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Friday, February 28, 2014

फिल्‍म समीक्षा : शादी के साइड इफेक्‍टृस

पति,पत्‍नी और इच्‍छाएं 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
न तो फरहान अख्तर और न विद्या बालन,दोनों में से कोई भी कामेडी के लिए चर्चित नहीं रहा। निर्देशक साकेत चौधरी ने उन्हें शादी के साइड इफेक्ट्स में एक साथ पेश करने का जोखिम उठाया है। फरहान अख्तर की पिछली फिल्म 'भाग मिल्खा भाग' रही है। उसके पहले भी वे अपनी अदाकारी में हंसी-मजाक से दूर रहे हैं। विद्या बालन ने अवश्य घनचक्कर में एक कोशिश की थी,जो अधिकांश दर्शकों और समीक्षकों के सिर के ऊपर से निकल गई थी। साकेत चौधरी ने शादी के साइड इफेक्ट्स में दोनों को परिचित किरदार दिए हैं और उनका परिवेश घरेलू रखा है। इन दिनों ज्यादातर नवदंपति सिड और तृषा की तरह रिलेशनशिप में तनाव,दबाव और मुश्किलें महसूस कर रहे हैं। सभी शिक्षा और समानता के साथ निजी स्पेस और आजादी की चाहत रखते हैं। कई बा लगता है पति या पत्‍‌नी की वजह से जिंदगी संकुचित और सीमित हो रही है। निदान कहीं और नहीं है। परस्पर समझदारी से ही इसे हासिल किया जा सकता है,क्योंकि हर दंपति की शादीशुदा जिंदगी के अनुभव अलग होते हैं।
सिड और तृषा अपनी शादीशुदा जिंदगी में ताजगी बनाए रखने के लिए नए एडवेंचर करते रहते हैं। वे नित नए तरीके अपनाते हैं। उनकी हैपनिंग शादी में बेटी के आगमन से झटका लगता है। सिड को लगता हैकि तृषा उसके हर काम और एक्शन में कोई कमी निकालती रहती है। वह धीरे-धीरे खुद को तृषा और घरेलू जिंदगी से दूर करता है। रणवीर की उल्टी-सीधी सलाह से उसकी दिक्कतें और बढ़ती हैं। शादी संभालने के चक्कर में वह और गलतियां करता है। तृषा भी नहीं भूल पाती है कि बेटी के आगमन से उसे प्रमोशन और नौकरी छोड़नी पड़ी। दोनों एक-दूसरे को जिम्मेदार नहीं ठहराने पर भी कुढ़ते रहते हैं। उनकी शादीशुदा जिंदगी पहले की तरह खशहाल नहीं रह जाती। आखिकर उन्हें एहसास होता है कि कहीं और जाने या सलाह करने से बेहतर है कि खुद को समझाएं और भरोसा रखें। सुलह होने के बाद हम फिर देखते हैं कि आदतन पति-पत्‍‌नी में से एक निजी तफरीह के लिए पुन: झूठ बोलने से बाज नहीं आता।
साकेत चौधरी ने पति-पत्‍‌नी के बीच की गलतफहमियों और मुश्किलों को एडल्ट कामेडी नहीं होने दिया है। सचमुच यह रोमांस से अधिक रिलेशनशिप की कामेडी है। फरहान अख्तर और विद्या बालन ने बहुत संजीदगी से अपने किरदारों को जिया है। वे हंसाने के लिए हरकतें नहीं करते हैं। उनकी हरकतों पर हंसी आती है। दोनों अपने संबंधों को लेकर गंभीर और चिंतित हैं। उनकी उलझनों में सादगी है। अभिनय की दृष्टि से दोनों की संगत और टाइमिंग सही है। परफारमेंस में वे पूरक भूमिकाएं भी अदा करते हैं।
हिंदी में ऐसी कामेडी फिल्में नहीं बनी हैं। रिलेशनशिन कामेडी में हमेशा एक वो रहती या रहता है। यहां भी वो है,लेकिन वह कोई व्यक्ति नहीं है। सिड और तृषा की इच्छाएं ही वो हैं। हालांकि फिल्म में रणवीर कहता है कि अफयर तो अफेयर है। चाहे वह व्यक्ति से हो या खुद से ़ ़ ़ समाज में किसी दूसरी या दूसरे से हुए अफेयर को ही अफेयर माना जाता है,जबकि हम में से ड्यादातर दांपत्य जीवन में किसी और अफेयर की वजह से पार्टनर को कम समय और महत्व देकर अपनी जिंदगी की रिक्तता बढ़ाते रहते हैं।
स्टार- 3
अवधि-145 मिनट

अनुभव सिन्‍हा से अजय ब्रह्मात्‍मज की बातचीत

अनुभव सिन्हा
-अजय ब्रह्मात्मज
    ‘तुम बिन’ से ‘रा.वन’ तक अनेक चर्चित और प्रशंसित फिल्में निर्देशित कर चुके अनुभव सिन्हा ‘बनारस मीडिया वक्र्स’ की स्थापना के साथ अब निर्माता भी बन चुके हैं। पिछले दिनों उनके प्रोडक्शन की पहली फिल्म ‘वार्निंग’ आई थी। 7 मार्च को माधुरी दीक्षित और जुही चावला अभिनीत ‘गुलाब गैंग’ आ रही है। फिल्मों के साथ अन्य गतिविधियों में संलग्न अनुभव सिन्हा इन दिनों खुद के लिए एक फिल्म का लेखन कर रहे हैं। उम्मीद है इस साल के अंत तक यह फिल्म फ्लोर पर चली जाएगी।
- ‘बनारस मीडिया वक्र्स’ का क्रिएटिव विचार क्या है?
0 हाई कांसेप्ट की फिल्में बनाना। ऐसे फिल्में जो हमारे दिल को अच्छी लगे और दर्शकों को भी पसंद आएं। फिर यह नहीं देखना कि वे फिल्में मुश्किल हैं या आसान। क्रिएटिव साहस के साथ फिल्मों का निर्माण करना। इसके अलावा गैरफिल्मी संगीत पर काम कर रहा हूं।
- आप सफल निर्देशक हैं। फिर निर्माता बनने का ख्याल क्यों आया?
0 बतौर निर्देशक औसतन मैं दो साल में एक फिल्म बनाता हूं। सच है कि इस दरम्यान मुझे अनेक कहानियां भाती हैं। सारी फिल्में मैं स्वयं निर्देशित नहीं कर सकता। यही सोच कर निर्माता बना कि ऐसी कहानियों को मैं फिल्मों में बदल सकूं। साथियों को अवसर और सुविधाएं प्रदान करूं।
- कहा जा रहा है कि यह दौर स्वतंत्र निर्माताओं का नहीं है?
0 स्वतंत्र निर्माताओं के लिए स्थितियां मुश्किल से बढ़ कर असंभव होती जा रही है। आप भले ही दो करोड़ की फिल्म बना लें, लेकिन उसे रिलीज करने में सात करोड़ रुपए लग जाएंगे। डिस्ट्रीब्यूशन का कोई पैरेलल सिस्टम नहीं है, जिसके जरिए सीमित बजट की फिल्में थिएटर में लग सके। 100 करोड़ क्लब में घुसने की कोशिश में मार्केटिंग के खर्च की सीमा दिनोंदिन ऊपर जा रही है। 25 करोड़ के प्रचार और विज्ञापन के सामने आप 5 करोड़ खर्च करेंगे तो कहीं नजर भी नहीं आएंगे। दर्शकों को पता ही नहीं चलेगा कि आपकी कोई फिल्म आ रही है। हम ऐसी दिशा में बढ़ रहे हैं जब छोटी फिल्में बनाना नामुमकिन हो जाएगा। मुझे लगता है कि यह सिलसिला टूटेगा और नया विकल्प सामने आएगा।
- वितरण और प्रदर्शन की स्थिति पर क्या कहेंगे?
0 खुशी की बात है कि वितरण और प्रदर्शन का विस्तार हो रहा है। टिकटों के दर बढ़ रहे हैं। अब जरूरत है कि फिल्मों की लागत भी बढ़े। देखना यह है कि छोटी फिल्में कैसे सस्ते माध्यम से रिलीज हो जाएं। इसके बाद ही लाभ की बात सोची जा सकती है। हम सभी स्वतंत्र निर्माता इस मैकेनिज्म की तलाश में हैं। अभी असंतुलन बन गया है। प्रकृति हर असंतुलन को स्वयं संतुलित कर देती है।
- आपकी ‘गुलाब गैंग’ में माधुरी दीक्षित और जुही चावला आमने-सामने हैं। निर्माण की कैसी चुनौतियां रहीं?
0 इस फिल्म को लेकर हम बाजार में उतरे तो सभी का यही सवाल होता था कि माधुरी और जुही के अलावा कौन है? इस कौन का सीधा मतलब मेल स्टार से होता था। हमारी फिल्में मेल स्टार से ही जानी जाती है। लोग यही पूछते रहे कि सिर्फ औरतों की फिल्मों में किसका इंटरेस्ट होगा?  ऐसे माहौल में माधुरी और जुही को लेकर पूरे विश्वास के साथ फिल्म बना लेना ही हिम्मत का काम है।
- आपकी अपनी फिल्म कब आएगी?
0 मैंने दो स्क्रिप्ट फायनल की है। उनमें से एक इस साल फ्लोर पर चली जाएगी। फिलहाल मैं खुद को भीड़ और भगदड़ से अलग पाता हूं। एक सुकून है, इसलिए आराम से काम करना चाहता हूं।
- गैरफिल्मी संगीत में क्या योजनाएं हैं?
0 गैरफिल्मी संगीत का संबंध मेरे पैशन से है। म्यूजिक वीडियो बनाना मेरे लिए बड़ा पैशन है। फिल्मों के निर्देशन के दौरान अनुभव हुआ कि कई अच्छे गीत-संगीत हमें छोडऩे पड़ रहे हैं। वे फिल्मी खांचे में फिट नहीं हो पाते थे। मैं पारंपरिक हिंदुस्तानी संगीत पर काम कर रहा हूं। सुगम संगीत अब श्रोताओं तक नहीं पहुंच पाता। कोशिश है कि लोकप्रिय माध्यमों से उसे श्रोताओं तक पहुंचाऊं। अभी तोषी और शारिफ के साथ पारंपरिक बंदिशों के छह रचनाएं रिकॉर्ड की हैं। ये सभी सिंगल्स के तौर पर जारी होंगे। गजलों और दूसरी संगीत परंपराओं पर भी काम चल रहा है।
- सुना है कि आपने कुछ कविताओं का भी पाठ करवाया है?
0 मैं कविताएं पढ़ता और गुणता रहता हूं। मैंने ऐसे कुछ कवियों को चुना है जिनसे आज की पीढ़ी नावाकिफ है। माधुरी दीक्षित ने इन कविताओं का पाठ किया है। साहिर लुधियानबी और गोरख पांडे जैसे कवियों की कविताएं चुनी गई हैं। कोशिश है कि इन्हें टीवी स्पेस या सोशल मीडिया के जरिए सभी तक पहुंचाया जाए।

