Search This Blog

Monday, March 31, 2014

अंकिता के साथ जिंदगी बीतना चाहता हूं- सुशांत सिंह राजपूत

चवन्‍नी के पाइकों के लिए यह इंटरव्‍यू रघुवेन्‍द्र सिंह के ब्‍लॉग अक्‍स से लिया गया है। सुशांत सिंह राजपूत के जीवन में टर्निंग पॉइंट रहा. काय पो चे और शुद्ध देसी रोमांस की कामयाबी ने उन्हें एक हॉट फिल्म स्टार बना दिया. रघुवेन्द्र सिंह ने की उनसे एक खास भेंट
सुशांत सिंह राजपूत के आस-पास की दुनिया तेजी से बदली है. इस साल के आरंभ तक उनकी पहचान एक टीवी एक्टर की थी, लेकिन अब वह हिंदी सिनेमा की सबसे प्रतिष्ठित और लोकप्रिय फिल्म निर्माण कंपनी यशराज के हीरो बन चुके हैं. शुद्ध देसी रोमांस के बाद वह अपनी अगली दोनों फिल्में ब्योमकेष बख्शी और पानी इसी बैनर के साथ कर रहे हैं. उन पर आरोप है कि आदित्य चोपड़ा का साथ पाने के बाद उन्होंने अपने पहले निर्देशक अभिषेक कपूर (काय पो चे) से दोस्ती खत्म कर ली. डेट की समस्या बताकर वह उनकी फिल्म फितूर से अलग हो गए. 
हमारी मुलाकात सुशांत सिंह राजपूत के साथ यशराज के दफ्तर में हुई. काय पो चे और शुद्ध देसी रोमांस की कामयाबी को वह जज्ब कर चुके हैं. वैसे तो इस हॉट स्टार के दिलो-दिमाग को केवल उनकी गर्लफ्रेंड अंकिता लोखंडे ही बखूबी समझती हैं. औरों के सामने वह बड़ी मुश्किल से अपना हाल-ए-दिल बयां करते हैं. लेकिन हम इस मुश्किल काम को करने की कोशिश कर रहे हैं. आप खुद जज कीजिए की इस बातचीत में आप सुशांत को कितना बेहतर जान पाए...

माना जाता है कि यशराज का हीरो बनने के बाद बाजार और दर्शकों का नजरिया आपके प्रति बदल जाता है. क्या वाकई ऐसा होता है?
जब मैं हीरो नहीं भी बनना चाहता था, जब मैं फिल्में देखा करता था, तब मैं यह सोचता था कि यार, यशराज का हीरो बन जाएं, तो क्या बात होगी. ये तो आप समझ ही सकते हैं कि आज मैं कितना अच्छा फील कर रहा हूं. दूसरा, जब मैंने एक्टर बनने के बारे में सोचा, तो मैंने यह तय नहीं किया कि एक दिन मैं टीवी करूंगा, फिर फिल्म करूंगा और एक दिन मैं इनके साथ काम करूंगा, एक दिन उनके साथ काम करूंगा. मेरे दिल में केवल यह बात थी कि एक्टिंग करने में मुझे मजा आता है. तो इसे मुझे बहुत अच्छे से करना और सीखना है. जब मैं थिएटर में कोई प्ले करता था, तो इतना ही एक्साइटेड होता था, मैं इतनी मेहनत और अच्छे से काम करता था. और जब लोग आकर मेरा प्ले देखते थे और तालियां बजाते थे, तो मुझे बहुत अच्छा लगता था. उतना ही अच्छा लगता है, जब आज मेरी दो फिल्में हिट हो चुकी हैं. तो ये तुलना मैं कर ही नहीं सकता कि इसका हीरो, उसका हीरो, टीवी एक्टर बनने के बाद मुझे कैसा लग रहा है. मुझे छह साल से ऐसा ही लग रहा है.

इस बात पर विश्वास नहीं किया जा सकता है, क्योंकि कुछ अचीव करने के बाद इंसान अलग महसूस करता है.
बहुत से लोगों को यकीन नहीं होता, लेकिन ये आपको लगता है न कि एक दिन मैं ये अचीव करूंगा और जब मैं उसे अचीव कर लूंगा, तो मुझे अच्छा लगेगा. लेकिन अगर आपने ऐसा कोई लक्ष्य बनाया ही नहीं है कि मैं एक दिन ये करूंगा, फिर वो करूंगा. मुझे भी नहीं पता कि मुझे जो फिल्में आज मिल रही हैं, वो क्यों मिल रही हैं. जो फिल्में मैं कर चुका हूं और जो आगे कर रहा हूं. वो सारी ऐसी स्क्रिप्ट्स हैं, जिनका हिस्सा मैं बनना चाहता हूं, इसलिए मैं इतना एक्साइटेड हूं. मैं इसीलिए इतना एक्साइटेड हूं कि मैं अगली फिल्म में दिबाकर बनर्जी के साथ काम कर रहा हूं. वो इतने इंटेलीजेंट हैं, इतने अलग तरीके का सिनेमा बनाते हैं, तो उनके साथ मुझे काम करने का मौका मिला. मैं इसलिए एक्साइटेड नहीं हूं कि मैं एक और फिल्म कर रहा हूं और अब टीवी एवं थिएटर नहीं कर रहा हूं. एक्साइटमेंट के अलग-अलग कारण हैं और सेंस ऑफ अचीवमेंट के अलग कारण हैं. आज मैं पांच फिल्में साइन कर लूं और तब मुझे लगेगा कि मैं अच्छा एक्टर हूं. मुझे अपने बारे में नहीं पता. अगर आज मैं एक ही फिल्म कर रहा हूं या थिएटर में मैं एक ऐसा प्ले करूं, जिसे लगता है कि मैं नहीं कर सकता, तो मुझे अच्छा लगेगा.

दिबाकर बनर्जी की फिल्म ब्योमकेश बख्शी के लिए आपको किस तरह की तैयारी की जरूरत पड़ रही है?
मैं हर फिल्म की रिलीज के बाद दो से ढ़ाई महीने का गैप लेता हूं. ताकि अपने अगले किरदार के बारे में हर चीज पढ़ सकूं, समझ सकूं, उसका बैकग्राउंड पता करूं, ताकि जब मैं शूट करने जाऊं, तो मुझे यह कंफ्यूजन न हो कि यार, मैं यह कैरेक्टर नहीं हूं. ब्योमकेश बख्शी हमारे पहले फिक्शनल डिटेक्टिव हैं, जिनकी बत्तीस-तैंतीस स्टोरीज ऑलरेडी हैं, तो ब्योमकेश का नाम लेते ही आपके दिमाग में उसकी एक इमेज बन जाती है. सबने उसे अपने-अपने तरीके से प्रजेंट किया है, तो जब आप उस किरदार के बारे में सोचते हैं, जब स्क्रिप्ट पढ़ते हैं, तो आप महसूस करते हैं कि डायरेक्टर कुछ अलग ही बताने की कोशिश कर रहा है, तो आपने जितना भी होमवर्क किया, वह आप पहले दिन भूल गए. फिर आप तय करते हैं कि चलिए देखते हैं कि क्या होता है.

शुद्ध देसी रोमांस जब आपने साइन की, तो यह खुशी सबसे पहले किसके संग शेयर की थी?
मैंने अंकिता से शेयर किया था. वो बहुत खुश थीं. अंकिता ने सेलिब्रेट किया था. यशराज की फिल्म मिलना और तब मिलना, जब आपकी पहली फिल्म रिलीज न हुई हो और दूसरा, आपने ऑडिशन के जरिए पाई हो. आप पहले ही एक बैगेज के साथ आते हैं कि आप एक टीवी एक्टर हैं. आपको खुद नहीं पता होता है कि टीवी में एक्टिंग करके आपने क्या गलत कर दिया जिंदगी में. और आपसे बोला जाता है कि पिछले बीस साल में तो ऐसा कोई नहीं कर पाया है, तो तुम क्या करोगे? आप समझते हैं कि वो भी सही बोल रहे हैं.

शुद्ध देसी रोमांस में आपने किसिंग सीन किया है. अंकिता को इस पर आपत्ति नहीं थी?
हम सब प्रोफेशनल एक्टर हैं और यह आपके काम का हिस्सा है. जब आप एक्टिंग कर रहे होते हैं, तो एक्टिंग कर रहे होते हैं. आप झूठ नहीं बोल रहे होते हैं. आप उस समय उस किरदार को फील कर रहे होते हैं. वह कर रहे होते हैं, जो वह करता है. इस फिल्म में दिखाना था कि दो किरदारों के बीच इस लेवल की इंटीमेसी है. हम क्या करते हैं कि हमें पर्दे पर यह सब नहीं देखना है. अगर आप आंकड़े उठाकर देखेंगे, तो पिछले बीस साल में सबसे ज्यादा जनसंख्या हमारे देश की बढ़ी है. सबसे ज्यादा बच्चे हमारे हुए हैं. लेकिन हम बात नहीं करेंगे भाई और ना ही टीवी पर दिखाएंगे. अगर आप एक रियलिस्टिक फिल्म में काम करते हैं, तो यह दिखाना पड़ेगा.

अंकिता आपको लेकर पजेसिव रहती हैं. क्या आप भी उन्हें लेकर पजेसिव हैं?
देखिए हम लोग चाहे कुछ भी बोल लें, लेकिन साइकॉलोजिकली हम सब इनसिक्योर्ड हैं. हम लोगों को एक चीज चाहिए होती है- सिक्योरिटी. वह हमें कभी लगता है कि जॉब से आ सकती है, तो हम हर वह काम करते हैं, जो वह जॉब बचाने में मदद करे. कुछ लोगों को लगता है कि किसी रिश्ते से आ सकती है, तो हम उसको पकडक़र रखते हैं. लेकिन साइकॉलोजिकल सिक्योरिटी मिलती नहीं है. यह ह्यïूमन नेचर है. कभी मेरे काम के बीच में अंकिता का पजेसिव नेचर नहीं आता. दूसरी बात कि अगर वह मेरे लिए पजेसिव न हों, तो मेरे लिए चिंता की बात होगी कि अरे यार, ये कैसी लडक़ी है कि मेरे लिए पजेसिव नहीं है. पजेसिव तो होना ही चाहिए. अगर मुझे मेरा काम पसंद है, तो मैं इसे लेकर पजेसिव हूं. अगर यह हाथ से चला गया, तो मेरा क्या होगा. अंकिता के साथ मैं इसलिए हूं या इसलिए जिंदगी बीतना चाहता हूं, क्योंकि वो मुझे अच्छी तरह से जानती और समझती हैं. वह मुझे साइकॉलोजिकली सिक्योर लगती हैं. इसलिए मैं पजेसिव हूं.

आपके हिसाब से परिनीती चोपड़ा और वाणी कपूर में से कौन बेटर एक्टर है?
दोनों में तुलना नहीं होनी चाहिए. दो इंसान, जिनका बैकग्राउंड फिल्म का नहीं है, वह यशराज की फिल्म कर रही हैं, मनीष शर्मा डायरेक्ट कर रहे हैं, तो उनमें कोई तो बात होगी. परिनीती बहुत कॉन्फिडेंट और स्पॉनटेनियस हैं. जब आप उनके साथ एक्ट कर रहे होते हैं, तो आपको इतना पता होता है कि अगर आप बीच में इंप्रॉवाइज भी करेंगे, तो वह उसी पर रिएक्ट करेंगी. वह उस लेवल तक तैयार रहती हैं. परिनीती के साथ एक्शन-रिएक्शन पर खेलते हैं. वाणी की बात करें, तो उनकी बिल्कुल ही फॉर्मल ट्रेनिंग नहीं है. थिएटर नहीं किया, टीवी नहीं किया है. जब मैं पहली बार टीवी में काम करने गया था, तो मुझसे लाइन नहीं बोली जा रही थी. कैमरा सामने रखा था, मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं. मुझे लगा कि वाणी के साथ भी ऐसी प्रॉब्लम होगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. उन्हें सारी लाइनें याद थीं. वह घबराई नहीं. ये चीजें मुझमें नहीं हैं. मैंने बहुत मेहनत की, तब जाकर आज इस तरह की स्पॉनटेनिटी लाने की कोशिश कर पाता हूं.

आदित्य चोपड़ा के साथ पहली मीटिंग याद है?
बिल्कुल याद है. उसे कौन भूल सकता है. जब मैं उनसे मिलने गया, तो शुरू में कुछ समय तक मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था. मैं उन्हें सिर्फ देख रहा था. ऐसे पल में, आप खुद को यह समझा रहे होते हैं कि यह सब सच में हो रहा है. फिर धीरे-धीरे आवाज सुनाई पडऩे लगती है. उन्होंने शुद्ध देसी रोमांस के बारे में कहा. उन्होंने मेरा काम देखा है पहले और उनको लगता है कि मैं एक अच्छा एक्टर हूं. लेकिन उन्होंने कहा कि अंतिम फैसला राइटर जयदीप वर्मा और डायरेक्टर मनीष शर्मा लेंगे. आपको ऑडिशन देना पड़ेगा. मेरे लिए इतना ही बहुत था.

आपको आदित्य चोपड़ा कैसे इंसान लगे? उनके व्यक्तित्व को आप कैसे परिभाषित करेंगे?
वह बहुत अच्छे फिल्ममेकर हैं. उन्हें पता है कि वह क्या कर रहे हैं. उनके दिमाग में क्लैरिटी है कि उन्हें क्या काम चाहिए. वह समझते हैं कि कौन कितना काबिल है और क्या कर सकता है. और अगर कोई अपने आपको काबिल समझता है और उसकी पोटेंशियल ज्यादा है, तो उसको रियलाइज करवाना कि तुम्हारी पोटेंशियल इसलिए ज्यादा है और ये करो, तो और भी ज्यादा हो जाएगा. इतना सपोर्टिव हैं. आप दूर की देख सकते हैं. आप वो चीजें सोच सकते हैं, जिसकी आम तौर पर लोग कल्पना भी नहीं कर पाते उस समय में.

क्या यह कह सकते हैं कि टीवी में आपकी मार्गदर्शक एकता कपूर थीं और अब फिल्म में आदित्य चोपड़ा हैं?
देखिए, हर बात घूम-फिर कर यहां आ जाती है कि आप कैमरे के सामने क्या करते हैं. अगर मैंने कैमरे के सामने अच्छी एक्टिंग करना बंद कर दी, तो फिर कोई भी आपको काम नहीं देगा. चाहे वह आपका मेंटर हो या कोई भी हो. मैं बहुत लकी हूं कि मैं इनके साथ काम कर रहा हूं. लेकिन वहीं, कल इस चीज को मैं हल्के से लेने लगूंगा कि चलो, ये लोग मुझे बैक कर रहे हैं, तो मैं बैठकर रिलैक्स करने लगूं, तो ऐसे काम नहीं चल सकता.

क्या आज आदित्य चोपड़ा के साथ आपके ऐसे संबंध हैं कि आप फोन उठाकर उनसे राय ले सकते हैं?
जी हां, बिल्कुल. उन्होंने खुद कहा है कि यशराज की फिल्म हो या बाहर की फिल्म, सारा डिसीजन तुम्हारा होगा. अगर तुम मुझसे पूछना चाहते हो कि सर, क्या करना चाहिए, तो वह तुम मुझसे कभी भी पूछ सकते हो. लेकिन मैं तुम्हें कभी नहीं कहूंगा कि ऐसा करो या ऐसा मत करो. मैं उनसे राय लेता हूं.

फराह खान की फिल्म हैप्पी न्यू ईयर में अंकिता काम करने वाली थीं, लेकिन अब वो उसका हिस्सा नहीं हैं. क्या वजह रही?
बातें चल रही थीं. बहुत सी चीजें थीं, जो वर्कआउट नहीं हो सकीं. काय पो चे से लेकर अब तक मेरे साथ पच्चीस फिल्मों की बातें चलीं, लेकिन चीजें वर्कआउट हुई नहीं. तो बातें होती रहती हैं.

Saturday, March 29, 2014

फिल्‍म समीक्षा : यंगिस्‍तान


नई सोच की प्रेम कहानी

-अजय ब्रह्मात्मज
    निर्माता वासु भगनानी और निर्देशक सैयद अफजल अहमद की ‘यंगिस्तान’ राजनीति और चुनाव के महीनों में राजनीतिक पृष्ठभूमि की फिल्म पेश की है। है यह भी एक प्रेम कहानी, लेकिन इसका राजनीतिक और संदर्भ सरकारी प्रोटोकोल है। जब सामान्य नागरिक सरकारी प्रपंचों और औपचारिकताओं में फंसता है तो उसकी अपनी साधारण जिंदगी भी असामान्य हो जाती है।
    देश के प्रधानमंत्री का बेटा अभिमन्यु कौल सुदूर जापान की राजधानी टोकियो में आईटी का तेज प्रोफेशनल है। वहां वह अपनी प्रेमिका के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहता है। वह पूरी मस्ती के साथ जी रहा है। एक सुबह अचानक उसे पता चलता है कि उसके पिता मृत्युशय्या पर हैं। अंतिम समय में वह पिता के करीब तो पहुंच जाता है, लेकिन अगले ही दिन उसे एक बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी जाती है। पार्टी की तरफ से उसे पिता का पद संभालना पड़ता है। इस कार्यभार के साथ ही उसकी जिंदगी बदल जाती है। उसे नेताओं, अधिकारियों और जिम्मेदारियों के बीच रहना पड़ता है। वह अपनी सहचर प्रेमिका के साथ पहले की तरह मुक्त जीवन नहीं जी पाता।
    जिम्मेदारी मिलने पर अभिमन्यु कौल स्थितियों के चक्रव्यूह में फंसने पर हारता नहीं है। वह अपने युवा अनुभव और सोच से देश की राजनीति को नई दिशा देता है। साथ ही दवाब में आने के बावजूद निजी जिंदगी में भावनाओं और प्रेमिका से समझौता नहीं करता। वह भरोसेमंद अधिकारी अकबर की मदद से नीतिगत तब्दीलियां लाता है।
    निर्देशक सैयद अफजल अहमद ने सर्वथा नए विषय पर फिल्म सोची है। उन्होंने राजनीतिक पृष्ठभूमि की इस प्रेम कहानी के अंतर्विरोधों को रेखांकित किया है। हमें पता चलता है लकीर के फकीर बने सिस्टम की चूलें हिलने लगी हैं। पारंपरिक राजनीति की साजिश में अभिमन्यु नहीं घबराता। वह कमान अपने हाथों में ले लेता है और पिता के करीबियों को चौंकाता है। ‘यंगिस्तान’ देखते हुए इंदिरा गांधी-राजीव गांधी या राहुल गांधी की भी याद आ सकती है, लेकिन यह फिल्म अलग स्तर और आयाम की है।
    ‘यंगिस्तान’ फारुख शेख की आखिरी फिल्म है। उनकी सहजता दर्शनीय है। वे न केवल अभिमन्यु कौल के दाएं हाथ के रूप में फिल्म में मौजूद हैं, बल्कि फिल्म के लिए भी दायां हाथ बन जाते हैं। वे जैकी भगनानी के परफॉरमेंस में पूरी मदद करते हैं। यह फिल्म उनके लिए भी देखी जा सकती है। जैकी भगनानी ने अभिमन्यु कौल के जीवन में आए परिवर्तन और द्वंद्व को पकडऩे की कोशिश की है। उनका अभिनय परिष्कृत हुआ है। उनकी प्रेमिका के रूप में नेहा शर्मा के हिस्से में कुछ खास नहीं था। वह अपनी भूमिका निभा भर ले जाती हैं। फिल्म के सहयोगी किरदारों में अपरिचित कलाकार फिल्म का प्रभाव बढ़ाते हैं। उसके लिए फिल्म के कास्टिंग डायरेक्टर को बधाई दी जा सकती है।
    ‘यंगिस्तान’ नई सोच की ताजा फिल्म है। फिल्म की आंतरिक कमियां हैं, लेकिन यह प्रयास सुखद है कि फिल्म की जमीन नई है।
अवधि- 133 मिनट
***तीन स्टार






फिल्‍म समीक्षा : ओ तेरी

फिल्म रिव्यू
रोचक विषय का मखौल
ओ तेरी
-अजय ब्रह्मात्मज
    उमेश बिष्ट की ‘ओ तेरी’ देखते हुए कुंदन शाह निर्देशित ‘जाने भी दो यारो’ की याद आ जाना स्वाभाविक है। उसी फिल्म की तरह यहां भी दो बेरोजगार युवक हैं। वे नौकरी और नाम के लिए हर यत्न-प्रयत्न में विफल होते रहते हैं। अखबार की संपादिका अब चैनल की हेड हो गई है। ‘ओ तेरी’ में भी एक पुल टूटता है और एक लाश के साथ दोनों प्रमुख किरदारों की मुश्किलें बढ़ती हैं।
    अगर ‘ओ तेरी’ आज के सामाजिक माहौल की विसंगतियों को ‘जाने भी दो यारो’ की चौथाई चतुराई और तीक्ष्णता से भी पकड़ती तो 21 वीं सदी की अच्छी ब्लैक कामेडी हो जाती। लेखक-निर्देशक इस अवसर का इस्तेमाल नहीं कर पाते। उन्होंने अपनी कोशिश में ‘जाने भी दो यारो’ का मखौल उड़ाया है। फिल्म के प्रमुख किरदारों में पुरानी फिल्म जैसी मासूमियत नहीं है, इसलिए उनके साथ हुए छल से हम द्रवित नहीं होते। जरूरी नहीं है कि वे दूध के धूले हों लेकिन उनके अप्रोच और व्यवहार में ईमानदारी तो होनी ही चाहिए।
    पुलकित सम्राट और बिलाल अमरोही दोनों प्रमुख किरदारों को जीने और पर्दे पर उतारने की कोशिश में असफल रहे हैं। समस्या उनकी एक्टिंग से अधिक उनके चरित्रों की है। अगर चरित्र सुगठित नहीं हो तो होनहार और प्रतिभाशाली एक्टर भी कोई प्रभाव नहीं दिखा पाते। ‘ओ तेरी’ के साथ यही हुआ है। किरदारों के नाम पर गढ़े गए कैरिकेचर की भूमिकाओं में अनुपम खेर, मुरली शर्मा और मंदिरा फिल्म का असर हल्का करते हैं। अन्य किरदारों के साथ भी यही दिक्कत रही है।
    ‘ओ तेरी’ एक रोचक विषय पर बनी अधकचरी फिल्म है।
अवधि- 107 मिनट

