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Saturday, September 26, 2015

दरअसल : बाजीराव मस्‍तानी का आईना महल



-अजय ब्रह्मात्‍मज
    संजय लीला भंसाली अपनी पीढ़ी के अकेले फिल्‍मकार है,जो संवेदना और सौंदर्य के साथ फिल्‍में बनाते हैं। उनकी फिल्‍मों में भव्‍यता के साथ सौंदर्य भी रहता है। यह सौंदर्य सेट,लोकेशन,कलाकार,किरदार,गीत-संगीत सभी में अलग-अलग स्‍तर और रूपों में दिखता है। उनकी फिल्‍में हिंदी फिल्‍मों की परंपरा का निर्वहन करती हैं। साथ ही वे दृश्‍यों और चरित्रों के निरूपण में अपनी खास सौंदर्य दृष्टि का उपयोग करते हैं। संजय की फिल्‍मों में नायिकाओं का सौंदर्य निखर जाता है। उनके साथ काम कर चुकी सभी अभिनेत्रियों ने यह स्‍वीकार किया है कि संजय के फिल्‍मों में वे सर्वाधिक सम्‍मोहक दिखती हैं। मनीषा कोईराला से लेकर दीपिका पादुकोण और प्रियंका चोपड़ा तक इसे दोहराती हैं। संजय लीला भंसाली की बाजीराव मस्‍तानी में दोनों अभिनेत्रियां बाजीराव बने रणवीर सिंह के साथ दिखेंगी। दीपिका मस्‍तानी और प्रियंका काशी बाई की भूमिका निभा रही हैं।
    संजय लीला भंसाली सेट पर हों या लोकेशन पर...दोनों ही स्थितियों में वे परिवेश की सुदरता को उसकी गहराई के साथ अपनी फिल्‍मों में ले आते हैं। उनकी हर फिल्‍म में इस गहराई से किरदारों और दृश्‍यों को भिन्‍न आयाम मिलते हैं। उनकी फिल्‍मों में प्रयुक्‍त सारी सामग्रियां विशाल और भव्‍य होती हैं। उन्‍होंने अपनी बातचीत में इसे जाहिर किया है कि बचपन और किशोरावस्‍था में
छोटी जगह में सिकुड़ कर रहने से मिली ग्रंथि से वे मुक्‍त होना चाहते हैं,इसलिए उनकी फिल्‍मों में कुछ भी छोटा और संकीर्ण नहीं होता। उनकी कोशिश रहती है कि दर्शकों को नयनाभिरामी दृश्‍य मिलें। उनके किरदार खुलें और विस्‍तार पाएं। वे अपनी फिल्‍मों में बारीकी पर ध्‍यान देते हैं। चादर की सलवटों से लेकर अभिनेत्रियों की लटों तक पर उनका ध्‍यान रहता है। हिंदी फिल्‍मों के समकालीन निर्देशकों में अकेले रूपवादी फिल्‍मकार हैं। रूप और शिल्‍प पर अधिक फोकस करने की वजह से उनकी फिल्‍मों के कथ्‍य में काल्‍पनिकता अधिक रहती है। उनकी फिल्‍में मूल स्‍वरूप में पलायनवादी होती हैं।
    बाजीराव मस्‍तानी में उन्‍होंने आईना महल का सेट लगाया था। 12500 वर्गफीट के इस सेट में दीवारों,खंभों और छत में शीशे से नक्‍काशी की गई है। जयपुर के कारीगरों ने फिल्‍म के प्रोडक्‍शन डिजायनर सलोनी धत्रक,श्रीराम आयंगार और सुजीत सावंत की देखरेख में इसे तैयार किया है। के आसिफ की फिल्‍म मुगलेआजम के शीशमहल की तर्ज पर तैयार इस आईना महल में भी फिल्‍म का एक अहम गाना शूट किया गया है। फिल्‍म के टर्निंग पाइंट पर यह गाना आएगा। इस गाने में मस्‍तानी खुद अपना परिचय देगी। रेमो फर्नांडिस के निर्देशन में इस गाने की कोरियोग्राफी हुई है। रेमो आधुनिक नृत्‍य शैली के लिए मशहूर है। उन्‍हें संजय ने क्‍लासिक नूत्‍य संयोजन की चुनौती दी है। संजय मानते हैं कि कलाकारों की योग्‍यता वर भरोसा कर उन्‍हें चुनौती दो तो उनके सामथ्‍र्य में इजाफा होता है। वे रेमो के काम से बहुत खुश हैं।
    संजय लीला भंसाली आईना महल से मुगलेआजम और के आसिफ को कलात्‍मक श्रद्धांजलि देना चाहते हैं। उन्‍हें मालूम है कि वे किसी भी तरह शीशमहल की बराबरी नहीं कर सकते। शीशमहल की मौलिकता अक्षुण्‍ण रहेगी। फिर भी ऐतिहासिक पूष्‍ठभूमि की बाजीराव मस्‍तानी में आईना महल की संभावना देख उन्‍होंने दृश्‍य रचे। आईना कहल और उसमें फिल्‍मांकित गीत दीपिका के लिए भी बड़ी चुनौती है। उन्‍हें भी मालूम है कि उनकी तुलना मधुबाला से की जागी।
    संजय लीला भंसाली के आईना कहल में शूटिंग की वैसी मुश्किले नहीं हैं,जैसी शीशमहल के गीत में हुई थी। तब मालूम नहीं था कि शीशे से परावर्तित हो रही लाइट को कैसे रोका जाए। कैमरामैन आरडी माथुर ने रिफ्लेक्‍टेड लाइट की तकनीक से इसे संभव किया था। आईना महल के इस गीत में संजय लीला भंसाली ने 12 नर्त्‍तकों और 16 नर्त्‍तकियों को दीपिका पादुकोण के साथ समूह त्‍य में रखा है। यह गीत और आईना महल बाजीराव मस्‍तानी का हाईलाइट होगा।

