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Thursday, April 30, 2015

दरअसल : तनु वेड्स मनु रिटर्न्स की शूटिंग


-अजय ब्रह्मात्मज
    कुछ सालों पहले तक निर्माता और निर्देशक अपनी फिल्मों की शूटिंग पर बुलाते थे। फुर्सत से बातें होती थीं। हम फिल्म निर्माण की प्रक्रिया की दिक्कतों से परिचित होते थे। कलाकारों और तकनीकी टीम के लोगों से भी बातचाीत और निरीक्षण में अनेक जानकारियां मिलती थीं। इधर कुछ सालों से यह सिलसिला बंद हो गया है। अब निर्माता नहीं बुलाते। उन्हें डर रहता है कि फिल्म का लुक बाहर आ जाएगा। समय से पहले जानकारियां दर्शकों के बीच पहुंच गईं तो फिल्म का नुकसान होगा। सच कहूं तो यह निर्माता और और निर्देशकों का वहम है। जानकारियां पहले मिलें तो दर्शकों की जिज्ञासा और उत्सुकता बढ़ती है। वे अपना मन बनाते हैं। अभी मीडिया के महाजाल में इंस्टैंट पब्लिसिटी का दौर चल रहा है। सभी चाहते हैं कि छोटी से छोटी बातों का भी एकमुश्त चौतरफा असर हो।
    इस पृष्ठभूमि में निर्माता कृषिका लुल्ला और निर्देशक आनंद राय ने अपनी ताजा फिल्म ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ के लिए बुला कर हिम्मत का ही काम किया। दरअसल,ऐसे मेलजोल में परस्पर विश्वास बडी चीज है। अगर आप सूंघने वाले पत्रकार हैं तो सभी आशंकित रहते हैं। लोकेशन और सेट पर ऐसी अनेक बातें होती हैं,जिन्हें तिल का ताड़ बनाया जा सकता है। ज्यादातर ऐसे मामले शूटिंग के दरम्यान होते रहते हैं। और फिर हर मोबाइल में कैमरे और रिकार्डिंग के साथ ही उसे तुरंत इंटरनेट पर डालने की सुविधा आ जाने से भी मुश्किलें बढ़ गई हैं। आखिर कितनी और किस-किस पर आप निगरानी रखेंगे।
    बहरहाल,कुछ हफ्ते पहले कूषिका लुल्ला और आनंद राय के निमंत्रण पर ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ की शूटिंग पर जाने का मौका मिला। दिल्ली से दो-ढाई घंटे की दूरी पर हरियाणा के झज्जर जिले के लोवाखुर्द गांव में शूटिंग चल रही थीं। हरियाणा के गांव के मकान और बथान थोड़े अलग किस्म के होते हें। स्थानीय मौसम और जीवनशैली के कारण यह भिन्नता नजर आती है। ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ में तनु जैसी दिख रही किरदार दत्तो उर्फ कुमारी कुसुम सांगवान है। वह हरियााणा की है और फर्राटेदार हरियाणवी बोलती है। अभी इस फिल्म का ट्रेलर आया तो कंगना रनोट की हरियाणवी पर सभी फिदा हो गए। सीक्वल में तनु के अलावा दत्तो के किरदार में भी कंगना ही हैं। शुरू में आनंद राय की कोशिश थी कि उन्हें कंगना जैसी कोई और लड़की मिल जाए। वैसी कोई लड़की नहीं मिली तो उन्होंने कंगना को ही राजी किया। ट्रेलर में आप ने गौर किया होगा कि तनु और दत्तो चेहरे से तो एक जैसी लगती हैं,लेकिन दोनों के हावभाव अलग हैं। भाषा भी अलग है। उनके मिजाज भी अलग हैं। तनु और मनु की शादी के सात साल हो चुके हैं। दोनों इस शादी में नाखुश है। खास कर तनु की अपेक्षाओं पर मनु खरे नहीं उतरते तो उसकी असंतुष्टि ज्यादा है। उधर मनू भी दांपत्य से हताश है। उसे दत्तो में नई संभावना दिखती है।
    क्लाइमेक्स के ठीक पहले के दृश्य में हरियाणा में दत्तो के गांव में सभी प्रमुख किरदार जमा हो गए हैं। तनु भी राजा अवस्थी के साथ पहुंच जाती है। इस से मनु की योजना में भंडोल हो जाता है। एक साथ सभी को उस गांव में पाकर वह घबरा जाता है। फिल्म की घटनाओं और दृश्यों को विस्तार में बताना अभी उचित नहीं होगा। आनंद राय ने विश्वसनीयता के लिए हरियाणा के वास्तविक लोकेशन पर शूट करने का फैसला किया। सभी मानते हैं कि नैचुरल लाइट और एक्चुअल लोकेशन का विकल्प नहीं होता। अगर आज की कहानी हो तो तो इन से फिल्म की रंग और छटा निराली हो जाती है। झज्जर के लोवाखुर्द गांव में ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ की शूटिंग गांव के सरपंच के घर ही हो रही थी। सरपंच ने शूटिंग की सुविधा और कलाकारों की सुरक्षा की व्यवस्थ कर ही रखी थीं। गांव के दूसरे ग्रामीण भी हर तरह का सहयोग दे रहे थे। सबसे बड़ी बात कि वे शूटिंग में किसी प्रकार का व्यवधान नहीं डाल रहे थे। कुगना को देखने की लालसा भी वे दूर से पूरी कर रहे थे।
    और कंगना रानोट? वह तो झट से तनु और पट से दत्तो की काया में प्रवेश कर जा रही थीं। कलाकार की लगन और धैर्य की परीक्षा आउटडोर के एक्चुअल लोकेशन पर ही होती है। कंगना के समर्पण से स्पष्ट था कि वह हर परीक्षा के लिए तैयार हैं। वह धैर्य से सारे सवाल हल कर रही हैं।

