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Sunday, August 31, 2014

सवालों में सेंसरशिप



-अजय ब्रह्मत्मज

    होमी अदजानिया की नई फिल्म ‘फाइडिंग फैनी’ में दीपिका पादुकोण के एक संवाद में ‘वर्जिन’ शब्द के प्रयोग पर सेंसर बोर्ड के एक अधिकारी ने आपत्ति की है। फिल्म के प्रमाणन के लिए नियुक्त सदस्यों की सम्मिलित राय व्यक्त करते हुए उन्होंने यह बात रखी है। उन्होंने फिल्म के ट्रेलर में दिखाए जा रहे उस दृश्य को भी टोन डाउन करने की सलाह दी है,जिसमें डिंपल कपाडिय़ा झुकी हुई मुद्रा में पीछे पलट कर देख रही हैं और उनके स्कर्ट की सिलाई उघड़ जाती है। फिल्म को अगर यूए सर्टिफिकेट चाहिए तो निर्माता-निर्देशक को सलाह माननी पड़ेगी। वे इसे चुनौती भी दे सकते हैं। ट्रिब्यूनल और कोर्ट के रास्ते खुले हैं,लेकिन ‘फाइडिंग फैनी’ 12 सितंबर को रिलीज होनी है। निर्माता-निर्देशक अपनी जिद पर अड़े रहें तो फिल्म समय पर रिलीज नहीं होगी और फिर करोड़ों का नुकसान होगा। प्रदीप सरकार की चर्चित और प्रशंसित ‘मर्दानी’ के निर्माता भी चाहते थे कि उनकी फिल्म को यूए सर्टिफिकेट मिले। फिल्म में गालियां और गोलियां थीं,इस वजह से उसे ए सर्टिफिकेट ही मिला। इधर सेंसर बोर्ड अतिरिक्त तौर पर सजग हो गया है। उसके सदस्य चौकस हैं। हाल ही में सेसर बोर्ड के प्रमुख अधिकारी राकेश कुमार की गिरफ्तारी के बाद से अन्य अधिकारी सक्रिय और सचेत हो गए हैं। वे अतिरिक्त सावधानी बरत रहे हैं।
    सेंसर बोर्ड में फैला कदाचार सदस्यों और निर्माताओं की मिलीभगत और जरूरत से होता है। फिल्मों की रिलीज तारीख तय हो चुकी रहती है। रिलीज के ठीक पहले सेंसर सर्टिफिकेट और सही कैटेगरी पाने की अफरातफरी में निर्माता गांठ ढीली करने में नहीं हिचकते। एजेंट के माध्यम से अधिकारियों के पास पैसे और उपहार भेजे जाते हैं। मकसद यही रहता है कि फिल्म को ऐन समय पर सर्टिफिकेट मिल जाए। कुछ अधिकारियों ने इसे कमाई का जरिया बना लिया है। वे चुन कर कुछ फिल्मों को सर्टिफिकेट देने में देरी करते हैं। निर्माता जल्दी का आग्रह करे तो उससे पैसे ऐंठते हैं। सेंसर बोर्ड की कार्य प्रणाली में फिल्मकारों को दलालों की मदद लेनी पड़ती है। न लें तो उन्हें सेंसर बोर्ड के दफ्तर के चक्कर लगाने में समय व्यर्थ करना पड़ेगा। सेंसर बोर्ड का यह पक्ष भी चिंतनीय है,लेकिन उससे ज्यादा अहम और जरूरी मुद्दा है कि आजादी के 67 सालों के बाद भी देश में स्पष्ट सेंसर नीति की कमी महसूस की जाती रही है। अभी सेंसर बोर्ड 1952 में पारित और 1983 में संशोधित सिनैमैटोग्राफ एक्ट के तहत काम करता है। 2008 में आवश्यक सुधार के बाद एक बिल पेश किया गया था,जो अभी तक स्थायी समिति के विचाराधीन है। ऐसी स्थिति में सेंसर बोर्ड के फैसलों में विरोधाभास और पिछड़ापन दिखना स्वाभाविक है।
    सेंसर बोर्ड की मौजूदगी और सेंसर के औचित्य एवं प्रासंगिकता पर भी सवाल उठते रहे हैं। जिस देश में संविधान से हर नागरिक को अभिव्यक्ति की आजादी मिली हुई है,उस देश में किसी प्रकार के सेंसर की जरूरत भी है क्या? देश के जागरुक फिल्मकार,दर्शक और नागरिक यह सवाल उठाते रहे हैं। समय-समय पर जिस प्रकार से फिल्में प्रतिबंधित की जाती हैं,उनसे इस सवाल की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। दूसरी तरफ,समाज का एक तबका मानता है कि अद्र्धशिक्षित भारतीय समाज में सेंसर की अनिवार्यता बनी रहेगी। 1970 में एक मामले की सुनवाई में न्यायालय ने भी माना था कि सेंसर के मामले में सरकारी दखल जरूरी है। भारत में मनोरंजन और रसास्वादन में सांस्कृतिक और सामाजिक विविधता के कारण यह जरूरी हो जाता है कि सभी के हितों का खयाल रखा जाए। फिल्मों में कोई ऐसी बात न आए,जिससे कोई आहत और दुखी हो। सेंसर के इस अदृश्य दबाव का असर फिल्मों के विषय पर होता है। हिंदी फिल्मों पर सरलीकरण के आरोप लगाए जाते हैं। वास्तव में यह मजबूरी और आसान राह है। निर्माता प्रेमकहानी,हॉरर और एक्शन की ऐसी कहानियां उठाते हैं,जिनका कोई सामाजिक और सामयिक आधार नहीं हो। न रहेगा बांस,न बजेगी बांसुरी ़ ़ ़किसी भी प्रकार के संभावित विवाद में फंसने से बचने की इस कोशिश में वायवीय कहानियों के फिल्मांकन पर जोर रहता है। हिंदी फिल्मों में सामजिकता,राजनीति,आधुनिक सोच और विचारोत्तेजक विषयों की कमी महसूस करनेवाले आलोचकों और बुद्धिजीवियों को इस दबाव और संकट का खयाल रखना चाहिए।
    सेंसर बोर्ड का प्रमुख कार्य स्वस्थ मनोरंजन और शिक्षा के लिए फिल्मों को प्रमाण पत्र देना है। भारत में चार कैटेगरी में प्रमाण पत्र दिए जाते हैं- यू,यूूए,ए और एस। 2008 के प्रस्तावित सिनैमैटोग्राफ में 12 साल और 15 साल के दर्शकों के लिए विशेष कैटेगरी की सलाह दी गई है। अभी इस पर विचार ही चल रहा है। कुछ देशों में सेंसर की 7 से 10 कैटेगरी तक हैं। इतिहास में जाएं तो भारत में फिल्मों को लकर पहली सेंसर नीति 1918 में बनी थी। तब अंग्रेजों का शासन था। भारत में सिनेमा को आए पांच साल हो गए थे। अंग्रेज शासकों को खतरा था की फिल्मों से स्वतंत्रता की राष्ट्रीय भावनाएं फैलायी जा सकती हैं। तब जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधिकारी मिल कर तय करते थे कि फिल्मों को प्रदर्शन की अनुमति दी जाए या नहीं? उनका सारा जोर इसी पर रहता था कि फिल्मों में अंग्रेजो के खिलाफ कोई संदेश न हो,जबकि फिल्मकार राष्ट्रीय भावनाओं के बातें कहने और दिखाने के अप्रत्यक्ष तरीके खोज निकालते थे। आजादी के पहले अनेक फिल्में राष्ट्रीय भावनाओं के प्रचार-प्रसार की वजह से प्रतिबंधित भी की गईं। देश में आजादी के पांच साल बाद तक अंग्रेजों के एक्ट के मुताबिक ही फिल्मों का प्रमाणन चलता रहा।
    गौर करें तो सेंसर बोर्ड का मुख्य काम शालीनता और नैतिकता का पालन करवाना रह गया है। धूम्रपान,मदिरापान,अंग प्रदर्शन,चुंबन,अश्लीलता,हिंसा,गाली,गोली आदि की मात्रा और पात्रता ही अधिकारी जांचते रहते हैं। लंबे समय तक हीरो। हीरोइन के चुंबन,आलिंगन और सहवास के दृश्यों के लिए फूलों को झूमते और टकराते दिखाया गया। ‘चुंबन चर्चा’ फिल्म के प्रचार का एक बहाना बन गया है। पिछली सदी के आखिरी दशक में धर्म और जाति के नाम पर बढ़े वैमनस्य की पृष्ठभूमि में अब यह भी खयाल रखा जाता है कि किसी भी जाति,समुदाय और समूह की भावना को ठेस नहीं पहुंचे। हम सामाजिक तौर पर इतने असहिष्णु और संवेदनशील हो गए है कि जरा सी बात भी खल जाती है। पिछले कुछ सालों में अनेक फिल्में इसलिए प्रतिबंधित और प्रद्रर्शन से बाधित की गईं कि देश के किसी कोने में बैठे समूह और समुदाय को फिल्म के संवाद,दृश्य और बोल के किसी शब्द पर आापत्ति थी। हाल ही में रिलीज ‘सिंघम रिटन्र्स’ में ऐसे ही दबाव में ‘प्रवचन’ को बदल कर ‘भाषण’ करना पड़ा।
    राकेश कुमार प्रसंग के बाद मुंबई से टीवी और फिल्म के प्रोड्यूसर्स गिल्ड ने सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्री प्रकाश जावडेकरको एक पत्र लिखा है। उन्होंने बताया है कि देश में हर साल 2000 से अधिक फिल्मों और ट्रेलर को प्रमाणन की जरूरत पड़ती है। निर्माता करोड़ों के निवेश के बाद फिल्म की रिलीज के समय दबाव में रहते हैं। स्पष्ट नीति के अभाव और देरी की वजह से कदाचार की संंभावनाएं बढ़ती हैं। दुनिया के कुछ देशों की तरह सेल्फ सेंसरशिप या सेंसर की प्रक्रिया का सरलीकरण किया जाए। उन्होंने कुछ सलाहें भी दी हैं। प्रमुख कार्यकारी अधिकारी ऐसा हो,जिसे फिल्मों का अनुभव और ज्ञान हो। बोर्ड के सदस्य भी सक्षम और जानकार हों। फिल्म प्रमाणन की प्रक्रिया में हालीवुड की तरह फिल्म बिरादरी की मदद ली जाए। साथ ही प्रोड्यूसर्स गिल्ड ने पूछा है कि नया सिनैमैटोग्राफ एक्ट कब तक पारित और लागू होगा। प्रोड्यूसर्स गिल्ड की सलाह और मांग पर माननीय मंत्री पहल करें तो समस्याएं सुलझ सकती हैं।
    सेंसर बोर्ड खुद कठघरे में खड़ा है। फिल्मकार,दर्शक और नागरिक सरकारी पहल की आस लगाए बैठे हैं। केंद्र में मौजूद सरकार की राजनीतिक समझ की पृष्ठभूमि में अनेक आशंकाएं तैर रही हैं कि अब सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष,प्रमुख अधिकारी और सदस्यों के चुनाव में किस एहतियात और पसंद का खयाल रखा जाएगा। अभी तो यह भी देखना होगा कि सोशल मीडिया के उफान के बाद नैतिकता और शालीनता की चादर कितनी फैलती है? सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर प्रतिबंधों और सीमाओं को परिभाषित और नियमित किया गया तो नई समस्याएं खड़ी होंगी। सवाल के साथ बवाल भी बढ़ेगा।

Saturday, August 30, 2014

निर्माण में आ सकते हैं नवाज


-अजय ब्रह्मात्मज
   
    लंबे अभ्यास और प्रयास के बाद कामयाबी मिलने पर इतराने के खतरे कम हो जाते हैं। नवाजुद्दीन सिद्दिकी के साथ ऐसा ही हुआ है। ‘सरफरोश’ से ‘किक’ तक के सफर में बारहां मान-अपमान से गुजर चुके नवाज को आखिरकार अब पहचान मिली है। इसकी शुरुआत ‘न्यूयार्क’ और कहानी से हो चुकी थी। ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ से उनकी योग्यता पर मुहर लगी और प्रतिष्ठा मिली। अभी स्थिति यह है कि उनके पास मेनस्ट्रीम फिल्मों के भी ऑफर आ रहे हैं। पिछली कामयाबी ‘किक’ के बाद भी नवाज ने तय कर रखा है कि वे साल में एक-दो ऐसी फिल्में करने के साथ अपने मिजाज की फिल्में करते रहेंगे। वे स्पष्ट कहते हैं कि इस पहचान से मेरी छोटी फिल्मों को फायदा होगा। पिछले दिनों मेरी ‘मिस लवली’ रिलीज हुई थी। उसके बारे में दर्शकों का पता ही नहीं चला। उस फिल्म में मैंने काफी मेहनत की थी।
    आमिर खान और सलमान खान के साथ काम कर चुके नवाज दोनों की शैली की भिन्नता के बारे में बताते हैं,‘आमिर खान के बारे में सभी जानते हैं कि वे परफेक्शनिस्ट हैं। उनके साथ रिहर्सल और सीन पर चर्चा होती है। सलमान खान के साथ अलग अनुभव रहा। ज्यादातर स्पॉनटेनियस काम होता रहा। दोनों की निजी खूबियों का असर सीन और फिल्म में दिखता है। मेरे लिए अच्छी बात रही कि लिखने के समय ही साजिद नाडियाडवाला ने इस किरदार के लिए मुझे चुन लिया था। उन्हें मालूम था कि मुझ से क्या चाहिए?’ नवाज आमिर और सलमान की फिल्मों की पहुंच से वाकिफ हैं। उनकी ख्वाहिश है कि भविष्य में उनकी फिल्मों को इस कमर्शियल पहचान का लाभ हो। अभी उनकी कुछ फिल्में तैयार हैं। वे बताते हैं,‘केतन मेहता के साथ मैंने दशरथ मांझी की जिंदगी पर बनी ‘माउंटेन मैन’ की है। बुद्धदेव भट्टाचार्य के साथ ‘अनवर का किस्सा’ कर चुका हूं। एक फिल्म ‘लायर्स डाइस’ है। फैंटम के साथ ‘घूमकेतु’ पूरी हो चुकी है। अभी श्रीराम राघवन के साथ ‘बदलापुर’ की शूटिंग कर रहा हूं।’
    एक कलकार के तौर पर नवाज चाहते हैं कि उन्हें केंद्रीय भूमिकाओं की फिल्में मिलती रहें। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के पुराने तौर-तरीके और व्यावसायिक दृष्टिकोण से फिलहाल ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है। नवाज किसी भ्रम में नहीं हैं। वह कहते हैं,‘मुझे अपनी सीमा और पहुंच मालूम है। मैं किसी गलतफहमी में नहीं हूं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में लंबे अनुभव ने बहुत कुछ सिखा दिया है। मैं संतुलन के साथ आगे बढऩे की कोशिश में रहूंगा। मैं तो रोमांटिक लव स्टोरी करना चाहता हूं। उसमें रोमांस का मेरा अपना तरीका होगा।’ नवाज भविष्य में अपनी खूबियों के साथ ऐसी फिल्में करना चाहते हैं,जो पहुंच और बजट में भले ही छोटी हों,लेकिन उनका इंपैक्ट बड़ा हो।
     नवाज बड़े गर्व से कहते हैं कि छोटी फिल्मों ने मुझे निराशा से बचा लिया। मैंने कभी छोटी-बड़ी के खांचे में फिल्मों या रोल को नहीं रखा। काम करता रहा और बेहतर का प्रयास करता रहा। अनुराग कश्यप और कुछ अन्य निर्देशकों ने मुझ पर विश्वास किया। उन अवसरों की वजह से यहां आ सका। नवाज स्पष्ट हैं कि किसी भी सूरत में वह निर्देशन या लेखन की कोशिश नहीं करेंगे। भविष्य में हो सकरी है कि प्रोडक्शन कंपनी आरंभ करें।
   


Friday, August 29, 2014

फिल्‍म समीक्षा : राजा नटवरलाल

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
 ठगों के बादशाह नटवरलाल उर्फ मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव के नाम-काम को समर्पित 'राजा नटवरलाल' कुणाल देशमुख और इमरान हाशमी की जोड़ी की ताजा फिल्म है। दोनों ने इसके पहले 'जन्नत' और 'जन्नत 2' में दर्शकों को लूभाया था। इस बीच इमरान हाशमी अपनी प्रचलित इमेज से निकल कर कुछ नया करने की कोशिश में अधिक सफल नहीं रहे। कहा जा रहा है कि अपने प्रशंसकों के लिए इमरान हाशमी पुराने अंदाज में आ रहे हैं। इस बीच बहुत कुछ बदल चुका है। ठग ज्यादा होशियार हो गए हैं और ठगी के दांव बड़े हो गए हैं। राजा बड़ा हाथ मारने के चक्कर में योगी को अपना गुरु बनाता है। एक और मकसद है। उसे अपने बड़े भाई के समान दोस्त राघव के हत्यारे को सबक भी सिखाना है। उसे बर्बाद कर देना है।
कहानी मुंबई से शुरू होती है और फिर धर्मशाला होते हुए दक्षिण अफ्रीका के शहर केप टाउन पहुंचती है। इमरान हाशमी भी योगी की मदद से राजा से बढ़ कर राजा नटवरलाल बनता है। वह अपना नाम भी मिथिलेश बताता है। फिल्म में ठगी के दृश्य या तो बचकाने हैं या फिर अविश्वसनीय। फिल्म की पटकथा सधी और कसी हुई नहीं है। साफ दिखता है कि डांस और गाने के लिए हीरोइन को बार डांसर बना दिया गया है। पाकिस्तान से आई हुमैमा मलिक को इस फिल्म में करने से अधिक दिखाने का काम मिला है। फुर्सत मिलते ही वह चुंबन और आलिंगन में मशगूल हो जाती हैं। वह समर्थ अभिनेत्री हैं, लेकिन स्क्रिप्ट की मांग ही न हो तो प्रतिभा का क्या करें? इस तरह की फिल्म की जरूरत के मुताबिक वह ढलने की कोशिश करती हैं, लेकिन झिझक उभर कर आ जाती है। हां, इमरान हाशमी अपने पुराने अंदाज में हैं। ऐसे किरदारों को उन्होंने साध लिया है। उन्होंने गाने, तेवर और प्रेजेंस में रौनक बिखेरी है।
'राजा नटवरलाल' में सभी किरदारों को कुछ चुटीले संवाद मिले है। संजय मासूम ने इन संवादों में देसी अनुभवों को शब्दों से सजा दिया है। ये संवाद फिल्म के कथ्य और दृश्यों के अनुरूप हैं और भाव को मारक बना देते हैं। हिंदी फिल्मों में बोलचाल की भाषा के बढ़ते असर में डायलॉग और डायलॉगबाजी की मनोरंजक परंपरा को यह फिल्म वापस ले आती है। कलाकारों में परेश रावल ऐसे किरदारों के लिए पुराने और अनुभवी अभिनेता हैं। लंबे समय के बाद दीपक तिजोरी छोटी सी भूमिका में भी अपनी मौजूदगी दर्ज करते हैं। के के मेनन निराश करते हैं। दरअसल, उनके चरित्र को ढंग से गढ़ा ही नहीं गया है। उनकी एक्टिंग मूंछ और विग संभालने में ही निकल गई है।
अगर आप फिल्म देखें तो अवश्य बताएं कि केके मेनन के किरदार का क्या नाम हैं? मुझे कभी वरदा, कभी वरधा, कभी वर्धा तो कभी वर्दा सुनाई पड़ा। हिंदी फिल्मों में उच्चारण की दुर्गति बढ़ती जा रही है?
अवधि: 141 मिनट
**1/2 ढाई स्‍टार-

