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Thursday, July 31, 2014

पीके का पोस्‍टर



दरअसल : पहली छमाही के संकेत


-अजय ब्रह्मात्मज

    2014 की पहली छमाही ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को उम्मीद और खुशी दी है। हिट और फ्लाप से परे जाकर देखें तो कुछ नए संकेत मिलते हैं। नए चेहरों की जोरदार दस्तक और दर्शकों के दिलखोल स्वागत ने जाहिर कर दिया है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री नई चुनौतियों के लिए तैयार है। नए विषयों की फिल्में पसंद की जा रही हैं। एक उल्लेखनीय बदलाव यह आया है कि पोस्टर पर अभिनेत्रियां दिख रही हैं। यह धारणा टूटी है कि बगैर हीरो की फिल्मों को दर्शकों का अच्छा रेस्पांस नहीं मिलता। पहली छमाही में अभिनेत्रियों की मुख्य भूमिका की कुछ फिल्मों ने साबित कर दिया है कि अगर फिल्मों को सही ढंग से पेश किया जाए तो दर्शक उन्हें लपकने को तैयार हैं। अगर कोताही हुई तो दर्शक दुत्कार भी देते हैं। ‘क्वीन’ और ‘रिवाल्वर रानी’ के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है।
    अभिनेत्रियों की स्वीकृति में आए उभार और उनकी फिल्मों की बात करें तो पहली छमाही में माधरी दीक्षित और हुमा कुरेशी की ‘डेढ़ इश्किया’ और माधुरी दीक्षित की ‘गुलाब गैंग’ है। कमोबेश दोनों फिल्मों को दर्शकों का बहुत अच्छा रेस्पांस नहीं मिला। कहीं कुछ गड़बड़ हो गई। फिर भी इन फिल्मों के निर्माता-निर्देशकों की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने ऐसी फिल्म बनाने का प्रयास किया। आलिया भट्ट की ‘हाईवे’ इम्तियाज अली की फिल्म थी। उन्होंने बहुत खूबसूरती से अमीर परिवार की एक लडक़ी की कहानी कही। खुद को पहचानने के बाद वह बचपन से भुगत रही यंत्रणा से मुक्त होती है। ‘2 स्टेट्स’ में भी आलिया भट्ट ने अपने किरदार को दमदार तरीके से पेश किया। ‘हंसी तो फंसी’ में परिणीति चोपड़ा की मौजूदगी अहम थी। ‘रागिनी एमएमएस’ और ‘क्वीन’ दो छोरों पर नजर आ सकती हैं,लेकिन दोनों ही फिल्मों में नायिका की प्रधानता की समानता थी। सनी लियोनी और कंगना रनोट ने अपनी भूमिकाओं में निश्शंक दिखीं। दोनों के अभिनय में झेंप नहीं है। दोनों को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता,लेकिन इस तथ्य से भी इंकार नहीं कर सकते कि सनी और कंगना की फिल्मों में पुरुष पात्र गौण थे।
    पहली छमाही में अर्जुन कपूर,वरुण धवन,सिद्धार्थ मल्होत्रा,टाइगर श्रॉफ और राजकुमार राव ने अपनी फिल्मों से बताया कि वे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की बागडोर संभालने के लिए तैयार हैं। अर्जुन कपूर की ‘2 स्टेट्स’ 100 करोड़ क्लब में दाखिल हो गई। सिद्धार्थ मल्होत्रा की जुलाई में आई फिल्म ‘एक विलेन’ की कामयाबी ने उनकी योग्यता पर मोहर लगा दी। वरुण धवन की ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया’ भी सफल हो चुकी है। टाइगर श्रॉफ की पहली फिल्म ‘हीरोपंथी’ ने भी दर्शकों का आकृष्ट किया। इन चारों से अलग राजकुमार राव अपने अभिनय और दर्शकों की सराहना के दम पर अगली कतार में शामिल हुए। इन अभिनेताओं की फिल्मों की कामयाबी स्पष्ट संकेत देती है कि नए सितारे पूरी तैयारी के साथ आ चुके हैं। समय और फिल्मों के साथ उनकी लोकप्रियता बढ़ेगी और उसी के अनुपात में उनके स्टारडम में इजाफा होगा।
    पहली छमाही में पुराने सितारों में सलमान खान और अक्षय कुमार की फिल्में आईं। ‘जय हो’ को सलमान की औसत फिल्म माना जाता है। लागत और प्रभाव की वजह से 100 करोड़ से अधिक का कलेक्शन करने के बावजूद ‘जय हो’ ने सलमान खान के स्टारडम पर प्रश्न चिह्न लगा दिया। अक्षय कुमार अलबत्ता ‘हॉलीडे’ की कामयाबी से फिर से सफल सितारों की तरह चमकने लगे। देखना यह है कि अगली छमाही में पुराने सितारों की चमक कैसी रहती है? बाक्स आफिस पर उनकी फिल्मों के प्रदर्शन का तमाशा रोचक होगा।

Sunday, July 27, 2014

अपनी लुक के लिए मैं क्‍यों शर्मिंदगी महसूस करूं ? -हुमा कुरेशी

(हुमा कुरेशी ने यह लेख इंडियन एक्‍सप्रेस के लिए शनिवार,26 जुलाई को लिखा थ। मुझे अच्‍छा और जरूरी लगा तो उनके जन्‍मदिन 28 जुलाई के तोहफे के रूप में मैंने इस का अनुवाद कर दिया।) 
मेरी हमेशा से तमन्‍ना थी कि अभिेनेत्री बनूंगी,लेकिन इसे स्‍वीकार करने के लिए हिम्‍मत की जरूरत पड़ी। खुद को समझाने के लिए भी।हां,मैं मध्‍यवर्गीय मुसलमान परिवर की लड़की थी,एक हद तक रुढि़वादी। पढ़ाई-लिखाई में हेड गर्ल टाइप। मैं पारंपरिक 'बॉलीवुड हीरोइन' मैटेरियल नहीं थी।
      औरत के रूप में जन्‍म लेने के अनेक नुकसान हैं...भले ही आप कहीं पैदा हो या जैसी भी परवरिश मिले। इंदिरा नूई,शेरल सैंडबर्ग और करोड़ों महिलाएं इस तथ्‍य से सहमत होंगी। निस्‍संदेह लड़की होने की वजह से हमरा पहला खिलौना बार्बी होती है। ग्‍लोबलसाइजेशन की यह विडंबना है कि हमारे खेलों का भी मानकीकरण हो गया है। पांच साल की उम्र में मिला वह खिलौना हमारे शारीरिक सौंदर्य और अपीयरेंस का आजीवन मानदंड बन जाता है।(मैं दक्षिण दिल्‍ली की लड़की के तौर पर यह कह रही हूं।) संक्षेप में परफेक्‍शन। परफेक्‍शन का पैमाना बन जाता है।
     दुनिया ने मेरे अंदर वैसी ही आकांक्षा डाली। बाद में मुझे पता चला कि बार्बी गेहुंआ और काली भी हो सकती है।अउसके घुघराले बाल हो सकते हैं। वह छिद्रदार टीशर्ट पहन सकती है। वह पका सकती है। अगर आप उसे खेलने भेजें तो वह छक्‍का भी मार सकती है। आप जैसा चाहें,बार्बी चैसी हो सकती है। मैंने समझ लिया कि कोई भी अपनी बार्बी हो सकती है और शायद मैं भी बार्बी हो सकती हूं।
     पारंपरिक तरीके से देखें तो मैं सुंदर हूं। लेकिन मैं उसका 'भार' समझती हूं। विचित्र लग सकता है,लेकिन मुझे अपने श्‍ारीर,कटाव और रूप से प्रेम नहीं है। मुझे अच्‍छा लगता है कि मेरे दांत टूटे हुए हैं,एडवेचरस होने के निशान मौजूद हैं।मेरे हॉबिट पांव हैं। और हां,पहली बार स्‍वीकार कर रही हूं कि मेरे पांव कुछ ज्‍यादा ही बड़े हैं।
     मुझे फिल्‍में पसंद हैं। फिल्‍में देखना और उनका हिस्‍सा बनना पसंद है। लेकिन एक्‍टर के तौर पर जब मेरे शरीर की निरंतर जंचाई होती है तो कोफ्त होती है। एक्‍टर होने के नाते मुझे इसके लिए तैयार रहना पड़ता है। हां,सभी औरतें इस गुण और कला में माहिर नहीं होतीं। उन्‍हें जरूरत भ्‍ाी नहीं पड़ती।
       हम ऐसी संस्‍कृति में जी रहे हैं,जहां फिल्‍मों,टीवी,विज्ञापन,पत्रिकाओं के कवर से पिरंतर बताया जा रहा है कि परफेक्‍ट शरीर की एक ही परिभाषा है... और उुपर से यह भी संदेश दिया जाता है कि आप उसके काबिल नहीं हैं और कभी हो भी नहीं पाएंगी। 
     महिलाओं को लगातार सिखाया जाता है कि वे खुद से प्‍यार ना करें।आप जानती हैं कि दुनिया आप को किस रूप में देखना चाहती है। 'छह फीट दो इंच लंबी','साइज जीरो'  या 'साइज माइनस वन' या खान-पान की जो अनियमितता इस हफ्ते हम बता रहे हैं,प्रोत्‍साहित कर रहे हैं। जब बोला जाए तभी बोलें,दिखाई पड़ें,सुनाई न पड़ें,कोई सुनेगा नहीं। दुनिया आप की नीरव खामोशी चाहती है। 
    इसके बावजूद दुनिया में ऐसी औरते हैं,जो खामोश बैठ कर दुनिया की कसौटी पर खरी नहीं उतरना चाहतीं। उन्‍हें दुनिया की मंजूरी नहीं चाहिए। जीवन की पूर्णता के लिए उन्‍हें किसी की अनुमति नहीं चाहिए। उन्‍होंने खुद को सिखाया कि वे स्‍वयं से प्‍यार करें,अपने वजूद को पसंद करें,अपनी कमियों से मोहब्‍बत करें। एक बार इसे हासिल करने के बाद उन्‍हें किसी से कुछ और नहीं चाहिए। यह उन्‍होंने हासिल किया है। यह हम भी हासिल कर सकती हैं। क्‍योंकि दुनिया आप की अावाज सुनना चाहती है। 
       औरतें हर किस्‍म के मर्तबान में आती हैं- भिन्‍न आकार-प्रकार,भिन्‍न उम्र,भिन्‍न रंग,भिन्‍न बाल.... उनकी सामाजिक-सांस्‍कृतिक पृरूठभूमि भी अलग-अलग होती है। वे सभी खूबसूरत होती हैं। और जब हमें अपनी वास्‍तविकता से प्रेम हो जाता है,जब हम दुनिया की निगाहों में कमी समझी जाने वाली चीजों को अपना लेती हैं और उसका जश्‍न मनाती हैं तो फिर हमें कोई नहीं रोक पाता। हमें रुकना भी नहीं चाहिए। 
     मेरी प्रिय कवयित्री माया एंगलो ने 'फेनोमेनल वीमैन' में लिखा है, Now you understand/Just why my head's not bowed/I dont shout or jump about/Or have to talk real loud/When you see me passing/It ought to make you proud/I say/Its in the click of my heels/The bend of my hair/The palm of my hand/The need of my care/'Cause i am a woman/Phenomenally/Phenomenal woman/That's me.
    मैं फेमनिस्‍ट नहीं हूं। मुझ पर ऐसा लेबल न लगाएं। दूसरों की तरह ही मैं भी आत्‍म गौरव के मुद्दों के साथ बड़ी हुई हूं। यह अस्‍वस्‍थ या अनफिट रहने का बहाना नहीं है। यह सिर्फ याद दिलाने के लिए है कि हम सभी अलग-अलग मर्तबान में आती हैं। और एक मर्तबान दूसरे से बेहतर नहीं होता। वे सभी अलग होते हैं। 
    कल को एक एथलीट की भूमिका के लिए मैंने अपना वजन कम किया तो भी मैं 'कटावदार जिस्‍म की लड़की' की वजह नहीं छोड़ूंगी या 'साइज जीरो की महामार' की चपेट में नहीं आऊंगी। ऐसा फिल्‍म के किरदार को निभाने के लिए होगा। मुझ से या किसी और लड़की से यह कभी नहीं कहें कि हम अपनी लुक या व्‍यवहार के लिए शर्मिंदगी महसूस करें।

