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Sunday, June 29, 2014

मधुमती का बुकलेट

सिनेमा के छात्र,अध्‍येता और कर्ता इसे अवश्‍य देखें और पढ़ें1 पहले यह चलन था कि फिल्‍म के साथ ऐसे बुकलेट छापे जाते थे। इसमें  कथासार,गाने और कल‍ाकारों तकनीशियनों की सूची रहती थी। इन दिनों हर कोई कहानी बताने या सुनाने से परहेज करता है। पहले ऐसा कोई डर नहीं रहता था। बिमल राय की मधुमती का यह बुकलेट मुझे उनकी बेटी रिंकी राय भट्टाचार्य के सौजन्‍य से मिला। बिमल राय के समय और जीवन पर एक प्रदर्शनी आगामी 7 जुलाई से मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज वास्‍तु संग्रहालय के क्‍यूरेटर गैलरी में आरंभ हो रही है। इसका उद़्घाटन हंसल मेहता करेंगे।। भारत में हम हर साल सैकड़ों फिल्‍में बनाते हैं और लगभग उतने ही नष्‍ट भी कर देते हैं। तात्‍पर्य यह कि फिल्‍मों का संग्रहालय तो है ,लेकिन उसके रख-रखाव और संरक्षण पर पर्याप्‍त्‍ा ध्‍यान नहीं दिया जाता। स्‍वयं निर्माताओं की भी संरक्षण में रुचि नहीं रहती।        









Saturday, June 28, 2014

किरदार में डूब कर मिलती है कामयाबी : विद्या


सशक्त अभिनेत्रियों की फेहरिस्त में विद्या बालन अग्रिम कतार में आती हैं। उनकी हालिया फिल्म ‘शादी के साइड इफेक्ट्स’ बॉक्स ऑफिस चमक बिखेर नहीं सकी, मगर वे जल्द ‘बॉबी जासूस’ से वापसी करने की तैयारी में हैं। उनके करियर को रवानगी प्रदान करने में ‘कहानी’ और ‘द डर्टी पिक्चर’ की अहम भूमिका रही है। अदाकारी को लेकर उनका अप्रोच जरा हटके है। वे साझा कर रही हैं अपनी कार्यप्रणाली
    मैं किरदार की आत्मा में उतरने के लिए आमतौर पर स्क्रिप्ट को बड़े ध्यान से सुनती और पढ़ती हूं। मैं किरदार की अपनी पृष्ठभूमि तैयार करती हूं। अक्सर किरदार से प्यार करने लग जाती हूं और फिर उसे पोट्रे करती हूं। उस लिहाज से मेरे करियर में ‘कहानी’ सबसे चुनौतीपूर्ण फिल्म रही है। विद्या बागची को मुझे कैसे पेश करना है, वह मेरी समझ में परे था। सुजॉय घोष ने भी मुझे पूरी स्क्रिप्ट नहीं सुनाई थी। उन्होंने मुझे बस उसकी एक लाइन सुनाई। उसके आगे विद्या बागची के किरदार की कहानी बस कहानी थी। उसका एक फायदा यह हुआ कि मैं विद्या बागची के चेहरे पर असमंजस भाव लगातार कायम रख सकी। मैं उसे परफॉरमेंस नहीं कहूंगी। मैंने उस किरदार को जिया। उसे निभाने के लिए मैं बतौर विद्या बालन कुछ सोच ही नहीं सकी।
    मेरे ख्याल से उस किरदार के साथ दर्शकों की भी यात्रा चल रही थी। मिस्ट्री आखिरी समय तक बरकरार रही। विद्या बागची की मासूमियत, ईमानदारी और साथ ही दगाबाजी साथ-साथ चली। दर्शक एम्यूज्ड रहे। मैं खुद शूट से पहले और शूट के दरम्यान भी सुजॉय से पूछती रही कि अब आगे क्या? वे मगर बड़ी चालाकी से इधर-उधर की बातें कर मुझे कुछ भी नहीं बताते। शूट के दौरान का एक मजेदार वाकया आप से साझा करना चाहूंगी। विद्या बागची और राणा जब मॉर्चरी हाउस से बाहर निकलते हैं तो राणा विद्या से पूछता है, ‘आप के पति का कोई रिश्तेदार’। विद्या बागची जवाब देती है, ‘चाचा’। बस अब वह चाचा क्यों बोलती है, उसका मोटिव क्या है, मैं व्यक्तिगत तौर पर कुछ समझ नहीं सकी थी। फिल्म देखने के बाद आप सबों की तरह मैं भी समझ सकी कि वह आखिर में क्या कहानी बना रही थी? सुजॉय की वह स्टाइल ऑफ वर्किंग कमाल की थी। उन्होंने मुझे संशय में नहीं रखा होता तो शायद ही विद्या बागची को जी पाई होती।
    अदाकारी की बारीकियां सीखने का सबका अपना तरीका है। अगर आप कहीं से प्रशिक्षण हासिल कर पाते हैं तो बहुत अच्छी बात है। मेरे मामले में वैसा नहीं हो सका था। मेरे संग ऑन द जॉब ट्रेनिंग वाला माजरा था। मैंने मगर पाया है कि किसी भी काम में सिद्धहस्त होने के लिए जिज्ञासु होना, चीजों को महसूस करना और अपने आंख-कान खुले रखना बहुत जरूरी है। मैंने उन चीजों पर हमेशा अमल किया। वह आगे भी कायम रहेगा। एक अच्छी चीज यह रही कि मेरी शुरुआत टीवी फिर मॉडलिंग से हुई। बाद में विज्ञापन फिल्में भी कीं। आखिर में फीचर फिल्मों की ओर मुड़ी। तो मेरा क्रमिक विकास होता रहा। मेरा मानना है कि अगर आप का दिमाग जो चीज कनसीव कर सकता है, उसे अचीव भी करेगा। फिल्मों में मेरे संघर्ष के बारे में हर किसी को पता है। वह काफी लंबा चला था मैं चेंबूर में अपने घर के पास की मंदिर की चौखट पर बिलख-बिलख कर रोई, मगर मेरे परिजनों के अपार सपोर्ट से मेरा मनोबल कायम हुआ। आज मैं इस मुकाम पर हूं।
    मेरा मानना है कि एक अदाकार को बेबाक, बिंदास होना चाहिए। शर्म के पर्दे उस वक्त हटा देने चाहिए, जब सामने मिलन लूथरिया जैसा फिल्मकार हो। आप उन जैसों पर आंखें मूंद कर भरोसा कर सकते हैं। मैं भी शुरू में हालांकि वैसी बेबाक नहीं थी। मुझे याद है ‘परिणीता’ से पहले भी मुझे एक फिल्म ऑफर हुई थी, जिसे मैंने छोटे कपड़े पहनने की अनिवार्यता के चलते ठुकरा दिया था। वहां मगर संबंधित फिल्मकार का मकसद मेरी सेंसुएलिटी को भुनाना था, जो मैं समझ चुकी थी। आप ‘बैंडिट क्वीन’ और ‘डाकू हसीना’ की बोल्डनेस के अंतर को आसानी से समझ सकते हैं। बहरहाल ‘द डर्टी पिक्चर’ में सिल्क की आउटफिट और बॉडी लैंग्वेज को पेश करना मेरे लिए आसान नहीं था। शूट की शुरूआत में मुझमें हिचकिचाहट थी। धीरे-धीरे जब सिल्क की असल जिंदगी के बारे में जाना। उसके बिंदास रवैये को समझा तो मुझमें स्वाभाविक तब्दीली आने लगी। मैंने अपने अंदर की हिचकिचाहट को खत्म किया। सेट पर छोटे कपड़ों में स्वाभाविक तरीके से रहने लगी। सिल्क के अवतार में मुझे मोटी दिखना था। एकबार मेरा वजन कम हुआ तो उसका असर मेरी तोंद पर दिखने लगा था। मिलन के लिए वह चिंता का विषय था। मैं उसी वक्त कैमरे के पीछे गई। अपने पेट के टायरों को बाहर निकाला। कपड़ों को टाइट किया और जब मिलन ने देखा तो वे अवाक थे। उनके सामने वही पुरानी सिल्क थी। आमतौर पर किरदार के गेटअप में उतरना हो तो अपनी फिजिक के साथ भी महीनों प्रयोग करना पड़ता है। आमिर ने वैसा ‘मंगल पांडे’ और ‘गजनी’ के लिए किया था तो फरहान ने अपनी फिजिक पर वैसा काम ‘भाग मिल्खा भाग’ के लिए किया। नतीजा सबके सामने है।
    बॉक्स
भाषा पर मेहनत करती हैं विद्या : सलीम आरिफ
    विद्या की सीखने की जिजीविषा की तारीफ दिग्गज थिएटर आर्टिस्ट सलीम आरिफ भी करते हैं। वे बताते हैं, ‘विद्या के मैनेजर ने एकबारगी मुझे फोन किया। मुझसे कहा कि विद्या आपसे मिलना चाहती हैं। मैंने सवाल किया, क्यों? जवाब चला कि विद्या पाकिस्तान में एक कहानी पाठ करना चाहती हैं। वे चाहती हैं कि उनका उर्दू का उच्चारण परफेक्ट रहे। मैं वह सुन अवाक रह गया। आज की तारीख में अधिकांश से यही सुनने को मिलता है कि सर मैंने एक्टिंग का कोर्स कर लिया। अब जिम ज्वॉइन कर रहा हूं। अगले दो-तीन महीनों में मैदान में उतरने वाला हूं। किसी के मुंह से यह सुनने को नहीं मिला कि अपनी भाषा पर मेहनत करने वाला हूं या करने वाली हूं। विद्या वैसी नहीं हैं, तभी अलग हैं।’
-अमित कर्ण

Friday, June 27, 2014

फिल्‍म समीक्षा : एक विलेन

एंग्री यंग मैन की वापसी 
 -अजय ब्रमात्‍मज 
 गणपति और दुर्गा पूजा के समय मंडपों में सज्जाकार रंगीन रोशनी, हवा और पन्नियों से लहकती आग का भ्रम पैदा करते हैं। दूर से देखें या तस्वीर उतारें तो लगता है कि आग लहक रही है। कभी पास जाकर देखें तो उस आग में दहक नहीं होती है। आग का मूल गुण है दहक। मोहित सूरी की चर्चित फिल्म में यही दहक गायब है। फिल्म के विज्ञापन और नियोजित प्रचार से एक बेहतरीन थ्रिलर-इमोशनल फिल्म की उम्मीद बनी थी। इस विधा की दूसरी फिल्मों की अपेक्षा 'एक विलेन' में रोमांच और इमोशन ज्यादा है। नई प्रतिभाओं की अभिनय ऊर्जा भी है। रितेश देशमुख बदले अंदाज में प्रभावित करते हैं। संगीत मधुर और भावपूर्ण है। इन सबके बावजूद जो कमी महसूस होती है, वह यही दहक है। फिल्म आखिरी प्रभाव में बेअसर हो जाती है।
नियमित रूप से विदेशी फिल्में देखने वालों का 'एक विलेन' में कोरियाई फिल्म 'आई सॉ द डेविलÓ की झलक देख सकते हैं। निस्संदेह 'एक विलेन' का आइडिया वहीं से लिया गया है। उसमें प्रेम और भावना की छौंक लगाने के साथ संगीत का पुट मिला दिया गया है। जैसे कि हम नूडल्स में जीरा और हल्दी डाल कर उसे भारतीय बना देते हैं या इन दिनों चाइनीज भेल खाते हैं, वैसे ही 'एक विलेन' कोरियाई फिल्म का भारतीय संस्करण बन जाती है। चूंकि इस फिल्म के निर्माता ने मूल फिल्म के अधिकार नहीं लिए है, इसलिए ग्लोबल दौर में 'एक विलेन' क्रिएटिव नैतिकता का भी शिकार होती है। हर देश और भाषा के फिल्मकार दूसरी फिल्मों से प्रेरित और प्रभावित होते हैं। कहा ही जाता है कि मूल का पता न चले तो आप मौलिक हैं।
'एक विलेन' मुख्य रूप से गुरु की कहानी है। आठवें और नौवें दशक की हिंदी फिल्मों में ऐ किरदार का नाम विजय हुआ करता था। तब परिवार के कातिलों से बदला लेने में पूरी फिल्म खत्म हो जाती थी। अब ऐसे ग्रे शेड के नायक की कहानी आगे बढ़ती है। सिल्वर स्क्रीन पर अपनी वापसी में एंग्री यंग मैन कुछ और भी करता है। बदला लेने और अपराध की दुनिया में रमने के बाद उसकी जिंदगी में एक लड़की आयशा आती है। आयशा प्राणघातक बीमारी से जूझ रही है। अपनी बची हुई जिंदगी में वह दूसरों की जिंदगी में खुशियां लाना चाहती है। उसे अपने एक काम के लिए गुरु उचित लगता है। इस सोहबत में दोनों का प्रेम होता है। गुरु अपराध की जिंदगी को तिलांजलि दे देता है। वह 9 से 5 की सामान्य जिंदगी में लौटता है, तभी मनोरोगी राकेश के हिंसक व्यवहार से वह फिर से एक बदले की मुहिम में निकल पड़ता है और मोहित सूरी की रोमांचक फिल्म आगे-पीछे की परतों का उजागर करती हुई बढ़ती है।
श्रद्धा कपूर निर्भीक और अकलुष आयशा के किरदार में सहज और स्वाभाविक हैं। मोहित ने उन्हें मुश्किल इमोशन नहीं दिए हैं। मौत के करीब पहुंचने के दर्द और जीने की चाहत के द्वंद्व को श्रद्धा ने व्यक्त किया है। अपनी सुंदर ख्वाहिशों में वह गुरु को बेहिचक शामिल कर लेती है। गुरु के रुप में सिद्धार्थ मल्होत्रा को ठहराव से भरे दृश्य मिले हैं। उन्होंने उन दृश्यों को बखूबी निभाया है। नई पीढ़ी के कलाकारों में सिद्धार्थ दमदार तरीके से अपनी मौजूदगी दर्ज कर रहे हैं। 'एक विलेन' अभिनेता रितेश देशमुख की प्रतिभा के अनदेखे पहलू को सामने ले आती है। वे मनोरोगी और सीरियल किलर के मानस और भाव को पर्दे पर लाने में सफल रहे हैं। तीनों मुख्य कलाकार अपनी भूमिकाओं में जंचते हैं। अगर फिल्म की पटकथा में दहक होती तो 'एक विलेन' इस साल की खास फिल्म हो जाती।
गीत-संगीत में निर्देशक,गीतकार और संगीतकार की मेहनत झलकती है। मिथुन, मनोज मुंतशिर और अंकित तिवारी के शब्द और ध्वनियों में फिल्म के किरदारों का अधूरेपन और टुकड़ा-टुकड़ा जिंदगी को अभिव्यक्ति मिली है। हालांकि संगीत पर आज के दौर का भरपूर असर है,लेकिन शब्दों में संचित उदासी-उम्मीद और निराशा-आशा फिल्म के कथ्य को सघन करती है। निर्देशक ने गीत-संगीत का सार्थक उपयोग किया है।
अवधि: 129 मिनट
*** तीन स्‍टार 