Thursday, August 28, 2014

दरअसल : कागज के फूल की पटकथा


-अजय ब्रह्मात्मज
    दिनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी बड़े मनोयोग से फिल्मों पर लिखते हैं। उनके लेखन में शोध से मिली जानकारी का पुट रहता है। सच्ची बातें गॉसिप से अधिक रोचक और रोमांचक होती हैं। इधर फिल्म पत्रकारिता प्रचलित फिल्मों की तरह ही रंगीन और चमकदार हो गई है। इसमें फिल्म के अलावा सभी विषयों और पहलुओं पर बातें होती हैं? अफसोस यह है कि स्टार,पीआर और पत्रकार का त्रिकोण इसमें रमा हुआ है। बहरहाल,दिनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी अपने अध्श्वसाय में लगे हुए हैं। इधर उन्होंने पटकथा संरक्षण का कार्य आरंभ किया है। इसके तहत वे गुरु दत्त की फिल्मों की पटकथा प्रकाशित कर रहे हैं। इस कार्य में उन्हें विधु विनोद चोपड़ा और ओम बुक्स की पूरी मद मिल रही है। इस बार उन्होंने गुरु दत्त की क्लासिक फिल्म ‘कागज के फूल’ की पटकथा संरक्षित की है।
    इस सीरिज में दिनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी गुरु दत्त की फिल्मों की पटकथा को अंग्रेजी,हिंदी और रोमन हिंदी में एक साथ प्रस्तुत करते हैं। हिंदी की मूल पटकथा को उसके भावार्थ के साथ अंग्रेजी में अनुवाद करना कठिन प्रक्रिया है। संवादों के साथ ही लेखकद्वय फिल्म के गीतों का भी भावानुवाद करते हैं। अपनी रोचक शैली में वे अंग्रेजी में भी तुक मिलाने की सफल कोशिश करते हैं। संवादों के भावानुवाद में कभी-कभी कुछ महत्वपूर्ण शब्द छूट जाते हैं। उन्हें थोड़ा सचेत रहना चाहिए। इसके अलावा पटकथा में निर्देश और एक्शन सिर्फ अंग्रेजी में ही दिए जाते हैं। उन्हें हिंदी में भी लिखा जाना चाहिए। हिंदी पाठक इसकी कमी महसूस करते हैं। ‘कागज के फूल’ के बारे में कहा जाता है कि श्ह गुरु दत्त की आत्मकथात्मक फिल्म है।
    पुस्तक के आरंभ में गुरु दत्त की शैली और संघर्ष पर लिखा लेख उनके द्वंद्वों को जाहिर करता है। प्रसिद्धि और सफलता के साथ गुरु दत्त का सही तालमेल नहीं बैठ पाया। उनकी फिल्में अवसाद और उदासी से भरी हैं। दुनियावी सफलता सभी के लिए आवश्यक होती है। खास कर अगर आप फिल्म जैसे जन उपभोग के माध्यम में सक्रिय हैं तो दर्शकों के बीच पहचान बनाने के साथ ही सराहना की भी उम्मीद रहती है। इस फिल्म के मुख्य किरदार सुरेश सिन्हा के जरिए गुरु दत्त ने एक फिल्ममेकर के एकाकीपन को सही संदर्भ में पेश किया है। सफलता की चढ़ाई मुश्किल होती है। सफलता हासिल होने के बाद की फिसलन तो दर्दनाक होती है। बहुत कम लोग ही इस पीड़ा को संभाल पाते हैं। असंयत हो जाना स्वाभाविक है। दर्प और अभिमान आड़े आता है। नए माहौल और स्थिति से एडजस्ट नहीं कर पाने के दुष्परिणाम भी सामने आते हैं। ‘कागज के फूल’ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बैकड्राप पर बनी फिल्म है,जिसमें सफलता के अप्रिय सच को गुरु दत्त ने पेश किया है।
    ऐसी पुस्तकों में अगर संबंधित कलाकारों और तकनीशियनों के अनुभव रहते हैं तो फिल्म समझने में बाहरी मदद मिलती है। आम तौर पर फिल्म या उसकी पटकथा से फिल्म का मर्म समझ में आता है। समकालीनों के अनुभव से उस मर्म की सच्चाई भी पता चलती है। इस पुस्तक में उनके बेटे अरुण दत्त,भाई देवी दत्त,दोस्त देव आनंद,कैमरामैन वी के मूत्र्ति और सहायक श्याम कपूर के साक्षात्कारों के जरिए दिनेश और जितेन्द्र ने ‘कागज के फूल’ से संबंधित अंतर्कथाएं भी दे दी हैं।
कागज के फूल
संरक्षण,अनुवाद,लेख और साक्षात्कार-दिनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी
ओम बुक्स इंटरनेशनल
विनोद चोपड़ा फिल्म्स की पहल
मूल्य- 595 रुपए

Tuesday, August 26, 2014

करें टिप्‍पणी या लिखें कहानी : रणवीर सिंह और अजय ब्रह्मात्‍मज

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रणवीर सिंह पिछले दिनों एक चायनीज नूडल्‍स और अन्‍य खाद्य पदार्थ के उत्‍पादों के ऐड की शूटिंग कर रहे थे। मैं वहां पहुंच गया। उस मुलाकात के इन दृश्‍यों पर आप की टिप्‍पणी और कहानी की अपेक्षा है। सर्वाधिक रोचक और टिप्‍पण्‍ी के लिए एक-एक पुरस्‍कार सुनिश्चित है।


इंस्पायरिंग कहानी है मैरी कॉम की-प्रियंका चोपड़ा


-अजय ब्रह्मात्मज   
प्रियंका चोपड़ा निर्माता संजय लीला भंसाली की ओमंग कुमार निर्देशित ‘मैरी कॉम’ में शीर्षक भूमिका निभा रही हैं। इस भूमिका के लिए उन्हें शारीरिक और मानसिक मेहनत करनी पड़ी है। ‘मैरी कॉम’ तक के सफर में प्रियंका चोपड़ा का उत्साह कभी कम नहीं हुआ। फिल्मों के प्रभाव और सफलता-असफलता के अनुसार उन्हें सराहना और आलोचना दोनों मिली। सीखते-समझते हुए आगे बढऩे के साथ प्रियंका चोपड़ा ने नई विधाओं में भी प्रतिभा का इस्तेमाल किया। ‘मैरी कॉम’ के प्रति वह अतिरिक्त जोश में हैं। इस फिल्म को वह अपने अभिनय करिअर की उपलब्धि मानती हैं।
- इतने साल हो गए,लेकिन आप के उत्साह में कभी कोई कमी नजर नहीं आती। आखिर वह कौन सी प्रेरणा है,जो आप को सक्रिय और सकारात्मक रखती है?
0 मेरे लिए मेरा काम बहुत जरूरी है। जिस दिन काम की भूख खत्म हो जाएगी या असफलता का डर नहीं रहेगा,उस दिन शायद मैं काम करना बंद कर दूंगी। मैं अपने काम को आधात्मिक स्तर पर लेती हूं। फिल्मों में आई तो बच्ची थी। विभिन्न निर्देशकों के साथ काम करते हुए मैंने समझा कि एक्टिंग हुनर है। यह एक क्राफ्ट है। अभ्यास करने से ही हम बेहतर होंगे। अभी तो वैरायटी की फिल्में बन रही हैं। मेरे लिए किरदार लिखे जा रहे हैं। ‘फैशन’,‘सात खून माफ’,‘बर्फी’ और अभी ‘मैरी कॉम’ में मुझे अलग-अलग किरदार मिले। एक आसान रास्ता है कि मैं घिसी-पिटी फिल्में कर खुद को दोहराती रहूं। मुझे कमर्शियल मसाला फिल्मों से गुरेज नहीं है। मैं वैसी फिल्में भी करती रहूंगी ताकि ऐसी फिल्में कर सकूं। मेरे लिए यह संतुलन जरूरी है।
-दस साल पहले ऐसे पोस्टर की कल्पना नहीं की जा सकती थी,जिसके पोस्टर पर सिर्फ अभिनेत्री हो और वह भी अपने किरदार के पोज में। यह हिंदी फिल्मों का सहज विकास है या आप अभिनेत्रियों की उपलब्धि है?
0 यह तो और मुश्किल होता है ‘इन एंड ऐज’। पोस्टर दिखा कर मुग्ध होती हैं प्रियंका। इसमें दोनों का रोल है। अभी ऐसी अभिनेत्रियां आई हैं,जो हर जोखिम के लिए तैयार हैं। आप ने सुना होगा कि हीरोइनें पूछती हैं कि हीरो कौन है? वह भी जरूरी है। कुछ फिल्मों की कहानी पावरफुल होती है। दर्शक भी अच्छी कहानियां सुनने और देखने के लिए तैयार हैं। अभी ज्यादा एक्सपोजर हो चुका है। रायटर और फिल्ममेकर भी नए विषयों पर फिल्में बना रहे हैं। यह दौर हम अभिनेत्रियों और फिल्मों के लिए बहुत अच्छा है।
-‘मैरी कॉम’ को किस तरह की फिल्म कहें? क्या यह एक अचीवर की कहानी है या एक औरत की बॉयोपिक है या किसी औा श्रेणी की फिल्म है ?
0 यह एक ऐसे इंसान की कहानी है,जिसने सीमा में रहने से इंकार कर दिया। वह डिब्बाबंद नहीं रहना चाहती थी। चावल उगाने वाले किसान की बेटी होने के बावजूद बॉक्सर होने के ख्वाब देख सकती हूं। जिस साल भारत में महिलाओं की बॉक्सिंग आरंभ हुई,वह मैरी कॉम का भी पहला साल था। बंदिशों को तोड़ कर अपने बड़ेे सपनों के लिए कुछ भी करूंगी।  इस फिल्म से हर दर्शक जुड़ाव महसूस करेगा,क्योंकि हम सभी पर बंदिशें लगी रहती है।
-मैरी कॉम से हुई बातों-मुलाकातों में उनकी कौन सी बात आप को सबसे अच्छी लगी?
0 वह खुशमिजाज हैं। किसी की सहानुभूति नहीं चाहतीं। किसी भी लडक़ी के आत्मविश्वास के लिए गर्व सबसे जरूरी है। आत्मसम्मान की धनी है। मुझ में और उनमें कई समानताएं हैं।
-कुछ आलोचकों को लगता है कि यह फिल्म मशहूर हो चुकी मैरी कॉम का इस्तेमाल है? क्या कहेंगी?
0 अगर कोई इंसान परिचित और मशहूर है तो उसकी कहानी नहीं कही जानी चाहिए। मुझे लगता है कि लोग जजमेंटल हो गए है? फट से फैसले सुना देते हैं। मैरी कॉम अर्जुन पुरस्कार से सम्मनित सबसे कम उम्र की एथलीट हैं। वह किन परिस्थितियों से यहां तक आईं? मुझे नहीं मालूम कितने लोग उनके बारे में जानते हैं। यह एक मौका है उन्हें देखने और जाने का। मुझे मैरी कॉम की स्टोरी इसलिए अच्छी लगी कि उसने अपने घर-परिवार और समाज के साथ सब हासिल किया है। मैं उनके साथ रह चुकी हूं। उनकी कहानी इंस्पायरिंग है। लिजेंड होने के लिए लाइफटाइम बिताना जरूरी नहीं है। फिल्में एक बिजनेस भी हैं। हम ऐसी फिल्में चुनते और बनाते हैं,जो दर्शकों को पसंद आएं।
- लिविंग लिजेंड के बॉयोपिक में चेहरे की समानता आवश्यक होती है। क्या आप को लगता है कि दर्शक संतुष्ट होंगे?
0 हम दोनों एक जैसे नहीं लगते। पहले नार्थ ईस्ट के कलाकारों का ऑडिशन किया गया। यह फिल्म बड़े स्केल की हो गई तो उसके लिए ऐसे एक्टर की जरूरत पड़ी,जो बिजनेस के लिहाज से सही हो। छोटे स्तर पर बनती तो शायद रिस्क लिया जा सकता था। ओमंग और संजय सर ने सहायक भूमिकाओं मं नार्थ ईस्ट के कलाकारों को ही लिया गया है। मुझे उम्मीद है कि मैं दर्शकों को निराश नहीं करूंगी। इस फिल्म के जरिए नार्थ ईस्ट पहली बार हिंदी सिनेमा के मेनस्ट्रीम में आएगा। देश के आम दर्शक अपने ही देश के एक हिस्से को करीब से जानेंगे।



Monday, August 25, 2014

टीवी सीरिज ‘होमलैंड 4’ में निम्रत कौर


-अजय ब्रह्मात्मज
    2013 में आई फिल्म ‘लंचबाक्स’ में इला की भूमिका निभा कर मशहूर हुई निम्रत कौर हाल ही में अमेरिकी टीवी सीरिज ‘होमलैंड 4’ की आरंभिक शूटिंग कर लौटी हैं। इस टीवी सीरिज की शूटिंग दक्षिण अफ्रीका के शहर केप टाउन में चल रही है। वहां इस्लामबाद का सेट लगाया गया है। निम्रत कौर इस टीवी सीरिज में पाकिस्तानी आईएसआई अधिकारी तसनीम कुरेशी की भूमिका निभा रही हैं। पहले योजना थी कि इजरायल में ही शूटिंग की जाए।  बाद में इसे केपटाउन में शिफ्ट कर दिया गया। ‘होमलैंड’ इजरायली टीवी सीरिज का अमेरिकी संस्करण है। निम्रत कौर के मुताबिक केपटाउन में ही इस्लामबाद का सेट लगाया गया है। मेरा सारा काम यहीं होना है। ‘होमलैंड 4’ की कहानी पाकिस्तान और अफगानिस्तान में घूमती है।
      ‘होमलैंड’ इजरायली टीवी सीरिज का अमेरिकी संस्करण है। ‘होमलैंड’ एक अमेरिकी फौजी की कहानी है। अफगानिस्तान से उसे बचा कर लाया तो जाता है,लेकिन शक है कि वह आतंकवादियों का एजेंट बन गया है। युद्धवीर की सीधी तहकीकात नहीं की जा सकती,इसलिए अप्रत्यक्ष घेराबंदी की जाती है। ‘होमलैंड’ के तीन सीजन आ चुके हैं। तीनों सीजन अमेरिका के शोटाइम चैनल पर बहुत पॉपुलर रहे हैं। चौथे सीजन का प्रसारण 5 अक्टूबर से आरंभ होगा। चौथे सीजन के चौथे एपीसोड में निम्रत कौर नजर आएंगी और उसके बाद बारहवें एपीसोड तक रहेंगी। ‘होमलैंड’ का हर सीजन 12 एपीसोड का होता है।
    मजेदार घटना है कि हाल ही में निम्रत कौर पहली बार लंदन गई थीं। वहां उन्हें अपने एजेंट से ‘होमलैंड 4’ के ऑडिशन की जानकारी मिली। लंदन में पहले दिन ही उन्होंने ऑडिशन दे दिया। तब तक उन्होंने ‘होमलैंड’ के पिछले सीजन नहीं देखें थे। निम्रत कहती हैं,‘जब कुछ खास होना होता है तो यों ही हो जाता है। अमेरकी टीवी सीरिज में काम करने की कोई योजना नहीं थी,लेकिन अभी मैं उसकी शूटिंग कर रही हूं। मुंबई में ‘लंचबाक्स’ की रिलीज के बाद दर्जनों डायरेक्टर से मिल चुकी हूं और 30-32 स्क्रिप्ट पढ़ डाली। कहीं बात नहीं बनी। इंतजार में हूं कि अगली फिल्म शुरु हो। ‘लंचबाक्स’ पिछले साल 20 सितंबर को रिलीज हुई थी। लगभग एक साल हो गए। यह तो अच्छा हुआ कि ‘होमलैंड 4’ का ऑफर मिल गया।’
    निम्रत कौर समझ नहीं पातीं कि उन्हें उचित किस्म की हिंदी फिल्में क्यों नहीं मिल पा रही हैं? वह स्वीकार करती है कि शायद ‘लंचबाक्स’ को मिली सराहना से एक धारणा बन गई होगी। सभी को लगता होगा कि मैं घरेलू महिला की भूमिका के लिए ही उपयुक्त हूं। वह बताती हैं,‘फिल्मों से पहले जब मैं ऐड कर रही थी,तब दोस्त यही कहते थे कि तुम्हारा रेगुलर लुक नहीं है। तुम्हें हिंदी फिल्में कैसे मिलेंगी? मतलब मैं शहरी लगती हूं। अभी ‘लंचबाक्स’ कर ली तो यह धारणा सी बन गई है कि मैं इला जैसी ही भूमिकाएं कर सकती हूं। यह तो ज्यादती है। मैं अच्छी स्क्रिप्ट के इंतजार में हूं। मुझे बड़ी या छोटी फिल्म से फर्क नहीं पड़ता। मुझे अपना किरदार पसंद आना चाहिए। अभी कुछ निर्देशकों से बातें चल रही हैं। उनमें से एक निखिल आडवाणी हैं। उनके साथ एक फिल्म करूंगी। अपनी उम्र और लुक का सही एहसास है मुझे। मैं छरहरी हीरोइन नहीं हो सकती हूं। अभी इतनी तरह की फिल्में बन रही हैं। यकीनन कोई मेरी पर्सनैलिटी के हिसाब से स्क्रिप्ट लिख रहा होगा। बस,उसी स्क्रिप्ट की प्रतीक्षा है।’
    ‘होमलैंड 4’ से विदेशी फिल्मों और टीवी सीरिज के द्वार खुल सकते हैं ना? निम्रत कौर फिलहाल ऐसी हड़बड़ी में नहीं हैं। वह ‘होमलैंड 4’ के प्रसारण और उस पर मिली प्रतिक्रिया के बाद ही कोई बड़ा फैसला लेंगी। फिलहाल वह इस सीरिज में काम करने का आनंद उठा रही हैं। वह कहती हैं,‘उनके काम करने का तरीका बहुत अनुशासित है। सारी तैयारियां पहले हो चुकी होती हैं। इस सीरिज के निर्माता-निर्देशक चौकस रहते हैं। मुझे मालूम नहीं कि मेरा किरदार आगे क्या रूप लेगा। भारत की तरह वहीं भी टीवी सीरिज के किरदारों का भविष्य उनकी लोकप्रियता के अनुसार प्रभावित होता है।’ वह आगे जोड़ती हैं,‘स्वयं ‘लंचबाक्स’ अमेरिका और अन्य देशों में इतना पॉपुलर रहा और देखा-सराहा गया है कि हमें आरंभिक पहचान मिल गई है। अगर विदेशों में काम मिलता है तो क्यों नहीं करूंगी? अभी के दौर में कलाकारों के लिए अनेक अवसर हैं। पहला ब्रेक मिलने के बाद चीजें आसान हो जाती हैं। ’