* एक स्टार

Friday, March 28, 2014

फिल्‍म समीक्षा : ढिश्‍क्‍याऊं

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
शिल्पा शेट्टी के होम प्रोडक्शन की पहली फिल्म 'ढिश्क्याऊं' पूरी तरह से क्राइम और एक्शन पर टिकी है। सनमजीत सिंह तलवार के लेखन-निर्देशन में बनी यह फिल्म मुंबई के अंडरव‌र्ल्ड को एक नए अंदाज में पेश करने की कोशिश करती है। इस बार अंडरव‌र्ल्ड को सरगना हमेशा की तरह कोई मुंबईकर नहीं है। अमूमन हम देखते रहे हैं कि सारी लड़ाई मुंबई के खास संप्रदायों से आए अपराधियों के बीच होती है।
आदर्शवादी पिता के साथ रहते हुए विकी घुटन महसूस करता है। हमेशा महात्मा गांधी की दुहाई देने वाले विकी के पिता की सलाहों को अनसुना कर अपराधियों की राह चुन लेता है। बचपन की चंद घटनाओं से उसे एहसास होता है कि यह वक्त आदर्शो पर चलने का नहीं है। वह बचपन से ही गैंगस्टर बनना चाहता है। बचपन में ही उसकी मुलाकात अपराधी टोनी से होती है। टोनी पहली शिक्षा सही देता है कि कोई मारे तो उसे पलट कर मारो। इस शिक्षा पर अमल करने के साथ ही विकी खुद में तब्दीली पाता हे। टोनी उसके बारे में कहता ही है कि वह ऐसा छर्रा है, जो ट्रिगर दबाने पर कारतूस बन कर निकलेगा।
'ढिश्क्याऊं' एक भटके हुए युवक के सपनों के साथ दोस्ती की भी कहानी है। दोस्ती में पड़ गई फांक का अंजाम खतरनाक और जानलेवा हो सकता है। 'ढिश्क्याऊं' में अपराध की रहस्य कथा बुनती है। इस कथा में टोनी, गुजर, रॉकी, खलीफा ओर लकवा हैं। लेखक-निर्देशक ने इस रहस्य कथा का रोचक शिल्प नहीं चुना है। हर बार लकवा और विकी के संवाद से नए दृश्य आरंभ होते हैं,जो कुछ दृश्यों के बाद रोचक नहीं रह जाते। हालांकि लकवा के किरदार की वजह से दिलचस्पी बनी रहती है।
विकी कारतूस की भूमिका में हरमन बावेजा ने पिछली छवि को तोड़ते हुए रफ और टफ गैंगस्टर को आत्मसात करने का भरसक प्रयास किया है। कुछ दृश्यों में वे इस तब्दीली के प्रति आश्वस्त भी करते हैं, लेकिन हीरो इमेज के लिए कथित रूप से जरूरी गाने और रोमांस की पैबंद से अंतिम प्रभाव कमजोर होता है। टोनी और रॉकी की भूमिका में प्रशांत नारायण और आनंद तिवारी ने भरपूर योगदान किया है। सनी देओल अपने हिस्से की जिम्मेदारी बखूबी निभाते हैं। उनकी वजह से 'ढिश्क्याऊं' की रोचकता बढ़ जाती है। इस फिल्म के स्टार वैल्यू सनी देओल ही हैं। मुख्य विलेन की भूमिका में सुमित निझावन प्रभावी लगे हैं।
फिल्म में संवादों और संवाद अदायगी पर विशेष ध्यान दिया गया है। आम दर्शकों को ये संवाद पसंद आ सकते हैं।
अवधि- 119 मिनट

दरअसल : चौदहवीं का चांद की स्क्रिप्ट

दरअसल ़ ़ ़
-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले हफ्ते इस स्तंभ में फिल्मों की स्क्रिप्ट की किताबों की चर्चा की गई थी। प्रकाशकों को लगता है कि यह लाभ का धंधा नहीं है। कविता,कहानी और अन्य विषयों पर घोषणा के मुताबिक 500-1000 प्रतियां छाप कर संतुष्ट होने वाले प्रकाशकों का मानना है कि स्क्रिप्ट के खरीददार नहीं होते,जबकि छात्रों,लेखकों और शोधार्थियों की हमेशा जिज्ञासा रहती है कि उन्हें फिल्मों की स्क्रिप्ट कहां से मिल सकती है। फिल्में देखना और स्क्रिप्ट पढऩा रसास्वादन की दो अलग क्रियाएं हैं। हमें स्क्रिप्ट के महत्व को समझना चाहिए। फिल्मकारों को भी इस दिशा में ध्यान देना चाहिए। विदेशों में ताजा फिल्मों की स्क्रिप्ट भी ऑन लाइन उपलब्ध हो जाती है। इस साल ऑस्कर से सम्मानित सभी फिल्मों की स्क्रिप्ट आसानी से पढ़ी जा सकती हैं। भारत में नई तो क्या पुरानी फिल्मों की स्क्रिप्ट भी अध्ययन और शोध के लिए नहीं मिल पातीं।
    दिनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी के संपादन में ‘चौदहवीं का चांद’ की स्क्रिप्ट प्रकाशित हुई है। इसे ओम बुक्स के स्पॉटलाइट और विनोद चोपड़ा प्रोडक्शन के सहयोग से छापा गया है। विनोद चोपड़ा प्रोडक्शन पिछले कुछ सालों से यह नेक कार्य कर रहा है। इसके तहत गुरूदत्त की फिल्मों की स्क्रिप्ट प्रकाशित की जा रही हैं। राजकुमार हिरानी की मुन्नाभाई सीरिज की फिल्मों की स्क्रिप्ट आ चुकी हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि यशराज फिल्म्स और धर्मा प्रोडक्शन समेत सभी निर्माता इस पहल में जल्दी ही शामिल होंगे। ििदनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी केवल फिल्म की स्क्रिप्ट हरी नहीं पेश करते। वे फिल्म के कलाकारों और तकनीशियनों के साक्ष्य भी इंटरव्यू के रूप मे संकलित करते हैं। इसके साथ ही फिल्म कें संवाद हिंदी के अलावा अंग्रेजी और रोमन में भी अनूदित किए जाते हैं। आज के देशी-विदेशी पाठकों को इस से सुविधा होती है।
    दिनेश रहेजा और जितन्द्र कोठारी ने ‘चौदहवीं का चंाद’ स्क्रिप्ट के साथ वहीदा रहमान,फरीदा दादी,श्याम कपूर,भानु अथैया और बाबूराव पावस्कर के ईटरव्यू प्रस्तुत किए हैं। सभी की बातचीत फिल्म और गुरूदत्त पा केंद्रित है। इन इंटरव्यू में ‘चौदहवीं का चांद’ की मेकिंग से संबंधित रोचक जानकारियां मिलती हैं। पढ कर विस्मित हुआ जा सकता है कि आरंभ में गुरूदत्त को आफताब शब्द का अर्थ नहीं मालूम था। गुरूदत्त जैसे फिल्मकार इस अज्ञान को दूर करते थे। भाषा के जानकारों को वे अपने आसपास रखते थे। हिंदी फिल्मों में हिंदी भाषा के संदर्भ में यह दूरी और अपरिचय आज भी मौजूद है। अंग्रेजी का वर्चस्व बढऩे के बाद यह विडंबना ज्यादा प्रगट होने लगी है। आज के फिल्मकार भाषा समझने की कोशिश नहीं करते।
    दिनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी ने ‘चौदहवीं का चांद’ की भूमिका में गुरूदत्त के प्रभाव का विस्तार से उल्लेख किया है। गुरूदत्त को फिल्म की कहानी पसंद आई थी। यूनिट के सदस्य चाहते थे कि वे स्वयं इस फिल्म का निर्देशन करें। गुरूदत्त को अपनी सीमाएं मालूम थीं। मुस्लिम परिवेश की तहजीब,रूढिय़ों और नफसतों के सही चि।ण के लिए उन्होंने एक सादिक का सहयोग लिया। ‘चौदहवीं का चांद’ हिंदी फिल्मों में प्रचलित छठे-सातवें दशक की लोकप्रिय विधा मुस्लिम सोशल की महत्वपूर्ण फिल्म है। लखनऊ की पृष्ठभूमि में इस फिल्म के किरदारों को रखा गया। लखनऊ के बाशिंदे भी मानते हैं कि उनके शहर को इस फिल्म ने ढंग से पेश किया। दिनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी ने आज के पाठकों के लिए ‘चौदहवीं का चांद’ को इसी संदर्भ में विश्लेषित किया है। यह पुस्तक फिल्म निर्माण संबंधी जानकारियां भी देती है। अंग्रेजी के पाठकों के लिए दोनों लेखकों ने गीतों का सटीक अनुवाद किया है। मूल के करीब रहने की उनकी यह कोशिश संवादों के अनुवादों में भी दिखती है।
चौदहवीं का चांद : द ओरिजनल स्क्रीनप्ले
संकलन,अनुवाद,निबंध और इंटरव्यू : दिनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी
ओम बुक्स इंटरनेशनल

Tuesday, March 25, 2014

मौन तो ध्वनि का प्रतीक है - श्याम बेनेगल

श्‍याम बेनेगल से यह बातचीत दुर्गेश सिंह ने की है। इसका संपादित अंश पिछले रविवार दैनिक जागरण के रविवारी परिशिष्‍ट झंकार में छपा था। श्‍याम बाबू हर सवाल का जवाब पूरी गंभीरता से देते हैं। यह गुण हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में दुर्लभ है। यह इंटरव्यू संविधान से आरंभ होकर उनकी पफल्‍मों तक जाता है।

सहयाद्रि फिल्म्स का दफ्तर दक्षिण मुंबई में बचे खुचे फिल्म दफतरों में से एक है। इमारत कुछ पुरानी सी लेकिन लिफट एकदम नई। भूमिका, अंकुर, निशांत, मंडी और कई सारी फिल्मों के अलावा मुझे उनकी त्रिकाल बेहद पसंद है, सो मुझे भी लिफट करने की जल्दी थी। दो दिन के अंदर मैं लगभग दूसरी बार उनसे मिलने पहुंचा। इस वजह से कि वे उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहां सेहत का नासाज रहना भी दिनचर्या हो जाती है। अपनी कुर्सी के सामने रखी तार से बुनी मेज पर सहयाद्रि फिल्म्स के लेटर पैड पर पेपरवेट घुमाते हुए वे एकदम स्वस्थ लगते हैं और कहते हैं:
फिल्म, टीवी, विज्ञापन कहां से प्रारंभ होना चाहिए। मैं अंग्रेजी-हिंदी दोनों में बात कस्ंगा। मैं उनके चश्मे को देख रहा था छूटते ही कह दिया जी-जी। ये जी के पीछे की कहानी उस समय याद आई जब उनसे मिलने की खुशी को जींस की दोनों जेबों में होल्ड किए सीढिय़ां उतरते वक्त दरबान ने टोका- मिल लिए श्याम बाबू से। तब भी मैंने कहा था जी और मन में सोचा सब श्याम बाबू ही कहते हैं।
वे कहते हैं ये तब की बात है जब मैं राज्यसभा का सदस्य था। मेरे ख्याल से साल 2007 का समय था। ठीक उसी समय लोकसभा और
राज्यसभा दोनों चैनल लॉन्च हुए थे। एक बार मैं राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी साहब से मिला। हमने चाय पी, गपशप की और उन्होंने कुछ करने को कहा। उनकी तरफ से मुझे एक ब्रीफ दी गई कि हम कुछ ऐसा करें जिससे संविधान के बारे में लोगों को पता चल सके। संविधान बना कैसे था। छह साल बाद जब मैं राज्यसभा से रिटायर हुआ तब मैंने इस पर काम करने का सोचा क्योंकि जब आप
राज्यसभा सदस्य होते हैं तब आप चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पाते हैं। जब मैं मुंबई आया और अपने दफतर में बैठा तो सोचा कि क्यों न संविधान पर कोई मिनी सीरिज बनाई जाए। दस एपिसोड में पूरा संविधान दिखाने का खाका भी उसी समय मेरे जेहन में आया लेकिन तब
 ये भी लग रहा था कि संविधान की मेकिंग कोई क्यों देखना चाहेगा?
क्या हम इसे आम भाषा में लोगों को समझा पाएंगे। जटिल था लेकिन किया जा सकता था। मैंने सोचा पैसे के लिए तो कर नहीं रहा और न ही कोई बड़ा बजट मिल रहा है। एक प्रयोग करते हैं। ठीक ऐसा ही प्रयोग मैंने डिस्कवरी ऑफ इंडिया और यात्रा के समय किया था। दोनों विषयों को बनाने का चैलेंज था मेरे सामने। मुझे बुद्ध इस वजह से पसंद है कि उनकी कही गई बातें अगर आपको ज्ञान न लगें तो कई बार आपके सोचने और जीने का और जीवन निर्वहन का जरिया प्रदान करती हैं। यदि मंजिल में भरोसा करते हो तो खुद रास्ता बनो। संविधान की परिकल्पना अगर मेरे दिमाग में कहीं थी तो मुझे उसके प्रजेंटेशन के साथ सतर्कता और प्रयोग करना था।
बड़ा सवाल था कि संविधान बनने के दौरान हुई बहसें रोचक कैसे होंगी?
राज्यसभा में किसी भी मसले पर जब बहस होती थी तो एक गैर राजनीतिक सदस्य के तौर पर कई बार वह बहस मुझे मनोरंजक लगती थी और मुझे लगता था कि अगर आम जनता इन सब चीजों को देख पाए तो अच्छा होगा। उदाहरण के लिए आप मान लीजिए कि जब संविधान बना तो भाषा और मूलभूत अधिकारों के अलावा क्षेत्र विशेष के हितों का ध्यान देने वाली समीति का किरदार क्या रहा होगा
? किस आधार पर राज्य को केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया गया होगा
और राज्य-केंद्र के हितों को ध्यान में रखने वाली कौन सी मूलभूत बातें होंगी?  इन बातों पर सदस्य किस तरह से तर्क देंगे। ये सब तथ्य मेरे दिमाग में थे। मुझे अपने लेखकों अतुल तिवारी और शमा जैदी पर पूरा भरोसा था। इस शो को बनाने में जो सबसे बड़ा चैलेंज था वह रिसर्च से संबंधित था। अगर राज्यसभा मुझे और मेरी टीम को रॉ फुटेज और संविधान समितियों का पूरा विवरण उपलब्ध करवाता तो बात बन जाती। यही बात हमारे लिए वरदान साबित हुई। संविधान बनने के दौरान असेंबली की बहस में 294 सदस्य शामिल थे जिसमें से 155 लोगों ने अपनी बात सदन पटल पर रखी थी। इन सबकी बात हमारे पास रिकॉर्डेड फुटेज के तौर पर आ गई थी। उससे लेखन के साथ ही शो को समझने में भी आसानी हुई। 
शूटिंग में अधिक मुश्किलें नहीं हुई। हमारे पास अभिनेता थे और राज्यसभा चैनल की मंजूरी भी। लेकिन तत्कालीन असेंबली का सेट हमें फिल्मसिटी में ही क्रिएट करवाना पड़ा। क्योंकि अभिनेताओं को राज्यसभा के अंदर सिर्फ फ्री ऑवर में ही शूट करने की मंजूरी थी। इसे टेक्निकल टर्म में विंडो कहते हैं जब पार्लियामेंट में कार्रवाई नहीं होती है। लेकिन अभिनेताओं की मुश्किल ये कि अधिकतर मुंबई के थे और दिल्ली बार-बार जाकर शूट करना उनके लिए संभव नहीं था। कुछ लोग दिल्ली के भी हैं। लेकिन उनकी संख्या कम थी। इस वजह से मैंने निर्णय लिया कि मुंबई में ही शूट करेंगे। शो में एक एंकर का कॉन्सेप्ट भी हम इसी वजह से लेकर आए ताकि संसदीय कार्यप्रणाली को आम जनता को समझाया जा सके। मान लीजिए, सदन की कार्रवाई में क्षेत्रीय भाषा को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो आवश्यक नहीं है कि नतीजा एक ही बार में सामने आ जाए। उस कार्रवाई में बाद के दिनों में क्या हुआ था, इस बात को हम एक एंकर के जरिए ही समझा सकते हैं। इसके बाद हमने एंकर का चयन किया। इस पूरे शो में अगर हमने कोई ड्रामाटिक लिबर्टी ली है तो वह सिर्फ यही है कि पूछे गए सवालों के जवाब में क्या हुआ था, यह हमने तुरंत बता दिया। बाकी एक एक शब्द और ऐक्शन हमने वैसे ही रखा है जैसा कि हमें लिखित या संरक्षित मिला था। चूंकि सब कुछ या बहुत हद तक संरक्षित दस्तावेज हमें मिले थे तो सेंसरशिप का सवाल भी नहीं पैदा होता। आपने अगर पहला एपिसोड देखा होगा तो आपको याद होगा कि संविधान बनने के पहले से मोहम्मद अली जिन्ना मुस्लिमों के लिए अलग संविधान की मांग करते हैं। लेकिन उस समय जवाहर लाल और पटेल एकजुट होकर एक राष्ट्र एक संविधान की बात रखते हैं। जिन्ना अपने समुदाय के लोगों को एक रैली में संबोधित करते हैं जिसके बाद पूरे बंगाल में हिंसा भडक़ जाती है। यहां हमने किसी की बातों को ध्यान में नहीं रखा। ये सारा मामला और मसला डॉक्यूमेंटेड है जिसमें कुछ भी ऐड ऑन या ऐड ऑफ करने की आवश्यक्ता नहीं पड़ी। अभिनेताओं ने भी मेरा कांफिडेंस बढ़ाया। नरेंद्र झा एनएसडी रपर्टरी से है लेकिन जिन्ना को उन्होंने करीने से कैरी किया है। ठीक वैसे ही आप नीरज काबी को देखिए। शिप ऑफ थीसियस देखने के बाद कोई कह नहीं कह सकता कि वे मोहनदास करमचंद गांधी को भी इतनी सहजता से निभा पाएंगे। दिलीप ताहिल को जब हमने संवाद दिए तो वे हमें जवाहर लाल के आस-पास के लगे।
अच्छा अभिनेता सिर्फ वो नहीं होता किरदार जैसा दिखे बल्कि उसको निभा भी पाएं। भूमिका के उदाहरण से मैं अगर आपको समझाऊं तो अमोल पालेकर का किरदार विलेन जैसा लगता है लेकिन वो विलेन है नहीं। स्मिता पाटिल के किरदार की अगर मैं बात करना चाहूं तो उसमें खामोशी है, मौन है और मौन के बिना ध्वनि की नोटिस नहीं ली जा सकती। मान लीजिए मैं और आप इस कमरे में खिडक़ी के पास बैठे हैं और दूर से कोई ट्रेन निकलती हुई दिख रही है। उसकी आवाज को हम सिर्फ उसका चित्र देखकर समझ लेते हैं। इस कमरे में जो धूप आ रही है उसके आस-पास कण मौन को और बढ़ा रहे हैं लेकिन ध्वनि का न होना हम शांति की वजह से ही नोटिस कर रहे हैं। भूमिका मेरी सबसे साइलेंट फिल्म थी लेकिन सबसे अधिक साउंड मेरी उसी तस्वीर में था।
कलयुग देखी होगी आपने? मैं उसको कई और तरीकों से बना सकता था लेकिन मैंने जानबूझकर महाभारत का नजरिया अपनाया। मेरा मानना है कि अगर अच्छी किताबों को आधार बनाकर कोई सिनेमा बनाया जाता है तो आने वाली हर पीढ़ी अपने हिसाब से उसका भावानुवाद कर लेगी। महाभारत एक ऐसा ग्रंथ है जिसकी व्याख्या आम जनमानस अपने अपने हिसाब से अलग-अलग करता है। महाभारत की पूरी कहानी वर्चस्व की कहानी है जो आज के दिन में भी प्रासंगिक है। अगर आप कला के माध्यम से कोई कहानी कह रहे हैं तो उसको माध्यम की मूल अर्हताएं पूरी करनी चाहिए। मोंटाज की एक मशहूर थियोरी है कि कला के माध्यम में ए और बी मिलकर एबी नहीं हो जाते हैं बल्कि उन्हें सी बनना चाहिए। यू हैव टू क्रिएट समथिंग न्यू अदरवाइज इट विल बी नो आर्ट। और मेरा अब तक का अनुभव बताता है कि यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है। हरियाणा में मैं एक बार डॉक्यूमेंट्री शूट कर रहा था। नाचते हुए मोर का एक शॉट लेना था लेकिन पतझड़ के महीने में न बरसात हो और न मोर नाचे। हम रोज कैमरा लेकर अपनी टीम के साथ बैठ जाते। पैक-अप नहीं किया और उम्मीद नहीं हारी। अगली सुबह बरसात हो रही थी और सडक़ों पर मोर नृत्य कर रहे थे। हमने बिना रेडी कैमरा बोले ही ऐक्शन कर लिया। दुनिया की किसी विधा में अगर दस में से नौ चीजें सही है तो दसवीं को आपके पक्ष में जाने से कोई नहीं रोक सकता।
- दुर्गेश

