्तर भी बहुत अच्छा लिखते हैं। उन जैसे अन्य कलाकारों की अनकही, अनसुनी कहानियों का खजाना भी इस शो में होगा।’

   
   

Friday, November 20, 2015

नए चेहरों और एक्‍शन से सजी ‘स्‍पेक्‍टर’



-अजय ब्रह्मात्‍मज

जेम्‍स बांड सीरिज की 24 वीं फिल्‍म स्‍पेक्‍टर कल रिलीज हो रही है। अास्ट्रिया, इटली और इंग्‍लैंड के विभिन्‍न शहरों की शूटिंग के बाद स्‍पेक्‍टरके ओपनिंग सीन की शूटिंग मेक्सिको सिटी में की गई। दैनिक जागरण के अजय ब्रह्मात्‍मज ओपनिंग सीन की शूटिंग के दौरान फिल्‍म यूनिट के विशेष निमंत्रण पर मेक्सिको सिटी में थे। वहीं उनकी मुलाकात निर्देशक सैम मेंडेस और मुख्‍य कलाकारों डेनियल क्रेग,क्रिस्‍टोफ वाल्‍ट्ज,ली सेडेक्‍स से हुई।

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    जेम्‍स बांड सीरिज की ताजा फिल्‍म स्‍पेक्‍टर की ओपनिंग सीन की शूटिंग के साथ उसके कलाकारों से मुलाकात का निमंत्रण ही उत्‍साह के लिए काफी था। वाया न्‍यूयार्क मेक्सिको सिटी पहुंचने पर सबसे पहले इस शहर की ज्‍यामितीक संरचना ने प्रभावित किया। मेक्सिको सिटी एक साथ नए और पुराने को समेटते हुए विकसित हुआ है। शहर की पुरानी इमारतें सदियों पुरानी सभ्‍यता का अहसास देती हैं। साथ ही आधुनिकता के साथ कदम मिला कर चल रहा यह शहर दुनिया के किसी अन्‍य विकसित शहर की तरह सभी सुविधाओं से संपन्‍न है। अमेरिका के करीब स्थित मेक्सिको अपनी पृथक पहचान के साथ कायम है। यह भिन्‍नता शहर के चप्‍पे-चप्‍पे और बाशिंदों के बात-व्‍यवहार में नजर आई।

    निर्माता माइकल विल्‍सन ने ओपनिंग सीन के लिए मेक्सिको सिटी के चुनाव के बारे में बताया, हमें अपनी फिल्‍म की थीम और भव्‍यता के मुताबिक ऐसे माहौल की जरूरत थी।ओपनिंग सीन ही दर्शकों को चौंकाने के साथ बांधती और फिल्‍म से जोड़ती है। मेक्सिको सिटी में डे ऑफ डेड का सेलिब्रेशन बड़े पैमाने पर होता है। हम ने अपनी फिल्‍म की ओपनिंग सीन के लिए 1500 जूनियर कलाकारों के साथ इसे क्रिएट किया। मेक्सिको में नवंबर महीने के दो दिनों के इस आयोजन में मर चुके पूर्वजों और पितरों को याद किया जाता है। परिवार के सदस्‍य जगराता करते हैं और पितरों की याद में उत्‍सव मनाते हैं। स्‍पेक्‍टर की टीम ने मार्च महीने में डे ऑफ डेड के उत्‍सवी माहौल को मेक्सिको सिटी के मुख्‍य स्‍क्‍वायर जुकोला में रीक्रिएट किया। ऐतिहासिक इमारतों से घिरे इस स्‍क्‍वायर को शूटिंग के लिए घेर दिया गया था। पास के ऐतिहासक ग्रैन होटल में प्रोडक्‍शन और मेकअप की टीम जुटी हुई थी। 1500 जूनियर कलाकारों के कोआर्डिनेश्‍न और उनके साथ जेम्‍स बांड के एक्‍शन का फिल्‍मांकन दिक्‍कतों से भरा काम था। हिंदी फिल्‍मों की ऐसी शूटिंग में माहौल में तनाव और शोर रहता है। स्‍पेक्‍टर की टीम ने इसे बगैर शोर-शराबे के सुनियोजित तरीके से किया। 

      फिल्‍म के प्रोडक्‍शन डिजायनर डेनिस गैशनर की चुनौती बड़ी थी। उन्‍हें निश्चित दिनों में ही ओपनिंग सिक्‍वेंस के फिल्‍मांकन की सुविधाएं जुटानी थीं।फिल्‍म के निर्देशक अपनी टीम के साथ इस सिक्‍वेंस की कोरियोग्राफी कर चुके थे। एक्‍शन टीम के सहयोग से उन्‍हें मालूम था कि कब किस एक्‍शन का निर्देश देना है। स्‍क्‍वायर की एक सड़क पर पारंपरिक कॉस्‍ट्यूम और मास्‍क में जूनियर कलाकरों की कतार थी। स्‍क्‍वायर के बीच में खड़े किए गए मंच पर करतब और कलाबाजी चल रही थी। सीन के मुताबिक फिल्‍म का विलेन जेम्‍स बांड की पकड़ में आने से बचने के लिए इस भीड़ में भागता है। एक्‍शन दृश्‍य के लिए हेलीकाप्‍टर भी लाया गया था। जेम्‍स बांड अपने खास अंदाज में हेलीकाप्‍टर पर खुले आकाश में एक्‍शन करने के बाद जंप मारते हैं1 वे विलेन का पीछा करते हैं। निर्देशक सैम मेंडेस ने बताया, हम ने सीन की जरूरत के मुताबिक फ्लोट और मैक्‍वेट भी बनवाए। सभी जूनियर कलाकारों के मेकअप,मास्‍क और कॉस्‍ट्यूम पर विशेष ध्‍यान दिया गया। हम ने इस त्‍योहार की रंगीन और समृद्ध परंपरा का निर्वाह किया। हमारी कोशिश है कि ओपनिंग सीन में ही दर्शक सब भूल कर जेम्‍स बांड के कारनामों के प्रति उत्‍सुक हो जाएं।

     
अगले दिन फिल्‍म के कलाकारों से मिलना तय था। डेनियल क्रेग,क्रिस्‍टोफ वाल्‍ट्ज और ली सेडेक्‍स से मिलना था। डेनियल क्रेग चौथी बार जेम्‍स बांड की भूमिका निभा रहे हैं। शुरू में खबर थी कि स्‍पेक्‍टर में जेम्‍स बांड की भूमिका किसी नए कलाकार को दी जाएगी। निर्देशक सैम मेंडेस और डेनियल क्रेग की जोड़ी बरकरार रही। इस बार क्‍या खास है ? डेनियल क्रेग ने बताया, सैम से इस पर बात हुई थी। हम ने तय किया था कि स्‍पेक्‍टर में स्‍काईफॉल से सब कुछ बड़ा होगा। स्‍टंट,एक्‍शन और सभी डिपार्टमेंट में पहले से आगे जाना है। स्‍पेक्‍टर एक बड़ा सेलिब्रेशन है। अभी तक की बांड फिल्‍मों से अधिक आकर्षक और भव्‍य। डेनियल को अफसोस था कि वे स्‍काईफॉल की शूटिंग भारत में नहीं कर पाए थे। उस फिल्‍म के ट्रेन सिक्‍वेंस की शूटिंग भारत में होनी थी। प्रशासिनक दिक्‍कतों से क्लियरेंस न मिलने की वजह से वह शूटिंग किसी और देश में हुई थी। डेनियल क्रेग ने उम्‍मीद जतायी, नेवर माइंड,मैं किसी और फिल्‍म की शूटिंग के लिए आऊंगा। भारत मुझे प्रिय है। मैं केरल और गोवा जा चुका हूं। यह पूछने पर कि अगर कोई भारतीय कलाकार जेम्‍स बांड की भूमिका निभाए तो ? उन्‍होंने कहा,अगर रोल में शूट करेगा तो क्‍यों नहीं ?’  

