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Saturday, May 31, 2014

फिल्‍म समीक्षा : कुक्कू माथुर की झंड हो गई


-अजय ब्रह्मात्मज
कहीं की ईंट,कहीं का रोड़ा

    जिगरी दोस्त पारिवारिक अपेक्षाओं और निजी आकांक्षाओं की वजह से अपनी-अपनी जिंदगी में मशगूल हो जाते हैं। अपनी जिंदगी में सुरक्षित और व्यवस्थित नहीं हो सका कुक्कू अपने दोस्त रोनी से छल करता है। इस कार्य में प्रभाकर उसकी मदद करता है। प्रभाकर आज के समय का ऐसा मददगार व्यक्ति है, जो जुगाड़ और प्रपंच के शॉर्टकट से सब कुछ हासिल करवा सकता है। इस शॉर्टकट के बुरे परिणाम भी सामने आते हैं। इस सफर में आखिरकार कुक्कू की आत्मा जागती है। वह अपने कुकर्मों को सुधारता है और फिर ़ ़ ़
    अमन सचदेवा की फिल्म ‘कुक्कू माथुर की झंड हो गई’ की अवधारणा बहुत अच्छी है, मगर लेखक-निर्देशक इस अवधारणा को कागज पर उतारने में असफल हो गए हैं। हालांकि उन्होंने ऐसी फिल्मों के लिए आवश्यक सभी उपादान जोड़े हैं। सारी तिकड़में शामिल की हैं। शायद इसी ‘कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा’ की वजह से फिल्म अपनी बात नहीं कह पाती। कलाकारों में केवल प्रभाकर की भूमिका निभा रहे अमित स्याल ही संतुष्ट करते हैं। बाकी सभी कलाकारों का परफारमेंस बुरा है।
    इस फिल्म के निर्माताओं में बिजॉय नांबियार का भी नाम है। अगर वे ऐसी ही फिल्में चुनते और करते रहेंगे तो उनकी बनी साख गिरेगी। इस साल की बुरी फिल्मों में से एक है ‘कुक्कू माथुर की झंड हो गई’।
अवधि - 109 मिनट
* एक स्टार

Friday, May 30, 2014

फिल्‍म समीक्षा : सिटीलाइट्स

Click to enlargeदुख मांजता है 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
माइग्रेशन (प्रव्रजन) इस देश की बड़ी समस्या है। सम्यक विकास न होने से आजीविका की तलाश में गावों, कस्बों और शहरों से रोजाना लाखों नागरिक अपेक्षाकृत बड़े शहरों का रुख करते हैं। अपने सपनों को लिए वहां की जिंदगी में मर-खप जाते हैं। हिंदी फिल्मों में 'दो बीघा जमीन' से लेकर 'गमन' तक हम ऐसे किरदारों को देखते-सुनते रहे हैं। महानगरों का कड़वा सत्य है कि यहां मंजिलें हमेशा आंखों से ओझल हो जाती हैं। संघर्ष असमाप्त रहता है।
हंसल मेहता की 'सिटीलाइट्स' में कर्ज से लदा दीपक राजस्थान के एक कस्बे से पत्नी राखी और बेटी माही के साथ मुंबई आता है। मुंबई से एक दोस्त ने उसे भरोसा दिया है। मुंबई आने पर दोस्त नदारद मिलता है। पहले ही दिन स्थानीय लोग उसे ठगते हैं। विवश और बेसहारा दीपक को हमदर्द भी मिलते हैं। यकीनन महानगर के कोनों-अंतरों में भी दिल धड़कते हैं। दीपक को नौकरी मिल जाती है। एक दोस्त के बहकावे में आकर दीपक साजिश का हिस्सा बनता है, लेकिन क्या यह साजिश उसके सपनों को साकार कर सकेगी? क्या वह अपने परिवार के साथ सुरक्षित जिंदगी जी पाएगा? फिल्म देखते समय ऐसे कई प्रश्न उभरते हैं, जिनके उत्तर हंसल मेहता मूल फिल्म 'मैट्रो मनीला' और लेखक रितेश शाह की कल्पना के सहारे खोजते हैं।
'सिटीलाइट्स' उदास फिल्म है। पूरी फिल्म में अवसाद पसरा रहता है। सुकून की जिंदगी जी रहे एक रिटायर्ड फौजी की पारिवारिक जिंदगी में आए आर्थिक भूचाल से सब तहस-नहस हो जाता है। हंसल मेहता दीपक के संघर्ष और दुख को नाटकीय तरीके से नहीं उभारते। उनके पास राजकुमार राव और पत्रलेखा जैसे सक्षम कलाकार हैं, जो अपनी अंतरंगता में भी अवसाद जाहिर करते हैं। हिंदी फिल्मों में प्रणय दृश्य की यह खूबसूरती और गर्माहट दुर्लभ है। वास्तविक स्टार जोडिय़ां भी यह प्रभाव नहीं पैदा कर सकी हैं। निश्चित ही हंसल मेहता की सूझ-बूझ और राजकुमार राव एवं पत्रलेखा के समर्पण और सहयोग से यह संभव हुआ है। फिल्म के अनेक दृश्यों में दोनों कलाकारों की परस्पर समझदारी और संयुक्त भागीदारी दिखती है। ऐसे दृश्य हिंदी फिल्मों में सोचे नहीं जाते।
अभिनय के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित राजकुमार राव ने दीपक की विवशता और लाचारी को बड़ी सहजता से प्रकट किया है। उन्हें संवादों का समुचित सहारा नहीं मिला है। वह कैमरे के सामने मनोभाव को अनावृत करने से नहीं हिचकते। उनका मौन मुखर होता है। खामोशी की खूबसूरती भावों को अभिव्यक्त कर देती है। लंबे अर्से के बाद हिंदी फिल्मों को ऐसा उम्दा कलाकार मिला है। हंसल मेहता ने उनकी प्रतिभा का सदुपयोग किया है। पत्रलेखा की यह पहली फिल्म है। राखी के समर्पण और द्वंद्व को वह आसानी से आत्मसात कर लेती हैं। उनकी भावमुद्राओं और भाषा की पकड़ से किरदार विश्वसनीय लगता है। दीपक के दोस्त की भूमिका में आए मानव कौल ने अपेक्षित जिम्मेदारी निभाई है। यह फिल्म शहरी रिश्तों के नए आयाम और अर्थ भी खोलती है।
फिल्म का गीत-संगीत प्रभावशाली है। फिल्म की थीम को रेखांकित करने के साथ वह दर्शकों को दृश्यों में दर्शकों को डुबोता है। रश्मि सिंह की गीतों के अर्थ व्यक्ति, शहर, संघर्ष और सपने के साथ वर्तमान का सच भी जाहिर करते हैं। 'सिटीलाइट्स' महानगरों की चकाचौंध और छलकती खुशी के पीछे के अंधेरे में लिपटी व्यथा को आज का संदर्भ देती है। फिल्म का क्लाइमेक्स थोड़ा नाटकीय और रोमांचक हो गया है, लेकिन अंत फिर से चौंकाता है। इस फिल्म की एक और विशेषता है कि इसे आप देख कर ही महसूस कर सकते हैं।
इस फिल्म के कई दृश्य अभिनय का पाठ बन सकते हैं।
और हां, चालू और उत्तेजक फिल्मों के लिए महेश भट्ट से नाराज प्रशंसकों यह फिल्म सुकून देगी कि वे पुरानी राह पर लौटे हैं।
अवधि-126 मिनट
**** चार स्‍टार

श्रद्धांजलि - मेरे शिक्षक और लेखक जय दीक्षित


-महेश भट्ट
महेश भट्ट की ‘सर’,‘फिर तेरी कहानी याद आई’,‘नाराज’,‘नाजायज’ और ‘क्रिमिनल’ जैसी फिल्मों के लेखक जय दीक्षित हिंदी के मशहूर लेखक जगदंबा प्रसाद दीक्षित का फिल्मी नाम था। उनके उपन्यास  ‘मुर्दाघर’ और ‘कआ हुआ आसमान’ काफी चर्चित रहे। पिछले हफ्ते मंगलवार को जर्मनी में उनका निधन हो गया। उन्हें याद करते हुए महेश भट्ट ने यह श्रद्धांजलि लिखी है।
    कहते हैं कि अगर आप नहीं चाहते कि मरने के साथ ही लोग आप को  भूल जाएं तो पढऩे लायक कुछ लिख जाएं या फिर लिखने लायक कुछ कर जाएं। मेरे शिक्षक, लेखक, दोस्त जय दीक्षित ने दोनों किया।
    मेरे सेलफोन पर फ्रैंकफट में हुई उनकी मौन की खबर चमकी तो यही खयाल आया। जय दीक्षित की मेरी पहली याद अपने शिक्षक के तौर पर है। वे कक्षा में शुद्ध हिंदी में पढ़ा रहे थे। उनका सुंदर व्यक्तित्व आकर्षित कर रहा था। यह सातवें दशक की बात है। वे सेंट जेवियर्स कॉलेज में फस्र्ट ईयर के छात्रों को हिंदी पढ़ा रहे थे। उनमें एक अलग धधकता ठहराव था। बहुत बाद में समझ में आया कि वे दूसरे अध्यापकों से क्यों भिन्न थे? एक दिन अखबार में मैंने खबर पढ़ी कि सेंट जेवियर्स कॉलेज के एक प्रोफेसर को राष्ट्रद्रोह के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया है। इस खबर ने मुझे चौका दिया था। मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि जय दीक्षित नक्सल थे।
    फेड आउट ़ ़ ़ फेड इन ़ ़ सालों बाद। सुंदर व्यक्तित्व के मेरे प्रोफेसर ‘एक बार फिर’ के निर्देशक विनोद पांडे के साथ एक दिन मेरे घर आए। उनकी स्थिति अच्छी नहीं दिख रही थी। वे मुझे ‘अर्थ’ की बधाई देने आए थे। ‘क्या मुझे पहचान पाए?’ उन्होंने पूछा। उनकी आवाज में स्नेह और आदर दोनों था। ‘आपने मुझे हिंदी पढ़ाया था। आप को कैसे भूल सकता हूं,’ मैंने कहा था। ‘लेकिन यह बताएं कि आप जैसा क्रांतिकारी मनोरंजन की दुनिया में क्या कर रहा है?’ मैंने सुना था कि वे विनोद पांडे की अगली फिल्म के संवाद लिख रहे हैं। उनका जवाब था। ‘यह लंबी कहानी है। क्रांति मर चुकी है और वह व्यक्ति भी मर गया। जरूरतों ने मुझे सीधा कर दिया है।’
    कुछ सालों के बाद उनका फोन आया, ‘मैं आप का शिक्षक जय दीक्षित बोल रहा हूं। सॉरी,मैं आपका समय ले रहा हूं, लेकिन कुछ जरूरी बात करनी है। क्या आप मुझे कोई काम दे सकते हैं, कोई भी। मैं अभी हताशा के भंवर में फंसा हुआ हूं।’ उनकी आवाज ऐसी लरज रही थी कि मैं कांप गया। मैंने तुरंत उन्हें काम सौंपा। फिर लंबे समय तक हम ने साथ काम किया। वे प्राय: कहा करते थे, ‘ये रहा मेरा छात्र, जो अभी मेरा शिक्षक है। अगर इन्होंने साथ नहीं दिया होता तो मैंने आत्महत्या कर ली होती।’ हमलोगों ने कई फिल्में एक साथ कीं। उनमें से एक ‘सर’ थी, जिसके लिए उन्हें संवाद लेखन का फिल्मफेअर पुरस्कार मिला था। पर उससे भी अधिक उनके संग-साथ की याद के लिए दो अविस्मरणीय पुस्तकें हैं। यूजी कृष्णमूर्ति पर लिखी दो पुस्तकों - ‘न खत्म होने वाली कहानी’ और ‘सारांश’ के अनुवाद उन्होंने ही किए थे।
    उनकी अंतिम याद उनके एक जन्मदिन की है। उनके एक दोस्त ने उनके जन्मदिन समारोह के लिए विशेष तौर पर मुझे आमंत्रित किया था। मुझे उस दिन मुंबई से बाहर जाना था, लेकिन जय दीक्षित सर के लिए मैंने अपने कार्यक्रम में बदलाव किया। उस शाम मैंने अपने जीवन में उनके योगदान को रेखांकित किया था। मेरी बातें सुन कर उनका चेहरा किसी उपलब्धि के एहसास से दीप्त हो उठा था। मैंने बताया था कि मेरे व्यक्तित्व के निर्माण में उनकी क्या भूमिका रही है?
    वे कहा करते थे, ‘मुझे मौत से डर लगता है।’ मेरा जवाब होता था, ‘मौत से कौन नहीं डरता दीक्षित साहब, यहां तक कि जो ईश्वर,अगली जिंदगी और स्वर्ग की धारणा में विश्वास करते हैं, उनहें भी मृत्यु से डर लगता है। लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि जिस ने मौत की सच्चाई को अंगीकार कर लिया हो, वह जिंदगी जीने लगता है।’ उन्होंने कहा था, ‘अपने बारे में तो मुझे नहीं मालूम, लेकिन आपकी जिंदगी देख कर खुशी होती है।’
    जय दीक्षित, मेरे शिक्षक, मेरे दोस्त, मेरे लेखक और अनुवादक की जिंदगी कुछ दिनों पहले पूरी हो गई। वे अपनी मातृभूमि से कोसों दूर थे। चूंकि मैं स्वर्ग और मृत्यु के बाद के जीवन में यकीन नहीं करता, इसलिए उनसे दोबारा मुलाकात की कोई उम्मीद नहीं है। लेकिन सर, आप बेहिचक मेरे सपनों में मुझ से मिलने आएं। कहीं भी और कभी भी आप से मिलने में खुशी होगी।


Thursday, May 29, 2014

अंधेरा है महानगरों की चकाचौंध में-हंसल मेहता


-अजय ब्रह्मात्मज
    हंसल मेहता और राजकुमार राव की जोड़ी की दूसरी फिल्म ‘सिटीलाइट््स’ आ रही है। पिछले साल की ‘शाहिद’ के लिए दोनों को राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। ‘सिटी लाइट’ का निर्माण महेश भट्ट और फॉक्स स्टार स्टूडियोज ने किया है। ‘सिटीलाइट्स’ में राजकुमार राव राजस्थान के दीपक की भूमिका में हैं, जो आजीविका के लिए मुंबई आता है। मुंबई जैसे महानगर में दीपक के सरवाइवल और संघर्ष की यह कहानी छोटे शहरों से सपनों के साथ बडे शहरों में आ रहे लाखों-करोड़ों युवकों की प्रतीकात्मक कहानी है।
    हंसल मेहता से पहले इस फिल्म के निर्देशन के लिए अजय बहल को चुना गया था। उन्होंने ‘शाहिद’  देख रखी थी। उन्हें लगा कि हंसल ‘सिटीलाइट़्स’ की थीम के साथ न्याय कर सकते हैं। ऐसा लग सकता है कि हंसल मेहता ने ही इस फिल्म के लिए राजकुमार राव को चुना होगा। यहां तथ्य उल्टे हैं। राजकुमार राव पहले से फिल्म में थे। बाद में हंसल मेहता को बतौर निर्देशक बुलाया गया।
    ‘शाहिद’ के लिए मिले पुरस्कार से फर्क तो पड़ा है। हंसल बताते हैं, ‘संयोग है कि हम दोनों को पुरस्कार मिले और अब ‘सिटीलाइट्स’ आ रही है। फिल्म इंडस्ट्री और बाकी लोगों के बीच पुरस्कार से साख बढ़ी है। अब हम कुछ और भी काम कर सकते हैं। अभी मेरी चाहत है कि दर्शक यह फिल्म देखने आएं। उनका समर्थन मिलेगा और फिल्म चलेगी, तभी हमलोग बेहतरीन फिल्में ला सकेंगे। खुशी है कि इस फिल्म को समर्थन मिल रहा है। फिल्म के गीत भी लोकप्रिय हो रहे हैं।’
     ‘सिटीलाइट्स’ फिलीपिंस की फिल्म ‘मैट्रो मनीला’ पर आधारित है। फॉक्स स्टार स्अूडियोज ने महेश भट्ट से आग्रह किया था कि वे इस फिल्म को भारतीय संदर्भ देकर बनाएं। चूंकि फिल्म का कथ्य भारत के लिए भी सामयिक है, इसलिए महेश भट्ट राजी हो गए। उन्होंने अपने कैंप के मशहूर निर्देशकों को यह फिल्म नहीं दी, क्योंकि इस फिल्म का मिजाज रियल और सादा है। उन्होंने हंसल मेहता को फिल्म सौंपी। हंसल मेहता कहते हैं, ‘भट्ट साहब के बारे में अनेक धारणाएं फैली हुई हैं। मुझे उन जैसा साहसी और क्रिएटिव कोई व्यक्ति नहीं दिखता। मुंबई की शूटिंग के दौरान मैं रोजाना उनसे मिलने पहुंच जाता था और रिचार्ज होकर निकलता था। भट्ट साहब ने कहा था कि निर्भीक होकर फिल्म बनाओ। बाकी मैं देख लूंगा। वे सिर्फ आजादी ही नहीं देते। वे आजाद रहने की हिम्मत भी देते हैं।’ हंसल मेहता ‘सिटीलाइट्स’ के बारे में स्पष्ट करते हैं, ‘मैंने मूल फिल्म नहीं देखी है। मैं नहीं चाहता था कि ‘मैट्रो मनीला’ से प्रेरित या प्रभावित हो जाऊं। ‘मैट्रो मनीला’ के आधार पर रितेश शाह ने स्क्रिप्ट लिख ली थी। उस स्क्रिप्ट पर ही मैंने काम किया। मैंने केवल मुख्य किरदारों को हिमाचल प्रदेश से निकाल कर राजस्थान में बिठा दिया।’
    फिल्म के टायटल को हंसल मेहता उचित ठहराते हैं। वे तर्क देते हैं, ‘इस फिल्म के लिए यह टायटल उपयुक्त है। महानगरों की चकाचौंध में अंधेरा पसरा रहता है। रोशनी के बीच रहते हुए भी सभी के मन में अंधेरा है। आप मुंबई शहर को ही लें। ऊंची इमारतों के वासी नीचे झोपड़पट्टियों को नहीं देखते। उनकी नजर दूर समुद्र की लहरों को टटोलती रहती है। देश के छोटे शहरों से लोग महानगरों की चमक-दमक (सिटीलाइट्स) देख कर भागे आते हैं और यहां की अंधेरी गलियों में गुमनाम हो जाते हैं।’
    ‘सिटीलाइट्स’ की शूटिंग राजस्थान के एक गांव में हुई है। शूटिंग से पहले राजकुमार राव और पत्रलेखा कुछ समय के लिए उस गांव में जाकर रहे। उन्होंने स्थानीय लोगों की चाल-ढाल और भाषा सीखी। हंसल मेहता बताते हैं कि इससे काफी फर्क पड़ा, ‘राजकुमार राव हरियाणा के हैं और पत्रलेखा असम की है। फिर दोनों शहरों में रह रहे हैं। जरूरी था कि वे मेरे किरदारों की भाषा, वेशभूषा और व्यवहार को वास्तविक तरीके से पर्दे पर ले आएं। मैंने उन्हें यह मौका दिया कि वे किरदार के अनुसार कुछ सीख-समझ सकें।’

