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Friday, January 31, 2014

फिल्‍म समीक्षा : वन बाय टू

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
अभिनेता से निर्माता बने अभय देओल की पहली फिल्म है 'वन बाय टू'। हिंदी सिनेमा में अभय देओल ने बतौर अभिनेता हमेशा कुछ अलग फिल्में की हैं। निर्माता के तौर पर भी उनकी भिन्नता नजर आती है। हालांकि 'वन बाय टू' हिंदी सिनेमा के फॉर्मूले से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाती, लेकिन प्रस्तुति, चरित्र चित्रण, निर्वाह और निष्कर्ष में कुछ नया करने की कोशिश है। उन्होंने लेखन और निर्देशन की जिम्मेदारी देविका भगत को सौंपी है।
'वन बाय टू' दो किरदारों पर बनी एक फिल्म है। दोनों फिल्म के सफर में कई बार एक-दूसरे के पास से गुजरते हैं। निर्देशक ने दोनों को अलग-अलग फ्रेम में एक साथ स्क्रीन पर पेश कर यह जता दिया है कि अलग होने के बावजूद उनकी जिंदगी में कुछ समानताएं हैं। यह संकेत भी मिल जाता है कि उनकी राहें मिलेंगी। अमित को उसकी प्रेमिका राधिका ने छोड़ दिया है। वह उसे फिर से पाने की युक्ति में लगा असफल युवक दिखता है। दूसरी तरफ समारा अपनी परित्यक्ता मां को संभालने के साथ करियर भी बुनती रहती है। दोनों मुख्य किरदारों के मां-पिता आज के समाज के पूर्णत: भिन्न मिजाज के दंपति हैं। पृष्ठभूमि में होने के बावजूद दोनों माता-पिता की जिंदगी को लेखक-निर्देशक ने बखूबी फिल्म का हिस्सा बनाया है। अमित और समारा की जिंदगी में हो रही घटनाएं भी किसी महानगर के युवकों की जिंदगी से मेल खाती है। प्यार, करियर, समर्पण और स्वतंत्रता के साथ कुछ कर गुजरने की चाहत और दवाब में फंसी युवा पीढ़ी के अंतर्विरोधों का भी 'वन बाय टू' में चित्रण है।
इस नवीनता को लेखक-निर्देशक देविका भगत रोचक और चुस्त तरीके से नहीं गूंथ पाई हैं। कथानक का बिखराव फिल्म के मनोरंजन और फिल्म के प्रभाव को कम करता है। 
इस फिल्म का संगीत विवादों की वजह से ढंग से दर्शकों के बीच नहीं पहुंच पाया। अमिताभ भट्टाचार्य ने महानगरीय एहसासों को भावपूर्ण शब्द दिए हैं और उन्हें शंकर एहसान लॉय ने सिंपल संगीत के साथ संजोया है। रोजमर्रा जिंदगी से उठाए गए गीतों के बिंब नए और प्रभावशाली हैं।
अवधि-139 मिनट 
** दो स्‍टार

तो ऐसे बना ऐ मेरे वतन के लोगों


पहली बार यह गाना 27 जनवरी 1963 को लता मंगेशकर ने भारत के पहले प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के सामने गाया था. लेकिन क्या आपको पता है कि ये गाना बना कैसे ? बीबीसी को बताया एक ख़ास बातचीत में इस गाने को लिखने वाले कवि प्रदीप ने .
कवि प्रदीप से ख़ास बातचीत की बीबीसी के नरेश कौशिक ने.हम ने चवन्‍नी के पाठकों के लिए इंटरव्‍यू को शब्‍दों में उतार दिया है।

http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2014/01/140124_kavi_pradeep_audio.shtml


कवि प्रदीप
आप से मिलिए कार्यक्रम में नरेश कौशिक का नमस्‍कार। इस कार्यक्रम में हम हिंदी कवि और गीतकार प्रदीप के करा रहे हैं। जी हां। वही गीतकार प्रदीप जिन्‍होंने भारत-चीन युद्ध के बाद प्रसिद्ध गीत लिखा था ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी। लेकिन प्रदीप ने हिंदी फिल्‍मों के लिए भी अनेक देशभक्ति गीत लिखें जो लोकप्रियता की पृष्टि से अमर है। कवि प्रदीप से मैंने ये भेंटवार्ता कुछ महीने पहले मुंबई में की थी। सबसे पहले मैंने प्रदीप जी से पूछा था- उनके
- कवि जीवन का आरंभ कैसे हुआ?
0 मैं असली में अध्‍यापक होने वाला था। अध्‍यापन के साथ-साथ मैं साइड में कविता भी करने लग गया था। मैं कवि सम्‍मेलन में जम जाता था। मुझे यह कल्‍पना नहीं थी कि यही कविता भविष्‍य में जा कर के मेरे भाग्‍योदय का कारण बनेगी। मेरा कवि जीवन ज्‍यादा नहीं रहा। पांच-छह बरस तक मैंने कविता की। और उस कविता का प्रभाव ऐसा पड़ा कि आपको शायद आश्‍चर्य होगा कि 1938 के अंदर... मैं तो 39 में यहां आ गया। 38 में महाकवि निराला जैसे आदमी ने मेरे बारे में चार पन्‍ने का एक आर्टिकल लिख दिया माधुरी के अंदर। वो नवल किशोर प्रेस से निकलता था लखनऊ में 1938 में। वह लेख अभी भी निराला रचनावली के अंदर है। उस लेख का शीर्षक है, नवीन कवि प्रदीप
- आप यहां फिल्‍म उद्योग में, मुंबई में फिल्‍मों से कैसे जुड़े?
0 अनायास। किसी का लड़का यहां बीमार था। उसने कहा मुझे मुंबई जाना पड़ेगा मेरा लड़का बीमार है। तुम भी मेरे साथ चलो। तो हमने कहा चलो। उस चक्‍कर के अंदर एक कवि सम्‍मेलन हुआ था छोटा सा। बायचांस भगवान ने वहां एक आदमी ऐसा भेज दिया जो बांबे टॉकीज के अंदर सर्विस करता था। उस आदमी ने जाकर अपने बॉस से कहा कि साहब एक लड़का आया हुआ है लखनऊ से, यूपी से आया हुआ है। उसने कविता सुनाई तो मुझे तो बड़ी अच्‍छी लगी। हिमांशु राय जो देविका रानी के पति थे। उन्‍होंने कहा कि अभी-अभी अपनी गाड़ी लेकर जाओ अपनी कंपनी की। जाओ उसको कहीं से भी ढूंढ़ लाओ। हम भी उसकी कविता सुनेंगे। तो वह ले गया।  तो मैं चला गया। उन्‍होंने कहा कि कविता लिखते हैं? मैंने कहा हां कविता तो लिखता हूं। उन्‍होंने कहा कि एक लाइन हमको सुनाओ। तो मैंने सुनाई तो वह चौंक गए। वो लाइन वो थी एक कविता मैंने लिखी थी। मेरे छंदों के बंद-बंद में तुम हो, प्रिय तुम हो। तो मैंने सुनाया उनको। सुनाने के बाद ये नतीजा हुआ कि हिमांशु राय मुझ पर मुग्‍ध हो गए। 2 सौ रुपए पर मंथ पर मेरा एपाएटमें हो गया। मैं तो चौंक गया। उन दिनों तो ये बहुत बड़ी रकम थी। तो में रह गया। उन्‍होंने पहला पिक्‍चर मुझे कंगन दिया। भगवान का नाम लेकर मैंने कंगन लिखा। कुछ मैंने लिखा और कुछ भगवान ने दया कर दी तो मेरा पिक्‍चर सिल्‍बर जुबली हो गया। मैं तो चिपक गया यहां।
- 1952 में शायद जागृति फिल्‍म के लिए आपको अनुबंध किया गया। उसका एक गीत था हम लाए हैं तुफान से किश्‍ती निकाल कर। इस गीत की प्ररेणा आपको कहां से मिली।
0 प्ररेणा। प्ररेणा देश में से मिली। वो बैकग्राउंड था स्‍कूल का। स्‍कूल का बैकग्राउंड होने की वजह से हमको तीन गाने लिखन पड़े देशभक्ति के। एक तो ये पिकनिक के ऊपर जाते हैं। तो पिकनिक पर जाते हैं तो तरह-तरह की होती है, लेकिन हमने पिकनिक को अलग अंदाज से लिया और ट्रेन में बच्‍चों को बिठा कर करे और जो टीचर था आवि भट्टाचार्य उससे कहा कि गाना गाओ –‘आओ बच्‍चों तुम्‍हें दिखाऊं झांकी हिंदुस्‍तान की, इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की। बात कुछ अलग बनी। इसी तरह से एक सिचुएशन में प्रोड्यूसर ने कहा कि भई गांधी जी की जयंती आ रही है तो गांधी जी के बारे में गाने लिखो। गांधी जी के बारे में मैंने कहा कि यह गाना चल रहा है और राजेन्‍द्र कृष्‍ण ने लिखा हुआ है और मोहम्‍मद रफी ने गाया है। बड़ा पापुलर है –‘सुनो सुनो ये दुनिया वालों बापु जी की अमर कहानी हमने कहा ये लिखना पड़ेगा। तो हमने डिफरेंट गाना लिखी –‘दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तू ने कर दिया कमाल। अलग टाइप का हुआ। इस तरह से कई अंतरे मैंने लिखे। एक अंतरा मैं खास तौर से सुनाना चाहूंगा। जिसमें राजेन्‍द्र बाबू बैठे हुए थे। तो वो उन पर चिपक गया। तो दूसरे दिन उन्‍होंने बुलाया राज भवन में। वो गाना फिर से सुनाओ मुझे। उसमें था। जग में कोई जिया है तो बापू तू ही जिया है प्रसीडेंट बैठा हुआ है। जग में कोई जिया है तो बापू तू ही जिया तूने वतन की राह पे सब कुछ लुटा दिया। मांगा न कोई तक्‍खत, न तो ताज लिया ही लिया। अमृत दिया सभी को और खुद जहर पिया। जिस दिन तेरी चिता जली, रोया था महाकाल। साबरमती के संत तू ने कर दिया कमाल। जब मास्‍टर विदा होने लगता है बच्‍चों को छोड़ कर। कहता है बच्‍चों अब हम जा रहे हैं। हमारा तबादला हो गया है, लेकिन हम एक संदेश तुमको देना चाहते हैं। - तो पाशें सभी उलट गए दुश्‍मन की चाल के, अक्षर सभी पलट गए भारत के भाल के। मंजिल पर आया मुल्‍क हर बला को टाल के। सदियों के बाद फिर उड़े बादल गुलाल के। अरे हम लाए हैं तूफान से किश्‍ती निकाल के। इस देश को रखना मेरे प्‍यारों संभाल के।
- बहुत सुंदर। अब आप उसके बारे में बताइए। ऐ मेरे वतन के लोगों के बारे में। वो आपने कब लिखा?
0 अरे भाई वो तो बाद की बात है। 1962 में चाइना ने अटैक कर दिया हमको। उन्‍होंने हमको थप्‍पड़ मारा, हमको पराजित किया। और अपने आप उन्‍होंने निर्णय कर लिया कि चला वापिस। अब चारो तरफ से आवाज उठी कि ये देश जो है उसमें जागृति रहना चाहिए। देश हिम्‍मत न हार बैठे इसलिए सब का ध्‍यान या तो रेडियो पर जाता था या फिल्‍म वालों पर जाता था। आप लोग कुछ बनाइए, कुछ बनाइए। तो हम से भी कहा। ये तो फोकटिया काम था। तो फोकटिया काम करने की हमारी आदत नहीं थी। हम बचते फिरे। इधर-उधर छिपते फिरे, लेकिन ऑफ्टर ऑल पकड़ में आ गए। उन दिनों दो तीन गानों जो थे वो तो फिक्‍स थे। एक गाना तो नौशाद भाई ने शकील बदाउनी से लिखवा कर के जो बाद में लीडर में आया। अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं, सर कटा सकते हैं लेकिन सर झुका सकते नहीं। वो गाना मोहम्‍मद रफी गाने वाला था इसलिए मोहम्‍मद रफी नाम का शानदार गानो वाला स्‍वर आदमी की आवाज वो नौशाद भाई साहब ने रिजर्व कर ली। अब मुकेश रह गए थे, तो मुकेश को राज कपूर ने रिजर्व कर लिया। हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है। वो भी रिजर्व हो गए। हमारे पल्‍ले लता बाई आई। अब लता बाई को हम कोई जोशीला गाना दे नहीं सकते। हमने ये कहा कि लता मंगेश्‍कर नाम की स्‍वर सम्राज्ञनी कहती है कि भाईयों अभी चंद महीने पहले अपने यहां एक लड़ाई हुई थी उसमें हमारे भाई कुछ अपने घरों से, अपनी माताओं से, अपनी बी‍बियों से, अपनी बहनों से तिलक लगवा कर गए थे। देश के लिए कुछ करने के लिए। लेकिन वह वापस नहीं लौटे। क्‍यों न हम तुम मिलकर कुछ आज उनको याद करें। क्‍यों न हम उनको याद कर के अश्रु की दो अंजलि उनको प्रदान करें। बस यही बेस था इस गाने का। लेकिन शुरू में हमने पहली दो लाइन लिखी ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी लिखने के बाद म्‍यूजिक डायरेक्‍टर एक दिन दौड़ा-दौड़ा आया। उसने कहा कि प्रदीप जी अपनी तो पोल खुल गई। मैंने कहा क्‍या हुआ? एक आदमी दिल्‍ली से आया है कह रहा है वह स्‍वेनियर निकाल रहा है और कह रहा है कि पहली दो लाइन लिख कर के दो। मैंने कहा कि यार ये शहीदों का टॉपिक है, यह तो ओपन हो गया। ये कोई भी दूसरा रायटर लिख देगा शहीदों के बारे में। तो आपन जो डार्क हार्स दोहराना चाहते हैं इसके अंदर कि सब चौंक जाएं। वो चौंकने का जो तत्‍व है वो खत्‍म हो जाएगा। उसने कहा कि करो कुछ? हमने कहा कि करते हैं। कल सबेरे आना मेरे पास। रात भर मुझे नींद नहीं आयी। वो प्रोग्राम होने वाला था लालकिले के अंदर 26 या 27 जनवरी को 1963 को। उसमें प्राइमीनिस्‍टर इत्‍यादि सब थे। तो हमने उसको चेंज कर दिया। क्‍योंकि दूसरी लाइन में, तीसरी लाइन में हमने उसको ओपन किया। ऐ मेरे वतन के लोगों तुम खूब लगा लो नारा, ये शुभ दिन है हम सब का लहरा लो तिरंगा प्‍यारा। पर मत भूलो सीमा पर वीरों ने है प्राण गंवाए। कुछ याद उन्‍हें भी कर लो, जो लौट के घर न आए। ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी।
- आपने 1939 से यहां देश भक्ति के लिए गाए हैं और फिल्‍मों के लिए लिखा है। इसके बाद के लेखन इन फिल्‍मों में रहा है। उस पर आप क्‍या सोचते हैं?
0 देखिए हमने जो कुछ भी फिल्‍मों में लिखा तो वो लोग लिखवाते थे तो हमने लिखा। फिल्‍में हमको ऐसी मिलती थी जिसमें देशभक्ति के गाने का स्‍कोप था तो हमने लिखा। आज कहानियां इस तरह की बनती हैं जिसके अंदर देश-वेश से कोई मतलब नहीं है। इसलिए नहीं नहीं लिखे जाते। पैसा परमात्‍मा हो गया है। कौन देश को पूछता है।
- आपके पास प्रोडयूसर लोग अभी भी आते हैं कि आप हमारे लिए लिख दें?
0 नहीं आते। अब नहीं आते। क्‍योंकि लोगों को तो खटिया के गाने चाहिए। कबूतर के गाने चाहिए। कउवे के गाने चाहिए। हमारे पास क्‍यों आएंगे।
- कारण है नहीं है कि इस तरह की ही फिल्‍में अब ज्‍यादा देखते हैं लोग। मांग ऐसी फिल्‍मों की है?
0 कारण आपको मालूम नहीं है। गांधी, जवाहरलाल, राजेन्‍द्र बाबू और सुभाषचंद्र बोस उनके कोई वारिशदार हैं आज? क्‍या हुआ इस देश को? कहां गए वो लोग? वो भी इसी देश के अंदर पैदा हुए थे। आज क्‍यों पैदा नहीं होते?
- भविष्‍य क्‍या देखते हैं आपं?
0 भविष्‍य जो है वो प्रलय है। आज लोग धीरे-धीरे सब लोगों को भूल रहे हैं। बी.एन. सरकार को भूल गए। आज शांताराम को भी धीरे-धीरे भूल रहे हैं। अब कोई शांताराम को याद नहीं करता। आज गुलाम हैदर को भी भूल रहे हैं। आज आएगा आने वाला आएगा। वो खेमचंद प्रकाश को भी लोग भूल रहे हैं। समय जो है बड़ा क्रूर है।
- प्रदीप जी आपका बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