Monday, March 24, 2014

नवाजुद्दीन की औकात क्या है? -ऋषि कपूर

इसे रघुवेन्‍द्र सिंह के ब्‍लॉग अक्‍स से लिया गया है चवन्‍नी के पाठकों के लिए...
कमर्शियल सिनेमा का कोई मजाक उड़ाए, यह ऋषि कपूर को बर्दाश्त नहीं. रघुवेन्द्र सिंह से एक बातचीत में वह अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं रख सके
हिंदी फिल्मों में उम्र के साथ चरित्र बदल जाते हैं. जवानी में हीरो की भूमिका निभाने वाले स्टार भी एक समय के बाद छिटक कर साइड में चले जाते हैं, लेकिन अमिताभ बच्चन के बाद अब ऋषि कपूर ने इस परिपाटी को तोड़ा है. उन्होंने सहयोगी भूमिकाओं को अपने लिए अयोगय साबित किया है और एक बार फिर से बड़े पर्दे पर केंद्र में आ गए हैं. 2010 में हबीब फैजल की फिल्म दो दूनी चार में पत्नी नीतू कपूर के साथ मिलकर ऋषि ने बॉक्स-ऑफिस पर ऐसा धमाल मचाया कि निर्माता-निर्देशक फिर से उनके दरवाजे पर खड़े होने लगे. ऋषि कपूर खुशी के साथ कहते हैं, ''दो दूनी चार के बाद मेरे लिए चीजें बदल गईं. अब मैं कैरेक्टर एक्टर नहीं रहा. मैं ऐसे रोल अब लेता ही नहीं हूं. मेरे रोल मेन लीड के बराबर होते हैं." 
इस वक्त हम ऋषि कपूर के साथ सुभाष घई की फिल्म कांची के सेट पर हैं. तैंतीस साल के बाद कर्ज की यह सुपरहिट जोड़ी इसमें साथ लौट रही है. ऋषि एक भव्य गाने की शूटिंग करने जा आए हैं. फिलहाल, उनके मन में कई भावनाएं उमड़ रही हैं. उनके मन में अपने बेटे की कामयाबी की खुशी है, तो कमर्शियल सिनेमा का माखौल उड़ाने वाले लोगों के प्रति बहुत गुस्सा है. हम बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाते हैं...
आजकल आप एक ओर डी-डे जैसी गंभीर फिल्म कर रहे हैं, तो  दूसरी ओर शुद्ध देसी रोमांस और कांची जैसी हल्की-फुल्की मनोरंजक मिजाज की फिल्में. अब आप ज्यादा एक्सपेरिमेंट मोड में दिख रहे हैं?
एक एक्टर का यही तो काम है ना! मुझे एक्टर का खिताब चाहिए. पहले ऐसे चांस नहीं मिलते थे. अभी चांस मिला है, तो मैंने अपने आपसे प्रॉमिज किया है कि मुझे सभी तरह के किरदार करने हैं. लुक हर फिल्म में अलग होना चाहिए. निगेटिव हो, पॉजिटिव हो, कॉमिक हो, ट्रैजिक हो, कुछ भी हो. मुझमें सब कुछ करने की योग्यता होनी चाहिए. मैं अब कैरेक्टर एक्टर नहीं रहा हूं. मैं फिल्म का सेकेंड हीरो होता हूं और मेरा रोल मेन लीड के बराबर होता है. आप देख लो कि हर पिक्चर में मैं कितने वेरायटी के कैरेक्टर अब कर रहा हूं.

सुभाष घई और आपकी जोड़ी ने कर्ज में इतना धमाल मचाया था. इसके बावजूद दोबारा साथ आने में तैंतीस साल क्यों लग गए?
वो तो सुभाष जानें. तैंतीस साल बाद हम साथ काम कर रहे हैं. मैं सत्ताइस साल का था, जब उन्होंने मेरे साथ ओम शांति ओम गाना शूट किया था. आज मैं 61 साल का हूं और इस तरह का गाना मेरे साथ कर रहे हैं (हंसते हैं). आपको यह दोनों फोटोग्राफ्स एक साथ पाठकों को दिखानी चाहिए.
आपको सेट पर डांस करते हुए देखकर हमें बहुत अच्छा लग रहा है.
मुझे तो बहुत अजीब लग रहा है. मैं 61 साल का हूं. आज भी मैं डांस कर रहा हूं. मैंने सोचा कि साउथ में सभी हीरो एनटीआर, एमजीआर सब सोलह साल की लड़कियों श्रीदेवी से प्यार करते थे. मुझे श्रीदेवी आकर बोलती थी कि सर, मैं एनटीआर, कृष्णा के साथ डांस करती थी, जो मेरी उम्र से डबल के होते थे. आज मैं इस गाने में हेजेल के साथ डांस कर रहा हूं, जो मेरी आधी उम्र की है. मैं इसे सम्मान की तरह देखता हूं. ईश्वर की कृपा रही है हम पर कि उसने ऐसा वक्त भी हमको दिखाया है. लेकिन मैं अपने काम को एंजॉय करता हूं. ये मत सोचना कि मैं काम मजबूरी में कर रहा हूं.

सुभाष घई के साथ इतने साल बाद काम कर रहे है. उनमें क्या बदलाव आए हैं?
उनका पैशन सेम है. बाल थोड़े सफेद हो गए हैं. मेरे बाल भी सफेद हो गए हैं. प्यार और सम्मान हमारा एक-दूसरे के लिए सेम है. पैशन, प्यार और लगन आज भी वही है. वक्त बदल गया है. लेकिन हमारा पैशन सिनेमा के लिए एक ही है. देखिए, अभी मैं यहां से एक दूसरी फिल्म की शूटिंग में जा रहा हूं. दस बजेंगे रात के. लेकिन मजा आ रहा है. ईश्वर कितने लोगों को ऐसा मौका देता है. मैं अपने फैंस को खुश कर पा रहा हूं, यह मेरे लिए बड़ी बात है.

कांची में अपने रोल के बारे में बताएं?
यह सुभाष घई टाइप एक निगेटिव कैरेक्टर है. उनका होता है ना ओवर द टॉप, कॉमेडी-रोमांटिक. इसमें उन्होंने मुझे थोड़ा अलग किस्म का रोल दिया है. यह विजय माल्या से प्रेरित किरदार है. मेरा पूरा गेटअप उन्हीं से लिया गया है. स्टाइलाइज भी वैसे ही किया है. लेकिन यह उनके जीवन की कहानी नहीं है.

क्या आपको अपने किरदारों के लिए तैयारी की जरूरत पड़ती है?
नहीं, हिंदी फिल्मों में ऐसा नहीं होता है. जो लोग रिसर्च की बात करते है, उनको मेरी तरफ से एक झापड़ खींचकर देना. अंडे से बाहर निकले दो दिन होते नहीं है कि अपने आपको एक्टर बोलते हैं और रिसर्च-विचर्स की बात करते हैं. आजकल के नए एक्टर अपने आपको तीस मार खां समझते हैं. उनसे पूछना कि क्या रिचर्स करते हो तुम लोग? और अगर तुमने किया है, तो क्या उखाड़ा है? कमर्शियल सिनेमा में तो आओ. पर्दे पर पहले धंधा करके तो दिखाओ. बातें करते हैं. इन पर मुझे बहुत गुस्सा आता है. बेसिकली हम सब कमर्शियल एक्टर्स हैं. हम सब एंटरटेनर्स हैं. वी प्रोवाइड एंटरटेनमेंट. वी ब्लडी डोंट प्रोवाइड एनी काइंड ऑफ नॉनसेंस. चालीस साल से मैं वही कर रहा हूं, ईश्वर की कृपा से और वही करना चाहता हूं. 
आज भी आप दर्शकों को सरप्राइज कर रहे हैं. यह बड़ी बात है.
वह एक एक्टर का ट्रिक होना चाहिए- सरप्राइज द ऑडियंस. वरना आप बासी हो जाओगे. मैंने 25 साल अपनी जिंदगी में वही काम किया. केवल रोमांटिक हीरो के रोल. आगे देखो, मैं क्या क्या करता हूं. तब मिलते नहीं थे ऐसे कैरेक्टर्स. बनती नहीं थीं ऐसी पिक्चरें. हमको कोई देता नहीं था. आज ऐसा मौका मिल रहा है.

रणबीर भी आपकी तरह सबको सरप्राइज करते रहते हैं. क्या आप दोनों ने मिलकर प्लानिंग की है?
बिल्कुल नहीं. दुनिया जानती है कि मैं उसके क्रिएटिव पहलू में इंटरफीयर नहीं करता. यह एक संयोग भर है.

रणबीर की उड़ान से खुश हैं?
देखो, उसकी मेहनत है बेचारे की. एक बार में एक पिक्चर करता है बस. वो भी देखो रिस्क कितना बड़ा लेता है. अगर वह पिक्चर नहीं चले, तो उसके हाथ से काम जा सकता है. लोग कहेंगे कि अरे यार छोड़ो. इतना गट्स होना चाहिए आपमें. आप एक बर्फी! कर रहे हो और आपने तीन पिक्चरों को ना बोला. वो भी एक राजकुमार हिरानी की पिक्चर, एक रोहित शेïट्टी की और एक अभिनव की. किस एक्टर में इतना दम है यार... मैं इस इंडस्ट्री के बिगेस्ट स्टार की बात भी कर रहा हूं. किसी एक्टर में इतना दम नहीं है कि वह एक्सपेरिमेंटल फिल्म करे. मैं अपनी बात भी कर रहा हूं. कोई सोचे तो सही कि चलो एक हटकर पिक्चर करते हैं, मेरे फैंस को अच्छा लगेगा. वो भी नहीं करते, क्योंकि उनके लिए पैसा महत्वपूर्ण है.

क्या आप रणबीर की चॉइसेस से खुश हैं?
नहीं. उस वक्त तो खुश नहीं था, जब उसने यह सब करना शुरू किया था. सब कहते थे कि क्या हो गया है तेरे बेटे को? मैं भी सोचता था कि क्या हो गया है. आज उसने सबको चुप करवा दिया है. पहले जब सरदार (रॉकेट सिंह सेल्समैन ऑफ द ईयर) बनकर घूमता था, फिर बाल बढ़ाकर रॉकस्टार कर रहा था, फिर गूंगे-बहरे का रोल कर रहा था, तो लोगों को कसीदे कसने में और कमेंट पास करने में तो कुछ जाता नहीं है ना. मुझे भी बुरा महसूस होता था कि यार, मेरा बेटा क्या कर रहा है. आज रणबीर ने सबको बोल दिया है कि शट अप. जस्ट कीप क्वाइट. मैं वही करूंगा, जो मैं करना चाहता हूं.
उस दौरान क्या आप रणबीर को बोलते थे कि ऐसा मत करो?
नहीं, मैंने कभी नहीं बोला. मैंने उसे उसका स्पेस दिया. आज उसने कमर्शियल जोन में आकर ये जवानी है दीवानी करके अपने आपको प्रूव कर दिया है. बर्फी! जैसी पिक्चर ने सौ करोड़ का बिजनेस किया. यह एक बड़ी अचीवमेंट है. ईश्वर की उस पर कृपा रही है. बस, अपना काम मेहनत से करते रहो, हमने अपने बुजुर्गों से यही सीखा है. मैं अपने बच्चे से यही बोलता हूं कि जैसे काम कर रहे हो, वैसे ही करो, लगन से करो.

क्या आरके बैनर फिर से सक्रिय हो रहा है?
आरके के बारे में मेरे से बात मत करो. आरके मेरे हिसाब से बंद हो चुका है. कोई पिक्चर उसमें बनने वाली नहीं है. सब झूठ बोलते हैं कि उसमें पिक्चर बनने वाली है.

क्या आप दोबारा डायरेक्शन में लौटेंगे?
मेरे पास बिल्कुल समय नहीं है. मैं डायरेक्टर गलती से बन गया था. मैं बेसिकली एक एक्टर हूं. फिल्ममेकिंग मेरा पैशन नहीं है.

नए कलाकारों में आपको किसका काम अच्छा लगता है?
मुझे इरफान खान बहुत अच्छे लगते हैं. बहुत अच्छे इंसान भी हैं. वह फाइन एक्टर हैं. अर्जुन रामपाल ने भी बहुत इंप्रूव किया है. मेरे हिसाब से सुशांत सिंह राजपूत, आयुष्मान खुराना और अर्जुन कपूर अच्छा काम करते हैं. मैं उन्हीं के बारे में बोल सकता हूं, जिनके साथ काम किया है.

किस निर्देशक का काम आपको पसंद है?
अनुराग कश्यप की फिल्म देखी है गैग्स ऑफ वासेपुर. अच्छी लगी थी. थोड़ी स्लो और लंबी थी. उनकी और कोई पिक्चर नहीं देखी. सुना है कि वह अच्छी पिक्चरें बनाते हैं.
नवाजुद्दीन पर भड़के ऋषि कपूर 
"मैंने कहीं पढ़ा कि नवाजुद्दीन (सिद्दिकी) नाम के कोई एक्टर हैं, उन्होंने कुछ उल्टा-सीधा कहा है कि रोमांटिक हीरोज रनिंग अराउंड द ट्रीज. उनके बाप-दादा भी नहीं कर सकते हैं ऐसा काम. वो खुद तो क्या करेंगे. इट्स वेरी डिफिकल्ट टू ब्लडी सिंग सॉन्ग्स एंड रोमांस द ब्लडी डैम हीरोइन. डोंट थिंक्स इट्स ईजी. तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ऐसा कहने की? तुम्हारी औकात क्या है कि तुम किसी में इंसपिरेशन डालो. तुम हो कौन यार? तुम कमेंट क्या पास करते हो कि व्हाट इज ग्रेट अबाउट डूइंग दैट? आपको पता है कि यह करने में क्या हुनर चाहिए होता है? कभी शाहरुख खान से पूछना, सलमान से पूछना, कभी अक्षय कुमार से पूछना, कभी जितेन्द्र से पूछना, राजेश खन्ना तो रहे नहीं. बच्चन साब से पूछना... गाना गाना या रोमांस करना आसान काम नहीं है हिंदी फिल्मों में. मेरे दोस्त, मेरे अजीज, मेरे जूनियर नवाजुद्दीन शाह (सिद्दिकी) को यह पता नहीं. और उनको ऐसी गलत बात बिल्कुल नहीं बोलनी चाहिए. इट्स टेक्स लॉट ऑफ आर्ट, इट टेक्स लॉट ऑफ टैलेंट टू डू दिस. मैं आपके टैलेंट को धुत्कार नहीं रहा हूं. मैंने सुना है कि आप बहुत अच्छे एक्टर हैं. एकाद पिक्चरें आपकी देखी भी हैं, जिसमें आप बहुत एवरेज थे. लेकिन दूसरे जो करते हैं, उसमें बहुत मेहनत लगती है. आपने जिंदगी में वह कभी किया नहीं है और आपको कभी मौका भी नहीं मिलेगा. आप कर भी नहीं सकते. आपकी इमेज नहीं है. आपमें वह टैलेंट नहीं है."

साभार: फ़िल्मफ़ेयर

Sunday, March 23, 2014

दमदार खिलाडि़यों की रोमांचक टक्‍कर

दमदार खिलाडिय़ों की रोमांचक टक्कर
-केप टाउन से लौट कर अजय ब्रह्मात्मज
खतरों के खिलाड़ी की प्रस्तुति भारतीय है। हालांकि यह इंटरनेशनल रियलिटी शो फियर फैक्टर का भारतीय संस्करण है,लेकिन अप्रोच और प्रजेंटेशन में यह भारतीय इमोशन को लेकर चलता है। एक्शन और इमोशन के मेल से खतरों के खिलाड़ी का यह संस्करण हैरतअंगेज होने के साथ भावुक भी है। दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन में इसकी कुछ कडिय़ों की शूटिंग का गवाह होने के बाद यह लिखा जा सकता है कि खतरों के खिलाड़ी का यह सीजन पहले से अधिक रोमांचकारी होगा। खतरों के खिलाड़ी के मेजबान के रूप में रोहित शेट्टी आ गए हैं। भले ही उनकी फिल्में कॉमेडी जोनर की होती हैं,लेकिन उनकी पहचान एक्शन के उस्ताद की है। उनकी कॉमेडी फिल्में भी एक्शन से भरपूर होती हैं। क्लाइमेक्स के चेज सिक्वेंस में जब गाडियां पतंगों की तरह उड़ी हैं तो हंसी के साथ रोमांच की लहर भी दर्शकों को सनसनी देती है। आज से आरंभ हो रहे खतरों के खिलाडी में उनकी मजबानी को देखना आनंददायक होगा। श्र्मीले स्वभाव के रोहित शेट्टी एक्शन करते समय किसी बंधन या सीमा को स्वीकार नहीं करते। अजय देवगन और शाहरुख खान को एक्शन दृश्य समझाने में वे किसी स्टंट एसिस्टैंट की मदद नहीं लेते। उन्हें खुद ही हैरतअंगेज स्टंट करते देखा गया है।
    खतरों के खिलाड़ी में अस बार मुग्धा गोडसे,निकीतन धीर,रणवीर शौरी,एजाज खान,रजनीश दुग्गल,गौहर खान,कुशल टंडन,नूजा गौड़,दयानंद शेट्टी,रोशेल मारिया राव,सलमान युसूफ खान,गुरमीत चौधरी,देबीना बनर्जी,करणबीर वोहरा,टीजे संधु्रडायना उप्पल और गीता टंडन जैसे दमदार प्रतियोगी हैं। इन्हें फिल्म ,टीवी और खेल की दुनिया से चुना गया है। कुछ तो दूसरे रियलिटी शो में रंग जमा कर यहां आए हैं। अभी बताना मुश्किल है कि इनमें से कितने छंट गए हैं और मितनों की सांस स्टंट करते समय उखड़ी। केप टाउन में हुई बातचीत में सभी प्रतियोगियों ने यह स्वीकार किया कि रोहित जबरदस्त तरीके से प्रोत्साहित करते हैं और असंभव स्टंट भी कर देने की हिम्मत भर देते हैं। शूटिंग के दौरान हम ने देखा कि हर बार मुश्किल स्टंट के बारें में अच्छी तरह समझाने के बाद रोहित शेट्टी हर प्रतियोगी से यही कहते थे कि आप इसे कर सकते हैं। उन्होंने कभी किसी को कमजोर या डरपोक नहीं समझा।
    कुछ स्टंट हम ने देखे। उनमें से एक था कि एक टैंक में एक पार्टनर को बांध दिया गया था। उस टैंक में मेढक थे। दूसरे पार्टनर को एक और टैंक से चाभी निकालकर अपने पार्टनर की जंजीर का ताला खोलना था। सुनने में यह आसान सा लगता है न ? पर इतना आसान नहीं था। चाभी वाले दूसरे टैंक में केंकड़े भरे थे,जो काटने के लिए तैयार थे। अस स्टंट में गुरमीत चौधरी और गौहर खान,रणवीर शौरी और निकीतन धीर तथा रजनीश दुग्गल और डायना उप्पल की जोडिय़ों ने हिस्सा लिया। विजेता का नाम हम अभी नहीं बताएंगे। मजा तो तब बाया जब रणवीर ने दस मिनट के बाद बताया कि एक मेढक उनकी पीठ से चिपका बैठा रहा,जिसे वे गीजा टीशर्ट समझ कर नजरअंदाज कर रहे थे।
    ऐसे ही एक स्टंट था आंख बंद कर गाड़ी चलाने का। गाड़ी को उबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरना था। एक विस्फेट भी होना था। विस्फोट से उड़ी घूल में में तो रास्ता बता रहे पार्टनर की आंखों के आगे भी अंधेरा छा गया था। इस स्टंट में रणवीर की अंधी ड्रायविंग काम आई। उन्होंने निकीतन के बताये डायरेक्शन से मंजिल छू ली,जबकि रजनीश और डायना की जोड़ी पिछड़ गई। उन्हें एलिमिनेशन राउंड के लिए जाना पड़ा। इस स्टंट के लिए रोहित ने खुली जीप को 20 फीट की ऊंची और सीधी चढ़ाई पर खुद जीप ड्राइव की। उन्होंने कोई सुरक्षा कवच भी नहीं पहना था।
्    रोहत शेट्टी की जवांमर्दी से इस शो में नई जान आ गई है। सभी प्रतियोगियों ने अपनी हिम्मत में इजाफा किया और जोखिम भरे कारनामों में जान तक का दांव लगाते रहे। दूसरे शो की तरह यहां चुगली और गंदी बातें नहीं थीं। होड़ में शामिल होने और जीतने की तमन्न के बावजूद प्रतियोगियों के बीच कोई दुर्भावना नहीं थी।