फिल्‍म समीक्षा : किस किस को प्‍यार करूं

करवा चौथ का गोल चांद
-अजय ब्रह्मात्मज
    हिंदी फिल्मों में करवा चौथ का चांद हमेशा गोल दिखाया जाता है। आदित्य चोपड़ा की फिल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगेÓ के आर्ट डायरेक्टर से हुई भूल पर न तो निर्देशक का ध्यान गया और न ही दर्शकों ने सुधि ली। लिहाजा, बाद में आई हर फिल्म में करवा चौथ का चांद गोल ही दिखता है, जबकि कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन चांद की गोलाई चार दिन घट चुकी होती है। 'किस किस को प्यार करूंÓ जैसी फिल्में 'करवा चौथ का गोल चांदÓ ही होती हैं। इनका वास्तविकता से खास रिश्ता नहीं होता।
    अब इसी फिल्म को लें। कुमार शिव राम किशन दिल का नेक लड़का है, वह अपनी मां की दी सीख 'कभी किसी लड़की का दिल न तोडऩा और कभी किसी का घर नहीं तोडऩाÓ पर अमल करते हुए तीन शादियां कर चुका है। तीनों शादियां गफलत और नैतिकता के दबाव में हुई हैं। अपने दोस्त और वकील करण की मदद से वह एक ही बिल्डिंग की चौथी, छठी और आठवीं मंजिलों पर तीनों बीवियों का परिवार चला रहा है। अब यह न पूछें कि कैसी एक ही बिल्डिंग में रहते हुए उनकी बीवियों को लंबे समय तक पता ही नहीं चलता कि उनका पति एक ही व्यक्ति है। हिंदी फिल्मों में मुंह पर केक की क्रीम लग जाए तो चेहरा थोड़े ही पहचान में आता है। आदित्य चोपडा ने बताया है न कि सिर्फ मुंछ लगाने से भी व्यक्ति की पहचान छिप जाती है। ऐसे तर्क और कारण खोजने लगेंगे तो 'किस किस को प्यार करूंÓ देखते हुए तकलीफ बढ़ जाएगी।
    'किस किस को प्यार करूंÓ के हीरो कपिल शर्मा हैं। कपिल शर्मा ने पिछले सालों में 'कॉमेडी नाइट्स विद कपिलÓ से बड़ा नाम कमाया है। खास कर फिल्मी सितारों के संग उनकी ठिठोली काफी लोकप्रिय है। हिंदी फिल्मों के सभी नामी कलाकारों के वे प्रिय हैं। टीवी से पॉपुलर हुए हर कलाकार की ख्वाहिश रहती है कि उन्हें फिल्में मिलें। आज भी फिल्मों से मिली लोकप्रियता टिकाऊ होती है, जबकि टीवी शो बंद होते ही उसके कलाकार भुला दिए जाते हैं। इस कोशिश में कपिल शर्मा को उनके स्वभाव और प्रतिभा के अनुकूल फिल्म मिली है। उन्होंने चेहरे पर निर्लिप्त भाव रखते हुए दृश्यों और स्थितियों में अपने संवादों से हंसाया है। अभिनय तो अभी कपिल शर्मा से कोसों दूर है। इसके लिए उन्हें चेहरे पर भाव लाने होंगे और बगैर संवादों के भी अभिव्यक्ति देनी होगी।
    अब्बास-मस्तान ने पहली बार कॉमेडी में हाथ आजमाया है। उनके पास देश के उम्दा और मशहूर कॉमेडियन कपिल शर्मा हैं। वे उनका सही इस्तेमाल करते हैं। फिल्म देखते हुए तीन-तीन बीवियों की वजह से चल रहे कंफ्यूजन और उन्हें संभालने में कुमार शिव राम किशन की परेशानी से हंसी तो आती है, लेकिन वह सिटकॉम(सिचुएशन वाली कॉमेडी) की खूबी है। उसमें कलाकारों का योगदान टाइमिंग और संवाद अदायगी तक सीमित रहता है। कपिल शर्मा और उनकी बीवियां बनीं मंजरी फड़णीस, सिमरन कौर मुंडी, साई लोकुर ने भरपूर योगदान किया है। फिल्म की नायिका और कुमार की प्रेमिका बनी एली अवराम बाकी अभिनेत्रियों से कमतर नजर आती हैं।
    इस फिल्म में नायक के सहयोगी बने करण यानी वरुण शर्मा का प्रयास सराहनीय है। उन्होंने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है और फिल्म के सूत्रधार के रूप में जरूरी दृश्यों में आते रहे हैं। पिता शरद सक्सेना और मां सुप्रिया पाठक भी अपने हिस्सों में प्रभावशाली हैं। बाई बनी जेमी लीवर अपनी भूमिका निभा ले जाती हैं।
अवधि- 136 मिनट
**दो स्टार