Thursday, January 30, 2014

बॉक्‍स ऑफिस : जनवरी 2014

इस साल से बॉक्‍स ऑफिस का यह कॉलम अब हर महीने के अंत में प्रकाशित होगा। ताकि सनद रहे और वक्‍त जरूरत काम आए। 
बॉक्‍स ऑफिस
-अजय ब्रह्मात्‍मज
2 जनवरी 2014
स्वागत 2014

2013 हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के लिए उल्लेखनीय कलेक्शन और मुनाफे का साल रहा। पिछले साल आठ फिल्में 100 करोड़ क्लब में पहुंची। 2012 की तुलना में संख्या में भले ही एक की कमी आ गई, लेकिन कुल कलेक्शन में 2013 आगे रहा। न भूलें कि पिछले साल दो फिल्मों ने 200 करोड़ से अधिक का कलेक्शन किया। ‘धूम 3’ ने कलेक्शन के चौतरफा नए रिकार्ड स्थापित किए। फिल्म के प्रति दर्शकों के उत्साह से लग रहा है कि ‘धूम 3’ 300 करोड़ का आंकड़ा छूने वाली पहली हिंदी फिल्म हो सकती है। जिस रफ्तार से फिल्मों का बिजनेस बढ़ रहा है उससे 2014 की उम्मीदें बढ़ गई हैं। इधर हिंदी प्रदेशों में नए सिनेमाघर आए हैं। टिकटों के दर में भी बढ़ोत्तरी हुई है। कुछ सालों में फिल्मों के बिजनेस में उत्तर भारत की उल्लेखनीय हिस्सेदारी होगी। तब फिल्मों के कंटेंट में भी उत्तर भारत की तरफ अधिक झुकाव होगा। इसके लक्षण दिखने लगे हैं। 2014 में भी फिल्मों के बिजनेस और कलेक्शन में तीनों खान की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी। इस साल कुछ नए कलाकार 100 करोड़ क्लब में शामिल हो सकते हैं।
पिछले हफ्ते की एनीमेशन फिल्म ‘महाभारत’ के प्रति दर्शक उदास रहे। नए साल के जश्न ने भी कलेक्शन प्रभावित किया,जो दर्शक सिनेमाघरों में गए भी उन्होंने ‘धूम 3’ देखना पसंद किया।

9 जनवरी 2014
अभी तक टिकी है ‘धूम 3’

    पिछले हफ्ते रिलीज हुई ‘मिस्टर जो बी करवाल्हो’ का कलेक्शन उल्लेखनीय नहीं रहा। ‘शोले 3डी’ में दर्शकों ने थोड़ी रुचि दिखाई। इसका वीकएंड कलेक्शन लगभग 6 ़5 करोड़ रहा। यह कलेक्शन अपेक्षा से काफी कम है। ट्रेड पंडितों के मुताबिक टीवी पर ‘शोले’ के नियमित प्रसारणों से दर्शकों का उत्साह ‘शोले 3डी’ के प्रति परवान नहीं चढ़ा। अभी तक ‘धूम 3’ ही बाक्स आफिस पर कलेक्शन के कीर्तिमान स्थापित कर रही है। इस सोमवार को फिल्म ने 500 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया। ‘धूम 3’ का यह आंकड़ा देश-विदेश के कलेक्शन का जोड़ है। उम्मीद की जा रही है कि ‘धूम 3’ भारत में 300 करोड़ का जादुई आंकड़ा छू कर सब से आगे निकल जाएगी।

16 जनवरी 2014
‘यारियां’ पसंद, ‘डेढ इश्किया’ नापसंद

    पिछले हफ्ते रिलीज हुई ‘यारियां’ और ‘डेढ इश्किया’ की सराहना और कलेक्शन के उलट-फेर से चकित हैं। दिव्या खोसला कुमार की ‘यारियां’ साधारण फिल्म रही। उल्लेखनीय समीक्षकों ने इस फिल्म की तारीफ नहीं की, लेकिन बाक्स आफिस पर फिल्म का कलेक्शन उल्लेखनीय रहा। निर्देशक और कलाकारों के नएपन के बावजूद इस फिल्म ने पहले वीकएंड में 16 करोड़ से अधिक का कलेक्शन किया। दूसरी तरफ समीक्षकों की भूरी-भूरी प्रशंसा पाने के बावजूद  ‘डेढ इश्किया’ दर्शकों को अधिक पसंद नहीं आई। इस फिल्म का पहले वीकएंड का कलेक्शन बमुश्किल 11 करोड़ पार कर सका। दर्शकों और समीक्षकों की पसंद-नापसंद का यह अंतरविरोध साल में कई बार देखने को मिलता है। ‘यारियां’ के अपेक्षाकृत बेहतरीन कलेक्शन के बावजूद यह सच है कि ‘डेढ इश्किया’ समय के साथ महत्वपूर्ण फिल्म साबित होगी।