Friday, February 21, 2014

फिल्‍म समीक्षा : हाईवे

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
हिंदी और अंग्रेजी में ऐसी अनेक फिल्में आ चुकी हैं, जिनमें अपहरणकर्ता से ही बंधक का प्रेम हो जाता है। अंग्रेजी में इसे स्टॉकहोम सिंड्रम कहते हैं। इम्तियाज अली की 'हाईवे' का कथानक प्रेम के ऐसे ही संबंधों पर टिका है। नई बात यह है कि इम्तियाज ने इस संबंध को काव्यात्मक संवेदना के साथ लय और गति प्रदान की है। फिल्म के मुख्य किरदारों वीरा त्रिपाठी (आलिया भट्ट) और महावीर भाटी (रणदीप हुड्डा) की बैकस्टोरी भी है। विपरीत ध्रुवों के दोनों किरदारों को उनकी मार्मिक बैकस्टोरी सहज तरीके से जोड़ती है। इम्तियाज अली की 'हाईवे' हिंदी फिल्मों की मुख्यधारा में रहते हुए भी अपने बहाव और प्रभाव में अलग असर डालती है। फिल्म के कई दृश्यों में रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सच का सामना न होने से न केवल किरदार बल्कि दर्शक के तौर पर हम भी स्तब्ध रह जाते हैं। इम्तियाज ने आज के दौर में बच्चों की परवरिश की एक समस्या को करीब से देखा और रेखांकित किया है,जहां बाहर की दुनिया के खतरे के प्रति तो सचेत किया जाता है लेकिन घर में मौजूद खतरे से आगाह नहीं किया जाता।
वीरा की शादी होने वाली है। वह विरक्त भाव से शादी के विधि-विधानों में हिस्सा ले रही है। रात होते ही वह अपने मंगेतर के साथ तयशुदा सैर पर निकलती है। दमघोंटू माहौल से निकल कर उसे अच्छा लगता है। मानों उनकी नसें खुल रही हों और उनमें जीवन का संचार हो रहा हो। हाईवे पर वह अपराधी महावीर भाटी के हाथ लग जाती है। तैश और जल्दबाजी में वह वीरा का अपहरण कर लेता है। बाद में पता चलता है कि वीरा प्रभावशाली उद्योगपति एम के त्रिपाठी की बेटी है। अब महावीर की मजबूरी है कि वह वीरा को ढंग से ठिकाने लगाए। इस चक्कर में वह वीरा को लेकर एक अज्ञात सफर पर निकल पड़ता है। इस सफर में वीरा अपनी दुनिया के लोगों से कथित अपराधी महावीर की तुलना करती है। उसे इस कैद की आजादी तरोताजा कर रही है। वह लौट कर समृद्धि की आजादी में फिर से कैद नहीं होना चाहती। एक संवाद में वीरा के मनोभाव को सुंदर अभिव्यक्ति मिली है-जहां से आई हूं, वहां लौटना नहीं चाहती और जहां जाना है, वहां पहुंचना नहीं चाहती। यह सफर चलता रहे।
वीरा और महावीर दोनों विपरीत स्वभाव और पृष्ठभूमि के किरदार हैं। उनके जीवन की निजी रिक्तता ही उन्हें करीब लाती है। दोनों के आंतरिक एहसास के उद्घाटन के दृश्य अत्यंत मार्मिक और संवेदनशील हैं। स्पष्ट आभास होता है कि दुनिया जैसी दिखती है, वैसी है नहीं। वीरा जैसे अनेक व्यक्ति इस व्यवस्थित दुनिया की परिपाटी से निकलने की छटपटाहट में हैं। वीरा का बचपन उसे स्थायी जख्म दे गया है, जो महावीर की संगत में भरता है। वीरा उसके दिल पर जमी बेरुखी की काई हटाती है तो अंतस की निर्मलता छलक आती है। पता चलता है कि महावीर ऊपर से कठोर, निर्मम और निर्दयी है, लेकिन अंदर से नाजुक, क्षणभंगुर और संवेदनशील है।
इम्तियाज अली ने मुकेश छाबड़ा की मदद से सभी किरदारों के लिए उपयुक्त कलाकारों का चुनाव किया है। वीरा की भूमिका में आलिया भट्ट का प्रयास सराहनीय और प्रशंसनीय है। प्रयास इसलिए कि अभिनय अभी आलिया का स्वभाव नहीं बना है। उन्होंने अभी अभिनय का ककहरा सीखा है, लेकिन इम्तियाज अली के निर्देशन में वह परफॉरमेंस की छोटी कविता रचने में सफल रही है। कुछ दृश्यों में उनका प्रयास साफ दिखने लगता है। हिंदी फिल्मों में अभिनेत्रियां उत्तेजक दृश्यों में नथुने फुलाने लगती हैं। बहरहाल, आलिया भट्ट ने वीरा की जद्दोजहद और जिद को अच्छी तरह समझा और व्यक्त किया है। फिल्म में रणदीप हुड्डा चौंकाते हैं। भीतरघुन्ना मिजाज के नाराज व्यक्ति की पिनपिनाहट को उन्होंने सटीक ढंग से पेश किया है। दोनों ही कलाकारों के अभिनय ने फिल्म को असरकारी बना दिया है। सहयोगी कलाकारों दुर्गेश कुमार, सहर्ष कुमार शुक्ला और प्रदीप नागर ने फिल्म को पूर्णता दी है।
इम्तियाज अली की फिल्मों में गीत-संगीत का खास योगदान रहता है। इस फिल्म में भी इरशाद कामिल और ए आर रहमान की जोड़ी ने अपेक्षाएं पूरी की हैं। रहमान ने ध्वनि और इरशाद ने शब्दों से फिल्म के भाव को कथाभूमि में पिरो दिया है। 'सोचूं न क्या पीछे है, देखूं न क्या आगे है' में वर्तमान को जीने और समेटने का भाव बखूबी आया है। फिल्म की उल्लेखनीय खूबसूरती सिनेमैटोग्राफी है। हाल-फिलहाल में ऐसी दूसरी फिल्म नहीं दिखती, जिसमें देश के उत्तरी राज्यों की ऐसी मनोरम छटा फिल्म के दृश्यों के संगत में आई हो। अनिल मेहता ने इम्तियाज अली के रचे दृश्यों में प्रकृति के स्वच्छ रंग भर दिए हैं।
'हाईवे' में इम्तियाज अली ने संत कबीर के हीरा संबंधी तीन दोहों का इस्तेमाल किया है। उनमें से एक दोहा इस फिल्म के लिए समर्पित है।
हीरा पारा बाजार में रहा छार लपटाए।
केतिहि मूरख पचि मुए, कोई पारखी लिया उठाए।।
अवधि- 133 मिनट
**** चार स्‍टार 

Thursday, February 20, 2014

खतरनाक रंग है गुलाबी- सौमिक सेन


-अजय ब्रह्मात्मज
मैं बंगाल से हूं। हर बंगाली की तरह सत्यजित राय और रविंद्रनाथ टैगोर को देखते-पढ़ते बड़ा हुआ हूं। दोनों हर बंगाली के खून में बहते हैं। इन दोनों के प्रभाव से पूरी मानवता के प्रति संवेदना बनती है। जापानी निर्देशक कुरोसोवा ने सही कहा था कि हर पृथ्वीवासी को सत्यजित राय की फिल्म देखनी चाहिए। साहित्य, सिनेमा और संगीत की संगत बचपन से रही। आरंभ में थिएटर में एक्टिव हुआ। सरोद बजाने के साथ मैं शास्त्रीय संगीत गाता भी था। यह संस्कार माता-पिता से मिला था। दिल्ली विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र की पढ़ाई करने के बाद मैं जर्नलिज्म में चला गया। बिजनेस स्टैंडर्ड के लिए वीकएंड बिजनेस टीवी प्रोग्राम बनाता था। वहां रहते हुए मैंने दो डॉक्युमेंट्री भी बनाए। फिर सोच-समझकर 2005 में मुंबई आ गया।
    मुंबई आने के बाद फिल्म लेखन से शुरूआत की। मुझे लगा कि मैं लेखन में अच्छा योगदान कर सकता हूं। राज कौशल की ‘एंथनी कौन है?’ मेरी पहली फिल्म थी। उसके बाद मैंने ‘मीराबाई नॉटआउट’, ‘रूबरू’ और ‘हम तुम और घोस्ट’ जैसी फिल्में लिखी। इनके साथ ही मैं किशोर कुमार पर स्क्रिप्ट लिख रहा था। मेरी नजर में आजादी के बाद ऐसी सिनेमाई विभूति हिंदुस्तान में दूसरी नहीं आई। उनकी जिंदगी पर दस घंटे की फिल्म बन सकती है। मैं खुद को किशोर कुमार फैनेटिक कहता हूं। यह फिल्म अनुराग बसु डायरेक्ट कर रहे हैं, जिसमें रणबीर कपूर किशोर कुमार की भूमिका में दिखेंगे।
    मैं ‘शोले’ जैसी एक वेस्टर्न फिल्म करना चाह रहा था। मुझे विलेन के खिलाफ एक अंडरडॉग की कहानी लिखनी थी। मैंने इसी सोच में महिलाओं का डाल दिया। हिंदी फिल्मों में महिलाएं मां, बीवी, बेटी, बहन और प्रेमिकाएं होती हैं। किसी न किसी पुरुष से उनका रिश्ता होता है। उन्हें सेंट्रल कैरेक्टर के काबिल नहीं माना जाता। सास-बहू और महिला केंद्रित फिल्मों में औरतों को पेश करने का नजरिया अलग होता है। मैंने ‘गुलाब गैंग’ में माधुरी दीक्षित और जूही चावला को आमने-सामने पेश कर दिया है। मैंने इस फिल्म को गंभीर और कलात्मक नहीं होने दिया। यह शुद्ध हिंदी मसाला फिल्म है। प्रचलित ढांचे में ही शिक्षा, समानता और आत्मनिर्भरता का संदेश भी है। इसमें सात गाने हैं। लंबे समय के बाद माधुरी दीक्षित ने सरोज खान के निर्देशन में डांस किया है। जूही चावला को पहली बार दर्शक निगेटिव शेड के रोल में देखेंगे। बस इतनी ही कोशिश है कि दर्शकों को भरपूर मनोरंजन मिले।
    ‘गुलाब गैंग’ नाम रखने के पीछे एरो स्मिथ का गीत ‘द पिंक इज रेड’ का भाव था। मैं यही कहना चाहता हूं कि गुलाबी लाल के बहुत नजदीक होता है और कभी-कभी खतरनाक भी। ‘गुलाबी गैंग’ से मेरी फिल्म ‘गुलाब गैंग’ का कोई संबंध नहीं है। संपत पाल बहुत अच्छा काम कर रही हैं। उनका काम मुख्य रूप से बदतमीज पतियों को रास्ते पर लाना है। मेरी फिल्म का वह मुख्य मुद्दा नहीं है। मेरी फिल्म में बालिकाओं की शिक्षा बड़ा मुद्दा है। उनको आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश है। वे इस दुनिया में स्वयं की मेहनत के दम पर जी सकें।
    माधुरी दीक्षित के पास मैं किसी निर्माता के बगैर चला गया था। पंद्रह मिनट सुनने के बाद उन्होंने हां कह दिया। उनकी हां के बाद ही मैंने निर्माताओं से मिलना शुरू किया। अनुभव सिन्हा भी संयोग से इस फिल्म में आए। मैं उनके लिए एक अलग फिल्म लिख रहा था। उस पर बात नहीं बन रही थी। फिर मैंने ‘गुलाब गैंग’ का जिक्र किया। वे तैयार हो गए। उनकी पहली प्रतिक्रिया थी कि यह लेडी सिंघम लग रही है। इस फिल्म के निर्माण का श्रेय निश्चित ही अनुभव सिन्हा और उनके सहनिर्माता मुश्ताक शेख को देना चाहूंगा।