Thursday, June 26, 2014

दरअसल : टीवी में मिलती है ट्रेनिंग


-अजय ब्रह्मात्मज
    इन दिनों सक्रिय अधिकांश फिल्म निर्देशकों के काम को पलट कर देखें तो पाएंगे कि उन्होंने किसी न किसी टीवी शो से शुरुआत की। अभी जो नाम याद आ रहे हैं, उनमें साजिद खान, हंसल मेहता,इम्तियाज अली, अनुराग कश्यप, विशाल भारद्वाज, अनुराग बसु, श्रीराम राघवन, ईशान त्रिवेदी, अनुभव कश्यप, अश्विनी धीर, चंद्रप्रकाश द्विवेदी आदि ने पहले टीवी के लिए शो या धारावाहिक निर्देशित किए। बाद में उन्होंने फिल्मों में हाथ आजमाया और सफल रहे।
    इन सभी ने दूरदर्शन और उसके बाद के दौर में सैटेलाइट टीवी के प्रसार के समय इस क्षेत्र में प्रवेश किया। यह वह दौर था, जब फिल्मों के निर्देशक टीवी शो को अपेक्षाकृत छोटा काम समझते थे। आज भी इस समझ में अधिक बदलाव नहीं आया है। एक बार टीवी की दुनिया से फिल्मों में प्रवेश करने के बाद निर्देशक टीवी की तरफ नहीं लौटते। दोनों अनुराग (बसु और कश्यप) अपवाद हो सकते हैं। इन दोनों ने फिल्मों में कामयाबी हासिल करने के बाद भी टीवी को हेय दृष्टि से नहीं देखा। अनुराग कश्यप का ‘युद्ध’ धारावाहिक जल्द ही प्रसारित होगा।
    21वीं सदी के सिनेमा में आए बदलाव में इन निर्देशकों ने उत्प्रेरक का काम किया है। पिछली सदी के आखिरी दशक में देश के विभिन्न इलाकों से  आई इन प्रतिभाओं ने टीवी में ट्रेनिंग हासिल की। टीवी से इनका जुड़ाव, लेखन, निर्देशन और निर्माण के क्षेत्र में रहा। चूंकि टीवी में निवेश और लाभ का अनुपात सुनिश्चित रहता है और हमेशा नई प्रतिभाओं की जरूरत रहती है, इसलिए इन्हें काम मिला। युवा प्रतिभाओं ने टीवी में मिले अवसरों का भरपूर लाभ उठाया। अपना हाथ साफ किया। ऑडियो विजुअल मीडियम के गुर सीखे। फिर जब फिल्मों में आए तो उनकी कार्यशैली में किफायत,तत्परता और पाबंदी दिखी। फिल्म निर्माण-निर्देशन में प्रचलित आलस्य और फिजूलखर्ची से भिन्न कार्यशैली से इन युवा प्रतिभाओं ने निर्माताओं को लाभ दिया। यही कारण है कि उन्हें टीवी में लगातार काम मिलता रहा। वे भी प्रयोग करते रहे। खुद को भविष्य के लिए तैयार करते रहे।
    इम्तियाज अली की ‘हाईवे’ उनके एक टीवी शो का ही विस्तार है। भविष्य में ऐसी अनेक फिल्में आ सकती हैं। जिनके बीज किसी शो या सोप ऑपेरा में मिल सकते हैं। कहानियों का भरपूर खजाना बन चुका है टीवी। जरूरत है उसे खंगालने और फिल्मों के अनुकूल कहानियां को चुनने की। टीवी पर ऐसे अनेक एपिसोडिक शो आते थे, जिनकी कहानियां एक घंटे में मुकम्मल ढंग से कह दी जाती थीं। ऐसे शो से निर्देशकों को संक्षेप में चुस्त तरीके से विषय की प्रस्तुति आई। स्तंभ के आरंभ में उल्लिखित सभी निर्देशकों की यह भी खूबी रही है कि उन्होंने खुद ही अपने शो की कहानियां लिखीं। पिछले 20 सालों में यह ट्रेंड मजबूत हुआ है। अब निर्देशक ही अपनी फिल्मों के लेखक होते हैं।
    टीवी से जब भी कोई अभिनेता फिल्मों में आता है तो बहुत चर्चा होती है। शाहरुख खान से कपिल शर्मा तक इसके उदाहरण हैं। गौर करें तो ऐसी हलचल निर्देशकों को लेकर नहीं होती। दरअसल सिनेमा और टीवी के माध्यम में ऐतिहासिक तौर पर एक्टर अधिक ख्याति हासिल करते हैं। चूंकि वे दिखते हैं और उनकी फैन फॉलोइंग बनती है,इसलिए प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया की खबरें उन्हीं पर केंद्रित होती हैं। लेखकों अैर निर्देशकों के टीवी से फिल्मों में आने की खबरों का संज्ञान नहीं लिया जाता। फिल्मों के छात्र, शिक्षक और इतिहासकार टीवी और फिल्म के इस रिश्ते पर गंभीर शोध कर सकते हैं।
    दरअसल, टीवी अच्छा और किफायती ट्रेनिंग ग्राउंड हो गया है। फिल्मों में करोड़ों का निवेश और जोखिम रहता है। किसी भी नए निर्देशक को फिल्म निर्देशन का स्वतंत्र भार देने के पहले निर्माता हर तरह से आश्वस्त होना चाहते हैं। टीवी का माध्यम अपेक्षाकृत सस्ता है। यहां यह भी सुविधा रहती है कि अगर निर्देशक अयोग्य साबित हो रहा हे तो निर्माता उसे आसानी से बदल देते हैं। फिल्मों में ऐसा करना सहज नहीं होता। मुंबई में बाहर से आ रहे प्रतिभाएं निर्देशक बनने से पहले मौका मिलते ही टीवी की इंटर्नशिप से नहीं हिचकती। उन्हें मालूम हो चुका है कि फिल्मों में घुसने का यह भी जरिया है।

Tuesday, June 24, 2014

चमकने लगे हैं नए सितारे


-अजय ब्रह्मात्मज
    हिंदी फिल्मों में कुछ सितारे ध्रुवतारे की तरह टिक गए हैं। दशकों से कामयाब इन सितारों की चमक फीकी नहीं पड़ रही है। दर्शक भी इन्हें पसंद करते हैं। वे इनकी फिल्मों के लिए उतावले होते हैं। खानत्रयी (आमिर, सलमान और शाहरुख) का जादू अभी तक बरकरार है। इस साल के आरंभ में सलमान खान की ‘जय हो’ आ चुकी है। हालांकि इस फिल्म ने अच्छा कारोबार नहीं किया, फिर भी कलेक्शन 100 करोड़ से अधिक रहा। 2014 की दूसरी छमाही में आमिर, सलमान और शाहरुख का जलवा दिखेगा। ईद, दीवाली और क्रिसमस के मौके पर आ रही इनकी फिल्में देश के सभी सिनेमाघरों में त्योहार का माहौल बनाएंगी।
    इस बीच पिछले छह महीनों में या यूं कहें कि 2014 की पहली छमाही में कुछ नए सितारों ने अपनी चमक दिखाई है। हिंदी फिल्मों में नवोदित सितारों की ऐसी चमक लंबे समय के बाद नोटिस की जा ही है। ये सभी सितारे अपनी दूसरी-तीसरी फिल्मों से बाजार, इंडस्ट्री और दर्शकों को भरोसा दे रहे हैं कि वे अपनी सामथ्र्य से दर्शकों को एंटरटेन करने के लिए तैयार हैं। इन सितारों की फिल्मों का बिजनेस संतोषजनक है। वे पुराने लोकप्रिय सितारों की परंपरा आगे बढ़ाने के लिए जरूरी गुणों से लैस हैं। यहां तक कि उनमें से कुछ 100 करोड़ क्लब में भी शामिल हो चुके हैं।
    नवोदित सितारों में पहला नाम रणवीर सिंह और परिणीति चोपड़ा का लेना होगा। यशराज फिल्म्स की फिल्मों से आए रणवीर और परिणीति ने दूसरे बैनरों की फिल्मों की कामयाबी से साबित किया है कि वे यहां टिकने वाले हैं। दोनों करिअर के प्रति सीरियस हैं और संभल कर फिल्में चुन रहे हैं। इनके बाद आए कलाकारों में अर्जुन कपूर, सिद्धार्थ मल्होत्रा, वरुण धवन, आदित्य राय कपूर, टाइगर श्रॉफ, कृति सैनन, पत्रलेखा, आलिया भट्ट, श्रद्धा कपूर, वाणी कपूर, तापसी पन्नू, सुशांत सिंह राजपूत, राजकुमार राव, हुमा कुरैशी, स्वरा भास्कर, तमन्ना और साकिब सलीम के नाम लिए जा सकते हैं। अगलेे एक साल में पता चलेगा कि इनमें से कौन अगली कतार में आया और कामयाब त्रयी बना। यह संयोग ही है कि अगली कतार में तीन सितारे ही रहते हैं। फिलहाल सभी ने बाक्स आफिस की कामयाबी से उम्मीदें जगा दी हैं। निर्माता इनमें निवेश करने के लिए तैयार हैं। वे इन्हें फिल्म बिजनेस के विकल्प के तौर पर देख रहे हैं।
    इन सभी ने लोकप्रिय सितारों से होड़ नहीं की है। गौर करें तो इनकी फिल्में पहली छमाही या उस अंतराल में आई हैं, जब बड़े सितारों की फिल्में नहीं आतीं। उन्होंने मिले हुए गैप में ही अपना हुनर दिखा दिया है। कह सकते हैं कि जल्दी ही नवोदित सितारे लोकप्रियता की कमान संभालेंगे। 50 की उम्र छू रहे पहले के सभी सितारे अब प्रौढ़ हो चुके हैं। देर-सबेर ये नए सितारे अपनी चमक से उनकी रोशनी फीकी कर देंगे। हालांकि समय बदल चुका है। अमिताभ बच्चन से प्रौढ़ और वृद्ध सितारों को केंद्र में रख कर कामयाब फिल्में बनाने का प्रयोग चल रहा है। आमिर, शाहरुख और सलमान, सैफ अली खान, अक्षय कुमार और अजय देवगन यथासंभव टिके रहने की कोशिश करेंगे। उनके लिए फिल्में भी लिखी जाएंगी। फिर भी नए सितारों की बढ़ती धमक और धाक ने संकेत दे दिया है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री नए सितारों के स्वागत के लिए तैयार है। नवोदित सितारे दम-खम से बढ़े आ रहे हैं।



Monday, June 23, 2014

2014 की दूसरी छमाही की 10 उम्‍मीदें


-अजय ब्रह्मात्मज
    हिंदी फिल्मों के सारे दिग्गज और पापुलर सितारों की फिल्में अगली छमाही में रिलीज होगी। जुलाई से दिसंबर के छह महीनों में हर महीना और हर त्योहार किसी न किसी सितारे के नाम सुरक्षित हो चुका है। पिछले कुछ सालों से यह ट्रेड सा बनता जा रहा है कि पापुलर स्टार अपनी फिल्में साल के उत्तरार्द्ध में लेकर आते हैं। ईद पर सलमान खान, दीवाली पर शाहरुख खान और क्रिसमस पर आमिर खान ने अपनी फिल्मों की रिलीज सुनिश्चित कर ली है। इनकी फिल्मों के एक हफ्ते पहले से एक हफ्ते बाद तक कोई भी फिल्म टक्कर में नहीं आती। वैसे इस बार रिलीज की तारीखों की मारामारी से कुछ फिल्में आगे-पीछे रिलीज होंगी। खानत्रयी के अलावा अक्षय कुमार, अजय देवगन, रितिक रोशन और सैफ अली खान की भी फिल्में रहेंगी। इनके अलावा नए सितारे रणवीर सिंह और रणबीर कपूर भी जोर आजमाईश करेंगे। रणबीर कपूर की तो फिल्में अगली छमाही में रिलीज होंगी।
1. पीके - राजकुमार हिरानी की ‘पीके’ पर सभी की निगाहें टिकी हैं। ‘3 इडियट’ की जबरदस्त कामयाबी के राजकुमार हिरानी फिर से आमिर खान के साथ आ रहे हैं। आमिर का परफेक्शन और हिरानी का डायरेक्शन एक बार फिर बाक्स आफिस पर जादू जगाएगा। अपनी हर फिल्म से कलेक्शन के नए रिकार्ड स्थापित कर रहे आमिर खान की ‘पीके’ से उम्मीद है कि यह ‘धूम 3’ से ज्यादा बिजनेस करेंगी। इस बार आमिर खान के साथ अनुष्का शर्मा हैं।
2.हैप्पी न्यू ईयर - शाहरुख खान के होम प्रोडक्शन की इस फिल्म की निर्देशक फराह खान हैं। ‘ओम शांति ओम’ की कामयाबी के सात सालों के बाद दोनों की जोड़ी फिर से साथ आ रही है। दीवाली के मौके  पर रिलीज हो रही शाहरुख खान की यह ग्यारहवीं फिल्म होगी। फराह खान की फिल्में मसाला और मनोरंजन से भरपूर होती हैं। उम्मीद की जा रही है कि शाहरुख खान इस फिल्म से ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ का रिकॉर्ड तोड़ेंगे और बाक्स आफिस पर अपनी पोजीशन मजबूत करेंगे।
3. किक - सलमान खान की ‘किक’ से उनके प्रशंसकों की आस बंधी है। 2014 के आरंभ में रिलीज हुई ‘जय हो’ ने वैसे तो 100 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया था, लेकिन सलमान खान की लोकप्रियता के हिसाब से यह कलेक्शन औसत रहा। निर्माता साजिद नाडियाडवाला इस फिल्म से निर्देशक बने हैं। कहा जा रहा है कि वे इसके प्रचार में कोई कसर नहीं छोडेंगे। उनके प्रोडक्शन की ‘हीरोपंथी’ पिछली छमाही की हिट फिल्म रही है। ‘किक’ इसी ना की तमिल फिल्म की रीमेक है।
4. बैंग बैंग - रितिक रोशन और कट्रीना कैफ की ‘बैंग बैंग’ की शूटिंग अटक-अटक कर बढ़ती जा रही है। इस बीच रितिक रोशन और कट्रीना कैफ गैरफिल्मी वजहां से सुर्खियों में रहे हैं। दोनों की पिछली फिल्म ‘जिंदगी ना मिलेगी दोबारा’ दर्शकों को पसंद आई थी। इस बार उनके रोमांस और केमिस्ट्री को दर्शक पर्दे पर देख सकेंगे। यह टाम क्रूज की फिल्म ‘नाइट एंड डे’ की हिंदी रीमेक है। इस फिल्म में डैनी डंजोग्पा खास किरदार निभा रहे हैं।
5. सिंघम-2 - रोहित शेट्टी और अजय देवगन की ‘सिंघम-2’ के बारे में कहा जा हा है कि पिछली ‘सिंघम’ से और बेहतर एवं प्रभावशाली होगी। लगातार कामेडी फिल्मों के बाद रोहित और अजय ने एक्शन फिल्म में भी बेंचमार्क स्थापित कर दिया था। इस बार फिल्म की कहानी मुंबई आ गई है। ‘सिंघम-2’ में अजय देवगन के साथ करीना कपूर आ रही हैं। उम्मीद है कि रोहित शेट्टी की यह फिल्म एक्शन और ड्रामा की वजह से दर्शकों की पसंद बनेगी।
6.  एक्शन जैक्सन - हालांकि इस फिल्म में अजय देवगन और सोनाक्षी सिन्हा की हिट जोड़ी है। दोनों की पिछली फिल्म ‘सन ऑफ सरदार’ ने 100 करोड़ का बिजनेस किया था। फिल्म के निर्देशक प्रभुदेवा हैं। उनकी तीन हिंदी फिल्मों में से दो न 100 करोड़ से अधिक का कारोबार है। इस बार वे अजय देवगन के साथ एक्शन का कमाल दिखाएंगे। साथ में डांस तो रहेगा ही।
7. जग्गा जासूस - ‘बर्फी’ के बाद फिर से साथ आ रहे अनुराग बसु की इस फिल्म में कट्रीना कैफ भी हैं। रणबीर कपूर और कट्रीना कैफ को देखने की बेताबी दर्शकों में है। इस फिल्म से निर्माता बन रहे रणबीर कपूर ‘जग्गा जासूस’ जासूसी की करतबों से दर्शकों को मुग्ध करेंगे। डायरेक्टर-एक्टर की यह जोड़ी। मनोरंजन और बिजनेस के हिसाब से चमत्कार कर सकती है।
8 .  बांबे वेलवेट - अनुराग कश्यप की ‘बांबे वेलवेट’ के भी हीरो रणबीर कपूर हैं। यहां उनके साथ अनुष्का शर्मा हैं। साथ में पहली बार करण जौहर पूर्ण भूमिका में नजर आएंगे। वे इस फिल्म में निगेटिव किरदार निभा रहे हैं। छठे दशक की मुंबई की पृष्ठभूमि पर बन रही इस फिल्म से अनेक उम्मीदें हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की महंगी फिल्मों में से एक ‘बांबे वेलवेट’ पीरियड ड्राया को नए स्तर पर ले जाएगी।
9. किल दिल -  रणवीर सिंह और परिणीति चोपड़ा की ‘किल दिल’ के निर्देशक शाद अली हैं। यशराज फिल्म्स की ‘किल दिल’ में रणवीर सिंह का जोश और परिणीति चोपड़ा की चंचलता के साथ अली जादर का भोलापन भी रहेगा। मुंबई की पृष्ठभूमि पर बन रही इस फिल्म में गोविंदा भी एक अहम किरदार निभा रहे हैं।
10. फैंटम - सैफ अली खान और कट्रीना कैफ की ‘फैंटम’ आतंकवाद से संबंधित फिल्म है। 26-11 को मुंबई में हुए हमले और इंटरनेशनल आतंकवाद के रिश्तों की बात करती इस फिल्म के निर्देशक कबीर खान हैं। फिल्म के निर्माता साजिद नाडियाडवाला हैं। इस फिल्म की शूटिंग विदेशों के नए लोकेशन पर हुई है। बेरूत, लेबनान और तुर्की से होते हुए यह फिल्म कश्मीर भी पहुंचती है।


