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Wednesday, December 31, 2014

आप की पसंद की 5 पोस्‍ट


2014 में मैंने चवन्‍नी चैप पर आप के लिए 305 पोस्‍ट किए। 2007 से मैं निरंतर लिख रहा हूं। इस बीच कई पाठक कलाकार,पत्रकार और फिल्‍मकार बने। मुझे खुशी होती है,जब यह पता चलता है कि उनके विकास में चवन्‍नी की भूमिका रही है। मैं आगे भी लिखता रहूंगा। इसे स्‍वावलंबी बनाने की दिशा में सोच रहा हूं। आप में जानकार मुझे सुझाव दे सकते हैं। अपेक्षित मदद कर सकते हैं। साथ ही यह भी बताएं कि चवन्‍नी की खनक कैसेट बढ़ाई जाए।

फिलहाल आग्रह है कि पिछले साल की पोस्‍ट में से अपनी पसंद की पांच पोस्‍ट का उल्‍लेख करें। पढ़ने की सुविधा के लिए आर्काइव में जा सकते हैं।

दिसंबर से जनवरी तक की यह सूची है।



    ▼  December (25)

    रॉन्ग नंबर के लोग विरोध कर रहे हैं : आमिर खान
    पीके फिल्‍म की धुरी है यह गीत और संवाद
    बाक्स आफिस सालाना रिपोर्ट
    फिल्‍म समीक्षा : अग्‍ली
    दरअसल : 2014 की मेरी पसंद की 12 फिल्में
    हिंदी सिनेमा से भी जुड़े थे के बालाचंदर
    अग्‍ली के लिए लिखे गौरव सोलंकी के गीत
    बस अच्छी फिल्में करनी है - अनुष्का शर्मा
    दरअसल : राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी
    इंपैक्‍ट 2014 : आमिर खान, कपिल शर्मा
    फिल्‍म समीक्षा : पीके
    दरअसल : एनएफडीसी का फिल्म बाजार
    दोनों हाथों में लड्डू : सुशांत सिंह राजपूत
    अब तीसरा शेड भी है सामने-राजपाल यादव
    बदला जमाने के साथ : अदनान सामी
    दरअसल : सेंसर के यू/ए सर्टिफिकेट का औचित्य
    ‘3 इडियट’ के तीनों इडियट ही ला रहे हैं ‘पीके’
    दरअसल : पर्दे पर आम आदमी
    फिल्‍म समीक्षा : भोपाल-ए प्रेयर फॉर रेन
    फिल्‍म समीक्षा : एक्‍शन जैक्‍सन
    दरअसल : पिता सुखदेव की खोज में बेटी शबनम
    खानत्रयी (आमिर,शाह रुख और सलमान) का साथ आना
    हर बार अलग अवतार में सोनाक्षी सिन्‍हा
    शालीन हास्‍य के अभिनेता देवेन वर्मा
    फिल्में बड़ी होती हैं या फिल्ममेकर?

    ►  November (18)

    श्रद्धांजलि : सितारा देवी
    खानाबदोश अभिनेता आदिल हुसैन
    रंग रसिया - फिल्मी पर्दे को कैनवस में बदलता सिनेमा...
    फिल्म समीक्षा : हैप्पी एंडिंग
    दरअसल : देश का इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल
    इरफान की अनौपचारिक बातें
    फिल्‍म समीक्षा : किल दिल
    दरअसल : माहौल बने बच्चों की फिल्मों का
    जेड प्‍लस मतलब con man बनाम common man
    करियर और अपनी संस्कृति को अलग नहीं कर सकता: गिरीश ...
    हिंदी फिल्‍मों में लुंगी
    फिल्‍म समीक्षा : रंग रसिया
    फिल्‍म समीक्षा : द शौकीन्‍स
    जेड प्‍लस पात्र परिचय
    दरअसल : आ जाती है छोटी और सार्थक फिल्में
    'जेड प्लस' के लेखक रामकुमार सिंह से एक बातचीत
    क्‍या बुराई है कंफ्यूजन में : श्रद्धा कपूर
    हम सब असलम : डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेद्वी

    ►  October (40)

    फिल्‍म समीक्षा : रोर
    दरअसल : फिल्म फेस्टिवल की प्रासंगिकता
    जेड प्‍लस का ट्रेलर
    पोस्‍टर - जेड प्‍लस
    खुद के प्रति सहज हो गई हूं-दीपिका पादुकोण
    दरअसल : बेहद जरूरी हैं किताबें
    शोक का शौक
    दरअसल : नया क्लब है 200 करोड़ का
    फिल्‍म समीक्षा : हैप्‍पी न्‍यू ईयर
    हमने भी ‘हैदर’ देखी है - मृत्युंजय प्रभाकर
    नकाब है मगर हम हैं कि हम नहीं: कश्मीर और सिनेमा -प...
    खुशियां बांटता हूं मैं-रणवीर सिंह
    हैदर : कश्मीर के कैनवास पर हैमलेट - जावेद अनीस
    हैदर यानी कश्‍मीरियत की त्रासदी
    फिल्‍म समीक्षा : सोनाली केबल
    बापू की लकी बेटी श्रद्धा कपूर
    बहुत अलग है लेखन और अभिनय -स्वानंद किरकिरे
    फिल्म ‘हैदर’ पर - अरुण माहेश्वरी
    ‘हेमलेट’ का प्रतिआख्यान रचती ‘हैदर’ - डाॅ. विभावरी...
    अमिताभ बच्‍चन : 78 सोच
    फिल्‍म समीक्षा : तमंचे
    फिल्‍म समीक्षा : जिगरिया
    दरअसल : दो छोर है ‘बैंग बैंग’ और ‘हैदर’
    हैदर: हुआ तो क्यों हुआ या हुआ भी कि नहीं... - पीयू...
    दरअसल, हैदर पिता द्वारा भटकाये गये बेटे को मां द्व...
    खुद को पा लिया मैंने -रितिक रोशन
    हैदर - विशाल का विशाल फलक
    हैदर पर वेद विलास उनियाल
    विशाल भारद्वाज के मन की फिल्‍म है हैदर - रश्मि रवी...
    ‘हैदर’ कविता नहीं, कथा और कथेतर गद्य का आर्टपीस है...
    ‘मैं हूं या मैं नहीं हूं’ के सवाल से जूझता ‘हैदर’ ...
    हैदर: हसीन वादियों में खूंरेज़ी की दास्‍तान - व्‍...
    एंटरटेनमेंट नहीं गंभीर विमर्श की कहानी है 'हैदर' ...
    'हैदर' वो है जिसने उम्मीद नहीं छोड़ी है -मिहिर पां...
    सियासत और सेना की नजर से ना देखें कश्मीर -धर्मेन्‍...
    हर फ्रेम शेक्सपीयराना है- जयप्रकाश चौकसे
    कश्मीर के आज़ाद भविष्य से इत्तेफ़ाक रखती है हैदर - ...
    दरअसल : शाह रुख खान की सोच
    फिल्‍म समीक्षा : हैदर
    फिल्‍म समीक्षा : बैंग बैंग


    ►  September (20)

    सवालों में सेंसरशिप
    निर्माण में आ सकते हैं नवाज
    फिल्‍म समीक्षा : राजा नटवरलाल
    दरअसल : कागज के फूल की पटकथा
    करें टिप्‍पणी या लिखें कहानी : रणवीर सिंह और अजय ब...
    इंस्पायरिंग कहानी है मैरी कॉम की-प्रियंका चोपड़ा
    टीवी सीरिज ‘होमलैंड 4’ में निम्रत कौर
    फिल्‍म समीक्षा : मर्दानी
    फिल्‍म समीक्षा : मैड अबाउट डांस
    दरअसल : बदल रहे हैं प्रचार के तरीके
    दरअसल : आत्मकथा दिलीप कुमार की
    अब तक गुलजार
    छह लूजर्स का ख्वाब है ‘हैप्पी न्यू ईयर’- शाह रुख ख...
    फिल्‍म समीक्षा : सिंघम रिटर्न्‍स
    भारतीयता का आधुनिक अहसास - शाह रुख खान
    ...तब ज्यादा मेहनत करता हूं-रोहित शेट्टी
    संग-संग : तिग्‍मांशु घूलिया-तूलिका धूलिया
    इतना तो हक़ बनता है - करीना कपूर
    सरहदें लाख खिंचे दिल मगर एक ही है -महेश भट्ट
    फिल्‍म समीक्षा : एंटरटेनमेंट
    दरअसल : ईद ने पूरी की उम्मीद
    अनसुलझी पहेली है हिट फिल्‍म का फार्मूला : अक्षय कु...


    ►  August (22)
    ►  July (19)


    ►  June (27)
    ►  May (34)
    ►  April (19)
    ►  March (30)
    ►  February (14)
    ►  January (37)