      क्रिस्‍टोफ वाल्‍ट्ज ने स्‍पेक्‍टर में विलेन की भूमिका निभाई है। इस बातचीत के समय उनकी बेटी भारत की यात्रा पर थीं। बेटी ने कुछ तस्‍वीरें भेजी थीं भारत से। वे उन्‍हें देख कर मुग्‍ध थे। क्रिस्‍टोफ वाल्‍ट्ज थिएटर के अभिनेता है। उन्‍होंने लंबे समय तक टीवी के लिए काम किया। लगभग 30 सालों के करिअर के बाद उन्‍होंने इनग्‍लोरियस बास्‍टर्ड से दस्‍तक दी और पहली ही फिल्‍म में बेस्‍ट सपोर्टिंग एक्‍टर का 2009 का ऑस्‍कर अवार्ड ले गए। उन्‍हें 2012 में भी इसी श्रेणी का दूसरा पुरस्‍कार मिला। क्‍या जेम्‍स बांड सीरिज के फिल्‍म करने में उन्‍हें कोई संकोच नहीं हुआ ?  उनका जवाब था, क्‍यों हो?  क्‍या यह कोई मामूली फिल्‍म है। इसके साथ अनेक टैलेंट जुड़े हैं। मेरे लिए जेम्‍स बांड भी एक तरह से थिएटर का ही विस्‍तार है,इसमें माडर्न मायथोलिजी कही जा रही है। इसकी प्रस्‍तुति में गजब की नाटकीयता रहती है। मैं इसमें फ्रैंज ओबरहाउजर का किरदार निभा रहा हूं। क्रिस्‍टोफ को देर से सफलता मिली,लेकिन उन्‍होंने देर आयद ,दुरुस्‍त आयद का मुहावरा चरितार्थ किया। अपनी स्‍वीकृति और सम्‍मान पर उन्‍होंने कहा, अच्‍छा लगता है,लेकिन मैंने इसकी कीमत अदा की है। मैंने मेहनत की है। मुझे जो मिला,उसका मैं हकदार हूं।     

 फ्रांस की अभिनेत्री ली सेडेक्‍स लेस्बियन फिल्‍म ब्‍लू इज द वार्मेस्‍ट कलर से इंटरनेशनल पहचान मिली। उम्‍मीद की जा रही है कि स्‍पेक्‍टर से उनकी लोकप्रियता बढ़ेगी और हालीवुड की फिल्‍मों में मांग भी। स्‍पेक्‍टर के निर्देशक सैम मेंडेस ने उनसे स्‍पष्‍ट कहा था कि फिल्‍म के हीरो तो जेम्‍स बांड हैं,लेकिन जब आप पर्दे पर आएंगी तो उसका इंपैक्‍ट दर्शक महसूस करें। ली सेडेक्‍स ने निर्देशक की अपेक्षाओं पर खरी उतरने की कोशिश की है। ली सेडेक्‍स ने कहा, मुझे ब्रिटेन और हालीवुड की फिल्‍मों में काम करना अच्‍छा लगता है। वहां बहुत सीखने को मिलता है। मेरी कोशिश है कि दर्शक मुझे मेरी भूमिकाओं में याद रखें। अगर हर फिल्‍म में मैं ली सेडेक्‍स ही दिखूंगी तो फिर अभिनय कैसा ?’ एक पत्रकार ने उनसे उनके प्रेमी के बारे में पूछा,क्‍या वह भी मेक्सिको सिटी आए हैं? भारतीय अभिनेत्रियों की तरह बिफरने के बजाए ली सेडेक्‍स ने टेबल के नीचे झांका और पूछा, कहीं वह टेबल के नीचे तो नहीं छिप कर बैठे हैं ?’ 