बाक्स
    राजकुमार राव ‘सिटीलाइट्स’ में दीपक की भूमिका को अपनी सबसे बड़ी चुनौती मानते हैं। फिल्म में दीपक का किरदार उनके देखे-सुने व्यक्तियों से भिन्न और एक हद तक आत्मकेंद्रित है। वह अपनी लड़ाई लड़ रहा है। उसकी एक ही चिंता है कि वह अपनी बीवी और बेटी को सुरक्षित जिंदगी से सके। राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित अभिनेता राजकुमार राव शूटिंग के दरम्यान किसी प्रकार का दबाव नहीं महसूस करते। वे मानते हैं कि अपने किरदार को पूरी ईमानदारी और गहराई से निभाने की चिंता भर रहती है। मैं यही कोशिश करता हूं कि दर्शकों को परिचित किरदार भी नए रूप-रंग में दिखाऊं। ‘सिटीलाइट्स’ का दीपक ‘शाहिद’ के शाहिद आजमी से स्वभाव और एटीट्यूड में भिन्न है।  
   

भाते हैं अपने मिजाज से अलग किरदार-जिम्मी शेरगिल


-अजय ब्रह्मात्मज
    कबीर सदानंद की ‘फगली’ में जिम्मी शेरगिल दिल्ली पुलिस के हरियाणवी पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका निभा रहे हैं। अपने अंदाज और लहजे में उन्होंने हरियाणवी खूबियां उतार ली हैं।
- ‘फगली’ में आप का हरियाणवी अंदाज आ रहा है?
0 दिल्ली पुलिस का एक ऑफिसर है। वह हरियाणवी है। भाषा, लहजा और अंदाज हरियाणा का है। वह थोड़ा सिरफिरा है। पुलिस रूलबुक उसे याद है। गंदी और बुरी स्थितियों में भी फायदा उठाने से नहीं हिचकता। वह इंटरेस्टिंग होने के साथ विचित्र भी है। कोई नहीं बता सकता है कि अगले पल ही वह क्या करेगा? वह अडिय़ल, चालाक और तेज दिमाग है। वह सिस्टम और पब्लिक के बीच का लिंक है।
- मतलब सिस्टम की कमजोरियों और सूराखों से परिचित है और उसका फायदा उठाता है?
0 हां,एक हद तक। अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि कुछ पुलिस अधिकारी सारे नियम-कानून जानते हैं। कबीर ने इस किरदार को रोचक तरीके से प्रजेंट किया है। पुलिस के तौर-तरीकों को बारीकी से रखा गया है।
- आप के अपने मिजाज से ऐसे किरदार मेल नहीं खाते तो फिर निभाने में दिक्कत होती होगी?
0 मजा आता है। जो आप नहीं होते हैं, उसे पर्दे पर निभाना हो,यही तो एक्टिंग की खूबसूरती है। मैं बेफिक्र और खुद में डूबा व्यक्ति हूं। लेकिन अगर कोई पुश करे तो खोपड़ी घूम जाती है। कभी किसी पर चिल्लाता नहीं। मुझ जैसे व्यक्ति को ऐसा या साहब जैसा रोल मिलता हे तो उसे निभाना चुनौती होती है। डायरेक्टर के साथ मिल कर फिल्म का सुर पकडऩा पड़ता है। मैं डायरेक्टर की सोच से ही चलता हूं। कुछ जटिल किरदारों पर बातें करते समय हम अपने सुझाव भी दे देते हैं। ‘साहब बीवी और गैंगस्टर’ के समय तिग्मांशु ने कहा था कि साहब ऐसा किरदार है जो बुलाए जाने पर पलट कर देखने में वक्त लेगा। वहां से मुझे किरदार का एटीट्यूड मिल गया था।
- ऐसे किरदारों में और क्या खास बात होती है, जो आप आकृष्ट होते हैं?
0 ये किरदार नार्मल नहीं होते। फिर इन्हें निभाते समय महसूस होता है कि हर एक्शन और संवाद में कुछ कहा जा रहा है। आप पंक्तियां भी नहीं बदल सकते, क्योंकि उनमें कोई सूचना, जानकारी या प्रतिक्रिया रहती है। ‘फगली’ का मेरा किरदार हरियाणवी है, लेकिन उसकी बातें सारे दर्शक समझ सकेंगे।
- इस फिल्म में आपके साथ तीन नए कलाकार है। क्या कोई जिम्मेदारी महसूस करते हैं?
0 जिम्मेदारी तो डायरेक्टर की ही रहती है। किसी सीन में साथ हों तो मैं नार्मल रहता हूं। मैं चौटाला का किरदार निभा रहा हूं। वह अडिय़ल है। उसकी इमेज से किसी को झिझक हुई हो तो फिल्म के लिए अच्छा ही होगा। चारों ने बहुत अच्छा और कंफीडेंस से काम किया है। कियारा, मोहित, विजेन्द्र और अरफी सभी अच्छे लगेंगे।
- आप के लिए ‘फगली’ का मतलब क्या है?
0 ‘फगली’ का मतलब सभी के लिए अलग-अलग है। फिल्म की थीम को यह टायटल अच्छी तरह व्यक्त करता है। मेरे लिए ‘फगली’ अगली से ऊपर का शब्द है।
- आप ने सुना होगा कि ‘बुलेट राजा’ में लगभग सभी की यही राय थी कि आप के किरदार की मौत के बाद फिल्म आगे नहीं बढ़ पाती?
0 यह सुन कर अच्छा लगता है। तिग्मांशु धूलिया ने स्वयं यह बात स्वीकार की कि मूल आयडिया पर चलना था। मेरे किरदार को इंटरवल में आने का फैसला गलत हो गया। दोनों की जुगलबंदी में दर्शकों की रुचि हो गई थी। मेरे मरते ही वह जुगलबंदी खत्म हो जाती है। ऐसी टिप्पणियों के बावजूद फिल्म न चले तो बुरा लगता है।


Sunday, May 25, 2014

आजाद सोच पर फुलस्टॉप के विरुद्ध - महेश भट्ट

mahesh bhatt article
मुझे खुशफहमी नहीं है कि मेरी जो दृष्टि है, वही पूरी फिल्म इंडस्ट्री की दृष्टि है। मैं पूछता हूं कि हिंदुस्तानी सिनेमा का मयार विश्व सिनेमा में ऊंचा क्यों है? चीन जो आज हर मामले में आपसे आगे है, वह क्यों सिनेमा में पीछे है? वजह सीधी-सी है, हमारी आजादी। द राइट टू फ्री स्पीच। यह फिल्म इंडस्ट्री की धड़कन है। अगर आपने इंफ्रास्ट्रक्चर बना दिया, हर किस्म की तकनीक लगा दी, लेकिन फ्री स्पीच का गला घोंट दिया, तो इंडस्ट्री दम तोड़ देगी। चीन के पास सब कुछ है, मगर आजादी नहीं है। जो समाज अपने कलाकारों, लेखकों और निर्देशकों को जेहनी आजादी नहीं देता, वो शापित समाज है। इसके बाद आप कला और सिनेमा के विकास के लिए जितना चाहे पैसा लगा लीजिए, कुछ होने वाला नहीं है।

मिडिल ईस्ट, सऊदी अरब और सिंगापुर में क्या कम पैसा है? चक्कर यह है कि आजाद सोच जहां होती है, वहीं सिनेमा या कला का जन्म होता है। 1998 में जब एनडीए सत्ता में थी, तो इन्होंने सिनेमा की आजादी को रोका था। इन्होंने मेरी फिल्म ‘जख्म’ के साथ क्या किया! यह फिल्म इनकी दक्षिणपंथी हिंदू मानसिकता को आड़े हाथों लेती थी। फिल्म को ये लोग गृह मंत्रालय तक खींच ले गए, जबकि सेंसर बोर्ड ने हरी झंडी दे दी थी। फिर इनके दोहरे मापदंड देखिए। एक तरफ तो फिल्म को रोकते हैं, दूसरी तरफ इसी फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार देते हैं।

कैसे भूल जाएं कि ‘फना’ को गुजरात में नरेंद्र मोदी की सरकार ने रिलीज होने से रोका था। ‘परजानिया’ की रिलीज पर रोक लगाई गई थी। हमारी फिल्म ‘तुम मिले’ को सिनेमाघरों से महज इसलिए उतार दिया गया था, क्योंकि मीडिया में यह बात फैली थी कि मेरे बेटे का हेडली के साथ लेना-देना है। जबकि इसका कारण सिर्फ इतना था कि मैंने हमेशा इनकी राजनीति का निडर होकर विरोध किया। संविधान अभिव्यक्ति की आजादी देता है। जब फिल्म सेंसर होती है, तो उसको पूरी आजादी के साथ प्रदर्शन का अधिकार है। हम हिंदुस्तान के अवाम हैं। हमारी आजादी, हमारी जिंदगी पर सिर्फ हमारा हक होना चाहिए।

आप बनारस की बात करते हैं। वहां की तहजीब देखिए। वहां हर किस्म के व्यक्ति ने गंगा तट पर अपनी बात निडर होकर कही है। वहां पर अघोरी हैं, कबीर हैं, मुसलमान हैं, शिवभक्त हैं...यह है हिंदुस्तान। अंग्रेजों ने जो काम किया था, तलवार की नोंक पर जिस तरह ईसाइयत थोपी थी, आपने उनसे वह उधार ले लिया। अरे, इस मुल्क में गौतम बुद्ध ने जन्म लिया, जिन्होंने मोक्ष की पूरी धारणा को नकार दिया था। वह जगह काशी से आधे घंटे की दूरी पर है... और मैं इसी हिंदुस्तान को जानता हूं।

फिल्मों की आजादी में लोग न्यूडिटी का विषय भी शामिल करते हैं। मैं पूछता हूं कि सेंसर बोर्ड के होते हुए सिनेमा ने ऐसा कौन-सा चौंका देने वाला दृश्य आपको दिखा दिया? इस मुल्क में वात्स्यायन हुए, यहां खजुराहो है। इस डिजिटल दौर में लोगों के वाट्सएप देख लीजिए। वह भी उनके जो बहुत पारिवारिक कहे जाते हैं। देखिए कि वे आपस में क्या शेयर करते हैं। सच यह है कि हिंदुस्तानी सिनेमा ने आज तक कोई ऐसी-वैसी बात दिखाई नहीं और सेंसर व कोर्ट के होते हुए दिखा भी नहीं पाएगा। भूल जाइए कि हमारा समाज न्यूडिटी की वजह से बर्बाद हो रहा है। आज के डिजिटल दौर में उपभोक्ता बिना आपकी इजाजत के वह सब कुछ देख लेता है, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते।

फिल्म इंडस्ट्री टैक्स और आधारभूत ढांचे वगैरह की बात समय आने पर कर लेगी, लेकिन नरेंद्र मोदी साहब से मेरी उम्मीद इसलिए है कि वह हिंदुस्तान के प्राइम मिनिस्टर हैं, न कि बीजेपी के। हिंदुस्तान के 69 फीसदी लोगों ने बीजेपी को वोट नहीं दिया। सिर्फ 31 फीसदी ने दिया है। अतः बावजूद इसके कि वह हमारे प्रधानमंत्री हैं, हमें उनसे असहमत होने का हक है। साथ ही, उन्हें भी मानना पड़ेगा कि हमारी जैसी सोच के लोग उनके मुल्क में रहते हैं। हम मानते हैं कि लोगों में परिवर्तन होता है। अगर हममें परिवर्तन हुआ है, तो आप में भी हुआ होगा। इस देश में सम्राट अशोक की मिसाल है। वह राजा थे और बड़ी जंग के बाद बुद्ध के दिखाए रास्ते पर चल पड़े। ऐसे में, नरेंद्र मोदी से हमारा आग्रह है कि जिस जगह से वह चुनकर आए हैं, उसकी तहजीब पर गौर करें, जिसमें लक्ष्य तक पहुंचने की नेति-नेति की एक परंपरा रही है। जो आपकी सोच पर फुलस्टॉप लगा दे, वह आजाद सोच नहीं हो सकती।

फिल्‍म स्‍मरण : सारांश

सुकन्‍या वर्मा का यह लेख रिडीफ से लिया गया है। सुकन्‍या ने इतने बेहतरीन तरीके से महेश भट्ट की 'सारांश' के बारे में बताया है कि फिल्‍म की सारी विशेषताएं स्‍पष्‍ट हो जाती हैं। मूल लेख यहां है। चवन्‍नी के आग्रह पर अमित जैन,सुजीत सिन्‍हा,देदीप्‍य भानु ,इरशाद अली और स्मिता सिंह ने अपनी पसंद और राय रखी थी।
 Mahesh Bhatt’s finest film Saaransh, which celebrates its 30th anniversary on May 25, isn’t comfort cinema but it is certainly a must-watch.
An elderly man wakes up early morning, draws out his desk and begins writing a letter to his son residing in the United States. 
The mail isn’t a fancy exercise in eloquence but its simplicity conveys a father’s love, concern and commitment towards his only child until he's stirred up by a crushing realisation -- his young son is dead, he’s been dead for three months following a mugging incident on the streets of New York. 
He may be no more but those he’s left behind aren’t exactly alive either. They merely exist mindlessly, meaninglessly in denial and disbelief.
Grief is a complex emotion, every person reacts differently to it but those afflicted share one difficulty in common -- of letting go and moving on. Because the truth is, there is no real closure; it can only be suppressed through a preoccupation with purpose. 
And that’s the nature of Mahesh Bhatt’s exploration in the heart-breaking Saaransh, which is about a bereaved 60-something couple and a young girl they volunteer to protect from a politician’s misplaced ire. 
Bhatt’s finest film, which celebrates its 30th anniversary on May 25, isn’t comfort cinema. Devoid of cheer and falsehoods, Saaransh is armed with a leading man like Anupam Kher who single-handedly enriches its story into an experience so personal, poignant and profound, only the callous can stay unmoved. 
Loss of a child is a horror no parent should suffer.
But for the retired headmaster B V Pradhan (Kher) and his schoolteacher wife, Parvati (Rohini Hattangadi) residing in a middle-class locality of Mumbai’s Shivaji Park (Bhatt grew up in the area and pays loving tribute to its daily sights), the enormity of this tragedy seems even greater. 
To possess the gift of life fully knowing it wasn’t their son’s time to go is an imposition they could do without. To compete for job positions against his son’s peers is a probability Pradhan didn’t prepare for. Or to endure the humiliation at the customs office when an official dismisses his urgency to retrieve his son’s ashes as an attempt to reclaim a television set. 
TV lene nahi aaya hoon. Main apne marey hue bete ki asthiyan lene aaya hoon. Ek baap ka apne bete ki raakh par koi adhikaar hai ke nahi? Ya uske liye bhi mujhe neeche rishvat deni padegi?" he cries, exposing his broken heart and the sad state of Indian bureaucracy at once. 
Shameful, isn’t it?
Even after three decades of Saaransh, corruption proudly occupies centre stage everywhere.
If Parvati resigns herself to religion and a monk’s soothsaying -- her son will soon take reincarnation; Pradhan’s atheistic ideals leave him with no scope for that comfort either. Bitter, frightened, gloomy, he seeks the easy escape -- suicide.   
During a painful moment, he angrily defends his refusal to live, “Agar zindagi mujhe apne ghinone usoolon par jeene ko majboor kare toh main kahoonga -- nahi, kabhi nahi.” 
Under her calm surface, Parvati is far from healed. Curiously studying the young and exuberant, she notes with a tinge of envy, “Uski aankhen dekhi? Kaise chamak rahi thi. Aisa laga jaise zindagi choo gayi ho.” 
What follows is a fascinating scene wherein Parvati resolves to join Pradhan in his suicidal pursuits. He plays her, she indulges him, it’s a dangerous game but they have nothing to lose. Except they are interrupted by a presence that will change the course of their life and offer them a motive, a 'mission' to go on living -- for the time being, at least.
Financial crunch forces them to rent out their deceased son, Ajay’s room to an aspiring actress Sujata (Soni Razdan, her first film under future husband, Mahesh Bhatt). 
Bhatt slyly remarks on how tough it is for artists to obtain rental accommodation in Mumbai given Bollywood’s ill reputation even in the 1980s through Sujata’s niggling doubt and hasty admission about her profession to her potential landlords.
Her affair with Vilas (Madan Jain), son of an influential politician Gajanan Chitre, (Nilu Phule) results in pregnancy, a development that doesn’t go down well her spineless beau and his tyrant daddy. When efforts to abort the baby go in vain, Chitre begins to intimidate Sujata and her protectors -- Pradhan and Parvati.  
I found uncanny resemblance between Chitre and late Shiv Sena supremo Bal Thackeray only to learn it’s not coincidental.  In an interview to Outlook, Bhatt admits, “I did reference him. The attributes, the body type, the glasses were borrowed.”
To the filmmaker’s surprise, Thackeray was all “praise for its theme.”
What’s masterful is how Bhatt plays out the ensuing menace by building on nerves and tension in place of physical violence. 
There’s a scene I really liked, where the troika along with their family friend, Vishwanath (a pitch perfect Suhas Bhalekar) are about to get into a taxi to the hospital when one (Salim Ghouse) of the four anti-social elements constantly hovering in their neighbourhood, slowly, sinisterly kicks a can towards Pradhan. 
The cautioning tone impressed in the sound of a rolling can and Ghouse’s glowering eyes convey more aggression than if he would grab Pradhan’s collar and mouth a few threats.
Tautly edited by David Dhawan (yes, the *same* one), Saaransh scores repeatedly for underlining significant aspects of society’s shortcomings without deviating from its core emotionality. 
Bhatt points out at the pains of red-tapism, the stigma of being an unwed mother in a conservative society, the audacity of politically-backed bullies, the meekness of politically-controlled law/order officials and dismisses the theory of reincarnation to extract suitable drama, which adds texture and dimensions to his narrative preventing it from turning overemotional.
Even though striking on its own, Saaransh wouldn’t bear the same soul without Anupam Kher. It’s extraordinary how an actor can attain this degree of success in his acting debut.   
There’s a fascinating anecdote behind his casting, which I learned of while watching his famous play, Kuch Bhi Ho Sakta Hai many years ago. Sanjeev Kumar was slated to work on this Rajshri production. 
When Bhatt short-changed Kher to accommodate the saleable star, the young actor from Shimla protested furiously calling the director a ‘fraud’ among many other things. As he started to walk out in a huff, Bhatt stopped him and decided to drop the Sholay actor in favour of a rank newcomer.
Interestingly, Sanjeev Kumar was extremely moved by Kher’s work in Saaransh and rated it among one of the best performances he’d ever seen. 
At 28, he plays a father who’s lost a son perhaps his own age with the gravitas and grace of a senior citizen. Would he be able to better the same performance today? I don’t know. Honestly, I don’t want to. 
What we see of him on screen, its pure, almost spiritual, a performance for the ages -- free from the baggage of image or expectation, it’s not merely Kher’s depiction of old age but a wisdom to penetrate into Pradhan’s consciousness that distinguishes it. 
That year he beat the likes of Naseeruddin Shah in Sparsh and Dilip Kumar in Mashaal to nab the Best Actor trophy at Filmfare awards. Bhatt walked with Best Story while Madhukar S Shinde, a regular with the filmmaker through his fecund phase from Arth to Dil Hai Ki Manta Nahi won for Best Art Direction.
Playing the equally noteworthy character of Kher’s better half, a 30-something Rohini Hattangadi infuses the part-repressed, part-hysterical temperament of her Parvati with maturity far beyond her years. 
It’s hard to describe the sadness enveloping the scene where she finally wakes up to the rotten reality of her circumstances.
Tum rakshas ho,” she accuses her husband for shattering her belief that Sujata’s unborn baby is her reincarnated Ajay. 
Soni Razdan is somewhat overshadowed by the dramatic prowess of her co-stars but her underplaying wronged women always stands her in good stead. 
Through the course of all these bittersweet developments, the essence of Saaransh is fruitfully realised when the previously suicidal Pradhan accepts it’s not taking one’s life but living it on one’s terms that requires courage.
Parvati, tumhare chehre ki jhuriyon mein mere jeevan ka saaransh hai,” he concludes. 
Loss is irreplaceable but life still goes on. The flowers blooming out of their son’s ashes reiterate this.


