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Monday, September 30, 2013

राम-लीला में प्रियंका चोपड़ा


संवाद और संवेदना की रेसिपी और लंचबॉक्स :सुदीप्ति

यह सिर्फ 'लंचबॉक्स' फिल्म की समीक्षा नहीं है. उसके बहाने समकालीन मनुष्य के एकांत को समझने का एक प्रयास भी है. युवा लेखिका सुदीप्ति ने इस फिल्म की संवेदना को समकालीन जीवन के उलझे हुए तारों से जोड़ने का बहुत सुन्दर प्रयास किया है. आपके लिए- जानकी पुल.से साभार और साधिकार
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पहली बात: इसे‘लंचबॉक्स’ की समीक्षा कतई न समझें. यह तो बस उतनी भर बात है जो फिल्म देखने के बाद मेरे मन में आई.

अंतिमबात यानी कि महानगरीय आपाधापी में फंसे लोगों से निवेदन:इससे पहले कि ज़िंदगी उस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दे, जहाँ खुशियों का टिकट वाया भूटान लेना पड़े, कम-से-कम ‘लंचबॉक्स’ देख आईये.

अंदर की बात:दरअसल कोई भी फिल्म मेरे लिए मुख्यत: दृश्यों में पिरोयी गई एक कथा की तरह है.माध्यम और तकनीक की जानकारी रखते हुए किसी फिल्म का सूक्ष्म विश्लेषण एक अलग और विशिष्ट क्षेत्र है,जानती हूँ. फिर भी कुछ फ़िल्में ऐसी होती हैं,जिन्हें देख आप जो महसूस करते हैं उसे ज़ाहिर करने को बेताब रहते है. ऐसी ही एक फिल्म है ‘लंचबॉक्स’.

‘लंचबॉक्स’ में तीन मुख्य किरदार हैं- मि.साजन फर्नांडिस(इरफ़ान खान), इला(निमरत कौर) और शेख(नवाजुद्दीन सिद्दीकी). तीनों की तीन कहानियां हैं और ये मुख्य कथा में जीवन के प्रति अपना भिन्न दृष्टिकोण लेकर आते हैं. मि.फर्नांडिस अपने अकेलेपन में स्वनिर्वासन झेल रहे हैं. उम्मीद, हंसी और अपनत्व से रहित उनका जीवन डब्बे के बेस्वाद खाने की तरह है. जब वो दूसरी बार इला का भेजा लंचबॉक्स खा चिट्ठी का जवाब ‘द फ़ूड वाज साल्टी टुडे’ भेजते हैंतो यह जैसे उनके जीवन में नमक और लावण्य का प्रवेश है.

इला अपनी चिट्ठियों में मुखर और खुली हुई है क्योंकि “चिट्ठियों में तो कोई कुछ भी लिख सकता है.”आरम्भ से ही वह अपनी उदासी छिपाने की कोशिश नहीं करती. पति लंच सफाचट कर नहीं भेजता और उसे परवाह भी नहीं- यह बात पहली चिट्ठी में ही लिखने से नहीं झिझकती. अपनी ओर से वह पति के साथ संवाद बढ़ाने को प्रयासरत है. व्यवहार में आए ठंडेपन को मसालों के स्वाद से छूमंतर कर देना चाहती है. तभी तो रेडियो पर रोज़ नई रेसेपी सुनना, पूरे मनोयोग से लंच तैयार करना और देशपांडे आंटी से नुस्खे लेना उसकी कोशिशों में शामिल है.पर ये सब काम नहीं आता, बावजूद इसके कि आंटी मैजिक होने का भरोसा देती हैं.

शेख अनाथ है. उसकी जिजीविषा काबिले-तारीफ है.उसकी कहानी फिल्म को हंसी से सराबोर करती है, सहज बनाती है. लोकल ट्रेन में सब्जी काटने से लेकर नौकरी जाने के भय, मि.फर्नांडिस द्वारा बचाये जाने और उसके खिलंदड़े स्वभाव के लौटने के बीच हास्य के कई दृश्य हैं.

फिल्म का मेरा पहला पसंदीदा दृश्य है— मि.फर्नांडिस जब गलती से मिले सही डब्बे को खोलते हैं, डब्बा सर्विस के खाने से ऊब चुके व्यक्ति के नीरस जीवन में नई खुशबू, नया स्वाद आ जाता है. उनके पूरे शरीर में उत्सुकता की लहर दौड़ पड़ती है. बार-बार रोटियों को उलटते-पलटते वह चावल-सब्जी के डब्बों को सूंघते  हैं. उनके चारों ओर देखिये तो सभी किसी-न-किसी के साथ बैठे हैं, पर वे अकेले हैं, निपट अकेले. इस अकेलेपन ने उनके स्वभाव को रुखा बना दिया है.मोहल्ले के बच्चों और सहकर्मियों से उनके व्यवहार को देख, उनके बारे में प्रचलित धारणाओं को जान हमें आभास हो जाता है कि मि. फर्नांडिस महानगरीय जीवन की एकरसता में डूबे एकाकीपन का प्रतिनिधि चरित्र है. वाकई सभी कहीं पहुँचने की ऐसी जिद्द में हैं कि अपने को ही खो देते हैं. जो इस भागमभाग में नहीं हैं, वे दूसरोंकी भाग-दौड़ में पीछे और अकेले छूट जाते हैं. इससे पहले कि हम बिलकुल अकेले पड़ जाएँ यह फिल्म मौका देती है ठहर कर सोचने का कि आखिर सारी भाग-दौड़ का हासिल क्या?

दूसरा दृश्य ठीक इसके बाद का है. इला डब्बे के लौटने के बेसब्र इंतजार में है और दरवाजे पर आहट पाते ही लपक कर डब्बा उठाती है. हिलाने-डुलाने से उसे लगता है कि आज तो चमत्कार हो गया. खोलकर देखने पर उमंग-उछाह से भर वह देशपांडे आंटी को बताने पहुँच जाती है कि आज डब्बा चाट-पोंछकर खाया गया है. आंटी भी चहककर जवाब देती हैं कि “मैंने कहा था न, ये नुस्खा काम करेगा.” पति के आने पर उससे कुछ सुनने की आस लगायी हुई इला निराश हो, खुद ही लंच के बारे में पूछती है. पति ‘अच्छा था’ का नपा-तुला जवाब देता है. नाप-तौल से वस्तु-विनिमय तो होता है, भाव-विनिमय नहीं होता. इला कुछ और सुनना चाहती है. बेरुखी को दरकिनार कर बात पगाने का फिर प्रयास करती है, बेपरवाह पति डब्बे में ‘आलू-गोभी’ होने की बात कह वहां से चला जाता है.
संवादहीनता का आलम यह है कि इला पति को बता भी नहीं पाती कि उसका बनाया लंचबॉक्स उसे मिला ही नहीं है.भारतीय समाज के बहुतेरे परिवारवादी, नैतिकतावादी यह कह सकते हैं कि देखो ‘बेचारा’ पति पत्नी और बच्चों के लिए इतनी मेहनत करता है, मुंह अँधेरे उठकर जाता है, देर रात को आता है और यह औरत बता भी नहीं रही कि उसकी गाढ़ी मेहनत की कमाई से बनाया लंच किसी और ने खाया होगा. अब ऐसी कमाई किस काम की कि परिवार से दो बातें करने भर की मोहलत ना हो! औरत तो कह भी रही है कि अब हमारे पास कितना कुछ है. सामान बढ़ाते जाने का क्या लाभ जब उसे भोगने का वक्त नहीं? पर ध्यान कौन देता है. परवाह किसको है घर में बंधी औरत का!

