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Friday, September 26, 2014

फिल्‍म समीक्षा : देसी कट्टे

-बजय ब्रह्माम्‍तज 
             आनंद कुमार की फिल्म 'देसी कट्टे' में अनेक विषयों को एक ही कहानी में पिरोने की असफल कोशिश की गई है। यह फिल्म दो दोस्तों की कहानी है, जो एक साथ गैंगवॉर, अपराध, राजनीति का दुष्चक्र, खेल के प्रति जागरूकता, समाज में बढ़ रहे अपराधीकरण आदि विषयों को टटोलने का प्रयास करती है। नतीजतन यह फिल्म किसी भी विषय को ढंग से पेश नहीं कर पाती। इसमें कलाकारों की भीड़ है। भीड़ इसलिए कि उन किरदारों को लेखक ने ठोस और निजी पहचान नहीं दी है। यही कारण है कि आशुतोष राणा, अखिलेंद्र मिश्रा, सुनील शेट्टी आदि के होने के बावजूद फिल्म बांध नहीं पाती।
              ऐसी फिल्मों में कथ्य मजबूत हो तो अपेक्षाकृत नए कलाकार भी फिल्म के कंटेंट की वजह से प्रभावित करते हैं। आनंद कुमार ने नए कलाकारों को निखरने का मौका नहीं दिया है। 'देसी कट्टे' हिंदी में बन चुकी अनेक फिल्मों का मिश्रण है, जो नवीनता के अभाव में रोचक नहीं लगती। फिल्म कई स्तरों और स्थानों पर भटकती है। अपराधियों की दुनिया में सबकी वेशभूषा एक जैसी बना दी गई है। अपने डील-डौल और रंग-ढंग में भी वे सब एक जैसे लगते हैं। कई बार लगता है कि यह किरदार तो अभी मारा गया था, फिर यह कैसे आ गया? फिल्म में घिसे-पिटे फॉर्मूले और दृश्यों के दोहराव से ऐसा होता है। फिल्म के चारों मुख्य कलाकार जय भानुशाली, अखिल कपूर, साशा आगा और टिया बाजपेई कोई असर नहीं छोड़ पाते।
'देसी कट्टे' निहायत कमजोर फिल्म है। अफसोस की बात है कि मिले अवसर का सही उपयोग न होने पर भविष्य की अनेक संभावनाओं का दम घुट जाता है। नई कोशिशों पर रोक लग जाती है। 'देसी कट्टे' में लेखक-निर्देशक ने धैर्य और संयम से काम किया होता और केंद्रित रहते तो फिल्म कुछ कह जाती।

अवधि-140 मिनट 
*1/2 डेढ़ स्‍टार 

फिल्‍म समीक्षा : चारफुटिया छोकरे

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
 लेखक-निर्देशक मनीष हरिशंकर ने बाल मजदूरी के साथ बच्चों के अपहरण के मुद्दे को 'चारफुटिया छोकरे' में छूने की कोशिश की है। उन्होंने बिहार के बेतिया जिले के एक गांव बिरवा को चुना है। उनके इस खयाली गांव में शोषण और दमन की वजह से अपराध बढ़ चुके हैं। संरक्षक पुलिस और व्यवस्था से मदद नहीं मिलने से छोटी उम्र में ही बच्चे अपराध की अंधेरी गलियों में उतर जाते हैं। इस अपराध का स्थानीय संचालक लखन है। सरकारी महकमे में सभी से उसकी जान-पहचान है। वह अपने लाभ के लिए किसी का भी इस्तेमाल कर सकता है।
इस पृष्ठभूमि में नेहा अमेरिका में सुरक्षित नौकरी छोड़ कर लौटती है। उसकी ख्वाहिश है कि अपने पूर्वजों के गांव में वह एक स्कूल खोले। गांव में स्कूल जाते समय ही उसकी मुलाकात तीन छोकरों से होती है। वह उनके जोश और चंचल व्यवहार से खुश होती है। स्कूल पहुंचने पर नेहा को पता चलता है कि तीनों छोकरे शातिर अपराधी हैं। उनकी कहानी सुनने पर मालूम होता है कि दमन के विरोध में उन्होंने हथियार उठा लिए थे। नेहा स्वयं ही प्रण करती है कि वह इन बच्चों को सही रास्ते पर लाएगी। स्थानीय बाहुबली लखन से उसकी भिड़ंत होती है। इस टकराव में सिस्टम की गड़बडिय़ां उभरती हैं।
लेखक-निर्देशक का नेक इरादा पर्दे पर प्रभावशाली तरीके से नहीं उतर पाया है। चुस्त कहानी और बिखरे स्क्रिप्ट में किरदारों को सही ढंग से विकसित नहीं किया जा सका है। एक साथ कई मुद्दों को छूने और स्क्रिप्ट में लाने की कोशिश में लेखक-निर्देशकअसफल रहे हैं। कलाकारों में सोहा अली खान, जाकिर हुसैन, मुकेश तिवारी और बाल कलाकार हर्ष मयार ने अवश्य अपनी अदाकारी से फिल्म को मजबूत करने की कोशिश की है, लेकिन वे निर्देशक और लेखक की ढीली सोच के शिकार हो गए हैं।
फिल्म का पार्श्‍व संगीत असंगत है। उदाहरण के लिए जीप चलने से सड़क पर जमा पानी के उछलने की आवाज बेमेल है। कलाकारों का लहजा बदलता रहता है। कभी वे फिल्मी बिहारी लहजा ले आते हैं और कभी मुंबइया लहजे में बोलने लगते हैं।
अवधि: 120 मिनट
*1/2  डेढ़ स्‍टार 

Thursday, September 25, 2014

दरअसल : प्रसंग दीपिका पादुकोण का


-अजय ब्रह्मात्मज
    प्रसंग कुछ हफ्ते पुराना हो गया,लेकिन उसकी प्रासंगिकता आगे भी बनी रहेगी। पिछले दिनों एक अंग्रेजी अखबार ने दीपिका पादुकोण की एक तस्वीर छापी और लिखा ‘ओ माय गॉड : दीपिका पादुकोण’स क्लीवेज शो’। थोड़ी ही देर में पहले दीपिका पादुकोण ने स्वयं इस पर टिप्पणी की। उन्होंने उस अखबार के समाचार चयन पर सवाल उठाया। बात आगे बढ़ी तो दीपिका ने बोल्ड टिप्पणी की। ‘हां,मैं औरत हूं? मेरे स्तन और क्लीवेज हैं। आप को समस्या है??’ दीपिका की इस टिप्पणी और स्टैंड के बाद ट्विटर और सोशल मीडिया समेत रेगुलर मीडिया में दीपिका के समर्थन में लिखते हुए फिल्मी हस्तियों और अन्य व्यक्तियों ने उक्त मीडिया की निंदा की। गौर करें तो फिल्म कलाकारों के प्रति मीडिया का यह रवैया नया नहीं है। आए दिन अखबारों,पत्रिकाओं,वेब साइट और अन्य माध्यमों में फिल्म कलाकारों पर भद्दी टिप्पणियों के साथ उनकी अश्लील तस्वीरें छापी जाती हैं। शुद्धतावादियों का तर्क है कि फिल्म कलाकार ऐसे कपड़े पहनते हैं तो कवरेज में क्लीवेज दिखेगा ही। क्या आप को इस तर्क में यह नहीं सुनाई पड़ रहा है कि लड़कियां तंग कपड़े पहनती हैं तो उत्तेजित पुरुष बलात्कार करता है?
    दीपिका पादुकोण आज की अभिनेत्री हैं। पहले की अभिनेत्रियां लाज और लिहाज की वजह से खुल कर कुछ नहीं बोलती थीं। कवरेज में गॉसिप और अश्लीलता नई बात नहीं है। अगर फिल्म पत्रकारिता के इस पहलू पर गंभीरता से विचार करें तो मूल्यों और नैतिकता के इस द्वंद्व को समझा जा सकता है। वास्तव में यह दो आय समूहों की सोच और समझ में मौजूद फर्क का नतीजा है। फिल्म पत्रकारिता में गॉसिप लेखन में सक्रिय अधिकांश पत्रकार छोटे शहरों के मध्यवर्गीय परिवारों से आते हैं। सेक्स,प्रेम,अफेयर,रिश्ता,शरीर और अन्य  संबंधित मामलों में उनकी सोच,धारणा और अपेक्षा सामाजिक परिवेश,परवरिश और एक्सपोजर से मिली समझ पर आधारित होती है। जिस समाज में लडक़े-लड़कियों का हाथ पकड़ कर चलना और आलिंगन-चुंबन करना भी किसी न किसी प्रकार के अंतरंग संबंध का द्योतक माना जाता हो,उस समाज से आए पत्रकारों का सामना हिंदी फिल्मों के कलाकारों से होता है तो वे अपने मूल्यों और नैतिकता की तराजू पर उन्हें तौलने लगते हैं। उन्हें बहुत कुछ अश्लील और अनैतिक दिखने लगता है। वे चाशनी और चटखारे के साथ अपनी समझ किसी प्रसंग,घटना और व्यवहार में थोपते हैं। चूंकि उनके पाठकों का बड़ा हिस्सा इसी निम्न और मध्य वर्ग से आता है तो वह उन खबरों में छिपी आपत्तियों से सहमत होता है। इस तरह मनोरंजन के कवरेज का कारोबार चलता रहता है। मैंने पाया है कि ऐसे लेखन में शामिल अधिकांश फिल्म पत्रकार निजी जिंदगी में भावनात्मक तौर पर अकेले,निराश,हताश और दुखी हैं। वे ऐसी खबरों में अपनी भड़ास निकालते हैं।
    दीपिका पादुकोण के प्रसंग में सभी का साथ आना महत्वपूर्ण है। सभी ने उक्त अखबार की निंदा की,लेकिन यह भी देखा और समझा गया है कि अगली जरूरत में सबसे पहले फिल्म कलाकार उसी मीडिया घराने की शरण लेते हैं। अगर दीपिका को स्टैंड लेना है तो वह यह भी तय करें कि भविष्य में वह उस मीडिया घराने से बात नहीं करेंगी या कम से कम कुछ अवधि के लिए परहेज करेंगी। ऐसा नहीं हो पाएगा। इस हमाम में सभी नंगे हैं। कभी किसी पर उंगली उठ जाती है तो हमें अपना नंगापन नहीं दिखता। सामाजिक स्तर पर इस ग्लोबल दौर में हम संक्रांति से गुजर रहे हैं। हमें बाहरी दुनिया आकर्षित कर रही है और अपनी दुनिया छूट नहीं रही है। इस दुविधा में हम दोनों दुनिया की रूढिय़ां अपने कंधों पर उठा लेते हैं। फिल्म पत्रकारिता में इन दिनों फिल्मों के अलावा सभी अवांतर और अनावश्यक मुद्दों पर बातें होती हैं। पत्र-पत्रिकाएं पाठकों का तर्क देकर ऐसी गलीज और पीत पत्रकारिता में गर्त हो रही हैं। ऑन लाइन मीडिया को पाठकों के हिट चाहिए। कहा जाता है कि गॉसिप और अश्लील तस्वीरों से हिट बढ़ता है। यह महज नैतिकता का प्रश्न नहीं है। हमें गंभीरता से सोचना होगा कि हम क्या परोसें और उसकी मर्यादा क्या हो?
   