Sunday, June 22, 2014

शक्तिपाद राजगुरू


 
-प्रकाश के रे 
जीवन की अर्थहीनता मनुष्य को उसका अर्थ रचने के लिए विवश करती है. यह अर्थ-रचना लिखित हो सकती है, विचारों के रूप में हो सकती है, इसे फिल्म के रूप में भी अभिव्यक्त किया जा सकता है. महान फिल्मकार स्टेनली क्यूब्रिक के इस कथन को हम किसी लिखित या वाचिक अभिव्यक्ति को फिल्म का रूप देने या किसी फिल्म को कहने या लिखने की स्थिति में रख दें, जो जीवन के अर्थ रचने की प्रक्रिया जटिलतर हो जाती है. शायद ऐसी स्थितियों में ही देश और काल से परे कृतियों का सृजन होता होगा तथा ऐसी कृतियां स्वयं में एक अलग जीवन रच देती होंगी जिनके अर्थों की पुनर्चना की आवश्यकता होती होगी या जिनसे पूर्वरचित अर्थों को नये माने मिलते होंगे. ॠत्विक घटक की फिल्म मेघे ढाका तारा (1960) एक ऐसी ही रचना है. इस फिल्म की मूल कथा शक्तिपाद राजगुरू ने लिखी थी. इस महान बांग्ला साहित्यकार का 12 जून को 92 वर्ष की उम्र में निधन हो गया.
बंगाल के एक गांव में 1922 में जन्मे शक्तिपाद राजगुरू का पहला उपन्यास कोलकता में पढ़ाई करते हुए 1945 में प्रकाशित हुआ. उन्होंने अपने लंबे सृजनात्मक जीवन में सौ से अधिक उपन्यासों की रचना की. बांग्ला के अन्यतम साहित्यकारों- बिभूतिभूषण बंधोपाध्याय और ताराशंकर बंधोपाध्याय- से प्रभावित राजगुरू ने कोलकाता से दूरस्थ स्थानों में अपने सामान्य चरित्रों को स्थित कर गूढ़तम, लेकिन अत्यंत मानवीय घटनाक्रमों में पिरोया. उनकी साहित्यिक रचनाओं की संख्या और बांग्ला के पाठकों में उनकी लोकप्रियता इस बात का स्वत: प्रमाण हैं कि लगातार लिखने के बावजूद उनकी कथाओं, कथानकों और चरित्रों में अनोखापन बरकरार रहा. यही कारण है कि राजगुरू की कई रचनाएं किताबी आशियाने से निकल कर सिनेमा की भाषा और भाव-भंगिमा में भी रचीं और बसीं. अनुवाद के जरिये तो उनके कुछ उपन्यास ही दूसरी भाषाओं के पाठकों तक पहुंच सके, लेकिन फिल्मों के माध्यम से राजगुरू के चरित्रों और उनका विशिष्ट जीवन देश की अनेक भाषाओं में अनुदित हुआ.
मेघे ढाका तारा के अतिरिक्त शक्तिपाद राजगुरू की कृतियों पर अमानुष (शक्ति सामंत, 1975), जीबन कहिनी (राजेन तरफदेर, 1964), बरसात की एक रात (शक्ति सामंत, 1981), तिल थेके ताल (शांतिमय बनर्जी, 1985), गायक (शांतनु भौमिक, 1987), अंतरंग (दिनेन गुप्ता, 1988), आशा--भालोबाशा (1989) आदि फिल्में बनीं जो उनके उपन्यासों की तरह ही दर्शकों द्वारा सराही गयीं. उनके साहित्यिक रचना-कर्म और रचना-प्रक्रिया के विविध पहलुओं की समीक्षा तो साहित्य के सुधी आलोचक व पाठकों का जिम्मा है, उसी तरह उनके सिनेमाई लेखन और अपनी रचनाओं को पटकथा में परिवर्तित करने के तौर-तरीके पर विस्तार से विश्लेषण किया जाना चाहिए. साहित्य और सिनेमा के अंतर्संबंधों में साहित्यिक कृति का सिनेमाई रूपांतरण हमेशा से विवादों में रहा है. माना जाता है कि सिनेमा कृति के स्तर से हमेशा निम्न होता है क्योंकि पटकथा के जरूरत के मुताबिक मूल रचना के कई हिस्सों को छोड़ देना पड़ता है और कभी-कभी संदर्भों से अलग घटना-क्रम या परिस्थितियों को समाहित कर दिया जाता है. एक बड़ी आलोचना यह भी होती है कि फिल्मकार मूल पाठ के गहन अर्थों को परदे पर उतार पाने में असफल रहता है. सिनेमा की दृश्यात्मकता भी कथा के चरित्रों, वस्तुओं, स्थलों और स्थितियों को एक निश्चित ढांचे में समाहित कर देती है जिससे कथा के अर्थों को विस्तार ले सकने की सीमा बंध जाती है.
बहरहाल, इस विवाद के तर्क-प्रतितर्क हैं, लेकिन, शक्तिपाद राजगुरू के संदर्भ में यह बहस काफी हद तक बेमानी हो जाती है क्योंकि रचनाकार अपनी कृतियों के सिनेमाई अवतरण की प्रक्रिया में स्वयं ही गहरे से जुड़ा हुआ है और फिल्मकार के रूप में उसे संवेदनशील और साहित्यानुरागी लोग मिले.
इस बारे में आगे बात करने के लिए हम उनकी दो बहुचर्चित फिल्मों को ले सकते हैं, जो भारतीय सिनेमा के इतिहास में अपने कथ्य और शिल्प की दृष्टि से विशिष्ट स्थान रखती हैं. घटक की मेघे ढाका तारा और शक्ति सामंत की अमानुष सिनेमाई व्याकरण की हद को बड़ा विस्तार देती हैं और इसी कारण उन्हें अप्रतिम क्लासिक फिल्मों की श्रेणी में रखा जाता है.
मेघे ढाका तारा की पृष्ठभूमि भारत-विभाजन की त्रासदी है, जिसमें पूर्व पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से आये एक शरणार्थी परिवार के अंतर्संबंधों और अंतर्द्वंद्वों की कथा है. भारत-विभाजन की हिंसा और अपनी जडों से उखड़ने का दुख सबसे अधिक दोनों तरफ के पंजाब और बंगाल ने भोगा था. दुनिया के इतिहास में इस स्तर पर कभी भी लोगों का पलायन नहीं हुआ था और न ही कभी लोगों में एक-दूसरे के प्रति हिंसा और नफरत का ऐसा विभत्स तांडव देखा या सुना गया था. बंगाली साहित्य और सिनेमा ने इस त्रासदी के अलग-अलग पहलुओं को बखूबी दर्ज किया है. मेघे ढाका तारा इस त्रासदी की अनवरत उपस्थिति का उल्लेखनीय दस्तावेज है. फिल्म शरणार्थी स्मृतियों और स्थगित भविष्य से उतपन्न असाधारण विलगन को रेखांकित करती है, जहां परिवार के सदस्य भी मानवीय आदर्शों और मूल्यों को विस्मृत कर देते हैं. परंतु, कला आशा का दामन नहीं छोड़ती है. जीवन ठहर जाता है, लेकिन गति की आस नहीं छोड़ता है. इस फिल्म में भी नैराश्य के अंधेरे सुनसान में विश्वास के लौ मौजूद हैं.
फिल्म शक्तिपाद राजगुरू की कहानी चेनामुख पर आधारित है जिसे एक अखबार में ॠत्विक घटक ने पढ़ा था. इस कहानी की संवेदनशीलता से प्रभावित होकर उन्होंने इसकी पटकथा तैयार की और मेलोड्रामा की अपनी पसंदीदा शैली में परदे पर उतारा. फिल्म में पाशर््व संगीत और हिंदू पौराणिकता के अद्भूत संयोग से राजगुरू की कहानी की त्रासदी अपने चरम को प्राप्त करती है. उल्लेखनीय है कि राजगुरू के पहले उपन्यास दिनगुली मोर का विषय-वस्तु शरणार्थियों की दुर्दशा ही थी. यह फिल्म निश्चित रूप से ॠत्विक घटक की फिल्म है, लेकिन इस कहानी के पात्र और उनका जीवन राजगुरू ने रचा है. फिल्म की तैयारी में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रही थी. इस लिहाज से यह उनकी उपलब्धि भी है.
अमानुष आजाद भारत की त्रासदी का बयान है जहां शोषण और अत्याचार है और इस परिस्थिति में एक साधारण इंसान अपने अस्तित्व को भूल आत्महंता की भूमिका निभाने के लिए विवश हो जाता है. मेघे ढाका तारा की त्रासदी दो देशों के अनियंत्रित इतिहास की पैदाइश है. अमानुष की त्रासदी अपना इतिहास स्वयं लिखने की जिद्द में बेसुध देश की यंत्रणा है. सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था एक भलेमानुष को अमानुष तो बना देती है, लेकिन उसके भीतर के मानुष को पूरी तरह नहीं मार पाती और वह मानुष अपने ही जैसे लोगों पर हो रहे अनाचार के प्रतिरोध में बोल उठता है. वह नहीं चाहता कि उसकी तरह अन्य लोग भी अमानुष होने का अभिशाप जीने के लिए विवश हों.
साहित्य के पाठ और सिनेमा के फ्रेम के भीतर और बाहर को लेकर बड़ी-बड़ी बहसें होती रही हैं. शक्तिपाद राजगुरू के लेखन और उन पर बनी फिल्मों के संदर्भ में भी ये बहसें प्रासंगिक हो सकती हैं, लेकिन इनका पाठन और दर्शन हमें आत्म और आत्म के बाहर बसे जीवन को समझने में तो निश्चित ही सहायता करती हैं.

Friday, June 20, 2014

किक का गाना जुम्‍मे की रात

हम जो कुछ नया करते हैं,वह पुराना ही होता है। अब किक का गाना 'जुममे की रात' ही देख लें। इस गाने का फील अमिताभ बच्‍चन पर फिल्‍माए लोकप्रिय गीत 'जुम्‍मा चुम्‍मा दे दे' जैसा ही है। अमिताभ बच्‍चन और सलमान खान अलग किस्‍म के डांसर और परफार्मर हैं। वह भिन्‍नता यहां दिखती है। सलमान खान अपने अंदाज में हैं। गौर करें तो वे अपनी नायिकाओं को रिझाते समय मदमस्‍त हो जाते हैं। जैक्‍लीन फर्नांडिस को सेक्‍सी रंग और ठसक ढंग से पेश किया गया है। हिमेश रेंश्‍मिया ने सलमान खान को पॉपुलर हो सकने वाले गाने की सौगात दी है। तो क्‍या आप भाई के साथ जुम्‍म्‍ो की रात बिताने के लिए तैयार हैं ?


फिल्‍म समीक्षा : हमशकल्‍स

-अजय ब्रह्मात्‍मज
साजिद खान की 'हमशकल्स' वास्तव में हिंदी फिल्मों के गिरते स्तर में बड़बोले 'कमअकल्स' के फूहड़ योगदान का ताजा नमूना है। इस फिल्म में पागलखाने के नियम तोडऩे की एक सजा के तौर पर साजिद खान की 'हिम्मतवाला' दिखायी गयी है। भविष्य में कहीं सचमुच 'हमशकल्स' दिखाने की तजवीज न कर दी जाए। साजिद खान जैसे घनघोर आत्मविश्वासी इसे फिर से अपनी भूल मान कर दर्शकों से माफी मांग सकते हैं, लेकिन उनकी यह चूक आम दर्शक के विवेक को आहत करती है। बचपना और बचकाना में फर्क है। फिल्मों की कॉमेडी में बचपना हो तो आनंद आता है। बचकाने ढंग से बनी फिल्म देखने पर आनंद जाता है। आनंद जाने से पीड़ा होती है। 'हमशकल्स' पीड़ादायक फिल्म है।
साजिद खान ने प्रमुख किरदारों को तीन-तीन भूमिकाओं में रखा है। तीनों हमशकल्स ही नहीं, हमनाम्स भी हैं यानी उनके एक ही नाम हैं। इतना ही नहीं उनकी कॉमेडी भी हमशक्ली है। ये किरदार मौके-कुमौके हमआगोश होने से नहीं हिचकते। डायलॉगबाजी में वे हमआहंग (एक सी आवाजवाले) हैं। उनकी सनकी कामेडी के हमऔसाफ (एकगुण) से खिन्नता और झुंझलाहट बढ़ती है। 'हमशकल्स' में कलाकारों और निर्माता-निर्देशक की हमखयाली और हमखवासी से कोफ्त हो सकती है। हिंदी फिल्मों के ये हमजौक और हमजल्सा हुनरबाज हमदबिस्तां(सहपाठी) लगते हैं। सच कहूं तो उन्हें दर्शकों से कोई हमदर्दी नहीं है। इस मायने में साजिद खान की हमशीर (बहन) फराह खान ज्यादा काबिल और माकूल डायरेक्टर हैं। फिर भी साजिद खान की हमाकत (मूर्खता) देखें कि उन्होंने इस फिल्म को किशोर कुमार और जिम कैरी जैसे हुनरमंद कलाकारों को समर्पित किया है और परोसा है कॉमेडी के नाम पर फूहड़ मनोरंजन। भला किशोर कुमार और साजिद खान मनोरंजन के हमरंगी हो सकते हैं?
'हमशकल्स' में सैफ अली खान, रितेश देशमुख और राम कपूर हैं। इन तीनों में केवल रितेश देशमुख अपनी काबिलियत से सुकून देते हैं। यहां तक कि लड़कियों का रूप धारण करने पर भी तीनों में केवल वही अपने नाज-ओ-अंदाज से लड़कीनुमा लगते हैं। सैफ अली खान ने पहली बार ऐसी कॉमेडी की है। अफसोस कि उन्हें केवल जीभ निकालने और पुतलियों को नाक के समीप लाना ही आता है। चेहरे पर उम्र तारी है। उनके लिए बच्चा, कुत्ता, समलैंगिक और लड़की बनना भी भारी है। मार्के की बात है कि किसी भी स्थिति-परिस्थिति में उनके बाल नहीं बिगड़ते। राम कपूर का इस्तेमाल इनकी प्रतिभा से अधिक डीलडौल के लिए हुआ है। बिकनी में वे बर्दाश्त के बाहर हो गए हैं। फिल्म की अभिनेत्रियां साजिद खान की अन्य फिल्मों की तरह केवल नाच-गाने और देहदर्शन के लिए हैं। तमन्ना भाटिया, ईशा गुप्ता और बिपाशा बसु को कुछ दृश्य और संवाद भी मिल गए हैं। फिल्म पूरी होने के बाद बिपाशा बसु का एंड प्रोडक्ट से क्यों मोहभंग हुआ था? उनके बयान का औचित्य समझ में नहीं आता। फिल्म शुरुआत से अंत तक निकृष्ट है। यह बात तो शूटिंग आरंभ होते ही समझ में आ गई होगी। बहरहाल, इस निम्नस्तरीय फिल्म में भी कॉमेडी के नाम पर दी गई घटिया हरकतों के बावजूद सतीश शाह की मौजूदगी तारीफ के काबिल है।
इतना ही नहीं। यह फिल्म 159 मिनट से अधिक लंबी है। बेवकूफियों का सिलसिला खत्म ही नहीं होता। हंसी लाने की कोशिश में गढ़े गए लतीफों और दृश्य मुंबइया भाषा में दिमाग का दही करते रहते हैं। दर्शकों के दिमाग के साथ धैर्य की भी परीक्षा लेती है 'हमशकल्स'। अगर आप नीली दवा पीकर आदमी के भौंकने और कुत्तों जैसी हरकतें करने पर बार-बार हंस सकते हैं, बड़ों के बच्चों जैसे तुतलाने पर मुस्कराने लगते हों और दो दृश्यों के बीच कोई संबंध या तर्क न खोजते हों तो आप 'हमशकल्स' देख सकते हैं। अन्यथा मनोरंजन के नाम पर तिगुना उत्पीडऩ हो सकता है।
अवधि-159 मिनट
* एक स्‍टार