Friday, March 21, 2014

फिल्‍म समीक्षा : आंखों देखी

निर्मल भाव की सहजता
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
दिल्ली-6 या किसी भी कस्बे, छोटे-मझोले शहर के मध्यवर्गीय परिवार में एक गुप्त कैमरा लगा दें और कुछ महीनों के बाद उसकी चुस्त एडीटिंग कर दें तो एक नई 'आंखें देखी' बन जाएगी। रजत कपूर ने अपने गुरु मणि कौल और कुमार साहनी की तरह कैमरे का इस्तेमाल भरोसेमंद दोस्ट के तौर पर किया है। कोई हड़बड़ी नहीं है और न ही कोई तकनीकी चमत्कार दिखाना है। 'दिल्ली-6' की एक गली के पुराने मकान में कुछ घट रहा है, उसे एक तरतीब देने के साथ वे पेश कर देते हैं।
बाउजी अपने छोटे भाई के साथ रहते हें। दोनों भाइयों की बीवियों और बच्चों के इस भरे-पूरे परिवार में जिंदगी की खास गति है। न कोई जल्दबाजी है और न ही कोई होड़। कोहराम तब मचता है, जब बाउजी की बेटी को अज्जु से प्यार हो जाता है। परिवार की नाक बचाने के लिए पुलिस को साथ लेकर सभी अज्जु के ठिकाने पर धमकते हैं। साथ में बाउजी भी हैं। वहां उन्हें एहसास होता है कि सब लोग जिस अज्जु की बुराई और धुनाई कर रहे थे, उससे अधिक बुरे तो वे स्वयं हैं। उन्हें अपनी बेटी की पसंद अज्जु अच्छा लगता है।
इस एहसास और अनुभव के बाद वे फैसला करते हैं कि वे अब सिर्फ अपनी आंखों से देखी बातों पर ही यकीन करेंगे। यहां तक कि शेर की दहाड़ भी वे खुद सुनना चाहते हैं। इतना ही नहीं दुनिया की चख-चख से परेशान होकर वे मौन धारण कर लेते हैं। फिल्म के केंद्र में बाउजी हैं, लेकिन परिवार के अन्य सदस्य, नाते-रिश्तेदार और अड़ोसी-पड़ोसी भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। फिल्म किसी खास अंत या क्लाइमेक्स में खत्म नहीं होती। एक मोड़ पर आकर ठहरती है। उसके बाद भी बाउजी की जिंदगी बदस्तूर चलती रही होगी। दिल्ली-6 की गलियों में ठहाकों, ठुमकों और ठसक के बीच।
बाउजी के किरदार को संजय मिश्रा ने इतना सहज और आत्मीय कर दिया है कि किरदार और कलाकार एकमेक हो गए हैं। हिंदी फिल्मों में सालों बाद ऐसा स्वाभाविक अभिनय दिखाया है। बाउजी के चलने, उठने, बैठने, रूठने और मनाने में मध्यवर्गीय सरलता है। संजय मिश्रा ने बाउजी को आत्मसात कर लिया है। उनकी बीवी की भूमिका में सीमा पाहवा बराबर का साथ देती हैं। उनकी झुंझलाहट और प्यार में लगाव है। वह भी अभिनय नहीं करतीं। लेखक-निर्देशक रजत कपूर ने सभी किरदारों के लिए सटीक कलाकारों का चुनाव किया है। कोई भी कलाकार फिल्मी नहीं लगता। प्रसंग, घटनाएं और संवादों में भी फिल्मीपन नहीं है। स्वयं रजत कपूर बाउजी के छोटे भाई के रूप में निखर कर आते हैं। खुद का विस्तार करते हैं।
फिल्म में गीतों के बोल पर ध्यान दें तो कहानी गहराई से उद्घाटित होती है। वरुण ग्रोवर ने 'आंखों देखी' की प्रस्तुति की संगत में गीतों को फिल्मी नहीं होने दिया है। वे शब्दों में नई इमेज गढ़ते हैं।
[अवधि-105 मिनट] 
***1/2 साढ़े तीन स्‍टार

फिल्‍म समीक्षा : रागिनी एमएमएस 2

हॉरर और सेक्‍स का मिश्रण 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
बालाजी मोशन पिक्चर्स की 'रागिनी एमएमएस 2' अपने इरादे में स्पष्ट है। हॉरर और सेक्स के मेल से आम दर्शकों के मनोरंजन के लिए बनी यह फिल्म अपने मकसद में सफल रहती है। निर्देशक भूषण पटेल ने पिछली फिल्म के तार नई फिल्म की कहानी से जोड़ दिए हैं। साथ ही एक अघोषित प्रयोग भी किया है। 'रागिनी एमएमएस 2' में सनी लियोनी स्वयं के किरदार में हैं। इस फिल्म के लिए चुनने के साथ उन्हें उनके अतीत के संदर्भ के साथ पेश किया गया है। अगर निर्माता-निर्देशक 'जिस्म 2' का भी हवाला दे देते तो संदर्भ दमदार हो जाता।
'रागिनी एमएमएस' की घटना से प्रभावित फिल्मकार उस खौफनाक घटना पर फिल्म बनाना चाहता हे। फिल्म के लिए वही उसी शापित बंगले में जाता है। सनी लियोनी अपने किरदार के बरे में जानने-समझने के लिए मेंटल हॉस्पिटल में भर्ती रागिनी से मिलती है। हंसी-मजाक के माहौल में फिल्म की शूटिंग आरंभ होती है। शुरू में सब कुछ सामान्य रहता है, लेकिन कार्तिक पूर्णिमा की रात सब कुछ गड़बड़ होने लगता है। बंगले में बंधी चुड़ैल जाग जाती है और वह एक-एक कर सभी की जान लेती है। लेखक-निर्देशक ने इस बार एक मनोचिकित्सक को भी रखा है, लेकिन दुर्भाग्य से वह फिल्म के क्लाइमैक्स में विज्ञान को भूल तंत्र-मंत्र का ही सहारा लेती है।
सनी लियोनी हिंदी फिल्मों में आने के पहले पोर्न स्टार रही हैं। फिल्म का एक किरदार जब ताने मारने के साथ सनी को छेड़ता है और चुनौती देता है तो वह पोर्नो के लिए उपयोगी 'आह..उह' का प्रदर्शन करती है और चुनौती देती है कि जरा वैसा अभिनय कर के दिखाए। बतौर अभिनेत्री सनी लियोनी की स्वीकृति में अभी तक उनका अतीत आड़े आ रहा है। इस फिल्म में सनी लियोनी ने अपने किरदार के साथ जीने की कोशिश की है। बाकी अपनी छवि के इस्तेमाल में उन्हें कोई हिचक नहीं रही है। हिंदी फिल्मों में ऐसी अभिनेत्रियों की कमी है, जो अपनी देह को लेकर स्वच्छंद और मुक्त हों।
'रागिनी एमएमएस 2' में हॉरर के साथ सेक्स का उत्तेजक मिश्रण है। खौफ और सेक्स के इस मिश्रण को लाइट, साउंड और सोशल इफेक्ट के तकनीक के जरिए रोमांचक और उत्तेजक बनाने की अच्छी कोशिश की गई है। ऐसी फिल्मों के विशेष दर्शक हैं। उन्हें 'रागिनी एमएमएस 2' पसंद आएगी।
[अवधि-119 मिनट] 
**1/2 ढाई स्‍टार

फिल्‍म समीक्षा : गैंग्‍ा ऑफ घोस्‍ट्स

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
सतीश कौशिक को रीमेक फिल्मों का उस्ताद निर्देशक कहा जा सकता है। आम तौर पर वे दक्षिण भारत की फिल्मों की रीमेक निर्देशित करते रहे हैं। इस बार उन्होंने अंकित दत्ता की बंगाली फिल्म 'भूतेर भविष्यत' को हिंदी में 'गैंग ऑफ घोस्ट्स' नाम से बनाया है। हिंदी फिल्म के मिजाज के मुताबिक उन्होंने मूल फिल्म में थोड़ा बदलाव किया है। देश भर के दर्शकों को रिझाने की फिक्र में उन्होंने विषय और प्रस्तुति का गाढ़ापन छोड़ दिया है। फिल्म थोड़ी हल्की हो गई है, फिर भी विषय की नवीनता और सिद्ध कलाकारों के सहयोग से मनोरंजन करने में सफल रहती है।
'गैंग ऑफ घोस्ट्स' भूतों के भविष्य के बहाने शहरी समाज के वर्तमान की कहानी है। मुंबइ में मॉल और मल्टीप्लेक्स कल्चर आने के बाद पुराने बंगले और मिल टूटते जा रहे हैं। उजाड़ बंगलों को अपना डेरा बनाए भूतों की रिहाइश का संकट बढ़ता जा रहा है। ऐसे में भूत संगठित होकर कुछ करना चाहते हैं। 'रागिनी एमएमस-2' की तरह यहां भी एक फिल्म बनती है, जिसमें भूतों का एक प्रतिनिधि ही लेखक बन जाता है। वह अपने समय के किरदारों की भूतियापंथी रचता है।
मूल फिल्म के निर्देशक अंकित दत्ता की आपत्तियों और शिकायतें अपनी जगह माकूल होंगी। सतीश कौशिक ने हिंदी दर्शकों की अभिरुचि के अनुसार थोड़ा बदलाव किया है। सेठ गेंदामल के साथ बीते जमाने के अन्य किरदारों को अच्छी तरह गढ़ा गया है। इसमें समाज के हर तबके के किरदार हैं। सतीश कौशिक ने उनके परिवेश और संवाद के माध्यम से दर्शकों को हंसने की विसंगतियां दी हैं। फिल्म वर्तमान पर कटाक्ष करने के साथ अपने दौर को भी नहीं बख्शती।
अनुपम खेर लंबे समय के बाद अपनी भूमिका के प्रति गंभीर नजर आते हैं। माही गिल ने अतीत की अभिनेत्री के अंदाज के साथ आवाज को भी परफॉरमेंस में अच्छी तरह उतारा है। अन्य भूमिकाओं में राजपाल यादव, असरानी, यशपाल शर्मा आदि समुचित सहयोग करते हैं। मीरा चोपड़ा में नयी नवेली की अनगढ़ता है। जैकी श्राफ और चंकी पांडे ऐसी भूमिकाएं कई बार निभा चुके हैं।
इस फिल्म का गीत-संगीत कमजोर है। वीनस की फिल्म में यह कमी खलती है। पिछले दशकों में उनकी फिल्मों का संगीत दर्शकों को झुमाता रहा है।
अवधि- 128 मिनट

फिल्‍म समीक्षा : लक्ष्‍मी

नागेश कुकुनूर 'हैदराबाद ब्लूज' से दस्तक देने के बाद लगातार खास किस्म की फिल्म निर्देशित करते रहे हैं। बजट में छोटी, मगर विचार में बड़ी उनकी फिल्में हमेशा झकझोरती हैं। 'इकबाल' और 'डोर' जैसी फिल्में दे चुके नागेश कुकुनुर के पास अब अनुभव, संसाधन और स्रोत हैं, लेकिन फिल्म मेकिंग के अपने तरीके में वे गुणवत्ता लाने की कोशिश नहीं करते। 'लक्ष्मी' फिल्म का विचार उत्तम और जरूरी है, लेकिन इसकी प्रस्तुति और निर्माण की लापरवाही निराश करती है।

चौदह साल की 'लक्ष्मी' को उसके गांव-परिवार से लाकर अन्य लड़कियों के साथ शहर में रखा जाता है। रेड्डी बंधु अपने एनजीओ 'धर्मविलास' की आड़ में कमसिन और लाचार लड़कियों की जिस्मफरोशी करते हैं। लक्ष्मी भी उनके चंगुल में फंस जाती है। फिर भी मुक्त होने की उसकी छटपटाहट और जिजीविषा प्रभावित करती है। वह किसी प्रकार उनके चंगुल से बाहर निकलती है। बाहर निकलने के बाद वह रेड्डी बंधु को उनके अपराधों की सजा दिलवाने के लिए भरे कोर्ट में फिर से लांछन और अपमान सहती है। 'लक्ष्मी' एक लड़की की हिम्मत और जोश की कहानी है। कहते हैं नागेश कुकुनूर ने एक सच्ची कहानी पर यह फिल्म बनाई है।
फिल्म के निर्माता नागेश कुकुनूर और सतीश कौशिक हैं। दोनों फिल्म के मुख्य किरदारों में हैं। ऐसा लगता है कि दोनों ने लड़कियों की खरीद-बिक्री पर एक उद्देश्यपूर्ण फिल्म बनाने का फैसला किया और फिर बजट सीमित रखने के लिए स्वयं अभिनय भी कर लिया। दोनों भाइयों (नागेश कुकनूर और सतीश कौशिक) की डील-डौल और भाषा में कोई समानता नहीं है। चौदह वर्षीय लक्ष्मी (मोनाली ठाकुर) के गेटअप और मेकअप पर ध्यान नहीं दिया गया है। जरूरी तो नहीं कि मुद्दे पर बनी फिल्मों में जरूरी तकनीकी पक्षों को नजरअंदाज किया जाए।
इरादे और उद्देश्य में बड़ी होने के बावजूद 'लक्ष्मी' कमजोर फिल्म है। नागेश कुकुनूर और सतीश कौशिक अपनी भूमिकाओं में प्रभाव नहीं छोड़ पाते। छोटी भूमिका में शेफाली शाह अपने किरदार के साथ न्याय करती है। लक्ष्मी को चौदह साल का बताया और दिखाया गया है। मोनाली किरदार की उम्र से बड़ी और बेतरतीब लगती है। 'लक्ष्मी' आर्ट फिल्म के प्रभाव में बनायी गई साधारण फिल्म है।
अवधि- 115 मिनट
*1/2 डेढ़ स्‍टार

Thursday, March 20, 2014

अलग मजा है एक्टिंग में-संजय मिश्रा


-अजय ब्रह्मात्मज
    संजय मिश्रा से राजस्थान के मांडवा में मुलाकात हो गई। वे वहां डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म ‘जेड प्लस’ की शूटिंग के लि सीधे हरिद्वार से आए थे। हरिद्वार में वे यशराज फिल्म्स और मनीष शर्मा की फिल्म ‘दम लगा कर हइसा’ की शूटिंग कर रहे थे। एक अंतराल के बाद संजय मिश्रा फिर से सक्रिय हुए हैं। उन्होंने एक्टिंग पर ध्यान देना शुरु किया है। सुभाष कपूर की ‘फंस गए रे ओबामा’ की कामयाबी के बाद उनके पास अनगिनत फिल्मों के ऑफर ो। उन सभी को किनारे कर वे डायरेक्टर की कुर्सी पर बैठ गए। उन्होंने ‘प्रणाम वालेकुम’ नाम की अनोखी फिल्म का निर्देशन किया। यह फिल्म अभी प्रदर्शन के इंतजार में है। फिलहाल उनकी फिल्म ‘आंखें देखी’ रिलीज हो रही है। इसका निर्देशन रजत कपूर कर रहे हैं।
    डॉ द्विवेदी की ‘जेड प्लस’ में छोटी भूमिका के लिए राजी हो की वजह उन्होंने खुद ही बतायी कि मुंबई आने के बाद सबसे पहले डॉ द्विवेदी के ही सीरियल ‘चाण्क्य’ में पहली बार कैमरे के सामने आने का मौका मिला था। डॉ द्विवेदी ने पिछली फिल्म ‘मोहल्ला अस्सी’ के लिए भी मुझे बुलाया था,लेकिन व्यस्तताओं की वह से उसे मैं नहीं कर सका था। इस बाद मैं यह ऑफर नहीं छोडऩा चाहता था। वैसे ‘आंखों देखी’ भी उनके हाथों से निकल गई थी। रजत कपूर ने समय पर संजय मिश्रा का जवाब नहीं मिलने पर नसीरूद्दीन शाह से बात कर ली थी। वे राजी भसी हो गए थे। तभी संजय मिश्रा को सुधि आई? उन्होंने रजत मिश्रा को कुरेदा तो पता चला कि फिल्म तो नसीर भाई कर रहे हैं। संजय मिश्रा के जोर देने पर रजत ने आश्वस्त किया कि वे नसीर भाई से पूछेंगे। अगर उन्होंने आप के लिए फिल्म छोड़ दी तो आप फिर से आ जाएंगे। जल्दी ही शुभ सूचना मिली कि संजय मिश्रा को केंद्रीय भूमिका देने की शत्र्त पर नसीरूद्दीन शाह ने फिल्म छोड़ दी।
    संजय मिश्रा जोर देकर कहते हैं कि नसीर भाई जैसे सीनियर कलाकार ही ऐसी उदारता दिखा सकते हैं। वे आगे बताते हैं कि मुझे इंडस्ट्री में कामेडियन समझा जाता है और उसी तरह के रोल मिलते हैं। रजत कपूर ने थोड़ा अलग होकर मेरे बारे में सोचा। उन्होंने ‘फंस गए रे ओबामा’ के समय ही कहा था कि वे मेरे लिए एक फिल्म लिख रहे हैं। मैंने तब इसे गंभीरता से नहीं लिया था। ‘आंखों देखी’ मेरे करिअर की अहम फिल्म है। मैं इसमें बाबूजी का किरदार निभा रहा हूं। वे एक दिन फैसला करते हैं कि अब से वे लोगों की कही-सुनी बातों पर यकीन नहीं करेंगे। वे केवल आंखों देखी बातों को ही सच मानेंगे। यहां से फिल्म और बाबूजी के रिश्तों में बदलाव आता है। इस फिल्म गलियों वाली दिल्ली मिलेगी,जहां मोहल्ला कल्चर अभी तक जिंदा है। यह वसंत कुंज की दिल्ली नहीं है।
    अपने करिअर में पहचान और मुकाम हासिल कर चुके संजय मिश्रा जरूरी मानते हैं कि काम में मजा आए। वे कहते हैं,अब मैं अपनी खुशी के लिए काम करना चाहता हूं। मैं किसी और को जवाब नहीं देना चाहता। फिल्म निर्देशन का मेरा अनुभव बहुत अच्छा नहीं रहा। फिल्म निर्देशन के साथ इतने रायते रहते हैं कि सभी को संभालना मुश्किल हो जाता है। एक्टिंग अच्छा है। अपना काम करो और जाओ। संजय मिश्रा स्वीकार करते हैं कि उनके जैसे एक्टर के लिए माहौल बेहतर हुआ है। नसीरूद्दीन शाह से अभी तक आए थिएटर के एक्टरों ने माहौल बदलने में बड़ा योगदान किया है। हम सभी ने साबित किया है। यही वजह है कि हमें भी केंद्रीय भूमिकाएं मिल पा रही हैं। हम यह भा जानते हैं कि हमारे साथ बड़े बजट की कमर्शियल फिल्म अभी नहीं बनायी जा सकती और न 100 करोड़ के बिजनेस की उम्मीद की जा सकती है। लेकिन कौन जाने भविष्य में क्या हो? अभी जैसी फिल्में कभी-कभी हिट हो जा रही हैं,उससे इंडस्ट्री भी चौंकी हुई है।

दरअसल : छपनी चाहिए स्क्रिप्ट



-अजय ब्रह्मात्मज
देश भर से परिचित लेखकों और मित्रों की फिल्मी लेखक बनने की जिज्ञासाएं मिलती रहती हैं। सुदूर इलाकों में बैठे महत्वाकांक्षी लेखक मेल, फोन और सोशल मीडिया के जरिए यह जानने की चाहत रखते हैं कि कैसे उनकी कहानियों पर फिल्में बन सकती हैं। इस देश में हर व्यक्ति के पास दो-तीन कहानियां तो होती ही हैं, जिन्हें वह पर्दे पर लाना चाहता है। अगर लिखना आता है और पत्र-पत्रिकाओं में कुछ रचनाएं छप गई हों तो उन्हें यह प्रवेश और आसान लगता है। ज्यादातर लोग एक कनेक्शन की तलाश में रहते हैं। उस कनेक्शन के जरिए वे अपनी कहानी निर्देशक-निर्माता या स्टार तक पहुंचाना चाहते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है। प्रतिभा है तो अवसर मिलना चाहिए। मैंने कई बार मदद की करने की कोशिश में पाया कि अधिकांश लेखकों के पास फिल्म लेखन का संस्कार नहीं होता। किसी भी पॉपुलर फिल्म को देखने के बाद वे उसी ढर्रे पर कुछ किरदारों को जोड़ लेते हैं और एक नकल पेश करते हैं। जिनके पास मौलिक कहानियां व विचार हैं, वे भी उन्हें स्क्रिप्ट में नहीं बदल पाते। दरअसल फिल्म लेखन एक क्राफ्ट है और यह क्रिएटिव लेखन से बिल्कुल अलग है।
    स्क्रिप्ट लेखन पर बहुत कम किताबें आईं हैं। कुछ विदेशी लेखकों की किताबों को पाठ की तरह इस्तेमाल किया जाता है, जबकि हिंदी फिल्मों का लेखन विदेशी फिल्मों के लेखन से बिल्कुल अलग है। हिंदी फिल्मों में स्क्रिप्ट का थ्री एक्ट फॉर्मूला नहीं चलता। हिंदी फिल्मों की सबसे बड़ी विशेषता उसका इंटरवल है। कहानी यूं बुनी जाती है कि इंटरवल के पहले और बाद में दर्शकों की रुचि बनी रहे। स्क्रिप्ट लेखन का भारतीय संदर्भ पृथक होता है। उसमें नाच-गाने(आजकल आइटम), मार-पीट और बाकी सभी इमोशन की गुंजाइश रखनी पड़ती है। इस लिहाज से देश के हर शहर में खुल चुके मीडिया स्कूल भी इस दिशा में कुछ नहीं कर पा रहे हैं। जरूरत है कि हिंदी फिल्मों के साक्ष्य के आधार पर स्क्रिप्ट लेखन का प्रशिक्षण दिया जाए। जब तक ऐसा नहीं होता है, तब तक हिंदी फिल्में ही शिक्षक का काम कर सकती हैं। कुछ दशक पहले तक हिंदी के लोकप्रिय प्रकाशक हिंदी फिल्मों की स्क्रिप्ट का पॉकेट बुक संस्करण निकाला करते थे। बताते हैं कि इनकी खपत अच्छी होती थी।
    इधर हिंदी फिल्मों में विदेशी फिल्म रसिकों और शोधार्थियों की अभिरुचि देखकर क्लासिक और क्लट फिल्मों की स्क्रिप्ट छापने का सिलसिला आरंभ हुआ है। इसके तहत फिल्मों की स्क्रिप्ट फिल्म देखकर तैयार की जाती है। विदेशी पाठकों की सुविधा के लिए हिंदी संवादों को रोमन हिंदी और अंग्रेजी में भी लिखा जाता है। कुछेक स्क्रिप्ट में तो उर्दू में भी संवाद लिखे गए। नसरीन मुन्नी कबीर, दिनेश रहेजा और कुछ अन्य फिल्म इतिहासकार व लेखक यह महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। इन लेखकों का काम मुख्य रूप से अंग्रेजी में आ रहा है। चूंकि हिंदी में दस्तावेजीकरण को कभी महत्व नहीं दिया गया। इसलिए अधिकांश फिल्मों की मूल पटकथा नहीं मिलती। अगर फिल्मों की शूटिंग स्क्रिप्ट मिले तो नए लेखकों को जरूरी फायदा हो। इस  कमी के बावजूद फिल्मों की स्क्रिप्ट को किताबों के रूप में लाने के प्रयास की सराहना की जानी चाहिए। इन किताबों के अध्ययन से दूर-दराज इलाकों में बैठे अनगिनत लेखकों को फायदा हो सकता है।
    अगर हिंदी के प्रकाशक और संस्थान हिंदी फिल्मों की स्क्रिप्ट की किताबें लाने के बारे में सोचें तो यह उनके लिए व्यवसाय का अच्छा समीकरण हो सकता है। साथ ही किताबों के रूप में आई स्क्रिप्ट से सभी लाभ उठा सकते हैं। यह बहुत महंगा और जोखिम का काम नहीं है। जरूरत है इच्छाशक्ति और ध्येय की।