Thursday, April 23, 2015

दरअसल : जीवन राजेश खन्ना का


-अजय ब्रह्मात्मज
    राजेश खन्ना की जिंदगी दिलचस्प है। चूंकि उनके करीबी और राजदार में से कोई भी उनकी जिंदगी के तनहा लमहों को शेयर नहीं करना चाहता,इसलिए हमें उनकी जिंदगी की सही जानकारी नहीं मिल पा रही है। उनकी लोकप्रियता और स्टारडम से सभी वाकिफ हैं। पहली किताब आने के पहले से उनके प्रशंसक उनके करिअर का हिसाब-कितपब रखते हैं। उन्हें मालूम है कि काका ने कब और कैसे कामयाबी हासिल की और कब वे नेपथ्य में चले गए। उन्हें अपनी किीकत मालूम थी,लेकिन वे उसके साथ जीने और स्वीकार करने से हिचकते रहे। यही कारण है कि उनके अतीत की परछाइयों ने उनके व्यक्तित्व को अंधेरे से बाहर ही नहीं आने दिया। बस,एक आकृति घूमती-टहलती रही दुनिया में। उसकी सांसें चल रही थीं,लेकिन सांसों की खुश्बू और गर्मी गायब थी। राजेश खन्ना जीते जी ही अपनी मूर्ति बन गए थे। उनकी मृत्यु के बाद भी उनके जीवनीकारों ने भी इसी निष्पंद व्यक्ति के जीवन चरित अपने साक्ष्यों,अनुभवों और अनुमानों के आधार पर लिखे हैं।
    यासिर उस्मान ने उनकी जिंदगी और करिअर को 256 पृष्इों की किताब राजेश खन्ना : कुछ तो लोग कहेंगे में सरल तरीके से समेटने की कोशिश की है। उन्हें बधाई कि उन्होंने यह काम हिंदी में किया है। हिंदी में सिनेमा पर लिखी जा रही पुस्तकों में अधिकांश प्रकाशक-लेखक संबंध की वजह से फिजूल और अपठनीय हैं। उनके छपने-छापने की वजहें स्पष्ट हैं। स्वतंत्र रूप से कुछ लेखक बढिय़ा काम कर रहे हैं। कुछ किताबें अंग्रेजी से अनूदित होकर आ रही हैं। उनके बारे में मेरी दोटूक राय है कि वे मूलत: हिंदी पाठकों के लिए नहीं लिखी जाती हैं। उनका उद्देश्य अंग्रेजी पाठकों को लुभाना है,जो हिंदी सिनेमा के प्रति मिश्रित अभिरुचि रखते हैं। इनमें से कुछ विदेशी पाठक भी होते हैं। इस पृष्ठभूमि में यासिर उस्मान की राजेश खन्ना की लिखी जीवनी का महत्व बढ़ जाता है। यासिर ने यह जीवनी हिंदी में हिंदी पाठकों के लिए लिखी है। लेखन में उनकी सरलता उल्लेखनीय है।
    इस जीवनी के लेखन में उन्होंने अपने तई राजेश खन्ना के करीबी रहे लोगों से बातें की हैं। उन्हें अपने ध्येय के अनुसार इस्तेमाल किया है। सभी ने राजेश खन्ना के बारे में मोटी जानकारियां शेयर की हैं। अगर कोई रिसर्च करे तो विभिन्न स्रोतों की मदद से ये जानकारियां हासिल कर सकता है। यासिज ने मिली जानकारियों को तरतीब दी है। उन्हें रोचक तरीके से पेश किया है। यों लगता है कि लाइव रिर्पोटिंग चल रही है। टीवी पत्रकार होने के असर से शायद शब्दों में दृश्यांकन की कोशिश सी रही है। अच्छी बात है कि यासिर कहीं भी संलग्न नहीं होते। वे बेलाग तरीके से जानकारियां परोसते जाते हैं। संभवत: इसी वजह इस जीवनी में राजेश खन्ना से अंतरंगता नहीं महसूस होती। हमें पर्याप्त जानकारियां मिलती हैं। व्यक्ति के अंदर चल रहे उथल-पुथल से हम अधिक वाकिफ नहीं हो पाते।
    लोकप्रियता से राजेश खन्ना का स्खलन,शादी के तुरंत बाद बीवी से मनमुटाव,डिंपल की किसी और की अंतरंगता,फिल्म इंडस्ट्री का बदलता रवैया,राजनीति में फिसलन,अप्रासंगिक होने की ग्रंथि और अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं की विस्तृत जानकारी मिलती तो यह जीवन अधिक रोचक और प्रभावशाली हो जाती। सीमित संसाधनों और स्रोतों के बावजूद यासिर उस्मान राजेश खन्ना का जीवन चरित रचने में सफल रहे हैं। मुमकिन है भविष्य में राजेश खन्ना की आधिकारिक जीवनी आए। उनकी जिंदगी में आए सभी व्यक्ति कुछ समय तक ही उनके साथ रहे,इसलिए किसी एक एक व्यक्ति से मिली जानकारी नाकाफी होगी। राजेश खन्ना ने स्वयं कहा था,‘ये सच है कि मैँ रीचे गिर गया और ये तकलीफदेह है ़ ़ ़ ़अगर मुझे सामान्य सफलता मिली होती तो उसे संभालना आसान होता। लेकिन उस ऊंचाई से गिर कर मैं अंदर से जख्मी हुआ हूं। चोट इसलिए भी ज्यादा लगी है क्योंकि मैं माउंट एवरेस्ट से गिरा।’
राजेश ख्न्ना : कुछ तो लोग कहेंगे
लेखक- यासिर उस्मान
पेंगुइन बुक्स
मूल्य- 250 रूपए
   
   
   

