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Thursday, October 31, 2013

दरअसल : ‘बेशर्म’ और ‘बॉस’ के समान लक्षण



-अजय ब्रह्मात्मज
    इस महीने रिलीज हईं ‘बेशर्म’ और ‘बॉस’ समान वजहों से याद की जाएंगी। भविष्य में ट्रेड पंडित इनके साक्ष्य से उदाहरण देंगे। निर्माता-निर्देशक भी अपनी योजनाओं में इनका खयाल रखेंगे। दोनों फिल्में लालच के दुष्परिणाम का उदाहरण बन गई हैं। कैसे?
    ‘बेशर्म’ के निर्माता रिलाएंस और निर्देशक अभिनव सिंह कश्यप ने तय किया कि 2 अक्टूबर को मिली गांधी जयंती की छुट्टी का उपयोग करें। 2 अक्टूबर को बुधवार था। उन्होंने शुक्रवार के बजाए बुधवार को ही ‘बेशर्म’ रिलीज कर दी। 3 दिनों के वीकएंड को खींच कर उन्होंने पांच दिनों का कर दिया। साथ ही यह उम्मीद रखी कि रणबीर कपूर की ‘बेशर्म’ देखने के लिए दर्शक टूट पड़ेंगे। दर्शक टूटे। पहले दिन फिल्म का जबरदस्त कलेक्शन रहा। अगर वही कलेक्शन बरकरार रहता या सफल फिल्मों के ट्रेंड की तरह चढ़ता तो ‘बेशर्म’ चार-पांच दिनों में ही 100 करोड़ क्लब में पहुंच जाती। ऐसा नहीं हो सका। फिल्म का कलेक्शन पांच दिनों में 40 करोड़ के आसपास ही पहुंचा।
    दो हफ्ते के बाद फिर से बुधवार आया। इस बार बकरीद थी। बकरीद की भी छुट्टी थी। लिहाजा वॉयकॉम और अक्षय कुमार ने अपनी फिल्म ‘बॉस’  की रिलीज दो दिन पहले कर ली। फिल्म बुधवार को रिलीज हुई। पहले दिन 12 करेाड़ के लगभग कलेक्शन रहा। अगले दिन से ‘बेशर्म’ की तरह ही ‘बॉस’ का भी कलेक्शन गिरा। इस फिल्म ने भी पांच दिनों के वीकएंड में 40 करोड़ के आसपास का ही कारोबार किया।
    दोनों फिल्में महंगी थी। दोनों में पॉपुलर स्टार थे। दोनों का बेहतरीन प्रचार हुआ था। दोनों मसाला एंटरटेनमेंट थीं। इन दिनों इसका चलन बढ़ा हुआ है। आमिर, सलमान, शाहरुख, अजय सभी इस मसाला एंटरटेनमेंट की बहती कमाई से अपनी तिजोरी भर चुके हैं। अक्षय कुमार को भी पहले लाभ हुआ है। रणबीर कपूर ने ‘ये जवानी है दीवानी’ से 100 करोड़ क्लब में दस्तक दी थी। अभी वे इस क्लब का आनंद उठाते कि उन्हें क्लब से बाहर निकलना पड़ा। हालांकि इससे उनकी पापुलैरिटी में ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है, लेकिन स्टारडम तो प्रभावित हो गया। उन्हें फिर से जोर लगाना पड़ेगा। अगली फिल्म ‘बांबे वेलवेट’ या उसकी रिलीज के पहले उन्हें किसी और फिल्म से 100 करोड़ क्लब में आना पड़ेगा। दरअसल, हमारे पापुलर स्टारों ने खुद के लिए ही मुसीबत खड़ी कर ली है। कामयाब स्टार की अगली कतार में रहने के लिए यह जरूरी हो गया है। अभी सारे स्टारों का जोर कमाई पर है। क्रिएटिव संतोष कमाई के बाद आता है। सभी बेशर्मी से खुलेआम कहते हैं कि आखिरकार फिल्म का बिजनेस मायने रखता है। एप्रीसिएशन से क्या होता है?
    ‘बेशर्म’ और ‘बॉस’ इस बात के भी उदाहरण हैं कि मसाला मनोरंजन के जोनर का अधिकतम दोहन हो चुका है। सलमान खान ने एक इंटरव्यू में कहा था कि दर्शक मसाला मनोरंजन से ऊब जाएंगे और फिर हमें कुछ और करना होगा? उनका अनुमान सही निकला। लोग सचमुच ऊब चुके हैं। मुझे तो लगता है कि प्रभु देवा के निर्देशन में आ रही ‘आर ़ ़ ़ राजकुमार’ इस जोनर की आखिरी बड़ी कोशिश होगी। उस फिल्म के साथ ‘वांटेड’ से आरंभ हुआ चक्र पूरा हो जाएगा। ‘बेशर्म’ और ‘बॉस’ की असफलता निर्माताओं के लिए सबक है। दोनों ही फिल्मों ने दर्शकों की परवाह नहीं की। कहीं न कहीं दोनों फिल्में निर्देशक की खामखयाली और निर्माताओं की अल्पदृष्टि से इस हाल में पहुंची।
    गौर करें तो दर्शक दोनों ही फिल्मों को पहले दिन देखने गए। दूसरे दिन से उनकी संख्या में आई गिरावट सबूत है कि फिल्म उन्हें पसंद नहीं आईं। वे दोबारा थिएटर नहीं गए। बाहर निकल कर उन्होंने फिल्म की बुराई भी की। आम तौर पर चालू किस्म की फिल्मों को भी पॉजीटिव माउथ पब्लिसिटी मिल जाती। ‘बेशर्म’ और ‘बॉस’ के प्रति दर्शकों का रवैया निगेटिव रहा। उन्होंने बता और जता दिया कि अब बहुत हो गया। उनकी नाखुशी का परिणाम दिख गया।
    लेकिन क्या हिंदी फिल्मों के निर्माता-निर्देशकों के सिर पर सवार कामयाबी का भूत उतरेगा? अगर वे ठहर कर सोचें तो उन्हें इस से छुटकारा लेना ही होगा। अच्छी बात है कि सीमित बजट में बनी बेहतरीन फिल्में दर्शकों को उम्दा बिजनेस देने के साथ निर्माताओं को लाभ भी दे रही है। ‘लंचबॉक्स’ और ‘शाहिद’ अपनी सीमाओं में सफल फिल्में हैं। दोनों संवेदनशील और यथार्थपरक भी हैं। निश्चित ही मुख्यधारा के फिल्मकारों को ऐसी फिल्मों से कुछ सीखना चाहिए।


Tuesday, October 29, 2013

यार मेरी जिंदगी... आनंद एल राय-हिमांशु शर्मा

तनु वेड्स मनु के बाद रांझणा के रूप में दूसरी खूबसूरत फिल्म देने के बाद यह जोड़ी चर्चा में है. फिल्मकार आनंद एल राय और लेखक हिमांशु शर्मा की दोस्ती के बारे में बता रहे हैं रघुवेन्द्र सिंह
वो बड़े भाग्यशाली होते हैं, जिनके हिस्से सच्ची दोस्ती आती है. और बात जब फिल्म इंडस्ट्री जैसी एक अति व्यावहारिक और घोर व्यावसायिक जगह की हो, तो फिर इसका महत्व शिव की जटा से निकली गंगा सा हो जाता है. हिमांशु शर्मा 2004 में मुंबई पहुंचे, लखनऊ से वाया दिल्ली होते हुए. दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज से ग्रेजुएशन के बाद वह एनडीटीवी में आठ महीने नौकरी कर चुके थे. चैनल में वह बतौर लेखक कार्यरत थे. सच्चाई उनकी जुबान पर रहती थी. हकीकत को वह बेलाग-लपेट मुंह पर ही बोल देते थे. उसका खामियाजा भी उन्हें उठाना पड़ता था. ''मुझे कई प्रोड्यूसर्स ने यह कहकर निकाल दिया गया कि मैं बदतमीज और डिस्ट्रैक्टिव हूं. हिमांशु बताते हैं. लेकिन उनकी यही खूबी आनंद एल राय को भा गई. ''इससे पहली मुलाकात में ही मुझे समझ में आ गया था कि इसके दिल में जो है, वही जुबान पर है." आनंद बताते हैं. 
आनंद और हिमांशु की पहली भेंट एक कॉमन दोस्त के जरिए हुई थी. सिनेमा और खाने में दोनों की समान रुचि है. दोनों की पसंदीदा रोमांटिक फिल्म गाइड है. हिमांशु हंसते हुए कहते हैं, ''हमारी जोड़ी की स्ट्रेंथ खाना है. हामी भरते हुए आनंद कहते हैं, ''हां, हम खाते बहुत हैं, लेकिन मुझे लगता है कि हम इस वजह से साथ चल रहे हैं, क्योंकि यह राइटर जैसा राइटर नहीं है और मैं डायरेक्टर जैसा डायरेक्टर नहीं हूं."
हिमांशु को आज तक नहीं पता कि वह फिल्म लेखन में क्यों आए. शायद इसीलिए उन्हें यह भी नहीं पता कि वह जिंदगियों को पन्ने पर उतारते कैसे हैं. ''मुझे जो अच्छा लगता है, मैं लिख देता हूं और फिर उम्मीद करता हूं कि दस में से पांच या छह लोग उसे पसंद करेंगे. क्योंकि मैं भी उन्हीं के बीच से आया हूं. मैं गोविंदा की फिल्में देखकर बड़ा हुआ हूं. मैं प्रशिक्षित लेखक नहीं हूं. हिमांशु साफगोई से कहते हैं. लेकिन आनंद राय को पता है कि आज वह फिल्ममेकिंग में क्यों हैं. औरंगाबाद (महाराष्ट्र) की बीएएम यूनिवर्सिटी में वह कंप्यूटर इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने यह सोचकर गए थे कि नित कुछ नया करने को मिलेगा. 1986 का एक किस्सा आनंद बताते हैं, ''कंप्यूटर इंडिया में आया ही था. मैं सोचता था कि कंप्यूटर इंजीनियर बनूंगा, तो जिंदगी में हमेशा नयापन रहेगा. पर पढ़ाई के दौरान मुझे एहसास हो गया कि इसमें मुझे क्रिएटिव स्पेस नहीं मिल रहा है."
आनंद अपनी बात खत्म करते कि हिमांशु ने उन पर यह मीठा सा इल्जाम लगा दिया, ''एक लडक़ा, जो इंजीनियरिंग करके देश की सेवा करता, आपने उसकी सीट खा ली सर. जवाब में आनंद ने कहा, ''मैं भी तो देश की सेवा कर रहा हूं. इंजीनियरिंग का इस्तेमाल मैं फिल्ममेकिंग में कर तो रहा हूं. तू कहता है नहीं है कि यार, आप टाइम डिवीजन कमाल का करते हो." मुंबई आने के बाद आनंद अपने बड़े भाई रवि राय के साथ काम करने लगे, जो टीवी में सक्रिय थे. आनंद ने पहला टीवी सीरियल सोनी के लिए थोड़ा है थोड़े की जरूरत है डायरेक्ट किया. फिर बाद में, भाई के साथ मिलकर उन्होंने पंद्रह से अधिक टीवी शोज का निर्माण किया.
2006 में आनंद और हिमांशु ने मिलकर अपना पहला कदम बढ़ाया. स्ट्रेंजर के रूप में इस जोड़ी का पहला काम सामने आया, लेकिन दर्शकों ने इसे अपनाने से इंकार कर दिया. नाकामयाबी हाथ लगी. इसकी जिम्मेदारी आनंद खुद पर लेते हैं. ''मैं दर्शकों को कहानी सुनाना भूल गया. मैं उन्हें यह दिखाने लगा कि देखो, मैं क्या-क्या दिखा सकता हूं. मैं खुद को कहानी सुनाने लगा था." स्ट्रेंजर को वे सबक के तौर पर लेते हैं, ''उस फिल्म ने मुझे सिखाया कि फिल्म का दर्शकों से कम्युनिकेशन होना चाहिए." 
इस फिल्म के बाद हिमांशु और आनंद बेरोजगार हो गए. हिमांशु ने अपना रास्ता अख्तियार कर लिया. वह टशन फिल्म में असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर जुड़ गए. बकौल आनंद, ''यह मुझे छोडक़र चला गया था." हिमांशु जवाब देते हैं, ''छोडक़र मतलब? रोटी खाएं या ना खाएं?" आनंद हंसते हुए कहते हैं, ''जब ये टशन कर रहा था, तब भी हमने बहुत आइसक्रीमें साथ खाईं बैठकर." फिर वह दार्शनिक अंदाज में कहते हैं, ''सफलता-असफलता, दोनों आने के बाद नॉर्मल होने में वक्त लेती हैं. मुझे भी संभलने के लिए टाइम चाहिए था. मेरे पास पैसों की कमी आ गई थी. उस वक्त मैंने जी कैफे के लिए बॉम्बे टॉकिंग नाम की अंग्रेजी सीरीज बनाई. उसके लिए अच्छा-खासा पैसा मिला. फिर मुझे लगा कि अब एक-डेढ़ साल टेंशन नहीं है."
हिमांशु तनु वेड्स मनु की स्क्रिप्ट के साथ 2008 में आनंद के पास लौटे. ''इसने जब मुझे कहानी सुनाई, तो मुझे लग गया कि यह कहानी वर्क करेगी." आनंद बताते हैं. तनु वेड्स मनु ने न केवल इन्हें सफल लेखक-निर्देशक के तौर पर स्थापित किया, बल्कि इसमें केंद्रीय भूमिका निभाने वाली कंगना रनौत के करियर के लिए टर्निंग पॉइंट फिल्म साबित हुई. ऐसा ही कुछ आलम रहा इस जोड़ी की हालिया आई फिल्म रांझणा का. इसने बॉक्स-ऑफिस पर सौ करोड़ रुपए की आमदनी तो की ही, सोनम कपूर को दमदार अभिनेत्री और तमिल सिनेमा के सुपरस्टार धनुष को हिंदी क्षेत्र में लोकप्रिय बना दिया. और तनु वेड्स मनु एवं रांझणा की एक विशेषता, जिसने सबका ध्यान खींचा, वह इसके कथानक की उत्तर भारतीय पृष्ठभूमि रही. पहले कानपुर और फिर बनारस को इस जोड़ी ने जस का जस पर्दे पर उतार दिया. आनंद कहते हैं, ''हम इन शहरों में टूरिस्ट बनकर नहीं जाना चाहते. हमने स्थानीय लोगों की नजर से इन शहरों को दिखाया." दोबारा अपनी फिल्म का कथानक यूपी चुनने के बाबत आनंद कहते हैं, ''जो आपके हिस्से का है, पहले उसे दिखा लें. फिर हम भी शायद फ्लाइट पकडक़र यूरोप चले जाएंगे." हिमांशु अपना मत रखते हैं, ''हम जियोग्राफी के हिसाब से कहानी नहीं लिखते हैं. मुझे लगता है कि कहानी खुद ब खुद बता देती है कि उसे क्या जियोग्राफी चाहिए."
हिमांशु इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि हिंदी फिल्मों ने गांव-कस्बों का सही चित्रण पर्दे पर नहीं किया है. उनके अनुसार, ''हमने रोमांटिसाइज बहुत किया है. हरिया खेत में काम कर रहा है, ट्यूबेल चल रहा है, बीवी खाना लेकर आती है. वह मुक्के से प्याज तोड़ता है, चटनी के साथ रोटी खाता है. सर, पॉइंट ये है कि हरिया बहुत दुखी है. वो खेत में काम करके बर्बाद हो गया है. असली हालत बहुत खराब है. सही चित्रण नहीं हुआ है फिल्मों में." और आनंद अपनी फिल्मों की एक सच्चाई बयां करते हैं, ''हमारे किरदार असली बातें करते हैं. आप जैसे हो, वैसे ही पेश आ जाओ. जिंदगी आसान हो जाएगी. जिसे प्यार करना होगा, वह कर लेगा. जिसे दुत्कारना होगा, वह दुत्कार देगा. एनर्जी मत वेस्ट करो कि आओ, मुझे प्यार करो."
रांझणा में कुंदन और जोया की प्रेम कहानी जिस तरीके से आकार लेती है, उस पर कुछ लोगों ने सवाल उठाए. कुंदन के जोया की राह में बार-बार आने को लोगों ने छेडख़ानी का नाम दिया. यह बात हिमांशु और आनंद दोनों को समझ से परे लग रही है. हिमांशु कहते हैं, ''स्टॉकिंग बहुत हार्श शब्द है. किस पल बचपन वाली जोया डरी हुई नजर आती है? उल्टा वह पलटकर बोलती है कि थप्पड़ मार देंगे. सारी  रंगबाजी निकल जाएगी दो मिनट में. पर वह कहीं डरी नहीं है." आनंद सवाल उठाते हैं, ''ऐसा आरोप लगाने वालों से मैं पूछना चहता हूं कि डर में क्या था? क्या शाहरुख करें, तो आपको मंजूर है वो? तब आपको अच्छा लगता है?" हिमांशु अपनी बात को विस्तार देते हैं, ''कम कपड़े पहनाकर आइटम नंबर करवाने से बेहतर है कि एक निगेटिव कैरेक्टर बना दो. ये ज्यादा इज्जत वाला काम है. कम कपड़े पहनकर आइटम नंबर करवाना बेहतर लगता है आपको? वहां पर उंगली नहीं उठाते आप?"
आनंद राय के करीबियों से आप बात करें, तो सब उन पर यह आरोप लगाते हैं कि वह सब पर भावनात्मक अत्याचार करते हैं. हिमांशु हंसते हुए कहते हैं, ''मैं जीता-जागता उदाहरण हूं. पिछले पांच साल से यह इंसान मुझे कहीं जाने नहीं दे रहा है." आनंद अपनी हंसी रोकते हुए कहते हैं, ''मैं प्यार से दुनिया चलाता हूं. और यह लोगों की चॉइस होती है. प्यार में एक्सप्लॉएट होना लोगों को अच्छा लगता है. मुझे ऐसा करके बुरा नहीं लगता है." आनंद-हिमांशु एक-दूसरे की टांग खिंचाई एवं मजा लेने का मौका गंवाते नहीं हैं, लेकिन जरूरत पडऩे पर एक-दूसरे के लिए निस्वार्थ भाव से खड़े भी रहते हैं. इनकी दोस्ती को समझना है, तो आप रांझणा के कुंदन और मुरारी की दोस्ती को देख लें.
क्या हिमांशु किसी दूसरे फिल्मकार के लिए लिखेंगे या आनंद किसी दूसरे लेखक की कहानी पर फिल्म बनाएंगे? यह बड़ा मुश्किल सवाल है, लेकिन आनंद जवाब देते हैं, ''मैं करना चाहूंगा, लेकिन नहीं कर पा रहा हूं. एक कंफर्ट लेवल बन गया है. मुझे इसके कैरेक्टर्स की आदत पड़ गई है." हिमांशु जवाब में कहते हैं, ''इनके बाद मैं किसी दूसरे डायरेक्टर की बजाए खुद के लिए लिखना चाहूंगा. मैं ऐसे काम नहीं कर सकता कि ये कॉन्सेप्ट है, इसे डेवेलप कर दो. ये कहानी में होना चाहिए और ये हटा दो." हिमांशु आगे कहते हैं, ''मैं अपने लिए लिखता हूं. ये अलग बात है कि आनंद जी को मेरा लेखन अच्छा लगता है." प्रतिक्रिया में आनंद कहते हैं, ''हिमांशु की यह बात मुझे पसंद है कि यह बेधडक़ लिखता है. इसकी कहानी में एक टेक होता है. इसकी राइटिंग ओरिजिनल है, जो आज के समय में बहुत कम देखने को मिलती है." और वे आगे कहते हैं, ''मुझे खुद के अंदर कभी राइटर नहीं दिखा. मेरी कमजोरी यह रही है कि मुझे अपने कैरेक्टर्स से प्यार हो जाता है. उसी को मैंने अपना प्लस बनाने की कोशिश की है."
रांझणा के बाद हिमांशु क्या लिख रहे हैं? इसका जवाब हिमांशु देते कि आनंद ने कहा, ''मैंने कुछ दिन पहले इसके घर पर जैपेनीज फिल्मों की डीवीडी देखी." और फिर दोनों ठहाका मारकर हंसने लगे.
साभार- फिल्मफेयर