Thursday, June 19, 2014

हंसी की पुडिय़ा बांधता हूं मैं-साजिद खान


-अजय ब्रह्मात्मज

    ‘हिम्मतवाला’  की असफलता के बाद साजिद खान ने चुप्पी साध ली थी। अभी ‘हमशकल्स’ आ रही है। उन्होंने इस फिल्म के प्रचार के समय यह चुप्पी तोड़ी है। ‘हिम्मतवाला’ के समय किए गए दावों के पूरे न होने की शर्म तो उन्हें है, लेकिन वे यह कहने से भी नहीं हिचकते कि पिछली बार कुछ ज्यादा बोल गया था।
- ‘हिम्मतवाला’ के समय के सारे दावे गलत निकले। पिछले दिनों आपने कहा कि उस समय मैं झूठ बोल गया था।
0 झूठ से ज्यादा वह मेरा बड़बोलापन था। कह सकते हैं कि वे बयान नासमझी में दिए गए थे। दरअसल मैं कुछ प्रुव करना चाह रहा था। तब ऐसा लग रहा था कि मेरी फिल्म अवश्य कमाल करेगी। अब लगता है कि ‘हिम्मतवाला’ का न चलना मेरे लिए अच्छा ही रहा। अगर फिल्म चल गई होती तो मैं संभाले नहीं संभलता। इस फिल्म से सबक मिला। यह सबक ही मेरी सफलता है। मैंने महसूस किया कि मैं हंसना-हंसाना भूल गया था। अच्छा ही हुआ कि असफलता का थप्पड़ पड़ा। अब मैं संभल गया हूं।
- ऐसा क्यों हुआ था?
0 मैं लोगों का ध्यान खींचना चाहता था। एक नया काम कर रहा था। मेरी इच्छा थी कि लोगों की उम्मीदें बढ़ें। वैसे भी दर्शकों की अपेक्षाएं बढ़ी हुई थी। पिछली फिल्मों की सफलता से उन्हें भी लग रहा था कि इस बार साजिद खान बड़ा धमाल करेगा। सच्चाई यह थी कि मैं अंदर से हिला हुआ था। अपनी घबराहट छिपा रहा था। बाकी फिल्मों के समय मेरा बड़बोलापन काम आ गया था। मेरा दिमाग चढ़ा हुआ था। अब लग रहा है कि मैं तो फिल्मकार हूं। मैं क्यों फिल्म के कलेक्शन की परवाह करूं?
- कलेक्शन का दबाव तो है। सब यही पूछते हैं कि यह फिल्म 100 करोड़ का बिजनेस करेगी कि नहीं?
0 दबाव तो है। इस दबाव को अपने काम से ही कम किया जा सकता है। हमारा काम है दर्शकों की अपेक्षा के मुताबिक फिल्म बनाना। ‘हिम्मतवाला’  जैसी गलती दोबारा नहीं करूंगा। मेरा काम हंसना-हंसाना है। मैं कामेडी बनाता हूं। फनी टाइप का निर्देशक हूं। इस बार यही उम्मीद है कि ‘हमशकल्स’ दर्शकों को खूब हंसाएगी। इस फिल्म में पूरा पागलपन डाल दिया है। हर दृश्य में दर्शक हंसेंगे।
- क्या एक्टर की तरह डायरेक्टर भी टाइपकास्ट होते हैं?
0 बिल्कुल होते हैं। हिचकॉक पूरी जिंदगी थ्रिलर बनाते रहे। भारत में अब्बास-मस्तान केवल थ्रिलर बनाते हैं। मेरी बहन फराह खान लार्जर दैन लाइफ मसाला एंटरटेंमेंट फिल्में बनाती हैं। डेविड धवन कामेडी फिल्में बनाते हैं। ये सभी टाइपकास्ट हैं। इनकी तरह मैं भी टाइपकास्ट हूं। मुझे कामेडी फिल्मों के लिए जाना जाता है। रोहित भी टाइपकास्ट हैं, लेकिन उन्होंने ‘सिंघम’ बना कर अपनी इमेज तोड़ी। सब कोई उनकी तरह सफल नहीं होता। अपने बारे में मैंने समझ लिया है कि मेरा काम है लोगों को हंसाना। मुझे कामेडी लिखने और डायरेक्ट करने में मजा आता है। टीवी से लेकर फिल्मों तक यही करता रहा हूं।
- पहले फिल्मों में हंसी का ट्रैक रहता था। अब पूरी फिल्म हंसी पर रहती है। ऐसा क्या हुआ है कि पिछले पांच-सात सालों में दर्शकों को हंसी की ज्यादा जरूरत हो गई है?
0 जब से हीरो कामेडी करन लगे तब से धीरे-धीरे यह ट्रेंड बन गई। भारत की रोजमर्रा जिंदगी में इतना ज्यादा स्ट्रेस है कि अगर फिल्मों से थोड़ी देर के लिए तनाव कम हो तो दर्शक खुश हो जाते हैं। स्ट्रेस रिलीफ के लिए फिल्में रामबाण हैं। इधर हर भाषा में कामेडी फिल्मों की संख्या बढ़ी है। कहा जा सकता है कि हमें हंसने की खुराक चाहिए। शायद भारत में अधिक समस्याएं होने की वजह से कामेडी फिल्में दर्शकों को रिलीफ दे रही हैं। हमारे चारो तरफ तनाव ही तनाव है। हंसी बेहतरीन दवा है और हम इस दवा के बिक्रेता हैं। मैं हंसी की पुडिय़ा बांधता हूं।
- ‘हमशकल्स’ में क्या नया है?
0 एक नया कंसेप्ट है। सैफ अली खान, रितेश देशमुख और राम कपूर तीन-तीन भूमिकाओं में हैं। तीन एक्टर के ट्रिपल रोल यानी नौ कैरेक्टर। उनके नाम भी एक समान हैं। अशोक, कुमार और मामा जी। ये तीनों एक ही शहर में रहते हैं। संयोग ऐसा बनता है कि वे एक ही घर में भी आ जाते हैं और फिर कामेडी पर कामेडी होती रहती है। इस फिल्म में ढेर सारी नई बातें हैं। मैं दावा कर रहा हूं कि दर्शकों को इस बार नौ गुणा ज्यादा मजा आएगा। अच्छी बात है कि अपने ट्रेलर और गानों से हमें ऐसा ही रिस्पांस मिल रहा है।

दरअसल : तारीफों की टर्र-टर्र


-अजय ब्रह्मात्मज
    इन दिनों कई फिल्मों की रिलीज के समय अचानक सोशल मीडिया नेटवर्क पर फिल्मी हस्तियों की सिफारिशें आरंभ हो जाती हैं। बरसाती मेढकों की तरह प्रशंसक टरटराने लगते हैं। फेसबुक और ट्विटर पर इनकी टर्र-टर्र ऐसी गूंजती है कि हर तरफ तारीफ बरसने लगती है। छोटी फिल्मों के लिए यह अच्छी बात होती है। माहौल बन जाता है। इस माहौल में दर्शक मिल जाते हैं। हाल ही में ‘फिल्मिस्तान’  और ‘द वल्र्ड बिफोर हर’ इसके उदाहरण रहे।
    ‘फिल्मिस्तान’ 2012 की फिल्म है। उस साल यह अनेक फेस्टिवल में दिखाई गई। 2012 के लिए इसे 2013 में पुरस्कार भी मिला, लेकिन वितरकों के अभाव में ‘फिल्मिस्तान’ समय पर रिलीज नहीं हो सकी। भला हो श्याम श्रॉफ और उनकी श्रृंगार फिल्म्स का। उन्हें फिल्म अच्छी लगी तो वितरण का रास्ता आसान हो गया। फिर यूटीवी का भी समर्थन मिल गया। ‘फिल्मिस्तान’ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की प्रमुख हस्तियों को दिखाई गई। सभी ने तारीफ के पुल बांधे। शाबिर हाशमी और इनामुल हक के साथ तस्वीरें खिचवाई गईं। बताया गया कि यह श्रेष्ठ सिनेमा है। इस श्रेष्ठ सिनेमा को एक साल से ज्यादा समय तक गुमनाम क्यों रहना पड़ा? देखें तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में तारीफ और प्रशंसका का भेडिय़ाधसान होता है। सभी एक सुर मेंअलापने लगते हैं।
    मुंबई में स्वतंत्र निर्माता-निर्देशक इन दिनों इस युक्ति का इस्तेमाल कर रहे हैं। फिल्म बना लो और फिर किसी लोकप्रिय निर्माता-निर्देशक को पकड़ लो। अगर वह उस फिल्म का प्रेजेंटर बन जाए तो फिल्म के ग्राहक मिल जाते हैं। इस प्रक्रिया में बगैर हिंग और फिटकरी के उन निर्माताओं को श्रेष्ठ सिनेमा से जुडऩे का गौरव हासिल हो जाता है। करण जौहर, किरण राव, यशराज फिल्म्स, अनुराग कश्यप और यूटीवी इस तरह नाम बटोर रहे हैं। इनमें केवल अनुराग कश्यप प्रायोगिक फिल्मों के प्रबल समर्थक हैं। वे आरंभ से ही सपोर्ट में खड़े रहते हैं। इन दिनों किसी महत्वाकांक्षी युवा निर्देशक से बात करें तो वह यही बताता है कि उसकी फिल्म अनुराग कश्यप को पसंद आई है। उन्होंने वादा किया है कि वे मेरी फिल्म प्रेजेंट करेंगे। अनुराग कश्यप अभी के दौर में ऐसी खूंटी हो गए हैं, जिस पर लोग कोट से लेकर लंगोट तक टांगने में नहीं हिचकिचा रहे हैं।
    मेरा सवाल है कि उम्दा और श्रेष्ठ फिल्मों को आरंभ से ही समर्थन क्यों नहीं मिलता? कारपोरेट प्रोडक्शन हाउस और करण जौहर जैसे निर्माताओं को पहल करनी चाहिए कि वे लीक से हटकर बन रही फिल्मों के लिए फायनेंस जुटाने में मदद करें। बहुत कम महत्वाकांक्षी अपनी फिल्में निजी कोशिश से पूरी कर पाते हैं। ज्यादातर को अपनी फिल्म का विचार छोडऩा पड़ता है या दबाव में चालू किस्म की फिल्मों में खुद को खपाना पड़ता है। अगर उन्हें शुरू से ही मदद और प्रोत्साहन मिले तो देश में प्रतिभाओं को उचित अवसर मिलेंगे।
    मुंबई से बाहर सक्रिय महत्वाकांक्षी निर्देशकों, फिल्मकारों और प्रतिभाओं का मुंबई की लोकप्रिय हस्तियों से सीधा संपर्क नहीं होता। वे मुंबई आकर लाबिंग और नेटवर्क में समय और पैसे खर्च नहीं कर सकते। उन्हें मलाल है कि उनके बेहतरीन प्रोजेक्ट को सही प्रेजेंटर नहीं मिल पाते। इधर इंटरनेट पर सुविधाओं के बढऩे से उन्हें अपनी प्रोजेक्ट के बारे में बताने का मौका तो मिल जाता है, लेकिन वे सही ठिकानों तक नहीं पहुंच पाते। उनके फिल्मों को खरीददार नहीं मिलते और फिल्में ढंग से वितरित नहीं हो पातीं।
    जरूरत है कि मुंबई के लोकप्रिय और जागरुक फिल्मकार ऐसी प्रक्रिया विकसित करें, जिससे छोटे शहरों और कस्बों की प्रतिभाओं को अपना काम उन तक पहुंचाने का रास्ता मिले। फिल्म फेस्टिवल एक तरीका है, लेकिन वह अपर्याप्त है।