Monday, December 29, 2014

रॉन्ग नंबर के लोग विरोध कर रहे हैं : आमिर खान

-स्मिता श्रीवास्‍तव 
विवादों के बीच राजकुमार हिरानी की 'पीके' 200 करोड़ क्लब में शामिल हो चुकी है। फिल्म पर हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाया जा रहा है। फिल्म को लेकर उठने वाले विवाद के पीछे इसमें दिखाए गए कुछ दृश्य हैं।
दरअसल, 'पीके' में धर्म के नाम पर होने वाली कुरीतियों पर कड़ा प्रहार किया गया है। भगवान और धर्म-कर्म के नाम पर चल रहे धार्मिक उद्योगों पर सवालिया निशान लगाया गया है। फिल्म चमत्कार दिखाने वाले संतों को भी कठघरे में खड़ा करती है। हवा से सोना पैदा करने वाले बाबा चंदा क्यों लेते हैं या देश की गरीबी क्यों नहीं दूर करते? धर्म के नाम पर खौफ पैदा करने वालों पर भी नकेल कसी गई है। फिल्म में स्पष्ट संदेश है कि जब ईश्वर ने तर्क-वितर्क की शक्ति दी है तो अतार्किक बातों पर हम आंखें मूंद कर विश्वास क्यों करते हैं।
इन सबके बीच सवाल उठ रहा है कि सिर्फ हिंदू धर्म पर ही चोट क्यों की गई। बाकी धर्मालंबियों पर ऊंगली क्यों नहीं उठाई? पूछने पर आमिर खान कहते हैं, 'फिल्म मानवता का संदेश देती है। दूसरा, अंधविश्वास के खिलाफ अलख जगाती है। फिल्म में धार्मिक कट्टरता के खिलाफ भी आवाज उठाई है। एक दृश्य में बम ब्लास्ट दिखाया गया है। टीवी पर खबर दिखाई गई है कि किसी ने अपने खुदा की रक्षा के नाम पर बम ब्लास्ट का बयान दिया। पेशावर में आर्मी स्कूल पर हमला धार्मिक कट्टरता की हालिया मिसाल है। कोई धर्म मासूमों की जान लेना नहीं सिखाता। यह सब गैर धार्मिक चीजें हैं। अगर लोगों को फिल्म पसंद नहीं आती तो देखते क्यों हैं? उन लोगों को ही तकलीफ होगी जो गलत काम करते हैं। जो लोग चाहते हैं उनका पर्दाफाश न हो वो विरोध करेंगे। दूसरा 'बायकॉट तो आमिर फॉर 'सत्यमेव जयते' का भी हुआ। दरअसल, जिन्हें फायदा होता है वे नहीं चाहते कि चीजें बदलें। मैं नकरात्मक चीजों पर रिएक्ट नहीं करता। मुझे गर्व है कि मैं सोशल मुद्दे उठाता हूं। डेमोक्रेसी में हर किसी का अपना ओपिनियन होता है। हम सबकी इज्जत करते हैं।'
वहीं राजकुमार हिरानी कहते हैं, 'हम सब एक हैं। भेदभाव हमने खुद बनाए हैं। कई सालों से लग रहा था कि यह बात सिनेमा के माध्यम से कहनी चाहिए। हमने इसमें किसी के ऊपर ऊंगली नहीं उठाई है। हमारी जो विचारधारा है उसे पेश करने की कोशिश की है। हम प्यार से कह रहे हैं कि अपने आपको एक समान समझो। कोई गलत बात नहीं कह रहे। फिल्म की स्क्रिप्ट लिखने के दौरान ही तय किया था यह संदेश देना है कि एक ईश्वर ने हमने बनाया, जिसके बारे में पता नहीं। दूसरा जिसे हमने बनाया हम जैसा ही है। अगर आम इंसान यह बात कहता तो सवाल उठते। यह तो हम जैसा ही है। फिर एलियन का विचार आया। उसके जरिए यह बात आक्रामक नहीं लगती।'
फिल्म में लव जेहाद को दिखाने से आमिर इंकार करते हैं। वह कहते हैं, ' फिल्म में लव जेहाद की बात नहीं की गई है। हमारे दिमाग में अक्सर गलत चीजें डाल दी जाती हैं। कई रॉन्ग नंबर बैठे होते हैं। यानी दूसरी कम्युनिटी के लिए कुछ शक-शंकाएं डाली जाती हैं। फिल्म में इसे रॉन्ग नंबर बताया गया है। हम इसे पकड़कर चलते हैं। इसके चलते गलत फैसले लेते हैं। क्लाइमेक्स इसी पर आधारित है। हमारे मन में दूसरों के खिलाफ खराब विचार हैं। इसलिए नहीं कि आपने मेरे साथ गलत किया है। बल्कि मन में यह विचार बैठाया गया है। सो, रॉन्ग नंबर को तोडऩे की कोशिश की है।'
देश में पिछले अर्से में कई बाबाओं का पर्दाफाश हुआ है। इस संदर्भ में आमिर कहते हैं, 'मैं यह नहीं कहता हर गुरु गलत होता है। बहुत सारे लोग अच्छी चीजें भी सीखाते हैं, जो आपके धार्मिक गुरु बनते हैं। बहुत सारे गुरु अच्छे लोग हैं। उनसे आपको प्रेरणा मिलती है। उनके पास हर धर्म के लोग जाते हैं। मेरा खुद का कोई धार्मिक गुरु नहीं है। हालांकि मेरा धर्म पर पूरा यकीन है। हम हर धर्म को फॉलो करते हैं। पहली पत्नी रीना से शादी के बाद जब उनकी मम्मी हवन कराती थी तो हम लोग पूजा में शामिल होते थे। मैं हज पर भी गया हूं। मेरा मानना है हर धर्म बहुत अच्छी बातें सिखाता है। समस्या तब शुरू होती है जब लोग धार्मिक कट्टता की आड़ में लोगों को बांटने और दरार पैदा करने की बात करते हैं। तभी उनका रॉन्ग नंबर शुरू हो जाता है।'
दुनिया में बदलाव लाने को लेकर आमिर कहते हैं, 'हम कम्युनिकेटर हैं। हम लोगों को जागृत करने की कोशिश करते हैं। अंतत: यह हर इंसान पर निर्भर पर करता है कि वह क्या चाहता है। कैसे अपना जीवन बिताना चाहता है।'

पीके फिल्‍म की धुरी है यह गीत और संवाद

पीके के पर चल रहे इस विवाद के संदर्भ में कि फिल्‍म में केवल हिंदू धर्म और साधु-संतों पर निशाना साध गया है... 
पेश है फिल्‍म का एक गीत और वह महत्‍वपूर्ण संवाद जो फिल्‍म की धुरी है....112वें मिनट से 116 वें मिनट तक आप फिल्‍म में इन्‍हें सुन सकते हैं।

 

Bhagwan Hai Kahan Re Tu Lyrics

Hai suna ye poori dharti tu chalata hai
Meri bhi sun le araj mujhe ghar bulata hai
Bhagwan hai kahan re tu
Hey Khuda hai kahan re tu

Hai suna tu bhatke mann ko raah dikhata hai
Main bhi khoya hun mujhe ghar bulata hai
Bhagwan hai kahan re tu
Hey Khuda hai kahan re tu

Aa...
Main pooja karun ya namajein padhun
Ardaasein karun din rain
Na tu Mandir mile, na tu Girje mile
Tujhe dhoondein thake mere nain
Tujhe dhoondein thake mere nain
Tujhe dhoondein thake mere nain

Jo bhi rasmein hain wo saari main nibhata hoon
In karodon ki tarah main sar jhukata hoon
Bhagwan hai kahan re tu
Aye Khuda hai kahan re tu

Tere naam kayi, tere chehre kayi
Tujhe paane ki raahein kayi
Har raah chalaa par tu na mila
Tu kya chaahe main samjha nahin
Tu kya chaahe main samjha nahin
Tu kya chaahe main samjha nahin

Soche bin samjhe jatan karta hi jaata hun
Teri zid sar aankhon par rakh ke nibhata hun
Bhagwan hai kahan re tu
Aye Khuda hai kahan re tu

Hai suna ye poori dharti tu chalata hai
Meri bhi sun le araj mujhe ghar bulata hai
Bhagwan hai kahan re tu
Hey Khuda hai kahan re tu
Bhagwan hai kahan re tu
Hey Khuda hai kahan re tu..

....बहुत ही कनफुजिया गया हूं भगवान। कुछ तो गलती कर रहा हूं कि मेरी बात तुम तक पहुंच नहीं रही है। हमारी कठिनाई बूझिए न। तनिक गाइड कर दीजिए... हाथ जोड़ कर आपसे बात कर रहे हैं...माथा जमीन पर रखें, घंटी बजा कर आप को जगाएं कि लाउड स्पीकर पर आवाज दें। गीता का श्लोक पढ़ें, कुरान की आयत या बाइबिल का वर्स... आप का अलग-अलग मैनेजर लोग अलग-अलग बात बोलता है। कौनो बोलता है सोमवार को फास्ट करो तो कौनो मंगल को, कौनो बोलता है कि सूरज डूबने से पहले भोजन कर लो तो कौनो बोलता है सूरज डूबने के बाद भोजन करो। कौनो बोलता है कि गैयन की पूजा करो तो कौनो कहता है उनका बलिदान करो। कौना बोलता है नंगे पैर मंदिर में जाओ तो कौनो बोलता है कि बूट पहन कर चर्च में जाओ। कौन सी बात सही है, कौन सी बात लगत। समझ नहीं आ रहा है। फ्रस्टेटिया गया हूं भगवान...

Saturday, December 27, 2014

बाक्स आफिस सालाना रिपोर्ट


-अजय ब्रह्मात्मज
     साल खत्म होने को है। अनुराग कश्यप की ‘अग्ली’ रिलीज हो चुकी है। पिछले हफ्ते राजकुमार हिरानी की ‘पीके’ रिलीज हुई। इस फिल्म ने आशा के अनुरूप कलेक्शन किया। हालांकि पहले दिन 26 करोड़ से कुछ अधिक के कलेक्शन से ऐसा लगा था कि दर्शकों ने फिल्म को पूरी तरह पसंद नहीं किया। टिकटों की ऊंची दर का मामला भी सामने आया। फिर भी ‘पीके’ ने शनिवार और रविवार को कामयाब फिल्मों की बढ़त दिखाई। शनिवार को फिल्म का कलेक्शन बढ़ कर 30 के लगभग हो गया और रविवार को तो ‘पीके’ ने 38 करोड़ का आंकड़ा छू लिया। फिल्मों के कलेक्शन में वीकएंड के तीन दिनों में ऐसी बढ़त दिखे तो माना जाता है कि वह फिल्म हिट होगी। ट्रेड पंडित कह रहे हैं कि ‘पीके’ हिट फिल्म है। इसने पलिे हफ्ते में 182 करोड1 का कलेक्‍शन कर नया रिकार्ड बना लिया है।अब देखना यह है कि वह कितनी बड़ी हिट होती है।
    2014 बाक्स आफिस के हिसाब से बहुत संतोषजनक नहीं रहा है। 2012 की 24 और 2013 की 25 की तुलना में 2014 में केवल 19 फिल्में ही कामयाब फिल्मों की श्रेणी में आ सकीं। इस साल केवल 8 फिल्में ही 100 करोड़ का आंकड़ा पार कर सकीं। बड़ी फिल्मों की असफलता ने ट्रेड को निराश किया। सफल फिल्मों ने भी उम्मीद के मुताबिक कारोबार नहीं किया। माना जा रहा था कि ‘पीके’ तीसरे दिन तो अवश्य ही 100 करोड़ से ज्यादा का कलेक्शन कर लेगी,लेकिन उसे भी चार दिन लग ही गए। हिंदी फिल्मों के सकल कारोबार में अपेक्षित बढ़त नहीं दिख रही है। ट्रेड पंडितों के मुताबिक बढ़त का प्रतिशत घट गया है। बहस चल रही है कि अगर फिल्म की लागत कम की जाए तो मुनाफे का प्रतिशत बढ़ सकता है। फिलहाल बड़े स्टारों को पारिश्रमिक के रूप में दी जाने वाली ऊंची रकम से नफा-नुकसान का संतुलन बिगड़ रहा है।
            ट्रेड पंडितों के मुताबिक पैकेजिंग और प्रचार का खर्च बढऩे से भी मुनाफे का अनुपात कम हुआ है। फिल्मों के कंटेंट पर सही ध्यान न देने से वीकएंड के बाद के दर्शक सिनेमाघरों में नहीं जाते हैं। देश में अभी तक वही फिल्में ज्यादा बड़ी सफल होती हैं,जिन्हें फैमिली दर्शक मिल पाते हैं। इस साल अच्छी बात यह रही कि युवा स्टारों ने सफलता की छलांग लगाई और वे पॉपुलर स्टारों की कतार में आ गए।