  • Amit Jain ·
    सारांश, कर्मा, डैडी !! बेहतरीन फिल्मो में से कुछ
  • Amit Jain ·
    और अपने पिता के प्रति उनका प्रेम .. उन्होंने अपनी पिता को ट्विटर के माध्यम से अपने सभी फोल्लोवेर्स को अवगत कराया... ना जानते हुए भी बहुत कुछ जाना अनुपम के माध्यम से उनके पिता के बारे में
  • Dedipya Bhanu श्रेष्ठ फिल्म अभी आणि बाक़ी है..!!! अच्छी फिल्में कई हैं.. सारांश, डैडी और भी कई..
  • Irshad Ali अनुपम अपने शुरूआती दिनों में महेश भट्ट के साथ सारांश से पहले ही जुड़ गए थे महेश की उन पर खास नजर थी तब तक सारांश की कहानी सामने नहीं आई थी लेकिन वो जानते थे कि इस आदमी के माध्यम से अभिनय को नये अंदाज में कहा जा सकता है। अगर आपने नाम देखी हो तो तलाश करना अनुपम खेर कहां हैं। किरण अनुपम के सामने कम नहीं उतरती लेकिन सिकन्दर दोनों के सामने कहीं नहीं ठहरते। इससे साबित हो जाता है कि आदमी खुद ही खुद को तैयार करता है। इन दिनों अनुपम या उनके जैसे सशक्त लोगों को लेकर काम नहीं हो रहा क्योंकि बाजार के आगे अनुपम खेर सरीखे अभिनेताओं का कद कहीं मैच नहीं करता फिर भी वह कर्मशियल सिनेमा का लोकप्रिय नाम है। उनकी पेस्टनजी, खोसला का घोसला सरीखी फिल्में कभी भी देखी जा सकती है।

  • Sujit Sinha सारांश

Saturday, May 24, 2014

फिल्‍म समीक्षा : कोचडयान


तकनीक और टैलेंट का उपयोग
-अजय ब्रह्मात्मज


    चेन्नई, हैदराबाद और मुंबई ़ ़ ़ फिल्म निर्माण के हर केंद्र में मसाला एंटरटेनमेंट पर जोर है। अगर आप के पास पापुलर स्टार हैं तो किसी प्रकार के प्रयोग की जरूरत ही नहीं महसूस होती। रजनीकांत की बेटी सौंदर्या आर अश्विन ने ‘कोचडयान’ में इस सुरक्षा कवच को तोड़ दिया है। उन्होंने परफारमेंस कैप्चरिंग तकनीक में सुपरस्टार रजनीकांत को लेकर ‘कोचडयान’ का निर्देशन किया है। यहां रजनीकांत अपने अंदाज और स्टाइल में हैं,लेकिन एनिमेटेड रूप में। धैर्य, मेहनत और सोच से बनाई गई यह फिल्म भारतीय फिल्मों के इतिहास में एक नई पहल है। पहली कोशिश की हिम्मत की तारीफ होनी ही चाहिए। सौंदर्या ने ‘कोचडयान’ में तकनीक और टैलेंट का सही उपयोग किया है।
    सौंदर्या आर अश्विन ने स्पष्ट किया था कि यह एक काल्पनिक कहानी है। कोचडयान और उनके बेटों राणा और धर्मा को लेकर गुंथी हुई कहानी में राष्ट्रप्रेम और प्रजाहित पर जोर दिया गया है। परिवेश के मुताबिक दो राष्ट्रों कलिंगपुर और कोट्टायपट्टनम के द्वेष और कलह के बीच राणा के योद्धा व्यक्तित्व,राजनीति और राष्ट्रप्रेम को भव्य तरीके से चित्रित किया गया है। राजकुमारी वदना से प्रेम की कहानी साथ चलती है।
    फिल्म मुख्य रूप से तकनीक पर आधारित है। कलाकारों की मेहनत पर्दे पर नहीं दिखती, क्योंकि तकनीक के माध्यम से उन्हें एनिमेटेड किरदारों में बदल दिया गया है। संभव है कुछ दर्शक जेम्स कैमरून की फिल्म ‘अवतार’ की तुलना में ‘कोचडयान’ को निम्न और कमजोर पाएं, लेकिन कमियों के बावजूद इस फिल्म का महत्व कम नहीं होता। भारतीय फिल्मों में यह पहली कोशिश है। रजनीकांत, दीपिका पादुकोण, जैकी श्रॉफ और अन्य कलाकारों के सहयोग से सौंदर्या का सपना साकार हुआ है। फिल्म के आरंभ में अमिताभ बच्चन की उक्ति ‘कोचडयान के पहले और बाद का सिनेमा’ अतिशयोक्ति लग सकती है, लेकिन इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि रजनीकांत जैसे लोकप्रिय स्टार के साथ सौंदर्या ने उल्लेखनीय प्रयोग किया है। ऐसे प्रयोग के लिए लोकप्रिय स्टार का होना जरूरी था।
    फिल्म के रंग को लेकर एक सवाल हैं? क्या इसे रंगीन और चमकदार रखने में कोई तकनीकी दिक्कत थी। फिल्म का सलेटी और गाढ़ा रंग कुछ दृश्यों के बाद आंखों को भारी लगने लगता है। इस फिल्म का पूर्ण आनंद ‘3 डी’ में ही लिया जा सकता है। रजनीकांत के प्रशंसकों के लिए उनके मैनरिज्म, चाल-ढाल और डांस का ‘कोचडयान’ में उपयोग किया गया है। फिल्म के विषय और परिवेश के मुताबिक तलवार उछल कर हाथ में आ जाती है। हां,नृत्यों के एनीमेशन में पूरी लचक नहीं आ सकी है, लेकिन युद्ध के व्यापक दृ़श्यों में रोमांच बढ़ता है। ‘कोचडयान’ में गानों की संख्या ज्यादा लगती है। हर भाव के गीत एक के बाद एक आने से ड्रामा कम होता है।
    ‘कोचडयान’ सौदर्या आर अश्विन के क्रिएटिव साहस का सफल परिणाम है। इस फिल्म को देखना अलग किस्म के नए सिनेमाई अनुभव से गुजरना है।
अवधि - 120 मिनट
*** 1/2 साढ़े तीन स्टार


Friday, May 23, 2014

फिल्‍म समीक्षा : हीरोपंथी / हिरोपंती

सिर्फ और सिर्फ टाइगर श्रॉफ 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
जैकी श्रॉफ के बेटे टाइगर श्रॉफ को केंद्र में रख कर बनी निर्माता साजिद नाडियाडवाला की साबिर खान निर्देशित 'हीरोपंती' का एक ही मकसद है सिर्फ और सिर्फ टाइगर श्रॉफ की खूबियों को दिखाना। इन दिनों हिंदी फिल्मों में हीरो के परफॉर्मेस को जांचने-परखने का तरीका एक्शन और डांस रह गया है। ड्रामा और इमोशन के दृश्य उन्हें कम से कम दिए जाते हैं। 'हीरोपंती' में टाइगर श्रॉफ अपनी मचलती मांसपेशियों और चुस्त देहयष्टि के साथ मौजूद हैं। डांस सिक्वेंस में भी उनकी चपलता आकर्षित करती है। कमी है तो सिर्फ एक्टिंग में, संवाद अदायगी में स्पष्टता नहीं है और हर इमोशन में चेहरे का भाव एक सा ही बना रहता है। बतौर अभिनेता टाइगर को अभी काफी मेहनत करनी होगी।
'हीरोपंती' अंतर्निहित कमियों और खूबियों के साथ एंटरटेन करती है, क्योंकि लंबे समय के बाद पर्दे पर दिख रहे हीरो के स्टंट में विश्वसनीयता है। एक्शन के सभी दृश्यों में टाइगर श्रॉफ के आत्मविश्वास और दक्षता की झलक है। एक्शन डायरेक्टर ने इन दृश्यों को हैरतअंगेज नहीं रखा है। इसी प्रकार गानों के फिल्मांकन में टाइगर श्रॉफ के नृत्य कौशल का सही उपयोग किया गया है। डांस में वे रितिक रोशन की तरह सिद्ध हैं। एक्टिंग के मामले में एक प्रकाश राज के अलावा टाइगर श्रॉफ के इर्द-गिर्द कोई अनुभवी कलाकार नहीं है, इसलिए ज्यादा ध्यान नहीं जाता।
इस फिल्म की बड़ी कमी लेखन है। हरियाणा और दिल्ली के आसपास के जाट बहुत इलाके की पृष्ठभूमि में एक ऐसे चौधरी परिवार की कहानी चुनी गई है, जहां प्रेम स्त्रियों के लिए ही नहीं पुरुषों के लिए भी वर्जित है। ऐसे माहौल में शादी के मंडप से चौधरी की बड़ी बेटी अपने प्रेमी के साथ भाग जाती है। चौधरी बेटी की तलाश में बेटी के प्रेमी के दोस्तों को बंदी बना लेता है। उनमें से एक बबलू भी है। जब लोग उससे कहते हैं कि वह हीरोपंती क्यों करता है तो उसका जवाब होता है-'सब को आती नहीं, मेरी जाती नहीं।' पूरी फिल्म में यह संवाद बार-बार दोहराया जाता है। अगर फिल्म के नायक के किरदार और उसके मिजाज एवं रवैए को देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि हीरोपंती का मतलब निर्भीक और संतुलित व्यवहार है। फिल्म का नायक किसी प्रकार की उच्छृंखलता नहीं दिखाता। वह प्रेमिका के पिता से हमदर्दी रखता है।
फिल्म बाप-बेटी के संबंध और बेटी के भाग जाने से अपमानित हुए पिता की व्यथा और दर्द को भी व्यक्त करती है। विस्तार से रखे गए इस भाव के दृश्य हास्यास्पद भी हो गए हैं। प्रकाश राज अपनी प्रतिभा से इन दृश्यों को संभालने में असफल रहते हैं। फिल्म की नायिका कृति सैनन सुंदर और आकर्षक है, लेकिन अभिनय के मामले में वह संतुष्ट नहीं करतीं। छोटी भूमिकाओं में आए कलाकार सीमित दृश्यों में भी अपनी छाप छोड़ जाते हैं।
फिल्म में भाषा के प्रति लापरवाही है। जाट बहुत इलाके के प्रचलित शब्दों के बजाए हिंदी फिल्मों के प्रचलित शब्दों और मुहावरों का इस्तेमाल किया गया है। प्रकाश राज 'ढूंढा' को 'धूंधा' बोलते है। चौधरी की बड़ी बेटी के प्रेमी का नाम कभी राकेश तो कभी राजेश हो जाता है। इनके साथ फिल्म के टायटल के हिंदी उच्चारण और वर्तनी पर भी ध्यान नहीं दिया गया है। यह 'हीरोपंती' के बजाय 'हीरोपंथी' होना चाहिए था। अफसोस की अंग्रेजी का दोष हिंदी में भी लिप्यतंरित हो रहा है।
अवधि: 146 मिनट
**1/2

Thursday, May 22, 2014

दरअसल :थिएटर, प्रशिक्षण और अभिनय


-अजय ब्रह्मात्मज

    आए दिन हिंदी फिल्मों के स्टार अपने इंटरव्यू में यह कहते मिल जाते हैं कि अभिनय जन्मजात प्रतिभा है। या तो आप अभिनय कर सकते हैं या नहीं कर सकते। अभ्यास या प्रशिक्षण से कोई अभिनेता नहीं बनता। वे अपना या अपने सरीखे दूसरे स्टारों का उदाहरण देने से भी नहीं हिचकते। एक बार मैं एक पापुलर अभिनेत्री का इंटरव्यू कर रहा था। उनसे भी अभिनय के कौशल पर बात चली। उन्होंने एनएसडी और थिएटर से आई कुछ अभिनेत्रियों का हवाला दिया अैर पूछा कि बताएं इतनी टैलेंटेड होने के बाद भी वे क्यों नहीं चल पाईं? उन्हें अभिनय की संपूर्ण जानकारी है, लेकिन दर्शक उन्हें नहीं अपनाते। उनसे बहस करना फिजूल था, क्योंकि वह प्रतिभा को पैसे और लोकप्रियता के अनुपात में आंक रही थीं।
    सिद्ध अभिनेता और प्रसिद्ध स्टार में फर्क होता है। अमिताभ बच्चन प्रसिद्ध स्टार हैं, जबकि नसीरुद्दीन शाह सिद्ध अभिनेता हैं। नाम, शोहरत और कमाई में नसीरुद्दीन शाह और अमिताभ बच्चन की कोई तुलना नहीं हो सकती। इसके बावजूद 20-25 सालों के बाद दोनों की फिल्में देखने-दिखाने की बात होगी तो निस्संदेह शेल्फ पर नसीरुद्दीन शाह की अधिक फिल्में होंगी। फिल्मों के इस महत्व में कलाकार के अंतर्निहित योगदान की व्याख्या पर पाना थोड़ा मुश्किल काम है, क्योंकि इससे लोकप्रिय स्टार का अहं आहत हो सकता है। वत्र्तमान में उसी की जय होती है, जो लोकप्रिय है। समय बीतने के साथ वह महान और महत्वपूर्ण होता है, जो सघन और सक्रिय है।
    हिंदी फिल्म इंडस्ट्री मुख्य रूप से स्टार केंद्रित थी और है। वैश्विक दौर में सिनेमा के बदलते रूप-स्वरूप से परिचित होने के बाद भी हिंदी सिनेमा में गुणात्मक बदलाव नहीं आ सका है। साल में दो अलग किस्म की फिल्में दर्शक पसंद कर लेते हैं तो सभी बताने और स्थापित करने लगते हैं कि दर्शकों की रुचि बदल रही है। यह कड़वी सच्चाई है कि हिंदी फिल्मों के मनोरंजन की परंपरा ने दर्शकों को अकर्मण्य बना दिया है। वह मानसिक मेहनत नहीं चाहता। तर्क दिया जाता है कि भारतीय दर्शक मनोरंजन की थाली चाहता है, जिसमें हर किस्म का स्वाद हो। मनोरंजन और उसके प्रभाव का यह ऐसा दुष्चक्र है, जिस से हिंदी फिल्में लाख प्रयत्नों के बावजूद नहीं निकल पा रही हैं। अलग किस्म की फिल्मों की तात्कालिक चर्चा के बाद फिर से वही ढाक के तीन पात हो जाते हैं। फिर वही मसाला एंटरटेनमेंट, 100 करोड़ और स्टार सिस्टम।
    इसी परिस्थिति का परिणाम है कि हिंदी फिल्मों में थिएटर या प्रशिक्षण हासिल कर आए अभिनेताओं को दोयम दर्जे का समझा जाता है। उन्हें तरजीह नहीं दी जाती है। फिल्मों में सहायक और चरित्र भूमिकाओं में उन्हें किसी इमारत की स्तंभ की तरह इस्तेमल किया जाता है, लेकिन उस इमारत में कंगूरे कथित सितारों  के ही लगते हैं। दशकों से मैं थिएटर से अभिनेताओं की यह शिकायत सुनता आ रहा हूं कि उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं दिया जाता। पहचान में आने के बाद किसी अभिनेता ने पारिश्रमिक बढ़ाने की बात कर दी तो सभी उसे औकात बताने लगते हैं। ताने दिए जाते हैं कि तेरा चेहरा पोस्टर पर डाल दें तो दर्शक सिनेमाघर में नहीं आएगा। कौन पूछता या चाहता है तुम्हें? 
    पिछले कुछ दशकों की हिंदी फिल्मों पर गौर करें तो अभिनय, संवाद अदायगी, एक्सप्रेशन सब में भारी बदलाव आ गया है। पारसी थिएटर के प्रभाव से निकली हिंदी फिल्में अब अप्रत्यक्ष रूप से थिएटर से आए कलाकारों से प्रभावित है। एक्टिंग को रियल बनाने में थिएटर से आए कलाकारों का बड़ा योगदान है। ये कलाकार स्वयं भले ही स्टर नहीं बन पाए हों, लेकिन अपनी मौजूदगी और सक्रियता से उन्होंने परफारमेंस का तरीका बदल दिया है। शायद कभी ऐसा वक्त आए जब इन कलाकारों को सितारों के समकक्ष समझा जाए और समान सम्मान दिया जाए।