फिल्‍म समीक्षा : जय हो डेमोक्रेसी

-अजय ब्रह्मात्‍मज
स्टार: 1.5 
ओम पुरी, सतीश कौशिक, अन्नू कपूर, सीमा बिस्वास, आदिल हुसैन और आमिर बशीर जैसे नामचीन कलाकार जब रंजीत कपूर के निर्देशन में काम कर रहे हों तो 'जय हो डेमोक्रेसी' देखने की सहज इच्छा होगी। सिर्फ नामों पर गए तो धोखा होगा। 'जय हो डेमोक्रेसी' साधारण फिल्म है। हालांकि राजनीतिक व्यंग्य के तौर पर इसे पेश करने की कोशिश की गई है, लेकिन फिल्म का लेखन संतोषजनक नहीं है। यही कारण है कि पटकथा ढीली है। उसमें जबरन चुटीले संवाद चिपकाए गए हैं। फिल्म का सिनेमाई अनुभव आधा-अधूरा ही रहता है। अफसोस होता है कि एनएसडी के प्रशिक्षित कलाकार मिल कर क्यों ऐसी फिल्में करते हैं? यह प्रतिभाओं का दुरूपयोग है। 
सीमा के आरपार भारत और पाकिस्तान की फौजें तैनात हैं। दोनों देशों के नेताओं की सोच और सरकारी रणनीतियों से अलग सीमा पर तैनात दोनों देशों के फौजियों के बीच तनातनी नहीं दिखती। वे चौकस हैं, लेकिन एक-दूसरे से इतने परिचित हैं कि मजाक भी करते हैं। एक दिन सुबह-सुबह एक फौजी की गफलत से गोलीबारी आरंभ हो जाती है। इस बीच नोमैंस लैंड में एक मुर्गी चली आती है। मुर्गी पकडऩे भारत के रसोइए को जबरन ठेल दिया जाता है। फिर से गोलियां चलती हैं। अचानक यह खबर टीवी पर आ जाती है। राष्ट्रीय समाचार बन जाता है और सरकार रामलिंगम के नेतृत्व में एक कमेटी गठित कर देती है। ज्यादातर फिल्म इस कमेटी की कार्यवाही पर केंद्रित है। कमेटी को फैसला लेना है कि पाकिस्तान से हुई गोलीबारी का जवाब दिया जाए या नहीं? पता चलता है कि कमेटी के सदस्यों के निजी मामले इस राष्ट्रीय चिंता पर हावी हो जाते हैं। उनके इगो टकराते हैं। मुद्दा भटक जाता है। तूतू मैंमैं आरंभ हो जाती है। उधर सीमा पर नोमैंस लैंड में पाकिस्तनी रसोइया भी आ जाता है। नोमैंस लैंड में भारत और पाकिस्तान दोनों तरफ के फौजी चीमा सरनेम के है, जो पंजाब के एक ही गांव से जुड़े हैं। उनके बीच भाईचारा कायम होता है। कमेटी के सदस्य किसी फैसले पर पहुंचने के पहले खूब लड़ते-झगड़ते हैं। और यह सब कुछ डेमोक्रेसी के नाम पर हो रहा है। 
 रंजीत कपूर की 'जय हो डेमोक्रेसी' की शुरूआत अच्छी है। ऐसा लगता है कि हम उम्दा सटायर देखेंगे, लेकिन कुछ दृश्यों के बाद फिल्म धम्म से गिरती है। फिर तो सब कुछ बिखर जाता है। हंसी गायब हो जाती है। अनुभवी और सिद्ध कलाकार भी नहीं बांध पाते। कहीं कोई पंक्ति अच्छी लग जाती है तो कहीं कोई दृश्य प्रभावित करता है, लेकिन फिल्म अपना असर खो देती है। थोड़ी देर के बाद सारे कलाकार भी बेअसर हो जाते हैं। कलाकारों को दोष दिया जा सकता है कि उन्होंने ऐसी अधपकी फिल्म क्यों की? उस से बड़ी दिक्कत लेखन और निर्देशन की है। जरूरी नहीं कि उम्दा विचार पर उम्दा फिल्म भी बन जाए। 
 यह फिल्म उदाहरण है कि कैसे कलाकारों की क्रिएटिव फिजूलखर्ची की जा सकती है। सभी कलाकार निराश करते हैं। उन्होंने दी गई स्क्रिप्ट के साथ भी न्याय नहीं किया है। अन्नू कपूर दक्षिण भारतीय के रूप में उच्चारण दोष तक ही सिमटे रह गए हैं। कहीं तो वे किरदार की तरह भ्रष्ट उच्चारण करते हैं और कहीं अन्नू कपूर की तरह साफ बोलने लगते हैं। आदिल हुसैन ने केवल च के स उच्चारण में ही अभिनय की इतिश्री कर दी है। ओम पुरी, सीमा बिस्वास और सतीश कौशिक का अभिनय भी असंतोषजनक है। अवधि: 95 मिनट

दीपिका और प्रियंका का मुकाबला नृत्य


-अजय ब्रह्मात्मज
याद है, संजय लीला भंसाली की ‘देवदास’ में ‘डोला रे डोला’ गीत विशेष आकर्षण बन गया था। इस गाने में पारो और चंद्रमुखी दोनों ने अपने पांवों में बांध के घुंघरू और पहन के पायल मनोहारी नृत्य किया था। ‘देवदास’ में ऐश्वर्या राय और माधुरी दीक्षित के युगल नृत्य को बिरजू महाराज ने संजोया था। संजय लीला भंसाली की फिल्मों की भव्यता की एक विशेषता सम्मोहक और शास्त्रीय नृत्य भी होती है। अपनी फिल्मों में उन्होंने सभी अभिनेत्रियों को नृत्य में पारंगता दिखाने के मौके दिए हैं। पिछली फिल्म ‘गोलियों की रासलीला ़ ़ ऱामलीला’ में दीपिका पादुकोण को ‘ढोल बाजे’ गाने में अपना हुनर दिखाने का अवसर मिला तो सिर्फ एक गाने ‘राम जाने’ में आई प्रियंका चोपड़ा भी पीछे नहीं रहीं। अब ‘बाजीराव मस्तानी’ दीपिका पादुकोण और प्रियंका चोपड़ा का युगल नृत्य दिखेगा। इसे रेमो फर्नांडिस निर्देशित कर रहे हैं।
    ‘बाजीराव मस्तानी’ में दीपिका पादुकोण मस्तानी की भूमिका निभा रही हैं। प्रियंका चोपड़ा बाजीराव की पत्नी काशीबाई की भूमिका में हैं। इन दिनों दोनों इस फिल्म के युगल नृत्य की शूटिंग कर रही हैं। दीपिका और प्रियंका ने पिछले दिनों रोजाना छह-छह घंटे इस नृत्य के अभ्यास किए। प्रियंका ने तो ट्विट भी किया था कि वह रिहर्सल से निढाल हो जाती थीं। संजय लीला भंसाली के लिए विख्यात है कि वे अपनी फिल्मों के दृश्यों और नृत्यों में बारीकियों पर बहुत ध्यान देते हैं। सब कुछ परफेक्ट और वैसा ही होना चाहिए,जैसा उन्होंने सोच रखा है। वे कलाकारों को कोई छूट और मोहलत नहीं देते। भले ही अनगिनत रीटेक लेने पड़ें। उनकी सभी अभिनेत्रियों के पास इस परफेक्शन की जिद के अनेक किस्से हैं। नृत्य में पारंगत दोनों अभिनेत्रियां दीपिका और प्रियंका इस बार अपने प्रिय निर्देशक की क्रिएटिव डिमांड को पूरी करने की कोशिश में लगी हैं। जानकार बताते हैं कि कंक्रीट फर्श पर निरंतर अभ्यास से उनके पांव में छाले पड़ जाते हैं।
    ‘बाजीराव मस्तानी’ 18वीं सदी के पूर्वार्द्ध में महाराष्ट्र के छत्रपति शाहू राजे के पेशवा यानी प्रधानमंत्री थे। कुशल योद्धा बाजीराव अपनी जिंदगी में हर युद्ध में विजयी रहे। काशीबाई उनकी पहली पत्नी थीं। बाद में मस्तानी उनकी जिंदगी में आईं। इस फिल्म में बाजीराव के साथ काशीबाई और मस्तानी भी अहम चरित्र हैं। संजय लीला भंसाली ने दोनों के युगल नृत्य की कल्पना की है। उस समय के मुताबिक यह नृत्य लावणी और शास्त्रीय नृत्य का मेल होगा। रेमो डिसूजा इसे संजय लीला भंसाली की दूसरी फिल्मों के यादगार नृत्यों की तरह भव्य और रम्य बनाना चाहते हैं। अपनी इस चुनौती के लिए उन्होंने सरोज खान का आदर्श सामने रखा है। मुंबई में इस हफ्ते सोमवार से इस गीत-नृत्य की शूटिंग आरंभ हुई,जो 12 दिनों तक चलेगी।
    दीपिका पादुकोण और प्रियंका चोपड़ा दोनों ही जी-जान से संजय लील भंसाली की पेश की चुनौती और कसौटी पर खरी उतरने की कोशिश कर रही हैं। देखना रोचक होगा कि इस बाद पायल और घुंघरू की संगत की खनक कितनी असरदार होती है?

