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Saturday, January 31, 2015

दरअसल : सेंसर बोर्ड का ताजा हाल

-अजय ब्रह्मात्मज
    बुधवार 21 जनवरी तक केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के आधिकारिक वेबसाइट पर नए अध्यक्ष का नाम नहीं लगाया गया था। लीला सैंपसन के इस्तीफा देने के बाद नई सरकार ने आनन-फानन में अध्यक्ष की नियुक्ति के साथ 9 नए सदस्यों की भी नियुक्ति कर दी गई। वेबसाइट पर पुराने 23 सदस्यों के नाम ही लगे थे। उस सूची में नए सदस्यों के नाम नहीं शामिल हो सके थे। डिजीटल युग में प्रवेश करने के बाद भी यह स्थिति है। यह सिर्फ आलस्य नहीं है। वास्तव में यह मानसिकता है,जो ढेर सारी नवीनताओं के प्रति तदर्थ रवैया रखती है। कायदे से नई नियुक्तियों के साथ ही वेबसाइट पर नामों का परिवत्र्तन हो जाना चाहिए था। सेंसर बोर्ड के नए सदस्यों और अध्यक्ष की नियुक्ति से बौखलाए लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि भविष्य में भी यही रवैया रहेगा। बदलने के बावजूद ज्यादातर कामकाज पूर्ववत चलता रहेगा।
    नए अध्यक्ष और बोर्ड के सदस्यों के बारे में कहा जा रहा है कि वे भाजपा के करीब हैं। उनमें से कुछ सदस्यों के बारे में यह भी कहा जा रहा है कि उनके संबंध संघ से रहे हैं। मुमकिन है ऐसा हो। तब भी हमें यह ध्यान में रखना होगा कि भारत में सेंसर बोर्ड के सदस्यों और अध्यक्ष की नियुक्ति सत्तारूढ़ पार्टी की मनमर्जी से होती है। हा सरकार की यह मंशा रहती है कि सारे सदस्य और अध्यक्ष उनके वश में रहें ताकि वक्त-जरूरत पडऩे पर उनका उपयोग किया जा सके। 15 जनवरी 1951 से अभी तक के 63 सालों में 27 अध्यक्षों की नियुक्तियां हुई है। अध्यक्ष का कार्यकाल तीन सालों का होता है। अतीत में अधिकांश अध्यक्षों ने तीन सालों का कार्यकाल पूरा नहीं किया। केवल शक्ति सामंत और शर्मिला टैगोर सात-सात सालों तक अध्यक्ष रहे थे। पिछली अध्यक्ष लीला सैंपसन का कार्यकाल पिछले साल अप्रैल में ही पूरा हो गया था। उनकी जगह नई नियुक्ति पर विचार चल ही रहा था कि उन्होंने एमएसजी फिल्म को प्रदर्शन की अनुमति दिए जाने को मुद्दा बना कर इस्तीफा दे किया। उनके इस्तीफे की वजह और मीडिया कवरेज से ही नई नियुक्तियों पर सभी का ध्यान गया। शोर है कि नई नियुक्तियों में भाजपा और संघ के करीबियों को प्राथमिकता दी गई है।
    गौर करें तो 1951 में सेंसर बोर्ड की स्थापना के बाद से नेहरू के विचारों से प्रेरित होकर यह संस्था भी वैचारिक स्वायत्तता के साथ दिशानिर्देशों का पलन करती रही। इंदिरा गांधी के दौर में आपात्काल लागू होने पर तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने अवश्य हस्तक्षेप किया। उसके बाद से सत्तारूढ़ पार्टियों ने हमेशा इस बात का खयाल रखा कि बोर्ड में उनकी पसंद के लोग रहें या कम से कम ऐसे सदस्य हों जो किसी प्रकार की खिलाफत न करें। सेंसर बोर्ड को भी सरकारों ने लाइसेंस और परमिट राज के अनुरूप ही संचालित किया। कई बार सेंसर बोर्ड के सुझावों की अवहेलना की गई। सरकारों ने किसी न किसी बहाने अंकुश बनाए रखा। कई बार तो प्रदर्शन का प्रमाणपत्र मिल चुकी फिल्मों का प्रदर्श रोका गया तो कुछ फिल्मों का क्लीन चिट दे दी गई। यही आशंका है कि नई साकार द्वारा गठित सदस्यों ने संस्कृति और सभ्यता के नाम पर अगर संकीर्ण रवैया अपनाया तो फिल्मकारों की समस्याएं बढ़ेंगी। सभी जानते हैं कि भाजपा की सांस्कृतिक नीति क्या और कैसी है?
    यों हिंदी और अन्य भाषाओं की मेनस्ट्रीम भारतीय भारतीय फिल्मों में ठोस विचार नहीं होता,इसलिए मुख्य रूप से प्रेमकहानियों की फिल्मों के अटकने की बात ही नहीं होगी। रही मूल्यों की बात तो उन्हें लेकर दिक्कतें बढ़ेंगी तो फिल्मकार क्रिएटिव रास्ते और विकल्प खोज लेंगे। दरअसल,दमन और अंकुश के दौर में फिल्में अधिक कल्पनाशील और संवेदनशील हो जाती हैं। फिल्मकारों को प्रयोग करने के अवसर मिलेंगे।


Friday, January 30, 2015

फिल्‍म समीक्षा : रहस्‍य

-अजय ब्रह्मात्मज
प्रमुख कलाकार: के के मेनन, टिस्का चोपड़ा, आशीष वशिष्ठ, मीता वशिष्ठ और अश्विनी कालसेकर।
निर्देशक: मनीष गुप्ता
स्टार: दो
मनीष गुप्ता की 'रहस्य' हत्या की गुत्थियों को सुलझाती फिल्म है, जिसमें कुछ कलाकारों ने बेहतरीन परफॉर्मेंस की हैं। उन कलाकारों की अदाकारी और लंबे समय तक हत्या का रहस्य बनाए रखने में कामयाब निर्देशक की सूझ-बूझ से फिल्म में रोचकता बनी रहती है। अगर पटकथा और चुस्त रहती तो यह फिल्म 'किसने की होगी हत्या' जोनर की सफल फिल्म होती।
आयशा महाजन की हत्या हो जाती है। आरंभिक छानबीन से पुलिस इस नतीजे पर पहुंचती है कि हत्या आयशा के पिता सचिन महाजन ने की होगी। वे गिरफ्तार कर लिए जाते हैं। बाद में उनकी प्रेमिका एक मशहूर वकील को मुकदमे में शामिल करती है और सीबीआई जांच होती है तो शक की सुई उनके किरदारों से होती हुई जिस पर टिकती है, उसके बारे में कल्पना नहीं की जा सकती। मनीष गुप्ता ने हत्या के रहस्य को अच्छी तरह उलझाया है। सीबीआई अधिकारी सुनील पारस्कर की खोजबीन सच्चाई की तह तक पहुंचती है तो रिश्तों का झूठ और संबंधों का सच प्रकट होता है।
लंबे समय के बाद आशीष विद्यार्थी हिंदी सिनेमा के पर्दे पर आए हैं। समर्थ अभिनेता अपनी मौजूदगी के लिए संवादों का मोहताज नहीं होता। बेटी की हत्या के आरोप में फंसे लाचार पिता के हाव-भाव और मुद्राओं को उन्होंने बखूबी व्यक्त किया है। सीबीआई अधिकारी की भूमिका में केके मेनन अपने विनोद और दृढ़ता से प्रभावित करते हैं। किरदारों की चुस्ती-फूर्ती उनमें है। मां आरती महाजन की भूमिका के द्वंद्व को टिस्का चोपड़ा ने समझा और जाहिर किया है। अन्य कलाकारों में अश्विनी कालसेकर याद रह जाती हैं।
ऐसा लगता है कि फिल्म सीमित बजट में जल्दबाजी में बनाई गई है। दृश्यों की तारतम्यता अनेक जगहों पर टूटती है। कुछ दृश्यों के बाद उनमें दोहराव आने लगता है।
अवधि: 124 मिनट

फिल्‍म समीक्षा : खामोशियां

-अजय ब्रह्मात्मज
प्रमुख कलाकार: गुरमीत चौधरी, सपना पब्बी और अली फजल।
निर्देशक: करण दारा
संगीतकार: अंकित तिवारी, जीत गांगुली, बॉबी इमरान और नवद जफर।
स्टार: 1.5
भट्ट कैंप की 'खामोशियां' नए निर्देशक करण दारा ने निर्देशित की है। उन्हें दो नए कलाकार गुरमीत चौधरी और सपना पब्बी दिए गए हैं। उनके साथ अली फजल हैं। कहानी विक्रम भट्ट ने लिखी है और एक किरदार में वे स्वयं भी मौजूद हैं। ऐसा लगता है कि अभी तक भट्ट कैंप अपनी फिल्मों में जिन मसालों का इस्तेमाल करता रहा है, उनकी बची-खुची और मिस्क मात्रा करण को दे दी गई है। प्रस्तुति और स्वभाव में भट्ट कैंप की यह फिल्म उनकी पिछली फिल्मों से कमजोर है। इस बार भट्ट कैंप अपनी एक्सपेरिमेंट देने में चूक गया है।
सस्पेंस, मर्डर, हॉरर, भूत-प्रेत, सेक्स, रोमांस और प्रेम जैसे सभी तत्वों के होने के बावजूद यह फिल्म प्रभावित नहीं करती। कारण स्पष्ट है कि लेखक-निर्देशक की विधा और प्रस्तुति के प्रति स्पष्ट नहीं है। कथा बढऩे के साथ छिटकती रहती है और आखिरकार बिखर जाती है। किरदारों में केवल कबीर (अली फजल) पर मेहनत की गई। मीरा (सपना पब्बी) और जयदेव (गुरमीत चौधरी) आधे-अधूरे रचे गए हैं।
'खामोशियां' का लोकेशन सुंदर है। दक्षिण अफ्रीका में कश्मीर रच दिया गया है। फिल्म में गीतों के फिल्मांकन पर पूरा ध्यान दिया गया है। गीत-संगीत के चुनाव में भट्ट बंधु हमेशा सफल रहते हैं। उनकी फिल्मों के गीत लोकप्रिय होते हैं। 'खामोशियां' में भी यही बात हुई है। फिल्म देखते हुए लगता है कि गानों के म्यूजिक वीडियो से एक लचर कथा को जोड़ा गया है। भूत, आत्मा, प्रेम ओर आकर्षण की 'खामोशियां' में तर्क खामोश ही रहते हैं। यह फिल्म प्रेम और विश्वास से अधिक अंधविश्वास पर टिकी हुई है। ऐसी फिल्मों में मंत्र, जाप और उपचार का मनगढ़ंत उपयोग किया जाता है। लेखक-निर्देशक तथ्यों और साक्ष्यों पर गौर नहीं करते। 'खामोशियां' में ऐसी लापरवाहियों की अति हो गई है।
कलाकारों में अली फजल अपनी सीमाओं में कबीर को निभाते हैं। उन्हें अपने अभिनय में प्रवाह पर ध्यान देना चाहिए। इस फिल्म के प्रचार में गुरमीत चौधरी के नाम का शोर मचाया गया, लेकिन फिल्म में उन्हें बहुत कम स्पेस और फुटेज मिला है। इनमें से भी आधे दृश्यों में वे अचेत लेटे रहते हैं। सपना पब्बी अपने किरदार मीरा की जरूरतों को पूरा नहीं कर पातीं।
'खामोशियां' का गीत-संगीत पॉपुलर रुचि का है। यों फिल्म की कथा से उसका अधिक तालमेल नहीं है।
अवधि: 123 मिनट