Monday, May 19, 2014

चांस लेना मेरी आदत है-प्रियंका चोपड़ा


-अजय ब्रह्मात्मज
    खिलाड़ी का जीवट, कलाकार की ऊर्जा और सीखने के लिए आतुर प्रियंका चोपड़ा अपनी जिंदगी और करिअर के उस मुकाम पर हैं, जहां से ली गई छलांग उड़ान साबित हो सकती है। बचपन में कभी उनका सपना था कि वह एरोनॉटिकल इंजीनियर बनें ताकि हवा से बातें कर सकें और आकाश में रहें। आज वह सचमुच सफलता के आकाश में कुलांचे मार रही हैं। कभी मुंबई तो कभी लास एंजेल्स ़ ़ ़ उन्होंने भारत और अमेरिका की दूरी को कदमों में समेट लिया है। वह फिल्मों में व्यस्त हैं। साथ ही गायकी के लिए पर्याप्त समय निकाल ले रही हैं। पिछले दिनों अमेरिका के टेम्पा शहर में आयोजित आईफा अवार्ड समारोह में उनकी सक्रियता दंग कर रही थी। सुबह से शाम तक विभिन्न इवेंट में सदा मुस्कराती और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का प्रतिनिधित्व करती प्रियंका चोपड़ा के पांवों में ज्यों स्प्रिंग लग गए थे। 15वें आईफा अवार्ड समारोह की सफलता का श्रेय प्रियंका चोपड़ा को भी मिलना चाहिए।
    पिछले दस सालों में उन्होंने कामयाबी और कंफीडेंस की लंबी दूरी तय की है। सिर्फ 17 साल की उम्र में मिस इंडिया और मिस वल्र्ड बनने के साथ बरेली की इस नादान लडक़ी की जिंदगी बदल गई। महीने-दो महीने के भीतर कदमों के आगे जो राह थी, उसकी मंजिल का पता नहीं था। कुछ भी साफ नहीं था। मिस वल्र्ड की ख्याति ठंडी पडऩे तक प्रियंका चोपड़ा फिल्मों की ओर मुड़ चुकी थीं। उन दिनों को वह आज भी नहीं भूल सकी हैं, ‘फिल्मों से मेरे परिवार का नाता सिर्फ पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनल की खबरों तक था। फिल्मों का निर्णय लिया गया तो मेरे पिता ने इतनी ही सलाह दी थी कि ‘जो भी करो, अपने निर्णय से करो। पूरे मनोयोग से करो। अगर कोई आलोचना करे तो उसे झेलने के लिए तैयार रहो।’ पिता जी के उस मार्गनिर्देश ने मुझे बड़ी ताकत दी। शुरू में अपनी समझ से अच्छी-बुरी फिल्में कीं। कुछ चलीं और कुछ नहीं चलीं। आलोचना हुई, जरूर हुई। मगर लोगों ने तारीफें भी कीं। पुरस्कार भी दिए। मैंने हमेशा चांस लिया। आजमाने का जोश हमेशा मेरे साथ रहा। मुझे याद है कि ‘ऐतराज’ के समय सभी ने उसे नहीं करने की सलाह दी। कहा था कि हीरोइन बनना है तो ऐसे रोल मत करो। वैंप बन कर रह जाओगी। मैंने चांस लिया। ‘ऐतराज’ के निगेटिव रोल के लिए मुझे सारे पुरस्कार मिले।’
    चासं लेना उनकी आदत बन चुकी है। हालांकि प्रियंका चोपड़ा ने कायांतरण के लिए अभ्यास आरंभ कर दिया है, लेकिन पिछली मुलाकात में मैरी कॉम के लिए बनाई गई मांसपेशियां छलक रही थीं। इन दिनों सभी कलाकारों को चरित्र के मुताबिक अपने जिस्म पर काम करना पड़ता है। अगर चरित्र बॉक्सर मैरी कॉम का हो तो यह लाजिमी होता है। प्रियंका चोपड़ा बताती हैं, ‘इस बॉयोपिक की खासियत है कि मैरी कॉम खिलाड़ी हैं। स्पोर्ट््सपर्सन की भूमिका निभाने की सबसे बड़ी चुनौती है कि हमें उस स्पोटर््स को सीखना पड़ता है।,क्योंकि स्पोर्ट्स की एक्टिंग नहीं की जा सकजर। प्रैक्टिस करनी ही पड़ती है। मैंने ‘मैरी कॉम’ के लिए रोजाना 6 घंटे का बाक्सिंग अभ्यास किया और दो घंटे जिम में बिताए।’ प्रियंका इस फिल्म के बारे में आगे कहती हैं, ‘आम तौर पर बॉयोपिक मृत या जिंदगी जी चुके व्यक्तियों पर होती है। मैरी कॉम अभी एक्टिव हैं। प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले रही हैं। ऐसे किरदार को पर्दे पर उतारना बहुत बड़ी चुनौती रही। सच कहूं तो ‘मैरी कॉम’ सिर्फ एक बॉक्सर की कहानी नहीं है। यह हर उस लडक़ी की कहानी है, जो समाज और परिवार द्वारा तय की गई सीमाओं को तोड़ती है। सामाजिक बंधनों से बाहर निकलती है। मैरी कॉम ने सभी मुश्किलों को पार कर असंभव जीत हासिल की।’
    लड़कियां प्रियंका चोपड़ा की चिंता और कार्य में शामिल रहती हैं। छोटे शहर बरेली से बोस्टन होते हुए मुंबई पहुंची प्रियंका चोपड़ा के दिल में आज भी छोटे शहरों के मध्यवर्गीय परिवारों की लडक़ी की संवेदनाएं स्पंदित होती हैं। यूनिसेफ के अभियानों में शामिल प्रियंका चोपड़ा ने ‘गर्ल राइजिंग’ सीरिज में भारत की प्रतिनिध फिल्म को आवाज दी है। इस विशेष सीरिज में विश्व प्रसिद्ध 9 अभिनेत्रियों ने अलग-अलग फिल्मों को आवाज देकर लड़कियों के संघर्ष और जीत को मुखर किया है। प्रियंका चोपड़ा ने कोलकाता की ‘रुखसाना’ की जिंदगी बयां की है। जल्दी ही वह इस सीरिज में भारत की 9 अभिनेत्रियों को 9 फिल्मों के लिए आमंत्रित करेंगी। इस कार्य के प्रति वह अत्यंत गंभीर हैं। वह आशा करती हैं कि उन्हें अभिनेत्रियों का सहयोग मिलेगा।
    इन दिनों प्रियंका चोपड़ा फिल्मों से फुर्सत मिलते ही गायकी के अभ्यास में लीन हो जाती हैं या यों कहें कि गायकी से समय निकाल कर फिल्में कर रही हैं। प्राथमिकता पूछने पर वह दो टूक शब्दों में कहती हैं, ‘मैं एक साथ कई सारी चीजें कर रही हूं। वैसे भी लड़कियां मल्टी टास्किंग होती हैं। अभिनय, गायन, एंडोर्समेंट और सोशल एक्टिविटी के लिए पर्याप्त समय निकाल लेती हूं। प्राथमिकता अभी तक तो फिल्में हैं। कल का कौन जाने?’ हाल ही में उनका नया सिंगल ‘आई कांट मेक यू लव मी’ आया है। यह गीत उन्हें बेहद पसंद रहा है। अपनी गायकी वह पिता को समर्पित करती हैं, ‘मेरे पिता जी भी गाते थे। उनकी एक इच्छा थी कि मैं गाऊं। जब यूनिवर्सल से मिले ऑफर के बारे में मैंने उन्हें बताया था तो वे बहुत खुश हुए थे। मुझे लगता है कि इंटरनेशनल पॉप में एक भारतीय सिंगर को भी होना चाहिए। मैं प्रयास कर रही हूं। अभी तक सभी पसंद कर रहे हैं। मुझे दिख रहा है कि मैंने सही राह पर सधे कदम उठाए हैं।’
    पिछले दिनों प्रियंका चोपड़ा ने इंटरनेशनल फैशन ब्रांड ‘गेस’ के लिए एंडोर्समेंट किया। इसे वह खुद के साथ देश की उपलब्धि के तौर पर भी देखती हैं, ‘अभी तक गेस की मॉडल होने के लिए नीली आंखों और सुनहरे बाल जरूरी थे। पहली बार उन्होंने भारतीय मूल की लडक़ी को चुना है। मुझे गर्व होता है कि मैं इस योग्य समझी गई।’ प्रियंका चोपड़ा की जिंदगी से परिचित उनके प्रशंसक जानते होंगे कि अमेरिका में हाई स्कूल की पढ़ाई के दौरान उन्होंने नस्ली ताने सुने थे। उन्हें ‘ब्राउनी’ कह कर नीचा दिखाने की कोशिश की जाती थी। आज वही ब्राउनी प्रियंका चोपड़ा इंटरनेशनल स्टार के तौर पर प्रकाशित हो रही हैं।

Sunday, May 18, 2014

किस्‍मत पर कम हुआ यकीन-तिग्‍मांशु धूलिया

-अजय ब्रह्मात्मज
    निर्देशक तिग्मांशु धूलिया इन दिनों एक्टिंग कर रहे हैं। ‘बुलेट राजा’ के बाद उनकी कोई फिल्म फ्लोर पर नहीं गई है। खाली समय में वे एक्टिंग के ऑफर स्वीकार कर रहे हैं। यहां तक कि अपनी आगामी फिल्म ‘यारा’ में भी वे इरफान के साथ नजर आएंगे। पिछले दिनों उनसे इस अभिनय प्रसंग पर बातें हुई।
-अभिनय में आप की सक्रियता बढ़ गई है इन दिनों। कोई खास वजह?
0 ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के बाद लोगों का ध्यान गया कि मैं एक्टिंग भी कर सकता हूं। अभी तक इसे करिअर बनाने का इरादा नहीं है। शुरू में दोस्तों के ऑफर या यों कहें कि डिमांड  ठुकरा नहीं सका। फिलहाल निखिल आडवाणी की फिल्म ‘हीरो’ में शम्मी कपूर वाली भूमिका निभा रहा हूं। अनुराग कश्यप निर्देशित धारावाहिक में भी दिखूंगा, जिसमें अमिताभ बच्चन हैं। उसमें अमित जी ईमानदार बिजनेसमैन बने हैं। मैं उस धारावाहिक में होम मिनिस्टर बना हूं। भ्रष्ट राजनीतिज्ञ हूं। अभी जून से आरंभी हो रही अपनी  ‘यारा’ में छोटी भूमिका निभा रहा हूं।
-एक्टिंग की तरफ रुझान कैसे हुआ?
0 मुझे एक्टिंग के ऑफर मिलते रहे हैं। मुझे करना नहीं था। हंसल मेहता की ‘शाहिद’ में सुनील वोहरा ने वकील के रोल के लिए राजी कर लिया। वह एक दिन का काम था। केतन मेहता की ‘माउंटेन मैन’ में भी किया। केतन ने बुलाया तो ना नहीं कह सका। उनके साथअपनी पहली फिल्म ‘सरदार पटेल’ की थी। उनका बड़ा उपकार रहा है। ‘बुलेट राजा’ की शूटिंग से समय निकाल कर मैंने वह फिल्म की। दोस्ती में की गई फिल्मों के लिए पैसे नहीं लिए थे।
-अभी भी क्या दोस्ती और मुफ्त में काम कर रहे हैं?
0 नहीं, इधर पैसों की जरूरत महसूस हुई। सच कहूं तो एक्टिंग मेरी क्रिएटिव जरूरत नहीं है। फिल्मों में अपनी क्रिएटिविटी की हसरतें पूरी कर लेता हूं। जब ‘हीरो’ कर रहा था तो एहसास हुआ कि एक्टिंग भी की जा सकती है। अनुराग कश्यप के धारावाहिक तक यह खयाल नहीं आया था। वह धारावाहिक तो मैंने अमित जी की वजह से किया। यही सोचा कि पता नहीं कब उनके साथ कोई फिल्म बनाऊंगा। चलो इसी बहाने उनके साथ खड़ा होने का तो मौका मिलेगा। कहने को हो जाएगा कि मैंने अमिताभ बच्चन के साथ काम किया है। ‘हीरो’ में लडक़ी का पिता हूं। पॉजीटिव कैरेक्टर हूं। तमाम इमोशन हैं। मुझे लगा कि सभी सीरियसली ले रहे हैं। फिर ‘यारा’ हो गई। इसके बावजूद मैं बता रहा हूं कि कोई सेक्रेटरी वगैरह रख कर काम खोजने की कोशिश नहीं करूंगा। मेरा पहला काम रायटिंग और डायरेक्शन ही है।
-खुद को डायरेक्ट करना कितना आसान होगा? क्या कभी किसी नाटक में खुद के डायरेक्शन में एक्ट किया है आप ने?
0 नाटक में तो किया है। देखें फिल्म का अनुभव कैसा रहता है। अभी तो मानीटर वगैरह की सुविधा हो गई है। हिंदी फिल्मों में मनोज कुमार में डायरेक्टर-एक्टर का उम्दा कांबीनेशन देखता हूं। वे जबरदस्त शॉट टेकिंग करते थे। ‘मैं न भूलूंगा’ गाना ही देख लीजिए। मेरे लिए मुश्किल नहीं होगी। ‘यारा’ में दस दिनों का काम है, बस।
-क्या हम कभी आप को स्वयं के डायरेक्शन में मेनलीड में भी देख सकेंगे?
0 नहीं। ऐसा नहीं होगा। बतौर एक्टर तो बिल्कुल नहीं। स्क्रिन पर मैं खुद को अजीब लगता पसंद नहीं करता हूं। अजीब लगता हूं। ‘यारा’ के लिए मेहनत करनी है। वजन कम करना है। ज्यादा सेहतमंद दिखूंगा। लुक और मेकअप पर ध्यान दूंगा। अगस्त-सितंबर तक फिट हो जाऊंगा।
- ‘यारा’ के अलावा और कौन सी फिल्मों की योजना है? सुना है कि अभिषेक बच्चन के साथ भी कुछ कर रहे हैं?
0 उनके साथ बातचीत चल रही है। एक स्क्रिप्ट उन्हें पसंद आई है। हम लोग डायरेक्टर खोज रहे हैं। हो सकता है कि वह हम दोनों का को-प्रोडक्शन हो। अभिषेक के साथ और भी फिल्मों पर बात चल रही है। एक को तो मैं डायरेक्ट करूंगा।
- ‘मिलन टाकीज’ और ‘बेगम समरू’ किस स्टेज पर है?
0 ‘मिलन टाकीज’ बालाजी के साथ करनी है। अभी वे लोग व्यस्त हैं। मैं भी खाली नहीं हूं। अभी तक एक्टर फायनल नहीं हुए हैं। जल्दी ही कुछ फैसला होगा। उस फिल्म की स्क्रिप्ट सभी को पसंद आती है, लेकिन फिल्म शुरू नहीं हो पा रही है।
-आशा-निराशा के बीच किस्मत पर भरोसा बढ़ गया होगा?
0 मैं पहले किस्मत को मानता था। अब यकीन कम हो गया है। लगा कि गलतियां हमारे अंदर थीं। मैं जल्दी ही भरोसा कर लेता हूं और सभी से सहमत हो जाता हूं। वह मेरी पर्सनैलिटी की समस्या है। मैं तो समझ ही नहीं पाता कि सभी को कैसे संदेह से देखा जाए? अभी इंडस्ट्री का मजेदार फेज चल रहा है। उतार आया है तो चढ़ाव भी आएगा।