Friday, August 22, 2014

फिल्‍म समीक्षा : मर्दानी

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
यशराज फिल्म्स की प्रदीप सरकार निर्देशित 'मर्दानी' में रानी मुखर्जी मुंबई पुलिस के क्राइम ब्रांच की दिलेर पुलिस इंस्पेक्टर शिवानी शिवाजी राव की भूमिका निभा रही हैं। इस फिल्म का नाम शिवानी भी रहता तो ऐसी ही फिल्म बनती और दर्शकों पर भी ऐसा ही असर रहता। फिल्म का टाइटल 'मर्दानी' में अतिरिक्त आकर्षण है। यशराज फिल्म्स और प्रदीप सरकार ने महज इसी आकर्षण के लिए सुभद्रा कुमारी चौहान की मशहूर कविता 'खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी' 'मर्दानी' शब्द ले लिया है। हिंदी फिल्मों के हाल-फिलहाल की फिल्मों से रेफरेंस लें तो यह 'दबंग' और 'सिंघम' की श्रेणी और जोनर की फिल्म है। फिल्मों की नायिका मर्दानी हो तो उसकी जिंदगी से रोमांस गायब हो जाता है। यहां रानी मुखर्जी पुलिस इंस्पेक्टर के साथ जिम्मेदार गृहिणी की भी भूमिका निभाती हैं। बतौर एक्टर स्क्रिप्ट की मांग के मुताबिक वह दोनों भूमिकाओं में सक्षम दिखने की कोशिश करती हैं। उन्हें बाल संवारने भी आता है। गोली चलाना तो उनकी ड्यूटी का हिस्सा है। उल्लेखनीय है कि किसी पुरुष पुलिस इंस्पेक्टर को फिल्मों में घरेलू काम करते हुए नहीं दिखाया जाता है, लेकिन वह महिला हो तो उसके क्रिया-कलाप में घरेलू काम दिखाए ही जाते हैं।
शिवानी शिवाजी राव या राय दबंग पलिस इंस्पेक्टर हैं। क्राइम ब्रांच की जरूरतों के मुताबिक वह खतरनाक अपराधियों को गिरफ्तार करने से लेकर उन्हें सबक सिखाने तक का काम कर्मठता से करती हैं। अपनी भाषा और लतीफों में वह किसी आम पुलिस अधिकारी की तरह ही गाली-गलौज इस्तेमाल करने से नहीं हिचकती। फिल्म का आरंभ बहुत ही सहज और नया है, लेकिन पहली भिडंत के साथ ही 'मर्दानी' आम पुलिसिया फिल्मों की तरह लकीर की फकीर हो जाती है। सिर्फ एक ही फर्क रहता है कि यहां पुलिस इंस्पेक्टर महिला है। बाकी उसके बात-व्यवहार और काम करने के तरीके में कोई फर्क नहीं होता। हालांकि फिल्म का खलनायक कहता है कि औरतें सभी बातों को पर्सनल ले लेती हैं। उसे कहना चाहिए था कि मुख्य किरदार किसी घटना को पर्सनली लेने पर ही एक्टिव होते हैं। शिवानी की दत्तक पुत्री प्यारी का अपहरण नहीं हुआ रहता तो शायद उसे चाइल्ड ट्रैफिकिंग के बारे में पता भी नहीं चलता। प्यारी को हासिल करने के चक्कर में वह चाइल्ड ट्रैफिकिं ग और ड्रग्स के अवैध कारोबार के का पर्दाफाश करने की मुहिम में शामिल हो जाती है।
इस फिल्म का मकसद रानी मुखर्जी की प्रतिभा के आयाम और विस्तार कि चित्रध के लिए ही किया गया है। लेखक-निर्देशक की कोशिश किरदार को निखारने से अधिक कलाकार को मौके देने की रही है। इस प्रयास में किरदार और कलाकार की संगत टूटती है। इसका एक फायदा हुआ है कि फिल्म के खलनायक को पहचान मिल गई है। वाल्ट के किरदार में ताहिर राज भसीन अपनी अदायगी से ध्यान खींचते हैं। निश्चित ही उन्होंने इस किरदार को खास बना दिया है। वाल्ट की क्रूरता उसकी सहजता में ज्यादा उभरी है। फिल्म में वकील की भूमिका निभा रहे कलाकार ने भी ऐसे चालू किरदार को अलग अंदाज दिया है। रानी मुखर्जी जांबाज पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका के लिए आवश्यक स्फूर्ति का प्रदर्शन करती हैं। उन्हें एक्शन और खलनायक से अकेले भिडऩे का भी मौका मिला है, लेकिन वह नियोजित और साधारण दिखता है। रानी की खूबी संवाद अदायगी और शिवानी के किरदार की पेशगी में है। रानी ने शिवानी के किरदार को मर्दानी बनाने में जी-तोड़ मेहनत की है। महिला होने के वजह से उन्हें गर्दा उड़ाऊ और धरतीछोड़ एक्शन नहीं दिए गए हैं।
हालांकि फिल्म में चाइल्ड ट्रैफिकिंग के आंकड़े और रेफरेंस देकर फिल्म को मुद्दापरक बताने की कोशिश है, लेकिन पूरी फिल्म मसाला एंटरटेनमेंट की चालू परंपरा का महिला संस्करण है। नायिका प्रधान होने के बावजूद यह महिला प्रधान फिल्म नहीं है। फिल्म के अंत में औरतों के एहसास और आत्मानूभूति से प्रेरित एक स्त्री गान भी है, जो फिल्म के मनोरंजक प्रभाव को जबरदस्ती फेमिनिस्ट रंग देने की असफल कोशिश करता है। प्रदीप सरकार 'परिणीता' के बाद के दो असफल प्रयासों के पश्चात 'मर्दानी' में रानी मुखर्जी की मदद से थोड़े रंग मे दिखते हैं।
अवधि-114 मिनट
*** तीन स्‍टार 

फिल्‍म समीक्षा : मैड अबाउट डांस

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
 पांच रुपैया बारह आना प्रोडक्शन की 'मैड अबाउट डांस' साहिल प्रेम की पहली फिल्म है। पहली फिल्म में अभिनय के साथ लेखन और निर्देशन की भी जिम्मेदारी उन्होंने संभाली है। डांस जोनर की यह फिल्म किशोर और युवा दर्शकों की रुचि का खयाल रखती है। साहिल प्रेम ने ऐसी फिल्मों की परंपरा में ही कुछ नया करने की कोशिश की है। डांस जोनर की फिल्मों में नायक या नायिका शिद्दत से डांस के जरिए अपने पैशन को पूरा करना चाहते हैं। प्राइज मनी और शोहरत से ज्यादा उनका इंटरेस्ट श्रेष्ठ होने की तरफ रहता है। साहिल प्रेम की फिल्म में आरव आनंद की ख्वाहिश है कि वह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ डांसर सीजर के ग्रुप में शामिल हो।
भारतीय माता-पिता अभी तक गैरपारंपरिक पढ़ाई और पैशन को नजरअंदाज कर अपने बज्चों को परिचित पेशों में जाने के उद्देश्य से पड़ाई करने की व्यावहारिक सलाह देते हैं। हिंदी फिल्मों और समाज में अब यह दिखने लगा है कि बच्चे अपनी जिद्द किसी बहाने या सीधे तरीके से पूरी करना चाहते हैं। आरव भी किसी और पढ़ाई के बहाने विदेश में सीजर के शहर पहुंचता है। उसका एक ही मकसद है कि वह सीजर से मिल ले और उसके ग्रुप में शामिल हो जाए। परिस्थितियां कुछ ऐसी बनती हैं कि वह सीजर के मुकाबले में आ जाता है। डांस कंपीटिशन में उसे सीजर के ग्रुप को हराना है। इस मुश्किल काम में इमोशन भी जोड़ दिए गए हैं।
साहिल प्रेम की 'मैड अबाउट डांस' में डांस के प्रति आरव की दीवानगी को अच्छी तरह चित्रित किया गया है। आरव के सामने अनेक चुनौतियां हैं। अपने मित्रों की मदद से वह उन चुनौतियों के बीच ही अपना ग्रुप तैयार करता है। यह फिल्म आरव के संघर्ष के साथ ही भारतीय और एशियाई मूल के लोगों के प्रति श्वेतरंगी समुदाय की श्रेष्ठ ग्रंथि को भी दर्शाती है। एक दूश्य में आरव को 'ब्राउनी' संबोधित करते हुए एक श्वेत किरदार कहता भी है कि तुम लोग टैक्सी चलाने, रसोई बनाने और बैरे के काम करने के उपयुक्त हो। डांस करना तुम्हारा काम नहीं है। यह प्रतिक्रिया कहीं न कहीं हमारे समाज की कमियों की तरफ भी इशारा करती है,जहां अभी तक परफॉर्मेंस की विधाओं को पेशेवर नहीं माना जाता। बहरहाल,आरव अपने ग्रुप के साथ साबित करता है कि पैशन और प्रैक्टिस से 'ब्राउनी' भी डांस में विजय हासिल कर सकते हैं।
साहिल प्रेम लेखन और निर्देशन के पहले प्रयास में उम्मीद जगाते हैं। आरव की भूमिका निभा रहे साहिल प्रेम में अपने किरदार की चपलता और एनर्जी है। उन्होंने सहयोगी कलाकारों के चुनाव में उनके नृत्य कौशल का ध्यान रखा है। यही वजह है कि डांस के सभी सिक्वेंस में गति और ऊर्जा नजर आती है। साहिल प्रेम नाटकीय और संवाद के दृश्यों में थोड़े अनगढ़ हैं, जिसकी भरपाई वह अपने डांस से कर देते हैं। नायिका के तौर पर अमृत मघेरा ने उनका बराबर साथ दिया है। आरव के अमीर और जिंदादिल दोस्त के रूप राशुल आनंद अपने किरदार और अदायगी की वजह से याद रह जाते हैं।
अवधि:125 मिनट
**r1/2 ढाई स्‍टार 

Thursday, August 21, 2014

दरअसल : बदल रहे हैं प्रचार के तरीके


-अजय ब्रह्मात्मज
    कुछ सालों पहले तक प्रचार के सामान्य तरीके थे। फिल्म आने के पहले टीवी पर प्रोमो आने लगते थे। सिनेमाघरों में ट्रेलर चलते थे। रिलीज के एक हफ्ते पहले से शहरों की दीवारों पर फिल्म के पोस्टर नजर आने लगते थे। मीडिया के साथ फिल्म यूनिट के सदस्यों की बातचीत रहती थी,जिसमें फिल्म के बारे में कुछ नहीं बताया जाता था। आज भी नहीं बताया जाता। फिल्म सिनेमाघरों में लगती थी। कंटेंट और क्वालिटी के दम पर फिल्म कभी गोल्डन जुबली तो कभी सिल्वर जुबली मना लेती थी। कुछ फिल्में डायमंड जुबली तक भी पहुंचती थीं। तब कोई नहीं पूछता और जानता था कि फिल्म का कलेक्शन कैसा रहा? सभी यही देखते थे कि फिल्म कितने दिन और हफ्ते चली। फिर एक समय आया कि 100 दिनों के सफल प्रदर्शन के पोस्टर लगने लगे। समय बदला तो प्रचार के तरीके भी बदले।
    बीच के संक्रमण दौर को छलांग कर अभी की बात करें तो यह आक्रामक और महंगा हो गया है। फिल्म आने के चार-पांच महीने पहले से माहौल तैयार किया जाता है। अभी सारा जोर जानकारी से अधिक जिज्ञासा पर रहता है। माना जाता है कि दर्शकों की क्यूरोसिटी बढ़ेगी तो वे सिनेमाघरों में आएंगे। क्यूरोसिटी बढ़ाने के लिए कतई जरूरी नहीं है कि फिल्म की बात की जाए। यह काम किसी भी प्रकार की एक्टिविटी से किया जा सकता है। धार्मिक स्थानों में मत्था टेकने से लेकर नाचने-गाने तक के आयोजन किए जा सकते हैं। हमेशा कोशिश यही रहती है कि चर्चा हो। अखबारों और चैनलों में बगैर पैसे खर्च किए फिल्म,फिल्म के कलाकारों और उनसे संबंधित बातें होती रहें। इन दिनों टीवी प्रचार का सशक्त और असरदायक माध्यम हो गया है। टीवी में भी चल रहे गेम शोज,टॉक शोज,कामेडी शोज और नियमित धारावाहिकों में फिल्म के कलाकारों को शामिल किया जाता है। इन दिनों छोटे-बड़े हर स्टार कामेडी नाइट्स विद कपिल में जरूर शामिल होते हैं। कई आर आप महसूस कर सकते हैं कि वहां अपनी मौजूदगी पर वे झेंप रहे हों।
    फिल्मों का प्रचार निरंतर महंगा होता जा रहा है। पहले फिल्म के बजट का एक छोटा हिस्सा ही प्रचार में खर्च किया जाता था। कुल लागत का का 5-10 प्रतिशत ही पर्याप्त माना जाता था। अभी यह खर्च बढ़ कर फिल्म के बजट से ज्यादा हो जाता है। छोटी फिल्मों को भी इस मद में 4-5 करोड़ खर्च करना ही पड़ता है,जबकि कई बार उनकी लागत इस रकम से कम होती है।  खानत्रयी और अन्य पॉपुलर स्टारों की कथित बड़ी फिल्मों के खर्च का अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है,क्योंकि इसमें उन स्टारों के महंगे दिन भी शामिल रहते हैं। इन दिनों अधिकांश बड़े स्टार अपनी फिल्मों के सहनिर्माता या लाभांशी होते हैं,इसलिए वे बगैर हीज-हुज्जत के प्रचार के लिए समय देते हैं। प्रचार की कमान मुख्य रूप से हीरो के हाथों में रहती है। उसी का स्टारडम दांव पर लगा रहता है। ओम शांति ओम के समय से शाह रुख खान ने आक्रामक प्रचार की शुरुआत की। अभी श्ह इस स्थिति में पहुंच गया है कि सभी स्टारों को लोहे के चने चबाने पड़ रहे हैं। सभी एक-दूसरे पर तोहमत लगाते हैं,लेकिन कोई भी पीछे नहीं हटता।
    सलमान खान की किक आकर सफल हो चुकी है। वे अगली फिल्म तक आराम कर सकते हैं। अभी शाह रुख और आमिर की बारी है। आमिर की फिल्म पीके के पोस्टर पर बेहिसाब बवाल हो चुका है। कुछ आलोचकों को लगता है कि पीके की टीम ने अश्लीलता का सहारा लिया है। उसके पक्ष-विपक्ष में तर्क दिए जा रहे हैं,इस बहसबाजी से पीके चर्चा के केंद्र में आ गई है। शाह रुख क्यों पीछे रहते। उन्होंने अपनी फिल्म का ट्रेलर भव्य स्तर पर लांच किया। यह अभी तक की सबसे विशाल और भव्य लांचिंग रही। शाह रुख मानते हैं कि उनकी फिल्मों से जुड़ा हर कार्यक्रम एक इवेंट हो। वे फिल्म को भी मनोरंजक इवेंट की संज्ञा देते हैं।