Wednesday, September 24, 2014

दरअसल : फिल्म समीक्षा की नई चुनौतियां


-अजय ब्रह्मात्मज
    इस साल सोशल मीडिया खास कर ट्विटर पर दो फिल्मों की बेइंतहा तारीफ हुई। फिल्म बिरादरी के छोटे-बड़े सभी सदस्यों ने तारीफों के ट्विट किए। ऐसा लगा कि फिल्म अगर उनकी तरह पसंद नहीं आई तो समझ और रसास्वादन पर ही सवाल होने लगेंगे। ऐसी फिल्में जब हर तरफ से नापसंद हो जाती हैं तो यह धारणा बनती है कि फिल्म बिरादरी की तहत सिर्फ औपचारिकता है। पहले शुभकामनाएं देते थे। अब तारीफ करते हैं। फिल्म बिरादरी इन दिनों कुछ ज्यादा ही आक्रामक हो गई है। वे फिल्म पत्रकारों और समीक्षकों का मजाक उड़ाने से बाज नहीं आते। आए दिन कहा जाता है कि अब समीक्षक अप्रासंगिक हो गए हैं। उनकी समीक्षा से फिल्म का बिजनेस अप्रभावित रहता है। वे कमर्शियल मसाला फिल्मों के उदाहरण से साबित करना चाहते हैं कि भले ही समीक्षकों ने पसंद नहीं किया,लेकिन उनकी फिल्में 100 करोड़ से अधिक बिजनेस कर गईं। धीरे-धीरे दर्शकों के मानस में यह बात भी घर कर गई है कि फिल्म का बिजनेस ही आखिरी सत्य है। बाजार और खरीद-बिक्री के इस दौर में मुनाफा ही आखिरी सत्य हो गया है।
    इन दिनों प्रिव्यू या किसी शो से निकलते ही संबंधित निर्माता,निर्देशक,कलाकार और दोस्त-परिचित यही पूछते हैं-क्या लगता है क्या लगता है से उनका तात्पर्य फिल्म के बिजनेस की संभावनाओं का अनुमान लगाना होता है। वे तुरंत हिंट या फ्लॉप सुनना चाहते हैं। मैं ऐसे जिज्ञासुओं से हमेशा यही कहता हूं कि मैं जलेबी खाने के बाद यह तो बता सकता हूं कि वह मीठी और स्वादिष्ट है कि नहीं? मैं यह नहीं बता सकता कि वह कितनी बिकेगी? दुकानदार उसे बेच पाएगा कि नहीं? जलेबी की बिक्री कई और बातों पर निर्भर करती है,जो जलेबी की गुणवत्ता से परे होती हैं। फिलम का बिजनेस इतना महत्वपूर्ण हो गया है कि आम दर्शक भी पहले दिन से यह जानना चाहते हैं कि फिल्म चल रही है या नहीं। अनेक दर्शक फिल्म के कलेक्शन के आधार पर उसे देखने या नहीं देखने का फैसला करते हैं। फिल्म की कोई बात नहीं करता। धारणा बनती जा रही है कि अगर फिल्म का कलेक्शन अच्छा है तो फिल्म भी अच्छी होगी। आप खुद ही सोचें। ऐसा है क्या? फिर तो 100 करोड़ क्लब में आ चुकी सभी फिल्में क्वालिटी के लिहाज से श्रेष्ठ फिल्में होतीं।
    डिजिटल युग में समीक्षकों खास का प्रिंट मीडिया के समीक्षकों की चुनौतियां बढ़ गई हैं। सालों की निरंतर समीक्षा से कुछ समीक्षकों ने प्रशंसक और पाठक जुटाए हैं। उनके लिए चुनौती है कि वे अपने पाठकों को कैसे संतुष्ट रखें। इन दिनों फिल्म की रिलीज के पहले से उसकी सराहना और आलोचना में टिप्पणियां आने लगती हैं। इन टिप्पणियों से सोशल मीडिया पर एक्टिव दर्शक प्रभावित होते हैं। स्वयं दर्शक भी समीक्षक हो गए है। अपनी राय और दूष्टिकोण जाहिर करने से वे नहीं हिचकते। प्रिंट मीडिया में शुक्रवार और शनिवार तक समीक्षाएं छपती हैं। डिजिटल युग के दर्शकों के लिए तब तक काफी देर हो चुकी होती है। इसके अलावा अभी यह बता पाना मुश्किल है कि क्या किसी समीक्षा से फिल्म का बिजनेस प्रभावित होता है या यों कहें कि दर्शक फिल्म के प्रति आकर्षित होते हैं। लोकप्रिय सितारों की मसाला फिल्मों पर भले ही असर न होता हो ,लेकिन छोटी और स्वतंत्र फिल्मों के दर्शक बढ़ाने में समीक्षकों की भूमिका रहती है। आज भी वे फिल्म और दर्शकों के बीच पुल होते हैं। यहां तक कि कमर्शियल मसाला फिल्मों के मनोरंजन और आनंद में भी समीक्षक की दृष्टि मददगार होती है।
   

Tuesday, September 23, 2014

आत्मविश्वास से लंबे डग भरतेअभिषेक बच्चन


-अजय ब्रह्मात्मज
    हमेशा की तरह अभिषेक बच्चन की मुलाकात में मुस्कान तैरती रहती है। उनकी कबड्डी टीम पिंक पैंथर्स विजेता रही। इस जीत ने उनकी मुस्कान चौड़ी कर दी है। अलग किस्म का एक आत्मविश्वास भी आया है। आलोचकों की निगाहों में खटकने वाले अभिषेक बच्चन के नए प्रशंसक सामने आए हैं। निश्चित ही विजय का श्रेय उनकी टीम को है,लेकिन हर मैच में उनकी सक्रिय मौजूदगी ने टीम के खिलाडिय़ों का उत्साह बढ़ाया। इस प्रक्रिया में स्वयं अभिषेक बच्चन अनुभवों से समृद्ध हुए।
    वे कहते हैं, ‘जीत तो खैर गर्व की अनुभूति दे रहा है। अपनी टीम के खिलाडिय़ों से जुड़ कर कमाल के अनुभव व जानकारियां मिली हैं। हम मुंबई में रहते हैं। सुदूर भारत में क्या कुछ हो रहा है? हम नहीं जानते। उससे अलग-थलग हैं। हमारी टीम में अधिकांश खिलाड़ी सुदूर इलाकों से थे। मैं तो टुर्नामेंट शुरू होने के दो हफ्ते पहले से उनके साथ वक्त बिता रहा था। उनसे बातचीत के क्रम में उनकी जिंदगी की घटनाओं और चुनौतियों के बारे में पता चला। उनके जरिए मैं सपनों की मायावी दुनिया से बाहर निकला। असली इंडिया व उसकी दिक्कतों के बारे में पता चला। उन तमाम दिक्कतों के बावजूद उनमें जो लडऩे का माद्दा है, वह कमाल का है। मैच के दौरान वे मुझसे कहा करते कि दादा यह टूर्नामेंट हम ने आप के लिए जीता है।’
    दूसरी चीज जो मुझे उनसे सीखने को मिली, वह यह कि जिंदगी में,किसी टीम में लीडर बनना चाहिए, बॉस नहीं। बॉस सिर्फ इंस्ट्रक्ट करेगा, लीडर अपनों के संग रहेगा। लड़ेगा। यही वजह थी कि मैं मैदान पर उनका जोश बढ़ाने के लिए रहता था। चाहता तो मैं भी अपने आफिस में बैठ कर उनके बारे में पता करता रहता और दूसरे काम भी करता रहता। मेरी मौजूदगी उनमें कमाल का जोश भरती रही और नतीजा आज सब के सामने है।
    इस गर्व के बाद आत्मिक खुशी के पल ‘हैप्पी न्यू ईयर’ दे रही है। वे बताते हैं, ‘फिल्म में लंबी-चौड़ी कास्ट है। शूटिंग के दौरान पूरा पारिवारिक इमोशनल माहौल बन गया था। सबके संग हंसी-मजाक होता था। एक-दूसरे के दिल की बातें जानने का मौका मिलता था। अब शूटिंग खत्म हो चुकी है। रिलीज की तारीख नजदीक आ रही है तो शूटिंग के दौरान वाले पल याद कर इमोशनल हो रहा हूं। अभी हमारा ध्यान प्रमोशन पर है। शाह रुख के बारे में जैसा सब जानते हैं, वे प्रमोशन के यूनीक कलेवर लेकर आते हैं। वह पीरियड भी काफी मजेदार होता है। हम सब फिल्म को सेलिब्रेट कर रहे हैं। फराह ने एक विशुद्ध मसाला फिल्म दी है। एकदम टिपिकल कमर्शियल फिल्म, जैसा मनमोहन देसाई दिया करते थे। लोग हिंदी सिनेमा को जिन खूबियों के लिए जानते हैं। जैसी फिल्में देखकर हम बड़े हुए हैं, ‘हैप्पी न्यू ईयर’ वैसी ही फिल्म है।’
क्या ‘हैप्पी न्यू ईयर’ में अभिषेक बच्चन डबल रोल में हैं? पूछने पर वे हामी भरते हैं,‘ जी,फिल्म में डबल रोल है मेरा। एक का नाम नंदू भीड़े है। वह मुंबई का है। वह पैसे के लिए दही हांडी और अन्य कार्यक्रमों में हिस्सा लेता है। दूसरे रोल में निगेटिव शेड में हूं। मैं इसे अपने करिअर का पहला डबल रोल फिल्म मानता हूं। बोल बच्चन में भी मैं दो अवतार में था, मगर यहां मैं पूरी तरह दो अपोजिट किरदार निभा रहा हूं। आज के दौर में भी डबल रोल निभाना आसान काम नहीं है। पहले के जमाने में हाई लेवल तकनीक नहीं थी। पहले कैमरे के फ्रेम को लॉक नहीं किया जाता था। कलाकार को तुरंत कपड़े बदल कैमरे के सामने आ जाना पड़ता था। आज फ्रेम को लॉक नहीं करना पड़ता। बाकी परफॉरमेंस में आप को वरायटी तो लानी ही पड़ती है।’
    पहले के जमाने में इस एंटरटेमेंट जॉनर की फिल्मों में कॉमेडी का एक ट्रैक भर होता था। अब उसका डोज बढ़ गया है। हर फिल्म में कॉमेडी पर जोर रहता है। अभिषेक बच्चन इसे स्वीकार करते हैं,‘उसकी संभवत : वजह यही है कि आज लोगों की जिंदगी में स्ट्रेस लेवल काफी बढ़ चुका है। सभी चाहते हैं कि उन्हें भरपूर आनंद मिले। फिल्म देखते समय वे ऐसा बंधें कि सारे तनावों से मुक्त हो सकें। उसकी खातिर अब कमर्शियल फिल्मों में कॉमेडी का तडक़ा ज्यादा होता है। हम एक्टर के लिए कॉमेडी करना सबसे टफ काम है। ड्रामा और इंटेंस सीन में मोमेंट के साथ खेला जा सकता है। कॉमेडी अगर अच्छी नहीं लिखी गई हो तो उसे पर्दे पर पेश करना बहुत टेढ़ा काम है। और यह साथ के कलाकारों की केमिस्ट्री से निखरती और डूबती है।’
    अभिषेक बच्चन जोर देकर कहते हैं,‘फिल्म की सबसे खास बात यह है कि आप को हर सीन में तकरीबन सभी कलाकार साथ परफॉर्म करते नजर आएंगे। शाह रुख को सिर्फ दो दिन बगैर किसी कलाकार के शूट करना पड़ा, जबकि मुझे तीन दिन। इस फिल्म का स्ट्रक्चर ऐसा रखा गया है कि सभी हर फ्रेम में नजर आएं। फराह खान के लिए यह मुश्किल फिल्म रही होगी।’ फिर खुद ही फराह खान की तारीफ करने लगते हैं अभिषेक,‘ फराह बड़ी दिलेर और साहसी फिल्ममेकर हैं। वे अपनी दिल की सुनती हैं। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं? उनके सिनेमा को क्या करार देते हैं? मुझे उनकी यही सोच प्रभावित करती है। फिर वे अपने कलाकारों को बच्चों जैसा प्यार देती हैं। घर में तीन बच्चों को पालने के अनुभव से उन्हें हमें संभालने में दिक्कत नहीं हुई। खुशी है कि मुझे ‘हैप्पी न्यू ईयर’ में उनके साथ काम करने का मौका मिला। सारे कलाकार एक-दूसरे से अच्छी तरह परिचित भी थे। मैं सबके संग पहले भी फिल्में कर चुका हूं सिवाय विवान के। सोनू सूद ‘युवा’ में मेरे बड़े भाई के रोल में थे। यहां शूट के दरम्यान भी वे मेरा ख्याल बड़े भाई के तौर पर करते थे। हर शाम सात बजे फोन आ जाता था कि चलो भाई कहां हो? जिम चलो।’
   