23 जनवरी 2014
नहीं चलीं तीनों फिल्में

    पिछले हफ्ते रिलीज हुई ‘कर ले प्यार कर ले’, ‘पराठे वाली गली’ और ‘मिस लवली’ का लगभग एक सा हाल रहा। तीनों ही फिल्में बाक्स आफिस पर लुढक़ गईं। ‘मिस लवली’  को समीक्षकों ने जरूर सराहा, लेकिन आम दर्शकों ने नवाजुद्दीन सिद्दिकी की इस फिल्म में रुचि नहीं ली। ‘कर ले प्यार कर ले’ और ‘पराठे वाली गली’ से ट्रेड पंडितों को कोई अपेक्षा नहीं थी। निर्माता सुनील दर्शन अपने बेटे शिव दर्शन की फिल्म ढंग से नहीं पेश कर सके। शिव दर्शन के शोकेस के तौर पर बनी ‘कर ले प्यार कर ले’ ने निराश किया। ‘पराठे वाली गली’ में दर्शकों ने घुसना पसंद नहीं किया। तीनों ही फिल्मों के शोज दर्शकों के अभाव में रद्द किए गए। वीकएंड में तीनों फिल्मों का कुल बिजनेस 2 करोड़ का आंकड़ा भी नहीं पार कर सका। अब गणतंत्र दिवस से पहले रिलीज हो रही ‘जय हो’ का इंतजार है।

30 जनवरी 2014
‘जय हो’ का औसत कलेक्शन

    पिछले हफ्ते रिलीज हुई सलमान खान की ‘जय हो’ के बाक्स आफिस व्यवहार पर बहसें चल रही हैं। कुछ ट्रेड पंडितों का मानना है कि सलमान खान की नरेन्द्र मोदी से हुई मुलाकात और अखिलेश यादव के आमंत्रण का फिल्म के बिजनेस पर असर पड़ा। इन पंडितों के मुताबिक सैफई और अहमदाबाद जाना सलमान खान के लिए नुकसान का सौदा साबित हुआ। कहा जा रहा है कि इससे उनके पारंपरिक (मुसलमान) दर्शक नाराज हुए। तो क्या सलमान खान की कामयाब फिल्मों का कारण यही पारंपरिक दर्शक हैं। एक तरह से ट्रेड पंडित सलमान खान के स्टारडम को बचाए रखने का यह तोड़ निकाल रहे हैं। सच यह है कि ‘जय हो’ दर्शकों को पसंद ही नहीं आई। इसी वजह से शुक्रवार को इस फिल्म का कलेक्शन 18 करोड़ से कम रहा। हालांकि शनिवार और रविवार को थोड़े दर्शक बढ़े, फिर भी वीकएंड कलेक्शन लगभग 60 करोड़ रहा। सलमान खान की फिल्म के लिए यह कलेक्शन औसत माना जाएगा। याद करें तो रणवीर सिंह की ‘ ़ ़ ऱाम-लीला’ ने भी शुक्रवार को ‘जय हो’ के बराबर ही कलेक्शन किया था। इस लिहाज से सलमान खान स्टारडम की सीढ़ी में कुछ पायदान नीचे उतर आए हैं।

दरअसल : फिल्म निर्माण में आ रही अभिनेत्रियां


-अजय ब्रह्मात्मज
    पहले  भी अभिनेत्रियां (हीरोइनें) प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से निर्माता बनती रही हैं। नरगिस, मीना कुमारी आदि से लेकर प्रीति जिंटा तक अनेक नाम लिए जा सकते हैं। निर्माता बनने की उनकी कोशिश परिवार और रिश्तेदारों की भलाई के लिए होती थी। या फिर करिअर के उतार पर आमदनी और कमाई के लिए वे पुराने रसूख और लोकप्रियता का इस्तेमाल कर निर्माता बन जाती थीं। इनमें से किसी को भी उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली। ऐसा लगता है कि वे जिस संयोग से फिल्म निर्माण में आती थीं, लगभग वैसे ही संयोग से फिल्म निर्माण से दूर भी चली जाती थीं। इधर एक नया ट्रेंड बनता दिख रहा है। अभी अभिनेत्रियां अपने करिअर के उठान पर ही निर्माता बनने से लेकर फिल्म निर्माण में हिस्सेदारी तक कर रही हैं।
    इन दिनों अनुष्का शर्मा दिल्ली के आसपास ‘एनएच 10’ की शूटिंग कर रही हैं। वह फैंटम के साथ मिल कर इस फिल्म का निर्माण कर रही हैं। उन्हें डायरेक्टर नवदीप सिंह की स्क्रिप्ट इतनी पसंद आई कि उन्होंने खुद ही निर्माता बनने का फैसला कर लिया। अनुष्का शर्मा एक तरफ राज कुमार हिरानी की फिल्म ‘पीके’ में आमिर खान की नायिका हैं तो दूसरी तरफ अनुराग कश्यप की ‘बांबे वेलवेट’ में वह रणबीर कपूर के साथ दिखेंगी। कह सकते हैं कि फिलवक्त वह अपने करिअर के उठान पर है। ऐसे वक्त में निर्माता बनने का फैसला सचमुच एक साहसिक कदम है।
    हिंदी फिल्म इंडस्ट्री भी भारतीय समाज के दूसरे क्षेत्रों की तरह पुरुष प्रधान है। यहां भी ज्यादातर सुविधाएं और लाभ पुरुषों के लिए उपलब्ध एवं सुरक्षित हैं। फिल्मों में अभिनेत्रियों का योगदान और सहयोग परिधि पर ही रहता है। वे किसी भी फिल्म की केंद्रीय फोर्स नहीं बन पाती हैं। इधर गौर करें तो सभी पापुलर पुरुष स्टार निर्माता बन चुके हैं। अच्छी और बड़ी फिल्मों को किसी न किसी तरह वे अपने बैनर तले ले आते हैं। पहले जो अभिनेता निर्देशन में आना चाहते थे, वे ही ज्यादातर निर्माता बनते थे। आमिर खान ने ‘लगान’ से एक नई परंपरा शुरू की। दोस्त आशुतोष गोवारीकर की अपारंपरिक स्क्रिप्ट में कोई भी निर्माता निवेश के लिए नहीं तैयार हुआ तो उन्होंने खुद ही निर्माता बनने का फैसला किया। उनके आगे-पीछे सलमान खान और शाहरुख खान भी निर्माण में उतरे। याद करें तो उनकी समकालीन अभिनेत्रियों में से एक-दो ने कारण विशेष से निर्माता बनने की छिटपुट कोशिश की। कोई भी अनुष्का शर्मा की तरह सीधे निर्माण में नहीं उतरा।
    और सिर्फ अनुष्का शर्मा ही क्यों? पिछले साल की सर्वाधिक सफल अभिनेत्री दीपिका पादुकोण ने नई फिल्म ‘फाइंडिग फैनी फर्नांडिस’ के निर्माण में शेयरिंग सेअप्रत्यक्ष हिस्सेदारी की है। वह इस फिल्म के लिए सीधे परिश्रमिक नहीं ले रही हैं। फिल्म के लाभ में उनकी शेयरिंग रहेगी। ऐसी शेयरिंग आमिर खान से सनी देओल तक करते रहे हैं। कह सकते हैं कि हिंदी फिल्मों में इधर अभिनेत्रियों का दबदबा बढ़ा है या वे अपने प्रभाव का सदुपयोग कर रही हैं। इधर शिल्पा शेट्टी भी फिल्म निर्माण में उतरी हैं। प्रियंका चोपड़ा अभिनय और गायकी के बाद अब निर्माण में हाथ आजमाना चाहती हैं। दीया मिर्जा अपनी दूसरी फिल्म ‘बॉबी जासूस’ का निर्माण कर रही हैं।
    दरअसल, इधर निर्माता की भूमिका और पहचान बदली है। पहले की तरह निवेश की मुश्किलें नहीं रह गई हैं। फिर निर्माण में पारदर्शिता आने से छल-प्रपंच कम हुआ है।  पहले के निर्माता काइयां और चालाक किस्म के प्राणि माने जाते थे। ऐसी धारणा थी कि फिल्म निर्माण में स्त्रियां नहीं आ सकतीं, क्योंकि अजीबोगरीब निवेशकों और वितरकों से मिलना पड़ता है। कारपोरेट प्रोडक्शन घरानों के आने से निर्माण और वितरण का काम आसान हुआ है। अब जरूरी नहीं है कि फिल्म प्रदर्शन का बोझ भी निर्माता उठाए। फिल्म बन जाने के बाद किसी कारपोरेट को बेच कर वे लाभ में हिस्सेदार हो सकती हैं।
    देखना यह होगा कि अभिनेत्रियों के फिल्म निर्माण में आने से फिल्म का कंटेंट कितना बदलता है। कहते हैं कि जिसकी पूंजी होती है, उसी का दिमाग चलता है। वह अपनी मर्जी और चाहत की फिल्में बनवाता है। अगर अभिनेत्रियां फिल्म निर्माण में उतर रही हैं तो हम उम्मीद करते हैं कि फिल्मों में पर्दे पर महिलाओं की भूमिका और मौजूदगी भी बढ़ेगी। ऐसा नहीं होता है तो वह अफसोसनाक बात होगी।

Monday, January 27, 2014

कमल स्‍वरूप-7

कमल स्‍वरूप की बातचीत की यह आखिरी किस्‍त है। ऐसा लगता है कि और भी बातें होनी चाहिए।फिल्‍म की रिलीज के बाद के अनुभवों पर उनसे बातें करूंगा। आप उनसे कुछ पूछना चाहें तो अपने सवाल यहां पोस्‍ट करें। अगली मुलाकात में उन सवालों पर बातचीत हो जाएगी।