दरअसल : साथ आना अमिताभ बच्चन और हनी सिंह का


-अजय ब्रह्मात्मज
 खबर है कि हनी सिंह अमिताभ बच्चन के साथ ‘भूतनाथ रिटन्र्स’ फिल्म का एक गीत गाएंगे। इस खबर को उलट कर भी पढ़ा जा सकता है। जी हां,अमिताभ बच्चन हनी सिंह के साथ गीत गाएंगे। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में हनी सिंह की मांग अभी सबसे ज्यादा है। उनके गाए गीत लोकप्रिय हो रहे हैं। किसी भी फिल्म की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए उनके गाए गीतों का इस्तेमाल हो रहा है। इसी कड़ी में ‘भूतनाथ रिटन्र्स’ के गीत की योजना बनी है। भूषण कुमार  भी अपने पिता गुलशन कुमार की तरह जब किसी गायक को या संगीतकार को पसंद करते हैं तो उसे भरपूर मौके देते हैं। इन दिनों वे हनी सिंह पर कृपावान हो गए हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि भूषण कुमार की पिछली फिल्म ‘यारियां’ को हिट कराने में हनी सिंह के गीत का बड़ा योगदान रहा। वे ‘भूतनाथ रिटन्र्स’ में इसी लाभप्रद संयोग को दोहरा रहे हैं।
हनी सिंह की बात करें तो चलन के मुताबिक वे इन दिनों सभी की पसंद बने हुए हैं। हर बार कुछ सालों के अंतराल पर पंजाब से कोई एक नई आवाज आती है और वह हर जगह गूंजने लगती है। सुखविंदर,दलेर मेंहदी,मीका और अब हनी सिंह ़ ़ ़ इन सभी ने अलग-अलग दौर में हिंदी सिनेमा के गीत-संगीत को प्रभावित किया है। पिछले दो दशकों में पंजाबी संगीत ने हिंदी सिनेमा में खास जगह बना ली है। फिल्म की कथाभूमि कहीं की भी हो,उसमें एक-दो गीत पंजाबी लहजे,शब्दों और बीट के जरूर डाल दिए जाते हैं। कोशिश और चाहत यह रहती है कि वह गीत प्रोमो के काम आए और फिल्म को हिट करने में सहायक हो। निर्माता-निर्देशकों के सामने ऐसी अनेक फिल्मों के उदाहरण है,जिनमें पंजाबी गीतों के होने से लाभ हुआ।
लकीर की फकीर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री हर नई कामयाबी को असफल होने तक घिसती है। कुछ फिलमों पहले तक मीका सिंह सबकी पसंद बने हुए थे। यहां तक कि निर्देशक उनके ऊपर गाने शूट करने से भी नहीं हिचकते थे। हाल ही में आई नीला माधव पांडा की ‘बबलू हैप्पी है’ में मीका के एक गीत का ऐसा ही नाहक इस्तेमाल किया गया था। मतलब यह कि निर्देशक लोकप्रिय गायकों के लिए फिल्म की कहानी और स्वर में विक्षेप पैदा करने से भी नहीं हिचकते। मालूम नहीं कि ‘भूतनाथ रिटर्न्‍स’ में हनी सिंह के गीत का कितना और कैसा सदुपयोग होगा? फिलहाल कोई भी यह सवाल नहीं पूछ सकता। हिंदी फिल्मों में लोकप्रियता के कारणों को लेकर संशय या सवाल नहीं किए जाते। सभी के लिए यह खबर ही काफी है कि अमिताभ बच्चन और हनी सिंह साथ गाएंगे।
अमिताभ बच्चन की प्रासंगिकता की खोज करें तो उन्होंने हमेशा वक्त के साथ चलने की कोशिश की है। वे इस बात की परवाह नहीं करते कि नई प्रतिभा उनके साथ आने योग्य है या नहीं ? उनके लिए इतना ही काफी रहता है कि अगर कोई लोकप्रिय है तो उसके साथ चलना चाहिए। कुछ पाठकों को याद होगा कि दलेर मंहदी की पॉपुलैरिटी के दिनों में अतिाभ बच्चन ने दलेर मेंहदी के साथ ‘मृत्युदाता’ फिल्म का गीत गाया था। खुद को वापिस जमाने के उस असुरक्षित दौर में उन्होंने गोविंदा के साथ कमर भी मटकाए थे। अमिताभ बच्चन अपनी फिल्मों और लोकप्रियता के लिए नई प्रतिभाओं का उपयोग करने से नहीं हिचकते। उन्होंने किसी समय अदनान सामी के साथ भी गीत गाए थे। एक ही बात गौर करने लायक है कि वे स्थापित हो चुके लोकप्रिय प्रतिभाओं का ही साथ लेते हैं। कितना अच्छा हो कभी वे किसी नई प्रतिभा को अपने साथ आने और गाने का पहला मौका दें। कभी यह सवाल उनसे पूछ लिया जाए तो वे बड़ी विनम्रता से अपनी लाचारी जाहिर कर देते हैं। हनी सिंह के साथ गीत गाने का श्रेय भी वे किसी और को सहर्ष दे देंगे।

Friday, February 14, 2014

फिल्‍म समीक्षा : गुंडे

दोस्ती-दुश्मनी की चटख कहानी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
यशराज फिल्म्स की अली अब्बास जफर निर्देशित 'गुंडे' देखते समय आठवें दशक की फिल्मों की याद आना मुमकिन है। यह फिल्म उसी पीरियड की है। निर्देशक ने दिखाया भी है कि एक सिनेमाघर में जंजीर लगी हुई है। यह विक्रम और बाला का बचपन है। वे बडे होते हें तो 'मिस्टर इंडिया' देखते हैं। हिंदी फिल्में भले ही इतिहास के रेफरेंस से आरंभ हों और एहसास दें कि वे सिनेमा को रियल टच दे रही हैं, कुछ समय के बाद सारा सच भहरा जाता है। रह जाते हैं कुछ किरदार और उनके प्रेम, दुश्मनी, दोस्ती और बदले की कहानी। 'गुंडे' की शुरुआत शानदार होती है। बांग्लादेश के जन्म के साथ विक्रम और बाला का अवतरण होता है। श्वेत-श्याम तस्वीरों में सब कुछ रियल लगता है। फिल्म के रंगीन होने के साथ यह रियलिटी खो जाती है। फिर तो चटखदार गाढ़े रंगों में ही दृश्य और ड्रामा दिखाई पड़ते हैं।
लेखक-निर्देशक अली अब्बास जफर ने बिक्रम और बाला की दोस्ती की फिल्मी कहानी गढी है। ऐसी मित्रता महज फिल्मों में ही दिखाई पड़ती है, क्योंकि जब यह प्रेम या किसी और वजह से टूटती है तो अच्छा ड्रामा बनता है। दोस्ती में एक-दूसरे के लिए जान देने की कसमें खाने वाले दुश्मनी होने पर एक-दूसरे की जान लेने पर उतारु हो जाते हैं। बाद में पता चलता है कि दुश्मनी तो गलतफहमी में हो गई थी। 'गुंडे' कुछ ऐसी ही फिल्म है,जो हिंदी फिल्मों के सारे आजमाए फार्मूलों को फिर से इस्तेमाल करती है। फिल्म देखते समय रोमांच, थ्रिल और आनंद आना स्वाभाविक है,क्योंकि लंबे समय से ऐसी फिल्में नहीं आई हैं। 'गुंडे' हिंदी फिल्मों की मसाला परंपरा का बखूबी निर्वाह करतर है। उसके लिए रणवीर सिंह, प्रियंका चोपड़ा और इरफान खान जैसी प्रतिभाओं का इस्तेमाल करती है।
कोलकाता और धनबाद की कथाभूमि की यह फिल्म ढाका से शुरु होती है। बिक्रम और बाला रोजी-रोटी के जुगाड़ में गैरकानूनी गतिविधयों में शामिल हो जाते हैं। बीच में उन्हें पश्चाताप भी होता है कि अगर बचपन में सिी ने उनका हाथ थाम लिया होता तो वे गुंडे नहीं बनते। गुडा बड़ा ही बदनाम शब्द है। मान लिया गया है कि यह गैरकानूनी और गलत काम करने वालों के लिए इस्तेमाल होता है। यहां जयशंकर प्रसाद की कहानी 'गुंडा' की याद दिलाना काफी होगा। सुधी दर्शक एक बार अवश्य उस कहानी को खोज कर पढ़ लें। हमारे समाज की कहानी 'गुंडा' से 'गुंडे' तक आ चुकी है।
अली अब्बास जफर की 'गुंडे' में सब कुछ गाढ़ा है। इतना गाढ़ा है कि अति की वजह से उसका स्वाद कभी-कभी कड़वा लगता है। इमोशन, एक्शन, दुश्मनी, दोस्ती, नाच-गाना और डायलॉग डिलीवरी तक में निर्देशक की तरफ से पूरी टीम को हिदायत है कि कुछ भी हल्का और पतला न हो। यह गाढ़ापन ही 'गुंडे' की खासियत है। संवादों को संजय मासूम ने गाढ़ा किया है। एक इरफान खान और दूसरी प्रियंका चोपड़ा ने इस गाढ़ेपन में भी अपनी पहचान नहीं छोड़ी है। उन दोनों ने फिल्म की अतिशयता को क किया है। इरफान ने अपने किरदार को बेलौस तरीके से पर्दे पर उतारा है। उनके अंदाज में शरारत है। प्रियंका ने अपनी संवाद अदायगी को सुधारा है। वह इस फिल्म में नंदिता के किरदार के द्वंद्व को प्रभावशाली तरीके से व्यक्त करती हैं।
फिल्म का गीत-संगीत मधुर और फिल्म के विषय और किरदारों के अनुकूल है। एक सूफी गीत ही गैरजरूरी लगता है। मौला रहम करे हिंदी फिल्मों पर। हर फिल्म में सूफी गीत-संगीत से अब ऊब सी होने लगी है। फिर भी इरशाद कामिल और सोहेल सेन ने शब्द और ध्वनि के सथ मधुर और सार्थक प्रयोग किए हैं।
अवधि-153 मिनट
*** तीन स्टार