फिल्‍म समीक्षा हवाईजादा

अजय ब्रह्मात्मज
निर्देशक: विभु पुरी
स्टार: 2.5
विभु पुरी निर्देशित 'हवाईजादा' पीरियड फिल्म है। संक्षिप्त साक्ष्यों के आधार पर विभु पुरी ने शिवकर तलपड़े की कथा बुनी है। ऐसा कहा जाता है कि शिवकर तलपड़े ने राइट बंधुओं से आठ साल पहले मुंबई की चौपाटी में विश्व का पहला विमान उड़ाया था। अंग्रेजों के शासन में देश की इस प्रतिभा को ख्याति और पहचान नहीं मिल पाई थी। 119 सालों के बाद विभु पुरी की फिल्म में इस 'हवाईजादा' की कथा कही गई है।
पीरियड फिल्मों के लिए आवश्यक तत्वों को जुटाने-दिखाने में घालमेल है। कलाकारों के चाल-चलन और बात-व्यवहार को 19 वीं सदी के अनुरूप नहीं रखा गया है। बोलचाल, पहनावे और उपयोगी वस्तुओं के उपयोग में सावधानी नहीं बरती गई है। हां, सेट आकर्षक हैं, पर सब कुछ बहुत ही घना और भव्य है। ऐसे समय में जब स्पेस की अधिक दिक्कत नहीं थी, इस फिल्म को देखते हुए व्यक्ति और वस्तु में रगड़ सी प्रतीत होती है।
शिवकर तलपड़े सामान्य शिक्षा में सफल नहीं हो पाता, पर वह दिमाग का तेज और होशियार है। पिता और भाई को उसके फितूर पसंद नहीं आते। वे उसे घर से निकाल देते हैं। उस रात वह दो व्यक्तियों से टकराता है। एक है सितारा, जो पहली मुलाकात के बाद ही उसके दिल में बिंध जाती है और दूसरे सनकी शास्त्री...जिन्हें लगता है कि शिवकर उनके प्रयोगों को आगे ले जा सकता है। प्रेम और प्रयोग के दो छोरों के बीच झूलते शिवकर तलपड़े की प्राथमिकता बदलती रहती है। नतीजतन कहानी रोचक होने के बावजूद प्रभावित नहीं कर पाती। इसकी वजह शिवकर तलपड़े के चरित्र निर्वाह में रह गई कमियां और थोपी गई खूबियां हैं।
ऐसे समय में जब सार्वजनिक जीवन में एक खास राजनीति और राष्ट्रीय भावना से प्रेरित विचार ने सभी को विस्मित कर रखा है, ऐसी फिल्म का आना भ्रम को बढ़ाता ही है। शिवकर तलपड़े के प्रयोग और उपलब्धि के पर्याप्त ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं हैं। चूंकि 'हवाईजादा' काल्पनिक कथा नहीं है, इसलिए भ्रम और गहरा होता है। लेखक-निर्देशक ने सिनेमाई छूट लेते हुए राष्ट्रवाद, देशभक्ति और वंदे मातरम भी फिल्म में शामिल कर दिया है। कहना मुश्किल है कि 1895 में मुंबई में वंदे मातरम के नारे लगते होंगे।
अतीत की ऐसी कथाएं किसी भी देश के इतिहास के संरक्षण और वर्तमान के लिए बहुत जरूरी होती हैं, लेकिन उन्हें गहरे शोध और साक्ष्यों के आधार पर फिल्म की कहानी लिखी है। शिवकर तलपड़े और उनके सहयोगी चरित्र थोड़े नाटकीय और कृत्रिम लगते हैं। सनकी वैज्ञानिक शास्त्री का किरदार ऐसा ही लगता है। फिल्म में ही दिखाया गया है कि वेदों और ऐतिहासिक ग्रंथों के आधार पर शास्त्री ने वैमानिकी की पुस्तक तैयार की थी, फिर उस पुस्तक के आधार पर विमान बनाने और उड़ाने का श्रेय अकेले शिवकर तलपड़े को देना उचित नहीं लगता।
विभु पुरी अपनी सोच और ईमानदारी से उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों का माहौल रचते हैं। इसमें उनके आर्ट डायरेक्टर अमित रे ने भरपूर सहयोग दिया है। उन्होंने पीरियड को वर्तमान संदर्भ दिया है, लेकिन उसकी वजह से तत्कालीन परिस्थितियों के चित्रण में फांक रह गई है। उन्नीसवीं सदी की मुंबई की बोली और माहौल रचने में भी फिल्म की टीम की मेहनत सराहनीय है।
कलाकारों में आयुष्मान खुराना ने शिवकर तलपड़े की चंचलता और सनकी मिजाज को पकडऩे की अच्छी कोशिश की है। कहीं-कहीं वे किरदार से बाहर निकल जाते हैं। शास्त्री के रूप में मिथुन चक्रवर्ती कृत्रिम और बनावटी लगते हैं। पीरियड फिल्म में उनका उच्चारण और लहजा आड़े आ जाता है। पल्लवी शारदा कुशल नृत्यांगना हैं। उनके अभिनय के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती। बाल कलाकार नमन जैन प्रभावित करते हैं। उनकी मासूमियत और संलग्नता प्रशंसनीय है।
'हवाईजादा' में गीतों के अत्यधिक उपयोग से कथा की गति बाधित होती है। नायक के समाज प्रेम और प्रयोग का द्वंद्व चलता रहता है।
अवधि: 147 मिनट

Thursday, January 29, 2015

ऊंचाइयों का डर खत्‍म हो गया - आयुष्‍मान खुराना

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
    ‘विकी डोनर’ से हिंदी फिल्मों में आए आयुष्मान खुराना की अगली फिल्म ‘हवाईजादा’ है। विभु पुरी निर्देशित ‘हवाईजादा’ पीरियड फिल्म है। यह फिल्म दुनिया के पहले विमानक के जीवन से प्रेरित है,जो गुमनाम रह गए।  विभु पुरी ने विमानक शिवकर तलपडे के जीवन को ही ‘हवाईजादा’ का विषय बनाया।
-पीरियड और अपारंपरिक फिल्म ‘हवाईजादा’ के लिए हां करते समय मन में कोई संशय नहीं रहा?
0 मेरी पहली फिल्म ‘विकी डोनर’ अपारंपरिक फिल्म थी। कांसेप्ट पर आधारित उस फिल्म को दर्शकों और समीक्षकों की सराहना मिली थी। बीच में मैंने दो कंवेशनल फिल्में कीं। फिर मुझे एहसास हुआ कि मुझे ऐसी ही फिल्म करनी चाहिए,जिसमें स्क्रिप्ट ही हीरो हो। इसी कारण मैं लगातार दो ऐसी फिल्में कर रहा हूं। पहली बार मैं कुछ ज्यादा अलग करने की कोशिश कर रहा हूं। एक मराठी किरदार निभा रहा हूं।
- शिवकर तलपडे के किरदार के बारे में क्या बताना चाहेंगे? और उन्हें पर्दे पर कैसे निभाया?
0 शिवकर तलपडे ने राइट बंधुओं से पहले विमान उड़ाया था। यह सुनते ही मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई थी। पहले मैंने विभु पुरी के बारे में पता किया। पता चला कि वे बड़े होनहार डायरेक्टर हैं। उनकी स्टूडेंट फिल्म ऑस्कर के लिए नॉमिनेट हुई थी। हिंदी भाषा पर उनकी गजब की पकड़ है। मैंने विभु से उनकी सनक ली और सौरभ भावे से उनकी मराठी। अपना चार्म भी डाल दिया। इस तरह शिवकर तलपडे तैयार हो गए। हर बॉयोपिक का रेफरेंस होता है। तलपडे की कोई जानकारी नहीं मिलती। इसका फायदा मिला कि डायरेक्टर के साथ मिल कर मैंने खूबसूरत दुनिया तैयार की। मेरे स्टाफ मराठी हैं। उन्हें हिदायत दे रखी थी कि वे मुझ से मराठी में ही बातें करें। मराठी सुनने से भाषा की पकड़ बढ़ी।
-विभु पुरी के अप्रोच को कैसे देखते हैं?
0 विभु बिल्कुल अलग डायरेक्टर हैं। श्ुाजीत सरकार की फिल्में रियल स्पेस में होती हैं। विभु उनके विपरीत हैं। विभु फैंटेसी में यकीन रखते हैं। वे मेरे यंगेस्ट डायरेक्टर हैं। परफेक्शनिस्ट हैं। सही चीज नहीं मिलती तो लगे रहते हैं। बारीकियों पर ध्यान देते हैं। ‘हवाईजादा’ के ट्रेलर से झलक तो मिल ही गई है।
-जोरदार एंट्री मारी थी आप ने। उस सफलता से क्या सीखा आप ने?
0 सफलता बहुत ही खराब शिक्षक है। असफलता सिखाती है। मैंने अपनी जिंदगी में रिजेक्शन ही रिजेक्शन झेले हैं। इसलिए बीच की दो फिल्मों के न चलने से ज्यादा निराशा नहीं हुई है। मेरे दोस्त पुराने ही हैं। नए दोस्त नहीं के बराबर हैं। वे मुझे जमीन पर रखते हैं। शुजीत सरकार और आदित्य चोपड़ा मेरे मेंटोर हैं। जॉ अब्राहम को दोस्त कह सकता हूं। विभु शांत स्वभाव के दोस्त हैं।
-पीरियड फिल्म में नेशनल फीलिंग भी डाली गई है। इस रुझान से आप कितने सहमत हैं?
0 इस विषय पर विभु से मेरी बातें हुई हैं। विभु प्रो-नेशनिलिज्म हैं। मैं चाहता था कि शिवकर के विमान उड़ाने की सनक तक हम सीमित रहें। विभु की सोच व्यापक थी। उन्होंने कहा कि अगर विमान उड़ाते हुए शिवकर अगर कहे कि मैं पहला आजाद हिंदुस्तानी हूं तो क्या दिक्कत है। अंग्रेजों का राज जमीन पर था। वह उड़ गया तो खुद को आजाद मान बैठा। ट्रेलर देख कर राय न निकालें। फिल्म में विमान की बातें ज्यादा हैं। वैसे राष्ट्रवाद उस दौर के अनुकूल है और आज भी प्रासंगिक है।
-आप बाहर से आए हैं। क्या आप को समान अवसर मिल रहे हैं?
0 हां,मिले और मिल रहे हैं। मेरी खुशनसीबी है कि मैं आउटसाइडर हूं। मेरे जैसा मजा इनसाइडर को नहीं मिल सकता। तमाम रिजेक्शन के बाद आप को बेस्ट डेब्यू पुरस्कार मिल रहे हैं। खाली हाथ आकर मैंने इतना पा लिया है। हां,मालूम है कि हर फिल्म में साबित करना होगा। यही तो चुनौती है। सही जगह पर सही समय में पहुंचा। और अब अवसर मिल रहे हैं। मेरे चुनाव सही या गलत होते रहेंगे। 2007 में एक पागलपन के साथ मुंबई आया था। वह आज भी बरकरार है।
-‘हवाईजादा’ का कोई खास अनुभव जो साथ रह गया हो?
0 ऊंचाइयों का डर खत्म हो गए। 40 फीट की ऊंचाई पर 15 टेक दिए। हर बार लगता था कि सुरक्षा के बावजूद कुछ भी हो सकता है। फिल्म में काफी समय जमीन से ऊपर रहा।
-स्टार होने के बाद क्या आनंद आ रहा है?
0 फिल्ममेकिंग का ट्रैवलिंग पार्ट बहुत एंज्वॉय करता हूं। शूट के दौरान हमारा इतना खयाल रखा जाता है। सच्ची हमार आदतें खराब हो जाती हैं।