Wednesday, June 18, 2014

अपेक्षाएं बढ़ गई हैं प्रेमियों की-शशांक खेतान


-अजय ब्रह्मात्मज
    धर्मा प्रोडक्शन की ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया’ के निर्देशक शशांक खेतान हैं। यह उनकी पहली फिल्म है। पहली ही फिल्म में करण जौहर की धर्मा प्रोडक्शन का बैनर मिल जाना एक उपलब्धि है। शशांक इस सच्चाई को जानते हैं। ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया ’ के लेखन-निर्देशन के पहले शशांक खेतान अनेक बैनरों की फिल्मों में अलग-अलग निर्देशकों के सहायक रहे। मूलत: कोलकाता के खेतान परिवार से संबंधित शशांक का बचपन नासिक में बीता। वहीं पढ़ाई-लिखाई करने के दरम्यान शशांक ने तय कर लिया था कि फिल्मों में ही आना है। वैसे उन्हें खेल का भी शौक रहा है। उन्होंने टेनिस और क्रिकेट ऊंचे स्तर तक खेला है। शुरू में वे डांस इंस्ट्रक्टर भी रहे। मुंबई आने पर उन्होंने सुभाष घई के फिल्म स्कूल ह्विस्लिंग वूड्स इंटरनेशनल में दाखिला लिया। ज्यादा जानकारी न होने की वजह से उन्होंने एक्टिंग की पढ़ाई की। पढ़ाई के दरम्यान उनकी रुचि लेखन और डायरेक्शन में ज्यादा रही। टीचर कहा भी करते थे कि उन्हें फिल्म डायरेक्शन पर ध्यान देना चाहिए। दोस्तों और शिक्षकों के प्रोत्साहन से शशांक ने ‘ब्लैक एंड ह्वाइट’ और ‘युवराज’ में सुभाष घई के इंटर्न रहे। बाद में वे यशराज फिल्म्स से जुड़े। वहां ‘इश्कजादे’ में एक छोटी भूमिका भी निभा ली। इन पड़ावों से गुजरते हुए वे अपने लक्ष्य से अलग नहीं हुए। फिल्म की पढ़ाई खत्म करने के बाद उन्होंने एक्टिंग के अपने शिक्षक नसीरुद्दीन शाह के साथ थिएटर भी किया।
    शशांक अपनी यात्रा और फिल्मी शिक्षा में नसीरुद्दीन शाह की बड़ी भूमिका मानते हैं। वे कहते हैं, ‘ह्विस्लिंग वूड्स से निकलने के बाद भी मैं नसीर सर के साथ जुड़ा रहा। उनसे बहुत कुछ सीखा। अपनी बात रियलिस्टिक तरीके से रखना आया। उनकी ट्रेनिंग के बाद मुझे करण जौहर के साथ काम करने का मौका मिला। कुछ लोगों को यह विरोधाभाषी लग सकता है। मैं इसे अपना सौभाग्य मानता हूं। मेरी फिल्म में दर्शक नसीर और करण दोनों का सम्मिलित प्रभाव देखेंगे। सिचुएशन और रिएक्शन नसीर सर की सोच के मुताबिक है और उनका फिल्मांकन करण जौहर से प्रभावित है। रियलिस्टिक कहानी को करण जौहर ने भव्यता दे दी है। करण के अनुभव से मेरी फिल्म को बहुत फायदा हुआ है। ज्यादा दर्शकों तक पहुंचने के लिए जरूरी तत्व उन्हीं की सलाह से आए।’
    ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया’ के बारे में बताते हुए शशांक खेतान दो फिल्मों का जिक्र करते हैं, ‘मैंने 13 साल की उम्र में ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ देखी थी। उस फिल्म ने मुझे झकझोर दिया था। मेरी पीढ़ी के दर्शकों के लिए वह फिल्म ‘मुगलेआजम’ थी। कह सकता हूं कि अगर वह फिल्म नहीं आई होती तो मैं फिल्मों में नहीं आया होता। मेरी फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ को समर्पित है। फिल्मों की पढ़ाई के समय मैंने ‘कसाबलांका ’ देखी थी। वह गजब की रोमांटिक फिल्म है। इन दोनों फिल्मों का असर यह हुआ कि मैंने तय कर लिया कि मेरी पहली फिल्म रोमांटिक ही होगी। ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया’ की शुरुआत इसी विचार से हुई। शुरू में मैं इसे कॉन स्टोरी बना रहा था। बाद में लगा कि हंप्टी और काव्या इतने प्यारे हैं कि वे ठग नहीं हो सकते।  उन्हें फिर से लिखना शुरू किया और यह फिल्म बनी।’
    शशांक खेतान की फिल्म कहीं न कहीं उनके अपनी जीवन से भी प्रभावित है। शशांक उन चंद भाग्यशालियों में से हैं जिन्होंने जिस लडक़ी से बचपन से प्रेम किया बाद में उसी से शादी की। वे स्वीकार करते हैं, ‘सच्चा प्रेम होता है। मैं और मेरी पत्नी इसके उदाहरण हैं। हम दोनों के प्रेम से यह जाहिर होता है कि आज के समय में भी प्रेम एक शाश्वत भाव है। मैं इस विचार को मानता हूं कि प्रेम है और सच्चा प्रेम हमेशा रहेगा। मैं नई पीढ़ी के युवकों की बात नहीं मानता कि आज के समय में प्रेम संभव नहीं है। मुझे जरूरी लगा कि ऐसी फिल्म बननी चाहिए जिसमें सच्चे प्रेम की बात की जाए। मेरी चुनौती यही थी कि इसे आज के जमाने में कैसे पेश करूं। मैं इसको मेलोड्रामा नहीं बनाना चाहता था। मेरी फिल्म में दोनों को अपने प्रेम के लिए किसी से लडऩे-झगडऩे की जरूरी नहीं पड़ती।’
    ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया’ में मेलोड्रामा का न होना ही करण जौहर को अधिक पसंद आया। उन्होंने शशांक खेतान की स्क्रिप्ट चुनी और उन्हें निर्देशन का मौका दिया। शशांक गर्व भाव से बताते हैं, ‘मैंने धर्मा प्रोडक्शन में अपनी स्क्रिप्ट भेज दी थी। यहां की टीम को मेरी स्क्रिप्ट पसंद आयी। मुझे बुलाया गया। करण जौहर से वह मेरी पहली मुलाकात थी। मैंने अनुमान नहीं किया था कि मुझे पहली फिल्म इतनी आसानी से मिल जाएगी। करण ने मुझे कहा भी था कि उन्हें मेरी फिल्म इसीलिए पसंद आई कि उसमें मेलोड्रामा नहीं है। उन्होंने कहा कि आप ही डायरेक्ट करो।’ शशांक आगे कहते हैं, ‘गौर करें तो प्रेम का भाव बदला नहीं है। हां, प्रेमियों की अपेक्षाएं बदल रही हैं। उनके ऊपर इतने किस्म के दबाव हैं कि वे तनाव और प्रभाव में तत्क्षण फैसले ले लेते हैं। मुझे मालूम है उनमें से कई बाद में बहुत पछताते हैं। ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया’ यह बताने की कोशिश है कि बगैर अपेक्षाओं के भी प्रेम किया जा सकता है।’
    अपने कलाकारों के चयन के बारे में शशांक कहते हैं, ‘मैंने ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ देखी थी। उन दिनों मैं अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट लिख रहा था। मुझे वरुण धवन और आलिया भट्ट कुछ दृश्यों में बहुत प्रभावशाली लगे थे। मैंने तभी सोचा था कि मेरी फिल्म में यदि ये दोनों होंगे तो मेरी बात सही तरीके से पर्दे पर आएगी। फिल्म लिखते समय अपनी किरदारों मे मैं उन्हीं दोनों को देखता रहा था। यह भी एक संयोग है कि मुझे अपनी फिल्म के लिए मनचाहे सितारे मिल गए। ’

  

Tuesday, June 17, 2014

सोने की सीढ़ी चढ़ती सोनाक्षी सिन्‍हा


-अजय ब्रह्मात्मज
सोनाक्षी सिन्हा के लिए अच्छा ही रहा कि अक्षय कुमार प्रचलित फैशन में धुंआधार प्रचार में यकीन नहीं करते। अगर प्रमोशन के लिए शहरों के चक्कर लगते तो उन्हें ‘तेवर’ के सेट से छुट्टी लेनी पड़ती। संजय कपूर की इस फिल्म में वह अर्जुन कपूर के साथ दिखेंगी। फिल्म का निर्देशन अमित शर्मा कर रहे हैं। इस फिल्म की शूटिंग मथुरा, वाई और मुंबई में हुई है। मनोज बाजपेयी की प्रतिभा से मुग्ध सोनाक्षी उनकी तारीफ करना नहीं भूलतीं। अजय देवगन के साथ उनकी ‘एक्शन जैक्सन’ भी लगभग पूरी हो चुकी है। इन सभी फिल्मों से अधिक खुशी उन्हें रजनीकांत की फिल्म ‘लिंगा’ से है। ‘रजनीकांत की फिल्म करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। इस फिल्म की शूटिंग के पहले मैं घबराई हुई थी। मेरी घबराहट देख कर रजनी सर ने समझाया कि तुम से ज्यादा मैं घबराया हुआ हूं, क्योंकि तुम मेरे दोस्त की बेटी हो।’ सोनाक्षी बताती हैं कि फिल्म पांचवें दशक की पीरियड फिल्म है, इसलिए हमें कोई दिक्कत नहीं हुई।
    दो दिनों पहले ही सोनाक्षी सिन्हा की ‘हॉलीडे’ रिलीज हुई है। अक्षय कुमार के साथ यह उनकी चौथी फिल्म है। जीवनशैली और आदतों से समानता की वजह से अक्षय कुमार और सोनाक्षी सिन्हा की अच्छी निभती है। सोनाक्षी ने अक्षय कुमार की उन फिल्मों में भी झलक दी है, जिनकी वह नायिका नहीं रहीं। अक्षय उन्हें अपने लिए लकी मानते हैं। सोनाक्षी इस संबंध में कहती हैं, ‘पहली फिल्म ‘राउडी राठोड़’ के समय ही हमारी समझदारी बन गई थी। हमारी पिछली फिल्म ‘हॉलीडे’ पहले की फिल्मों से काफी अलग रही। इस बार कामेडी से अधिक जोर थ्रिलर पर था। मुर्गोदास को हिंदी दर्शक ‘गजनी’ से जानते हैं। उन्होंने इस बार गे्रग पावेल को एक्शन के लिए बुलाया था। मेरे लिए यह फिल्म अपने व्यक्तित्व के ज्यादा करीब रही। शुरू से खेलों में मेरी रुचि रही है। फिल्म में दिखाए गए लगभग सभी खेल मैं स्कूल के दिनों में खेल चुकी हूं। मेरे लिए केवल रग्बी और बॉक्सिंग ही नया खेल था। बॉक्सिंग की ट्रेनिंग और जानकारी मशहूर बॉक्सर विजेन्द्र सिंह से ली थी।’
    ‘हॉलीडे’ के लिए बाक्सिंग सीखने का यह फायदा हुआ है कि सोनाक्षी सिन्हा के नियमित एक्सरसाइज में बाक्सिंग भी शामिल हो गई है। वह कहती हैं, ‘हफ्ते में कम से कम दो दिन तो मैं बॉक्सिंग की प्रैक्टिश कर ही लेती हूं।’ फिल्में करते समय कलाकारों को नए-नए हुनर सीखने पड़ते हैं। कई बार ये हुनर जिंदगी में काम आते हैं और रेगुलर प्रैक्टिश न रहे तो भी सायकिलिंग और स्विमिंग की तरह हमेशा साथ रहते हैं। सोनाक्षी स्वीकार करती हैं, ‘यह हमारे पेशे की खासियत और मुसीबत दोनों है। चूंकि हमें पर्दे पर विश्वसनीय दिखना होता है, इसलिए कोशिश रहती है कि हम उसमें दक्ष दिखें।’ याद करें तो कुछ दशकों पहले तक हीरोइनें बैडमिंटन और टेनिस खेलती हुई नकली लगती थीं। सोनाक्षी स्पष्ट शब्दों में कहती हैं, ‘अब निर्देशक या कलाकार वैसा रिस्क नहीं ले सकते।’
    लगातार सफल फिल्मों का हिस्सा रहीं सोनाक्षी सिन्हा समय की पाबंद और प्रोफेशनल हैं। फिल्म यूनिट से उनके नखरों की खबरें नहीं आतीं। कभी ऐसा भी नहीं सुना कि उनकी वजह से किसी यूनिट का कोई नुकसान हो गया हो। निजी जिंदगी में अनुशासन और व्यवहार का श्रेय वह अपनी परवरिश को देती हैं। वह कहती हैं, ‘शुरू से विनम्रता और अनुशासन की ट्रेनिंग मिली है। मैं हर तरह के उतार-चढ़ाव और बदलाव से वाकिफ हूं। फिल्मी परिवार है मेरा ़ ़ ़ मुझे मालूम है कि मैं क्या हूं और लोग मुझ से क्या चाहते हैं? यह मेरा प्रोफेशन है। फिल्मों के चलने या न चलने से हम प्रभावित जरूर होते हैं, लेकिन उन प्रभावों को दिमाग तक नहीं आने देते।’
    सोनाक्षी के अभी तक के करिअर में दो फिल्में नहीं चली हैं - एक ‘जोकर’ और दूसरी ‘लूटेरा’। ‘लूटेरा’ में उनके काम की सभी ने तारीफ की। ‘जोकर’ के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती। इन दोनों फिल्मों का जिक्र आने पर सोनाक्षी बेबाक कहती हैं, ‘मुझे ‘जोकर’ पसंद है। उसे बच्चों ने बहुत पसंद किया था। मुझे लगता है कि ‘जोकर’ अपने समय से पहले आ गई थी। मैं उसे अपनी बुरी फिल्म नहीं मानती। मौका मिले तो फिर से ‘जोकर’ कर सकती हूं। हां, ‘लूटेरा’ जैसी स्क्रिप्ट की तलाश में हूं। इधर कुछ स्क्रिप्ट पढ़ रही हूं, जिनमें टिपिकल मसाला फिल्मों की हीरोइन के रोल नहीं है। मैं आउट ऑफ द बाक्स फिल्मों के लिए तैयार हूं, लेकिकिसी दबाव या प्रलोभन में वैसी फिल्म नहीं कर सकती। सबसे पहले तो वह फिल्म मुझे अच्छी लगे। ‘लूटेरा’ मेरे लिए टेलर मेड रोल था। ऐसा रोल मिले तो कभी भी कर लूंगी। इसके बावजूद मुझे यह बताने में संकोच नहीं है कि मुझे मसाला फिल्में अच्छी लगती हैं। बतौर दर्शक मैं ऐसी फिल्में देखती हूं। ऐसी फिल्में ज्यादा से ज्यादा दर्शक तक पहुंचती हैं। बिजनेस अच्छा करती हैं। फिर भी संतुलन बनाए रखूंगी। इसी साल ‘हॉलीडे’ के बाद ‘एक्शन जैक्सन’ आएगी तो ‘तेवर’ और ‘लिंगा’ भी आएगी।’
    सोनाक्षी सिन्हा ‘लिंगा’ में पांचवे दशक का किरदार निभा रही हैं। यह पीरियड फिल्म है। ‘लूटेरा’ भी पीरियड फिल्म थी। सोनाक्षी अपने अनुभव के बारे में कहती हैं, ‘पीरियड फिल्में अलग तरह का सुख देती हैं। उन फिल्मों की तैयारी और परफारमेंस में वक्त लगता है। उनसे तृप्ति का अनुभव होता है।’ लगातार सफल फिल्में दे रही सोनाक्षी सिन्हा की तुलना हेमा मालिनी से की जा रही है। हेमा मालिनी अपने समय में कामयाब फिल्में जरूर दीं, लेकिन ़ ़ ़ बात खत्म होने के पहले ही सोनाक्षी पूछ बैठती हैं यह अच्छी बात है कि नहीं? यह बताने पर कि हेमा मालिनी की सफल फिल्मों की तुलना में यादगार फिल्में कम हैं,सोनाक्षी चौंकती हैं और फिर अपना पक्ष रखती हैं, ‘अभी मैं केवल चार साल पुरानी हूं। थोड़ा और समय दें। आप निराश नहीं होंगे। अभी मेरे पास काफी समय है। चार सालों की मेरी उपलब्धि दूसरी हीरोइनों की आठ सालों की जर्नी के बराबर है। मैं शुद्ध मन से हर तरह की फिल्में कर रही हूं। मैंने कभी किसी रणनीति के तहत फिल्में नहीं चुनी हैं।’