Thursday, February 13, 2014

इरशाद कामिल से सचिन श्रीवास्‍तव की बातचीत


एक इनसान के बनने में जिस ईंट-गारे का इस्तेमाल होता है, वह यकीनन सारी उम्र अपना असर दिखाता है। यह बात नई सदी के हिंदी फिल्मों के गीतों को दार्शनिक ऊंचाई, रूमानी सुकून और विद्राही तेवर बख्शने वाले कलमकार इरशाद कामिल को जानने के बाद फिर साबित होती है। पंजाबी खुशी और इश्क की मस्ती में पले-बढ़े इरशाद के भरपूर इनसान बनने में आठवें दशक की नफरत, अवतार सिंह पाश के विद्रोह, शिवकुमार बटालवी के दर्द का गारा है, तो बचपन की दोस्ती की शरारतों और आवारा-मिजाजी की ईंटें भी हैं। जाहिर है यह सब कुछ उनके लेखन में अनायास ही दिखाई देता भी है। इरशाद को महज गीतकार कहना, एक ऐसी नाइंसाफी है, जिसे करने का गुनाह नाकाबिले मुआफी है। गीत उनके लेखन की महज एक विधा है, जो लोकप्रिय हो गई है, लेकिन असल में वे एक कलाकार हैं, जो खुद को बयां करने के हर औजार को, हर विधा को आजमाना चाहता है। दिलचस्प यह कि वे कई रचनात्मक विधाओं में पारंगत भी हैं। इरशाद कामिल से सचिन श्रीवास्तव ने मुलाकात के दौरान अनौपचारिक बातचीत की। इसके प्रमुख अंश... 



"चमेली" से लेकर "रॉकस्टार" और "हाईवे" तक आपके गाने कानफोडू शोर के बीच अलग से पहचाने जा सकते हैं। आपके गानों का तीखा स्वर भी सुखद लगता है। तो यह तोड़ने का स्वर, विद्रोह का स्वर कैसे आया आपके भीतर? 
इरशाद : बचपन से मैं कुछ विद्रोही स्वभाव का था। हालांकि उस वक्त विद्रोह का मतलब पता नहीं था, लेकिन बनी-बनाई चीजें तोड़ने, पारंपरिक खांचों से बाहर निकलने की छटपटाहट भी खूब थी। पढ़ाई से लेकर शुरुआती नौकरियों तक सिलसिला चलता रहा। जाहिर है मैं जिस माहौल में रहा हूं वहां का भी असर रहा।
तो आपका बचपन का माहौल कैसा था? वो दोस्त, वो शरारतें याद हैं? 
इरशाद : हां, यकीनन। मेरे बचपन एक कस्बाई मोहल्ले में बीता। मेरे परिवार की माली हालत ठीक थी, लेकिन आसपास रिक्शेवाले, मजदूर और कई ऐसे परिवार थे, जिंदगी की ठोकरों को बेदर्दी से झेलती-सहते हैं। उन परिवारों के बच्चे ही मेरे दोस्त थे। यह बड़े शहरों का कल्चर है कि मोहल्ले या इलाके में तकरीबन एक ही तरह के लोग रहते हैं। हमारे पुराने कस्बों में यह फर्क नहीं होता था। तो मुझे एक भरा-पूरा माहौल मिला। छुटपन में हम दोस्तों की टोली रात में किसी रिक्शेवाले के घर के सामने से उसका रिक्शा उठा लेते थे, और रात भर सड़कों पर दौड़ाते थे। एक थकता तो दूसरा चलता। फिर खेल भी सिर्फ क्रिकेट ही नहीं था, कई तरह के ग्रामीण, देशज खेल थे। इस दौरान अपनी खुशी साझा करना, लोगों पर यकीन करना, दोस्तों पर हक जताना यह सब सीखा। यह सीखें आज भी काम आती हैं।
आप जब दुनिया को जानने-समझने, उसे देखने की अपनी नजर विकसित कर रहे थे, वह दौर पंजाब में खौफ का दौर था। नफरत तारी थी उस माहौल पर, उसका क्या असर पड़ा? 
इरशाद : बहुत ज्यादा! जो पढ़-लिख रहा था, जिस तरह के लोगों के बीच था, वे इनसानियत पर यकीन करने वाले लोग थे, लेकिन फिजां में वो नरमी नहीं थी। असल में जो राजनीतिक माहौल होता है, वह हमारे सामाजिक ताने-बाने और आर्थिक रिश्तों पर भी असर डालता है। तो तब बाजार शाम में ही बंद हो जाते थे, लोग घरों में दुबक जाते थे, यह सब बहुत करीब से देख रहा था। उस दौर की तकलीफें भी देखीं और फिर यह भी गहराई से देखा कि जिंदगी हर मुश्किल वक्त में खिलखिला लेती है, हंस लेती है। 
इस राजनीतिक माहौल का असर क्या पड़ा? 
इरशाद : कॉलेज के जमाने में एआईएसएफ में रहा। लेफ्ट पार्टी के सांस्कृतिक संगठनों से भी जुड़ा रहा, लेकिन असल में मैं राजनीतिक व्यक्ति नहीं हूं। इसलिए यह दौर लंबा नहीं चला। हां, असर यह हुआ कि बेचैनियां बढ़ने लगीं और जो राजनीतिक सवाल थे, सांस्कृतिक सवाल थे, उनके जवाब अपने ढंग से तलाशने लगा था। 
तो ऐसे माहौल में आपकी शायरी को इश्क की नरमी और आशिकाना तबियत कैसे मिली?
इरशाद : इसकी वजह दिलचस्प है। पढ़ाई के दौरान ही मैं शायरी करने लगा था। दोस्तों की दाद भी मिलने लगी थी। यह वह दौर था जब हर तीसरे घंटे में एक इश्क होता था। जाहिर है दोस्तों को भी होता था। तो मेरे दोस्त मुझसे अपने लिए प्रेम-पत्र लिखवाते थे। अब इसमें थोड़ा वजन डालने के लिए शेर भी लिख देते थे। 
लेकिन यह उधार की शायरी का इश्क दोस्तों पर भारी पड़ता होगा? सभी प्रेम-पत्रों की भाषा तो घुमा-फिराकर एक ही होती होगी?
इरशाद : नहीं? इसे हुनर कहिए या मेहनत, लेकिन हर खत को दूसरे से जुदा जुबान में लिखता था। इसके लिए सोच के दायरे भी खोलता था। एक मायने में वे खत रियाज थे, आने वाली उम्र के लिए, जिसमें अलग-अलग ढंग से अपनी बात को कहने की आदत हो रही थी।
यह महज शब्दों में हेरफेर का मामला नहीं है। आपके गीतों में दर्शन का भी विशाल फलक दिखता है, साथ ही सूफियाना रंगत से लेकर युवाओं की बातचीत तक को आप गीतों में इस्तेमाल कर रहे हैं, यह महज प्रतिभा का मामला नहीं लगता, इसके पीछे की मेहनत क्या है? 
इरशाद : बिल्कुल सही कह रहे हैं। प्रतिभा एक हद तक तो लेखन में साथ चलती है, लेकिन गहराई में उतरने के लिए तो डूबना ही होगा, सांस रोककर पानी के भीतर उतरना होगा। हाल ही में लोकप्रिय हुए "गुंडे" के गानों में "तूने मारी एन्ट्रियां" है, तो वहीं "मन कुन्तुम मौला" भी है और रूमानियत से भरा "जिया" भी है। इसके कुछ बोल ऐसे हैं "नैना फिरोजी नहर/ ख्वाबों का पानी में घर/ ऐसे हूं मैं तेरे बिन/ सहरा की जैसे सहर/ इश्क का तू हरफ/ जिसके चारों तरफ/ मेरी बाहों के घेरे का बने हाशिया... जिया मैं ना जिया"। तो यह मिसरे भीतर से ही निकलते हैं। 
यह दौर विचारों की रिसाइकिलिंग का है। ऐसे में नये विचार को गीतों में लाने की जिद आप क्यों कर रहे हैं? 
इरशाद (हंसते हुए) : यह जिद से ज्यादा स्वाभाव का मामला है। सही है कि आजकल ओरिजनल लिरिक्स नहीं लिखे जा रहे हैं। ज्यादातर गीतों में विचार रिसाईकल हो रहे हैं। अपने समय में हस्तक्षेप करने की जिद तो है, और में इसे पूरी ईमानदारी से करना चाहता हूं। अगर आप कोई चीज बदल सकते हैं, कुछ बेहतर लिख सकते हैं, और वह न करें, तो यह बेईमानी होगी। बस, जितना कर सकता हूं कर रहा हूं। 
आपने कुछ वक्त तक पत्रकारिता भी की है, उससे मन कब ऊबा? 
इरशाद : मैंने हिंदी की समकालीन कविता पर शोध किया है, और उसके बाद पत्रकारिता का कोर्स भी किया। उसी दौरान इत्तेफाकन ट्रिब्यून में नौकरी लग गई। एक दोस्त को वॉक-इन इंटरव्यू दिलाने गया था, मैंने भी दिया और सलेक्ट हो गया। फिर एक दिन जिस तरह ज्वाइन किया था, उसी तरह पत्रकारिता को छोड़ भी दिया। करीब ढ़ाई साल का वक्त मैंने पत्रकारिता में गुजारा। 
इस वक्फे में पत्रकारिता को कैसे देखा?
इरशाद : खबरें देखने का हरएक का अपना तरीका होता है, लेकिन अफसोस कि हमारे दौर में बिकने वाली खबरों को तरजीह दी जाती है। तो जो एक दो कॉलम की खबर होती है, उसके पीछे कितनी बड़ी कहानी होती है, वह सामने नहीं आ पाती। और हर कहानी के पीछे कई खबरें छुपी होती हैं। इस तरह की उलटबांसियां देखकर पत्रकारिता से ऊब होने लगी थी, और मैं आगे बढ़ गया। 
यह कब तय किया कि फिल्मी दुनिया में आना है? 
इरशाद : हमारे वक्त में बच्चे तय नहीं करते थे कि उन्हें क्या करना है? बस एक परीक्षा होती थी, उसे पास करना, फिर दूसरी परीक्षा की तैयारी। कॉलेज हो गया, तो यूनिवर्सिटी, फिर जो नौकरी मिल जाए। आजकल के बच्चे ऐसे नहीं हैं, उनका कॅरियर प्लान तैयार होता है। तो मेरे साथ भी कुछ तय नहीं था, लेकिन हां, मौटा खाका था कि लिखने-पढ़ने के पेशे में ही रहना है। साहित्य से लगाव का यह असर था। 
आपने समकालीन कविता पर पीएचडी की है। हिंदुस्तान के अलावा विदेशी साहित्य से भी गहरा लगाव है। वो कौन-से रचनाकार हैं, जिनका असर पड़ा?
इरशाद : देखिए प्रभाव तो हर इनसान का पड़ता है, रचनाकार का, कवि-शायर का कुछ ज्यादा पड़ता है। मैं मानता हूं कि कोई रचनाकार अपने जीवन में महज एक लाइन भी ऐसी लिख देता है जो दूसरे को पसंद आए तो वह महान है, उसने अपना काम किया। मैंने रघुवीर सहाय से लेकर लीलाधर जगूड़ी और कुमार अंबुज से लेकर अरुण कमल तक लगभग सभी समकालीन कवियों को पढ़ा और उनका असर भी रहा, लेकिन असल में तो मेरी प्रेरणा मेरे भीतर है। मुझे लगता है कि किसी एक के प्रभाव को नहीं आंका जा सकता। सबका प्रभाव है, और किसी का भी नहीं। 
आप स्वाभाव से विद्रोही हैं। दुनिया को प्रेम करते हैं। यह विद्रोह और प्रेम साथ-साथ चलता है क्या? 
इरशाद : बिल्कुल! प्रेम के बिना आंदोलन नहीं होता, और आंदोलन के बिना प्रेम नहीं होता। मेरा मानना है कि प्रेम और संघर्ष एक साथ चलता है। प्रेम है, तो मुश्किलें होंगी ही। और विद्रोह अगर मूल में है, तो वह हर चीज में आएगा। लिखने-पढ़ने से लेकर प्रेम तक, क्योंकि वह आपका जीने का अंदाज है। 
आप कई विधाओं में खुद को कह रहे हैं। अपनी रचनात्मकता की अभिव्यक्ति के लिए विधा कैसे तय करते हैं? 
इरशाद : कोई विचार है, कोई दर्शन है, या कोई व्याख्या है, तो वह अपनी विधा खुद चुन लेती है। अब तक जो कहना चाहता हूं उसके लिए अलग-अलग फार्म तलाशता रहा हूं। आगे का कह नहीं सकता, जैसा विचार आएगा, वह अपने लिए विधा ढूंढ लेगा। 
फिल्मों के गीत लिखते हुए कोई असमंजस रहता है क्या? क्योंकि आप जो लिखते हैं, उसका असर पड़ता है, तो अपनी जवाबदेही कितनी मानते हैं?
इरशाद : जो कुछ लिखा है, उसके लिए जवाबदेह तो मैं ही हूं। हालांकि कई बार मैं व्यावसायिक दबाव में वैसा भी लिखता हूं जो मेरे विचार से ठीक नहीं है। लेकिन वह पात्र की मांग होती है। उस कैरेक्टर की फिलॉसफी है। कोशिश यह रहती है कि कैरेक्टर के साथ भी न्याय हो और लेखन की जो जवाबदेही है उसके साथ भी नाइंसाफी न हो। 