Tuesday, January 27, 2015

प्रागैतिहासिक प्रेमकहानी

-अजय ब्रह्मात्‍मज
मेरे प्रिय निर्देशकों में से एक आशुतोष गोवारिकर ने में प्रिय अभिनेताओं में से एक रितिक रोशन के साथ मोहनजो दाड1ों की शूटिंग भुज में आरंभ की। सिंधु घाटी की सभ्‍यता की इस प्रागैतिहासिे प्रेमकहानी में रितिक रोशन की प्रमिका पूजा हेगड़े हैं। लगान,जोधा अकबर और खेलें हम जी जान से की सफलता-विफलता के बाद आशुतोष गोवारिकर ने फिर से साहसिक पहल की है। हिंदी पिफल्‍मों के इतिहास की यह प्राचीनतम प्रेमकहानी होगी। यह देखना रोचक होगा कि आशुतोष अपने विशेषसों की मदद से कैसी दुनिया रचते हैं ? मोहनजो दाड़ो को लेकर उत्‍सुकता बनी रहेगी।
आप बताएं कि आप कितने उत्‍सुक हैं और क्‍या अपेक्षाएं रखते हैं ?

Friday, January 23, 2015

फिल्‍म समीक्षा : बेबी

समझदार और रोमांचक 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
स्टार: चार
लंबे समय के बाद... जी हां, लंबे समय के बाद एक ऐसी फिल्म आई है, जो हिंदी फिल्मों के ढांचे में रहते हुए स्वस्थ मनोरंजन करती है। इसमें पर्याप्त मात्रा में रहस्य और रोमांच है। अच्छी बात है कि इसमें इन दिनों के प्रचलित मनोरंजक उपादानों का सहारा नहीं लिया गया है। 'बेबी' अपने कथ्य और चित्रण से बांधे रखती है। निर्देशक ने दृश्यों का अपेक्षित गति दी है, जिससे उत्सुकता बनी रहती है। 'बेबी' आतंकवाद की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म है। ऐसी फिल्मों में देशभक्ति के जोश में अंधराष्ट्रवाद का खतरा रहता है। नीरज पांडे ऐसी भूल नहीं करते। यह वैसे जांबाज अधिकारियों की कहानी है, जिनके लिए यह कार्य किसी कांफ्रेंस में शामिल होने की तरह है। फिल्म के नायक अजय (अक्षय कुमार) और उनकी पत्नी के बीच के संवादों में इस कांफ्रेंस का बार-बार जिक्र आता है। पत्नी जानती है कि उसका पति देशहित में किसी मिशन पर है। उसकी एक ही ख्वाहिश और इल्तजा है कि 'बस मरना मत'।
यह देश के लिए कुछ भी कर गुजरने का आतुर ऐसे वीरों की कहानी है, जो देश के लिए जीना चाहते हैं। फिरोज अली खान (डैनी डेंजोग्पा) 'बेबी' नामक एक मिशन के प्रभारी हैं। उनके साथ बहादुर अधिकारियों की एक टीम है, जो इस बात के लिए तैयार हैं कि अगर कभी पकड़े या मारे गए तो भारत सरकार उनसे किसी प्रकार के संबंध नहीं होने का दावा कर लेगी। इस असुरक्षा के बावजूद वे देशहित में कुछ भी करने को तैयार हैं। फिरोज के ही शब्दों में, 'मिल जाते हैं कुछ ऑफिसर्स हमें, थोड़े पागल, थोड़े अडिय़ल, जिनके दिमाग में सिर्फ देश और देशभक्ति घूमती रहती है... ये देश के लिए मरना नहीं चाहते, बल्कि जीना चाहते हैं ताकि आखिरी सांस तक देश की रक्षा कर सकें।' ऐसे ही पागल और अडिय़ल देशभक्त अधिकारियों के संग नीरज पांडे आतंकवाद के साए की रोमांचक मुहिम पर निकलते हैं।
नीरज पांडे के विवेक और समझदारी की तारीफ करनी होगी। उन्होंने अपने किरदारों, प्रसंगों और दृश्यों से स्पष्ट किया कि आतंकवाद का किसी धर्म विशेष से सीधा रिश्ता नहीं है। राजनीतिक और व्यापारिक मकसद से कुछ लोग इसमें संलग्न होते हैं। वे असंतुष्टों को बरगलाने में सफल होते हैं। तौफीक और वसीम (सुशांत सिंह) के किरदारों से स्पष्ट होता है कि वे किसी धार्मिक भावना से नहीं, बल्कि व्यापारिक हित में साजिशों का हिस्सा बने हुए हैं। अनेक प्रसंगों में नीरज ने संकेत दिए हैं कि कैसे देश के असंतुष्ट मुसलमान भटकाव के शिकार होते हैं। नीरज पांडे का उद्देश्य राजनीतिक और सामाजिक फिल्म बनाने का नहीं है, लेकिन विवेक और समझदारी हो तो संदर्भ और परिप्रेक्ष्य में ये तत्व आ जाते हैं। 'बेबी' आतंकवाद पर बनी एक समझदार फिल्म है। नीरज पांडे की 'बेबी' में पाकिस्तान का जिक्र आता है, लेकिन वह तथ्य और समाचार की तरह है। देशभक्ति की आड़ में पड़ोसी देशों को कुचल देने का व्यर्थ नारा नहीं है इस फिल्म में।
वर्तमान में मौलाना मोहम्मद रहमान (राशिद नाज) पड़ोसी देश से आतंकवादी गतिविधियां संचालित कर रहा है। वह आतंकवादी बिलाल (के के मेनन) को देश से फरार कराने में सफल होता है। तहकीकात में पता चलता है कि उसके सूत्र देश और विदेशों तक में जुड़े हुए हैं। एक-एक कर उनकी धड़-पकड़ से अजय और उसकी टीम मुख्य ठिकाने और सरगना तक पहुंचती है। नीरज पांडे ने मुख्य आतंकवादी तक पहुंचने की व्यूह रचना और घटनाक्रम में पर्याप्त उत्सुकता बनाए रखी है। होनी-अनहोनी के बीच दिल की धड़कनें बढ़ती हैं-धकधक, धकधक। इस धकधक को पाश्र्व संगीत की संगत मिलती है तो उत्तेजना और बढ़ जाती है, हालांकि पाश्र्व संगीत कुछ स्थानों पर लाउड हो गया है।
क्लाइमेक्स के 30-40 मिनट में नीरज पांडे की पकड़ दिखती है। छोटे-छोटे दृश्यों से स्थितियां बनती हैं और उत्सुकता बढ़ती जाती है। नीरज पांडे का दृश्य विधान प्रेडिक्टेबल नहीं है। अनुमान से अलग किरदारों का व्यवहार चौंकाता है। क्लाइमेक्स दृश्यों में हल्का दोहराव आता है, जो अधिकांश दर्शकों के लिए हंसी का कारण हो सकता है। क्लाइमेक्स में अजय और शुक्ला (अनुपम खेर) की नोंक-झोंक तनाव ढीला कर राहत देती है। कह सकते हैं कि नीरज पांडे अपनी प्रस्तुति में परिपूर्णता के करीब पहुंच जाते हैं।
किरदारों के गठन और कलाकारों के चयन में निर्देशक और कास्टिंग डायरेक्टर की सूझ-बूझ फिल्म को सही रूप देती है। विकी सदाना की कास्टिंग उल्लेखनीय है। छोटे-छोटे दृश्यों में भी समर्थ अभिनेताओं की मौजूदगी कथ्य गाढ़ा करती है। ड्रामा का घनत्व बढ़ाती है। अक्षय कुमार फिल्म की लीड भूमिका में जंचे हैं। एक्शन दृश्यों में उनकी गति और स्फूर्ति उल्लेखनीय है। 'बेबी' का एक्शन धूलउड़ाऊ और कांचतोड़ू नहीं है, लेकिन वह पर्याप्त असर डालता है। एक दृश्य में प्रिया सूर्यवंशी (तापसी पन्नू) और वसीम (सुशांत सिंह) के बीच की भिड़ंत उल्लेखनीय है। हिंदी फिल्मों में महिला किरदारों को नाजुक दिखाने की परंपरा रही है। यहां प्रिया भिड़ती है और नायक अजय के आने तक उसे सुला चुकी होती है। डैनी डैंजोग्पा, मधुरिमा तुली, मुरली शर्मा, सुशांत सिंह, जमील खान और अनेक अपिरिचित चेहरे अपने अभिनय से किरदारों को विशेष रंग देने के साथ विश्वसनीय बनाते हैं। ने भी उल्लेखनीय काम किया है।
नीरज पांडे की 'बेबी' आतंकवाद पर बनी एक समझदार फिल्म है। अतिरकों से बचती हुई यह पूरी ईमानदारी से एक्शन और ड्रामा के साथ थ्रिल पैदा करती है। 'बेबी' दर्शनीय है।
अवधि-160 मिनट