Friday, July 25, 2014

फिल्‍म समीक्षा : किक

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
कुछ फिल्में समीक्षाओं के परे होती हैं। सलमान खान की इधर की फिल्में उसी श्रेणी में आती हैं। सलमान खान की लोकप्रियता का यह आलम है कि अगर कल को कोई उनकी एक हफ्ते की गतिविधियों की चुस्त एडीटिंग कर फिल्म या डाक्यूमेंट्री बना दे तो भी उनके फैन उसे देखने जाएंगे। ब्रांड सलमान को ध्यान में रख कर बनाई गई फिल्मों में सारे उपादानों के केंद्र में वही रहते हैं। साजिद नाडियाडवाला ने इसी ब्रांड से जुड़ी कहानियों, किंवदंतियो और कार्यों को फिल्म की कहानी में गुंथा है। मूल तेलुगू में 'किक' देख चुके दर्शक बता सकेगे कि हिंदी की 'किक' कितनी भिन्न है। सलमान खान ने इस 'किक' को भव्यता जरूर दी है। फिल्म में हुआ खर्च हर दृश्य में टपकता है।
देवी उच्छृंखल स्वभाव का लड़का है। इन दिनों हिंदी फिल्मों के ज्यादातर नायक उच्छृंखल ही होते हैं। अत्यंत प्रतिभाशाली देवी वही काम करता है, जिसमें उसे किक मिले। इस किक के लिए वह अपनी जान भी जोखिम में डाल सकता है। एक दोस्त की शादी के लिए वह हैरतअंगेज भागदौड़ करता है। इसी भागदौड़ में उसकी मुलाकात शायना से हो जाती है। शायना उसे अच्छी लगती है। देवी उसके साथ बूढ़ा होना चाहता है। शायना चाहती है कि देवी किसी नियमित जॉब में आ जाए। उधर देवी की दिक्कत है कि हर नए काम से कुछ ही दिनों में उसका मन उचट जाता है। शायना उसे टोकती है। उसकी एक बात देवी को लग जाती है। इसके बाद वह किक के लिए देवी से डेविल में बदल जाता है। डेविल और पुलिस अधिकारी हिमांशु की अलग लुकाछिपी चल रही होती है। इनके बीच भ्रष्ट नेता और उसका भतीजा भी है।
रोमांस, एक्शन, चेज, कॉमेडी, सॉन्ग एंड डांस और इमोशन से भरपूर 'किक' से साजिद नाडियाडवाला केवल सलमान खान के प्रशंसकों को खुश करने की कोशिश में हैं। दृश्य विधान ऐसे रचे गए हैं कि कैमरा आखिरकार हर बार सलमान की भाव-भंगिमाओं पर आकर ठहर जाता है। अगर कभी दूसरे किरदार पर्दे पर दिखते हैं तो वे भी देवी या डेविल की ही बातें कर रहे होते हैं। हिंदी फिल्मों में स्क्रिप्ट लेखन का यह खास कौशल है, जो पॉपुलर स्टार की फिल्मों में आजमाया जाता है। एकांगी होने से बचते हुए ढाई घंटे की ऐसी स्क्रिप्ट तैयार करने में अलहदा मेहनत लगती है। 'किक' जैसी फिल्मों का एकमात्र उद्देश्य आम दर्शकों का मनोरंजन करना है। आम दर्शक अपने परिवार के सदस्यों के साथ उसका आनंद उठा सकें।
'किक' अपनी इन सीमाओं और खूबियों में कहीं बिखरती और कहीं प्रभावित करती है। इंटरवल के पहले का विस्तार लंबा हो गया है। देवी और उसके पिता के रिश्ते को स्थापित करने वाले दृश्य नाहक खींचे गए हैं। इसी तरह नायक-नायिका की मुलाकात के दृश्य में दोहराव है। हम दशकों से ऐसी छेड़खानियां और बदमाशियां देखते आए हैं। अगर फिल्म के नायक सलमान खान हैं तो सीधे व सामान्य की उम्मीद ही नहीं करनी चाहिए। देवी और डेविल की हरकतों में कई बार लॉजिक की परवाह नहीं की गई है, लेकिन क्या सलमान खान के प्रशंसक इन पर गौर करते हैं? बेहतर है कि दिल में आने वाले इस नायक को समझने में दिमाग न लगाया जाए।
'किक' में सलमान खान पूरे फॉर्म में हैं। उम्र चेहरे और शरीर पर दिखती है, लेकिन ऊर्जा में कोई कमी नहीं है। सलमान ने एक्शन के दृश्यों में आवश्यक फुर्ती दिखाई है। रोमांस और डांस का उनका खास अंदाज यहां भी मौजूद है। सलमान खान की इस फिल्म में रणदीप हुडा और नवाजुद्दीन सिद्दिकी अपनी उपस्थिति दर्ज करते हैं। रणदीप हुड्डा ने पुलिस अधिकारी हिमांशु के किरदार में स्फूर्ति बरती है। कुछ दृश्यों में वे अवश्य लड़खड़ा गए हैं। नवाज की तारीफ करनी होगी कि चंद दृश्यों के अपने किरदार का उन्होंने अदायगी से यादगार बना दिया है। चटखारे लेकर उनके बोलने के अंदाज की नकल होगी। जैकलीन फर्नांडीज के लिए कुछ डांस स्टेप्स और रोमांस के सीन थे। उनमें वह जंचती हैं। संवाद अदायगी और नाटकीय दृश्यों के लिए उन्हें और मेहनत करनी होगी। सौरभ शुक्ला, मिथुन चक्रवर्ती, विपिन शर्मा और संजय मिश्रा अपनी भूमिकाओं में उपयुक्त हैं।
ईद के मौके पर सलमान खान और साजिद नाडियाडवाला की पेशकश 'किक' आम दर्शकों का ध्यान में रख कर बनाई गई सलमान खान की विशेषताओं की फिल्म है।
अवधि: 146 मिनट
***  तीन स्‍टार

Thursday, July 24, 2014

दरअसल : खान बनाम खान बनाम खान


-अजय ब्रह्मात्मज
    ईद के मौके पर सलमान खान की ‘किक’ रिलीज होगी। पिछले कुछ सालों से सलमान खान की फिल्में ईद पर ही रिलीज हो रही हैं। दर्शकों के प्रेम और सराहना से उन्हें कामयाबी के रूप में ईदी मिल जाती है। अगले साल की ईद के लिए भी उनकी फिल्म घोषित हो चुकी है। ‘किक’ के निर्माता-निर्देशक साजिद नाडियाडवाला हैं। अपनी पहली फिल्म के निर्माण और प्रमोशन में वे किसी प्रकार की कमी नहीं रहने देना चाहते। इस साल की अभी तक की यह बहुप्रचारित फिल्म है। हालांकि इस बीच प्रेस फोटोग्राफरों से सलमान खान की अनबन हुई है। फिर भी ‘किक’ और सलमान खान में दर्शकों की मांग की वजह से मीडिया की रुचि कम नहीं हुई है। सलमान खान स्वयं आगे बढ़ कर सहयोग कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि वे ‘जय हो’ की गलती नहीं दोहराना चाहते। हालांकि ‘जय हो’ 100 करोड़ क्लब में आ गई थी,लेकिन वह सलमान खान की इमेज और हैसियत के हिसाब से बिजनेस के मामले में कमजोर फिल्म रही।
    सलमान खान की तरह ही शाहरुख खान और आमिर खान भी अपनी फिल्मों के प्रचार और विज्ञापन की तैयारी में जुटे हैं। शाहरूख खान की ‘हैप्पी न्यू ईयर’ दीपावली के मौके पर आएगी और आमिर खान ने ‘पीके’ के लिए क्रिसमस का समय चुन रखा है। देश के तीन बड़े त्योहारों पर खानत्रयी ने कब्जा कर रखा है। इनकी फिल्मों की रिलीज की पूर्वघोषणा हो जाती है। देखा जाता है कि इनकी फिल्मों के साथ उन तारीखों को ही अपनी फिल्में रिलीज करने की हिमाकत कोई निर्माता नहीं करता। बिजनेस के लिहाज से इसे ठीक नहीं माना जाता। पिछले कुछ सालों से तीनों खानों की यही रणनीति चल रही है। तीनों अपने करिअर के शीर्ष पर हैं। वहीं टिके रहने का सारा इंतजाम करते हैं। संयोग और मेहनत से उनकी फिल्में औसत से बेहतर व्यापार करती हैं। वे चमकते रहते हैं।
    तीनों खानों को अक्षय कुमार,अजय देवगन और रितिक रोशन से कभी-कभी टकराना पड़ता है,लेकिन अपनी ख्याति और रुतबे से वे आगे बने रहते हैं। खानत्रयी के करिअर पर गौर करें तो उनके भी बुरे फेज आए हैं। लगातार फिल्में फ्लॉप होती रही हैं। अब स्थितियां बदल चुकी हैं।  अभी तीनों में से कोई भी फ्लॉप का जोखिम नहीं ले सकता। इसी साल का उदाहरण लें तो अर्जुन कपूर और सिद्धार्थ मल्होत्रा पहले ही 100 करोड़ क्लब में पहुंच चुके हैं। वरुण धवन की फिल्म ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया’ भी सफलता के संकेत दे रही है। अपने स्टारडम को बरकरार रखने के लिए तीनों खानों को बाक्स आफिस पर तीनों नए स्टारों से बेहतर प्रदर्शन करना होगा।
    यों 25 सालों से दर्शकों के दिलों पर राज कर रहे तीनों खानों के अवसान का समय आ चुका है। दूसरी तरफ,नए स्टारों की धमक को दर्शकों का समर्थन मिल रहा है। शाहरुख खान रोहित शेट्टी की ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ की मदद से फिर से सेंटर में आ चुके हैं। फराह खान की ‘हैप्पी न्यू ईयर’ से उन्हें और उनके प्रशंसकों को उम्मीदें हैं। ‘ओम शांति ओम’ के बाद फिर से शाहरुख खान,दीपिका पादुकोण और फराह खान की तिगड़ी पुराने जादू के प्रयास में है। चुनौती आमिर खान के लिए भी है। ‘3 इडियट’ के बाद वे एक बार फिर राजकुमार हिरानी के साथ आ रहे हैं। उनकी पिछली फिल्म ‘धूम 3’ ने नए रिकॉर्ड बनाए थे। सलमान खान और शाहरुख खान की इच्छा है कि वे आमिर खान से आगे निकलें। आमिर खान अपनी बढ़त बनाए रखना चाहते हैं। हिंदी फिल्मों में प्रेमत्रिकोण होता है,जिसमें कोई एक छूट जाता है। यह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का फेमत्रिकोण है,इसमें किसी एक को आगे बढऩा है। दो छूट जाएंगे। सवाल है कि 2014 में खान बनाम खान बनाम खान में कौन में कौन बाजी मारेगा? सलमान,शाहरुख या आमिर?