Thursday, November 19, 2015

दरअसल : रौनक लौटी सिनेमाघरों में



-अजय ब्रह्मात्‍मज 
दीवाली के एक दिन बाद रिलीज हुई सूरज बड़जात्‍या की प्रेम रतन धन पायो ने दर्शकों को सिनेमाघरों में खींचा है। लंबे समय से किसी भी फिल्‍म के प्रति दर्शकों का ऐसा आकर्षण नहीं दिखा था। फिल्‍मों ने 100-200 करोड़ के बिजनेस भी किए, लेकिन सिनेमाघरों पर दर्शकों की ऐसी भीड़ नहीं उमड़ी। पिछले दिनों दैनिक जागरण से खास बातचीत में सूरज बड़जात्‍या ने अपनी फिल्‍मों के दर्शकों के बारे में स्‍पष्‍ट संकेत दिए थे कि उनकी फिल्‍में देखने आठ से अस्‍सी साल की उम्र तक के दर्शक आते हैं। हिंदी में बन रहीं ज्‍यादतर फिल्‍मों के दर्शक सीमित होते हैं। अपराध या किसी खास जॉनर की फिल्‍मों में दर्शकों की संख्‍या सीमित रहती है, जबकि मेरी फैमिली फिल्‍मों के दर्शक उम्र और श्रेणी से परे होते हैं। सूरज बड़जात्‍या की बातों की सच्‍चाई सिनेमाघरों में दिख रही है। दीवाली के अगले दिन छुटृटी के कारण इस फिल्‍म को पर्याप्‍त दर्शक मिले और कलेक्‍शन का आंकड़ा 40 करोड़ के पार हो गया।
    हिंदी फिल्‍मों के निर्माता- निर्देशक इन दिनों वीकेंड कलेक्‍शन पर ज्‍यादा जोर देते हैं। वे आक्रामक प्रचार और प्रमोशन से दर्शकों को अलर्ट करते हैं। जितना बड़ा स्‍टार, उतना आक्रामक प्रचार। नतीजा यह होता है कि दर्शक शुक्रवार को टूट पड़ते हैं। फिल्‍म प्रचार के मुताबिक संतोषजनक या अच्‍छी निकली तो शनिवार और रविवार को दर्शक बढ़ते हैं। देखा गया है कि अगर किसी फिल्‍म ने शुक्रवार को 10 करोड़ का कलेक्‍शन किया तो हिट होने की स्थिति में रविवार का कलेक्‍शन 15 से 20 करोड़ तक हो जाता है। तात्‍पर्य यह कि तीन दिनों में ही फिल्‍मों का बिजनेस डेढ़ से दोगुना बढ़ जाता है। फिल्‍में दर्शकों को पसंद न आईं तो तमाम प्रचार और बड़े स्‍टार के बावजूद फिल्‍मों का बिजनेस अगले ही दिन आधा और कई बार तो उससे भी कम हो जाता है। फिल्‍म ट्रेड को समझने वालों की भविष्‍यवाणी में प्रेम रतन धन पायो चार दिनों में निश्चित ही 100 करोड़ का जादुई आंकड़ा पार कर लेगी। कुछ ट्रेड पंडितों ने तो वीकएंड में 125-150 करोड़ तक की भविष्‍यवाणी की है। वैसे रिलीज के दिन कुछ आलोचकों ने प्रेम रतन धन गंवायों भी लिखा।
    भारतीय परिदृश्‍य में दर्शकों की चेतना और संवेदना की समझ जरूरी है। हिंदी में ज्‍यादातर सुपरहिट फिल्‍में फैमिली ओरिएंटेड रही हैं। महानगरों के विकास और मल्‍टीप्‍लेक्‍स के आने के बाद यह देखा गया कि पूरा परिवार अब एकसाथ फिल्‍में देखने नहीं जाता। पहले दिन और वीकएंड में सिनेमा के शौकीन ही फिल्‍में देखते हैं। किसी भी फिल्‍म को हिट कराने में सिनेमा के इन शौकीनों का बड़ा हाथ नहीं होता। फिल्‍में तभी बड़ी हिट होती हैं, जब‍ उन्‍हें फैमिली दर्शक मिलते हैं। और वे फैमिली दर्शक महानगरों से अधिक छोटे शहरों और कस्‍बों में रहते हैं। हिंदी फिल्‍मों का यह ध्रुव सत्‍य है कि अखिल भारतीय स्‍तर पर दर्शकों की पसंद बनने के बाद भी कोई फिल्‍म ब्‍लॉकबस्‍टर हो पाती है। कुछ दशकों पहले तक निर्देशक इस बात का ख्‍याल रखते थे कि देश के हर इलाके के दर्शक उनकी फिल्‍में पसंद करें। भाव और भाषा के स्‍तर पर निश्चित सरलता बढ़ती जाती थी। 21वीं सदी के ज्‍यादातर निर्देशक इन चिंताओं में नहीं रहते। वे ज्‍यादातर खुद की पसंद के लिए फिल्‍में बनाते हैं। वे इस बात की वकालत भी करते हैं कि हमें अपनी रूचि का ख्‍याल रखना चाहिए। सच्‍चाई यही है कि सिनेमा समष्टिमूलक विधा है। अगर निर्देशक व्‍यापक दर्शकों तक पहुंचना चाहता है तो उसे अपनी फिल्‍मों में सर्वमान्‍य रू़चि का निर्वाह करना होगा। सूरज बड़जात्‍या की फिल्‍म रूढि़वादी और पारंपरिक होती हैं। इसी कारण वे कहीं न कहीं देश के पारंपरिक और रूढिबद्ध दर्शकों को पसंद आती हैं। प्रेम रतन धन पायो के साथ भी ऐसा ही हुआ है।
    भारत एकसाथ अनेक सामाजिक और पारिवारिक संरचनाओं में जी रहा है। उत्‍तरआधुनिक पूंजीवाद के साथ दशकों पुराना सामंतवाद भी मौजूद है। महानगरों की सामाजिक, आर्थिक जरूरतों की वजह से न्‍यूक्लियर फैमिली का जोर बढ़ा है। वहीं अभी तक संयुक्‍त परिवार भी दिखाई पड़ते हैं। पारिवारिक संबंधों में रिश्‍तों की जटिलताओं के बावजूद भावनाओं पर अब भी जोर रहता है। हॉलीवुड से प्रभावित हिंदी फिल्‍मों में भी रिश्‍तों में इन भावनाओं पर ध्‍यान दिया जाता है। सभी मानते हैं कि हिंदी फिल्‍मों के दर्शक थोड़े इमोशनल और मेलोड्रैमेटिक होते हैं। उन्‍हें ऐसी फिल्‍में पसंद भी आती हैं। सोच और व्‍यवहार में आधुनिक होने के साथ सूरज बड़जात्‍या राजश्री के मूल्‍यों और सिद्धांतों को लेकर चलते हैं। उनके लिए आज भी परिवार और पारिवारिक मूल्‍य महत्‍वपूर्ण हैं। भले ही उन्‍हें दिखाने के लिए वे सामाजिक और पारिवारिक संरचनाओं और रिश्‍तों का अतिक्रमण और उल्‍लंघन करते दिखे। प्रेम रतन धन पायो में प्रेम, विजय सिंह, मैथिली और चंद्रिका विरोधाभासी चरित्र हैं। फिर भी वे पारिवारिक मूल्‍यों व मान्‍यताओं के वृत में दिखते हैं। प्रेम रतन धन पायो में सूरज बड़जात्‍या को इस जटिलता को भी सरलता से दिखाया है। उनकी सरलता ही ज्‍यादा से ज्‍यादा दर्शकों को आकर्षित कर रही है। सिनेमाघरों में रौनक लौट रही है।

Tuesday, November 17, 2015

अपने सपनों को जी लो - रणबीर कपूर


-अजय ब्रह्मात्मज 

रणबीर कपूर मिलते ही कहते हैं कि अभी तक मेरी तीन फिल्में लगातार फ्लॉप हुई हैं। जब फ्लॉप की संख्या पांच हो जाएगी तब मुझे सोचना पड़ेगा। फ़िलहाल पिछली बातों को भूल कर मैं 'तमाश' के लिए तैयार हूँ। इम्तियाज अली के साथ यह मेरी दूसरी फिल्म है। सभी जानते हैं क़ि इम्तियाज़ कैसे फिल्मकार हैं। उन्होंने मुझे 'रॉकस्टार' जैसी  है। उस फिल्म के दौरान मैंने एक्टिंग और ज़िन्दगी के बारे में बहुत कुछ सीखा। 'तमाशा' ने मुझे अधिक जागरूक बना दिया है। इसमें मैं वेद वर्धन का किरदार निभा रहा हूँ। 