बेचैन रहते हैं अनुराग कश्यप


-अजय ब्रह्मात्मज
    28 मई को अनुराग कश्यप की फिल्म ‘अग्ली’ फ्रांस में रिलीज हुई। फ्रांसीसी भाषा में इसे डब किया गया था। अनुराग कश्यप चाहते हैं कि ‘अग्ली’ भारत में भी रिलीज हों। उन्होंने फिल्म में धूम्रपान के दृश्यों के साथ आने वाली चेतावनी के खिलाफ जंग छेड़ रखी थी। उनका मानना है कि फिल्म देखते समय लिखे शब्दों में ऐसी चेतावनी धूम्रपान के खिलाफ सचेत करने का बचकाना प्रयास है। अपने इस तर्क के बावजूद अनुराग अपना केस हार चुके हैं। हाई कोर्ट ने उन्हें बताया है कि अभी सुप्रीम कोर्ट में इसी से संबंधित एक मामला दर्ज है, इसलिए हाई कोर्ट किसी भी फैसले पर नहीं पहुंच सकता। अनुराग मानते हैं कि फिलहाल इस मसमले में कुद नहीं किया जा सकता। उन्होंने ‘अग्ली’ की भारतीय रिलीज का फैसला अब निर्माता और निवेशकों पर छोड़ रखा है। वे कहते हैं, ‘निर्माताओं ने मेरा लंबा साथ दिया। वे मेरे साथ बने रहे, लेकिन अब उन्हें दिक्कत महसूस हो रही है। ‘अग्ली’ फ्रांस में रिलीज हो चुकी है। निर्माता जल्दी ही यहां भी रिलीज की घोषणा करेंगे।’
    पिछले हफ्ते रिलीज हुई निशा पाहुजा की डाक्यूमेंट्री ‘द वल्र्ड बिफोर हर’ ने अनुराग कश्यप को डिस्टर्ब कर दिया था। फिल्म देखने के बाद उन्हें पता चला कि यह भारत में रिलीज नहीं हो पा रही है तो उन्होंने आगे बढ़ कर जिम्मेदारी ले ली। उनकी वजह से फिल्म की चर्चा हुई और यह डाक्यूमेंट्री रिलीज हो सकी। भारत में डाक्यूमेंट्री और अलग किस्म की फिल्मों के प्रदर्शन की स्थिति पर वे नाराज स्वर में कहते हैं, ‘इस देश के दर्शक बदल रहे हैं। फिल्म इंडस्ट्री भी बदल रही है। इन दिनों अनेक फिल्मकार नए विषयों पर अलग किस्म की फिल्में बना रहे हैं। इन सब के बावजूद बदलाव के अनुसार वितरकों की सोच में तब्दीली नहीं आ रही है। वे पहले ही घोषणा कर देते हैं कि फलां फिल्म नहीं चलेगी। उसके दर्शक नहीं है। ‘द वल्र्ड बिफोर हर’ जैसी डाक्यूमेंट्री से आप किसी एंटरटेनिंग फिल्म जैसे बिजनेस की उम्मीद नहीं रख सकते। मेरा कहना है कि ऐसी फिल्मों को जितने दर्शक मिल सकते हैं, उन तक तो फिल्म पहुंचे।’
    अनुराग कश्यप इन दिनों अपनी महात्वाकांक्षी फिल्म ‘बांबे वेलवेट’ की एडीटिंग और पोस्ट प्रोडक्शन में व्यस्त है। रणबीर कपूर,अनुष्का शर्मा और करण जौहर अभिनीत यह फिल्म पिछली सदी की मुंबई की कहानी है, जब यह महानगर आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में नई करवट ले रहा था। ‘बांबे वेलवेट’ के प्रति उत्साहित अनुराग कश्यप कहते हैं, ‘हाल ही में हमलोगों न एडीटिंग लॉक किया। अब उसे फायनल शेप देने का काम चल रहा है। फिल्म के पोस्टर, प्रमोशन और मार्केटिंग की जिम्मेदारी विकास बहल की है। वे सब कुछ प्लान कर रहे हैं। ‘फैंटम’ में हमलोगों की अच्छी टीम बन गई । अब विकास बहल फिल्म डायरेक्ट करेंगे तो उसकी मार्केटिंग और प्रमोशन का काम हमलोग देखेंगे।’ अनुराग कश्यप अपनी निर्माणाधीन फिल्मों के बारे में बातें करने से नहीं हिचकते। मौका मिलते ही रिलीज के पहले वे फिल्म दिखाने भी लगते हैं। इस बार फिल्म बड़ी है और बहुत कुछ दांव पर लगा है। क्या इस बार भी वे वही रुख अपनाएंगे, ‘बिल्कुल, अपनी फिल्मों को लेकर मैं आश्वस्त रहता हूं। पहले ही लोग देख लें तो फीडबैक मिल जाता है। मैं दूसरों के पाइंट ऑॅफ व्यू  भी समझ पाता हूं। इस बार भी फिल्म पूरी होगी तो उसके प्रायवेट शो होंगे।’
    पिछले कुछ समय से कल्कि कोइचलिन से अपने संबंधों को लेकर चर्चा में रहे अनुराग कश्यप मानते हैं कि मीडिया हमेशा से पर्सनल बातों और घटनाओं में रुचि रखता है। इस बीच अपने बारे में छपी खबरों से पता चला कि परिदृश्य कितना उलझ गया है। वे स्वीकार करते हैं कि ‘क्लकि से मैं अलग हो चुका हूं। फिर भी हमारे संबंध खराब नहीं हुए हैं। हम अब भी बातचीत करते हैं और दोस्त हैं।’ हाल ही में दोनों एक टीवी शो में भी साथ दिखे। अनुराग कश्यप के करीबी मानते हैं कि उनके जीवन में फिल्मों का प्रेम बाकी सभी संबंधों पर भारी पड़ता है। फिल्म के निर्माण, निर्देशन और अन्य गतिविधियों में वे इस कदर डूब जाते हैं कि उन्हें न खुद की फिक्र रहती है और न दुनिया की।
हमेशा बेचैन रहते हैं अनुराग। अपनी फिल्मों के साथ उनहें साथियों की फिल्मों की भी चिंता रहती है। पिछले एक दशक में अनुराग के अनेक सहायकों ने फिल्म निर्देशन में कदम रखा। अनुराग कश्यप किसी भी वाजिब फिल्म के साथ जडऩे में खुशी महसूस करते हैं। हालांकि अब वे पहले की तरह सभी के लिए उपलब्ध नहीं होते, लेकिन अगर कोई उन तक पहुंच गया तो वह निराश होकर नहीं लौटता। अनुराग कश्यप की मौजूदगी फिजां में सृजन का संचार करती है। उनकी ऊर्जा और चिंता संक्रामक है।

Monday, June 16, 2014

टाइमिंग का कमाल है कामेडी -रितेश देशमुख


-अजय ब्रह्मात्मज
    अभिनेता रितेश देशमुख मराठी फिल्मों के निर्माता भी हैं। इस साल उन्हें बतौर निर्माता राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला है। हिंदी में बतौर अभिनेता उनकी दो फिल्में ‘एक विलेन’ और ‘हमशकल्स’ आ रही है। सृजन के स्तर पर उनका दो व्यक्तित्व नजर आता है। यहां उन्हें अपने व्यक्तित्व के दो पहलुओं पर बातें की हैं।
- निर्माता और अभिनेता के तौर पर आपका दो व्यक्तित्व दिखाई पड़ता है? बतौर निर्माता आप मराठी में गंभीर और संवेदनशील फिल्में बना रहे हैं तो अभिनेता के तौर पर बेहिचक चालू किस्म की फिल्में भी कर रहे हैं। इन दोनों के बीच संतुलन और समझ बनाए रखना मुश्किल होता होगा?
0 बतौर निर्माता जब मैं ‘बालक पालक’, ‘येलो’ और ‘लेई भारी’ का निर्माण करता हूं तो उनके विषय मेरी पसंद के होते हैं। मैं तय करता हूं कि मुझे किस तरह की फिल्में बनानी है। वहां सारा फैसला मेरे हाथ में होता है। जब फिल्मों में अभिनय करता हूं तो वहां विषय पहले से तय रहते हैं। स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी होती है। उनमें जो रोल मुझे ऑफर किया जाता है उन्हीं में से कुछ मैं चुनता हूं। हां, अगर जैसी फिल्मों का मैं निर्माण करता हूं, वैसी ही फिल्में मुझे ऑफर हों तो जरूर करूंगा। निजी तौर पर मुझे वैसी फिल्में पसंद हैं। दर्शक जिन फिल्मों में मुझे देख रहे हैं वे फिल्में मुझे दी गई हैं। अभी मैं हिंदी फिल्में बनाने की स्थिति में नहीं हूं। कल को संभव हुआ तो हिंदी में भी ‘बालक पालक’ जैसी फिल्में बनाऊंगा।
- क्या मान लिया जाए कि आपका एक्टिंग करिअर आपकी पसंद से नहीं चल रहा है?
0 ना ना ़ ़ ़ मैं अपनी पसंद की ही फिल्में चुनता हूं। मुझे जो दस फिल्में मिलती हैं उनमें से ही एक चुनता हूं। वह एक मेरी पसंद होती है। समस्या यह है कि कोई एक फिल्म चल जाती है तो उसी तरह की फिल्में मिलने लगती है। ‘हमशकल्स’ के पहले मैंने जो चार कामेडी फिल्में की हैं वे सभी सिक्वल हैं। उनमें मुझे रहना ही था। कायदे से देखें तो मैंने कोई नई फिल्म की ही नहीं है। ‘हमशकल्स’ उस लिहाज से ‘तेरे नाल लव हो गया’, ‘एक विलेन’ और ‘हमशकल्स’ नई फिल्में हैं। ‘एक विलेन’ जैसी फिल्म आती है तो कुछ अलग करने का अहसास होता है। एक्सेल प्रोडक्शन के लिए करण अंशुमान के लिए ‘बैंगिस्तान’ करूंगा। यह आतंकवाद पर सटायर है।
- ‘एक विलेन’ में आप अलग रूप में नजर आ रहे हैं?
0 पिछले कुछ सालों से नया ट्रेंड आया है कि स्टार को उसकी इमेज से अलग रोल और फिल्म दो। कोशिश रहती है कि एक्टर नए अंदाज और रूप में दिखे। हम कलाकारों के लिए यह अच्छा समय है। गोविंदा जैसे अभिनेता भी डार्क रोल कर रहे हैं।
- आप स्वभाव से विनोदी हैं या फिल्में करते-करते ऐसा स्वभाव बन गया है?
0 यह क्रिकेट की तरह होता है। आप जितनी अधिक प्रैक्टिस करेंगे आपकी टाइमिंग उतनी अच्छी होती जाएगी। जन्मजात तो कुछ भी नहीं होता। हम सभी में प्रतिभा रहती है। अभ्यास और व्यवहार से हम निखरते हैं। सभी कलाकारों की टाइमिंग अलग-अलग होती है। ह्यूमर की बेसिक समझ रहती है। लतीफे का पंच मालूम होना चाहिए। अलग-अलग डायरेक्टर और एक्टर के साथ काम करने के बाद उनके साथ टाइमिंग मैच करनी होती है। मैं अच्छा ऑबजर्वर हूं। उनसे सीखने की कोशिश करता हूं। कामेडी, टाइमिंग और जोक्स। सही समय पर हो तो असरदार होता है।
- पुराने कलाकारों में आप किन्हें पसंद करते हैं?
0 किशोर कुमार, महमूद, कादर खान, संजीव कुमार और गोविंदा ... इन सभी की टाइमिंग अलग-अलग है। अप्रोच अलग है। महमूद साहब की एक्टिंग इन योर फेस होती थी। उनके सामने हीरो भी घबराते थे। किशोर दा की एनर्जी गजब की थी। वे कामेडी परफार्म करते थे। आपका ध्यान खींच लेते थे। उनके ठीक विपरीत संजीव कुमार थे। संपूर्ण अभिनेता। उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं रहता था, लेकिन अपनी शैली से वे हंसा देते थे।
- क्या ह्यूमर और कामेडी का सांस्कृतिक और भाषायी आधार होता है?
0 बिल्कुल होता है। कोई भी सिचुएशन युनिवर्सल हो सकती है, लेकिन उसका ट्रीटमेंट, पंचलाइन और डायलॉग संस्कृति और भाषा विशेष से तय होगा। केले के छिलके पर फिसलकर किसी भी देश में लोग गिरें तो आप हंसेंगे। बस प्रतिक्रिया की भाषा अलग होगी। यह सिटकॉम हुआ।
- साहित्य में हास्य और विनोद का राजनीतिक दृष्टिकोण भी रहता है। क्या फिल्मों में ऐसा नहीं हो सकता?
0 हो सकता है। इस तरफ हमारे फिल्मकारों का अभी ध्यान नहीं गया है। राजनीतिक व्यंग्य बहुत ही प्रभावशाली हो सकता है। शायद हम लिख नहीं पा रहे हैं। अगर कुछ लिख भी रहे हैं तो उसके मुताबिक फिल्म नहीं बन पा रही है। ऐसी छोटी-मोटी सफल कोशिशें चल रही हैं। उन्हें दर्शक पसंद भी कर रहे हैं। मेरी फिल्म ‘बैंगिस्तान’ धर्म और आतंकवाद पर सटायर है।

Saturday, June 14, 2014

दरअसल : अज्ञान के साथ लापरवाही


-अजय ब्रह्मात्मज
    हिंदी फिल्मों की अनेक विडंबनाओं में से एक बड़ी विडंबना यह भी है कि धीरे-धीरे हिंदी फिल्मों के नाम फिल्म और पोस्टर में हिंदी में आने बंद या कम हो गए हैं। इधर ऐसी कई फिल्में आई हैं, जिनके टायटल तक हिंदी में नहीं लिखे जाते। आप बड़े शहरों के किसी भी मल्टीप्लेक्स या सिनेमाघर में घूम आएं। बहुत मुश्किल से कुछ पोस्टर हिंदी में दिखेंगे। उत्तर भारत में फिल्म रिलीज होने के हफ्ते-दस दिन पहले पोस्टर हिंदी में लगते हैं। उनमें भी कई बार गलत हिंदी लिखी रहती है। मान लिया गया है कि हिंदी फिल्मों के दर्शक अंग्रेजी समझ लेते हैं, इसलिए देवनागरी में नाम लिखने की जरूरत नहीं रह गई है। निर्माता और वितरकों पर दर्शकों की तरफ से दबाव भी नहीं है। इस लापरवाही और आलस्य में भाषा की तमीज और शुद्धता खत्म होती जा रही है।
    इन दिनों साजिद खान की फिल्म ‘हमशकल्स’ की काफी चर्चा है। धुआंधार प्रचार चल रहा है। हर कोई ‘हमशकल्स’ बोल और लिख रहा है। गौर करें तो हिंदी या उर्दू में ‘हमशक्ल’ के बहुवचन के लिए कोई अलग शब्द नहीं है। एक तो यह शब्द ‘हमशक्ल’ है। ‘हमशक्ल’ का बहुवचन भी ‘हमशक्ल’ ही होगा। बहुवचन के लिए हिंदी अंग्रेजी के नियम से ‘एस’ अक्षर लगाने की जरूरत नहीं है। ‘हमशकल्स’ नाम पर किसी को आपत्ति नहीं है। हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में भी यही गलत नाम लिखा जा रहा है। साजिद खान का बेशर्म लॉजिक है कि फिल्म में तीन हमशक्ल हैं तो वे ‘हमशकल्स’ हो जाएंगे। टायटल के प्रति ऐसी लापरवाही इधर कुछ और फिल्मों में दिखाई पड़ी है।
    कुछ महीने पहले शाहिद कपूर की फिल्म ‘फटा पोस्टर निकला हीरो’  आई थी। इस फिल्म का पोस्टर भी अंग्रेजी में था और निकला को उच्चारण के हिसाब से निखला लिखा गया था - हृढ्ढ्य॥रु्र। निर्माताओं ने अक्षर ज्योतिष के हिसाब से लाभ के लिए अतिरिक्त अक्षर ‘एच’ लगा दिया। अगर ऐसा ही चलता रहा तो नागरी में लिखे नामों के अप्रचलन से कुछ सालों में भ्रष्ट और गलत उच्चारण चलने लगेंगे। निश्चित ही भाषा और शब्दों का स्थायी स्वरूप और अर्थ नहीं होता, लेकिन प्रचलित शब्दों का भ्रष्ट या गलत प्रयोग अनुचित है। पिछले दिनों टायगर श्रॉफ की फिल्म आई। इस फिल्म का नाम अंग्रेजी के तर्ज पर हिंदी में ‘हिरोपंती’ लिखा गया। हिंदी की पत्र-पत्रिकाओं में पुराने संस्कार से ‘हिरोपंती’ को सुधार कर ‘हीरोपंती’ कर दिया गया। यह ख्याल नहीं रहा कि सही शब्द  ‘हीरोपंथी’ है। मुंबई में निर्माता-निर्देशक ने तो बताने पर भी परवाह नहीं की। फिल्म हिट हो चुकी है तो अब उनका तर्क होगा - नाम में क्या रखा है? करण जौहर के धर्मा प्रोडक्शन की फिल्म ‘हंसी तो फंसी’ को अंग्रेजी में लिखते समय ‘हंसी’ और ‘फंसी’ में ‘एन’ लगाने की चिंता नहीं की गई। अंग्रेजी अक्षरों का उच्चारण लिखते तो नाम ‘हसी तो फसी’ होता। पिछले दिनों विशाल भारद्वाज अपवाद रहे थे। उनकी फिल्म ‘मटरू की बिजनी का मन्डोला’ के पोस्टर केवल हिंदी में थे।
    वास्तव में यह अज्ञान के साथ लाभ की लापरवाही है। अक्षर ज्योतिष की लोकप्रियता के बाद टायटल में अतिरिक्त अक्षर जोड़ लेना प्रचलन में है। अक्सर हिंदी फिल्मों के नामों अंग्रेजी के कुछ अतिरिक्त अक्षर दिख जाते हैं। अब तो कलाकार भी अपने नाम में अतिरिक्त अक्षर जोड़ लेते हैं। उन्हें लगता है कि अतिरिक्त अक्षर लगाने मात्र से उनका करिअर चमक जाएगा। सुनील शेट्टी, करीना कपूर, रितेश देशमुख, मनोज बाजपेयी आदि ने अपने नाम में अतिरिक्त अक्षर जोड़े हैं। इन्हें चिता ही नहीं रहती कि उनका नाम हिंदी में अतिरिक्त अक्षर के साथ लिखा जाए तो वह कैसे पढ़ा जाएगा? इस लापरवाही और षिेध पर तो अब ध्यान भी नहीं जाता कि हिंदी फिल्मों में कलाकारों और तकनीशियनों के नाम अंग्रेजी में ही लिखे जाते हैं।
    हिंदी में नाम लिखने की एक समस्या पुरानी है। अंग्रेजी अक्षरों के मराठी उच्चारण थोड़े अलग हो जाते हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री मुंबई में स्थित है। आरंभ से अभी तक यहीं से पोस्टर या उसकी डिजाइन यहीं से बन कर जाते हैं। मराठीभाषी डिजाइनर या लेखक मराठी भाषा के प्रभाव में ‘सिंह’ को ‘सिंग’ लिखने की गलतियां करता रहा है। हम अर्से तक ‘दारा सिंह’ को ‘दारा सिंग’ पढ़ते रहे हैं। इसी का असर था अक्षय कुमार की फिल्म का नाम ‘सिंग इज किंग’ लिखा जा रहा था। बताने पर विपुल शाह माने थे कि ‘सिंग’ की जगह ‘सिंह’ लिखना सही और उचित होगा।