ऐसे पति को क्या सजा नहीं मिलनी चाहिए जिसे शादी के छह-सात साल बाद भी अपनी पत्नी के हाथ के बने खाने का स्वाद तक की पहचान नहीं? खैर, इस गफलत से ही सही, गलत ट्रेन के दो तनहा मुसाफिर सही तरीके से एक दूसरे की ज़िंदगी में शामिल हो जाते हैं. चिट्ठी पहले इला ही भेजती है. अपनेपन से भरी औपचारिक चिट्ठी कैसे लिखी जाती है, यह इला की पहली चिट्ठी से पता चलता है.
एक दृश्य है जिसमें शेख मि.फर्नांडिस के पास आकर कहता है कि “सब कहते हैं आप मुझे कभी नहीं सिखाएंगे. मैं अनाथ हूँ. बचपन से सबकुछ अपने-आप सीखा है. यह भी सीख लूँगा.”यहीं से वह दुर्गम किले से दिखनेवाले फर्नांडिस के जीवन में घुसपैठ कर लेता है. ट्रेन की उनकी यात्राएँ और ‘पसंदा’ खिलाने घर ले जाना सब एक क्रम में होता है. पहली बार जब शेख फर्नांडिस को घर बुलाता है तब लगता है कि यह काम निकालने की तरकीब है, लेकिन दफ्तर, लंचटाइम और रेलयात्रा के एक जैसे लगते कई दृश्यों से उन दोनों का एक सहज संबंध विकसित होता है. यह भी साफ़ हो जाता है कि शेख निश्छल स्वभाव का, लेकिन चतुर और आशावादी व्यक्ति है. आज की मतलबी दुनिया में ऐसे लोग कम ही है.

‘लंचबॉक्स’ में चार स्त्री किरदार हैं— इला, देशपांडे आंटी, इला की माँ और मि.फर्नांडिस की मर चुकी पत्नी. मि.फर्नांडिस की मृत पत्नी एक जीवित पात्र की तरह फिल्म में मौजूद है. एक पूरा दृश्य उसके साथ मि.फर्नांडिस के संबंध पर केंद्रित है. मरी हुई पत्नी से उन्हें जितना लगाव है, उतना इला के पति को उससे होता तो क्या बात थी! खैर,रात भर फर्नांडिस पत्नी के पसंदीदा रिकार्डेड वीडियो को देखते हैं और पुरानी साइकिल पर हाथ फेरते समय उसके हंसते हुए चेहरे के टीवी स्क्रीन पर उभरते प्रतिबिम्ब को अब याद करते हैं तो हमारे सामने उनके भावुक व्यक्तित्व की तहें खुल जाती हैं.

इला की माँ के साथ इला के दो दृश्य हैं और दोनों अद्भुत. पहला वह जिसमें पति के अफेयर के शुबहे से टूटी इला अपनी माँ के पास जाती है परन्तु वहां माँ की हालत देख चुप्प रह जाती है. ऐसी ही तो होती हैं बेटियां, अक्सरहाँ. गम खा न रोने वालीं. दवा के लिए रुपयों की बात चलती है. टी.वी. बिकने और भाई का हवाला आने के बीच इला रुपयों से मदद की बात करती है. पीछे के दृश्य में हम देख चुके हैं कि पति उसे भाई का ताना दे चुका है और मदद करने की हालत में इला है नहीं.माँ जब मना करती है तो उसके चेहरे पर राहत का भाव आता है तभी माँ का जवाब बदल जाता है. उस क्षण बेटी होने की तकलीफ, मदद ना कर पाने की लाचारगी और जीवन के अनगिनत असमंजस इला के चेहरे पर एक साथ उभरते हैं.निमरत ने इस क्षण को इस खूबसूरती से अपने अभिनय में जिया है कि क्या कहें! पिता की मृत्यु के बाद माँ की  गफलत,बेचैनी और भूख के बीच इला घर में मौजूद लोगों के बीच उसके व्यवहार को संतुलित करने की जद्दोजहद में है. माँ बेटे के साथ पैसे का भी अभाव झेलती औरत है, जिसके लिए मृत्यु राहत की बात है.

माँ के बरक्स देशपांडे आंटी जीवंत, उम्मीद का दामन न छोड़ने वाली औरत हैं. बरसों से उनके पति कोमा में हैं पर उन्हें ज़िन्दा रखने की ज़िद्द में जेनरेटर खरीदने से लेकर चलता पंखा साफ़ करने तक का हौसला वे रखती हैं. ‘ज़िंदगी हर हाल में खूबसूरत है’— यही झलकता है उनकी खनकती आवाज़ से. शेख और देशपांडे आंटी जैसे किरदार अगर नहीं होते तो यह प्रेमकथा बोझिल और उदास होती. उनके होने भर से फिल्म भावों की विविधता से भरी है.

इरफ़ान के हिस्से कई तनाव भरे, बेचैनी और व्याकुलता को झलकाने वाले दृश्य आए हैं जिन्हें उन्होंने बखूबी निभाया है. उन्हें इला के पत्र में एक बार आखिरी पंक्ति यह मिली कि ‘तो किसलिए जिए कोई.’ अगली सुबह ऑटोवाले से पता चलता है कि एक ऊँची इमारत से एक औरत अपनी बच्ची समेत कूद गई है. वह अपनी भयमिश्रित व्याकुलता में उसका नाम पूछते हैं. अब ऑटोवाले को भला नाम क्या पता? उस दिन जबतक ‘लंचबॉक्स’ नहीं आ जाता और आने पर उसमें से इला के हाथों की खुशबू नहीं पहचान लेते, मि.फर्नांडिस बेचैन रहते हैं. इसी तरह सिगरेट छोड़ने की कोशिश करते हुए भी.

आप कल्पना कीजिए, वह आदमी अपने मन के अंतिम कोने तक कितना अकेला होगा, उसे किसी की परवाह की कितनी भूख होगी, जो एक अपरिचित औरत के प्यार से कहने भर से अपनी बरसों पुरानी लत छोड़ने की कोशिश कर रहा है? फिर अपने से काफी छोटी उम्र की इला को देख उसके जीवन से बाहर चले जाने की कोशिश के बाद रिटायरमेंट ले नासिक की ट्रेन में बैठने पर सामने बैठे भविष्य को देख पैदा हुई वह बेचैनी, जिसमें वह डब्बा वालों के साथ इला का घर ढूंढने निकल पड़ते हैं.

फिल्म का सबसे भयावह दृश्य वह है जिसमें इला की कल्पनाशीलता एक दु:स्वप्न का रूप लेती है. रात में वह गहने उतारती है, बेटी को उठाती है, उसकी आँखों पर पट्टी बांधती है और छत की सीढियाँ चढ़ती है. यह होता नहीं, बस उस अनाम औरत की आत्महत्या के बाद के पत्र में लिखा जाता है और फर्नांडिस की आँखों के आगे एक दृश्य की तरह उभरता है. उफ्फ, माएं किस क्षण में अपने बच्चों समेत करती हैं आत्महत्याएं! कितनी बेबसी के बाद, अवसाद के उन्माद में लेती होंगी यह फैसला? सोचना भी दुष्कर है.इला कूदने भर के साहस की बात कहती है, लेकिन मेरे लिए वह अवस्था साहस,विवेक,समझ— सबसे परे चरम उन्माद की स्थिति है.

