Search This Blog

Friday, October 30, 2015

फिल्‍म समीक्षा : तितली



रियल सिनेमा में रियल लोग
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पहले ही बता दूं कि तितली देखते हुए मितली आ सकती है।
     नियमित तौर पर आ रही हिंदी फिल्‍मों ने हमें रंग,खूबसूरती,सुदर लोकेशन,आकर्षक चेहरों और सुगम कहानी का ऐसा आदी बना दिया है कि अगर पर्दे पर यथार्थ की झलक भी दिखे तो सहज प्रतिक्रिया होती है कि ये क्‍या है ? सचमुच सिनेमा का मतलब मनोरंजन से अधिक सुकून और उत्‍तेजना हो गया है। अगर कोई फिल्‍म हमें अपने आसपास की सच्‍चाइयां दिखा कर झकझोर देती हैं तो हम असहज हो जाते हैं।तितली कोई रासहत नहीं देती। पूरी फिल्‍म में सांसत बनी रहती है कि विक्रम,बावला और तितली अपनी स्थितियों से उबर क्‍यों नहीं जाते ?
          जिंदगी इतनी कठोर है कि जीने की ललक में आदमी घिनौना भी होता चला जाता है। तीनों भाइयों की जिंदगी से अधिक नारकीय क्‍या हो सकता है ? अपने स्‍वर्थ के लिए किसी का खून बहा देना उनके लिए साधारण सी बात है। जिंदगी की जरूरतों ने उन्‍हें नीच हरकतों के लिए मजबूर कर दिया है। पाने की कोशिश में जिंदगी उनके हाथ से फिसलती जाती है। वे इस कदर नीच हैं कि हमें उनसे अधिक सहानुभूति भी नहीं होती। अपनी आरामतलब जिंदगी में पर्दे पर किरदारों के रूप में उनकी मौजूदगी भी हमें डिस्‍टर्ब करती है। हमें कनु बहल का प्रयास अच्‍छा नहीं लगता। उबकाई आती है कि अरे भाई बस भी करो। क्‍या कोई इतना क्रूर भी हो सकता है कि अपनी ब्‍याहता को आर्थिक लाभ के लिए शारीरिक जख्‍म दे। और बीवी भी कैसी है कि तैयार हो जात है। अपना हाथ आगे बढ़ा देती है कि लो मेरा हाथ,सुन्‍न करो और तोड़ दो।
    कनु बहल की तितली कई स्‍तरों पर एक साथ प्रभावित करती है। कनु ने अपनी कहानी के लिए जो यथार्थवादी शिल्‍प चुना है। वे जैसा है वैसा आज और समाज प्रस्‍तुत करते हें। फिल्‍म के सभी प्रमुख किरदारों को उन्‍होंने वास्‍तविक रंग दिया है। उन्‍होंने अपने किरदारों के लिए उपयुक्‍त चेहरों के एक्‍टर चुने हें। चूंकि हम उन्‍हें पहले से नहीं जानते,इसलिए उनकी प्रतिक्रियाएं कहानी के अनुसार स्‍वाभाविक लगती हैं। फिल्‍म में रणवीर शौरी ही परिचित चेहरा है। उन्‍होंने विक्रम की व्‍याकुलता को प्रभावपूर्ण अभिव्‍यक्ति दी है। रणवीर शौरी अपनी पीढ़ी के उम्‍दा अभिनेता है,जो छोटी भूमिकाओं में सिमट कर रह गए हैं। कनु की तरह अन्‍य निर्देशकों को भ उनका सही उपयोग करना चाहिए। नीलू के किरदार में आई शिवानी रघुवंशी भी अपनी सहजता से प्रभावित करती हैं।
    फिल्‍म आरंभ से ही अपने दृश्‍यों और ध्‍वनि के तालमेल से बांध लेती है। यों लगता है कि हम खुद उन किरदारों के बीच हैं और उन्‍हें देख-सुन रहे हैं। साउंड डिजायन उत्‍तम और असरकारी है। फिल्‍म का मटमैला रंग भी किरदारों और उनकी स्थितियों से मेल खाता है। कनु बहल अपनी पहली फिल्‍म में खतरों से वाकिफ नहीं हैं,इसलिए मौलिक,ईमानदार और सरल हैं। उन्‍होंने दर्शकों को खुश रखने या करने की कोई कोशिश नहीं की है। दिबाकर बनर्जी की खोसला का घोसला की तरह कनु बहल की तितली में भी दिल्‍ली अपनी वास्‍तविकता के साथ नजर आई है।
    फिल्‍म के लेखक शरत कटारिया और कनु बहल अलग से बधाई के पात्र हैं। उन्‍होंने दृश्‍यों और संवादों को फिल्‍म की थीम के अनुरूप रखा है। सबसे अच्‍छी बात है कि वे कहीं भी बहके नहीं हैं। उन्‍होंने संवेदना और सपने को भी धड़कन दी है। उन्‍हें परिस्थिति की कठोरता से चकनाचूर नहीं होने दिया है।तितली एक उम्‍मीद है कि अभी सब कुछ नष्‍ट नहीं हुआ है।
    ऐसी फिल्‍म के निर्माण के लिए दिबाकर बनर्जी और समर्थन के लिए यशराज फिल्‍म्‍स को भी बधाई। यह मेलजोल आगे भी बनी रहे।
अवधि- 117 मिनट
स्‍टार- चार स्‍टार