Tuesday, March 18, 2014

द पावरफुल देओल

चवन्‍नी के पाब्‍कों के लिए इसे रधुवेन्‍द्र सिंह के ब्‍लॉग अक्‍स से साधिकार लिया गया है। सनी देओल जब पर्दे पर गुस्से से आग बबूले नजर आते हैं, तो दर्शक सीटियां और तालियां बजाते हैं और निर्माता खुशी से फूले नहीं समाते हैं. बॉक्स-ऑफिस के इस चहेते देओल से रघुवेन्द्र सिंह ने की मुलाकात 
सनी देओल सालों से सफलता-असफलता की आंख मिचौली का खेल खेलते आ रहे हैं, इसलिए उनकी फिल्म बॉक्स-ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर हो या हिट, उनके चेहरे पर मुस्कुराहट बनी रहती है. उनका जादू दर्शकों पर बरकरार है. इसका ताजा उदाहरण है सिंह साब द ग्रेट. मगर निजी जीवन में वह सीधे-सादे और शर्मीले हैं. उनके अंदर एक बच्चा भी मौजूद है, जो शैतानियां करता रहता है. उन्होंने फिल्मफेयर को जुहू स्थित अपने ऑफिस सनी सुपर साउंड में आमंत्रित किया. जब हम पहुंचे, तो वह बैठकर समोसे और केक खा रहे थे. हमें ताज्जुब नहीं हुआ, क्योंकि देओल्स तो खाने-पीने के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने अभी-अभी अपने ऑफिस की एक स्टाफ का बर्थडे सेलिब्रेट किया. आज हमें पता चला कि उन्हें चेहरे पर केक लगाने का शौक है. इस तरह के मौके पर वह एक केक खास तौर से सबके चेहरे पर लगाने के लिए मंगाते हैं. बहरहाल, हम उनसे बतियाना शुरू करते हैं... 

हाल में सिंह साब द ग्रेट फिल्म में आप एक बार फिर धुंआधार एक्शन  करते दिखे. आप इस जॉनर को एंजॉय करते हैं?
बात काम की होती है. वह एक्शन हो, कॉमेडी हो, रोमांस हो, हम अपना काम कर रहे हैं. एक कहानी है, उसमें कैरेक्टर है, हमें उसे निभाना होता है. मैं उस कैरेक्टर को अपने अंदर खोजता हूं कि अगर मैं ऐसा होता, तो क्या करता. हर इंसान का दिमाग एक इनसाइक्लोपिडिया है. जब तक मैं किसी चीज को दिल में न बैठा लूं, मैं करता नहीं हूं. मेरे अंदर वह चीज जाएगी, तो ही मैं परफॉर्म कर पाऊंगा. मैं सुपरफिशियल परफॉर्मेन्स नहीं दे सकता. मैं जिस ढंग की एक्टिंग को मानता हूं, उसे मैंने आगे किया. आज जब मैं कहीं जाता हूं, तो कितने युवा आकर मुझसे अच्छी तरह मिलते हैं और कहते हैं कि सनी जी, मैंने आपकी वो पिक्चर देखी थी, उसमें चीजें इतनी अच्छी थीं कि मैंने उन्हें अपने जीवन में अपनाना शुरू कर दिया. तो मुझे अच्छा लगता है कि मेरी एक फिल्म से आदमी सही ट्रैक पर तो है.

अगर भ्रष्टाचार की बात करें, तो क्या आप जैसे एक स्टार का सामना भी इससे हुआ है?
हर आदमी को भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ता है. किसी को छोटी करप्शन, तो किसी को बड़ी और किसी को बहुत बड़ी करप्शन का. हर जगह करप्शन है, तभी पैसे हर जगह जाते हैं. कुछ काम करवाना होता है, तो पैसे देने पड़ते हैं. मुझे तो किसी को पैसे देने में भी शर्म आती है. मुझे समझ में नहीं आता, जब लोग कहते हैं कि उसको पैसे दे दो, अगर काम करवाना है तो. मैं कहता हूं कि कैसे दूं, उन्हें कहीं बुरा न लग जाए. कितनी बार मैं चिढ़ता हूं कि मुझे नहीं देना है. तो मुझे वकील समझाते हैं कि आप नहीं देंगे, तो ये नहीं होगा. यह एक जबरदस्ती का फॉरमैट हो गया है.

लेकिन हम लोग चुपचाप इसे बर्दाश्त क्यों कर लेते हैं?
सिंह साब द ग्रेट का मकसद था कि बदला नहीं बदलाव. पहले अपने आप में एक बदलाव लाओ. जब आप नल बंद कर दोगे, तो पानी नहीं बहेगा. मैंने कहा कि चलो एक फिल्म करते हैं, जिसमें ऐसा कैरेक्टर प्ले करें, जिससे किसी को प्रोत्साहन मिले. हमने पॉलिटिशियंस के हाथ में अपनी जिंदगी दे दी है कि जो मर्जी हो, करो, हमें परवाह नहीं है.

मार-धाड़ करना जोखिम भरा काम है. ऐसे सीन करते समय आप किस तरह की सावधानी रखते हैं?
जब हम एक्शन करते हैं, तो उस वक्त सेफ्टी की जो सुविधा मौजूद होती है, उसे लेकर चलते हैं. लेकिन चोट ऐसी चीज है, जो हो जाती है. तभी हम उसे एक्सीडेंट कहते हैं. आज के जमाने में सेफ्टी बहुत है. पहले अस्सी या नब्बे के दशक में इतनी सेफ्टी नहीं थी. 2000 के बाद सेफ्टी आनी शुरू हुई है. पहले हमारे पास एयर बैगस नहीं थे, हम जानवरों के साथ पंगा लेते थे, चोटें खाते थे. जब बिल्डिंग से छलांगें मारते थे, तो नीचे गद्दे रखे होते थे, उसी पर छलांगें मार देते थे. अब हमारे पास केबल हैं, एयर बैगस हैं, तो हम उस पर सॉफ्टली लैंड करते हैं.

परिजनों ने कभी कहा कि आप इस तरह का जोखिम भरा काम न करें?
बिल्कुल. वो कभी नहीं चाहते थे कि मैं स्टंट करूं. लेकिन अब काम है, तो करना ही पड़ता है. मैं शुरू से स्पोर्ट्स में रहा हूं, तो ये मुझे खेल की तरह लगता है. बेताब में घुड़सवारी का एक सीन था. उस सीन की शूटिंग के वक्त घोड़ा तंग कर रहा था, तो हमारे जितने भी एक्शन मास्टर और एक्शन डुप्लीकेट थे, उनसे हो नहीं रहा था. हमारे अरेंजर्स में एक-दो विदेशी भी थे, उनसे भी नहीं हो रहा था. मैंने कहा कि मैं करके देखूं? मैं बैठ गया घोड़े पर, तो गिरा ही नहीं. वहां से मेरी एक्शन की जर्नी शुरू हुई. फिर मैं चलता ही गया. मैं कहीं रूका नहीं. मैंने सीखा कुछ नहीं था. स्पोर्ट्समैन में एक स्फूर्ति होती है. हमें चोट लगती है, तो हम रूकते नहीं हैं. मुझे कई बार चोटें लगीं और फिर बाद में, बैक की प्राब्लम आने लगी. बैक से मैं तबसे लड़ रहा हूं. मेरे चार ऑपरेशन हो चुके हैं बैक के. लेकिन अब आदत-सी हो गई है. मैं किसी चीज को कमजोरी नहीं बनाता. भगवान ने मेरे अंदर एक शक्ति दी है कि किसी चीज के सामने मैं हार नहीं मानता.

देओल परिवार खाने-पीने के लिए जाना जाता है. फिर आप अपने आपको फिट कैसे रखते हैं?
हम पहले खाते हैं, फिर ज्यादा एक्सरसाइज कर लेते हैं या खेल लेते हैं, तो बर्नआउट हो जाता है. मैंने एक-दो बार कंट्रोल करने की कोशिश की, लेकिन वो डिसिप्लीन हो नहीं पाता. मैं एक्सरसाइज ज्यादा कर लेता हूं. आजकल के ज्यादातर लोग स्ट्रिक्ट डायट फॉलो करते हैं. वो अच्छी चीज है, पर मैं उस ढंग से नहीं करता. 

फिल्मों में हम आपको अक्सर गुस्सा होते देखते हैं, लेकिन क्या रियल लाइफ में आप गुस्सा होते हैं?
(हंसते हैं) गुस्सा आता है. यह तो एक इमोशन है. जब चोट लगती है या जब किसी चीज पर चिढ़ जाता है आदमी, जब थका हो, तो गुस्सा आता ही है. हां, बगैर वजह के मुझे गुस्सा नहीं आता.

प्रीमियर या पार्टी को लेकर क्या आपको एक्साइटेड होती है?
मैं तो इन चीजों से भागता हूं (हंसते हैं). अगर आप खुद स्क्रीनिंग रखते हैं, तो जाना पड़ता है. मुझे पार्टीज का शौक होता, तो मैं जरूर जाता. थोड़ा दारू पीता और बहक जाता. मैं ये सब चीजें नहीं करता, इसलिए नहीं जाता. जिस तरह से मैं अपना जीवन जी रहा हूं, उसमें मुझे बहुत खुशी है. ऐसी जगहों पर फिल्म इंडस्ट्री के लोगों से मिलना-जुलना होता है. लेकिन हम कभी नहीं चाहते हैं कि किसी का भला हो, क्योंकि हम डरते हैं दूसरों के भले से कि कहीं उसके भले के साथ हमारा नुकसान न हो जाए. अफसोस कि हमारी इंडस्ट्री ऐसी है. 

क्या आपको इस बात का दुख है कि आप जिस इंडस्ट्री का हिस्सा हैं, वहां लोग ऐसी सोच रखते हैं?
हमारे पूरे देश की सोच ऐसी है. हर फील्ड में यही हाल है और इंडस्ट्री अलग नहीं है. आजकल पेज 3 पार्टी में हर कोई जाता है, हर आदमी सोचता है कि उसकी फोटो आ जाए. और इसके लिए लोग कुछ भी करने को तैयार हैं. ऑडियंस जानती है कि मैं कुछ बुराई करूंगा, तो मैं भी टीवी पर आ जाऊंगा. रियलिटी शो पर चला जाऊंगा. पूरे देश का जीवन जीने का यह तरीका बन गया है.

आप एक साफ दिल और नेक इंसान हैं, लोग आपसे जुड़ाव महसूस करते हैं, लेकिन आप सबसे दूर क्यों रहते हैं?
हर कोई इंसान है और इंसान गलतियां भी करता है. लेकिन हमारी कोशिश होती है कि हम किसी को चोट न पहुंचाएं. अगर हमसे कोई गलती होती है, तो हम मान लेते हैं कि हमसे गलती हुई है. हम अपने आप पर ही हंसते हैं. हमें किसी चीज पर शर्म नहीं है. हम वही करते हैं, जो करना हमें अच्छा लगता है. तभी मैं किसी को फॉलो नहीं करता, क्योंकि हर इंसान ऐसा ही है. 

सालों से इंडस्ट्री में होने के बावजूद आप पर इसका रंग क्यों नहीं चढ़ा?
हम ऐसे ही हैं और एक इंसान को ऐसा ही होना चाहिए. हम हर आदमी को अपने जैसा समझते हैं. हम हर आदमी पर भरोसा कर लेते हैं, क्योंकि भरोसे से ही काम होता है. यह सोच हमें परिवार से मिली है. मेरी जॉइंट फैमिली है. पापा ज्यादा काम करते थे, तो मैं ज्यादातर समय अपनी बीजी, मम्मी या आंटी के साथ होता था. बचपन में उन्होंने जो बातें कही होंगी, वह दिमाग में रह जाती हैं. उसका मतलब हमें बाद में समझ में आता है और जब कुछ घटना घटती है, तब वो बात याद आती है.

आपके बच्चों में भी ऐसे ही संस्कार और सोच है, ऐसा हमने सुना है.
जैसे हम लोग पले हैं, वो भी उसी ढंग से पले हैं. हमारे जो विचार होंगे, वही हमारे बच्चों के भी विचार होंगे. जैसे- हमने उनको शिक्षा दी है कि इज्जत से बात करो, तो वह वो दिमाग में रखते हैं. अब घर में फादर, ग्रैंड फादर सब लोग उसी बात को फॉलो करें, तो माहौल ही वैसा हो जाता है. आप सीखा नहीं रहे होते हैं, आदमी उसमें पलते-बढ़ते सीख जाता है.

आप इस वक्त ज्यादा एक्सपेरिमेंट करने के मोड में दिख रहे हैं. आपने मोहल्ला अस्सी की, फिर आई लव न्यू ईयर की. आप अपनी सीमाएं तोडऩे के लिए ओपन हैं?
मैं हमेशा से ओपन था. बेताब के बाद मैंने अर्जुन की. उस वक्त ऐसी फिल्म कोई नहीं करता था. मैंने यतीम की, डकैत की, वो भी लोग नहीं करते थे. मैंने हमेशा नए लोगों के साथ काम किया,क्योंकि उनमें एक जोश होता है, एनर्जी होती है, जो मुझमें भी है. चाहे मैं सौ फिल्में कर लूं, लेकिन मेरे अंदर वही एनर्जी रहेगी. कोई चीज परफेक्ट नहीं होती. आप परफेक्ट कैसे बोल सकते हो? क्रिएटिविटी क्या होती है? जब हम कोई चीज शुरु करते हैं, तो हमें पता नहीं होता कि वह कहां तक जाएगी. उसमें मजा आता है, मुझे अच्छा लगता है कि मैं मॉनीटर नहीं देखूं. मैं डायरेक्टर को देखता हू, अगर उसने कह दिया ओके, तो मैं उसकी आंखें देखता हूं, तो सोचता हूं कि चलो, एक और कोशिश करता हूं. उस ढंग से मजा आता है.

मोहल्ला अस्सी का कैसा अनुभव रहा? इसकी रिलीज में देर क्यों हो रही है?
यह बहुत ही अच्छी फिल्म है. जल्द रिलीज होगी. यहां हर फिल्म की किस्मत पिछली फिल्म तय करती है. यह बहुत गंदी रियलिटी है, क्योंकि आज के जमाने में लोग एक्टिंग के भरोसे नहीं चल रहे हैं, एक प्रोडक्ट के भरोसे पर चल रहे हैं. कितनी पिक्चरों ने साबित भी कर दिया है कि वो खराब होती हैं, लेकिन उनकी हाइप ऐसी क्रिएट कर देते हैं कि लोग जाकर टिकट खरीद लेते हैं और आधी पिक्चर छोडक़र आ जाते हैं. वो पिक्चरें ऐसा बिजनेस करती हैं कि हर आदमी वैसा बिजनेस चाहता है. कोई यह नहीं चाहता कि अच्छा सिनेमा बनाकर वह बिजनेस हासिल करूं. वो चाहता है कि ये तरीके अपनाकर के मैं भी पैसे ला सकता हूं. उस वजह से हमारे जितने भी बड़े एक्टर हैं, जिनकी पहचान ऐसी है कि वह किसी भी बजट की फिल्म कर सकते हैं, उनमें ऐसी हिम्मत नहीं है, पैशन नहीं है. काश, ये पैशन होता, तो बहुत अच्छा हो सकता है. आप अच्छा करोगे, तो सक्सेज मिलेगी, फिर पैसा खुद-ब-खुद आएगा, पर अगर आप पैसे को टारगेट कर रहे हो और कंप्रोमाइज कर रहे हो, तो बात वही हो जाती है कि एक्टर नीचे रह गया और आपकी बाकी क्रिएटिविटी ऊपर चली गई.

आपको नहीं लगता है कि इंडस्ट्री ने आपको एक ही खांचे में ढाल दिया और फिर उसी में बार-बार दोहराती रही?
हमें एक ऐसा एक्टर बता दो, जो बिना किसी इमेज के चल रहा हो. हर स्टार इमेज के साथ चल रहे हैं और वो उस इमेज को लेकर इतने इनसिक्योर हैं कि डरते हैं कि कोई नया आकर ले न ले. वो कोई भी रोल करते हैं, पर लौटकर उसी इमेज में आ जाते हैं. मैंने अपनी कितनी पिक्चरें देखी नहीं हैं, वरना मैं आपके साथ उनके बारे में डिबेट कर सकता था. हां, जैसे मोहल्ला अस्सी और आई लव न्यू ईयर जैसी फिल्म पहले मुझे नहीं मिलती थीं. अगर मिली होतीं, तो मैं जरूर करता. अगर मैं दामिनी जैसी एक वूमन ओरिएंटेड फिल्म कर सकता था, तो मैं ये सब भी कर सकता था. पापा ने ऐसी-ऐसी फिल्में की हैं, जो किसी एक्टर ने नहीं किए हैं. वो सब कैरेक्टर्स में हिट रहे हैं. कोई ऐसा एक्टर नहीं है, जिसने इतनी वेरायटी के कैरेक्टर किए और उसकी फिल्में हिट रही हों. दूसरे एक्टर भी तो उस वक्त मौजूद थे, वो नहीं कर पाए. कितनी बार मैं सोचता हूं कि काश, मैं उस जमाने में रहा हंोता. क्योंकि निर्देशक और कहानियां इतनी खूबसूरत थी. अफसोस कि आज के नए एक्टर शिक्षा बहुत देते हैं. मगर लोगों में खोखलापन बहुत है. उनमें इतना टैलेंट नहीं है, जितना वो बात करते हैं. जिसके पास टैलेंट होता है, वह बात नहीं करता. क्योंकि उसका टैलेंट बात करता है.

हां, धरम जी की सत्यकाम के बारे में बहुत कहा जाता है.
मैं भी सत्यकाम का जिक्र कर रहा हूं, लेकिन पापा की फूल और पत्थर देखी है किसी ने? आप वह फिल्म देखिए. उसी फिल्म से एक्शन का दौर शुरू हुआ हिंदी फिल्मों में. उससे पहले एक्शन नहीं था. वह क्लासिक फिल्म है. सौ सप्ताह चली थी वह. उसी से एक स्टाइल बना. उसमें पापा ने शर्ट उतारी थी. लेकिन वह ये सब दिखा नहीं रहे थे. वह कैरेक्टर थे.

क्या आपको अपने करियर की बेस्ट फिल्में मिल चुकी हैं, जिनके बारे में लोग पचास साल भी बात करेंगे?
मैं लकी रहा हूं अपने कई समकालीन कलाकारों की तुलना में कि मैंने ढेर सारी ऐसी फिल्में की हैं, जिनका जिक्र लोग करते रहते हैं. आज यूट्यूब पर पर मैं उन फिल्मों को देखता हूं, तो सोचता हूं कि हां, मैं इसमें अच्छा तो था. ऐसे क्यों नहीं सोचता था. अर्जुन, बेताब, यतीम, डकैत, घायल, जीत, जिद्दी, बॉर्डर, गदर और भी कई सारी फिल्में थीं. ये आज भी सैटेलाइट पर खरीदते हैं लोग. आज भी मेरे डायलॉग लोग बोलते हैं, जबकि उन्हें करते वक्त हमने सोचा भी नहीं था कि इतने पॉपुलर हो जाएंगे.

आपका सबसे पॉपुलर डायलॉग है ढाई किलो का हाथ... इससे जुड़ा कोई किस्सा शेयर करना चाहेंगे?
मुझे लगता है कि क्यों लोग उसे पकडक़र बैठे हैं. हमें कभी नहीं पता होता कि कौन से डायलॉग लोग उठा लेंगे. मुझे अगर कोई सीन दे और कहे कि देखना, इसे लोग पसंद करेंगे, तो मैं कहता हूं कि मुझे वह सीन ही नहीं करना है. घायल ले लीजिए. हम और राज लड़ते रहते थे कि ये सीन अच्छा नहीं हुआ. पिक्चर खत्म हो गई. सेंसर हो गई. काट-पीट हो गई. मीडिया ने वो फिल्म देखी. उसके बाद हमारी प्रेस कॉन्फ्रेंस थी. उस समय इरॉज में फिल्म दिखाया करते थे. मैं निर्माता के तौर पर जा रहा था. मैं सोच रहा था कि मीडिया वाले पता नहीं क्या बोलेंगे. मैंने राज से कहा कि तुम बात करना. मुझसे नहीं होगा. लेकिन जैसे ही हम अंदर गए, मीडिया खड़ा होकर तालियां मारने लगा. हमें समझ में नहीं आया कि हमने ऐसा क्या ॠॠॠॠकर दिया है. उस चीज का मजा है. जब लोग शाबाशी दें, तब उसका मजा है.