फिल्‍म रिव्‍यू : डॉली की डोली

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
हंसी के साथ तंज भी
***1/2 साढ़े तीन स्‍टार
अभिषेक डोगरा और उमाशंकर सिंह की लिखी कहानी पर अभिषेक डोगरा निर्देशित 'डॉली की डोली' ऊपरी तौर पर एक लुटेरी दुल्हन की कहानी लगती है, लेकिन लेखक-निर्देशक के संकेतों पर गौर करें तो यह परतदार कहानी है। लेखक और निर्देशक उनके विस्तार में नहीं गए हैं। उनका उद्देश्य हल्का-फुल्का मनोरंजन करना रहा है। वे अपने ध्येय में सफल रहे हैं, क्योंकि सोनम कपूर के नेतृत्व में कलाकारों की टीम इस प्रहसन से संतुष्ट करती है।
डॉली (सोनम कपूर) की एक टीम है, जिसमें उसके भाई, पिता, मां और दादी हैं। ये सभी मिल कर हर बार एक दूल्हा फांसते हैं और शादी की रात जेवर और कपड़े-लत्ते लेकर चंपत हो जाते हैं। यही उनका रोजगार है। डॉली की टीम अपने काम में इतनी दक्ष है कि कभी सुराग या सबूत नहीं छोड़ती। डॉली का मामला रॉबिन सिंह (पुलकित सम्राट) के पास पहुंचता है। वह डॉली को गिरफ्तार करने का व्यूह रचता है और उसमें सफल भी होता है, लेकिन डॉली उसे भी चकमा देकर निकल जाती है। वह फिर से अपनी टीम के साथ नई मुहिम पर निकल जाती है।
लेखक-निर्देशक आदर्श और उपदेश के भार से नहीं दबे हैं। उन्हें डॉली की तकलीफ और लाचारी से भी अधिक मतलब नहीं है। वे उसके उन मुहिमों और करतूतों की कहानी कहते हैं, जो सामाजिक विडंबना और प्रचलित धारणा का प्रहसन रचती है। इस प्रहसन के लिए वे जरूरी किरदार समाज से ही चुनते हैं। इन किरदारों की लालसा, इच्छा और लंपटता से हास्यास्पद स्थितियां बनती हैं, जो हमें पहले हंसने और फिर हल्का सा सोचने के लिए मजबूर करते हैं।
'डॉली की डोली' पूरी तरह से सोनम कपूर की फिल्म है। 'खूबसूरत' के बाद एक बार फिर सोनम ने साबित किया है कि अगर ढंग की स्क्रिप्ट और किरदार मिले तो वह अपनी सीमाओं के बावजूद फिल्म को रोचक बना सकती हैं। सोनम कपूर के हास्य में एक शालीनता है। वह हंसी-मजाक के दृश्यों में भाव-मुद्राओं या संवादों से फूहड़ नहीं होतीं। निश्चित ही लेखक-निर्देशक की मदद से वह ऐसा कर पाती हैं। 'डॉली की डोली' के मुश्किल दृश्यों में उनका संयम और आत्मविश्वास दिखता है।
अन्य कलाकारों में राजकुमार राव ने गन्ना किसान सोनू सहरावत की भूमिका में अभिभूत किया है। हरियाणवी किरदार को उन्होंने भाषा, संवाद अदायगी और अपने हाव-भाव से जीवंत कर दिया है। नए-नए अमीर बने हरियाणवी किसान की ठस को बहुत खूबसूरती से वे आत्मसात करते हैं। मनोज की भूमिका में वरुण शर्मा भी प्रभावित करते हैं। उनका जोर हंसाने पर रहा है, इसलिए कई बार वह जबरन प्रतीत होता है। सहयोगी कलाकारों में मोहम्मद जीशान अयूब और मनोज जोशी स्वाभाविक हैं। दादी की भूमिका निभा रही प्रौढ़ अभिनेत्री याद रह जाती हैं। पुलकित सम्राट के अभिनय में सलमान खान की छाया खटकती है, हालांकि उन्होंने अपने अंदाज और अदायगी पर मेहनत की है।
'डॉली की डोली' में कथ्य की नवीनता नहीं है, लेकिन परिचित कथ्य को ही अभिषेक डोगरा और उमाशंकर सिंह ने रोचक तरीके से पेश किया है। छोटे-छोटे दृश्यों के जोड़ से गति बनी रहती है, जिन्हें संवादों की पींग मिलती रहती है। लेखक-निर्देशक ने अपना काम जिस ईमानदारी और ध्येय से किया है, उसे सही तरीके से तकनीकी टीम और कलाकारों ने पर्दे पर उतारा है।
अवधि: 100 मिनट

Thursday, January 22, 2015

हंसल मेहता के निर्देशन में गे प्रोफेसर की भूमिका निभाएंगे मनोज बाजपेयी

अजय ब्रह्मात्मज
 हंसल मेहता और मनोज बाजपेयी की दोस्ती बहुत पुरानी है। बीच में कुछ ऐसा संयोग बना कि दोनों ने साथ काम नहीं किया। इस बीच दोनों अपने-अपने तरीके से संघर्ष करने के साथ उपलब्धियां भी हासिल करते रहे। दोनों ने 'दिल पे मत ले यार' में एक साथ काम किया था। 14 सालों के बाद वे फिर से एक फिल्म करने जा रहे हैं। मनोज बताते हैं, 'मुंबई में हंसल पहले व्यक्ति थे, जिनसे मैं काम मांगने गाया था। 'सत्या' के सफल होने पर मुझे पहचान मिली तो हम दोनों ने साथ काम करने का फैसला किया। तब 'दिल पे मत ले यार' की योजना बनी। इस फिल्म में मेरे साथ तब्बू भी थीं। फिल्म नहीं चली। हम दोनों कुछ नया करने की साच में रहे। एक दौर ऐसा भी आया कि हमारे बीच मनमुटाव हुआ और हम दोनों अलग हो गए। हमारी बातचीत भी बंद हो गई। हंसल अलग मिजाज की फिल्में बनाने लगे। मुझे खुशी है कि 'शाहिद' से वे अपनी जमीन पर लौटे हैं। हमारे संबंध फिर से कायम हुए और उन्होंने अपनी नई फिल्म का प्रस्ताव मेरे सामने रखा। इस फिल्म में मुझे अपना रोल चुनौतीपूर्ण लगा, इसलिए मैंने हां कर दी।'


हंसल मेहता की नई फिल्म का अभी कोई नाम नहीं रखा गया है। यह एक गे प्रोफेसर की कहानी है। जिसे किसी वजह से सस्पेंड कर दिया जाता है। गे होने के कारण रिटायरमेंट से पहले उसकी मुश्किलें बढ़ीं। उस प्रोफेसर के संघर्ष के सभी पहलुओं का फिल्म में चित्रण है। उस प्रोफेसर का सच जानने के लिए एक रिपोर्टर उसके पीछे लग जाता है। इस अनाम फिल्म में मनोज बाजपेयी गे प्रोफेसर की भूमिका निभा रहे हैं और रिपोर्ट बन रहे हैं राजकुमार राव। अपनी अगली फिल्म को लेकर उत्साहित हंसल मेहता बताते हैं,'मनोज बाजपेयी मेरी पहली फिल्म के हीरो थे। राजकुमार राव मेरी दूसरी पारी की पहली फिल्म के अभिनेता रहे। इस बार मैं उन दोनों के साथ काम कर रहा हूं। मुझे इससे बेहतर मौका क्या मिलेगा? सालों बाद फिल्म के सिलसिले में मनोज से मुलाकातें हुईं। उनमें वही उत्साह है। वे अपने किरदार को लेकर पूरी तैयारी कर चुके है। वे तो इतने उतावले हैं कि जल्दी से जल्दी कैमरे के आगे आना चाहते हैं। मुझे अतिरिक्त तैयारी करनी है। पहली बार मैं आउटडोर जा रहा हूं। मेरी फिल्म की पूरी शूटिंग बाहर ही होगी। दोनों स्टारों को संभालना भी है।'


मनोज बाजपेयी इस फिल्म के नए किरदार को लेकर उत्साहित हैं। वे कहते हैं,'मैंने हमेशा नए किरदारों को ज्यादा तरजीह दी है। पहली बार पर्दे पर गे कैरेक्टर निभाने जा रहा हूं। मेरी पिछली फिल्म 'तेवर' को ही देख लें। उस फिल्म का विलेन एक लवर ब्वॉय है। मैं अपने किरदारों के हर इमोशन को टच करता हूं। निगेटिव किरदारों की इंसानी फितरत पर गौर करता हूं। एक्टर होने के नाते यह हमारा फर्ज बनता है कि हम अपने चरित्रों को किसी कोष्ठक में नहीं डालें। अभी हंसल ने नई चुनौती दी है। मैं तैयार हूं।'
पश्चिमी उत्तरप्रदेश के एक शहर में हंसल मेहता इस फिल्म की शूटिंग करेंगे। आउटडोर शूटिंग में स्टार से मिलने और देखने के लिए उमड़ी भीड़ को संभालना बड़ी जिम्मेदारी होती है। हंसल मेहता कहते हैं,'मैं इस जिम्मेदारी से वाकिफ हूं। उम्मीद है किसी खलल के बिना मेरी फिल्म की शूटिंग पूरी हो जाएगी। मैं फिलहाल नर्वस महसूस कर रहा हूं।'

