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Wednesday, July 31, 2013

हिंदी टाकीज-2 (2) : 'घातक’ साबित हुयी घातक- विमल चंद्र पाण्‍डेय

हिंदी टाकीज-2 में इस बार विमल चंद्र पाण्‍डेय । विमल इन दिनों मुंबई में हैं।



मैं ग्यारहवीं में गया था और अचानक मेरे आसपास की दुनिया बदल गयी थी। अब न मुझे कंधे पर किताबों से भरा बैग लादना था और न ही स्कूल में मुझे कोई धमकाने और डराने वाला सीनीयर रह गया था। जो बारहवीं के छात्र थे, उनके पास खुदा के करम से करने को और भी ज़रूरी काम थे जिनमें फिल्मों के बाद सबसे ज़रूरी काम था उन लड़कियों के पीछे एक दूसरे का मुंह फोड़ देना जिसे पता भी नहीं हो कि वह एप्पल ऑफ डिस्कॉर्ड बन चुकी है। हम अपने उन एक साल सीनीयर बंधुओं की ओर देखते तो वे हमारी ओर दोस्ताना भाव से देखते। ये वही लोग थे जो पिछले साल तक हमें बबुआ समझते थे और सिगरेट पीता देखने पर कान पकड़ कर हड़का दिया करते थे। राजकीय क्वींस कॉलेज पूरे बनारस में जितना अपने अच्छे रिजल्ट के लिये मशहूर था उतना ही मारपीट के लिये भी।
बिना घर पर बताये वैसे तो हमने नियमित फिल्में देखना नवीं कक्षा से ही शुरू कर दिया था जिसकी शुरूआत हमारे सहपाठी अमित के सहयोग से हुयी थी। उसके पिता जी नगर निगम में कार्यरत थे और एक सादे चिट पर अपनी गंदी हैंडराइटिंग में पता नहीं क्या लिख कर देते थे कि साजन सिनेमाहॉल का मैनेजर हमें पूरी इज्जत से ले जाकर बालकनी में सबसे पीछे वाली सीट पर बिठाता और कभी-कभी तो हमें सरप्राइज करता हुआ कोल्ड ड्रिंक वगैरह भी थमा जाता। साजन में हमने जो शुरूआती फिल्में देखीं उनमें पुलिसवाला गुण्डा और मेघा आदि फिल्में थीं। अमित अपने पिताजी की इस अतिरिक्त योग्यता पर इतराता था और हम उसके एहसान तले दबते जाते। फिल्में देखने में मेरा नियमित साथी आनंद था और कभी-कभी अनुज और आशुतोष भी साथ शामिल होते। आशुतोष का रंग बहुत काला था पर उसका दावा था कि वह दिल का बहुत साफ है और अपने दावे को संगीतमय तरीके से पेश करने के लिये वह अक्सर हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैंगीत गाया करता था। आनंद ने उसके दावे को गंभीरता से लेते हुये उसका नाम सिंघाड़ा कर दिया था जो बकौल उसके आशुतोष जैसे गुणों वाला फल था।
अमित के पिताजी का करम महीने में मुश्किल से एकाध बार हुआ करता था और हमारे पास और फिल्में देखने की इच्छा तो थी पर पैसे नहीं थे। ग्यारहवीं में आते ही हमारे स्कूल ने हमें बताया कि अब हम जवान हो गये हैं और फिल्में देखने के लिये पैसे जुटाने के कुछ तरीके और ईजाद किये जाने चाहियें। हालांकि हमारी ही कक्षा के कुछ धुरंधर थे जो किसी भी सिनेमाहॉल में मुफ्त में फिल्में देखते थे और पैसों की मांग होने पर मारपीट करते। हम मारपीट के पक्षधर नहीं थे क्योंकि हमारा पसंदीदा हीरो शाहरुख खान था। हाई स्कूल बोर्ड का अंतिम पर्चा देकर निकलने के बाद हमने बाकायदा घरवालों से इजाजत लेकर टकसाल में डीडीएलजे देखी थी जब उसका पंद्रहवां बीसवां हफ्ता चल रहा था और बाकी लोग उसे देख चुके थे।