Tuesday, August 19, 2014

दरअसल : आत्मकथा दिलीप कुमार की


-अजय ब्रह्मात्मज
    पिछले दिनों दिलीप कुमार की आत्मकथा आई। इसे उनकी विश्वस्त फिल्म पत्रकार उदयतारा नायर ने लिखा है। दिलीप कुमार ने उन्हें अपनी जिंदगी के किस्से सुनाए हैं। ऐसी आत्मकथाओं में लेखक की संलग्नता अंदरुनी नहीं रहती। खुद के बारे में लिखते हुए जब लेखक रौ में आता है तो कई बार उन प्रसंगो और घटनाओं के बारे में अनायास लिख जाता है,जिन्हें उसका सचेत मन लिखने से रोकता है। इन बहके उद्गारों में ही लेखक का जीवन निर्झर और अविरल बहता है। बताते और लिखवाते समय अक्सरहां लेखक खुद ही अपने जीवन को एडिट करता जाता है। वह नहीं चाहता कि कोई आहत हो या स्वयं उसकी अर्जित छवि में कोई दाग नजर आए। उदयतारा नायर को बताई गई इस आत्मकथा में यह दिक्कत बार-बार आती है। जीवन में ही किंवदंती बन चुके दिलीप कुमार के बारे में हम इतना जानते हैं कि इस आत्मकथा में चुनिंदा तरीके से कुछ प्रसंगों का जिक्र तक न होना खलता है।
    445 पृष्ठों की इस किताब में उदयतारा नायर ने स्वयं दिलीप कुमार के हवाले से उनके जीवन के अनसुने पहलुओं का उजागर किया है। परिवार के प्रति उनका समर्पण देखते ही बनता है। अपनी लोकप्रियता और व्यस्तता के बावजूद उन्होंने पारिवारिक जिम्मेदारियों से कभी मुंह नहीं मोड़ा। हाल ही में उनके भाइयों ने उन पर एक मुकदमा किया कि अपने वायदे से वे मुकर रहे हैं,जबकि जिंदगी भर वे दिलीप कुमार के आसरे ही रहे। दिलीप कुमार में गजब की सलाहियत है। वे पुरानी पीढ़ी के सही प्रतिनिधि हैं। हां,कुछ प्रसंगों का इस आत्मकथा में न होना नागवार गुजरता है। उन्हें मधुबाला के प्रसंग में अवश्य विस्तार से बताना चाहिए था। समय बीतने के साथ ये तथ्य भी ऐतिहासिक दस्तावेज बन जाते हैं। उन्होंने अपनी दूसरी पत्नी आसिमा का भी जिक्र नहीं किया है। इसके साथ ही वे कामिनी कौशल के साथ अपने संबंधों के खुलासे में नहीं गए हैं।
    आत्मकथा ‘दिलीप कुमार- द सब्सटांस एंड शैडो’ के मुताबिक दिलीप कुमार ने कुल 62 फिल्मों में काम किया। उनकी पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा’ 1944 में आई थी। बांबे टाकीज की इस फिल्म को अमिय चक्रवर्ती ने डायरेक्ट किया था। इसमें उनकी नायिका मृदुला थीं। उनकी आखिरी फिल्म रेखा के साथ 1998 में आई ‘किला’ थी,जिसका निर्देशन उमेश मेहरा ने किया था। दिलीप साहब की कोई फिल्म 1998 के बाद नहीं आई है। उन्होंने अपनी पत्नी सायरा बानो के साथ 1970 में पहली फिल्म ‘गोपी’ की थी। उन्होंने वैजयंती माला के साथ सबसे अधिक 7 फिल्में कीं। ऐसी 13 फिल्में हैं,जिनकी घोषणा और शूटिंग तो हुई,लेकिन वे कभी पूरी नहीं हो सकीं। आज के अभिनेताओं को आश्चर्य होता है कि कैसे सिर्फ 62 फिल्में कर भी कोई दर्शकों की यादों में बना रह सकता है। दिलीप कुमार को अभिनय की पाठशाला कहा जाता है। अमिताभ बच्चन ने तो उनके प्रभाव को स्वीकार किया है। ऐसे अनेक कलाकार भी हैं,जिन्होंने जिंदगी भर उनकी नकल की। अपना नाम रोशन किया और जगह बनाई। दिलीप कुमार हिंदी फिल्मों के उन अभिनेताओं में से हैं,जिनकी शैली शुद्ध भारतीय रही। उन्होंने कभी किसी की नकल नहीं की। वे हिंदी फिल्मों के मौलिक कलाकार हैं।
    इस किताब का रोचक हिस्सा हिंदी फिल्मों के सितारों और दिलीप कुमार के अन्य परिचितों का उनके बारे में लिखना है। सभी ने अपने अनुभव और धारणाओं को साझा किया है। दिलीप कुमार की आत्मकथा सायरो बानो की क्षेपक कथा भी हो गई है। सायरा बानो और उदयतारा नायर के दृष्टिकोण से लिखी इस आत्मकथा में कुछ और जरूरी बातें होनी चाहिए थीं। फिल्मों पर छिटपुट रूप से उन्होंने भिन्न प्रसंगों में कुछ-कुछ कहा है। अच्छा होता कि एक अध्याय उनके अभिनय और उनके समय के अन्य कलाकारों पर रहता।

दिलीप कुमार-द सब्सटांस एंड द शैडो
ऐज टोल्ट टू उदयतारा नायर
प्रकाशक-हे हाउस इंडिया
मूल्य-699 रुपए
   

Monday, August 18, 2014

अब तक गुलजार

        गुलजार साहब से कई बार मिलना हुआ। उनके कई करीबी अच्‍छे दोस्‍त हैं। गुलजार से आज भी अपरिचय बना हुआ है। अक्‍सरहां कोई परिचित उनसे मिलवाता है और वे तपाक से मिलते हैं। हर बार लगता है कि पहला परिचय हो रहा है। इस लिहाज से मैं वास्‍तव में गुलजार से अपरिचित हूं। यह उम्‍मीद खत्‍म नहीं हुई है कि उनसे कभी तो परिचय होगा। 
         आज उनका जन्‍मदिन है। गुलजार के प्रशंसकों के लिए उनसे संबंधित सारी एंट्री यहां पेश कर रहा हूं। चवन्‍नी के पाठक अपनी मर्जी से चुनें और पढ़ें। टिप्‍पणी करेंगे तो अच्‍छा लगेगा।
        अतृप्‍त,तरल और चांद भावनाओं के गीतकार गुलजार को नमन। वे यों ही शब्‍दों की कारीगरी करते रहें और हमारी सुषुप्‍त इच्‍छाओं का कुरेदते और हवा देते रहें। 


हमें तो कहीं कोई सांस्कृतिक आक्रमण नहीं दिखता - गुलजार 

एक शायर चुपके चुपके बुनता है ख्वाब - गुलजार

निराश करती हैं गुलजार से अपनी बातचीत में नसरीन मुन्‍नी कबीर

सोच और सवेदना की रंगपोटली मेरा कुछ सामान

कुछ खास:पौधा माली के सामने इतराए भी तो कैसे-विशाल भारद्वाज

श्रीमान सत्यवादी और गुलजार

 

 

 

 