Tuesday, April 21, 2015

इन दिनों मैं समय बिताने के लिए चलता हूं।


मुंबई में कई बार एक इवेंट या मुलाकात के बाद दूसरे इवेंट या मुलाकात के बीच इतना समय नहीं रहता कि मैं घर लौट सकूं या ऑफिस जा सकूं। ऐसी स्थिति आने पर मैं चलता हूं। कई बार अगले ठिकाने तक पैदल जाता हूं। समय कट जाता है और कुछ नई चीजें दिखाई पड़ जाती हैं। आज लाइट बॅक्‍स के प्रिव्‍यू शो के बाद मुझे रणवीर सिंह के घर जाना था। खार जिमखाना तक मैं पैदल ही चल पड़ा। बाकी तो मजा आया,लेकित तीन बार पसीने से तरबतर हुआ। रणवीर के अपार्टमेंट में घुसते समय झेंपा और सकुचाया हुआ था। क्‍यों,रणवीर मिलते ही भर पांज भींच लेते हैं। मुझे डर था कि कहीं दरवाजे पर ही मुलाकात हुई तो क्‍या होगा ? पसीने से तरबतर व्‍यक्ति की झप्‍पी ठीक नहीं रहेगीत्र गनीमत है। मुझे वक्‍त मिला। चसीना सूख गया। और फिर रणवीर मिले तो वैसे ही मिलना हुआ। भर पांज की भींच और ढेर सारी बातें....हर अच्‍छी मुलाक़ात की तरह आज की मुलाकात भी अधूरी ही रही।



Saturday, April 18, 2015

हिंदी टाकीज 2(8) : यादों के गलियारों से... -वर्षा गोरछिया 'सत्‍या'



इस बार वर्षा गोरछिया 'सत्‍या' अपनी यादों के गलियारों से सिनेमा के संस्‍मरण लेकर लौटी हैं। फतेहाबाद,हरियाणा में पैदा हुई वर्षा ने पर्यटन प्रबंधन में स्‍नातक किया है। बचपन से सिनेमा की शौकीन वर्षा ने अपनी यादों को पूरी अंतरंगता से संजोया है। फिलहाल वह गुड़गांव में रहती हैं। हरियाणा की वर्षा के सिनेमाई अनुभवों में स्‍थानीय रोचकता है।



रविवार का दिन है, शाम के वक़्त बच्चे काफी शोर कर रहे हैं  कुछ बच्चे बबूल (कीकर) के पेड़ पर चढ़े हुए हैं  कुछ जड़ों को काटने के लिए खोदे गए गड्ढे में कुछ अजीब ढंग के लाल-पीले चश्मा लगाकर, गर्दन हिलाकर चिल्ला रहे हैं “दम मारो दम,मिट जाए गम, बोलो सुबहो शाम..”, तभी एक बच्चा बबूल के पेड़ के किसी ऊंची डाल पर से बोलता है “बसंती, इन कुत्तों के सामने मत नाचना..”  एक छोटी सी लड़की ने एक डंडा गिटार की तरह पकड़ रखा है और फ्लिम “यादों की बारात” का गाना “चुरा लिया है तुमने..” गा रही है  इसी तरह अलग-अलग बच्चे अपनी-अपनी पसंदीदा फिल्मों या कलाकारों की नक़ल करने में लगे हुए हैं  ये सब मैं कोई नाटक का दृश्य बयान नहीं कर रही बल्कि अपनी बचपन की याद ताज़ा कर रही हूँ और वो हाथ में गिटार की शक्ल में डंडा लिए लड़की कोई और नहीं बल्कि मेरी छोटी बहन थी 

कोई शायद सोच भी नहीं सकता कि जिस फिल्म को बनाने में निर्देशकों को हजारों, लाखों या करोड़ों रूपये लगे होंगे, महीनों या सालोँ की मेहनत लगी होगी, जिस पात्र को सजीव करने में एक कलाकार ने अपना खून-पसीना लगाया होगा उस पूरी फिल्म को हम गली के बच्चे मिलकर घंटे भर में बना डालते थे और ये हमारा सबसे प्रिय खेल था  मैं अनुमान करती हूँ कि उस दौर के अधिकतर बच्चों का बचपन कुछ इसी तरह का रहा होगा  हम में से किस लड़की को याद नहीं होगा कि किस तरह हम अलग-अलग परिधानों में अलग-अलग गाने गाती या उन पर थिरकती और खुश होतीं  सिनेमा ने कम समय में ही लोगों के बीच अपना एक अलग स्थान बना लिया और अगर मैं कहूँ की हमारी पीढ़ी तक आते आते ये जीवन शैली का एक अति महत्वपूर्ण हिस्सा हो गयी तो शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी 

मैं बात कर रही हूँ नब्बे के दशक की जिसमे मेरा बचपन, किशोरावस्था की दहलीज़ तक पहुंचा ये वो दौर था जब सिनेमाघरों से निकलकर सिनेमा लोगों के घरों तक पहुचने लगी थी  टेलीविज़न ने ये काम आसान कर दिया था अब हम घर में बैठकर फिल्म का आनंद ले सकते थे  दूर दराज के गाँव और छोटे शहरों में भी गली-मोहल्ले में एक-आध टी.वी. होता जहाँ पूरा आस-पड़ोस एक साथ बैठकर सिनेमा का आनंद लेते इस दौर में लोग छोटे परदे पर रामायण-महाभारत जैसे धारावाहिक से प्रभावित थे और फिर उसी लय में कई और धारावाहिक भी बनाए गए जैसे श्रीकृष्णा, जय हनुमान इत्यादि और सभी कमोवेश लोकप्रिय हुए  धीरे धीरे छोटा परदा भी अपना विस्तार करने लगा था  यहाँ अब धार्मिक कथाओं के अलावे अन्यान्य विषयों पर भी धारावाहिक आने लगे जैसे “युग”,“अर्धांगिनी”, “वक़्त की रफ़्तार”, “मिर्ज़ा ग़ालिब”, “तमस” इत्यादि जो बहुत महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डालते नज़र आये मगर सिनेमा का अपना महत्व कायम रहा 