बहरहाल, हमने अपने-अपने घरों से अपने राशन कार्ड लिये और एकाध पड़ोसियों के राशन कार्ड भी यह कह कर मांग लिये कि हमारे एक गरीब दोस्त को जिसके यहां गैस चूल्हा नहीं है, मिट्टी के तेल की जरूरत है। मुझे याद है उन दिनों कंट्रोल पर तेल का सरकारी रेट तीन रुपये लीटर था और हमें सबके कार्ड पर औसतन पांच-पांच लीटर मिट्टी का तेल मिलता। हम पचीस तीस लीटर तेल लेकर बनिये की दुकान पर जाते जो हमारे घरों से दूर था और हमने बड़ी मुश्किल से उसे दस रुपये लीटर पर तैयार किया था हालांकि यह तेल वह हमसे खरीद कर ग्राहकों को अठारह रुपये लीटर बेचने वाला था। तेल बेचने के बाद हमारे पास दस से पंद्रह दिन बनारस में उपलब्ध हर फिल्म देखने के पैसे जुट जाते।
ग्यारहवीं का इम्तेहान आते-आते हम लोग क्लास छोड़कर फिल्म देखने के अभ्यस्त हो चुके थे। हमारा लक्ष्य वे सिनेमाहॉल थे जहां उतारी हुयी फिल्में लगती थी और टिकट के दाम कम हुआ करते थे जैसे दीपक, प्राची जो बाद में साहू बना, लक्ष्मी, पुष्पराज और अभय आदि। कुछ दोस्तों को प्रॉक्सी लगवाने के लिये सहेज कर हम बाहर निकल आते और किसी चाय की दुकान पर आज अखबार उठा कर शहर में लगी फिल्मों को देखकर आज का लक्ष्य तय करते। कई बार ऐसा होता कि हम शहर में लगी सारी फिल्में देख चुके होते। ऐसे में मतदान इस बात पर होता कि कौन सी फिल्म दो बार देखी जा सकती है। खिलाडि़यों के खिलाड़ी इसी प्रक्रिया के तहत हॉल में तीन बार देखी गयी।
ऐसे ही एक दिन जब कोई नयी फिल्म नहीं लगी थी, हमने एक देखी हुयी फिल्म को तिहराने का निर्णय लिया। मेरा पड़ोसी सुनील मेरे साथ ही स्कूल आता था और घर जाकर मेरी मां के पूछने पर बता देता था कि विमल एक्स्ट्रा क्लास कर रहा है। मैं निश्चिंत था और उसकी तरफ से मुझे कोई खतरा नहीं महसूस होता था लेकिन शायद मेरी खुशहाल जीवनशैली के बरक्स अपनी पढ़ाई में व्यस्त जिंदगी उसे बुरी लगी थी और उसने या शायद किसी और ही ने हमारे खिलाफ मुखबिरी कर दी थी।
पिताजी से मेरी बातचीज नहीं के बराबर थी जैसा कि छोटे शहरों में आमतौर पर होता है। पिताजी मेरे देर रात तक घूमने पर सिर्फ इतना ही कहते थे कि मैं घर आकर खाना खा लिया करूं फिर जहां चाहे वहां घूमूं। खाने जैसी तुच्छ चीज को इतना महत्व दिये जाने पर मेरा मूड खराब हो जाता।
घातक देखने मेरे साथ आनंद, अनुज और दिनेश भी गये। दिनेश को ले जाना हमारे लिये खतरनाक साबित हुआ क्योंकि वह अक्सर समय से घर पहुंचने वालों में से था और घर का इकलौता चिराग होने के कारण उससे लगातार घर में रहने की उम्मीद की जाती थी जिसे अक्सर पूरा कर वह अपने लिये खतरा बढ़ा रहा था। हम अभय सिनेमाहॉल में घातक देखने गये। घातक हमारे लिये एक प्रेरक फिल्म थी जिसे देखने के बाद सभी आपस में कसम खाते कि कल से सिगरेट पीना छोड़ दंड पेले जाएंगे और सनी देयोल की तरह बॉडी बनायी जायेगी। अनुज सलमान खान का प्रशंसक था लेकिन उसका जि़क्र आते ही यह कह कर बात काट दी जाती कि सलमान खान की बॉडी जिम वाली है उसमें ताकत कम होगी लेकिन सनी देयोल वाली बॉडी असली अखाड़े की बॉडी है जिसमें असली ताकत है। अखाड़े की बात कहने वाला इतने विश्वास से यह बात कहता कि लगता कि उसने सनी देयोल के साथ अखाड़े में प्रेक्टिस की है।