Monday, October 28, 2013

MAKING (AND BY THAT I MEAN SURVIVING) YOUR FIRST FILM -sonam nair

आप फिल्‍म बनाना चाह रहे हैं। एक बार इसे पढ लें। बहुत मदद मिलेगी। सोनम नायर का आत्‍मकथात्‍मक लेख मैंने उनके ब्‍लॉग चिंकी चमेली से चवन्‍नी के पाठकों के लिए लिया है।

There are things people tell you, and things people just let you find out on your own. When I decided that I would like to direct films for a living, I was 13 and had no idea what a director actually does. Now, after having directed a film, I feel like I know only about a 10% of what it means to be a director. I guess it’s better than zero!
So, I thought, maybe I should do something no one did for me- write about what you might think making a film is like vs what actually happens.
The Idea
If you start off thinking you’ll make a film that’ll bring Shah Rukh Khan and Aamir Khan together finally, that’s set in New York with one song in Paris and one in Switzerland,  with Kareena, Katrina and Deepika and an item number by Priyanka, chances are… your film is not going to get made. You need to start small. You haven’t made a film before, so it’ll be easier for a producer to trust you with 5 crores instead on 50.
Also, don’t write a script that you think will be a hit and therefore get producers interested. Write what you are most passionate about, because you only get to do that in your first film. After that, you’ll get polluted with the ‘business’ of movies and stop thinking only from the heart. Write from your life, your experiences, your world- not a script that anyone could have written. One of the reasons I got to direct my film was because it was so personal that it was obvious that I should be the one to make it.
After the First Draft
Don’t think that once you’ve typed the words ‘The End”, the script is ready for the world to see. It’s not. If you want to make a film, chances are you have been working in films for a few years and have a few friends in the industry now. So give out the script to a select few of these- your fellow ADs, maybe an editor you got friendly with during the post-production of your earlier film, maybe a dialogue writer you found interesting. Just make sure you have registered your script and mention the fact that you have before giving it out.  Take their advice, write a second draft, then give that out to more people. Be very careful about people’s responses. If they’re being generic and polite, they might not have liked it. By the time you’ve heard feedback from about 10 people, you’ll have a pretty good idea of whether the script is working or not. If you think it’s working, give it out to someone you respect. The director of your last film, an actor you got friendly with, another scriptwriter- someone in the power to get your film to the next level. If they love it, you know you’ve got something there.
Meeting Producers
I was extremely lucky that the first producer I went to said yes to my film, but that might not always happen. It helps if you have someone backing your script. An actor, another director, someone close to the producer, someone whose opinion is important. If you don’t have that, then your script will first go to the script-reader, and that’s a very long and unreliable process. So make sure you get someone on your side before you go to producers.
Don’t go to several people at once. The industry is small and you don’t want people talking about your double-dealings. Go one by one, starting with whoever you think you have the best chances with. It’s always helpful if you’ve been working for the same production house for a few years instead of hopping around. But often, people work with one house and get produced outside it- so there’s no one formula. If a producer says he likes your script but wants more time to think about it, give it a couple of months and then ask if you can show it to other producers. You don’t want to get stuck for a year and then get rejected. Always keep your options open.
You’re On!
If you get your project greenlit, congratulations! You might want to celebrate and enjoy it, but you’ll probably enter a state of panic. The reality that you’re actually going to make a film is terrifying. You’ll think of everything that can go wrong. You’ll start worrying about your health. You’ll start drinking green tea and  driving more cautiously. Let this phase pass. Don’t make any rash decisions about the film till about 2 weeks after it’s been picked up. Then- go all out! Start putting your team together- your team can make or break the film. Meet as many people as you can. Don’t think some people have too much experience and some too little. Meet whoever you think is talented, pitch to whoever you would love to work with. You might hear a few no’s but so what? You got a Producer to say yes, and others will follow soon. Don’t leave room for regret. I always thought my film was too small for a lot of people in the industry whose work I admired, and now I wish I had at least met them. Even if they can’t do your film, each meeting will make you a little wiser, and you might get great tips from the people you admire. One important thing- be humble. You might be the director, but these people have a lot of good work behind them- so learn from them. Finally, take people who respect you and won’t overstep your position. I have heard of many cinematographers or actors or editors who try and take over the film, thinking the director doesn’t know anything. Don’t let your film slip away from your fingers.
Putting It All Together
Now that you’ve got yourself a Cast, a Cinematographer, a Production Designer, a Costume Designer, a Music Director, and a First AD, it’s time to bring everyone together and share your vision with them. Don’t doubt yourself at this point. You have written the script, and you know more about it than any of them do. But this time is more crucial than people might think- because it’s very important that everyone is on the same page. You might think they get it, and they might think they get it- but everyone might be making their own movie in their heads. So… extra-simplify! Don’t talk about things… SHOW them. Make a giant folder of references. Put in everything you can think of- the color of the fabric you want in this scene, the size of the kettle you want in that scene, the way you want sunlight to fall on the actor’s face in the other scene. Nothing is too small to put in here. Put videos, songs, pictures, websites, artwork, whatever you can find. I used a lot of my pictures from childhood to give everyone a sense of the emotional world of the film. Be open to suggestions at this point, it’s only talk so just let it flow. Let others bring their own references and see if they’re close to yours or not. Meet your HODs (Heads of Departments) as often as you can. Read every scene with your actors, once, twice, three times. If you have time, make storyboards. One thing though- don’t let anything you decide at this point become too rigid in your head. Everything will change when you actually shoot things, but this prep will not go to waste, believe me.
Shooting
Easily the most exhilarating part of the whole process, and also the most harrowing. You might not sleep before the first day of your shoot, but try not to over-think it and put too much pressure on yourself. Start with the easiest shots first. I did a whole day of inserts when I began. Hand on clock, Object on table, Sign on door. It really helped me get into the zone. Everyone is finding their groove so don’t expect perfection straightaway. Just concentrate on keeping a good environment on set, because once that is in place, work will happen smoothly from here on. Don’t let fear, confusion or frustration spoil your mental peace. If you feel any of these brewing, take 5 minutes off. Remember, you have all the answers, and there is no right or wrong. Plus, you have a team to help you out. And don’t be afraid to admit that you’re not sure about something or can’t figure it out. It’s better to ask for help than make the wrong choices.
The most important thing to remember while shooting is that nothing will go as planned. Start with that, and you won’t be thrown off by the million problems that arise. Your job is to make the best of any situation and keep the show going. Don’t compromise on everything the first time a problem crops up, but also keep in mind that you’ll have to let go of a few things to get the rest done. It’s good to have a backup plan, especially on problematic days with lots of background actors or heavy equipment. However, when you do solve the problem and get the shot, it’s the best feeling in the world! So work towards that.
Not to be an aunty about it, but try and recuperate after the shoot on your own. Don’t hang out too much with the cast and crew. You need to brew over the day’s shoot and mentally prepare yourself for the next day. No one else is under the same pressure you are, so even if you hear everyone talking and laughing down the hallway, resist the temptation and go to sleep! You need to rest your mind, and cut off for while.
One tip- you should review your work during shoot.  Keep an editor on set to put together rough edits of the scenes you shoot- it’ll help you a lot in the long run. Even if you see the scenes every 3-4 days, just watching the scenes will help you see the drawbacks while you can still fix them. If your gut says that a scene isn’t working, try and reshoot it while you’re still at that location. You might not get to go back once the film is in post-production.
And lastly, don’t forget to ENJOY YOURSELF! Laugh when you’re shooting a funny scene, cry when you’re shooting an emotional one, and dance your butt off when you’re shooting songs. If you don’t feel it, how will you make others feel it? You won’t get to shoot another film for a long time, so make the best of these days!
What Have I Done?
Once the shoot is over, the most nerve-wracking phase begins. When you look at what you’ve shot, you’ll invariably think that everything looks horrible and nothing is working and that you’ve ruined your film. Relax. Cut off for a while. Let your editor go through the footage, assemble some scenes, try and get all the beats right- while you take a mini-vacation. Then come back with fresh eyes and look at the footage. Focus on getting each scene working first, and then worry about the length or scope of the entire film. Once you’re more or less satisfied with each scene, then put them all together and watch the whole film. This will make new problems stand out, but most things can be fixed on the edit. Don’t look at scenes bare. Put reference background music wherever you feel the need to. Don’t hold back with the music- there’s no copyright issue yet so go all out! Later, you can help recreate the same feeling with your Background Music Director.
Once you have a satisfactory first cut, ask a few people close to you to give some feedback on it. Don’t invite the whole world yet, the film is at a vulnerable stage and you don’t want people to form rigid opinions about it yet. If your friends have more or less the same few pointers, work on that, and then call them again. If they seem satisfied, start calling in more people. I called in hoards of people of different ages, professions and walks of life. Sometimes they’ll give you bizarre feedback, but you’ll find out the fundamental problems if they keep coming up in every screening. And every now and then, someone gives a brilliant suggestion that can swing things around! Don’t let criticism get you down, it’s better to hear things now and fix them than hear them later once the film has released.
Deadlines and Madness
Once your edit is locked, a period of complete chaos begins. Even if you do everything on time, you cannot account for the 100 new things that crop up, and of course everything has to be done NOW and done PERFECTLY. There is background music, DI, VFX, Sound mixing, Dubbing, Subtitling, Censoring, Publicity, Trailers (theatrical trailer, music promos, dialogue promos, 30 seconder, 20 seconder, 15 seconder), DEATH! You’ll have to take a hundred calls a day from things like the order of the opening credits, to which dialogue promo should go out first, to what your actors should wear in a last minute publicity shoot, to what the font of the ‘intermission’ should be like. It’s exhausting and you don’t have time to dilly-dally, so you just have to trust your instincts and keep ticking off the boxes. There’s no point in trying to be healthy, or get enough sleep during this time. You’ll probably skip lunch every single day, smoke a pack of cigarettes even if you’re not a smoker, and have 2-3 tearful emotional breakdowns. Just remember to keep going, no matter what. The end is near and your very own film will release all over the country!! That’ll make it all worth it.
Looks Like We Made It!
Your baby is out! You’re a mother now! (Yes, even the men!) All that buildup and hard work and emotional trauma, it has all been for this one day, right?! What happened? What was the opening? What are the reviews? What was the overseas response? What does my producer think? What do I do now? CALM DOWN. Don’t sit and think that your world is going to change the day your film releases. It’s not. If you’re very lucky, you’ll go to the theater and see a house-full board and hear people laughing and clapping inside. But don’t make this day about that. Make it about taking your friends and family to watch the film. Your friends will whistle when your name comes on screen and your parents will cry every 5 minutes, filled with pride and joy. That is what will make this day special. Or go alone and buy a ticket for your own film. It’s the best feeling in the world. Take the day to pat yourself on the back for having done what thousands of people yearn to do in this country. Go watch it with a real audience everyday. Feel your heart swell up with pride every time they laugh or cry. That’s what making films is about, right?
If your film does well, you’ll get calls and texts from people in the industry. You’ll get invited to a few parties. You’ll get nominated for some awards. If it doesn’t do well, you’ll get a lot of people saying ‘Oh you made that film? Sorry, I haven’t seen it yet but I’ve been meaning to catch it.’ You’re not an actor, so no one will recognize you on the street and tell you whether they liked your film or not. Whatever response you get from the general public will be limited to Twitter and Facebook and Youtube comments. After a couple of months, people will move on to the next crop of films and yours will be one of the many films that came out that year.  Either way, your life won’t change drastically. You might move to a bigger apartment or buy a new car, but the money will run out soon, so you’ll have to be careful with it.
The few weeks after the film’s release are the worst. Your hectic life suddenly feels empty. You stop getting hundreds of calls a day about deadlines and requirements, and the phone occasionally beeps when someone sends you a nice message about your film. Or VMCallertunes wants you to buy a new ringtone. Take this time to take account of everything you learned from this film, what your strengths and weaknesses are, what you would like to do differently next time around, and thank the lord that your film actually made it to the theaters! Then… stop thinking about it. You’ve thought about your film for a looooong time now, and you need to stop. Go away somewhere. Meet new people who have no connections to films. Read books. Watch entire seasons of TV shows in one day. Wash yourself off the film, so you can start thinking about the next one with a clean state of mind.
Aftermath
Making films is, I think, the best job in the world. I have never been as happy as I was during the making of my film. Every problem seemed small, every setback manageable, when I just sat back and thought, ‘Wow, I’m making my own film!’ But I’m not going to lie, it really takes a toll on you. You put everything you have in your first film- blood, sweat, tears and all your heart. And yet, to the rest of the world, it’s just another film. It might be a good film, a successful film, but it isn’t the most important film of their lives. Don’t let that deter you. Your first film should never be about the destination, because it will be the journey of a lifetime. And you only get to go through it once. So if you don’t put everything you’ve got into it, you’re going to regret it for the rest of your life.
Now, I’m going through the immense anxiety of starting my next project. Putting too much pressure on every little idea, second-guessing myself at every step and analyzing everything way too much. I yearn for the simplicity of when I did this the first time around, when just getting the film made was the most important thing. Cherish that innocence, it gets snatched away pretty soon. But whatever happens next, I can always put my Gippi DVD on, watch my first baby come alive and smile that I got to do this. And no one can ever take that away from me.
With all my love and wishing you all the luck in the world,
Sonam Nair.