Friday, September 19, 2014

फिल्‍म समीक्षा : दावत-ए-इश्‍क

-अजय ब्रह्मात्‍मज

                मुमकिन है यह फिल्म देखने के बाद स्वाद और खुश्बू की याद से ही आप बेचैन होकर किसी नॉनवेज रेस्तरां की तरफ भागें और झट से कबाब व बिरयानी का ऑर्डर दे दें। यह फिल्म मनोरंजन थोड़ा कम करती है, लेकिन पर्दे पर परोसे और खाए जा रहे व्यंजनों से भूख बढ़ा देती है। अगर हबीब फैजल की'दावत-ए-इश्क में कुछ व्यंजनों का जिक्र भी करते तो फिल्म और जायकेदार हो जाती। हिंदी में बनी यह पहली ऐसी फिल्म है,जिसमें नॉनवेज व्यंजनों का खुलेआम उल्लेख होता है। इस लिहाज से यह फूड फिल्म कही जा सकती है। मनोरंजन की इस दावत में इश्क का तडक़ा लगाया गया है। हैदराबाद और लखनऊ की भाषा और परिवेश पर मेहनत की गई है। हैदराबादी लहजे पर ज्‍यादा मेहनत की गई है। लखनवी अंदाज पर अधिक तवज्‍जो नहीं है। हैदराबाद और लखनऊ के दर्शक बता सकेंगे उन्हें अपने शहर की तहजीब दिखती है या नहीं?
हबीब फैजल अपनी सोच और लेखन में जिंदगी की विसंगतियों और दुविधाओं के फिल्मकार हैं। वे जब तक अपनी जमीन पर रहते हैं, खूब निखरे और खिले नजर आते हैं। मुश्किल और अड़चन तब आती है, जब वे कमर्शियल दबाव में आकर हिंदी फिल्मों की परिपाटी को ठूंसने की कोशिश करते हैं। 'दावत-ए-इश्क के कई दृश्यों में वे 'सांप-छदूंदर की स्थिति में दिखाई पड़ती है। उनकी वजह से फिल्म का अंतिम प्रभाव कमजोर होता है। इसी फिल्म में सच्‍चा प्यार पाने के बावजूद गुलरेज का भागना और कशमकश के बाद फिर से लौटना नाहक ही फिल्म को लंबा करता है। ऐसी संवेदनशील फिल्में संवेदना की फुहार के समय ही सिमट जाएं तो अधिक मर्मस्पर्शी हो सकती हैं। बेवजह का विस्तार कबाब में हड्डी की तरह जायके को बेमजा कर देता है।
परिणीति चोपड़ा ने गुलरेज के गुस्से और गम को अच्‍छी तरह भींचा है। वह अपने किरदार को उसके आत्मविश्वास के साथ जीती हैं। वह मारपीट के दृश्यों के अलावा हर जगह अच्‍छी लगी हैं। खासकर बेटी और बाप के रिश्तों के सीन में उन्होंने अनुपम खेर का पूरा साथ दिया है। अनुपम खेर भी लंबे समय के बाद अपने किरदार की सीमा में रहे हैं। यह फिल्म बाप-बेटी के रिश्तों को बहुत खूबसूरती से रेखांकित करती है। तारिक की वेशभूषा और भाषा तो आदित्य राय कपूर ने हबीब फैजल के निर्देशन और सहायकों से ग्रहण कर ली है,लेकिन परफॉर्म करने में वे फिसल गए हैं। उनमें लखनवी नजाकत और खूसूसियत नहीं आ पाई है। इस फिल्म में वह कमजोर चयन हैं। परिणीति चोपड़ा के साथ के दृश्यों में भी वे पिछड़ गए हैं। अपनी लंबाई को लेकर वह अतिरिक्त सचेत न रहें तो बेहतर। उन्हें इस मामले में अमिताभ बच्‍चन और दीपिका पादुकोण से सीखना चाहिए।
फिल्म का शीर्षक थीम के मुताबिक जायकेदार नहीं है। 'दावत-ए-इश्क को गाने में लाने के लिए कौसर मुनीर को भी मेहनत करनी पड़ी है। फिल्म के गीत कथ्य के साथ संगति नहीं बिठा पाते। कौसर मुनीर गीतों में अर्थ लाने के लिए सहजता और स्वाभाविकता खो देती हैं। होली गीत में कैसे हैदराबाद की गुलरेज अचानक लखनवी लब्जों का इस्तेमाल करने लगती है? तार्र्किकता तो गीतों की तरह अनेक दृश्यों में भी नहीं है। ईमानदार पिता बेटी के बहकावे में आकर गत रास्ता अख्तियार कर लेता है। समझदार बेटी भी शादी के दबाव में कैसे आ जाती है? हबीब फैजल ने ऐसी चूक कैसे स्वीकार की?
यह फिल्म स्पष्ट शब्दों में दहेज का सवाल उठाती है और धारा 498ए का उल्लेख करती है। इसके लिए हबीब फैजल अवश्य धन्यवाद के पात्र हैं।
स्टार: ** 1/2 ढाई स्टार
अवधि-108 मिनट


फिल्‍म समीक्षा : खूबसूरत

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
 शशांक घोष की 'खूबसूरत' की तुलना अगर हृषिकेष मुखर्जी की 'खूबसूरत' से करने के इरादे से सोनम कपूर की यह फिल्म देखेंगे तो निराशा और असंतुष्टि होगी। यह फिल्म पुरानी फिल्म के मूल तत्व को लेकर नए सिरे से कथा रचती है। एक अनुशासित और कठोर माहौल के परिवार में चुलबुली लड़की आती है और वह अपने उन्मुक्त नैसर्गिक गुणों से व्यवस्था बदल देती है। निर्देशक शशांक घोष और उनके लेखक ने मूल फिल्म के समकक्ष पहुंचने की भूल नहीं की है। उन्होंने नए परिवेश में नए किरदारों को रखा है। 'खूबसूरत' सामंती व्यवहार और आधुनिक सोच-समझ के द्वंद्व को रोचक तरीके से पर्दे पर ले आती है।

एक हादसे से राजसी परिवार में पसरी उदासी इतनी भारी है कि सभी मुस्कराना भूल गए हैं। वे जी तो रहे हैं, लेकिन सब कुछ नियमों और औपचारिकता में बंधा है। परिवार के मुखिया घुटनों की बीमारी से खड़े होने और चलने में समर्थ नहीं हैं। उनकी देखभाल और उपचार के लिए फिजियोथिरैपिस्ट मिली चक्रवर्ती का आना होता है। दिल्ली के मध्यवर्गीय परिवार में पंजाबी मां और बंगाली पिता की बेटी मिली चक्रवर्ती उन्मुक्त स्वभाव की लड़की है। वह अपनी मां को उनके नाम से बुलाती है। राजप्रासाद के शिष्टाचार से अपरिचित मिली के मध्यवर्गीय आचार-व्यवहार से रानी साहिबा को खीझ होती रहती है। उसके आगमन और संवाद से परिवार में आरोपित अनुशासन में खलल पड़ती है। हालांकि इस कोशिश में कई दृश्यों में मिली को उजड्ड और गंवार की तरह हम देखते हैं। वह अपनी मुखरता और खुलेपन से रानी साहिबा के अलावा परिवार के सभी सदस्यों की प्रिय बन जाती है। हिंदी फिल्मों की एक मजबूरी प्रेम है। इस फिल्म में विक्रम सिंह राठौड़ और मिली के बीच प्रेम दिखाने के दृश्य जबरन नहीं डाले गए होते तो फिल्म सरल और स्वाभाविक रहती। कुछ अन्य दृश्यों में भी घिसे-पिटे प्रसंग रखे गए हैं। इस कमी के बावजूद फिल्म मनोरंजक और ताजगी से भरपूर है। इसकी प्रस्तुति में रंग, एनर्जी और नई सोच भी रखी गई है।

उदाहरण के लिए पंजाबी मां और बंगाली पिता की बेटी मिली के किरदार पर गौर करें। वह महानगरों में पली आज की लड़की है, जो देश की सांस्कृतिक विविधता की पैदाइश है। ऐसे परिवार हिंदी फिल्मों में दिखने लगे हैं। वहीं राजप्रासाद की जड़ता भी उजागर होती है। नियम और औपचारिकताओं में इच्छाएं दबायी जा रही हैं। महानगर से आई लड़की सपनों और सोच पर लगी गांठ खोल देती है। फिल्म में वह कहीं भी रानी साहिबा से टकराने या उन्हें सबक सिखाने की कोशिश नहीं करती। सब कुछ अपनी गति से बदलता जाता है और आखिरकार रानी साहिबा को महसूस होता है कि उन्होंने अपने सीने और कंधे पर जो बोझ उठा रखा था, वह फिजूल था। परिवार के सभी सदस्यों के साथ उसका व्यवहार अलग-अलग है। पता चलता है कि सभी अपनी जिंदगी में कुछ और चाहते हैं। यह फिल्म हिंदी फिल्मों में आ रही विविधता का भी सुंदर उदाहरण है।

मिली चक्रवर्ती की उन्मुक्तता को पर्दे पर जीवंत करने में सोनम कपूर की स्वाभाविकता दिखती है। ऐसा लगता है कि उन्हें खास मेहनत नहीं करनी पड़ी हैं, जबकि मिली के मिजाज को अंत तक निभा ले जाने में श्रम लगा होगा। सोनम कपूर ने मिली के स्वभाव को अपने हाव-भाव और अभिनय से रोचक बना दिया है। रानी साहिबा की भूमिका में रत्ना पाठक शाह की पकड़ और अकड़ किरदार के अनुकूल है। विक्रम सिंह राठौड़ की भूमिका में पाकिस्तानी अभिनेता फवाद खान अपनी प्रतिभा से मुग्ध करते हैं। उन्होंने अभिनय में संयम और शिष्टता का परिचय दिया है। राजा साहब की भूमिका में अमीर राजा हुसैन जंचे हैं। रामसेवक के छोटे किरदार में अशोक बांठिया भी नोटिस होते हैं।

हां, फिल्म में हिंदी शब्दों के प्रति बरती गई लापरवाही अखरती है। सूर्यगढ़ को सूर्यगड़ और संभलगढ़ को समभलगढ़ लिखना और दिसंबर को डिसेंबर बोलना सही नहीं लगता।
अवधि: 130 मिनट
***1/2 साढ़े तीन स्‍टार

Thursday, September 18, 2014

आज की फीलिंग्स है ‘मां का फोन’ में



-अजय ब्रह्मात्मज
इन दिनों ‘खूबसूरत’ का गाना ‘मां का फोन’ रिंग टोन के रूप में लडकियों के फोन पर बज रहा है। गाने बोल इतने चुटले और प्रासंग्कि हैं कि इस गाने से लड़कियां इत्तफाक रखती हैं। और सिर्फ लड़कियां ही नहीं लडक़े भी मानते हैं कि मां की चिंताओं और जिज्ञासाओं से अनेक बार उनकी मस्ती में खलल पड़ती है। नए दौर की मौज-मस्ती अनग किस्म की है। फोन हमेशा सभी के साथ में रहता है। मोबाइल पर अचानक मां का फोन आता है तो तो इस गाने जैसा ही माहौल बनता है। ‘खूबसूरत’ के इस गाने को अमिताभ वर्मा ने लिखा है। पिछले कुछ सालों से वे फिल्मों में छिटपुट गाने लिख कर अपनी पहचान बना चुके हैं। अनुराग बसु निर्देशित ‘लाइफ इन मैट्रो’ के लिए लिखा उनका गाना ‘अलविदा’ बहुत पॉपुलर हुआ था। ‘अग्ली और पगली’ के लिए लिखा उनका गीत ‘मैं टल्ली हो गई’ भी पार्टी गीत के तौर पर खूब बजा।
    इन पॉपुलर गीतों के बावजूद अमिताभ वर्मा गीत लेखन के रूप में अधिक सक्रिय नहीं रहे। बीच में वे अपनी फिल्म के लेखन में व्यस्त रहे। वे स्वयं उसे निर्देशित करने के लिए आउटउोर पर जाने वाले थे कि मंदी की मार में उनकी फिल्म अटक गई। गीत लेखन की शुरुआत भी आकस्मिक रही। हंसल मेहता ने उन्हें ‘छल’ के गीत लिखने के लिए बुलाया था। वह फिल्म नहीं चली तो गाने भी नहीं चले,लेकिन अमिताभ को ‘छल’ का अलबम बहुत प्रिय है। अमिताभ वर्मा मूल रूप से बिहार के समस्तीपुर इलाके के हैं। उन्होंने एफटीआईआई से एडीटिंग की पढ़ाई की। आरंभ में कुछ फिल्मों की एडीटिंग से जुड़े रहे अमिताभ को लिखने-पढऩे का पुराना शौक रहा। संगीतकार प्रीतम से उनकी दोस्ती है। कभी-कभी उनके लिए कुछ गीत लिखा करते थे। वहीं से यह सिलसिला बना। गीत लेखन अभी तक शौकिया ही है। वैसे ‘मां का फोन’ से मिली लोकप्रियता के बाद अमिताभ गीत लेखन पर ध्यान दे रहे हैं। उन्होंने राजकुमार हीरानी की ‘पीके’ में भी गीत लिखा है। ओनिर की फिल्म ‘शब’ और लारा दत्ता ‘चलो चाइना’ उनकी अगली फिल्में होंगी।
    ‘मां का फोन’ के बारे में वे बताते हैं,‘एक दोपहर हम सभी यों ही फिल्म के गीत के बारे में सोच रहे थे। फिल्म में सोनम कपूर के पास बार-बार किरण खेर का फोन आता है। वह फिल्म में उनकी मां हैं। कभी -कभी उस फोन की वजह से व्यवधान पड़ता है। बात चली कि ऐसा रिंग टोन बनाया जाए जो मां के फोन को जाहिर कर दे। निर्मातारिया कपूर से विमर्श करने के दौरान ही ‘मां का फोन’ का आयडिया आया। गीत के बोल ऐसे रखने थे,जो आज की लड़कियों की फीलिंग्स को व्यक्त कर सके। हमें लगा था कि यह इंटरेस्टिंग गीत बना है,लेकिन इसकी ऐसी पॉपुलैरिटी का आभास नहीं था।’