ताजिंदगी 27 साल का रहूं मैं-सलमान खान


-अजय ब्रह्मात्मज
ऐसा कम होता है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में सीनियर बाद की पीढ़ी की खुले दिल से तारीफ नहीं करते। सलमान खान इस लिहाज से भिन्न हैं। वे अपनी फिल्मों में नई प्रतिभाओं को मौका देते और दिलवाते हैं। पिछली मुलाकात में उन्होंने शुरुआत ही नए और युवा स्टारों की तारीफ से की। फिल्मों की रिलीज के समय उनके अपार्टमेंट गैलेक्सी के पास स्थित महबूब  स्टूडियो उनका दूसरा घर हो जाता है। एक अस्थायी कैंप बन जाता है। उनके सारे सहयोगी तत्पर मिलते हैं। यहीं वे मीडिया के लोगों से मिलते हैं। पिछले कुछ सालों से यही सिलसिला चल रहा है। ‘किक’ के लिए हुई इस मुलाकात में सलमान खान ने सबसे पहले अर्जुन कपूर ,आलिया भट्टऔर वरुण धवन समेत सभी नए टैलेंट की तारीफ की। उन्होंने अपने अनुभव से कहा कि वे खुले मिजाज के हैं। बातचीत और मेलजोल में किसी प्रकार का संकोच नहीं रखते। मैंने देखा है कि वे आपस में एक-दूसरे की खिंचाई भी करते हैं। खिल्ली उड़ाते हैं। मेरी पीढ़ी में केवल मैं हंसी-मजाक करता हूं। दूसरे तो सीरियस रहते हैं। अपनी पीढ़ी की बातें करते समय उन्होने जाहिर किया कि संजू यानी संजय दत्त के साथ उनकी ऐसी दोस्ती रही है। बाकी से भी मित्रता है,लेकिन वैसी अंतरंगता नहीं है।
    सलमान ने अपने दर्शकों से आग्रह किया कि वे ‘किक’ के टिकट ब्लैक में न खरीदें और न ही पायरेटेड डीवीडी पर घर में देखें। वे सिनेमाघरों में जाएं और सामान्य टिकट के लिए थोड़ा इंतजार कर लें। फस्र्ट डे फस्र्ट शो देखने के चक्कर में ब्लैक में डेढ़ हजार रुपए में टिकट खरीदने का कोई मतलब नहीं है। ब्लैक में खर्च किया दर्शकों का पैसा किसी निर्माता के पास नहीं आता। सोम-मंगल को देखने से कम पैसे खर्च होंगे। मेरी या किसी और की फिल्म हो। आप सोचो और फिर देखो। ‘किक’ में सलमान खान ने अपने लुक पर भी काम किया है। मास्क के अलावा फ्रेंच दाढ़ी भी रखी है। यह फैसला साजिद नाडियाडवाला का है। सलमान ने बताया, साजिद ने मुझे मेरी छह-सत साल पुरानी तस्वीर दिखाई। उसमें मैंने गोटी रखी थी। उन्हें वह लुक अच्छा लगा। ‘हर दिल जो प्यार करेगा’ के समय मैंने उस लुक की होर्डिंग जुहू में लगवाई थी। मजेदार बात है कि फिल्म में कहीं भी मेरा वैसा लुक नहीं था। बहरहाल,साजिद ने सोचा की डेविड का लुक ऐसा रखते हैं और देवी का लुक तो नार्मल रहेगा। मास्क का आयडिया भी साजिद का था। देवी करी ड्रेसिंग स्टायल भी अलग है। वह जींस और कुर्ते में रहता है।
     कुछ सालों पहले सलमान खान ने फैसला किया था कि वे अब दोस्ती-यारी में फिल्में नहीं करेंगे। क्या उन्होंने साजिद नाडियाडवाला के लिए उस फैसले को बदला? इस सवाल पर सलमान की परिचित हंसी फूट पड़ी। उन्होंने हंसते हुए कहा,यह प्रोफेशनल फैसला है। वैसे साजिद मेरे पुराने दोस्त हैं,लेकिन दोस्ती में हम दोनों इतनी राशि का रिस्क नहीं ले सकते। फिल्म बिजनेस में थोड़ी भी कमजोर हुई तो लोग साजिद को कोसेंगे। साजिद के लिए यह परीक्षा की घड़ी है। निर्माता होना और बात है। वे इस फिल्म के निर्देशक भी हैं। अरबाज और सोहेल के साथ भी इसलिए फिल्म नहीं करता कि वे मेरे भाई हैं। हमलोग बहुत मेहनत करते हैं। इस फिल्म में तो रिलीज के दस दिनों पहले तक हम कुछ न कुड जोड़ते रहे हैं। शुक्रवार को सब पता चल जाएगा। हां,देख लेंगे,संभाल लेंगे,तू है न जैसे प्रपोजल की फिल्में अब नहीं करता। फिल्म लिख ली गई हो और पूरी फिल्म का खाका सामने हो तभी हो करता हूं। अभी कंपीटिशन बढ़ गया है।
    सलमान खान यह तो मानते हैं कि उम्र बढऩे के साथ उन्हें भी सीनियर एक्टर की तरह कैरेक्टर रोल में जाना पड़ेगा। उन्होंने शरारती मुस्कान के साथ जोड़ा,यह देखना रोचक होगा कि हम तीनों में से कौन पहले कैरेक्टर रोल में जाता है। मैं 27 दिसंबर को पैदा हुआ हूं। मेरी उम्र हर साल 27 दिसंबर को 27 की हो जाती है। मैं तो हमेयाा 27 की उम्र में ही रहना चाहता हूं। तो क्या 2027 तक आप हीरो ही रहेंगे? सलमान ने 27 से 14 घटा कर देखा। क्या कह रहे हैं? अभी से सिर्फ 13 साल और? ना ना कम से कम 27 साल और दें मुझे। इतने दिनों तक तो मैं दर्शकों का चहेता बने रहना चाहता हूं।

Saturday, July 19, 2014

मुंबई की बिमल राय प्रदर्शनी









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Friday, July 18, 2014

फिल्‍म समीक्षा : हेट स्‍टोरी 2

 -अजय ब्रह्मात्‍मज 
           यह पिछली फिल्म की सीक्वल नहीं है। वैसे यहां भी बदला है। फिल्म की हीरोइन इस मुहिम में निकलती हैं और कामयाब होती हैं। विशाल पांड्या की 'हेट स्टोरी 2' को 'जख्मी औरत' और 'खून भरी मांग' जैसी फिल्मों की विधा में रख सकते हैं। सोनिका अपने साथ हुई ज्यादती का बदला लेती है। विशाल पांड्या ने सुरवीन चावला और सुशांत सिंह को लेकर रोचक कहानी बुनी है। फिल्म की सबसे बड़ी खूबी है कि अंत तक यह जिज्ञासा बनी रहती है कि वह मंदार से प्रतिशोध कैसे लेगी?

सीक्वल और फ्रेंचाइजी में अभी तक यह परंपरा रही है कि उसकी कहानी, किरदार या कलाकार अगली फिल्मों में रहते हैं। 'हेट स्टोरी 2' में विशाल इस परंपरा से अलग जाते हैं। उन्होंने बिल्कुल नई कहानी और किरदार लिए हैं। उनके कलाकार भी नए हैं। इस बार सोनिका (सुरवीन चावला) किसी मजबूरी में मंदार (सुशांत सिंह) की चपेट में आ जाती है। भ्रष्ट, लोलुप और अत्याचारी मंदार उसे अपनी रखैल बना लेता है। वह उसकी निजी जिंदगी पर फन काढ़ कर बैठ जाता है। स्थिति इतनी बदतर हो गई है कि सोनिका अपनी मर्जी से कुछ भी नहीं कर सकती है। उसके ताजा प्रेम को मंदार बर्दाश्त नहीं कर पाता। सोनिका को फिर से अपनी गिरफ्त में लेने के लिए वह सीधी खतरनाक चाल चलता है। मौत के करीब पहुंच चुकी सोनिका जिंदगी में वापस लौटती है। अब उसका एक ही मकसद है। मंदार और उसके साथियों का सफाया।
अगर हम ऐसी कहानियों की सामाजिकता, कानूनी दांव-पेंच और तर्क पर गौर करें तो हिंदी की अनेक फिल्में लचर साबित होंगी। 'हेट स्टोरी 2' भी इन कमियों की शिकार है। इन कमियों के बावजूद विशाल पांड्या ने 'हेट स्टोरी 2' को दो किरदारों के आमने-सामने की लड़ाई बनाकर इसे इंटरेस्टिंग तरीके से रचा है। सुरवीन चावला और सुशांत सिंह ने अपने किरदारों को ढंग से आत्मसात किया है। वे जरूरी भावों और अभिनय की वजह से प्रभावित करते हैं। हिंदी फिल्मों की अपेक्षाकृत नई अभिनेत्री सुरवीन चावला ने सोनिका की जद्दोजहद और बदले की भावना जाहिर करने में असरदार हैं। 'हेट स्टोरी 2' में सुशांत सिंह ने अपने दमदार अभिनय से किरदार के प्रति दर्शकों में नफरत पैदा की है। यही निगेटिव किरदार की सफलता होती है। लंबे समय के बाद पर्दे पर उन्हें देखकर यह कसक हो सकती है कि उन्हें लगातार मौके क्यों नहीं मिलते? जय भानुशाली की भूमिका छोटी है। उन्हें अधिक दृश्य और अवसर नहीं मिले हैं।
     पिछली फिल्म की वजह से यह धारणा बन सकती है कि ‘हेट स्टोरी 2’ भी पहली की तरह अश्लील या इरोटिक होगी, लेकिन ऐसा नहीं है। यह फिल्म पूरी तरह से बदले की कहानी है, जिसमें एक अत्याचारी पुरुष के खिलाफ स्त्री की जंग है। इस जंग में अप्रत्यक्ष रूप से औरतों का पक्ष भी आता है। उनका बहनापा और सहयोग भी दिखता है। अपने संवादों में ‘हेट स्टोरी 2’ औरतों के पक्ष में अघोषित सवाल भी खड़ा करती है। आखिर क्यों उन्हें हर काम करना ‘पड़ता’ है। उनकी मर्जी और चाहत को पुरुष प्रधान समाज हमेशा नजरअंदाज करता है।
अवधि-129 मिनट 
तीन स्‍टार ***