फिल्‍म समीक्षा : कैलेंडर गर्ल्‍स

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-अजय ब्रह्मात्‍मज
मधुर भंडारकर की 'पेज 3’, 'फैशन’ और 'हीरोइन’ की कहानियां एक डब्बे में डाल कर जोर से हिलाएं और उसे कागज पर पलट दें तो दृश्यों और चरित्र के हेर-फेर से 'कैलेंडर गर्ल्स’ की कहानी निकल आएगी। मधुर भंडारकर की फिल्मों में ग्लैमर की चकाचौंध के पीछे के अंधेरे के मुरीद रहे दर्शकों को नए की उम्मीद में निराशा होगी। हां, अगर मधुर की शैली दिलचस्प लगती है और फिर से वैसे ही प्रसंगों को देखने में रूचि है तो 'कैलेंडर गर्ल्स’ भी रोचक होगी।

कैलेंडर गर्ल्स
मधुर भंडारकर ने हैदराबाद, कोलकाता, रोहतक, पाकिस्तान और गोवा की पांच लड़कियां नंदिता मेनन, परोमा घोष, मयूरी चौहान, नाजनीन मलिक और शैरॉन पिंटो को चुना है। वे उनके कैलेंडर गर्ल्स’ बनने की कहानी बताते हैं। साथ ही ग्लैमर वर्ल्ड में आ जाने के बाद की जिंदगी की दास्तान भी सुनाते हैं। उनकी इस दास्तान को फिल्म के गीत 'ख्वाहिशों में...’ गीतकार कुमार ने भावपूर्ण तरीके से व्यक्त किया है। यह गीत ही फिल्म का सार है- 'कहां ले आई ख्वाहिशें, दर्द की जो ये बारिशें, है गलती दिल की या फिर, है वक्त की साजिशें।’
देश के विभिन्न हिस्सों और पाकिस्तान से आई लड़कियों को पहले अपने परिवार और फिर अपने परिवेश से संघर्ष करना पड़ता है। आरंभ में सभी को विरोध झेलना पड़ता है। उनकी असली लड़ाई कैलेंडर गर्ल्स बन जाने के बाद होती है, जब उन्हें पिनाकी चटर्जी, अनिरूद्ध श्रॉफ, हर्ष नारंग, अनन्या रायचंद और तिवारी जैसे व्यक्ति मिलते हैं। वे उन्हें ग्लैमर की उन अंधेरी गलियों में धकेलते हैं, जहां से निकलना मुश्किल है। नंदिता, मयूरी और शैरॉन की जिंदगी तो संभल जाती है, लेकिन परोमा और नाजनीन को मुश्किलों से गुजरना पड़ता है। मधुर भंडारकर ने इन लड़कियों की तबाह जिंदगी के चित्रण में 'फैशन’ और 'हीरोइन’ की तकलीफों को ही दोहराया है। शायद चकाचौंध के पीछे का अंधेरा एक सा ही होता है।
मधुर भंडारकर के फिल्मों का कंटेंट मजबूत और प्रासंगिक होता है, लेकिन उनके निरूपण में अब बासीपन आ गया है। यह फिल्म 'पेज 3’ और 'फैशन’ की नवीनता दोहराए जाने से अपनी चमक खो चुकी है। ऐसा लगता है कि कथ्य और शिल्प दोनों ही स्तरों पर मधुर भंडारकर को अब नई कोशिशें करनी होंगी। यह मुमकिन है कि मधुर भंडारकर के नए दर्शकों को 'कैलेंडर गर्ल्स’ अच्छी लगे, क्योंकि उनके लिए इस फिल्म की ख्वाहिशों का दर्द नया होगा।
परोमा, नाजनीन और शैरॉन के किरदार निभा रही अभिनेत्रियों को बेहतर प्रदर्शन का मौका मिला है। उनकी जिंदगी में ज्यादा घटनाएं और उथल-पुथल हैं। सतरूपा पायणे, अवनी मोदी और कियारा दत्ता ने अपनी भूमिकाओं को समझा और निभाया है। तीनों ही अभिनेत्रियों ने अपने किरदारों के दर्द और द्वंद्व को अच्छी तरह पर्दे पर उकेरा है। फिल्म के अधिकांश दृश्यों में उन्हें सुंदर और आकर्षक दिखना है, इसलिए अभिनय से ज्यादा उनके रूप और श्रृंगार पर निर्देशक ने ज्यादा ध्यान दिया है।
फिल्म देखते हुए कुछ किरदारों की शिनाख्त की जा सकती है। सोसायटी में वे मौजूद हैं। पत्र-पत्रिकाओं और चैनलों की खबरों में वे सुर्खियों में रहते हैं। फिल्म उन व्यक्तिओं की मानसिकता और लालसा की बातें नहीं करतीं, जिनकी वजह से कैलेंडर गर्ल्स का कारोबार चलता है। मधुर भंडारकर की फिल्मों में स्थितियों के कारण की खोज नहीं रहती। वे दिखाई पड़ रही घटनाओं की सतह पर ही अपने किरदारों के जीवन का चित्रण करते हैं।
अवधिः 130 मिनट