जेएनयू में मेरी फिल्‍म का शो किया गया। गीता कपूर आई थी मेरा इंटरव्‍यू लेने। गीता ने मुझसे सवाल किया कि आपकी महिलाएं क्‍यों एकआयामी होती हैं? मैंने उन्‍हें समझाया कि आर्ट सिनेमा में औरतों को सिंबल सही तरीके से नहीं आता। ऐसी फिल्‍मों में कोई औरत घड़ा लेकर चलती है तो आप उसे गर्भ का बिंब कहते हो। उसके आगे आप सोच ही नहीं पाते हो। यह कह कर मैं सो गया। दो घंटे के बाद उठा तो खाना-वाना खत्‍म हो गया था। सब मुझे घूर रहे थे कि यह है कौन? उसके बाद उन लोगों ने मुझे प्रोमोट करना बंद कर दिया।
वीएचएस की कॉपी दर कॉपी हो रही थी। हर फिल्‍म स्‍कूल और फिल्‍म मंडली में ओम दर-ब-दर देखी जा रही थी। वीएचएस की कॉपी घिसती चली गई। बाद में तो केवल आवाज रह गई थी। चित्र ढंग से आते ही नहीं थे। नई पीढ़ी के बीच ओम दर-ब-दर पासवर्ड बन गई थी। सभी एक-दूसरे से पूछते थे कि तुमने यह फिल्‍म देखी है क्‍या? मेरी फिल्‍म पर दर्शकों की अलग कम्‍युनिटी बन गई। बाद में किसी ने सीडी बनाई फिर डीवीडी बनी और फिर किसी ने टोरेंट पर डाल दिया। ओम दर-ब-दर धीरे-धीरे मिथ बन गई। मैं कहता भी था कि ओम दर-ब-दर कल्‍ट नहीं, औकल्‍ट फिल्‍म है। वास्‍तव में देखें तो यह सब एक कॉमेडी है।
मेरा रुझान बॉलीवुड सिनेमा की तरफ नहीं है। मैं इधर झांकता भी नहीं हूं। ज्‍यादातर नए लड़के बॉलीवुड के परंपरा में ही काम कर रहे हैं। मेरे संपर्क में एनआईडी और सृष्टि से आए लड़के रहते हैं। वे लैपटॉप और मैकबुक पर काम करते हैं। मैं उनसे ज्‍यादा जुड़ाव महसूस करता हूं। विशाल भारद्वाज मुझे बहुत पसंद हैं। अनुराग कश्‍यप की गुलाल और आनंद गांधी की शिप ऑफ थिसिएस मुझे पसंद है। जमाना बदल गया है। इनके पास अलग एनर्जी है। इनके पास वर्ल्‍ड सिनेमा का एक्‍सपोजर है। यश चोपड़ा का क्राफ्ट मुझे पसंद था। मुझे वीर जारा बहुत अच्‍छी लगी थी। यश चोपड़ा रोमांटिक ट्रेडिशन के आखिरी क्राफ्टस मैन थे।
पैरेलल सिनेमा साहित्‍य पर आधारित था, इसलिए मुझे पसंद था। सही वितरण के अभाव में वह आगे नहीं बढ़ सका। दूसरी वजह थी कि अधिकांश फिल्‍ममेकर की पहली भाषा हिंदी नहीं थी। कुमार शाहनी तो भारत में रहते ही नहीं थे। उनकी माया दर्पण में निर्मल वर्मा हैं ही नहीं। वैसे निर्मल वर्मा स्‍वयं अनुदित भावभूमि के हैं। मणि कौल को भाषा की समझ थी। मणि कौल एक्‍टर बनने आए थे। बाद में उन्‍होंने क्राफ्ट सीखा और फिल्‍में बनाईं। शॉट टेकिंग में वे मास्‍टर थे। उनके ट्रेडिशन में जम्‍मू का लड़का अमित दत्‍ता हैं।
प्रोडक्‍शन डिसेंट्रलाइज हो रहा है। छोटे-छोटे शहरों से टैलेंट आ रहे हैं। हर इलाका अपना सिनेमा लेकर आ रहा है। पांच साल के अंदर सिनेरियो बदल जाएगा। गौर करें तो मुंबई के फिल्‍ममेकर भी लोकल सिनेमा ही बना रहे हैं। चूंकि उनकी दादागिरी है तो वे अपने सिनेमा को पैन इंडियन कह देते हैं। सारे फिल्‍ममेकर एक ही स्‍कूल के पढ़े हुए हैं। फिल्‍म इंडस्‍ट्री में तो पता ही नहीं चलता कि वास्‍तव में कौन किसका बच्‍चा है। नूतन के.एन. सिंह की बच्‍ची है या तनूजा मोती लाल की है। इतना बड़ा इनसिस्‍ट है। एफटीआईआई से इन्‍होंने सबक लिया। जब देखा कि शत्रुघ्‍न सिन्‍हा, मिथुन चक्रवर्ती और डेनी डेंजोग्‍पा स्‍टार बन रहे हैं। तो वे घबड़ा गए थे। सभी ने मिलकर सांठ-गांठ की और एफटीआईआई का एक्टिंग कोर्स बंद करवा दिया। जीपी सिप्‍पी और विद्याचरण शुक्‍ल की सांठ-गांठ से यह सब हुआ। बाहर से आकर स्‍टार बनने लगेंगे तो हिंदी फिल्‍म का अस्‍तबल का क्‍या होगा? फिल्‍म इंडस्‍ट्री तो स्‍टार ब्रिडिंग सेंटर है। इनका बड़ा खतरनाक सिस्‍टम होता है। अमिताभ बच्‍चन को ले लें। वे हरिवंश के बच्‍चे हैं। उन्‍हें यूपी टैरिटरी मिल गई। मां तेजी बच्‍चन पंजाब की थीं, तो पंजाब टैरिटरी मिल गई। अगर वे पंजाबी नहीं होते सिर्फ यूपी के भैया होते तो ये स्‍टार नहीं बनते। आगे चल कर उन्‍होंने बंगाली से शादी कर ली। ये मिक्‍स ब्रिडिंग से स्‍टार के हाय‍ब्रिड पैदा करते हैं। वे इसे अच्‍छी तरह समझते हैं। मणि कौल भी उनके साथ शामिल हो गए थे। उन्‍होंने भी हामी भरी कि एक्टिंग निकाल दो। वे तो कहते थे कि मैं तो कुर्सी-टेबुल से एक्टिंग करवा सकता हूं।
एनएफडीसी बहुत अच्‍छा काम कर रही है। उनका फिल्‍म बाजार बहुत ही अच्‍छा कदम है। इससे नई प्रतिभाओं को मौका मिलेगा। स्क्रिप्‍ट लैब अच्‍छी बात है। एनएफडीसी फेस्टिवल नेटवर्क और विदेशी संगठनों के साथ मिलकर बहुत ही अच्‍छा काम कर रही है। यूरोप पूरी तरह से भारत की तरफ देख रहा है। उन्‍हें इंडिया में काम दिख रहा है। तीन साल में नतीजे सामने मिलेंगे। एनएफडीसी भी डिसेंट्रलाइज होगा। बॉलीवुड से टक्‍कर लेने की बात भूल जानी चाहिए। बॉलीवुड का सर्कस चलता रहेगा।



Sunday, January 26, 2014

ॐ ....ओम....ओम दर-ब-दर

जो कोई कमल स्‍वरूप की फिल्‍म 'ओम दर-ब-दर नहीं समझ पा रहे हैं। उनके लिए बाबा नागार्जुन की यह कविता कुंजी या मंत्र का काम कर सकती है। इस कविता का सुंदर उपयोग संजय झा मस्‍तान ने अपनी फिल्‍म 'स्ट्रिंग' में किया था। वे भी 'ओम दर-ब-दर' को समझने की एक कड़ी हो सकते हैं। 
मंत्र कविता/ बाबा नागार्जन
ब्द ही ब्रह्म है..
ब्द्, और ब्द, और ब्द, और ब्द
प्रण‌, नाद, मुद्रायें
क्तव्य‌, उदगार्, घोषणाएं
भाष‌...
प्रव‌...
हुंकार, टकार्, शीत्कार
फुसफुस‌, फुत्कार, चीत्कार
आस्फाल‌, इंगित, इशारे
नारे, और नारे, और नारे, और नारे

कुछ, कुछ, कुछ
कुछ हीं, कुछ हीं, कुछ हीं
त्थ की दूब, रगोश के सींग
-तेल-ल्दी-जीरा-हींग
मूस की लेड़ी, नेर के पात
डाय की चीख‌, औघड़ की अट बात
कोयला-इस्पात-पेट्रोल
मी ठोस‌, बाकी फूटे ढोल

इदमान्नं, इमा आपः इदज्यं, इदं विः
मान‌, पुरोहित, राजा, विः
क्रांतिः क्रांतिः र्वग्वंक्रांतिः
शांतिः शांतिः शांतिः र्वग्यं शांतिः
भ्रांतिः भ्रांतिः भ्रांतिः र्वग्वं भ्रांतिः
चाओ चाओ चाओ चाओ
टाओ टाओ टाओ टाओ
घेराओ घेराओ घेराओ घेराओ
निभाओ निभाओ निभाओ निभाओ

लों में एक अपना ,
अंगीकरण, शुद्धीकरण, राष्ट्रीकरण
मुष्टीकरण, तुष्टिकरण‌, पुष्टीकरण
ऎतराज़‌, आक्षेप, अनुशास
द्दी आजन्म ज्रास
ट्रिब्यून‌, आश्वास
गुटनिरपेक्ष, त्तासापेक्ष जोड़‌-तोड़
‌-छंद‌, मिथ्या, होड़होड़
वास‌, उदघाट
मारण मोह उच्चाट

काली काली काली हाकाली हकाली
मार मार मार वार जाय खाली
अपनी खुशहाली
दुश्मनों की पामाली
मार, मार, मार, मार, मार, मार, मार
अपोजीश के मुंड ने तेरे ले का हार
ऎं ह्रीं क्लीं हूं आङ
बायेंगे तिल और गाँधी की टाँग
बूढे की आँख, छोकरी का काज
तुलसीद, बिल्वत्र, न्द, रोली, अक्ष, गंगाज
शेर के दांत, भालू के नाखून‌, र्क का फोता
मेशा मेशा राज रेगा मेरा पोता
छूः छूः फूः फूः फिट फुट
त्रुओं की छाती अर लोहा कुट
भैरों, भैरों, भैरों, रंगली
बंदूक का टोटा, पिस्तौल की ली
डॉल, रूब, पाउंड
साउंड, साउंड, साउंड

रती, रती, रती, व्योम‌, व्योम‌, व्योम‌, व्योम
अष्टधातुओं के ईंटो के ट्टे
हामहिम, हमहो उल्लू के ट्ठे
दुर्गा, दुर्गा, दुर्गा, तारा, तारा, तारा
इसी पेट के अन्द मा जाय र्वहारा
रिः त्स, रिः त्स

अब इसे जुबिन गर्ग की आवाज में सुन भी लें....

Saturday, January 25, 2014

कमल स्‍वरूप-6

कमल स्‍वरूप की बातें आप सभी को पसंद आ रही हैं। मैं इसे जस का तस परोस रहा हूं। कोई एडीटिंग नहीं। हां,अपने सवाल हटा दिए हैं। इस बातचीत में वे गुम भी तो हो गए हैं। अगर आप ने 'ओम दर-ब-दर' देख ली है और कुछ लिखना चाहते हैं तो पता है chavannichap@gmail.com