दरअसल :सत्ता और सितारों की नजदीकी



-अजय ब्रह्मात्मज
कयास लगाया जा रहा है कि अमिताभ बच्चन मोदी के नेतृत्व में आई केंद्रीय सत्ता के नजदीक आ गए हैं। हालांकि अपनी बातचीत में अमिताभ बच्चन ने स्पष्ट शब्दों में इस बात से इनकार किया है कि वे मोदी सरकार के किसी प्रचार अभियान का हिस्सा बनेंगे। दरअसल मोदी के मुख्यमंत्री रहते समय अमिताभ बच्चन ने जिस प्रकार गुजरात के पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए अपने प्रशंसकों और दर्शकों का आमंत्रित किया, उससे इस प्रकार की संभावनाओं को बल मिलता है। सभी जानते हैं कि अमिताभ बच्चन के जोरदार और आत्मीय आमंत्रण के बाद गुजरात का पर्यटन बढ़ा है। इन दिनों हर राज्य किसी न किसी फिल्मी सितारे को ब्रैंड एंबेसेडर बनने का न्यौता दे रहा है। कुछ राज्यों में सितारे ब्रैंड एंबेसेडर के तौर पर एक्टिव भी हो गए हैं। सत्तारूढ़ पार्टी और सितारों के बीच परस्पर लाभ और प्रभाव के लिए रिश्ते बनते हैं। भारतीय समाज में तीन क्षेत्रों के लोगों को प्रतिष्ठा और लोकप्रियता हासिल है। इनमें राजनीति, खेल और फिल्म शामिल हैं। स्वार्थ, लाभ और प्रभाव से इनके बीच उपयोगी संबंध बनते हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि अमिताभ बच्चन दादा साहेब फाल्के पुरस्कार पाने के लिए मोदी और उनके नुमांइदों के साथ लॉबिइंग कर रहे हैं।
            भारतीय समाज में फिल्मी सितारों के साथ हमारा संबंध प्रचुर प्रेम और घनघोर घृणा का होता है। हम एक साथ जिसे देखने और छूने के लिए लालायित रहते हैं, उसे ही पलक झपकते मटियामेट भी कर देते हैं। प्रेम और घृणा के इस संबंध से परे है फिल्मी सितारों की लोकप्रियता और उसका प्रभाव। सत्ता और संस्थान उनकी इस क्षमता का उपयोग करने से नहीं हिचकते। आजादी के बाद नेहरू के समय से लेकर अभी तक सत्तारूढ़ पार्टियां फिल्मी सितारों को अपनी पसंद के हिसाब से पलकों पर बिठाती हैं। पहले ऐसे संबंधों की सार्वजनिकता नहीं होती थी। अब हर मुलाकात के पीछे अनेक किस्से बनते हैं। मुझे यह अफवाह बेतुकी लगती है कि अमिताभ बच्चन दादा साहेब फाल्के पुरस्कार के लिए किसी प्रकार की लॉबिइंग करेंगे। उनका योगदान और कद इतना बड़ा है कि देर-सबेर दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से उन्हें नवाजा ही जाएगा। हां, यह भी सच है कि पिछली कांग्रेस सरकार के साथ उनके रिश्ते कतिपय कारणों से मधुर नहीं थे, लेकिन याद करें तो राजीव गांधी के एक आह्वान पर वे अपना फिल्मी करियर छोडक़र इलाहाबाद से चुनाव लडऩे चले गए थे। अगर कोई अध्ययन विश्लेषण करे तो निस्संदेह यही पाएगा कि सत्ता और संस्थानों ने फिल्मी कलाकारों का ज्यादा उपयोग और दुरुपयोग किया है। क्यों ऐसा होता है कि सत्ता की नजदीकी लोकप्रिय नेताओं के साथ ही होती है। इस देश में लोकप्रियता भी एक प्रकार की सत्ता है, जिसके दम पर फिल्मी सितारे, खिलाड़ी और दूसरी लोकप्रिय हस्तियां विशिष्ट समूह में शामिल हो जाती है।
            सच कहें तो हिंदी फिल्मों में चंद सितारे ही राजनीतिक रूप से सजग और सचेत हैं। सत्ता और राजनीतिक पार्टियों से जुड़ते समय वे पॉलिटिकल विवेक से काम नहीं लेते। आजादी के बाद के दशकों में वे स्वाभाविक रूप में नेहरू की आभा से प्रभावित रहे। स्वंय इंदिरा गांधी की नजदीकियां फिल्मी सितारों से रहीं। अल्प अवधि के लिए प्रधानमंत्री बने लाल बहादुर शास्त्री भी मनोज कुमार को बहुत मानते थे। समय-समय पर तत्कालीन सरकारों ने इन सितारों को राज्यसभा की सदस्यता भी दी। इमरजेंसी के बाद थोड़ा परिवर्तन दिखा। देव आनंद, शत्रुघ्न सिन्हा और राज बब्बर जैसे लोकप्रिय कलाकारों ने जयप्रकाश नारायण के साथ अपनी संबंद्धता जाहिर की। उनमें से कुछ लोग जनता पार्टी के टूटने पर अलग-अलग पार्टियों में गए। खासकर भाजपा ने लोकप्रिय सितारों को राजनीति में लाने का हरसंभव प्रयास किया। वे लोकप्रिय धारावाहिकों के मामूली अभिनेताओं को भी सांसद बनाने की युक्ति करते रहे। फिलहाल भाजपा के अनेक सांसद वर्तमान संसद में हैं। सत्ता और कलाकारों की नजदीकी हमेशा से बनी रही है। राजतंत्र से लेकर लोकतंत्र तक हम देखते हैं कि कलाकारों को महत्व मिलता रहा है और कलाकारों ने भी अपना झुकाव बार-बार दिखाया है। यह बहुत ही स्वाभाविक प्रक्रिया है। हमें बाहर से ऐसा लगता है कि फिल्मी सितारे फायदे के लिए सत्ता के करीब जाते हैं, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। सत्ता अपने हित में लोकप्रिय सितारे-कलाकारों का इस्तेमाल सदियों से करती आई है। आज भी वही सिलसिला जारी है। 21 वीं सदी में फिल्मी सितारे ही हमारे आदर्श बने हुए हैं। नारी सशक्तिकरण हो या पोलियो मिटाना हो। कश्मीर के बाढ़ पीडि़तों की सहायता करना हो या मोदी के स्वच्छ भारत अभियान चलाना हो। इनक्रेडिबल इंडिया की वकालत करनी हो या गुजरात बुलाना हो... हर बार हम इन सितारों को बुला लेते हैं।

Wednesday, January 21, 2015

दीवार

40 साल पहले आज ही के दिन 21 जनवरी 1975 को दीवार रिलीज हुई थी। इसके निर्देशक यश चोपड़ा थे। इस फिल्‍म ने ही अमिताभ बच्‍चन को स्‍टारडम की ऊचाई दी थी। इस फिल्‍म में उनके साथ शशि कपूर और निरूपा राय की भी खास भूमिका थी। इसके पहले 'जंजीर' से उन्‍हें एंग्री यंग मैन की मिली छवि का 'दीवार' ने पुख्‍ता कर दिया था। दोनों ही फिल्‍मों के लेखक सलीम-जावेद थे। 
यश चोपड़ा ने पहले राजेश खन्‍ना को विजय और नवीन निश्‍चल को रवि की भूमिका देने की सोची थी। तब उनकी मां की भूमिका वैजयंती माला निभाने वाली थीं। कहते हैं सलीम-जावेद ने शत्रुघ्‍न सिन्‍हा को ध्‍यान में रख कर विजय का रोल लिखा था। वे राजेश खन्‍ना के नाम पर राजी नहीं थे,क्‍योंकि उनसे उनकी अनबन चल रही थी। राजेश खन्‍ना के नहीं चुने जाने पर नवीन निश्‍चल और वैजयंती माला ने भी फिल्‍म छोड़ दी। मां की भूमिका के लिए यश चोपड़ा ने वहीदा रहमान के बारे में भी सोचा था,लेकिन 'कभी कभी' में पति-पत्‍नी की भूमिका निभा रहे अमिताभ बच्‍चन और वहीदा रहमान को साथ में लेना उचित नहीं लगा। 
अमिताभ बच्‍चन ने 'दीवार' के साथ-साथ 'शोले' और 'कभी कभी' की भी शूटिंग की। आदत के मुताबिक वे कहीं भी देर से नहीं पहुंचते थे। 'आज खुश तो बहुत होगे' श्‍ाॉट के समय अमिताभ बच्‍चन ने सेट खाली करवा दिया था। 15 रीटेक के बाद यह शॉट परफेक्‍ट हुआ था। मां की गोद में मरने के दृश्‍य के संवाद नहीं लिखे गए थे। यश चोपड़ा ने अमिताभ बच्‍चन को आजादी दी थी कि वे स्‍वयं ही कुछ बोलें।
'दीवार' के पोस्‍टर में अमिताभ बच्‍चन की कमीज बंधी हुई है। दाअसल,वह कमीज इतनी लंबी हो गई थी कि उसमें गांठ बांधनी पड़ी। इसी प्रकार 'सरकार' की शूटिंग के समय कमीज को कॉलर बड़ा होने पर अमिताभ बच्‍चन ने उसे कटवा दिया था। 
इस फिल्‍म के संवाद बहुत ही लोकप्रिय हुए थे। अपने प्रिय संवाद बताएं...