Monday, September 15, 2014

‘खूबसूरत’ में टोटल रोमांस है-सोनम कपूर


-अजय ब्रह्मात्मज
-‘खूबसूरत’ बनाने का आइडिया कहां से आया?
इन दिनों फैमिली फिल्में नहीं बन रही हैं। पहले की हिंदी फिल्में पूरे परिवार के साथ देखी जाती थीं। अब ऐसा नहीं होता। ऐसी फिल्में बहुत कम बन रही हैं। इन दिनों फिल्मों में किसी प्रकार का संदेश भी नहीं रहता। राजकुमार हीरानी की फिल्म वैसी कही जा सकती है। अभी कंगना रनोट की ‘क्वीन’ आई थी। ‘इंग्लिश विंग्लिश’ को भी इसी श्रेणी में डाल सकते हैं।
-कम्िरर्शयल फिल्मों के साथ कलात्मक फिल्में भी तो बन रही हैं?
मुझे लगता है कि इन दिनों मसाला फिल्मों के अलावा जो फिल्में बन रही हैं, वे डार्क और डिप्रेसिंग र्हैं। उनमें निगेटिव किरदार ही हीरो होते हैुं। एंटरटेनिंग फिल्मों के लिए मान लिया गया है कि उनमें दिमाग लगाने की जरूरत नहीं हैं। बीच की फिल्में नहीं बन रही हैं। इस फिल्म का ख्याल यहीं से आया।
-इस फिल्म का फैसला किस ने लिया? आप बहनों ने या पापा(अनिल कपूर) ने?
पापा इस फैसले में शामिल नहीं थे। उन्होंने टुटू शर्मा से फिल्म के अधिकार लिए । रिया और शशांक के साथ मिल कर मैंने यह फैसला लिया।
-क्या ‘खूबसूरत’ की रेखा की कोई झलक सोनम कपूर में दिखेगी?
हो ही नहीं सकता। मैं तो सोच भी नहीं सकती। हमलोगों ने कहानी बदल दी है। आइडिया वहीं से लिया है, लेकिन कहानी आज की है। हमें आज के दर्शकों का ख्याल रखना होगा। हमारी पीढ़ी के दर्शकों ने ‘खूबसूरत’ देखी ही नहीं है।
-फवाद खान इस फिल्म में कैसे आए?
रिया ने उन्हें चुना। ‘जिंदगी गुलजार है’ सीरियल से दर्शकों ने अभी उन्हें जाना, लेकिन इंडस्ट्री के लोग पहले से जानते थे। सच्ची,फवाद के लिए लोग पागल हैं। आजकल के अभिनेताओं में कोई भी पुरूष नहीं है। चालीस साल की उम्र तक वे लडक़े ही बने रहते हैं। उन्हें तमीज नहीं होती है। नजाकत या तहजीब नहीं है उनमें। फवाद की भाषा इतनी साफ है। मुझे लगता है कि जब पाकिस्तान के एक्टर इतनी साफ ंिहंदी बोल सकते हैं तो यहां के एक्टर क्यों नहीं बोल पाते?
-यह तो बड़ा सवाल कि हिंदी फिल्मों के एक्टर क्यों साफ हिंदी नहीं बोल पाते?
अभी तो बहुत सारे एक्टर खासकर अभिनेत्रियां ऐसी हैं, जो भारतीय नहीं हैं। मैंने तो फिल्मों में आने के पहले उर्दू सीखी। बारहवीं तक मैंने हिंदी पढ़ी है। मुझ से कोई हिंदी में बात ही नहीं करता तो मैं क्या करूं? भाषा तो अभ्यास और व्यवहार की चीज है। मेरे पिता के परिवार में सभी हिंदी में बातें करते हैं। उनकी हिंदी पर पंजाबी का असर है। हिंदी फिल्मों में हिंदुस्तानी चलती है। मुझे लगता है कि मेरा उच्चारण ठीक है। फवाद के साथ मेरी हिंदी-उर्दू अच्छी हो गई।
-पुरानी ‘खूबसूरत’ से यह फिल्म कितनी अलग है?
पहली ‘खूबसूरत’ रोमांटिक फिल्म नहीं थी। यह टोटल रोमांस है। मिडिल क्लास की लडक़ी है मिली। वह इस परिवार में बुलायी जाती है। यहां उसका प्रेम हो जाता है। उसे पता चलता है कि माहौल की वजह से ही राजा साहब बीमार हैं।  उनकी बीमारी मनोवैज्ञानिक है। वह घर का माहौल बदलती है।
-अनिल कपूर प्रोडक्शन की कमान आप दोनों बेटियों के हाथों में है क्या?
प्रोडक्शन रिया संभालती है। मैं तो एक्टर हूं। मुझे सैलरी मिलती है। मैंने कह दिया था कि क्रिएटिव प्रोड्यूसर बनाओगी तो मैं एक्टर नहीं रह पाऊंगी। अगर फिल्म में काम करवाना है तो प्रोडक्शन की जिम्मेदारी मत दो। वैसे भी पूरी फिल्म मेरे कंधे पर है। ऐसा लगता है कि आसान काम होगा, लेकिन सच कहूं तो कामेडी करना बहुत मुश्किल काम है। हमेशा हाई एनर्जी रखनी पड़ती है। आंसू बहाना आसान है। हंसते रहना तो बहुत मुश्किल है।
-दिल्ली के मेरे युवा मित्र ने आग्रह किया है कि सोनम अपनी हंसी नहीं फिसलने दें। यह आप की खासियत है?
बिल्कुल ख्याल रखूंगी। आप दिल्ली के दोस्त से पूछना कि मेरा दिल्ली के लहजे का उच्चारण कैसा लगा? सही था न? आप मुझे बताना। हंसना तो मेरा स्वभाव है। लोगों के बीच रहने पर मैं हंसती ही रहती हूं। कई बार दोस्त मना करते हैं कि इतना मत खिलखिलाया करो।
-आप शोज और फंक्शन में एक्टिव नहीं दिखती? क्या बात है?
मैं शोज नहीं करती और न ही शादियां अटेंड करती हूं। मुझे भी पैसे कमाने हैं। कोई बताए कि कैसे कमाऊं? यहां पर अच्छे कंसेप्ट के साथ शोज नहीं करते।
-फिल्म के निर्देशक शशांक के बारे में क्या कहेंगी?
वे दिखने में गंभीर हैं, लेकिन बहुत फन लविंग हैं। मुझे पता था कि वे इस फिल्म को अच्छी तरह पेश करेंगे। मेरा एक ही आग्रह था कि इसे बंगाली फिल्म मत बना देना और न आर्ट फिल्म की तरह डार्क कर देना। उनकी वजह से फिल्म समृद्ध हो गई है।
-और कौन सी फिल्में कर रही हैं?
‘डॉली की डोली’ कर रही हूं। इसे उमाशंकर सिंह ने लिखा है। फिल्म के निर्देशक अभिषेक डोगरा हैं। मेरे साथ राजकुमार राव, वरुण शर्मा,पुलकित सम्राट और जीशान हैं। मेरे फेवरिट जीशान हैं। सलमान खान के संग ‘प्रेम रतन धन पायो’ कर रही हूं। सूरज बडज़ात्या के निर्देशन में फिल्म काम करना स्वंय में एक बड़ी उपलब्धि है।
-सुना था कि अनिल जी की वजह से यह फिल्म आप को मिली?
अगर मेरा पापा ऐसा कर सकते तो मेरे पास ऐसी अनेक फिल्में होतीं। सिफारिश से ऐसी फिल्में मिल सकती हैं क्या? सूरज जी ने तो पापा के साथ कभी भी काम नहीं किया। उनकी औपचारिक मुलाकातें भी हैं। मेरा चुनाव अक्टूबर 2013 में ही हो गया था। उसके बाद अलग-अलग हीरोइनों के लिए जाने की खबरें आती रहीं। मैं उन सब खबरों को पढ़ कर हंसती रहती थी। सूरज जी ने किसी प्रकार की घोषणा नहीं की थी। वे स्वयं बताना चाहते थे। फिल्म देखने के बाद आप को पता चलेगा कि मैं इस रोल के लिए क्यों चुनी गई?
आप के एक प्रशंसक का सवाल है कि वहीदा रहमान की कौन सी फिल्म आप को पसंद है?
मेरी फेवरिट फिल्म ‘गाइड’ है। उस फिल्म मेें वह खूबसूरत और प्रभावशाली लगी हैं।

Friday, September 12, 2014

फिल्‍म समीक्षा -फाइंडिंग फैनी

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
 सबसे पहले यह हिंदी की मौलिक फिल्म नहीं है। होमी अदजानिया निर्देशित फाइंडिंग फैनी मूल रूप से इंग्लिश फिल्म है। हालांकि यह हॉलीवुड की इंग्लिश फिल्म से अलग है, क्योंकि इसमें गोवा है। गोवा के किरदारों को निभाते दीपिका पादुकोण और अर्जुन कपूर हैं। इन्हें हम पसंद करने लगे हैं। यह इंग्लिश मिजाज की भारतीय फिल्म है, जिसे अतिरिक्त कलेक्शन की उम्मीद में हिंदी में डब कर रिलीज कर दिया गया है। इस गलतफहमी में फिल्म देखने न चले जाएं यह हिंदी की एक और फिल्म हैं। हां, अगर आप इंग्लिश मिजाज की फिल्में पसंद करते हैं तो जरूर इसे इंग्लिश में देखें। भाषा और मुहावरों का वहां सटीक उपयोग हुआ है। हिंदी में डब करने में मजा खो गया है और प्रभाव भी। कई दृश्यों में तो होंठ कुछ और ढंग से हिल रहे हैं और सुनाई कुछ और पड़ रहा है। यह एक साथ इंग्लिश और हिंदी में बनी फिल्म नहीं है। इन दिनों हॉलीवुड की फिल्में भी डब होकर हिंदी में रिलीज होती हैं, लेकिन उनमें होंठ और शब्दों को मिलाने की कोशिश रहती है। फाइंडिंग फैनी में लापरवाही झलकती है।
गोवा के एक गांव पाकोलिम में फाइंडिंग फैनी की किरदार रहते हैं। विधवा सास-बहू साथ में रहती हैं। फर्दी पोस्टमास्टर हैं और पेड्रो पेंटर है। इनके बीच सैवियो है, जो सालों बाद गांव लौटा है। उनके एकांतिक जीवन मे कोई हलचल नहीं है। अचानक एक सुबह फर्दी को अपना पुराना प्रेम पत्र मिलता है, जो 46 साल पहले उसने अपनी प्रेमिका फैनी को लिखा था। उसे पता चलता है कि फैनी उसके प्यार को जान ही नहीं सकी। एंजी उसकी उदासी खत्म करने के लिए सैवियो की मदद लेती है। तय होता है कि वे पांचों फैनी की तलाश में जाएंगे। इस यात्रा में हम गोवा देखते हैं और उन किरदारों के अतीत में भी प्रवेश करते हैं। सभी की जिंदगी में खालीपन है। पता चलता है कि ऐन वक्त पर दिल की बात नहीं कहने से सभी प्रेमविहीन जिंदगी जी रहे हैं। फिल्म के आखिर में सभी को अपनी फैनी यानी मोहब्बत मिल जाती है।
होमी अदजानिया ने गोवा के पृष्ठभूमि के इन किरदारों की निजी विसंगति में हास्य पैदा किया है। उनकी नोंक-झोंक और छींटाकशी में विनोद है। होमी इन किरदारों के माहौल और मूड को अच्छी तरह से चित्रित करते हैं। उन्हें उम्दा कलाकारों से भरपूर सहयोग मिला है। पंकज कपूर और नसीरुद्दीन शाह ने वैसे इस से बेहतर परफारमेंस से हमें चकित किया है। डिंपल भी अपनी छोटी भूमिकाओं में प्रभावित करती रही हैं। फाइंडिंग फैनी वास्तव में दीपिका पादुकोण और अर्जुन कपूर के लिए उल्लेखनीय हैं। दोनों ने मिले मौके के हिसाब से मेहनत की और अपनी अदाकारी से संतुष्ट किया है।
हिंदी फिल्मों के आम दर्शक फाइंडिंग फैनी का अपेक्षित आनंद नहीं उठा सकेंगे। फिल्म की भावभूमि उनके लिए नई और अपरिचित है।
अवधि: 105 मिनट
**1/2