Friday, October 25, 2013

बच्चों काे पसंद आएगी ‘कृष 3’-राकेश रोशन


-अजय ब्रह्मात्मज
- ‘कृष 3’ आने में थोड़ी ज्यादा देर हो गई? क्या वजह रही?
0 ‘कृष 3’ की स्क्रिप्ट बहुत पहले लिखी जा चुकी थी। मैं खुश नहीं था। उसे ड्रॉप करने के बाद नई स्क्रिप्ट शुरू हुई। उसका भी 70 प्रतिशत काम हो गया तो वह भी नहीं जंचा। ऐसा लग रहा था कि हम जबरदस्ती कोई कहानी बुन रहे हैं। बहाव नहीं आ रहा था। भारत के सुपरहीरो फिल्म में गानों की गुंजाइश रहनी चाहिए। इमोशन और फैमिली ड्रामा भी पिरोना चाहिए। मुझे पहले फैमिली और बच्चों को पसंद आने लायक कहानी चुननी थी। उसके बाद ही सुपरहीरो और सुपरविलेन लाना था। फिर लगा कि चार साल हो गए। अब तो ‘कृष 3’ नहीं बन पाएगी। आखिरकार तीन महीने में कहानी लिखी गई, जो पसंद आई। 2010 के मध्य से 2011 के दिसंबर तक हमने प्री-प्रोडक्शन किया।
- प्री-प्रोडक्शन में इतना वक्त देना जरूरी था क्या?
0 उसके बगैर फिल्म बन ही नहीं सकती थी। हम ने सब कुछ पहले सोच-विचार कर फायनल कर लिया। पूरी फिल्म को रफ एनीमेशन में तैयार करवाया। कह लें कि एनीमेटेड स्टोरी बोर्ड तैयार हुआ। अपने बजट में रखने के लिए  सब कुछ परफेक्ट करना जरूरी था। मेरे पास हालीवुड की तरह 300 मिलियन डॉलर तो है नहीं। स्ट्रांग कहानी और कंटेंट को फिल्माने के लिए सही स्ट्रक्चर जरूरी था। कृष इस फिल्म में मनुष्यों से नहीं लड़ता। उसकी लड़ाई मानवरों (म्यूटैंट््स) से होती है। वे मानवर तैयार करने पड़े। इतनी तैयारियों मे बाद भी मैं डरा हुआ था। रितिक से भी मैंने कहा कि इसे बंद करते हैं। उसने मुझे प्रेरित किया। जब विवेक का मैंने पहला शॉट ले लिया तो कंफीडेंस आया। 6 महीने में शूटिंग खत्म कर वीएफएक्स के पास भेज दिया गया।
- पोस्ट-प्रोडक्शन भी तो टफ रहा होगा? वीएफएक्स का इतना काम है?
0 शूटिंग खत्म होने के बाद मुझे पोस्ट प्रोडक्शन में लगना पड़ा। स्टूडियो में जाकर वीएफएक्स टीम के साथ बैठना पड़ा। सात-आठ करेक्शन के बाद अपनी कल्पना पर्दे पर उतरती थी। कल्पना को कम्युनिकेट करना मुश्किल काम होता है। मैंने फैसला लिया था कि विदेश नहीं जाऊंगा। मेरी राय में अपने देश के टेक्नीशियन काबिल हैं। हालीवुड की फिल्मों का वीएफएक्स काम भी भारत में होता है। हमारी समस्या है कि हम अपने टेक्नीशियन पर भरोसा नहीं करते और पर्याप्त समय नहीं देते। काम थोपने की हमारी चाहत और आदत भी बन गई है।
- ‘कृष 3’ जैसी फिल्म के लिए तकनीकी और साइंटिफिक जानकारी भी जरूरत पड़ी होगी?
0 टेकनीक और साइंस से ज्यादा कॉमन सेंस की जरूरत पड़ती है। बस थोड़ा सा दिमाग लगाना पड़ता है। ज्यादातर लोग वही बनाते और दिखाते हैं,जो वे देख चुके हैं। उसमें नवीनता नहीं रहती।
- आप पर भी तो 100 करोड़ क्लब का दबाव होगा? इस ट्रेंड के बारे में क्या कहेंगे्र
0 यह अच्छा नहीं है। 100 करोड़ तो बी क्लास फिल्मों का टारगेट है। भारत जैसे देश में ए क्लास फिल्म को ढाई सौ करोड़ का कारोबार करना चाहिए। इतने थिएटर और दर्शक हैं। ‘3 इडियट’ ने कम थिएटर के जमाने में उतना बिजनेस किया। वह ए क्लास फिल्म थी। मैं किसी दबाव में नहीं हूं। अभी एक दिन का अच्छा बिजनेस हो तो 40 करोड़ कलेक्ट हो सकता है। मैं तो आश्वस्त हूं। यूट््यूब पर ट्रेलर देखने वालों की संख्या को संकेत मानें तो पूरी उम्मीद बनी है।
- फिल्म के किरदारों के बारे में कुछ बताएं?
0 रोहित और कृष के बीच काफी सीन है। बाप-बेटे की कहानी चलेगी। कृष कहीं टिक कर नौकरी नहीं कर पाता। जब भी उसे कहीं से आवाज आती है तो वह बचाने निकल पड़ता है। बीवी भी उससे नाराज रहती है। वास्तव में यह एक परिवार की कहानी है। इस परिवार में सुपरविलेन आता है। उसके बाद कहानी खुलती जाती है।
- सुपरविलेन के लिए विवेक ओबेराय को कैसे राजी किया?
0 वह रोल इतना अच्छा है कि रितिक खुद करना चाहता था। मैंने उसे डांटा कि रोहित, कृष्ण और सुपरविलेन तीनों तुम ही करोगे तो मैं शूटिंग कितने दिनों में करूंगा? स्क्रिप्ट लिखे जाने के बाद विवेक ओबेराय और कंगना रनोट ही हमारे दिमाग में थे। विवेक बहुत अच्छे एक्टर हैं। उन्हें सही पिक्चर नहीं मिल रही है। वे कैरेक्टर रोल में जंचते हैं। कंगना रनोट में खास स्टायल है। वह रूप बदलने में माहिर है।
- रितिक के बारे में क्या कहेंगे?
0 वह मेरा बेटा जरूर है, लेकिन बहुत ही पावरफुल एक्टर है। वह हर रोल में जंच जाता है। ‘गुजारिश’ का बीमार लगता है तो ‘कृष 3’ का हीरो भी लगता है। ‘कोई ़ ़ ़ मिल गया’ में बच्चे के रूप में भी जंचा था। ‘जोधा अकबर’ में वह बादशाह भी लगा। इतनी वैरायटी उसके समकालीनों में किसी और में नहीं दिखती। ‘कृष 3’ में बाप-बेटे का सीन देखिएगा। आप चकित रह जाएंगे।


हीरो बन गए मनीष पॉल


-अजय ब्रह्मात्मज
    लंबे समय तक होस्ट, आरजे, एंकर आदि की भूमिकाएं निभाने के बाद मार्च 2012 में अचानक मनीष पॉल को खयाल आया कि अब फिल्मों में एक्टिंग करनी चाहिए। उनके दोस्त रीतिका ने उन्हें डायरेक्टर सौरभ वर्मा से मिलने के लिए कहा। मुलाकात हुई तो सौरभ वर्मा ने अपनी फिल्म ‘मिकी वायरस’ के बारे में बताया। नाम सुनते ही मनीष हंसने लगे। उन्होंने बताया कि मेरे घर का नाम मिकी है। संयोग से मनीष की तरह ही ‘मिकी वायरस’ का मिकी भी दिल्ली के मालवीय नगर इलाके में रहता है। लगे हाथ मनीष ने बिना मांगे ही कुछ इनपुट दे दिए। दस दिनों के बाद सौरभ का फोन आया कि तू मेरी फिल्म कर ले। इस तरह मनीष पॉल को ‘मिकी वायरस’ मिली और अब वह जल्दी ही रिलीज होगी।
- फिल्मों में आने का इरादा कब और कैसे हुआ?
0 मुंबई आया हर अभिनेता कभी न कभी फिल्म करना चाहता है। मुझे आते ही फिल्मों में काम नहीं मिला। पहला काम टीवी में मिला। फिर आरजे का काम मिला। मेरी आदत रही है कि मैं अपने कंफर्ट जोन को खुद ही तोड़ता हूं। फिल्में मिलने से पहले मैं तैयारियों में लगा था। सही समय आया तो फिल्म मिल गई।
- फिल्मों से पहले आपका साबका लाइव ओडिएंस से रहा है। फिल्मों के लिए खुद को बदलने में कितनी दिक्कत हुई?
0 होस्टिंग करने की वजह से मुझे कैमरे में देखने की आदत सी है। सौरभ की ट्रेनिंग और वर्कशाप से फायदा हुआ। फिल्म मिलते ही मैंने मानसिक तैयारी शुरू कर दी थी। फिल्म में काफी एक्शन है। एक्शन के लिए मैंने बॉडी पर ध्यान दिया। परफारमेंस में सौरभ की सलाह मानी।
- आपने बड़ी लांचिंग का इंतजार नहीं किया। क्या सेफ खेलना नहीं चाहते थे?
0 मैंने आज तक सेफ नहीं खेला है। मैंने हमेशा पंगा लिया है। मुझे मालूम है कि मैं इंडस्ट्री से बाहर का हूं। यहां मुझे कोई जानता नहीं है। मुझे बड़ी फिल्म नहीं मिलेगी। मेरे साथ मां का आशीर्वाद था। वह हमेशा कहती है कि टैलेंट छिप कर नहीं रह सकता। अपने काम पर ध्यान देना। कभी निराश होता था तो मां ही ढाढस बंधाती थी। मुझे जब जो काम मिला मैंने उसे अपना दो सौ प्रतिशत दिया।
- अपनी पृष्ठभूमि के बारे में बताएं?
0 मैं दिल्ली से हूं। मेरे परिवार के ज्यादातर सदस्य फायनेंस के बिजनेस में हैं। केवल मैं थोड़ा अलग निकला। शुरू से ही सभी ने मुझे प्रोत्साहित किया। उन्होंने हर तरह का समर्थन दिया।
- यह अलग सा शौक कब जागा?
0 कह सकता हूं कि नर्सरी के समय ही यह शौक जाग गया था। तब मैं सनफ्लावर बना था। स्कूल की सांस्कृतिक गतिविधियों में हमेशा बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेता रहा। मेरे रुझान को देखते हुए शिक्षकों ने भी मदद की। मुझे गाने के लिए स्कॉलरशिप तक मिली। मजेदार सी बात है कि परीक्षा में मैं 60 माक्र्स तक के ही सवाल हल करता था। कभी स्कॉलर  बनने की इच्छा नहीं हुई,इसलिए 100 माक्र्स तक पहुंचा ही नहीं। मुझे स्कॉलर बुद्धू लगते थे।
- पढ़ाई-लिखाई कहां हुई?
0 दिल्ली से ही। स्कूल के बाद मैंने टूरिज्म की पढ़ाई की। डैड ने सलाह दी थी कि पढ़ के टूरिस्ट एजेंसी खोल ले। वह नहीं हो पाया तो भी उन्होंने बुरा नहीं माना। मेरे शौक को देखते हुए उन्होंने मुंबई जाने की सलाह दी।
- क्या कभी कोई आदर्श रहा?
0 बिल्कुल नहीं। मैंने कभी किसी को आदर्श नहीं बनाया। सच कहूं तो मैं काम शुरू करने के पहले कुछ सोचता ही नहीं। एंकरिंग के लिए भी पहले से सोचकर नहीं जाता था। मैं चैलेंज लेने में यकीन करता हूं। मैंने यही महसूस किया कि किसी योजना के साथ मुंबई नहीं आना चाहिए। आप मुंबई आ जाएं अगर यह चाहेगी तो आपको स्वीकार कर लेगी वर्ना वापस भेज देगी। मेरे कई दोस्त वापस चले गए। मुझे यह अपने काम का शहर लगता है।
- दिल्ली की कमी किस रूप में महसूस होती है?
0 मैं वहां का खाना मिस करता हूं। दिल्ली में चौड़ी सडक़े हैं तो वहां की ड्राइविंग भी मिस करता हूं। मैं मालवीय नगर में पला-बढ़ा हूं तो वहां के बंगाल स्वीट्स के समोसे और बंटे खाते-पीते थे। पुरानी दिल्ली के अड्डे तो मशहूर हैं ही। कुतुब के इलाके में भी कुछ रेस्त्रां हैं। अभी तो मुझे मुंबई की लत लग गई है। अब यह अच्छा लगने लगा है।
- एक्टर का कोई घर या ठिकाना होता है क्या?
0 केवल सूटकेस होता है। आज कल मेरी जिंदगी सूटकेस में रहती है। बहुत पहले से लाइव शो की वजह से हमेशा घर के बाहर ही रहता हूं। मां तो कहती थी कि यह हमारे घर का बंजारा है। मेरी बर्थडे पर मां पिताजी सूटकेस ही गिफ्ट करते थे।
- पापुलर सेलिब्रिटी होने की क्या मुश्किलें हैं?
0 फिलहाल तो यही कि लोग फोटो खिंचवाने के लिए घर भी चले आते हैं। बिल्डिंग में किसी के यहां दोस्त या रिश्तेदार आया हुआ हो तो वह बेहिचक घर की घंटी बजा देता है। शुरू में तकल्लुफ में मैं ना नहीं करता था। अभी मना करने लगा हूं।



Thursday, October 24, 2013

दरअसल : जरूरी है यह चेतावनी


-अजय ब्रह्मात्मज
    इन दिनों देश भर के सिनेमाघरों में फिल्म आरंभ होने के पहले वैधानिक चेतावनी आती है। इस चेतावनी में बताया जाता है कि तंबाकू सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इस से कर्क रोग (कैंसर) हो सकता है। साथ में एक कैंसर रोगी का फुटेज भी दिखाया जाता है। बताया जाता है कि वह बच नहीं सका। इसके साथ ही प्रदर्शित फिल्म मेंजहां भी कोई किरदार सिगरेट पीने या तंबाकू सेवन करते नजर आता है, वहां पर्दे पर यही वैधानिक चेतावनी लिखी हुई नजर आती है। फिल्म में इस चेतावनी की अपरिहार्यता से फिल्मकार खुश नहीं हैं। मैंने फिल्मों के प्रिव्यू शो में देखा है कि क्रिटिक भी इस चेतावनी पर नाक-भौं सिकोड़ते हैं। सही-सही नहीं मालूम कि दर्शकों की क्या प्रतिक्रिया होती है? शायद उन्हें भी अच्छा नहीं लगता हो।
    दबे स्वर में फिल्मकार इसके खिलाफ फुसफुसाते रहे हैं। उन्हें लगता है कि इस चेतावनी से फिल्म का मजा खराब होता है। दृश्य का प्रभाव कम होता है। उन्हें इस चेतावनी के साथ दिखाई जाने वाली फिल्म पर भी आपत्ति है कि वह अप्रिय और असुंदर है। उनकी राय में अधिक संवेदनशील और सुंदर चेतावनी फिल्म बनायी जा सकती है। आपत्ति के बावजूद अभी तक फिल्म इंडस्ट्री ने कोई विकल्प नहीं दिया है। क्रिएटिव व्यक्तियों की जमात को शिकायत है, लेकिन निदान नहीं है। उनमें से कोई एक प्रभावशाली फिल्म बनाने की कोशिश नहीं कर रहा है। ‘मटरू की बिजली का मंडोला’ के समय एक निष्फल कोशिश हो पाई है।
    हाल ही में हालीवुड के फिल्मकार वुडी एलेन ने इस वैधानिक चेतावनी की वजह से अपनी फिल्म ‘ब्लू जैस्मीन’ वापस ले ली। उन्हें भारत सरकार की वैधानिक चेतावनी पसंद नहीं थी। उन्होंने अपनी फिल्म भारत में प्रदर्शित नहीं होने दी। वुडी एलेन के इस फैसले का देश के कई फिल्मकार ने सराहा और तालियां बजाईं। तालियां बजाने और गालियां देने का काम आजकल ट्विटर से होता है। अगर किसी से सहमति या नाराजगी हो तो लोग समर्थन या विरोध में ट्विट करने लगते हैं। ऐसा लगा कि वुडी एलेन ने सभी के आहत मन को सहला दिया और उन्हें अभिव्यक्ति दे दी। अफसोस है कि भारतीय फिल्मकारों ने इस वैधानिक चेतावनी के भारतीय संदर्भ और महत्व पर ढंग से ध्यान नहीं दिया।
    तंबाकू सेवन और सिगरेट पीने का शौक किसी भी महामारी से अधिक तेजी से फैल रहा है। हर साल इसकी वजह से लाखों व्यक्ति कैंसर की चपेट में आते हैं और उनमें से अधिकांश अपनी जिंदगी गंवा बैठते हैं। सिगरेट के डब्बों और खैनी की पुडिय़ा पर भी यह वैधानिक चेतावनी लिखी रहती है। कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि अगर सरकार को आम नागरिक के सेहत की इतनी चिंता है तो सिगरेट की बिक्री पर रोक लगा दी जानी चाहिए। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। इस अति के अलावा भी तो उपाय हो सकते हैं। सरकार की अपनी मजबूरियां और सिगरेट कंपनियों की लॉबिंग भी कारण हो सकती हैं। बेहतर तो यही होगा कि सिगरेट और तंबाकू पर पूर्ण प्रतिबंध लग जाए। तंबाकू सेवन के लंबे निजी अनुभव और दुष्प्रभाव के बाद यह लिख रहा हूं।
    वुडी एलेन के फैसले और भारतीय फिल्मकारों के समर्थन के प्रसंग में टाटा कैंसर हॉस्पिटल के कैंसर सर्जन पंकज चतुर्वेदी ने उन्हें एक खुला पत्र लिखा है। वुडी एलेन को संबोधित इस पत्र में उन्होंने दस पाइंट दिए हैं। सबसे पहले उन्होंने वुडी की सराहना की है कि उनकी फिल्म भारत में रिलीज नहीं हो रही है। रिलीज होती तो सिगरेट पीने वालों की संख्या में और कुछ हजार जुड़ जाते। उन्होंने वैधानिक चेतावनी के पक्ष में तर्क दिए हैं। लंबी बहसों के बाद इस फैसले पर सभी सहमत हो सके हैं। भारत जैसे अद्र्धशिक्षित देश में यह बहुत जरूरी है, क्योंकि सिनेमा एक सस्ता मनोरंजक माध्यम है। देश के अधिकांश नागरिक सिनेमा के सक्रिय दर्शक हैं। वे फिल्मों से प्रभावित होकर सिगरेट पीना आरंभ करते हैं। जवानी की दहलीज पर खड़े मेरे जैसे अनेक युवक होंगे जो फिल्मों के किरदार से प्रेरित होकर उंगलियों के बीच सिगरेट फंसाते हैं। ‘हर फिक्र को धुएं में उड़ाने’ का संदेश हमारी फिल्मों ने ही दिया है। भारत में फिल्म स्टार किसी देवी-देवता से कम महत्व नहीं रखते। दर्शक उनके किरदारों से एक रिश्ता बनाते हैं और अपनी जिंदगी में उन्हें उतारने की कोशिश करते हैं। यह कुतर्क बेमानी है कि सिनेमा अच्छी बातें और अच्छे किरदार भी तो दिखाता है, उन से समाज क्यों नहीं प्रभावित होता?
    मेरी राय में फिल्मों में तंबाकू सेवन से संबंधित वैधानिक चेतावनी अवश्य चलनी चाहिए। मुंबई में यह चेतावनी दृश्यों में अंग्रेजी में लिखी आती है। अगर यह हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में भी आती है तो ठीक है। अन्यथा भारतीय भाषाओं मे यथाशीघ्र यह चेतावनी लिखी जानी चाहिए। तंबाकू सेवन से होने वाले कैंसर से बचा सकता है। फिर क्यों न हम बचाव के कदम उठाएं। कहते हैं इलाज से बेहतर परहेज होता है। यह परहेज व्यक्ति और देश की जिंदगी के लिए जरूरी है।