हम फिल्म देखने में मशगूल थे और बाहर हमारी खोजाई चालू थी। उन दिनों सिर्फ मेरे घर पर लैंडलाइन फोन था (मेरे पिताजी दूर संचार विभाग में थे) और बाकी लोगों से संपर्क का जरिया पड़ोसियों के फोन थे जिन्हें पीपी नंबर कहा जाता था। पहले मेरे घर पर खबर गयी कि हम लोग पढ़ाई छोड़ कर फिल्म देखने गये हैं और फिर पीपी नंबर के जरिये यह अफवाह पता नहीं कैसे उड़ गयी कि विमल ही सभी दोस्तों को फिल्म दिखाने ले जाता है नहीं तो वे बबुए तो पढ़ाई के पीछे पागल हुये रहते हैं। ऐसी अफवाहों पर मेरे पिताजी तुरंत विशवास कर लेते थे क्योंकि उन्होंने देखा था कि अक्सर मैं ही अपने ग्रुप का लीडर रहता हूं और कुछ अलग हट कर करने की हमेशा कोशिश भी करता हूं। दिनेश के माता पिता मेरे घर पर पहुंच गये थे और मेरे पड़ोसी सुनील के घरवाले भी हमारे ही घर आकर बैठे थे। बारात का इंतजार करने वाली मुद्रा में बैठे वे लोग सब कुछ जान चुके थे, घातक की शो टाइमिंग भी और टिकट की दर तक, आज भी मैं अंदाजा ही लगाता हूं कि आखिर ये मुखबिरी की किसने।
हमने घातक देखी जो बनारस के कुछ हिस्सों में शूट होने के कारण हम बनारसियों के लिये कुछ ज्यादा ही खास फिल्म थी। हम वहां से खुश होकर निकले, बाहर सिगरेटें पी और अपने घरों की ओर चल पड़े। देर होने का आज कौन सा बहाना बनाया जाय, यह सोचता हुआ मैं घर पहुंचा तो वहां का नजारा देखकर मेरा माथा ठनक गया। सब मेरी ही ओर देख रहे थे। इम्तिहान सिर पर थे और मैंने पिताजी की मर्जी के खिलाफ करेण्ट कोचिंग सेण्टर यह कह कर छोड़ दिया था कि वहां की पढ़ाई मेरी समझ में नहीं आती। हिसाब किताब लंबे समय से इकट्ठा हो रहे थे और आज उन्हें पूरा करने का दिन था। पहले पापा ने ही पूछा कि मैं कहां से आ रहा हूं। मैंने तुरंत एक दोस्त का नाम लिया जो बहुत पढ़ाकू था कि मैं उसी के यहां बैठ कर पढ़ रहा था और पापा ने बिना कुछ कहे एक तमाचा मेरे गाल पर रख दिया। मेरे गाल पर पड़ने वाला यह तमाचा कई सालों के एक लंबे अंतराल के बाद आया था और मुझे इसकी आदत छूट गयी थी। वहां मौजूद लोगों ने भी कुछ बोलने को सोचा था लेकिन जब उन्होंने देखा कि बल्लेबाज बिना मोटिवेशन दिये अच्छी बल्लेबाजी कर रहा है तो वे धीरे-धीरे वहां से खिसकने लगे। कुछ ने जाते जाते मुझे सीख दी कि परीक्षाएं सिर पर हैं और मुझे पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिये। इसे एक राज की बात की तरह बताने के बाद वे सब चले गये। पापा ने फरमान सुनाया कि कल से तुम्हारा इधर उधर घूमना बंद, वे भी जानते थे  कि इस फरमान का कोई अर्थ नहीं है लेकिन मैं एक झापड़ खा चुका था और दूसरा खाने के मूड में नहीं था।
हंगामे का अगले दिन मेरे सभी दोस्तों को पता चल गया था लेकिन मैंने झापड़ वाली बात आज तक अपने दोस्तों को नहीं बतायी। एकाध ने पूछा भी तो मैं साफ मुकर गया। घातक मेरे लिये उस दिन बहुत घातक साबित हुयी थी। इसके बाद से हमने समझ लिया कि ऐसे कामों में थोड़े और सावधानी की जरूरत है। इसके बाद हम फिर कभी पकड़े नहीं गये, उस दिन भी जब हमने एक के बाद एक तीन फिल्में हॉल में लगातार देखीं।