क्या आपको लगता है कि फिल्म इंडस्ट्री आपकी अभिनय प्रतिभा का संपूर्ण इस्तेमाल नहीं कर सकी?
बहुत वक्त है अभी. करेंगे. मुझे ऐसी कोई शिकायत नहीं है. जो समाज है, उसी में हमें जीना है, तो चिढक़र जीने से क्या फायदा है. गुस्से से जीने से क्या मतलब है. कितने सारे लोग हैं, बेचारे जिनको उतना भी नहीं मिलता, जितना मुझे मिला है. तो उसको देखकर आगे चलो.

आई लव न्यू ईयर में आप अपनी इमेज के विपरीत दिख रहे हैं. उसके बारे में कुछ बताएं.
बहुत ही प्यारी फिल्म है. एक साल हो गया, हम उसे बनाकर बैठे हैं. राधिका-विनय सप्रू ने मुझे कहानी सुनाई, वह मुझे तुरंत अच्छी लगी. उस वक्त टी-सीरीज ने उसे सपोर्ट किया और हमने बना ली. कैरेक्टर इतना अच्छा है. आज के जमाने में लोगों ने नाम दे दिया है- रॉम-कॉम. बस उस ढंग की फिल्म है. मैंने इस फिल्म में काम करते वक्त बहुत एंजॉय किया. पिक्चर प्यार की कहानी है. प्यार की कोई वजह नहीं होती, उम्र नहीं होती, प्यार बस हो जाता है. इसमें एक आदमी है, जो लेट फोर्टीज में है, वह कमिटमेंट से डरता है, क्योंकि वह फादर के साथ रहता है. उसे लगता है कि अगर लडक़ी के साथ हो गया, तो मैं क्या करूंगा. यह एक दिन-एक रात की कहानी है.

कंगना रनौट के बारे में आपकी क्या राय है? कैसा अनुभव रहा आपका?
वह बहुत अच्छी एक्ट्रेस हैं. हमारी केमिस्ट्री बहुत अच्छी है फिल्म में. गाने में आपने देखी होगी.

आपके हिसाब से क्या वजह रही कि यमला पगला दीवाना 2 को दर्शकों ने पहले पार्ट जैसा प्यार नहीं दिया?
मैं कभी बैठकर वजहें सोचता नहीं हूं. अगर वजह के बारे में सोचेंगे, तो दुख होगा. हम लोग आगे बढऩे में विश्वास करते हैं. हमने मेहतन की थी, प्रमोशन भी अच्छा किया था, लेकिन हमारी प्रमोशन काम नहीं आई. ट्रेलर में गलती थी शायद. लोगों को पसंद नहीं आए.

दिल्लगी (1999) के बाद आपने दोबारा निर्देशन क्यों नहीं किया?
मैं घायल रिटन्र्स डायरेक्ट करने जा रहा हूं. मैं डायरेक्टर ऐसे ही बना था. कहीं मुसीबत में फंस गया था, तो डायरेक्टर बन गया. मेरी ट्रेनिंग नहीं हुई थी. काफी लोगों ने कहा कि दिल्लगी अच्छी फिल्म थी. ज्यादा चली नहीं, लेकिन उसने अपना बिजनेस किया था. आज भी मैं कहीं जाता हूं तो यंगस्टर्स मुझसे कहते हैं कि दिल्लगी प्यारी थी, अपने समय से आगे की फिल्म थी. आप अगली पिक्चर क्यों नहीं बना रहे हैं.

आपके पापा धर्मेन्द्र आज भी सक्रिय हैं. आप उनसे कहते नहीं हैं कि पापा, अब आप आराम कीजिए?
जो काम करना पसंद करता है, जिसे काम की लगन है, वो काम नहीं करे, तो उसे आराम नहीं मिलता. पापा के लिए काम ही आराम है.

नए फिल्मकारों- जैसे अनुराग कश्यप, विक्रमादित्य मोटवानी, दिबाकर बनर्जी आदि. इन लोगों के साथ काम करने का संयोग नहीं बन रहा है?
क्या होता है कि जब डायरेक्टर स्ट्रगल कर रहा होता है, तब वह कुछ करना चाहता है, लेकिन जब वह किसी मुकाम पर पहुंच जाता है, तो उसकी सोच बदल जाती है. फिर उनको केवल एक तरह का सिनेमा कमर्शियल लगता है, एक तरह के एक्टर्स कमर्शियल लगते हैं. पहले भी मैं किसी डायरेक्टर के पास काम मांगने नहीं गया. मेरी जितनी भी फिल्में हुई हैं, वहां से डायरेक्टर बने हैं.


मेरा बेटा...
पापा और हम सबका मानना है कि बच्चा वही करे, जो वह करना चाहता है. और वह जो भी करे, उसमें उसे सफलता मिले. पर सफलता तभी मिलेगी, अगर उसमें हुनर होगा और वह मेहनत करेगा. करण अभिनय करना चाहते हैं. उन्हें हमें लॉन्च करना है. पर अब तक हमने लॉक नहीं किया है कि उनकी पहली फिल्म कौन-सी होगी और उसे कौन निर्देशित करेगा. करण की खासियत के बारे में क्या कहूं! मुझे देखकर कोई नहीं कह सकता था कि मैं एक्टर बनूंगा. मुझे नहीं पता था कि मेरी खासियत क्या है. मेरे अंदर जज्बा था, जो हर आदमी के अंदर होना चाहिए. वही आगे लेकर जाता है. मेरी और करण की फिल्म अगर आमने-सामने होगी, तो क्या हुआ! जब पापा की फिल्में चल रही थीं, तब मैं आया था. मेरी फिल्म बेताब लगी थी और पापा की फिल्म नौकर बीवी का लगी थी. दोनों फिल्में चली थीं. हमें काम करते रहना चाहिए. सोचना नहीं चाहिए. 
साभार: फिल्मफेयर


Sunday, March 16, 2014

द क्वीन मेकर विकास बहल

चवन्‍नी के पाठकों के लिए रघुवेन्‍द्र सिंह के ब्‍लॉग अक्‍स से साधिकार 
रिस्क लेना विकास बहल की पसंदीदा आदत है और आज उनकी यही क्वालिटी उन्हें फिल्ममेकिंग में लेकर आई है. अपने रोचक सफर को वर्तमान पीढ़ी के यह फिल्मकार रघुवेन्द्र सिंह से साझा कर रहे हैं 
मुंबई शहर की आगोश में आने को अनगिनत लोग तड़पते हैं, मगर यह खुद चंद खुशकिस्मत लोगों को अपनी जमीं पर लाने को मचलता है. विकास बहल ऐसा ही एक रौशन नाम हैं. यह शहर उनके सफर और सपनों का हिस्सा कभी नहीं था, लेकिन आज यह उनकी मंजिल बन चुका है. अनुराग कश्यप, विक्रमादित्य मोटवानी और मधु मंटेना जैसे तीन होनहार दोस्त मिले, तो उन्हें अपने ख्वाबों का एहसास हुआ. यूटीवी जैसे स्थापित कॉरपोरेट हाउस में अनपेक्षित आय वाली नौकरी को छोडक़र उन्होंने इन दोस्तों के साथ मिलकर फैंटम नाम की फिल्म प्रोडक्शन कंपनी की नींव रखी. जिसका लक्ष्य गुणवत्तापूर्ण मनोरंजक फिल्मों का निर्माण करना है. खुशमिजाज, सकारात्मक सोच एवं ऊर्जा से भरपूर विकास ने निर्देशन की ओर पहला कदम बढ़ाया और चिल्लर पार्टी जैसी एक प्यारी-सी फिल्म दर्शकों के बीच आई. अब अपनी दूसरी पिक्चर क्वीन में वह एक ऐसी साहसी लडक़ी की कहानी लेकर आ रहे हैं, जो अकेले हनीमून पर निकल पड़ती है. आइये, विकास बहल के जीवन की मजेदार कहानियां जानते हैं, जिसके हिस्सों को वह किस्सों के रूप में पर्दे पर बारी-बारी से लेकर आ रहे हैं...

मैं मुंबई फिल्म बनाने नहीं आया था. मैं वर्ष 2000 में नौकरी के लिए बैंगलोर गया था. फिर उसी कंपनी (इंडिया.कॉम) ने मेरा ट्रांसफर मुंबई कर दिया. वह कंपनी बंद हो गई. फिर मैंने रेडियो मिर्ची जॉइन किया. वहां मैं मार्केटिंग हेड था. मगर तीन महीने बाद मैंने वह नौकरी छोड़ दी. मुझे काम करने में मजा नहीं आ रहा था. मैंने सोनी जॉइन किया. उस वक्त सोनी ने सब टीवी खरीदा ही था. मैं उसका क्रिएटिव हेड बन गया. जबकि मुझे कुछ नहीं पता था कि टीवी कैसे चलता है. उसके बाद मैंने यूटीवी जॉइन किया. मुझे पता नहीं था कि मुझे फिल्ममेकर बनना है. इस ओर मैं अजय बिजली की वजह से आया. क्योंकि जब मैं सोनी में था, तो वो चाहते थे कि मैं पीवीआर मूवीज जॉइन करूं. उनसे बात चल ही रही थी कि बीच में मैं रॉनी स्क्रूवाला के संपर्क में आया. मैं रॉनी का फैन था. यूटीवी जॉइन करने के बाद मैंने यूटीवी स्पॉटबॉय शुरू किया. अब मुझे पता नहीं था कि पिक्चर बनती कैसे है? पहले हफ्ते मैं कमरे में बैठा रहा. मैं गेम खेलता रहता था. चिल्लर पार्टी मैंने इसलिए लिखनी शुरू की, क्योंकि मेरे पास कुछ काम करने को नहीं था. मैंने तिग्मांशु धूलिया को फोन किया. उनके साथ मैंने सब टीवी के लिए एक शो किया था- मोहल्ला मोहब्बत वाला. वो एक छोटी-सी पर्ची पर पान सिंह तोमर फिल्म लेकर आए. मैंने उनसे कहा कि हम ये पिक्चर बना रहे हैं. उसके दो-तीन बाद मैं राजकुमार गुप्ता से मिला. मैंने आमिर की कहानी सुनी. मैंने उनसे भी कहा कि हम ये फिल्म बना रहे हैं. एक दिन मैं राजकुमार के साथ बैठे था, तो अनुराग कश्यप आ गए. उन्होंने देव डी सुनाई. मैंने कहा कि हम ये फिल्म बना रहे हैं. अब मुझे नहीं पता था कि फिल्म कितने में बनती है. तो मैं सीख-सीख कर यहां तक आया हूं.
                                                    कंगना रनौत और विकास बहल
मुझे रिस्क लेने और एक्सपेरिमेंट करने में मजा आता है. और इसी प्रक्रिया में मुझे यह एहसास हुआ कि मुझे लिखना, डायरेक्शन और प्रोडक्शन आता है. लेकिन एक समय आया, जब मुझे लगा कि मैं अपनी ही टीम को नहीं समझा पा रहा था कि मैं गैंग्स ऑफ वासेपुर क्यों बनाना चाह रहा हूं. तब मैंने तय किया कि अब मुझे किसी को समझाने की जरूरत नहीं है. मुझे जो करना है, वह बस करना है. मैंने यूटीवी छोड़ दिया. मुझे लगा कि अब नहीं कर सकूंगा, तो कभी नहीं कर सकूंगा. क्योंकि मैं आर्थिक रूप से सिक्योर होता जाता, मेरी रिस्क लेने की आदत जाती रहती. जब मैंने नौकरी छोड़ी, तो मेरे पिता (हरिश्चन्द्र बहल) ने मुझसे बात करनी बंद कर दी. उनको लगा कि ये गलत फैसला है. लेकिन मैं अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीना चाहता था. उस वक्त मेरी पत्नी ऋचा (विकास-ऋचा की लव मैरिज हुई है. ऋचा एक इंटिरियर डिजाइनर हैं) ने बहुत सर्पोट किया. उन्होंने मुझसे तब बस एक बात कही थी कि अगर हमारे कुत्ते का खाना आता रहेगा, तो बाकी सब ठीक है. ऋचा रॉकस्टार हैं.

मेरी मम्मी (उमा बहल) का एक छोटा-सा सपना था, जिसके बारे में उन्होंने मुझे बहुत साल बाद बताया कि वह लाइब्रेरियन बनना चाहती थीं. लेकिन घर, परिवार, बच्चों के चक्कर में वह नहीं बन पाईं. और वह अपनी जिंदगी में बहुत खुश हैं. मगर उनके जीवन में एक और रास्ता खुला होता, तो उन्होंने जीवन में क्या-क्या किया होता. क्वीन फिल्म का विचार मम्मी की वजह से मेरे मन में आया है. लेकिन क्वीन फिल्म में परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि हमें क्वीन का दूसरा पहलू देखने को मिलता है. क्वीन अपनी कहानी की हीरो है और मुझे हीरो की कहानियां बहुत पसंद हैं. क्वीन मेरे लिए कालिया बनाने की तरह है. इसमें केवल अमिताभ बच्चन की जगह कंगना हैं. क्वीन का सिर्फ पॉइंट ऑफ कॉनफ्लिक्ट अलग है. पिछली पिक्चर चिल्लर पार्टी में बच्चों का एक छोटा-सा मुद्दा था. लेकिन जो मुद्दा हमारे लिए छोटा था, वो बच्चों के लिए बड़ा था. मैं अनकंवेन्शनल हीरो से बहुत जल्दी प्रभावित हो जाता हूं. और यही बात चिल्लर पार्टी और क्वीन की दुनिया में कॉमन बात है. कुछ लोगों ने कहा कि क्वीन के लिए कंगना रनौट क्यों? मेरे खयाल से कंगना इस तरह की लड़कियों से परिचित हैं. वह जानती हैं कि अंडर कॉन्फिडेंस लड़कियां किस तरह की होती हैं. अगर मैंने किसी दूसरी एक्ट्रेस को इस किरदार के लिए चुना होता, तो उसे क्वीन को समझने के लिए एक आम घर और कॉलेज में जाना पड़ता. कंगना से बेहतर क्वीन को कोई नहीं निभा सकता था.   
          दोस्तों की टोली विक्रमादित्य मोटवानी, अनुराग कश्यप, मधु मंटेना और विकास बहल जब मैं क्वीन लिख रहा था, तब लोगों को समझाना मेरे लिए बहुत मुश्किल हो रहा था. मेरे लिए लाइफ फनी है. मैं ह्यïूमर बहुत अजीब जगहों में पाता हूं. तो वही फिल्म में आ गया, लेकिन वो बताना मुश्किल था. विक्रम मल्होत्रा ने इस स्क्रिप्ट को ग्रीन लाइट किया था. तब तक किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि हम बनाना क्या चाहते हैं. मैं बहुत सारे स्टूडियोज के पास गया था. लेकिन किसी को मेरी स्क्रिप्ट समझ में नहीं आ रही थी. दरअसल, प्रोडक्शन हाउसेज को सीधे मार्केटिंग के आइडियाज चाहिए होते हैं. उनको कोई कॉनफ्लिक्ट या स्कैंडल चाहिए. इस फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं था. यह सच है कि बहुत-सी अच्छी फिल्में कॉरपोरेट को समझ में नहीं आती हैं, क्योंकि स्क्रिप्ट रिडिंग एक आर्ट है. यह जन्मजात होती है. आप इसे सीख नहीं सकते. हालांकि कॉरेपोरेट में कुछ अच्छे लोग भी हैं. अब कुछ कॉरपोरेट ऐसे हैैं, जो साल में 8 फिल्में बनाते हैं. अब 8 फिल्में बनाने के लिए वह कम से कम 50 रिजेक्ट करेंगे. मतलब कि पचास लोग सडक़ पर घूम रहे हैं, जिनकी फिल्म नहीं बनी और वो कॉरपोरेट को गाली दे रहे हैं. मैं भी उन पचास लोगों में से एक था, जो सडक़ पर गाली दे रहे थे. मगर हमें समझना होगा कि यह एक नई इंडस्ट्री है. कॉरपोरेट में काम करने वाले लोग अलग-अलग इंडस्ट्री से आए हैं. वो सीख रहे हैं. और फिल्ममेकिंग एक जर्नी है, लेकिन स्टूडियोज सोचते हैं कि जब वह ग्रीन लाइट देते हैं, तब वह जर्नी वहीं खत्म हो जाती है. उनको उसके पहले की एक निर्देशक की दो साल की जर्नी को समझना होगा.

जब मैं पहले दिन क्वीन शूट कर रहा था, तो मुझे नीतेश तिवारी (चिल्लर पार्टी के सह-निर्देशक) की बहुत याद आई, क्योंकि नीतेश और मैंने बाय चांस चिल्लर पार्टी साथ में लिखी और डायरेक्ट की थी. हमने कभी बैठकर यह तय नहीं किया था कि वह क्या कर रहा है और मैं क्या कर रहा हूं. किसी को क्रेडिट की नहीं पड़ी थी. मैं थोड़ा रेस्टलेस था, तो मैं मॉनीटर पर नहीं बैठता था, मैं बच्चों के साथ रहता था. नीतेश मॉनीटर के सामने बैठता था. कुछ दिन बाद हमें लगा कि अच्छा है कि दो लोग हैं, वरना ये दस बच्चे और एक कुत्ता अकेले नहीं संभलता. जब मैं क्वीन की शूटिंग करने गया, तो एक-दो दिन तो मुझे पता नहीं था कि कैमरा किधर रखना है. मैंने जाने से पहले अनुराग से बात की कि मैं जा तो रहा हूं, लेकिन ये बताओ कि फिल्म बनाते कैसे हैं? उसने बोला कि तुझे स्टोरी पता है ना, कैमरा रख और शूट कर. मुझे तीन-चार दिन लगे रिद्म आने में और फिर मैं सहज हो गया. मैंने यही समझा है कि अगर आपने अच्छा होमवर्क किया है, आपकी टीम अच्छी है और आपमें ईगो नहीं है, तो फिल्ममेकिंग आसान है. क्वीन की शूटिंग के 45 दिन, मेरी जिंदगी के सबसे अच्छे दिन थे.  

मेरे समकक्ष पसंदीदा फिल्मकार

राजकुमार हिरानी
वह जिंदगी को खूबसूरती से देखते हैं. उनका नजरिया मेरे जीवन के प्रति अप्रोच से मिलता-जुलता है. हमारी फिल्म चिल्लर पार्टी उनकी वजह से रिलीज हुई. उन्होंने वह फिल्म देखी और कहा कि अब यह मेरी पिक्चर है. वहां से सबको उस फिल्म में विश्वास आना शुरू हुआ. वह चिल्लर पार्टी से निर्माता के तौर पर जुडऩा चाहते थे.

अनुराग कश्यप
अनुराग फिल्ममेकिंग के मामले में इंडिया को एक अलग लेवल पर ले जाएंगे. वह जानते हैं कि एक फिल्म को कैसे दुनिया भर में पहुंचाया जा सकता है. विश्व स्तर पर उन्हें जो पहचान मिल रही है, वह उसके हकदार हैं. क्योंकि उनकी कहानियां आउट्रेजियस होती हैं, तो लोग सोचते हैं कि वह गैर-जिम्मेदार हैं. 

विक्रमादित्य मोटवानी
वह फिल्म इंडस्ट्री में इस वक्त बेस्ट क्राफ्टमैन हैं. कोई अन्य नहीं है, जो उनके जितना फिल्म के हर डिपार्टमेंट को समझता है. वह कमाल के स्टोरीटेलर हैं. वह जिस खूबसूरती के साथ कहानी को बयां करते हैं, उनकी वह कला अतुलनीय है.

विकास बहल के बारे में तीन रोचक तथ्य
-कॉलेज के दिनों में उन्होंने मंडल कमीशन के विरूद्ध काफी धरने दिए थे और मोर्चे निकाले थे. वह आत्मदाह जैसा कदम न उठा लें, इस डर से उनके पिता ने उन्हें दो दिन तक कमरे में बंद कर दिया था.
-जेब खर्च के लिए वह दिल्ली में मेडिकल कॉन्फ्रेंस में अशरिंग का काम किया करते थे. दिवाली में स्टॉल लगाते थे और कृष्ण जन्माष्टमी के दौरान अपनी मंडली बनाकर पैसा इकट्ठा करते थे.
-उन्होंने एमबीए में गोल्ड मेडल हासिल किया है. इस बात का उन्हें अब तक ताज्जुब होता है.