Monday, October 21, 2013

खिली और खिलखिलाती दीपिका पादुकोण


-अजय ब्रह्मात्मज
    दीपिका पादुकोण ने पीछे पलट कर नहीं देखा है, लेकिन हमें दिख रहा है कि वह समकालीन अभिनेत्रियों में आगे निकल चुकी हैं। दौड़ में शामिल धावक को जीत का एहसास लक्ष्य छूने के बाद होता है, लेकिन होड़ में शामिल अभिनेत्रियों का लक्ष्य आगे खिसकता जाता है। दीपिका पादुकोण के साथ यही हो रहा है। ‘चेन्नई एक्सप्रेस’  की अद्वितीय कामयाबी ने उन्हें गहरा आत्मविश्वास दिया है। वह खिल गई हैं और बातचीत में उनकी खुशी खिलखिलाहट बन कर फूट पड़ती है। अक्तूबर की उमस भरी गर्मी में दोपहर की मुलाकात चिड़चिड़ी हो जाती है। फिर भी तय समय पर दीपिका से मिलना है, क्योंकि शूटिंग, डबिंग और प्रोमोशन के बीच उन्हें यही वक्त मिला है। वह जुहू स्थित सनी सुपर साउंड में ‘राम-लीला’ की डबिंग कर रही हैं।
    थोड़े इंतजार के बाद मुलाकात होती है। उनकी परिचित मुस्कान और गर्मजोशी से संबोधित ‘हेलो’ में स्वागत और आदर है। बात शुरू होती है ‘राम-लीला’ से ़ ़ ़ वह इस फिल्म के प्रोमो और ट्रेलर में बहुत खूबसूरत दिख रही हैं। बताने पर वह फिर से मुस्कराती हैं और पलकें झुका कर तारीफ स्वीकार करती हैं। करिअर और फिल्म के लिहाज से ‘राम-लीला’ के बारे में बताती हैं, ‘हर हीरोइन का यह ख्वाब है कि वह संजय सर के साथ काम करे। ‘खामोशी’ से लेकर ‘गुजारिश’ तक में उनकी हीरोइनों के परफारमेंस की तारीफ हुई है। मनीषा कोईराला, ऐश्वर्या राय, माधुरी दीक्षित, रानी मुखर्जी, सोनम कपूर सभी उनकी फिल्मों में खास लगी हैं। उनकी फिल्मों की हीरोइनों सालों तक दर्शकों की स्मृति में रहती हैं। ‘राम-लीला’ के ऑफर से मैं खुश, उत्साहित और घबराई हुई थी। मैं जानती थी कि वे किसी हड़बड़ी में फिल्म नहीं बनाते। समय सीमा तो रहती होगी, लेकिन उसका दबाव शूटिंग में नहीं रहता। वे एक्टर को पूरी आजादी देते हैं। एक्टर को प्रोत्साहित करते है और सपोर्ट करते हैं। उनकी बारीकियों में प्यार होता है। इस फिल्म का अनुभव किसी सुनहरे सपने के साकार होने की तरह मुझे याद रहेगा।’
    संजय लीला भंसाली की यह खासियत है। उनकी फिल्मों में हीरोइनें अपनी प्रचलित इमेज से अलग दिखती हैं। वे हर हीरोइन की प्रतिभा का कोई छिपा और अनछुआ आयाम खोज निकालते हैं। सहज जिज्ञासा होती है कि दीपिका में उन्होंने क्या खास खोज निकाला? फिल्म रिलीज होने पर हम सभी यह देख लेंगे, फिर भी खुद अभिनेत्री से उसे जान लेना अलग मायने रखता है। दीपिका इस राय से सहमति जाहिर करती हैं, ‘आप मुझे ‘राम-लीला’ में बिल्कुल नए रंग-ढंग में देखेंगे। शुटिंग के दरम्यान वे हमेशा कहते रहे कि मैं बहुत नाजुक दिखती हूं, लेकिन इमोशनली बहुत स्ट्रांग हूं। मेरी इन खूबियों को उन्होंने किरदार में ढाला है। और भी कई पहलू हैं, जो आप पर्दे पर देखें तो अच्छा। मैं खुद अंजान थी अपनी पर्सनैलिटी के उन पहलुओं से ़ ़ ़ लीला मेरी ही तरह नाजुक और मजबूत है।’
    ‘राम-लीला’ की नायिका लीला है। संजय लीला भंसाली के नाम के मध्य में आया यह नाम उनकी मां का है। संजय ने अपने इंटरव्यू में कहा था कि अपनी मां का नाम पेश कर रहा हूं तो पूरी सावधानी बरतूंगा। दीपिका क्या सोचती हैं लीला के बारे में? ‘लीला अपनी शर्तों पर जीती है। निर्भीक स्वभाव की लीला केवल अपनी मां की सुनती है। दूसरों को कान तक नहीं देती। प्यार के मामले में कंजर्वेटिव है,’ संक्षेप सा जवाब देती हैं दीपिका। फिल्म के प्रोमो में दीपिका गुजरात के कास्ट््यूम में दिख रही है। वर्तमान समय की वर्किंग वीमैन की तरह दीपिका भी आम जिंदगी में जींस-टीशर्ट या शर्ट पहनना पसंद करती हैं। ऐसे में कॉस्ट्यूम की वजह से क्या फर्क आता है किरदार में? वह स्पष्ट करती हैं, ‘साडिय़ां तो मैंने ‘ओम शांति ओम’ और ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ में भी पहनी हैं। इस फिल्म का कास्ट्यूम गुजराती है। कपड़े और गहने पहनने से एक्टर का आधा काम आसान हो जाता है। फिल्म का लुक टेस्ट और रिहर्सल भी हम कास्ट््यूम में करते हैं। फील से फीलिंग्स आती है। कास्ट्यूम धारण करते ही स्टायल अलग हो जाती है। ’
    बतौर एक्टर संजय की संगत के बारे में दीपिका दो टूक शब्दों में बताती हैं, ‘संजय सर के साथ कुछ भी आसान नहीं रहता। फिल्म देखते समय सब कुछ सहज लग सकता है। मैंने महसूस किया कि स्क्रिप्ट को वे निराले अंदाज से सीन में ट्रांसफार्म कर देते हैं। उन्हें हर सीन में ‘मैजिक’ चाहिए। वे डायरेक्ट करते समय सीन समझाने के बाद यही कहते हैं कि बस, अब मैजिक पैदा कर दो। जादू हो जाए। बतौर एक्टर हमें सोचना पड़ता है। कई बार तो 15-20 टेक के बाद भी वे कुछ नया करिश्मा चाहते हैं। उनकी शूटिंग में दिल-दिमाग और शरीर निचुड़ जाता है। मुश्किल होने के बावजूद यह मेरे लिए लर्निंग एक्सपीरिएंस भी रहा। ‘राम-लीला’ ने मेरा रेंज बढ़ा दिया है। मुझे पता चला है कि मैं और क्या-क्या कर सकती हूं?’
    हीरोइनों की होड़ में आगे निकल रही दीपिका पीछे पलट कर देखना उतना जरूरी नहीं मानतीं। खिलाड़ी मानसिकता की दीपिका अपना दर्शन समझाती हैं, ‘जिंदगी में पीछे मुड़ कर कभी-कभी ही देखना चाहिए। हमेशा फोकस आगे की तरफ हो। सफलता को बहुत सीरियसली नहीं लेना चाहिए। आगे क्या करना है? मैं खिलाड़ी रह चुकी हूं। जानती हूं कि जीत और हार को लेकर रुक नहीं सकते। तारीफ अच्छी लगती है। मैंने बुरा वक्त भी देखा है, इसलिए अच्छे वक्त को खूब एंज्वॉय कर रही हूं। डेढ़ दो साल से सब कुछ अच्छा चल रहा है। नया करने की चाहत बढ़ गई है। कुछ करते समय पेट में तितलियां उडऩी चाहिए। मुझे आराम का काम नहीं चाहिए। काम घबराहट दे तो मजा है।’ अभी कुछ ऐसा आ रहा है क्या? दीपिका अपनी आगामी फिल्मों के बारे में बताती हैं, ‘फराह खान की ‘हैप्पी न्यू ईअर’ कर रही हूं। उसमें मुंबई की बार डांसर हूं। इम्तियाज अली की फिल्म करूंगी रणबीर के साथ ़ ़ ़’
    गौर करेंगे कि दीपिका के चेहरे की चमक-दमक बढ़ गई है। वह इनका राज खोलती हैं, ‘मैं खुश हूं अपने काम को लेकर ़ ़ ़ लोगों के प्यार और तारीफ से यह खुशी बढ़ जाती है। उम्मीद करती हूं कि यह जारी रहे।’ ग्रामीण पारंपरिक सोच में कहते हैं लड़कियां शादी के बाद खूबसूरत हो जाती हैं? क्या हम कह सकते हैं कि दीपिका की फिल्मों से शादी हो गई है? ‘अरे वाह, इतने खूबसूरत तरीके से आपने बात कही। शादी ही हुई है। फिलहाल मेरी जिंदगी फिल्मों तक सीमित है। मेरा कोई पर्सनल लाइफ नहीं है। परिवार के सदस्यों से भी भेंट नहीं हो पाती। मैं रीडिंग, डबिंग, शूटिंग, मीटिंग, इंटरव्यू यहां तक कि फिल्म के प्रोमोशन में भी खुश रहती हूं।’ दीपिका को सबसे ज्यादा खुशी किस रूप में मिलती है -- स्टार, एक्टर या दीपिका? सवाल खत्म होते ही दीपिका बताती हैं, ‘बेटी के रूप में सबसे ज्यादा खुशी होती है। मम्मी-पापा की लाडली दीपिका। जब घर जाती हूं तो वे जो प्यार-दुलार मिलता है। यहां तो मैं अकेली रहती हूं। परिवार में रहने पर मैं निश्चिंत रहती हूं। वह मेरी सबसे बड़ी खुशी है। उसके बाद काम ़ ़ ़’
    काम में एक फर्क बना हुआ है। आज भी हीरोइनों से अधिक तवज्जो और बाकी सबकुछ हीरो को मिलता है। क्या दीपिका कभी इस फर्क से परेशानी नहीं महसूस करतीं? हिंदी फिल्मों का इतिहास भी हीरो के नामों के साथ लिखा जाता है। दीपिका कुछ सोचती हैं, ‘मैंने क्या इस तरह से नहीं सोचा। अपने पारिश्रमिक की किसी और से तुलना नहीं की। पता भी नहीं करती। मैं अपने काम और पारिश्रमिक से खुश हूं। जिंदगी में हम सभी कुछ ज्यादा चाहते हैं। मैं भी चाहती हूं। अच्छी फिल्में, अच्छे डायरेक्टर, बड़ा काम, बड़ा नाम ़ ़ ़़ इन इच्छाओं के साथ अपने वर्तमान से खुश हूं। मैं चाहूंगी कि अंत में लोग मुझे एक बेहतर इंसान के तौर पर याद करें। कोई यह न कहे कि हीरोइन तो अच्छी थी,लेकिन ़ ़ ़। मेरी याद में लेकिन न लगे।’
    ‘राम-लीला’ को दीपिका के प्रशंसक क्यों देखें? आखिर इसमें क्या कुछ मिलेगा उन्हें? दीपिका हंसते हुए कहती हैं, ‘मैं पचास विशेषताएं बता सकती हूं। फिलहाल यही कहूंगी, ‘यह संजय लीला भंसाली की फिल्म है, जिन्होंने ‘हम दिल दे चुके सनम’, ‘देवदास’ जैसी ऐतिहासिक फिल्में बनायी थीं। यह कलरफुल, वायबेंट और फील गुड फिल्म है। मेरे और रणवीर के परफारमेंस के लिए देखें। हमारी केमिस्ट्री अच्छी है। यह आप को खुद की प्रेमकहानी लगेगी।’