Thursday, October 29, 2015

दरअसल - फिर से पाकिस्‍तानी कलाकारों का विरोध


-अजय ब्रह्मात्‍मज
पहले गुलाम अली के गायन पर पाबंदी लगी। महाराष्‍ट्र में सक्रिय शिसेना के नुमाइंदों ने गुलाम अली के कार्यक्रम पर आपत्ति की तो आयोजकों ने तत्‍काल कार्यक्रम ही रद्द कर दिया। हालांकि महाराष्‍ट्र के मुख्‍य मंत्री पे सुरक्षा का आश्‍वासन दिया,लेकिन उस आश्‍वासन में ऐसा भरोसा नहीं था कि गुलाम अली मुंबई में गा सकें। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। पहले भी शिवसेना के कार्यकर्ता इसी तरह के हुड़दंग करते रहे हैं। उन्‍होंने पहले भीद पाकिस्‍तानी कलाकारों के खिलाफ बयान दिए हैं। कई बा उनका विरोध आक्रामक और हिंसक भी हुआ है। पाकिस्‍तानी कलाकारों के वर्त्‍तमान विरोध का खास पहरप्रेक्ष्‍य है। इस बार तो केंद्र और राज्‍य में भाजपा की सरकार है। रात्ज्‍य में शिवसेना का उसे सकर्थन भी प्राप्‍त है। न केवल कलाकार, क्रिकेटरों का भी विरोध हो रहा है। उसके पहले एक  राजनयिक के पुस्‍तक विमोचन के अवसर पर तो सुधींद्र कुलकर्णी का मुंह भी काला किया गया।
एक तर्क दिया जाता है कि पाकिस्‍तान से आतंकवादी गतिविधियां चलती रहती हैं और बोर्डर पर हमेशा दोनों देशों के बीच कलह रहती है,जिसमें पाकिस्‍तान ही शुरुआत करता है। आजादी और बंटवारे के बाद से भारत और पाकिस्‍तान के रिश्‍ते कभी भी लंबे समय तक नॉर्मल नहीं रहे। हमेशा एक तनाव कायम रहता है। सांस्‍कृतिक मेलजोल और नागरिकों के मेल-मिलाप से रिश्‍ता नरम और दोस्‍ती का बन रहा होता है कि सीमा पर गोलियां चलती हैं और दोनों देश लहूलुहान हो जाते हैं। आशंका और अनि‍श्चितता बढ़ जाती है। सालों की मेहनत फिर से खटाई में पड़ जाती है। रिश्‍तों की मजबूती फिर से ढीली पड़ती है। फिरकापरस्‍त कामयाब होते हैं। गौर करें तो दोनों देशों के नागरिक साझा संस्‍कृति की वजह से एका महसूस करते हैं। विदेशों में भारतीय और पाकिसनियों की दोस्‍ती देखते ही बनती है,लेकिन अपने मुल्‍कों में लौटते ही वैमनस्‍य और संदेह बढ़ने लगता है। जरूरत है कि दोनों देशों में समझदारी और मेलजोल बढ़े।
        हिंदी सिनेमा के संदर्भ में दोनों देशों के साहर्य का इतिहास देखें तो रोचक तथ्‍य मिलेंगे। देश की आजादी से हिंदी सिनेमा में फिल्‍म निर्माण के तीन मुख्‍य केंद्र थे- कोलकाता,लाहौर और मुंबई। कोलकाता में छिटपुट रूप से ही हिंदी इफिल्‍मों का निर्माण होता रहा। लाहौर और मुंबई ही ज्‍यादार कलाकार और फिल्‍म कंपनियां थीं। आजादी के पहले मुंबई और लाहौर के बीच सीधा संबंध था। गौरतलब है कि राजीनीति का केंद्र दिल्‍ली रही,लेकिन सांस्‍कृतिक राजधानी लाहौर ही रहा। आजादी के पहले उत्‍तर भारत में सिनेमाई गतिविधियां लाहौर में ही सिमटी रहीं। आजादी और बंटवारे के बाद लाहौर से अनेक प्रतिभाओं ने मुंबई को अपना ठिकाना बनाया। सच्‍चाई है कि धर्म की वजह से अनेक फिल्‍मकारों और कलाकारों को मुंबई का रुख करना पड़ा और मुटो समेत अनेक मुसलमान कलाकारो,लेखकों और तकनीशियनों ने लाहौर का रास्‍ता देखा। सुरक्षा और करिअर के लिए गए इन फैसलों पर कभी अध्‍ययन नहीं किया गया।
    अगर पाकिस्‍तानी संबंध को हिंदी सिनेमा से अलगाया जाएगा तो हिंदी सिनेमा के इतिहास का एक तिहाई से ज्‍यादा हिस्‍सा हमें काटना या छोड़ना पड़ेगा। हिंदी सिनेमा की पहली लोकप्रिय त्रयी दिलीप कुमार,देव आनंद और राज कपूर का रिश्‍ता पाकिस्‍तान से रहा है। अनके लेखक,संगीतकार और कलाकारों ने लाहौर में रहते हुए काम किया और बंटवारे के बाद वे भारत आ गए। हिंदी सिनेमा के विकास में उन सभी के योगदान को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। हम सभी जानते हें कि आजादी के बाद मुंबई में हिंदी सिनेमा का तेजी से विकास हुआ। पाकिस्‍तान में सिनेमा ने वैसी प्रगति नहीं की। भाषा और संस्‍कृति की समानता की वजह से दोनों देशों में सिनेमा के दर्शक हिंदी फिल्‍में पसंद करते हें। पाकिस्‍तानी कलाकर संभावनाओं और एक्‍सपोजर के लिए भारत आते रहे हें। उन प्रतिभाओं को भारत में सराहा भी गया है। आज भी यह सिलसिला जारी है।
    दरअसल,हमें अधिक उदारता बरतनी होगी। इस तर्क में अधिक दम नहीं है कि पाकिस्‍तान में भारतीय कलाकारों का मौके नहीं मिलते। पाकिस्‍तान का मनोरंजन उद्योग इस स्थिति में नहीं है कि वह भारतीय प्रतिभाओं को खपा सके। हां,हम पाकिस्‍तानी प्रतिभाओं को अवसर दे सकते हें। और यह कहना बेमानी है कि कलाकार और क्रिकेटर भी अतंकवादी होते हैं या उसी मानसिकता के होते हें।
    