फिल्‍म समीक्षा : पिज्‍जा

- अजय ब्रह्मात्‍मज 
निर्माता बिजॉय नांबियार और निर्देशक अक्षय अक्किनेनी की फिल्म 'पिज्जा' तमिल में बन चुकी इसी नाम की फिल्म की रीमेक है। अक्षय अक्किनेनी ने हिंदी दर्शकों के लिहाज से स्क्रिप्ट में कुछ बदलाव किए हैं। उन्होंने अपने कलाकारों अक्षय ओबरॉय और पार्वती ओमनाकुट्टन की खूबियों व सीमाओं को ध्यान में रखते हुए कथा बुनी है। 'पिज्जा' हॉरर फिल्म है, इसलिए हॉरर फिल्म के लिए जरूरी आत्मा, भूत-प्रेत, खून-खराबा सारे उपादानों का इस्तेमाल किया गया है। अक्षय की विशेषता कह सकते हैं कि वे इन उपादानों में रमते नहीं हैं। बस आवश्यकता भर उनका इस्तेमाल कर अपनी कहानी पर टिके रहते हैं।
'पिज्जा' डिलीवरी ब्वॉय कुणाल और उसकी प्रेमिका निकिता की प्रेम कहानी भी है। दोनों इस शहर में अपनी जगह बनाने की कोशिश में हैं। निकिता अपनी कल्पना से घोस्ट स्टोरी लिखा करती है। उसकी कल्पना एक समय पर इतनी विस्तृत और पेचीदा हो जाती है कि वह कुणाल के साथ खुद भी उसमें शामिल हो जाती है। इस हॉरर फिल्म में अक्षय ने जबरदस्त रहस्य रचा है। आखिरी दृश्य तक फिल्म बांधे रखती है और जब रहस्य खुलता है तो दर्शक भी सरप्राइज महसूस करते हैं। फिल्म की कहानी पर बात करने से भेद खुल जाएगा, इसलिए बेहतर है कि आप स्वंय इस रहस्य के राजदार बनें।
अक्षय अक्किनेनी ने 'पिज्जा' 3 डी में शूट की है। उन्होंने बैकग्राउंड के लिए साउंड की नई तकनीक इस्तेमाल की है। इन दोनों तकनीकी खूबियों से यह फिल्म नए किस्म का प्रभाव डालती है। नयापन कलाकारों के चुनाव और दृश्यों की संरचना में भी है। उनकी वजह से फिल्म में ताजगी बनी रहती है। हिंदी की सामान्य हॉरर फिल्मों की तरह 'पिज्जा' सिर्फ डराने की कोशिश नहीं करती। यह अपनी रोचकता और रहस्यात्मकता से इंटरेस्ट बनाए रखती है।
कुणाल की भूमिका में अक्षय ओबेरॉय ने फिल्म के लिए जरूरी डर के भाव को पकड़ा है। चीखने-चिल्लाने से अधिक वे इन दृश्यों में जूझते दिखाई पड़ते हैं। 'पिज्जा' पारंपरिक तंत्र-मंत्र का भी इस्तेमाल नहीं करती और न ही किसी वैज्ञानिक या मनोवैज्ञानिक तर्क का सहारा लेती है। यह शुद्ध काल्पनिक हॉरर फिल्म है, जो नई तरह से कही गई है।
अवधि: 107 मिनट
तीन स्‍टार ***

Thursday, July 17, 2014

दरअसल : बिमल राय-मुख्यधारा में यथार्थवादी फिल्म

-अजय ब्रह्मात्मज    
 पिछली बार हम ने उनकी कुछ फिल्मों की चर्चा नहीं की थी। आजादी के बाद जब सारे फिल्मकार अपनी पहचान और दिशा खोज रहे थे,तभी जवाहर लाल नेहरू के प्रयास से 1952 की जनवरी में पहले मुंबई और फिर कोलकाता,दिल्ली,चेन्नई और तिरुअनंतपुरम में पहले इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का आयोजन किया गया। इस फेस्टिवल के असर से अनेक फिल्मकार अपनी फिल्मों में यथार्थवाद की ओर झुके। हालांकि वामपंथी आंदोलन और इप्टा के प्रभाव से प्रगतिशील और यथार्थवादी दूरिूटकोण और शैली पर एक तबका जोर दे रहा था,लेकिन वह हाशिए पर था।इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में डिसिका जैसे फिल्मकारों की इतालवी फिल्मों को देखने के बाद भारतीय फिल्मकारों का साहस बढ़ा। तब हिंदी फिल्म इंडस्ट्री मुंबई में संकेंद्रित हो रही थी। देश भर से प्रतिभाएं व्यापक दर्शक और अधिकतम नाम और कमाई के लिए मुंबई मुखातिब हो रही थीँ। पिछले स्तंभ में हम ने बताया था कि अशोक कुमार के आग्रह और निमंत्रण पर बिमल राय भी मुंबई आ गए थे।
     इस बार उनकी दो फिल्मों की विशेष चर्चा होगी। उनकी एक फिल्म है हमराही। 1944 में यह फिल्म आई थी। हमराही में उद्योगपति राजेन्द्रनाथ और बेरोजगार लेखक अनूप की कहानी है। अमीर और गरीब के रिश्तों के द्वंद्व को यह फिल्म बखूबी उजागर करती है। आजादी के पहले के  भारत की यह कहानी आज भी प्रासंगिक लग सकती है,क्योंकि 70 सालों के बाद भी समाज का समीकरण और अमीरों का रवैया नहीं बदला है। हां,उनके तरीके अवश्य बदल गए हैं। अनूप को राजेन्द्रनाथ के यहां नौकरी मिल जाती हे। उसका काम राजेन्द्रनाथ के लिए भाषण तैयार करना है। अनूप के भाषणों से राजेन्द्रनाथ की लोकप्रियता बढ़ जाती है। एक प्रसंग में आत्माभिमानी अनूप नौकरी छोड़ देता है तो राजेन्द्रनाथ उसे मनाने उसके घर तक आते हैं। वे उसके अप्रकाशित उपन्यास को छपवाने का आश्वासन भी देते हैं। बाद में वे उसे अपने नाम से छाप लेते हैं। दोनों का संघर्ष बढ़ता है। इस बीच उद्योगपति की बहन गोपा उससे प्रेम करने लगती है। वह अनूप के साथ हो लेती है। हमराही देश के युवकों को बेहद पसंद आई थी। अमीर परिवार की लडक़ी गोपा का वंचित अनूप से प्रेम होना ही युवकों को अपनी तरफ खींचने में समर्थ रहा। इस दौर की फिल्मों में अमीरों का या तो हृदय परिवत्र्तन हो जाता था या फिर उनकी बहन या बेटी हीरो के साथ चली जाती थी। प्यासा और नया जमाना पर इस फिल्म का प्रभाव देखा जा सकता है।
    बिमल राय की परख की अधिक चर्चा नहीं होती। 1960 की इस फिल्म का प्रतीकात्मक महत्व है। परख मेंं बिमल राय ने चुनाव पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी की थी। यह एक ऐसी राजनीतिक फिल्म है,जिसमें सीधे पार्टी-पॉलिटिक्स की बातें नहीं होतीं। राधानगर गांव के पोस्टमास्टर को किसी जे सी राय का पांच लाख का चेक मिलता है। साथ में हिदायत है कि इसे गांव के सबसे अच्छे आदमी को ही दिया जाए। सूचना मिलते ही पूरे गांव में खलबली मच जाती है। सभी इस मोटी रकम को हासिल करना चाहते हैं। अगले दिन पोस्टमास्टर अपनी समझ से गांव के जमींदार,डॉक्टर,मास्टर,महापंडित और मजदूर नेता को बुलाता है और सबसे अच्छे आदमी की शर्त के बारे में बताता है। सभी के व्यवहार में तब्दीली आ जाती है। एक मास्टर ही है,जो पहले की तरह सेवा भाव से अपने काम में लगा रहता है। गांव के लोग चकित हैं,क्योंकि जमींदार,पंडित और डॉक्टर बदल गए हैं। एक पोस्टमैन पांचों व्यक्तियों पर नजर रखता है। चूंकि इन पांचों में से ही किसी एक को चुना जाना है,इसलिए गांव में चुनाव का माहौल बन जाता है। पता चलता है कि चुनाव में जीत के लिए किन तिकड़मों और झूठ का सहारा लिया जाता है।
    इन दोनों फिल्मों का कोई आज के संदर्भ में रीमेक करे तो नए सच सामने आएंगे। बिमल राय ने फार्मूले से बाहर के विषयों को भी छुआ और उन्हें रोचक तरीके से पेश किया। उनकी चर्चित फिल्मों के बारे में सभी जानते हैं,फिर भी हाल में एक युवा फिल्मकार ने स्वीकार किया कि उनकी पीढ़ी बिमल राय जैसे भारतीय फिल्मकारों पर गौर नहीं करती। फैशन चल गया है कि हम विदेशी फिल्मकारों की फिल्में देखें और उनके ही नाम लें।