Saturday, May 17, 2014

देश को उम्मीद दी है नरेन्द्र मोदी ने-आमिर खान


-अजय ब्रह्मात्मज
अपने कामकाज के बीच आमिर खान ने चुनाव परिणामों में रुचि दिखाई। उन्होंने आज दोपहर में आ रहे परिणामों को टीवी पर देखा और नरेन्द्र मोदी को मिले स्पष्ट बहुमत पर खुशी जतायी। उन्होंने बातचीत में यह उम्मीद जाहिर की कि नरेन्द्र मोदी अपने वादों को पूरा करेंगे और पूरे देश को प्रगति की राह पर ले चलेंगे।
- मोदी के नेतृत्व में भाजपा को मिले स्पष्ट बहुमत पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
0 नरेन्द्र मोदी ने देश को एक उम्मीद दी है। चुनाव प्रचार के दौरान पिछले कुछ महीनों में उन्होंने मतदाताओं उम्मीदें जगा दी हैं। प्रगति और विकास का उन्होंने नारा दिया है। नौकरियां देने का वादा है। आर्थिक प्रगति का वादा है। उनके ये वादे मतदाताओं को अच्छे लगे। युवकों, मजदूरों और व्यापारियों के मन में उन्होंने भारत की एक तस्वीर बसाई है। मतदाताओं को उनकी खींची यह तस्वीर अच्छी लगी। ये सारे वायदे बहुत अच्छे हैं। भ्रष्टाचार मिटाने और खुशहाली लाने के वादे पर लोगों ने भरोसा दिखाया है। उन्हें स्पष्ट बहुमत मिला है। वे फैसले ले सकते हैं।
- इस बार मतदान का प्रतिशत बढ़ा।  चुनाव आयोग के ब्रांड ऐंबेसडर के तौर पर वोट देने के आप के आह्वान का असर दिखा। चुनाव  होने के बाद लोकतंत्र में नागरिकों की भागीदारी कैसे बढ़ सकती है?
0 इस पर तो हम ने ‘सत्यमेव जयते’ के दो एपीसोड बनाए थे। चुनाव के ठीक पहले इनका प्रसारण हुआ था। राजनीति के अपराधीकरण पर एक एपीसोड था। अनेक राजनीतिज्ञों पर अपराध दर्ज हैं। कोर्ट में मुकदमे चल रहे हैं। इस संदर्भ में मोदी जी ने कहा है कि वे एक साल में सारे मामलों का निबटारा करवा देंगे। अगर एक साल में यह हो जाए तो बहुत अच्छा है। दूसरा हमने कहा था कि डेमोक्रेसी वास्तव में लोकशाही है। इसमें हर मतदाता और नागरिक शाह या राजा है। यह देश हमारा है और हम इसके राजा हैं। यह एहसास हमारे अंदर आना जरूरी है कि हमने जिन्हें चुना है, वे हमारे सेवक हैं। उन सभी ने काम करने का वादा किया है। हम उनके पास अपने काम के लिए जाएं तो याचक की मुद्रा में न हों। हक से अपने काम की बात करें। अभी तो हम अपनी जरूरतों के लिए याचना करने लगते हैं। हम अपने प्रतिनिधियों को राजा समझने लगते हैं। होना यह चाहिए कि अगर कोई काम नहीं कर रहा है तो हम उसे झट से हटा दें। हम इसे लोकशाही समझें न कि वोटशाही।
- आप मोदी की जीत को कांग्रेस के विरोध में किए गए मतदान का परिणाम मानते हैं या सचमुच मोदी के समर्थन में मतदान हुआ है?
0 मुझे नहीं लगता है कि उनकी जीत में केवल कांग्रेस के विरोध में किए गए मतदान का योगदान है। मोदी जी की कही बातों और वादों के प्रभाव में मतदाताओं ने उनके नेतृत्व में विश्वास कर भाजपा को वोट दिया है। आर्थिक समृद्धि के उनके आश्वासन पर नागरिकों ने भरोसा किया है। मोदी जी ने यह भी कहा है कि उनके लिए सभी समान हैं। वे सभी को एक साथ लेकर देश को आगे ले जाएंगे। मतदाताओं ने प्रगति, विकास, भ्रष्टाचारविहीन सिस्टम आदि के लिए उन्हें वोट दिया है।
- एक नारा था कि अच्छे दिन आने वाले हैं। आप की राय में क्या होने पर आप मानेंगे कि अच्छे दिन आ गए?
0 मेरी राय में सबसे पहले समाज के चारों स्तंभ मजबूत हों। इनके अलावा मैं चार चीजें देखना चाहूंगा। पहला, जन स्वास्थ्य। देश के सभी नागरिकों को स्वास्थ्य की मूल भूत सुविधाएं मिले। बीमार पडऩे पर उसे उपयुक्त उपचार मिले। उसे उपचार पर फूटी कौड़ी भी खर्च न करनी पड़े। विकसित देशों की तरह सभी नागरिकों को उपचार की समान सुविधाएं मिले। देखें तो देश का हर नागरिक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से टैक्स दे रहा है। स्वास्थ्य और उपचार उसका मौलिक अधिकार है। दूसरा, सभी नागरिकों को शिक्षा की सुविधा मिले। शिक्षित होने पर ही समाज सही ढंग से विकसित होगा। तीसरा, सभी को सुरक्षा मिले। महिला-पुरुष दोनों को पर्याप्त सुरक्षा मिले। सुरक्षा देने में किसी नागरिक की जाति, धर्म या समूह आड़े न आए। चौथा, न्याय। अगर कभी नागरिक को किसी मामले में न्याय की जरूरत महसूस हो तो उसे तुरंत न्याय मिले। ये चार चीजें हो जाएं तो मैं मानूंगा कि अच्छे दिन आ गए।

फिल्‍म समीक्षा : द एक्‍सपोज

सातवें दशक की चकाचौंध 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का सातवां दशक। अभी एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन का पदार्पण नहीं हुआ था। फिल्म स्टार, फिल्में, प्रोड्यूसर और डायरेक्टर का अलग ढर्रा था। चमकदार और रंगीन होने के साथ हिंदी सिनेमा में चकाचौंध अभी आई ही थी। हीरोइनें साड़ी छोड़कर विदेशी परिधानों में दिखने लगी थीं। ऐसे ही परिवेश की कहानी है 'द एक्सपोज'। हिमेश रेशमिया उर्फ रवि कुमार को केंद्र में रख कर बनाई गई इस फिल्म के सारे किरदार सप्तर्षि की तरह हैं। ध्रुवतारा या स्टार एक ही हैं हिमेश रेशमिया।
लेखक और निर्देशक का पूरा ध्यान हिमेश रेशमिया पर टिका है। उनकी वेशभूषा, चाल-ढाल, संवाद अदायगी, लुक और अंदाज को हर तरह से सजाने-संवारने की सफल कोशिश की गई है। फिल्म की दोनों हीरोइनों जारा और चांदनी की खूबसूरत और मादक अंदाज में पेश किया गया है। चूंकि माहौल ही फिल्म इंडस्ट्री की रौनक का है, इसलिए वे सभी फिल्म की कहानी में उपयुक्त लगते हैं। फिल्म में निर्माता-निर्देशक के तौर पर आए किरदारों को ठोस चरित्र दिए गए हैं। इनके अलावा बाकी किरदारों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है, इसलिए वे फिल्म में होते हुए भी फिल्म का हिस्सा नहीं लगते। इरफान और आदिल हुसैन बेहतर कलाकार हैं। वे अपने परफॉर्मेस से प्रभावित करते हैं, किंतु वे फिल्म के बाकी कलाकारों से अलग-थलग हैं। हनी सिंह अपनी लोकप्रियता की वजह से अवश्य ध्यान खींचते हैं, अन्यथा उनका किरदार बेढब है।
अनंत नारायण महादेवन ने हिमेश रेशमिया के सौजन्य और सहयोग से सातवें दशक की पृष्ठभूमि में एक मर्डर मिस्ट्री बुनी है, जो म्यूजिकल भी है। म्यूजिक की दो पॉपुलर प्रतिभाएं (हिमेश रेशमिया और हनी सिंह) इस फिल्म से जुड़ी हैं। संगीत मधुर और कर्णप्रिय है। उनका फिल्मांकन रोचक है। संगीत आज का है, लेकिन ध्वनियों में सातवें दशक की अनुगूंज है। लेखक-निर्देशक मर्डर मिस्ट्री को अंत तक बनाए रखने में सफल रहे हैं। फिल्म इंडस्ट्री में अवॉर्ड नाइट की पार्टी में एक हीरोइन की हत्या हो जाती है। शक के दायरे में सभी हैं, लेकिन असली हत्यारा कौन है? क्या कानून सही हत्यारे तक पहुंच सका?
'द एक्सपोज' में फिल्म स्टार और इंडस्ट्री की ईष्र्या, चालबाजी, साजिश, इगो, निराशा, प्रेम और बदले की भावना को लेखक-निर्देशक ने फिल्म की कहानी में घटनाओं के जरिए पिरोया है। कथा विस्तार नहीं होने से फिल्म की रोचकता गहरी नहीं हो पाती। ईष्र्या और हत्या का कमजोर आधार फिल्म के रहस्य और प्रभाव को कम करता है। हालांकि निर्देशक और मुख्य कलाकारों ने अपने अंदाज और अभिनय से रहस्य गढ़ने और बढ़ाने की पूरी कोशिश की है।
यह फिल्म हिमेश रेशमिया की है। उनकी मेहनत, लगन और प्रतिभा नजर आती है। वे अपनी सीमाओं का विस्तार करते हैं। यों रवि कुमार में रजनीकांत, शत्रुघ्न सिन्हा और राजकुमार की छवियों की मिश्रित झलक है।उनके अलावा केवल अनंत नारायण महादेवन अभिभूत करते हैं। हीराइनों के तौर पर आई दोनों लड़कियां निराश करती हैं। इस फिल्म में इरफान और आदिल हुसैन पैबंद की तरह नजर आते हैं।
अवधि-113 मिनट
** 1/2 ढाई स्‍टार 

Thursday, May 15, 2014

दरअसल : दरकिनार होती करीना कपूर


-अजय ब्रह्मात्मज
    सफल फिल्मों का हिस्सा होने के बावजूद करीना कपूर सफलता की हकदार नहीं हो सकीं। उन्हें याद करते समय उनकी असफल फिल्में पहले याद आ जाती हैं। वह ‘3 इडियट’, ‘गोलमाल 3’, ‘बॉडीगार्ड’ और ‘रा ़ वन’ की हीरोइन थीं, लेकिन इन फिल्मों की सफलता का श्रेय आमिर खान, अजय देवगन, सलमान खान और शाहरुख खान को ही मिलता रहेगा। करीना कपूर को फिलवक्त हम ‘हीरोइन’, ‘एक मैं और एक तू’, ‘सत्याग्रह’ और ‘गोरी तेरे गप्यार में’ जैसी असफल फिल्मों के साथ जोड़ कर देख रहे हैं। देखते ही देखते सेंटर स्टेज से करीना कपूर दरकिनार हो गई हैं। लगता है चर्चा और फिल्मों से गायब हो रही करीना कपूर का ध्यान कहीं और है।
    ‘जब वी मेट’ की तत्काल सफलता के बाद ‘टशन’ में सैफ अली खान से हुई उनकी मुलाकात करिअर को नया मोड़ दे गई। इस मोड़ से आगे का रास्ता ढलान का दिख रहा है। सैफ से दोस्ती और शादी के इस दौर में करीना कपूर ने फिल्मों पर फोकस नहीं किया। करिअर के प्रति करीना आरंभ से लापरवाह रही हैं। इस दौर में उनकी लापरवाही और बढ़ गई। समकालीन अभिनेत्रियों में अधिक सक्षम, योग्य, गुणी और भावप्रवीण होने के बावजूद उन्होंने कभी मनोयोग से फिल्मों में अभिनय नहीं किया। फिल्मों के चुनाव में भी उनकी यह लापरवाही झलकती रही है। उन्होनें ज्यादातर बड़े बैनर, बड़े निर्देशक और पॉपुलर स्टार के साथ फिल्में कीं। गौर करें तो उन सभी फिल्मों में करीना कपूर का व्यक्तित्व निखर कर नहीं आता। उसकी बड़ी वजह यही रही कि उन फिल्मों की नायिकाएं औसत और साधारण थीं। उन भूमिकाओं में कोई और अभिनेत्री रहती तो दर्शक और समीक्षक नोटिस भी नहीं करते।
    कपूर खानदान की करीना कपूर को बड़ी बहन करिश्मा कपूर की तरह मेहनत नहीं करनी पड़ी। जे पी दत्ता की ‘रिफ्यूजी’ के साथ हुई बड़ी शुरुआत ने पहली फिल्म की असफलता के बावजूद उन्हें खास जगह दे दी। ग्लैमर, फैमिली और बाकी उपादानों से वह हमेशा चर्चा में रहीं। एक जमाने में उन्हें फ्लाप फिल्मों की हिट हीरोइन का दर्जा भी मिला। फिल्में चली या नहीं चलीं, लेकिन करीना कपूर हमेशा चलती रहीं। एक दौर में रानी मुखर्जी और प्रीति जिंटा से उनकी प्रतियोगिता थी। वे दोनों कहीं पीछे छूट चुकी हैं। उन्होंने बिपाशा बसु, प्रियंका चोपड़ा आदि को कभी तूल नहीं दिया। वह इस मुगालते में रहीं कि निर्देशक और दर्शक उन्हें पूछते रहेेंगे। अभी स्थिति यह आ गई है कि वह अपनी लापरवाही, निष्क्रियता और प्रभावहीन भूमिकाओं की वजह से नेपथ्य में चली गई हैं। हाल ही में आयोजित एक इंटरनेशनल अवार्ड समारोह में उनकी खिसकती लोकप्रियता का साक्षात अनुभव हुआ। स्वयं करीना कपूर को भी एहसास हो रहा होगा कि सेंटर स्टेज में उनकी जगह कोई और आ चुका है।
    करीना कपूर की उल्लेखनीय फिल्मों की सूची बनाएं तो उनमें ‘जब वी मेट’, ‘ओमकारा’ और ‘चमेली’ को निश्चित ही शामिल करना होगा। उल्लेखनीय है कि इन तीनों फिल्मों के निर्देशक आउटसाइडर हैं। जिस करण जौहर और फिल्म इंडस्ट्री के इनसाइडर पर उनका भरोसा रहा, उन्होंने उन्हें तत्कालीन ख्याति और चर्चा जरूर दी, लेकिन कोई यादगार फिल्म नहीं दे सके। करीना कपूर ने एक समय के बाद आउटसाइडर निर्देशकों के साथ काम करना बंद कर दिया। वह कुछ खास प्रोडक्शन हाउस और प्रोड््यूसर-डायरेक्टर तक ही सीमित रहीं। इन सभी ने करीना कपूर की इमेज का इस्तेमाल नहीं किया। सभी की कोशिश रही कि सुरक्षित फिल्म बनाओ और प्रयोग से बचो। स्वयं करीना कपूर ने भी असुरक्षा और असुविधा से बचने के लिए स्वतंत्र और सीमित बजट की फिल्मों को प्रश्रय नहीं दिया।
्र    अभी नई और युवा अभिनेत्रियां उनसे आगे निकल चुकी हें। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में सफलता ही सबसे बड़ी कुंजी होती है। दर्शकों की स्मृति वैसे भी बहुत छोटी होती है। उन्हें केवल पिछली फिल्म ही याद रहती है। अगर आप लगातार सफल हैं तो वे सिर पर बिठा लेते हैं। करिअर डगमगाया तो वे ठोकर मारने में देर नहीं करते। ऐसा लग रहा है कि करीना कपूर को उन्होंने सिर से उतार दिया है। अभी उन्होंने ठोकर तो नहीं मारा है,लेकिन करीना कपूर के प्रति उनकी उत्सुकता खत्म हो चुकी है। अब उन्हें करीना कपूर की फिल्मों का इंतजार नहीं रहता। ‘सिंघम 2’ की भी बात करें तो वह अजय देवगन और रोहित शेट्टी की फिल्म है।
(फोटो-हेमंत पांड्या)

Wednesday, May 14, 2014

दरअसल : अमेरिका में आईफा


-अजय ब्रह्मात्मज
        पूरी दुनिया में मनोरंजन जगत से जुड़े लोगों ने पिछले दिनों दो तस्वीरों को बड़े गौर से देखा। एक तस्वीर मैं जॉन टै्रवोल्टा हिंदी फिल्मों की अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा के साथ ठुमके लगा रहे थे। दूसरी तस्वीर में केविन स्पेसी दीपिका पादुकोण के साथ लुंगी डांस कर रहे थे। दोनों ही घटनाएं अप्रत्याशित थीं। तारीफ करनी होगी कि जॉन ट्रैवोल्टा और केविन स्पेसी ने बगैर किसी ना-नुकूर के दोनों वक्त मंच पर पूरे जोश के साथ नृत्यों में हिस्सा लिया। उनकी ये तस्वीरें मीडिया में विभिन्न माध्यमों से फ्लैश हुईं। सहसा यकीन नहीं हुआ कि ऐसा भी हो सकता है,लेकिन ऐसा हुआ। पिछले दिनों अमेरिका के फ्लोरिडा स्टेट के टेम्पा शहर में 15वां आईफा अवार्ड समारोह आयोजित किया गया था। हालीवुड के दोनों नामवर कलाकार उसी समारोह के खास अतिथि थे।
        आईफा हिंदी फिल्मों के अवार्ड और समारोह का अनोखा आयोजन है। यह साल में एक बार दुनिया के किसी भी देश के प्रमुख शहर में आयोजित होता है। स्थानीय प्रशासन और नागरिकों की मदद से संपन्न आईफा अवार्ड समारोहों में मुख्य रूप से विदेशों में बसे हिंदी फिल्मों के प्रेमी अपने प्रिय सितारों को देख-सुन पाते हैं। हर बार भीड़ उमड़ती है। यह आयेजकों और भागीदारों के लिए मुनाफे का सौदा होता है। आईफा समारोहों के बाद हर देश में भारतीय पर्यटकों में इजाफा हुआ है। साथ ही उक्त देश और भारत के बीच फिल्मों के कारोबार में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। हिंदी फिल्मों के अन्य पुरस्कारों की तरह आईफा के पुरस्कार भी विवादित रहते हैं। इस साल भाग मिल्खा भाग को मिले अनेक पुरस्कारों से संदेह बढ़ता है। फिर भी यह स्वीकार करने में हिचक नहीं होनी चाहिए कि आईफा अवार्ड समारोह एक वार्षिक उत्सव बन चुका है। विदेशियों को इसका इंतजार रहता है।
        अमेरिका में आईफा आयोजन का विशेष महत्व है। हिंदी फिल्मों का 20 प्रतिशत कारोबार विदेशों में होने लगा है। इस कारोबार का बड़ा हिस्सा अमेरिका और इंग्लैंड से आता है। अमेरिका और इंग्लैंड में बसे भारतवंशी मुख्य दर्शक हैं। इधर कुछ सालों से नोटिस किया जा रहा है कि भारतवंशियों की दूसरी-तीसरी पीढ़ी गैरभारतीयों को हिंदी फिल्मों का चस्का लगा रही है। इस बार टेम्पा में साफ दिखा कि विदेशी अपने भारतीय मित्रों के साथ रात तीन बजे तक हिंदी फिल्मों के सितारों की अदाओं और भंगिमाओं का आनंद उठाते रहे। अवार्ड की रात टेम्पा के रेमंड जेम्स स्टेडियम में 28000 दर्शकों के बैठने की व्यवस्था थी। पूरा स्टेडियम खचाखच भरा था। कमी थी तो लोकप्रिय सितारों की। इस बार अग्रिम पंक्ति के लोकप्रिय सितारे नहीं थे। अगर खानत्रयी में से कोई और अमिताभ बच्चन रहते तो दर्शक संतुष्ट होकर लौटते।
        अमेरिकी मीडिया में आईफा के कवरेज से जाहिर होता है कि अपने पाठकों की रुचि का खयाल रखते हुए सभी ने उसे बराबर महत्व दिया। वक्त आ गया है कि इंटरनेशनल मीडिया भारतीय सिनेमा विशेष कर हिंदी सिनेमा को  अब नजरअंदाज नहीं कर सकता। हालीवुड की नजर भी हिंदी फिल्मों की चााल और गतिविधियों पर टिकी हुई है। कल तक हिंदी फिल्मों के नाच-गाने पर हंसने और नाक-भौं सिकोडऩे वालों के हीरो खुद ही हिंदी गानों ने ठुमके लगा रहे हैं। यह छोटी घटना नहीं है। जॉन ट्रैवोल्टा ने स्वयं बताया कि शेखर कपूर ने पानी की स्क्रिप्ट उन्हें भेजी है। वे विचार कर रहे हैं और मुमकिल है कि जल्दी ही फिल्म की शुटिंग के लिए वे भारत आएं। अमेरिका में आईफा के जबरदस्त सफल आयोजन से हालीवुड और हिंदी फिल्मों की दूरियां कम हुई हैं।
        हालीवुड के सिनेमा के गढ़ अमेरिका में तंबू तान कर अपना तमाशा दिखाने का बीड़ा उठाना और उसके लिए दर्शकों को जुटा लेना एक उपलब्धि है। हिंदी की मुख्यधारा की फिल्मों के जरिए यह जारन-पहचान बढ़ रही है। नई कोशिश यह होनी चाहिए कि हिंदी सिनेमा में जारी नए ट्रेंड की फिल्मों का भी कोई समारोह विदेशों में हो,जहां नई किस्म की छोटी फिल्मों का प्रदर्शन और विमर्श हो।