Saturday, March 15, 2014

दरअसल : सितारे झेलते हैं बदतमीजी


-अजय ब्रह्मात्मज

    हिंदी फिल्मों के सितारों की लोकप्रियता असंदिग्ध है। मनोरंजन के सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम फिलम से संबंधित होने के कारण पहली फिल्म से ही उनके प्रशंसकों का दायरा बढऩे लगता है। अगर सितारा कामयाब होने के साथ दर्शकों को प्रिय है तो उसकी लोकप्रियता का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। सार्वजनिक स्थानों पर उनकी मौजूदगी मात्र से हलचल होने लगती है। उनके पहुंचने के पहले ही उनके गंतव्य स्थान पर सरसराहट सी होने लगती है। सरकारी लाल बत्तियों और प्रशासनिक सुरक्षा में विचरण करने वाले नेताओ,मंत्रियों और आला अधिकारियों से अलग सितारों के मूवमेंट का असर होता है। महानगरों और बड़े शहरों तक में उनकी उपस्थिति से किसी भी स्थान की दशा बदल जाती है। वे भीड़ में भंवर बन जाते हैं। सारा हुजूम उनकी तरफ धंस रहा होता है। हवाई अड्डा,रेस्तरां,स्टेडियम आदि स्थानों पर सुरक्षा कवच में होने के बावजूद उन्हें धक्कामुक्की झेलनी पड़ती है। किसी भी स्थान पर उनके होने या वहां से गुजरने पर दसों दिशाओं की आंखें उन पर केंद्रित हो जाती हैं। वे सभी को सुकून देते हैं। उनकी छवि आंखों में समाते ही होंठों पर मुस्कान आती है। जरूरी नहीं है कि आप उस सितारे के निजी प्रशंसक ही हों। उल्लास का रंग हम सभी को रंगीन करता है।
    इस संदर्भ में यह भी देखें कि मोबाइल क्रांति के बाद सभी हाथों में एक कैमरा आ गया है। किसी भी सेलिब्रिटी से मिलने के साथ पहला काम उसके साथ अपनी तस्वीर उतारना हो गया है। पहले ऑटोग्राफ का चलन था तो कागज के किसी भी टुकड़े पर लोग ऑटोग्राफ ले लेते थे। भले ही वह कागज का टुकड़ा दो दिनों के बाद खो जाता था। इन दिनों वही स्थिति फोटोग्राफ की हो गई है। हर कोई मोबाइल के कैमरे से तस्वीर उतारता है। खुद देखता और दूसरों को दिखाता है। सोशल मीडिया पर एक्टिव हुआ तो फेसबुक और ट्विटर पर डालता है। फिर समय के साथ भूल भी जाता है। अमूमन देखा जा रहा है कि सितारों की छवि उतारने के पहले उनसे अनुमति नहीं ली जाती। पता भी नहीं चलता और उनकी छवि मोबाइल कैमरों में कैद हो जाती है। साथ में तस्वीर उतारनी हो तो अवश्य पूछना पड़ता है। अगर सितारा पुरुष है तो वह ज्यादातर आग्रह मान लेता है। महिला सेलिब्रिटी के इंकार को लोग नखरा-पैंतरा समझ बैठते हैं। सच्चाई यह है कि उनके स्टारडम का बड़ा आधार उनकी छवि है। कई बार वे उचित सज-धज या मूड में नहीं होते तो वे मना कर देते हैं। मैेंने खुद देखा है कि फोटो खिंचवाते समय प्रशंसक नजदीकी दिखाने के लिए सटने या कंधे और कमर पर हाथ रखने की कोशिश करते हैं। एक बार अक्षय कुमार ने अपने प्रशंसक को इस हरकत के लिए डांट दिया था। उन्होंने बताया था कि हर सेलिब्रिटी को यह ध्यान रखना चाहिए कि वह अपरिचित को अपने कंधे पर हाथ न रखने दें। ऐसी तस्वीरों का बेजा लाभ उठाया जाता है।
    पिछले दिनों माधुरी दीक्षित अपनी फिल्म के प्रचार के लिए भोपाल शहर गई थीं। वहां एयरपोर्ट पर एक अधिकारी ने पहले उन्हें आग्रह के साथ वीआईपी रूम में बिठाया। फिर अपना इरादा जाहिर किया। वह माधुरी दीक्षित के साथ अपनी तस्वीर चाहता था। माधुरी के मैनेजर ने मना कर दिया। मना करने के बाद उस अधिकारी ने फिर से दो बार आग्रह किया। तीनों बार मना किए जाने के बाद उक्त अधिकारी तैश में आ गया। उसने साफ कहा,फिर तो आप को वीआईपी लाउंज से बाहर जाना होगा। माधुरी दीक्षित और उनके सहयोगियों ने कोई बखेड़ा नहीं किया। अधिकारी की यह हरकत शुद्ध बदतमीजी ही कही जाएगी। फिल्मी सितारों को आए दिन ऐसी बदतमीजियां झेलनी पड़ती हैं। वे चाहें तो इसकी शिकायत कर सकते हैं,लेकिन भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता। उनकी हर सावधानी बेअसर होती है। साथ ही उन्हें खयाल भी रखना पड़ता है कि उनकी मनाही,शिकायत और रवैए को गलत अर्थों में लेकर बात का बतंगड़ न बना दिया जाए।

Wednesday, March 12, 2014

वक्‍त क्षणभंगुर है-अमित कुमार

यह इंटरव्यू गजेन्‍द्र सिंह भाटी के ब्‍लाॅग फिलम सिनेमा से लिया गया है। 

 Q & A. .Amit Kumar, film director (Monsoon Shootout).
Nawazuddin Siddiqui in a still from 'Monsoon Shootout.'

उनकी द बाइपास काफी वक्त पहले देखी। दो चीजों ने ध्यान आकर्षित किया। पहला, इरफान खान और नवाजुद्दीन सिद्दीकी को एक साथ किसी फ़िल्म में कांटेदार अभिनय करते देखना। दूसरा, बिना किसी शब्द के तकरीबन सोलह मिनट की इस फ़िल्म को बनाने वाले किसी अमित कुमार के निर्देशन और नजरिए को लेकर जागी जिज्ञासा। उनके बारे में ढूंढा, पर वे गायब थे। फिर उनके नए प्रोजेक्ट के बारे में सुना... मॉनसून शूटआउट। इसमें भी प्रमुख भूमिका में नवाज थे। उनसे बात करनी थी, संपर्क किया और कुछ महीनों के इंतजार के बाद कुछ महीने पहले उनसे बात हुई।

बेहद अच्छे मिजाज के अमित भारत में जन्मे और अफ्रीका में पले-बढ़े। पढ़ाई के बाद कई बड़ी होटलों, बैंकों और अमेरिकन एक्सप्रेस जैसे बहुराष्ट्रीय समूह में नौकरी की। पर रुचि शुरू से फ़िल्मों 
में थी। पैरिस के एक फेमिस फ़िल्म स्कूल वर्कशॉप का भी हिस्सा बने। बाद में दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया से मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की। यहां से रुख़ पुणे के फ़िल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया की प्रवेश परीक्षा का किया और दाखिला हो गया। उनकी पत्नी अनुपमा भी एफटीआईआई में पढ़ चुकी हैं और लेखिका-निर्देशिका हैं। यहां से निकलने के बाद वे निर्देशक आसिफ कपाड़िया की फ़िल्म द वॉरियरमें सहयोग करने लगे। दोनों का नाता यहां से गहरा हुआ। फ़िल्म को बाफ्टा मिला और इरफान खान को अभूतपूर्व प्रसिद्धि। 2003 में अमित ने अपनी शॉर्ट फ़िल्म द बाइपासबनाई। इसे बेस्ट शॉर्ट फ़िल्म का बाफ्टा मिला। इसी दौरान उन्होंने मॉनसून शूटआउटबनाने की कोशिशें शुरू कर दी थीं। उन्होंने ब्रिटेन की फ़िल्म काउंसिल से संपर्क किया जहां से सहयोग मिला। द बाइपासके प्रोड्यूसर ट्रेवर इंगमैन भी फ़िल्म से जुड़े। अमित को एक भारतीय निर्माता की भी तलाश थी। यहां दुविधा ये थी कि काउंसिल का बजट ज्यादा था लेकिन शर्त थी कि राशि का उपयोग सिर्फ ब्रिटेन में ही किया जाए, और कोई भारतीय निर्माता इसलिए नहीं जुड़ रहा था क्योंकि बजट काफी ऊंचा था। बाद में यूके फ़िल्म काउंसिल ने अपने हाथ खींच लिए। स्क्रिप्ट तैयार थी पर फ़िल्म लटक गई।

फिर आठ साल बाद यानी 2011 में फ़िल्म शुरू हुई। भारतीय निर्माता के तौर पर गुनीत मोंगा (सिख्या एंटरटेनमेंट) और अनुराग कश्यप जुड़े। फ़िल्म के निर्माण के दौरान आसिफ कपाड़िया क्रिएटिव प्रोड्यूसर रहे। नवाजुद्दीन सिद्दीकी, विजय वर्मा और नीरज कबी (शिप ऑफ थिसीयस), तनिष्ठा चैटर्जी और श्रीजीता डे की भूमिकाओं वाली ये फ़िल्म एक साल से बनकर तैयार है और अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सवों में दिखाई जा रही है। पिछले साल मई में 66वें कान फ़िल्म फेस्ट में इसकी आधी रात के बाद की स्क्रीनिंग हुई। अब इस 4 और 5 फरवरी को बर्लिन के फ़िल्म वीक में इसे दिखाया जाना है।

अमित अपनी अगली फ़िल्म की योजना बना चुके हैं। ये दूसरे विश्व युद्ध की कहानी पर आधारित होगी। फ़िल्म का नाम गिव मी ब्लडरखा गया है। इसका प्रोडक्शन जल्द ही शुरू हो सकता है। इससे पहले मॉनसून शूटआउटको भारत में रिलीज किया जाना है। प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीतः
 
Amit Kumar
कहां रहते हैं?
मुंबई में। काम के सिलसिले में बाहर के चक्कर लगते हैं, घर मुंबई में ही है। पेरेंट्स दिल्ली में रहते हैं।

मॉनसून शूटआउटभारत में कब लगेगी?
कुछ भारतीय प्रदर्शकों को दिखाई थी, उम्मीद है कि इस साल रिलीज हो जाएगी।

बीते साल द लंचबॉक्स’, ‘शिप ऑफ थिसीयसऔर शाहिदजैसी फ़िल्में सिर्फ वैश्विक फ़िल्म महोत्सवों तक नहीं सिमटकर रहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर प्रदर्शित हुईं। अपनी फ़िल्म के लिए भी क्या वैसी ही अपेक्षाएं हैं?
हां, बड़े स्केल पर रिलीज करना चाहते हैं। बाकी देखते हैं, कैसे होता है। अभी कुछ फाइनल नहीं है।

आपने इस फ़िल्म को बनाने में जिंदगी के दस साल दे दिए। क्या मॉनसून शूटआउटइस काबिल थी कि उसे आप जिंदगी का इतना बड़ा हिस्सा दे दें?
 
एक तरह से निजी चीज है। क्या ये फ़िल्म इतना डिजर्व करती थी या नहीं? इसका उतर तो मैं नहीं दे सकता। क्योंकि, अंततः बात ये है कि आप क्यों बना रहे हैं? कोई कहता है, पैसा कमाने के लिए बना रहा हूं। ऐसे में एक फ़िल्म दस साल में बनाओगे तो कोई फायदा नहीं। मेरा मोटिवेशन ये आइडिया था। मेरा मोटिवेशन ये एक पॉइंट है कि जो मेरे दिमाग में है वो लोगों को स्टोरी की फॉर्म में दिखना चाहिए। चाहे कितनी भी बाधाएं आएं पर फ़िल्म बनानी है। और भी कई रहे होंगे जो दस साल लगाकर भी एक फ़िल्म नहीं बना पाए। और भी कई हैं जो नए आइडिया पर ही लगे हैं, बनाना तो बहुत दूर है। तो ये (मॉनसून...) बन गई। अब फ़िल्म फेस्टिवल्स में घूम रही है। दर्शकों के साथ कनेक्ट करेगी। मेरे लिहाज से तो ये वर्थ इट (काबिल) थी। जब बनी तो, इंडि फ़िल्ममेकर्स के लिए जो सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म होता है कान फ़िल्म फेस्टिवल, वहां सम्मान मिला। हालांकि ये कान का सम्मान नहीं भी होता तो मेरे लिए फ़िल्म वर्थ इट है।

इतना वक्त क्यों लगा, आगे भी इतना ही वक्त लगाएंगे? यदि हां, तो कैसे चलेगा? क्योंकि कमर्शियल फ़िल्म होगी तो कोई आर्थिक प्रारूप इतने लंबे वक्त में फ़िल्म को सपोर्ट नहीं करता, अगर इंडिपेंडेंट भी बनाएंगे तो इस हिसाब से पूरी जिंदगी में कितनी कहानियां कह पाएंगे?
मेरी पर्सनैलिटी का असर पड़ता है फ़िल्म पर। कई लोग सिंगल माइंडेड होते हैं। मैं बैंलेस्ड हूं। मेरे दो बच्चे हैं। उनके साथ टाइम बिताता हूं, सब कुछ करता हूं। दूसरा ये कि कहानी या फ़िल्म को लेकर सिंगल माइंडेड ऑब्सेस्ड हूं तो विचार आते हैं कि इस तरह से ये-ये बनाना है और उसके लिए फिर प्रोजेक्ट के सही हिस्से मिलने चाहिए जो आपके विजन से मेल खाते हों। फ़िल्म को ऐसे ही बनाना चाहिए। मेरे लिए फ़िल्म में वो हिस्से ढूंढने मुश्किल थे। उसमें वक्त लगा। अब स्वीकार्यता आ गई है इंडि सिनेमा में कि नई स्टोरी है, पर अच्छी है। अलग टाइप को स्वीकार करते हैं। आसान हो गया है, ऐसे विचारों पर बनाना। अंतत मॉनसून शूटआउटएक थ्रिलर ही है, बस अलग अप्रोच से बनाई गई है।
  
खैर, मेरा तो यही तरीका है। अलग तरीका हुआ तो ये हो सकता है कि लिखने में टाइम ज्यादा लगे पर जल्दी बन जाए। मॉनसून शूटआउटमें कहानी लिखने में टाइम लगा, फिर प्रोसेस में मोटे बदलाव करने पड़े। शुरू से शुरू करना पड़ा। आपकी बात सही भी है। आगे वाली फ़िल्म, आशा है अच्छे ढंग से बनाएंगे। कम टाइम लगेगा। लेकिन कहना चाहूंगा, मैं किसी दौड़ में नहीं हूं, कोई जल्दी नहीं है।
  
साइड बाइ साइड दूसरा काम भी चलता रहता है। सिर्फ फ़िल्में ही नहीं हैं। पर्सनल चॉयस में लोग जिंदगी के दूसरे अध्यायों पर ध्यान नहीं देते, मैं देता हूं। बाकी जितनी फ़िल्में बना पाया उतना अच्छा। कुछ खास कहानियां हैं, कुछ खास पार्टनर हैं तो उन्हीं पर ध्यान है। कई चीजें संयोगवश होती हैं। एक साल में भी हो जाता है और दस साल भी लग जाते हैं। एक स्क्रिप्ट में तीन साल लगे और एक है जो एक साल लिखी है।
The Bypass (2003)


द बाइपासकैसे बनी? आज के दो बेहद प्रभावी अभिनेता इरफान खान और नवाजुद्दीन सिद्दीकी पहली बार 2003 में आपकी इसी शॉर्ट फ़िल्म से साथ दिखे थे। उन्हें कैसे कास्ट किया?
मैं द वॉरियर’ (2001) में उसके निर्देशक आसिफ कपाड़िया के साथ काम कर रहा था। हम साथ घूमते थे। मैं सहयोगी निर्देशक था। उनकी ग्रेजुएशन फ़िल्म के दौरान मिला था। साथ में हुए, लोकेशन रेकी की। तब मैं अपने आइडिया उन्हें बताता रहता था। एक द बाइपासका बताया था और एक मॉनसून शूटआउटका। फिर काफी दिन बाद उन्होंने मुझे फोन किया। बोले कि एक फ़िल्म कॉम्पिटीशन (UKFC Cinema Extreme short film programme) है, उसमें अपनी कहानी जमा करवा दो, कौन सी करवाना चाहोगे? मैंने कहा कि ये दो हैं पर मैं मॉनसून शूटआउटको करवाना चाहता हूं। पर वे बोले कि द बाइपासकर दो, ये अच्छी कहानी है। हालांकि मेरा मन नहीं था पर उनकी बात मानी और वो ही किया। फिर बनाने की बात आई तो द वॉरियरके कास्टिंग डायरेक्टर रह चुके तिग्मांशु धूलिया से संपर्क किया। उन्होंने द बाइपासकी कास्टिंग की। इरफान को लिया। उसके बाद नवाजुद्दीन को लिया। नवाज का जिक्र हुआ तो बोले कि स्टार बेस्टसेलर्स में एक लड़का था वो अच्छा है। मैंने सीरियल देखा, उसमें एक दृश्य है जिसमें नवाज का किरदार मुड़कर आइने में देखता है, तो मुझे उसकी आंखें बहुत अच्छी लगीं, मेरे जेहन में बस गई। मैंने उसे बुलाया, ऑडिशन लिया। मुझे तुरंत लगा कि यही है मेरा दूसरा किरदार। यूं बनी।

फ़िल्ममेकिंग के इतने लंबे बाधा भरे सफर में निराश नहीं हुए? दूसरा, आपने मॉनसून...की कहानी 2003 से भी पहले सोच रखी थी। ऐसे में जब इंसानी दिमाग में हर पल विचार, विजुअल, भाव बदल जाते हैं, आपने इतने लंबे वक्त तक अपनी इस फ़िल्म की कहानी और तीव्रता को कैसे जस का तस सहेजकर रखा?
मेरा एक दार्शनिक नजरिया (Philosophical Approach) जो है जिंदगी को लेकर, वो एक तरह से फिक्स है। उसी के आसपास जिंदगी के बाकी अध्यायों और हिस्सों को देखता हूं। उसमें आमतौर पर फ्रस्ट्रेशन का कॉलम नहीं आता। नहीं तो वो बाधा बन सकती है, कि यार इतने साल से कर रहा हूं। तो वो नहीं आने देता। दूसरी बात कि स्टोरी की इमोशनल इंटेग्रिटी को बनाए रखना एक लंबे वक्त तक। मेरे लिए दिमाग में वो जमा है, एक तकरीबन ठोस आकार में है। यानी विजुअली है। सिर्फ शब्द ही नहीं है। एक तरह से वो फ़िल्म बन गई है दिमाग में। अब चाहे अगले दिन शूट करूं या चार दिन बाद, दिमाग से ही निकालनी है। हां, लिखते हुए स्टोरी बदलती है, लेकिन जो भी उसका दिल है वो इस पूरे सफर के दौरान मन में पूरी छत्रछाया में रहता है। ये अब तक का अनुभव है।

आगे किस कहानी पर फ़िल्म बनाएंगे?
अपने जर्मन फ़िल्ममेकर दोस्त फ्लोरियन गॉलनबर्गर (Florian Gallenberger) के साथ 2007 में उसकी फ़िल्म (City of War: The Story of John Rabe, 2009) के निर्देशन में सहयोग किया था। इसकी रिसर्च (सिटी ऑफ वॉरः द स्टोरी ऑफ जॉन रेब’, दरअसल जॉन रेब नाम के जर्मन बिजनेसमैन की कहानी थी जिसने अपनी नाज़ी सदस्यता का इस्तेमाल 1937-38 में नेनकिन नरसंहार के दौरान 2 लाख से ज्यादा चीनी नागरिकों की जान बचाने में किया था) कर रहा था तो मुझे एक कहानी मिली। ये दूसरे विश्व युद्ध के दौरान की बात है। तभी से तय कर लिया कि इस पर फ़िल्म (Give Me Blood) बनानी है। ये मेरी अगली फ़िल्म हो सकती है।

आप कैसे इंसान हैं? क्योंकि बातचीत से लग रहा है कि बहुत तनाव में नहीं रहते, बेहद कूल हैं। ऐसे कैसे?
मैं बहुत शांतचित्त और ढीला आदमी हूं। टकराव ज्यादा पसंद नहीं करता। रिलैक्स होना पसंद करता हूं। आमतौर पर ज्यादा गुस्सा नहीं करता। जिंदगी के प्रति रवैया ये है कि हम लोग समझते हैं कि कंट्रोल में हैं पर होते नहीं हैं। इसलिए किसी चीज को कंट्रोल में करने की कोशिश कर रहे हैं और हो नहीं रही। ये मॉनसून...की जर्नी में बहुत हुआ। ब्रिटिश फ़िल्म काउंसिल ने आधे रास्ते में ही हाथ खींच लिए तो दोस्त चिल्लाने लगे, बहुत चिंतित हुए, लेकिन मैंने कहा, कोई बात नहीं। मैं आम मध्यमवर्गीय परिवार से हूं जो बच्चों को इंजीनियर बनाने के सपने देखते हैं। मैंने जैसे-तैसे अपने सपने फ़िल्म बनाने के, पूरे कर लिए। मुझे कोई शिकायत नहीं है। नहीं हुआ यार तो कोई बात नहीं, मेरा यही रास्ता है, ठीक है। मुझे हंसने में बहुत मजा आता है। जोक करने में आता है। खाना बनाना बहुत अच्छा लगता है। हर तरह की फ़िल्म देखना पसंद है। कमर्शियल, आर्टहाउस, रोमैंटिक, मसाला। ये नहीं कि जैसी बनाता हूं वैसी ही देखता हूं। परिवार के साथ बहुत वक्त बिताना चाहता हूं।