दरअसल : ‘वन बाय टू’ की डिजिटल रिलीज


-अजय ब्रह्मात्मज
    अभय देओल अभिनीत और निर्मित ‘वन बाय टू’ दर्शकों और समीक्षकों को पसंद नहीं आई। बाक्स आफिस पर फिल्म का प्रदर्शन बहुत बुरा रहा। फिल्म अंतर्निहत कारणों से नहीं चली। फिर भी यह फिल्म हिंदी फिल्मों के इतिहास में याद रहेगी। अक्षर सुनहरे हो या न हो।
    सबसे पहले अभय देओल ने अपने संगीतकारों और गायकों के पक्ष में खड़े होने की हिम्मत दिखाई। टी सीरिज के दबाव में न आकर उन्होंने संगीत के भविष्य में उपयोग के स्वत्वाधिकार और हिस्सेदारी के मामले को उठाया। इसकी वजह से उनकी फिल्म ऐन रिलीज के मौके पर पारंपरिक प्रचार से वंचित रह गई। अमूमन म्यूजिक कंपनी अपनी फिल्मों के संगीत के प्रचार के लिए उनके ‘सौंग प्रोमो’ चलाते हैं। ऊपरी तौर पर दिखता है कि अब संगीत का बाजार खत्म हो गया है। लोग न तो सीडी खरीदते हैं और न उनकी मार्केटिंग की जाती है। डिजिटल युग में संगीत का डिजिटल उपयोग बढ़ गया है। गाने डाउनलोड होते हैं। उनके कलर ट्यून बनते हैं। मोबाइल इंडस्ट्री से म्यूजिक कंपनियों को लाभ मिलता है। मॉनिटरिंग की व्यवस्था बढऩे से अब उन्हें मालूम रहता है कि उनके संगीत का कौन, कहां इस्तेमाल कर रहा है। कॉपी राइट के नए नियमों के मुताबिक गायक, संगीतकार और गीतकार को रॉयलटी मिलनी चाहिए। लगभग सभी म्यूजिक कंपनियां नियमों के पालन में उदारता नहीं दिखा रही हैं। म्यूजिक कंपनियां दबाव डालकर फिल्मों के संगीत के लिए एकमुश्त रकम देने के बाद सारा लाभ अपने पास रखना चाहती हैं। पूंजी निवेश से संबंधित उनके अपने तर्क हैं, जो कलाकारों को मान्य नहीं हैं। ऐसी स्थिति में फिल्मों का हाल ‘वन बाय टू’ जैसा हो सकता है। सुनने में आ रहा है कि सोनू निगम और सुनिधि चौहान के गाने के अवसर कम हो रहे हैं। अभय देओल की फिल्म ‘वन बाय टू’ इस स्थिति की पहली शिकार बनी।
    अभय देओल की फिल्म सीमित बजट की थी। हिंदी के प्रचलित फार्मूले से अलग थी। फिल्म में स्वयं अभय देओल ही सबसे लोकप्रिय फेस थे। और फिर प्रचार में आई अड़चनों से फिल्म के प्रति दर्शकों की जिज्ञासा नहीं बढ़ पाई थी। नतीजतन वितरकों ाअैर प्रदर्शकों के बीच भी फिल्म के प्रति उत्साह नहीं था। निश्चित हो गया था कि यह फिल्म ओवरसीज में रिलीज नहीं हो सकेगी। अभय देओल इस वास्तविकता से हताश नहीं हुए। उन्होंने एक नया रास्ता खोज निकाला। उन्होंने डिजिटल युग में सोशल मीडिया के प्रसार का लाभ उठाया। उन्होंने फैसला लिया कि वे फिल्म की रिलीज के दिन ही उसे इंटरनेशनल दर्शकों के लिए जारी कर देंगे।
    ‘वन बाय टू’ 31 जनवरी को ही फेसबुक के प्लेटफार्म से दुनिया भर के दर्शकों के लिए उपलब्ध थी। 4 ़99 डॉलर में कोई भी ग्राहक इसे 48 घंटों के लिए डाउनडोल कर सकता है। बताते हें कि अमेरिका और दूसरे देशों में पायरेटेड डीवीडी भी लगभीग इसी कीमत में मिलती है, इसलिए इच्छुक दर्शक हाई रिजोलयूशन में वैध तरीके से ‘वन बाय टू’ देख सकते हैं। चूंकि यह फिल्म भारत और नेपाल में रिलीज हुई थी इसलिए थिएटर मालिकों के हित को ध्यान में रखते हुए स्थानीय दर्शकों के लिए यह सुविधा नहीं दी गई है। यानी अगर भारत से कोई इसे डाउनडोल करना चाहे तो नहीं कर सकेगा। फेसबुक स्थानीय आईपी नंबर का एंटरटेन ही नहीं करेंगे।   
    अभी देखना है कि ‘वन बाय टू’ ने डिजीटल रिलीज की पहल से कितनी कमाई की। कमाई कम हो या ज्यादा, यह प्रयास स्वयं में सराहनीय और कम खर्चीला है। छोटे-मझोले बजट की फिल्मों की रिलीज के लिए यह पहल बेहतर विकल्प देती है। अब जरूरी नहीं है कि आप थिएटर रिलीज के लिए ज्यादा खर्च करें और अपना नुकसान बढ़ाएं। अगर ‘वन बाय टू’ की पहल का संतोषजनक परिणाम रहा तो भविष्य में दूसरी फिल्में भी फेसबुक या किसी और प्लेटफार्म का इस्तेमाल कर सकती हैं।
    पिछले कुछ समय से फिल्मों के थिएटर रिलीज से होने वाली कमाई पर निर्माताओं की निर्भरता कम हुई है। पहले तो फिल्म का सारा कारोबार थिएटर रिलीज पर ही निर्भर करता था। बाद में प्रदर्शन के दूसरे माध्यमों के आने के बाद भी मुख्य कमाई थिएटर से ही होती रही है। विदेशों में निर्माता फिल्मों की डिजिटल रिलीज से अपनी कमाई का प्रतिशत बढ़ा रहे हैं। कई फिल्मों के मामले में कुल कमाई का 31-40 प्रतिशत डिजिटल से आ जाता है। भारत में डिजिटल अभी तक एक संभावना है। इस संभावना का पहला इस्तेमाल ‘वन बाय टू’ ने किया है। अभय देओल की पहली कोशिश फिल्म के तौर पर तो सफल नहीं रही, लेकिन उसने प्रदर्शन और दर्शकों के बीच पहुंचने के नए द्वार खोले।

Wednesday, February 12, 2014

आज के इस इंसान को ये क्या हो गया - प्रदीप

प्रदीप के लिखे इस गीत को आज संतोष कुमार पांडेय ने रेखांकित किया। गीत सुनने के बाद इसे शब्‍दों में लिख देना उचित लगा। मशहूर कवि आलो धन्‍वा कहते हैं कि गर आप किसी गीत को बार-बार पढ़ें तो उसके अर्थ की नई छवियों से परिचित होंगे। आप देखना चाहें तो इस गीत को देख भी सकते हैं। नीचे लिंक दे रहा हूं। 1961 में आई अमर रहेये प्‍यार के लिए यह गीत लिखा गया था।