-वेद का परिचय दें।  वह कौन है?
० वेद आम बच्चों की तरह स्कूल जाता है। उसका दिमाग गणित से ज्यादा किस्से-कहानियों में लगता है। उसके शहर में एक किस्सागो है, वेद कहानियां सुनने उसके पास जाया करता है। वह किस्सागो पैसे लेकर कहानियां सुनाता है। वेद कहानियां सुनने के लिए पैसे इधर-उधर से जमा करता है। वेद कहानियों की दुनिया में गुम होना पसंद करता है। बड़े होने पर देश के दुसरे बच्चों की तरह उस पर भी माता-पिता और समाज का दबाव बढ़ता है कि क्या बनना है? इंजीनियर या मार्केटिंग गुरु के प्रोटोटाइप में से एक चुनना है। इम्तियाज़ खुले तौर पर यह बताना चाह रहे हैं कि  हम सभी रोबोट बन गए हैं। देखें तो हम सभी की ज़िन्दगी में एक जोकर ज़रूर रहना चाहिए। 
- लेकिन समाज और परिवार तो प्रोटोटाइप ही चाहता है?
० सही बात है। इम्तियाज़ यही कह रहे हैं  कि हम  अपने मन का काम करना चाहिए। माता-पिता या परिवार के दबाव में आकर बेमन से कुछ नहीं करना चाहिए। कोई चाहत दबी रह जाए तो वह गंदे तरीके से उभर कर सामने आएगी। हमारे अंदर कटुता भर जाएगी। वेद की ज़िन्दगी यह बताती है  कि अपने सपनों के पीछे ही चलना चाहिए। समाज के सपनों पर चलेंगे तो हम कहीं नहीं पहुंचेंगे। 
-वेद पूरी तरह से इम्तियाज़ की सोच का एक किरदार और व्यक्ति है। वेद अपने रचयिता के बारे में क्या सोचता है? क्या वह खुश है अपने सर्जक से?
० बिल्कुल… मैं कहूँ तो इम्तियाज़ खुद ही वेद हैं। वेद के रास्तों से वे गुजर चुके हैं। यूँ भी कह सकते हैं की वेद का रास्ता इम्तियाज़ का चला हुआ है। मैं खुद एक फ़िल्मी परिवार से हूँ.\ . मेरे ऊपर कभी कोई दबाव नहीं रहा। मेरे माता-पिता मॉडर्न सोच के हैं।  मुझे आर्थिक या पारिवारिक दबाव में नहीं रहन पड़ा। आम हिंदुस्तानी नौजवान बहुत दबाव में रहता है। इम्तियाज़ की ज़िन्दगी देखें. वे तीन भाइयों में सबसे बड़े हैं। जमशेदपुर में पले-बढे। वे एकदम से अपने घर में नहीं कह सके  कि मुंबई जाकर फिल्मों में कोशिश करेंगे। कोई जरिया नहीं था। उनकी ज़िन्दगी और वेद की ज़िन्दगी में अनेक समानताएं हैं। ऐसे और भी लोग मिल सकते हैं। ज़िन्दगी ज़द्दोज़हद में हम भूल जाते हैं  कि हम कौन हैं? कभी कोई दोस्त हमें याद दिलाता है  कि हम कोई और हैं। उस और को हम समय रहते पहचान लें तो खिल उठेंगे। 
-वेद की अपनी पहचान क्या है/
० वह शिमला का है।  उसके पूर्वज पार्टीशन के समय पेशावर से आये थे।  किस्सागोई का रिवाज़ उसके परिवार में रहा है। उसके दादा ने सब कुछ भूल कर परिवार के  हैं।वेद के पिता  कि पारिवारिक पेशे में ही रहते हैं। जब वेद की बारी आती है तो  वेद से भी यही उम्मीद की जाती है। वह पारिवारिक रिवाज़ीं में फंसता है। उसे निकलने में वक़्त लगता है। बैकड्रॉप में पार्टीशन है।  वेद के पिता एक बार समझते हैं  कि अगर दादा जी ने तो परिवार को संभाला।  अगर उस समय वे बांसुरी बजाने लगते तो क्या होता? सभी सड़क पर आ जाते। ज़िन्दगी अपनी मर्जी से नहीं चलती।  अपनी ख्वाहिशों को मारना होता है।वेद सब समझता है। जब वह उसकी ज़िन्दगी में आती है और झिंझोरती है तब उसे लगता है  कि ज़िन्दगी में कुछ और करना है। वह मेडियोकर इंसान बन चुका है।
-क्या यह भी 'रॉकस्टार' की तरह इंटेन्स फिल्म है?
०  ना ना… यह हल्की-फुल्की फिल्म है। लव स्टोरी है। एक सोशल मैसेज भी है। मैसेज है कि अपने मन का काम करो।  इमोशनल स्टोरी है। मैं कहूँगा  कि इसमें सोशल कन्वर्सेशन है। 
- फिल्म कैसे चुनते हैं?
० इम्तियाज़ की फ़िल्में सही जगह से आती है। ईमानदार होती हैं। इम्तियाज़ हिंदी बेल्ट के मूल्यों को जानते हैं। उनकी फिल्मों में अपने समाज की तकलीफ जाहिर होती है।  इम्तियाज़ मध्यवर्गीय युवकों की भावनाओं को स्वर देता है। मुझे उनके साथ इसे समझने और दिखाने में अच्छा लगता है। इम्तियाज़ इस फिल्म के जरिए याद दिल रहे हैं  कि अभी भी वक़्त है। दुनिया बदल चुकी है।  आप अपनी मर्जी का पेशा चुन सकते हैं।  सपनों को दबाए नहीं।  कोशिश ज़रूर करें। यह हिंदी मशाला फिल्म है,लेकिन एक संदेश भी है। मुमकिन है कि हमारी फिल्म से किसी की लाइफ बदल जाए। 
-क्या वेद से आप जुड़ाव महसूस करते हैं/
० इम्तियाज़ ने साफ़ कहा था  कि मुझे रणबीर कपूर नहीं चाहिए।  मुझे साधारण युवक चाहिए,जिसका आत्मविश्वास हिला हुआ है। वेद हीरो नहीं है।  वह देश का एक साधारण युवक है। मुझे औसत युवक दिखना था।  अगर ग्रुप में मेरी तस्वीर ली जाए तो कोई पहचान  भी नहीं पाए। 
- क्या आप ने हाल-फिलहाल में देश के साधारण नागरिक जैसा कोई काम किया है?
० मेरी ज़िन्दगी साधारण ही है। मेरे लिए अपनी ज़िन्दगी ही कॉमन है। मैं वह सब कुछ करता हूँ जो मेरी उम्र के युवक करते हैं। फिल्मों में आने के पहले यह ज़िन्दगी जी है।  अमेरिका में पढ़ाई के समय साधारण ही था।  मैंने अनुभव के लिए गरीबी नहीं ओढ़ी है। 
-क्या आप पर्स लेकर चलते हैं और अपनी ज़रूरतों के लिए पैसे खर्च करते हैं?
०हाँ पर्स रहता है मेरे पास।  नगद पैसे भी रहते हैं।  

Sunday, November 15, 2015

हर घर में है एक कहानी : सूरज बडज़ात्या


रोमांटिक फिल्मों को रीडिफाइन करने वालों में सूरज बडज़ात्या की भी अहम भूमिका है। प्रेम नामक कल्ट किरदार उन्हीं का दिया हुआ है। दीपावली पर उनकी 'प्रेम रतन धन पायोÓ रिलीज हुई। उन्होंने फिल्म के बनने, सलमान संग समीकरण और अपने बारे में बहुत कुछ साझा किया।
-झंकार टीम