सिनेमा लोगों के जीवन मूल्यों पर गहरा प्रभाव डालता रहा है  ये शुरुआत इतने हलके से होती है कि  लोग महसूस भी नहीं कर पाते सुना हुआ है कि देवता का किरदार निभाने वाले को ही देव चेहरा समझा जाने लगा था  लोग अगरबत्तियां और फूल-फल लेकर रामायण, महाभारत देखने बैठते थे  अरुण गोविल और दीपिका अभिनेता न होकर कलयुग के राम और सीता हो गए थे  इसी प्रकार फिल्मो में दिखाए जाने वाले पात्रों में भी लोग अपनी छवि ढूंढते थे या आसपास के लोगों को सिनेमा के पात्रों से जोड़कर देखते थे  यहाँ मैं आपको एक छोटा सा दृष्टान्त सुनाती हूँ, माँ बताती है कि जब मैं चार-पांच साल की थी एक बार फिल्म देखते देखते रो पड़ी क्यूँकि फिल्म में एक “शीला देवी” नामक कोई पात्र मर जाती है और मेरी माँ का नाम भी “शीला देवी” था, ये किस्सा भले ही भोलेपन का हो मगर ये सिनेमा का असर ही है, जिसे नहीं नकारा जा सकता  ऐसे ही हर कोई सिनेमा के साथ हँसता-रोता है, परेशां होता है भले ही तहजीब का नकाब ओढने के बाद वो पांच साल की बच्ची की तरह फूट कर नहीं भी रोये पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जब भी हम फिल्म देख रहे होते हैं वो हमें अपने जादू में जकड़े रखता है  ये बहुत पहले की बात नहीं जब “मोगेम्बो” के खुश होने पर लोग दुखी और उसको पीटे जाने पर खुश होते थे, ये भी लोगों को शायद ही विस्मरण हुआ होगा जब “शोले” के “जय” को गोली लगती है तो कैसे उसके लिए ह्रदय व्यथित हो जाता है और जब “गब्बर” को “ठाकुर” से मार पड़ती है तो कैसे दिल खुश होता है  हम पात्र के साथ प्रेम करते हैं, सच्चाई की जीत चाहते हैं, बुराई को मात देना चाहते हैं 

पचास के दशक की सिनेमा की बात करें, नब्बे के दशक की या आज की, सिनेमा में एक मुख्य पात्र होता है और सिनेमा उसीके चारों ओर घूमती है  भले ही वक़्त के साथ सिनेमा का ढंग कुछ न कुछ बदला हो पर हमारा नायक जिस प्रकार अपने कंधो पर जिम्मेदारियां लेता है उसी प्रकार हर व्यक्ति के कन्धों पर उसके परिवार की ज़िम्मेदारी होती है जिसे वह मेहनत, सचाई और इमानदारी से निभाने का प्रयास करता है, यही तो उसके नायक ने भी किया होता है 

सिनेमा और मैं

मैं बचपन से ही रविवार और शुक्रवार का अखबार घर वालों से छुपाकर इकठ्ठा करती थी और ऐसा करने वाली मैं अकेली लड़की नहीं थी  कुछेक उदाहरण तो मेरे अपने ही घर में मौजूद थे  हम दो बहनों समेत चार सहेलियां थीं  जिनका ये मनपसंद शौक हुआ करता था और मैं बड़े यकीन के साथ कह सकती हूँ कि इस तरह औरों ने भी अपने सिनेमाई दीवानापन को जाहिर किया ही होगा  क्या ये आपको याद नहीं होगा कि गाँव से अपने मनपसंद अभिनेता-अभिनेत्री के पोस्टर लाने लोग शहरों तक चले जाते, बच्चे अपने कॉपी और किताबों पर तस्वीरों वाले अखबार की जिल्द लगाया करते तो कुछ लोग अपने बाल उसी स्टाइल में कटवाते जिसमे उनके पसंदीदा हीरो या हीरोइन ने कटवाया होता और आज भी ये आलम बरकरार है बहुत नहीं बदला  हाँ, तो मैं बता रही थी अखबार के बारे में, मुझे याद आता है कि किस तरह मैं अखबार के रंगीन पृष्ठ पाने के लिए मेहनत किया करती थी  सिनेमा और उसके अभिनेता-अभिनेत्रियों के बारे में जानने की जिज्ञासा, उनकी तस्वीरें सब-कुछ ही तो लुभाती थी मुझे  पंजाब केसरी का वो रंगीन पृष्ठ एक दो और रोचक स्तंभों की वज़ह से बहुत प्रसिद्ध हुआ  इसमें किसी एक कलाकार की सारी फिल्में, उनका एक विवरण और एक अलग साइज़ में एक खास तस्वीर दी होती थी, इसके साथ ही एक फ़िल्मी वर्ग पहेली होती थी जिसमे दायें से बायें और ऊपर से नीचे गाने के शब्द या कलाकार का नाम दिया होता जो सबसे रोचक था 

जब इतने सारे सेटेलाईट चैनलों का चलन नहीं हुआ था तब फिल्म के लिए तीन दिन निर्धारित हुआ करते थे और फ़िल्मी गाने भी अपनी अहम् भूमिका में सिर्फ दो दिन दिखाए जाते थे, रविवार को हेमामालिनी जी के साथ रंगोली और बुधवार को चित्रहार  मुझे आज भी अच्छी तरह याद है कि हर रविवार को सुबह-सुबह हेमा जी हमें सिनेमा से जुड़ी रोचक बातें बताती और बीच-बीच में मधुर गीत सुनाती  उनमे निश्चित तौर पर एक धार्मिक गीत, कुछ पुराने गाने और एक या दो नए गाने भी सुनने को मिलते और हम खुद को थिरकने से नहीं रोक पाते  यहीं से हमारा सिनेमाई दुनिया के बारे में जानने का सिलसिला शुरू हुआ  एक मज़ेदार वाकया ये हुआ
कि एक बार हेमा जी रंगोली के किसी भाग में रेखा जी को एक काली-मोटी, गन्दी सी लड़की कहकर संबोधित कर रहीं थीं और मैं नाराज हो गयी, आगे सुनने की सुध किसे थी
  वज़ह ये थी कि मैं बचपन से ही रेखा की फैन रही हूँ, डी.डी. १ पर जबसे “घर” फिल्म देखी थी, मुझे उस चेहरे से ही प्रेम था जिसे हेमाजी भद्दा बता रही थी  वो नाराजगी हेमा जी से कब ख़त्म हुई ये कहना मुश्किल है मगर बाद में पता चला कि उस दिन रेखा जी की पहली फिल्म “सावन-भादो” की बात हो रही थी 
      