फिल्‍म समीक्षा : क्रीचर

-अजय ब्रह्माात्‍मज 
 एक जंगल है। आहना अपने अतीत से पीछा छुड़ा कर उस जंगल में आती है और एक नया बिजनेस आरंभ करती है। उसने एक बुटीक होटल खोला है। उसे उम्मीद है कि प्रकृति के बीच फुर्सत के समय गुजारने के लिए मेहमान आएंगे और उसका होटल गुलजार हो जाएगा। निजी देख-रेख में वह अपने होटल को सुंदर और व्यवस्थित रूप देती है। उसे नहीं मालूम कि सकी योजनाओं को कोई ग्रस भी सकता है। होटल के उद्घाटन के पहले से ही इसके लक्षण नजर आने लगते हैं। शुरु से ही खौफ मंडराने लगता है। विक्रम भट्ट आनी सीमाओं में डर और खौफ से संबंधित फिल्में बनाते रहे हैं। उनमें से कुछ दर्शकों को पसंद आई हैं। इन दिनों विक्रम भट्ट इस जोनर में कुछ नया करने की कोशिश में लगे हैं।
इसी कोशिश का नतीजा है क्रीचर। विक्रम भट्ट ने देश में उपलब्ध तकनीक और प्रतिभा के उपयोग से 3डी और वीएफएक्स के जरिए ब्रह्मराक्षस तैयार किया है। उन्होंने इसके पहले भी अपनी फिल्मों में भारतीय मिथकों का इस्तेमाल किया है। इस बार उन्होंने ब्रह्मराक्षस की अवधारणा से प्रेरणा ली है। ब्रह्मराक्षस का उल्लेख गीता और अन्य ग्रंथों में मिलता है। हिंदी के विख्यात कवि मुक्तिबोध ने तो ब्रह्मराक्षस पर कविता भी लिखी है। इन उल्लेखों और चित्रणों से अलग विक्रम भट्ट ने दस फीट लंबे एक मायावी जीव को वीएफएक्स से रचा है, जो मनुष्य और जानवर के मेल से बना अलग प्राणि है। वह उसी जंगल में रहता है। जंगल में होटल चालू होने के बाद वह वहां के कर्मचारियों और मेहमानों को अपना शिकार बनता है। ऐसा नहीं है कि वह आहना पर लक्षित आक्रमण करता हो। चूंकि होटल आहना का है और सारे मेहमानों की जिम्मेदारी उसके ऊपर है, इसलिए वह ब्रह्मराक्षस के मुकाबले में खड़ी होती है। ऐसा लगता है कि दोनों आमने-सामने हों। फिल्म में यह सवाल नहीं है कि होटल खुलने से ब्रह्मराक्षस के संसार में खलल पड़ता है और वह उत्तेजित होकर आक्रमण करता है। कहानी का यह रोचक आयाम हो सकता था।
विक्रम भट्ट की क्रीचर के सीधी कहानी में कोई पेंच नहीं है। पिता और प्रेमी के ट्रैक पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है। निर्देशक की मंशा जल्दी से ब्रहाराक्षस के दानवी व्यक्तित्व और आतंक तक आने की है। विक्रम भट्ट और उनकी टीम ने वीएफएक्स से खौफनाक जीव को प्रभावशाली सृजन किया है। कंप्यूटर के माध्यम से उन्होंने ब्रह्मराक्षस की चाल-ढाल को को जीवंत किया है। ब्रह्मराक्षस की चिंघाड़ और चाल से भय होता है। 3डी और संगीत के प्रभाव से यह भय और उभरता है। अपनी तरह की पहली कोशिश में विक्रम भट्ट निराश नहीं करते। निस्संदेह इससे बेहतर इफेक्ट की उम्मीद की जा सकती है, लेकिन हमें बजट और भारतीय माहौल को भी नजर में रखना होगा। इस लिहाज से विक्रम भट्ट की तारीफ करनी चाहिए कि वे अपनी कोशिश में सफल रहे हैं। इस जोनर में हॉलीवुड की फिल्में देख चुके दर्शकों को विक्रम का प्रयास मामूली लग सकता है, लेकिन हम आम भारतीय दर्शकों के संदर्भ में सोचें तो यह प्रयास सराहनीय है।
फिल्म में दूसरी कमियां अमर्निहित हैं। बिपाशा बसु अपनी कोशिशों के बावजूद आहना के किरदार में असर नहीं ला पातीं। भिड़ंत के कुछ दृश्यों में वह अवश्य अच्छी लगती हैं। उन्हें अच्छे सहयोगी कलाकार नहीं मिले हैं। एक दीपराज राणा ही अपने किरदार में डूबे दिखते हैं। विक्रम भट्ट की अन्य फिल्मों में गीत-संगीत का भी योगदान रहता है। इस बार उसकी कमी खलती है।
अवधि: 135 मिनट

Thursday, September 11, 2014

दरअसल : 'फाइंडिंग फैनी' के संकेत


-अजय ब्रह्मात्मज
    होमी अदजानिया की अर्जुन कपूर और दीपिका पादुकोण अभिनीत 'फाइंडिंग फैनी' के प्रचार में कहीं नहीं कहा जा रहा है कि यह अंग्रेजी फिल्म है। इसमें पंकज कपूर, डिंपल कपाडिय़ा और नसीरुद्दीन शाह जैसे दिग्गज कलाकार भी हैं। फिल्म के कुछ गाने हिंदी में आए। यह संभ्रम ैपैदा हो रहा है कि यह हिंदी फिल्म ही है। दरअसल, यह अंग्रेजी फिल्म है। इसमें हिंदी फिल्मों के पॉपुलर चेहरे हैं। इसे हिंदी में डब किया जाएगा, जैसे 'डेल्ही बेल को किया गया था। 'फाइंडिंग फैनी के हंसी-मजाक और महौल में गोवा की गंध है और भाषा मुख्य रूप से अंग्रेजी और कोंकणी रखी गई है। फिल्म के निर्देशक होमी अदजानिया का दावा है कि वे इस फिल्म से भारतीय फिल्मों का प्रचलित ढांचा तोड़ेंगे। स्पष्ट शब्दों में कहें तो वे फिल्मों की भाषा अंग्रेजी करना चाहते हैं। अपनी इस जरूरत के लिए वे हिंदी फिल्मों के पॉपुलर सितारों का उपयोग कर रहे हैं।
    क्या 'फाइंडिंग फैनी' की सफलता से मुंबई में अंग्रेजी फिल्मों के निर्माण का चलन बढ़ेगा? अगर चलन बढ़ा तो फिल्म इंडस्ट्री के युवा लेखकों, निर्देशकों और कलाकारों की आसानी बढ़ जाएगी। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े जानकार जानते हैं कि इन दिनों फिल्में भले ही हिंदी में बन रही हैं, लेकिन उनका कार्य व्यापार अंग्रेजी में होता है। आप अचानक किसी भी सेट पहुंच जाएं तो फिल्मों के संवाद के अलावा शायद ही कोई हिंदी बोलता नजर आता है। मैं यहां जूनियर आर्टिस्ट, लाइटमैन और स्पॉट ब्वॉय को शामिल नहीं कर रहा हूं। हिंदी फिल्मों के निर्माण की भाषा अंग्रेजी हो चुकी है। शेड्यूल, स्क्रिप्ट, प्रमोशन, इंटरव्यू और प्रचार में अंग्रेजी पर जोर रहता है। चूंकि संवादों में हिंदी रखना मजबूरी है, इसलिए उसका निर्वाह किया जा रहा है। देश के अधिकांश दर्शकों तक पहुंचने और बड़ी कमाई के लिए हिंदी जरूरी है। यहां तक कि मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों में भी हिंदी फिल्मों का कलेक्शन अंग्रेजी फिल्मों की तुलना में ज्यादा रहता है।  आप हिंदी की साधारण फिल्मों और अंग्रेजी की लोकप्रिय फिल्मों की तुलना न करें और न उसके उदाहरण लें।
    हिंदी फिल्मों में ऐसे कलाकारों, लेखकों और निर्देशकों की फौज आ गई है, जिनकी संपर्क और प्रयोग की भाषा अंग्रेजी है। इनकी परवरिश में अंग्रेजी माध्यम का बड़ा योगदान रहता है। बचपन में इन्हें नैनी या धाय मां के रूप में कोई कैथोलिक महिला मिलती है, जो अंग्रेजी बोलने के साथ 'इंग्लिश कल्चर में निपुण रहती है। फिर वे बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में जाते हैं, जो इंटरनेशनल सिलेबस और स्टैंडर्ड का पालन करते हैं। भारतीय इतिहास, मिथक और शास्त्रों में उनका परिचय लेश मात्रका ही हो पाता है। मिडिल स्कूल और हाई स्कूलउत्तीर्ण करते ही वे इंग्लैंड, अमेरिका, स्विटजरलैंड या किसी और देश में आगे की पढ़ाई के लिए निकल जाते हैं। इन दिनों फिल्म परिवारों में भी परिवार की भाषा अंग्रेजी हो गई है। नाना-नानी या दादा-दादी से ही हिंदी में बातचीत हो पाती है। ऐसे बच्चे जब हिंदी फिल्मों में आने का फैसला करते हैं तो वे हिंदी का क्रैश कोर्स करते हैं। फटाफट हिंदी सीखते हैं। जल्दबाजी में सीखी गई हिंदी में उच्चारण नहीं सुधर पाता। भाषा के अभ्यास के लिए इनके पास ड्रायवर और अन्य सहयोगी होते हैं। गौर करें तो ये बाबा लोग काम चलाऊ हिंदी ही बोल और समझ पाते हैं। पिछले 15 सालों में मेरा अनुभव रहा है कि अमिताभ बच्चन और शाह रुख खान जैस्े अपवादों को छोड़ दें तो उनसे सवाल पूछते समय भी यह ख्याल रखना पड़ता है कि हिंदी उनके लिए क्लिष्ट नहीं हो जाए। वे 'परिणाम नहीं समझ सकते। उनके लिए 'रिजल्ट ही बोलना या पूछना पड़ेगा।
    अंग्रेजी में फिल्में बनाने की कोशिशें पहले भी हुई हैं। उन फिल्मों को 'डेल्ही बेली या 'फाइंडिंग फैनी की तरह हिंदी का जामा नहीं पहनाया गया। स्पष्ट तौर पर बताया गया कि वे अंग्रेजी फिल्में हैं। 'फाइंडिंग फैनी में निर्माताओं की चालाक कोशिश है कि भाषा छिपा कर दर्शकों को बुला लो। किसी दूसरी हिंदी फिल्म की तरह ही इसका प्रचार किया जा रहा है। इन दिनों फिल्मों के नियमित पत्रकारों को भी इतनी समझ या फुर्सत कहां है कि वे मूलभूत सवाल करें। सभी खुश हैं कि एक फिल्म आ रही है, जिसमें कुछ गाने हैं और अंग्रेजी बोलते झक्की किस्म् के किरदार हैं। पंकज कपूर और नसीरुद्दीन शाह को 'शौकीन' स्वभाव के बुजुर्ग किरदारों के रूप में ही पेश किया गया है।
        'फाइंडिंग फैनी' की सफलता अवश्य ही दूसरे अंग्रेजी भाषी निर्देशकों और कलाकारों को अंग्रेजी में फिल्में बनाने को प्रेरित करेगी। देखना यह है कि इस फिल्म को कैसा कलेक्शन मिल पाता है? इसकी सफलता हिंदी फिल्मों के लिए खतरे की घंटी होगी। फिल्म जगत को इससे भले ही लाभ हो, लेकिन देश के दर्शकों का नुकसान होगा। कालांतर में 'फाइंडिंग फैनी' जैस् फिल्मों की अधिकता उन्हें हिंदी फिल्मों की समझ और मनोरंजन से दूर कर देगी।

Tuesday, September 9, 2014

आशुतोष गोवारिकर ले आएंगे ‘एवरेस्ट’