Sunday, May 11, 2014

पुरानी बातचीत : हंसल मेहता

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
फिल्‍मों के इतिहास और फिल्‍मकारों के विकास के अध्‍ययन में रुचि रखने वाले चवन्‍नी के पाठकों के लिए हसंल मेहता का यह इंटरव्यू दिल पर मत ले यार के समय यह इंटरव्यू किया गया था। तब इतनी लंबी बातें कर लेना मुश्‍िकल नहीं था। अब न तो जवाब मिलते हैं और न सवाल सूझते हैं। पढ़ने के बाद फीडबैक अवश्‍य दें। यहां या मेल करें। chavannichap@gmail.com


-     'दिल पे मत ले यार' का आयडिया कब आया?
0     जब मैं 'जयते' बना रहा था उस वक्त बहुत सारी कहानियां दिमाग में थीं. हमारे कुछ लेखक कई सारे विषयों पर सोच रहे थे कि किस तरह की फिल्म बनाई जा सकती है. मुझे आर वी पंडित ने कहा था कि मैं कहानी चुनूं ,जो प्रासंगिक हो, ऐसी कहानी हो जो जिंदगी से जुड़ी हो. उस वक्त शहर की हालत गंभीर थी. खून-खराबा, गैंगवार जौसी चीजें अपने चरम पे थी. उसी वक्त एक आयडिया दिमाग में आया. और 'जयते' की कहानी उभरकर आई. और 'जयते' बना दिया. पर कहीं लगता था कि एक कहानी छूटी हुई है जो अच्छी है. एक समय ऐसा आया जब मैंने सोचा कि उसको लेकर टेलीविजन पर ही कुछ कर दिया जाए. लग रहा था कि टीवी पर जो सस्पेंस, थ्रीलर जौसे प्रोग्राम हैं उन्हीं के मुताबिक ये कहानी ढाल दूं. पर ये किसी में फीट नहीं हो रहा था. एक्शन, आपसी संबंध जौसे पहलुओं का मिश्रण था. सौभाग्यवश ऐसा हुआ नहीं. मैं 1998 में सौरभ शुक्ला के साथ रिश्ते कर रहा था सौरभ हमारे साथ पहली बार काम कर रहा था, पर एक-दूसरे के साथ काम करके मजा आया. हम दोनों ही एक-दूसरे की मानसिकता समझ रहे थे. एक रात जब हम शूट कर रहे थे तो मैंने सौरभ को एक लाइन की कहानी सुनाई और कहा कि मुझे इस पर छोटी फिल्म करने की इच्छा है. सौरभ ने कहा कि मैं लिखूंगा इस कहानी को और तुम्हारे लिए काम भी करूंगा. लेकिन शर्त ये होगी कि यह किरदार मैं करूंगा. मैंने कहा अगर तुम लिखते नहीं तब भी यह तुम्हारे लिए ही सोचा था. सौरभ ने कहा कि विषय तो अच्छा है पर इस पर बहुत काम करना पड़ेगा. और उत्साह में हमलोगों ने स्क्रिप्ट पर काम करना शुरू कर दिया. एक छोटी फिल्म की स्क्रिप्ट तौयार हो गई,जिसे हमने पन्द्रह से बीस लाख में करने का सोचा था. पर हम किसी भी तरह से फिल्म शुरू नहीं कर पाए. धीरे-धीरे लगने लगा कि यह और भी बड़ी फिल्म हो सकती है. फिर मैंने अपने स्कूल के मित्र अजय तुली के साथ कहानी पर बातचीत की. उसने जब कहानी सुनी तो वो भी उत्साहित हो गया. उसने भी कहा कि इस पर बड़ी फिल्म बननी चाहिए. उसी वक्त 'सत्या' हिट हो गई. फिर सोचा कि मनोज और सौरभ को मुख्य किरदारों में रखकर एक अच्छी व बड़ी फिल्म बनाई जा सकती है. अजय ने ही प्रोत्साहित किया कि बड़ी फिल्म ही बनाई जाए. उस वक्त तक ये नहीं पता था कि अजय ही निर्माता होगा. लेकिन अजय की रूचि इस प्रोजेक्ट में बढ़ती चली गई. 98-99 में हमलोगों ने कई सारे निर्माताओं को यह कहानी सुनाई. पर कोई बात नहीं बनी. हम लगातार स्क्रिप्ट पर काम करते रहे. इस जुनून के साथ कि ये फिल्म तो हमें करनी है. पिछले साल मई में एक निर्माता ने अपनी रूचि दिखाई तब तक मनोज से बात नहीं की गई थी. हमने मनोज से भी बात की और उसे कहानी पसंद आई. मनोज ने पूछा इसका निर्माण कौन करेगा. मैंने कहा कि मेरे पास निर्माता है. परंतु आगे चलकर हमें लगने लगा कि जो हम कहना चाहते हैं वो बाहर का निर्माता नहीं समझ पाएगा. हम कुछ ऐसा करने की सोच  रहे थे जो आजतक हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में नहीं किया गया था. इस फिल्म को आप एक दायरे में बांध नहीं सकते. जब कोई निर्माता सुनता था कि थ्रीलर है और वो भी मनोज के साथ तो खुश हो जाता था. पर जब मैं कहता था कि इसमें ह्यूमर भी है तो समझ नहीं पाता था. थ्रीलर और ह्यूमर एक साथ कैसे हो सकता है. कभी मैं कहता था कि इसमें ह्यूमर है पर कॉमेडी नहीं है तो वो इस फर्क को भी नहीं समझ पाते थे. निर्माता पूछते थे कि इसमें रोमांस है, मैं कहता था कि इसमें रोमांस तो है पर 'कुछ कुछ होता है' वाला नहीं. लोगों को समझ में नहीं आ रहा था कि  विषय क्या है? पर हमें समझ में आ रही थी फिल्म, इसलिए हमने सोचा कि इसे हम ही बनाएंगे. हमने अपनी तरफ से कोशिशें शुरू की .पहले मनोज को साइन किया फिर तब्बू को. सौरभ साथ में थे ही. आदित्य श्रीवास्तव को जोड़ा. और इस तरह जनवरी 21 को हमने फिल्म शुरू की. ये एक अजूबा ही था. क्योंकि हमें लग रहा था कि हमारे पास पौसे नहीं हैं तो फिल्म कैसे बनाएंगे. लेकिन वह जनवरी 21 था और आज 1 जुलाई है. हमारी फिल्म तौयार होनेवाली है. शूटिंग और डबिंग पूरी हो गई है. मुझे अभी तक ऐसा लग रहा है जौसे मैं, अभी भी, सपने में जी रहा हूं. कुछ भी सच नहीं लगता.
-     'दिल पे मत ले यार' है क्या?
0     कहानी के बारे में मैं कम बात करना चाहता हूं. कहानी के बारे मैं ये कह सकता हूं कि फिल्म आपका मनोरंजन करेगी. दिलचस्पी आपकी बनी रहेगी और आपको सोचने पर मजबूर भी करेगी. मैं कभी नहीं चाहता हूं कि माइंडलेस फिल्म कॉमेडी हो. वौसी फिल्म नहीं है ये. इसमें हमने कुछ कहने की भी कोशिश की है. इस फिल्म की कहानियत बेजोड़ है. मैंने भी कोशिश की है कि  कहानी ईमानदारी से दर्शकों को कही जाए. दर्शकों को कहानी समझ में आए. आप कई सालों से पाप्युलर सिनेमा देखते आ रहे हैं, लेकिन इसमें कुछ ऐसे तत्व भी डाले हैं जो हमारे सिनेमा में नहीं होता है. जौसे डार्क ह्यूमर है. और जो प्यार और रोमांस की आम धारणा है फिल्मों में, वो टूटेगी . थ्रीलर, रोमांस और कॉमेडी की जो आम धारणा है वो टूटेगी. अगर ये फिल्म दर्शकों को कह पाई जो ये कहना चाहती है तो मैं कह सकता हूं कि इस फिल्म से बहुत सारी नई चीजें देखने को मिलेगी. अगर सफल रही तो एक नया चलन शुरू हो जाएगा.
-     लेकिन आम दर्शकों को जोड़ने के लिए कोई तो बात होगी?
0     हर इंसान के अंदर अपने परिवेश से बाहर निकलने की प्रवृति होती है. कोई छोटे शहर से बड़े शहर को आता है. कोई बडे़ शहर से विदेश जाना चाहता है. हर इंसान ये महसूस करता है कि वो फंसा हुआ है. और वहां से निकलना चाहता है. हर इंसान को लगता है कि वो भंवर में फंसा हुआ है. आम जिंदगी के उतार-चढ़ाव से हर आदमी लड़ता हुआ दिखता है. कहानी हम सबकी है. मानसिक या सामाजिक भंवर को हमने कहानी का रूप दिया. एक प्रवासी की कहानी है. वो कैसे शहर में आता है उसके सपने क्या हैं, और उसके सपने उसे कहां तक ले जाते हैं. ये सीधा-सादा किरदार है जो बातों को बहुत जल्दी दिल पे ले लेता है. कहानी की खासियत ये है कि हर मोड़ पर आपको लगेगा कि अब आगे क्या होनेवाला है.? जौसे-जौसे फिल्म क्लाइमेक्स तक पहुंचेगी आप सोच भी नहीं पाएंगे कि ऐसा होनेवाला था. उत्साह का जो तत्व है वो बहुत मजबूत है इस फिल्म में. कहानी ऐसी है जो दर्शकों को पूरे समय तक बांधकर रखती है. कहानी कहीं भी बंद होती नहीं दिखाई देती.
-     मनोज के किरदार के बारे में कुछ बताइए.
0     वही जो मैंने अभी बताया. इस नायक का नाम रामसरन पांडे है. वो एक छोटे शहर जौनपूर से आया है. बहुत छोटे-छोटे सपने हैं उसके. गौराज में काम करता है. तो सोचता है कि वहां का सुपरवाइजर बन जाएगा. उसकी जिंदगी में एक लड़की आती है और उसे एक नया सपना दे जाती है. उस लड़की के साथ संबंध स्थापित होते-होते कुछ और सपने जुड़ जाते हैं. और उन सपनों का क्या होता है यही कहानी है इस फिल्म की.
-     मासूमियत खोनेवाली बात जो थी वो कहां है?
0     मासूमियत खोनेवाली बात है. मैं इसलिए इसके विषय में बात नहीं कर रहा हूं क्योंकि मैं कहानी के अंदर ज्यादा झांकना नहीं चाहता. मेरे लिए ये ऐसा सफर है जो हर इंसान तय करता है. मैं मुंबई छोड़कर कई सालों तक  बाहर रहा. वो मेरी जिंदगी का एक सफर था. शुरू में एक उमंग लेकर एक सपना लेकर गया. धीरे-धीरे अच्छा होता गया. मैं पौसे भी कमाने लगा. लेकिन फिर वो सपना टूट गया. और मैं वापस आ गया. मुझे लगने लगा कि ये सपना तो मैंने नहीं देखा था. ये अच्छा है, पर बुरा बहुत ज्यादा है. एक अजीब सी भावना थी इसलिए मैं लौट आया. रामसरन पांडे की कहानी भी ऐसी ही है. जो एक सपना लेकर आता है शहर में और वो सपना उसे कहां तक ले जाता है. कहानी में हमने समाज के अलग-अलग तबकों को भी दिखाने की कोशिश की है. मनोज का किरदार प्रवासियों का प्रतिनिधित्व करता है. सौरभ इस शहर का कीड़ा है. जो इसी शहर में पला-बड़ा है. शहर की कमियों को और उससे उत्त्पन्न असमंजस की स्थितियों का वो प्रतिनिधित्व करता है. उसे लगता है कि ऐसा करूंगा तो गलत हो जाएगा, वौसा करूंगा तो भी गलत हो जाएगा. तब्बू उच्च मध्यवर्गीय समाज का प्रतिनिधित्व करती है. किशोर कदम शहर के निगेटिव पहलू का प्रतिनिधित्व करता है. वो गैंगस्टर है. शहर के अलग-अलग तबकों के बीच कैसे संबंध बनते हैं और समय के साथ कैसे उनमें बदलाव आता है उस पर आधारित ये कहानी है.
-     अंतत: आपका नायक कहां पहुंचता है.
0     उसके लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी. मैं अभी उस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता.
-     शहरो में पूंजीवाद के साथ आए अलगावाद(एलियनेशन)ो आपने कहानी का आधार बनाया है ...
0     नहीं ऐसा नहीं है. मैं जरूरत से ज्यादा बौद्धिक स्तर पर भी कहानी को नहीं ले जाना चाहता. मैं सिर्फ एक कहानी कहने की कोशिश कर रहा हूं. मेरे लिए किरदार के साथ जो समीकरण बनते हैं वो अहमियत रखते हैं. अलग-अलग तबके के लोग मिलकर जो समीकरण बनाते हैं वो जरूरी है. गोविंद निहलानी ने एक पार्टी में ही सबको दिखा दिया था. मैं पूरी फिल्म में दिखा रहा हूं. जब ये सारे लोग एकत्रित होते हैं तो अपनी-अपनी जरूरतों के हिसाब से इनके बीच हर पल कुछ न कुछ बदलता रहता है. किसी की भावनात्मक जरूरत है तो किसी की नकारात्मक. समीकरण कैसे बनते हैं कैसे बदलते हैं मेरे लिए वो महत्वपूर्ण है. एलियनेशन, वर्गसंघर्ष जरूरी नहीं है. शहर में आकर वो खत्म हो जाता है.
-     वह समय खत्म हो गया है या सोचने का तरीका बदल गया है?
0     समय भी खत्म हो गया है और सोचने का तरीका भी बदल गया है. तब्बू उच्च मध्य वर्गीय समाज की होते हुए भी जिस तरह से मनोज के साथ मिलती-जुलती है. हकीकत में मनोज उससे प्यार करने का सपना भी देख सकता है . आम व्यावसायिक फिल्मों में हकीकत से परे एक टैक्सी ड्राइवर प्यार भी कर सकता है, पर इसमें ऐसा कुछ नहीं है. इसमें हमने वास्तविकता से जुड़े रहकर बदलते हुए संबंधों को दिखाया है. ये सबसे बड़ी चुनौती भी थी. इसमें हमारे बदलते हुए आदर्श कहीं न कहीं दिखाई देते हैं.
-     कुछ ठोस कहने की कोशिश नहीं की है क्या?
0     मेरे लिए ये कोई वक्तव्य नहीं है. यह एक कहानी है,जिसका आप आनंद उठाएंगे. और जो आपको थोड़ा बहुत सोचने पर भी मजबूर करेगी. इसे देखने के बाद आप अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में झांकना जरूर चाहेंगे. लोग थिएटर अलग-अलग कारणों से जाते हैं. कोई मनोरंजन के लिए जाता है, कोई सूचना के लिए जाता है तो कोई सोचने के लिए जाता है. मेरी यह फिल्म सब के लिए है. मेरे लिए फिल्म एक ऐसा माध्यम है,जहां सारी कलाओं का मिलन होता है. मैंने कोशिश भी यही किया है. शहर की जो अपनी कविता होती है, जिस भाषा का इस्तेमाल शहर में होता है वह इस फिल्म में है. फिल्म में अगर कोई गाली भी देता है तो आपको अपनी बीवी के साथ बौठे फिल्म देखते समय सोचना नहीं पड़ेगा, क्योंकि वह इस शहर के रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है. जिसने कविता का रूप ले लिया है. यह फिल्म शहर की वास्तविक चित्रकारी है. साहित्यिक रूप रखते हुए भी सरल भाषा में कही गई कहानी है.
-     कहीं आम व्यवसायिक फिल्मों की तरह सबको खुश करने जौसी कोई बात तो नहीं?
0     मैं अपने आपको एक ऐसा फिल्मकार मानता हूं जो अपने काम को पूरी निष्ठा के साथ करता है. जब टेलीविजन के लिए काम करता था या जब पहली फिल्म बनाई तो एक बात मैंने सीखी कि दर्शकों से सीधा संपर्क स्थापित करना बहुत जरूरी है. खुश करने का जरिया भी एक तरह से दर्शकों से सीधे जुड़ने का जरिया है. इसलिए अगर आप चर्चित तत्वों के सहारे दर्शकों से जुड़ जाते हैं तो आप पूर्ण हैं. एक जेफरी आर्चर का उपन्यास जिसे ज्यादातर लोग समझते हैं और एक बड़े साहित्यिकार की रचना जिसे बहुत कम लोग समझ सकते हैं. उन दोनों को मिलाने की कोशिश की है. मैं जो कुछ भी कह रहा हूं, उसे थिएटर में सामने बौठे दर्शकों से लेकर पीछे बौठे दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश की है. मेरे लिए यह अलग माध्यम है लोगों से संपर्क स्थापित करने का. मैंने हमेशा माना है कि गाने हमारे फिल्म संस्कृति का अटूट हिस्सा हैं. सत्यजीत रे ने भी इसे बखूबी साबित किया है. उन्होंने अपनी फिल्मों में भी गाने और नृत्य का अच्छा मेल रखा है. जबकि हमने उसे बहुत बुरा रूप दे रखा है. मतलब ये कि गाने चाहिए तो ठोक दो. जबकि गाना या गाने हमारे फिल्म को एक अलग रूप देते हैं. पिछले साल जब 'जयते' फिल्म फेस्टीवल में थी तो मैंने गौर किया कि विदेशी लोग फिल्म पौनोरमा की फिल्मों को छोड़कर 'कुछ कुछ होता है' देखने ज्यादा जा रहे थे. 'कुछ कुछ होता है' के चार शो थे,पर इसमें खड़े रहने की जगह भी नहीं थी. जबकि फिल्म हिट हो चुकी थी और लोगों ने देखी भी थी. इससे मुझे एहसास हुआ कि हमारी फिल्म संस्कृति विकसित है और यह लोगों से सीधा संपर्क स्थापित करती है. इस फिल्म ने लोगों को दिल को छुआ था. अगर मैं ऐसी फिल्म बनाऊं जो मुझे ही समझ में आए तो उसका कोई फायदा नहीं. फिल्म अगर लोगों तक पहुंचने का माध्यम है तो यह समझना जरूरी है कि उन तक कैसे पहुंचा जाए.