Tuesday, July 15, 2014

ऐसी भी क्‍या जल्‍दी है -विक्रमादित्य मोटवानी



-अजय ब्रह्मात्मज
‘उड़ान’ और ‘लूटेरा’ के निर्देशक विक्रमादित्य मोटवानी अपनी नई फिल्म के प्रिप्रोडक्शन में व्यस्त हैं। इसके साथ ही वे फैंटम फिल्म्स के प्रमुख कर्ता-धर्ता हैं। अनुराग कश्यप,विकास बहल और मधु मंटेना के साथ उन्होंने क्रिएटिव प्रोडक्शन कंपनी आरंभ की है। विक्रमादित्य मोटवानी की ‘लूटेरा’ इसी बैनर के तहत आई थी।
- आप की फिल्म ‘लूटेरा’ को सराहना और प्रशंसा मिली,लेकिन वह सफल नहीं रही। कहां चूक हो गई?
0 फिल्म मैंने अपनी सोच से बनाई थी। पहले से अंदाजा था कि उसे मिक्स रेस्पांस मिलेगा। कुछ को पसंद आएगी तो कुछ को पसंद नहीं आएगी। हम सभी को यह पता था। मैं उसके लिए तैयार था। सराहना जबरदस्त मिली। अगर बाक्स आफिस पर भी समान परिणाम आता तो कमाल हो जाता। मार्केटिंग,डिस्ट्रीब्यूशन और अन्य चीजों पर फिल्म का बिजनेस निर्भर करता है। मेरा अनुभव कभी इंटरेस्टिंग रहा।
-फिल्म रिलीज होने के बाद कोई निर्माता-निर्देशक उस पर बातें नहीं करता। आप तैयार हुए,लेकिन क्या कमियों के बारे में बताना चाहेंगे?
0 ‘उड़ान’ से ज्यादा सीख मुझे ‘लूटेरा’ ने दी। पता चला कि मैं कहां चूक गया। क्या बेहतर कर सकता था? कहां चूक हो गई। हालांकि मेरे लेखक सहमत नहीं होंगे,लेकिन मुझे लगता है कि पटकथा में गड़बड़ी रह गई थी। अगर हम उसे चुस्त और अलग रखते तो फिल्म का प्रभाव बदल जाता। अभिनय,संगीत,प्रोडक्शन आदि में कोई कमी नहीं दिखती। इस फिल्म में अभिनय के लिए सोनाक्षी सिन्हा और रणवीर सिंह की तारीफ होती है। मैं किसी को दोषी नहीं ठहराना चाहता। मैं निर्देशक हूं। यह मेरी जिम्मेदारी थी कि कमियों को दूर करूं। स्क्रीनप्ले दुरुस्त करूं। ‘लूटेरा’ प्योरिस्ट फिल्म हो गई थी। ऐसी फिल्म कुछ लोगों को बेहद पसंद आती है,लेकिन आम दर्शक बिदक जाते हैं। उन्हें ऐसी फिल्म हजम नहीं होती। फस्र्ट हाफ और सेकेंड हाफ दोनों जगह में स्क्रीनप्ले में दिक्कतें रह गई थीं।
-क्या ‘लूटेरा’ के परिणाम ने आप को शिथिल कर दिया। खबर थी कि अगली फिल्म आप जल्दी ही आरंभ कर देंगे।
0 मुझे अपनी फिल्म जनवरी में ही आरंभ करनी थी। सब कुछ तय था।पहले इमरान खान के साथ यह फिल्म होनी थी। अभी सिद्धार्थ मल्होत्रा के साथ करूंगा। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में स्टार की कमी है। उनकी तारीखों की समस्या रहती है। फिल्म निर्माण की इन अंदरूनी तब्दीलियों से फिल्म में देर हो जाती है। अभी दिसंबर में अपनी फिल्म आरंभ करूंगा। खली तो हूं नहीं। फैंटम के प्रोडक्शन की अन्य फिल्में भी देखनी होती हैं।
-फैंटम फिल्म्स में क्या-क्या चल रहा है? अभी कौन सी फिल्में आएंगी?
0 अनुष्का शर्मा की फिल्म ‘एनएच10’ की शूटिंग पूरी हो चुकी है। इसमें नील गोपालन भी हैं। इसके निर्देशक नवदीप सिंह हैं। 19 ाितंबर को अनुराग कश्यप की ‘अग्ली’ रिलीज होगी। उनकी ही ‘बांबे वेलवेट’ के पोस्ट प्रोडक्शन का काम चल रहा है। यह फिल्म भी दिसंबर में रिलीज हो रही है। नवाजुद्दीन सिद्दिकी के साथ ‘घूमकेतु’ बन रही है। साथ में रघुवीर यादव और इला अरूण हैं। उसे पुष्पेन्द्र मिश्र निर्देशित कर रहे हैं। हर्ष कुलकर्णी की एक फिल्म है। अभिषेक चौबे के साथी एक फिल्म आरंभ होगी। मेरी फिल्म का प्रिप्रोडक्शन चल रहा है। उसकी रायटिंग और डेवलपमेंट का काम है। फैंटम के लिए यह साल महत्वपूर्ण है। आगे का रोडमैप अभी की फिल्मों की रिलीज के बाद तय होगा।
-क्या रोडमैप है ?
0 हमारा तो सब कुछ खुला और सभी का जाना हुआ है। हमें फिल्में बनानी है। छोटी-बड़ी हर तरह की फिल्मों की योजनाएं हैं। टीवी और ऐड फिल्मों में भी घुसना है। हर दिशा में फैलना है। बड़ी और बेहतर फिल्में बनानी हैं। आप देखें कि अनुराग कश्यप की ‘बांबे वेलवेट’ कितनी बड़ी फिल्म हो गई है। विकास और मेरी फिल्म भी बड़ी होगी। हमलोग अपनी सारी फिल्में किसी न किसी के सहयोग से बना रहे हैं। इसमें रिस्क की शेयरिंग हो जाती है। कोप्रोडयूसर के साथ रहने से आसानी हो जाती है।
-फैंटम में आप की क्या भूमिका रहती है?
0 हमलोगों के काम उस तरह से परिभाषित नहीं हैं। विकास,अनुराग और मैं ... तीनों स्क्रिप्ट पढ़ते हैं। जो अच्छी लग जाती है,उसे बनाते हैं। मधु मंटेना हम सभी के संरक्षक और मालिक हैं। वे हम पर नियंत्रण रखते हैं। हमारी कोशिश रहेगी कि क्वालिटी और कंटेंट पर फोकस रहे। हम सिर्फ बिजनेस करने नहीं आए हैं। चार में से हम तीन तो डायरेक्टर ही हैं। हमलोग बाहर की प्रतिभाओं का स्वागत करते हैं। जाहिर सी बात है कि हम अपनी पसंद से ही फिल्में चुन रहे हैं। वैरायटी तो दिखेगी।
-आप थोड़े स्थिर भाव के डायरेक्टर लगते हैं। किसी हड़बड़ी में नहीं दिखते।
0इतने सालों के अनुभव से जान लिया है कि अपना काम जमा कर करो। जल्दबाजी से क्या होगा? एक स्थिति ऐसी आ गई कि हमें एक्टर बदलना पड़ा। इमरान ने ना कर दिया। अभी सिद्धार्थ मल्होत्रा फायनल हुए हैं। ‘भावेश जोशी’ एक्शन फिल्म है। विकास बहल की फिल्म ‘शानदार’ डेस्टिनेशन वेडिंग पर है। आजकल यह फैशन में है। लोग यूरोप जाकर शादियां कर रहे हैं। इसमें शाहिद कपूर और आलिया भट्ट हैं।


Monday, July 14, 2014

मन के काम में मजा है -अजय देवगन


-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दिनों अजय देवगन हैदराबाद की रामोजी राव फिल्मसिटी में ‘सिंघम रिटन्र्स’ की शूंटिंग कर रहे थे। यह 2011 में आई ‘सिंघम’ का सिक्वल है। अब बाजीराव सिंघम गोवा से ट्रांसफर होकर मुंबई आ गया है। यहां उसकी भिड़ंत अलग किस्म के व्यक्तियों से होती है। ये सभी राजनीति और सामाजिक आंदोलन की आड़ में अपने स्वार्थो में लगे हैं। हैदराबाद की रामोजी राव फिल्मसिटी रोहित शेट्टी को प्रिय है। वे यहां के नियंत्रित माहौल में शूूटिंग करना पसंद करते हैं। काम तेजी से होता है और लक्ष्य तिथि तक फिल्म पूरी करने में आसानी रहती है। ‘सिंघम रिटन्र्स’ 15 अगस्त को रिलीज होगी।
    अजय देवगन पिछले कुछ समय से आजमाए हुए सफल निर्देशकों के साथ ही काम कर रहे हैं। रोहित शेट्टी के साथ उनकी खूब छनती है। फिल्मों में आने से पहले की उनकी दोस्ती का आधार परस्पर विश्वास है। ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ के अलावा रोहित शेट्टी ने मुख्य रूप से अजय देवगन के साथ ही काम किया है। दोनों की जोड़ी हिट और सफल है। उन्होंने ‘सिंघम’ की शूटिंग 45 दिनों में कर ली थी। इस बार ़3 दिनों का ज्यादा समय मिला है। ‘सिंघम रिटन्र्स’ फलक और गहराई में पहली से बड़ी हो गई है। बाजीराव सिंघम गोवा में एसीपी था। मुंबई आने के बाद प्रमोशन पाकर वह डीसीपी हो गया है। जिम्मेदारियों के साथ चुनौतियां भी बढ़ गई हैं। सिंघम के प्रभाव से अजय देवगन वाकिफ हैं। वे बताते हें कि नासिक में एक बार एक गांव के लोगों ने अपने थाने के इंस्पेक्टर के बारे में बताया कि यह हमारे गांव का सिंघम है। इसने यहां के एमएलए को मारा था। वे कहते हैं पुलिस अधिकारियों के लिए सिंघम विशेषण बन चुका है। यही कारण है कि सफलता के बावजूद वे सिक्चल और फ्रेंचाइज फिल्मों की हडग़ड़ी में नहीं रहते। अजय देवगन कहते हैं,‘सही स्क्रिप्ट की तलाश रहती है। आश्वस्त होने के बाद ही हम नई फिल्म पर काम करते हैं। एक अनकहा दबाव रहता है कि दर्शक निराश न हों। इसे लिखने में डेढ़ साल लगे हैं। दक्षिण में सूर्या की ‘सिंघम’ की सिक्वल आ चुकी है। इस बार हम ने उन्हें बता दिया है कि हम कहानी अलग दिशा में ले जा रहे हैं। ’
    बातचीत के दरक्यान अजय देवगन बताते हैं कि ‘सिंघम’ बच्चों और औरतों के बीच काफी पॉपुलर रही है। औरतों के बीच फिल्म की पॉपुलैरिटी के बारे में उनकी राय है कि आज औरतों के बीच अधिक गुस्सा है। वे ादियों से दबी-सहमी ाही हैं। अब उन्हें मौका मिल रहा है। उन्हें बाजीराव सिंघम की ईमानदारी और पारिवारिक मूल्यों के प्रति आस्था अच्छी लगी होगी। वे आगे कहते हैं,‘बच्चों को तो एक्शन पसंद आता है। उनकी वजह से ही हम अपनी फिल्मों में पर्दे पर खून नहीं दिखाते हैं। हमारी फिल्मों में एक्शन हिंसक और खूंरेज नहीं होता।’ इस बार करीना कपूर आ गई हैं। क्या करीना कपूर भी एक्शन करती दिखेंगी? अजय कहते हैं,‘एक्शन है,लेकिन वह कूद-फांद या मारधाड़ नहीं है। उनका किरदार आक्रामक है। कुछ भी गलत होता देख वह उखड़ जाती है।’
    एक्शन अब पहले से आसान और सुरक्षित हो गया है। अजय देवगन अपनी फिल्मों में एक्शन के लिए मशहूर रहे हैं। पहली फिल्म से बनी इमेज अभी तक बरकरार है। वे बताते हैं,‘अभी केबल और वायर से सुरक्षा बढ़ गई है। मुझे वायर वगैरह बांधने में आलस्य लगता है। मैं आज भी चाहता हूं कि पहले की तरह ही एक्शन कर लूं। अभी लोग मना करते हैं। पहले चार माले तक की ऊंचाई से कूद जाया करते थे। हालांकि उसकी वजह से वोटें भी आई हैं।’ यह बताने के साथ वे कमर में लगाए आइस पैक निकाल कर दिखाते हैं। हमें आश्चर्य होता है कि इतनी तकलीफ में तो सामान्य व्यक्ति बिस्तर पकड़ लेता है,जबकि अजय देवगन शूटिंग और बातचीत कर रहे हैं। वे समझाते हैं,‘जिस काम में मजा आता है,उस काम की तकलीफ दर्द नहीं देती।’
    23 सालों के करिअर में हर तरह और विधा की फिल्में कर चुके अजय देवगन ‘जख्म’ के किदार अजय को अपने अधिक करीब पाते हैं। इस फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था।  महेश भट्ट की आत्मकथात्मक ‘जख्म’ 1998 में आई थी। अजय बताते हैं,‘फिल्म की कहानी ने मुझे इस कदर छुआ था कि मैंने भट्ट साहब से अनुमति मांगी थी कि मुझ से किसी एक्टिंग की मांग न करें। मुझे खुद में रहने दें। अगर किरदार की पीड़ा चेहरे पर नजर आ गई तो ठीक ,वर्ना अपना बैड लक। उनके गो अहेड कहने से फिल्म इतनी सुंदर बनी और मुझे नेशनल अवार्ड मिला।’ अजय ‘जख्म’ जैसी और भी फिल्में करना चाहते हैं। उन्हें वैसी कोई स्क्रिप्ट नहीं मिल पा रही है। हां,उन्होंने तय किया है कि वे जल्दी ही फिर से निर्देशक की कुर्सी पर बैठेंगे। इस फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी जा रही है। उनके निर्देशन में बनने वाली फिल्म में इस बार काजोल नहीं होंगी।
   