-प्रेम रतन धन पायो टायटिल रखने का ख्याल कहां से आया?
मेडिटेशन के दौरान यह नाम मेरे दिमाग में आया। पहले मेरे मन में राम रतन नाम आया। उसके बाद प्रेम रतन। मैैंने सोचा बाद वाला नाम इस फिल्म के लिए सही बैठेगा। उसकी वजह थी फिल्म के केंद्र में अनकंडीशनल लव का होना। फिल्म में उसे बखूबी बयान किया गया है। मैैं सिर्फ कमर्शियल प्वॉइंट से कोई टिपिकल नाम नहीं देना चाहता था। सलमान को जब मैैंने नाम सुनाया तो वे चुप हो गए। दो मिनट के लिए एकदम शांत। फिर उन्होंने कहा कि कोई और निर्देशक होता तो बाहर निकाल देता। बाद में हमने इसे बरकरार रखा। फिल्म के टाइटिल सौंग में भी हमने सारे भाव स्पष्ट किए है। इरशाद कामिल ने उसे खूब निभाया है। फिल्म के गीत उन्होंने ही लिखे हैैं। मुझे खुशी है कि लोग गाने का मतलब न समझने के बावजूद उसे पसंद करते रहे। खैर, मेरे हिसाब से यही एकमात्र टाइटल था, जिससे फिल्म का मिजाज उभरकर सामने आया। हमने फिल्म के कुछ हिस्से की शूटिंग चितौड़ में की है। मेरा मन था कि मीरा के मंदिर को इस फिल्म में दिखाया जाए। उन्होंने कहा था कि प्रेम धन है। लुटाने पर वो बढ़ता है। हालांकि हम मीरा मंदिर में शूटिंग नहीं कर पाए। इस फिल्म में मैंने प्रयोग भी किए। पहली बार खल चरित्रों को रखा।
-हिंदी सिनेमा का माहौल बदला है। आप अपने ढांचे में ही कब तक काम करते रहेंगे? आप की फिल्मों में परिवार के प्रति संदेश होता है। यह आज के दौर से कैसे मेल खाता है?
मुझे इसी तरह की फिल्में बनानी आती है। मेरा मानना है कि हर फिल्म के दर्शक हैं। हर फिल्म चलती है। पैसा खर्च करने से फिल्म पसंद आएगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है। मापदंड के हिसाब से काम किया जाता है। आज के समय में हर किस्म की फिल्म चल रही है। ऐसा दौर फिल्म इंडस्ट्री में कभी नहीं था। उसमें फिल्म मेकर जो बनाना चाहता है वहीं उसका मापदंड है। मेरे टाइप की फिल्मों के लिए हर वर्ग के दर्शक हैैं। बाकी के संग ऐसा नहीं है। मिसाल के तौर पर आतंकवाद। उसके लिए दर्शक सीमित होते हैैं। जहां पारिवारिक फिल्मों की बात आती है, उसके लिए सभी तैयार रहते हैैं। हां यह है कि मैैंने ज्वाइंट फैमली पर फिल्में बनाईं। अब मामला थोड़ा अलग है। अब न्यूक्लियर फैमली हो गई है। इसके बावजूद परिवार में माता -पिता को अहम माना जाता है। मेरे दादा जी बताते थे कि हमारे समय में हम अपने बच्चों को प्यार नहीं कर सकते थे। हमारे पिता के सामने। दादा का ही हक रहता था अपने पोते को प्यार करने का। उसे जाहिर करने का। आज ऐसा नहीं है। मेरा बेटा मुझसे बेझिझक सारी बाते करता है। इसका मतलब यह नहीं है कि प्यार और सम्मान कम हो गया है। मैैं आगे भी चलकर इसी तरह की फिल्में बनाऊंगा। अभी भी कई कहानियां बकाया हैैं, जिन पर फिल्म बनानी है। हर घर में कहानी है।
-राजश्री बैनर को सफल बनाने का इरादा बचपन से ही था?
हां जी। यह सब मेरे दादा जी का किया हुआ है। मैैंने उनके साथ बैठ कई कहानियां सुनी हैं। वे उन कहानियों के वितरण का काम लेते थे, लेकिन निर्देशन नहीं करते। हम उनसे सवाल करते थे। हम कहते कि आप को जब पता है कि यह फिल्में कमाई करेंगी। तो आप इनका निर्माण क्यों नहीं करते हैैं। वे जवाब देते कि मैैं उन्हीं फिल्मों का निर्माण करूंगा, जिनमें सरस्वती का वास हो। मेरे मन में हमेशा के लिए यह बात बैठ गई। मैैंने निर्माता के तौर पर अलग तरह की फिल्में बनाने की कोशिश की है। वे फिल्में सफल नहीं हुई। मैैं प्रेम की दीवानी हूं उनमें से एक हैै। हमने एक्शन, सस्पेंस फिल्में भी बनाई। वे भी नहीं चल पाई। वही फिल्में हमारे बैनर की चलीं, जिनमें पारिवारिक मूल्य थे। जिनमें सरस्वती का वास हो। शायद हमें इसी तरह की फिल्में बनानी आती हो। यह मेरी धरोहर है। इसे बनाए रखना आज के समय में मेरे लिए युद्ध के समान है।
-आज छोटे लेंथ की फिल्में बनती हैं। इसका क्लाइमेक्स क्यों बड़ा किया?
मेरी हर फिल्म की लेंथ बड़ी रहती है। इस फिल्म का कैनवास बड़ा था। आधुनिकता का मिश्रण था। फिल्म में प्रिंस के किरदार में सलमान आज के जमाने के थे, जिसे इटालियन, जर्मन समेत कई देशों की भाषाएं आती थीं। यह आज की कहानी है। पहले और अब को दौर के माहौल को दर्शाया गया है। आज के राजा का बेस है। मेरे पहचान की रॉयल फैमली उनका बेटा डॉक्टर बनना चाहता हैै। वे सोचते हैैं कि हमारे राजमहल के बाहर डॉक्टर का नेम प्लेट अच्छा लगेगा! उनकी अपनी कशमकश है। लिहाजा हमने क्लाइमेक्स को बड़ा बनाया। सारी चीजें शामिल करनी पड़ीं।
-फिल्म का संगीत भी आज के ढर्रे पर नहीं था?
जी हां। मैैंने हिमेश रेशमिया से संगीत के विषय पर बात की थी। पहली बार हिमेश और इरशाद कामिल की जुगलबंदी हुई। दोनों अलग दुनिया के हैैं। इरशाद और हिमेश की अपनी खूबी है। हिमेश ने मुझसे पूछा कि कैसा संगीत देना है। जो चलता है वह या स्क्रिप्ट के हिसाब से। मैैंने कहा कि जो चलता है वह जाने देते हैैं। जो चाहिए वह काम करते हैैं। हमने आधे घंटे में गाने बनाए, क्योंकि हम आजाद हो गए। हमें हुक लाइन के हिसाब से काम नहीं करना था। फिल्म के पूरे होने तक गाने को लेकर दुविधा थी। इस तरह का संगीत चलेगा या नहीं। सब यहीं सोच रहे थे। बता दूं कि टाइटल गाने में 90 का ठेका इस्तेमाल किया गया है। आज कल ऐसा संगीत होता ही नहीं। लोगों को फिल्म के गीत पसंद आ रहे हैैं। हमें फिल्म बेचनी थी। संगीत नहीं।
- आप के नायक का नाम प्रेम ही क्यों रहता है? बदलता क्यों नहीं?
मेरे हिसाब से प्रेम जैसा किरदार हर किसी को बनना चाहिए। मैैं मानता हूं कि हर एक में वह प्रेम है। कई बार छल में प्रेम फंस जाता है। एक ऐसा इंसान जो महिलाओं की इज्जत करे। जो लडक़ी की सादगी से प्यार करे। जो परिवार की अहमियत को समझता हो। जो अपने से कम स्तर इंसान को बराबरी का दर्जा है। कहीं ना कहीं मैं ऐसा ही हूं। कहीं जाकर मैैंने प्रेम को अपनी फिल्मों के साथ ही रखा। कहीं जाने नहीं दिया।
- कलाकारों का चयन किस आधार पर किया?
अभिनेत्री के लिए कई नाम मेरे दिमाग में थे। राझंणा देखने के बाद मेरा सारा फोकस सोनम पर ही था। मुझे लगा यही वह लडक़ी है। जो देसीपन सोनम में थी वह किसी और में नहीं थी। हां, सलमान को मनाने में चार महीने लग गए। उनका कहना था कि मैैंने सोनम को अपने सामने बड़े होते देखा है। वह भी, तब जब वह बहुत मोटी थी। फिल्म में उसके संग रोमांस कैसे करूंगा? मैैंने समझाया आप की उम्र की अभिनेत्री कहां मिलेगी? वे मान गए। उनकी जोड़ी पसंद की गई। मैैं आज के जमाने की राजकुमारी चाहता था। जो दिल्ली की हो। खुद के पैरों पर खड़ी है। खुद से लड़ रही है। मैैंने एक फ्रेश जोड़ी कास्ट की । रहा सवाल सलमान की बहन के किरदार का तो उसके लिए कोई तैयार नहीं थी। सब कहने लगीं कि उनकी बहन का रोल प्ले कर लिया तो विज्ञापन मिलने बंद हो जाएंगे। बहरहाल, स्वरा भास्कर मान गई। उनके लिए इमेज से बढक़र किरदार है।
-इस फिल्म से जुड़ी खास याद? सलमान के साथ आपका रिश्ता एक्टर-डायरेक्टर का रहा या स्टार-डायरेक्टर जैसा?
रिश्ते में कोई तब्दीली नहीं हुई है। मैैं गड़बड़ करता तो उन्हें पता चल जाता है। फिल्म को लेकर हमारा विजन एक जैसा ही था। वह सबसे बड़ी बात थी। हम एनडी स्टूडियो में सूट करते थे। मैैं सुबह जाकर सलमान भाई को उठाता था। नाश्ते के साथ मैैं उन्हें सीन समझाता था। अपने सीन के साथ उन्हें सबके सीन में दिलचस्पी थी। वे सब के काम पर गौर करते थे। उनके किरदार को छोडक़र बकाया के एक्टरों के किरदार पर बात होती थी। एक्टर और निर्देशक के लिए खुल कर काम करना  जरूरी है। वन पेज वन विजन की दर्ज पर काम करना चाहिए। हमने वैसे ही किया। एक्टर और निर्देशक की राय मेल ना खाने पर फिल्म नहीं चलती है।
-शीशमहल की सोच क्या थी?
परिवार के साथ बचपन बिताने का जो मूल्य है, उसे शीशमहल से प्रस्तुत किया। हर आइने ने बचपन को दोहराया। बचपन की समेटी हुई यादें शीशमहल में दिखीं। आर्ट डायरेक्टर नितिन देसाई को इसका श्रेय जाएगा। यूनिक सेट बना। कारीगरों ने बारीकी से काम किया है। सबसे अच्छी बात यह रही कि कैमरे से शूटिंग करने पर आइना चमका नहीं।