आज के इस इंसान को ये क्या हो गया
इसका पुराना प्यार कहाँ पर खो गया
कैसी यह मनहूस घडी है, भाईओं में जंग छिड़ी है
कहीं पे खून कहीं पर जवाला, जाने क्या है होने वाला
सब का माथा आज झुका है, आजादी का जलूस रुका है
चरों और दगा ही दगा है, हर छुरे पर खून लगा है
आज दुखी है जनता सारी, रोते हैं लाखों नर नारी
रोते हैं आँगन गलिआरे, रोते आज मोहल्ले सारे
रोती सलमा रोती है सीता, रोते हैं कुरान और गीता
आज हिमालय चिल्लाता है, कहाँ पुराना वो नाता है
डस लिया सारे देश को जेहरी नागो ने,
घर को लगादी आग घर के चिरागों ने
अपने देश था वो देश था भाई, लाखों बार मुसीबत आई
इंसानों ने जान गवाई, पर बहनों की लाज बचाई
लेकिन अब वो बात कहाँ है, अब तो केवल घात यहाँ है
चल रहीं हैं उलटी हवाएं, कांप रहीं थर थर अबलायें
आज हर एक आँचल को है खतरा, आज हर एक घूँघट को है खतरा
खतरे में है लाज बहन की, खतरे में चूड़ीया दुल्हन की
डरती है हर पाँव की पायल, आज कहीं हो जाए ना घायल
आज सलामत कोई ना घर है, सब को लुट जाने का डर है
हमने अपने वतन को देखा, आदमी के पतन को देखा
आज तो बहनों पर भी हमला होता है,
दूर किसी कोने में मजहब रोता है
किस के सर इलज़ाम धरें हम, आज कहाँ फ़रिआद करें हम
करते हैं जो आज लड़ाई, सब के सब हैं अपने ही भाई
सब के सब हैं यहाँ अपराधी, हाय मोहोब्बत सबने भुलादी
आज बही जो खून की धारा, दोषी उसका समाज है सारा
सुनो जरा ओ सुनने वालो, आसमान पर नज़र घुमा लो
एक गगन में करोडो तारे, रहते हैं हिलमिल के सारे
कभी ना वो आपस में लड़ते, कभी ना देखा उनको झगड़ते
कभी नहीं वो छुरे चलाते, नहीं किसी का खून बहाते
लेकिन इस इंसान को देखो, धरती की संतान को देखो
कितना है यह हाय कमीना, इसने लाखों का सुख छीना
की है जो इसने आज तबाही, देगें उसकी यह मुखड़े गवाही
आपस की दुश्मनी का यह अंजाम हुआ,
दुनिया हसने लगी देश बदनाम हुआ
कैसा यह खतरे का पहर है, आज हवाओं में भी ज़हर है
कहीं भी देखो बात यही है, हाय भयानक रात यही है
मौत के साए में हर घर है, कब क्या होगा किसे खबर है
बंद है खिड़की, बंद है द्वारे, बैठे हैं सब डर के मारे
क्या होगा इन बेचारों का, क्या होगा इन लाचारों का
इनका सब कुछ खो सकता है, इनपे हमला हो सकता है
कोई रक्षक नज़र ना आता, सोया है आकाश पे दाता
यह क्या हाल हुआ अपने संसार का,
निकल रहा है आज जनाजा प्यार का
- प्रदीप

Friday, February 7, 2014

फिल्‍म समीक्षा : बबलू हैप्‍पी है

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
शहरों की दौड़ती-भागती जिंदगी में युवक-युवतियों की बड़ी उलझन और समस्या प्यार, संबंध और समर्पण है। हर संबंध के लिए गहरी समझदारी के साथ परस्पर विश्वास अनिवार्य है। पसंद और आकांक्षाएं भी एक सी हों तो रिश्तों के पनपने के लिए समान भूमि मिल जाती है। यह फिल्म दिल्ली के कुछ युवक-युवतियों के जरिए प्यार और समर्पण तलाशती हुई एक ऐसे मुकाम पर पहुंचती है, जहां सच के आभास से डर पैदा होता है ओर उसके एहसास से प्रेम और विश्वास जगता है।
जतिन और तमन्ना की शादी होने वाली है। शादी से पहले जतिन दोस्तों के साथ पहाड़ों की सैर को निकलता है। तमन्ना को भी एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में पहाड़ों पर जाना है। तय होता है कि दोनों वहां मिलेंगे। तमन्ना तुनकमिजाज और पजेसिव किस्म की युवती है। वह जतिन को कभी कुछ कहने का मौका नहीं देती। हमेशा उलाहने और डांट से ही उनकी मुलकातें खत्म होती हैं? जतिन समर्पित प्रेमी की तहर हमेशा उसकी सुनता रहता है। पहाड़ों के सफर में उसके साथ हैरी और रोहन भी है। उनकी अपनी समस्याएं हैं। यात्रा की रात बैचलर पार्टी में जतिन की मुलाकात नताशा से हो जाती है। उन्हें सुधि नहीं रहती। नशे की हालत वे हमबिस्तर हो जाते हैं। बाद में भी नताशा से मुलाकातें होती हैं। नजदीकियां बढ़ती हैं। इसके साथ ही उसकी दुविधा बढ़ती जाती है। एक रहस्य गाढ़ा होता है। उनकी मौज-मस्ती और मुश्किलों के बीच कहानी बढ़ते-बढ़ते एक ऐसे मोड़ पर पहुंचती है, जहां जतिन स्तब्ध होने के साथ लाचार दिखता है। उसी लाचारी में उसे प्रेम का एहसास होता है।
नीला माधब पांडा और लेखक संजय चौहान ने फिल्म में समाज के एक जरूरी और गंभीर मुद्दे को खूबसूरती से पिरोया है। इंटरवल तक अनुमान नहीं रहता कि पिल्म उद्देश्यपूर्ण मोड़ लेगी। लगता ही नहीं कि साधारण सी लग रही युवा समूह की उलझनों की कहानी में सार्थक पेंच आ जाएगा। नीला माधब पांडा अपने उद्देश्य में सफल होते हैं। इस मकसद तक पहुंचने में उन्होंने नाहक प्रचलित फॉर्मूला का इस्तेमाल किया है। मीका सिंह का आइटम सॉन्ग और बंजारा डांस फिल्म के भाव के लिहाजा से अनावश्यक पैबंद लगते हैं।
फिल्म का गीत-संगीत प्रयोगधर्मी और प्रभावशाली है। गीतकार प्रतीक मजूमदार और संगीतकार बिशाख-कनीश ने मधुर गीत-संगीत संयोजन किया है। कलाकारों में नताशा की भूमिका निभा रही अभिनेत्री एरिका फर्नाडिस अपने किरदार की वजह से याद रह जाती हैं। साहिल आनंद और सुमित सूरी अपनी भूमिकाओं के संग न्याय करते हैं।
'बबलू हैप्पी है' साधारण और सहज रूप एक जरूरी मुद्दे को रोचक तरीके से फिल्म में ले आती है। यही इस फिल्म की खासियत है। इस मकसद और प्रयास के लिए लेखक संजय चौहान और निर्देशक नीला माधब पांडा की सराहना करनी होगी। प्रस्तुति में कुछ कमियों और अनावश्यक चतुराई का आभास होता है। उद्देश्य की वजह से उसे अनदेखा किया जा सकता है।
अवधि-114 मिनट
*** तीन स्‍टार

फिल्‍म समीक्षा : हंसी तो फंसी

-अजय ब्रह्मात्‍मज
फिल्म के अंग्रेजी हिज्जे का उच्चारण करें तो यह फिल्म 'हसी तो फसी' हो जाती है। यह इरादतन किया गया होगा। धर्मा प्रोडक्शन की फिल्म है तो अक्षर जोड़ने के बजाय इस बार घटा दिया गया है। फिल्म का यही प्रभाव भी है। फिल्म में बस मनोरंजन का अनुस्वार गायब है। फिल्म मनोरंजन की जगह मनोरजन करती है। हिंदी में बिंदी का बहुत महत्व होता है। अंग्रेजी में हिंदी शब्दों के सही उच्चारण के लिए बिंदी के लिए 'एन' अक्षर जोड़ा जाता है। करण जौहर की भूल या सोच स्वाभाविक हो सकती है, लेकिन इस फिल्म के साथ अनुराग कश्यप भी जुड़े हैं। अफसोस होता है कि भाषा और उच्चारण के प्रति ऐसी लापरवाही क्यों?
'हंसी तो फंसी' गीता और निखिल की कहानी है, जो अपने परिवारों में मिसफिट हैं। उनकी जिंदगी परिवार की परंपरा में नहीं है। वे अलग सोचते हैं और कुछ अलग करना चाहते हैं। गीता संयुक्त परिवार की बेटी है, जिसमें केवल उसके पिता उसकी हर गतिविधि के पक्ष और समर्थन में खड़े मिलते हैं। निखिल को अपनी मां का मौखिक समर्थन मिलता है। संयोग कुछ ऐसा बनता है कि दोनों बार-बार टकराते हैं। आखिरकार उन्हें एहसास होता है कि अलग मिट्टी से बने होने के कारण वे प्यार और जिंदगी में एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।
फिल्म के प्रोमो और प्रचार से अगर आपने सोच रखा हे कि यह परिणीति चोपड़ा की एक और चुहलबाजी होगी तो मुमकिन है कि निराश होना पड़े। 'हंसी तो फंसी' स्वयं में रोचक है, लेकिन वही फिल्म नहीं है, जो भ्रम देती है। यह ए किस्म की रोमांटिक कामेडी है। इस फिल्म में परिणीति चोपड़ा का उपयोग प्रचलित छवि से अलग किया गया है। परिणीति चोपड़ा ने इस चुनौती को स्वीकार किया है। वही फिल्म का आकर्षण हैं। निखिल की भूमिका में सिद्धार्थ मल्होत्रा मिसफिट लगते हैं। उनकी देहयष्टि, भावमुद्रा और चाल-ढाल से ऐसा व्यक्तित्व बनता है, जिससे कभी कोई चूक नहीं हो सकती। उनकी बेवकूफियां सहज नहीं लगतीं। इस फिल्म में अदा शर्मा चौंकाती हैं। उन्हें ठीक-ठाक भूमिका मिली है। 
'हंसी तो फंसी' के प्लस प्वॉइंट मनोज जोशी हैं। मीता के मूक समर्थन में उनका अव्यक्त दुलार जब फूटता है तो परिजन स्तब्ध रह जाते हैं। हम लोग मनोज जोशी को हास्यास्पद या मामूली किरदारों में देखते रहे हैं। वे साबित करते हैं कि किरदार और दृश्य मिलें तो उनकी अदाकारी दिख सकती हैं। शरत सक्सेना और बाकी सहयोगी कलाकार फिल्म की जरुरतें पूरी करते हैं।
अवधि-141 मिनट
** 1/2 ढाई स्‍टार

Thursday, February 6, 2014

दरअसल : ...इसलिए नहीं चली ‘जय हो’