Sunday, July 13, 2014

लिखनी थी दिलचस्प किताब-पंकज दूबे

-अजय ब्रह्मात्मज
पेशे से पत्रकार रहे पंकज दूबे का पहला उपन्यास एक साथ हिंदी और अंग्रेजी में छपा। हिंदी में इसका नाम ‘लूजर कहीं का’ और अंग्रेजी में ‘ह्वाट अ लूजर’ है। दोनों ही भाषाओं में यह किताब बेस्ट सेलर रही है। पंकज दूबे में हिंदी-अंग्रेजी के विरले लेखकों में हैं,जो समान गति और ज्ञान से हिंदी और अंग्रेजी में लिख सकते हैं। अभी वे मुंबई मैं अपनी पत्नी श्रद्धा और बेटी कुग्गी के साथ रहते हैं। पंकज जल्द ही फिल्म निर्देशन में कदम रखना चाहते हैं। उनकी पहली फिल्म ‘लूजर कहीं का’ पर आधारित होगी।
-क्या चल रहा है अभी? आप के पहले उपन्यास का जोरदार स्वागत हुआ।
0 ‘लूजर कहीं का’ अभी तक बिक ही रही है। इस बीच एक निर्माता ने इस उपन्यास के फिल्मांकन में रुचि दिखाई। मेरी योजना थी कि आराम से इसी पर स्क्रिप्ट तैयार करूंगा और फिर स्टूडियोज और निर्माताओं के पास जाऊंगा। मेरी तैयारी के पहले ही कोई तैयार हो गया। अभी मैं ‘लूजर कहीं का’ की स्क्रिप्ट लिख रहा हूं।
-इतनी आसानी से निर्माता मिल गया? यहां तो निर्देशकों को लंबा स्ट्रगल करना पड़ता है?
0 स्ट्रगल तो मैंने भी किया है,लेकिन मैं उसे निर्देशक बनने की प्रक्रिया मानता हूं। इस निर्माता ने भी पूरी तहकीकात और जांच के बाद ही सहमति दी है। इस उपन्यास के दो दृश्यों की डमी शूटिंग कर उन्हें दिखायी। वे राजी और आश्वस्त हुए कि मैं निर्देशित कर सकता हूं ‘लूजर कहीं का’ एंटरटेनिंग फीचर फिल्म होगी। मुख्यधारा की फिल्मों के सारे तत्व इसमें रहेंगे। हमलोग जल्दी ही शूटिंग आरंभ करेंगे।
-उपन्यास को एक साथ हिंदी और अंग्रेजी में लाने का विचार क्यों और कैसे आया?
0 मेरे दोस्त दोनों भाषाओं के हैं। मैं स्वयं सोचता तो हिंदी में हूं,लेकिन मेरे अध्ययन और एक्सप्रेशन की भाषा अंग्रेजी रही है। मैं दोनों भारूााओं में सहज और प्रवहमान हूं। मैंने देखा और पाया कि हिंदी की बात अंग्रेजी में या अंग्रेजी के साथ की जाए तो आदर और स्वीकार बढ़ जाता है। सिर्फ हिंदी हिंदी करूं तो धारणा बनती है कि अंग्रेजी नहीं आती होगी। दूसरे डिजिटल मीडिया में अभी तक अंग्रेजी का चलन है। मेरा उपन्यास काउबेल्ट कॉमेडी है। उसके पाठक हिंदी में हैं,लेकिन चर्चा के लिए अंग्रेजी जरूरी है। नतीजतन दोनों ही भारूााओं में उपन्यास बेस्टसेलर रहा। अब फिल्म आएगी तो किताब से फिल्म को फायदा होगा और फिर फिल्म से किताब की आगे बिक्री बढ़ेगी।
-आप का उपन्यास लोकप्रिय होगा,इस अनुमान और विश्वास का आधार क्या था?
0 मैं खुद ़ ़ ़ मैं बेहद संकोची पाठक हूं। मुझ ज्यादातर साहित्य बोझिल और अप्रासंगिक लगता रहा है। मैं दिलचस्प किताब लिखना चाहता था। एक अनुभव शेयर करना चाहूंगा। बीबीसी की नौकरी के दरम्यान एक बार सुबह दफ्तर से लौट रहा था। मैंने देखा कि एक दुकान के आगे भीड़ लगी है। पता करने पर मालूम हुआ कि आज जेके रोलिंग की हैरी पॉटर सीरिज में नयी किताब आ रही है। वह दृश्य दिमाग में बैठ गया। मैं बेस्ट सेलर ही लिखना चाहता था। इच्छा रही कि जो नहीं पढ़ते उन्हें पाठक बनाया जाए। मुझे लगता है कि पाठक लेखक की तुलना में तेजी से परिपक्व हो रहे हैं। 16 से 21 की उम्र के पाठकों के सपने,विजुअल और भाषा बदल चुकी है,लेकिन हमारे लेखक अपने टाइमलाइन में फंसे हुए हैं। ह्वाट्स ऐप जेनरेशन के लिए लिखना जरूरी है। लेखन क्लिफहैंगर हो। पाठक किताब न रखे। लिखते समय ही आश्वस्त हो गया था कि बात बन रही है।
-लेखन की प्रक्रिया क्या रही?
-लेखन की प्रक्रिया क्या रही?   
0 दोनों भाषाओं में साथ लिखता गया। कंसेप्ट और शुरुआत अंग्रेजी में रही। फिर कभी हिंदी में लिखा तो कुछ ज्यादा चैप्टर लिख दिए। ऐसा अंग्रेजी के साथ भी हुआ। घटनाक्रम और स्ट्रक्चर एक जैसा है,लेकिन दोनों में से कोई भी अनुवाद नहीं है। अगर हिंदी श अंग्रेजी में बाद में कुछ नया आ गश तो उसे दूसरी भाषा में डाल देता था। भाषा और सेंस ऑफ ह्यूमर में मेहनत करनी पड़ी।
-साहित्यकारों का क्श रेस्पांस रहा?
0 अभी तक गालियां पड़ी नहीं हैं। अगर किसी ने दी भी हो तो मुझ तक नहीं पहुंची है। मुझे तो तारीफ ही मिली है। कुछ लोगों को इसमें श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी की झलक मिली। मेरे लिए यह बड़ी बात है। अच्छी बात है कि उपन्यास पर गंभीर विमर्श भी हुआ है। इसके गंभीर पहलुओं को रेखांकित किया गया है।

   



Friday, July 11, 2014

फिल्‍म समीक्षा : हंप्‍टी शर्मा की दुल्‍हनिया

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
हिदी फिल्मों की नई पीढ़ी का एक समूह हिंदी फिल्मों से ही प्रेरणा और साक्ष्य लेता है। करण जौहर की फिल्मों में पुरानी फिल्मों के रेफरेंस रहते हैं। पिछले सौ सालों में हिंदी फिल्मों का एक समाज बन गया है। युवा फिल्मकार जिंदगी के बजाय इन फिल्मों से किरदार ले रहे हैं। नई फिल्मों के किरदारों के सपने पुरानी फिल्मों के किरदारों की हकीकत बन चुके हरकतों से प्रभावित होते हैं। शशांक खेतान की फिल्म 'हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया' आदित्य चोपड़ा की फिल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' की रीमेक या स्पूफ नहीं है। यह फिल्म सुविधानुसार पुरानी फिल्म से घटनाएं लेती है और उस पर नए दौर का मुलम्मा चढ़ा देती है। शशांक खेतान के लिए यह फिल्म बड़ी चुनौती रही होगी। उन्हें पुरानी फिल्म से अधिक अलग नहीं जाना था और एक नई फिल्म का आनंद भी देना था।
चौधरी बलदेव सिंह की जगह सिंह साहब ने ले ली है। अमरीश पुरी की भूमिका में आशुतोष राणा हैं। समय के साथ पिता बदल गए हैं। वे बेटियों की भावनाओं को समझते हैं। थोड़ी छूट भी देते हैं, लेकिन वक्त पडऩे पर उनके अंदर का बलदेव सिंह जाग जाता है। राज मल्होत्रा इस फिल्म में हंप्टी शर्मा हो गया है। मल्होत्रा बाप-बेटे का संबंध यहां भी दोहराया गया है। हंप्टी लूजर है। सिमरन का नाम काव्या हो गया है। उसमें गजब का एटीट्यूड और कॉन्फिडेंस है। वह करीना कपूर की जबरदस्त फैन है। काव्या की शादी आप्रवासी अंगद से तय हो गई है। पुरानी फिल्म का कुलजीत ही यहां अंगद है। शादी के ठीक एक महीने पहले काव्या मनीष मल्होत्रा का डिजायनर लहंगा खरीदना चाहती है, जो करीना कपूर ने कभी पहना है। अंबाला में वैसा लहंगा नहीं मिल सकता, इसलिए वह दिल्ली आती है। दिल्ली में हंप्टी और काव्या की मुलाकात होती है। पहली नजर में प्रेम होता है और 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' की कहानी थोड़े फेरबदल के साथ घटित होने लगती है।
शशांक खेतान की फिल्म पूरी तरह से 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' पर आश्रित होने के बावजूद नए कलाकरों की मेहनत और प्रतिभा के सहयोग से ताजगी का एहसास देती है। यह शशांक के लेखन और फिल्मांकन का भी कमाल है। फिल्म कहीं भी अटकती नहीं है। उन्होंने जहां नए प्रसंग जोड़े हैं, वे चिप्पी नहीं लगते। 'हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया' आलिया भट्ट के एटीट्यूड और वरुण धवन की सादगी से रोचक हो गई है। दोनों कलाकारों ने अपने किरदारों के मिजाज को अच्छी तरह निभाया है। वरुण के अभिनय व्यवहार में चुस्ती-फुर्ती है। वे डांस, एक्शन और रोमांस के दृश्यों में गति ले आते हैं। दूसरी तरफ आलिया ने इस फिल्म में काव्या की आक्रामकता के लिए बॉडी लैंग्वेज का सही इस्तेमाल किया है। खड़े होने के अंदाज से लेकर चाल-ढाल तक में वे किरदार की खूबियों का उतारती हैं। अलबत्ता कहीं-कहीं उनके चेहरे की मासूमियत प्रभाव कम कर देती है। लंबे समय के बाद आशुतोष राणा को देखना सुखद रहा। बगैर नाटकीय हुए वे आधुनिक पिता की पारंपरिक चिंताओं को व्यक्त करते हैं। हंप्टी शर्मा के दोस्तों की भूमिका में गौरव पांडे और साहिल वैद जंचते हैं। सिद्धार्थ शुक्ला अपनी पहली फिल्म में मौजूदगी दर्ज करते हैं।
शशांक खेतान की 'हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया' हंसाती है। यह फिल्म रोने-धोने और बिछड़े प्रेम के लिए बिसूरने के पलों को हल्का रखती है। भिड़ंत के दृश्यों में भी शशांक उलझते नहीं हैं। यह फिल्म अंबाला शहर और दिल्ली के गलियों के उन किरदारों की कहानी है,जो ग्लोबल दौर में भी दिल से सोचते हैं और प्रेम में यकीन रखते हैं। शशांक खेतान उम्मीद जगाते हैं। अब उन्हें मौलिक सोच और कहानी पर ध्यान देना चाहिए।
अवधि: 134 मिनट
*** तीन स्‍टार