फिल्‍म के न रिलीज होने का मुझ पर बहुत असर पड़ा। मैंने इस फिल्‍म के लिए आठ लाख रुपए लोन लिए थे। दूसरे शेड्यूल में कैमरे की प्रॉब्‍लम आ गई थी। कैमरे का शटर खराब हो गया था। लौट कर रसेज देखे तो उसमें वीडियो इफेक्‍ट दिखा। वह दौर फिल्‍मों से वीडियो में ट्रांजिशन का दौर था। मुझे एक साल रुकना पड़ा। एक साल के बाद पुष्‍कर का मेला लगा तो फिर से गया। बीच में लोग बोलने लगे थे कि इसके साथ यही होना था। यह तो लापरवाह आदमी है। लोग मजे ले रहे थे। मेरा मजाक बन रहा था। फिल्‍म किसी तरह मैंने पूरी कर ली। इसे फिल्‍मफेयर अवार्ड मिला। फिल्‍म बर्लिन भी गई। मणि कौल आदि को मेरी जरूरत थी। वे मुझे पसंद करते थे। इकबाल मसूद वगैरह ने साफ कहा कि अगर तुम्‍हें एक्‍सेप्‍ट कर लेंगे तो बाकी का क्‍या होगा? श्‍याम बेनेगल आदि के बारे में क्‍या लिखेंगे। तू तो एक जंतु आ गया है। एक तो यह हुआ। मेरी फिल्‍म का रिव्‍यू तक नहीं किया गया। खालिद और आशीष ने अच्‍छा लिखा। ज्‍यादातर मुझे एक्‍सेंट्रीक मानते रहे। अवार्ड और फेस्टिवल से मैं सेलेब्रिटी बन गया। सब जगह से घूम-घाम कर आया। मुंबई में तब आदर्श नगर में रहता था। तब वह झोपड़पट्टी हुआ करती थी। आर्ट फिल्‍म झोपड़पट्टी में रह कर बनाओगे तो लोग कहेंगे कि लफड़ा है। आर्ट फिल्‍म भी क्‍लास की चीज है। वह दक्षिण मुंबई और एनसीपीए के आस पास हो सकती है। आर्ट फिल्‍म के लिए जरूरी है कि आप उस क्‍लास का बिलौंग करें। मुझे डर था कि अगर मैं उनकी राह पर चला तो धीरे-धीरे उनके जैसा हो जाऊंगा। इस वजह से उनके बीच मैं शिड्यूल कास्‍ट हो गया।
बाद में मुझे वीमेन इन सैटेलाइट सिटी के लिए ग्रांट मिली थी। उसे पूरा करने के बाद मैं फालके में लग गया। दादा साहब फालके पर मैंने 1990 से काम शुरू किया। तब मैं न्‍यू बांबे में रहता था। मैंने स्‍क्रैप बुक बनाना शुरू किया। अभी जो बुक बनाई है वह स्‍क्रैप बुक को स्‍कैन कर डिजिटाइज किया गया है। मैं दु:स्‍वप्‍न में ही जीता रहा। एनएफडीसी का पैसा न चुकाने से मैं डिफॉल्‍टर हो गया था। तब के निर्देशक रवि मलिक मेरे जाने के पीछे पड़े हुए थे। कोर्ट के भी चक्‍कर शुरू हो गए थे। मैं भी समाज से नजरें छुपाता था। मेरी मानसिक स्थिति अच्‍छी नहीं थी। उन्‍हीं दिनों मैंने तय किया कि अभी इससे भी बड़ा काम करूंगा। फाल्‍के पर काम करते हुए बीस साल निकल गया। फाल्‍के का काम जल्‍दी पूरा कर दूंगा।
अभी ओम दर-ब-दर रिलीज हुई है। मुझे लगता है कि मुझे दिया गया कर्ज माफ कर दिया गया है। एनएफडीसी ने अनेक फिल्‍मकारों के कर्ज माफ कर दिए थे। इस माफी का भी एक किस्‍सा है। एनएफडीसी का नियम था कि पहली फिल्‍म का कर्ज चुकाने के बाद ही दूसरी फिल्‍म के लिए कर्ज मिलता था। सभी के ऊपर कर्ज थे। किसी को दूसरी फिल्‍म के लिए पैसे नहीं मिल रहे थे। तभी गांधी पिक्‍चर की योजना बनी। इस फिल्‍म को एनएफडीसी ने सात साढ़े सात करोड़ दिए। यह खबर सुनते ही फिल्‍मकारों को मौका मिल गया। उन्‍होंने एक संगठन बनाया फॉरम फॉर गुड सिनेमा। सुरेश जिंदल ने उस फॉरम को फंड किया। दारू, टैक्‍सी के खर्च वही देते थे। सुरेश जिंदल और सईद मिर्जा के घर मीटिंग होती थी। फॉरम का कहना था कि हम गांधी नहीं बनने देंगे। उनकी मांग थी कि पैसे हमारे बीच बांटो। हम तो लाखों में फिल्‍म बना देते हैं। आप करोड़ों एक ही फिल्‍ममेकर को दे रहे हो। हमलोग किसी से कम हैं क्‍या? भूख हड़ताल, धरना, सत्‍याग्रह की योजनाएं बन गई। इस तरह उन्‍होंने मंत्रालय को ब्‍लैकमेल किया। फिर प्रस्‍ताव आया कि 1981 के पहले के सारे कर्ज माफ कर दिए जाएंगे।
आर्ट सिनेमा के लिए जरूरी है कि उसे नेशनल अवार्ड मिले। नेशनल अवार्ड मिलने के बाद ही औकात और अन्‍य सुविधाएं मिलती हैं। बगैर अवार्ड के आप इस समाज के सदस्‍य नहीं हो सकते। एक बार नेशनल अवार्ड मिल जाने से कई रास्‍ते खुल जाते हैं। आप सर्कल में आ जाते हैं और माननीय सदस्‍य बन जाते हैं। मेरी फिल्‍म को अवार्ड तो क्‍या नेशनल पैनोरमा के लिए भी नहीं चुना गया था।
मेरी फिल्‍म की अंडर ग्राउंड पॉपुलैरिटी की अलग कहानी है। सेंसर के लिए हमें एक वीएचएस कॉपी बनानी होती थी। मैंने दो कॉपी बना ली थी। एक मेरे पास रह गई थी। एक सेंसर को दी थी। सेंसर ने फिल्‍म को एक साल के लिए रोके रखा। उनको संदेह था कि फिल्‍म में कुछ छिपे हुए मतलब हैं। अब जैसे लड़का लौकेट खोल कर कुछ पढ़ता है। उन्‍होंने एक मौलवी को बुला कर पूछा कि यह कुरान शरीफ तो नहीं है? मैंने बताया था कि वह कुरान शरीफ नहीं। इंग्लिश की छोटी डिक्‍शनरी है। उन्‍होंने उसे फ्रेम बाय फ्रेम मौलवी को दिखाया। इसी प्रकार टरट्रीटाल कहीं सतश्रीयकाल तो नहीं है। सेंसर ने कुछ कट्स के साथ एडल्‍ट सर्टिफिकेट दिया। मुझे लगता है कि मेरी फिल्‍म को इसलिए एडल्‍ट सर्टिफिकेट मिला कि वह केवल एडल्‍ट को समझ में आ सकती है। मतलब मानसिक रूप से परिपक्‍व होने के बाद ही आप ओम दर-ब-दर देख सकते हैं। सेंसर को सेक्‍स और वायलेंस से ज्‍यादा दिक्‍कत नहीं होती है। उन्‍हें धर्म, राजनीति जैसी चीजों से दिक्‍कत होती है।
जो वीएचएस मेरे पास था, वह मैंने कुछ लोगों को दिखाया था। उन्‍हीं दिनों सफदर हाशमी की बलि चढ़ी थी। सहमत की स्‍थापना हुई थी। उन्‍हें मैं हीरो लग रहा था। उन्‍होंने मेरी फिल्‍म दिखाई। केरल में जॉन अब्राहम की मृत्‍यु हो गई थी। उन्‍हें भी मैं हीरो दिख रहा था। उन्‍हें बलि के लिए अगला बकरा चाहिए था। मैं सॉफ्ट टारगेट था। मेरे पास घर नहीं था, पैसे नहीं थे। मैं हैंडसम था। कोई काम नहीं था। इस प्रकार मैं बलि के लिए उपयुक्‍त था। बलि चढ़ने के सारे गुण मेरे अंदर थे। कल्‍ट बनने की सारी संभावना थी। सहमत ने दिल्‍ली में ओम दर-ब-दर का प्रीमियर किया। कसौली में विवान सुंदरम के घर पर इनकी मीटिंग होती थी। ये लोग मुझे भी ले गए। वहां सुबह-शाम ओम दर-ब-दर की वीएचएस देखी गई। मेरी जां ऐ ऐ और बबलू बेबीलोन से सुनकर उन्‍हें थ्रिल होता था। फिर अचानक ये लोग मुझ से नाराज हो गए। मैं बुर्जुआ था नहीं। उनकी लाइफ में कम्‍फर्ट फील नहीं करता था। उनकी जाति का मैं नहीं हो सका। हो भी नहीं सकता था। एक तो वे अंग्रेजी वाले थे और दूसरे बड़े बड़े लोग थे। मैं अपने हिसाब से एरोगेंट था।
 

Friday, January 24, 2014

कमल स्‍वरूप-5

कमल स्‍वरूप बी बातें आप सभी को पसंद आ रही हैं। मैं इसे जस का तस परोस रहा हूं। कोई एडीटिंग नहीं। हां,अपने सवाल हटा दिए हैं। इस बातचीत में वे गुम भी तो हो गए हैं। अगर आप ने 'ओम दर-ब-दर' देख ली है और कुछ लिखना चाहते हैं तो पता है chavannichap@gmail.com



मेरे ज्‍यादातर कलाकार नोन-एक्‍टर थे। एक्‍टर को भी दिक्‍कत हो रही थी। वे मेरी स्क्रिप्‍ट समझ ही नहीं पा रहे थे। वे अपना कैरेक्‍टर नहीं समझ पा रहे थे और संवादों के अर्थ नहीं निकाल पा रहे थे। मैंने किसी एक्‍टर का ऑडिशन नहीं लिया था। उन्‍हें कुछ पूछने का मौका भी नहीं दिया था मैंने। मैं मान कर चल रहा था कि मेरे सोचे हुए संसार को अजमेर खुद में समाहित करेगा और अजमेर का असर मेरे संसार पर होगा। तोड़ फोड़ और निर्माण एक साथ चलेगा। इस प्रक्रिया को मैं रिकॉर्ड कर रहा था। क्रिएटिव द्वंद्व को डॉक्‍यूमेंट कर रहा था। कृत्रिम और प्रा‍कृतिक का यह द्वंद्व अद्भुत था। ओम दर-ब-दर में मैंने किसी कहानी का चित्रण नहीं किया है। मजेदार है कि ओम दर-ब-दर की कहानी आप सुना नहीं सकते।
राजकमल चौधरी और मुक्तिबोध के लेखन का मेरे ऊपर असर रहा। राजकमल चौधरी से तो मैं मिला भी था। उनसे गिंसबर्ग पर बातें भी की थी। धूमिल की कविताओं और क‍हानियों का माहौल मुझे आकर्षित करता था। मुक्तिबोध के यहां विपात्र और सतह से उठता आदमी में उनका क्राफ्ट देखिए। मुक्तिबोध की कहानियों के रंग, रंगछाया और माहौल फिल्‍मों में रच दे तो बहुत बड़ी बात हो जाएगी। तारकोवस्‍की ब्रह्मराक्षस को रच सकते थे। मणि कौल कर सकते थे। सतह से उठता आदमी में वे सफल नहीं हो सके। सिद्धेश्‍वरी के समय वे क्राफ्ट सिद्ध कर चुके थे। तब तक वे मीठे हो गए थे। मुक्तिबोध और राजकमल की रचनाओं के बीज छायावाद में देखे जाते हैं। मेरा मानना है कि दोनों छायावादी रचनाकार नहीं थे।
पुष्‍कर की एक पुराण कथा है। ब्रह्मा जी के पास कोई स्‍थान नहीं था। ईश्‍वर ने नील कमल धरती पर फेंका। वह तीन जगह उछल कर गिरा। तीनों जगह झील बन गया। उन्‍हें आशीर्वाद मिला कि इन झीलों में जो भी नहाएगा वह सीधे स्‍वर्ग जाएगा। पुष्‍कर के आस पास मेला लगने लगा। लोग आकर वहां झील में डुबकी मारते थे। डुबकी मारने से उनके सारे पाप धूल जाते थे। बुरे कर्म साफ हो जाते थे। उनका स्‍वर्गारोहन हो जाता था। स्‍वर्ग की आबादी बढ़ने लगी। देवी-देवताओं ने ब्रह्मा से आपत्ति की। उन्‍होंने शिकायत की कि तुम कर्म श्रृंखला ही तोड़ रहे हो। ईश्‍वर ने कहा कि अब तो मैं आशीर्वाद दे चुका हूं, उसे बदल नहीं सकता। एक काम करता हूं कि मैं इसे वापस बुला लेता हूं। अब साल में केवल पांच दिनों के लिए वह धरती पर उतरेगा। उन पांच दिनों का ही महात्म्‍य होगा। मैंने इसे एक बिंब के तौर पर लिया।
बिंबों को आप छू नहीं सकते। जो दिखती है वह छाया है। छाया और बिंब पांच दिनों के लिए मिलते हैं तो पुष्‍कर का पानी पवित्र हो जाता है।
ओम दर-ब-दर कुमार शाहनी को पसंद आई थी। गुलाम शेख, भुपेन खख्‍खर और दूसरे चित्रकारों को भी मेरी फिल्‍म अच्‍छी लगी थी। बुद्धिजीवियों ने पसंद की थी। मणि कौल और कुमार शाहनी उनसे मिलवाने मुझे ले जाया करते थे। मैं भी उनके ग्रुप का छोटा सदस्‍य मान लिया गया था। उस ग्रुप को फिल्‍ममेकर की जरूरत थी। फिल्‍ममेकर को भी कलाकार समझा जाता था। हम लोगों की कास्टिंग हो चुकी थी। मैं भुपेन खख्‍खर की नैरेटिव पेंटिंग से बहुत प्रभावित था। फिल्‍म भी मेरे दिमाग में स्‍क्रॉल की तरह थी।
शुरू में फिल्‍म का नाम मैंने दर-ब-दर रखा था। कश्‍मीर में यह शब्‍द बहुत प्रचलित है। दर-बदर होना मतलब भटकना। घाटियों में भी एक दर्रे की आवाज निकल कर दूसरे दर्रे में जाती है तो उसे भी दर-ब-दर कहते हैं। प्रतिगूंज कह लें। यह प्रतिगूंज कांप रही थी। उस स्थिर करने के लिए मैंने दर-ब-दर में ओम शब्‍द जोड़ दिया। ओम मेरे फिल्‍म का कुंभक है। ओम के आने बाद द्वंद्व पैदा हुआ। तंत्र विज्ञान के लोग इसे अच्‍छी तरह समझ सकते हैं। ओम ही मेरे लिए फिल्‍म का सूत्र और मंत्र था। बाकी चरित्र उसके वजह से प्र‍कट होने लगी। राजकमल चौधरी तंत्र-मंत्र में थे। ऐसा लगता है कि वे साहित्‍य रच रहे थे, लेकिन उनके साहित्‍य में तंत्र-मंत्र ही है। उनके साहित्‍य को अर्थों में नहीं मंत्रों में समझने की जरूरत है। मेरी फिल्‍म भी मंत्रात्‍मक है। मंत्र से ही फिल्‍म का संकल्‍प बनता है। यह मंत्र मुझे मार भी सकता है। मुझे मारा भी उसने... लेकिन मैं जीवित रहा। बड़ी इच्‍छा रखने और ईशनिंदा करने का परिणाम तो होगा।