मुंबई से मायूस लौटे थे मुंशीजी

यह लेख डोइच वेले से चवन्‍नी के पाठकों के लिए साभार लिया गया है। इसे लखनऊ के सुहेल वहीद ने लिखा है और संपादन अनवर जे अशरफ ने किया है।लेख के अंत में उनकी फिल्‍म 'हीरा मोती' का एक गीत भी है- कौन रंग मुंगवा....

मुंबई से मायूस लौटे थे मुंशीजी

कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने हिंदी फिल्मों में हाथ आजमाया, उनकी कृतियां पर कई फिल्में भी बनीं फिर भी उन्हें कामयाबी नहीं मिली. वे चकाचौंध से प्रभावित होकर मुंबई नहीं गए. उन्हें आर्थिक हालात ने वहां पहुंचाया.
प्रेमचंद की 133 वीं जयंती ऐसे साल में है, जब हिन्दी सिनेमा अपना सौवां साल मना रहा है.
बात 1929 की है. प्रेमचंद एक साल भी मुंबई में नहीं रुक पाए. नवल किशोर प्रेस की मुलाजमत खत्म हो चुकी थी और सरस्वती प्रेस घाटे में चला गया था. पत्रिका हंस तथा जागरण भी जबर्दस्त घाटा झेल रहे थे. तब उन्हें एक ही रास्ता सूझा. मुंबई की मायानगरी का जहां वे अपनी कहानियों का अच्छा मुआवजा हासिल कर सकते थे. लेकिन कामयाबी हाथ न लगी.
जब उन्होंने मुंबई जाने की ठानी तब तक वे लोकप्रिय हो चुके थे. इसीलिए अजंता सिनेटोन में उन्हें फौरन काम मिला तो प्रख्यात लेखक जैनेंद्र कुमार को लिखा, "बंबई की एक फिल्म कंपनी मुझे बुला रही है. तनख्वाह की बात नहीं ठेके की बात है. आठ हजार रुपये सालाना. अब मैं इस हालत पर पहुंच गया हूं जब इसके सिवा कोई चारा नहीं रह गया है, या तो वहां चला जाऊं या अपने नॉवेल को बाजार में बेचूं." मुंबई पहुंच पत्नी को खत लिखा, "कंपनी से इकरारनामा कर लिया है. साल भर में छह किस्से लिख कर देने होंगे. छह किस्से लिखना मुश्किल नहीं."
अचानक मिले पैसे
हालांकि मुंबई पहंचने से पहले ही उनके उपन्यास सेवा सदन पर बाजारे हुस्न नाम से फिल्म बनने का एग्रीमेंट हो चुका था. 14 फरवरी 1934 को उन्होंने जैनेंद्र कुमार को लिखा, "सेवा सदन का फिल्म हो रहा है. इस पर मुझे साढ़े सात सौ मिले... साढ़े सात सौ."
फिल्मों में कामयाब नहीं रहे प्रेमचंद
प्रेमचंद के बेटे अमृत राय लिखते हैं, "महालक्ष्मी सिनेटोन ने ये रकम देकर सेवा सदन हासिल की." निर्देशन नानू भाई को दिया जो घटिया फिल्में बनाने के लिए मशहूर थे. उन्होंने इसका उर्दू नाम बाजारे हुस्न रखा और वही घटिया नाच गाने वाली ठेठ बंबइया फिल्म बना दी. इसे देख प्रेमचंद ने कथाकार उपेंद्र नाथ अश्क को लिखा, "यहां के डायरेक्टरों की जहनियत ही अनोखी है. बाजारे हुस्न ने सेवासदन की मिट्टी ही पलीद कर दी."
दो तरह के लेखक