Thursday, November 12, 2015

फिल्‍म समीक्षा : प्रेम रतन धन पायो



-अजय ब्रह्मात्‍मज
    प्रेम रतन धन पायो सूरज बड़जात्‍या की रची दुनिया की फिल्‍म है। इस दुनिया में सब कुछ सुंदर,सारे लोग सुशील और स्थितियां सरल हैं। एक फिल्‍मी लोक है,जिसमें राजाओं की दुनिया है। उनके रीति-रिवाज हैं। परंपराओं का पालन है। राजसी ठाट-बाट के बीच अहंकार और स्‍वार्थ के कारण हो चुकी बांट है। कोई नाराज है तो कोई आहत है। एक परिवार है,जिसमें सिर्फ भाई-बहन बचे हैं और बची हैं उनके बीच की गलतफहमियां। इसी दुनिया में कुछ साधारण लोग भी हैं। उनमें प्रेम दिलवाला और कन्‍हैया सरीखे सीधे-सादे व्‍यक्ति हैं। उनके मेलजोल से एक नया संसार बसता है,जिसमें विशेष और साधारण घुलमिल जाते हैं। सब अविश्‍वसनीय है,लेकिन उसे सूरज बड़जात्‍सा भावनाओं के वर्क में लपेट कर यों पेश करते हैं कि कुछ मिनटों के असमंजस के बाद यह सहज और स्‍वाभाविक लगने लगता है।
    सूरज बड़जात्‍या ने अपनी सोच और अप्रोच का मूल स्‍वभाव नहीं बदला है। हां,उन्‍होंने अपने किरदारों और उनकी भाषा को माडर्न स्‍वर दिया है। वे पुरानी फिल्‍मों की तरह एलियन हिंदी बोलते नजर नहीं आते। हालांकि शुरू में भाषा(हिंग्लिश) की यह आधुनिकता खटकती है। सूरज बड़जात्‍या दर्शकों को आकर्षित करने के बाद सहज रूप में अपनी दुनिया में लौट आते हैं। फिल्‍म का परिवेश,भाषा,वेशभूषा और साज-सज्‍जा रजवाड़ों की भव्‍यता ले आती है। तब तक दर्शक भी रम जाते हैं। वे प्रेम के साथ राजसी परिवेश में खुद को एडजस्‍ट कर लेते हैं। सूरज बड़जात्‍या के इस हुनरमंद शिल्‍प में रोचकता है। याद नहीं रहता कि हम ने कुछ समय पहले सलमान खान की दबंग,बॉडीगार्ड और किक जैसी फिल्‍में देखी थीं। सूरज बड़जात्‍या बहुत खूबसूरती से सलमान को प्रेम में ढाल देते हैं।
    प्रेम रतन धन पायो का रूपविधान का आधार रामायण है। फिल्‍म की कथाभूमि भी अयोध्‍या के आसपास की है। रामलीला का रसिक प्रेम राजकुमारी मैथिली के सामाजिक कार्यो से प्रभावित है। वह उनके रूप का भी प्रशंसक है। वह उनके उपहार फाउंडेशन के लिए चंदा एकत्रित करता है। वह चंदा देने और मैथिली से मिलने अपने दोस्‍त कन्‍हैया के साथ निकलता है। घटनाएं कुछ यों घटती हैं कि उसे नई भूमिका निभानी पड़ती है। अपनी प्रिय राजकुमारी के लिए वह नई भूमिका के लिए तैयार हो जाता है। हम देखते हैं कि वह साधारण जन के कॉमन सेंस से राज परिवार की जटिलताओं को सुलझा देता है। वह उनके बीच मौजूद गांठों को खोल देता है। वह उन्‍हें उनके अहंकार और स्‍वार्थ से मुक्‍त करता है। कहीं न कहीं यह संदेश जाहिर होता है कि साधारण जिंदगी जी रहे लोग प्रेम और रिश्‍तों के मामले में राजाओं यानी अमीरों से अधिक सीधे और सरल होते हैं।
    प्रेम रतन धन पायो का सेट कहानी की कल्‍पना के मुताबिक भव्‍य और आकर्षक है। सूरज बड़जात्‍या अपने साधारण किरदारों को भी आलीशान परिवेश देते हैं। उनकी धारणा है कि फिल्‍म देखने आए दर्शकों को नयनाभिरामी सेट दिखें। लोकेशन की भव्‍यता उन्‍हें चकित करे। इस फिल्‍म का राजप्रासाद और उसकी साज-सज्‍जा में भव्‍यता झलकती है। रियल सिनेमा के शौकीनों को थोड़ी दिक्‍कत हो सकती है,लेकिन हिंदी सिनेमा में मनोरंजन का यह एक प्रकार है,जिसे अधिकांश भारतीय पसंद करते हैं। सूरज बड़जात्‍या की फिल्‍मों में नकारात्‍मकता नहीं रहती। इस फिल्‍म में उन्‍होंने चंद्रिका के रूप में एक नाराज किरदार रखा है। राजसी परिवार से जुड़ी होने के बावजूद वह सामान्‍य जिंदगी पसंद करती है,लेकिन अपना हक नहीं छोड़ना चाहती। सूरज बड़जात्‍या अपनी फिल्‍म में पहली बार समाज के दो वर्गों के किरदारों को साथ लाने और सामान्‍य से विशेष को प्रभावित होते दिखाते हैं। यह कहीं न कहीं उस यथार्थ का बोध भी है,जो वर्तमान परिवेश और माडर्निटी का असर है।
    हिंदी फिल्‍मों में सिर्फ मूंछें रखने और न रखने से पहचान बदल जाती है। इस फिल्‍म के अनेक दृश्‍यों में कार्य-कारण खोजने पर निराशा हो सकती है। तर्क का अभाव दिख सकता है,लेकिन ऐसी फिल्‍में तर्कातीत होती हैं। प्रेम रतन धन पायो सूरज बड़जात्‍या की फंतासी है। सलमान खान प्रेम और विजय सिंह की दोहरी भूमिकाओं में हैं। उन्‍होंने दोनों किरदारों में स्क्रिप्‍ट की जरूरत के मुताबिक एकरूपता रखी है। हां,जब प्रेम अपने मूल स्‍वभाव में रहता है तो अधिक खिलंदड़ा नजर आता है। सोनम कपूर की मौजूदगी सौंदर्य और गरिमा से भरपूर होती है। भावों और अभिव्‍यक्ति की सीमा में भी वह गरिमापूर्ण दिखती हैं। सूरज बड़जात्‍या ने उनकी इस छवि का बखूबी इस्‍तेमाल किया है। नील नितिन मुकेश के किरदार को अधिक स्‍पेस नहीं मिल सका है। स्‍वरा भास्‍कर अपने किरदार को संजीदगी से निभा ले जाती हैं। उनका आक्रोश वाजिब लगता है। अनुपम खेर लंबे समय के बाद अपने किरदार में संयमित दिखे हैं।
    गीत-संगीत फिल्‍म में दृश्‍यों और किरदारों के अनुरूप है। दो गानों अधिक हो गए हैं। उनके बगैर भी फिल्‍म ऐसी ही रहती। इस बार अंताक्षरी तो नहीं है,लेकिन उसकी भरपाई के लिए फुटबॉल मैच है।
अवधि- 174 मिनट
स्‍टार- साढ़े तीन स्‍टार  