टॉप 10 हिंदी फिल्में
   फिल्म                 कलाकार                                       निर्देशक                        कलेक्शन करोड़ रुपयों में
1 .किक               सलमान खान,जैक्लीन फर्नांडिस       साजिद नाडियाडवाला          233 .00
2 .हैप्पी न्यूू ईयर शाह रुख खान,दीपिका पादुकोण     फराह खान                              203.30
3. पीके                आमिर खान,अनुष्का शर्मा            राजकुमार हिरानी                    182.00 जारी
4.बैंग बैंग            रितिक रोशन,कट्रीना कैफ           सिद्धार्थ आनंद                            181.03
5. सिंघम रिटन्र्स अजय देवगन,करीना कपूर खान     रोहित शेट्टी                           141.00
6. हॉलीडे            अक्षय कुमार,सोनाक्षी सिन्हा          ए आर मुर्गोदास                        112 .00
7.  जय हो          सलमान खान,डेजी शाह              सोहेल खान                                   111.00
8. एक विलेन     सिद्धार्थ मल्होत्रा,श्रद्धा कपूर           मोहित सूरी                                 105.50
9. 2 स्टेट्स       अर्जुन कपूर,आलिया भट्ट             अभिषेक वर्मन                            104.00
10. हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया वरुण धवन,आलिया भट्ट  शशांक खेतान                       76.81                     



Friday, December 26, 2014

फिल्‍म समीक्षा : अग्‍ली

- अजय ब्रह्मात्‍मज 
अग्ली अग्ली है सब कुछ
अग्ली अग्ली हैं सपने
अग्ली अग्ली हैं अपने
अग्ली अग्ली हैं रिश्ते
अग्ली अग्ली हैं किस्तें
अग्ली अग्ली है दुनिया
अब तो बेबी सबके संग
हम खेल घिनौना खेलें
मौका मिले तो अपनों की
लाश का टेंडर ले लें
बेबी लाश का टेंडर ले लें
क्योंकि अग्ली अग्ली है सब कुछ।
    अनुराग कश्यप की फिल्म 'अग्ली' के इस शीर्षक गीत को चैतन्य की भूमिका निभा रहे एक्टर विनीत कुमार सिंह ने लिखा है। फिल्म निर्माण और अपने किरदार को जीने की प्रक्रिया में कई बार कलाकार फिल्म के सार से प्रभावित और डिस्टर्ब होते हैं, लेकिन उनमें से कुछ ही भूमिका निभाने की उधेड़बुन को यों प्रकट कर पाते हैं। दरअसल, इस गीत के बोल में अनुराग कश्यप की फिल्म का सार है। फिल्म के थीम को गीतकार गौरव सोलंकी ने भी अपने गीतों में सटीक अभिव्यक्ति दी है। वे लिखते हैं, जिसकी चादर हम से छोटी, उसकी चादर छीन ली, जिस भी छत पर चढ़ गए हम, उसकी सीढ़ी तोड़ दी...या फिल्म के अंतिम भाव विह्वल दृश्य में बेटी के मासूम सवालों में उनके शब्द संगदिल दर्शकों के सीने में सूइयों की तरह चुभते हैं। इन दिनों बहुत कम फिल्मों में गीत-संगीत फिल्म के भाव को छू पाते हैं। 'अग्ली' की कुरूपता समझने के लिए इन गीतों को फिल्म देखने के पहले या बाद में सुन लें तो पूरा नजरिया और संदर्भ मिल जाएगा।
         अनुराग कश्यप की 'अग्ली' शहरी जीवन और समाज में रिश्तों में आए स्वार्थ, चिढ़, ईर्ष्या, छल, कपट, द्वेष, मान मर्दन, अपमान आदि स्याह भावनाओं को समेटती हुई ऐसी कली कथा का सृजन करती है, जिसे पर्दे पर घटते देख कर मन छलनी होता है। अनुराग की इस फिल्म में केवल कली ही निष्कपट चरित्र है। वह अपने पापा को प्यार करती है। उसे नहीं मालूम कि उसकी मां पापा से क्या अपेक्षा रखती है और क्यों दूसरे पापा के साथ रहने लगती है। वह तो पापा के साथ रहने की कोशिश में इस बेरहम समाज के लालच का शिकार होती है। कली की मां शालिनी, कली के पापा राहुल, कली के दूसरे पापा सौमिक, पापा के दोस्त चैतन्य, मामा सिद्धांत, मां की दोस्त राधा सभी किसी न किसी प्रपंच में लीन हैं। वे अपने स्वार्थ और लाभ के लिए किसी भी स्तर तक गिर सकते हैं। रात के पौने तीन बजे अंडरवियर में हजार-हजार के नोट खोंस कर हवा में हजारों के नोट उड़ाते और सोफे पर नोट बिछा कर लेटते कली के मामा को देख कर घिन आ सकती है, लेकिन यही मुंबई जैसे शहरों की घिनौनी काली सच्चाई है। कली के मां या दोनों पापा भी तो दूध के धुले नहीं हैं। ये आत्मकेंद्रित चरित्र खुद के बाएं-दाएं भी नहीं देख पाते। मौका मिलते ही सभी गिरह काटने में माहिर हैं। बतौर -लेखक निर्देशक अनुराग कश्यप की किसी किरदार से सहानुभूति नहीं है। वे निष्ठुर भाव से उन्हें ज्यों के त्यों पेश कर देते हैं। हमारी मुलाकात एक निर्दयी निर्देशक से होती है, जिसकी कटु कल्पना शहर के अंधेरे कोनों और इंसान के संकरे विवरों में प्रवेश करती है। वहां हर किरदार को अपनी कमजोरियों से लगाव है।
        निश्चित ही 'अग्ली' अनुराग कश्यप की अलहदा फिल्म है। यहां वे चित्रण, विवरण और प्रस्तुति में मुखर हैं। वे बेलाग तरीके से हमारे समय कसैले अनुभवों को स्थितियों और घटनाओं की तरह पेश करते हैं। कली का गायब होना ऐसा हादसा है, जिसके बाद रिश्तों की कलई उतरने लगती है। गौर करें तो कली के गायब होने का क्रूर रूपक सभी चरित्रों को एक-एक कर बेनकाब करता है। उनकी असली सीरत और सूरत कुरूप है। अनुराग ने किसी भी चरित्र को नहीं बख्शा है। यहां तक कि श्रीलाल और उसकी बुआ या इंस्पेक्टर जाधव भी नहीं बच पाते। ये सभी शहरी समाज के डिस्टर्ब चरित्र हैं। वे इरिटेट करते हैं। अनुराग ने अपनी फिल्म के लिए मुंबई का खास परिवेश चुना है। जीर्ण और जर्जर इमारतों का यह मध्यवर्गीय माहौल आम तौर हिंदी फिल्मों में नहीं दिखाई देता। उनके प्रोडक्शन डिजाइनर और कैमरामैन ने रंग और परिवेश से फिल्म के कथ्य को गढ़ा और प्रभावशाली बना दिया है।
        कलाकारों के चयन और और उनके अभिनय में अनुराग कश्यप ने हिंदी फिल्मों की परिपाटी का पालन नहीं किया है। यथार्थ की जमीन पर खड़े किरदारों का सभी कलाकारों ने मजबूती से पेश किया है। राहुल भट्ट, तेजस्विनी कोल्हापुरी और रोनित रॉय ने प्रमुख किरदारों के तनाव और उलझन को समुचित मात्रा में आत्मसात और प्रस्तुत किया है। छोटी भूमिका में सिद्धांत कपूर ध्यान खींचते हैं। इस फिल्म की उपलब्धि हैं विनीत कुमार सिंह और गिरीश कुलकर्णी। अपने किरदार से विनीत का एकात्मता का नतीजा है फिल्म का टाइटल गीत। गिरीश कुलकर्णी अपनी निर्दोष सादगी से इंस्पेकटर जाधव को असली रंग देते हैं।
अवधि-127 मिनट
**** चार स्‍टार