Saturday, October 19, 2013

फिल्‍म समीक्षा : शाहिद

गैरमामूली शख्सियत का सच
-अजय ब्रह्मात्‍मज
शाहिद सच्ची कहानी है शाहिद आजमी की। शाहिद आजमी ने मुंबई में गुजर-बसर की। किशोरावस्था में सांप्रदायिक दंगे के भुक्तभोगी रहे शाहिद ने किसी भटके किशोर की तरह आतंकवाद की राह ली, लेकिन सच्चाई से वाकिफ होने पर वह लौटा। फिर पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया और जेल में डाल दिया। सालों की सजा में शाहिद ने अपनी पढ़ाई जारी रखी। बाहर निकलने पर वकालत की पढ़ाई की। और फिर उन बेकसूर मजलूमों के मुकदमे लड़े, जो सत्ता और समाज के कानूनी शिकंजे में लाचार जकड़े थे।
शाहिद ने ताजिंदगी बेखौफ उनकी वकालत की और उन्‍हें आजाद आम जिंदगी दिलाने में उनकी मदद की। शाहिद की यह हरकत समाज के कुछ व्यक्तियों को नागवार गुजरी। उन्होंने उसे चेतावनी दी। वह फिर भी नहीं डरा तो आखिरकार उसके दफ्तर में ही उसे गोली मार दी। हंसल मेहता की फिल्म 'शाहिद' यहीं से आंरभ होती है और उसकी मामूली जिंदगी में लौट कर एक गैरमामूली कहानी कहती है।
'शाहिद' हंसल मेहता की साहसिक क्रिएटिव कोशिश है। अमूमन ऐसे व्यक्तियों पर दो-चार खबरों के अलावा कोई गौर नहीं करता। इनकी लड़ाई, जीत और मौत नजरअंदाज कर दी जाती है। गुमनाम रह जाती है। भारतीय समाज में अल्पसंख्यकों के प्रति भेदभावपूर्ण रवैया और समझ जारी रहने की वजह से ही ऐसा होता है।
'शाहिद' में एक संवाद है कि सिर्फ अपने नाम और मजहब की वजह से फहीम जेल में है। अगर उसका नाम सुरेश, जैकब या कुछ और होता तो उस पर शक नहीं किया जाता। देश की यह अफसोसनाक सच्चाई है कि विभाजन के बाद से हिंदू-मुसलमान समुदाय के बीच ठोस सद्भाव कायम नहीं हो सका। ताजा उदाहरण मुजफ्फरनगर में हुए दंगे हैं। इस पृष्ठभूमि में 'शाहिद' सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं रह जाती। यह समुदाय, समाज और देश की कहानी बन जाती है।
हिंदी फिल्मों के नायक मुसलमान नहीं होते। यह भी एक कड़वी सच्चाई है। हर साल सैकड़ों फिल्में बनती हैं। उनमें मुसलमान किरदार भी होते हैं, लेकिन उन्हें ज्यादातर निगेटिव शेड्स में दिखाया जाता है। दशकों पहले मुस्लिम सोशल बनते थे, जिनमें पतनशील नवाबी माहौल का नॉस्टेलजिक चित्रण होता था। तहजीब, इत्र, शायरी, बुर्के और पर्दे की बातें होती थीं। उन फिल्मों में भी मुस्लिम समाज की सोशल रिएलिटी नहीं दिखती थी। सालों पहले 'गर्म हवा' में विभाजन के बाद भारत से नहीं गए एक मुसलमान परिवार की व्यथा को एम एस सथ्यू ने सही ढंग से पेश किया था। संदर्भ और स्थितियां बदल गई हैं, लेकिन सोच और समझ में अधिक बदलाव नहीं आया। 'शाहिद' एक अर्थ में कमोबेश 'गर्म हवा' की परंपरा की फिल्म है।
सीमित बजट और संसाधनों से बनी 'शाहिद' कोई मसाला फिल्म नहीं है। तकनीकी गुणवत्ता की भी कमियां दिख सकती हैं, लेकिन मानवीय मूल्यों के लिहाज से यह उल्लेखनीय फिल्म है। विषम परिस्थितियों में एक व्यक्ति के संघर्ष और जीत को बयान करती यह फिल्म हमारे समय का पश्चाताप है। हंसल मेहता ने इसे अतिनाटकीय नहीं होने दिया है। वे दर्शकों की सहानुभूति नहीं चाहते। उन्होंने शाहिद को मजबूर और बेचारे युवक के तौर पर नहीं पेश किया है। साधारण परिवार का सिंपल युवक शाहिद जिंदगी के कुछ संवेदनशील मोड़ों से गुजरने के बाद एक समझदार फैसला करता है। वह वंचितों के हक में खड़ा होता है और इस जिद में मारा भी जाता है।
राज कुमार फिल्म की शीर्षक भूमिका में हैं। उन्होंने शाहिद के डर, खौफ, संघर्ष, जिद और जीत को बखूबी व्यक्त किया है। वे हर भाव के दृश्यों में नैचुरल लगते हैं। फिल्म की कास्टिंग जबरदस्त है। शाहिद के भाइयों, मां और पत्‍‌नी की भूमिकाओं में भी उपयुक्त कलाकारों का चयन हुआ है। फिल्म के कोर्ट रूम सीन रियल हैं। 'जॉली एलएलबी' के बाद एक बार फिर हम कोर्ट रूम की बहसों को बगैर डायलॉगबाजी और सौगंध के देखते हैं।
'शाहिद' मर्मस्पर्शी और भावुक कहानी है। फिल्म के अंतिम प्रभाव से आंखें नम होती हैं, क्योंकि हम सत्ता और समाज के हाथों विवश और निहत्थे व्यक्ति की हत्या देखते हैं। यह फिल्म सिहरन देती है। खौफ पैदा करती है। हिंदी सिनेमा के वर्तमान मनोरंजक दौर में लकीर से अलग होकर एक सच कहती है।
अवधि-112 मिनट
**** चार स्‍टार

Friday, October 18, 2013

क्‍लासिक फिल्‍म : गर्म हवा



 15 वें मुंबई फिल्‍म फेस्टिवल के लिए लिखा यह विशेष लेख वहां अनूदित होकर अग्रेजी में प्रकाशित हुआ है। चवन्‍नी के पाठकों के लिए मूल लेख प्रस्‍तुत है। आप बताएं कि और किन फिल्‍मों पर ऐसे लेख पढ़ना चाहते हैं। इरादा है कि खास फिल्‍मों पर विस्‍तार से लिखा जाए।
-अजय ब्रह्मात्‍मज