Sunday, August 17, 2014

छह लूजर्स का ख्वाब है ‘हैप्पी न्यू ईयर’- शाह रुख खान


-अजय ब्रह्मात्‍मज 
- आजादी की पूर्व संध्या पर ट्रेलर लाने का कोई खास मकसद है क्या?
0 इसके टेक्निकल कारण हैैं। ‘सिंघम रिटर्न्‍स’ 15 अगस्त को रिलीज हो रही है। इसी के साथ ‘हैप्पी न्यू ईयर’ का ट्रेलर आ रहा है। वितरक और मार्केटिंग टीम ही यह फैसला करती है। फिल्म का एक अलग पहलू भी है, इसमें कमर्शियल हैप्पी पैट्रियटिक फील है। ‘हैप्पी न्यू ईयर’ बहुत बड़ी फिल्म है। इसमें फन, गेम और फुल एंटरटेनमेंट है। आमतौर पर बॉलीवुड की फिल्मों के बारे में दुष्प्रचार किया जाता है कि वे ऐसी होती हैैं, वैसी होती हैैं। फराह खान ने जब इस फिल्म की स्टोरी सुनाई, तभी यह तय किया गया कि बॉलीवुड के बारे में जो भी अच्छा-बुरा कहा जाता है, वह सब इस फिल्म में रहेगा। बस इसे इंटरनेशनल स्तर का बनाना है। पूरे साहस के साथ कहना है, जो उखाडऩा है, उखाड़ लो। हम यहीं खड़े हैैं। इस फिल्म में गाना है, रिवेंज है, फाइट है, डांस है... अब चूंकि समय बदल गया है, इसलिए सभी चीजों के पीछे लॉजिक भी है। उन्हें थोड़ा रियल रखा गया है। अब ऐसा नहीं होगा कि कमरा खोला और स्विटजरलैैंड पहुंच गए। हमने ऐसा विषय चुना, जिसमें बॉलीवुड के सभी तत्व डाले जा सकें। फिल्म के अंदर इंडिया वाले कांसेप्ट बहुत महत्वपूर्ण है। यह अच्छा संयोग है कि स्वतंत्रता दिवस के एक दिन पहले हम लोग ट्रेलर लेकर आ रहे हैैं।
- क्या कांसेप्ट है इंडिया वाले का? आपकी एक पुरानी फिल्म है, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी?
0 फिर भी दिल है हिंदुस्तानी मीडिया पर थी। इंडिया वाले के पीछे दो बातें हैैं। अमूमन लोग विजेताओं पर फिल्में बनाते हैैं। जो जीत जाते हैैं, कुछ हासिल करते हैैं, हम उनकी ही फिल्में बनाते हैैं। वे इंस्पायरिंग और हीरो होते हैैं। हमने लूजर्स की कहानी कही है। पहले के हीरो बहुत अच्छे होते थे। हमारे हीरो हर तरह से हारे हुए हैैं। उन सभी के पास कुछ ख्वाब है, जिन्हें वे पूरा करना चाहते हैैं। यह पहली फिल्म होगी, जो लूजर्स होने का जश्न मनाती है। आप थक गए हों, हार गए हों तो भी अपने ख्वाबों को पूरा करने की साकारात्मकता रहनी चाहिए।
- आपके लिए लूजर्स का रोल प्ले करना बहुत मुश्किल रहा होगा। 
0 मैैं लूजर्स होने का मतलब समझता हूं,इसीलिए मैैं विनर हूं। हार की समझ हो, तभी आप जीत सकते हैैं। हम जिंदगी में बहुत कुछ खोते हैैं। हर किसी का अपना एक लेवल होता है। हम लोगों का खोना 100 करोड़ का होता है। हार को मैैंने करीब से देखा है। आईपीएल में हारता रहा हूं। ‘हैप्पी न्यू ईयर’ में एक लाइन है। दुनिया में हर तरह के लोग होते हैैं, काले-गोरे, बड़े-छोटे, सच्चे-झूठे, मेरे खयाल से यह विभाजन सही नहीं है। दुनिया में दो ही तरह के इंसान होते हैैं। एक विनर और दूसरा लूजर। जिंदगी हर हारने वाले को एक मौका जरूर देती है, जब वह जीत सके। यह कहानी उन सभी की है। गौर करें तो दुनिया में ज्यादातर लोग लूजर हैैं, लेकिन उनकी खुशियों पर कोई गौर नहीं करता। बहुत कम लोग ही सफल होते हैैं। एक-दो ही स्टीब जॉब होते है। लूजर की हार को भी सेलीब्रेट करना चाहिए। ‘हैप्पी न्यू ईयर’ लूजर्स की हार को सेलिब्रेट करती है।
- अपने पिता को भी आप सफल फैल्योर कहते रहे हैैं?
0 मैैं उनसे बहुत प्रभावित हूं। उनकी भद्रता, शिक्षा और उनके सबक। प्रभाव की वजह शायद यह भी हो सकती है कि वे हमें छोडक़र जल्दी चले गए। वे बहुत ही योग्य, सुंदर और त्याग करने वाले व्यक्ति थे। वे स्वतंत्रता सेनानी थे। आजादी के लिए उन्होंने अपना परिवार छोड़ दिया। शायद उन्हें मालूम था कि वह जो हासिल कर सकते हैैं, वह सब वे नहीं कर पाएंगे। फिर भी उन्होंने हमें मूल्य दिए। हमेशा यही कहते थे कि धोखा मत देना। घटियापन, छिछोरापन नहीं करना, बदतमीजी नहीं करना। पठान होने के बावजूद वे यह सब सिखाते थे। आमतौर पर पठानों में ये गुण नहीं होते। वे बहुत ही विनम्र और सुशील थे। मैैं पूर गर्व से कहता हूं कि वे दुनिया के सफलतम फैल्योर थे। इसके बावजूद मैैं उन्हें लूजर नहीं कहूंगा, क्योंकि उनकी सारी सफलताएं मुझे मिली हैैं। उनकी शिक्षा से ही मैैं सफल हुआ, उनका सिखाया बेकार नहीं गया।
- आपके अमेरिका टूर स्लैम में भी क्या इंडिया वाले कांसेप्ट ही रहेगा?
0 नहीं। पिछले 10 सालों से मैैं किसी वल्र्ड टूर नहीं गया। इसमें फिल्म के यूनिट के लोग जरूर हैैं, लेकिन हम सिर्फ अपनी ही फिल्म ‘हैप्पी न्यू ईयर’ पर परफॉर्म नहीं करेंगे। सभी की राय थी कि हम लोग वल्र्ड टूर पर चलें। मुझे भी लगा कि मेरी फिल्म में हीरो-हीरोइन और बाकी टैलेंट हैैं तो उन सभी के साथ क्यों न एक टूर किया जाए। हम सुष्मिता सेन को भी शामिल करना चाह रहे थे। ‘मैैं हूं ना’ से उनके साथ एसोसिएशन रहा है, लेकिन वह कहीं शूटिंग कर रही हैैं। व्यस्त हैं। हम लोग छह शो करेंगे। मैैं अमूमन 18 शो करता हूं। इस टूर को ‘हैप्पी न्यू ईयर’ टूर कहना ठीक नहीं होगा,इसीलिए हम ने इसे स्लैम नाम दिया है। हां, सभी को एक साथ देखकर लोगों को ‘हैप्पी न्यू ईयर’ का खयाल आएगा। फिल्म के प्रचार के लिए हमें जाना ही है। उसमें रेगुलर सवाल के जवाब देने से बेहतर है कि हम परफॉर्म और एंटरटेन करें। तब तक अगर ’हैप्पी न्यू ईयर’ के गाने आ गए तो उन पर भी परफॉर्म करेंगे। यह ढाई घंटे का एंटरटेनिंग पैकेज होगा।  मैैं, अभिषेक, दीपिका, सोनू, फराह, डिनो और बोमन ईरानी के अलावा कुछ और लोग भी होंगे। जैकी श्राफ को भी निमंत्रित करूंगा।
- क्या आप अच्छे लूजर हैैं? 3
0 मैैं अच्छा लूजर हूं। मैैं खिलाड़ी रहा हूं। खेल में हमेशा जीतते ही नहीं हैैं। खेल बताता है कि आप हार को कैसे स्वीकार करते हैैं। क्रिकेट और फुटबाल में हार जाता था तो टीचर कहते थे, तुम कल जीतोगे। माइकल जार्डन ने कहा था,मैं बार-बार हारता हूं,बार-बार गलत हो जाता हूं,एक टीम के तौर पर इतना हार चुका हूं कि मैंने जीत सीख ली है। लूजर होने के बाद यह सबक मिलता है कि इस एहसास से निकलने के लिए कल अलग तरीके से खेलना होगा। मैैं गुड लूजर हूं। मैँ बैड लूजर नहीं हूं। निजी तौर पर उदास हो जाऊंगा, परेशान रहूंगा, दुख तो पहुंचता ही है। कोई काम करें आप और वह लोगों को पसंद न आए, अच्छी न जाए। हमारा काम इतना तनाव से भरा होता है। सभी कहते हैैं कि यह कला है, लेकिन यह कला लोगों की पसंद-नपसंद पर निर्भर करती है। मेरे खयाल में कला के साथ आर्थिक विचार नहीं जुड़ा होना चाहिए। कविता तो कविता होती है, कोई कविता 250 या 500 रुपए की कैसे हो सकती है? यह कहने में ही घटिया लगता है। लेकिन फिल्मों के साथ अलग मामला है। हम 150-300 करोड़ की फिल्में बना रहे हैैं। हम ऐसी विवश स्थिति में हैैं।
- क्या सफलता और समृद्धि आपके लिए जुड़ी हुई चीजें नहीं हैैं? 3
0 बिल्कुल नहीं। मैैंने बहुत पैसे बनाए हैैं। मैैं सफल भी हूं। अल्लाह का फजल है। मैैं खुशकिस्मत हूं। मैैं आपको इंटरव्यू दे सकता हूं कि मुझे बिजनेस की अच्छी समझ है। जब चल पड़ती है, तब खूब चलती है। वजह और बहाने एक ही जैसी चीजें हैैं। जीतने की वजह लोग बताते हैैं और हारने के बहाने बताते हैैं। और दोनों में से कोई भी सही नहीं होता।
- आप हमेशा यह कहते रहे हैैं कि आपको बिजनेस की ज्यादा जानकारी नहीं है। लेकिन स्मार्ट बिजनेसमैन का तमगा आपको ही मिला है? आक्रामक प्रचार का तरीका आपने ही शुरू किया।
0 दो बातें हैैं, मैैं अपनीे बिजनेस टीम के साथ बैठता हूं तो वे कई योजनाएं लेकर आते हैैं। मैैं उन्हें सुनकर कुछ बता देता हूं। कुछ सुझा देता हूं। चल पड़ती है तो क्रेडिट मुझे मिल जाता है। मेरे खयाल में बड़े सिनेमा का एक्सपीरियंस ऐसा होना चाहिए कि सभी खुश हों। वरना लोग टीवी या लैपटॉप पर फिल्में देखने लगेंगे। फिल्म की वह इज्जत हो कि उसे सिनेमाघर में ही देखा जाए। हमारे यहां जिंदगी डिब्बों में होती है। हम लोग अपने परिवारों में सब कुछ डिब्बों और पैकेट्स में बंद कर के रखते हैैं। गहने, जेवर, बच्चों के कपड़े, अपने कपड़े... सब कुछ संजोकर डब्बे में रखते हैैं। अपने पहले लेख, पहली किताब, पहला सब कुछ संजोने की कोशिश करते हैैं। अगर उन्हें डब्बे में न रखें या डब्बे इधर-उधर हो जाएं तो हम डर जाते हैैं। हमें उन सभी चीजों से दिक्कत होती है, जिन्हें हम डब्बाबंद या श्रेणीबद्ध नहीं कर पाते। हम श्रेणीबद्ध या रेफरेंस से जोडक़र सुरक्षित महसूस करते हैैं। मुझे जो तमगे मिले या दिए गए हैैं, उनके बारे में मुझे भी नहीं मालूम। कुछ हो जाता है और लोग समझ नहीं पाते तो तमगे दे देते हैैं। मैैं आज तक नहीं समझ पाया कि मैैं कैसी फिल्में करता हूं। यह लोग मुझे समझा देते हैैं। सभी की इच्छा रहती है कि वे हर चीज समझ लें और समझा दें। मैैं सब कुछ करता हूं और चल भी रहा हूं। इसे समझने की कोशिश में लोग अलग-अलग चीजों को श्रेय देते हैैं। कभी कोई कहता है कि इसकी पीआर टीम बहुत अच्छी है। कभी किसी को लगता है कि मैैं खुद ही कुछ कमाल कर देता हूं। मैैं एक्टर हूं। मुझ इस तरह के तमगे अच्छे लगते हैैं। जब तक लोग समझ नहीं पाएंगे, तब तक लोग तमगे देते रहेंगे। इसकी वजह से मेरे साथ जुड़ा रहस्य बरकरार रहता है। जो लोग बाहर से देखते-समझते हैैं, उनकी धारणा कुछ और होती है। जो लोग आसपास रहते हैैं, वे लोग मुझे थोड़ा-बहुत समझ पाते हैैं। कई पत्रकार पहले से कुछ सोचकर इंटरव्यू करने आते हैैं। मैैं उनके सवालों से समझ जाता हूं और फिर वैसा ही इंटरव्यू दे देता हूं। उन्हें खुश कर देता हूं। मुझे आप बता दें, मैैं वैसा ही इंटरव्यू दे दूंगा। अभी आप लोगों के साथ इंटरव्यू नहीं कर रहा हूं। यह तो बातचीत हो रही है। इसके पहले अनुपम खेर के शो में उनके साथ बातचीत कर रहा था। कई बार लोग कुछ निकालने की कोशिश में अजीब से सवाल पूछते हैैं तो मैैं स्मार्ट सा जवाब देकर उन्हें खुश कर देता हूं। अब कोई पूछे कि मैैं सुबह उठकर क्या बनना चाहूंगा तो उसे क्या जवाब दिया जा सकता है। फिर भी मैैं कुछ चटपटा-सा जवाब देता हूं।
- अभी आपकी उम्र के सारे हीरो सोलो हीरो की फिल्में कर रहे हैैं। ऐसे दौर में ‘हैप्पी न्यू ईयर’ जैसी फिल्म लेकर आना कुछ नया है? ऐसा एंसेबल कास्ट जमा करने की जरूरत क्यों महसूस हुई?
0 इस फिल्म में न केवल सारे कलाकारों को प्रमुख भूमिका मिली है। पोस्टर पर भी हम सभी साथ नजर आएंगे। सच कहूं तो अपने प्रोडक्शन में अभी तक मैैंने खुद के लिए कोई फिल्म नहीं बनाई। कभी यह नहीं सोचा कि यह मेरी खासियत है और मुझे ऐसी ही फिल्म करनी चाहिए। अभी मैैंने खुद के लिए फिल्में बनाना शुरू ही नहीं किया है। अभी मैैं ऐसी फिल्में चुनता हूं, जिनमें कुछ अलग-अलग कर सकूं। वही फिल्म करता हूं, जिन्हें करते हुए मजा आता है। वैसे लोगों के साथ करता हूं, जिनके साथ काम करना अच्छा लगता है। फराह यह फिल्म सुनाते समय आशंकित थीं कि तुम यह फिल्म क्यों करोगे? ऐसी फिल्म का हिस्सा क्यों बनोगे, जिसमें सभी के रोल बराबर हों। इस फिल्म में एक भी कैरेक्टर ऐसा नहीं है, जिसका रोल एक-दूसरे से कम या ज्यादा हो। सबका कमोबेश बराबर ही है।  इस फिल्म का कोई हीरो है ही नहीं। रोमांटिक एंगल होने की वजह से कह सकते हैैं कि मैैं हीरो हूं। हीरोइन मुझे मिलती है। यह छह लोगों की कहानी है। मैैंने शुरू में ही कह दिया था कि पोस्टर में कोई अकेला नहीं आएगा, टे्रलर में अकेला नहीं आएगा, बात कोई अकेले नहीं करेगा। हम सभी साथ में बोलेंगे। सभी का रोल समान है। ‘हैप्पी न्यू ईयर’ छह लूजरों की कहानी है। मैैं अभी कॉमेडी और एक्शन फिल्में नहीं करना चाहता हूं। क्वाइट और इंक्लूसिव फिल्म करना चाहता हूं।
-अभी सब कुछ बड़े स्केल पर होने लगा है?
0 शेखर कपूर ने कहा था कि फिल्में बहुत बड़ी हो जाएंगी। अभी सब कुछ कमर्शियल और बड़ा हो गया है। मौत कमर्शियल हो गई है। एमएच 17 की एक पूरी डॉक्यूमेंट्री है। लोग इसे देख रहे हैैं। समाचार देख लो, कैसे म्यूजिक, एंकर और प्रेजेंटेशन से बेचा जा रहा है। इलेक्शन बेचा गया। लोग बॉलीवुड पर इल्जाम लगाते हैैं कि हम लोग सब कुछ बेचते हैैं। बाहर पूरे समाज में भी तो यही बिक्री चालू है। मैैं इसे गलत नहीं मानता हूं। ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ के समय भी मैैंने इसे गलत नहीं कहा। एक दर्शक आईपीएल और इलेक्शन कैंपेन एक ही रुचि के साथ देख सकता है। वह एंटरटेन हो रहा है। सब कुछ एंटरटेनमेंट हो गया है। तब हमने कहा था कि मौत भी बिकेगी और कोई शीतल पेय उसका स्पांसर होगा। हम इस कमर्शियललाइजेशन के बहुत करीब पहुंच गए हैैं। ट्रेजडी बिक रही है। इंवेंशन ऑफ लाइज एक फिल्म आई थी, उसमें लोग झूठ नहीं बोलते हैैं और जब झूठ बोलने लगते हैैं तो वे ईश्वर भी बना लेते हैैं। कमर्शियल सिनेमा में अब यह सब चीजें भी आएंगी। मेरा यही कहना है कि यह सारी चीजें लाएं, लेकिन उसे खुशी और कॉमर्स से भर दें।
- आप पर हमेशा आरोप रहता है कि आप एक जैसी ही फिल्में करते हैैं?
0 कहां एक जैसी फिल्में करता हंू। मेरी पिछले 10 साल की फिल्में देख लें, कितनी भिन्नता है। मैैं एक एक्टर हूं, आपको हंसा भी सकता हूं और रूला भी सकता हूं। मैैं कभी भी फैशन और चलन के मुताबिक फिल्में नहीं करता। मैैं सुबह 9 बजे से अगले दिन सुबह छह बजे तक काम करता रहता हूं। मुझे मजा आता है। ‘हैप्पी न्यू ईयर’ में छह लोगों को साथ में लेकर चलना फराह के लिए बहुत मुश्किल कम रहा है। हर फ्रेम में सबको साथ रखना, उनके खड़े होने और बैठने की पोजिशन तय करना, उसके हिसाब से सेट बनाना, यह सब कुछ मुश्किल रहा।
- मुझे याद है कभी आपकी दिली इच्छा थी कि आप आइकॉन बनें। अब तो आप आइकॉन होने के साथ सफल ब्रांड भी हैैं। यहां से आगे कहां जाना है? कभी अमरता के लिए कुछ करने का खयाल आता है? आपको लोग याद रखें?
0 और बड़ा आइकॉन बनाना चाहूंगा। याद रखने के लिए मैैं कोई काम नहीं करता। कोई भी नहीं करता। मैैं उदाहरण देता हूं, प्यासा अभी देश की सबसे अच्छी फिल्म मानी जाती है। जब यह फिल्म रिलीज हुई थी, तब किसी ने इसे पानी नहीं दिया था। बनी होगी, तब न जाने लोगों ने क्या-क्या कहा होगा। दत्त साहब को कितनी बातें सुनाई होंगी। कह नहीं सकते, आज की असफल फिल्म 50 साल के बाद बड़ी फिल्म साबित हो सकती है। हो सकता है कि ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ की अलग व्याख्या हो। हो सकता है कि मेरा बेटा मेरे ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’, ‘चक दे’, ‘अशोका’, ‘देवदास’ आदि की तारीफ करे और कोई उसे समझाए कि यह सब तो ठीक है,लेकिन ‘गुड्डू’ तेरे पापा की सबसे अछी फिल्म है। जो लोग भविष्य के बारे में सोचकर काम करते हैैं, वे अंधेरे में तीर चलाते हैैं। भविष्य का किसी को ज्ञान ही नहीं है। अगर हमें पांच साल बाद की चीजों का इल्हाम हो गया रहता, तब न जाने हम कहां से कहां पहुंच जाते। वैज्ञानिकों को भी नहीं मालूम होता है। हमें वर्तमान और इस पल के लिए काम करना चाहिए। फिल्मों की मेरी एक जानकारी हो गई है। फिर भी कोई नई चीज आती है तो मैैं नहीं कतराता। मैैं रीमेक और पुरानी चीजें करने से दूर रहता हूं।
- ‘देवदास’ और ‘डॉन’ के बारे में क्या कहेंगे?
0 मैैं उन्हें रीमेक नहीं कहता। मेरे खयाल से वे क्लासिक फिल्मों का रिइंट्रोडक्शन हैैं। इन फिल्मों को देखकर हम बड़े हुए हैैं। नई पीढ़ी ‘डॉन’ के बारे में नहीं जानती। अमित जी को देखकर हम पागल हो जाते थे। 11 मुल्कों की पुलिस उनके पीछे पड़ी रहती थी। उनके बारे में तो बताया जाना चाहिए। फराह कहती है कि हमारी फिल्म न भी देंखे, कम से कम इसी बहाने पुरानी फिल्में तो देखें। सच कहूं तो मैैं दिलीप कुमार के ‘देवदास’ के बारे में ज्यादा नहीं जानता था। मेरी मम्मी हमेशा उसकी तारीफ करती थीं। संजय लीला भंसाली ने कहा तो मैैंने स्वीकार कर लिया और कहा कि चलो बनाते हैैं। मेरा दिल कल के बारे में सोचकर नहीं धडक़ता। मेरा दिल आज के लिए धडक़ता है। मैैं सबसे यही कहता हूं कि आप जिस वक्त पर जहां हैैं, आपकी दुनिया वही हैैं। अभी हम लोग बातचीत कर रहे हैैं, इस पल के बाहर दुनिया में क्या हो रहा है, हमें कुछ नहीं मालूम। हम जहां नहीं हैैं,वहां की चीजों से हम वाकिफ नहीं हैैं। हो सकता है कि 30 सेकंड के बाद एक सुनामी आए। मैैं तो समुद्र के किनारे रहता हूं। हमें 30 सेकंड का फ्यूचर नहीं मालूम,आप आगे की बात पूछ रहे हैैं। हम लोग यहां बातें कर रहे हैैं और बाहर कोई इंटरनेशनल लीडर मारा जाए या जैसे जहाज में 400 लोग जा रहे थे और जहाज अचानक विस्फोट कर गया। उस विस्फोट के समय न जाने कौन क्या कर रहा होगा? किसी को पता ही नहीं चला होगा कि क्या हो गया। मैैं बहुत स्पष्ट हूं। 20 साल के बाद मुझे किसी ने याद रखा या नहीं रखा, इसकी मुझे परवाह नहीं है। लोग अभी तो मुझे याद रख रहे हैैं। मेरा होना उनके लिए मानीखेज है। अपने बेटे के लिए मैैं जरूरी हूं। अपनी फिल्मों के लिए जरूरी हूं। दर्शकों और दोस्तों के लिए जरूरी हूं। हूं कि नहीं, यह देखना चाहिए।
- अभी ऐसी क्या तीन चीजें हैैं, जो आपको चिंतित करती हैैं? 3
0 पहला,मेरे बच्चे सेहतमंद रहें। उनको जुकाम वगैरह भी हो जाता है, तो मैैं घबरा जाता हूं। बेटी को अभी दिल्ली में बुखार लग गया था, मुझे मालूम है कि ठीक हो जाएगा, लेकिन मैैं घबरा गया था। दूसरा, अपने होने का लाभ उठाते हुए ऐसा काम कर जाना जो लोगों को आनंदित कर सके। वह आज का खास काम हो। तीारा, दूसरों की खुशी, सफलता और काम देखकर परेशान न हों। आप खुश रहो, मैैं भी खुश हूं अपनी जगह। किसी के पास इतना समय नहीं है कि वह दूसरों की जिंदगी के बारे में सोच सके। मैैं सिनिकल नहीं हो रहा हूं। अपना खयाल रखो, अपनी लाइफ लीड करो, दूसरों का भी ठीक-ठाक हो ही जाएगा। मैैंने खुद तो एक आवरण में लपेट लिया है। मैैं सभी चीजों से अप्रभावित रहता हूं। अपने बारे में ही मैैंने इतनी चीजें सुन ली हैैं कि घोर निराशा में जा सकता हूं। बेहतर है मैैं उस पर मजाक करूं। अन्यथा मैैं पागल हो जाऊंगा।
-आप प्रेस कांफ्रेस और पब्लिक इंटरैक्शन में हंसी-मजाक के मूड में रहते हैं?
0 ज्यादातर समय मुझ से वैसे ही सवाल पूछे जाते हैैं, जिनके जवाब पूछने वालों के पास पहले से रहते हैैं। लोगों को लगता है कि उन्हें मेरे बारे में सब कुछ मालूम है, वे कोई ऐसा सवाल नहीं करते हैैं कि जिससे कोई नई बात पता चले। अभी दुबई में एक महिला मिलीं। उन्होंने पूछा कि आप अनुपम खेर के शो में इतने दुखी क्यों थे। मैैंने उन्हें बताया कि आंखों की लेसिक करवाई है, इसलिए ऐसा लग रहा होगा। उसमें आंखें थक जाती हैैं। महिला नहीं मानीं। उन्होंने कहा कि आप थके हुए थे, आप उदास थे। मैैं 20 साल से आप की आंखें देख रही हूं, ऐसी उदासी नहीं देखी। फिर मैैंने उनसे कहा कि आप सच कह रही हैैं। मैैं बहुत दुखी था उस दिन। अब खुश हो। वह मेरा मजाक नहीं समझ पाईं। उन्होंने खुश होकर कहा, मैैं कह रही थी कि आप उदास थे। यही वजह है कि मैैं अपनी किताब लिख रहा हूं। मैैं जो बताना चाहता हूं, उसके बारे में कोई पूछता ही नहीं है। मैैंने सोचा कि मैैं खुद ही लिख देता हूं। इन दिनों अपने एहसास लिखा करता हूं। प्रेस कांफ्रेंस वगरैह में तो मजाक ही चलते रहते हैैं। वहां तो वही दो सवाल सलमान पर होते हैैं, दो फिल्मों के बारे में और ढाई किसी नई घटना के बारे में। अब आप कितना मजाक उड़ाएं। उनकी भी मजबूरी है, वे हेडलाइन के इंतजार में रहते हैैं। मेरा पूरा यकीन है कि 20 सालों से अगर कोई किसी फील्ड में काम कर रहा है, तो उससे ऐसी कई बातें पूछी जा सकती है, जो दूसरों के काम आएं। सचिन से आप कोई सवाल कर सकते हैैं, जिससे क्रिकेट और जिंदगी के बारे में कुछ नई बातें पता चले।
- आपके विज्ञापनों को देखकर लगता है कि उनमें फिल्मों से आपकी अर्जित छवि का ही विस्तार हो रहा है? दूसरे सितारों से अलग आपके विज्ञापनों में घरेलू और फैमिली अप्रोच दिखता है? यह संयोग है या किसी योजना के तहत आप ऐसा करते हैैं?
0 मैैं जब एड फिल्म वालों के साथ बैठता हूं तो वे अजीब-अजीब एक्सपलानेशन देते हैैं। मैैं उनसे कभी कोई सवाल नहीं करता। वे जो भी कहते हैैं, मैैं सुन लेता हूं। मैैं यह नहीं समझाता कि मैैं क्या हूं। वे बताते हैैं कि हमारा जो ब्रांड है। वह फलां वैल्यू के लिए स्टैैंड करता है। भले ही वे बनियान का विज्ञापन लेकर आए हों, लेकिन वे फैमिली की बात करेंगे। मुझे भी पता नहीं चलता कि यह सब कैसे होता है। वे बताते हैैं कि आप घर की आलमारी खोलेंगे तो यह लगेगा कि यह हमारे घर की शान है। उसमें प्यार है। वे प्रोडक्ट का मानवीकरण कर देते हैैं। फिर उसे मेरे ऊपर थोप देते हैैं। मैैं उनकी बात मान लेता हूं। कहेंगे कि यह ड्रिंक बबली, रिफरेसिंग और हैप्पी है आपकी तरह। मैैं भी मान लेता हूं। मैैं बबली हूं, रिफरेसिंग हूं, हैप्पी हूं। वे मुझे हमेशा यही कहते हैैं कि हमारे प्रोडक्ट के लिए आप फिट ब्रांड हो। मैैंने तमाम अलग-अलग ब्रांड किए हैैं। गजब बात है कि मैैं सब में फिट हो जाता हूं। पहले मैैं उनके क्रिएटिव में थोड़ा-बहुत बदलाव करता था। अब समझदार हो गया हूं। मैैंने समझ लिया है कि विज्ञापन बनाने वालों की जानकारी मुझसे ज्यादा है। फिल्म बनाते समय अगर मुझे कोई कहेगा तो मैैं मना कर दूंगा। वह मेरा मैदान है। अब तो मैैं उनसे जाकर पूछता हूं कि बताओ आपको क्या चाहिए। मैैं वही कर देता हूं। मैैं उनसे कभी सवाल नहीं करता। मेरे ज्यादातर प्रोडक्ट मिडिल क्लास और अपर मिडिल क्लास के हैैं। मैैं बहुत महंगी चीजों का विज्ञापन नहीं करता। मैैं टैग की घड़ी पहनता हूं। यह सस्ती घड़ी है। 80 हजार में आ जाती है। मेरा बेटा भी इसे खरीद सकता है। मेरे पास जब पैसे नहीं होते थे, तब भी मैैंने यही घड़ी खरीदी थी। मैैं उनसे नहीं पूछता कि वे इसे कैसे बेचेंगे। मुझसे यह कोई नहीं पूछता कि मैैं अपनी फिल्म कैसे बेचूंगा।
-क्या फिल्मों के प्रमोशन में सही जानकारी दी जाती है ?
0 अपनी फिल्मों के बारे में मैैं झूठ नहीं बोलता। जब से चीजें मेरे नियंत्रण में आई हैैं, तब से मैैं धोखे में नहीं रखता। कभी ऐसा नहीं किया कि दिखाऊं कुछ और बेचूं कुछ और। मैैं दर्शक को वही बताता हूं, जो फिल्म में होता है। हर ट्रेलर में फिल्म की सही जानकारी रहती है। फिल्में टीवी या फ्रिज नहीं हैैं कि पसंद नहीं आने पर आप उन्हें वापस कर सकते हैैं। आपने टिकट ले लिया तो फिल्म देखनी ही है। मैैं यही चाहता हूं कि दर्शक 700 रुपए खर्च करने के बाद यह न कहे कि शाहरुख ने बताया तो कुछ और था, दिखा कुछ और रहा है।
-अभी आप सेहतमंद हैं। कोई चोट वगैरह तो नहीं है ?
0 अब मैं चोट देने के लिए तैयार हूं।