फिल्म‘ओपन एंडेड’ है और ऐसी फिल्मों के साथ अच्छी और बुरी बात यही है कि आप अंत की कल्पना में खुश हो सकते हैं या खीझ सकते हैं. मैं जीवन में ट्रेजेडी को नहीं पसंद करती तो मेरे लिए यही अंत है कि तुकाराम को गाते हुए डब्बेवालों के साथ साजन फर्नांडिस इला के घर पहुँच जाते हैं और नासिक के बदले भूटान को निकल पड़ते हैं. उस भूटान को जहाँ हमारा रूपया भी पांच गुना अधिक मूल्य रखता है और खुशियाँ भी हमसे पांच गुना ज्यादा होती हैं. क्या कहते हैं, भूटान जाकर ही मिल सकती हैं खुशियाँ?

इस फिल्म में संवाद कम और छोटे हैं, पर इन छोटे संवादों के अर्थ और मर्म बड़े गहरे हैं. इला जब भूटान की बात लिखती है तब जवाब में मि.फर्नांडिस का सवाल आता है-“क्या मैं तुम्हारे साथ भूटान चल सकता हूँ?” इस एक सवाल से आत्मीयता से अनुराग तक की दूरी एक झटके में तय हो जाती है.


इस फिल्म में जो ज़ाहिर है वह सशक्त है और जो ज़ाहिर नहीं है वह बेहद मुखर है.याद कीजिये वह नि:संवाद दृश्य जब मि.फर्नांडिस किसी के सामने चिट्ठी देखना नहीं चाहते, पर खुद को रोक भी नहीं पाते. याद करिए उनके चेहरे का वह अबोला भाव जिसमें झिलमिल चमकता है उनका अत्यंत निजी गोपनीय आनंद, जिसे वे अपने भर में समेट लेना चाहते हैं. जो इला शुरुआत में देशपांडे आंटी से कहती है कि ‘मुझे ये सब ठीक नहीं लग रहा’, वही अपनी हंसी का राज छुपा लेती है. ‘साजन’ फिल्म के गाने का रहस्य तो बाद में खुलता है, बात हमें पहले समझ में आने लगती है. फर्नांडिस इला से मिलने पहुँचता है, उसको छुप कर देखता है. लेकिन इला की मुलाकात उससे नहीं होती. दोनों के बीच निकटता का संयोग फिल्म खत्म होने के बाद भी पक्के तौर पर नहीं घटित होता. फिर भी यह एक प्रेमकथा है.इससे पहले ‘स्लीपलेस इन सिएटल’ नामक एक रोमांटिक फिल्म मैंने देखी थी, जिसमें नायक-नायिका फिल्म के अंत में एक बार मिलते हैं पर फिल्म एक जबरदस्त प्रेमकथा है.पूरी फिल्म में मिसेज देशपांडे कहीं दिखतीं नहीं, लेकिन फिल्म में उनसे ज्यादा मुखर चरित्र भला कौन है, शेखको अगर भूल जाइये. मैं तो कहती हूँ कि संवाद और संवेदना की रेसिपी से तैयार इस ‘लंचबॉक्स’ का आस्वाद कभी भूलना संभव नहीं होगा.

Saturday, September 28, 2013

पन्ने से परदे तक – कहानी पिंजर और मोहल्ला अस्सी की : डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी



भारतीय साहित्य की दोंनों बहु चर्चित कृतियों का फिल्म के लिए लेखन कुछ आसान भी था और कठिन भी.
आसान इसलिए की दोंनों के पास एक पुख्ता ज़मीन थी.कथा की.चरित्रों की.चरित्रों  के विकास और उत्थन पतन की.और कथा के प्रवाह और चरित्रों में परिवर्तन की.
मुश्किल इसलिए की दोंनों की कथा का विस्तार और काल खंड विस्तृत था.दोंनों ही अपने समाज के इतिहास को अपने अंक में संजोये एक विशिष्ट काल और समाज की यात्रा पर ले जाते हैं.
पहले बात पिंजर की
अमृता प्रीतम की पिंजर में कथा का काल लगभग बारह साल से अधिक का है.
मूल कहानी सियाम ( वर्तमान थाईलेंड ) से प्रारंभ होती है.लगभग सन १९३५ का सियाम.कहानी की नायिका पूरो (उर्मिला मातोंडकर ) के पिता (कुलभूषण खरबंदा ) अपने परिवार सहित सियाम में रहते हैं.सन १९३५ के सियाम की पुनर्रचना खर्चीला भी था और सियाम के इतिहास और स्थापत्य का मेरा अध्ययन भी नहीं था.इसलिए विचार आया कि क्यों न परिवार की स्थापना अमृतसर में की जाये.यह आसान भी था और सियाम की तुलना में कम खर्चीला.१९३५ के अमृतसर की छबियाँ भी उपलब्ध थी और ऐसे बहुत से लोगों को ढूँढा भी जा सकता था जिन्होंने उस अमृतसर को देखा था.दूसरा यह मेरे अनुभव का हिस्सा भी था.हमारे परिवार रहते शहरों में थे पर विवाह के लिए गाँवों में जाते थे.लगभग ८० तक ऐसा आम तौर पर मैंने देखा था.आज स्थितियां दूसरी हैं.इसलिए पूरो के परिवार का पूरो के विवाह के लिए शहर अमृतसर से अपने गाँव छत्तोआनी (वर्तमान पाकिस्तान के एक गाँव में ) जाना मेरे लिए सहज और नैसर्गिक था.गाँव छत्तोआनी और रोजीरोटी कमाने का शहर अमृतसर.यह पहला बड़ा परिवर्तन स्क्रिप्ट में हुआ.
पर चुनौतियाँ और भी थी.मूल कथा में पूरो का भाई ( प्रियांशु चटर्जी ) छोटा है जो बड़ा होने पर बंटवारे के पहले अपने गाँव जाता है और रशीद (मनोज वाजपेयी) के खेतों को आग लगाता है.इसी समय वह अपनी पत्नी लाजो को उसके गाँव रत्तोवाल( वर्तमान पाकिस्तान का एक गाँव ) छोड़ आता है जो भारत पाकिस्तान के
विभाजन के दंगों में उठा ली जाती है.
लाजो (संदली सिन्हा ) मूल कहानी के रामचंद(संजय सूरी )की बहन है और रामचंद पूरो के अपहरण के बाद पूरो की बहन रज्जो (ईशा कोप्पिकर) से विवाह कर लेता है.
अमृता प्रीतम की कहानी में पूरो का भाई बंटवारे के बाद लाजो को लेने आता है ( सन १९५५ तक बंटवारे में जिन स्त्रियों का अपहरण हुआ था उन्हें उनके देश पहुँचाया गया था) और वह पूरो को भी पकिस्तान छोड़ अपने साथ चलने को कहता है.पूरो के इस समय बड़े बच्चे हैं.माता पिता को छोड़ सभी पात्र कहानी के अंत में आमने सामने हैं.पूरो,रशीद,रामचंद,पूरो का भाई त्रिलोक.मेरे सामने सबसे बड़ा सवाल था कि कहानी के इस मोड पर पूरो के सामने क्या चुनाव है.उसका मुल्क अब कहाँ हैं ? भारत या पकिस्तान ? अब पूरो रशीद के बच्चों की माँ है.इसलिए मैं चाहता था कि पूरो के लिए चुनाव और कठिन कर दिया जाये.यदि रामचंद अविवाहित रहता है तो पूरो वापस रामचंद के पास और भारत लौटने की उम्मीद कर सकती है.रामचंद के सामने भी प्रश्न खड़ा करना था कि यदि पूरो का भाई उसकी (रामचंद की) बहन को स्वीकार कर सकता है तो रामचंद क्यों नहीं.यह रामचंद के चरित्र का बड़ा भी करता है.रशीद के मन में भी दुविधा उत्पन्न करनी थी कि इस क्षण वह करे तो क्या करे ? क्षमा,प्रायश्चित,स्वीकृति,घृणा,प्रेम और आंसू सब एक साथ.
मैं यह स्थिति चाहता था इसलिए उम्र और रिश्तों के बड़े परिवर्तन मूल कहानी में किये.मेरी कहानी में पूरो का भाई बड़ा है.रामचंद विवाह नहीं करता.पूरो की छोटी बहन से रामचंद का चचेरा भाई विवाह करता है.इस तरह से अदला बदली के विवाह की परंपरा का निर्वाह भी हो गया और हर चरित्र की आयु के विकास से मैं बच भी गया.
आयु से बचने के मेरे अपने कारण हैं.मुझे मेक अप करने वाले कलाकारों पर बहुत भरोसा नहीं था.आज भी नहीं है.इसके अलावा हर कलाकार फिल्म में अपनी बढती हुई आयु का निर्वाह कर लेगा इसमें भी संदेह था.
इसके अलावा छोटे (उम्र से) कलाकारों की जगह बड़ों के आने से उनकी पहचान (एशोसिएशन) का भी संकट था.
यह तो बात कथा के मुख्य चरित्रों की थी.इसके अतिरिक्त बड़ी चुनौती थी कि अमृता प्रीतम के पिंजर की कथा के प्रवाह में स्त्री पर हो रहे अन्याय और उपेक्षा के कई रूप थे.पूरो और लाजो के अतिरिक्त मूल उपन्यास में एक छोटी बच्ची कम्मो और सक्कड़आली गांव की एक असहाय पगली की भी कहानी थी जो किसी नरपशु के द्वारा गर्भवती कर दी जाती है.फिल्म में इसके कई अंश बाद में काट दिए गए थे.संक्षेप में कई नारी पात्रों को लेकर अमृता प्रीतम ने नारी के एकाकीपन, उत्पीडन और शोषण की करुण कथा विभाजन की पृष्ठभूमि में लिखी थी.मेरे सामने चुनौती कथानक को छोटा करना था.उसमे कुछ हद तक में सफल भी रहा और कुछ हद तक असफल.दरअसल मैं अमृता प्रीतम के शब्दों के चुनाव,भावों की गहराई और अभिव्यक्ति से इतना अभिभूत था कि उसे जस का तस रख देने के मोह का संवरण नहीं कर सका.