फिल्म निर्माता आसिफ जाह कहते हैं, "फिल्म इंडस्ट्री में दो तरह के लेखक हैं. एक जो यहां के संघर्ष से बने और बहुत मशहूर हुए, दूसरे जो मशहूर होकर आए जैसे राही मासूम रजा, प्रेमचंद वगैरा. इनमें से राही मासूम रजा को ही कामयाबी नसीब हुई. बाकी सब प्रेमचंद की तरह वापस चले गए."
इसके बाद प्रेमचंद की कहानी मिल मजदूर पर गरीब मजदूर बनी. ( मजदूर स्‍वतंत्र फिल्‍म थी। यह उनकी किसी कहानी पर आधारित नहीं थी। प्रेमचंद ने इसकी कहानी और संवाद लिखे थे। - चवन्‍नी) इसमें प्रेमचंद ने एक रोल भी किया. फिल्म सेंसर से कई सीन काटे जाने के बाद रिलीज हुई. पूरे पंजाब में इसे देखने मजदूर निकल पड़े. लाहौर के इंपीरियल सिनेमा में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए मिलिट्री तक बुलानी पड़ी. ये फिल्म जबर्दस्त हिट हुई और सरकार के लिए मुसीबत बन गई. दिल्ली में इसे देख एक मजदूर मिल मालिक की कार के आगे लेट गया. नतीजा कि इस पर प्रतिबंध लग गया.
मायूसी में वापसी
इन घटनाओं से प्रेमचंद इतने आहत हुए कि मार्च 1935 में मुंबई छोड़ बनारस लौट गए. वापसी के बाद भी उनकी कहानियों पर फिल्में बनती रहीं लेकिन सफल नहीं रहीं. उनके उपन्यास चैगान हस्ती पर रंग भूमि बनी. इसके 13 साल बाद कृष्ण चोपड़ा ने 1959 में उनकी कहानी दो बैलों की कथा पर हीरा मोती बनाई. ये फिल्म कामयाब रही. इसमें शैलेंद्र के गीत लोकप्रिय हुए. सलिल चैधरी का संगीत भी सबको भाया. फिर 1963 में गोदान पर बनी पसंद नहीं की गई. हीरा मोती के बाद कृष्ण चोपड़ा ने 1966 में ऋषिकेष मुखर्जी के साथ मिलकर गबन बनाई.
प्रेमचंद की रचनाओं पर बच्चों के लिए भी कई फिल्में बनीं. प्रसिद्ध लेखक पत्रकार ख्वाजा अहमद अब्बास ने उनकी कहानी ईदगाह पर चिल्डेन फिल्म सोसाइटी से ईद मुबारक फिल्म बनाई. जगदीश निर्मल ने कुत्ते की कहानी के डायलॅाग और स्क्रीनप्ले लिखे. उनकी एक और कहानी कजाकी पर भी फिल्म सोसाइटी ने फिल्म बनाई. अमृत राय के मुताबिक उनकी ही एक कहानी पर सैलानी बंदर भी बनी. प्रेमचंद की उर्दू कहानी शतरंज की बाजी पर सत्यजीत राय ने 1977 में शतरंज के खिलाड़ी बनाई.
गरीब मजदूर से लेकर कफन तक प्रेमचंद की कहानियों पर 13-14 फिल्में बनीं. लेकिन वे हिंदी फिल्म उद्योग से जुड़ नहीं सके. उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री के बारे में लिखा, "सिनेमा में किसी तरह के सुधार की उम्मीद करना बेकार है. ये उद्योग भी उसी तरह पूंजीपतियों के हाथ में है जैसे शराब का कारोबार." प्रेमचंद के वंशजों में से एक और लमही पत्रिका के संपादक विजय राय के मुताबिक प्रेमचंद में समाज सुधार का जज्बा तो था "लेकिन फिल्मों में ये सब कहां चलता है. इसी कारण वे क्षुब्ध हुए."
रिपोर्टः सुहेल वहीद, लखनऊ
संपादनः अनवर जे अशरफ