पर आपको ईर्ष्या, दुख या पछतावा नहीं होता कि 2003 में आपने द बाइपासबनी ली थी, जिसे बाफ्टा तक में सम्मान मिला? उसके बाद 2014 तक में आपकी दूसरी फ़िल्म लोगों के बीच पहुंच नहीं पाई है जबकि इतने वक्त में लोगों ने कितनी शानदार फ़िल्में बना ली और बतौर फ़िल्ममेकर अपने सफर में बहुत आगे पहुंच गए। आप अब तक शुरू भी ढंग से नहीं हुए, बहुत पीछे रह गए। जलन नहीं होती कि यार उस लड़के ने, जो बच्चा ही था, इतनी जोरदार फ़िल्म बना दी और मुझे वो सम्मान नहीं मिला?
मेरा दृष्टिकोण है कि मेरा ये पथ है और आपको वो है। है न? दूसरे फ़िल्ममेकर ने फाड़ू फ़िल्म बना दी हो 20 की उम्र में और मैं 50 का हूं, तब मैं सोचूं, यार मैंने नहीं बनाई। हो सकता है वो 23 के बाद कोई न बनाए, मैं 55 के बाद फाड़ू बना दूं। तो अपने पथ में खुश हूं। उसने ये कर लिया मैंने क्यों नहीं किया? ये तुलना नहीं करता। अगर मुड़ें तो देखेंगे कि आज अगर निराशा आती है तो कल पॉजिटिविटी आ जाती है। जब निराशा आती है तो लगता है दुनिया ख़त्म हो गई। पर पिछली बार ऐसे ही मौके को देखो तो पता चलेगा कि ये बीतेगा। मैं तो प्रेरणा की तरह ले लेता हूं। बड़ी फ़िल्म हो तो सोचता हूं, यार... कमाल, ऐसी फ़िल्म बन गई। मैं मानता हूं कि ये अकेले डायरेक्टर का नहीं है, पूरी टीम का है। द बाइपासमें आप राजीव रवि (कैमरा वर्क) का काम देखिए। एक्टर्स को देखिए। मैं तो इस तरह से लेता हूं।

बचपन से लेकर अब तक ऐसी कौन सी फ़िल्में रही हैं जिन्होंने सम्मोहित कर दिया जो शानदार लगीं?
एक फ़िल्म अभी आई वंस अपॉन अ टाइम इन ऐनेटोलिया’ (Once Upon a Time in Anatolia, 2011)। बहुत बढ़िया लगी। लगा, यार, लोग ऐसा कमाल का काम कर रहे हैं। मतलब, होप है कि मैं भी करूंगा और कमाल की फ़िल्में बनाऊंगा। फिर 2012 में देखी अ सैपरेशन’ (A Separation, 2011)। कमाल की फ़िल्म बनाई यार। कोई बोलेगा, कोई एक्शन नहीं, छोटा सा कमरा, लव अफेयर भी नहीं चल रहा। सिंपल है, पर क्या ग्रिपिंग बना ली। पल्प फिक्शन’ (Pulp Fiction, 1994) पहली बार देखी तो एक-एक चीज, डायलॉग्स, स्टेजिंग, एक-एक चीज कमाल लगी। चारूलता’ (Charulata, 1964) बहुत बढ़िया लगती है। हर कोई पाथेर पांचाली’ (Pather Panchali, 1955) को महान कहता है, मैं चारूलताको डिफाइन नहीं कर पाया, पर बहुत अलग है। सत्या’ (Satya, 1998) बहुत अच्छी लगी थी। उससे पहले रामू (राम गोपाल वर्मा) की शिवा’ (Shiva, 1989) बहुत अच्छी लगी। तब मैं दिल्ली में कॉलेज में था। पोस्टर लगा तो देखा कि यार कौन सी है, कमाल है। मैंने उसके बाद फिर हालांकि देखी नहीं। शोले’ (Sholay, 1975)। मैं बचपन में इंडिया में रहता था। फिर हम अफ्रीका चले गए। वहां मैं और मेरा भाई इस फ़िल्म के किरदारों की नकल उतारते थे। शायद उसी की वजह से मैं फ़िल्ममेकर बना हूं। वहीं से कर-कर के स्टोरीटेलिंग सीखी। कि जय और वीरू ही क्यों बने हैं, स्पाइडरमैन बन जाते हैं। एक फ्रेंच फ़िल्मकार हैं लियो कैरेक (Leos Carax), उनकी फ़िल्म मोवे सांग’ (Mauvais Sang, 1986) देखी। दिल्ली में फ्रेंच एंबेसी में एक फ़िल्म फेस्टिवल में देखी, तब मैं जामिया मिल्लिया इस्लामिया में पढ़ रहा था। इसके अलावा वंस अपॉन अ टाइम इन द वेस्ट’ (Once Upon a Time in the West, 1968)। कमाल की फ़िल्म है। अकीरा कुरोसावा (Akira Kurosawa) की सेवन सामुराई’ (Seven Samurai, 1954)स्टॉकर’ (Stalker, 1979), आंद्रेई तारकोवस्की (Andrei Tarkovsky) की। अ शॉर्ट फ़िल्म अबाउट किलिंग’ (A Short Film About Killing, 1988)। एक शानदार चिलियन फ़िल्ममेकर हैं मिग्वेल लिटिन (Miguel Littín) उनकी फ़िल्में कमाल की हैं, अगर आपको किश्लोवस्की की अ शॉर्ट फ़िल्म अबाउट किलिंगफाड़ू लगती है न, कि क्या मासूम लोग हैं और इनके साथ क्या हो रहा है, तो आप इनकी फ़िल्में देखिए।

क्या आप फ़िल्मों की श्रेष्ठता को उस लिहाज से देखते हैं कि विमर्श और आलोचना पर खरी कौन उतरी है, या यूं ही? जैसे सत्यजीत रे हैं। उनकी फ़िल्में आलोचना के तकरीबन सभी मानकों के पार जाती हैं। स्क्रीनप्ले, सौंदर्य, तकनीक से प्रयोग, विचार, एडिटिंग, कुल कंपोजिशन, और भी बहुत कुछ। सबमें वे अव्वल खड़े हैं। क्या उनके समकक्ष या उस लिहाज से आपके पसंदीदा कोई निर्देशक हैं? क्या आप फ़िल्मों को ऐसे देखते हैं?
रे साहब की तरह विट्टोरियो डी सिका (Vittorio De Sica) थे। वैसे सच कहूं तो मैंने कभी फ़िल्मों को उस तरह से नहीं देखा। मेरे लिए फ़िल्म उस तरह मायने रखती है कि मैंने देखी और मेरे दिल में क्या भाव पैदा किए और मैं कितने दिन उसके बारे में सोचता रहा। जब अ सैपरेशनदेखी तो शॉट्स के बारे में नहीं सोचता रहा। बस देखने के बाद तक महीनों देखता रहा। जैसे आपको चारूलताका जिक्र करता हूं तो दिमाग में उसका सीन क्रिएट होता है। तो वो एक्चुअली बताना बड़ा मुश्किल है। बहुत सारी चीजें उसमें शामिल होती हैं। कई बार गलत हो सकती हैं, परफेक्ट बन सकती हैं। मैं उस तरह से देखता हूं। फैलिनी (Federico Fellini) की ‘8 एंड अ हाफ’ (8½, 1963) ले लीजिए। ये जादुई फ़िल्में हैं। मेरे लिए स्टॉकरबड़ी जादुई है। मैं ये नहीं सोचता कि रे अकेले खड़े हैं।

फ़िल्म को आप कैसे देखते हैं? खासकर ऐसी फ़िल्मों को जो किसी आइडियोलॉजी की बात करती हैं या जो बहुत गूढ़ और घने विचार लिए होती हैं। जैसे, कोपोला (Francis Ford Coppola) की अपोकलिप्स नाओ’ (Apocalypse Now, 1979) को देखें तो चुंधिया देने वाली फ़िल्म है। अब इसे समझने के लिए आप किस स्तर तक जाएंगे? क्या आप उतना समझ लेंगे जितना निर्देशक को खुद समझ आया होगा? वो पूरा विमर्श, वो अमरत्व की बात, वियतनाम युद्ध का संदर्भ और सही-गलत का पूरा व्यापक प्रश्न।
मेरे लिए जरूरी ये है कि फ़िल्म का मुझ पर प्रभाव क्या होता है। मैं ब्रेक डाऊन नहीं करता या उसे तोड़ता नहीं कि ये फिलॉसफी रही होगी। फाइनली फ़िल्मकार ने जो भी हलवा बनाया होगा या जो भी विषय-वस्तु है, ...मूल उद्देश्य ये है कि लोग देखें और असर पड़े। एंटरटेनमेंट भी हो सकता है असर। कॉमेडी फ़िल्म है तो उद्देश्य है लोगों को हंसाना। हॉरर का डराना है। पॉलिटिकल का कुछ और है। मैं सवाल नहीं करता कि उन्होंने ऐसे बनाई। मुझे याद है जब पहली बार देखी तो सोचा, कि क्या बनाई है यार अपोकलिप्स नाओ। मैं ये नहीं सोच रहा हूं कि क्या पागलपन बनाया है। कभी-कभी समझ ही नहीं पाता हूं। नो स्मोकिंगदेखी हॉल में तो थोड़ी समझ आई, पर बाद में उलझ गया कि डायरेक्टर ये नहीं वो दिखा रहा है, कुछ और चक्कर है। तो ऐसे ही एंजॉय करता हूं न। पूरा देखा तो अंत में एक असर था। मैंने पहली बार फ़िल्म के बारे में बात की तो कहा कि यार प्रभावित हूं।

टैरेंस मलिक की फ़िल्में कितनी समझ आती हैं?
मैं कुछ देखता हूं, समझ आती है तो ठीक, नहीं आती तो ठीक। जैसे कोई शेफ बहुत बढ़िया सुशी बनाता है तो बनाए, मैं पावभाजी ही खाना चाहता हूं। वंस अपॉन अ टाइम इन ऐनेटोलियामेरी वाइफ ने मुझे रेफर की थी। बोली कि गजब है, देखो! मैंने देखी तो सो गया, क्या कमाल-वमाल। फिर एक बार दोबारा देखी तो ग्रिप में रह गया, देखता ही रह गया। वो तब की मानसिक अवस्था भी थी। उसका भी फर्क पड़ता है। कहने का मतलब ये है कि कुछ हो फ़िल्म में, तो चांस दो। मुझे कोई अनिवार्यता नहीं लगती।

अपनी फ़िल्म में आप न जाने कितनी बातें कहते हो, संदर्भ रखते हो, कितने इशारे करते हो लेकिन दर्शक उनमें से ज्यादातर नहीं देखता। ऐसे में दुख नहीं होता कि जितनी कोशिश की वो पूरी तरह कोई समझा ही नहीं? जैसे आपने कहा कि पहली बार में वंस अपॉन अ टाइम इन ऐनेटोलियाआपने खारिज ही कर दी थी, जबकि तब भी उसमें उतनी ही शानदार चीजें थीं।
अब जैसे मैंने मॉनसून शूटआउटबनाई। मैंने मान लीजिए उसमें 50 चीजें डाली। और 90 परसेंट दर्शकों ने उन 50 चीजों में से सिर्फ 20 चीजें लीं। कोई दिक्कत नहीं। क्योंकि वो 20 भी मैंने ही डाली थीं। कुछ लोग 40 चीज लेंगे। कुछ लोग 60 ले लेंगे। उनके पर्सनल एक्सपीरियंस से वो लेते होंगे। कोई बोलेगा कि आपने फ़िल्म के उस सीन में वो किया था न, कमाल था। और उस वक्त मैं मन ही मन सोचूंगा कि यार ऐसा तो मैंने सोच कर डाला ही नहीं था। तो ये मेरी ड्यूटी है कि जो डालना चाहता हूं डालूं, और लेने वाले का अपना है वो क्या ले। 10 ले, 50 ले, मेरे डालने से ज्यादा ले। हर इंसान का अलग होता है। जितना ज्यादा लोग देख पाएं।

मॉनसून...को लेकर सबसे यादगार प्रशंसा आपको क्या मिली है?
कान (Cannes International Film Festival) में आधी रात की स्क्रीनिंग थी फ़िल्म की। बारिश हो गई थी तो थोड़ा सा आगे खिसक गई थी। 12 की जगह रात 1.30 बजे फ़िल्म शुरू हई। खत्म हुई 2.30-3 बजे। तब फ़िल्म को 10 मिनट का स्टैंडिंग ओवेशन मिला। कोई औपचारिकता नहीं थी, अच्छी नहीं लगती तो लोग चले जाते हैं। दुनिया भर के लोग आए हुए थे, वो रात को पब में जा सकते थे लेकिन मॉनसून...देखने आए। इसका मतलब ये हुआ कि मैंने जो 50 चीजें डाली हैं उनमें से ज्यादातर पकड़ में आईं उनके। मुख्य बात ये है कि फ़िल्म से जुड़ाव बना उनका। इतने सारे लोग थे और खड़े होकर तालियां बजा रहे थे आधी रात को, तो ये अच्छा लगा।

आप छोटे थे तो ऐसी कौन सी चीजें थीं जिन्होंने कहानियों की रुचि आपमें डाली? किताबें, फ़िल्में, साहित्य, पड़ोस, दोस्त, माहौल, परिवार के लोग... क्या? क्या यादे हैं?
मेरे बाबा थे। वो कहानियां सुनाते थे, जब हम छोटे थे। एक याद है। कोई किंगकॉन्ग की थी। वो विजुअली याद है। वो एक किंगकॉन्ग है, लड़की है, बाल बना रही है। तो वो यादें, दृश्य दिमाग में बैठे हुए हैं। शोलेका असर था। मैं और मेरा भाई गेम्स खेलते थे। फ़िल्म को लेकर अभिनय करते थे। एक-दूजे के सामने बैठकर फ़िल्म की कहानी सुनाते थे। ये खेल खूब खेलते थे। क्योंकि हम लोग अफ्रीका में रहते थे, तो सब अमेरिकन शो आते थे। कॉमिक्स पढ़ता था। विश्व युद्ध-2 की कॉमिक्स खूब थीं। हो सकता है रूचि वहीं से आई हो। बैटमैन-स्पाइडरमैन नहीं पढ़ी। फैनटैस्टिक फोर और सुपरमैन पढ़ता था। अब अपने बच्चों को रोज कहानी सुनाता हूं। दो बच्चे हैं, दोनों को एक-एक शब्द चुनने को कहता हूं। और उन्हें मिलाकर कहानी बना देता हूं।

बच्चों को कहानी सुनाने का वक्त कैसे निकाल लेते हैं? जबकि गीक्स या अन्य तरह के फ़िल्मकारों को अपनी फ़िल्मों के अलावा कोई चीज नहीं दिखती।
देखिए, मैं मानता हूं कि वक्त बहुत क्षणभंगुर है। जो है आसपास, वो एक सेकेंड बाद नहीं है। कोई बोले कि यार टाइम नहीं है, बहुत फ़िल्में बनानी हैं। कोई बोले कि लाइफ में इतने सुख हैं, परिवार वगैरह। तो दोनों ही चीजें निकल ही रही हैं न। अभी बच्चे छोटे हैं तो कहानियां सुना सकता हूं। बड़े हो जाएंगे तो अपनी कहानी खुद सुनेंगे। अभी कैसी भी कहानी की तारीफ करते हैं, बाद में नहीं करेंगे। कभी-कभी मीटिंग होती तो छूट जाता है। लेकिन ये रात का रिचुअल है जो मैं करता ही हूं। अपना दृष्टिकोण है। मुझे लगता है कि बात करनी जरूरी चीज है।

2012-13
में कौन सी फ़िल्में बेहद अच्छी लगीं?
शाहिदकी शुरुआत ही देख पाया, पूरी नहीं देखी, मुझे लगा कि बहुत बढ़िया होगी। द लंचबॉक्सबहुत बढ़िया फ़िल्म है यार। रितेश की कैफे कायरोभी बहुत अच्छी लगी। कन्नड़ फ़िल्ममेकर हैं पवन कुमार उनकी लुसिया। लंदन में अवॉर्ड मिला था। कमाल की फ़िल्म लगी मुझे। पैडलर्सअच्छी है। कम से कम लोग इन फ़िल्मों को देख तो लें। और भी कई फ़िल्में रहीं, मैं सबको देख नहीं पाया।

आपके जीवन का दर्शन क्या है?
मेरी फिलॉसफी है कि जो होना है वो होगा। वो आपके कंट्रोल से बाहर है। मैं चिंता नहीं करता। मॉनसून...अभी के अभी रिलीज हो! क्यों नहीं हो रही? क्या है यार! ये नहीं करता। प्रोग्रैमर या आपके भगवान को आपका पथ पता है, तो एक हफ्ते तक मैं क्यों परेशान होता रहूं? कौन करेगा? कब करेगा? नहीं सोचता।

वेद-पुराण भी पढ़े हैं क्या? पुराणों में किसी फिलॉसफी को मानते हैं?
ये मेरी मम्मी मजाक करती हैं कि तुम तो ज्ञानी हो। वो पूजा-पाठ करती रहती हैं। मैं पूछता हूं कि पूजा तो रोज करती हैं कि फिर टेंशन क्यों लेती हैं। मेरे ख्याल से माइथोलॉजी में मैं श्रीमद्भगवद्गीता का फैन हूं। ये नहीं कि दो साल पहाड़ी में जाकर पढ़ा है, जो भी पढ़ा वो कनेक्शन हो गया है। जो विचार हैं न, वो फ्रेजेज में भी होते हैं। टीवी में, किताबों में, कहानियों में, सब में उस विचार का निचोड़ (एसेंस) आ जाता है। घर में मम्मी कुछ-कुछ रेफर करती थीं पढ़ने के लिए और एक बार मैंने गीता का साधारण संस्करण देखा, वैसे भी देखता रहता था। एकदम सटीक याद नहीं कब-क्या पढ़ा।

मंदिर जाते हैं? धर्म को लेकर आपके रिचुअल क्या हैं?
सबका अपना विचार होता है। मैं कभी धार्मिक नहीं था। मैं पूजा करना और मंदिर जाना वगैरह नहीं करता था। मेरा ये नहीं कि जाना ही है। कोई मंदिर कला और स्थापत्य का अद्भुत नमूना है तो देखने जाता हूं। भगवान तो दिल में रहता है। कर्म-कांड पहले किए हों तो याद नहीं लेकिन अब नहीं करता हूं। कई चीजें मैं देखता था बचपन में, अब एक फ़िल्मकार के तौर पर देखता हूं तो पता चलता है कि खास नहीं थीं। अब तो बच्चे कार्टून देखते हैं तो मैं भी मजे से देखता हूं। वो फीलिंग जबरदस्ती नहीं पैदा करनी चाहिए।

मॉनसून...की कहानी क्या है? क्या एक पुलिसवाले और अपराधी की है जो बरसात में खड़े हैं और कुछ पलों में पूरी फ़िल्म सिमटी है?
हां, वो ही है। एक कॉप (विजय वर्मा) है। उसने अपराधी (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) पर रिवॉल्वर तान रखी है। पलों में ही सबकुछ हो रहा है। वो सोच रहा है कि गोली मारूं या नहीं मारूं? तुरंत फैसला लेना है। लेकिन उन चंद पलों में उसके दिमाग में कई कहानियां, घटनाएं, नैतिक सवाल तैर रहे हैं।

फ़िल्म शूट करने की आपकी प्रक्रिया क्या होती है? आप अपने सिनेमैटोग्राफर के साथ मिलकर सीन्स की योजना कैसे बनाते हैं, उसके लुक को लेकर क्या बातें करते हैं? अभिनेताओं को आप कैसे ब्रीफ करते हैं, उनसे क्या भाव निकलवाने की कोशिश करते हैं?
मेरी दोनों ही फ़िल्मों के सिनेमैटोग्राफर राजीव रवि रहे हैं। हम दोनों एफटीआईआई में साथ पढ़े हैं। हमारी आपसी समझ अच्छी है। हम लोग शूट करने से पहले संदर्भों पर बात करते थे कि दृश्य कैसे चाहिए, कैसे नहीं। जैसे बाइपासमें हमने तय किया कि रेत का रंग मौलिक रहे। वो सुनहरे रंग की ग्लैमरस रेत नहीं होगी जो फ़िल्मों में दिखाई जाती है। वो साधारण रेत होगी। लोग सूर्यास्त के वक्त शूट करते हैं, हमने चिलचिलाती धूप में किया। उसी तरह मानसून...में हमने इस पर बहुत बात की कि बरसात को कैसे दिखाएंगे। तो बरसात हमारा विजुअल रेफरेंस पॉइंट है। सब उसी से निकला। जहां तक अभिनेताओं से बात करने का सवाल है तो उनके साथ शुरुआती प्रक्रिया गहरी होती है। जब तक हम वर्कशॉप खत्म करते हैं सब एक्टर्स को पता होता है कि अपने और फ़िल्म के परफॉर्मेंस को कहां ले जाना है। इस तरह योजना बनाने से थोड़ा आसान हो जाता है। एक सीन के लिए सही बिंदु मिल गया तो सारी फ़िल्म के लिए मिल जाता है। तो एक-एक सीन का गहराई से अभ्यास करने की जरूरत नहीं होती।

कैमरे कौन से इस्तेमाल किए?
एलेक्सा डिजिटल (Alexa digital) है, वो ही यूज किया। फाइव डी (Canon 5D) भी। कुछ पलों के लिए।
Tannishtha Chatterjee and Nawaz in a still from 'Monsoon Shootout.'
Amit Kumar is a film writer and a director. He lives is Mumbai. He's a graduate from FTII, Pune. He's worked with BAFTA-winning British director Asif Kapadia (Senna) as associate director on his 2001 feature The Warrior, starring Irrfan Khan. He's also worked on Oscar-winning German director Florian Gallenberger's 2004 feature Shadows of Time, which was set in India, and on City of War: The Story of John Rabe, which was released in 2009. Kumar debuted with his acclaimed 2003 short The Bypass, which picked up various awards, including a BAFTA for best short film. His feature debut Monsoon Shootout is doing the rounds for various international film fests. It was in the Midnight Screenings program at 66th Cannes film fest last year. Kumar is planning to release the movie in India this year. His next film is set in WW II called 'Give Me Blood.'
- See more at: http://filamcinema.blogspot.in/#sthash.dciBJh9I.dpuf