 सिनेमा किसी न किसी रूप में हमारे दैनिक जीवन के हर क्षेत्र में प्रवेश पाता गया चाहे वो हर शनिवार को स्कूल में होने वाली अंतराक्षरी हो या 15 अगस्त, 26 जनवरी से एक हफ्ते पहले रिहर्सल रूम में बजने वाले देशभक्ति फ़िल्मों के गाने  सिनेमा की दी हुई धुनों पर पूरा देश गाने लगता था  बॉर्डर, क्रांति, क्रांतिवीर, पूरब-पश्चिम, देशप्रेमी जैसी देशप्रेम से ओतप्रोत अनेक फिल्में हममें एक अलग ऊर्जा का संचार करती थी  मुझे तो ये भी याद आता है कि जन्मदिन पर अगर कोई दोस्त मनपसंद फिल्म या गानों का कैसेट भेंट करता तो वो हमारा सबसे प्यारा दोस्त होता  “पापा कहते हैं ऐसा काम करेगा..” हर बच्चे की जुबान पर था  बच्चों को ध्यान में रखकर बनायीं गई फिल्में वैसे तो कम थी पर उनका एक खास स्थान जरूर रहता था  फिर इसमें एक ठहराव आया और राजू चाचा, मकड़ी, छोटा चेतन जैसी छिटपुट फिल्में समय समय पर आती रहीं मगर इसके बाद कुछ समय के लिए सिनेमा से बचपन गायब रहा फिर “तारे ज़मीन पर” ने ये परिस्थिति बदली  हालिया दिनों में कई फिल्में आई हैं जो बच्चों को आकृष्ट करने के साथ उर्जा भी प्रदान करती है 

बचपन से ही मुझे सिनेमा और उनसे जुड़े लोग लुभाते रहे हैं  सिनेमा से जुड़े किस्से भी उतने ही लोकप्रिय रहे हैं  एक वाकया ये भी याद आता है कि जब काजोल और अजय देवगन कि शादी हुई, बहुत से लड़कियों के दिल टूटे पर बहुत सी शाहरुख़ खान के बच जाने के लिए खुश भी थी  लोग परदे पर बनी जोड़ियों के लिए इतने भावुक हो जाते कि उसी को सच समझते  काजोल और शाहरुख़ ने भी लोगो में एक ऐसी छवि बना ली थी  लोग उन्हें साथ देख खुश होते थे, उनके प्रेम, शादी, खुशहाली की दुआ मांगते और मैं उनसे भिन्न नहीं थी  ये वो वक़्त था जब मैंने प्यार किया” “हम आपके हैं कौन” “दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे” जैसी साफ़-सुथरी और प्रेम भाव की फिल्में अधिक बन रही थी और इन फिल्मों ने सामाजिक संरचनाओं के विषमताओं पर हलकी सी चपत लगाने के साथ-साथ सामाजिक मूल्यों और पारिवारिक मेल-भाव पर बल दिया 

मेरे देखते देखते ही धीरे-धीरे सिनेमा का विषय बदलता गया  देशप्रेम, पारिवारिक व्यवस्था, सामजिक कुरीति या सामान्य प्रेम कथाएं अब विषयसूची से बाहर होती चली गई  एक और जहाँ कुछ तथ्यपरक फिल्में जैसे कि “मद्रास कैफ़े”, “थ्री इडियट्स” दिखाई दी हैं जो पहले नहीं दिखती थी वहीँ दूसरी ओर कई बेतुकी फिल्मों ने भी अपनी जगह बना ली है  ये अवमूल्यन हास्य फिल्मों में सबसे अधिक दिखाई पड़ता है  आज हास्य के नाम पर अधिकतर भौंडापन और असामाजिक बातें ही सिनेमा में रह गयी है  हम, हास्य अभिनेता महमूद और जॉनी वाकर से लेकर कादर खान और जॉनी लीवर तक पर खूब हँसने वाले जब आज “हैप्पी न्यू ईअर” और “ग्रांड मस्ती” जैसी फिल्मों को देखते हैं तो लगता है कि सिनेमा बीमार है 

सिनेमा और उसका प्रभाव

हिंदी सिनेमा को हम सबने बचपन से जीवन के लगभग हर क्षेत्र में महसूस किया होगा  वो चाहे प्रेम हो, साहित्य हो, राजनीति हो या संस्कृति  मैं इसे हिंदी सिनेमा का जादू ही कहूँगी कि इसने हर भाषा को अपनाया, हर संस्कृति को दर्शाया चाहे वो पाश्चात्य हो, बंगाली सी कोमल हो, पंजाबी सी मस्त-मौला या उर्दू सी तहजीब वाला 
सिनेमाई दुनिया दरअसल हमारे चारों तरफ फैली हुई है  घरों की साज-सज्जा से लेकर उनके बनावट तक, लोगों के हेयर स्टाइल से लेकर उनके पहनावे तक, उनके बोलचाल से लेकर उठने-बैठने तक हर जगह मैंने सिनेमा का प्रभाव देखा है 

साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है और अगर सिनेमा की उपयोगिता की बात करें तो मैं मानती हूँ इसने साहित्य के काम को सरल कर दिया क्यूंकि यह एक मात्र ऐसा साधन है जो हर वर्ग तक एक समान रूप से पहुंचा है  जहाँ कुछ फिल्में सच्ची घटनाओं पर आधारित रही हैं वहीँ कुछ प्रेरणा सूचक भी  सिनेमा को मैंने न सिर्फ हमारी कमजोर राजनैतिक पहलुओं को उजागर करते देखा है बल्कि पुलिस की समस्या, समाज की रुढिवादिता जैसे अनेक सामाजिक समस्याओं पर भी इसने चोट किया है  “मदर इंडिया”, “नया दौर”, “गाइड”, “इज़ाज़त”, “दामिनी”, “अंधा कानून” इत्यादि ये ऐसे कई नाम हैं जो भिन्न-भिन्न विषयों अपनी गहरी छाप छोड़ती नज़र आई है 

सिनेमा को मैंने सामजिक विषमताओं को उजागर करने के क्रम में कई ऐसे विषय को भी अपनाते देखा  जिससे समाज ने दूरी बनायी है  मैं उदहारण स्वरुप कुछ फिल्मों का नाम लेती हूँ जो मेरी देखी हुई है, “स्पर्श” एक ऐसे अंधे आदमी की कहानी बताता है जो स्वाभिमानी है और साथ ही अंधों के समस्याओं पर काम कर रहा है, वहीँ “फिर मिलेंगे” एक एड्स रोगी की कहानी है, जो ये साबित करना चाहता है कि एक एड्स रोगी को भी सामान्य जीवन जीने का हक़ है  ये दोनों फिल्में समाज को सकारात्मकत दृष्टिकोण देती है और बदलते समय के साथ कदम मिलाकर चलने के लिए उत्साहित करती है   इसी कड़ी में एक और नाम जोड़ना चाहूंगी, फिल्म का नाम था “क्या कहना”  इस फिल्म में एक लड़की की कहानी जिस तरह से लोगों के सामने रखी गयी वो भारतीय समाज के  लिए अछूत विषय था  हमारे यहाँ माँ को भगवान् का दर्ज़ा तो दिया गया है पर उसके लिए एक दायरा है, वो है माँ का शादी शुदा होना  इस फिल्म ने इसी दायरे को तोड़ने की कोशिश की  इस फिल्म के एक दृश्य में नायिका मन ही मन अपने आपको बिन ब्याही माँ होने पर पवित्र महसूस करती है, वो एक ऐसा क्षण था जब वो संवाद सुनकर मैं अकेले में बहुत रोई  अकेले में रोने का मतलब था कि मैं खुल कर इस बात का समर्थन कर सकने में असमर्थ थी पर जिस बात को मैं अब तक ग़लत नज़रिए से देखती थी उसके लिए संवेदना आना ही दर्शाता है कि वो एक बदलाव की घड़ी थी  इसी तरह की कई और फिल्में भी समय-समय पर वक़्त के साथ बदलने और समाज को आइना दिखाने को तैयार रही हैं 