अब मैं मूल लेखक के प्रति संवेनदशील भी हूँ और निर्मम भी.पटकथा लेखक को आवश्यकता पडने पर निर्मम होना चाहिए.
अमृता प्रीतम की कथा का प्रारंभ पूरो की पूर्व काल की स्मृतियों से होता है.पूरो गर्भवती है और उसे लग रहा है कि मानों उसके पेट में कोई कीड़ा रेंग रहा है.यह पूरो द्वारा रशीद के प्रति घृणा की अभिव्यक्ति थी.मैं यहाँ से अपनी कहानी नहीं कहना चाहता था.कारण था मैं देश,समाज,काल और चरित्रों को स्थापित करने के बाद उनकी कहानी कहना चाहता था.
इस प्रयास में कहानी /पटकथा का विस्तार बढ़ गया.शायद आज मुझे पिंजर की पटकथा वापस लिखनी हो तो मैं उसे बिलकुल अलग तरीके से लिखूंगा.अनुभव बहुत पाठ सिखाता है.मुझे आज अपने पिछले लेखन या निर्देशन में कई दोष दिखाई देते हैं.
जहाँ तक संवादों का प्रश्न था मैंने अमृता प्रीतम के कई मर्मस्पर्शी वाक्यों/संवादों को जस का तस रखने का प्रयत्न किया .उपन्यास में अमृता प्रीतम की  अभिव्यक्ति में,भाषा में एक खास अंदाज़ था,एक शैली थी.वे अपने पात्रों से परिचित थी.मेरे भीतर का संवाद लेखक वहीँ कूदा जहाँ कथा या चरित्रों को मैंने गढा था या उनका विस्तार किया था.
कथा,पटकथा और चरित्रों के बाद मेरे सामने बड़ी चुनौती विभाजन के काल के निर्माण की थी.मैं न पंजाब से हूँ न मैंने विभाजन की त्रासदी को भोगा है.इसलिए समकालीन समाज की राजनैतिक समझ और सामजिक स्थितियों को कहीं कहीं कहानी में बुना.
विभाजन पर लिखे इतिहास की महत्वपूर्ण किताबों को पढ़ा और अलग अलग राजनैतिक पक्षों को समझने की कोशिश हुई.कहीं कहीं एक दो पक्तियों में उसका उल्लेख भी किया और सुधि दर्शकों ने उसे पकड़ा भी.
विभाजन के काल को समझने के लिए मैंने हिंदी और कुछ अंग्रेजी साहित्य में विभाजन पर लिखी कहानियों को पढना प्रारंभ किया ताकि कहानियों में वर्णित समकालीन समाज से मैं परिचित हो सकूँ.मंटो,राजिंदर सिंह बेदी,मृदुला साराभाई  और दूसरे कई कहानीकारों की कहानियां,लघु कथाएं,संकलित कहानियां पढ़ी.इसी से समझ में आया कि वह एक ऐसा काल था जब हिंदू और मुसलमान स्त्रियां दुप्पटा भी अलग अलग तरीके से लेती थीं.हिंदुओं और मुसलमानों का पानी अलग-अलग  होता था.रेलवे स्टेशन पर हिंदुओं का नल और मुसलमानों का नल अलग होता था.कोयले से चलने वाली बसें होती थी.
कोयले से चलने वाली बस को बनाने के लिए मेरे कला निर्देशक सप्पल मुनीश और मैंने बहुत माथापच्ची की.सफल नहीं हुए.किसी तरह धुंए की चिमनी बना कर आभास उत्पन्न किया.विचित्र बात यह की मोहल्ला अस्सी की शूटिंग के बाद बनारस में एक सज्जन से मुलाकात हुई जिन्होंने कोयले से चलने वाली बस को देखा था और मुझे उसके काम करने के तरीके को समझाने का प्रयत्न किया.(खोज जारी रहती है )
संक्षेप में बस में बैठने के की सीटों से लेकर उस समय की टिकिटों के दाम और उनके चित्र तक मुनीश ने ढूंढें.काल को जिंदा करने की चाह में मुनीश ने बसों के रूट और बस चलाने वाली कंपनियों के नाम तक ढूंढ निकाले.इतिहास को जीवित करने की कोशिश में लाहोरी दरवाज़े की आस पास की दुकानों के नाम तक अमृतसर के बुजुर्गों से पूछकर कला निर्देशक सप्पल मुनीश ने ढूंढें.सोडे की कंचे वाली बोतलें लुधियाना से मंगवाई गयी.संक्षेप में विभाजन के समय के पंजाब और व्यवहार में आने वाली रोज़मर्रा की वस्तुओं के visual references को ढूँढने का हर संभव प्रयत्न किया
रशीद का घर मुंबई की फिल्म सिटी में लगाया गया था.पहले तय हुआ था कि हम लोग पंजाब या राजस्थान में किसी उपयुक्त जगह पर रशीद का घर ढूंढ लेंगे पर अंत में तय हुआ कि सेट पर काम करना ज्यादा सुविधाजनक होगा.इसलिए सेट मुंबई में लगा.गंगा नगर ने शूटिंग के दरम्यान मैंने एक बात नोट कर ली थी कि वहाँ मिटटी के घरों में गेहूं की भूसी को मिटटी में मिलाया जाता है और दीवारों पर वह भूसी दिखाई भी देती है.अब सवाल था कि मुंबई में भूसी कहाँ से मंगवाई  जाये.तमाम कोशिशों के बावजूद भी जब हम लोग भूसी न पा सके तो मुनीश ने घास को खूब बारीक़ काटा.सेट तैयार हुआ पर मेरी आँखों को वह भूसी तब भी नहीं दिखाई दे रही थी.