लेवल ऊंचा ही रखा - प्रियंका चोपड़ा

-अजय ब्रह्मात्‍मज
      प्रियंका चोपड़ा इस मायने में खास हो गई हैं कि वह हिंदी फिल्‍मों की अगली कतार में होने के साथ ही विदेश की धरती पर भी अपनी पहचान बना रही है। अमेरिका के शहरों में होर्डिंग और बिलबोड्र पर वह दिख रही हैं। हिंदी सिनेमा के परिचित चेहरे को अमेरिका में देख कर आप्रवासी भारतीय गर्व महसूस कर रहे हैं। प्रियंका चोपड़ा का टीवी शो क्‍वैंटिको इसी महीने 27 सितंबर से प्रसारित होगा। भारत में यह 3 अक्‍टूबर से देखा जा सकेगा। पिछले दिनों बाजीराव मस्‍तानी के शूट के लिए आई प्रियंका चोपड़ा ने दैनिक जागरण के पाठकों के लिए अपने अनुभव शेयर किए।
      मैं अभी मांट्रियाल में शूटिंग कर रही हूं। हम पूरा सीजन वहां कर रहे हैं। अब तक एपीसोड 4 पर ही पहुंचे हें। वापस जाकर 5वें की शूटिंग आरंभ करूंगी। यूं समझें कि बाजीराव मस्‍तानी और क्‍वैंटिको के बीच भागदौड़ चल रही है।
      मेरे लिए बड़ा अचीवमेंट है कि मैं हिंदी फिल्‍मों और इंटरनेशनल असाइनमेंट के बीच बैलेंस बना कर चल रही हूं। दूसरी बात है कि मैं जिस तरह का काम विदेश में करना चाह रही थी,वैसा कर पा रही हूं। स्‍टीरियोटाइप रोल नहीं कर रही हूं। मैंने वहां यही कहा कि मुझे सीरियसली लो और बतौर एक्‍टर बेहतर काम दो। मैं कहां से हूं,कैसी लगती हूं,इससे क्‍या लेना-देना? अच्‍छी बात है कि ऐसा ही हुआ। मैंने यह भी तय किया था कि हिंदी फिल्‍मों में जैसा काम कर रही हूं,उसी स्‍तर का काम लूंगी। मुझे कोई जल्‍दबाजी नहीं है। मैं यहां बहुत अच्‍छा काम कर रही हूं। चाहती हूं कि मेरे काम का विस्‍तार हो। जो लोग मुझे जानते हैं,मेरे प्रशंसक हैं,उन्‍हें निराशा न हो। मैं बड़ी फिल्‍म में छोटा रोल कभी नहीं करना चाहती थी।
     क्‍वैंटिको आया तो इसमें लीडिंग रोल था। हेडलाइनिंग पार्ट था। वह बहुत अच्‍छा किरदार भी है। स्‍ट्रांग वीमैन कैरेक्‍टर है। एलेक्‍स पैरिश टफ लड़की है। वह कभी कमजोर भी पड़ती है। अगर हिंदी फिल्‍म में भी ऐसा रोल मिलता तो मैं इसे चूज करती। मैंने अपने इंटरनेशनल काम के लिए अलग नजरिया नहीं रखा है। मेरे लिए यह सफल कदम है कि मुझे अपने मूल्‍यों और सोच से समझौता नहीं करना पड़ा। मैं भारत में जिस स्‍तर पर हूं। उसी स्‍तर से अमेरिका या किसी देश में शुरूआत करूंगी। ढेर सारा काम कर लिया है। एक प्रकार की इज्‍जत बना ली है।