कमल स्‍वरूप-4



कमल स्‍वरूप से हुई बातचीत अभी जारी है। उनके प्रशंसकों,पाठकों और दर्शकों के लिए उन्‍हें पढ़ना रोचक है। सिनेमा के छात्र और अध्‍यापक...फिल्‍मकार भी इस बातचीत से लाभान्वित हो सकते हैं। अबर आप कमल स्‍वरूप की फिल्‍म या उन पर कुछ लिखना चाहें तो स्‍वागत है। chavannichap@gmail.com पते पर भेज दें।
 अभी के फिल्‍मकारों में मुझे विशाल भारद्वाज में संस्‍कार दिखता है। वे मेरठ के हैं। उन्‍होंने पल्‍प साहित्‍य भी पढ़ा है। गुलजार साहब की संगत भी की है। उन्‍हें संगीत का भी ज्ञान है। फिल्‍मों की मेलोडी, आरोह-अवरोह और सम सब कुछ मालूम है उन्‍हें। विशाल संगीत के सहारे अपनी फिल्‍म में समय पैदा करते हैं। किसी भी फिल्‍मकार की यह खूबी होती है कि दो घंटे की अवधि में वह कितने समय का एहसास देता है। अगर समय की अमरता का एहसास मिल जाए तो फिल्‍म बड़ी और महान हो जाती है। काल का अनुभव देने के बाद ही फिल्‍में कालातीत होती हैं। अफसोस है नए फिल्‍मकारों के फिल्‍मों में काल का अनुभव नहीं है। मुझे लगता है फिल्‍मकारों को काल का भाष ही नहीं है।
राजनीतिक फिल्‍मों को लेकर भी समस्‍या है। दर्शक और फिल्‍मकार तक यह मानते हैं कि राजनीति पर बनी फिल्‍में ही राजनीतिक होती हैं। राजनीति वास्‍तव में फिल्‍मकार के पोजीशन या स्‍टैंड से ताल्‍लुक रखती है। मुंबई में तो कम, लेकिन दक्षिण भारत में इस तरह की बातें हो रही हैं। फिल्‍मों के विषय से अधिक उसके फार्म और प्रजेंटेशन में पॉलीटिक्‍स होती है। राजकपूर की फिल्‍में देखें तो उनके लेखक ख्‍वाजा अहमद अब्‍बास वामपंथी थे। उनकी फिल्‍मों पर इप्‍टा और मार्क्‍स का प्रभाव था। एक जमींदार है, एक कम्‍प्राडोर बुर्जुआ है, एक नेशनल बुर्जुआ है, प्रोलेट्रिएट है। औरत है, औरत देवी भी है औरत वेश्‍या भी है। कहानी लिखने का एक फार्मूला बन गया था। गौर करें तो हिंदी फिल्‍मों की कहानी लिखने का फार्मूला इप्‍टा से ही आया है। कुमार साहनी ने तरंग बनाई थी तो सीपीएम का फार्मूला लिया था।
ओम दर-ब-दर का अंकन मैंने अंग्रेजी में किया। अंग्रेजी में ही मार्केटिंग होती थी। मेरी अंग्रेजी भी हिंदी की तरह कच्‍ची है। चूंकि मेरा विषय अलग था इसलिए एक भाषा बनानी पड़ी। मेरी अंग्रेजी में ग्रामर नहीं था, लेकिन स्‍पंदन था। मैं इसे जेनरेटिव सेंटेंश बोलता हूं। उसकी ध्‍वनि अटपटी और तोड़फोड़ की होती थी। मेरे वाक्‍य अनसुने होते थे। अनसुने वाक्‍यों में भी पॉलीटिक्‍स थी। मैंने तय कर लिया था कि कुछ भी फैमिली‍यर नहीं बनाऊंगा। मुझे अपनी फिल्‍म में ऐसा कुछ करना था जो न पहले देखा गया हो और न सुना गया हो। मुझे अपना स्‍पेस पैदा करना था। मैंने अपनी फिल्‍म में मां को निकाल ही दिया था। फिल्‍मों में सेक्‍स और वायलेंस फैमिलीयर होता है। मैंने इन दोनों को निकाल दिया। हमलोग फिल्‍मों में सेक्‍स और वायलेंस देखते हैं तो लगता है कि देखी हुई चीज है। देखने का रिश्‍ता ताजा हो जाता है। मुझे मरना भी नहीं दिखाना था। क्‍योंकि फिल्‍मों में आदमी मरता तो है नहीं। वह केवल प्रिट्रेंड करता है। मजेदार तत्‍थय है कि मेरी स्क्रिप्‍ट मंजूर हो गई। उसके बाद समस्‍या आयी कि मैं इसे हिंदी में कैसे लिखूं। अंग्रेजी में तो कुछ भी फेंक दो अच्‍छा लगता है। हिंदी में अपने धरती का ख्‍याल रखना पड़ता है। धरती तो अंग्रेजी में सोचती नहीं है। हिंदी में लिखने लगा तो वह अलग फिल्‍म बन गई। हिंदी में भी मुझे ऐसा कुछ लिखना था जो पहले नहीं सुना गया हो। मैं एक ही वाक्‍य को बार-बार लिखता था। जब तक मेरी समझ में आता था मैं लिखता रहता था। जब समझ में आना बंद हो जाता था तब मैं छोड़ देता था कि अब ठीक है। मुझे ऐसे ही वाक्‍य लिखने थे जो समझ में न आए। फिर भी इन वाक्‍यों में प्राण रहता था। मेरा मानना है कि जो चीज समझ में आ जाए वह आपके कब्‍जे में आ जाती है। आप उसे मार देते हैं। जब तक कोई चीज समझ में न आए तब तक उसमें जान रहती है। यह मेरा सिद्धांत था पॉलीटिकल स्‍टैंड था। मुझे स्क्रिप्‍ट लिखने में डेढ़ साल लगे।
शुरू में एनआईडी में दिखाया तो उनकी समझ में नहीं आया। फिल्‍म के आरंभ में प्रेम कहानी देख कर सभी खुश हुए, लेकिन कुछ देर के बाद सब गडमड हो गया। मेरी प्रेम कहानी में जब वे घर के अंदर चले गए तो मैंने बाहर के दरवाजे बंद कर दिए। मैं कंफ्यूजन पैदा कर दिया। यहां से फिल्‍म उनकी बौद्धिकता के लिए चुनौती हो गई। फिर फिल्‍म के अंदर तो घुस गए, लेकिन बाहर नहीं निकल पा रहे थे। मैंने उनके साथ छेड़खानी कर दी थी। सच कहें तो यह मेरे जीवन का अनुभव भी है। मुझे लगता है कि मैं तो सब कुछ समझ रहा हूं। फिर लगता है कुछ समझ में नहीं आ रहा है। सारे मतलब और अर्थ धीरे-धीरे छूट जाते हैं।
किशोर वय की जो छटपटाहट है उसे मैं पर्दे पर लाना चाहता था। दैहिक, मानसिक हर तरह की छपटाहट है फिल्‍म में। बाबूजी, जगदीश, ओम सब एक ही पात्र हैं। ये सभी ओम के ही प्रक्षेपण हैं।
फिल्‍म मेरे लिए एक जादू-टोना था। जादू-टोना दूसरों पर होने से पहले खुद पर होता है। पहले खुद को डिलयूड करना पड़ता है। मैं मेढ़कों की कल्‍पना कर रहा था तो मुझे हर जगह मेढक ही दिखने लगे। स्क्रिप्‍ट मेरे आंखों सामने नाचता रहता था। मैं साइकी की स्‍ट्रेट में जा रहा था। एक बहुत पतली रेखा थी मेरे पागल हो जाने का खतरा था। पागल तो मैं था ही। मैं एक अलग संसार में रमा हुआ था। अचेतन और अवचेतन में छलांगें लगा रहा था। कोशिश थी कि मोती हाथ लग जाए। ऐसी छलांग में डूबने की भी संभावना रहती है। समस्‍या थी कि मैं अपने पागलपन में जीवित कैसे रहूं। फिल्‍म कैसे बनाऊं। मेरे दोस्‍त कहते भी थे कि तू नेति-नेति पर चला गया तो बचेगा क्‍या। ऐसे तो तू मर जाएगा। फिर कौन से संसार में रहेगा। वे मेरे संसार के बारे में पूछने लगे। मेरा इरादा था कि नेति-नेति करते हुए अचानक कुछ दिखने लगेगा। दूसरा मेरा सिद्धांत था कि आर्ट इज नॉट नेचुरल। मणि कौल का सिद्धांत था कि स्‍वाभाविक हो जाओ। मैं पूछता था कि स्‍वभाव क्‍या होता है। मेरा कहना था कि आर्ट आर्टिफीशियल होता है।
आर्टिफीशियल लोक को लेकर मैं अजमेर जा रहा था। वहां जमीन है, जंगल है, पहाड़ है। सब कुछ वास्‍तविक है। वहां अपर मीडिल क्‍लास, लोअर मीडिल क्‍लास बाकी लोग दरगाह, परिवार और इन सभी का एक संसार है। उनके लिए वही नेचुरल है। कहते हैं कि डाक्‍यूमेंट्री बनाओ तो उसे फिल्‍म की तरह बनाओ। और फिल्‍म बनाओ तो उसे डाक्‍यूमेंट्री की तरह शूट करो। अजमेर की आत्‍मा मेरे खाके में थी। कहानी वहीं से निकली थी। अजमेर के प्रति मुझे प्रेम है और अजमेर ने मुझे धृष्‍टता दी है। अजमेर के प्रति मेरे मन में एक तिरस्‍कार भाव भी था। चोर बन कर मैं अपने ही खजाने को लूटने जा रहा था। कोशिश थी कि किसी को पता भी न चले कि मैं क्‍या लूट रहा हूं। अजमेर और पुष्‍कर में कहा जाता है कि लोग यहां देने आते हैं। कोई यहां से कुछ लेकर नहीं जाता। वहां जेबें खाली हो जाती हैं। मैं खाली जेब वहां गया था। अपने अप्राकृतिक संसार को वहां थोप रहा था। वहां के नोन एक्‍टर और एक्‍टर को ऐसी लाइने दी जो उन्‍होंने कभी सुनी ही नहीं थी। सुने-सुनाए संवाद हों तो एक्‍टर के हाथ-पांव खुद ही चलने लगते हैं। उनकी स्‍मृतियों में एक लय होती है। उसी लय को वे अभिनय में खींच लाते हैं।