मैंने मुनीश से कहा कि आँखें तो धोखा खा लेंगी पर मैं अपने मन को नहीं समझा पा रहा हूँ.मुझे मिटटी में वही भूसी देखनी है.केमेरामेन संतोष ठुण्डीयाल ने भी मुझे समझाया कि दर्शक यह फर्क नहीं पकड़ पायेगा.आखिर तय हुआ कि टेस्ट शूट करते हैं और पिछली शूटिंग से उसकी तुलना करते हैं.कुछ घंटों की बिना किसी कलाकार के शूटिंग की.टेली सिने पर फिल्म को ट्रांसफर किया और मशीन पर काम कर रहे विशेषज्ञ से भी पूछा.वह भी फर्क नहीं पकड़ पा रहा था.सभी खुश थे मुझे छोड़कर.मैं तैयार न हुआ.मैंने अलग अलग शहरों में अपने परिचितों को फोन किया कि मुझे गेहूं की भूसी चाहिए.आखिर एक रिश्तेदार ने आश्वासन दिया कि वे कुछ व्यवस्था करते हैं.हम लोग प्रतीक्षा कर ही रहे थे कि एक दिन योगानुयोग बड़ी नाट्यात्मक परिस्थितियों मुझे फिल्म सिटी में ही कुछ फेंकी हुई बोरियां मिल गयी.ये बोरियां नितिन देसाई ( मेरे पुराने कला निर्देशक ) द्वारा फेंकी हुई थी.फिल्म देवदास में उपयोग करने के लिए नितिन ने उन्हें मंगवाया था और जो बोरियां बच गयी थी उन्हें फेंक दिया गया था.भूसी मिलते ही पूरे सेट की प्लास्टरिंग फिर से हुई और मैंने राहत की सांस ली.यहाँ बता देने चाहूँगा कि उस वर्ष मुनीश सप्पल को कला निर्देशन और वेशभूषा के सारे पुरस्कार मिले.राष्ट्रीय पुरस्कार को छोड़कर.आज भी मुझे अफ़सोस है कि उस वर्ष मुनीश को राष्ट्रीय पुरस्कार नहीं मिला.पर पिंजर ने मुनीश को हिंदी सिने जगत के अग्रणी कला निर्देशक के रूप में स्थापित कर दिया.
इतनी ही मेहनत वेशभूषा को लेकर भी हुई.अधिकतर कपड़ा,चूडियाँ,गहने,हुक्के,लालटेनें और दूसरा सामान अमृतसर और मलेर कोटला से ख़रीदे गए.मुनीश स्वयं सिख परिवार से है.उसने अपने दादा दादियों की पुरानी तस्वीरें खंगाली.उसी के अनुसार कपडे बनवाये.मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि उसके किस किस रिश्तेदार की तस्वीरें पिंजर में दीवारों पर टंगी है.
यहाँ मैंने कला निर्देशन का उल्लेख इसलिए भी किया है कि लेखक के साथ साथ काल निर्माण में उसकी बहुत बड़ी भूमिका रही है.
लेखक के दृष्टिकोण से पिंजर के सन्दर्भ एक खास बात का उल्लेख यहाँ करना चाहूँगा.जब मैं पिंजर लिख रहा था तो मेरे मन में पूरो का परिवार “आर्य समाजी” था.मेरे एक पंजाबी मित्र के यहाँ मेरा आना जाना था.वे आर्य समाजी थे.उनके परिवार के रहन सहन को मैं सन्दर्भ के रूप में देख रहा था.लेखन के समय मैं पूरो की माँ को साडी में देख रहा था और पूरो के पिता को टोपी पहने.पर मेरे मित्र और वेशभूषाकार(कला निर्देशक भी) का आग्रह था कि हम पूरो के पिता को पगड़ी पहने दिखाए और महिलाओं को सलवार कुर्ता पहने.बहुत बहसों के बाद हम लोगों ने तय किया कि हम पूरो के पिता को पगड़ी और उनके बेटे को थोडा आधुनिक दिखाए.पर मेरे मन में आर्य समाजी पूरो के पिता इस तरह प्रवेश कर गए थे कि   परिवार को आर्य समाजी दिखाया होता ? इतना ही नहीं फिर किसी दूसरे काम के सिलसिले में शोध करते समय विभाजन के पहले की कुछ महिलाओं के चित्र जो मेरे हाथ लगे जिसमे महिलाओं ने साडियां पहन रखी थी, मैंने मुनीश को दिखाए.
फिल्म पूरी हो गयी,रिलीज हो गयी,वर्षों बीत गए,पर सर्जन की यात्रा समाप्त नहीं होती.रचना की प्रक्रिया से जुड़े लोगों से मैं बार बार संवाद करता हूँ.मन में बसी हुई छबियाँ आसानी से नहीं मिटती.
पिंजर की लम्बाई मुझे खल रही थी.कई साथियों से पूछा क्या काटें ? सबके अलग अलग सुझाव.ठोस उत्तर मेरे पास भी नहीं था.क्या काटें ? यह प्रश्न मेरे अंतर में उतर गया था और पिंजर के रिलीज होने के कोई पांच साल बाद मैं एक सुबह अपने बिस्तर से उठा और कहा रील नंबर सिक्स !
रील नंबर सिक्स काट दो तो भी फिल्म को कोई फर्क नहीं पडता !
सिनेमा का शायद यही आनंद है कि लेखक निर्देशक पूरे जीवन अपने गढे हुए चरित्रों के साथ,छबियों के साथ यात्रा करता है....अपनी की जिंदगी की यात्रा के खत्म होने तक !!!!!!!!!
अब मैं यहाँ पिंजर को विराम देता हूँ और मोहल्ला अस्सी की ओर बढता हूँ