‘दिलवाले’ में वरुण धवन


-अजय ब्रह्मात्‍मज
       इस साल 18 दिसंबर को रिलीज हो रही दिलवाले वरुण धवन की 2015 की तीसरी फिल्‍म होगी। इस साल फरवरी में उनकी बदलापुर और जून में एबीसीडी 2 रिलीज हो चुकी हैं। दिलवाले उनकी छठी फिल्‍म होगी। स्‍टूडेंट ऑफ द ईयर के तीन कलाकारों में वरूण धवन बाकी दोनों आलिया भट्ट और सिद्ार्थ मल्‍होत्रा से एक फिल्‍म आगे हो जाएंगे। अभी तीनों पांच-पांच फिल्‍मों से संख्‍या में बराबर हैं,लेकिन कामयाबी के लिहाज से वरुण धवन अधिक भरोसेमंद अभिनेता के तौर पर उभरे हैं।
    वरुण धवन फिलहाल हैदराबाद में रोहित शेट्टी की फिल्‍म दिलवाले की शूटिंग कर रहे हैं। इस फिल्‍म में वे शाह रुख खान के छोटे भाई बने हैं। उनके साथ कृति सैनन हैं। इन दिनों दोनों के बीच खूब छन रही है। पिछले साठ दिनों से तो वे हैदराबाद में ही हैं। आउटडोर में ऐसी नजदीकी होना स्‍वाभाविक है। यह फिल्‍म के लिए भी अच्‍छा रहता है, क्‍योंकि पर्दे पर कंफर्ट और केमिस्‍ट्री दिखाई पड़ती है। हैदराबाद में फिल्‍म के फुटेज देखने को मिले,उसमें दोनों के बीच के तालमेल से भी यह जाहिर हुआ।
    कृति सैनन और वरुण धवन की जोड़ी में एक ही समस्‍या रही। कृति थोड़ी लंबी हैं। उनके साथ के दृश्‍यों में वरुण धवन के लिए पाटला लगाया जाता था। पाटला मचिया या स्‍टूल की तरह का एक फर्नीचर होता है। शूटिंग में इसके अनेक उपयोगों में से एक उपयोग कलाकारों का कद बढ़ाना भी है। अब अगर दिलवाले में कद में छोटे वरुण धवन अगर कृति से लंगे या बराबर दिखें तो याद कर लीजिएगा कि उनके पांव के नीचे पाटला होगा। अस फिल्‍म के शाह रुख खान और काजोल भी लंबाई में कृति से छोटे हैं। वे भी कृति के साथ के दृश्‍यों में सावधान रहे। वैसे,फिल्‍म में कृति के लिए लंबी लड़की संबोधन का इस्‍तेमाल किया गया है।
    वरुण धवन इस फिल्‍म में शाह रुख खान के बेवकूफ छोटे भाई हैं,जिनकी वजह से मुसीबत आती रहती है। दिलवाले में वरुण धवन के दोस्‍त बने हैं वरुण शर्मा। सेट पर सब उन्‍हें चू चा ही कहते हैं। दोनों की दोस्‍ती उस जमाने की फिल्‍मों की याद दिलाएगी,जब हीरो के साथ एक कॉमेडियन चिपका रहता था। उसकी वजह से फिल्‍म में पैरेलल कॉमेडी ट्रैक चलता रहता था। वरुण धवन को अपने हमउम्र वरुण शर्मा के साथ सीन करने में इसलिए भी मजा आया कि दोनों ने मिल कर सीन इम्‍प्रूवाइज करते थे। रोहित ने उन्‍हें कभी-कभी खुली छूट दी। वरुण मानते हैं कि वरुण शर्मा और कृति सैनन ने रियल लाइफ एक्‍सपीरिएंस से फिल्‍म को एनरिच किया है। वे बेहिचक स्‍वीकार करते हें कि मुंबई में फिल्‍म इंडस्‍ट्री की परवरिश की वजह से रियल लाइफ का उनका एक्‍सपोजर कम है।
    वरुण धवन दिलवाले में शाह रुख के साथ काम कर बेहद खुश हैं। वे इसे किसी अचीवमेंट से कम नहीं मानते। वे कहते हें, फिल्‍म आने पर दर्शक खुद ही देख लेंगे। मेरे लिए तो इस फिल्‍म की शूटिंग ही यादगार एक्‍सपीरिएंस रही। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा। सबसे बड़ी सीख्‍ तो यह रही कि आप जिस सेट या लोकेशन पर शूट कर रहे हें,उसे अच्‍छी तर‍ह फील करें। उसे महसूस करें। उसकी मौजूदगी को अपने अंदर उतार लें। मेरे खयाल में इस से सेट और लोकेशन से रिश्‍ता बन जाता है। मैंने देखा है कि शाह रुख खान बगैर बताए हुए शूट से पहले अपने सेट पर घूमते हैं। एक-एक चीज को छूते हैं। इस स्‍पर्श से उनसे आत्‍मीय रिश्‍ता बन जाता है। मुझे लगता है कि इस प्रक्रिया में सेट की सही जानकारी भी मिल जाती है। स्‍पेस के साथ यह भी पता चल जाता है कि कौन सी चीज कैसी है ? अब अगर दीवार ईंट की है तो आप उस पर झटके के साथ टिक सकते हैं। वही दीचार प्‍लायवुड की है तो अलग ढंग से भार डालना होगा।
    वरुण धवन को दिलवाले में रोहित शेट्टी के निर्देशन में एक्‍शन और कॉमेडी के नए गुर मिले।
   
     

Friday, October 23, 2015

दरअसल : गाने सुनें और पढें भी



-अजय ब्रह्मात्‍मज
    पिछले से पिछले रविवार को मैं लखनऊ में था। दैनिक जागरण ने अभिव्‍यक्ति की विधाओं पर संवादी कार्यक्रम का आयेजन किया था। इस के एक सत्र में चर्चित गीतकार इरशाद कामिल गए थे। वहां मैंने उनसे बातचीत की। इस बातजीत में लखनऊ के श्रोताओं ने शिरकत की और सवाल भी पूछे। बातचीत मुख्‍य रूप से इरशाद कामिल के गीतो और उनकी ताजा फिल्‍म तमाशा पर केंद्रित थी। फिर भी सवाल-जवाब में ऐसे अनेक पहलुओं पर बातें हुई,जो आज के फिल्‍मी गीत-संगीत से संबंधित हैं।
    एक पहलू तो यही था कि क्‍या फिल्‍मी गीतों को कभी साहित्‍य का दर्जा हासिल हो सकता है। इरशाद कामिल ने स्‍वयं अने गीतों की अनेक पंक्तियों से उदाहरण्‍ दिए और पूछा कि क्‍या इनमें काव्‍य के गुण नहीं हैं ? क्‍या सिर्फ फिल्‍मों में आने और किसी पाम्‍पुलर स्‍टार के गाने की वजह से उनकी महत्‍ता कम हो जाती है। यह सवाल लंदनवासी तेजेंन्‍द्र शर्मा भी शैलेन्‍द्र के संदर्भ में उठाते हैं। उन्‍होंने तो वृहद अध्‍ययन और संकलन से एक जोरदार प्रेजेंटेशन तैयार किया है। साहित्‍य के पहरूए या आलोचक फिल्‍मी गीतों को साहित्‍य में शामिल नहीं करते। उनके हिसाब से यह पॉपुलर कल्‍चर से संबंधित है। जो पॉपुलर है,वह भला क्‍लासिकल कैसे हो सकता है ? वक्‍त आ गया है कि हम सभी अपना नजरिया बदलें और खुले दिमाग से सोचें। बिल्‍कुल जरूरी नहीं है कि घटिया गीतों को साहित्‍य में शामिल करें। साहित्‍य में भी तो घटिया कविताओं का लेखन होता है,जो समय के साथ छंट जाते हैं।
    फिल्‍मी गीतों की साहित्यिक गुणवत्‍ता से अधिक यह मामला फिलमों के बारे में बनी समाज की धारणा है। हिंदी समाज अपने ही सिनेमा को लेकर उदार और सहिष्‍णु नहीं रहा। आज भी सिनेमा के अध्‍ययन,पत्रकारिता और शोध को सम्‍मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता। मान लिया गया है कि हिंदी सिनेमा में सब कुछ फूहड़ और अश्‍लील है। वहां काम करने वाले लोग अनैतिक और अमर्यादित होते हैं। हम सभी अपने एकांत में भले ही हिंदी फिल्‍मों के गीत गुनगुनाए या अकेले होने पर उन्‍हें सुनना चाहें,लेकिन सार्वजनिक तौर पर हम उनके प्रति तिरस्‍कार भाव रखते हैं।
    इरशाद कामिल ने जोर देकर कहा कि हम लोग फिल्‍मी गीतों में कोई भी बात हल्‍के तरीके से कहते है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हम हल्‍की बातें करते हैं। शुरू से फिल्‍मी गीतों ने अपने समय के समाज की भावनाओं को अभिव्‍यक्ति दी है। राष्‍ट्रीय भावना और मानवीय संवेदना की ऐसी अनूठी और सरल अभिव्‍यक्ति साहित्‍य में भी दुर्लभ है। संगीत के साथ आने के कारण ये गीत याद भी रहते है। हमारे मानस में बजते रहते हैं। ये गीत हमारी सांसकृतिक पहचान का हिस्‍सा हैं। इरशाद की बातों की सच्‍चाई मैंने स्‍वयं महसूस की है। विदेशों में जब हर तरफ से अपहिरचित ध्‍वनियां कानों में पड़ रही होती हैं। वैसे विकल माहौल में परिचित और प्रिय फिल्‍मी गीत गहरा सुकून देता है। हमें वहीं पंक्तियां याद रहती हैं,जो मर्मस्‍पर्शी होती हैं। हम अपनी पसंद के गीतों के साथ जीते हैं।
    गीतों में विजुअल और साउंड बढ़ने से उनका प्रतिगामी असर भी होता है। अव्‍वल तो सभी गीत एक बार ध्‍यान से सुनें और मुमकिन हों तो सुनने के साथ उन्‍हें पढ़ें। मेरा दावा है कि सुने हुए गीतों का भी असर नया और मानीखेज होगा। जागिंग करते हुए या चलते हुए या फिर टीवी पर उन्‍हें सितारों के मुंह से गाते हुए सुनने पर गीतों पर एकाग्रता नहीं रहती। गीतों के रसास्‍वादन के लिए जरूरी है कि हम गीतकार की पंक्तियों पर गौर करें। उनसे निकलने वाले अर्थों पर धान दें। गीत देखें और उन पर नाचें भी,लेकिन समय निकाल कर उन्‍हें एक बार जरूर सुनें और पढ़ें। इन दिनों विजुअल और साउंड का तात्‍कालिक आकर्षण होता है। गीत तो उसके बाद भी रेडियो,किताबों और अब इंटरनेट के जरिए जिंदा रहते हैं।