Friday, August 15, 2014

फिल्‍म समीक्षा : सिंघम रिटर्न्‍स

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
            रोहित शेट्टी एक बार फिर एक्शन ड्रामा लेकर आ गए हैं। तीन सालों के बाद वे 'सिंघम रिटर्न्‍स' में बाजीराव सिंघम को लेकर आए हैं। इस बीच बाजीराव सिंघम मुंबई आ गया है। उसकी पदोन्नति हो गई है। अब वह डीसीपी है, लेकिन उसका गुस्सा, तेवर और समाज को दुरुस्त करने का अभिक्रम कम नहीं हुआ है। वह मुंबई पुलिस की चौकसी, दक्षता और तत्परता का उदाहरण है। प्रदेश के मुख्यमंत्री और स्वच्छ राजनीति के गुरु दोनों उस पर भरोसा करते हैं। इस बार उसके सामने धर्म की आड़ में काले धंधों में लिप्त स्वामी जी हैं। वह उनसे सीधे टकराता है। पुलिस और सरकार उसकी मदद करते हैं। हिंदी फिल्मों का नायक हर हाल में विजयी होता है। बाजीराव सिंघम भी अपना लक्ष्य हासिल करता है।

             रोहित शेट्टी की एक्शन फिल्मों में उनकी कामेडी फिल्मों से अलग कोशिश रहती है। वे इन फिल्मों में सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं को पिरोने की कोशिश करते हैं। उनकी पटकथा वास्तविक घटनाओं और समाचारों से प्रभावित होती है। लोकेशन और पृष्ठभूमि भी वास्तविक धरातल पर रहती है। उनके किरदार समाज का हिस्सा होने के साथ लार्जर दैन लाइफ और फिल्मी होते हैं। बाजीराव सिंघम की ईमानदारी सिर चढ़ कर बोलती है। रोहित शेट्टी की खास शैली है, जो हिंदी फिल्मों के पारंपरिक ढांचे में थोड़ी फेरबदल से नवीनता ला देती है। पूरा ध्यान नायक पर रहता है। बाकी किरदार उसी के सपोर्ट या विरोध में खड़े रहते हैं। 'सिंघम रिटर्न्‍स' में खलनायक बदल गए हैं। इस बार धर्म, काला धन और मौकापरस्त राजनीति एवं ढोंगी साधु के गठजोड़ से समाज में फैल रहे भ्रष्टाचार से बाजीराव सिंघम का माथा सटकता है। वह जांबाज पुलिस अधिकारी है। अपनी युक्ति से वह इस गठजोड़ की तह तक पहुंचता है, लेकिन उसे सतह पर लाने में नाकामयाब होने पर वह कानून के दायरे से बाहर निकलने में संकोच नहीं करता, जबकि कुछ समय पहले वह मीडिया को सलाह दे रहा होता है कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों से पहले वे फैसले नहीं दें।

          हिंदी फिल्मों की यह बड़ी समस्या है कि वे मनोरंजन के नाम पर हर तर्क को गर्क कर देती हैं। दर्शकों को रोमांच और आनंद तो मिलता है, लेकिन तृप्ति नहीं होती। कुछ समय के बाद हम ऐसी फिल्मों को भूल जाते हैं। 'सिंघम रिटर्न्‍स' में आम दर्शकों की पसंद और लोकप्रियता का पूरा खयाल रखा गया है। हालांकि इसी कोशिश में जबरन गाने भी डाले गए हैं, जो फिल्म की गति को रोकते हैं। हीरो है तो हीरोइन भी होनी चाहिए और फिर उन दोनों का रोमैंटिक ट्रैक भी होना चाहिए। इस अनिवार्यता से फिल्म का प्रभाव कम होता है। बाजीराव सिंघम और अवनी की प्रेमकहानी का ओर-छोर समझ में नहीं आता। राजनीति की सही समझ नहीं होने से सालों पुरानी धारणा के सहारे किरदार गढऩे पर किरदार कैरीकेचर लगने लगते हैं। स्वामी जी और राव के चरित्रों पर अधिक मेहनत नहीं की गई है।

         'सिंघम रिटर्न्‍स' में बाजीराव सिंघम मुंबई पुलिस का अधिकारी है। उसके बहाने पुलिस की छवि को बेहतर परिप्रेक्ष्य दिया गया है। सिर्फ 47 हजार पुलिसकर्मी शहर के सवा करोड़ नागरिकों की सुरक्षा के लिए भागदौड़ करते हैं। उनकी जिंदगी नारकीय हो चुकी है। यह फिल्म सिस्टम पर भी सवाल करती है, लेकिन उनमें उलझती नहीं है। बाजीराव सिंघम के निशाने पर कुछ इंडिविजुअल हैं। हर अराजक नायक की तरह उसे भी लगता है कि इन्हें समाप्त करने से कुरीतियां खत्म हो जाएंगी। फिल्म में सामूहिकता सिर्फ दिखावे के लिए है, क्योंकि बाजीराव सिंघम अंतिम फैसले में किसी की सलाह नहीं लेता।
          अजय देवगन के लिखी और रची गई 'सिंघम रिटर्न्‍स' उनकी छवि और खूबियों का इस्तेमाल करती है। अपनी गर्जना, एक्शन और द्वंद्व जाहिर करने में वे सफल रहे हैं। अमोल गुप्ते और जाकिर हुसैन के किरदारों की सीमाएं हैं। फिर भी वे निराश नहीं करते। करीना कपूर के हिस्से जो आया है, उसे उन्होंने ईमानदारी से निभा दिया है। 'सिंघम रिटर्न्‍स' में मारधाड़ और गोलीबारी ज्यादा है। खासकर उनकी आवाज ज्यादा और ऊंची है।

अवधि-142 मिनट
**1/2 ढाई स्‍टार 

भारतीयता का आधुनिक अहसास - शाह रुख खान

मेरी आगामी फिल्म 'हैप्पी न्यू इयर' में छह किरदार हैं। फिल्म के अंदर हम खुद को इंडिया वाले बोलते हैं। मुझे यह शब्द अच्छा लग रहा है। अपनी फिल्म के लिए हमने इसे गढ़ा है। देशवासी, भारतीय, हिंदुस्तानी, इंडियन ये सब पहले से प्रचलित हैं। हम इनका इस्तेमाल करते रहे हैं। मुझे लग रहा है कि अब सब कुछ बदल रहा है तो ये शब्द भी बदल सकते हैं। भारतीय होने के मॉडर्न अहसास को यह शब्द सही तरीके से व्यक्त करता है।
देशभक्ति पर मॉडर्न टेक है इंडिया वाले। हम देश के प्रति जो गर्व महसूस करते हैं वह समय के साथ आधुनिक हो गया है। पुराने समय के लोग कुछ अलग तरीके से सोचते थे। उनके लिए देशभक्ति का जो मतलब था, वह आज भी है। लेकिन अभी एक्सप्रेशन बदल गया है। मेरी हर फिल्म कामर्शियल होने के साथ कुछ अच्छी बातें भी करती हैं। मैंने कभी भी संदेश को मनोरंजन से बड़ा स्थान नहीं दिया, लेकिन मेरी हर फिल्म के आधार में नेक संदेश रहता है। उसी की वजह से मैं फिल्म करता हूं। अगर उसे कोई समझ ले तो बहुत अच्छा, जिसको अच्छा लगे वह अपना ले, जिसको बुरा लगे वह जाने दे।
'हैप्पी न्यू इयरÓ में माडर्न देशभक्ति है, जैसे कि 'चक दे' में थी। मेरा मानना है कि आतंकवादियों का कोई देश नहीं होता। देश, धर्म और रिश्तों से जो डरते या उनका लिहाज करते हैं वे ये सब काम नहीं कर सकते। गलत काम करने के पहले उन्हें अपने परिवार, समाज और देश का खयाल आएगा। इन लोगों का कुछ अपना ही नजरिया और मजहब होता है। वास्तव में वैसे इंसान ही अलग होते हैं।
 'हैप्पी न्यू इयरÓ में जब कोई देश की बुराई करता है तो हमारे किरदार कहते हैं कि असली इंडिया वाले आएंगे तो सब ठीक कर देंगे। असली इंडिया वाले अभी देश का प्रतिनिधित्व नहीं कर पा रहे हैं। इंटरनेशनल मंचों पर सही प्रतिनिधि नहीं भेजने से हम हारते और पिछड़ते रहे हैं। मुझे लगता है कि हमें उनका सिस्टम नहीं मालूम है। हमें ऑस्कर, ओलंपिक और अन्य इंटरनेशनल प्रतियोगिताओं को समझना होगा। मेरी 'पहेली' ऑस्कर में गई थी, हम लोग नहीं जीत पाए। हमें समझना होगा कि उनका सिस्टम क्या है? हमारे पास हर साल 30 ऐसी फिल्में होंगी, जो ऑस्कर जीत सकें। मुझे तो इतना ही कहना है कि इंटरनेशनल स्टैंडर्ड की चीजों में भाग लेना है तो हमें उसके स्टैंडर्ड को समझना होगा। मैं सबसे यही कहता हूं कि अगर मैं किसी प्रतियोगिता में शामिल हो रहा हूं तो उसके बारे में मुझे अच्छी तरह समझना होगा। मैं हमेशा कहता हूं कि अगर किसी ने मुझे अपनी पार्टी में बुलाया है और यह कहा है कि टाई पहनकर कर आना तो मैं टाई पहनकर ही जाऊंगा। वैसे मैं पहनूं या न पहनूं, लेकिन वहां पहनकर जाना मेरा फर्ज है। इसी प्रकार इंटरनेशनल प्रतियोगिताओं में जाना है तो उन्हें अच्छी तरह समझना होगा। अभी कॉमनवेल्थ में हमारी लड़कियों ने पदक जीते। किसी को नहीं मालूम कि उन्होंने कैसे इतने पदक जीते। कोई तो होगा जो उन्हें प्रशिक्षित कर रहा होगा। ऐसे लोगों को बढ़ावा देना चाहिए। मेरे लिए यह माडर्न पैट्रियटिज्म है। अब इससे काम नहीं चलेगा कि हम सब जानते हैं और भारत देश हमारा इतना पुराना है। अब यह तरीका बदलना होगा। इस सोच से निकलना होगा। हमें दुनिया से सीखना और समझना होगा। बंद रहने से काम नहीं चलेगा। हमें उनकी भाषा समझनी होगी और फिर उन्हें मात देनी होगी। हम लोग उस मानसिकता में चले गए है, जहां गेम भी हमारा होगा, रूल भी हमारा होगा और हम जीतेंगे भी नहीं। हॉकी के मामले में कोई कहता है, वे एस्ट्रोटर्फ पर खेलते हैं। उन्होंने हमारी हॉकी को मार दिया। अगर पूरी दुनिया में वैसे ही खेला जा रहा है तो हमें वही खेलना होगा। हम तो वल्र्ड चैंपियन रहे हैं। ओलंपिक में 8 गोल्ड मेडल जीत चुके हैं। हमें हार नहीं माननी चाहिए, छोडऩा नहीं चाहिए। दुनिया के साथ कदम मिलाकर चलना चाहिए। यह आधुनिक देशभक्ति है। हमारे अंदर जीत का जज्बा आना चाहिए।
मुझे अपनी फिल्मों पर बहुत गर्व है। मैं भारत की फिल्में बहुत पसंद करता हूं। हमें भारतीय होने पर गर्व होना चाहिए। अपनी हार और जीत पर भी गर्व होना चाहिए। हमें अपनी फिल्मों के नाच-गाने और खुश रहने की शैली पर गर्व होना चाहिए। हमारी फिल्म में एक लाइन है, हारो तो हारो, पर इज्जत मत उतारो। मेरे लिए वह फिल्म की मेन लाइन है। हर हाल में हमें अपना आत्माभिमान नहीं खोना चाहिए। देशभक्ति के लिए यह बहुत जरूरी है। कभी-कभी कुछ संहिताएं जारी होती हैं कि हमारी सभ्यता इसकी अनुमति नहीं देती। निश्चित रूप से इस पर नए ढंग से सोचने की जरूरत है। सभ्यता हमारी साझी थाती है। अगर समाज में कोई चीज हमारी सभ्यता के हिसाब से गलत है तो वह मेरे घर में भी गलत है, आपके घर में भी गलत है। मैं अपनी बेटी को ऐसा कुछ नहीं करने दूंगा जिससे सभ्यता पर आंच आए। यों फिल्में देखकर या किताबें पढ़कर कोई नहीं बदलता। फिर भी हम कोशिश करते हैं। पाठक या दर्शक थोड़ा समझदार हो तो वह समझ लेता है।
सांस्कृतिक या कोई और राष्ट्रवाद ठीक है, अगर वह हमारी जिंदगी बेहतर बनाता है, हमें बेहतर नागरिक बनाता है। जिंदगी के हर क्षेत्र में अगर आगे बढऩे का प्रोत्साहन देता है तो उसे स्वीकार करना चाहिए। यह सब अगर नहीं होता है तो किसी भी प्रकार का राष्ट्रवाद हमें कुएं का मेंढक बना देता है। फिर 'हम और हमारा' ही चलता रहेगा। हम आत्म-मुग्ध रहेंगे और कहीं नहीं पहुंचेंगे। अभी ग्लोबल दौर में सभी एक-दूसरे को छू रहे है। सभी देशों और संस्कृतियों के बीच आदान-प्रदान हो रहा है। हम प्रभावित हो रहे हैं तो संस्कृति भी कुएं में नहीं रह सकती। हमें अपनी सभ्यता और संस्कृति का प्रदर्शन पूरे गर्व से करना चाहिए। योग, आयुर्वेद, दर्शन और अन्य कई चीजें हमारे देश की देन हैं। इन्हें लेकर हम विदेशों में जा सकते हैं, किंतु उनकी पैकेजिंग और बॉटलिंग वहां के लोगों के हिसाब से करनी पड़ेगी। हमें अपनी सभ्यता बचाकर रखनी चाहिए, लेकिन इस सभ्यता के निर्यात के लिए दूसरे देशों की जरूरत भी समझनी चाहिए।
हम बहुत सारे क्षेत्रों में आगे बढ़ रहे हैं। बहुत कुछ हासिल करने वाले हैं। इस दौर में हमें निजी लाभ की मानसिकता से निकलना होगा। मेरा हो जाए, बाकी से हमें मतलब नहीं है। इस सोच को अपने सिस्टम से निकालना होगा। हम लोग इतने साल तक गुलाम रहे कि हमेशा निजी लाभ के चक्कर में पड़े रहते हैं। अपने और अपने परिवार के बारे में ही सोचते हैं। अंग्रेजों के समय से क्या बचा और छिपा लें या पा लें, इसी फिक्र में रहने लगे हैं। इसी में सुरक्षा समझते हैं। अभी देश संक्रमण से गुजर रहा है। देश के छोटे शहर और मध्य वर्ग के नागरिक लंबी और ऊंची छलांग लगा रहे हैं। हम सभी को निजी लाभ की संकीर्णता से निकलना होगा। मेरी पीढ़ी ऐसी मानसिकता की आखिरी पीढ़ी है। हमारे बच्चे खुली सोच के हैं। वे अपने साथ ही दूसरों की भी सोचते हैं। हम सुरक्षा की चिंता में ही घुलते रहे, नई पीढ़ी मौके आजमाने से नहीं हिचकती। वे इसी सांस्कृतिक माहौल में सब कुछ करेंगे। अगर हम अपनी संस्कृति को छोटा या पिछड़ा समझे बगैर दुनिया के साथ चल सकें तो अच्छी बात होगी। वे मूर्ख नहीं हैं। वे अलग तरीके से देश पर गर्व करेंगे। वे इंडिया वाले हैं।