मोहल्ला अस्सी
पिंजर को रिलीज़ हुए वर्षों हो गए थे.
पृथ्वीराज रासो और कुणाल अवदान पर वर्षों काम किया.दोंनों फ़िल्में बनते बनते रह गयी.
तय किया कि अब कहानी वर्तमान से ढूंढूंगा.सबसे मुश्किल यही काम था.मुझे एक ऐसी कहानी की तलाश थी, जिसमे वर्तमान की कथा में अतीत भी जीवित हो.सभ्यता और संस्कृति का प्रवाह भी हो.अतीत और वर्तमान का संगम हो.पर ऐसी कहानी मिलेगी कहाँ ?
पढना जारी था.
समय दो हज़ार छः का था.उपनिषदों पर काम करने का प्रस्ताव मिला.दिसम्बर
२००६ में उपनिषद गंगा के पहले पांच प्रकरण लिखे और सन २००७ के प्रारंभ में लोकेशन ढूँढने के सिलसिले में बनारस जाने का पहला अवसर मिला.मैं इस अवसर की लंबे समय से प्रतीक्षा कर रहा था.कारण था - मेरे पिता ने अपना अध्ययन बनारस में किया था.मुझे आज तक पता नहीं कि मेरे पिता राजस्थान से बनारस आकर कहाँ रहे होंगे.पर इतना निश्चित था कि इसी गंगा में वे सैकड़ों बार नहाये होंगे.इसलिए गंगा को देखना और उसके घाटों पर शूटिंग करना मेरे लिए न सिर्फ रोमांचक बल्कि कुछ कुछ तीर्थ यात्रा सा अनुभव था.पूर्वज जो दिखाई नहीं देते पर इसी गंगा,इसी मिटटी,शायद इन्हीं गलियों में वे चले होंगे.ये स्मृतियाँ मन के संताप को हर लेती हैं.मन भी कितना विचित्र है.जिनके जीते जी उनकी कीमत नहीं जानता,मरने के बाद उनकी स्मृतियों को हवा में,लहरों में,आकाश में ढूँढता है.
२००७ , अप्रैल में फिर दूसरी बार उपनिषद गंगा की शूटिंग के लिए बनारस गया और शायद इस यात्रा के दरम्यान हवाई जहाज़ की सीट की जेब में एक पत्रिका में काशी का अस्सी पर खेले गए नाटक “काशी नामा” की समीक्षा पढ़ी.उषा गांगुली द्वारा निर्देशित इस नाटक की एक छबि को देख मेरी निगाह चित्र पर थम  गयी और मैंने समीक्षा पढ़ डाली और भीतर से जैसे एक आवाज़ उठी अरे यह तो तुम्हारा विषय है !
काशीनामा,काशी का अस्सी की एक कहानी “पांडे कौन कुमति तोहें लागी” पर आधारित था.पर मैं “पांडे कौन कुमति तोहें लागी” नाम की पुस्तक ढूंढ रहा था.कुछ खोज बीन के बाद पता चला कि यह तो काशी का अस्सी की एक कहानी है.
काशी का अस्सी ले आया.पढने लगा.होठों पर हंसी,मन में गुदगुदी और मैं दंग ! हतप्रभ !!!!!!!
कौन हैं ये काशीनाथ सिंह ( काशीनाथ जी के शब्दों में सिंघवा )
रस का यह प्रवाह क्या है ? कहानी,लघु कथा,संस्मरण,रिपोर्ताज,या सब कुछ एक साथ ?
ऐसी रचना जिसमें आज भी है,कल भी है,न दिखाई देने वाला भविष्य भी हैं.हमारा वर्तमान और हमारे वर्तमान के समाज का इतिहास भी है.बाबा भोलेनाथ की काशी की तरह इसमें अतीत और वर्तमान, एक साथ सांस ले रहा है.बदल रही सभ्यता का इतिहास या लेखा जोखा.पर वह इतिहास जितना गंभीर भी नहीं.यह तो हंस रहा है.उतनी ही मासूमियत से जितनी काशीनाथ सिंह की मासूम हंसी हैं.कौन हंस रहा है ? काशीनाथ,या काशी का अस्सी.और पुस्तक के अंत होने पर “कौन ठगवा नगरिया लूटल हो” पर पहुंचते ही आपकी हंसी गायब !
कमाल है लेखक काशीनाथ सिंह.हंसते हंसाते,व्यंग्य करते हंसी के गायब होने की कहानी कहता है.
काशी का अस्सी में पांच कहानियां है.कहानियां हैं ? संस्मरण है ? बत रस है ? रिपोर्ताज है.यह मेरे लिए बड़ा प्रश्न नहीं था.
सवाल था इसमें तो कई कहानियां हैं.मैं कौन सी कहानी कहूँ ?
कौन ठगवा नगरिया लूटल हो सबसे मुश्किल कहानी है अपनी बुनावट में और कथ्य में.पर यह कहानी मैं कैसे कहूँ कि फिल्म के दर्शक को कहानी आसानी से समझ में आ जाये.सो उस कहानी को मैंने भविष्य के लिए छोड़ दिया.
कहानी कहने में सबसे आसान लगी “पांडे कौन कुमति तोहें लागी” पर उसकी चोट बड़ी थी.कहानी पढकर मुझे लगा कि इस कहानी को प्रारंभ और अंत की जरुरत है.कहाँ से लाएं प्रारंभ और अंत ?
जैसे जैसे,बार बार काशी का अस्सी पढता गया,लगने लगा कि काशी का अस्सी के फलक पर जो व्यक्ति छाया हुआ है वह है डॉ गया सिंह.पर कहानी डॉ गया सिंह की नहीं है.काशी का अस्सी को विचार की धार अस्सी के इसी लौह पुरुष से मिलती है.मेरी दृष्टि में काशी का अस्सी का नायक डॉ गया सिंह ही है और यदि उन्हें कहानी से निकाल दिया जाये तो काशी का अस्सी विचार के स्तर पर गिर सकती है.
कई बार पढने पर मुझे साफ़ साफ़ कुछ कहानियां दिखने लगी.मुझे समझ में आ रहा था कि काशी का अस्सी में एक फिल्म की नहीं बल्कि कई फिल्मों की
कहानियां छिपी हुई हैं.
इसमें एक कहानी धर्मनाथ पांडे कि है जो एक काशीनाथजी के अनुसार उनका काल्पनिक पात्र है.एक कहानी तन्नी गुरु की है और शायद एक और कहानी रामजी राय की है. डॉ गया सिंह सभी कहानियों में हैं पर वे किसी भी कहानी में नायक नहीं.डॉ गया सिंह आत्मा की तरह - है भी और नहीं भी.पर गया सिंह के बिना कोई कहानी कहना संभव भी नहीं.
इसलिए मैंने सबसे पहले “पांडे कौन कुमति तोहे लागी” पर फिल्म बनाने का निर्णय किया.केंद्र में यही कहानी और कथा के विस्तार,प्रारंभ और अंत के लिए उपन्यास से ही कुछ और प्रसंग लिए.कुछ मैंने गढे भी.डॉ गया सिंह,राधेश्याम ,वीरेंद्र श्रीवास्तव,तन्नी गुरु और दूसरे पात्रों की मदद से “पांडे कौन कुमति तोहें लागी” को केंद्र में रख पटकथा लिखी.
“पांडे कौन कुमति तोहें लागी” सिर्फ पांडे के पतन की कहानी नहीं है.यह हमारी वर्तमान सभ्यता के पतन की कहानी है.मेरी दृष्टि में मोहल्ला अस्सी में सिर्फ पांडे ही नहीं फिसला बल्कि हमारा समाज,हमारी राजनीति,हमारे सामाजिक संस्थान और हमारी शिक्षा की व्यवस्था,सब कुछ फिसली है.फिसला शब्द का प्रयोग इस लिए कर रहा हूँ कि फिसला हुआ आदमी फिर से खड़ा हो सकता है और सावधान हो सकता है.राह में और भी फिसलन आएँगी पर मनुष्य वही है जो गिरे और उठे.कहानी में काशीनाथ जी ने फिसलन दिखा दी.