Thursday, October 22, 2015

फिल्‍म समीक्षा - शानदार




नहीं है जानदार
शानदार
-अजय ब्रह्मात्‍मज
    डेस्टिनेशन वेडिंग पर फिल्‍म बनाने से एक सहूलियत मिल जाती है कि सभी किरदारों को एक कैशल(हिंदी में महल या दुर्ग) में ले जाकर रख दो। देश-दुनिया से उन किरदारों का वास्‍ता खत्‍म। अब उन किरदारों के साथ अपनी पर्दे की दुनिया में रम जाओ। कुछ विदेशी चेहरे दिखें भी तो वे मजदूर या डांसर के तौर पर दिखें। शानदार विकास बहल की ऐसी ही एक फिल्‍म है,जो रंगीन,चमकीली,सपनीली और भड़कीली है। फिल्‍म देखते समय एहसास रहता है कि हम किसी कल्‍पनालोक में हैं। सब कुछ भव्‍य,विशाल और चमकदार है। साथ ही संशय होता है कि क्‍या इसी फिल्‍मकार की पिछली फिल्‍म क्‍वीन थी,जिसमें एक सहमी लड़की देश-दुनिया से टकराकर स्‍वतंत्र और समझदार हो जाती है। किसी फिल्‍मकार से यह अपेक्षा उचित नहीं है कि वह एक ही तरह की फिल्‍म बनाए,लेकिन यह अनुचित है कि वह अगली फिल्‍म में इस कदर निराश करे। शानदार निराश करती है। यह जानदार नहीं हो पाई है। पास बैठे एक युवा दर्शक ने एक दृश्‍य में टिप्‍पणी की कि ये लोग बिहाइंड द सीन(मेकिंग) फिल्‍म में क्‍यों दिखा रहे हैं?’
    शानदार कल्‍पना और अवसर की फिजूलखर्ची है। यों लगता है कि फिल्‍म टुकड़ों में लिखी और रची गई है। इम्‍प्रूवाइजेशन से हमेशा सीन अच्‍छे और प्रभावशाली नहीं होते। दृश्‍यों में तारतम्‍य न‍हीं है। ऐसी फिल्‍मों में तर्क ताक पर रहता है,फिर भी घटनाओं का एक क्रम होता है। किरदारों का विकास और निर्वाह होता है। दर्शक किरदारों के साथ जुड़ जाते हैं। अफसोस कि शानदार में ऐसा नहीं हो पाता। जगिन्‍दर जोगिन्‍दर और आलिया अच्‍छे लगते हैं,लेकिन अपने नहीं लगते। उन की सज-धज पर पूरी मेहनत की गई है। उनके भाव-स्‍वभाव पर ध्‍यान नहीं दिया गया है। शाहिद कपूर और आलिया भट्ट अपने नकली किरदारों को सांसें नहीं दे पाते। वे चमकते तो हैं,धड़कते नहीं हैं। फिल्‍म अपनी भव्‍यता में संजीदगी खो देती है। सहयोगी किरदार कार्टून कैरेक्‍टर की तरह ही आए हैं। वे कैरीकेचर लगे हैं। लेखक-निर्देशक माडर्न प्रहसन रचने की कोशिश में असफल रहे हैं।
    फिल्‍म की कव्‍वाली,मेंहदी विद करण और सिंधी मिजाज का कैरीकेचर बेतुका और ऊबाऊ है। करण जौहर को भी पर्दे पर आने की आत्‍ममुग्‍धता से बचना चाहिए। क्‍या होता है कि फिल्‍म इंडस्‍ट्री के इतने सफल और तेज दिमाग मिल कर एक भोंडी फिल्‍म ही बना पाते हैं? यह प्रतिभाओं के साथ पैसों का दुरुपयोग है। फिल्‍म का अंतिम प्रभाव बेहतर नहीं हो पाया है। इस फिल्‍म में ऐसे अनेक दृश्‍य हैं,जिन्‍हें करते हुए कलाकारों को अवश्‍य मजा आया होगा और शूटिंग के समय सेट पर हंसी भी आई होगी,लेकिन वह पिकनिक,मौज-मस्‍ती और लतीफेबाजी फिल्‍म के तौर पर बिखरी और हास्‍यास्‍पद लगती है। शाहिद कपूर और आलिया भट्ट ने दिए गए दृश्‍यों में पूरी मेहनत की है। उन्‍हें आकर्षक और सुरम्‍य बनाने की कोशिश की है,लेकिन सुगठित कहानी के अभाव और अपने किरदारों के अधूरे निर्वाह की वजह से वे बेअसर हो जाते हैं। यही स्थिति दूसरे किरदारों की भी है। पंकज कपूर और शाहिद कपूर के दृश्‍यों में भी पिता-पुत्र को एक साथ देखने का सुख मिलता है। खुशी होती है कि पंकज कपूर आज भी शाहिद कपूर पर भारी पड़ते हैं,पर दोनों मिल कर भी फिल्‍म को कहीं नहीं ले जा पाते।
    लेखक-निर्देशक और कलाकरों ने जुमलेबाजी के मजे लिए हैं। अब जैसे आलिया के नाजायज होने का संदर्भ...इस एक शब्‍द में सभी को जितना मजा आया है,क्‍या दर्शकों को भी उतना ही मजा आएगा ? क्‍या उन्‍हें याद आएगा कि कभी आलिया भट्ट के पिता महेश भट्ट ने स्‍वयं को गर्व के साथ नाजायज घोषित किया था। फिल्‍मों में जब फिल्‍मों के ही लोग,किस्‍से और संदर्भ आने लगें तो कल्‍पनालोक पंक्‍चर हो जाता है। न तो फंतासी बन पाती है और न रियलिटी का आनंद मिलता है। मेंहदी विद करण ऐसा ही क्रिएटेड सीन है।
    शानदार की कल्‍पना क्‍लाइमेक्‍स में आकर अचानक क्रांतिकारी टर्न ले लेती है। यह टर्न थोपा हुआ लगता है। और इस टर्न में सना कपूर की क्षमता से अधिक जिम्‍मेदारी उन्‍हें दे दी गई है। वह किरदार को संभाल नहीं पातीं।
हां,फिल्‍म कुछ दृश्‍यों में अवश्‍य हंसाती है। ऐसे दृश्‍य कुछ ही हैं।
(घोड़ा चलाना क्‍या होता है ? हॉर्स रायडिंग के लिए हिंदी में घुड़सवारी शब्‍द है। उच्‍चारण दोष के अनेक प्रसंग हैं फिल्‍म में। जैसे कि छीलो को आलिया चीलो बोलती हैं।)
अवधि- 146 मिनट
स्‍टार- दो स्‍टार