...तब ज्यादा मेहनत करता हूं-रोहित शेट्टी

दबाव में ज्यादा मेहनत करता हूं-रोहित शेट्टी
-अजय ब्रह्मात्मज
    रोहित शेट्टी इस दौर के कामयाब निर्देशक हैं। ‘सिंघम रिटन्र्स’ उनकी दसवीं फिल्म है। अजय देवगन और अभिषेक बच्चन के साथ उनकी पहली फिल्म ‘जमीन’ 2003 में आई थी। फिल्म को दर्शकों ने अधिक पसंद नहीं किया था। तीन सालों की तैयारी और सोच-विचार के बाद उन्होंने अजय देवगन के साथ ‘गोलमाल’ बनाई तो सभी सशंकित थे। अजय देवगन उसके पहले एक्शन स्टार या फिर इंटेस एक्टर के तौर पर जाने जाते थे। संदेह यही था कि क्या कॉमिक रोल में रोहित अजय देवगन अपने प्रशंसको और दर्शकों को संतुष्ट कर पाएंगे? आशंका तो रोहित और अजय के भी मन में थी,लेकिन उन्होंने नाप-तौल कर जोखिम उठाने की हिम्मत की थी। फिल्म चलीइ और खूब चली। इतनी चली कि अब ‘गोलमाल 4’ की बात चल रही है। उसके बाद दो और फिल्मों में रोहित को जबरदस्त कामयाबी नहीं मिली। ‘संडे’ और ‘आल द बेस्ट’ ने भी सामान्य बिजनेस किया। अभी तक रिलीज हुई उनकी नौ फिल्मों में से छह ने दर्शकों को खुश किया है। इस बीच 2011 में उन्होंने ‘सिंघम’ बना कर यह साबित कर दिया के वह केवल कॉमेडी में ही कामयाब नहीं हैं। एक्शन पर भी उनकी पकड़ है। तीन सालों के बाद एक बार फिर वे एक्शन फिल्म ‘सिंघम रिटन्र्स’ से रिटर्न कर रहे हैं।
    रोहित शेट्टी अच्छी तरह जानते हैं कि दर्शक उनकी फिल्में पसंद करते हैं। अभी फिल्म इंडस्ट्री का हर छोटा-बड़ा स्टार और बैनर उनके साथ उनकी शर्तों पर फिल्में करने के लिए तैयार है। पिछले साल ‘चेननई एक्सप्रेस’ से उन्होंने शाहरुख खान की लड़खड़ाती पोजीशन ठीक की। खबर है कि उनकी अगली फिल्म भी शाहरुख खान के साथ होरी,जिसमें अर्जुन कपूर और वरुण धवन भी हो सकते हैं। फिलहाल ‘सिंघ रिटन्र्स’ की बात करें तो रोहित शेटअी पहले की तरह ही किसी प्रकार का दावा नहीं करना चाहते। वे कहते हैं,‘मैंने कभी कुछ कर दिखाने का दावा नहीं किया है। पूरी सोच और मेहनत से फिल्में बनाता हूं। दर्शक तय करते और बताते हैं कि फिल्म अच्छी लगी कि नहीं? और अगर अच्छी लगी तो क्या खास बात है? अभी इतना ही कह सकता हूं कि पिछली फिल्म से ज्यादा और खतरनाक एक्शन है। अभी वे मुंबई पुलिस के अधिकारी हैं। उनका प्रमोशन हो चुका है। वे डीसीपी हैं।’ वे आगे जोड़ते हैं,‘हमारी पहली कोशिश यही रही कि किसी प्रकार का दोहराव नहीं हो। गौर करें तो ‘सिंघम’ के बाद ऐसी कई फिल्में आई हैं,जिनमें उसी प्रकार का एक्शन था। कुछ नया करना था या फिर पुराने को ही नए ढंग से करने की चुनौती थी।’
    कामयाबी की राह कठिन होती है। निरंतर कामयाबी से दबाव भी बढ़ जाता है। रोहित शेट्टी मानते हैं कि दबाव रहता है,‘यह नई बात नहीं है। हर नई फिल्म के साथ लोगों की अपेक्षाएं और शंकाएं बढ़ जाती हैं। मुझ पर या मेरी यूनिट पर बाहरी दबाव ज्यादा रहता है। मैंने महसूस किया है कि कुछ लोग इसी फिक्र में रहते हैं कि हम से कोई चूक हो रही है कि नहीं? मैं अपनी मेहनत बढ़ा देता हूं। अभी तक तो दर्शकों का साथ मिला है।’ ‘सिंघम रिटन्र्स’ की नायिका बदल गई हैं? अब करीना कपूर आ गई हैं। रोहित बताते हैं,‘ करीना कपूर के साथ मैं पहले भी काम कर चुका हूं। इस बार कहानी बदल गई है,इसलिए सारे किरदार बदल गए हैं। फिल्म में मुख्य खलनायक की भूमिका में अमोल गुप्ते हैं। उनकी सलाह तो मेरे एक एडी ने दी थी। अच्छी बात है कि उन्होंने अधिक फिल्में नहीं की हैं।उनके साथ जाकिर हुसैन भी हैं। अनुपम खेर अहम रोल में दिखेंगे। फिल्म का फोकस लॉ एंड आर्डर ही है,लेकिन इस बार काले धन का मामला है। बाजीराव सिंघम को इस फिल्म में अधिक खतरनाक लोगों से टकराना है।’
    हिंदी फिल्मों में मुंबई और और मुंबई के पुलिस अधिकारी आते रहे हैं। शहर और पुलिस की खास छवि बन चुकी है। रोहित के शब्दों में,‘हमलोगों ने अलग होने की कोशिश की है। माहिम के मखदूम शाह दरगाह और गेटवे ऑफ इंडिया पर भी शूटिंग हुई है। कॉटन ग्रीन और रे रोड को दर्शक पहली बार देखेंगे। हमें किसी प्रकार की दिक्कत नहीं हुई। मुंबई के पुलिस अधिकारियों की मदद मिली। दरअसल,बाजीराव सिंघम अपनी ईमानदारी औी कर्तव्यनिष्ठा से पुलिस विभाग में पॉपुलर है। उन्हें भी फख्र होता है। हमने रियल पुलिस अधिकारियों और सिपाहियों के साथ भी शूटिंग की है।’
    निश्चित समय में फिल्म पूरी कर लेने के राज के बारे में पूदने पर वे कहते हैं,‘मेरे सामने हमेशा रिलीज की तारीख रहती है। मैं फिल्मों की रिवर्स प्लानिंग करता हूं। पहले ही दिन से उल्टी गिनती चालू हो जाती है। मेरी टीम के सदस्य नहीं बदलते। एक फिल्म की शाूटिंग चल रही होती है तो अगली लिखी जा रही होती है। शाहरुख खान के साथ होने वाली फिल्म लिखी जा चुकी है। मैं दिन-रात एक कर देता हूं। मैं वैसे निर्देशकों में से नहीं हूं,जो एक फिल्म बनाने के बाद दो साल आराम करते हैं या सोचते रहते हैं। यही मेरी रोजी-रोटी है। यही एक काम आता है मुझे।’
   
   

Wednesday, August 13, 2014

संग-संग : तिग्‍मांशु घूलिया-तूलिका धूलिया



-अजय ब्रह्मात्मज
तिग्‍मांशु और तूलिका की यह कहानी अत्‍यंत रोचक और रोमैंटिक है। इलाहाबाद शहर की पृष्‍ठभूमि में पनपे उनके संग-संग चलने का यह सफर प्रेरक भी है। साथ ही विवाह की संस्‍था की प्रांसिगकता भी जाहिर होती है। 
तूलिका - पहली मुलाकात की याद नहीं। तब तो हमलोग बहुत छोटे थे। छोटे शहरों में लड़कियों को बाहर के लडक़ों से बात नहीं करने दिया जाता है। कोई कर ले तो बड़ी बात हो जाती है। मुद्दा बन जाता है। हम दोनों की इधर-उधर मुलाकातें होती रहती थीं। कोई ऐसी बड़ी रुकावट कभी नहीं रही। उस समय तो सबकुछ एडवेंचर लगता था। एडवेंचर में ही सफर पूरा होता चला गया। पलटकर देखूं तो कोई अफसोस नहीं है। मुझे सब कुछ मिला है। कभी कुछ प्लान नहीं किया था तो सब कुछ सरप्राइज की तरह मिलता गया। हमारा संबंध धीरे-धीरे बढ़ा। पता ही नहीं चला। हमलोग बाद में मुंबई आकर रम गए। हमारे थोड़े-बहुत दोस्त थे। उन सभी के साथ आगे बढ़ते रहे। मां-बाप की यही सलाह थी कि पहले कुछ कर लो। हर मां-बाप यही सलाह देते होंगे। अब हम भी ऐसे ही सोचते हैं। परिवार वालों को सीधी पढ़ाई और सीधी नौकरी समझ में आती है। तिग्माुशु की पढ़ाई और करिअर का मामला तो ऐसा था कि जिसके बारे में कुछ भी कहा-बताया नहीं जा सकता। जब हमने शादी कर ही ली तो परिजनों ने उसे मान लिया। उनकी तरफ से कोई अड़चन नहीं रही। शुरू में जरूर जितना रोकने का हो सकता था, उतना रोका। हमलोग बहुत ही नार्मल लाइफ जीते रहे। ‘पान सिंह तोमर’ के बाद कामयाबी मिली। मां-बाप के लिए तो यह सब गर्व के क्षण होते हैं।
तिग्मांशु - मुलाकात या आकर्षण के बारे में क्या बताऊं? तूलिका देखने में अच्छी लगती थी। इतना ज्यादा मिलना-जुलना तो हो नहीं पाता था। स्वभाव की सीधी लगती थी। इनके बहुत ज्यादा दोस्त नहीं थे। नेचर अच्छा था। मिलना-जुलना यों ही हो पाता था। कभी किसी दोस्त के यहां मुलाकात हो गई। कभी कहीं अचानक मिल गए। तय कर मिलना तो मुमकिन नहीं था। चिट्ठियां लिखी जाती थीं। आज भी ऐसे ही होता होगा। इंटरनेट और मोबाइल आने पर माध्यम और तरीका बदल गया है। उस वक्त अधिक सिनेमाघर नहीं थे, जो थे वहां आप जा नहीं सकते थे। वहां पहचाने या पकड़े जा सकते थे।
तूलिका - अपना टाइम तो हम सभी को ज्यादा अच्छा लगता है। हमें लगता है कि अब मां-बाप भी अब उदार हो गए हैं। बच्चों को स्पेस और लिबर्टी मिल रही है। हमलोगों के समय मिलने जाते समय जो दिल का धडक़ता होता था, अब शायद नहीं होता होगा। तब तो हमारे लिए वह बहुत बड़ी बात होती थी। रोमांस वाली बात थी। इन दिनों रोमांस बदल गया होगा।
तिग्मांशु - मैं बताऊं,जब किसी से प्यार नहीं होता। उसका एहसास नहीं होता तो उससे मिलना-जुलना आसान रहता है। क्लासमेट या दोस्तों की बहनों से हम बेहिचक मिल सकते थे। उसमें दिक्कत नहीं थी। बड़े भाइयों की पार्टियां होती थीं। उनकी दोस्त आती थीं। डांस वगैरह होता था। कोई नहीं पूछता था कि कहां जा रहे हो? कैसे जा रहे हो? ये अच्छी लगने लगीं तो एक स्वाभाविक झिझक आ गई। साथ में घूमना या पिक्चर देखना नहीं होता था।
तूलिका - हमलोग अलग-अलग स्कूल में थे। मैं लड़कियों के स्कूल में थी। तिग्मांशु लडक़ों के स्कूल में थे। तिग्मांशु जिंदादिल इंसान थे। अभी तो थोड़े नरम हो गए हैं। पहले बहुत बिंदास हुआ करते थे। उस उम्र की खूबसूरती इनमें थी। मुझे अच्छे लगते थे।
शादी का प्रस्ताव
तूलिका - मैं परिवार की बड़ी बेटी हूं। परिवार में रिवाज था कि सही समय पर शादी कर देनी है। पहल मैंने की थी। तिग्मांयाु तब नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में पढ़ाई कर रहे थे।
तिग्मांशु - शादी तो करनी ही थी, लेकिन हम दोनों ही छोटे थे। 22 साल की उम्र थी। वह शादी करने की उम्र होती नहीं है। मैं ड्रामा स्कूल में था। थर्ड ईयर में अभी पास आउट नहीं हुआ था। दो-तीन महीने बाकी थी। गर्मियों की छुट्टियां थीं। मुझे पता था कि इनके घर पर कुछ तनाव चल रहा है ,इसलिए मैं उन छुट्टियों में इलाहाबाद नहीं गया था। हास्टल में रूक गया था। मेरे एक दोस्त थे संजय ब्राउन। वे मयूर विहार में रहते थे। उनके घर आता-जाता था। तूलिका एक दिन उनके घर पर आ गई। तय हुआ कि शादी करनी है। पैसे नहीं थे मेरे पास। केवल 40 रुपए थे। दोस्तों की मदद से शादी हुई। तीस हजारी कोर्ट जाकर हमने रजिस्ट्रेशन कर लिया। घर वालों के विरूद्ध जाकर शादी करनी पड़ी। हमारी उम्र नहीं थी। तब तो यह रहता था कि इश्क किया है तो निभाएंगे। कुछ दिनों तक छुप कर रहे। इनके पिताजी बड़े अधिकारी थे। शादी के बाद हम इलाहाबाद चले। प्रयागराज से नहीं गए। हमने एक दूसरी ट्रेन पकड़ी। कानपुर तक जाने वाली ट्रेन ली। वहां से दूसरी ट्रेन ली। घर वाले नाराज थे,लेकिन हफ्ते भर में सब ठीक हो गया। फिर लौट आए दिल्ली। पहले कुछ साथ दोस्तों के साथ रहे। फिर अपना कमरा ले लिया। एक ही कमरा था हिंदुस्तान टाइम्स अपार्टमेंट में। बालकनी को किचेन बना लिया था।
तूलिका - कभी ख्याल नहीं आया कि कल क्या होगा? सपनों की दुनिया ही थी। तय था कि शादी तो करनी है। पविार के लोग आनाकानी कर रहे थे तो एक दिन तिग्मांशु के पास आ गई। आ जाने के बाद सारी औपचारिकताएं और जरूरतें पूरी की गईं। मेरे मन में कभी कोई संशय नहीं रहा।
तिग्मांशु - दोस्तों की मदद से हम ने शादी कर ली। दिल्ली में हमलोग छुप के रहे। इनके पिताजी एडमिंस्ट्रेटिव ऑफिसर थे। बड़े पोस्ट पर थे। सारे पड़ोसी पुलिस में थे। डीआईजी किस्म के लोग थे। शादी की और फिर सोचे कि इलाहाबाद ही चलते हैं। वैसे एक एक ट्रेन प्रयाग इलाहाबाद तक जाती थी। हमको लगा कि इससे जाएंगे तो पकड़े जाएंगे। तो मैंने एक दूसरी ट्रेन पकड़ी जनसाधारण एक्सप्रेस वह कानपुर जाती है। फिर कानपुर बदल ली। नाराज थे,घर वाले उन्होंने एक्सेप्ट कर लिया। - तुलिका - हमलोग सपनों की दुनिया में बचपन से रहते हैं और हम उसी दुनिया को परफेक्ट मानते हैं। एक बार तिग्मांशु ने एक जिंगलस किया था। उसमें पांच सौ रुपए मिले थे। हमें लगा था कि पांच सौ रुपए में तो हम पूरी दुनिया खरीद सकते हैं। हमें कभी नहीं लगा कि यह सब नहीं कर पाएंगे। हमने यह भी नहीं सोचा था कि इस मुकाम तक पहुंच जाएंगे। हमारी हर सिचुएशन अच्छी रही। हम हर सिचुएशन में खुश रहते थे। मैं ये नहीं सोचती थी कि सबके पास शादी के बाद ये-वो है,हमारे पास नहीं है। मैं कभी सोचती ही नहीं थी। हमें लगता था कि हम डिफरेंट हैं।
दिल्ली के दिन
तूलिका - कुछ ऐसा था कि हमलोग के बचपन के सारे दोस्त आस पास रह रहे थे। हम भी उनसे मिलते रहते थे।  एक तरह से बहुत ही अच्छा वह माहौल था। लगता नहीं था कि स्ट्रगल चल रहा है। हम जिंदगी में रम गए थे।
तिग्मांशु - दोस्तों ने बहुत साथ दिया। शादी की तो मैं ड्रामा स्कूल में था और ये अपने घर में ही थीं। हमलोग केरल गए थे एक-सवा महीने के लिए। संजय उसे साढ़े सात सौ रुपए देते थे महीने के। एक कमरा हमको मिला। पूरा घर ही था टू बेडरूम का। सब के अपने-अपने कमरे थे। रहना भी वहीं और खाना भी वहीं। वह कहानी बिल्कुल सही है - एक राजकुमार था वह गरीब हो गया। हमारी एक रोमांटिक दुनिया थी। कोई प्रॉब्लम नहीं था।
तुलिका - वो कहते हैं न स्ट्रगलिंग  के दौर से गुजरना पड़ता है। हमलोग को भी थोड़ा सा गुजरना पड़ा। फैमिली का सपोर्ट, फ्रेंड का सपोर्ट, इमोशनली सपोर्ट हमारा खुद ही, सबकुछ स्मूथली बीत गया। कभी नहीं लगा कि कोई बड़ी कमी रही?
शादी की जरूरत
तिग्मांशु - शादी का फैसला इन्होंने लिया था। शायद अगर घर में दिक्कत नहीं आती तो दो-तीन साल के बाद शादी करते। तब तक लीव इन रिलेशन प्रचलित नहीं हुआ था। शादी के लिए इनके घर वाले राजी हो जाते तो शायद बाद में करते शादी। शादी किए आज पच्चीस साल हो गए। अगर मैंने शादी नहीं की होती तो मेरे बिगडऩे के बहुत चांस थे, क्योंकि मैं दोस्ती-यारी वाला बंदा हूं। आओ चलो, आओ चलो। आओ पीओ, खाओ पीओ। इस तरह का हूं मैं। शादी का जो अंकुश शायद मेरे लिए जरूरी था। मेरे लिए अच्छा हुआ। 22 साल की उम्र में ही शादी हो गई। अच्छा हुआ।
तूलिका - हमलोग सब कंडिशनिंग वाले लोग थे। पत-पत्नी से ज्यादा कंपैनियनशिप की फीलिंग रही। शादी करने का दबाव या प्रभाव जैसा कुछ नहीं रहा। इस एज में अभी जो जमाना हो रहा है, उसमें हमें लग रहा है कि हमारी बेटी बहुत भाग्यशाली होगी। क्योंकि उसे दोनों पैरेंट्स वैसे ही मिले हैं। आजकल इतनी छोटी-छोटी चीजों पर लोग अलग होना चाह रहे हैं, जैसे लग रहा है पूरी दुनिया का संतुलन बिगड़ रहा है। आज के माहौल में संतुलन बिगडऩे से शेर ही कम नहीं हो रहे हैं। आदमी की इंसानियत भी कम हो रही है। प्यार-मोहब्बत से आदमी दूर भाग रहा है। उसे यह सब बोझ लग रहा है। क्यों जरूरी है प्रेम। सभी को फ्रीडम चाहिए। वास्तव में सभी को फ्रीडम नहीं चाहिए। सबको प्यार चाहिए।
तिग्मांशु - हमारे आसपास ऐसे लोग हैं। अच्छी-खासी शादी सालों की। बच्चा भी है। क्यों छोड़ा? एक होता है न लडक़ा या लडक़ी किसी और के चक्कर में पड़ गए हैं। बीवी किसी के साथ पकड़ी गई है। मियां कहीं फंस गया है। ऐसा कुछ नहीं है। कुछ नहीं। सिर्फ यह है कि बोर हो गए हैं। इस इंडस्ट्री क्या पूरी दुनिया में यही हो रहा है। एक की शिकायत थी कि घर में पड़ा रहता है। जबकि वह घर में काम ही कर रहा है। बीवी को लगा कि मियां इंटरप्राइजिंग नहीं है। अब हर आदमी एक तरीके से तो काम नहीं करेगा। सभी का अपना एक रिदम होता है। सिस्टम होता है। शरीर का अपना संविधान होता है। नहीं,पता चला उसी चक्कर में मियां को छोड़ दिया।
स्ट्रगल में साथ,कामयाबी में अलग
तिग्मांशु - एक-दूसरे को समझना। दुनिया को समझना, अपने दोस्तों को समझना। ये बातें खत्म हो गई हैं। आदमी धीरे-धीरे टेकनोलॉजी के तरफ बढ़ रहा है।  एक-दूसरे के साथ जुडऩे की टेकनोलॉजी आ गई है। इंटरनेट, फेसबुक और सब  ़ ़ ़ दूरियां बढ़ गई है उससे। जरूरत से ज्यादा बढ़ गई है। फेसबुक और ये सब जो है,वहां  एक्चुअल फ्रेंड नहीं हैं। ये सभी वर्चुअल फेंड हैं। सैटेलाइट से भेजे गए दोस्त हैं। आप उन्हें जानते नहीं हैं। इनमें सब लोग इतना ज्यादा रम गए हैं कि मेरे कितने-कितने फ्रेंड हैंकी तुलना होती है। मेरे सेवन हंड्रेड है, मेरे टू थाउजंड हैं, मेरे थ्री थाउजंड हैं। लाइक और डिसलाइक दोनों पर बातें होती हैं। इगो फील वहां पर रहती है। मेरी फोटो दस लोगों थम डाउन किया। मेरा दिमाग खराब हो गया। अरे ये क्या? जाओ बाहर खेलो गिल्ली-डंडा। उसमें हारो और उसमें दोस्तों से नाराज हो। वो सब खत्म हो गया है। इसी पर लगा हुआ है आदमी और दूरियां और बढ़ रही है। अकेलेपन और अलगाव के शिखर पर हैं हम।
तूुलिका - मेरी बेटी पिछले साल एक दिन घर आई  और बताने लगी कि मम्मा हमारे क्लास में ज्यादातर बच्चों के  पैरेंट्स अलग हो चुके हैं। हमलोग तीन-चार बच्चे जिनके पैरेंट्स साथ में हैं। मुझे अजीब सी बात लगी। हमलोग को लगता है कि हमलोग के ऐसे पैरेंट्स रहे। उन्होंने जितना अच्छा जीवन हमलोगों को दिया उसका आधा भी हम नहीं दे पा रहे हैं। वो प्यार-मोहब्बत ़ ़ ़ किस को प्यार नहीं चाहिए। अकेले कितना आदमी रह लेगा। वह फैमिली ढूंढ़ता है। पैरेंट्स ढूंढ़ता है। फ्रेंडस ढूंढ़ता है। फैमिली में रहना बहुत ही जरूरी है,क्योंकि केवल परिवार में बिना शर्त प्यार होता है। बाकी रिश्ते मतलबी होते हैं। हमलोग की बांडिंग इतनी स्ट्रोंग है कि कितना भी कुछ हो जाए सब एक साथ रहेंगे हर चीज से मुकाबला करने के लिए ।
तिग्मांशु - मैंने कितने लोगों को देखा है। हम नहीं करेंगे शादी, हम बैचलर रहेंगे। हम शादी की संस्था में यकीन नहीं करते। फिर 45-50 की उम्र के बाद शादी करते हैं। आप 70 के हो गए और बच्चे 15 के ही हैं। फिर कंपैनियनशिप नहीं हो पाती।
तूलिका - परिवार की कंपैनियनशिपअनकंडिशनल होती है। बाकी फ्रेंड चार ही होते हैं,जो आपको प्यार करते हैं। सौ नहीं हो सकते। हर इंसान को वह चीज चाहिए ही चाहिए। जितना माडर्न हो जाए, जितनी टेकनोलॉजी आ जाए। जिस मुकाम पर भी पहुंचे। सुख-दुख शेयर करना चाहते हैं। चाहे वे दो ही लोग हों। फैमिली इज वेरी इंर्पोटेंट। इस दुनिया को ठीक कर लें नहीं तो सब कुछ बिखर जाएगा। जानवर तो फिर भी कंट्रोल में आ जाएगा लेकिन इंसान कंट्रोल में नहीं आएगा।
घर के फैसले
तिग्मांशु - ये लेती हैं।
तूलिका - उस पर कोई बहस नहीं होती है। वह अनकहा फैसला है कि मैं करूंगी। बाकी ये देखेंगे।
तिग्मांश - इनका एस्थेटिक्स सेंस अच्छस है। पेंटिंग करती थीं। कलर पसंद,फैब्रिक की जानकारी इन सब का सेंस अच्छा है। मैं इस मामले में जीरो हूं।। क्या खरीदा जाए और घर को कैसे रखा जाए? अभी नया घर हमने लिया है उस घर का इंटीरियर चल रहा है। सब कुछ यही देख रही है। मैं केवल इतना कहा कि मेरा बार ठीक कर देना। इन चीजों में मैं बिल्कुल दखल नहीं देता। ये शॉपिंग में लंबा टाइम लेगी। चाहे एक चीज खरीदनी हो। दो घंटा लगाएगी खरीदने में। मैं जाता हूं एक ही दुकान में पंद्रह मिनट में पांच समान खरीद कर वापस आ जाता हूं।