-अजय ब्रह्मात्मज
    आशुतोष गोवारिकर टीवी पर आ रहे हैं। 1987 से 1999 के बीच कुछ धारावाहिकों और फिल्मों में अभिनय करने के बाद आशुतोष गोवारिकर ने ‘लगान’ फिल्म के निर्देशन से बड़ी सफलता हासिल की। ‘लगान’ से पहले वह ‘पहला नशा’ और ‘बाजी’ जैसी चालू फिल्में निर्देशित कर चुके थे। ‘लगान’ के बाद उन्होंने ‘स्वदेस’ और ‘जोधा अकबर’ जैसी फिल्में निर्देशित कीं। उनकी पिछली दो फिल्में ज्यादा नहीं चलीं। फिलहाल उन्होंने रितिक रोशन के साथ ‘मोहनजोदाड़ो’ की घोषणा की है। इसकी शूटिंग अक्टूबर में आरंभ होगी। अक्टूबर में ही उनके निर्देशन में बन रहे टीवी शो ‘एवरेस्ट’ का प्रसारण आरंभ होगा।
    टीवी शो ‘एवरेस्ट’ की कहानी है। वह अपने पिता के सपनों को पूरा करने के लिए एक एडवेंचर पर निकलती है। शो की जानकारी देते हैं आशुतोष गोवारिकर,‘यह 21 साल की एक लडक़ी की कहानी है,जिसे आज पता चला है कि उसके पिता नहीे चाहते थे कि उसका जन्म हो। उनकी समझ में बेटियां बेटों के मुकाबले में कमतर होती हैं। बेटा होता तो वह मेरे सपने पूरा करता। वह अपने पिता से बेइंतहा प्यार करती है,लेकिन इस जानकारी से हतप्रभ रह जाती है। वह अपने पिता से नाराज नहीं होती। वह पिता की धारणा बदलने के लिए कुछ करना चाहती है। इस खोज में उसे पता चलता है कि पिता का एक सपना एवरेस्ट पर चढऩा था,जिसे शारीरिक अक्षमता के कारण अब वे परा नहीं कर सकते। वह ठान लेती है कि वह एवरेस्ट की चढ़ाई करेगी। अभी तक जिस लडक़ी ने एक टीले पर भी चढऩे की कोशिश नहीं की है,वह कैसे एवरेस्ट की दुर्गम चढ़ाई करेगी?’
    ऐसे शो के बारे में सोचने की वजह है। आशुतोष गोवारिकर लंबे समय से पर्वतारोहण जैस स्पोटर््स के प्रति आकर्षित रहे। वे विस्मित रहते थे कि इसमें किस किस्म का रोमांच है। बाकी खेलों में तो नाम,शोहरत और पैसे मिलते हैं,लेकिन पर्वतारोहण में क्या है? शिखर पर पहुंचने की खुशी क्या होती है? इस आत्मिक खुशी के विस्मय ने ही  आशुतोष गोवारिकर को ‘एवरेस्ट’ के लिए प्रेरित किया। पर्वतारोहण को भाव के तौर पर लें तो हम सभी के मन में एक एवरेस्ट है,जिसे हम अपनी जिंदगी में पार करते हैं। वह बताते हैं,‘हमारी इच्छाएं ही हमारे एवरेस्ट हैं। इन इच्छाओं को हासिल कर लेने की खुशी अवर्णनीय होती है। पहले इरादा था कि फिल्म बनाऊं,लेकिन उसके डाक्यूमेंट्री हो जाने का खतरा था। मैंने उसे टीवी शो के लिए उपयुक्त समझा। यह शो एक साथ बेटी,पिता के सपनों को पूरा करती बेटी और अपने एवरेस्ट के शिखर पर पहुंचने की कहानी है। इसमें एक साा ड्रामा,एडवेंचर और जीत की कोशिश  है।’
    ‘एवरेस्ट’ इन दिनों चल रहे टीवी शो की तरह अनंत एपीसोड का नहीं होगा। आशुतोष गोवारिकर स्परूप कहते हैं,‘यह शो असीमित नहीं होगा। हम चाहेंगे कि अपनी बात कहने तक ही एपीसोड दिखाएं। कोशिश है कि दर्शकों को कहानी,रिश्तों और विजुअल के तौर पर कुछ नया मिले। इस फिल्म के माहौल में प्रकृति की ताजगी है,जो प्राकृतिक तौर पर शो में दिखेगी। हम ने कलाकारों के चुनाव में भी नयापन रखा है। शो के सीनियर किरदारों में ही सुहासिनी मुले और मनीष चौधरी जैसे पांच सीनियर कलाकार रखे गए हैं। यंग ब्रिगेड नया है। सभी किरदारों की अपनी कहानियां भी हैं,जिसके साथ उनका परिवेश भी आएगा। एवरेस्ट की शूटिंग के लिए हमलोग पहाड़ों में गए। पहाड़ों और एवरेस्ट पर चढ़ाई की शूटिंग मुश्किल और चुनौतीपूर्ण रही।  मुझे अपनी कहानी पर भरोसा है। उम्मीद है कि टीवी के दर्शक भी इस नएपन को स्वीकार करेंगे। अगर यह शो किसी भी तरह दर्शकों की सोच को प्रभावित कर सका तो अपने प्रयास को सफल मानूंगा। हम मनोरंजक तरीके से एक संदेश भी दे रहे हैं।’
    ‘एवरेस्ट’ स्टार प्लस से प्रसारित होगा। टीवी शोज में चल रहे नए प्रयोग और प्रयास का नया पड़ाव होगा ‘एवरेस्ट’।
   

Monday, September 8, 2014

खुशकिस्मत हूं मैं - फवाद खान


-अजय ब्रह्मात्मज
फवाद खान कुछ ऐसे दुर्लभ सितारों में हैं, जिनके प्रति पहली फिल्म से ही इतनी उत्सुकता बनी है। इसके पहले कपूर खानदान के रणबीर कपूर के प्रति लगभग ऐसी जिज्ञासा रही थी। फवाद के लिए यह इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि वह पाकिस्तानी मूल के एक्टर हैं। लाहौर में रचे-बसे फवाद ने माडलिंग और गायकी के बाद शोएब मंसूर की फिल्म ‘खुदा के लिए’ से एक्ंिटग की शुरुआत की। चंद साल पहले उन्हें मुंबई से एक फिल्म का आफर मिला था, लेकिन तब दोनों देशों के संबंध बिगडऩे की वजह से फवाद का भारत आ पाना संभव नहीं हो पाया था। ‘देर आयद दुरुस्त आयद’ मुहावरे के तर्ज पर फवाद 2014 में शशांक घोष की फिल्म ‘खूबसूरत’ में सोनम कपूर के साथ आ रहे हैं। फिल्म की रिलीज के पहले जिदंगी चैनल पर आए उनके टीवी ड्रामा ‘जिंदगी गुलजार है’ ने उनके लिए लोकप्रियता की कालीन बिछा दी है। भारत में फवाद के प्रशंसक बढ़ गए हैं। अपनी इस लोकप्रियता से फवाद भी ताज्जुब में हैं और बड़ी चुनौती महसूस कर रहे हैं।    

-‘खूबसूरत’ आने के पहले आपकी लोकप्रियता का जबरदस्त माहौल बना हुआ है। बतौर पाकिस्तानी एक्टर आप किसे किस रूप में एं'वाय कर रहे हैं?
 0 मेरे लिए बहुत ही फख्र और इज्जत की बात है अपने मुल्क में तो मैंने लोहा मनवा लिया। लोगों ने पसंद किया सराहना की। मुहब्बत दी। अब मैं अपने मुल्क से बाहर ग्लोबल पैमाने पर निकला हूं। इससे इज्जत का एहसास और बढ़ गया है। अपने मुल्के के नुमाइंदे के तौर पर मैं यहां आया हूं। यहां के लोगों के प्यार और मुहब्बत ने मुझे विनम्र बना दिया है। ‘जिंदगी गुलजार है’ मेरे लिए कालिंग कार्ड बन गया। हमारे यहां 20 से 20 एपीसोड के सीरियल बनते हैं,इसलिए क्वालिटी कंट्रोल मुमकिन हो जाता है। पाकिस्तान में फिल्मों में आई फिसलन के बाद म्यूजिक और टीवी ही टैलेंट दिखाने का रास्ता रह गया था। मेरी कोशिश नैचुरल अदायगी पर रहती है।
-अपने बैकग्राउंड के बारे में थोड़ा बताएं।
0 मैं ऐसे परिवार में पला बढ़ा जहां फिल्मों और एक्ंिटग का ख्याल ही नहीं आया। मेरे पिता एक फार्मास्यूटिकल कंपनी में थे। मेरा बचपन उनके साथ कई देशों में बीता। 12 साल की उम्र में मैं पिता के साथ ही लाहौर आया और फिर हम वहीं रह गए। पूरे खानदान में कभी किसी ने एक्ंिटग की तरफ रुख नहीं किया था। पहले पाकिस्तान और अब भारत में यहां तक आना मेरे लिए बहुत लंबा सफर है। इस सफर में मेरी यह जीत है मंजिल आगे ही बढ़ती जा रही है। पिछले 18 सालों से लाहौर के एक मध्यवर्गीय परिवार में रहता हूं। अभी तक कोई खास तब्दीली नहीं आई है। मेरे वालिद ने भी इसका तसव्वुर नहीं किया था। मेरी शादी हो चुकी है और मेरा एक बेटा है। हम लोग हंसी-खुशी अपनी जिंदगी बिता रहे हैं। जितना बड़ा आर्टिस्ट मुझे बना दिया गया है,मैं खुद को उससे कम पाता हूं।
-आपकी परवरिश में लाहौर की क्या भूमिका रही है? आजादी के पहले हिंदी फिल्मों के विकास में लाहौर का रोल रहा है। क्या आप कुछ जानते हैं?
0 लाहौर लगातार तरक्की कर रहा है। जानता हूं कि लाहौर कल्चर और लिट्रेचर का बहुत बड़ा सेंटर रहा है। फिल्में अब कम बनती हैं, लेकिन इतिहास के निशान मौजूद हैं। हिंदी फिल्मों के विकास में लाहौर का मकबूल रोल रहा है। यकीनन लाहौर बदल गया है। पहले जैसी बात नहीं रही, लेकिन मुझे लगता है कि पिछले दस सालों में हिंदुस्तान-पाकिस्तान के सभी शहरों का यही हाल हुआ है।
-पाकिस्तान में हिंदी फिल्मों के प्रति क्या नजरिया है?
0 मैं खुशकिस्मत हूं कि दोनों देशों के बीच सुधरते हालात में यहां आया हूं। पिछले कुछ सालों से पाकिस्तान के रेगुलर थिएटर में हिंदुस्तान के साथ ही फिल्में रिलीज हो रही हैं। अब तो पाइरेसी का जमाना चला गया है। मुझे याद है पहले हम लोग वीडियो कैसेट्स लाकर समूह में फिल्में देखा करते थे। हम लोग नए दौर में जी रहे हैं। एकदूसरे के हवाले से हम 'यादा जानकार हो गए हैं। गलतफहमियां कम हुई हैं। दोनों तरफ की मुश्किलें लगभग खत्म हो गई हैं। अगर मेरी पर्सनल राय लें तो मुझे एक ही दिक्कत हुई है वह है हिंदी और उर्दू के वाक्य रचना में। यहां बोलने का लहजा थोड़ा अलग है।
-‘खूबसूरत’ के बारे में बताएं। क्या किरदार है आप का?
0 मैंने यह फिल्म देख रखी थी। सामने से ऑफर आया तो ना क्यों करता? हमलोगों की फिल्म पुरानी ‘खूबसूरत’ से अलग है। इस यूनिट के लोग अंदरुनी तौर पर खूबसूरत हैं। उनके साथ काम करने का तर्जुबा भी खूबसूरत रहा। मेरे लिए यह यादगार रहेगा। मेरा किरदार विक्रम बहुत ही एंबीसस और अनुशासित व्यक्ति है। वह अक्खड़ किस्म का है।  इस मायने में भी खुशकिस्मत हूं कि मेरे बचपन के आदर्श ‘मिस्टर इंडिया’ अनिल कपूर के प्रोडक्शन में काम करने का मौका मिला। सच कहूं तो उनके सामने घबरा जाता हूं।