Thursday, July 10, 2014

दरअसल : बिमल राय

दरअसल ़ ़ ़
बिमल राय
    पिछली सदी के छठे-सातवें दशक को हिंदी फिल्मों का स्वर्ण युग माना जाता है। स्वर्ण युग में के आसिफ, महबूब खान,राज कपूर,वी शांताराम और गुरूदत्त जैसे दिग्गज फिल्मकारों के साथ बिमल राय का भी नाम लिया जाता है। बिमल राय ने कोलकाता के न्यू थिएटर के साथ फिल्मी करिअर आरंभ किया। वहां वे बतौर फोटोग्राफर और कैमरामैन फिल्मों के निर्माण में सहयोग देते रहे। पीसी बरुआ और नितिन बोस के सान्निध्य में वे फिल्म निर्माण से परिचित हुए और निजी अभ्यास से निर्देशन में निष्णात हुए। बंगाल में रहते हुए उन्होंने बंगाली फिल्म ‘उदयेर पाथे’ का निर्देशन किया। बाद में यही फिल्म हिंदी में ‘हमराही’ नाम से बनी थी। फिल्म का नायक लेखक था,जो अपने शोषण के खिलाफ जूझता है। फिल्मों में सामाजिक यथार्थ और किरदारों के वास्तविक चित्रण का यह आरंभिक दौर था।
    इस समय तक बंगाल विभाजन के प्रभाव में कोलकाता की फिल्म इंडस्ट्री टूट चुकी थी। आजादी के बाद लाहौर के पाकिस्तान में रह जाने और कोलकाता में फिल्म निर्माण कम होने से मुंबई में निर्माता-निर्देशको की जमघट और गतिविधियां बढ़ रही थीं। लाहौर से विस्थापित पंजाबी मूल के फिल्मकारों ने मुंबई को मुफीद समझा। बेहतर संभावनाओं की तलाश में बंगाल समेत देश के सभी राज्यों से विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिभाएं मुंबई कूच कर रही थीं। इसी दौर में अशोक कुमार ने बिमल राय को मुंबई आने और बांबे टाकीज के साथ काम करने का निमंत्रण दिया। मुंबई आने के पश्चात बिमल राय ने ‘मां’ का निर्देशन किया। इसमें भारत भूषण और लीला चिटणीस मुख्य भूमिकाओं में थे। बांबे टाकीज इस समय तक खस्ता हाल हो चुका था। चूंकि बिमल राय का अशोक कुमार ने ही मुंबई बुलाया था,इसलिए उन्होंने उनकी अगली फिल्म के निर्माण की जिम्मेदारी स्वयं ले ली। अशोक कुमार और मीना कुमारी के साथ शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास पर बिमल राय ने इस फिल्म का निर्माण किया। इसमें भी बिमल राय ने यथार्थवादी शैली रखी। दशकों बाद प्रदीप सरकार ने ‘परिणीता’ के रिमेक में विद्या बालन को मौका दिया।
    इस समय तक बिमल राय का आत्मविश्वास काफी बढ़ चुका था। भारत में पहली बार आयेजित इंटरनेयानल फिल्म फेस्टिवल में इटली की यथार्थवादी फिल्में देख कर अनेक फिल्मकार प्रभावित हुए। उनमें सत्यजित राय और बिमल राय प्रमुख थे। बिमल राय ने दोस्तों के मना करने पर भी अपनी प्रोडक्शन कंपनी स्थापित की और ‘दो बीघा जमीन’ का निर्माण आरंभ किया। इस फिल्म की कहानी मशहूर संगीतकार सलिल चौधरी ने लिखी थी। फिल्म में उन्हीं का संगीत था। फिल्म की पटकथा और संपादन की जिम्मेदारी हृषिकेष मुखर्जी ने संभाली थीं। बलराज साहनी और निरुपा राय अभिनीत ‘दो बीघा जमीन’ आजादी के तुरंत अपनी जमीन से बेदखल होते किसान की व्यथा कथा है। गांव से विस्थापित होकर शहर आ रहे किसान आजीविका के चक्र में फंस कर किस दुखांत जिंदगी की ओर अग्रसर रहे हैं? बिमल राय ने किरदार,परिवेश और तत्कालीन स्थितियों को वास्तविक और विश्वसनीय तरीके से चित्रित किया था। ‘दो बीघा जमीन’ अपनी वास्तविकता के कारण सोवियत संघ और चीन में बेहद पसंद की गई थी। इस फिल्म की इंटरनेशनल ख्याति ने सभी को विस्मित कर दिया था।
    बिमल राय की 109वीं वर्षगांठ पर मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय में 7 जुलाई से एक प्रदर्शनी लगी है। पहली बार किसी फिल्मकार के कृतित्व और जीवन पर ऐसी प्रदर्शनी का आयोजन किया गया है। इस प्रदर्शनी में बिमल राय की फिल्मों से संबंधित दुर्लभ सामग्रियां प्रदर्शित की जा रही हैं। बिमल राय की बेटी रिंकी राय भट्टाचार्य ने इस प्रदर्शनी के लिए दुर्लभ सामग्रियां मुहैया करवाई हैं। भारतीय सिनेमा के सौ साल हो गए। हर साल सैकड़ों फिल्में भी बनती हैं। उनसे हजारों करोड़ों की कमाई होती है। इन उपलब्धियों बावजूद फिल्मों और फिल्मकारों के लिए अभी तक देश में कोई म्यूजियम नहीं है। पुरानी फिल्मी हस्तियों से संबंधित सामग्रियां उचित रखरखाव के अभाव और उनके वंशजों की लापरवाही से बर्बाद हो रही हैं। भारत सरकार इस दिशा में पहल करे तो उसे फिल्म इंडस्ट्री और फिल्मप्रमियों का सहयोग मिल सकता है।
 (क्रमश:)


Friday, July 4, 2014

फिल्‍म समीक्षा : बॉबी जासूस

Click to enlarge -अजय ब्रह्मात्‍मज 
 इरादे की ईमानदारी फिल्म में झलकती है। 'बॉबी जासूस' का निर्माण दिया मिर्जा ने किया है। निर्देशक समर शेख हैं। यह उनकी पहली फिल्म है। उनकी मूल कहानी को ही संयुक्ता चावला शेख ने पटकथा का रूप दिया है। पति-पत्नी की पहनी कोशिश उम्मीद जगाती है। उन्हें विद्या बालन का भरपूर सहयोग और दिया मिर्जा का पुरजोर समर्थन मिला है। हैदराबाद के मुगलपुरा मोहल्ले के बिल्किश की यह कहानी किसी भी शहर के मध्यवर्गीय मोहल्ले में घटती दिखाई पड़ सकती है। हैदराबाद छोटा शहर नहीं है, लेकिन उसके कोने-अंतरों के मोहल्लों में आज भी छोटे शहरों की ठहरी हुई जिंदगी है। इस जिंदगी के बीच कुलबुलाती और अपनी पहचान को आतुर अनेक बिल्किशें मिल जाएंगी, जो बॉबी जासूस बनना चाहती हैं। मध्यवर्गीय परिवार अपनी बेटियों को लेकर इतने चिंतित और परेशान रहते हैं कि उम्र बढ़ते ही उनकी शादी कर वे निश्चिंत हो लेते हैं। बेटियों के सपने खिलने के पहले ही कुचल दिए जाते हैं। 'बॉबी जासूस' ऐसे ही सपनों और शान की ईमानदार फिल्म है।
बिल्किश अपने परिवार की बड़ी बेटी है। उसका एक ही सपना है कि मोहल्ले में उसका नाम हो जाए। वह जासूसी की दुनिया में मैदान मारना चाहती है। करमचंद उसने देख रखा है। सीआईडी देखती रहती है। जासूसी का काम उसके अब्बा को कतई नापसंद है। वे उम्मीद हार चुके हैं। उन्हें लगता है और यह हमें दिखता भी है कि बेटी को अम्मी का समर्थन और विश्वास हासिल है। बिल्किश कोशिश करती है। उसे पेशेवर जासूसों का प्रोत्साहन नहीं मिलता। उसके हाथ कोई केस भी नहीं आता। अचानक एक दिन एक अमीर उसे एक लड़की की खोज के लिए मोटी रकम एडवांस में देता है। वह सफल होती है। उसे उसी अमीर आदमी से और केस मिलते हैं। सब कुछ अच्छा चल रहा है, तभी उसे संदेह होता है कि अपने शौक और सपनों में कहीं वह कुछ गलत तो नहीं कर बैठी। यहां एक रहस्य बनता है। लेखक-निर्देशक इस रहस्य को बनाए रखने में सफल होते हैं। कामयाबी और जीतने की जिद के साथ बिल्किश अपने दोस्तों के साथ लगी रहती है। इस कोशिश और अभियान में हम उस मोहल्ले के अंतर्विरोधों और सोच से वाकिफ होते हैं। साथ में बाप-बेटी के रिश्ते का अनकहा पहलू भी चलता है, अंत में उजागर होता है।
'बॉबी जासूस' की नायिका विद्या बालन हैं। फिल्मी भाषा में यह फिल्म उनके सबल कंधों पर टिकी है। वह अपनी मजबूत परफॉरर्मेंस से इसे अंत तक निभा ले जाती हैं। उन्हें इसमें सहयोगी कलाकारों का पूरा समर्थन मिला है। विद्या बालन की अनेक खूबियों में एक खूबी यह भी है कि वह रूप और गेटअप बदलते समय अपने रंगरूप की परवाह नहीं करतीं। अनेक दृश्यों में निर्देशक ने उन्हें वास्तविकता की हद तक नैचुरल रखा है। दोस्त, प्रेमी और पति तसव्वुर की क्रमवार भूमिका में अली फजल ने विद्या बालन का समुचित साथ निभाया है। इस फिल्म में राजेन्द्र गुप्ता का अभिनय उल्लेखनीय है। सहयोगी भूमिकाओं में सिद्ध कलाकारों को सीन मिल जाएं तो उनकी प्रतिभा के दर्शन होते हैं। किरण कुमार, आकाश दहिया और प्रसाद बर्वे अपनी भूमिकाओं में जंचते हैं। 'बॉबी जासूस' में सुप्रिया पाठक, तन्वी आजमी और जरीना वहाब के हिस्से ठोस दृश्य नहीं आ सके हैं। ऐसा लग सकता है कि उनकी मौजदूगी के साथ न्याय नहीं हो सका। मुमकिन है निर्देशक ने उन्हें इतनी ही भूमिकाओं के लिए ही चुना हो।
फिल्म में कुछ कमियां भी हैं। बिल्किश की खोजबीन दो प्रसंगों में थोड़ी लंबी हो गई है। फिल्म यहां कमजोर पड़ती है, लेकिन बाद की घटनाओं और कलाकारों के परफॉर्मेंस से उनकी भरपाई सी हो जाती है। बिल्किश और तसव्वुर का रोमांटिक गाना भी फिल्म की थीम में चिप्पी लगता है। अगर ये कमियां नहीं रहतीं तो 'बॉबी जासूस' का प्रभाव और ऊंचाई तक पहुंचता। यह 21 वीं सदी का मुस्लिम सोशल है,जो आज की सच्चाइयों का चित्रण करती है।
अवधि:121 मिनट