      सन् 1973 में आई एम एस सथ्यू की गर्म हवा  का हिंदी सिनेमा के इतिहास में खास महत्व है। यह फिल्म बड़ी सादगी और सच्चाई से विभाजन के बाद देश में रह गए मुसलमानों के द्वंद्व और दंश को पेश करती है। कभी देश की राजधानी रहे आगरा के ऐतिहासिक वास्तु शिल्प ताजमहल और फतेहपुर सिकरी के सुंदर, प्रतीकात्मक और सार्थक उपयोग के साथ यह मिर्जा परिवार की कहानी कहती है।
      हलीम मिर्जा और सलीम मिर्जा दो भाई हैं। दोनों भाइयों का परिवार मां के साथ पुश्तैनी हवेली में रहता है। हलीम मुस्लिम लीग के नेता हैं और पुश्तैनी मकान के मालिक भी। सलीम मिर्जा जूते की फैक्ट्री चलाते हैं। सलीम के दो बेटे हैं बाकर और सिकंदर। एक बेटी भी है अमीना। अमीना अपने चचेरे भाई कासिम से मोहब्बत करती है। विभाजन की वजह से उनकी मोहब्बत कामयाब नहीं होती। हलीम अपने बेटे को लेकर पाकिस्तान चले जाते हैं। कासिम शादी करने के मकसद से आगरा लौटता है, लेकिन शादी की तैयारियों के बीच कागजात न होने की वजह से पुलिस उन्हें जबरन पाकिस्तान भेज देती है। दुखी अमीना को फूफेरे शमशाद का सहारा मिलता है, लेकिन वह मोहब्बत भी शादी में तब्दील नहीं होती। दूसरी तरफ सलीम मिर्जा आगरा न छोडऩे की जिद्द पर अमीना की आत्महत्या और पाकिस्‍तानी जासूस होने के लांछन तक अड़े रहते हैं। संदेह और बेरूखी के बावजूद उनकी संजीदगी में फर्क नहीं आता। उन्हें उम्मीद है कि महात्मा गांधी की शहादत बेकार नहीं जाएगी। सब कुछ ठीक हो जाएगा।
      फिल्म फायनेंस कारपोरेशन के सहयोग से बनी गर्म हवाआजादी के बाद पहली बार विभाजन के दुष्‍प्रभाव को राजनीतिक संदर्भ में वस्तुगत ढंग से प्रस्तुत करती है। सीमित बजट में बनी गर्म हवा  आज के दौर के इंडेपेंडेट फिल्मकारों जैसी ही पहल कही जा सकती है। इप्टा मे सक्रिय एम एस सथ्यू ने समान विचार के तकनीशियनों और कलाकारों को जोड़ कर यह फिल्म पूरी की। इस्मत चुगताई की कहानी थी। उसे कैफी आजमी और शमा जैदी ने पटकथा में बदला। कैफी आजमी ने फिल्म के शुरू और अंत में भारत-पाकिस्तान की समान स्थिति पर मौजूं गजल पढ़ी। बलराज साहनी ने मुख्य किरदार सलीम मिर्जा की भूमिका निभाई। ए के हंगल चरित्र भूमिका में दिखे। फिल्म के निर्माण में इप्टा के आगरा स्थित रंगकर्मियों और स्थानीय कलाकारों ने सक्रिय सहयोग दिया। प्रगतिशील विचारों से प्रेरित यह फिल्म समानधर्मी कलाकारों और तकनीशियनों का सामूहिक प्रयास थी। अपने समय में यह फिल्म हिंदी सिनेमा के मुख्यधारा के खिलाफ बनी थी।
      सत्यजित राय ने गर्म हवा के बारे में लिखा है, ‘विषयहीन हिंदी सिनेमा के संदर्भ में गर्म हवाने इस्मत चुगताई की कहानी लेकर दूसरी अति की। यह फिल्म सिर्फ अपने विषय की वजह से मील का पत्थर बन गई, जबकि फिल्म में अन्य कमियां थीं। सचमुच, इस फिल्म में तकनीकी गुणवत्ता और बारीकियों से अधिक ध्‍यान कहानी के यथार्थ धरातल और चित्रण पर दिया गया। 1973 में प्रदर्शित हुई अन्य हिंदी फिल्मों की तुलना में गर्म हवाछोटी फिल्म कही जा सकती है, जिसमें न कोई पॉपुलर स्टार था और न हिंदी फिल्मों के प्रचलित मसाले।
      एम एस सथ्यू की गर्म हवापहली बार विभाजन के थपेड़ों का हमदर्दी और स्पष्ट दृष्टिकोण के साथ पर्दे पर पेश करती है। हिंदी फिल्मों में इसके पहले भी विभाजन के संदर्भ मिलते हैं, लेकिन कोई भी निर्देशक सतह से नीचे उतर कर सच्चाई के तल तक जाने की कोशिश नहीं करता। देश के विभाजन और आजादी के बाद लाहौर’ (1949), ‘अपना देश’ (1949), ‘फिरदौस’ (1950), ‘नास्तिक’ (1959), ‘छलिया’ (1960), ‘अमर रहे तेरा प्यार’ (1961) और धर्मपुत्र’ (1961) में विभाजन के आघात से प्रभावित चरित्र हैं। इनमें से कुछ में अपहृत महिलाओं की कहानियां है तो कुछ में सिर्फ रेफरेंस है। दशकों बाद गोविंद निहलानी के धारावाहिक तमसऔर डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी  के पिंजरमें फिर से विभाजन की पृष्ठभूमि मिलती है। पिंजरमें डॉ. द्विवेदी ने अपहृत पारो के प्रेम और द्वंद्व को एक अलग संदर्भ और निष्कर्ष दिया,जो मुख्य रूप से पिंजरउपन्यास की लेखिका अमृता प्रीतम की मूल सोच पर आधारित है। सन् 2000 में अनिल शर्मा की गदरमें भी विभाजन का संदर्भ है, लेकिन यह फिल्म भारत के वर्चस्व से प्रेरित अंधराष्ट्रवादी किस्म की है। गदर अतिरंजना से बचती तो सार्थक फिल्‍म हो सकती थी। हिंदी फिल्मों में देश के विभाजन पर फिल्मकारों की लंबी चुप्पी को गर्म हवा तोड़ती है। इस फिल्म में लेखक-निर्देशक ने विभाजन की पृष्ठभूमि में आगरा के सलीम मिर्जा और उनके परिवार के सदस्यों के मार्फत मुसलमानों की सोच, दुविधा, वास्तविकता और सामाजिकता को ऐतिहासिक संदर्भ में संवेदनशील तरीके से समझने और दिखाने की कोशिश की।
      विभाजन की राजनीति-सामाजिक विभीषिका देश से हमारा देश कभी उबर नहीं पाया। इस विध्वंस की तबाही आज भी देखी जा सकती है। देश के नेताओं की जल्दबाजी और भूलों के परिणाम के रूप में विभाजन सामने आया। विभाजन में हुई जान-ओ-माल की तबाही के आंकड़े आज भी विचलित कर देते हैं। नेहरू और जिन्ना ने सत्ता हथियाने की होड़ के साथ अपने वर्चस्व और अहं की लड़ाई में यह नहीं सोचा कि देश के टुकड़े होने से स्थानातरण और पुनर्वास के बीच लाखों परिवार ओर जिंदगियां इस भूल से रौंदी जाएंगी। आजादी के 66 सालों के बाद भी प्रभावित व्यक्तियों की कराह हमारे वर्तमान को टीसती रहती है। वैमनस्य और अविश्वास हमारी सोच-समझ का हिस्सा बन गया है। दशकों बाद भी पहले भारत-पाकिस्तान और अब भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश की अनेक समस्याएं समान और परस्पर हैं। इन समस्याओं के बीज विभाजन में ही रोपे गए थे।
विभाजन के लिए हम अपनी सोच और विचारधारा से किसी एक को दोषी ठहरा देते हैं। वास्तव में दोषी तो राजनेता थे। 1960 में लियोनार्ड मोसली से एक बातचीत में जवाहर लाल नेहरू ने कहा था, ‘सालों की लड़ाई से हम सभी थक गए थे। हम लोगों में से कुछ ही फिर से जेल जाने की स्थिति के लिए तैयार हो पाते - अगर हम संयुक्त भारत के लिए लड़ते तो निश्चित ही हमें जेल के खुले दरवाजे मिलते। हम ने पंजाब में लगी आग देखी और कत्लेआम की खबरें सुनीं। विभाजन की योजना से एक राह मिली और हम ने उसे स्वीकार कर लिया। हम ने उम्मीद की थी कि विभाजन अस्थायी होगा और पाकिस्तान लौट कर भारत में शामिल होगा। नेहरू की इस सोच पर आज हैरानी होती है, लेकिन यह तत्कालीन नेताओं के सामूहिक मानस की अभिव्यक्ति है।
इस पृष्ठभूमि में विभाजन और उसके प्रभाव को लेकर फिल्मों में न के बराबर प्रयास हुए। साहित्य में विभाजन की स्थिति और पीड़ा की मुखर अभिव्यक्ति हुई। हिंदी, उर्दू, बाग्ला, सिंधी और पंजाबी भाषा के साहित्यकारों ने विभाजन को स्वीकार नहीं किया। वे विभाजन के अभिशप्त किरदारों को शब्दों के जरिए पन्नों पर उतारते रहे। आश्चर्य है कि उसे पर्दे पर लाने का सक्रिय प्रयास नहीं दिखता। न केवल भारतीय और पाकिस्तानी फिल्मकार विभाजन की विभीषिका के प्रति उदासीन रहे, बल्कि पश्चिम देशों में के फिल्मकारों ने भी भारतीय उपमहाद्वीप की इस विपदा को फिल्मों के विषय के रूप में नहीं चुना। विश्व युद्ध और दूसरी विपदाओं पर दर्जनों फिल्में बना चुके विदेशी फिल्मकार की निष्क्रियता भी उल्लेखनीय है। उन्होंने दक्षिण एशिया के इस भूभाग के विभाजन और विस्थापन से उपजी मानवीय त्रासदी पर ध्यान नहीं दिया।
      हिंदी फिल्मों में विभाजन के प्रति विरक्ति को गुलजार और श्याम बेनेगल ने अपने लेखों और इंटरव्यू में रेखांकित किया है। गुलजार ने उल्लेख किया है कि आजादी मिली, मगर वह पार्टीशन के दंगों में बहे खून से सनी थी। हवा में घृणा, विद्वेष और उदासी भरी थी। श्याम बेनेगल ने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘सन् 1947 में विभाजन हुआ। हर भारतीय की स्मृति में वह इतिहास का सबसे बड़ा सदमा था। राष्ट्र का सिद्धांत हमारे लिए भले ही नया हो, मगर एक देश के रूप में हमारा अस्तित्व सदियों पुराना था। इस सदमे का भारी असर हुआ। दो राष्ट्र के सिद्धांत को धर्म से जोड़ कर पाकिस्तान का निर्माण किया गया। पाकिस्तान बन जाने के बाद दोनों तरफ से आबादी का विस्थापन और पलायन हुआ। भारत से मुसलमान पाकिस्तान गए। इस पलायन के बावजूद मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा देश में रह गया। वे अपने पूर्वजों की जमीन छोडऩे के लिए तैयार नहीं थे, मगर बाद में उनकी वफादारी पर शक किया गया। देश में रह गए मुसलमानों ने सीधा सवाल किया कि हम ने तो पाकिस्तान नहीं मांगा था फिर हम पर क्यों अविश्वास किया जा रहा है?’
इस प्ररिप्रक्ष्य में गर्म हवाका निर्माण निश्चित ही आवश्यक साहसिक कदम था।गर्म हवाके निर्माण के बाद आरंभ में इसे सेंसरशिप की मुश्किलों से गुजरना पड़ा। सेंसर बोर्ड के अधिकारियों की राय थी कि ऐसे विषय से हम बचें। इसके विपरीत फिल्मकार और सचेत सामाजिक एंव राजनीतिक एक्टिविस्ट विभाजन के बाद से दबे विषयों पर बातें करने के लिए तत्पर थे। छह महीनों तक फिल्म अटकी रही। दिल्ली में फिल्म के पक्ष में समर्थन जुटाने की कोशिश में राजनीतिक हलकों और सांसदों के बीच फिल्म का प्रदर्शन किया गया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और सूचना प्रसारण मंत्री इंद्र कुमार गुजराल की पहल और समर्थन से फिल्म सेंसर हुई और दर्शकों के बीच पहुंची।
 गर्म हवाका आरंभ फिल्म को सही परिप्रेक्ष्य देता है। कास्टिंग रोल में आजादी का साल 1947 बताने के बाद भारत का अविभाजित नक्‍शा उभरता है। सबसे पहले मीात्‍मा गांधी की तस्‍वीर आती है। फिर माउंनबेटेन और लेडी माउंट बेटेन के साथ महात्मा गांधी दिखते हैं। आजादी के संघर्ष में शामिल पटेल, नेहरू, जिन्ना की तस्वीरों के बाद पर्दे पर सत्ता हस्तानंतरण की तस्वीरें, लाल किले से नेहरू का संबोधन, हर्ष और उल्लास की छवियों के बीच देश के विभाजित नक्शे को हम देखते हैं। इस नक्शे पर विभाजन की तस्वीरें तेजी आती हैं। तीन गोलियों की आवाज के साथ गांधी की तस्वीर गिरती है और कैफी आजमी की आवाज में हम सुनते हैं -
      तकसीम हुआ मुल्क तो दिल हो गए टुकड़े
      हर सीने में तूफान वहां भी था यहां भी
      घर घर में चिता जलती थी लहराते थे शोले
      हर शहर में श्मशान वहां भी था यहां भी
      गीता की न कोई सुनता न कुरान की सुनता
      हैरान सा ईमान वहां भी था यहां भी
      कास्टिंग में तस्वीरों के कोलाज के बाद कैफी आजमी की आवाज में विभाजन के बयान के साथ फिल्म अवसाद से आरंभ होती है। आजादी के साथ आई उदासी को महात्मा गांधी की हत्या और गाढ़ा कर देती है। महात्मा गांधी की आकस्मिक मृत्यु के राष्ट्रीय संदर्भ से सांप्रदायिक दंगे रुक गए थे। हालांकि फिल्म में मिर्जा कहते भी हैं कि गांधी जी की शहादत बेकार नहीं जाएगी, लेकिन वास्तविकता इस उम्मीद से अलग है। मुसलमानों के प्रति संदेह जारी रहा और बेरूखी नहीं घटी। गर्म हवामें यह बेरूखी और संदेह कई दृश्यों और प्रसंगों में चित्रित हुआ है। एक दृश्य में तांगावाला आठ आने के भाड़ा बढ़ा कर दो रुपए कर देता है। सलीम आपत्ति करते हैं तो उसका जवाब होता है, ‘तुम्हारा वक्त खत्म हो गया है। आठ आने में जाना है तो पाकिस्तान जाओ, पाकिस्तान। सलीम इस पर भी नाराज नहीं होते। वे कहते हैं, ‘नई नई आजादी मिली है। सब उसका मतलब अपने ढंग से निकाल रहे हैं।सलीम के भाई हलीम पाकिस्तान जाने का इरादा कर चुके हैं। दस्तरखान पर पारिवारिक बातचीत में सलीम कहते हैं, ‘बीए पास कर लें कि एम ए। अब हिंदुस्तान में किसी मुसलमान लडक़े को नौकरी नहीं मिले सकती।फिल्म के आगे के दृश्यों में हम देखते हैं कि सलीम बेटे सिकंदर को हर इंटरव्यू में निराशा ही हाथ लगती है।
      फिल्‍म की शुरुआत में स्‍टेशन पर खड़े सलीम मिर्जा ट्रेन को प्‍लेटफार्म छोड़ते हुए एकटक देखते हैं। भारी कदमों से बाहर आकर तांगे में बैठते हैं। तांगा वाला पूछता है,आज किसे छोड़ आए मियां?
सलीम- बड़ी बहन को...बहनोई साहब तो पहले ही करांची जा चुके थे। आज उनके बाल-बच्‍चे भी चले गए। कैसे हरे-भरे दरख्‍त कट रहे हैं इस हवा में...
तांगावाला- बड़ी गर्म हवा है मियां,बड़ी गरम...जो उखड़ा नहीं सूख जावेगा मियां...
      इन संवादों में फिल्‍म का सार मिल जाता है। अपनी जमीन से नहीं उखड़े सलीम मिर्जा को हम वक्‍त और घटनाओं के थपेड़ों से सूखते देखते हैं। आरंभ  से लेकर अमीना की आत्महत्या और खुद पर लगे पाकिस्तानी जासूस के आरोप के पहले सलीम परिवार और समाज के विरोध का सामना समझदारी से करते हैं। जड़ें न छोडऩे की अपनी जिद्द में वे विरोधों के मुकाबले खड़े रहते हैं। उनके व्यक्तित्व में संजीदगी है। बड़े आर्डर करने के लिए जरूरी पूंजी बाजार और बैंक से न उगाह पाने के बाद भी उनका जोश नहीं टूटता। वे अपने बेटे को समझाते भी हैं, ‘ व्यापार तो व्यापार होता है, मजहब को कोई नहीं देखता।फिर भी शहर में उनके प्रति अविश्वास और संदेह बढ़ता है। तंग आकर वे कहते हैं, ‘जो भागे हैं उनकी सजा उन्हें क्यों दी जाए जो न भागे हैं और न भागने वाले हैं।
केवल एक दृश्‍य में एमएस सथ्‍यू ने एक व्यापारी को उन्हें उधार देने  से प्रत्यक्ष मना करते दिखया है। इसके अलावा बाकी दृश्यों में मना कर रहे चेहरे नहीं दिखते।  मकान मालिक, बैंक के मैनेजर और इंटरव्यू लेने वाले अदृश्य रहते हैं। उनकी सिर्फ आवाजें सुनाई पड़ती हैं। आजादी के बाद देश में रह गए मुसलमानों पर आए नए दबाव का कोई प्रत्यक्ष चेहरा नहीं है। एमएस सथ्यू ने बहुत बारीकी से सत्ता और समाज के प्रतिनिधियों के अदृश्य दबाव को पेश किया है। स्पष्ट संकेत है कि मुसलमानों के लिए माहौल प्रतिकूल है। .
गर्म हवाकी रिलीज के समय से लेकर आज तक आलोचकों का एक समूह इसे विभाजन के प्रभाव का संतुलित और सुसंगत चित्रण नहीं मानता। उनके दृष्टिकोण से फिल्म में पाकिस्तान में रह गए हिंदुओं का कोई उल्लेख नहीं होता। उनके अनुसार पाकिस्तान में हिंदू और सिख परिवारों पर अत्याचार हुए। उनकी नजर में फिल्म के चरित्रों के पास्परिक द्वंद्व को फिल्म जरूर दिखाती है, लेकिन सलीम या कोई अन्य किरदार अपनी बिरादरी की आलोचना नहीं करता। संतुलित चित्रण की इस असंगत अपेक्षा से गर्म हवासामाजिक विमर्श के हाशिए पर रही। पिछले चालीस सालों में गर्म हवापर पर्याप्त चर्चा और बहस नहीं हुई।. गर्म हवा अनेक स्‍तरों पर प्रभावित करती है। विषय का बारीक चित्रण एक खूबी है। सभी चरित्रों को ढंग से विकसित करने के साथ उन्‍हें एक न एक मकसद सौंपा गया है। प्रमुख चरित्र के साथ सहयोगी चरित्रों को पिरोने और मुख्‍य कथा को आगे बढ़ाने में उनकी भूमिका एवं उपयोग के लिहाज से यह फिल्‍म लेखकों के लिए दर्शनीय और
पठनीय है। इस से कहानी को पटकथा में बदलने की निपुणता सीखी जा सकती है। दृश्‍य संरचना कहीं भी बोझिल नहीं होती। फिल्‍म का अवसाद असर करता है। इन दिनों कास्टिंग डायरेक्‍टर के कौशल की काफी चर्चा होती है। ‘गर्म हवा उपयुक्‍त कास्टिंग के लिए भी उल्‍लेखनीय है। उपयुक्‍त कास्टिंग की पहली शर्त यही है कि उन भूमिकाओं में दूसरे कलाकारों की कल्‍पना नहीं की जा सकती। सलीम, हलीम, फखरुद्दीन, अजवानी, बाबर, सिकंदर, अमीना, कासिम, शमशाद और बूढ़ी मां... सभी किरदार और कलाकार फिल्‍म के विषय का प्रभाव बढ़ाने मं योगदान करते हैं।
      फिल्‍म अवसाद, अपमान, संदेह और दुख से घिरे सलीम मिर्जा के चरित्रांकन में रत्‍ती भर भी भावुक नहीं होती। लेखक-निर्देशक दर्शकों की संवेदना जगाने के साथ उस समय की समझ बढ़ाते हैं। वे निरंतर टूटते-सूखते सलीम मिर्जा के जीवन की घटनाएं भी दिखाते हैं, लेकिन सहानभूति नहीं पैदा करत। अपने समय की विसंगतियों से जूझते सलीम मिर्जा विक्षुब्‍ध नहीं होते। यहां तक कि तंज और फिकरों पर भी वे अधिक गौर नहीं करते। समय के साथ उन्‍हें जोड़कर वे निष्‍कलुष ही रहते हैं। भावनात्‍मक रूप से आहत अमीना से हमदर्दी होती हे। उसकी आत्‍महत्‍या से झटका लगता है। सलीम मिर्जा यहां भी अपनी लाडली की मौत का कड़वा घूंट पीते हैं। मैलोड्रामा से बचते हुए सिर्फ पलकें झपकाकर अपने व्‍यक्तित्‍व के अनुरूप शोक व्‍यक्‍त करते हैं।
      सलीम मिर्जा फिल्‍म के केंद्रीय चरित्र हैं। समाज से परिवार के पुरुषों का संपर्क रहता है। परिवार की स्त्रियां हवेली के चौखटे के अंदर रहती हैं। सलीम मिर्जा की मां, बीवी और बेटी के चरित्रों पर गौर करें तो ऐसा लगता है कि मां विभाजन की खबरों और सच्‍चाइयों से वाकिफ नहीं हैं। उनके लिए पूरी दुनिया यह हवेली ही है, जहां वह छोटी उम्र में ब्‍याह कर आई थीं। उन्‍हें यकीन नहीं होता कि इस हवेली पर कोई और काबिज हो सकता है। हवेली छोड़ते समय वह एक कोने में जाकर छिप जाती हैं। मृत्‍यु से पूर्व उन्‍हें पालकी में हवेली ले जाया जाता है, जहां उनकी सांसें अटकी हैं। यह दृश्‍य मर्मातंक है। मां का चरित्र प्रिय और मासूम है। सलीम मिर्जा की बीवी आए बदलाव को समझ रही हैं। वह दबे स्‍वर में शौहर से पाकिस्‍तान चलने की बात भी करती हैं, लेकिन सलीम के फैसले पर उनको भरोसा है। अमीना की आत्‍महत्‍या के बाद सलीम मिर्जा पाकिस्‍तान जाने के लिए तैयार हो जाते हैं तो वह शिकायत भी करती है कि पहले चलते तो अमीना जिंदा रह जाती। अमीना विभाजन से व्‍यक्तिगत स्‍तर पर प्रभावित है। विभाजन की वजह से ही कासिम और शमशाद से उसकी शादी नहीं पाती। उसकी चीख सुनाई नहीं पड़ती। वह खुद को समेट लेती है। अमीना उन सभी लड़कियों की प्रतिनिधि है, जो विभाजन के कारण कुंवारी रह गईं1 उनकी भावनाओं का दम घुटा और उन्‍होंने खुदकुशी कर ली।
गर्म हवाका अंत प्रतीकात्मक होने के साथ राजनीतिक है। विरोधों और प्रतिकूल स्थितियों से थके-हारे सलीम कहते हैं, ‘लोग मुझे देख कर कतराते हैं। पास से उठ जाते हैं। मुंह फेर लेते हैं। बर्दाश्त की भी हद होती है। अब यह मालूम हो गया कि इस देश में रहना नामुमकिन है। बर्दाश्त की हद टूटने पर वे अपनी बीवी और बेटे सिकंदर के साथ पाकिस्तान जाने का फैसला करते हैं तो सिकंदर विरोध करता है, ‘हमें हिंदुस्तान से भागना नहीं, बल्कि हिंदुस्तान में रह कर आम आदमी के कंधे से कंधा मिलाकर अपनी मांगों के लिए लडऩा चाहिए।सिकंदर की इन आदर्श पंक्तियों में ठोस वामपंथी सोच की नारेबाजी प्रतीत हो सकती है। सलीम बेटे की बात को तवज्जो नहीं देते। अगले दिन ताजमहल के सामने वे आंखें पोछते नजर आते हैं। सारी तकलीफ आंसू बन कर निकलती है। उनके गुबार को महसूस किया जा सकता है। आखिरकार स्टेशन के लिए तांगे में बैठते हैं। रास्ते में एक जुलूस दिखता है। नारा लग रहा है मांग रहा है हिंदुस्तान, रोजी-रोटी और मकान। सलीम अपने बेटे की कही बातों को अब स्वीकार करते हैं। वे कहते हैं, ‘जा बेटा। अब मैं तुझे नहीं रोकूंगा। इंसान कब तक अकेला जी सकता है... मैं भी अकेली जिंदगी से तंग आ गया हूं। तांगा वापस ले जाओ।बीवी को घर पहुंचा देने की ताकीद कर वे भी जुलूस में शामिल हो जाते हैं। फिर से कैफी आजमी की आवाज उभरती है -
      जो दूर से कहते हैं, तूफान का नजारा
      उनके लिए तूफान वहां भी है यहां भी
      धार में जा मिल जाओ तो बन जाओगे धारा
      ये वक्त का ऐलान वहां भी है यहां भी





Thursday, October 17, 2013

दरअसल... क्या करते और चाहते हैं प्रशंसक?


-अजय ब्रह्मात्मज
    हाल में एक उभरते स्टार मिले। अपनी फिल्म के प्रचार के लिए वे मुंबई से बाहर गए थे। इन दिनों फैशन चल गया है। सभी मुंबई और दिल्ली से निकल कर इंदौर, नागपुर, लखनऊ, कानपुर, पटना और जयपुर जैसे शहरों में जा रहे हैं। ऐसे ही एक शहर से वे लौटे थे, उन्होंने अपना हाथ दिखाया। नाखूनों के निशान स्पष्ट थे। मानो किसी ने चिकोटी काटी हो। पूछने पर वे बताने लगे - यह तो कुछ भी नहीं है। अभी तो और भी फरमाइशें पूरी करनी पड़ती है। अभी किशोर और युवा उम्र की लड़कियां गोद में उठाने का आग्रह करती हैं। मेरे तो कंधे दर्द कर रहे हैं। याद नहीं कितनी लड़कियों को सहारा देकर बांहों में उठाया। यह सब होता है महज एक तस्वीर और क्षणिक सुख के लिए। सेलिब्रिटी के साथ होते ही आम नागरिक के रंज-ओ-गम काफूर हो जाते हैं। इस सुख और खुशी को परिभाषित नहीं किया जा सकता है। यह है और होता है।
    मोबाइल में कैमरा लगने के बाद तस्वीरों की चाहत बढ़ गई है। सेलिब्रिटी दिखते ही हम सभी पहले उनकी तस्वीर उतारते हैं। यह खयाल नहीं रहता कि वे वहां किस वजह से हैं? कहीं वह उनका प्रायवेट क्षण तो नहीं है। मुंबई में आए दिन रेस्तरां और थिएटर में फिल्म सेलिब्रिटी को ये परेशाानियां झेलनी पड़ती हैं। मुस्कराते हुए तस्वीर खिंचवानी पड़ती है। खयाल रखना पड़ता है कि कैमरा क्लिक हो तो वे नाखुश ना दिखें। हालांकि यह शोध का विषय हो सकता है कि ऐसी तस्वीरें प्रशंसक संभाल कर रखते हैं या नहीं? या फिर मोबाइल बदलने या खोने के साथ सब कुछ खो जाता है। पहले ऑटोग्राफ का चलन था। अब फोटोग्राफ का जमाना है।
    पहले भी मैंने इसका उल्लेख किया है। हम कहीं भी हो और अपने काम या गतिविधि में भले ही कितने मशरूफ न हों? सेलिब्रिटी को देखते ही हम बेसुध हो जाते हैं। अपना काम भूल जाते हैं। कुछ भी याद नहीं रहता। सिर्फ उस सेलिब्रिटी को निहारने में आनंद आता है। सेलिब्रिटी हम से मुखातिब भी नहीं होता, लेकिन उसे देख कर ही हिया जुड़ा जाता है। इस खुशी या क्षणिक आनंद को कैसे डिफाइन करेंग? हर सेलिब्रिटी अपनी मौजूदगी मात्र से दो पल के लिए हमारी जिंदगी में खुशियां उड़ेल देता है। इसके एवज में उसे कुछ नहीं मिलता। वह कुछ चाहता भी नहीं। हां, उसे भी खुशी मिलती है। उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। माधुरी दीक्षित ने कभी बताया था कि ‘तेजाब’ की रिलीज के बाद वह एयरपोर्ट से निकल रही थीं तो कुछ बच्चों ने उन्हें ‘मोहिनी-मोहिनी’ कह कर पुकारा था। वैसी खुशी दोबारा नहीं मिली। सचमुच कोई अपरिचित सामने आकर नाम या काम से पुकारे तो बेहद खुशी होती है।
    प्रशंसकों और सेलिब्रिटी के संबंध की कुछ समस्याएं भी हैं। कुछ प्रशंसक आक्रामक होते हैं। वे अपने प्रिय सितारों को तंग करने से भी नहीं हिचकते। बिपाशा बसु को छूने की कोशिश में छेड़खानी हो चुकी है। मैं खुद गवाह रहा हूं। एक बार रितिक रोशन के साथ अहमदाबाद गया था। हमलोग एक क्लब में थे। वहां किटी पार्टी की महिलाओं से मिलना था। मुलाकात के बाद अचानक रितिक रोशन ने महसूस किया कि उनके नितंब पर किसी का हाथ है। उसने चिकोटी काटी। रितिक का चेहरा लाल हो गया। गुस्से और शर्म में वे झटकते हुए आगे बढ़े तो भगदड़ मच गई। बाद में उन्होंने बताया कि उन प्रौढ़ महिलाओं में से किसी ने चिकोटी काटी थी।
    देव आनंद के समय चि_ी-पत्री तक ही सब कुछ सीमित था तो उन्हें खून से लिखे प्रेमपत्र मिलते थे। राजेश खन्ना के समय लड़कियां राजेश खन्ना के गुजरने के बाद धूल उठाकर मांग से लगाती थीं या उनकी कार को चूम-चूम कर लिपिस्टिक से लाल कर देती थीं। अब जमाना बदल गया है। दीवानगी में भी फर्क आया है। अब छूने और बांहों में आने का शौक बढ़ गया है। हर कलाकार और सेलिब्रिटी को ऐसी परेशानियों से गुजरना पड़ता है। वे ना  भी तो नहीं कर सकते। प्रशंसक ही तो उनके भाव और ताव बढ़ाते हैं। एक प्रशंसक को नाराज करने के मतलब सैकड़ों प्रशंसकों को अपने खिलाफ करना होता है। कोई भी सेलिब्रिटी यह रिस्क नहीं ले सकता।