फिल्‍म समीक्षा : फगली

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
स्वाभाविक है कि 'फगली' देखते समय उन सभी फिल्मों की याद आए, जिनमें प्रमुख किरदार नौजवान हैं। कबीर सदानंद की 'फगली' और अन्य फिल्मों की समानता कुछ आगे भी बढ़ती प्रतीत हो सकती है। दरअसल, इस विधा की फिल्मों के लिए आवश्यक तत्वों का कबीर ने इस्तेमान तो किया है, लेकिन उनका अप्रोच और ट्रीटमेंट अलग रहा है। 'फगली' की यह खूबी है कि फिल्म का कोई भी किरदार नकली और कागजी नहीं लगता।
'फगली' इस देश के कंफ्यूज और जोशीले नौजवानों की कहानी है। देव, देवी, गौरव और आदित्य जैसे किरदार बड़े शहरों में आसानी से देखे जा सकते हैं। ईमानदारी और जुगाड़ के बीच डोलते ये नौजवान समय के साथ बदल चुके हैं। वे बदते समय के अनुसार सरवाइवल के लिए छोटे-मोटे गलत तरीके भी अपना सकते हैं। ऐसी ही एक भूल में वे भ्रष्ट पुलिस अधिकारी आरएस चौटाला की चपेट में आ जाते हैं। यहां से उनकी नई यात्रा आरंभ होती है। मुश्किल परिस्थिति से निकलने और आखिरकार जूझने के उनके तरीके से असहमति हो सकती है, लेकिन उनके जज्बे से इंकार नहीं किया जा सकता। वास्तव में निराशा से उपजे इस उपाय पर विचार की जरूरत है कि क्यों देश का नौजवान आत्महंता रास्ता अख्तियार करता है? और दुस्साहसी हो जाते हैं।
'फगली' नौजवानों की मौज-मस्ती से आगे की फिल्म है। वे सभी समाज के विभिन्न तबकों से आए यूथ हैं, जो अपने सपनों को आकार देना चाहते हैं। एक छोटी सी बात पर अडऩे के साथ ही उनकी भिडं़त सिस्टम से हो जाती है। सिस्टम की क्रूरता समझने में उन्हें थोड़ा वक्त लगता है। कबीर सदानंद ने 'फगली' में किसी व्यक्ति के बजाए उस समूह की कहानी कही है, जिसके प्रतिनिधि देव, देवी गौरव और आदित्य हैं।
आर एस चौटाला की भूमिका में जिमी शेरगिल ने शुरू से अंत तक किरदार में रहे हैं। उनके संवाद और व्यवहार में किरदार की कुटिलता जाहिर होती है। वे इस पीढ़ी के एक उम्दा अभिनेता हैं,जो सहयोगी किरदारों में खर्च हो रहे हैं। 'फगली'के नए कलाकारों में कियारा आडवाणी आकर्षित करती हैं। लेखक-निर्देशक ने उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने के पर्याप्त अवसर दिए हैं। उन्होंने इन अवसरों को हाथ से नहीं जाने दिया है। अन्य कलाकारों को भी लेखक-निर्देशक ने अवसर दिया है, लेकिन मोहित मारवा और विजेन्द्र सिंह चूक गए हैं। अरफी लांबा फिर भी कुछ दृश्यों में प्रभावित करते हैं।
कबीर सदानंद ने हिंदी फिल्मों के प्रचलित ढांचे में ही कुछ नया करने का प्रयास किया है। निश्चित ही उन पर समकालीन श्रेष्ठ फिल्मों का प्रभाव है, लेकिन वे नकलची नहीं है। उन्होंने दृश्यों, संवादों और मुहावरों में नवीनता बरती है। 'फगली' का गीत-संगीत सराहनीय है।
अवधि - 136 मिनट 
*** तीन स्‍टार

फिल्‍म समीक्षा : मछली जल की रानी है

-अजय ब्रह्मात्‍मज
फिल्म मछली जल की रानी है के पोस्टर पर लिखा है 'यह बच्चों की नहीं, बड़ों की फिल्म है'। यह हिदायत जरूरी है, क्योंकि टाइटल में बच्चों की फिल्म का आकर्षण है। निर्देशक देवालय डे ने कहानी, किरदार व परिवेश के स्तर पर हॉरर फिल्मों की परंपरा में कुछ नया करने का प्रयास किया है। हॉरर फिल्मों की चुनौती है दर्शकों को चौंकाना और उन्हें अप्रत्याशित हादसों के लिए तैयार रखना। देवालय इस चुनौती को समझते हैं।
आयशा और उदय नवदंपति हैं। उनकी एक बेटी भी है। एक बार हंसी-मजाक में आयशा की तेज ड्राइविंग से दुर्घटना में एक लड़की मारी जाती है। आयशा उस हादसे को दिमाग से नहीं निकाल पाती। इस बीच, उदय का ट्रांसफर जबलपुर हो जाता है। दोनों को लगता है कि नई जगह पर वे खुशहाल रहेंगे। वहां पहुंचने पर नई अज्ञात हरकतें आरंभ होती हैं। आयशा को संदेह होता है कि घर में कुछ गड़बड़ है। आयशा की संदेह को उदय उसका वहम मानता है, लेकिन एक समय के बाद स्थितियां बेकाबू हो जाती है। फिर तांत्रिक उग्र प्रताप की मदद लेनी पड़ती है।
देवायल डे डर को बुनने में ज्यादा वक्त लेते हैं। आरंभिक प्रसंग पूरी तरह से बांध नहीं पाते। उनमें ढीलापन है। प्रेतात्मा का प्रसंग आ जाने पर फिल्म पूरी तरह से स्वरा भास्कर पर निर्भर करती है। स्वरा के लिए ऐसे किरदार को निभाना आसान नहीं रहा होगा। उन्होंने आयशा के मन में बैठे डर और फिर प्रेतात्मा से आवेशित होने के बाद के भावों को अच्छी तरह व्यक्त किया है। इस फिल्म में स्वरा ने साबित किया है कि अगर उन्हें बहन और दोस्त से बड़ी भूमिकाएं मिलें तो वह उन्हें सहजता से निभा सकती हैं। इस बार उन्हें पर्दे पर गाने-नाचने का भी मौका मिला है।
अन्य कलाकारों में केवल दीपराज राणा तांत्रिक की भूमिका में प्रभावित करते हैं। उन्होंने इस किरदार के लिए आवश्यक ऊर्जा व आवाज का सुंदर संयोग किया है। पड़ोसी की छोटी भूमिका में मुरली शर्मा निराश नहीं करते। अच्छी बात है कि देवालय ने हॉरर में किसी और तत्व का मिश्रण नहीं किया है।
अवधि - 120 मिनट
**1/2 ढाई स्‍टार

Monday, June 9, 2014

रियल कॉमेडी है यह मेरे लाइफ की -गोविंदा


-अजय ब्रह्मात्मज
   
    कैसी विडंबना है? गोविंदा जैसे कलाकारों की तारीफ हो रही है, लेकिन गोविंदा तकलीफ में हैं। उन्हें फिल्में नहीं मिल रही हैं। बीच में एक वक्त ऐसा गुजरा जब गोविंदा के पास बिल्कुल फिल्में नहीं थीं। अभी वे फिर से एक्टिव हुए हैं। होम प्रोडक्शन की ‘अभिनय चक्र’ के साथ वे शाद अली की ‘किल दिल’ में भी दिखेंगे। इनके अलावा कुछ और फिल्मों की बातें भी चल रही हैं। उन्हें दुख इस बात का नहीं है कि उनके पास फिल्में नहीं हैं। वे आहत हैं कि किसी साजिश के तहत उनके करिअर को नुकसान पहुंचाया गया। वे यहां तक कहते और मानते हैं कि उनकी अटकी या अप्रदर्शित फिल्में इसी साजिश का हिस्सा हैं। गोविंदा को अब लगता है कि राजनीति में उनका जाना सही फैसला नहीं रहा। उन्हें इस भूल की कीमत चुकानी पड़ी है। इस व्यथा और विक्षोभ के बावजूद उनकी मुस्कराहट बनी हुई हैं और आंखों की चमक में पुरानी मासूमियत छलकती रहती है।
    गोविंदा हाल ही में अमेरिका और इंग्लैंड की यात्रा से लौटे हैं। उन्हें खुशी है कि दर्शक अभी तक उन्हें नहीं भूले हैं। आईफा वीकएंड समारोह के दौरान टेम्पा शहर में गोविंदा भी आकर्षण का केन्द्र रहे। विदेशी मीडिया से लेकर अमेरिकी दर्शकों तक ने उनमें रुचि दिखाई। आईफा के दौरान उनकी फिल्म ‘अभिनय चक्र’ की झलक पेश की गई। वे कहते हैं, ‘मुझे विदेशी मीडिया के पत्रकारों ने बताया कि वे मेरी फिल्में देखते हैं। मैं वहां के डीवीडी मार्केट में पॉपुलर हूं। भारत में तो सभी यही कहते रहे कि मैं आम दर्शकों का हीरो हूं, इसलिए विदेशों में मेरा बाजार नहीं है। सच्चाई कुछ और है। मुझे देश और विदेश के दर्शक समान रूप से चाहते हैं।’
    अपनी फिल्म ‘अभिनय चक्र’ के प्रति वे बहुत उत्साहित हैं। उनकी राय में ‘अभिनय चक्र’ उनके करिअर की नई शुरुआत है। जिसमें वे अपनी पुरानी छवि से अलग रूप में नजर आएंगे। वे बताते हैं, ‘हम सभी अपने जीवन में एक पात्र होते हैं। हमारी भूमिकाएं निश्चित रहती हैं। अपना कर्तव्य निभाते समय वास्तव में हम अभिनय कर रहे होते हैं। फिल्म में मैं पुलिस इंस्पेक्टर बना हूं। इस भूमिका के लिए मैंने खुद को चुस्त-दुरुस्त किया है। फिल्म में एक्शन है, लेकिन साथ में कामेडी का ट्रैक चलता रहता है। हम लोगों ने डायलॉग पर काफी मेहनत की है।’
    ‘अभिनय चक्र’ में आशुतोष राणा खलनायक की भूमिका में हैं। लंबे समय बाद उन्हें पर्दे पर चीखते और संवाद बोलते देख कर अच्छा लगता है। गोविंदा ने फिल्म में खलनायक को लार्जर दैन लाइफ रखा है। वजह पूछने पर वे बेहिचक कहते हैं, ‘सालों पहले मैंने एक फिल्म देखी थी, जिसमें खलनायक को देखकर नफरत नहीं हुई थी। वह अच्छा लगा था। ‘अभिनय चक्र’ का खलनायक भी ऐसा ही है। आशुतोष राणा ने अपने किरदार को अच्छी तरह निभाया है।’ गोविंदा मानते हैं कि उनके होम प्रोडक्शन मंगलतारा की यह नई शुरुआत है। ‘तीन-चार साल के ठहराव के बाद मैंने यह फिल्म शुरू की है, वह बताते हैं, ‘जब मैंने 1985-86 में शुरुआत की थी तो क्या अंदाजा था कि कुछ सालों में मेरा नाम हो जाएगा और हीरो के रूप में पहचान मिल जाएगी। तब सिर्फ मेहनत की थी। फिर से मेहनत कर रहा हूं। कहते हैं कि मेहनत का फल मीठा होता है।’
    पिछले कठिन दौर की वजह से गोविंदा कटु नहीं हुए हैं। उन्होंने इस दौरान आत्मनिरीक्षण किया। परिर्चितों को परखा और मित्रों की पहचान की। वे अपना अनुभव साझा करते हैं, ‘वक्त कठिन चल रहा हो तो थोड़ा संभल कर चलना चाहिए। देखना चाहिए कि पीछे कौन खड़ा है? सामने कौन है? जो लोग होशियारी करते हैं। उनकी सोच एक जगह जाकर ठहर जाती है। समय का इंतजार करें। समय सही होते ही सब कुछ सही हो जाएगा। मुझे लगता है कि मेरा समय लौट रहा है। फिल्म अच्छी बनी है। मैंने मेहनत की है। मैं फिट और सेहतमंद हो गया हूं।’ गोविंदा जैसे कलाकारों की तारीफ और गोविंदा को काम न मिलने की तकलीफ के बारे में पूछने पर वे ठठा कर हंसते हैं, ‘यह तो मेरी लाइफ की सबसे बड़ी कामेडी है। रियल लाइफ में कामेडी हो गई है। लोग कहते हैं कि फलां एक्टर गोविंदा की तरह काम करता है। बड़ा अच्छा है। अरे भाई, गोविंदा की तरह काम करने वाला इतना अच्छा है तो गोविंदा की फिल्में क्यों नहीं रिलीज हो रहीं? गोविंदा को काम क्यों नहीं मिला? बहरहाल, अब काम मिल रहा है।’
    गोविंदा अपने करिअर में आए ठहराव के बावजूद संतुष्ट हैं। वे स्वीकार करते हैं कि समीक्षकों ने उन्हें कभी पसंद नहीं किया। अब भले ही उन्हें मुझ में कुछ चीजें अच्छी लगने लगी हैं। वे गर्व और संतुष्टि के साथ कहते हैं, ‘मैं तो आम दर्शकों का हीरो रहा। मुझे पर्दे पर देख कर वे झूमते थे। हीरोइनों के साथ नाचते देख कर वे खुश होते थे। सच कहूं तो मैं जिस मध्यवर्गीय परिवार से आया, वहां कोई प्लानिंग नहीं होती। मैं अपने परिवार का पहला व्यक्ति था जो निकला और यहां पहुंचा। फिल्म और राजनीति दोनों जगह रहा मैं। मेरे ऊपर अनेक जिम्मेदारियां थीं। उन्हें निभाते हुए मैं तो गांव वाला रह गया। कुछ लोग कहते हैं कि बदलते समय को मैं समझ नहीं पाया, लेकिन मैं देख रहा हूं कि जो समझ गए थे, वे भी गिरे। सब दिन होत न एक समाना ़ ़ ़ यह मान लें तो तकलीफें कम हो जाती हैं।’
    आनेवाली फिल्मों में शाद अली की ‘किल दिल’ में गोविंदा खलनायक की भूमिका निभा रहे हैं। ‘हैप्पी एंडिंग’ में उनका गेस्ट एपीयरेंस है। फिर होम प्रोडक्शन की ‘अभिनय चक्र’ है। अक्षय कुमार की फिल्म ‘होलीडे’ में भी कैमियो है। अक्षय कुमार के सीनियर का रोल है। लंबे समय तक छोटी-मोटी फिल्मों में सामान्य भूमिकाओं के ऑफर से इंकार करने के बाद आखिरकार गोविंदा ने पत्नी की सलाह मान ली और उन्होंने फिल्में स्वीकार करना शुरू कर दिया है।