Thursday, January 23, 2014

जय हो के गीत



जय हो

1

Jai Ho Title Song Lyrics


Jai jai jai jai jai jai jai jai jai jai ho, jai ho..
Jai jai jai jai jai jai jai jai jai jai ho, jai ho..
Jai Ho..
Jai Ho..

Ek zindagi..
Sabko mili..
Insaaniyat ki raah pe chalo..
Na bhed-bhaav koi rahe..
Sabke liye jagah dil mein ho..
Open your heart
And spread your love
Through the world..
Cause they all are the same..
Let there be peace
Let there be faith..
Ab mere sang kaho..
Jai Ho..
Jai jai jai jai jai jai jai jai jai jai ho, jai ho..
Jai jai jai jai jai jai jai jai jai jai ho, jai ho..
Jai ho, jai ho, jai jai..
Jai ho, jai ho, jai ho..
Vidya dadati vinyam (Jai ho..)
Vinyaa dadaati matrtam (Jai ho..)
Maatrtam dhanam apno ki..
Jay ho, jai ho, jai ho..
Jai ho, Jai ho, Jai ho..
Jay jai jai jai jai jai, jai ho..
Jai Ho..

Lyrics: Jai Ho – Title Song
Music Director: Amal Malik
Lyrics: Shabbir Ahmed
Singer: Wajid Ali, Armaan Malik, Brijesh Shandilya, Amal Malik




1
जाई हो टाइटल सॉंग लिरिक्स

जय जय जय जय जय जय जय जय जय जय हो, जय हो..
जय जय जय जय जय जय जय जय जय जय हो, जय हो..
जय हो..
जय हो..
एक ज़िंदगी..
सबको मिली..
इंसानियत की राह पे चलो..
ना भेद-भाव कोई रहे..
सबके लिए जगह दिल में हो..
ओपन योर हार्ट
एंड स्प्रेड योर लव
थ्रू द वर्ल्ड..
कॉज द ऑल आर द सेम..
लेट देयर बी पीस
लेट देयर बी फेथ..
अब मेरे संग कहो..
जय हो..
जय जय जय जय जय जय जय जय जय जय हो, जय हो..
जय जय जय जय जय जय जय जय जय जय हो, जय हो..
जय हो, जय हो, जय जय..
जय हो, जय हो, जय हो..
विद्या ददाति विनयम् (जय हो..)
विनय ददाति मात्रतम (जय हो..)
मात्रतम धनम अपनो की..
जय हो, जय हो, जय हो..
जय हो जय हो जय हो
जय जय जय जय जय जय जय जय हो..
जय हो..

लिरिक्स: जय हो टाइटल सॉंग
म्यूज़िक डाइरेक्टर: अमल मलिक
लिरिक्स: शब्बीर आमेड
सिंगर: वाजिद अली, अरमान मलिक, बृजेश शांडिल्य, अमल मलिक
2

Baaki Sab First Class Lyrics

Apna kaam banta
Bhaad mein jaaye janta
Apna kaam banta
Bhaad mein jaaye janta
Gungo bahro ki nagari
Kaun kisi ki sunta
Apna kaam banta
Bhaad mein jaaye janta
Apna kaam banta
Bhaad mein jaaye janta
Yeh desh tha veer jawaanon ka
Ab rah gaya beimaanon ka
Yeh desh tha veer jawaanon ka
Ab rah gaya beimaanon ka
Arey badal gaya itihaas hai
Raavan ki leela paas hai
Raavan ki leela paas hai
Baki sab first class hai
Aam aadmi udaas hai
Baaki sab first class hai
Baaki sab first class hai
Baki sab first class hai
Paisa paisa haaye re paisa
Paisa paisa haaye re paisa
Paisa paisa haaye re paisa
Upar leke jaaun kaisa, ho
Paise ki aapa dhaapi hai
Bholi soorat mein paapi hai
Agar jeb mein rishwat rakh do toh
Tumhe har galti ki maafi hai
Sachchaai ke mooh pe, kaala hai
Jhoothe ka bol, baala hai
Arey itna ghotala karte hai
Ye kehte nahi darte hai
Sachchaai ka kaam tumhara hai
Lekin ye desh hamara hai
Lekin ye desh hamara hai
Lekin ye desh hamara hai
Kheton mein ab bhi sookha hai
Mango man apna bhooka hai
Kahte hain India great hai
Yahaan betiyaan unsafe hain
Arey badal gaya itihaas hai
Raavan ki leela paas hai
Baaki sab first class hai
Baki sab first class hai
Baaki sab first class hai
Education neeyam tight karo
Future generation bright karo
Apna hak khud badh kar cheeno
Tum bhrashtachaar se fight karo
Guru bhole sun bhole
Sun bhole guru bhole
Haathon mein apne hath toh do
Le lenge inko ghere mein
Ab dekhna chahte hai hum bhi
Is desh ko naye savere mein
Saara jahan hamara hai
Saara jahan hamara hai
Ye aane waali peedhi hai
Yahi development ki seedi hai
Manzil paani hai toh bhaago
Agar chain se sona hai jaago
Hum badlenge itihaas re
Phir milke kahe, jhakkaas hai
Baaki sab first class hai
Phir milke kahe, jhakkaas hai
Baaki sab first class hai
Baaki sab first class hai
Baaki sab first class hai
Muah muah muah muah…
Lyrics: Baaki Sab First Class – Jai Ho
Music Director: Sajid Ali, Wajid Ali
Lyrics: Sajid Ali, Irfan Kamal, Danish Sabri
Singer: Wajid Ali



2
बाकी सब फर्स्ट क्लास लिरिक्स


अपना काम बनता
भाड़ में जाए जनता
अपना काम बनता
भाड़ में जाए जनता
गूंगो बहरो की नगरी
कौन किसी की सुनता
अपना काम बनता
भाड़ में जाए जनता
अपना काम बनता
भाड़ में जाए जनता
यह देश था वीर जवानों का
अब रह गया बेईमानों का
यह देश था वीर जवानों का
अब रह गया बेईमानों का
अरे बदल गया इतिहास है
रावण की लीला पास है
रावण की लीला पास है
बाकी सब फर्स्ट क्लास है
आम आदमी उदास है
बाकी सब फर्स्ट क्लास है
बाकी सब फर्स्ट क्लास है
बाकी सब फर्स्ट क्लास है
पैसा पैसा हाय रे पैसा
पैसा पैसा हाय रे पैसा
पैसा पैसा हाय रे पैसा
उपर लेके जाऊं कैसा, हो
पैसे की आपा धापी है
भोली सूरत में पापी है
अगर जेब में रिश्वत रख दो तो
तुम्हे हर ग़लती की माफी है
सच्चाई के मुंह पे, काला है
झूठे का बोल, बाला है
अरे इतना घोटाला करते है
ये कहते नही डरते है
सच्चाई का काम तुम्हारा है
लेकिन ये देश हमारा है
लेकिन ये देश हमारा है
लेकिन ये देश हमारा है
खेतों में अब भी सूखा है
माँगो मन अपना भूखा है
कहते हैं इंडिया ग्रेट है
यहाँ बेटियाँ अनसेफ हैं
अरे बदल गया इतिहास है
रावण की लीला पास है
बाकी सब फर्स्ट क्लास है
बाकी सब फर्स्ट क्लास है
बाकी सब फर्स्ट क्लास है
एजुकेशन नियम टाइट करो
फ्यूचर जेनरेशन ब्राइट करो
अपना हक खुद बढ़ कर छीनो
तुम भ्रष्टाचार से फाइट करो
गुरु भोले सुन भोले
सुन भोले गुरु भोले
हाथों में अपने हाथ तो दो
ले लेंगे इनको घेरे में
अब देखना चाहते है हम भी
इस देश को नये सवेरे में
सारा जहाँ हमारा है
सारा जहाँ हमारा है
ये आने वाली पीढ़ी है
यही डेवेलपमेंट की सीढ़ी है
मंज़िल पानी है तो भागो
अगर चैन से सोना है जागो
हम बदलेंगे इतिहास रे
फिर मिलके कहे, झक्कास है
बाकी सब फर्स्ट क्लास है
फिर मिलके कहे, झक्कास है
बाकी सब फर्स्ट क्लास है
बाकी सब फर्स्ट क्लास है
बाकी सब फर्स्ट क्लास है
लिरिक्स: बाकी सब फर्स्ट क्लास
म्यूज़िक डाइरेक्टर: साजिद अली, वाजिद अली
लिरिक्स: साजिद अली, इरफ़ान कमाल, दानिश सबरी
सिंगर: वाजिद अली

3

Tumko To Aana Hi Tha Lyrics

Owo..
Tumko to aana hi tha
Zindegi mein
Der hui aane mein kyun
Jeena mujhe hai bas tere liye
Jo bhi karun its only for you..
Because I love.. you..
I love.. you..
Because I love.. you..
I love you till the end.. ye.. aa..
Meri toh har ek subah
Hoti tere saath hi
Teri hi baaton mein beete din mera.. ha..
Tune aake har ek khushi mein
Main chhod doon only for you
Because I love you
I love you..
Because I love you..
I love you till the end.. ye..
Chaahe jo kuchh bhi ho
Main tujhe yoon hi chaahun sada
Har mod pe main tere hi saath hoon..
Jab tak chalein saansein
Mujhe jeena only for you
Because I love you
I love you..
Because I love you..
I love you till the end..