Thursday, December 25, 2014

दरअसल : 2014 की मेरी पसंद की 12 फिल्में


-अजय ब्रह्मात्मज
2014 समाप्त हो गया। कल आखिरी शुक्रवार होगा। अनुराग कश्यप की ‘अग्ली’ रिलीज होगी। पहले तय था कि उनकी ‘बांबे वेलवेट’ क्रिसमस के मौके पर रिलीज होगी। पोस्ट प्रोडक्शन में लग रहे समय की वजह से अब यह फिल्म मई में रिलीज होगी। पिछले हफ्ते राजकुमार हिरानी की ‘पीके’ रिलीज होने के साथ प्रशंसित हुई। गौर करें तो 2014 में भी फिल्मों का हाल कमोबेश 2013 रके समान ही रहा। च्यादातर बड़े और लोकप्रिय स्टारों ने मसाला एंटरटेनर फिल्में ही कीें। अपनी बढ़त और पोजीशन बनाए रखने की फिक्र में पॉपुलर स्टार हमेशा की तरह लकीर के फकीर बने रहे। स्थापित डायरेक्टरों का भी यही हाल रहा। उन्होंने भी लकीर छोडऩे का साहस नहीं किया। अच्छी बात है कि फिर भी कुछ बेहतरीन और उल्लेखनीय फिल्में 2014 में प्रदर्शित हुईं। उनमें से कुछ को कामयाबी और तारीफ दोनों मिली और कुछ केवल सराही गईं। याद करें तो हम समय गुजरने के साथ यह भूल जाते हैं कि रिलीज के समय किस फिल्म ने कितना बिजनेस किया था। हमें बेहतरीन फिल्में ही याद रह जाती हैं। 2014 की रिलीज फिल्मों में से अपनी पसंद  12 फिल्में चुनना अधिक मुश्किल काम नहीं रहा।
1. हाईवे - इम्तियाज अली निर्देशित हाईवे में अमीर परिवार की एक लडक़ी की आजादी की छटपटाहट को आलिया भट्ट ने सलीके से निभाया था। इम्तियाज अली की यह फिल्म किसी साहित्यिक कहानी की तरह असरदार है। रणदीप हुडा को भी इस फिल्म से बतौर अभिनेता गाढ़ी पहचान मिली।
2 .क्वीन - विकास बहल की क्वीन ने दर्शकों को चौंका दिया था। इस फिल्म में कंगना रनोट ने छोटे शहर की कंफीडेंट लडक़ी के किरदार में अनेक लड़कियों की भावनाओं और जोश को अभिव्यक्ति दी थी। सच्चाई यही है कि इस फिल्म को सबसे ज्यादा किशोरियों और युवतियों ने देखा है।
3.आंखों देखी - रजत कपूर की सीमित बजट की यह फिल्म विषय के अनोखेपन के साथ संजय मिश्र के अभिनय के लिए भी याद रखी जाएगी। रजत कपूर ने इस फिल्म के वास्तविक चित्रण में हिंदी सिनेमा के प्रचलित ग्रामर को तोड़ा।
4.हवा हवाई - अमोल गुप्ते बच्चों की भावनाओं के चितेरे हैं। उन्होंने हवा हवाई में बाल मन की आकांक्षाओं की उड़ान को आकाश दिया है। लगन,जोश और समर्पण किसी वर्ग या समूह विशेष की पूंजी नहीं है। समान अवसर मिलने पर समाज के निचले तबके के बच्चे भी कमाल परिणाम दे सकते हैं।
5.सिटीलाइट्स - हंसल मेहता की यह फिल्म फिलीपिंस की फिल्म की रिमेक थी,लेकिन उन्होंने इसका अद्भुत स्थानिकीकरण किया था। राजकुमार राव और पत्रलेखा के स्वाभाविक अभिनय से यह फिल्म अत्यंत रियल नजर आती है।
6. फिल्मिस्तान - नितिन कक्कड़ की फिल्मिस्तान बन जाने के बहुत बाद रिलीज हुई। शारिब हाशमी और इनामुल हक की अदाकारी से लैस इस फिल्म में भारत-पाकिस्तान के रिश्ते में फिल्मी धागे की मजबूती को अच्छी तरह चित्रित किया था।
7.बॉबी जासूस - समर शेख की यह फिल्म हैदराबाद की पृष्ठभूमि में एक मुस्लिम परिवार की लडक़ी बॉबी के सपनों की कहानी कहती है। 21 वीं सदी के मुस्लिम सोशल में किरदारों के रवैए और चित्रण में आए परिवत्र्तन को यह फिल्म आत्मसात करती है।
8.मैरी कॉम - ओमंग कुमार की मैरी कॉम प्रियंका चोपड़ा की प्रतिभा और मैरी कॉम की जिदंगी का फिल्मी साक्ष्य है। वास्तव में यह दो युवतियों की सफलता की कहानी बन जाती है।  नार्थ ईस्ट के किरदार और जमीन को मेनस्ट्रीम में लाने के लिए भी यह फिल्म याद रहेगी।
9. हैदर - विशाल भारद्वाज की हैदर कश्मीर की पृष्ठभूमि में कुछ ऐसे सवालों को पेश करती है,जिन पर बहस की जरूरत है। कश्मीर के मामले में एकांगी सोच से न तो जख्म भरेंगे और न नई शुरुआत होगी। हैदर हमारे समय की वैचारिक फिल्म है।
10. ज़ेड प्लस - रामकुमार सिंह की लिखी डॉ ़चंद्रप्रकाश द्व्विेदी की फिल्म जेड प्लस शुद्ध राजनीतिक व्यंग्य है। हिंदी में ऐसी फिल्मों की कमी है। वास्तविक चित्रण और देसी किरदारों की यह फिल्म वर्तमान समय की राजनीतिक विसंगति जाहिर करती है। भाषा एक बड़ा सवाल है।
11.पीके - राजकुमार हिरानी की पीके भरतीय समाज में फैले धर्म के ढोंग और आडंबर को बेनकाब करती है। राजकुमार ने अपनी सरस शैली में प्रासंगिक संदेश दिया है। आमिर खान की लोकप्रियता का सुंदर और सार्थक उपयोग हुआ है।
12.अग्ली - वर्तमान समय के महत्वपूर्ण निर्देशक और सिग्नेचर अनुराग कश्यप की अग्ली समाज और परिवार के संबंधों के स्याह पक्ष को पेश करती डार्क फिल्म है। अनुराग ने बताया है कि समय ने हमें ऐसा स्वार्थी बना दिया है कि हम अपने संबंधों में भी नृशंस हो गए हैं।


Wednesday, December 24, 2014

हिंदी सिनेमा से भी जुड़े थे के बालाचंदर

अजय ब्रह्मात्मज
‘एक दूजे के लिए’ के निर्देशक के बालचंदर का कल चेन्नई में निधन हो गया। मृत्यु के समय वे 84 साल के थे। 9 जुलाई 1930 को उनका जन्म हुआ था। हिंदी सिनेमा के दर्शक उन्हें मुख्य रूप से ‘एक दूजे के लिए’ के निर्देशक के तौर पर जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि तमिल सिनेमा के वर्तमान सुपरस्टार रजनीकांत और कमल हासन का करियर के बालाचंदर ने ही संवारा था। उन्होंने अन्य कई स्टारों को पहला मौका दिया। के बालाचंदर मूलत: रंगकर्मी और लेखक थे। उन्होंने आरंभ में नाटक लिखे और उनका मंचन किया। रागिनी रिक्रिएशन उनकी रंग संस्था थी। हिंदी में ‘एक दूजे के लिए’ के निर्देशन से पहले उन्होंने ‘आईना’ का निर्देशन किया था और अनेक फिल्मों के लेखन से जुड़े थे।
सबसे पहले फणि मजुमदार ने उनके नाटक ‘मेजर चंद्रकांत’ पर आधारित ‘ऊंचे लोग’(1965) का निर्देशन किया था। ‘ऊंचे लोग’ सेना के रिटायर मेजर चंद्रकांत की कहानी है। अंधे मेजर चंद्रकांत रिटायर होने के बाद अपने तीनों बेटे की शादी करते हैं। उसके बाद उनकी जिंदगी में भारी तब्दीली आती है। फिर 1968 में एसएस वासन ने ने के बालचंदर की तमिल फिल्म भामा विजयम का हिंदी रीमेक ‘तीन बहुरानियां’ नाम से किया। इस फिल्म में फिल्म अभिनेत्री एक मध्यवर्गीय परिवार के पड़ोस में रहने आ जाती हैं। उन्हें प्रभावित करने की फिक्र में पड़ोसी दीनानाथ के परिवार की तीनों बहुरानियां अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को नजरअंदाज कर फिजूलखर्ची करती हैं। 1970 में आई ए सुब्बाराव की ‘मस्ताना’,1971 में आई एसएस बालन की ‘लाखों में एक’ और 1972 में आई सीपी दीक्षित की ‘हार जीत’ के लेखक के बालाचंदर ही थे।
1977 में के बालचंदर ने पहली हिंदी फिल्म ‘आईना’ का निर्देशन किया। यह भी मध्यवर्गीय परिवार की मुश्किलों और मुफलिसी की कहानी थी। राजेश खन्ना और मुमताज ने फिल्म में मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं। 1981 में उन्होंने प्रसिद्ध फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ का निर्देशन किया। कमल हासन और रति अग्निहोत्री की यह फिल्म सुपरहिट रही थी। हिंदी भाषी सपना और तमिलभाषी वासुदेवन की प्रेमकहानी ने दो संस्कृतियों और परंपराओं के प्रेम के माध्यम से मनोहारी कहानी कही गई थी। 1983 में उनके निर्देशन में ही ‘जरा सी जिंदगी’ आई। फिर 1984 में कमल हासन के साथ उन्होंने ‘एक नई पहेली’ निर्देशित की।
के बालाचंदर की अधिकांश फिल्में मध्यवर्गीय सिंगतियों पर ही केंद्रित हैं। उनके मध्यवर्गीय चरित्र अपनी मुश्किलों और संघर्ष में मध्यवर्ग के अंतर्विरोधों को उजागर करते हैं। तमिल सिनेमा के विकास और प्रसार में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है। भारतीय सिनेमा में उनके अवदान का देखते हुए ही उन्हें पद्मश्री और दादा साहेब फाल्के पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

Tuesday, December 23, 2014

अग्‍ली के लिए लिखे गौरव सोलंकी के गीत

अनुराग कश्‍यप की फिल्‍म अग्‍ली के गीत गौरव सोलंकी ने लिखे हैं। मेरा सामान उनके ब्‍लाग्‍ा का नाम है। उन्‍हें आप फेसबुक और ट्विटर पर भी पा सकते हैं। खुशमिजाज गौरव सोलंकी मुंबइया लिहाज से सोशल नहीं हैं,लेकिन वे देश-दुनिया की गतिविधियों से वाकिफ रहते हैं। इन दिनों वे एडवर्ल्‍ड में आंशिक रूप से सक्रिय हैं। और एक फिल्‍म स्क्रिप्‍ट भी लिख रहे हैं। प्रस्‍तुत हैं अग्‍ली के गीत...