अनुभव रहा शानदार - शाहिद कपूर




-अजय ब्रह्मात्‍मज
      उस दिन शाहिद कपूर झलक दिखला जा रीलोडेड के फायनल एपीसोड की शूटिंग कर रहे थे। तय हुआ कि वहीं लंच पर इंटरव्‍यू हो जाएगा। मुंबई के गोरेगांव स्थित फिल्मिस्‍तान स्‍टूडियो में उनका वैनिटी वैन शूटिंग फ्लोर के सामने खड़ा था।
       पाठकों को बता दें कि यह वैनिटी बैन किसी एसी बस का अदला हुआ रूप होता है। इसके दो-तिहाई हिस्‍से में स्‍टार का एकाधिकार होता है। एक-तिहाई हिस्‍से में उनके पर्सनल स्‍टाफ और उस दिन की शूटिंग के लिए बुलाए गए अन्‍य सहयोगी चढ़ते-उतरते रहते हैं। स्‍टार के कॉस्‍ट्यूम(चेंज के लिए) भी वहीं टंगे होते हें। अमूमन सुनिश्चित मेहमानों को इसी हिस्‍से के कक्ष में इंतजार के लिए बिठाया जाता है। स्‍टार की हामी मिलने के बाद बीच का दरवाजा खुलता है और स्टार आप के सामने अपने सबसे विनम्र रूप में रहते हैं। आखिर फिल्‍म की रिलीज के समय इंटरव्‍यू का वक्‍त होता है। स्‍टार और उनके स्‍टाफ को लगता है कि अभी खुश और संतुष्‍ट कर दिया तो सब कुछ ठीक हो जाएगा। इतनी बार चाय या काफी या ठंडा पूछा जाता है कि लगने लगता है कि अगर अब ना की तो ये जानवर समझ कर मुंह में कांड़ी डाल कर पिला देंगे।
         बहरहाल, उस दिन सब कुछ तय था। निश्चित समय से दस मिनट ज्‍यादा हुए होंगे कि बुला लिया गया। घुसने पर पहले शाहिद की पीठ दिखी। वे कुसर्भ्‍ पर बैठे थे। उनके साने टिफिन रखा था। टिफिन्‍ के डब्‍बों में सब्जियां और दाल थी। रोटी और चावल भी था। बताया गया था कि समय की तंगी की वजह से यह व्‍यवस्‍था की गई है। आप उनके लंच के समय बात कर लें। बात शुरू ही हुई थी कि उनकी मैनेजर भी आकर बैठ गई। अब यह नया सिलसिला है। स्‍टार के साथ बातचीत के समय उनके मैनेजर या पीआर टीम का कोई सदस्‍य बैठ जाता है। उनकी आप की हिंदी बातचीत में कोई रुचि नहीं होती। वे अपनी मोबाइल में उलझी रहती हैं और अपनी मौजूदगी मात्र से डिस्‍टर्ब कर रही होती हैं। सच कहें तो इंटरव्‍यू प्रेमालाप की तरह होते हैं। किसी तीसरे की मौजूदगी कुछ बातें पूछने और बताने से रह जाती हैं। आज का यह विवरण उस परिप्रेक्ष्‍य के लिए है,जिसमें स्‍टार के इंटरव्‍यू होते हैं। और हां,20 मिनट की इस बातचीत में पीआर की एक सदस्‍य तीन बार बताने आई कि आप का समय पूरा हो गया है। इस बातचीत के दौरान शाहिद ने अपना डायट फूड भी खत्‍म किया,क्‍योंकि उन्‍हें शूट के लिए फ्लोर पर जाना था।
          शादी के बाद शाहिद कपूर के जीवन में सबसे बड़ा फर्क यही आया है कि लंच में उनके लिए घर से टिफिन आता है। शाहिद टिफिन के डब्‍बों की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं,’ इससे पहले की आप शादी के बारे में पूछें। मैं ही बता देता हूं कि अब घर से टिफिन आता है। डायटिशियन के सुझाव के अनुसार ही सब कुछ तैयार किया जाता है। स्‍वाद और वैरायटी मिल रही है। इसके साथ ही शूटिंग के बाद घर लौटने पर बात करने के लिए कोई रहता है। अच्‍छी बात है कि मीरा का फिल्‍मों से कोई ताल्‍लुक नहीं है। हमलोग कुछ और बातें करते हैं। इस बातचीत में ही हम एक-दूसरे को समझ रहे होते हैं। करीब आ रहे होते हैं।‘

      ‘शानदार’ की बात चलने पर शाहिद कपूर बताते हें,’ विकास बहल से मेरी मुलाकात ‘कमीने’ के समय हुई थी। तब वे डायरेक्‍श्‍न में नहीं आए थे। इस बीव वे डायरेक्‍शन में आ गए। उन्‍होंने पहले एक छोटी फिल्‍म और फिर क्‍वीन निर्देशित की। उनकी क्‍वीन बेहद सफल रही,लेकिन मैं बता दूं कि मैंने शानदार उनकी क्‍वीन की सफलता के पहले ही साइन कर ली थी। विकास में अलग सी एनर्जी और उत्‍साह है। आप उन्‍हें ना नहीं कह सकते। उन्‍होंने बताया था कि उन्‍हें डेस्टिनेशन वेडिंग पर एक मजेदार फिल्‍म करनी है। मुझे उनका आयडिया पसंद आया और मैंने हां कर दी। हिंदी में इस कंसेप्‍ट पर बनी यह अनोखी फिल्‍म है। हिंदी सिनेमा की सभी खासियतों को विकास ने बड़े स्‍केल पर शूट किया है। मौज-मस्‍ती और नाच-गाना सब कुछ है। पूरी फिल्‍म में पार्टी ही चलती रहती है। इसमें मेरे साथ प्रतिभाशाली आलिया भट्ट हैं। यह फिल्‍म मेरे लिए खास है,क्‍योंकि इसमें मेरे पिता पंकज कपूर और मेरी बहन सना कपूर भी हैं। उन सभी के साथ होने से शानदार यादगार फिल्‍म हो गई है।‘
      शाहिद कपूर की फिल्‍मों के चुनाव में एक बदलाव दिख रहा है। वे स्‍पष्‍ट कहते हैं,’पिछले सालों में मैं प्रयोग कर रहा था। हर तरह की फिल्‍मों में हाथ आजमा रहा था। यही चाहत थी कि सफल रहूं। फिर एहसास हुआ कि इस कोशिश में मैं कई चीजें खो रहा हूं और कहीं पहुंच नहीं पा रहा हूं। विशाल भारद्वाज के साथ कमीने करते समय जैसी एकाग्रता और ऊर्जा रहती थी... उसकी कमी महसूस हो रही थी। फिर हैदर आई। उसके बाद सब कुछ तय हो गया। मन की दुविधा और बेचैनी खत्‍म हो गई। मैंने समझ लिया कि सफलता के लिए कोई फिल्‍म नहीं करनी है। वही फिल्‍म करनी है,जहां सुकून मिले और काम करने से संतुष्टि हो। शानदार भी ऐसी ही फिल्‍म है। इसके बाद उड़ता पंजाब आएगी। एके वर्सेस एसके की भी शूटिंग चल रही है। मैंने यह दाढ़ी रंगून के लिए बढ़ा रखी है। विशाल सर ने मुझे कहा कि दाढ़ी बढ़ाओ। देखें फायनली क्‍या लुक मिलता है?’ शाहिद कपूर इन दिनों घनी दाढ़ी में ही हर जगह दिख रहे हैं।
     इस फिल्‍म में शाहिद आने पिता पंकज कपूर के साथ दिखेंगे। पिता के बारे में पूछने पर वे जवाब देते हैं,’ शानदार में डैड के साथ अच्‍छा अनुभव रहा। डैड इतने बड़े एक्‍टर हैं। विकास ने हम दोनों के बीच कुछ मजेदार सीन रखे हैं। ट्रेलर में तो अभी झलक मात्र मिली है। डैड के मुकाबले मैं कहीं नहीं हूं। बाकी,इस फिल्‍म के दृश्‍यों में उनके सामने वह सब विकास ने मुझ से करवाया,जो मैं अपने डैड के सामने जिंदगी में कभी नहीं कर सकता। डैड ने भी खूब मजे लिए।‘  