Tuesday, January 20, 2015

तमाशा में दीपिका पादुकोण

परसेप्शन बदले आतंकवाद का-नीरज पाण्डेय


-अजय ब्रह्मात्मज
            नीरज पाण्डेय की बेबीलागत और अप्रोच के लिहाज से उनकी अभी तक की बड़ी फिल्म है। उनके चहेते हीरो अक्षय कुमार इसके नायक हैं। फिल्म फिर से आतंकवाद की पृष्ठभूमि पर है। बेबीएक मिशन का नाम है,जिस में अक्षय कुमार अपनी टीम के साथ लगे हैं। नीरज पाण्डेय की खूबी है कि उनकी फिल्मों के विषय और ट्रीटमेंट अलग और आकर्षक होते हैं।
- हिंदी फिल्मों के ढांचे के बाहर के विषयों के प्रति यह आकर्षण क्यों है और आप का ट्रीटमेंट भी अलहदा होता है?
0 बाकी काम जो लोग सफल तरीके से कर रहे हैं,उसमें जाकर मैं क्या नया कर लूंगा? विषय चुनते समय मैं हमेशा यह खयाल रखता हूं कि क्या मैं कुछ नया कहने जा रहा हूं? कुछ नया नहीं है तो फिल्म बनाने का पाइंट नहीं बनता। कहानियों की कमी नहीं है। पुरानी कहानियों को आज के परिप्रेक्ष्य में रख सकते हैं। मेरी कोशिश रहती है कि हर बार कुछ नया करूं। एक फिल्म में दो-ढाई साल लग जाते हैं। मुझे लगता है कि अगर कुछ नया न हो तो कैसे काम कर पाएंगे।
- आप की सोच और परवरिश की भी तो भूमिका होती है विषयों के चुनाव में?
0 हो सकता है। पहली फिल्म से ही मैंने ऐसी कोशिश की। शुरूआत करते समय ऐसा कोई लक्ष्य नहीं रख था कि मुझे दूसरों का गलत साबित करना है। मैं इंडस्ट्री की पैदाइश नहीं हूं। टाइप्ड फिल्मों के प्रति उत्साह नहीं बनता। आप देखें कि बाहर से आए सभी निर्देशकों ने नए विषयों पर फिल्में बनाई हैं। कह सकते हैं कि मुझे मालूम ही नहीं था कि सेफ फिल्में कैसी होती हैं। मेरे लिए विषय सबसे अधिक महत्व रखता है। कास्टिंग,प्रोडक्शन और मार्केटिंग आदि मैनेज किया जा सकता है। विषय ठोस है और निर्देशक की पसंद का है तो वह कमाल कर सकता है। पहली फिल्म से अभी तक विषयों के चुनाव में मैंने सावधानी बरती है। सोच और परवरिश से तय होता है कि हमें कैसी कहानियां अच्छी लगती हैं? मेरा अपना प्रोडक्शन हाउस है तो हमें बाहरी दबाव में काम नहीं करना पड़ता।
-मुंबई आने के पीछे आप का मकसद फिल्म निर्देशन में ही आना था। यहां तक पहुंचने में थोड़ा वक्त लगा,लेकिन आप क्या खूब आए?
0 मैं स्पष्ट रहा कि मुझे क्या करना है? डाक्यूमेंट्री और ऐड फिल्में बनाते समय भी मेरा लक्ष्य टिका रहा। मुझे यह भी मालूम था कि वक्त लगेगा। कोई हमारा इंतजार तो कर नहीं रहा था। यह सफर रोचक रहा। मैं कोलकाता से हूं,लेकिन मेरी जड़ें बिहार में आरा की हैं। आरा से बारह-पंद्रह किलोमीटर दूर लक्ष्मीपुर गांव है मेरा। भोजपुरी भाषा और संस्कृति में पला-बढ़ा हूं। बंगाली भाषा से विशेष प्रेम है। मैंने एक बंगाली फिल्म भी बनाई थी। और फिर मेरी पढ़ाई-लिखाई का भी असर रहता है।
-फिल्म निर्देशन तक पहुंचने के सफर के बारे में संक्षेप में कुछ बताएं?
0 एक जर्नी रही है। उसे में ग्लैमराइज नहीं करना चाहता। न ही ऐसी कोई नॉस्टेलजिक कहानी है। मैं लोगों से शेयर नहीं करना चाहता। वह सफर मुझे प्यारा है। सभी को यह समझ लेना चाहिए कि बाहर से आए हर व्यक्ति की एक जर्नी होगी। आप इंडस्ट्री के नहीं हैं तो मुश्किलें भी होंगी। उनके लिए तैयार होने के बाद ही यहां आना चाहिए।  बड़ी आशा और घोर निराशा से बचने का एक ही तरीका है कि आप लगातार काम करते रहें। यही मैंने किया। मेहनत तो करनी होगी। उसी में दोस्त बनते गए। अवसर मिले। और राह बनती गई।
- ‘ऐ वेडनेसडेके बाद आप को पीछे पलट कर देखने की जरूरत नहीं पड़ी?
0 यह मुहावरा बहुत गलत अर्थ देता है। फिल्ममेकिंग के धंधे में हमेशा आगे और पीछे देखते रहना पड़ता है। कई बार सारी चीजें आप के नियंत्रण से बाहर चली जाती हैं।  मैं अलग किस्म का व्यक्ति हूं। मैं पार्टीजीवी नहीं हूं। मैं शुरू से ही ऐसा हूं। मैं ढेर सारे लोगों के बीच रहने पर असहज महसूस करता हूं। खूब पढ़ता हूंं और खूब फिल्में देखता हूं। और अपना काम करता हूं।
- ‘बेबीका विचार कैसे आया?
0 ‘स्पेशल 26’ के बाद मैंने एक उपन्यास गालिब डैंजरलिखा। उसके बाद फिल्म के लिए कहानी की तलाश थी। अचानक एक विचार आया और उसके इर्द-गिर्द कहानी और किरदार जोड़े गए। इंटनेशनल जासूसी और मिशन कहानी के केंद्र में है। बेबीफिल्म में कोड नेम है। चूंकि पांच साल के ट्रायल रन पर है,इसलिए उसका नाम बेबी रखा गया है। कुछ चीजें अभी नहीं बता सकते। जिज्ञासा बची रहे।
-आतंकवाद बहुत ही टॉपिकल विषय है। इन दिनों लगातार ऐसी घटनाएं घट रही हैं,जिनका जिक्र आप की फिल्म में भी होगा। आप आतंकवाद को कैसे देखते हैं?
0 मेरी अपनी सोच और निर्देशक की सोच एक जैसी ही है। मेरा अपना पाइंट ऑफ व्यू है। बेबीमें कल्पना की गई है कि ऐसा कुछ हो सकता है। इसी वजह से मेरी फिल्म से कनेक्ट बनता है। जब भी कोई आतंकवादी हादसा होता है तो महसूस होता है कि ऐसा तो फलां फिल्म में देखा था। हमें वास्तविक घटनाएं ही प्रेरित करती है। उनमें रिसर्च के जरिए हम कुछ संभावनाएं जोड़ते हैं और उसे इंटरेस्टिंग तरीके से पेश करते हैं।
- इन दिनों आतंकवाद के प्रति एक प्रचलित नजरिया है। सभी उसी तरह से देखना और दिखाना चाहते हैं। क्या आप की फिल्म में कोई संकेत है?
0 मैं इस मामले का एक्सपर्ट नहीं हूं। ढेर सारे तेज दिमाग इसके विश्लेषण में लगे हैं। हमारे देश की भौगोलिक और राजनीतिक स्थितियों को भी ध्यान में रखना होगा। मैं अलग लेंस से इसे देख रहा हूं। आतंकवाद एक बड़ी समस्या है। किसी एक धर्म से उसे जोड़ देना एकदम गलत है। इससे जुड़े लोग धर्म का इस्तेमाल लोगों को भडक़ाने और उकसाने के लिए करते हैं। आतंकवाद के प्रति परसेप्शन बदलना चाहिए। अलग खेल चल रहा है।
- अक्षय कुमार और अन्य कलाकारों के चुनाव के बारे में क्या कहेंगे?
0 अक्षय कुमार से दोस्ती और समझदारी बन गई है। अगर एक पॉपुलर स्टार मेरी फिल्म में फिट बैठता है और वह दोस्त है तो क्यों नहीं उसे चुनूं? कई प्रकार की सुविधाएं हो जाती हैं। अनुपम खेर जी से भी एक रिश्ता है। इस बार के के मेनन और डैनी साहब के साथ काम कर रहा हूं। दोनों ही गजब कलाकार हैं। हीरोइनों में तापसी पन्नू और मधुरिमा तुली का चुनाव भी किरदारों को ध्यान में रख कर किया गया है।