-अजय ब्रह्मात्मज
    लोकप्रिय सितारों की हल्की पड़ती चमक के भी कारण कहीं और खोज लिए जाते हैं। बता दिया जाता है कि दर्शकों और सितारों के बीच किसी वजह से धुंध आ गई थी,इसलिए चमक धुधली हुई है। ये वजहें अतार्किक और बचकानी भी हो सकती हैं। दो हफ्ते पहले सलमान खान की फिल्म ‘जय हो’ रिलीज हुई अपेक्षा के मुताबिक इस फिल्म के कलेक्शन नहीं हुए। स्वयं सलमान खान भी हैरान रहे। वे फिल्म चलने की वजह खुद खोजें या बताएं, इसके पहले ही कुछ ट्रेड पंडितों ने उनके स्टारडम के बचाव ढूंढ निकाले। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के निमंत्रण पर सैफई महोत्सव में शरीक होना और अहमदाबाद जाकर वहां के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ पतंग उड़ाना ‘जय हो’ के लिए नुकसानदेह साबित हुआ।
    कहा जा रहा है कि मुस्लिम संगठनों और नेताओं की अपील पर देश के मुसलमान दर्शकों ने ‘जय हो’ और सलमान खान का बहिष्कार कर दिया। वे फिल्म देखने ही नहीं गए। इस तर्क का एक अव्यक्त पहलू है कि सलमान खान की कामयाब फिल्में कथित मुसलमान दर्शकों की वजह से ही चलीं। देश के दर्शकों का यह विभाजन ट्रेड सर्किल करता रहा है। पहले ये विचार और मीमांसा ट्रेड पंडित, वितरक और प्रदर्शकों के बीच रहते थे। पहली बार किसी फिल्म की नाकामयाबी की वजह सार्वजनिक तौर पर ‘मुसलमान’ दर्शकों में खोजी जा रही है। ट्रेड विश्लेषण का यह सही तरीका नहीं है। इसके परिणाम और निष्कर्ष भयंकर हो सकते हैं।
    देश के लोकप्रिय खानत्रयी नाम और धर्म से अवश्य मुसलमान हैं, लेकिन व्यवहारिक तौर पर उनके दर्शक सभी धर्मों, संप्रदायों, जातियों और अब तो गैरहिंदी भाषियों के बीच भी हैं। दर्शकों की पसंद-नापसंद में अभी तक धर्म के दृष्टिकोण से प्रत्यक्ष विचार नहीं किया गया था। ‘जय हो’ की असफलता में ‘मुसलमान’ कारक को लाकर ट्रेड पंडितों ने विश्लेषण को जटिल आयाम दे दिया है। मुझे नहीं लगता कि किसी संगठन या नेता के आह्वान से अभी तक किसी फिल्म की कामयाबी या नाकामयाबी पर भारी असर पड़ा है। ‘जय हो’ का कलेक्शन आधे से कम रहा। पहले शो या प्रदर्शन में विघ्न आने से अवश्य कलेक्शन के कुछ प्रतिशत घट जाते रहे हैं, जैसा कि हम ने ‘फना’ पर गुजरात में लगी पाबंदी और मुंबई में हुए ‘माई नेम इज खाऩ’ के विरोध के समय देखने को मिला था।
    दरअसल, ट्रेड पंडितों ने सलमान खान के स्टारडम को बचाए रखने का यह तोड़ निकाला है। उनके दिए तर्क से सलमान खान की लोकप्रियता पर आंच नहीं आती। फिल्म के न चलने की कोई और वजह बताकर वे सलमान खान के स्टारडम और पॉपुलैरिटी को अक्षुण्ण रखने की कोशिश कर रहे हैं। सच्चाई यह है कि सोहेल खान निर्देशित ‘जय हो’ बुरी फिल्म है। ‘वांटेड’  के बाद से लगातार सफल रहे सलमान खान को लग रहा था कि उन्हें कामयाबी का फार्मूला मिल गया है। और सिर्फ उन्हें ही क्यों? बाकी सितारों का भी यह भ्रम मजबूत हुआ कि ऐसी मसाला फिल्में दर्शक पसंद करते हैं। इस तरह की फिल्में चलीं और खूब चलीं। खुद सलमान खान ही ‘एक था टायगर’ के समय से कह रहे हैं कि इस फार्मूले का अतिरिक्त दोहन हो चुका है। उनकी सोच सही निकली, लेकिन नतीजा उनकी ‘जय हो’ से समाने आया। यह बात उन्हें अखर रही होगी।
    हिंदी फिल्मों के आम दर्शक आज भी मसाले-फार्मूले में पगी, प्यार, बदला और रोमांस की लार्जर दैन लाइफ स्टोरी पसंद करते हैं। मसालों के हेरफेर और फार्मूले के उलटफेर से 1932 से हम ऐसी ही सफल फिल्में देखते आ रहे हैं। बीच-बीच में कभी कोई नया ट्रेंड बनाना और मजबूत होता दिखाई पड़ता है, लेकिन कुछ सालों में ही यह दम तोड़ देता है। अभी स्वतंत्र निर्माताओं, सीमित बजट, नॉन स्टारर और नए विषयों की फिल्में पसंद की जा रही हैं। पिछले कुछ सालों से हर साल 4-6 ऐसी फिल्मों को पुरस्कार और व्यापार दोनों मिल रहा है। इसके बावजूद इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सता कि हिंदी फिल्में ज्यादातर स्टार और फार्मूले के दम पर ही चलती हैं। हां, स्टार लगातार बदलते रहते हैं।
    खानत्रयी पिछले 20-25 सालों में इस पोजीशन में पहुंची है, लेकिन अब उनके स्टारडम के दिन गिने हुए हैं। नई पीढ़ी ने दस्तक दे दी है। दर्शक नए सितारों को विश्वास और प्यार दे रहे हैं। यह भी एक सच्चाई है कि हिंदी फिल्मों में शीर्ष की जगह पर 5-6 सितारे ही रहते हैं। कोई नया आता है तो किसी पुराने को जगह खाली करनी पड़ती है। संकेत मिलने लगे हैं, लेकिन बुझते दीयों की लपलपाती लौ की तरह इन सितारों की कुछ फिल्मों की सफलता भ्रम पैदा करती है कि उनके दिन लदे नहीं हैं।

Sunday, February 2, 2014

संगीत मेरा सबका सूरज - ए आर रहमान



-अजय ब्रह्मात्मज
विनम्र और प्रतिभाशाली एआर रहमान से साक्षात मिलना किसी अनुभव से कम नहीं है। वे अपनी प्रतिभा से परिचित हैं,लेकिन तारीफ सुनने पर शर्म से लाल होने लगते हैं। संगीत के लिए समर्पित ए आर रहमान हमेशा प्रयोगों के लिए तैयार रहते हैं। प्रतिभाओं पर उनकी नजर रहती है। वे उन्हें मौका देने से भी नहीं चूकते। ए आर रहमान से यह खास बातचीत इम्तियाज बली की फिल्म ‘हाईवे’ के प्रोमोशनल वीडियो शुटिंग के दौरान हुई। इस म्यूजिक वीडियो में वे आलिया भट्ट के साथ दिखाई देंगे।