Sunday, September 7, 2014

जिद्दी धुन के धनी संजय लीला भंसाली


-अजय ब्रह्मात्मज
    हाल-फिलहाल में करण जौहर ने एक चैट शो में संजय लीला भंसाली का जिक्र आने पर मुंह बिचकाया तो सलमान खान ने सूरज बडज़ात्या के साथ चल रही एक बातचीत तें कहा कि संजय को सूरज जी से सीखना चाहिए कि कैसे ठंडे मन से काम किया जा सकता है। इन दोनों प्रसंगों का उल्लेख करने के बाद जब संजय लीला भंसाली की प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की गई तो उन्होंने खामोशी बरती। हां,इतना जरूर कहा कि समय आने पर कुछ कहूंगा। जवाब दूंगा। संजय लीला भंसाली के बारे में विख्यात है कि वे तुनकमिजाज हैं। सेट पर कुछ भी उनकी सोच के खिलाफ हो तो वे भडक़ जाते हैं और फिर उनकी डांट-डपट आरंभ हो जाती है। लोगों से मुलाकात में भी उनके चेहरे पर सवालिया भाव रहते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वे खीझे हुए हैं और मुंह खोला तो कुछ कटु ही बोलेंगे। संजय लीला भंसाली अपने प्रति फैली इस धारणा को तोडऩा नहीं चाहते। हालांकि वे इधर काफी बदल गए हैं। उम्र के साथ संयत हो गए हैं। दूसरों की सुनते हैं और उनके पाइंट ऑफ व्यू को समझने की कोशिश करते हैं। उनमें आए बदलाव का सीधा उदाहरण अन्य निर्देशकों के साथ आई उनकी फिल्में हैं। उन्होंने राघव डार के साथ ‘माई फ्रेंड पिंटो’,प्रभदेवा के साथ ‘राउडी राठोड़’,बेला सहगल के साथ ‘शीरीं फरहाद की तो निकल पड़ी’ और अब ओमंग कुमार के साथ ‘मैरी कॉम’ बनाई है। ये सभी फिल्में संजय लीला भंसाली की निर्देशित फिल्मों से अलग मिजाज की हैं।
          शुक्रवार को रिलीज हुई ‘मैरी कॉम’ के बारे में वे जोर देकर कहते हैं,‘प्रियका चोपड़ा की ‘मैरी कॉम’ देश के हर यूथ को देखनी चाहिए। असंभव को संभव करने की यह कहानी प्रेरक है। यह उम्मीद और जीत की कहानी है। अपने देश में महिला खिलाडिय़ों को लेकर कोई फिल्म नहीं बनी है। मणिपुर की मैरी कॉम की कहानी चकित करती है। उसकी जीत में आप गर्व महसूस करेंगे।’ निर्माता के तौर पर संजय को ‘राउडी राठोड़’ और ‘मैरी कॉम’ समान संतोष देती हैं। वे कहते हैं,‘मैं एक ही तरह से नहीं सोचता। मुझे लगता है कि मैं सारी फिल्में तो नहीं बना सकता,इसलिए उन विषयों को पर्दे पर लाने का मौका दूसरों को देता हूं। उनसे सीखता हूं मैं। मैं असीमित रुचि का कलाकार हूं। मुझे हर जोनर की फिल्में पसंद हैं। लोगों को लगता है कि मैं अनरियल वल्र्ड का मिस्टिकल व्यक्ति हूं। जब ‘मैरी कॉम’ जैसी फिल्म ले आता हूं तो वे चौंकते हैं। सच कहूं तो मैं जिद्दी धुन का व्यक्ति नहीं हूं। वक्त के साथ मेरे अंदर भी बदलाव आया है। दूसरी तरह की फिल्मों का हिस्सा बन कर भी मैं खुश हूं। मैं अपने निर्देशकों को किसी करार के बंधन में नहीं रखता। क्रिएटिव व्यक्ति की उड़ान नहीं रोकनी चाहिए। सभी को स्पेस और फ्रीडम मिलना चाहिए।’
    संजय लीला भंसाली अपनी फिल्मों के जरिए पूरे देश की यात्रा करवा रहे हैं। उनकी हर फिल्म किसी नए परिवेश में होती है और वे उस परिवेश के रंग,खूश्बू,लोग और वातावरण को फिल्मों में ले आते हैं। अपनी इस यात्रा की वे जानकारी देते हैं, ‘मैंने ‘खामोशी’ गोवा के बैकड्राप पर बनाई थी। उसके बाद ‘हम दिल दे चुके सनम’ में गुजरात गया। ‘देवदास’ बनाते समय मैं बंगाल चला गया। फिर ‘ब्लैक’ मैं हिमाचल प्रदेश की बर्फीली वादियों में गया। ‘सांवरिया’ में लखनऊ की नजाकत और तहजीब ले आया। ‘गुजारिश’ में फिर से गोवा था। ‘राम-लीला’ में सुदूर कच्छ पहुंच गया। अगली फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ में महाराष्ट्र का पुणे इलाका रहेगा। मजा आता है न? मैं अपनी फिल्मों के जरिए देश से वाकिफ हो रहा हूं। दर्शकों भी अलग रंग और ढंग का विजुअल आनंद और अनुभव दे रहा हूं। अभी आप ने ‘मैरी कॉम’ में पहली बार मणिपुर के लोगों और जीवन को देखा। सिनेमा में हम हिंदुस्तान के अलग-अलग हिस्सों को ले आते हैं और आप के घर-शहर में पहुंचा देते हैं। मेरा भी मन है कि एक बार पंजाब जाऊं। बिहार जाना है। दक्षिण भारत की यात्रा करनी है। ऐसी यात्राओं में फिल्मों के जरिए संबंधित इलाकों की खुश्बू मिलती है। मुझे तो स्वाद भी मिल जाता है।’
    संजय लीला भंसाली के साथ काम कर चुकी सभी अभिनेत्रियों और दर्शक भी मानते हैं वे किसी और फिल्म में वैसी खूबसूरत नहीं दिखीं। ‘राम-लीला’ की अभिनेत्री दीपिकर पादुकोण ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि मैं अपने रूप के ऐसे सौंदर्य और लावण्य से परिचित नहीं थी। आखिर वह कौन सी पारखी नजर है संजय की जो परिचित अभिनत्रियों को भी विशेष बना देती हैं? संजय हंसने लगते हैं। शरारती मुस्कान और मुग्धता की चमक उनकी आंखों में आती है। वे बताते हैं,‘मैं अपनी नायिकाओं से प्यार करता हूं। उनसे मेरा लगाव हो जाता है। मैं उन्हें सबसे खूबसूरत और मादक रूप में पेश करता हूं। उनकी छोटी-छोटी चीजों और जरूरतों का खयाल रखता हं। उनके किरदारों को गढऩे में मेहनत की जाती है,इसलिए वे पुष्ट दिखती हैं। गौर करेंगे वे सभी सशक्त किरदार भी हैं।  मैं अपनी फिल्मों में उनके औरत होने को सेलिब्रेट करता हूं। औरतों को देखने का मेरा नजरिया अलग है। सभी जानते हैं कि मैं अपनी मां से कितना प्यार करता हूं। उन्हें पेश करते समय शूटिंग के दरम्यान कपड़े,लाइट,फोकस,मेकअप आदि से उनके व्यक्तित्व को निखारता हूं। मैं उन्हें नाहने लगता हूं। दीवानगी की हद तक मेरी मोहब्बत रहती है। मोहब्बत में हर चीज खूबसूरत हो जाती है। किरदार और कलाकार से मोहब्बत और इज्जत मिले तो वह खिल उठती है। उनमें एक दीप्ति आ जाती है,जो पर्दे पर रोशन होती है। उनके ग्लैमर में ग्लो आ जाता है। मुझे ऐसा लगता है।’
     संजय लीला भंसाली की हीरोइनें हिरणियों की तरह गर्व और दर्प के साथ कुलांचें भरती हैं। उनके विस्मय में भी लावण्य रहता है। स्वाभिमानी होने के साथ वे स्वतंत्र और सगुण सोच की होती हैं।
   
   

Friday, September 5, 2014

फिल्‍म समीक्षा : मैरी कॉम

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
                  मैरी कॉम के जीवन और जीत को समेटती ओमंग कुमार की फिल्म 'मैरी कॉम' मणिपुर की एक साधारण लड़की की अभिलाषा और संघर्ष की कहानी है। देश के सुदूर इलाकों में अभाव की जिंदगी जी रहे किशोर-किशोरियों के जीवन-आंगन में भी सपने हैं। परिस्थितियां बाध्य करती हैं कि वे उन सपनों को भूल कर रोजमर्रा जिंदगी को कुबूल कर लें। देश में रोजाना ऐसे लाखों सपने प्रोत्साहन और समर्थन के अभाव में चकनाचूर होते हैं। इनमें ही कहीं कोई कोच सर मिल जाते हैं,जो मैंगते चंग्नेइजैंग मैरी कॉम की जिद को सुन लेते हैं। उसे प्रोत्साहित करते हैं। अप्पा के विरोध के बावजूद मां के सपोर्ट से मैरी कॉम बॉक्सिंग की प्रैक्टिस आरंभ कर देती है। वह धीरे-धीरे अपनी चौकोर दुनिया में आगे बढ़ती है। एक मैच के दौरान टीवी पर लाइव देख रहे अप्पा अचानक बेटी को ललकारते हैं। फिल्म की खूबी है कि भावनाओं के इस उद्रेक में यों प्रतीत होता है कि दूर देश में मुकाबला कर रही मैरी कॉम अप्पा की ललकार सुन लेती है। वह दोगुने उत्साह से आक्रमण करती है और विजयी होती है।

फिल्म देखने से पहले आशंका थी कि संजय लीला भंसाली की देख-रेख में कहीं मैरी कॉम की संघर्ष और विजय गाथा सपनीली भव्यता की चपेट में न आ गई हो। संजय की फिल्मों में दुख और युद्ध भी चमकीला होता है। ओमंग कुमार पर संजय का प्रभाव शिल्प में है, लेकिन वह फिल्म के कथ्य पर हावी नहीं होता। संजय ही फिल्म के एडीटर हैं। फिल्म के परिवेश को प्रोडक्शन डिजायनर वनिता ओमंग कुमार ने यथासंभव रियल रखा है। फिल्म का रंग चटकीला नहीं है। मैरी कॉम की दृढ़ता और इच्छाशक्ति की अभिव्यक्ति के लिए मटमैला रंग सटीक है। दृश्यों की संरचना में सजावट से ज्यादा ध्यान वास्तविकता पर दिया गया है। हालांकि 'मैरी कॉम' मणिपुर के परिवेश, माहौल और जिंदगी को करीब और विस्तार से देख पाने की चाहत पूरी नहीं करती, लेकिन झलकियों और बैकड्राप में उसका एहसास हो जाता है। इस फिल्म में पहली बार हिंदी सिनेमा के पर्दे पर मणिपुर के किरदारों को उनके समाज में हम देखते हैं। लेखक-निर्देशक ने मणिपुर मे चल रहे विरोध और आंदोलन को भी नजरअंदाज नहीं किया है। हां, वे उसे फिल्म के पार्श्‍व में ही रखते हैं। निश्चित ही मैरी कॉम का जीवन उनसे अप्रभावित नहीं रहा होगा,लेकिन वह फिल्म का कथ्य नहीं है।

'मैरी कॉम' कई स्तरों पर प्रभावित करती है। फिल्मी भाषा में यह साधारण लडकी की असाधारण कहानी है। गौर करें तो जिंदगी की साधारण घटनाओं से जूझती और अपनी मंजिल की ओर बढ़ती मैरी कॉम अपने फैसलों और व्यवहार में असाधारण हो जाती है। कई व्यक्तियों का उसे सहयोग मिलता है। सबसे बड़ा सहयोग उसे पति की तरफ से मिलता है, जो जुड़वां बच्चों के लालन-पालन की जिम्मेदारी लेता है और अपनी बीवी को आगे बढऩे की ताकत देता है। पुरुष प्रधान समाज में ऐसे किरदार हैं। उन्हें सही संदर्भ के साथ पेश नहीं किया जाता। शादी और फिर बच्चों का जन्म मैरी कॉम की जिंदगी की बड़ी घटनाएं हैं। बॉक्सिंग पर पूर्णविराम लगाती इन घटनाओं को तोड़ कर मैरी कॉम विजय अभियान जारी रखती है। कई मार्मिक और कमजोर क्षण भी आते हैं, लेकिन वह हाथों से हमेशा के लिए दस्ताने नहीं उतारती। अभ्यास के दौरान बच्चों की देखभाल के लिए वह अवश्य दस्ताने उतारती है। हिंदी फिल्मों ने मां की छवि को त्याग की मूत्र्ति का पर्याय बना दिया है। पर्दे और पर्दे के बाहर फिल्म संसार में इस मां के गुणगान किए जाते हैं। 'मैरी कॉम' भी मां है। वह भी ममत्व के द्वंद्व और दुविधा से गुजरती है, लेकिन अपने प्रोफेशन को तिलांजलि नहीं देती। वह इस चुनौती को कायदे से संभालती है।
'मैरी कॉम' प्रियंका चोपड़ा की फिल्म है। मैरी कॉम की जिंदगी से हम वाकिफ है। उनकी निस्संदेह सराहना करते हैं। देखना यह था कि प्रियंका चोपड़ा उस जुझारु और विजयी बॉकसर को पर्दे पर कैसे जीवित करती हैं। मैरी कॉम और प्रियंका चोपड़ा के चेहरे का नहीं मिलना एक तथ्य है। इस तथ्य को प्रियंका चोपड़ा अपने अभिनय और प्रस्तुति से पाट देती हैं। वह मैरी कॉम के जोश और भावना की तीव्रता को जज्ब करती हैं। फिल्म के आरंभिक दृश्य में ही जब वह पति के साथ प्रसव पीड़ा से गुजरती हुई गली-नुक्कड़ों से होते हुए एक जगह आकर बैठती है और कैमरा उनके चेहरे का क्लोज शॉट लेता है। उस समय वह असह्य पीड़ा में केवल 'उई मां' कहती है और हम पाते हैं कि वह किरदार में ढल चुकी हैं। प्रियंका चोपड़ा ने इस फिल्म के लिए कसरती शरीर के साथ उस हिम्मती मन पर भी मेहनत की है, जो मैरी कॉम के चरित्र को आत्मसात करने के लिए जरूरी था। प्रियंका चोपड़ा अपनी कोशिश में विजयी हैं।