लोगों के परिधान और उनके सामाजिक स्थिति पर भी सिनेमा का प्रभाव दिखा है  गुज़रे वक़्त में जब नायिका पैंट-शर्ट या स्कर्ट पहन कर परदे पर दिखाई देती तो इसे हैरत भरी नज़रों से देखा जाता था, पर आज ऐसा नहीं है  मुझे भी ये जिज्ञासा रहती थी कि आखिर किस नायिका ने पहली बार ऐसा करने का दुस्साहस किया होगा, किस फिल्म ने पहली बार भारतीय नारी के लाज को सिर्फ चोली, घाघरा या साड़ी का मोहताज़ नहीं रखा होगा  मुझे याद है कि मेरे गाँव के इलाके में औरतें घाघरा पहनती थीं  अलग अलग राज्यनुसार कहीं साड़ी तो कहीं सलवार-कमीज़ तो कहीं कुछ और ही परिधान हुआ करता था  अब खुद की सहजता के अनुसार परिधान बदल गए हैं  सिनेमा के प्रभाव से एक राज्य का परिधान दूसरे राज्य तक पहुँच गया है  अब उनमे अंतर करना भी धीरे धीरे मुश्किल हो गया है  इतना ही नहीं कई रीति-रिवाज़, त्यौहार इत्यादि भी सिनेमा के माध्यम से एक जगह से दूसरे जगह पहुँच रहा है  ये भारत को जोड़ने का एक महीन सा उदाहरण है और साथ ही सांस्कृतिक आदान-प्रदान का एक नया अध्याय भी लिखा जा रहा है 

और अंत में

हिंदी सिनेमा में संवाद और उसकी अदायगी के महत्व को नहीं नकारा जा सकता  ऐसे दर्जनों नहीं सैकड़ों संवाद होंगे जो लोगों की जुबान पर ऐसे चढ़े की आज तक उनका जादू बरकरार है  मेरे ज़ेहन में खुद ही “मुग़ल-ए-आज़म” और “शोले” जैसी कई फिल्मों के संवाद अक्षरसः मौजूद है और यही इन्हें कालजयी भी बनाती हैं पर हालिया फिल्मों  में संवाद अदायगी की ओर से ध्यान हटा लिया गया है जो मेरे दृष्टिकोण में एक कमजोर पहलू है 
       
 न जाने क्यूँ मगर मेरे अन्दर सिनेमा के लिए शुरू से ही एक अलग झुकाव रहा है  नायिका बनने की इच्छा कितनी रही या नहीं रही इस पर तो कभी विचार नहीं कर पायी पर एक दर्शक के रूप में सिनेमा के लिए चाहत हमेसा बनी रही है  मेरे अन्दर की बच्ची ही सिर्फ सिनेमा पर नहीं हँसी या रोई है बल्कि आज भी कई दृश्य मुझे विचलित करते हैं तो कुछ घंटो या दिनों तक मुझे खुश और तरोताजा रखते हैं  “हम आपके दिल में रहते हैं” फिल्म का एक दृश्य मुझे इतना मार्मिक लगता है कि मैं आज तक वो दृश्य दखने की हिम्मत नहीं जुटा पायी हूँ  ऐसे तो न जाने कितने और दृष्टांत आते जाएं और मैं लिखती जाऊं 

हालांकि आज के दौर में लोग तकनीक को बेहतर समझने लगे हैं और प्रसारण के अनेक माध्यम हो जाने के कारण एक साथ देखने की परिपाटी भी लगभग समाप्तप्राय है, और इस वज़ह से भावनाओं का वो ज्वार-भाटा नहीं दीखता पर सिनेमा का जादू अब भी कायम है और आशा करती हूँ कि ये और नए आयाम तक पहुंचेगी 

-          वर्षा गोरछिया “सत्या”
varshagorchhia89@gmail.com
                                          

Friday, April 17, 2015

फिल्म समीक्षा : मिस्टर एक्स

स्टार: डेढ़ स्टार
विक्रम भट्ट निर्देशित इमरान हाशमी की 'मिस्टर एक्स' 3डी फिल्म है। साथ ही एक नयापन है कि फिल्म का नायक अदृश्य हो जाता है। यह नायक अदृश्य होने पर भी अपनी प्रेमिका को चूमने से बाज नहीं आता, क्योंकि पर्दे पर इमरान हाशमी हैं। इमरान हाशमी की कोई फिल्म बगैर चुंबनों के समाप्त नहीं होती। विक्रम भट्ट 3डी तकनीक में दक्ष हैं। वे अपनी फिल्में 3डी कैमरे से शूट भी करते हैं, लेकिन इस तकनीकी कुशलता के बावजूद उनकी 'मिस्टर एक्स' में कथ्य और निर्वाह की कोई नवीनता नहीं दिखती। फिल्म पुराने ढर्रे पर चलती है।

रघु और सिया एटीडी में काम करते हैं। दोनों अपने विभाग के कर्मठ अधिकारी हैं। एक-दूसरे से प्रेम कर रहे रघु और सिया शादी करने की छट्टी ले चुके हैं। उन्हें बुलाकर एक खास असाइनमेंट दिया जाता है। कर्तव्यनिष्ठ रघु और सिया पीछे नहीं हटते। वे इस असाइनमेंट में एक कुचक्र के शिकार होते हैं। स्थितियां ऐसी बनती हैं कि दोनों एक-दूसरे के खिलाफ हो जाते हैं। अदृश्य हो सकने वाला नायक अब बदले पर उतारू होता है।

वह स्पष्ट है कि कानून उसकी कोई मदद नहीं कर सकता, इसलिए कानून तोडऩे में उसे कोई दिक्कत नहीं होती। बदले की इस भिड़ंत के बीच कुछ नहाने के दृश्य हैं, जहां अदृश्य नायक अपनी नायिका को चूमता है। इस मद में अच्छी रकम खर्च हुई होगी। महंगे चुंबन हैं 'मिस्टर एक्स' में। भट्ट कैंप की फिल्म है तो जब-तब गाने भी सुनाई पड़ते हैं। दर्शक अनुमान लगा सकते हैं कि कब गना शुरू हो जाएगा।