Lyrics: Tumko To Aana Hi Tha – Jai Ho Song
Music Director: Amal Malik
Lyrics: Shabbir Ahmed
Singer: Armaan Malik, Marianne D’Cruz Aiman, Altamash Faridi


3


तुमको तो आना ही था लिरिक्स

ओओ..
तुमको तो आना ही था
ज़िंदगी में
देर हुई आने में क्यूँ
जीना मुझे है बस तेरे लिए
जो भी करूँ इट्स ओनली फॉर यू..
बिकॉज़ आई लव यू..
आई लव... यू...
बिकॉज़ ई लोवे.. योउ..
आई लव... यू...टिल द एंड.. ये.. आ..
मेरी तो हर एक सुबह
होती तेरे साथ ही
तेरी ही बातों में बीते दिन मेरा.. हा..
तूने आके हर एक खुशी में
मैं छोड़ दूं ओनली फॉर यू
बिकॉज़ आई लव... यू...
आई लव... यू...
बिकॉज़ आई लव... यू...
आई लव... यू...टिल द एंड.. ये..
चाहे जो कुछ भी हो
मैं तुझे यूं ही चाहूं सदा
हर मोड़ पे मैं तेरे ही साथ हूँ..
जब तक चलें साँसें
मुझे जीना ओनल फॉर यू
बिकॉज़ आई लव... यू...
आई लव... यू...
बिकॉज़ आई लव... यू...
आई लव... यू...टिल द एंड..

लिरिक्स: तुमको तो आना ही था जाई हो सॉंग
म्यूज़िक डाइरेक्टर: अमल मलिक
लिरिक्स: शब्बीर आमेड
सिंगर: अरमान मलिक, मेरिन दक्रूज़ ऐमन, अल्तमश फरीदी
4

Tere Naina Maar Hi Daalenge Lyrics

Tere naina bade katil, maar hi daalenge..
Tere naina bade katil, maar hi daalenge..
Kaatilana.. kaatilana adaaon se
Ek din is dil ko..
Hasaayenge, rulaayenge
Maar hi daalenge..
Tere naina, naina..
Tere naina, naina..
Kaatilana bade naina, naina (Repeat once)
Kaatilana..
Kaatilaana adaaon se ek din is dil ko..
Hasayenge, rulaayenge, maar hi daalenge..
Tere naina bade katil, maar hi daalenge..
Ga ma pa sa, sa ga ma pa sa, sa na sa ni re
Shararat naina karte hain
Tadapna dil ko padta hai
O dheere dheere haule haule
Silsila yeh badhta hai
Teri yaadon ki garmi se
Mera lamha pinghalta hai
Dard ko teri baahon mein
Bada aaram milta hai..
Bada aaram milta hai..
Kaatilaana adaaon se ek din is dil ko..
Hasayenge, rulaayenge, maar hi daalenge..
Tere naina bade katil, maar hi daalenge..
Naina.. kaatilaana.. naina re..
Tere ehsaas ki khusboo
Mere saanson mein bahti hai
Tere deedar ki khwaahish
Mujhe din raat rahti hai
Tere aane ki aahat se
Machalte hain
Mahakte hain
Bichhadte hain toh her lamha
Teri hi raah takte hain
Teri hi raah takte hain
Kaatilaana adaaon se ek din is dil ko..
Hasayenge, rulaayenge, maar hi daalenge..
Tere naina bade katil, maar hi daalenge..
Tere naina, naina..
Tere naina, naina..
Kaatilana bade naina, naina (Repeat 3 times)

Lyrics: Tere Naina Bade Katil Maar Hi Daalenge – Jai Ho Song
Music Director: Sajid, Wajid
Singer: Shaan, Shreya Ghoshal, Shabaab Sabri


4


तेरे नैना मार ही डालेंगे लिरिक्स


तेरे नैना बड़े कातिल, मार ही डालेंगे..
तेरे नैना बड़े कातिल, मार ही डालेंगे..
कातिलाना.. कातिलाना अदाओं से
एक दिन इस दिल को..
हसाएँगे, रुलाएँगे
मार ही डालेंगे..
तेरे नैना, नैना..
तेरे नैना, नैना..
कातिलाना बड़े नैना, नैना (रिपीट वन्स)
कातिलाना..
कातिलाना अदाओं से एक दिन इस दिल को..
हसाएँगे, रुलाएँगे, मार ही डालेंगे..
तेरे नैना बड़े कातिल, मार ही डालेंगे..
गा मा पा सा, सा गा मा पा सा, सा ना सा नि रे
शरारत नैना करते हैं
तड़पना दिल को पड़ता है
ओ धीरे धीरे हौले हौले
सिलसिला यह बढ़ता है
तेरी यादों की गर्मी से
मेरा लम्हा पिघलता है
दर्द को तेरी बाहों में
बड़ा आराम मिलता है..
बड़ा आराम मिलता है..
कातिलाना अदाओं से एक दिन इस दिल को..
हंसाएँगे, रुलाएँगे, मार ही डालेंगे..
तेरे नैना बड़े कातिल, मार ही डालेंगे..
नैना.. कातिलाना.. नैना रे..
तेरे एहसास की खुश्‍बू
मेरे साँसों में बहती है
तेरे दीदार की ख्वाहिश
मुझे दिन रात रहती है
तेरे आने की आहट से
मचलते हैं
महकते हैं
बिछड़ते हैं तो हेर लम्हा
तेरी ही राह ताकते हैं
तेरी ही राह ताकते हैं
कातिलाना अदाओं से एक दिन इस दिल को..
हंसाएँगे, रुलाएँगे, मार ही डालेंगे..
तेरे नैना बड़े कातिल, मार ही डालेंगे..
तेरे नैना, नैना..
तेरे नैना, नैना..
कातिलाना बड़े नैना, नैना (रिपीट 3 टाइम्स)

लिरिक्स: तेरे नैना बड़े कातिल मार ही डालेंगे जाई हो सॉंग
म्यूज़िक डाइरेक्टर: साजिद, वाजिद
सिंगर: शान, श्रेया घोषाल, शबाब सबरी
5

Photocopy Lyrics

Hey ye jee re..
Jatt pat par ulat palat
Natkhat jatt latak matak
Lachak machak, lachak machak
Chal chalat jat..
Aye chhora gaanda thhe gaayo
Re tere mukhde mein heere panne jade
Latko jhhatko jiyara kare
Tere mukhde mein heere panne jade
Latko jhhatko jiyara kare
Aye chhora gaanda thhe gaayo
Tu naathi toh tharo photo panchal se
Tu naathi toh tharo photo panchal se
Tu naathi toh tharo photo panchal se
Joh tharo photo naathi, naathi, naathi
Joh tharo photo naathi toh photocopy panchal se..
Tu naathi toh tharo photo panchal se
Tu naathi toh tharo photo panchal se
Jo tharo photo naathi, naathi, naathi
Jo tharo photo naathi toh photocopy panchal se..
Jo tharo photo naathi toh photocopy panchal se..
Ye chhora gaanda thhe gaayo
Are dhichkiyaun dhhoom tere thumkey dhamakey
Sun sun ke sher mere dil ka dahaade
Han.. han.. han..
Myaaun-myaaun kahey ko shekhi baghare
Bille ko dil key tu sher pukaare
Ho lalkaro naa.. haan phatkaro naa..
Mere jungle me dangal naa chaal sey
Gaali bhii gori tere hotho se chal se
Gaali bhii gori tere hotho se chal se
Gaali bhii gori terey hotho se chal se
Joh teri gaali naathi, naathi, naathi
Joh teri gaali naathi to joraa jorii panchal se
Aye chhora gaanda thhe gaayo
Sooraj sajaa dunga chandaa bicha dunga
Kadmo mein keh de joh tu haan.. haan..
Sooraj thakelaa hai, chandaa akelaa hai
Bore kar tu mujhko naa.. aa..
Apna bana loon aa dil me basaa lun aa
Tasweer main teri haan..
Poori nahin se toh aadhhi bhi chal se
Poori nahin se toh aadhhi bhi chal se
Tere man mein jagha, jagha, jagha
Tere man mein jagha
Thodi thhodi panchal se..
Tu naathi toh tharo photo banchal se
Tu naathi toh tharo photo banchal se
Jo tharo photo jo tharo photo
Jo tharo photo naathi, naathi, naathi
Joh tharo photo naathi toh photocopy panchal se
Joh tharo photo naathi toh photocopy panchal se
Aye chhora gaanda thhe gaayo

Lyrics: Photocopy – Jai Ho Song
Music Director: Sajid, Wajid
Lyrics: Kausar Munir
Singer: Himesh Reshammiya, Keerthi Sagathia, Palak Muchhal

 


5
फोटोकॉपी लिरिक्स


हे ये जी रे..
जट पट पर उलट पलट
नटखट जट लटक मटक
लचक मचक, लचक मचक
चल चलत जात..
आए छोरा गांडा थो गायो
रे तेरे मुखड़े में हीरे पन्ने जड़े
लटको झटको जियरा करे
तेरे मुखड़े में हीरे पन्ने जड़े
लटको झटको जियरा करे
आए छोरा गांडा थे गायो
तू नाथी तो तरो फोटो पांचल से
तू नथी तो थारो फोटो पां चाल से
तू नथी तो थारो फोटो पां चाल से
जो थारो फोटो नथी, नथी, नथी
जो थारो फोटो नथी तो फोटोकॉपी पां चाल से..
तू नथी तो थारो फोटो पांचल से
तू नथी तो थारो फोटो पांचल से
जो थारो फोटो नथी, नथी, नथी
जो थारो फोटो नथी तो फोटोकॉपी पां चाल से..
जो थारो फोटो नथी तो फोटोकॉपी पां चाल से..
ये छ्होरा गांडा तहे गायो
अरे धीचक़ीयोन घूम तेरे ठुमके धमाके
सुन सुन के शेर मेरे दिल का दहाड़े
हाँ.. हाँ.. हाँ..
म्यओन-म्यओन कहे को शेखी बघरे
बिल्ले को दिल के तू शेर पुकारे
हो ललकारो ना.. हन फटकरो ना..
मेरे जंगल मे दंगल ना चाल से
गाली भी गोरी तेरे होठों से चाल से
गाली भी गोरी तेरे होठों से चाल से
गाली भी गोरी तेरे होठों से चाल से
जो तेरी गाली नथी, नथी, नथी
जो तेरी गाली नथी तो जोरा ज़ोरी पां चाल से
आ छोरा गांडा थे गायो
सूरज सज़ा दूँगा चंदा बिछा दूँगा
कदमो में कह दे जो तू हां.. हां..
सूरज थकेला है, चंदा अकेला है
बोर कर तू मुझको ना.. आ..
अपना बना लूं आ दिल मे बसा लूँ आ
तस्वीर मैं तेरी हां..
पूरी नहीं से तो आधी भी चाल से
पूरी नहीं से तो आधी भी चाल से
तेरे मान में जगह, जगह, जगह
तेरे मान में जगह
थोड़ी थोड़ी पां चाल से..
तू नथी तो थरो फोटो बनचल से
तू नथी तो थारो फोटो बनचल से
जो थारो फोटो जो थारो फोटो
जो थारो फोटो नथी, नथी, नथी
जो थारो फोटो नथी तो फोटोकॉपी पां चाल से
जो थारो फोटो नाती तो फोटोकॉपी पां चाल से
ऐ छोरा गांडा थे गायो

लिरिक्स: फोटोकॉपी
म्यूज़िक डाइरेक्टर: साजिद, वाजिद
लिरिक्स: कौसर मुनीर
सिंगर: हिमेश रेशम्मिया, कीर्ति सगतिया, पालक मुच्छल