Wednesday, October 16, 2013

बॉस के गीत


बॉस तो देख ली होगी। उसके गाने यहां पढ़ लें और साथ में गुनगुनाएं। मजा आएगा।
1

Hum Na Tode Lyrics


(Re passe ne hat ja re taau.. Boss aa riya se..
Pata koni ke tanne.. Boss re boss..)

Hum na chhode.. tode.. phodein..
Jo bhi humse panga le..
Hum na chhode, tode.. phode..
Jo bhi humse panga le..

Collar nikal ke, Jeans phati daal ke..
Duniya ko bandh ke, apne rumaal se..
Hum to chale jhoomte..
Dayein bayein ghumte.. hey..

Masti full on re..
Rokega kaun re..(Repeat once)

Hmm.. hum na chhode.. tode.. phodein..
Jo bhi humse panga le..
Hum na chhode.. tode.. phode..
Jo bhi humse panga le..

Hey jo yahaan baat karega (Akad ke)
Taang deke usko chand pe (Pakad ke)
Apna to mizaj hi bada, hai manmaana..
Hum hain baki sab jubaan ke yahan gulam hai (Gulam hai..)
Aate-jate humko thokte salam hain (Salam hain)
Apne hi usool pe chale yeh jawana (Yeh jawana)

Mana humne hum dheet hain
Lekin dil ke hum meet hain
Mana humne hum dheet hain
Lekin dil ke hum meet hain
Geet yahi chhedke, apni guitar pe
Fikron ka aasman sir se utaar ke
Hum to chale jhoomte..
Oh daaye baaye ghumte..

Masti full on re..
Rokega kaun re..(Repeat once)

(Re khatam nahi hua baavdi poonchh.. abbe dhol peet le..)
(Re guitar baja le Jakson ki aulaad)
(Re peepni ne phoonk le.. hawa ni bhar ri ke andar..)
(Re orkistra, baja..)

Ho apni to hai sidhi sadi si philosophy (Philosophy)
Khate peete mauj mein kate, ye zindagi (Ye zindagi..)
Dil rahe khushi ke hi nashe mein chakraya..
Hoo hum to cheez hain kamal ki, pahchan lo..
Yaar jake husn walo se, yeh jaan lo..
Humne hi to ladkiyon ka dil, hai dhadkaaya..

Apne charche akhbaar mein..
Chhapte rahte hain pyar mein
Apne charche akhbaar mein..
Chhapte rahte hain pyar mein..
Wish ko hum to karte hain, apne hisab se…
Humpe yakeen na ho to, poochh lo janaab se..

O hum to chale jhoomte.. haan
Daayein baayein ghumte..

Masti full on re..
Rokega kaun re..(Repeat once)

Hum na chhode.. tode.. phodein..
Jo bhi humse panga le..
Hum na chhode, tode.. phode..
Jo bhi humse panga le..

(Aye taau boss chala gaya..
Ab kaahein ki uchhal kood)


Lyrics: Hum Na Tode – Boss Song
Music Director: P A Deepak
Lyrics: Kumaar
Singer: Vishal Dadlani

1


हम ना तोड़े लिरिक्स



(रे पास से ने हट जा रे ताउ.. बॉस आ रिया से..
पता कोनी के तन्‍ने.. बॉस रे बॉस..)
हम ना छोड़ें.. तोड़े.. फोड़ें..
जो भी हम से पंगा ले..
हम ना छोड़े, तोड़े.. फोड़े..
जो भी हम से पंगा ले..

कॉलर निकाल के, जीन्स फटी डाल के..
दुनिया को बाँध के, अपने रुमाल से..
हम तो चले झूमते..
दायें बायें घूमते.. हे..
मस्ती फुल ओंन रे..
रोकेगा कौन रे..(रिपीट वन्स)
ह्म.. हम ना छोड़े.. तोड़े.. फोड़ें..
जो भी हम से पंगा ले..
हम ना छोड़े.. तोड़े.. फोड़े..
जो भी हम से पंगा ले..

हे जो यहाँ बात करेगा (अकड़ के)
टाँग देके उसको चाँद पे (पकड़ के)
अपना तो मिज़ाज ही बड़ा, है मनमाना..
हम हैं बाकी सब ज़ुबान के यहाँ गुलाम है (गुलाम है..)
आते-जाते हमको ठोकते सलाम हैं (सलाम हैं)
अपने ही उसूल पे चले यह जवाना (यह जवाना)
माना हम ने हम ढीठ हैं
लेकिन दिल के हम मीत हैं
माना हम ने हम ढीठ हैं
लेकिन दिल के हम मीत हैं
गीत यही छेड़ के, अपनी गिटार पे
फ़िक्रों का आसमान सिर से उतार के
हम तो चले झूमते..
ओह डाए बाए घूमते..
मस्ती फुल ओंन रे..
रोकेगा कौन रे..(रिपीट वन्स)
(रे ख़तम नही हुआ बावड़ी पूंछ.. अबे ढोल पीट ले..)
(रे गिटार बजा ले जैक्‍सन की औलाद)
(रे पीपनी ने फूँक ले.. हवा नी भर री के अंदर..)
(रे ओर्कीस्ट्रा, बजा..)
हो अपनी तो है सीधी सादी सी फिलॉसोफी (फिलॉसोफी)
खाते पीते मौज में कटे, ये ज़िंदगी (ये ज़िंदगी..)
दिल रहे खुशी के ही नशे में चकराया..
हू हम तो चीज़ हैं कमाल की, पहचान लो..
यार जाके हुस्न वालो से, यह जान लो..
हम ने ही तो लड़कियों का दिल, है धड़काया..
अपने चर्चे अख़बार में..
छपते रहते हैं प्यार में
अपने चर्चे अख़बार में..
छपते रहते हैं प्यार में..
विश को हम तो करते हैं, अपने हिसाब से
हम पे यकीन ना हो तो, पूछ लो जनाब से..
ओ हम तो चले झूमते.. हां
दायें बायें घूमते..
मस्ती फुल ओंन रे..
रोकेगा कौन रे..(रिपीट वन्स)
हम ना छोड़े.. तोड़े.. फोड़ें..
जो भी हम से पंगा ले..
हम ना छोड़े, तोड़े.. फोड़े..
जो भी हम से पंगा ले..
(ऐ ताउ बॉस चला गया..
अब काहें की उछल कूद)

लिरिक्स: हम ना तोड़े बॉस सॉंग
संगीत निर्देशक- पी ए दीपक
गीत-कुमार
गायक-विशाल ददलानी
2

Pitah Se Hai Naam Tera


Terena derana.. aa..
Pitah se hai naam tera..
Pitah pahchaan teri..
Jiye jis sahare pe tu..
Pitah se wo saans mili..
Hai pitah.. (Hai pitah..)
Rab tera.. (Rab tera..)

Ishwar Allah..
Jitne bhi rab hain..
Noor tera..
Tujh mein hi sab hain (Repeat once)

Rab hai hai
Tu hi sab hai hai (Repeat once)

Pitah ka mol hai kya
Paas rahke jaana nahin
Pyar pitah se karun
Yeh keh na payein kabhi
Hai pita.. sab tera..

Ishwar Allah..
Jitne bhi rab hain..
Noor tera..
Tujh mein hi sab hain (Repeat once)

Pita ke aashirwad se
Tune sab kuchh paya hai
Kya lekar tu aaya jag mein
Aur kya toone kamaya hai (Repeat once)

Pitah ka rutba sabse uncha
Rab ke roop saman hai
Pitah ki Ungli thaam ke chalo toh
Rasta bhi aasan hai
Pitah ka saayan sir pe ho tu
Kadmo mein aakash hai
Pitah hai poonji, kho jaye to
Phir kya tere paas hai

Pitah bina na hasti teri
Na koi tera thikana hai
Pitah ke naam se aana jag mein
Pitah ke naam se jana hai (Repeat once)

Ishwar Allah..
Jitne bhi rab hain..
Noor tera..
Tujh mein hi sab hain (Repeat once)


Lyrics: Pitah Se Hai Naam Tera – Boss Song
Music Director: Meet Bros Anjan Ankit
Lyrics: Kumaar
Singer: Sonu Nigam, Meet Bros Anjan Ankit


2
पितः से है नाम तेरा



तेरेना डेरना.. आ..
पिता से है नाम तेरा..
पिता पहचान तेरी..
जिए जिस सहारे पे तू..
पिता से वो साँस मिली..
है पितः.. (है पिता..)
रब तेरा.. (रब तेरा..)
ईश्वर अल्लाह..
जितने भी रब हैं..
नूर तेरा..
तुझ में ही सब हैं (रिपीट वन्स)


रब है है
तू ही सब है है (रिपीट वन्स)
पिता का मोल है क्या
पास रह के जाना नहीं
प्यार पिता से करूँ
यह कह ना पायें कभी

है पिता.. सब तेरा..

ईश्वर अल्लाह..
जितने भी रब हैं..
नूर तेरा..
तुझ में ही सब हैं (रिपीट वन्स)
पिता के आशीर्वाद से
तूने सब कुछ पाया है
क्या लेकर तू आया जग में
और क्या तूने कमाया है (रिपीट वन्स)
पिता का रुतबा सबसे उँचा
रब के रूप समान है
पिता की उंगली थाम के चलो तो
रास्ता भी आसान है
पिता का साया सिर पे हो तो
कदमो में आकाश है
पिता है पूंजी, खो जाए तो
फिर क्या तेरे पास है
पिता बिना ना हस्ती तेरी
ना कोई तेरा ठिकाना है
पिता के नाम से आना जग में
पितः के नाम से जाना है (रिपीट वन्स)
ईश्वर अल्लाह..
जितने भी रब हैं..
नूर तेरा..
तुझ में ही सब हैं (रिपीट वन्स)

लिरिक्स: पिता से है नाम तेरा बॉस सॉंग
म्यूज़िक डाइरेक्टर: मीत ब्रदर्स अंजन अंकित
लिरिक्स: कुमार
सिंगर: सोनू निगम, मीत ब्रदर्स अंजन अंकित
3

Party All Night Lyrics


Aaj botlaan khullan do
Daru sharu ghullan do
Whisky da pack laga ke
Saari duniya bhullan do

Party all night, party all night, party all night
We do party all night

Sun lo sari duniya waalon
Jitna bhi tum zor lagalo
Karenge party sari raat
Gaand mein dum hai toh band karwa lo..

Party all night, party all night, party all night
We do party all night

Sun lo sari duniya waalon
Jitna bhi tum zor lagalo
Karenge party sari raat
Gaand mein dum hai to band karwa lo..

Aaj botlaan khullan do
Daru sharu ghullan do
Whisky da pack laga ke
Saari duniya bhullan do

Bajate raho sabki, bajate raho sabki
Bajate raho sabki, bajate raho..

Party all night, party all night, party all night
We do party all night (Repeat once)

Jisne bhi party hai karni..
Aa jao mere ghar ke bheetar..
Daaru liquor, khane ko hai murga bheetar
Noida, Gurgaon, Dilli ki chhoriyaan aayi hain
Sath mein yo yo ki CDyaan bhi layi hain
Sawari saman ki id khud zimmedaar hain
Kar lo party sari raat, kal itwaar hai
Music bajega loud, toh aunti police bula legi..
Ib aunty ne jake kah do, ye party yoon hi chalegi

Party all night, party all night, party all night..
We do party all night

Aunty police bula legi, aunty police bula legi
Aunty police bula legi, aunty police bula legi
Phir bhi party yoon hi chalegi
Party yun hi chalegi, party yun hi chaleg, party yun hi chaleg
Ib party yun hi chaleg..

Sun lo sari duniya waalon
Jitna bhi tum zor lagalo
Karenge party sari raat
Gaand mein dum hai toh band karwa lo..

Aaj botlaan khullan do
Daru sharu ghullan do
Whisky da pack laga ke
Saari duniya bhullan do

Bajate raho sabki, bajate raho sabki
Bajate raho sabki, bajate raho..

Party all night, party all night, party all night
We do party all night

Khulli daru khulla khana
Har koi bole ghar nahi jaana
Daddy ko tu karde message
Aaja ri karke bahana
Party hori bahut bhayankar
Party ke gazab nazaare
Dikkath hai bas ek baat ki
Gaanv mein hai kayi taau kunware
Nikkar wali ne ye
Vodka chada rakhi hai
Ek katam na hori iss se
Doosri mangwa rakhi hai
Naach dekh ri kaise
aag si laga rakhi hai
Ithni si toh hai ri hai
Aafat macha rakhi hai



Party all night, party all night, party all night
We do party all night

Aunty police bula legi, aunty police bula legi
Aunty police bula legi, aunty police bula legi
Phir bhi party yoon hi chalegi
Party yoon hi chalegi, party yoon hi chalegi, party yoon hi chalegi
Party yoon hi chalegi..

Sun lo sari duniya waalon
Jitna bhi tum zor lagalo
Karenge party sari raat
Gaand mein dum hai toh band karwa lo..

Aaj botlaan khullan do
Daru sharu ghullan do
Whisky da pack laga ke
Saari duniya bhullan do

Bajate raho sabki, bajate raho sabki
Bajate raho sabki, bajate raho..

Aunty police bula legi, aunty police bula legi
Aunty police bula legi, aunty police bula legi
Phir bhi party yoon hi chalegi
Party yoon hi chalegi, party yoon hi chalegi, party yoon hi chalegi
Party yoon hi chalegi..


Lyrics: Party All Night – Boss Song
Music Director: Yo Yo Honey Singh
Lyrics: Sahil Kaushal-Lill Gollu
Singer: Yo Yo Honey Singh

3
पार्टी ऑल नाइट लिरिक्स




आज बोतलां खुल्लन दो
दारू शारु घुल्लन दो
विस्की दा पैग लगा के
सारी दुनिया भुल्लन दो
पार्टी ऑल नाइट, पार्टी ऑल नाइट, पार्टी ऑल नाइट
वी डू पार्टी ऑल नाइट

सुन लो सारी दुनिया वालों
जितना भी तुम ज़ोर लगा लो
करेंगे पार्टी सारी रात

गांड में दम है तो बंद करवा लो..
पार्टी ऑल नाइट, पार्टी ऑल नाइट, पार्टी ऑल नाइट
वी डू पार्टी ऑल नाइट

सुन लो सारी दुनिया वालों
जितना भी तुम ज़ोर लगलो
करेंगे पार्टी सारी रात
गांड में दम है तो बंद करवा लो..
आज बोतलां खुल्लन दो
दारू शारु घुल्लन दो
विस्की दा पैग लगा के
सारी दुनिया भुल्लन दो
बजाते रहो सबकी, बजाते रहो सबकी
बजाते रहो सबकी, बजाते रहो..