-     सब तक पहुंचने मेंे एक तरीका हावी होता है. आप एक लड़की और लड़के को दिखाते हैं तो दर्शकों को पता होता है कि आगे क्या होनेवाला है. ज्यादा से ज्यादा आप उनके संवाद बदल सकते हैं. एक तरह का मानकीकरण होता जा रहा है.
0     मैं इसी स्टंैडर्डाइजेशन या मानकीकरण से बचना चाह रहा हूं. वहीं निर्देशक की तौर पर मेरे लिए चुनौती है. दूसरी चुनौती यह है कि मैं अपने आपको दोहराऊं नहीं. और यह भी ध्यान रखना है कि अलग करते हुए भी ऐसा न हो कि दर्शकों को झटका लगे. मैं मणि कौल जौसी फिल्म नहीं बनाऊंगा. राजकपूर, गुरूदत्त से लेकर मनमोहन देसाई तक सबने हमें कुछ न कुछ दिया है. मैं उनकी बातों को अपनी कहानी में जोड़ने की कोशिश करता हूं. मैंने उन्हीं औजारों का इस्तेमाल करके एक नई चित्रकारी की है.
-     पिछले कुछ सालों में कॉमेडी फिल्मों की एक अलग पहचान बन गई है. हमारे समाज में ह्यूमर निहित है, फिर भी हम उसे फिल्मों तक नहीं ला पा रहे हैं.
0     शुरू से लेकर अब तक हमलोगों ने ह्यूमर का एक फॉर्मूला बनाया है. उस हिसाब से ह्यूमर हमेशा लाउड रहा है. किसी की चड्ढी गिर रही है, कोई नंगा भाग रहा है, कोई चिल्ला रहा है. ... ऐसी चीजों को ह्यूमर कहा जाता है. दुर्भाग्यवश हमलोगों में भी ह्यूमर की कमी है. इतनी दुख भरी जिंदगी जीते हैं कि उसमें ह्यूमर को सम्मिलित नहीं कर पाते हैं. हम जब दारू पीते हैं तो जोर से हंसते हैं. यह एक तरह से अपनी परेशानी को कम करने का तरीका है. पर इसे ही ह्यूमर समझा जाता है. और यही हम दिखाते भी हैं. मैंने तो यहां तक सुना है कि दादा कांेडके अपने सहायकों के साथ खूब दारू पीते थे और बाद में टेपरिकार्डर चालू कर देते थे. दारू के नशे में कही गई बातों को फिल्मों में डाल देते थे. हालांकि यह सुनी हुई बात है. पर इसमें सच्चाई लगती है. क्योंकि जब हम आप शराब के नशे में होते हैं. तो ऐसे ही फालतू की बातें करते हैं. सही ह्यूमर को हम देख ही नहीं पाते. हमने कोशिश की है कि इस फिल्म से आपको कॉमेडी और ह्यूमर के बीच का फर्क समझ आए. फिल्म में आप पेट पकड़कर नहीं हंसेंगे. पर आपके चेहरे पर मुस्कान बनी रहेगी. मुझे उम्मीद है कि धीरे-धीरे लोग इसे भी अपना लेगें. क्योंकि एक वास्तविक स्थिति में ह्यूमर को कैसे दिखाया जाए ये निर्देशक के लिए भी कठिन होता है और लेखक के लिए भी. इस फिल्म की सबसे बड़ी बात यही है.
-     ह्यूमर को ध्यान में रखते हुए हिंदी फिल्मों में कौन सी ऐसी फिल्में हैं,जिसने आपको प्रेरित किया हो?
0     मैं सिर्फ दो फिल्मों का नाम लूंगा - 'जाने भी दो यारो' और 'अमर अकबर एंथनी'. 'अमर अकबर एंथनी' एक मसाला फिल्म थी पर उसका हास्य समय के परे हैं. हालांकि कहना ठीक नहीं होगा पर मुझे राजकपूर की फिल्मों का हास्य थोपा हुआ लगता है. लेकिन फिल्म को इतनी अच्छी तरह से वे समझते थे कि थोपा हुआ हास्य भी खटकता नहीं था. 'चुपके-चुपके' और 'अंगूर' भी अपने आप में कमाल की फिल्म थी. दोनोें ही फिल्मों में हास्य को एक मुकाम पर दिखाया गया है. 'अंगूर' शेक्सपीयर के नाटक का हिंदी रूपांतर था. पर उसमें इतना मजा आएगा यह मौंने सोचा भी नहीं था.
-     क्या आपको यह नहीं लगता कि आप जोखिम मोल ले रहे हैं?
0     ऐसा कुछ नहीं है. मैं मूलत: एक कहानी कह रहा हूं. हास्य जिसका अभिन्न अंग है. मेरा ध्यान न ही रोमांस पर है, न ही थ्रीलर पर है. मैं न तो हीरो पर फोकस कर रहा हूं , न ही हिरोइन पर. क्योंकि ये परंपरागत हीरो-हिरोइन भी नहीं हैं. ये किरदार की कहानी है. और मेरा पूरा ध्यान कहानी को कहने में है.
-     वो क्या चीजें थीं जिसने आपको व्यवस्थित और सुरक्षित जिंदगी से उठाकर यहां ले आया?
0     मुझे आज तक नहीं मालूम कि मैं कैसे यहां आया हूं. मैंने किसी से विधिवत निर्देशन सीखा भी नहीं है. लेकिन जिस दिन पहली बार एक्शन बोला था सेट पर,मुझे लगा था कि मुझे यहीं होना चाहिए था. कह सकता हूं कि मैं भटका हुआ था और अब अपनी दुनिया में हूं. मुझे हमेशा यही लगता रहा कि ये सारी चीजें तो मुझे मालूम है. फिल्में देखता था लोगों से बातें करता था. फिल्मों की प्रशंसा भी करता था. मुझे किताबें पढ़ने की आदत थी. यहां जब आया तो फिल्मों से संबंधित किताबें पढ़ने लगा. शुरू में मेरे सिर के ऊपर से चीजें गुजर जाती थी. सौभाग्यवश यहां जो मेरे मित्र बने उन्होंने मुझे बताया कि मुझे क्या पढ़ना चाहिए. मैं उनसे किताबें लेता था पढ़ता था. पर फिर भी कुछ समझ में नहीं आता था. 'तारकोवस्की' कौन था, मुझे मालूम भी नहीं था. उसकी बातें भी समझ में नहीं आती थी. पर जब सेट पर काम करता था तो मुझे लगता कि मैं सब ठीक कर रहा हूं. धीरे-धीरे काम करते-करते ही विकसित हुआ हूं. पर कह नहीं सकता कि मैं यहां कैसे आया. मेरे उस जिंदगी के दोस्त और परिवार वालोंें ने इस बदलाव के लिए मुझे माफ नहीं किया अभी तक.
-     अभिव्यक्ति के किसी और माध्यम से आप पहले जुड़े हुए थे क्या?
0     नहीं, बिल्कुल नहीं. मुझे सिर्फ एक शौक था कहानी लिखने का. मैं छोटी-छोटी कहानियां लिखता था. मेरे अंदर एक कला थी चीजों को शब्दों में ढालने की. अंग्रेजी में जो कहानियां लिखता था,उससे लोग बहुत प्रभावित होते थे. मैंने अंग्रेजी में कविताएं भी लिखने की कोशिश की थी जिसे आज देखकर बहुत शर्म आती है.मैंने कुछ वर्ष तक शास्त्रीय संगीत सीखने की कोशिश की थी. उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान से. लेकिन इंजीनियरिंग की पढ़ाई के चक्कर में वह भी पूरा नहीं कर पाया. लेकिन जब कभी भी फिल्म देखता था तो मुझे लगता था कि मैं गलत जगह बौठा हूं. अपनी दुनिया से दूर. मैं आज भी असुरक्षित हूं, क्योंकि टेलीविजन में काम करके भी मैंने आर्थिक रूप से अपने आपको सुरक्षित नहीं किया है. लेकिन रचनात्मक तौर पर मैं सुरक्षित महसूस करता हूं. मैं खुश हूं. मैं आज भी अपने पुराने कामों को देखकर भावुक हो जाता हूं.
-     ऐसा कौन सा पड़ाव था,जहां आपने फैसला कर लिया कि अब आपको फिल्मी दुनिया में आ ही जाना है? कोई ऐसी घटना या खास बात?
0     मेरी निजी जिंदगी में एक ऐसा दर्दनाक मोड़ आया था,जिसकी वजह से मैं बाहर पढ़ने चला गया था.वहां टेलीविजन के लिए काम किया और बाकी समय में शादी-ब्याह की शूटिंग करता था. मैंने छोटे-छोटे कदम बढ़ाने शुरू कर दिए थे. मैं अपने मां-बाप से बहुत ज्यादा जुड़ा हुआ था. एक वक्त ऐसा आया जब मुझे लगा कि मैं ऐसा करके उन्हें कष्ट दे रहा हूं. एक जिम्मेवारी का भी एहसास हुआ कि वहां वेे अकेले हैं और यहां मैं फकीरों की जिंदगी जी रहा हूं. जिम्मेवारी के एहसास तले मैंने फैसला किया कि कम्प्यूटर की जिंदगी फिर से शुरू करनी होगी. पर जब यहां आया तो जीटीवी जौसे चौनल आ चुके थे. मैंने बहुत छोटे से कार्यक्रम'खाना-खजाना'से अपनी शुरूआत की. मैंने उस वक्त भी नहीं सोचा था कि मैं एक दिन फिल्म करूंगा. उस दौरान किसी ने सुझाया कि मैं म्यूजिक वीडियो करूं . मैं शायद पहला व्यक्ति था,जिसने म्यूजिक वीडियो बनाया था. हालांकि वह दिखाया नहीं गया. फिर 'यूल लवस्टोरी' आई. लोगों ने काफी प्रशंसा की. इस तरह मैं धीरे-धीरे ऊपर उठता रहा और अपनी महत्वाकांक्षाओं को उसी अनुपात में बढ़ाता रहा.
-     अब जब आ गए हैं. आप किसकी तरह बनना चाहेंगे या कैसी फिल्में करना चाहेंगे?
0     मैं किसी का शिष्य बनना नहीं चाहूंगा. वौसे जब मैं इस इंडस्ट्री में नहीं था,तब भी मुझे गुरूदत्त, गुलजार साहब, महेश भट्ट जौसे लोगों ने प्रेरणा दी है. गुरूदत्त साहब की फिल्मों ने मेरी जिंदगी को झकझोर दिया था. और इस वजह से भी मैं मुंबई से भाग गया. जब बाहर था तो गुलजार साहब की फिल्में वीडियो पर देखता था. उन्होंने मुझे संबंधों को जीना सिखाया है. 'सारांश' ने मुझे जिंदगी का मकसद दिया है. मैं इन सबसे प्रेरित होता रहा हूं, पर प्रभावित किसी से नहीं हुआ. एक पोलिस फिल्मकार हैं किसलोस्की .. उनकी फिल्मों ने भी मुझे वौसे ही छुआ है, प्रेरित किया है.म्ैंने उनकी फिल्म ब्लू कई बार देखी है.
-     कभी ऐसा लगा कि अगर आप सीखकर आए होते इस इडस्ट्री में तो कहीं और से शुरूआत की होती आप ने?
0     नहीं मुझे ऐसा नहीं लगता. यदि सीख कर आया होता तो फिर मैं ऐसा नहीं होता,जौसा हूं. मेरे काम में एक अलग तरह की ताजगी है, एक मासूमियत है. मेरे काम में जो मासूमियत है उसने मुझे अलग पहचान दी है. और मैं कह सकता हूं कि मुझे दूसरी जिंदगी नहीं चाहिए. जिस तरह की जिंदगी जी रहा हूं,उससे मैं बहुत ज्यादा खुश हूं.
-     किसी फिल्मकार ने कहा था कि हर निर्देशक को अपना विषय खुद चुनना चाहिए. आप क्या सोचते हैं?
0     इससे जुड़ी और भी बात होती है ---- जब कोई निर्देशक बाहर के लेखक के साथ काम करता है तो वह विषय उसका हो जाता है. विजय आनंद ने आर. के. नारायण की 'गाइड' को अपने अंदाज में बनाया. उसी तरह मैं भी अपने आपको मानता हूं. अगर मेरी कहानी है तो अच्छी बात है. अगर किसी और कि कहानी पर मैं फिल्म बनाऊं तो यह यकीनन वह मेरी कहानी बन जाती है. वह हम सब की कहानी बन जाती है. मेरी या उसकी नहीं रह जाती. कोरोसावा ने यहां तक कहा था कि एक निर्देशक को लेखक होना बहुत जरूरी है. पटकथा उसे स्वयंं लिखनी चाहिए. इसलिए निर्देशन बहुत सारे आयामों को इकट्ठा करने का भी नाम है. बिल गेट्स ने विंडोज नहीं बनाया था. उसने हूनर को परखकर उसको एक अभिव्यक्ति की दिशा दे दी थी. वहे लोगों तक पहुंचा. निर्देशक का काम भी ऐसा ही होता है. अलग-अलग कलाओं को एक साथ लाकर उन्हें एक दिशा देना यह काम है निर्देशक का. फिल्मकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है. मेरा इसमें भरपूर विश्वास है.
-     सत्यजीत राय ने अपनी बाद की फिल्मोें में सारा काम ख्ुद किया. फिल्म से जुड़े जितने भी विभाग हैं, कैमरा, संगीत, संकलन .. सब कुछ ख्ुद किया. लगभग सारे बड़े निर्देशक के साथ रहा है. ऐसा कितना जरूरी है?
-     मेरा मानना है कि तकनीकी बातों को समझना बहुत जरूरी है. उसमें पटकथा भी है. इसलिए फिल्म के हर भाग को जानना और उसकी बारीकी को समझना बहुत जरूरी है. मैं जब किताबें प़ढ़ता हूं तो निर्देशन से संबंधित कम पढ़ता हूं. सिनेमेटोग्राफी की किताबें ज्यादा पढ़ता हूं. उसके मौेनुअल से सारी चीजें एकत्रित करता हूं.नई मशीन आती है, उसके विषय में पढ़ता हूं. इसलिए मैं हमेशा पूरी तरह से तौयार रहता हूं. मैंने सबसे पहले संपादक(एडीटर) के रूप में काम की शुरूआत की थी. हालांकि मौं झूठ बोला था कि मौं संपादक था,क्योंकि मैं वहां शादी के वीडियो शूट करके ही देता था. फिर भी मुझे संपादन का काम मिलने लगा और मैं उसमें रमता गया. चूंकि इंजीनियर्रिग की पढ़ाई की थी. इसलिए मशीनों से लगाव है. एक बच्चे सा उत्साह मन में उठता है,जब भी नई मशीन देखत हूं.
-     मैंने यह सवाल इसलिए किया कि जौसे-जौसे सत्यजित राय सारा विभाग खुद देखने लगे, वौसे-वौसे उनकी फिल्में कमजोर होती गई. इसलिए लगता है कि यह बहुत जरूरी नहीं है.
0     बिल्कुल सही. एक समय के बाद फिल्मकार का अहम् उससे ज्यादा बड़ा हो जाता है. दिक्कत तकनीक की नहीं है, अहम् की है. उसे लगने लगता है कि सारी चीजें वह खुद ही कर सकता है. अगर ऐसा होता तो आप ही दर्शक भी होते. अगर आप सब कुछ कर सकते हैं तो फिल्म भी देखिए. वास्तविक्ता खत्म हो जाती है और काम में नयापन नहीं रह जाता. मैं जानता हूं कि लाइट कहां रखनी है. पर मैं अपने कैमरामौेन से कभी नहीं कहता. हो सकता है कि वह लाइट कहीं और रखे और मुझे कुछ नया सीखने को मिल जाए. आधी जानकारी खतरनाक होती है. वौसे कैमरा के विषय में मेरी जानकारी को देखते हुए विशाल भारद्वाज ने कहा था कि जब वह काम शुरू करेगा तो मैं कैमरामौन रहूंगा. मैंने उससे कहा था कि काम मत बिगाड़ो,क्योंकि मैं अपने काम से और पढ़-पढ़कर सीखता हूं.
-     सिनेमा की जो स्थिति है, उसे आप किस रूप में देखते हैं? दो-तीन चीजें एकदम साफ दिख रही है.हिंदी फिल्मों के अंतर्राष्ट्रीय बाजार की खेाज चल रही है,इस खेाज में  बड़े मेकर भी शामिल हैं, दूसरी तरफ एक अलग दर्शक है जो कि 'जानवर' और 'जंगल' जौसी फिल्मों को पसंद करता है. कहीं-कहीं बहुत बड़ा दर्शक 'डाकू हसीना' फिल्म को पसंद कर रहा है. इन सबको लेकर एक फिल्मकार के लिए कितनी चुनौती है? कैसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सकते हैं?