सूरज है कहां

सूरज है कहाँसर में आग रे
ना गिन तितलियांअब चल भाग रे
मेरी आँख में लोहा है क्या
मेरी रोटियों में काँच है
गिन मेरी उंगलियां
क्या पूरी पाँच हैं
ये मेरी बंदूक देखो, ये मेरा संदूक है
घास जंगल जिस्म पानी 
कोयला मेरी भूख हैं 
चौक मेरा गली मेरी, नौकरी वर्दी मेरी 
धूल धरती सोना रद्दी, धूप और सर्दी मेरी 

मेरी पार्किंग है, ये मेरी सीट है
तेरा माथा हैये मेरी ईंट है

तेरी मिट्टी से मेरी मिट्टी तक
आ रही हैं जोसारी रेलों से
रंग सेतेरे रिवाज़ों से
तेरी बोली से
तेरे मेलों से
कीलें चुभती हैं
चीलें दिखती हैं

लकड़ियां गीली नहीं हैं
तेल है, तीली यहीं है

मेरा झंडा, तरीका, मेरा सच सही
गर कोई आवाज़ उठीगाड़ दूंगा मैं यहीं
मैं यहां पहले खड़ा थाहै ये मेरा मैदान
आज़मा ले लाठियों पे, क्या तेरा संविधान

ये किताबें पाप हैं 
वे लोग सारे सांप हैं
जहालत के हमामों में 
मोरैलिटी की भाप है

मैं बताऊंगा तुझे, तू जीन्स पहने कितनी तंग
कौनसी बिल्डिंग में तू रह सकती है कब किसके संग
रात के कितने बजे कैसे चलेकिससे मिले
कब पलटकर मार देकब चुप रहेकब कब जले 
है ये वेलेंटाइन क्यूं तू पीती वाइन क्यूं
तेरे पब सेउसके रब से मुझको प्रॉब्लम है सब से
हमने उनको खूब धोया जो रूई से लोग थे 
बन गए उनके गुब्बारे, 
जो सुई से लोग थे 

जिसकी चादर हमसे छोटीउसकी चादर छीन ली  जिस भी छत पे चढ़ गए हम, उसकी सीढ़ी तोड़ दी 
इश्तिहारों में ख़ुशी है और घर आटा नहींदे मेरा चाकू मुझे मां, कब से कुछ काटा नहीं
बच्चे खेलते थे जहां पिछले जून में
अब बस्ते दीखते हैं वहां भीगे खून में
मर रही थी एक बच्ची सड़क परभीड़ थी
सबका दफ़्तर था ज़रूरीसबने मरती छोड़ दी

पापा

क्या वहाँ दिन है अभी भी
पापा तुम रहते जहाँ हो
ओस बन के मैं गिरूंगी
देखना, तुम आसमां हो

टीन के टूटे कनस्तर
से ज़रा बूंदी चुराकर
भागती है कोई लड़की
क्या तुम्हें अब भी चिढ़ाकर

फ़र्श अब भी थाम उंगली
साथ चलता है क्या पापा
भाग के देखो रे आँगन
नीम जलता है क्या पापा

आग की भी छाँव है क्या
चींटियों के गाँव हैं क्या
जिस कुएं में हम गिरे हैं
उस कुएं में नाव है क्या

क्या तुम्हें कहता है कोई कि चलो, अब खा भी लो
डिब्बियों में धूप भरकर कोई घर लाता है क्या
चिमनियों के इस धुएं में मेरे दो खरगोश थे
वे कभी आवाज़ दें तो कोई सुन पाता है क्या

गिनतियां सब लाख में हैं
हाथ लेकिन राख में हैं 

चाँद अब भी गोल है क्या
जश्न अब भी ढोल है क्या
पी रहे हैं शरबतें क्या
क्या वहाँ सब होश में हैं?
या कि माथे सी रहे हैं
दो मिनट अफ़सोस में हैं? 

निचोड़ दे 


लाइब्रेरी के हिस्ट्री वाले फ़्लोर पे
पोस्ट ऑफ़िस के पीछे वाले डोर पे
सेज पे या मेज पे क्लास में

रेत में या खेत में घास में
तू मुझे निचोड़ दे
मैं तुझे निचोड़ लूं
तू मुझे झिंझोड़ दे
मैं तुझे झिंझोड़ दूं

चाहे मिल लिफ़्ट में
रात वाली शिफ़्ट में
पी ले चाहे ओक से
चाहे चूल्हे झोंक दे
आ तुझे थोड़ा सा बिगाड़ दूं
दिल्लियां बिल्लियां उघाड़ दूं
तवे से जलें तलवे मेरे
काट मुझे, शर्ट तेरी फाड़ दूं

जैसे चाहे खेल ले
जैसे चाहे मोड़ दे
जब चाहे ढील दे
चरखियां तोड़ के

ढूंढ़े कहाँ सेब है
फटी मेरी जेब है
चाहे तुरपाई कर
चाहे तो उधेड़ दे

आ तू जैसे भूला कोई आए घर आके मेरी करवट में ठहर
सेकूं तुझे इस तन्दूर में सीना तेरा चूरमे सा चूर के 

ऐसे मैले हों कि जैसे साफ़ हों
दोनों एक दूजे के लिहाफ़ हो

तू मेरी ज़मीन बन
बाकी मुझपे छोड़ दे

मैं तुझे निचोड़ लूं
तू मुझे निचोड़ ले

चाहे मिल लिफ़्ट में
रात वाली शिफ़्ट में
पी ले चाहे ओक से
चाहे चूल्हे झोंक दे
आ तुझे थोड़ा सा बिगाड़ दूं
दिल्लियां बिल्लियां उघाड़ दूं
तवे से जलें तलवे मेरे
काट मुझे, शर्ट तेरी फाड़ दूं

तू मुझे निचोड़ दे
मैं तुझे निचोड़ लूं
तू मुझे झिंझोड़ दे
मैं तुझे झिंझोड़ दूं

बस अच्छी फिल्में करनी है - अनुष्का शर्मा

फिल्मों के चयन में काफी एहतियात बरतती हैं अनुष्का शर्मा। 'पीके' में आमिर खान के साथ काम करके वह हैं काफी उत्साहित हैं। अजय ब्रह्मात्मज से साक्षात्कार के अंश...
आपको इस बात का इल्म कब हुआ कि आप असल में अपने करियर से क्या चाहती हैं?
मुझे पिछले दो-तीन सालों में इस बात का एहसास हुआ कि मुझे अपने करियर से चाहिए क्या? उन सालों में मैंने चार फिल्में की। सब में अलग-अलग टाइप के रोल थे। अलग-अलग और अपनी-अपनी किस्सागोई में महारथी निर्देशकों के संग काम करने का मौका मिला। वहां से मुझे लगने लगा कि मुझे क्या करना है। मैंने तय कर लिया कि मुझे सिर्फ अच्छी फिल्में ही करनी हैं और अच्छे-अच्छे निर्देशकों के संग काम करना है।
यह एहसास सफलता से हुआ। अगर आप सफल न हुई होतीं तो ऐसा एहसास हो पाता?
असफल रहने पर भी मैं ऐसी ही रहती। मेरे ख्याल से मैं ऐसी हूं तभी मुझे सफलता मिली है। मैंने वह सब नहीं किया, जो बहुत सारे लोगों ने मुझे सजेस्ट किया। वह भी तब, जब मैं रेस में भाग रही थी। यही वजह है कि पिछले छह सालों में मेरी फिल्मों का आंकड़ा डबल डिजिट में नहीं है। अब जब मैं इंडस्ट्री में अच्छी पोजीशन में हूं, फिर भी मैं उसका बेजा इस्तेमाल नहीं कर रही हूं। कोई मुझसे बोले कि यार तुम्हें साल में तीन फिल्में करनी चाहिए या फिर कोई कहे कि यह प्रोजेक्ट बड़ा है तो वह मुझसे नहीं हो सकेगा।

फिल्म प्रोड्यूस करने का ख्याल कहां से दिमाग में आया?
मेरे दिमाग में था कि अच्छी फिल्मों को सपोर्ट करना है। जब मेरे पास 'एनएच-10" की स्क्रिप्ट आई तब मुझे लगा कि सही समय आ गया है। सच कहूं तो अपनी जिंदगी के बड़े फैसले आप किस तरह से ले लेते हैं, आपको पता नहीं चलता। ये फैसले इंस्टिंक्ट से आते हैं, ज्यादा सोच-समझकर नहीं आते। मैं 'एनएच-10' की स्क्रिप्ट पढ़ रही थी तो मैंने अपने मैनेजर से बात की कि क्या मुझे यह फिल्म प्रोड्यूस करनी चाहिए। उसे हैरानी हुई। उसने पूछा भी कि अचानक ऐसा ख्याल क्यों आया दिमाग में। मैंने जवाब दिया कि मुझे ऐसी ही फिल्म से फिल्म निर्माण में कदम रखना है। एक तो मैं कहानी से काफी कनेक्टेड फील कर रही थी। दूसरी चीज मुझे लगी कि अगर मैं बतौर एक्टर इस फिल्म के साथ काफी अंदर तक इन्वॉल्व हो रही हूं तो क्यों न इसे प्रोड्यूस ही किया जाए।

पारंपरिक सोच तो कहती है कि अभिनेत्रियां तब प्रोडक्शन में उतरती हैं, जब उनका करियर ढलान पर होता है। अब जरूर यह बदलाव आया है कि आपकी जेनरेशन रिस्क लेने में कोताही नहीं करती। अब उस रिस्क को सपोर्ट करने वाला सिस्टम भी स्ट्रॉन्ग हुआ है...
जी हां, मुझे पता ही नहीं था कि मैं क्या कर रही हूं। वक्त के साथ चीजें बेहतर होती गईं। आज की जेनरेशन जोखिम लेना पसंद करती है। वे चाहे वरुण हों, सिद्धार्थ या रणवीर सिंह हों। सब अलग-अलग किस्म की फिल्में कर रहे हैं। किरदार में डूबने के लिए वे किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं।