पार्टी ऑल नाइट, पार्टी ऑल नाइट, पार्टी ऑल नाइट
वी डू पार्टी ऑल नाइट (रिपीट वन्स)

जिसने भी पार्टी है करनी..
आ जाओ मेरे घर के भीतर..
दारू लिकर, खाने को है मुर्गा भीतर
नोयडा, गुड़गांव, दिल्ली की छोरियाँ आई हैं
साथ में यो यो की सीडीयां भी लाई हैं
सवारी समान की ईद खुद ज़िम्मेदार हैं
कर लो पार्टी सारी रात, कल इतवार है
म्यूज़िक बजेगा लाउड, तो आंटी पोलीस बुला लेगी..
इब आंटी ने जाके कह दो, ये पार्टी यूं ही चलेगी
पार्टी ऑल नाइट, पार्टी ऑल नाइट, पार्टी ऑल नाइट..
वी डू पार्टी ऑल नाइट
आंटी पोलीस बुला लेगी, आंटी पोलीस बुला लेगी
आंटी पोलीस बुला लेगी, आंटी पोलीस बुला लेगी
फिर भी पार्टी यूं ही चलेगी
पार्टी यूँ ही चलेगी, पार्टी यूँ ही चलेगी, पार्टी यूँ ही चलेगी
इब पार्टी यूँ ही चलेग..

सुन लो सारी दुनिया वालों
जितना भी तुम ज़ोर लगा लो
करेंगे पार्टी सारी रात
गांड में दम है तो बंद करवा लो..
आज बोतलां खुल्लन दो
दारू शारु घुल्लन दो
विस्की दा पैग लगा के
सारी दुनिया भुल्लन दो
बजाते रहो सबकी, बजाते रहो सबकी
बजाते रहो सबकी, बजाते रहो..
पार्टी ऑल नाइट, पार्टी ऑल नाइट, पार्टी ऑल नाइट
वी डू पार्टी ऑल नाइट
पार्टी ऑल नाइट, पार्टी ऑल नाइट, पार्टी ऑल नाइट
वी डू पार्टी ऑल नाइट
खुल्ली दारू खुल्ला खाना
हर कोई बोले घर नही जाना
डॅडी को तू कर दे मैसेज
आजा री करके बहाना
पार्टी होरी बहुत भयंकर
पार्टी के ग़ज़ब नज़ारे
दिक्कत है बस एक बात की
गाँव में है कई ताउ कुंवारे
निक्कर वाली ने ये
वोदका चढ़ा रखी है
एक खतमम ना हो री इस से
दूसरी मंगवा रखी है
नाच देख री कैसे
आग सी लगा रखी है
इतनी सी तो है री है
आफ़त मचा रखी है
पार्टी ऑल नाइट, पार्टी ऑल नाइट, पार्टी ऑल नाइट
वी डू पार्टी ऑल नाइट


आंटी पोलीस बुला लेगी, आंटी पोलीस बुला लेगी
आंटी पोलीस बुला लेगी, आंटी पोलीस बुला लेगी
फिर भी पार्टी यूं ही चलेगी
पार्टी यूं ही चलेगी, पार्टी यूं ही चलेगी, पार्टी यूं ही चलेगी
पार्टी यूं ही चलेगी..
सुन लो सारी दुनिया वालों
जितना भी तुम ज़ोर लगलो
करेंगे पार्टी सारी रात
गांड में दम है तो बंद करवा लो..
आज बोतलां खुल्लन दो
दारू शारु घुल्लन दो
विस्की दा पैग लगा के
सारी दुनिया भुल्लन दो
बजाते रहो सबकी, बजाते रहो सबकी
बजाते रहो सबकी, बजाते रहो..

आंटी पोलीस बुला लेगी, आंटी पोलीस बुला लेगी
आंटी पोलीस बुला लेगी, आंटी पोलीस बुला लेगी
फिर भी पार्टी यूं ही चलेगी
पार्टी यूं ही चलेगी, पार्टी यूं ही चलेगी, पार्टी यूं ही चलेगी
पार्टी यूं ही चलेगी..

लिरिक्स: पार्टी ऑल नाइट बॉस सॉंग
म्यूज़िक डाइरेक्टर: यो यो हनी सिंग
लिरिक्स: साहिल कौशल-लिल्ल गोल्लू
सिंगर: यो यो हनी सिंह
4

Har Kisi Ko

Do lafz ki hai
Baat ek hi hain
Kyun darmiyaan phir
Ruki ruki..
Keh bhi paayein
Reh bhi na paayein
Kyun bewajah hai
Yeh bebasi

Tum mein hum hain
Hum mein tum ho
Tumse hum hain
Humse tum ho
Kismaton se milte hain do dil yahaan

Har kisi ko nahi milta
Yahan pyaar zindagi mein
Har kisi ko nahi milta
Yahan pyar zindagi mein

Khushnaseeb hain hum
Jinko hai mili
Yeh bahaar zindagi mein

Har kisi ko nahi milta
Yahan pyaar zindagi mein

Pyar na ho toh, zindhgi kya hai
Yaar na ho to, bandhgi kya hai (Repeat once)

Tujhse hi har khushi hai
Tere gham se ashiqui hai jaanle

Mil jaye hum toh, sab kuch sahi hai
Phir is tarah kyun, Hai Ajnabi

Tum mein hum hain
Hum mein tum ho
Tumse hum hain
Humse tum ho
Kismaton se milte hain do dil yahaan

Har kisi ko nahi milta
Yahan pyar zindagi mein
Har kisi ko nahi milta
Yahan pyaar zindagi mein

Tu mohabbat hai, ishq hai mera
Ek ibaadat hai, saath ye tera.. (Repeat once)

Jab dil se dil mile hain
Phir kyun ye faaslein hai is tarah

Ha bolu de tu
Ya boludoon mein
Kab tak chupaein
Ye bekhudi

Tum mein hum hain, hum mein tum ho
Tumse hum hain, humse tum ho
Kismaton se milte hain do dil yahaan

Har kisi ko nahi milta
Yahan pyar zindagi mein
Har kisi ko nahi milta
Yahan pyar zindagi mein


Lyrics: Har Kisi Ko – Boss Song
Music Director: Chirantan Bhatt
Lyrics: Manoj Yadav
Singer: Nikhil D’Souza


4


हर किसी को

दो लफ्ज़ की है
बात एक ही हैं
क्यूँ दरमियाँ फिर
रुकी रुकी..
कह भी पायें
रह भी ना पायें
क्यूँ बेवजह है
यह बेबसी
तुम में हम हैं
हम में तुम हो
तुमसे हम हैं
हम से तुम हो
किस्मतों से मिलते हैं दो दिल यहाँ
हर किसी को नही मिलता
यहाँ प्यार ज़िंदगी में
हर किसी को नही मिलता
यहाँ प्यार ज़िंदगी में
खुशनसीब हैं हम
जिनको है मिली
यह बहार ज़िंदगी में
हर किसी को नही मिलता
यहाँ प्यार ज़िंदगी में
प्यार ना हो तो, ज़िंढ़गी क्या है
यार ना हो तो, बंदगी क्या है (रिपीट वन्स)

तुझसे ही हर खुशी है
तेरे गम से आशीकी है जान ले
मिल जाए हम तो, सब कुछ सही है
फिर इस तरह क्यूँ, है अजनबी
तुम में हम हैं
हम में तुम हो
तुमसे हम हैं
हम से तुम हो
किस्मतों से मिलते हैं दो दिल यहाँ
हर किसी को नही मिलता
यहाँ प्यार ज़िंदगी में
हर किसी को नही मिलता
यहाँ प्यार ज़िंदगी में

तू मोहब्बत है, इश्क़ है मेरा
एक इबादत है, साथ ये तेरा.. (रिपीट वन्स)
जब दिल से दिल मिले हैं
फिर क्यूँ ये फासलें है इस तरह


हां बोलू दे तू
या बोलूं मैं
कब तक छंपाएं
ये बेखुदी
तुम में हम हैं, हम में तुम हो
तुमसे हम हैं, हुंसे तुम हो
किस्मतों से मिलते हैं दो दिल यहाँ
हर किसी को नही मिलता
यहाँ प्यार ज़िंदगी में
हर किसी को नही मिलता
यहाँ प्यार ज़िंदगी में

लिरिक्स: हर किसी को बॉस सॉंग
म्यूज़िक डाइरेक्टर: चिरंतन भट्ट
लिरिक्स: मनोज यादव
सिंगर: निखिल डिसूज़ा
5

Boss Lyrics

Make wait for the Boss.. (Boss.. Boss..)
Yo mother brother you listen up..

Wo.. hai gali gali mein shor..
Hai boss mein itna zor..
Ek baar bhadak jaaye..
Toh dharti dega tod..

Humm mere mister jaise tevar..
Har koi leta favor..
Apni approach unchi..
Hum toh hain duniya ke Boss..

Habbit aphi hai desi
Takhto mein full hai ac
Music sunte hain high
Hum toh hai duniya ke Boss..

Boss.. Hai hukm ka ikka Boss
Hai laakhon ka sikka Boss
Har jagah pe likha Boss
Hai Boss.. hai Boss.. hai Boss.. hai Boss..

Boss six pack ka shahanshah.. Boss
Bas brand pahanta Boss
Attitude se banta Boss
Boss B Boss..

(Boss ka khoon Bolta nahi khaulta hai
Aur jab yeh khaulta hai
Toh ye Boss ek ek ko phodta hai..)

Ab apni ke tareef karun
Uper wale se main darun
Je koi banega Landlord
Unhe maar ghused neeche main dharun

Hum Hariyaana ke eklautte King..
Bolte apni bahan fall..
Arrey apne ko koi fark nahi padta..
Wo hi hai sabka karta dharta..

Dil ka hoon thoda rangeen..
Par bhains ke aage na bajata bean..
Mujhko to tu aa gayi pasand..
Common baby don’t be mean..

Aaja tainne sair kara doon
Unchi Loongi tanne diva doon
Akshay Kumar toh bhai hai apna
Bol to sahi photo kara doon

Boss.. hai hukm ka ikka Boss
Hai laakhon ka sikka Boss
Har jagah pe likha Boss
Hai Boss.. hai Boss.. hai Boss.. hai Boss..

Boss six pack ka shahanshah.. Boss
Bas brand pahanta Boss
Attitude se banta Boss
Boss B Boss..

Hey hey sun lo sare
Yeah hain boss hamare
Hain dharenge tagde
Jhatka ne maare


Lyrics: Boss – Title Song
Music Director: Meet Bros Anjjan
Lyrics: Kumaar
Singer: Yo Yo Honey Singh, Meet Bros Anjjan

5

बॉस लिरिक्स

मेक वेट फॉर द बॉस.. (बॉस.. बॉस..)
यो मदर ब्रदर योउ लिसन अप..
वो.. है गली गली में शोर..
है बॉस में इतना ज़ोर..
एक बार भड़क जाए..
तो धरती देगा तोड़..

हुम्म मेरे मिसटर जैसे तेवर..
हर कोई लेता फेवर..
अपनी अप्रोच उँची..
हम तो हैं दुनिया के बॉस..

हैबिट आफ़ि है देसी
तखतो में फुल है एसी
म्यूज़िक सुनते हैं हाइ
हम तो है दुनिया के बॉस..
बॉस.. है हुक्म का इक्का बॉस
है लाखों का सिक्का बॉस
हर जगह पे लिखा बॉस
है बॉस.. है बॉस.. है बॉस.. है बॉस..

बॉस सिक्स पॅक का शहंशाह.. बॉस
बस ब्रांड पहनता बॉस
एटीट्यूड से बनता बॉस
बॉस बी बॉस..
(बॉस का खून बोलता नही खौलता है
और जब यह खौलता है
तो ये बॉस एक एक को फोड़ता है..)
अब अपनी के तारीफ करूँ
ऊपर वाले से मैं डरूँ
जे कोई बनेगा लॅंडलॉर्ड
उन्हे मार घुसेड़ नीचे मैं धरूं
हम हरियाणा के एकलौते किंग..
बोलते अपनी बहन फॉल..
अर्रे अपने को कोई फ़र्क नही पड़ता..
वो ही है सबका कर्ता धर्ता..

दिल का हूँ तोड़ा रंगीन..
पर भैंस के आगे ना बजता बीन..
मुझको तो तू आ गयी पसंद..
कामन बेबी डॉंट बी मीन..
आजा तैनें सैर करा दूं
उँची लूँगी तनने दिवा दूं
अक्षय कुमार तो भाई है अपना
बोल तो सही फोटो करा दूं
बॉस.. है हुक्म का इक्का बॉस
है लाखों का सिक्का बॉस
हर जगह पे लिखा बॉस
है बॉस.. है बॉस.. है बॉस.. है बॉस..
बॉस सिक्स पॅक का शहंशाह.. बॉस
बस ब्रांड पहनता बॉस
एटीट्यूड से बनता बॉस
बॉस ब बॉस..
हे हे सुन लो सारे
यॅ हैं बॉस हमारे
हैं धरेंगे तगड़े
झटका ने मारे

लिरिक्स: बॉस टाइटल सॉंग
म्यूज़िक डाइरेक्टर: मीत ब्रदर्स अंजान
लिरिक्स: कुमार
सिंगर: यो यो हनी सिंग, मीत ब्रदर्स अंजान
6

Boss Ganpati Mix

Ganpati Bappa Morya
Morya..
Urja varshi lavkar ya

Hmm..
Bappa ke aisi tewar
Karte hain sab pe fever
Chalti hai inki marzi
Yeh to hai duniya ke boss

Shristi ki hai ye data
Sab ke hai ye vidhata
Sunte hai sab ki arzi
Yeh to hai duniya ke boss

Boss.. Hai hukum ka ika
Boss.. Hai Ganpati Bappa
Boss.. Har jagah pe likha
Boss up, Boss up, Boss up, Boss up..

Boss.. pandaal mein aaye
Boss.. Har jagah pe chaaye
Boss.. Dil chahe na jaaye
Boss Boss Ba Boss..

Ganpati Bappa Morya
Hmm…
Bappa dhurandhar
Duniya hai inke andar
Inke order se
Badlein har saal calendar

All world mein inka danka
Phoonke ye dushman ki lanka
Choor kare ye har ashanka
Hai apna waade ka pakka

Boss.. Hay hukum ka ika
Boss.. Hay Ganpati Bappa
Boss.. Har jagah pe likha.. Boss
Boss up, Boss up, Boss up, Boss up..

Boss.. Har nou din aaye
Boss.. Har jagah pe chaaye
Boss.. Dil chahe na jaaye
Boss Boss Ba Boss..

Ganpati Bappa Morya
Urja varshi lavkar ya


Lyrics: Boss Ganpati Mix – Boss Song
Music Director: Meet Bros Anjan Ankit
Lyrics: Akshay Kumar
Singer: Meet Bros Anjan Ankit


6

बॉस गणपति मिक्स

गणपति बप्पा मोरया
मोरया..
उद्या वर्षी लवकर या
ह्म..
बप्पा के ऐसी तेवर
करते हैं सब पे फेवर
चलती है इनकी मर्ज़ी
यह तो है दुनिया के बॉस
श्रृष्टि की है ये दाता
सब के है ये विधाता
सुनते है सब की अर्ज़ी

यह तो है दुनिया के बॉस

बॉस.. है हुकुम का ईका
बॉस.. है गणपति बप्पा
बॉस.. हर जगह पे लिखा
बॉस अप, बॉस अप, बॉस अप, बॉस अप..
बॉस.. पंडाल में आए
बॉस.. हर जगह पे छाए
बॉस.. दिल चाहे ना जाए
बॉस बॉस बा बॉस..
गणपति बप्पा मोरया

ह्म
बप्पा धुरंधर
दुनिया है इनके अंदर
इनके ऑर्डर से
बदलें हर साल कॅलंडर
ऑल वर्ल्ड में इनका डंका
फूँके ये दुश्मन की लंका
चूर करे ये हर आशंका
है अपना वादे का पक्का
बॉस.. हे हुकुम का इक्‍का
बॉस.. हे गणपति बप्पा
बॉस.. हर जगह पे लिखा.. बॉस
बॉस अप, बॉस अप, बॉस अप, बॉस अप..
बॉस.. हर नौ दिन आए
बॉस.. हर जगह पे छाए
बॉस.. दिल चाहे ना जाए
बॉस बॉस बा बॉस..
गणपति बप्पा मोरया
उद्या वर्षी लवकर या

लिरिक्स: बॉस गणपति मिक्स बॉस सॉंग
म्यूज़िक डाइरेक्टर: मीत ग्रदर्स अंजन अंकित
लिरिक्स: अक्षय कुमार
सिंगर: मीत ब्रदर्स अंजन अंकित