Sunday, January 18, 2015

आज की प्रेमकहानी है ‘मिर्जिया’-राकेश ओमप्रकाश मेहरा


-अजय ब्रह्मात्मज
    राकेश ओमप्रकाश मेहरा इन दिनों जैसलमेर में हैं। जोधपुर और उदयपुर के बाद उन्होंने जैसलमेर को अपना ठिकाना बनाया है। वहां वे अपनी नई फिल्म ‘मिर्जिया’ की शूटिंग कर रहे हैं। यह फिल्म पंजाब के सुप्रसिद्ध प्रेमी युगल मिर्जा़-साहिबा के जीवन पर आधारित फिल्म है। राकेश ओमप्रकाश मेहरा इसे किसी पीरियड फिल्म की तरह नहीं रच रहे हैं। उन्होंने लव लिजेंड की इस कहानी को आधार बनाया है। वे आज की प्रेमकहानी बना रहे हैं। राकेश ओमप्रकाश मेहरा के लिए इसे गुलज़ार ने लिखा है। नाम भी ‘मिर्जिया’ रख दिया गया है। गुलज़ार साहब ने इसे म्यूजिकल टच दिया है। उन्होंने इस कहानी में अपने गीत भी पिरोए हैं,जिन्हें शंकर एहसान लॉय ने संगीत से सजाया है।
    कम लोगों को पता है कि राकेश ओमप्रकाश मेहरा ‘दिल्ली 6’ के बाद ही इसे बनाना चाहते थे,लेकिन तब ‘भाग मिल्खा भाग’ की कहानी मिली। उन्होंने पहले उसका निर्देशन किया। जोधपुर से जैसलमेर जाते समय हाईवे के सफर में राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने यह बातचीत की। उन्होंने बताया,‘अच्छा ही हुआ कि तीन सालों तक कहानी आहिस्ता-आहिस्ता पकती रही। गुलज़ार भाई इस पर काम करते रहे। यह पोएटिक तरीके से लिखी गई। मिर्जा़-साहिबा की कहानी मेरे जहन में रह गई थी। कॉलेज के दिनों में पढ़ी इस कहानी में कुछ खास बात थी। साहिबा ने मिर्जा़ के तीर तोड़ दिए थे। क्यों तोड़े? इसकी अलग-अलग व्याख्याएं है। गुलज़ार भाई ने अपने तरीके उसे लिखा है। मिर्जा़ का सूफियाना अंदाज था। बचपन से ही दोनों का रुहानी रिश्ता था,जो बड़े होने पर प्यार में बदला। दोनों के परिजन उनके प्रेम के खिलाफ थे। साहिबा बेहद खूबसूरत और भाइयों की लाडली थी। उसे मालूम था कि तीर तोडऩे पर मिर्जा़ अपनी और उसकी रक्षा नहीं कर पाएगा। एक तरह से उसने अपने प्यार की कुर्बानी दे दी। ‘मिर्जिया’ में गुलज़ार भाई ने दोनों के प्रेम के रुहानी और सूफियाना भाव को आज के माहौल में रचा है। इन दिनों की फिल्मों में ऐसा ट्रीटमेंट नहीं मिलता।’
    राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने यह स्वीकार किया कि कंज्यूमर कल्चर में प्यार के मायने बदल गए हैं। अब प्रेम रुहानी नहीं रह गया है,लेकिन यही तो खोज है। क्या आज के दौर के प्रेमी भी मिर्जा़-साहिबा की तरह जज़्बाती हो सकते हैं? प्यार हो जाने के बाद क्या होता है? अतीत की सभी प्रेम कहानियां दुखांत रही हैं। उन्होंने समझाया, ‘जमाने के साथ हमारे आसपास की चीजें बदल जाती हैं। कम्युनिकेशन के तरीके बदल जाते हैं,लेकिन गौर करें तो प्रेम का अंदरूनी जज़्बा वैसे ही रहता है। भीतरी स्तर पर इमोशन की लहर वैसी ही रहती है। उसके लक्षण थोड़े अलग हो जाते हैं। अभी दिखता है कि सभी नाप-तौल के प्यार कर रहे हैं। जीवन साथी के चुनाव में कई भौतिक चीजें देखी जा रही हैं। शहरों में तो दोनों एक-दूसरे के आर्थिक पक्ष पर ध्यान देते हैं। हम अपने पार्टनर जेवर की तरह चुनते और खरीदते हैं। मैं थोड़ा ओल्ड फैशन लग सकता हूं,लेकिन मेरे लिए प्यार भौतिक सुरक्षा से बड़ी चीज है। हम प्रेम को जैसे जीते और देखते रहे हैं,उसे ही अपनी फिल्मों में ले आएंगे। इस फिल्म के प्रेमी किरदार आज के जमाने से जूझते हैं।’
    ' मिर्जिया’ का संगीत दो साल पहले तैयार हो गया था। राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने जानकारी दी,‘इस फिल्म में गीत-संगीत शूटिंग स्क्रिप्ट का हिस्सा है,इसलिए हमलोगों ने संगीत तैयार कर लिया था। ‘भाग मिल्खा भाग’ के बैकग्राउंड के समय ही ‘मिजिऱ्या’ का संगीत तैयार कर लिया गया। गुलज़ार भाई ने स्क्रिप्ट के साथ ही गीत लिख कर दिए। पोएट्री इज द पार्ट ऑफ नैरेशन। उन्होंने इसे काव्यात्मक सुर दिया है। गायकी में नए पुराने टैलेंट का मिश्रण मिलेगा। नई-नई आवाजें सुनाई देंगी। लोकगीत और संगीत का मॉडर्न फ्यूजन असरदार हुआ है। ’
    सभी जाते हैं कि ‘मिर्जिया’ में मिर्जा़ का किरदार हर्षवर्द्धन कपूर निभा रहे हैं। उनके साथ सैयामी खेर हैं। कलकारों के चुनाव के बारे में पूछने पर राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने कहा,‘अनिल कपूर जी के घर पर मेरा आना-जाना रहा है। सोनम कपूर के साथ मैंने दो फिल्में की हैं। हर्ष से मेरी मुलाकातें रही हैं। मैंने उन्हें बहुत पहले चुन लिया था। वे खुद का तैयार नहीं पा रहे थे। उन्होंने मुझ से समय मांगा था। उनकी प्यारी आंखें हैं। सुंदर स्माइल है। दो साल पहले उनका मैसेज अया कि ‘आई एम फीलिंग रेडी’। मैंने उन्हें बुला कर ‘मिर्जिया’ की कहानी सुनाई। उन्होंने हां कहा। उसके बाद डेढ़ सालों तक हम रीडिंग और रिहर्सल किए। दिल्ली के दिलीप शंकर ने कोचिंग की। बाहर से टीना भी सिखाने के लिए आईं। हर्ष को घुडुसवारी भी सीखनी पड़ी। जब वे मंझ गए तो फिर हमलोग फ्लोर पर गए।  मेरे हाथों में कच्ची मिट्टी है। अब देखें कि उन्हें क्या रूप-रंग दे पाता हूं? मैंने अनुभवी अभिनेताओं और तकनीशियनों के साथ काम किया है। इनसे सीखा ही नए कलाकारों का सिखा रहा हूं। दरअसल,ऐसे ही चीजें आगे बढ़ती रहती हैं।’
    ‘मिर्जिया’ की टेक्नीकल टीम में कैमरामैन पावेल डैलेस पोलैंड से आए हैं। उनकी पूरी टीम वहीं से आई है। स्टंट और एक्शन के लिए आस्ट्रेलिया से डैनी आए हैं। उन्होंने टॉम क्रूज के साथ ‘द लास्ट समुराई’ की थी। फिल्म की जरूरत के मुताबिक नैचुरल रोशनी में शूटिंग की जा रही है। प्रकृति की लाइटिंग लाजवाब होती है। हां,हमें उसके साथ एडजस्ट करना पड़ता है। इस शेड्यूल के बाद राकेश ओमप्रकाश मेहरा लद्दाख और मुंबई की शूटिंग के साथ फिल्म पूरी करेंगे।

Saturday, January 17, 2015

फिल्‍म समीक्षा : क्रेजी कुक्‍कड़ फैमिली

-अजय ब्रह्माात्‍मज 
स्टार: तीन
रितेश मेनन की 'क्रेजी कुक्कड़ फैमिली' भिन्न किस्म की कॉमेडी फिल्म है। चार असफल संतानों के पिता बेरी एक बार फिर कोमा में चले गए हैं। इस बार नालायक संतानों को उम्मीद है कि उनका इंतकाल हो जाएगा। इसी उम्मीद में वे एकत्रित होते हैं। सभी को धन की जरूरत है। पिता की जायदाद से हिस्सा मिलने पर ही उनकी जिंदगी की फिसली गाड़ी पटरी पर लौट सकती है। पिता की वसीयत वकील गुप्ता के पास है। वसीयत पढ़े जाने की एक शर्त यह है कि चारों की शादी हो जानी चाहिए।

चारों संतान पिता के पास पहुंचते हैं। पवन और अर्चना की शादी हो चुकी है। अमन किराए पर बीवी लेकर आया है और अभय की शादी आनन-फानन में तय कर दी जाती है, लेकिन मंडप में ठीक फेरे के समय राज खुलता है कि उसने भी शादी कर ली है, लेकिन... बहरहाल वसीयत जाहिर होने के पहले हड़बोंग मचा रहता है। सभी एक-दूसरे पर आरोप लगाने और खुद को सच्चा-सीधा साबित करने में लगे रहते हैं। घर के नौकर और मां ही केवल बेरी की सेहत को लेकर फिक्रमंद हैं। संतान तो इंतजार में हैं कि पिता मरे और वे अपना हिस्सा लेकर निकलें।
'क्रेजी कुक्कड़ फैमिली' में विषय का नयापन नहीं है, लेकिन कुशाल पंजाबी, रितेश मेनन, पुनीत शर्मा और सुहास शेट्टी की टीम ने कथा में नए प्रसंग और परिवेश जोड़े हैं। अनुकूल संवाद लिखें हैं। साथ ही कलाकारों के चयन में खयाल रखा गया है कि वे हिंदी सिनेमा के घिसे-पिटे चेहरों को परिचित भूमिकाओं में न लाएं। स्वानंद किरकिरे, शिल्पा शुक्ला, कुशाल पंजाबी और सिद्धांत शर्मा के अभिनय में अनगढ़ ताजगी है। वे हमें अपनी अदाओं और कारस्तानियों से लुभाते हैं। इस फिल्म का वितान बड़ा नहीं है। फिल्म नए ढंग से कुछ कहने की कोशिश करती है। खास कर समलैंगिकता के मुद्दे को जिस संवेदना स्वीकृति के साथ पेश किया गया है, वह उल्लेखनीय है।
कलाकारों में शिल्पा शुक्ला अपने किरदार के स्वभाव को उसकी लालसा और निराशा के साथ पर्दे पर उतारती हैं। स्वानंद किरकिरे सरप्राइज करते हैं। संवादों और हाव-भाव में अपने सटीक एक्सप्रेशन से वे प्रभावित करते हैं। उनका चरित्र पॉजीटिव और प्रिय नहीं है, लेकिन अपनी भंगिमाओं से वे उसकी नकारात्मकता हावी नहीं होने देते। कुशाल पंजाबी और सिद्धांत शर्मा ने अपने चरित्रों को सहज रखा है। बाकी कलाकार भी कथ्य को वास्तविक रंग देने में सहायक होते हैं।
सीमित घटनाओं और प्रसंगों की इस फिल्म को लेखक-निर्देशक ने संवादों और कलाकारों के सहयोग से रोचक बनाया है। फिल्म में हंसी आती है। प्रकाश झा ने ऐसी फिल्म के निर्माण से सराहनीय काम किया है। यह फिल्म हंसाने के लिए फूहड़ नहीं होती और न ही ध्यान खींचने के लिए द्विअर्थी संवादों का सहारा लेती है।
अवधि: 105 मिनट