Sunday, October 18, 2015

जीवन के आठ पाठ - शाह रुख खान

Image result for srk edinburgh speechSo here’s my first life lesson, inspired by the movie title ‘Deewana’: MaMadness (of the particularly nice / romantic kind) is an absolute prerequisite to a happy and successful life. Don’t ever treat your little insanities as if they are aberrations that ought to be hidden from the rest of the world. Acknowledge them and us them to define your own way of living the only life you have. All the beautiful people in the world, the most creative, the ones who led revolutions, who discovered and invented things, did so because they embraced their own idiosyncrasies. There’s no such thing as “normal”. That’s just another word for lifeless.
Life Lesson 2: So my next lesson is the following: If you ever find yourself cheated of all your money and sleeping on a grave, do not fear, a miracle is near, either that or a ghost. All you have to do is fall asleep! In other words, no matter how bad it gets, life IS the miracle you are searching for. There is no other one around the corner. Develop the faith in it to let it take its own course, make all the effort you can to abide by its beauty and it will not let you down. Use every resource you have been given, your mental faculties, the ability of your heart to love and feel for those around you, your health and good fortune: all of the thousands of gifts life has given you to their maximum potential. Honour your life. Honour each gift and each moment by not laying it to waste. There is no real measure of success in this world except the ability to make good of life’s endowments to you.
Life Lesson 3: Darr means fear in Hindi and everyone always tells you that you ought to be brave so I’m not going to bore you with that idea. Instead let me tell you this: Being brave means being shit scared all the way to the party but getting there and doing the Funky Chicken in front of all your teenage kid’s friends anyway. Let me just add on behalf of all the fathers of the world who have embarrassed their children by doing this…it takes a lot of bravery resolve and grit to do this. So do it. Don’t let your fears become boxes that enclose you. Open them out, feel them and turn them into the greatest courage you are capable of. I promise you, nothing will go wrong. But if you live by your fears, everything that can possibly go wrong will go wrong and you wont even have done the Funky Chicken.
Life Lesson 4: Life lesson number four rears its head: Give of yourself to others. And while you’re at it, make sure you realise that you aren’t doing anyone any favours by being kind. It’s all just to make you feel that sneaky little twinge that comes from being utterly pleased with yourself. After all, the one that gets the most benefit out of any act of kindness or charity that you do will always be you. I don’t say this, as many see it, in a transactive or karmic way. It’s not an “I do good, I get benefit” equation with some white bearded figure taking notes from the heavens above. It’s a simple truth. An act of goodness becomes worthless when you assign a brownie point to yourself for it, no matter how subtly you allow yourself to do so. As benevolent as your gesture might be; someone else could have made it too. Regardless of how rich, successful and famous you become, don’t ever underestimate the grace that other people bestow upon you just by being the recipients of your kindnesses. You might be able to buy your friend a Rolls for his/her birthday but its no substitute for a patient hearing of your sulky rants on a bad hair day.
Life Lesson 5: So my fifth lesson is this: When life hits you with all the force of its resplendent rage, the Rolls isn’t going to give you comfort. A friend’s grace will, and if you can’t find resolution as easily as you would like to, don’t panic. Everything evolves as you go along, Chalte Chalte as we say in Hindi (and yes, that was another movie I did but no more mad plots for God’s sake!!) Even disasters eventually resolve themselves. Give life the space to move at its own pace, pushing it ahead only by way of being kind to yourself when you are hurting or in despair. You don’t always have to figure things out or find an explanation for the circumstances you are in.
Life Lesson 6: All the names you give yourself, or those that others call you, are just labels. You are not defined by them no matter how flattering or uncomplimentary they are. What defines you is your heart. Ask The Artist Formerly Known As Prince!! And learn a thing or two from him, if you don’t believe this insanely sexy Indian Superstar standing in front of you. And I say this out of experience because if I was to go by what all I am called on Social Media I would be an old desperate manipulative has been star who swings both ways while making crap movies, and these are just the good mentions.
Life Lesson 7: Whatever it is that is pulling you back, its not going away unless you stand up and start forging your own path with all your might in the opposite direction. Stop whining and start moving, so to speak. Sadness and happiness have the same quality of transience. Life is a balanced exchange of one with the other. And this is lesson number eight: Don’t attach yourself to either, they’re both going to change with the same certitude. Take them with the ephemeral spirit of their impermanence and manage them with a healthy dose of good humour. Laugh at yourself when you are despairing, shed a tear or two when one of my movie plots makes you hysterical with laughter.
Life Lesson 8 (final): Live from the heart. Dil Se. Love. Love people, love the world around you, love animals and birds, and big cities and mountains, love dreams, love life, love your work, your friends and your enemies even if you feel least like it. Most importantly, my friends; love yourselves. Embrace all that this life has in store for you, let your heart be as deep as the deepest ocean and as wide as the farthest horizon. Know that it is limitless. Love is not an excuse to grab or to hold or to own or to barter. It is the only excuse you will ever have to call yourself special. And if someone you love lets you down, don’t fault yourself for not trusting him, fault yourself for not trusting your love enough to forgive his/her trespasses.