'पीके' के बारे में कुछ बताना चाहेंगी? आपके गेटअप की काफी चर्चा है? फिल्म में आपके किरदार का रोमांस किसके संग है, आमिर या सुशांत?
आपको ट्रेलर से जो कुछ लग रहा है, वही है। एक रोमांटिक एंगल है सुशांत के साथ। लुक वाकई काफी रोचक है। ढेर सारे लोगों ने उसकी तारीफ की है। राजू सर ने पहले ही दिन कह दिया था कि मैं तुम्हें बिल्कुल डिफ्रेंट लुक में प्रजेंट करने वाला हूं। मैं खुशी से फूली नहीं समा रही थी कि वाह अलग-अलग अवतार एक ही फिल्म में देखने का मौका मिलेगा। हेयरस्टाइल को लेकर एक लंबा प्रॉसेस था। ढेर सारी स्टाइल अटेंप्ट की गई। लोग मुझे कह रहे हैं कि तुम बड़ी फ्रेश लग रही हो। सोने पे सुहागा यह कि मेरा लुक लड़कियों को बहुत पसंद आ रहा है। लड़कियों के लिए बड़ी हिम्मत की बात होती है कि वे अपने लंबे-घने बालों पर कैंची चलने दें।

यह रोल कैसे मिला और राज कुमार हिरानी के संग काम करने का अनुभव कैसा रहा?
दो-तीन साल पहले मैं 'रॉकस्टार' की स्क्रीनिंग पर गई थी। वहां मुझे राजू सर मिल गए। उन्हें मेरी 'बैंड बाजा बारात' अच्छी लगी थी तो वे 'पीके' के लिए मुझे कास्ट करना चाहते थे। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं एक फिल्म की स्क्रिप्ट और कास्टिंग पर काम कर रहा हूं। अगले दिन उन्होंने कहा कि फिल्म में तुम्हारा लंबा रोल है। यह मैंने अपनी बीवी के कहने पर किया है। वह कहा करती है कि तुम्हारी फिल्मों में सारा क्रेडिट हीरो ही लेता है। हीरोइन का रोल सिग्निफिकेंट होता तो है, मगर वह लंबा नहीं रहता। इस बार मैंने उसकी वह शिकायत दूर कर दी है। यह सुनकर तो मेरी बांछें खिल गई। उनके संग काम करने का मजा इसलिए भी आता है कि वह औसत दर्जे का काम नहीं करते। मैं ऐसे लोगों की बड़ी इज्जत करती हूं। उनका सबसे बेस्ट पार्ट है उनकी स्टोरी। उस पर उनकी कमांड बहुत तगड़ी है। कहानी के अलावा तो वे कुछ और सोचते ही नहीं। सिक्स पैक, ऐट पैक या लैविश लोकेशन इत्यादि कुछ भी नहीं। उनका सारा जोर कहानी पर होता है, उससे वे भटकते नहीं। उनके दिमाग में कहीं से 100 या 200 करोड़ क्लब की फिल्में बनाने को लेकर प्लानिंग नहीं रहती। उनके साथ काम करते वक्त आपको लगेगा कि आप पार्ट हो किसी बहुत बड़ी चीज का। वह बात बहुत कम फिल्मकारों के संग मिलती है। आप बाकी चीजों को भूल जाएं कि आमिर खान हैं फिल्म में। 'पीके' ऐसी फिल्म है, जिसे मैं अपने बच्चों को गर्व की अनुभूति के साथ दिखा सकती हूं।

'पीके' में आपके किरदार का नाम जगत जननी है। क्या है वह एक्चुअली? आमिर खान के संग काम करने के अनुभव को कैसे बयां करेंगी?
किरदार के बारे में ज्यादा कुछ तो नहीं बता सकूंगी। आमिर से आप मिलते ही अंदाजा लगा लेते हो कि वे बहुत शार्प हैं। उनकी मेमोरी कमाल की है। उसी से उनका बिहेवियर झलकता है। उनकी इंटेलिजेंस का पता चलता है। मैं तो आमिर की बहुत बड़ी फैन रही हूं। उन्होंने 'जो जीता वही सिकंदर' में जब आएशा जुल्का के साथ 'पहला नशा' किया था, मैं तो वहीं से उन पर लट्टू थी। अब जब 'पीके' में उनके संग काम करने का मौका मिला तो मेरे पांव तो जमीं पर थे ही नहीं।

...और सुशांत सिंह राजपूत के बारे में क्या कहना चाहेंगी?
उनकी एनर्जी कमाल की है। सबसे बड़ी बात है कि वे जिस किस्म की फिल्में चुन रहे हैं, उनसे साफ है कि फिल्मों को लेकर उनकी समझ और सोच कितनी हाई है। वह भी शूटिंग कर चुपचाप घर निकल जाते हैं। लो प्रोफाइल रहना उन्हें पसंद है। वे काम पर पूरा फोकस रखते हैं। अच्छी बात यह हुई कि सेट पर हम दोनों की फ्रीक्वेंसी मैच हुई। उससे बेस्ट काम निकला।
बॉलीवुड में आपकी जर्नी कितनी संतोषजनक है? युवती होने की वजह से ऐसा कभी लगा कि कोई रोड़े अटका रहा है?

अपेक्षा से बढ़कर। खुशी, गर्व और संतुष्टि की अनुभूति है। एक्ट्रेस के लेवल से बोलूं तो मुझे 'विमेन सेंट्रिक रोल' शब्दावली से नफरत है। आप रितिक की फिल्म को हीरो सेंट्रिक थोड़े न कहते हैं तो फिर यह विशेषण हमारे ही साथ क्यों!

Monday, December 22, 2014

दरअसल : राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी

-अजय ब्रह्मात्मज
    हिंदी फिल्मों के इतिहास में सलीम-जावेद की जोड़ी मशहूर रही है। दोनों ने अनेक सफल फिल्मों का लेखन किया। दोनों बेहद कामयाब रहे। उन्होंने फिल्मों के लेखक का दर्जा ऊंचा किया। उसे मुंशी से ऊंचे और जरूरी आसन पर बिठाया। उनके बाद कोई भी जोड़ी बहुत कामयाब नहीं रही।  लंबे समय के बाद राजकुमारी हिरानी और अभिजात जोशी की जोड़ी कुछ अलग ढंग से वैसी ही ख्याति हासिल कर रही है। अभी देश का हर दर्शक राजकुमार हिरानी के नाम से परिचित है। ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’, ‘लगे रहो मुन्नाभाई’, ‘3 इडियट’ और इस हफ्ते आ रही ‘पीके’ के निर्देशक राजकुमार हिरानी ने हिंदी फिल्मों को नई दिशा दी है। उन्होंने मनोरंजन की परिभाषा बदल दी है। उन्होंने अपनी तीनों फिल्मों से साबित किया है कि मनोरंजन के लिए आसान और आजमाए रास्तों पर ही चलना जरूरी नहीं है। लकीर छोडऩे पर भी मंजिल तक पहुंचा जा सकता है।
    अभिजात जोशी उनके सहयोगी लेखक हैं। ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ से दोनों साथ आए। दोनों के बीच संयोग से मुलाकात हुई। 1992 में अयोध्या में घटना के बाद अहमदाबाद में हुए सांप्रदायिक दंगों के परिप्रेक्ष्य में उन्होंने ‘शैफ्ट ऑफ सनलाइट’ नामक नाटक लिखा था। विधु विनोद चोपड़ा को इस नाटक के विषय ने प्रभावित किया था। उन्होंने अभिजात जोशी से मिलने में रुचि दिखाई थी। बाद में अभिजात जोशी ने विधु विनोद चोपड़ा के लिए लेखन आरंभ किया था। उसी दरम्यान एक बार राजकुमार हिरानी से उनकी संगत हुई। राजकुमार हिरानी ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ की स्क्रिप्ट पर काम कर रहे थे। वे अपना ड्राफ्ट सुना रहे थे। अभिजात जोशी ने साथ में काम करने का प्रस्ताव रखा, जिसे राजकुमार हिरानी ने सहज रूप से स्वीकार नहीं किया। कुछ महीनों की मेलबाजी के बाद स्पष्ट समझदारी बनी। बाद में ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ की स्क्रिप्ट में गांधी के विचारों का सार समेटने में अभिजात जोशी ने पूरी मेहनत की। उन्होंने गांधी वांग्मय के साथ गांधी जी के सचिव महादेव देसाई की डायरी भी पढ़ी। उनके इनपुट से ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ की स्क्रिप्ट समृद्ध और सारगर्भित हुई।
    अभिजात जोशी और राजकुमार हिरानी का सहयोग चलता रहा। बीच में अभिजात जोशी अमेरिका वेस्टरविले ओहियो में पढ़ाने चले गए। उस दौरान दोनों के बीच ईमेल और फोन के जरिए निरंतर संपर्क रहता था। राजकुमार हिरानी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि दोनों फिल्म के मुख्य विषय और विचार को स्वतंत्र रूप से दृश्यों में विकसित करते हैं। वे अपना लिखा एक-दूसरे को भेजते हैं। सुझाव से उसमें परिष्कार करते हैं। लंबी बहस और बातचीत के बाद ही वे स्क्रिप्ट को अंतिम रूप देते हैं। उनकी इस कार्यशैली में कई अड़चनें आती थीं। लेकिन चूंकि सहयोग और समझदारी आला दर्जे की थी, इसलिए कभी कोई मनमुटाव या मतभेद नहीं हुआ।
    दोनों की परवरिश अलग-अलग शहरों में हुई है। राजकुमार हिरानी नागपुर के हैं। उनके सिंधी पिता पाकिस्तान से माइग्रेट होकर भारत आए थे। पार्टीशन के बाद नागपुर को अपना ठिकाना बनाकर उन्होंने जीवनयापन आरंभ किया। कह सकते हैं कि राजकुमार हिरानी की फिल्मों में आए मध्यमवर्गीय मूल्य इसी पारिवारिक संस्कार के परिणाम हैं। अभिजात जोशी अहमदाबाद में रहे। दोनों की सोच में सामाजिकता हैं। उन्हें सोशलिस्ट विचार के लेखक कहा जा सकता है। दोनों चाहते हैं कि उनकी फिल्मों में एक ठोस संदेश रहे, जो मनोरंजक तरीके से दर्शकों के बीच पहुंचे। ‘3 इडियट’ में शिक्षा और करियर के प्रति अभिभावकों के दृष्टिकोण को बदल दिया। सभी ने महसूस किया कि बच्चों की जिस पढ़ाई और कार्य में रुचि हो, उन्हें उसी के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
    ‘पीके’ का संदेश अभी तक जाहिर नहीं हो सका है। इस फिल्म में आमिर खान पीके की केंद्रीय भूमिका में हैं। उनके किरदार को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। एक बात तो सामने आ रही है कि हिरानी और जोशी ने पीके के माध्यम से भारतीय समाज और सिस्टम पर बातें की हैं। हास्य-विनोद और सोच से इस बार कौन सा नया संदेश वे देंगे, वह देखने वाली बात होगी। यह अभी तक नहीं मालूम है। इतना मालूम है कि राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी की जोड़ी फिल्म लेखन में सफलता और गंभीरता के नए अध्याय जोड़ रही है।