परिपक्‍व हुआ प्रेम - सलमान खान

-अजय ब्रह्मात्‍मज
सूरज बड़जात्‍या और सलमान खान का एक साथ आना हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री की बड़ी खबर है। सलमान खान को सुरज बड़जात्‍या की फिल्‍म मैंने प्‍यार किया से ही ख्‍याति मिली थी। उनकी  फिल्‍म हम आपके हैं कौन में भी सलमान खान थे,जो पांच सालों तक सिनेमाघरों में टिकी रही। फिर हम साथ साथ हैं में दोनों साथ आए। उसके बाद एक लंबा अंतराल रहा। सूरज बड़जात्‍या अपनी कंपनी को मजबूत करने में लगे रहे और सलमान खान मसाल फिल्‍मों में अपनी मौजूदगी मजबूत करते रहे। दो साल पहले खबर आई कि सूरज बड़जात्‍या और सलमान खान साथ काम करेंगे? इस खबर से सभी चौंके,क्‍योंकि ऐसा लग रहा था कि इस बीच सलमान खान की लोकप्रियता का कद विशाल हो गया है। क्‍या वे सूरज बड़जात्‍या की सीधी-सादी पारिवारिक कहानी में जंचेंगे। कुछ तो यह भी मान रहे थे कि दोनों की निभेगी नहीं और यह फिल्‍म पूरी नहीं हो पाएगी। फिल्‍म में समय लगा। बीच में व्‍यवधान भी आए। प्रशंसकों की सांसें अटकीं। बाजार और ट्रेड के पंडित भी अनिश्चित रहे। लेकिन अब सब क्‍लीयर हो चुका है। पिछले कुछ समय से सलमान खान प्रेम रतन धन पायो का धुआंधार प्रचार कर रहे हैं। मुंबई के महबूब स्‍टूडियो को उन्‍होंने अड्डा बना रख है। सलमान की छवि तुनकमिजाज और अधीर व्‍यक्ति की है। किंतु वह एक दृष्टिकोण है। यहां वे पूरे संयम और शालीनता के साथ मीडिया और प्रशंसकों से घुलते-मिलते नजर आए। सलमान कहीं भी रहें,कुछ भी कर रहे हों,उन्‍हें देखने और उनसे मिलने वालों की भीड़ आ ही जाती है।सलमान उन्‍हें निराश नहीं करते। अपनी व्‍यस्‍तता के बीच उनके लिए मुस्‍कराते हैं। सेल्‍फी और तस्‍वीरें खिंचवाते हैं। सलमान मिश्री की डली की तरह हैं,वे जहां रहते हैं वहां उनके प्रशंसक चींटियों की तरह आ जाते हैं।
    इस बातचीत में सलमान खान से नियमित सवाल नहीं किए गए और न उन्‍होंने किसी खास फ्रेम में बात की। जागरण के लिए उन्‍की इस अबाध बातचीत में एक अलग किस्‍म का प्रवाह मिलेगा। हम-आप उनकी सरलता से परिचित होंगे। निस्‍संदेह सलमान खान अपनी पीढ़ी के सुपरस्‍टार हैं। उनकी पिछली फिल्‍मों ने एक दबंग छवि भी विकसित की है,जिसे बजरंगी भाईजान ने कुछ नरम किया। उनकी यह नरमी प्रेम रतन धन पायो में और कोमल हो गई है।
सलमान खान के शब्‍दों में....
सूरज और मैं
       मेरे लिए सूरज बड़जात्‍या की इस फिल्‍म का आना खास है। सूरज की फिल्‍मों में लोगों का विश्‍वास है। उनके प्रति दर्शकों की श्रद्धा है। उन्‍होंने 19 साल की उम्र में उन्‍होंने मैंने प्‍यार किया जैसी रोमांटिक फिल्‍म बनाई। उसमें न तो किसिंग सीन था और न कोई वल्‍गैरिटी थी। कोई एक्‍सपोजर भी नहीं था। 24 साल की उम्र में उनकी हम आपक हैं कौन रिलीज हुई। अभी सोच कर देंखें कि क्‍या 24 साल का लड़का वैसी फिल्‍म लिख सकता है ? ‘मैंने प्‍यार किया के बाद उसी टाइप की फिल्‍म आनी चाहिए थी। 22 साल की उम्र में उन्‍होंने लिखी होगी और 24 की उम्र में फिल्‍म पूरी की। उस वक्‍त हम आके हैं कौन की स्क्रिप्‍ट सुनने के बाद मुझे कॉम्‍प्‍लेक्‍स हो गया था। तब हम बागी सोच रहे थे। और इस आदमी का कैसा ग्रोथ हुआ कि छलांग लगा रहा है। परिवार के बारे में यह कितना जानता है ? यह मुमकिन नहीं था। यहं ऊंची आत्‍माओं के साथ ही हो सकता है। उसके बाद हम साथ साथ हैं आई। तब मैंने कहा था कि यह फिल्‍म हम आपके हैं कौन से हर मामले में आगे है। एक ही समस्‍या है कि हम आपके हैं कौन के पांच साल चलने के बाद छठे साल में यह फिल्‍म आ रही है। लोगों को ऐसा लगेगा कि यह उसी का विस्‍तार है। अगर यह हम आपके हैं कौन के पहले आ जाती तो सिनेमाघ्‍रों से उतरती ही नहीं। उसके बाद उन्‍हें मेरे लिए इस टाइप की फिल्‍म नहीं मिली। मैंने मैं प्रेम की दीवानी हूं और विवाह की स्क्रिप्‍ट सुनी थी। मैं पहला व्‍यक्ति था। तब हमें लगा कि हमें इन फिल्‍मों में साथ नहीं आना चाहिए।