Friday, October 16, 2015

फिल्‍म समीक्षा : प्‍यार का पंचनामा 2




प्रेम का महानगरीय प्रहसन
प्‍यार का पंचनामा 2
-अजय ब्रह्मात्‍मज
     प्‍यार का पंचनामा देख रखी है तो प्‍यार का पंचनामा 2 में अधिक नयापन नहीं महसूस होगा। वैसे ही किरदार हैं। तीन लड़के है और तीन लड़कियां भी इनके अलावा कुछ दोस्‍त हैं और कुछ सहेलियां। तीनों लड़कों की जिंदगी में अभी लड़कियां नहीं हैं। ऐसा संयोग होता है कि उन तीनों लड़कों की जिंदगी में एक साथ प्रेम टपकता है। और फिर पहली फिल्‍म की तरह ही रोमांस, झगड़े, गलतफहमी और फिर अलगाव का नाटक रचा जाता है। निश्चित रूप से पूरी फिल्‍म लड़कों के दृष्टिकोण से है, इसलिए उनका मेल शॉविनिज्‍म से भरपूर रवैया दिखाई पड़ता है। अगर नारीवादी नजरिए से सोचें तो यह फिल्‍म घोर पुरुषवादी और नारी विरोधी है।
दरअसल, प्‍यार का पंचनामा 2 स्‍त्री-पुरुष संबंधों का महानगरीय प्रहसन है। कॉलेज से निकले और नौकरी पाने के पहले के बेराजगार शहरी लड़कों की कहानी लगभग एक सी होती है। उपभोक्‍ता संस्‍कृति के विकास के बाद प्रेम की तलाश में भटकते लड़के और लड़कियों की रुचियों, पसंद और प्राथमिकताओं में काफी बदलाव आ गया है। नजरिया बदला है और संबंध भी बदले हैं। अब प्‍यार एहसास मात्र नहीं है। प्‍यार के साथ कई चीजें जुड़ गई हैं। अगर सोच में साम्‍य न हो तो असंतुलन बना रहता है। 21 वीं सदी में रिश्‍तों को संभालने में भावना से अधिक भौतिकता काम आती है। प्‍यार का पंचनामा 2 इस नए समाज का विद्रूप चेहरा सामने ले आती है। हालांकि, हम फिल्‍म के तीन नायकों के अंशुल,तरुण और सिद्धार्थ के साथ ही चलते हैं, लेकिन बार-बार असहमत भी होते हैं। प्‍यार पाने की उनकी बेताबी वाजिब है, लेकिन उनकी हरकतें उम्र और समय के हिसाब से ठीक लगने के बावजूद उचित नहीं हैं। लड़कियों के प्रति उनका रवैया और व्‍यवहार हर प्रसंग में असंतुलित ही रहता है।
    लव रंजन के लिए समस्‍या रही होगी कि पहली लकीर पर चलते हुए भी कैसे फिल्‍म को अलग और नया रखा जाए। तीन सालों में समाज में आए ऊपरी बदलावों को तो तड़क-भड़क, वेशभूषा और माहौल से ले आए, लेकिन सोच में उनके किरदार पिछली फिल्‍म से भी पिछड़ते दिखाई पड़े। हंसी आती है। ऐसे दृश्‍यों में भी हंसी आती है, जो बेतुके हैं। कुछकुछ लतीफों जैसी बात है। आप खाली हों और लतीफेबाजी चल रही हो तो बरबस हंसी आ जाती है। प्‍यांर का पंचनामा 2 किसी सुने हुए लतीफे जैसी ही हंसी देती है।
    इस फिल्‍म के संवाद उल्‍लेखनीय हैं। ऐसी समकालीन मिश्रित भाषा हाल-फिलहाल में किसी अन्‍य फिल्‍म में नहीं सुनाई पड़ी। यह आज की भाषा है, जिसे देश का यूथ बोल रहा है। संवाद लेखक ने नए मुहावरों और चुहलबाजियों को बखूबी संवादों में पिरोया है। संवादों में लहरदार प्रवाह है। उन्‍हें सभी कालाकारों ने बहुत अच्‍छी तरह इस्‍तेमाल किया है। फिल्‍म में अंशुल (कार्तिक आर्यन) का लंबा संवाद ध्‍यान खींचता है। इस लंबे संवाद में फिल्‍म का सार भी है। यकीनन यह फिल्‍म रोमांटिक कामेडी नहीं है। एक तरह से यह एंटीरोमांटिक हो जाती है।
    तीनों लड़कों ने अपने किरदारों पर मेहनत की है। कार्तिक आर्यन, ओंकार कपूर और सनी सिंह निज्‍जर ने कमोबेश एक सा ही परफॉरमेंस किया है। लेखक-निर्देशक ने अंशुल के किरदार को अध्रिक तवज्‍जो दी है। कार्तिक आर्यन इस तवज्‍जो को जाया नहीं होने दिया है। ओंकार कपूर अपने लुक और शरीर की वजह से हॉट अवतार में दिखे हें। सनी सिंह निज्‍जर ने लूजर किस्‍म के किरदार को अच्‍छी तरह निभाया है। तीनों लड़कियां न होतीं तो इन लड़कों के संस्‍कार और व्‍यवहार न दिखते। ये लड़कियां भी इसी समाज की हैं। उनकी असुरक्षा, अनिश्चितता और लापरवाही को उनके संदर्भ से समझें तो लड़के गलत ही नहीं मूर्ख भी दिखेंगे।
    क्‍या ही अच्‍छा हो कि कोई निर्देशक लड़कियों के दृष्टिकोण से प्‍यार का पंचनामा 3 बनाए?
अवधि- 137 मिनट
तीन स्‍टार

फिलम समीक्षा : वेडिंग पुलाव




बासी और ठंडा पुलाव
-अजय ब्रह्मात्‍मज
    यह फिल्‍म अनुष्‍का रंजन के माता-पिता ने बेटी की लौंचिंग के लिए बनाई है। ऐसी लौंचिंग फिल्‍म में लेखकों को हिदायत रहती है कि सारा जोर उस कलाकार पर हो, जिसे लौंच किया जा रहा है। फिल्‍म में उसके लिए ऐसे दृश्‍य होने चाहिए, जिसमें उस कलाकार की क्षमता और प्रतिभा का परिख्‍य मिले। ऐसी फिल्‍में वास्‍तव में फिल्‍म से अधिक नवोदित कलाकार का पोर्टफोलियो होती हैं, जो एक साथ दर्शकों और इंडस्‍ट़ी के लिए पेश की जाती है।
    इस लिहाज से इस फिल्‍म की कहानी अनुष्‍का रंजन को ध्‍यान में रख कर लिखी गई है। फिल्‍म के आरंभ से अ‍ाखिर तक खयाल रखा गया है कि किसी और किरदार की तरफ दर्शक आकर्षित न हो जाएं, इसीलिए दिगंत, मनचले, सोनाली सहगल और करण ग्रोवर के किरदारों को बढ़ने का मौका ही नहीं दिया गया है। हर बार फिल्‍म लौट कर अनुष्‍का पर आ जाती है। उनके किरदार तक का नाम अनुष्‍का रख दिया गया है।
    अनुष्‍का सामान्‍य हैं। स्‍क्रीन पर वह अच्‍छी लगती हैं। अपनी लंबाई से उन्‍हें झेंप नहीं आती। उनकी मुस्‍कराहट बौर कद-काठी अच्‍छी है। भावनात्‍मक दृश्‍यों में अभी उन्‍हें और मेहनत करनी होगी। नाचना तो इन दिनों सभी लड़कियों को आता है। खासकर बॉलीवुड डांस के लिए किस शास्त्रियता की जरूरत होती है। हां, उच्‍चारण और संवाद अदायगी की कमियां हें। उन पर कौन ध्‍यान देता है। स्‍क्रीन पर अच्‍छी दिखना पहली शर्त्‍त होती है। अनुष्‍का रंजन में इन दिनों की अभिनेत्रियों के सभी बाहरी गुण हैं।
    रही फिल्‍म की बात तो यह पुलाव बासी है। इसे नाच-गानों के ओवन में गर्म किया गया है। सही टेम्‍पेरेचर और टाइम फिक्‍स न करने से यह अंदर में ठंडा ही रह गया है। फिल्‍म में कोई नयापन नहीं है। दोस्‍ती और प्रेम में उलझी यह कहानी सैकड़ों बार हिंदी फिल्‍मों में आ चुकी है।
अवधि- 123 मिनट
स्‍टार एक स्‍टार
 