Sunday, December 21, 2014

इंपैक्‍ट 2014 : आमिर खान, कपिल शर्मा

इंपैक्ट 2014
-अजय ब्रह्मात्‍मज
आमिर खान
    ‘सत्य की जीत’ का संदेश बुलंद करता अमिर खान का टीवी शो ‘सत्यमेव जयते’ पहला ऐसा अनोखा शो है, जिसमें मुख्य रूप से सामाजिक मुद्दों, कुरीतियों और चलन पर सवाल उठाए गए। विमर्श के केंद्र में लाए विषयों को आमिर खान ने आत्मीयता और गंभीरता के साथ न केवल पेश किया, बल्कि निदान, समाधान और विकल्प के भी सुझाव दिए। हर एपिसोड में किसी एक विषय के सभी पहलुओं को प्रस्तुत करते समय साक्ष्य रखे गए। ‘सत्यमेव जयते’ की टीम ने आमिर खान और उनके मित्र व सहयोगी सत्यजित भटकल के निर्देशन और निरीक्षण में वस्तुनिष्ठ रहते हुए विषयों का विश्लेषण और विमर्श किया। पहले सीजन में ही सत्यमेव जयते के प्रभाव से सरकारी और निजी संस्थानों को सुझाए रास्तों पर बढऩे की प्रेरणा मिली। आमिर खान के हर शो में निदान और सहयोग में सक्रिय व्यक्तियों और संस्थाओं के प्रयासों की मुखर प्रस्तुति रही। इस शो ने टीवी दर्शकों समेत भारतीय समाज में एक मन आंदोलन सा खड़ा कर दिया, जिसका निश्चित सामाजिक संदर्भ बना। इस साल आमिर खान ने शो के प्रसारण के बाद देश के किसी एक शहर में जाकर सीधे प्रसारण से स्थानीय नागरिकों समेत पूरे देश से संवाद किया। सत्यमेव जयते में उठाए मुद्दों के शोध, अध्ययन और प्रस्तुति की गहनता ने आमिर खान समेत पूरी टीम को भावनात्मक रूप से झिंझोड़ और निचोड़ दिया है। सभी मनोवैज्ञानिक रूप से प्रभावित हुए हैं। सत्यमेव जयते की एंकरिंग करते हुए आमिर खान  ने जरूरी समझा कि वे कमर्शियल और कंज्यूमर प्रोडक्ट के विज्ञापनों से दूर रहेंगे। इस वजह से उन्हें लगभग 200 करोड़ का सालाना नुकसान हुआ है। उपभोक्ता संस्कृति के इस दौर में जहां हर फिल्मी हस्ती येन-केन-प्रकारेण अधिकाधिक कमाई में लीन और तल्लीन है, वहां आमिर खान का यह आर्थिक त्याग भी प्रेरक और उल्लेखनीय है।

कपिल शर्मा
    आधुनिक समाज में तनाव और कठिनाइयां बढ़ती ही जा रही हैं। यह महज संयोग नहीं है कि इस दौर में टीवी शो और फिल्मों में हास्य-विनोद के विषय सफल हो रहे हैं। निजी जिंदगी की तकलीफों से घबराए दर्शकों को ऐसे शो और फिल्मों से राहत मिलती है। टीवी पर पिछले कुछ सालों से अनेक कॉमेडी और लाफ्टर शो पॉपुलर रहे हैं। उनमें ज्यादातर एडल्ट कंटेंट रहता था।  उन्हें कपिल शर्मा के ‘कॉमेडी नाइट्स विद कपिल शर्मा’ ने एक नई ऊंचाई और लोकप्रियता देने के साथ प्राइम टाइम पर घरों में ले आए और फैमिली शो बना दिया। कपिल शर्मा का यह शो घर-घर में देखा जाता है। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि यह शो फिलहाल हर पॉपुलर और बड़े स्टार की फिल्म के प्रोमोशन का मंच बन गया है। अमिताभ बच्चन हों कि शाह रुख खान या फिर ‘दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे’ के हजारवें हफ्ते का जश्न ़ ़ ़ सभी इस शो में आने के बाद ही प्रचार की पूर्णता मानते हैं। कपिल शर्मा ने पूर्व प्रचलित कॉमेडी और लाफ्टर शो में पारिवारिकता के साथ स्टूडियो के दर्शकों की भागीदारी भी शामिल की है। उनका अंदाज दर्शकों को आमंत्रित करता है। वे घर बैठे दर्शकों को भी शो का हिस्सा बना लेते हैं। हालांकि टीवी और फिल्मों में प्रचलित कॉमेडी की सीमाओं में उनका शो भी बंधा हुआ है, जिसमें महिलाओं का मजाक उड़ाया जाता है। फिर भी शो के सूत्रधार के रूप में कपिल शर्मा की कोशिश रहती है कि हंसी-मजाक और छींटाकशी में शालीनता बनी रहे। मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से आए कपिल शर्मा टीवी के बहुसंख्यक मध्यवर्गीय दर्शकों की अच्छी समझ और संवेदना रखते हैं। सिद्धू और गुत्थी की मदद से वे आमंत्रित मेहमानों के साथ हास्य की सरिता रचते हैं, जिसमें दर्शकों को डूबना-उतरना और ठहाका लगाना अच्छा लगता है।


Friday, December 19, 2014

फिल्‍म समीक्षा : पीके

-अजय ब्रह्मात्‍मज
....बहुत ही कनफुजिया गया हूं भगवान। कुछ तो गलती कर रहा हूं कि मेरी बात तुम तक पहुंच नहीं रही है। हमारी कठिनाई बूझिए न। तनिक गाइड कर दीजिए... हाथ जोड़ कर आपसे बात कर रहे हैं...माथा जमीन पर रखें, घंटी बजा कर आप को जगाएं कि लाउड स्पीकर पर आवाज दें। गीता का श्लोक पढ़ें, कुरान की आयत या बाइबिल का वर्स... आप का अलग-अलग मैनेजर लोग अलग-अलग बात बोलता है। कौनो बोलता है सोमवार को फास्ट करो तो कौनो मंगल को, कौनो बोलता है कि सूरज डूबने से पहले भोजन कर लो तो कौनो बोलता है सूरज डूबने के बाद भोजन करो। कौनो बोलता है कि गैयन की पूजा करो तो कौनो कहता है उनका बलिदान करो। कौना बोलता है नंगे पैर मंदिर में जाओ तो कौनो बोलता है कि बूट पहन कर चर्च में जाओ। कौन सी बात सही है, कौन सी बात लगत। समझ नहीं आ रहा है। फ्रस्टेटिया गया हूं भगवान...