तूलिका- लेकिन बाद में तीन फेंक देते हैं।

ग्लैमर वल्र्ड
तुलिका - तिग्मांशु फिल्मों में हैं। कभी यह आशंका यह भय नहीं रहा कि ये भटक जाएंगे। निश्चित रूप से ऐसा खयाल कभी नहीं आया। कभी हमारे दिमाग से भी नहीं गुजरती है यह बात। हमको लगता है कि हम इतना अच्छे से एक-दूसरे को जानते हैं। हमलोग को मालूम है कि हमलोग आखिर तक साथ रहेंगे।
तिग्मांशु- मुझे रास्ते पर यही रखती हैं।
तूलिका - जब साथ आदमी रहने लगता है तभी एक-दूसरे का गुण जान पाता है। वैसे इतनी समझदारी और पहचान तो होती है। इंसान सिंपल और मेहनती होना चाहिए। वफादार होना चाहिए।
तिग्मांशु - लडक़ा-लडक़ी साथ तो शादी के बाद रहते हैं। उसके पहले किसके साथ रहते हैं? उसके पहले अपने पैरेंट्स के साथ रहते हैं। भाई-बहन के साथ रहते हैं। अपने दोस्तों के साथ रहताा है। अगर किसी ने ये सारे रिश्ते ठीक से निभाए और आपको उसकी जानकारी है। अगर वो अपने माता-पिता के साथ बहुत प्यार है, केयरिंग है, सिस्टर को लेकर प्रोटेक्टिव है। दोस्तों का यार है तो बंदा या बंदी ठीक है। देखिए दुनिया बदल रही है। समाज बदल रहा है। पहले वाला सवाल नहीं रहा कि आराम वाला एक स्लो जिंदगी चल रही है। छोटे शहरों में भी रोज पार्टी करते हैं। तो बदल गया है समाज। लडक़ी हो या लडक़ा ़ ़ ़ दोनों को स्पेस देना बहुत जरूरी हो गया है। आदमी हमेशा अपनी स्पेस चाहता है। उससे पहले वो अपने परिवार के साथ रहा होता है। अपने दोस्तों के साथ रहा होता है। लडक़ों के ज्यादा दोस्त होते है, वह हमेशा घूमता रहता है। पान की दुकान पर जाता है। रेस्टोरेंट में जाता है। शादी के पहले खुली होती है उसकी जिंदगी। शादी के बाद कम हो जाती है एक्टिविटी। वाइफ के साथ शॉपिंग करने, वाइफ के साथ घूमने की जरूरत बढ़ती है। रिश्तेदारों में जाओ, शादियों में जाओ। फिर बहुत ज्यादा बंधा-बंधाया फील करता है। यार तबाह हो गई है जिंदगी। नरक हो गई है। संभव है मेरे साथ भी ऐसा हुआ होगा।



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तिग्मांशु धूलिया - हमसफर


तूलिका - आज के माडर्न जमाने में दोनों को स्पेस चाहिए। एक-दूसरे पर ट्रस्ट होना चाहिए और  ़ ़ ़ ये मत करो, वो मत करो, यहां मत जाओ, वहां मत जाओ। अब ये चीजें कम होती हैं। यही चीजें वजह बनती है अलग होने की। औरतों को भी चाहिए होता है फ्रीडम। जब दोनों स्पेस दे रहे हों तो संतुलन हो जाता है। लडक़ों की तरह लड़कियों को भी लगता है कि अरे यह क्या  ़ ़ ़ हर चीज में ये करो, वो करो। औरत को ये करना चाहिए। आप उस चीज  को समझ जाते हो और स्पेस देते हो तो। स्पेस क्या है आप एक-दूसरे को जीने दें, करने दें। वही प्यार, वही फैमिली, बैलेंस रहता है तो सब चीजें ठीक रहती है।
बदलाव
तूलिका - ऐसा कुछ बदलाव नहीं है। सब वैसे ही है। अभी थोड़े शांत हो गए हैं। वेरी सेकरीफाइजिंग एंड वेरी लविंग पर्सन हैं तिग्मांशु। सिंपल लिविंग,हाई थिकिंग में यकीन रखते हैं। हर के लिए चिंतित रहते हैं। केवल फैमिली तक सीमित नहीं है इनका श्ह व्यवहार। कुछ भी पता चल जाए, चाहे पैसों को लेकर हो चाहे खुद जाकर करना हो। सच है, झूठ है यह जानने के पहले किसी की भी तकलीफ से उद्वेलित हो जाते हैं। यह बड़ी क्वालिटी होती है आजकल।
तिग्मांशु - शादी के समय हम दोनों का उम्र ही क्या थी? मैं बहुत ज्यादा इंटलेक्चुअली, बहुत 'ज्यादा स्प्रीचुअली ग्रोथ की बात नहीं करूंगा। दुनियादारी और क
ाम की जिम्मेदारी थीा। आपको अपना ड्रीम पूरा करना है, स्ट्रगल भी करना है और घर को भी देखना है। तो शायद वो ग्रोथ जल्दी हो गई काम के वजह से। इतना भाग-दौड़ करना। मुझे लगता है जानसीं के आने के बाद बहुत परिवत्र्तनकारी ग्रोथ हुआ। किसी ने सिखाया तो नहीं। और बच्चों को मैं देखता हूं, जानसीं तो जो भी है, जैसी भी है वैसी ही है। मुझे जानसीं को देख कर बहुत खुशी होती है। वह बहुत समझदार है।
तुलिका - यह भी होता है न कि हमलोगों को देखती है। हमलोगों को लगता है कि प्यार से पढ़ाते हैं, बोल कर पढ़ाते हैं। बहुत सी चीजें अनजाने में आप ही से सीख लेते हैं बच्चे। हम दोनों से उसे सीख मिली है। हमलोगों की ग्राउंड थिंकिंग है तो उसकी भी वैसी ही है।
तिग्मांशु-उसे सलीम जावेद की सारी फिल्में अच्छी लगती है। शक्ति और दीवार बहुत अच्छी लगती है। उसको अमिताभ बच्चन की डॉन अच्छी लगती है। शाहरुख खान की डॉन अच्छी नहीं लगती है। हमलोगों को भी जंगल और जानवर पसंद है, म्यूजिक पसंद है। उसको भी पसंद है। प्यानो सीखती है। म्यूजिक का बहुत शौक है। छुट्टियां हैं। हमलोग कहीं नहीं जा रहे हैं। वह जिद नहीं करती है कि मुझे कहीं लेकर चलो। हमको असिस्ट करती है। ऑफिस जाती है। ये सब फैमिली की देन होती है।
क्या है शादी
तिग्मांशु - शादी है क्या? आप अपनी जेनेटिक्स को बढ़ा रहे हैं।  वो अच्छी जेनेटिक्स भी होने चाहिए। मैंने भी वही सीखा है जो हमारे फादर ने, मदर ने, बड़े भाईयों ने, उसी को आगे लेकर जा रहे हैं। यही फैमिली यूनिटी है। इसी से बनी रहेगी चीजें,नहीं तो सब अलग-अलग बिखर जाएंगे।
तूलिका - अपने परिवारों से जुड़ हुए हैं हम। एक बार की बात बताऊं। अब यहां बैठ कर पता नहीं चलता। नैनीताल में करीबन पौने ग्यारह बज रहा था। इन्होंने हमारे फोन से भी किया और अपने फोन से भी किया। वे सब सो गए थे। सुबह-सुबह उनका फोन आ गया। क्या बात हो गई तुम लोगों का फोन रात को ग्यारह बजे आया। मैं बोली ऐसे ही किया। बोले कि मैं तो घबरा ही गया था। ऐसी प्रतिक्रिया से पता चलता है कि कंसर्न है।
तुलिका - छोटे शहर से निकले। दिल्ली पहुंचे। फिर मुंबई आ गए। शादी हुई। बच्ची हुई। तिग्मांशु को पहचान मिली। जो भी सफर रहा बहुत ही खूबसूरत रहा। मेरे फ्रेंड और फैमिली बहुत हैं। उस वजह से लगता है कि सपने की तरह अभी तक पूरी हो रही है।
तिग्मांशु-मैं खुश हूं कि थोड़ा टेढ़ा काम चुना। जैसे आप खुद ही कह रहे हैं कि आउटसाइडर हैं। हमलोग जब आए थे, अब हमलोग भी पुराने हो गए। नए डायरेक्टर और आ गए। उस वक्त अभी की तरह फिल्ममेकिंग व्यवस्थित नहीं थी। उस वक्त था कि आप किसी डायरेक्टर को असिस्ट करो और पिक्चर बनाते-बनाते आप एक्टर के नजदीक हो जाओगे और अपनी स्क्रिप्ट पिच करो और पिक्चर बनने की संभावना हो जाती है। हमलोग ऐसे ही किए हैं। हम साल डेढ़ साल शेखर कपूर के साथ लगे रहे। फिर वे एलिजाबेथ करने चले गए। कोई था ही नहीं। और भी मुश्किल आ गई थी। ये अच्छा हो गया अपना सपना भी पूरा किया। हालांकि सपने अभी तक बचे हैं। फिर भी जहां पहुंचे कभी किसी तरह की दिक्कत नहीं आई। कई मौके होते थे बिल्कुल पैसे नहीं होते थे। कोई न कोई दोस्त या कुछ और हो जाता है। मेरे साथ हमेशा हुआ है। मुझे पैसे उधार बहुत कम मांगने पड़े।
कौन बोलता है सॉरी
तिग्मांशु - शायद हम दोनों को पता चल जाता है कि गलती किसकी थी। मेरी गलती हो तो मैं सॉरी बोल देता हूं। कभी कभी गलती इनकी गलती रहती है लेकिन मैं उसे नहीं झेल पाता। आप सभी के सामने भी चुप हैं। बात नहीं कर रहे हैं तो वह फैलता है। वह रोग जैसा हो जाता है।