- शूटिंग का कैसा अनुभव रहा और वीडियो शूटिंग में आपको कितना मजा आता है?
0 मैं ज्यादा शूटिंग नहीं करता, लेकिन इम्तियाज जैसा कोई भरोसेमंद फिल्ममेकर का आग्रह हो तो कुछ भी करने के लिए मैं राजी हो जाता हूं।
- अभी तक आपने कितने वीडियो किए हैं?
0 सबसे पहले मैंने ‘मां तुझे सलाम’ किया था। फिर ‘जन गण मन’ किया था। बहुत ज्यादा म्यूजिक वीडियो नहीं किए हैं मैंने। ‘जय हो’ को इंटरनेशन वर्सन किया था।
- क्या शूटिंग के समय किसी प्रकार का दबाव भी रहता है।
0 एक ही दबाव होता है। वजन कम करने का, क्योंकि कैमरा आपके शरीर को बढ़ा देता है। आप बीस से पच्चीस प्रतिशत ज्यादा दिखने लगते हैं। कैमरे को मुझ से कुछ ज्यादा ही प्रेम है। वे मुझे तुरंत मोटा दिखाने लगते हैं।
- क्या लाइव परफारमेंस के समय भी आप कैमरों का ख्याल रखते हैं?
0 कहीं भी आप कैमरे पर आ रहे हैं तो खुद का ख्याल रखना पड़ता है। थोड़ी सावधानी बरतनी पड़ती है। मैं यह भी ख्याल रखता हूं कि परफारमेंस के समय कैमरा किधर रखा है और किस एंगल से मुझे शूट कर रहा है। मैं एक्टर हूं नहीं कि हर एंगल से अच्छा लगूंगा। मैं सिंगर और परफार्मर हूं। मुझे मालूम है कि मैं किस एंगल से अच्छा लगता हूं। कुछ लोग परफेक्ट पैदा होते हैं। मैं दिखने में परफेक्ट नहीं हूं। अभी कोई तस्वीर भी खींचे तो मैं बता देता हूं कि किस एंगल से लें। कुछ एंगल से मेरी तस्वीरें थोड़ी अच्छी आती है।
- अपने वीडियो और फोटोग्राफ में भी आप स्वभाव के अनुसार शर्मीले दिखते हैं।
0 मैं एक्टर तो हूं नहीं। मेरा काम तस्वीरों में आना नहीं है। मैं म्यूजीशियन हूं।
- इम्तियाज अली की ‘हाईवे’ के बारे में क्या कहेंगे?
0 यह ट्रैवलिंग फिल्म है। यह फिल्म यात्रा करती है और हम उसके हमसफर हो जाते हैं। संगीत में कहीं-कहीं कहानी लीड ले लेती है। यह फिल्म जहां-जहां पहुंचती है, वहां-वहां का संगीत हमने इस फिल्म में रखा है। हमने उन सभी राज्यों की ध्वनियों और लोक संगीत के गुणों को अपने संगीत को समृद्ध किया है। कभी गीत में तो कभी पाश्र्व संगीत में आप इसे सुन सकेंगे। हमने गीतों में कभी फिल्म के थीम तो कभी माहौल पर ध्यान दिया है। कई बार हम चरित्रों के साथ भी चलते हैं। फिल्म में संगीत का बाहरी प्रभाव धीरे से आंतरिक प्रभाव के रूप में बदलता है।
- जैसे कि हम कहते हैं कि भारत विविध संस्कृतियों का देश है। क्या वैसे ही हम कह सकते हैं कि भारत विविध संगीत परंपराओं का भी देश है?
0 भारत की यह खूबी है कि तमाम विविधताओं के बावजूद वह एक है। ऐसे ही यहां की संगीत परंपराएं सुनने में विविध लग सकती हैं, लेकिन आत्मिक तौर पर एक हैं। हमारी विविधता ही हमारी विशेषता है। विदेशों में हर शहर एक जैसे लगते हैं, लेकिन भारत में केरल के शहर उत्तरप्रदेश से भिन्न है तो गुजरात के शहर असम से बिल्कुल भिन्न है। हर जगह की अपनी सांस्कृतिक विशेषताएं और परंपराएं हैं। भारत के संगीत और संस्कृति को समझने के लिए एक जिंदगी नाकाफी है।
- भारत के बारे में आपकी क्या विचार है। ऐसा लगता है कि भारत की स्वतंत्रता से आप बहुत प्रभावित हैं। समय-समय पर स्वतंत्रता की इस प्रेरणा से आप संगीत रचते रहे हैं?
0 मुझे इस देश ने बहुत कुछ दिया है। देश के लोग मुझे बहुत प्यार करते हैं। देश के हर इलाके के लोग मुझे पहचानते हैं। उन्होंने ही मुझे सफल बनाया है। उनके प्रेम और स्वीकृति से ही मेरी पहचान है। मैं विदेशी प्रवास पर रहता हूं तो भारत की चुंबकीय शक्ति मुझे खींचती रहती है। भारत मेरे अंदर बसा है।
- संगीत कंपनियों और कलाकारों, तकनीशियनों के बीच चल रहे विवाद के बारे में क्या कहेंगे?
0 कलाकारों और तकनीशियनों के पक्ष में कुछ अच्छी बातें हुई हैं। अभी उसे स्वीकार करने में थोड़ी दिक्कत हो रही है। मुझे विश्वास है कि धीरे-धीरे सभी पक्ष उसे मान लेंगे। समय के साथ सब दुरुस्त हो जाएगा। सही दिशा में बढ़ा यह कदम है, इसलिए एडजस्ट करने में दिक्कत हो रही है। अभी हम टीदिंग प्रॉब्लम से गुजर रहे हैं। नया कानून अच्छा और सभी के हक में है।
- कहा और माना जा रहा है कि नए कानून को मनवाने की जिद में कलाकारों को काम नहीं मिल पा रहा है। सोनू निगम इसके उदाहरण हैं।
0 मुझे नहीं लगता है कि ऐसी कोई बड़ी दिक्कत होगी, जिसको जो चाहिए वह उसे मिल जाएगा। सोनू की अपनी पहचान है। वह बहुत बड़े कलाकार हैं। वह चाहें तो अपना लेवल लेकर आ सकते हैं।
- आपने हमेशा नए गायकों को मौका दिया है। बाद में उन गायकों को ज्यादा काम नहीं मिल पाया। क्या आप उनके प्रति जिम्मेदारी नहीं महसूस करते? आप अपने गायकों का चयन कैसे करते हैं?
0 मुझे उनकी आवाज अच्छी लगनी चाहिए। उस गाने के लिए जरूरी आवाज का चरित्र उनकी आवाज में हो। जो संबंध चरित्रों और कलाकारों में होता है, वही संबंध गीतों और गायकों में होता है। दोनों मिलकर प्रभाव डालते हैं। गीत सुनने पर यह एहसास होना चाहिए कि वे सीधे आपके लिए गा रहे हैं। उस गीत में और कोई आवाज विकल्प नहीं हो सकती। नए गायकों को मैं एक मुकाम दे सकता हूं। उसके आगे तो उन्हें खुद प्रयास करना होगा। मुझे अवश्य पहला मौका किसी से मिला, लेकिन उसके बाद मुझे कड़ी मेहनत करनी पड़ी। हमेशा कुछ नया, मधुर और सुंदर करना पड़ा,ताकि मैं सफल रहूं। ऐसा है नहीं कि हमेशा और लगातार किसी एक का समर्थन मुझे मिलता रहा। मुझे खुद राह चुननी और बनानी पड़ी। गायकों के साथ भी यही बात है। उन्हें अपना करिअर खुद बनाना होगा। गायन का अवसर देने से उन्हें आरंभिक एक्सपोजर तो मिल जाता है। यह खुद ही बड़ी बात है।
- आपने म्यूजिक स्कूल भी खोला है। उसके पीछे क्या उद्देश्य है?
0 मैं चाहता हूं कि देश में प्रशिक्षित संगीतकारों की तादाद बढ़े। यह म्यूजिक और टेक्नोलॉजी का कॉलेज है। इसमें देश-विदेश के छात्र आकर पढ़ सकते हैं। यह मेरा पुराना सपना था। मैं चाहता हूं कि अगली पीढ़ी भी संगीत से समृद्ध और संपन्न हो। मेरे यहां गुजरात, केरल, कश्मीर सभी जगह के छात्र हैं। उत्तर भारत के छात्र भी मेरे कॉलेज में आ रहे हैं।
- क्या किसी विदेशी फिल्म पर भी काम कर रहे हैं?
0 ‘मिडियन डॉलर आर्म’  डिज्नी की फिल्म है। इसके अलावा इम्तियाज अली की ‘हाईवे’ का संगीत पूरा कर रहा हूं।
- सलमान खान की फिल्म ‘जय हो’ को लेकर कोई विवाद था क्या? सुना कि ‘जय हो’ की कॉपी राइट आपके पास है?
0 कोई विवाद नहीं है। ‘जय हो’ का कॉपी राइट हमारे पास है। किसी भी प्रकार के दुरूपयोग से बचने-बचाने के लिए हमने इसे रजिस्टर्ड करवा लिया था। ‘जय हो’ का निर्माण इरोस कर रहा है। उनके साथ मेरे पुराने संबंध हैं। मैंने उन्हें नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट दे दिया था।
- आपके कई गीतों में ‘रे’ शब्द और ध्वनि आती है। यह एक प्रशंसक का निरीक्षण है।
0 ज्यादातर ‘रे’ गुलजार साहब के दिए हुए हैं। ‘सतरंगी रे’, ‘दिल से रे’, ‘जिया रे’, ़ ़ ़ मुझे लगता है यह उनका फेवरिट साउंड है। गुलजार साहब ने ही मुझे हर बार यह ध्वनि दी। ऐसा लगता है कि उन्हें इस ध्वनि से बहुत प्यार है।
- आपने गुलजार, प्रसून जोशी और अब इरशाद कामिल के साथ बेहतरीन काम किया है। क्या जैसे संगीतकार नई ध्वनियां लेकर आते हैं, वैसे ही क्या गीतकारों के पास भी नए शब्द होते हैं?
0 नए-पुराने भावों की अभिव्यक्ति बदलती रहती है। हर गीतकार के पास अपने प्रिय शब्द होते हैं। वे उनका इस्तेमाल करते हैं। ऐसे शब्द ही किसी गीत में आकर्षण पैदा करते हैं। अगर एक ही शब्द और अभिव्यक्ति लगातार इस्तेमाल की जाएगी तो श्रोता और दर्शकों की रुचि खत्म हो जाएगी। कई बार एक ही भाव नए शब्दों में आने से कैचिंग हो जाते हैं।
- आप खुद ज्यादातर आध्यात्मिक या सूफी गीत गाते हैं। कोई खास वजह?
0 मैंने ‘हम्मा हम्मा’ जैसा फन गीत भी गाया है। अपने गानों की रफ रिकॉर्डिंग मैं अपनी आवाज में करता हूं। कई बार निर्देशक मुझ पर दबाव डालते हैं कि फायनल रिकॉर्डिंग में भी आप ही आवाज दें। मेरे लिए सूफी गीतों को गाना आध्यात्मिक साधना भी है। मुझे आनंद और सुकून मिलता है।
- क्या फिल्म लेखन, निर्देशन और निर्माण में भी जाने की कोई आकांक्षा है?
0 मैं फिलहाल एक फिल्म की  स्क्रिप्ट लिख रहा हूं। उम्मीद है इस साल की अंत तक यह फिल्म फ्लोर पर चली जाएगी। अपने स्क्रिप्ट के अंतिम चरण में हूं।
- किसी जमाने में युसूफ खान को आम स्वीकृति के लिए अपना नाम बदल कर दिलीप कुमार करना पड़ा। आप स्वयं दिलीप कुमार थे, जिन्हें बाद में ए आर रहमान नाम मिला। फिर भी इस देश ने आपको स्वीकारा और प्रेम दिया। देश के इस सेक्युलर बदलाव के बारे में क्या कहेंगे?
0 अभी श्रोता या दर्शक किसी और चीज की परवाह नहीं करते। वे सिर्फ आपका काम देखते हैं। आपकी ईमानदारी उन्हें आपके काम और चेहरे में दिख जाती है। अगर आप मानव समाज के लिए कुछ बेहतर काम कर रहे हैं तो वे आपको प्यार देते रहेंगे। मैंने दो पीढ़ी पहले की कहानियां सुनी हैं कि स्थितियां कितनी खराब थीं। लोगों को उनकी धार्मिक पहचान से अलगाया जाता था। अभी सब कुछ बदल गया है। अभी प्रतिभा की कद्र है।
- क्या आपको कभी किसी प्रकार की अवहेलना से गुजरना पड़ा है?
0 कभी नहीं। मेरी जानकारी में तो कभी ऐसा नहीं हुआ। मेरा स्कूल और मेरे स्टूडियो में कोई भेद-भाव नहीं रखा जाता। हम सूफी सिद्धांत पर चलते हैं। सूरज धूप देने में कोई भेद-भाव नहीं करता। वैसे ही हवा, समुद्र और प्रकृति की सारी संपदाएं सभी के लिए हैं। हमारा संगीत भी सब के लिए है। मैं बिना शर्तों के इसे सभी को देता हूं।
- हम यह तो जानते हैं कि आपका नाम ए आर रहमान कैसे पड़ा, क्या आप हमें बताएंगे कि आपका नाम दिलीप कुमार कैसे पड़ा?
0 मुझे लगता है कि मेरे पिता दिलीप कुमार के फैन रहे होंगे।
- हिंदी फिल्मों का संगीत किसी दिशा में बढ़ रहा है?
0 पॉकेट-पॉकेट में कई सारी अच्छी चीजें हो रही हैं। लोग केवल टीवी पर देखने-सुनने के बाद राय बना लेते हैं। बहुत सारी चीजें अभी लोगों के सामने नहीं आ पा रही हैं। फिल्म और टीवी से बाहर संगीत में बहुत काम हो रहा है। शास्त्रीय संगीत में भी नई प्रतिभाएं आ रही हैं। अच्छी बात है कि अब किसी की प्रतिभा दबी नहीं रह सकती। कोई जरिया न मिले तो आप युटूब पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकते हैं। मैंने कई प्रतिभाओं को युट्यूब से चुना है। मैंने उनका इस्तेमाल किया है। ‘हाईवे’ का एक गीत जोनिता गांधी ने गाया है। उन्हें मैंने युट्यूब पर ही खोजा था। अब कोई बाधा या अड़चन नहीं है।
- इम्तियाज के साथ अपनी संगत को कैसे देखते है?
0 हम दोनों एक-दूसरे के प्रशंसक हैं। मेरे लिए वे तीसरी पीढ़ी के निर्देशक हैं, जिनके साथ मैं काम कर रहा हूं। उनके पास बिल्कुल नए विचार होते हैं। ‘रॉकस्टार’ इसका बड़ा नमूना है। हम दोनों ने पहली बार इस फिल्म में एक साथ काम किया था। हम दोनों अपने काम से आगे बढ़ कर कुछ खोज रहे थे। उसका लाभ मिला। ‘रॉकस्टार’ नाम से एक खास किस्म के संगीत की उम्मीद रहती है, लेकिन फिल्म में बिल्कुल अगल संगीत है।
- आलिया भट्ट के बारे में कुछ बताएं?
0 आलिया का व्यवहार दोस्ताना है। उसे देखते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। मैंने पहली बार किसी अभिनेत्री के साथ शूटिंग की है। वह मेरी आधी उम्र की है।