Saturday, June 7, 2014

फिर से साथ आ रहे हैं आशुतोष गोवारिकर और रितिक रोशन




-अजय ब्रह्मात्मज

    आशुतोष गोवारिकर और रितिक रोशन की डायरेक्टर-स्टार जोड़ी एक बार फिर ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बन रही प्रेमकहानी ‘मोहनजोदाड़ो’ में दिखेगी। आशुतोष गोवारिकर और रितिक रोशन दोनों इस फिल्म को लेकर उत्साहित हैं। ‘मोहनजोदाड़ो’ सिंधु घाटी की सभ्यता की प्रेमकहानी है, जिसमें रितिक रोशन नायक की भूमिका निभाएंगे। नायिका का चुनाव अभी तक नहीं हुआ है। अक्टूबर-नवंबर में आरंभ हो रही इस फिल्म का सेट ‘लगान’ और ‘जोधा अकबर’ की तरह विशाल एवं विस्तृत होगा। सेट के लिए समुचित स्थान की खोज जारी है। ‘मोहनजोदाड़ो’  की घोषणा पर रितिक रोशन कहते हैं, ‘आशुतोष के साथ फिल्म करना शारीरिक और मानसिक तौर पर चुनौती है। उनके असामान्य किरदारों को पर्दे पर उतारना आसान नहीं होता। मेरे लिए खुशी की बात है कि देश-दुनिया में विख्यात सिंधु घाटी की सभ्यता के समय के किरदार को जीने का मौका मिलेगा।’ अपनी फिल्मों की भव्यता और गहराई के लिए विख्यात आशुतोष गोवारिकर ‘मोहनजोदाड़ो’ को पिछली फिल्मों से अधिक मुश्किल मानते हैं। वे कहते हैं, ‘मुझे प्रेमकहानियां पसंद हैं। मैं अलग-अलग पीरियड की प्रेम कहानियां पेश करने में यकीन रखता हूं। इस बार सिंधु घाटी की संस्कृति और सभ्यता के बीच प्रेम का बखान करूंगा। मुझे इसके लिए पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पूरा नगर बसाना है। 4500 साल पहले की प्रेमकहानी के लिए उपयुक्त परिवेश तैयार करना ही  अभी सबसे बड़ी चुनौती है।’ ‘मोहनजोदाड़ो’ की अन्य कलाकारों का चुनाव अभी नहीं हुआ है। आशुतोष ने ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुरातात्विक सामग्रियों के आधार पर साढ़े चार हजार साल पहले की कहानी बुनी है। उल्लेखनीय है कि सिंधु घाटी की सभ्यता की पृष्ठभूमि पर ही रांगेय राघव ने ‘मुर्दों का टीला’ नामक उपन्यास लिखा था।








Friday, June 6, 2014

फिल्‍म समीक्षा : फिल्मिस्‍तान

- अजय ब्रह्मात्‍मज 
 2012 में 'फिल्मिस्तान' को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। कायदे से यह फिल्म काफी पहले आ जानी चाहिए थी। अभी चर्चित फिल्मी हस्तियां 'फिल्मिस्तान' के गुणगान में लगी हैं। पिछले एक साल तक ये सहृदय समर्थक कहां थे? 'फिल्मिस्तान' नितिन कक्कड़ की शानदार फिल्म है। यह फिल्म भारत-पाकिस्तान के रिश्तों की घिसी-पिटी कथाओं और घटनाओं में नहीं जाती। नए तरीके से दोनों देशों की समानता को रेखांकित करती 'फिल्मिस्तान' में भावनाओं का उद्रेक होता है और घृणा थोड़ी कम होती है। इस फिल्म में नितिन कक्कड़ ने अनोखे अंदाज में दोनों पड़ोसी देशों को करीब दिखाने की सार्थक कोशिश की है।
सनी अरोड़ा एक्टर बनना चाहता है। एक्टिंग में सही मौका नहीं मिलने पर वह कुछ समय के लिए एक अमेरिकी फिल्म मंडली का सहायक बन जाता है। राजस्थान के सीमांत पर शूटिंग के दरम्यान सनी का अपहरण हो जाता है। पाकिस्तानी आतंकवादी उसे अमेरिकी समझ कर उठा ले जाते हैं। गलती का एहसास होने पर सही समय के इंतजार में वे उसे बंदी बना लेते हैं। इस दौरान सनी की मुलाकात आफताब से हो जाती है। आफताब हिंदी फिल्मों की पायरेटेड डीवीडी का धंधा करता है। हिंदी फिल्मों के दीवाने आफताब और सनी के बीच दोस्ती होती है। हिंदी फिल्मों के स्टार, संवाद और संगत में दोनों की दोस्ती गाढ़ी होती है। सनी अपने बेफिक्र और निर्भीक मासूमियत से आतंकवादी सरगना महमूद को छेड़ता रहता है। वे फिल्मों की इस दीवानगी और समानता से असमंजस में रहते हैं।
शारिब हाशमी (सनी अरोड़ा) और इनामुल हक (आफताब) ने अपने किरदारों को सादगी और ईमानदारी के साथ पेश किया है। अभिनय की यह स्वच्छता अब हिंदी फिल्मों में नहीं दिखाई पड़ती। दोनों नए कलाकार हैं, लेकिन कैमरे के आगे दृश्यों में इनकी रवानी देखते ही बनती है। आतंकवादी सरगना महमूद बने कुमुद मिश्रा की आंखें, भौं और होंठ बोलते हैं। वे अपने लुक से ही नफरत जाहिर कर देते हैं। अन्य सहयोगी कलाकार भी अपनी भूमिकाओं को जिम्मेदारी से निभाते हैं।
'फिल्मिस्तान' भारत-पाकिस्तान के रिश्तों को अघोषित तरीके से मजबूत करती हिंदी फिल्मों को दी गई सच्ची श्रद्धांजलि है। वास्तव में यह फिल्म दोनों देशों की समानता को अनेक स्तरों पर उद्घाटित करती है। बोली, स्वाद, रुचि आदि तो एक जैसी हैं, लेकिन कुछ गुमराह आतंकवादी फर्क बढ़ाने की मुहिम में लगे रहते हैं। 'फिल्मिस्तान' दोनों देशों की दोस्ती का भी नारा नहीं देती। फिर भी दोनों देशों के दो सामान्य नागरिकों की आकस्मिक मुलाकात और एहसास से 'फिल्मिस्तान' कुछ जरूरी बातें कह जाती है।
'फिल्मिस्तान' देखी जानी चाहिए। यह फिल्म भारत-पाकिस्तान के बीच मौजूद नफरत कम करने के साथ दोस्ती बढ़ाती है। उससे भी अधिक यह मानवीय भावनाओं की सरल फिल्म है।
अवधि-117 मिनट
**** चार स्‍टार 

फिल्‍म समीक्षा : हॉलीडे

Click to enlargeहालांकि मुरूगादास ने तमिल में 'थुपक्की' बना ली थी, लेकिन यह फिल्म हिंदी में सोची गई थी। मुरूगादास इसे पहले हिंदी में ही बनाना चाहते थे। अक्षय कुमार की व्यस्तता कमी वजह से देर हुई और तमिल पहले आ गई। इसे तमिल की रीमेक कहना उचित नहीं होगा। फिल्म के ट्रीटमेंट से स्पष्ट है कि 'हॉलीडे' पर तमिल फिल्मों की मसाला मारधाड़, हिंसा और अतिशयोक्तियां का प्रभाव कम है। 'हॉलीडे' हिंदी फिल्मों के पॉपुलर फॉर्मेट में ही किया गया प्रयोग है।

विराट फौजी है। वह छुट्टियों में मुंबई आया है। मां-बाप इस छुट्टी में ही उसकी शादी कर देना चाहते हैं। वे विराट को स्टेशन से सीधे साहिबा के घर ले जाते हैं। विराट को लड़की पसंद नहीं आती। बाद में पता चलता है कि साहिबा तो बॉक्सर और खिलाड़ी है तो विराट अपनी राय बदलता है। विराट और साहिबा की प्रेम कहानी इस फिल्म की मूलकथा नहीं है। मूलकथा है एक फौजी की चौकसी, सावधानी और ड्यूटी। मुंबई की छुट्टियों के दौरान विराट का साबका एक 'स्लिपर्स सेल' से पड़ता है। (स्लिपर्स सेल आतंकवादी गतिविधियों में संलग्न ऐसे व्यक्ति होते हैं, जो नाम और पहचान बदल कर सामान्य नागरिक की तरह जीते हैं।) बहरहाल, स्लिपर्स सेल की जानकारी मिलने पर चौकस विराट अपने फौजी साथियों की मदद से उनका सफाया करता है।
अक्षय कुमार ने इस फिल्म के लिए लुक और गेटअप पर ध्यान दिया है। आवश्यक परिवर्तन से वे आकर्षक भी दिखे हैं, लेकिन वे अपनी चाल और शैली पूरी तरह से नहीं छोड़ पाते। इस कारण विराट और स्टार अक्षय कुमार गड्डमगड्ड हो जाते हैं। पापुलर एक्टर की यह बड़ी सीमा है कि वह कैसे अपने स्टारडम और इमेज से निकल कर किसी किरदार को आत्मसात करे। अक्षय कुमार पूरी कोशिश करते हैं और कुछ दृश्यों में प्रभावशाली लगते हैं। 'हॉलीडे' का एक्शन अधिक विश्वसनीय है। सोनाक्षी सिन्हा फिल्म की प्रेमकहानी के लिए आवश्यक थीं। लेखक-निर्देशक की कोशिश रही है कि ऐसी फिल्मों की हीरोइनों की तरह साहिबा केवल शोपीस या आयटम न रहे। फिल्म में साहिबा खिलाड़ी है। सोनाक्षी सिन्हा खिलाड़ी की तरह नजर आती हैं। फिल्म में कुछ गाने जबरन न डाले जाते तो ठीक रहता।
अन्य कलाकारों में सुमित राघवन, जाकिर हुसैन और फरहाद (फ्रेडी दारूवाला) प्रभावित करते हैं। खास कर फरहाद ने मिले मौके का भरपूर लाभ उठाया है। उनकी प्रेजेंस दमदार है। सुमित राघवन अपनी भूमिका के साथ न्याय करते हैं। 'हॉलीडे' में परिचित सहयोगी कलाकारों को नहीं रखने से ताजगी आ गई है। जाकिर हुसैन ऐसी भमिका पहले भी कर चुके हैं।
फिल्म अलबत्ता थोड़ी लंबी लगती है और राष्ट्रप्रेम एवं फौज के प्रति आदर जगाने के प्रयास अपनी अतिवादिता से कही-कहीं कृत्रिम लगने लगती है। फिल्म के अंत का प्लेटफार्म पर चित्रित विदाई समारोह में रिश्तेदारों की भावुकता लंबी,यक्सांऔर नकली हो गई है। क्या फौजियों के मोर्च पर लौटने के समय रेल्वे स्टेशनों पर ऐसा ही रोना-रोहट चलता है?
अवधि- 170 मिनट
***1/2 साढ़े तीन स्‍टार

दरअसल : संभावना और आशंका के बीच


-अजय ब्रह्मात्मज
    भाजपा के नेतृत्व में आई नरेन्द्र मोदी की सरकार के शपथ ग्रहण लेने के पहले ही कला एवं संस्कृति प्रकोष्ठ के संयोजक मिथिलेश कुमार त्रिपाठी का बयान आ गया था कि उन लोगों ने फिल्मों के विकास और स्वरूप की रूपरेखा तैयार कर ली है। इसके तहत भारतीय परंपराओं में सिक्त सांस्कृतिक मूल्यों की फिल्मों पर जोर दिया जाएगा। उन्होंने लगे हाथ उदाहरण भी दे दिया कि ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ जैसी फिल्मों के निर्माण को बढ़ावा दिया जाएगा। स्वयं भाजपा से जुड़े फिल्मकारों ने इसे हड़बड़ी में दिया गया बयान कहा है। उन्होंने आश्वस्त किया है कि फिल्मों के निर्माण पर किसी तरह की पाबंदी नहीं लगायी जाएगी। पहले की तरह फिल्मकार अपने फिल्मों के विषय चुनने के लिए स्वतंत्र रहेंगे। इस आश्वासन के बावजूद कुछ फिल्मकारों का मन आशंकित है।
    नरेन्द्र मोदी प्रगति, विकास और समृद्धि के स्लोगन के साथ आए हैं। उनका मुख्य ध्यान देश के चौतरफा विकास पर होगा। मालूम नहीं विकास की इस रणनीति और कार्ययोजना में फिलहाल फिल्में शामिल हैं कि नहीं? भारत में फिल्म इंडस्ट्री लगभग स्वायत्त उद्योग है। बगैर किसी सरकारी सहयोग के सिर्फ दर्शकों के दम पर टिकी हुई फिल्म इंडस्ट्री ने पिछले सौ सालों में निवेश और निर्माण की संरचना तैयार कर ली है। दुनिया में हालीवुड और भारतीय फिल्में ही सरकारी सहयोग के अभाव में भी फल-फूल रही हैं, जबकि और देशों की फिल्मों का सरवाइवल रियायत, सहयोग और छूट पर निर्भर है। मुंबई के फिल्मकार मानते हैं कि हमें कुछ सुविधाएं मिल जाएं तो हम पहले की तरह प्रसार करते रहेंगे।
    भारतीय फिल्म इंडस्ट्री का भारत सरकार से पुराना आग्रह रहा है कि मनोरंजन कर समाप्त किया जाए। अगर आप नियमित फिल्में देखते हैं तो अपने टिकट को ध्यान से पढ़ें। टिकट पर मनोरंजन कर की रकम अंकित रहती है। विभिन्न राज्यों मनोरंजन कर के प्रतिशत में फर्क हो सकता है, लेकिन सच यही है कि देश के सभी राज्य मनोरंजन के नाम पर कर वसूलते हैं। फिल्म इंडस्ट्री के सदस्यों को दुख है कि वसूले गए कर की राशि का उपयोग फिल्म इंडस्ट्री के हित में नहीं होता। आजादी के 67 साल के बाद भी देश में फिल्मों का कोई संग्रहालय या आर्काइव नहीं है। पुणे और मुंबई में कुछ संस्थाएं कार्यरत हैं भी तो उनकी क्षमता और संरक्षण की योग्यता पर प्रश्नचिह्न लगते रहते हैं। मनोरंजन कर के अलावा फिल्म इंडस्ट्री में लाभ और व्यय की अन्य गतिविधियों पर अनेक किस्म के कर लगते हैं। पिछले सालों में इसके खिलाफ आवाजें भी उठती रही हैं, लेकिन अभी तक सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।
    कुछ फिल्मकारों को आशंका है कि सेंसर अधिक सख्त हो सकता है। सेंसर बोर्ड में दक्षिणपंथी विचारधारा के सदस्यों की भर्ती की संभावना है। हम सभी जानते हैं कि पिछले कुछ सालों में सेंसरशिप की उदारता से अनेक ऐसी फिल्में रिलीज हो सकीं, जिनकी पहले कल्पना नहीं की जा सकती थी। अगर फिर से सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा के नाम पर पाबंदियां लगनी शुरू हुई तो अभिव्यक्ति के विस्तार में बाधा आएगी। एक चर्चित और विवादास्पद फिल्मकार ने आशंका जतायी कि सेंसरशिप की सख्ती के पहले ही फिल्मकार अतिरिक्त सावधानी में सेल्फ सेंसरशिप लागू कर देंगे। वे वर्तमान सरकार की नीतियों का खयाल रखते हुए स्वयं किसी प्रकार का जोखिम नहीं उठाएंगे। इस प्रकार की सेल्फ सेंसरशिप फिल्मों के लिए खतरनाक होगी, क्योंकि सृजनात्मकता पर लगाम लगेगी।
    संभावना और आशंका से मुक्त फिल्मकारों का एक तबका यह मान रहा है कि आने वाला समय फिल्मकारों के लिए बहुत अच्छा होगा। पिछले एक दशक में कला के सभी माध्यमों में सृजनात्मक शिथिलता आ गई थी। सामाजिक और राजनीतिक अंतर्विरोध के तेज होने पर कल्पना का विस्तार होता है। अगर दमन और दबाव बढ़ा तो फिल्मकार अधिक कल्पनाशील और प्रयोगशील होंगे। एक तरह से कह सकते हैं कि फिल्मों के अच्छे दिन आने वाले हैं, क्योंकि सामाजिक उद्वेलन से फिल्मों में विषय का विकास और विस्तार होगा।