इसलिए मेरी दृष्टि में आसान सी दिखने वाली इस कहानी में कई परतें हैं.व्यक्ति,समाज और राष्ट्र.शायद तीनों की कहानियां पांडे कौन कुमति तोहें लागी के अंतस में समायी हुई हैं.
उदारीकरण के बाद के बनारस की या कह लीजिए भारत की कहानी की एक झलक पांडे कौन कुमति तोहें लागी में है और उसका विस्तार और विवेचन “कौन ठगवा नगरिया लूटल हो” में.
पांडे कौन कुमति तोहें लागी पर पटकथा लिखने के बाद मैंने काशीनाथजी से कहा था कि असली चुनौती “कौन ठगवा नगरिया लूटल” हो लिखने में है पर मैं उसका सिरा नहीं पकड़ पा रहा हूँ.पर मैं आसानी से हार मानने वाला नहीं.यदि डॉ गया सिंह पूरे काशी के अस्सी में विचारवान के रूप में उभरते हैं तो तन्नी गुरु एक आदर्शवादी,सरल,सहज,और निष्कपट व्यक्ति के रूप में.इस आदमी की कहानी कहना जरुरी है और तीन वर्षों की जद्दोजहद के बाद आखिर मैं तन्नी गुरु को पकड़ पाया(डॉ गया सिंह के साथ) और उसकी पटकथा भी लिख ली.
मेरी पत्नी मंदिरा ने तन्नी गुरु की कहानी पढने के बाद मुझसे पूछा कि आपने यह कहानी पहले क्यों नहीं लिखी.मेरा उत्तर था कौन ठगवा को समझने के पहले पांडे की कहानी को लिख देना जरुरी था.सृजन की यात्रायें ऐसे ही होती है. “कौन ठगवा नगरिया लूटल हो” का विषय पहली चार कहानियों से बिलकुल अलग है फिर भी उसमे बदल रहे देश, काल और समाज की निरंतरता है.पहली चार कहानियों के कुछ चरित्र भी हैं.पर कथ्य में यह कहानी,मेरी दृष्टि में सभी कहानियों को पीछे छोड़ देती है.हमारे जीवन,समाज और देश में बाज़ार की घुसपैठ और उससे चरमरा रहे रिश्ते और मूल्य ! उदारीकरण,बाजारवाद या उपभोक्ता संस्कृति ( यदि संस्कृति कहा जा सके तो ) से परिवार और समाज के हो रहे विघटन की और हमारे भविष्य की तस्वीर है “कौन ठगवा नगरिया लूटल हो”.ठग घर में ही बैठा है.साथ साथ चल रहा है.पर हम जान कर भी उसे अनदेखा कर रहे हैं. “काशी का अस्सी” की ज़मीन गंगा की मिटटी है, बहुत उपजाऊ है.न जाने भविष्य के सर्जक इसमें क्या क्या उगाए.इसलिए इसकी बात मैं यही छोड़ देता हूँ और मोहल्ला अस्सी के लेखन और उसके के बाद की प्रक्रिया पर लौटता हूँ.
मेरे पास धर्मनाथ पांडे का चरित्र था.वे सुबह घाट पर बैठते हैं और बाद में संस्कृत पाठशाला में पढ़ाते हैं.कहानी की पंक्तियों को ही मैंने कई दृश्यों में रूपांतरित कर उनकी कथा को विस्तार दिया.कहानी में पांडेजी के पड़ोसियों का उल्लेख है पर वे कहानी के क्रिया कलाप में दिखाई नहीं देते.इसिलए मैंने उनके पडोसी पंडों के पात्र गढे.पांडेजी की कहानी में पर्याप्त सामग्री (मसाला) था.
पांडेजी की पत्नी सावित्री है.जग्गू मल्लाह की पत्नी रामदेई को और विस्तार दे दोंनों को एक दूसरे के सम्मुख और नजदीक लाया और अंत तक इस पात्र को ले गया.
कन्नी गुरु के लिए भी मुझे एक प्रारंभ,मध्य और चरम या अंत चाहिए था.उसके चरित्र के विकास में भी कोई समस्या नहीं हुई.
पर मुझे अभी भी एक पात्र की तलाश थी.जो कहानी के समय में हो रहे परिवर्तन को रेखांकित कर सके.यह पात्र मुझे काशी का अस्सी के लाढेराम में मिला.लाढेराम(नेकराम) और केथेरीन की कहानी को मैंने कथा के मुख्य सूत्र में गूंथ दिया और इस प्रकार मेरे पास तीन मुख्य पुरुष चरित्र तैयार हो गए.ये थे धर्मनाथ पांडे,कन्नी गुरु और नेकराम शर्मा या मूल कहानी का लाढेराम.
पर यदि अस्सी की कहानी हो और उसमे पप्पू की चाय की दुकान और डॉ गया सिंह न तो क्या अस्सी और क्या काशी !
इसलिए मेरे लिए जरुरी हो गया था कि मैं चाय की दुकान को केंद्र में लाऊं.जिन्होंने ने भी काशी का अस्सी पढ़ा है वे पप्पू की दुकान से परिचित होंगे ही.पप्पू की दुकान से भांग के साथ विचारों की भी गोलियाँ दागी जाती है.पप्पू की यह दुकान काशी का अस्सी का अभिन्न अंग हैं.इसके बिना अस्सी की कल्पना संभव नहीं है पर समस्या यह थी कि पांडे कौन कुमति तोहें लागी में धर्मनाथ पांडे पप्पू की दुकान पर दिखाई नहीं देते.इसलिए मैं पांडेजी को पप्पू की दुकान पर ले गया.और उसी के साथ पप्पू की दुकान फिल्म का अहम और अभिन्न हिस्सा बन गयी.
पप्पू की दुकान के आते ही डॉ गया सिंह,कौशिक जी,वीरेंद्र श्रीवास्तव,रामजी राय,राधेश्याम आदि चरित्र पांडेजी की कहानी में प्रवेश कर गए.
अब मेरे पास मोहल्ला अस्सी की कहानी कहने के तीन धरातल या परतें थी.पहली परत व्यक्ति धर्मनाथ पांडे की.दूसरी परत उसके समाज की जो पप्पू की दुकान है और तीसरी परत देश और दुनिया में हो रही हलचल की, जिस पर पप्पू की दुकान में चर्चा,बहस और लड़ाइयां होती हैं.इस तरह से व्यक्ति से समाज और समाज से देश का एक सूत्र हाथ में आ गया और उसी के साथ व्यक्ति,समाज और देश में हो रहे मूल्यों के पतन की कहानी.मूल्य चाहें वे व्यक्तिगत(नैतिक) हो,सामाजिक हो या राष्ट्रीय हो.यही पांडेजी की कहानी “मोहल्ला अस्सी” की ताकत है.