दर्शक इस फिल्म की पूरी कहानी का अनुमान लगा सकते हैं। सब कुछ प्रेडिक्टेबल और सरल है। महेश भट्ट और विशेष फिल्म्स की फिल्मों का एक पैटर्न बन चुका है। कभी कढ़ाई सुघड़ हो जाती है तो दर्शक फिल्म पसंद कर लेते हैं। 'मिस्टर एक्स' से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती। इमरान हाशमी का जादू बेअसर हो चुका है।
फिल्म में उनका किरदार ढंग से लिखा भी नहीं गया है। सिया की भूमिका में अमायरा दस्तूर कमजोर हैं,जबकि उन्हें कुछ अच्छे दृश्य मिले हैं। अरूणोदय सिंह अपनी मौजूदगी से प्रभावित नहीं काते। उन्हें अभी तक अभ्यास की जरूरत है। तिवारी की छोटी भूमिका में आया कलाकार अपनी बेवकूफियों में अच्छा लगता है।

भट्ट कैंप की फिल्मों का संगीत कर्णप्रिय होने की वजह से लोकप्रिय होता है। इस बार वह मधुरता नहीं है। पॉपुला सिंगर अंकित तिवारी भी निराश करते हैं। वे एक ही तरीके से गाने लगे हैं या उनसे वैसी ही मांग की जाती है? दोनों ही स्थितियों में उन्हें सोचना चाहिए।

और हां, इस फिल्म में हर किरदार भारद्वाज को भरद्वाज क्यों बुलाता है? उ'चारण की और भी गलतियां हैं। फिल्म में भट्ट साहब ने शीर्षक गीत में आवाज दी है। बेहतर होगा कि वे ऐसे चमत्कारिक दबावों से बचें। कृष्ण, गीता और रघु व सिया के प्रतीकात्मक नाम...सब फिजूल रहा।
अवधि- 132 मिनट

Thursday, April 16, 2015

फिल्म समीक्षा : मार्गरिटा विद ए स्ट्रा

-अजय ब्रहमात्मज
स्टार: 4
शोनाली बोस की निजी जिंदगी संबंधों और भावनाओं की उथल-पुथल से कांपती रही है। इधर कुछ उनसे बिछुड़े और कुछ अलग हो गए। बड़े बेटे ईशान को आकस्मिक तरीके से खोने के बाद वह खुद के अंतस में उतरीं। वहां सहेज कर रखे संबंधों को फिर से झाड़ा-पोंछा। उन्हें अपनी रिश्ते की बहन मालिनी और खुद की कहानी कहनी थी। मालिनी के किरदार को उन्होंने लैला का नाम दिया। अपनी जिंदगी उन्होंने विभिन्न किरदारों में बांट दी।
इस फिल्म में शोनाली की मौजूदगी सोच और समझदारी के स्तर पर है। उन्होंने लैला के बहाने संबंधों और भावनाओं की परतदार कहानी रची है। सेरेब्रल पालसी में मनुष्य के अंगो के परिचालन में दिक्कतें होती हैं। दिमागी तौर पर वे आम इंसान की तरह होते हैं। प्रेम और सेक्स की चााहत उनके अंदर भी होती है। समस्या यह है कि हमारा समाज उन्हें मरीज और बोझ मानता है। उनकी सामान्य चाहतों पर भी सवाल करता है।
'मार्गरिटा विद ए स्ट्रॉ' लैला के साथ ही उसकी मां, पाकिस्तानी दोस्त खानुम, गुमसुम व सर्पोटिंग पिता, नटखट भाई और लैला की जिंदगी में आए अनेक किरदारों की सम्मिलित कहानी है, जों संबंधों की अलग-अलग परतों में मौजूद हैं। वे सभी अपने हिस्से के प्रसंगों में धड़कते हैं और कहानी के प्रभाव को बढ़ाते हैं। सेरेब्रल पालसी की वजह से अक्षम लैला क्रिएटिव और इमोशनल स्तर पर बेहद सक्षम है। ऊपरी तौर पर उसे मदद और भावनात्मक संबल की जरूरत है। शोनाली ने इस किरदार को गढऩे में उसे पंगु नहीं होने दिया है। वह लैला के प्रति सहानुभूति जुटाने के लिए दृश्य नहीं रचतीं। इस फिल्म में मेलोड्रामा की पूरी संभावनाएं थीं। वह लैला और उसकी मां को गलदश्रु (रोता हुआ) किरदार बना सकती थीं, लेकिन फिर वह अपने कथ्य को आंसुओं में डुबो देतीं। फिल्म सभी संबंधों की परतें खोलती हैं। फिल्म देखते हुए हम संवेदनात्मक रूप से समृद्ध होते हैं। नए संबंधों से परिचित होते हैं। संबंधों के इन पहलुओं को पहले कभी नजदीक से नहीं देखा हो तो बार-बार सिहरन होती है। कुछ नया उद्घाटित होता है। हर किरदार के साथ कहानी एक नया मोड़ लेती है और रिश्तों का नया आयाम दिखा जाती है। 'मार्गरिटा विद ए स्ट्रॉ' सही मायने में रोचक और रोमांचक फिल्म है। भरपूर इमोशनल थ्रिल है इसमें।
शोनाली बोस को कल्कि कोइचलिन का पूरा सहयोग मिला है। उन्होंने लैला को आत्मसात कर लिया है। हाव-भाव और अभिव्यक्ति में वह कोई कसर नहीं रहने देतीं। कल्कि ने इस किरदार को आंतरिक रूप से पर्दे पर जीवंत किया है। सेरेब्रल पालसी की वजह से किरदार की गतिविधियों में आने वाली स्वाभाविक भंगिमाओं को जज्ब करने के साथ ही उन्होंने उसकी मानसिक क्षमताओं को भी सुंदर तरीके से जाहिर किया है। उन्हें सयानी गुप्ता और रेवती का बराबर साथ मिला है। रेवती ने मां की ममता और भावना के बीच सुंदर संतुलन बिठाया है। बेटी के लिए चिंतित होने पर भी वह नई चीजों को लेकर असहज नहीं होतीं और न हाय-तौबा मचाती हैं। ऐसे किरदार को पर्दे पर उतारना सहज नहीं होता।
'मार्गरिटा विद ए स्ट्रॉ' माता-पिता और बेटी-बेटों के साथ देखी जाने वाली फिल्म है। हां, उनका व्यस्क होना जरूरी है। भारतीय समाज में अभी समलैंगिकता की सही समझ विकसित नहीं हुई है। इसे या तो रोग या फिर जोक माना जाता है। हिंदी फिल्मों में समलैंगिक किरदार हास्यास्पद होते हैं। लैला के जरिए शोनाली बोस एक साथ अनेक सामाजिक ग्रंथियों को छूती हैं। वह कहीं भी समझाने और सुधारने की मुद्रा में नहीं दिखतीं। उनके किरदार अपनी जिंदगी के माध्यम से सब कुछ बयान कर देते हैं।
अवधिः 101 मिनट