फिल्‍म समीक्षा : लेकर हम दीवाना दिल

-अजय ब्रह्मात्‍मज

         दक्षिण मुंबई और दक्षिण दिल्ली के युवक-युवतियों के लिए बस्तर और दांतेवाड़ा अखबारों में छपे शब्द और टीवी पर सुनी गई ध्वनियां मात्र हैं। फिल्म के लेखक और निर्देशक भी देश की कठोर सच्चाई के गवाह इन दोनों स्थानों के बारे में बगैर कुछ जाने-समझे फिल्म में इस्तेमाल करें तो संदर्भ और मनोरंजन भ्रष्ट हो जाता है। 'लेकर हम दीवाना दिल' में माओवादी समूह का प्रसंग लेखक-निर्देशककी नासमझी का परिचय देता है। मुंबई से भागे प्रेमी युगल संयोग से यहां पहुंचते हैं और माओवादियों की गिरफ्त में आ जाते हैं। माओवादियों ने एक फिल्म यूनिट को भी घेर रखा है। उन्हें छोडऩे के पहले वे उनसे एक आइटम सॉन्ग की फरमाइश करते हैं। हिंदी फिल्मों में लंबे समय तक आदिवासियों और बंजारों का कमोबेश इसी रूप में इस्तेमाल होता रहा है। माओवादी 21वीं सदी की हिंदी फिल्मों के आदिवासी और बंजारे हैं।
'लेकर हम दीवाना दिल' आरिफ अली की पहली फिल्म है। आरिफ अली मशहूर निर्देशक इम्तियाज अली के भाई हैं। अभिव्यक्ति के किसी भी कला माध्यम में निकट के मित्रों और संबंधियों का असर होना स्वाभाविक है। 'लेकर हम दीवाना दिल' की संरचना और निर्वाह में इम्तियाज अली का सीधा प्रभाव है। प्रेम और विवाह को लेकर कंफ्यूज नायक-नायिका यहां भी सफर में निकलते हैं। वहां रास्ते में रतलाम पड़ा था। यहां रायपुर शहर आता है। नायक-नायिका की सुहाग रात यहां भी नहीं हो पाती। और भी कई लक्षण इम्तियाज अली की फिल्मों से लिए गए हैं, लेकिन संरचना और निर्वाह में उनकी फिल्मों जैसी कसावट नहीं है। दीनू और करिश्मा के चरित्र चित्रण पर मेहनत नहीं की गई है। दोनों शुरू से अंत तक एक ही अवस्था में रहते हैं। 140 मिनट में उनकी ग्रोथ नहीं होती, जबकि आजकल 140 अक्षरों (ट्विटर) में सब कुछ व्यक्त किया जा रहा है।
दीनू और करिश्मा साथ पढ़ते हैं। शेट्टी परिवार की करिश्मा की शादी तय हो जाती है। करिश्मा अरेंज मैरिज के बंधन में नहीं बंधना चाहती। दीनू के साथ उसकी खटपट चलती रहती है, लेकिन दोनों एक-दूसरे के दीवाने हैं। इस स्थिति में बीयर पीते समय दोनों को एहसास होता है कि क्यों न वे शादी कर लें? अपने परिवारों को राजी करने में विफल होने पर वे अपने घरों से भाग जाते हैं। इस भागमभाग में वे एक-दूसरे से परिचित होते हैं। प्रेम विरक्ति में बदलता है और तलाक की नौबत आ जाती है। तलाक के बाद फिर से पुराना किस्सा दोहराया जाता है। इस बार दोनों के अभिभावक राजी हो जाते हैं। 'लेकर हम दीवाना दिल' ढीली पटकथा और दोहराव से बांध नहीं पाती है।
हर प्रसंग में अरमान जैन के चेहरे पर एक ही भाव टिका रहता है। वे पहली फिल्म में निराश करते हैं। संवाद अदायगी और भाषा उनके अभिनय में आड़े आती है। दीक्षा सेठ फिर भी करिश्मा के किरदार को निभा ले जाती हैं। इस फिल्म में सहयोगी किरदारों ने अवश्य अपनी जिम्मेदारी ढंग से निभायी है, लेकिन नायक-नायिका ही प्रभावहीन हों तो अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते। 'लेकर हम दीवाना दिल' में एआर रहमान का संगीत है। एक 'खलीफा' के अलावा कोई भी गीत याद नहीं रहता है।
अवधि:140 मिनट
** दो स्‍टार 

Thursday, July 3, 2014

दरअसल : नहीं याद आए ख्वाजा अहमद अब्बास


-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले महीने 7 जून को ख्वाजा अहमद अब्बास की 100 वीं सालगिरह थी। 21 साल पहले 1 जून 1987 को वे दुनिया से कूच कर गए थे। किशोरावस्था से प्रगतिशील विचारों से लैस ख्वाजा अहमद अब्बास मुंबई आने के बाद इप्टा में एक्टिव में रहे। अखबारों के लिए नियमित स्तंंभ लिखे। उन्होंने पहले ‘बांबे क्रॉनिकल’ और फिर ‘ब्लिट्ज’  के लिए ‘लास्ट पेज’ स्तंभ लिखा। वे फिल्मों की समीक्षाएं भी लिखा करते थे। आज की तरह ही तब के साधारण फिल्मकार अपनी बुरी फिल्मों की आलोचना पर बिदक जाते थे। किसी ने एक बार कह दिया कि आलोचना करना आसान है। कभी कोई फिल्म लिख क दिखाएं। ख्वाजा अहमद अब्बास ने इसे अपनी आन पर ले लिया। उन्होंने पत्रकारिता के अपने अनुभवों को फिल्म की स्क्रिप्ट में बदला। वे बांबे टाकीज की मालकिन और अभिनेत्री देविका रानी से मिले। देविका रानी ने उस पटकथा पर अशोक कुमार के साथ ‘नया संसार’ 1941 नामक फिल्म का निर्माण किया। इसे एनआर आचार्य ने निर्देशन किया था? निर्देशन में आने के पहले वे भी पत्रकार थे। क्रांतिकारी पत्रकारिता की थीम पर बनी यह फिल्म खूब चली थी। बाद में ख्वाजा अहमद अब्बास ने फिल्म निर्माण और निर्देशन में उतरने का फैसला किया तो उन्होंने अपनी कंपनी का नाम नया संसार रखा।
     1941 में आई ‘नया संसार’ के बाद 1946 में उन्होने चेतन आनंद के लिए ‘नीचा नगर’ की स्क्रिप्ट लिखी। मक्सिम गोर्की के उपन्यास ‘लोअर डेफ्थ’ से प्रेरित इस फिल्म में अमीर और गरीब के संघर्ष और टकराहट की कहानी सामाजिक संदर्भ के साथ लिखी गई थी। इसी फिल्म के एक प्रसंग से प्रेरित होकर शेखर कपूर ‘पानी’ फिल्म बना रहे हैं।  ‘नीचा नगर’ भारत से कान फिल्म फेस्टिवल भेजी गई थी। इसे श्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार भी मिला था। यह अभिनेत्री कामिनी कौशल और संगीतकार रवि शंकर की पहली फिल्म थी। इस फिल्म की प्रशंसा,पुरस्कार और प्रभाव से प्रेरित होकर ख्वाजा अहमद अब्बास ने ‘धरती के लाल’ का लेखन और निर्देशन किया। बलराज साहनी,शंभु मित्रा,तृप्ति मिऋा,जोहरा सहगल,अली सरदार जाफरी और प्रेम धवन जैसी हस्तियां इस फिल्म से जुड़ी थीं। इस फिल्म का निर्माण इप्टा पिक्चर्स ने किया था। हिंदी फिल्मों की वाम दिशा के अध्येताओं के लिए यह फिल्म जरूरी है। उसी साल उनकी लिखी स्क्रिप्ट ‘डॉ ़ कोटनिस की अमर कहानी’ पर वी ़ शांताराम ने फिल्म निर्देशित की। इसमें उन्होंने डॉ ़ कोटनिस की भूमिका भी निभायी थी। 
1951 में ख्वाजा अहमद बब्बास राज कपूर से जुड़ें। उन्होंने ‘आवारा’ लिखी। मजेदार तथ्य है कि अब्बास ने राज कपूर की फ्लाप फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ और सुपरहिट फिल्म ‘बॉबी’ का भी लेखन किया। उन्होंने राज कपूर के लिए ‘श्री 420’,‘जागते रहो’ और ‘हिना’ की भी कहानियां लिखीं। राज कपूर की फिल्मों के साथ उनके जुड़ाव और कामयाबी को अधिकांश प्रशंसकों के लिए पचाना मुश्किल काम रहा। अपनी फिल्मों में वे जिस सामाजिकता और वाम रुझान के साथ आते थे,ठीक उसके विपरीत राज कपूर की व्यावसायिक फिल्मों में उनकी संलग्नता दुविधा पैदा करती है। यही कारण है कि ख्वाजा अहमद अब्बास के योगदान का सार्थक मूल्यांकन नहीं हो सका है। उनकी फिल्मों को भी नजरअंदाज किया गया है। ‘धरती के लाल’,‘आज और कल’,‘अनहोनी’,‘राही’,‘मुन्ना’,‘परदेसी’,‘चार दिन चार राहें’,ईद मुबारक’,‘गिरगाम सैंक्चुरी’,‘फ्लाइट टू असम’, ‘ग्यारह हजार लड़कियां’,‘शहर और सपना’,‘हमारा घर’,‘टुमौरो शैल बी बेटर’,‘आसमान महल’,‘बंबई रात की बांहों में’,‘धरती की पुकार’,‘चार शहर एक कहानी’,‘सात हिंदुस्तानी’ और ‘दो बूंद पानी’ जैसी अनकेक फिल्मों का निर्देशन और लेखन कर चुके ख्वाजा अहमद अब्बास को अज की पीढ़ी सिर्फ इसलिए जनती है कि उन्होंने ‘सात हिंदुस्तानी’ में अमिताभ बच्चन को पहला मौका दिया था।                          
सभी जानते हैं कि महात्मां गांधी को फिल्में नापसंद थीं। गाधी जी के ऐसे विरोधी विचारों को देखते हुए ही ख्वाजा अहमद अब्बास ने उन्हें एक खुला पत्र लिखा था। इस पत्र में उन्होंने गांधी जी से फिल्म माध्यम के प्रति सकारात्मक सोच अपनाने की अपील की थी। अब्बास के पत्र का अंश है - ‘आज मैं आपकी परख और अनुमोदन के लिए अपनी पीढ़ी के हाथ लगे खिलौने - सिनेमा को रखना चाहता हूं। आप सिनेमा को जुआ, सट्टा और घुड़दौड़ जैसी बुराई मानते हैं। अगर यह बयान किसी और ने दिया होता, तो हमें कोई चिंता नहीं होती ़ ़ ़ लेकिन आपका मामला अलग है। इस देश में या यों कहें कि पूरे विश्व में आपको जो प्रतिष्ठा मिली हुई है, उस संदर्भ में आपकी राय से निकली छोटी टिप्पणी का भी लाखों जनों के लिए बड़ा महत्व है। दुनिया के एक सबसे उपयोगी आविष्कार को ठुकराया या इसे चरित्रहीन लोगों के हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता। बापू, आप महान आत्मा हैं। आपके हृदय में पूर्वाग्रह के लिए स्थान नहीं है। हमारे इस छोटे खिलौने सिनेमा पर ध्यान दें। यह उतना अनुपयोगी नहीं है, जितना दिखता है। इसे आपका ध्यान, आर्शीवाद और सहिष्णु मुस्कान चाहिए।’
अफसोस की बात है कि ऐसे धुरंधर और महत्वपूर्ण फिल्मकार की जन्मशती पर फिल्म इंडस्ट्री खामोश है। दिलली और अलीगढ़ में अलबत्ता कुछ कार्यक्रमों में उन्हें याद किया गया,लेकिन मुंबई में लगभग सन्नाटा रहा।  केवल सांस्कृतिक संस्था ‘चौपाल’ में उनकी स्मृति में एक कार्यक्रम रखा गया था।