0     मेरे लिए एक चीज बहुत जरूरी है.स्पष्ट संकेत मिल रहा है. दो सालों में दर्शकों की संवेदनशीलता नहीं बदलती.हमने उनकी संवेदनशीलता को बहुत आहत किया है. बहुत चोट पहुंचाई है. अब वो दिन नहीं रहे. मतलब हमारे दर्शक चीजों को समझने लगे हैं.े हैं. 'डाकू हसीना' देखनेवाले दर्शकोें का प्रतिशत बहुत कम है. जिसकों हम एक्सपोर्ट या एनआरआई ओरियेंटेड फिल्म बोल रहे हैं, वो यहां भी अच्छी चल रही है. इसलिए चल रही है कि उसमें संवेदना नाम की चीज है.'कुछ कुछ होता है' मेरे लिए आधुनिक परिदृश्य की महत्त्वपूर्ण फिल्म हैै. 'दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे' 'कुछ कुछ होता है' से  बहुत ज्यादा आधुनिक परिदृश्य की प्रतिनिधि फिल्म है.वह आज की क्लासिक फिल्म है.मैं मानता हूं कि इस फिल्म में हमारी संस्कृति का सही प्रतिनिधित्व हुआ है. मैं इसे लौंडमार्क फिल्म मानता हूं . हमारे पारिवारिक सबंध,मां-बेटी के संबंध, रोमांस, हमारे मूल्यों को किस प्रकार अच्छी तरह कहानी में नौरेट किया जाता है, मेरे लिए 'दिलवाले दुलहनिया जाएंगे' उसका एक प्राइम उदाहरण है.और वह बदलती संवेदना की शुरूआत थी. . 'हम आपके कौन!' 'दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे' हमारी बदलती संवेदना के परिचायक हैं. 'कुछ कुछ होता है' उसी चीज को ज्यादा विज्ञापित करते हुए.. .. च्यूंगगम,लॉली पॉप, पेप्सी जेनरेशन- जेनरेशन नेक्स्ट को लेकर ,उनके वौल्यू सिस्टम को लेकर एक कहानी दे दी. लेकिन समस्या क्या है हमारी फिल्म इंडस्ट्री में  कि हम हर सफल चीज को एक फामर््ाूला बना लेते हैं. हम सोचते हैं कि यही है सफलता का फार्मूला. और हर हफ्ते सफलता का नया फार्मूला बनता है और अगले हफ्ते वह टूटता है. तो मेरा सवाल ये है कि फार्मूला क्यों बनाते हो? आप फिल्में बनाइए.अपनी संवेदना को प्रोजेक्ट करते हुए फिल्म बनाइए.जिन चीजों में विश्वास करते हैं, उनको फिल्मों में ढालिए और फिर लोगों को फैसला करने दीजिए कि वह सही है या नहीं है. ईमानदारी से फिल्में बनाइए. फार्मूला का अनुसरण मत करिए. मेरी यह लड़ाई जबसे मैं टेलीविजन में हूं, तब से है. टेलीविजन में भी एक फार्मूला हो गया है. मतलब फार्मूला ड्राइविंग बहुत ज्यादा है. हॉलीवूड में ये बीमारी एक हद तक है लेकिन उनमें जब आप ग्रीन मौन जौसी फिल्में देखते हैं. तो आपको लगता है कि नहीं उम्मीद है. मतलब वेे पूरी तरह से फार्मूला में नहीं घुस गए हैं. हर साल एक फार्मूला टाइप फिल्म आती है और तीन-चार ऐसी फिल्में आती हैं,जो आपको उत्साहित करती है कि हम ऐसी फिल्में क्यों नहीं बनाते हैं. अभी एक फिल्म आई थी सिगरेट लॉबी पर क्या नाम था उसका ... तो हमलोग काफी फार्मूलाबाज हैं. दो साल से यह मिथ टूटता जा रहा कि फार्मूला फिल्म नहीं चलती है. फार्मूला मत बनाओ, फिल्में बनाओ. कोई भी फार्मूला नहीं चलता है. 'दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे' चलना चाहिए. लोगों ने कहा कि डेविड धवन की जो ब्रांड है,,वह कॉमेडी है वो एक तरह की फिल्में बनाता है. अब उनकी 'दीवाना मस्ताना' के बाद कौन सी फिल्में इतनी चली है. आप मुझे बताइए. फार्मूला से दूर हटना पड़ेगा. मेरे लिए संकेत ये है कि फार्मूला से दूर हटो. 'डाकू हसीना'.. हॉरर और सेक्स जो बना रहे उनको भी हमारी सुझाव है कि आप अपना फार्मूला चेंज करो नहीं तो जौसे मिथुन दा की फिल्में एक साल चली थी, अभी वे गायब हो गए. उसी तरह से 'डाकू हसीना' का फार्मूला भी बंद हो जाएगा. हर सेक्सन के लिए फार्मूला बना के रखे हैं वो. थोड़ा दिन तक चलेगा, फिर अपने आप बंद हो जाएगा.
-     तब्बू के बारे में क्या कहना है? तब्बू का रोल और तब्बू का अपना परफार्मेंस और तब्बू कैसी अभिनेत्री हैा?
0 मौ माचिस से जुड़ा हुआ था. माचिस का ट्रेलर और प्रोमो बनाया था. आर बी पंडित और गुलजार साहब के वजह से मैं माचिस के साथ बड़े नजदीक से साथ जुड़ा हुआ था. मैं तब्बू को जानता नहीं था तब, लेकिन मैं तब्बू के काम से बहुत प्रभावित हुआ था. मुझे लगा कि इस अभिनेत्री के साथ काम करना चाहिए. बहुत ज्यादा प्रभावित हुआ था. मुझे उम्मीद नहीं थी कि इतनी अच्छी अभिनेत्री इस पीढ़ी में है. इस फिल्म में कामिया का जो चरित्र बन रहा था.मुझे लगा कि इस देश में और कोई अभिनेत्री इस चरित्र को नहीं समझ पाएगी. समझने के बाद उसे अभिनीत करने के लिए भी प्रतिभा चाहिए. उसके लिए एक समझदारी भी चाहिए. आम फिल्मों में हिरोइन की जो धारणा है यह वौसी हिरोइन नहीं है. तब्बू ने इस चरित्र को कमाल तरीके से निभाया है. इस भूमिका को समझा है. मैंने  अभिनय के जिस स्तर के उम्मीद भी नहीं की थी वह किया है.पता नहीं इस फिल्म के लिए उसे अवार्ड मिले या न मिले लेकिन उसने साबित किया है कि वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर की अभिनेत्री है. एक जमाने में  शबाना आजमी थीं. गॉडमदर से पहले. तब्बू उस स्तर की अभिनेत्री है. वह किसी भी फिल्ममेकर के लिए स्वपन है. मेरे लिए खुशी की बात यह है कि तब्बू न केवल एक अच्छी अभिनेत्री है बल्कि बेहतर इंसान भी है. उसके साथ काम करना बड़ा आसान है. सेट पर कोई तकलीफ नहीं देती है अपने काम के प्रति समर्पित है. सबसे घुलमिल कर काम करती है. मेरे लिए एक अच्छी दोस्ती की शुरूआत भी है. यह मेरे लिए खुशी की बात है कि मेरे टीम में न केवल एक अच्छी अभिनेत्री मिल गई बल्कि एक दोस्त भी मिल गई.
-     मनोज के बारे में बताएं?
0     हमदोनों एक-दूसरे को सात सालों से जानते हैं. हमदोनों ने बुरे दिन देखे हैैं. मनोज के पास काम नहीं था , मेरे पास भी काम नहीं था. मैं 'खाना खजाना' करता था. मनोज उसकी शूटिंग पर आता था खाना खाता था, बौठा रहता था और चला जाता था. हमलोगों ने साथ में बहुत बुरे दिन देखे हैं. एक-दूसरे को पौसे दिए हैं. एक-दूसरे के कपड़े पहने हैं. मेरे कपड़े बड़े होते थे लेकिन वह पहनकर चला जाता था. हमारा ऐसा रिस्ता बना था. हमने सोचा था कि कभी साथ में फिल्म बनाएंगे. हम सपने देखते थे. हर महत्वाकांक्षा आदमी सपना देखता है. हमारे सपने पूरे हो रहे हैं इस फिल्म से. ऐसा नहीं है कि इस फिल्म के लिए मनोज को अलग से लिया कि वह स्टार है. उसके स्टार होने के वजह से ही यह फिल्म बनी है. मनोज के स्टार होने से इसकी मांग बढ़ी है. मैं रामगोपाल वर्मा का आभारी हूं. उन्होंने एक अच्छे अभिनेता को बाजार में बिकने लायक बना दिया. इसकी  वजह से दो दोस्त साथ में फिल्म बना सके. मेरे लिए मनोज के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था. अपनी पीढ़ी में मनोज से अच्छा अभिनेता इस देश में नहीं है. होगा तो कहीं कोने में छिपा होगा. आज की तारीख में मनोज में सारे अभिनेताओं की खूबियां शामिल हैं. मनोज बाहर और भीतर दोनों तरफ से तौयारी करता है. वह चरित्र को व्याखायित करता है. वह सिनेमा के व्याकरण को अच्छी तरह समझ गया है. 'सत्या' के बाद वह सिनेमा का एक्टर हो गया है. सिनेमा के कला और शिल्प दोनों को उसने खूबसूरती से मिला लिया है.
-     फिल्म के संगीत के बारे मेें बताएं?
0     विशाल भी उन्हीं दिनों का मेरा दोस्त है. जब वह 'माचिस' का संगीत तौयार कर रहा था तब मैं उसके साथ था. एक छोटे से कमरे में बौठकर वे संगीत तौयार करते थे. मैं भी उसका हिस्सा था. संगीत तौयार करने के बाद वे मुझे सुनाते थे. गुलजार साहब को सुनाने के पहले तीसरे आदमी के तौर पर मेरी राय लेते थे. विशाल जहां संगीत रचना करते थे वह जगह बहुत दूर थी. तब उनकी पत्त्नी रेखा गर्भवती थी. तब विशाल के पास गाड़ी नहीं थी. मैं ड्राइवर की तरह उसे छोड़ने जाता था और लाने जाता था. हमारे भावनात्मक संबंध रहे हैं. उस समय विशाल के पास स्टिरियो सिस्टम नहीं था. दो गाने तौयार हो गए थे 'छोड़ आए हम वो गलियां' और चपा-चपा. निर्देशकों को उन गीतों को सुनाने के लिए मैं अपना स्टियरियो सिस्टम लेकर विशाल के म्यूजिक रूम में जाता था. यह तो तय ही था कि इस फिल्म का संगीत विशाल ही देगा. विशाल के संगीत के प्रति मेरे मन में आदर भी है. कई बातों पर हमलोगों की असहमति है, लेकिन वह अपने विश्वास पर टिका रहता है. जिद्दी है वह. उसकी जिद से लोगों को तकलीफ भी होती है. लेकिन मुझे इस बात का फकर है कि विशाल अपने विश्वास को लेकर हिलता नहीं है. उसके लिए वह लड़ भी लेता है. ऐसा संबंध मेरे लिए सृजनात्मक रूप से आदर्श है.
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0     इस फिल्म का संगीत विशाल के कैरिअर को नई दिशा देगा. 'माचिस' के बाद अगर विशाल ने किसी कमर्शियल फिल्म का संगीत दिया है तो वह इसी में है. इस फिल्म के गानों को जब भी मैं किसी को सुनाता हूं, हर आदमी एक नई पसंद लेकर आता है. अब मैं ऐसा भम्रित हो गया हूं कि अपनी पसंद तय नहीं कर पा रहा हूं. उसका मतलब यह है कि उसने सबकी पसंद का संगीत तौयार किया है. इस फिल्म का संगीत अगर लोकप्रिय हुआ तो बतौर संगीतकार विशाल के कैरिअर में एक नया मोड़ होगा.
-     फिल्म के गीत
0     गुलजार साहब के साथ काम करना मेरे लिए बहुत मुश्किल है. जिन्हें आप भगवान मानते हैं उनके साथ काम करना या उनके साथ लड़ना मुश्किल होता है. मैं इस चीज से कतराता हूं. मैं गुलजार साहब से कैसे कह सकता हूं कि कुछ गलत जा रहा है. मुझे डर लगता है. गुलजार साहब से मिलता हूं तो मेरी आवाज नहीं निकलती है. मेरी बोलती बंद हो जाती है. हालांकि एक सपना भी है उनके साथ काम करना. इस फिल्म में अलग गीत चाहिए था क्योंकि संगीत फिल्म का हिस्सा है. हमने कई संगीतकारों के साथ काम करने की कोशिश की. इस फिल्म को देखते हुए कुछ पता ही नहीं चलता कि गाने कब चले गए. हमेशा गाने फिल्म के कहानी को आगे ले जाते हैं. एक नया मोड़ देते हैं. इस फिल्म के गीतों के लिए कहानी और गीत के प्रसंग को समझना बहुत जरूरी है. विशाल अब्बास टायरवाला को लेकर आए. उसने पहला गाना लिखा तो मैंने कहा कि कहां थे अभी तक. उसका पहला गीत था 'चल पड़ी' मेरे लिए वह खोज के समान था. अब्बास को मैं इस फिल्म का अतिरिक्त लेखक मानता हूं. उसके गाने फिल्म के हिस्से हैं.
-     टॉकिंग पिक्चर्स
0     टॉकिंग पिक्चर्स हमने एक जरूरत के तौर पर स्थापित किया. यह फिल्म कोई और नहीं बना सकता था. दोस्तों ने मिलकर यह कंपनी शुरू की. हमलोग समान उद्देश्य से प्रेरित हैं. हम अच्छे लोगों के साथ अच्छी फिल्में बनाना चाहते हैं. हम अपनी फिल्मों में कुछ कहना चाहते हैं. हम फार्मूला फिल्मों के बीच अपनी फिल्में बनाना चाहते हैं और उस सफल भी देखना चाहते हैं. आजकल फिल्म बनाने के साथ-साथ उसकी मार्केटिंग, उसका प्रचार पूरी पेकेजिंग पर ध्यान देना पड़ता है. एक खास दृष्टि से हमलोग काम कर रहे हैं. 'दिल पे मत ले यार' सफल हो या न हो हमलोग इसी तरह से फिल्में बनाते रहेंगे.
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अजय तुली स्कूल में मेरे साथ थे. मैं जब से इस इंडस्ट्री में हूं तब से वह मेरा समर्थक और प्रशंसक रहा है. हमेशा मेरे साथ रहा है. हमेशा मेरी मदद करता रहा है. मेरे ऊपर उसका विश्वास था. अनीश से मैं मनोज बाजपेयी के जरिए मिला. हमलोग समान सोच के हैं. कभी-कभी अनीश की सोच समझ में नहीं आती. वह अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं. हमलोग शहरी होने के कारण इन चीजों से हमेशा दूर रहे हैं. हमें अपने जड़ों के बारे में अधिक पता नहीं है. हमें थोड़ा पता है. अजय को बिल्कुल पता नहीं है. अनीश ने आकर हमें संतुलित कर दिया. उसने मिट्टी और सोना में फर्क बताया. अनीश हमारे लिए पिता के समान है. हालांकि उनकी उम्र हमसे ज्यादा नहीं है.
-     नई योजनाएं?
0     नई योजनाओं पर अभी चर्चा करना जल्दबाजी होगी. इसके बाद हमलोग 'नेटुआ' बना रहे हैं. उसके बाद एक फिल्म सौरभ शुक्ला निर्देशित करेंगे. 'डाकू' इस साल के अंत तक दोनों शुरू हो जाएंगे. कनिका और विक्रम तुली हमारे लिए फिल्म निर्देशित करेंगे. हम फिल्म से पौसे कमाकर फिल्मों में डालनेवाले हैं. साल में चार-पांच अच्छी फिल्में बनाने की योजना है.
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आदित्य श्रीवास्तव का जिक्र मैं नहीं कर पाया वे इस फिल्म में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. वे उत्प्रेरक हैं. वह रामसरन के सपनों का उत्प्रेरक हैं. वह उसके पतन का भी कारण बनता है. आदित्य श्रीवास्तव ने हम सबको चौका दिया. उसे लोगों ने अभी तक 'सत्या' में इंस्पेक्टर खाडिलकर के रूप में देखा है. इस फिल्म के बाद उसे बहुत सारी फिल्में मिली. लेकिन सभी में पुलिस इंस्पेक्टर का ही रोल था. उसने सबको मना किया. इस फिल्म के जरिए लोगों को पता चलेगा कि आप अभिनेता को कभी इमेज में नहीं बांध सकते हैं. मेरे लिए वह फिल्म की खास बात है. सौरभ को भी देखकर आप चौकेंगे. मैं मानता हूं कि सौरभ अंतर्राष्टीय स्तर का अभिनेता है. वह भारत का डैनी दवितो है. और मनोज रॉवर्ट डिनोरा है. किशोर कदम मेरे पुराने प्रिय अभिनेता हैं. 'जयते' में मैंने उन्हें रखा था. परेश रावल की भूमिका मैंने उसे सौंपी थी. किशोर ने कभी कहा भी जो लोग मुझे वर्षो से जानते हैं उन्होंने कभी काम नहीं दिया. हंसल मुझे नहीं जानता मगर उसने हमेशा काम दिया. हमारे संबंध बन गए हैं. मेरे लिए किशोर ऐसी प्रतिभा है जिसका अभी उपयोग नहीं हुआ है. मैं उसे यही कहता हूं कि तुम शिक्षित अभिनेता हो लेकिन यह शिक्षा पर्दे पर नहीं दिखना चाहिए. वह कोशिश कर रहा है. किशोर कदम को कला फिल्मों का अभिनेता माना जाता है. उसने 'समर' किया उसने 'कल का आदमी' किया. इस फिल्म में वह इस छवि को तोड़ेगा.
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बाहर की फिल्मों की बातें चल रही है. अगर निर्देशक के तौर पर मुझे विकास करना है तो सिर्फ अपनी कंपनी के काम नहीं कर सकता. मुझे बाहर का काम करना होगा.