गैप की वजह
    हम दोनों को मनमाफिक स्क्रिप्‍ट नहीं मिल पा रही थी। सूरज बामू के पास तब इस फिल्‍म का आयडिया भर था। सात-असठ साल पहले उन्‍होंने इस पर काम करना शुरू किया। मुझे सुनाया और बताया। कहानी आखिरकार पक्‍की हुई तो उन्‍होंने डेढ़ साल में इसकी रायटिंग की तो मैंने सेकेंड भर में हां कह दिया। हां कहने के बाद मैं किक और जरंगी भाईजान में व्‍यस्‍त हो गया। उन फिल्‍मों से खाली होने के बाद लौटा और आज यह फिल्‍म पूरी हो गई। दोनों ने धैर्य रखा। मुझ से ज्‍यादा सूरज बाबू ने धैर्य बनाए रखा।
घरेलू और पारिवारिक
    सूरज बाबू की फिल्‍मों में भारतीय घर और परिचार की सही तस्‍वीर आती है। घर और संयुक्‍त परिवार के माहौल को वे अच्‍छी तरह समझते हैं।पारिवारिक मूल्‍य फिल्‍म के दृश्‍यों में घुल कर आते हैं। संवादों में हर घर की बातचीत रहती है। मैंने महसूस किया है कि ऐसे संवाद तो मेरी मां,डैड और भाई बोलते हैं। सूरज बाबू भी बताते हैं कि उनकी चाची या किसी और रिश्‍तेदार ने कभी ऐसी बात कही थी। हम अपन फिल्‍मों में सुनी और देखी निगेटिव बातों को भी पॉजीटिव कर देते हैं। हमारा हर रेफरेंस परिवारों से आता है। सूरज बाबू में इतनी सच्‍चाई और मासूमियत है कि वे कोई भी कहानी गढ़ सकते हैं। आप उनकी फिल्‍म कभी भी देख सकते हैं। इन्‍होंने सेक्‍स और वल्‍गैरिटी का कभी इस्‍तेमाल नहीं किया,जबकि देश के बड़े से बड़े डायरेक्‍टर इनसे बच नहीं पाए। उनकी हीरोइन की एक डिग्निटी रहती है। सेट और स्‍क्रीन पर वह डिग्निटी दिखती है। सूरज बाबू के हीरो हीरोइन की सूरत से नहीं,सीरत से प्‍यार करते हैं। उनकी हीरोइनों को रियल लाइफ में भी देखेंगे तो एक स्‍माइल आता है। इनकी फिल्‍मों में नॉटी रोमांस रहता है। जैसे कि गुलेल मारना....इनकी फिल्‍में अच्‍छा बनने को विवश करती हैं। कम से कम इच्‍छाई का एहसास तो भर ही देती हैं।

सूरज बाबू
    सूरज और मैं एक ही उम्र के हैं। मैं उन्‍हें सूरज बाू बुलाता हूं। मैंने ही उनका यह नाम रखा। उसका भी एक किस्‍सा है। मैंने प्‍यार किया के आउटडोर के समय मैंने उन्‍हें इस नाम से बुलाना शुरू किया। मुझे मालूम था कि ये क्‍या बना रहे हैं ? उनके सच,साहस और स्प्रिचुअल लेवल की मुझे जानकारी थी। मुझे एहसास हो गया था कि मैंने प्‍यार किया के बाद वे बड़े नाम हो जाएंगे। उस वक्‍त उनके सारे असिस्‍टैंट उनसे काफी बड़े थे। वे सभी उन्‍हें सूरज,सूरज,सूरज कह कर बुलाते थे। वे तू-तड़ाक करते थे। मुझे यह बुरा लगता था। मुझ से बर्दाश्‍त नहीं होता था। मैंने उन्‍हें सूरज बाबू बुलाना शुरू किया। फिर तो दो दिनों के अंदर वे सभी के सूरज बाबू हो गए। अब सोहेल और अरबाज मुझे सलमान भाई बुलाते थे,इसलिए वे मुझे सलमान भाई पुकारने लगे। इस तरह हम भाई और बाबू हो गए।

सेट पर हम दोनों
    मैं देर से सोता हूं और थोड़ी देर से जागता हूं। सूरज बाबू जल्‍दी सोते और जल्‍दी जागते हैं। सेट पर यही रुटीन रहता था कि वे आकर मुझे जगाते थे। वे सीन सुनाते थे। उस दिन के सीन के आगे-पीछे के भी सीन सुनाते थे कि मैं सही रेफरेंस समझ सकूं। बस बातचीत के दरम्‍यान शॉट लग जाता था। मैं तैयार होकर सेट पर आता था और शॉट देता था। सूरज बाबू का काम पक्‍का होता है। शूट पर जाने के पहले दिन से पहले ही सब ठोक-बजा कर वे परफेक्‍ट कर देते हैं। सिर्फ लाइटिंग में जो समय लगे। शॉट बताने,समझाने और लेने में कोई समय नहीं लगता था। हमलोंग तो सेट पर हंसी-मजाक भी करते हैं। तफरीह भी करते हैं। यह आदमी सुबह से शाम तक वहां से हटता नहीं है। बैठते भी नहीं थे। या तो खड़े हैं या टहल रहे हैं। मैं दूर से देख कर हाथ से कोई इशारा कता थ तो वहीं से थम्‍स अप साइन देकर हौसला देते थे। बाकी डायरेक्‍टर के यहां इतनी तैयारी नहीं रहती तो मुझे बताना और समझाना पड़ता है,जिसे लोग मेरा इंटरफेरेंस कहते हैं।

मतभेद नही रहता
    कभी-कभी मैं पूछता हूं कि सूरज बाबू लाइल बदल दूं। वे पूछते हैं। लाइन पसंद अा गई तो हां कह देते हैं। नहीं तो कहते हैं कि लाइन तो यही रहेगी। मैं तो अपनी लाइन सिर्फ वहीं देख रहा हूं,जबकि वे उसके आगे-पीछे के रेफरेंस भी जाते हैं। हमारी यही कोशिश रहती है कि एक ही पेज पर रहें। कभी एकाध शब्‍द बदल दिए सुविधा के लिए तो वे मान लेते हैं।

फिल्‍म का भाव
    रोमांस और फैमिली। लड़कों को अक्ष्‍छी लड़कियां मिलें और लड़कियों को अच्‍छे लड़के मिलें1 सभी प्रेम बनना चाहें। अगर आप प्रेम बन गए तो आपकी लाइफ में आई लड़की की जिंदगी संवर जाएगी। और यह संदेश है कि लड़ने-झगड़ने से कया फायदा। साथ रहो और साथ जियो। अगर भाई-बहन या भाई-भाई के बीच प्रॉब्‍लम है तो उसे तुरंत सुलझाना चाहिए। झगड़ने के दिन ही नहीं सुलझाया जाए तो गात पेंचीदा और गहरी हो जाती है। मामला खींच जाता है। फिर एक-दूसरे पर दोष और आरोप लगने लगते हैं। अरे यार...फोन उठाओ और बात कर लो ना। एक सेकेंड में जो बात सुलझााई जा सकती है,उसे लोग जिंदगी भर उलझाए रखते हैं। इस फिल्‍म में भी फैमिली और रिश्‍ते पर जोर दिया गया है। यह हम सभी के घर की कानी है। घर के इमोशन पूरी दुनिया में एक जैसे हैं। हम त्‍योहार क्‍यों मनाते हैं ? एक साथ रहने,खाने और मिलने के लिए।
स्‍वरा और नील नितिन
    मैंने स्‍वरा की कोई फिल्‍म नहीं देखी है। मैंने उसे यहीं काम करते देखा है। जबान साफ होना... किसी के भी परफारमेंस में इसका बड़ा रोल होता है। उसकी जबान साफ है। उसका अमोश करेक्‍ट रहता है। सीन की अंडरस्‍टैंडिंग गजब की रहती है और वह उसे पर्सनल टच देती है। वह परफार्म नहीं करती है। वह अपनी जिंदगी से ले आती है। वह कैलकुलेट नहीं करती। नील बहुत ही अच्‍छा लड़का है। वह सुलझा हुआ लड़का है। पता नहीं क्‍यों वह लो फेज में है। लो फेज में होने के बावजूद उसने अपना खयाल रखा है। वह सज्‍जन परिवार का लड़का है। उसके काम में ईमानदारी झलकती है।

मैसेज नण्‍ कलाकारों के लिए
जरूरी है कि आप में टैलेंट हो,लेकिन उसके साथ ही हार्ड वर्किंग भी होनी चाहिए। हसर्ड वर्क से नोटैलेंट को टैलेंट में बदला जा सकता है। लोग मुझे कहते हैं कि इम्‍प्रूव हो गया। ओ भैया,अब नहीं होंगे तो कब होंगे। किसी भी काम में 2000 घंटे लगा दो तो एक्‍सपर्ट तो हो ही जाओगे। हम ने तो न जाने कितने हजार डाले हैं।