      इतने साल काम करने के बाद अचानक दूसरे देश में न्‍यूकमर की तरह आना मुश्किल लगता है। डर भी लग रहा है। पता नहीं वहां के दर्शक कैसे देखेंगे? भारत में क्‍या प्रतिक्रिया होगी। दूसरा देश है? दूसरी भाषा है। अभी तक जो जिज्ञासा और स्‍वागत है,वह बहुत उत्‍साहजनक है। सभी लिस्‍ट में क्‍वैंटिको का टॉप पोजीशन मिल रही है। अभी तक तो अच्‍छा ही लग रहा है।
          क्‍वैंटिको के प्रोमो और ट्रेलर को जिस संख्‍या में लोग देख रहे हैं,उस से उनकी समझ में भी आया है। मैंने सुना है कि 180 देशों में इस शो की मांग है। मुझे यकीन है कि यह हिंदी सिनेमा के पावर से हुआ है1 मैं वहां के लिए न्‍यू कमर ही हूं। इसकी लांचिंग के समय मैं ही शो स्‍टॉपर थी। आखिरी पंक्ति मुझे ही बोलनी थी। तब लगा कि कुछ बड़ा हो गया है,क्‍योंकि वहां एबीसी के सारे एक्‍टर थे।
         अमेरिका में स्‍कूल के दिनों में मुझे रंगभेद का शिकार होना पड़ा था। तब मैं 13-14 साल की थी। उस उम्र में ज्‍यादा गहरी चोट लगती है। वह पुरानी बात है। अब कितना दोहराएंगे। स्‍कूल वैसे भी मुश्किल जगह होती है। मैं नहीं कह रही कि वह सही था या गलत। अब भी मैं वही लड़की हूं। उसी रंग की हूं। शायद यह मेरे लिए एक प्रकार की जीत है। जुरासिक वर्ल्‍ड में इरफान खान का नाम और काम देख कर मुझे बहुत अच्‍छा लगा था। विदेशी फिल्‍मों और टीवी शो में किसी भारतीय को देख कर रोमांच होता है।मेरे लिए वह कोई रीजन नहीं है कि मैं यह कर रही हूं।मैं इसलिए कर रही हूं कि एक्‍टर हूं। मुझे अच्‍छे काम का शौक है। मुझे अच्‍छा काम देश में मिले या विदेश में मिले। मुझे हिंदी फिल्‍मों का बहुत शौक है तो मैं इसे छोड़ कर तो जाऊंगी नहीं। जब तक लोग मुझे देखना चाहते हैं हिंदी फिल्‍में करती रहूंगी। फिल्‍मों में गाना नहीं हो तो है तो मुझे बहुत प्राब्‍लम हो जाती है। मुझे विदड्राल सिस्‍टम सताने लगता है। इसलिए मैंने डिसाइड कि चाहे मेरे शेडयूल पागल हो जाएं। मेरा शरीर थक जाए। मेरे लिए जरूरी कि मैं दोनों वर्ल्‍ड के लिए काम करूं। काली काफी पर जी रही हूं आज कल। सिर्फ दो दो दिनों के लिए इंडिया आना मजाक नहीं है। हर महीने ऐसा हो रहा है। वहां आठ दिनों में एक एपीसोड पूरा कर रहे हें। लगभीग 16-16 घंटे काम करना पड़ रहा है। शरीर पर इसका असर हो रहा है।