फिल्‍म समीक्षा : अलोन

-अजय ब्रह़मात्‍मज 
डरावनी फिल्मों का भी एक फॉर्मूला बन गया है। डर के साथ सेक्स और म्यूजिक मिला कर उसे रोचक बनाने की कोशिश की जारी है। भूषण पटेल की 'अलोन' में डर, सेक्स और म्यूजिक के अलावा सस्पेंस भी है। इस सस्पेंस की वजह से फिल्म अलग किस्म से रोचक हो गई है। हिंदी फिल्मों में अक्सर दिखाया जाता है कि प्रेम के लिए कुछ लोग किसी भी हद तक जा सकते हैं। कई बार हद टूटने पर बड़ी डरावनी स्थितियां पैदा हो जाती हैं। 'अलोन' ऐसे ही उत्कट प्रेम की डरावनी कहानी है।
संजना और अंजना सियामी जुडवां बहनें हैं। जन्म से दोनों का शरीर जुड़ा है। दोनों बहनों को लगता है कि कबीर उनसे प्रेम करता है। लंबे समय के बाद उसके आने की खबर मिलती है तो उनमें से एक एयरपोर्ट जाना चाहती है। दूसरी इस से सहमत नहीं होती। कबीर के जाने के समय भी एक की असहमति की वजह से दूसरी नहीं जा सकी थी। इस बार दूसरी तय करती है कि वह एयरपोर्ट जरूर जाएगी। भले ही इसके लिए उसे अपनी जुड़वां बहन से अलग होना पड़े। इस ऊहापोह में एक हादसा होता है और एक बहन की जान चली जाती है। अब अकेली बहन बची है। हम नहीं बताना चाहेंगे कि संजना बची है या अंजना... फिल्म का यह सस्पेंस सिनेमाघर में खुले तो बेहतर।
'अलोन' में बिपाशा दोहरी भूमिका में हैं। जीवित भी वहीं हैं,मृत भी वही। बची हुई बहन पर मृत बहन का भूत आता है। जुड़वां बहनों को द्वंद्व जारी रहता है। इस द्वंद्व के मध्य में है कबीर। एक तो वह भूत-प्रेत में यकीन नहीं करता, दूसरे वह करिअर के उस मुकाम पर है जब व्यस्तता थोड़ी ज्यादा रहती है। बीवी को लगता है कि पति उसे पर्याप्त समय नहीं दे रहा। विवाह के बाद दांपत्य में प्रेम के इस कंफ्यूजन के खत्म होने के पहले कबीर को अपनी बीवी के साथ् केरल लौटना पड़ता है,क्योंकि उसकी सासु मां का एक्सीडेंट हो गया है। वहां पहुंचने पर उसे पता चलता है कि मृत बहन की आत्मा जागृत हो गई है। यहां से डर का ड्रामा चालू हो जाता है,जिसमें दांपत्य में आई खटास भी एक मसाला है।सभी हॉरर फिल्मों की तरह निर्देशक भूषण पटेल ने नीम रोशनी,साउंड ट्रैक और चौंकाने वाले प्रसंग रखे हैं। आरंभ में थोड़ा डर भी लगता है,लेकिन कुछ दृश्यों के बाद डर का दोहराव डराने से अधिक हंसाता है। हॉरर फिल्मों की यह सबसे बड़ी दिक्कत रहती हैं। भूषण पटेल दोहराव के एहसास से नहीं बच पाए हैं। फिल्म में बिपाशा बसु और करण सिंह ग्रोवर के बीच कुछ हॉट सीन हैं,जिन्हें दर्शकों की उत्सुकता और उत्तेजना के लिए रखा गया है। कुछ रोमांटिक गाने हैं,जिनमें चुंबन और आलिंगन की संभावनाओं का उपयोग किया गया है। फिल्म का सस्पेंस रोचक है। उस सस्पेंस के जाहिर होने के बाद फिल्म नया आयाम ले लेती है।

 करण सिंह ग्रोवर की यह पहली फिल्म है। कैमरे के सामने वे सधे हुए हैं। उनके चरित्र को थोंड़ा विस्तार मिला होता तो अ'छी तरह समझ में आता कि वे कैसे अभिनेता हैं। इस फिल्म में तो निर्देशक उनकी देह दिखा कर ही काम चला लेते हैं। उनके कुछ दृश्य जाकिर हुसैन के साथ हैं। वहां उनकी सीमाएं नजर आती हैं,लेकिन बिपाशा बसु के साथ के रोमांटिक दृश्यों में वे जंचते हैं। यह फिल्म बिपाशा बसु की काबिलियत जाहिर करती है। दोनों भूमिकाओं में भिन्नता बरतने में उन्हें अधिक दिक्कत नहीं हुई है। बिपाशा बसु डरावनी फिल्मों के औचक दृश्यों में सध गई हैं।
फिल्म में अनेक गायकों और संगीतकारों का इस्तेमाल किया गया है। सभी निजी तौर पर प्रभावित करते हैं।
अवधि:131 मिनट
abrahmatmaj@mbi.jagran.com

Thursday, January 15, 2015

दरअसल : ऊपर आका,नीचे काका

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-अजय ब्रह्मात्मज
    राजेश खन्ना की लोकप्रियता और उसके प्रभाव को शब्दों में नहीं बताया जा सकता। आठवें दशक के आरंभ में जवान हो रही पीढ़ी ने इस लोकप्रियता को राजेश खन्ना की फिलमों के जरिए महसूस किया है। अभी डिजायनर और स्टायलिस्ट आ गए हैं,लेकिन किसी भी कथित स्टार या सुपरस्टार के पहनावे की नकल नहीं होती। एक दौर था जब सभी राजेश खन्ना की शैली के गुरू कट कुर्ता पहनते थे। आलों का उनकी शैली में काढ़ते थे और आईने के सामने खड़े होकर पलकों को झपकाते हुए मीठी मुस्कान का रिहर्सल करते थे। राजेश खन्ना पे पूरी पीढ़ी को अपना दीवाना बना दिया था। लड़कियों की दीवानगी के किस्से तो और अलग एवं रोमांचकारी हैं। राजेश खन्ना की जिंदगी और मौत दोनों ने उनके प्रशंसकों का आकर्षित किया। सन् 2012 के जुलाई महीने में निधन के बाद मुंबई की सडक़ों पर उनकी अंतिम यात्रा में शामिल प्रशंसकों के समूह को भीड़ कहना अनुचित होगा। आर्शीवाद से श्मशन की उस यात्रा में उनके प्रशंसक उनकी यादों को तिरोहित करने नहीं,बल्कि संयोजित करने आए थे।
    सुपरस्टार राजेश खन्ना ने लोकप्रियता की असीम ऊंचाई देखी और फिर अपनी ही लोकप्रियता का उस ऊंचाई से फिसलते देखा। कभी कहा जाता था-ऊपर आका,नीचे काका। काका ने आका सा महत्व हासिल कर लिया था,लेकिनअपने स्खलन के वे स्वयं गवाह थे। हारा मन अपनी हार स्वीकार नहीं करता। उसे उम्मीद रहती है कि मरने से पहले वह एक बार फिर उछलेगा या छलांग मार लेगा। काका को भी उम्मीद थी,लेकिन ऐसा हो नहीं सका। आईफा के  अवार्ड समारोह में मकाओ में उन्हें लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया था। यह अवार्ड अमिताभ बच्चन के हाथों उन्हें सौंपा गया था। जिस किसी ने भी इस अवार्ड समारोह का प्रसारण देखा होगा,उसने जरूर राजेश खन्ना का आर्तनाद सुना होगा। पराजय की रुदन में आंसू भले ही न दिखें,लेकिन वह सामने बैठे व्यक्ति को विह्वल करती है। राजेश खन्ना ने उस रात जता दिया था कि वे पराजित हो गए हैं। समय उनके साथ नहीं रहा। बाद में यह अवार्ड अपने दोस्तों को दिखा कर वे कहा करते थे कि इसे अमिताभ बच्चन ने दिया था। अपनी हार की यह उनकी पहचान थी। उनके करिअर पर नजर डालें तो स्पष्ट दिखता है कि उन्होंने अपनी ही लोकप्रियता की अवहेलना की। लोगों के प्यार की कद्र नहीं की। वे ऐसे आत्ममुग्ध और आत्महंता व्यक्ति के तौर पर नजर आते हैं,जो अपने ही स्टारडम की चमक में लुप्त और अदृश्य हो गया।
    राजेश खन्ना के व्यक्तित्व को जानने,समझने और लिखने की सफल कोशिश गौतम चिंतामणि ने की है। उन्होंने द लोनलीनेस ऑफ बीइंग राजेश खन्ना : डार्क स्टार नामक पुस्तक लिखी है। पिछली सदी के एक स्याह सितारे की यह जीवनी उतार-चढ़ाव से भरी उसकी यात्रा से अधिक उसकी छवि का विश्लेषण करती है। इसमें उनकी अप्रतिम कामयाबी की परछाइयां है। इन परछाइयों में खोती उनकी छवि है। गौतम ने राजेश खन्ना का एकाकीपन के देवता के तौर पर नहीं देखा है। उन्होंने जतिन खन्ना से राजेश खन्ना बने उस व्यक्ति और कलाकार के बात-व्यवहार से ही स्खलन को समझने की कोशिश की है। गौतम ने सिलसिलेवार तरीके से उनकी फिल्मों का उल्लेख किया है। उनके निभाए किरदारों की भी व्याख्या की है। साथ ही हर फिल्म के साथ उनमें आ रहे बदलावों को भी वे रेखांकित करते चलते हैं।  यह पुस्तक राजेश खन्ना के व्यक्त्त्वि और व्यवहार की समझ देती है। यों कई बार लगता है कि भटकने या किसी और डर से गौतम विश्लेषण और टिप्पणी पर स्वयं ही रोक लगा देते हैं। इस संयम में कुछ चीजेें खुलते-खुलते ढक जाती हैं।
    गौतम चिंतामणि ने उपलब्ध सामग्रियों और जानकारियों के आधार पर यह पुस्तक तैयार की है। राजेश खन्ना के करीबियों से उन्हें पूरा सहयोग नहीं मिला है। भारतीय परिवेश में जीवनियां और आत्मकथाएं अस असहयोग के कारण अधूरी लगती हैं। स्टार या अन्य फिल्मी हस्तियां स्वयं कुछ नहीं लिखतीं और बतातीं। करीबी भी सच बताने से अधिक छिपाने की कोशिश करते हैं। इस पृष्ठभूमि में गौतम चिंतामणि का यह प्रयास सराहनीय है। उन्होंने राजेश खन्ना की लोकप्रियता के साए में पनपे राजेश खन्ना के अकेलेपन और निर्वासन को यथासंभव प्रकाशित किया है।

द लोनलीनेस ऑफ बीइंग राजेश खन्ना : डार्क स्टार
लेखक-गौतम चिंतामणि
हार्पर कालिंस पब्लिशर्स,इंडिया