पप्पू की दुकान के केंद्र में आते ही जो सबसे बड़ा फायदा हुआ वह था “काल /समय” का.मेरी सभी कहानियों में काल केंद्र में होता है.नायक होता है.जैसे के पिंजर में विभाजन का समय.उसी तरह मोहल्ला अस्सी में १९८६ के बाद का समय.पप्पू की दुकान की बहसें, अपने समय के संघर्ष,राजनैतिक उठा पटक और समाज के सुख दुःख को मुखरित करती हैं.हिंदी फिल्मों में ज्यादातर समाज और देश गायब रहता है.काशी का अस्सी में समाज और देश की त्रासदी और पीड़ा की अभिव्यक्ति है.मोहल्ला अस्सी में उसका एक पक्ष उजागर होता है.सारे मुद्दे एक साथ एक ही फिल्म में लाना संभव नहीं होता और कई बार वह मूल कथा से भटका भी देता है इसलिए मैंने पांडेजी के माध्यम से मूल्यों के ह्रास की कहानी को चुना और तन्नी गुरु को अगली फिल्म के लिए छोड़ दिया.
मोहल्ला अस्सी की कहानी पांडेजी की कहानी हैं.इसमें कई पात्र हैं जो काशी का अस्सी में मौजूद हैं और काशी का अस्सी के कई पात्र मोहल्ला अस्सी से नदारद हैं.कुछ नए पात्र मैंने जोड़े भी हैं.
संक्षेप में कथा का सूत्र “पांडे कौन कुमति तोहें लागी” और काशी का अस्सी के मोतियों जैसे कई अनोखे पात्र.मेरी माला बन गयी थी.
वास्तव में पूरा का पूरा काशी का अस्सी इतने रोचक प्रसंगों और चरित्रों से भरा पड़ा है कि जी चाहता कि सभी को एक ही फिल्म में ड़ाल दिया जाये.पर वह संभव भी नहीं.इसलिए पूरी निर्ममता से बहुत सारे चरित्रों और प्रसंगों को मैंने छोड़ दिया जो पांडेजी की कहानी कहने में सहायक नहीं थे.
अब बात संवाद की.काशी का अस्सी की जान तो उसकी भाषा है,चरित्रों के शब्द हैं जो किसी मिसाईल की तरह चलते हैं.उपन्यास के किसी भी पात्र को उठा लीजिए,चाहे कौशिकजी हों, वीरेंद्र श्रीवास्तव हों या डॉ गया सिंह.सब एक से बढ़कर एक.इसलिए मैं चाहता था कि काशी का अस्सी के शब्द या संवाद जहाँ तक बन पड़े जस के तस रखे जाएँ.कुछ गालियों को छोड़कर.
वास्तव में मैंने मोहल्ला अस्सी में कथा और संवादों का संकलन किया है.फिल्म की भाषा में कहूँ तो मेरे पास काशी का अस्सी के रूप में एक ऐसी असंकलित फिल्म है जिसकी लम्बाई कई घंटों की है और अब मुझे उसमें से दो-सवा दो घंटे का फुटेज ( सामग्री ) निकालनी है.और मजेदार बात यह कि बाकी बची हुई सामग्री से एक दूसरी कथा भी रची जा सकती है.पर संकलन का काम आसान भी नहीं होता.बार बार पढना और बार बार लिखना.मोहल्ला अस्सी का शूटिंग ड्राफ्ट बारहवां था.यानी बारह बार उसमें परिवर्तन किये गए.कुल मिलाकर काशीनाथ जी के शब्दों को ही मैंने अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया.
यहाँ एक बात कह देना चाहूँगा कि मेरे कई फिल्मकार मित्र जिन्होंने काशी का अस्सी को पढ़ा है.उन्होंने मुझसे पूछा कि इस उपन्यास पर फिल्म कैसे बन सकती है.मेरा उत्तर था इस पर एक से अधिक और सार्थक फ़िल्में बन सकती हैं.
एक बार पटकथा तैयार होने के बाद चुनौती थी पप्पू की दुकान और अस्सी की गलियों में शूटिंग कैसे हो ?
पप्पू की दुकान इतनी छोटी है कि उसमे प्रकाश की व्यवस्था करना लगभग नामुमकिन था और दुकान भी भीडभाड वाले इलाके में.सो यह बात तो तय थी पप्पू की दुकान का मुंबई में सेट लगाना होगा.पर अस्सी की पांडेजी के घर की गली का क्या करें ?
संकरी गलियों में भीड़ का डर और शूटिंग देखनेवाले दर्शकों का दबाव बना रहता है और उस पर बनारस जैसे संवेदनशील नगर में कभी भी दुर्घटना हो सकती है.इसलिए मैंने तय किया कि अस्सी या बनारस की एक गली भी मुंबई में ही लगाई जाये.
पप्पू की दुकान,निर्देशक और कला निर्देशक के लिए चुनौती थी.दुकान के सामने की सड़क बनवाई गई और दुकान को हुबहू बनाया गया.सिर्फ एक परिवर्तन मैंने निर्देशक के अधिकार से किया कि दुकान की एक दीवार तोड़ दी जाये ताकि सड़क पर हो रही गतिविधियां दिखाई दें.वरना बंद दीवारों (स्पेस) में एक समय के बाद दर्शकों को भी मानसिक घुटन का आभास होता है.पप्पू की दुकान का नल,सामने बहती नाली,नाली पर जाली,भट्टी,भट्टी के सामने का पंखा सब कुछ दुकान में जैसा है वैसा ही.
अब दुकान को भरना था.हिंदी फिल्मों की एक समस्या वस्तुओं की “एजिंग” या आयु की होती है.अधिकतर वस्तुएँ नयी नयी दिखती हैं.इसलिए मैंने पप्पू के बेटे अशोक से बात की.मैंने अशोक से कहा कि पप्पू की दुकान की पुरानी वस्तुएँ जैसे की चाय बनाने के बर्तन,छलनी,केतली,गिलास,पक्कड,और ऐसी ही दूसरी चीज़ें हमें दे दी जाये और उसके बदले में वे नयी वस्तुएँ हमसे ले ले.अशोक ने एक पल की भी देरी किये बिना हाँ कह दिया.
इसी तरह पुराने हाथ रिक्शा,हाथ गाड़ी,साईकिल,पूजा की सामग्री और बाज़ार का दूसरा सामान बनारस से ही ख़रीदा गया.मुनीश सप्पल के पुराने सहयोगी भूपेन सिंह ने कला निर्देशक की कमान संभाल रखी थी.
अस्सी और पप्पू की दुकान को परदे पर जीवित करने का छायाकार विजय अरोरा के मन में ऐसा उत्साह कि उन्होंने बनारस में पप्पू की दुकान में रात में रोशनी की तीव्रता(इंटेंसिटी) को अपने उपकरणों से मापा और मुंबई में उसी प्रकार की रोशनी को रिक्रिएट करने की कोशिश की.
अस्सी और बनारस में लगातार चल रहे विभिन्न स्वरों,ध्वनियों के कोरस को ध्वनि संयोजक अरुण नाम्बिआर ने फिल्म के संकलन हो जाने के बाद अस्सी और बनारस में घूम घूम कर रेकोर्ड किया.फिल्म में पार्श्व में जो ध्वनियाँ दर्शक सुनेगा वे अस्सी और बनारस की ही होंगी.
संगीत निर्देशन के लिए संगीतकार अमोद भट्ट ने काशीनाथ जी से भी बनारस जाकर संगीत के सन्दर्भ में लंबी चर्चा की और कुछ लोक गीतों को बनारस में ही रेकोर्ड किया.
मोहल्ला अस्सी जल्दी ही आपके सामने आएगी और मुझे उम्मीद है कि उस पर लंबी बहस के अवसर हमें मिलेंगे.