फिल्म के अन्य किरदारों में पति की भूमिका निभा रहे दर्शन कुमार और कोच की भूमिका में आए सुनील थापा अपने अभिनय से 'मैरी कॉम' को विश्वसनीय और प्रभावशाली बनाते हैं। दोनों ने अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है। अप्पा की भूमिका में रॉबिन दास थोड़े नाटकीय हो गए हैं, जबकि मां की भूमिका में रजनी बासुमटराई स्वाभाविक लगी हैं। फेडरेशन के सदस्य के रूप में शक्ति सिन्हा के किरदार के काइयांपन को उभारते हैं।

'मैरी कॉम' प्रेरक फिल्म है। सबसे बड़ी बात कि यह अपने जीवन में ही किंवदंती बन चुकी मैरी कॉम की कहानी है। उनका जीवन और खेल अभी प्रगति पर है। हिंदी में जीवित और सक्रिय हस्ती पर बनी यह पहली बॉयोपिक है।
अवधि: 124 मिनट
**** चार स्‍टार 

Thursday, September 4, 2014

दरअसल : आलिया भट्ट की इमेज बिल्डिंग


-अजय ब्रह्मात्मज
    हम एक ऐसे समाज में रह रहे हैं,जहां साधारण को विशेष और विशेष को अतिसाधारण मानने और समझने का दौर चल रहा है। महेश भट्ट की सुपुत्री आलिया भट्ट फिल्मों में कैमरे के आगे आ चुकी हैं। अभी तक आई उनकी हर फिल्म सफल रही है। उन्हें सराहना भी मिली है। नई पीढ़ी की अभिनेत्रियों में अपनी अदायगी से ज्यादा ताजगी की वजह से उन्हें पसंद किया जा रहा है। बतौर अभिनेत्री अभी उन्हें मुश्किल भूमिकाएं नहीं मिली हैं। हर नई अभिनेत्री आरंभ की कुछ फिल्मों में अपने कच्चेपन के बावजूद स्वाभाविक लगती हैं। उसकी अकेली वजह यही है कि उन भूमिकाओं में हम उन्हें पहली बार देखते समय कुछ नयापन महसूस करते हैं। सामान्य लडक़े-लडक़ी को भी सजा-संवार कर पर्दे पर पेश कर दें तो वह अभिभूत करेगा या करेगी। यकीन न हो तो आप अपनी जवानी की तस्वीरे देख लें। उनमें आप किसी अभिनेता-अभिनेत्री से कम नहीं लगते। नवोदित प्रतिभाओं की परीक्षा चौथी-पांचवीं फिल्म से आरंभ होती है। तब उन्हें किरदार के अनुरूप ढलना होता है। उस समय तक अपने स्वाभाविक अंदाज में वे किरदार में दिखना बंद कर देते हैं। उन्हें सचमुच अभिनय करना पड़ता है।
    कुछ समय पहले आलिया भट्ट करण जौहर के शो में गई थीं। यह शो करण जौहर ने ‘स्टूडेंट ऑफ इ ईयर’ के तीनों नए कलाकारों को लेकर बनाया था। इस शो में सामान्य ज्ञान के सवालों के जवाब देते समय आलिया भट्ट ने देश के राष्ट्रपति का नाम पृथ्वीराज चौहान बता दिया था। इसे उनकी मंदबुद्धि से जोड़ का सोशल मीडिया पर लतीफों का रेला सा आ गया। हर तरफ उनकी हंसी उड़ाई जा रही थी। चूंकि वह महेश भट्ट की बेटी हैं,इसलिए वह ज्यादा निशाने पर आ गईं।  निश्चित ही इससे उनकी चढ़ती-बढ़ती इमेज को झटका लगा। वैसे सामान्य ज्ञान की परीक्षा ली जाए तो अनेक सितारे उसमें अनुत्तीर्ण हो जाएंगे। सितारों के लिए यह जरूरी शत्र्त भी नहीं है। उनकी लोकप्रियता में इस वजह से कोई आंच भी नहीं आती। आलिया भट्ट और उनके परिवार ने चल रहे इस मखौल को गंभीरता से लिया। दोस्तों और शुभचिंतकों की मदद से उन्होंने यूट्यूब के पापुलर चैनल पर ‘जीनियस ऑफ द ईयर’ वीडियो स्केच डाला। इस विीडियो स्केच में आलिया भट्ट बुद्धि संवद्र्धन की क्लास करती हैं और फिर से करण जौहर के सवालों के जवाब देती हैं। जवाब में अपने ज्ञान से वह करण जौहर का हतप्रभ कर देती हैं। इस वीडियो स्केच की सभी ने तारीफ की। कहा गया कि आलिया भट्ट ने खुद पर हंसने का साहस दिखाया।
    ऊपरी तौर पर खुद का मजाक करता हुआ यह वीडियो स्केच साहसी प्रयास लगता है। गौर करें तो पाएंगे कि यह गलत जवाब से हुए इमेज के नुकसान के भरपाई के लिए किया गया सचेत प्रयास है। हाल-फिलहाल में ऐसा कोई दूसरा पीआर एक्सरसाइज देखने को नहीं मिलता। आलिया के दोस्तों और परिवार के सदस्यों ने एक ही झटके में उनके प्रति दृष्टिकोण बदल दिया। कहा जा रहा है कि आलिया खुद पर हंस सकती है। वह साहसी है। यहां साहस के भाव का प्रत्यारोपण सही नहीं है। सभी ने मिल का आलिया भट्ट की छवि को सकारात्मक और उज्जवल करने करी सफल कोशिश की। गलत जवाब से जो दाग लगे थे,उसे धोने में एक हद ते वे कामयाब रहे। इस वीडियो स्केच को करण जौहर कैंप के एक निर्देशक ने डायरेक्ट किया। वीडियो में करण जौहर ने खास भूमिका निभाई। साथ ही भट्ट परिवार भी इस वीडियो में शामिल हुआ। आलिया की वजह से आए कथित पारिवारिक संकट को उन्होंने मिल कर टाला। अर्जुन कपूर और परिणीति चोपड़ा भी इस वीडियो स्केच में नजर आए। कुल मिला कर यह एक एक इनसाइडर की इमेज की क्षतिपूर्ति का प्रयास है। यही इंडस्ट्री आउटसाइडर विद्या बालन की भूल और कंगना रनोट की सीमा पर हंसती और खिल्ली उड़ाती है। आउटसाइडर और इनसाइडर के प्रति फिल्म इंडस्ट्री के रवैए का फर्क भी हमारी समझ में आना चाहिए। हमें फिल्म इंडस्ट्री की इस भेदनीति पर भी गौर करना चाहिए।




सिखाने में आता है आनंद -आनंद मिश्रा


-अजय ब्रह्मात्मज

    हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में देश-विदेश से रोजाना हजारों युवक-युवती पर्दे पर आने की ललक से मुंबई पहुंचते हैं। यों तो मान लिया गया है कि आज की इंडस्ट्री में अभिनेता या अभिनेत्री बनने के लिए हिंदी-उर्दू की जानकारी अनिवार्य नहीं रह गई है। उदाहरण में कट्रीना कैफ समेत अनेक नाम गिना दिए जाते हैं। आनंद मिश्र सालों से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में प्रवेश कर रही प्रतिभाओं को हिंदी पढ़ाने का काम कर रहे हैं। उनकी राय में,‘दुनिया भर से प्रतिभाएं आ रही हैं यहां। इधर अभिनेत्रियों की संख्या बढ़ गई है। वे सभी हिंदी सीखना चाहती हैं। पढऩा और बोलना चाहती हैं। उनमें हिंदी के प्रति आकर्षण है। मेरा अनुभव रहा है कि विदेशों से आई बालाएं हिंदी सीखने में अधिक मेहनत करती हैं। भारत की अभिनेत्रियों को गलतफहमी है कि उन्हें हिंदी आती ही है।’
    यह धारणा गलत नहीं है कि हिंदी फिल्मों से हिंदी गायब होती जा रही है। आनंद मिश्र अपने अनुभव से बतााते हैं,‘इधर शायद ही कोई स्क्रिप्ट मुझे हिंदी में मिली हो। कंप्यूटर और स्क्रिप्ट के सॉफ्टवेयर की वजह से अंग्रेजी का चलन बढ़ा है। रोमन में नुख्ता,ंिबंदी और लहजे को सही ढंग से नहीं लिखा जा सकता। स्क्रिप्ट और संवाद  हिंदी में रहें तो दर्शकों को सही भाषा सुनाई पड़ेगी। मैं 12 सालों से हिंदी सिखा रहा हूं। सबसे पहले रुमी जाफरी ने मुझे वासु भगनानी के पास भेजा था कि मैं उनके बैटे जैकी को हिंदी का उच्चारण सिखाऊं।’
     आनंद मिश्र जबलपुर के हैं। मुंबई आने से पहले वे थिएटर में सक्रिय थे। हरिशंकर परसाई और बीवी कारंथ की संगत कर चुके आनंद मिश्र को पढ़ाने में आनंद आता है। वे कहते हैं,‘हिंदी प्रदेशों से आए लोगों को भी सही हिंदी नहीं आती। उच्चारण दोष और अंग्रेजी के प्रभाव से ‘हैं’ बोलना छूटता जा रहा है। आनुनासिक अक्षरों और शब्दों के उच्चारण में ‘अं’ की जगह ‘न’ लगा देते हैं। ‘जाएंगे’ को ‘जाएन्गे’ बोलने में उन्हें दोष नहीं दिखता। ‘आंख’ को ‘आन्ख’ बोलने का चलन बढ़ रहा है। महाराष्ट्र में पले-बढ़े ‘द’ और ‘ध’,‘ब’ और ‘भ’ में उच्चारण भेद नहीं रख पाते।’पर्व’ को ‘परव’ और ‘प्रकार’ को ‘परकार’ बोलना आम हो गया है।’ आनंद मिश्र ने जैकी भगनानी,सेलिना जेटली,कट्रीना कैफ,रिया सेन,नीतू चंद्रा,श्रेया शरण,जीनिलिया डिसूजा,वरुण धवन,सोहम शाह,विपिन्नो आदि को हिंदी पढ़ाई है। अभी भी कुछ अभिनेता और अभिनेत्रियां उनसे हिंदी सीख रही हैं।
    आनंद मिश्र तीन से चार महीने की कोचिंग करते हैं। हिंदी सिखाने में वे वर्णमाला और बारहखड़ी की सही उच्चारण सिखाते हैं। उनके अनुसार उच्चारण पूरी तरह से वैज्ञानिक प्रक्रिया है। अक्षरों के उच्चारण में जीभ के सही प्रयोग की जरूरत पर जोर देते हैं। वे कहते हैं कि हिंदी फिलमों के कलाकारों को हिंदी सिखनी चाहिए। आनंद मिश्र की राय में सिर्फ अभिनेताओं ही नहीं,उन सभी को उच्चारण पर ध्यान देना चाहिए जो सार्वजनिक तौर पर बोलते हैं। नेता,टीवी एंकर और रेडियो जॉकी को तो सही उच्चारण का अतिरिक्त अभ्यास करना चाहिए। पत्रकारों को भी भाषा की शुद्धि पर ध्यान देना चाहिए। भाषा के जानकार दर्शक और श्रोता गलत हिंदी सुनते ही चौंकते और बिदकते हैं।