Thursday, October 15, 2015

दरअसल : जब सेलेब्रिटी पूछते हैं सवाल



-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दिनों ट्विटर पर एक मित्र ने टिप्पणी की। उनकी टिप्पणी का आशय था कि फिल्मों के पत्रकार किसी सेलेब्रिटी की तरह सवाल नहीं पूछते। सेलेब्रिटी चैट शो में जब एक सेलेब्रिटी दूसरे सेलेब्रिटी से बात करता है तो उनके सवाल-जवाब बेहद अंतरंग और निजी होते हें। जानी-अनजानी बातें सुनाई पड़ती हैं। ऐसा लगता है कि सितारे अपने जिंदगी के रहस्‍य खोल रहे हों। मित्र ने यह टिप्‍पणी द अनुपम खेर शो-कुछ भी हो सकता है देख कर की थी। भारतीय टीवी पर फिल्‍म सेलेब्रिटी के चैट शो बहुत पॉपुलर होते हैं। साल-दो साल में कोई नया सेलेब्रिटी एंकर ऐसे शो लेकर आता है। पिछले कुछ सालों में कॉफी दि करण को सर्वाधिक लोकप्रियता मिली है।
से‍लेब्रिटी चैट शो के इतिहास से वाकिफ लोगों को मालूम है कि दमरदर्शन के जमाने में तबस्‍सुम फूल खिले हैं गुलशन गुलशन शो लेकर आती थीं। इस शो में हिंदी फिल्‍मों की पॉपुलर हस्तियों से तबस्‍सुम बातें करती थीं और उन्‍हें अपनी खास मुस्‍कराहट के साथ पेश करती थीं। सैटेलाइट टीवी के अस्तित्‍व और प्रसार में आने के बाद मुस्‍कराहट कम हुई और हर शो होस्‍ट के मिजाज के हिसाब से भावुकता,छींटाकशी और चुहलबाजी बढ़ गई। करण जौहर के शो की निहित मसखरी और संबंधों की उघड़ती परतों ने दर्शकों को आकृष्‍ट किया। समकालीन सिनेमा के लोकप्रिय निर्देशक ने अपनी पहुंच,संबंध और अर्जित छवि का सुंदर इस्‍तेमाल किया। उन्‍होंने मेहमानों से अंतरंग और चुटीले सवाल पूछे। मेहमानों ने भी बगैर आहत हुए उन सावालों के जवाब दिए।
    दो चीजें साथ-साथ हुईं। करण जौहर और दूसरे सेलेब्रिटी होस्‍ट की फिल्‍म बिरादरी से नजदीकी का सबसे बड़ा लाभ हुआ। उन्‍होंने अपनी बिरादरी के सभी चर्चित सितारों को ही बुलाया। माहौल यह रखा गया मानो आफ्टर पार्टी गुपचुप बातें चल रही हो...परनिंदा का माहौल हो। पूरी बातचीत में मेजबान और मेहमानों के बॉडी लैंग्‍वेज से उनकी अंतरंगता जाहिर होती है। ऐसी अंतरंगता और अनौपचारिकता पत्रकारों से बातचीत के समय नहीं होती। नकली और कृत्रिम माहौल होता है। ओढ़ी अंतरंगता रहती है। पत्रकारों की मजबूरी रहती है कि वे ज्‍यादातर मीठे सवाल पूछें। किसी सवाल से यह भनक न लगे कि वे कुछ खास जानना चाह रहे हैं। अगर कभी किसी पत्रकार ने हिमाकत भी कर दी तो फिल्‍म सेलेब्रिटी जवाब में सवाल को ही दरकिनार कर देती है। अव्‍वल तो पत्रकारों को ऐसे मौके ही नहीं मिलते कि उनके पास रिसर्च की पूरी टीम हो। सच कहें तो हमें अपनी मशरूफियत में इतना समय भी नहीं मिलता कि खास मेहमानों के लिए खास सवाल तैयार करें।
पत्रकारों से बातचीत के लिए बमुश्किल 20 मिनट का समय निकाला जाता है। उस 20 मिनट में भी सख्‍त हिदायत रहती है कि केवल संबंधित फिल्‍म पर ही बात करें। सेलिब्रिटी चैट के लिए तीन से पांच घंअे का समय निकाला जाता है। वे एकदूसरे को ऑब्‍लाइज भी कर रहे होते हैं। इन दिनों तो फिल्‍म सितारों के मैनेजर और पीआर भी बातचीत में बैठते हैं। मालूम नहीं उनकी खामोश मौाजूदगी की क्‍या वजह होती है। जरूरी है तो अमिताभ बच्‍चन की तरह अपना वॉयस रिकॉर्डर रखें। मैाने महसूस किया है कि किसी तीसरे की मौजूदगी में ढंग से बातचीत नहीं होती। हर इंटरव्‍यू एक प्रेमालाप है,जो दो व्‍यक्तियों के बीच हो तो रस बना रहता है। मैं हमेशा कहता हूं कि अच्‍छा इंटरव्‍यू परस्‍पर सम्‍मान और बराबरी के बाद ही संभव है। सर्वथा अपरिचित या कुछ परिचित व्‍यक्तियों के इंटरव्‍यू बेहतर होते हैं। बातचीत में तभी मजा आता है,जब पर्देदारी न हो। अनेक फिल्‍म सेलेब्रिटी पॉलिटिकली करेक्‍ट होने के चक्‍कर में सच और संवेदना से दूर हो जाते हैं। इन दिनों तो केवल फिल्‍मों की रिलीज के समय ही फिल्‍म स्‍टार मिलना पसंद करते हैं। फिल्‍मों के प्रचार के लिए उनकी टर्राहट जारी रहती है।
      इन दिनों इंटरव्‍यू और बातचीत नीरस और बेस्‍वाद हो गए हैं। अखबारों में इतना स्‍पेस नहीं रहता कि कि लंबे और बेबाक इंटरव्‍यू छापे जा सकें। और फिर कई बार समझदारी के फर्क से भी संपादन और प्रस्‍तुति में अर्थ का अनर्थ हो जाता है।