पीके के इस स्वगत के कुछ दिनों पहले पाकिस्तान के पेशावर में आतंकवादी मजहब के नाम पर मासूम बच्चों की हत्या कर देते हैं तो भारत में एक धार्मिक संगठन के नेता को सुर्खियां मिलती हैं कि 2021 तक वे भारत से इस्लाम और ईसाई धर्म समाप्त कर देंगे। धर्माडंबर और अहंकार में मची लूटपाट और दंगों से भरी घटनाओं के इस देश में दूर ग्रह से एक अंतरिक्ष यात्री आता है और यहां के माहौल में कनफुजियाने के साथ फ्रस्टेटिया जाता है। वह जिस ग्रह से आया है, वहां भाषा का आचरण नहीं है, वस्त्रों का आवरण नहीं है और झूठ तो बिल्कुल नहीं है। सच का वह हिमायती, जिसके सवालों और बात-व्यवहार से भौंचक्क धरतीवासी मान बैठते हैं कि वह हमेशा पिए रहता है, वह पीके है।
धर्म के नाम पर चल रही राजनीति और तमाम किस्म के भेदभाव और आस्थाओं में बंटे इस समाज में भटकते हुए पीके के जरिए हम उन सारी विसंगतियों और कुरीतियों के सामने खड़े मिलते हैं, जिन्हें हमने अपनी रोजमर्रा जिंदगी का हिस्सा बना लिया है। आदत हो गई है हमें, इसलिए मन में सवाल नहीं उठते। हम अपनी मुसीबतों के साथ सोच में संकीर्ण और विचार में जीर्ण होते जा रहे हैं। राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी की कल्पना का यह एलियन चरित्र पीके हमारे ढोंग को बेनकाब कर देता है। भक्ति और आस्था के नाम पर 'रौंग नंबर' पर भेजे जा रहे संदेश की फिरकी लेता है। वह अपनी सच्चाई और लाजवाब सवालों से अंधी आस्था और धंधा बना चुकी धार्मिकता के प्रतीक तपस्वी को टीवी के लाइव प्रसारण में खामोश करता है। 'पीके' आज के समय की जरूरी फिल्म है। राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी का संदेश स्पष्ट है कि अलग-अलग भगवान के मैनेजर बने स्वामी, बाबा, गुरु, मौलवी और पादरी वास्तव में डर का आतंक फैला कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं।
राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी की कथा-पटकथा सामाजिक विसंगति और कुरीति की गहराइयों में उतर कर विश्लेषण और विमर्श नहीं करती। वह सतह पर तैरते पाखंड को ही अपना निशाना बनाती है। मान सकते हैं कि 2 घंटे 33 मिनट की फिल्म में सदियों से चली आ रही आस्था की जड़ों और वजहों में जाने की गुंजाइश नहीं हो सकती थी, लेकिन धर्म सिर्फ कथित मैनेजरों और तपस्वियों का प्रपंच नहीं है। इसके पीछे सुनिश्चित सामाजिक सोच और राजनीति है। 'पीके' एक धर्महीन समाज की वकालत करती है,लेकिन वह ईश्वर की अदृश्य सत्ता से इंकार नहीं करती। फिल्म यहीं अपने विचारों में फिसल जाती है। वैज्ञानिक सोच और आचार-व्यवहार के समर्थक किसी भी रूप में ईश्वर की सत्ता स्वीकार करेंगे तो कालांतर में फिर से विभिन्न समूहों के धर्म और मत पैदा होंगे। फिर से तनाव होगा, क्योंकि सभी अपनी आस्था के मुताबिक भगवान रचेंगे और फिर उनकी रक्षा करने का भ्रमजाल फैला कर भोली और नादान जनता को ठगेंगे। 'पीके' सरलीकरण से काम लेती है।
वैचारिक स्तर पर इस कमी के बावजूद 'पीके' मनोरंजक तरीके से कुछ फौरी और जरूरी बातें करती है। भेद और मतभेद के मुद्दे उठाती है। उनके समाधान की कोशिश भी करती है। राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी ने खूबसूरती से पीके की दुनिया रची है, जिसमें भैंरो और जग्गू (जगत जननी) जैसे किरदार हैं। जग्गू की मदद से पीके अपने ग्रह पर लौट पाने का रिमोट हासिल करता है। और फिर एक साल के बाद अपने ग्रह से दूसरे यात्री को लेकर आगे के शोध के लिए आता है। सवाल है कि रिमोट मिलते हैं, उसे लौट जाने की ऐसी क्या हड़बड़ी थी? वह अपना शोध पूरा करता या फिर मानवीय व्यवहार और आचरण से ही वह धरतीवासियों को परख लेता है?
इस दरम्यान जग्गू की उपकथा भी चलती है। पाकिस्तानी सरफराज से उसके प्रेम और गलतफहमी की कहानी बाद में मूल कथा में आकर मिलती है। बाबाओं के आडंबर और ईश्वर के नाम पर चल रहे ढोंग और प्रपंच को अनके फिल्मों में विषय बताया गया है। हिरानी और जोशी इस विषय के विवरण और चित्रण में कुछ नया नहीं जोड़ते। नयापन उनके किरदार पीके में है, जो 'कोई मिल गया' में जादू के रूप में आ चुका है। 'पीके' की विचित्रता ही मौलिकता है। पता चलता है कि सभ्यता और विकास के नाम पर अपनाए गए आचरण और आवरण ही मतभेद और आडंबर के कारण हैं।
पटकथा अनेक स्थानों पर कमजोर पड़ती है। कहीं उसकी क्षिप्र गति तो कहीं उसकी तीव्र गति से मूल कथा को झटके लगते हैं। सरफराज और जग्गू के बीच प्रेम की बेल तेजी से फैलती है, फिर सरफराज परिदृश्य से गायब हो जाते हैं। जग्गू भारत लौट आती है। और यहां उसकी मुलाकात पीके से हो जाती है। अपने रिमोट की तलाश में भटकता पीके पहले जग्गू के लिए एक स्टोरी मात्र है, जो कुछ मुलाकातों और संगत के बाद प्रेम और समझ का प्रतिरूप बन जाता है। पीके के किरदार को आमिर खान ने बखूबी निभाया है। यह किरदार हमें प्रभावित करता है। ऐसे किरदारों की खासियत है कि वे दिल को छूते हैं। फिल्म के अंतिम दृश्य में सहयात्री के रूप में आए रणबीर कपूर भी उतने ही जंचते हैं। तात्पर्य यह कि हिरानी और जोशी की काबिलियत है कि पीके में आमिर खान की प्रतिभा निखरती है। जग्गू की भूमिका में अनुष्का निराश नहीं करतीं। वह सौंपी गई भूमिका निभाकर ले जाती हैं। सरफराज की छोटी भूमिका में आए सुशांत सिंह राजपूत में आकर्षण है। अन्य भूमिकाओं में सौरभ शुक्ला, परीक्षित साहनी, बोमन ईरानी, संजय दत्त आदि अपने किरदारों के अनुरूप हैं।
फिल्म का गीत-संगीत थोड़ा कमजोर है। इस बार स्वानंद किरकिरे और शांतनु मोइत्रा जादू नहीं जगा पाए हैं। अन्य गीतकारों में अमिताभ वर्मा और मनोज मुंतजिर भी खास प्रभावित नहीं करते। पीके पर फिल्माए गाने अतिरंजित और अनावश्यक हैं। ईश्वर की खोज का गाने से अधिक प्रभावपूर्ण उसके बाद का स्वगत संवाद है।
अवधि- 153 मिनट 
**** चार स्‍टार

Thursday, December 18, 2014

दरअसल : एनएफडीसी का फिल्म बाजार


-अजय ब्रह्मात्मज
    सन् 1975 में एनएफडीसी की स्थापना हुई थी। उद्देश्य था कि सार्थक सिनेमा को बढ़ावा दिया जाए। हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में बन रही कमर्शियल फिल्मों के बीच से राह निकाली जाए। युवा निर्देशकों की सोच को समर्थन मिले और उनके लिए आवश्यक धन की व्यवस्था की जाए। एनएफडीसी के समर्थन से सत्यजित राय से लेकर रितेश बत्रा तक ने उम्दा फिल्में निर्देशित कीं। उन्होंने भारतीय सिनेमा में वास्तविकता के रंग भरे। सिनेमा को कलात्मक गहराई देने के साथ भारतीय समाज के विविध रूपों को उन्होंने अपनी फिल्मों का विषय बनाया। देश में पैरलल सिनेमा की लहर चली। इस अभियान से अनेक प्रतिभाएं सामने आईं। उन्होंने अपने क्षेत्र विशेष की कहानियों से सिनेमा में भारी योगदान किया। कमी एक ही रही कि ये फिल्में सही वितरण और प्रदर्शन के अभाव में दर्शकों तक नहीं पहुंच सकीं। ये फिल्में मुख्य रूप से फेस्टिवल और दूरदर्शन पर ही देखी गईं। समय के साथ तालमेल नहीं बिठा पाने के कारण पैरेलल सिनेमा काल कवलित हो गया।
    धीरे-धीरे एनएफडीसी के बारे में यह धारणा विकसित हो गई थी कि उसके समर्थन से बनी फिल्में कभी रिलीज नहीं होतीं। निर्देशक और निर्माता एनएफडीसी से सहयोग के तौर पर मिले कर्ज को लौटाने में कोई रुचि नहीं रखते। नतीजा यह हुआ कि युवा फिलमकार भी अपनी फिल्मों के लिए नए निर्माताओं की खोज करने लगे। आंकड़े पलट कर देखें तो बीच में एक लंबा दौर शिथिलता का रहा। छिटपुट रूप से फिल्में बनती रहीं,लेकिन एनएफडीसी  भारतीय फिल्मों के विकास में परिवर्तनकारी भूमिका से दूर चली गई। यहां से आई फिल्में थकी और बासी होन लगीं। इन फिल्मों में पहले जैसी कलात्मक उर्जा नहीं दिखाई पड़ी। एक तो पैरेलल सिनेमा के अवसान का असर रहा और दूसरे एनएफडीसी से उभरे फिल्मकार बाद में सक्रिय नहीं रहे। उनमें से कुछ ने सोच और दिशा बदल दी। वे इस भ्रम में रहे कि वे आर्ट और कमर्शियल सिनेमा के बीच का अंतर मिटा रहे हैं,जबकि इस प्रक्रिया में उन्होंने सबसे पहले विचार को तिलांजलि दी। कह सकते हैं कि उन्होंने बाजार के आगे घुटने टेक दिए। अपने सरवाइवल के लिए उन्होंने कमर्शियल सिनेमा के लटके-झटकों को अपना लिया। फिर भी यह कहा जा सकता है कि एनएफडीसी ने भारतीय सिनेमा के विकास में एक समय जरूरी भूमिका निभाई।
    अप्रासंगिक हो रहे एनएफडीसी को 2007 में नई त्वरा मिली। निदेशक नीना लाठ गुप्ता ने फिल्म बाजार आरंभ किया। इसके अंतर्गम नई फिलमों और फिल्मकारों को ऐसा मंच प्रदान किया गया,जहां वे अपनी फिल्मों को पेश कर सकें। इसके तहत सहयोगी निर्माताओं की खोज से लेकर स्क्रिप्ट के लिए सुझाव और मार्गदर्शन के लिए उपयुक्त व्यक्यिों और संस्थाओं को जोड़ा गया। लाभ हुआ और नए रास्ते निकले। कुछ फिल्में इंटरनेशनल फेस्टिवल और मार्केट में गईं। फिल्म बाजार से निकली लंचबॉक्स ने तो मिसाल कायम कर दिया। यह फिल्म विदेशों में किसी भी भारतीय फिल्म से ज्यादा देखी और सराही गई। एनएफडीसी के सौजन्य से हर साल गोवा में आयोजित इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के समय फिल्म बाजार का आयोजन होता है। इस साल बाजार में अनेक देशों के प्रतिनिध आए। उन्होंने भारतीय फिल्मों में रुचि दिखाई। इस दौरान लैब,वर्कशाप और मेल-मुलाकात के जरिए नए और युवा निर्देशकों को अपनी फिल्मों के बाजार और बाजार की अपेक्षा की जानकारी मिली। एनएफडीसी का फिल्म बाजार अभी उसी रूप में सक्रिय और महत्वपूर्ण हो गया है,जैसे पैरेलल सिनेमा के उत्कर्ष के समय था।
    फिल्म बाजार के प्रयासों की सराहना करनी चाहिए। बस,एक कमी नजर आई कि फिल्म बाजार में स्क्रिप्ट और फिल्मों के प्रस्ताव केवल अंग्रेजी भाषा में लिए जाते हैं। इस एक शर्त से फिल्म बाजार देश के सुदूर इलाकों की उन प्रतिभाओं के लिए अपने द्वार बंद कर देता है,जो अंग्रेजी का इस्तेमाल नहीं करते। अनेक लेखक और युवा निर्देशक भारतीय भाषाओं में दक्ष हैं,लेकिन अंग्रेजी नहीं आने की वजह से वे फिल्म बाजार की सुविधाओं से वंचित रहते हैं। संबंधित अधिकारियों को इस दिशा में विचार करना चाहिए। उन्हें भारतीय भाषाओं में स्क्रिप्ट और फिल्में स्वीकार करनी चाहिए। अभी फिल्म किसी भी भाषा की हो उसका प्रस्ताव अंग्रेजी में भेजना अनिवार्य है?