Tuesday, July 30, 2013

मिली बारह साल पुरानी डायरी



कई बार सोचता हूं कि नियमित डायरी लिखूं। कभी-कभी कुछ लिखा भी। 2001 की यह डायरी मिली। आप भी पढ़ें। 

30-7-2001

      आशुतोष राणा राकेशनाथ (रिक्कू) के यहां बैठकर संगीत शिवन के साथ मीटिंग कर रहे थे। संगीत शिवन की नई फिल्म की बातचीत चल रही है। इसमें राज बब्बर हैं। मीटिंग से निकलने पर आशुतोष ने बताया कि बहुत अच्छी स्क्रिप्ट है। जुहू में रिक्कू का दफ्तर है। वहीं मैं आ गया था। रवि प्रकाश नहीं थे।
      आज ऑफिस में बज (प्रचार एजेंसी) की विज्ञप्ति आई। उसमें बताया गया था कि सुभाष घई की फिल्म इंग्लैंड में अच्छा व्यापार कर रही है। कुछ आंकड़े भी थे। मैंने समाचार बनाया बचाव की मुद्रा में हैं सुभाष घई। आज ही क्योंकि सास भी कभी बहू थीका समाचार भी बनाया।
      रिक्कू के यहां से निकलकर हमलोग सुमंत को देखने खार गए। अहिंसा मार्ग के आरजी स्टोन में सुमंत भर्ती हैं। उनकी किडनी में स्टोन था। ऑपरेशन सफल रहा, मगर पोस्ट ऑपरेशन दिक्कतें चल रही हैं। शायद कल डिस्चार्ज करें। अब हो ही जाना चाहिए? काफी लंबा मामला खिच गया।
      रास्ते में आशुतोष ने बताया कि वह धड़ाधड़ फिल्में साइन कर रहे हैं। कल उन्होंने आकाशदीप की और फिर एक दिनसाइन की। इस फिल्म में ढेर सारे कलाकार हैं। यह थ्रिलर फिल्म है। आशुतोष ने इसकी कहानी भी सुनाई।
      सुमंत के यहां से लौटते समय आशुतोष ने बताया कि वह मंदिरा के पिता कश्यप से मिल कर लौटेंगे। कश्यप भगत सिंह पर फिल्म बनाने की सोच रहे हैं, जिसमें चंद्रशेखर आजाद का रोल आशु को दिया जा रहा है। रवि प्रकाश ने उनसे कहा कि रोल के लिए हां मत कहिएगा। आशुतोष ने साफ कहा, ‘इतने पैसे मांगूंगा कि अंकल खुद ही राजी नहीं होंगे।
      बातचीत में कभी मुकेश तिवारी का भी जिक्र आया।

31-7-2001

      सुमंत को हास्पिटल से डिस्चार्ज करवा कर उनके घर पहुंचाने के लिए बारह बज खार रोड स्थित आरजी स्टोन पहुंचा। वहीं महेश भट्ट का फोन आया। वे कल दिल्ली में थे। प्रिय पाठकों के लिए उन्हें लेख लिखना था। बात हुई कि इस बार सुभाष घई पर लेख हो। सुभाष घई की फिल्म यादेंबेहतर पिट गई है। फिर भी उनका अहंकार खत्म नहीं हुआ है। महेश भट्ट ने कहा है कि वे सुभाष घई पर अवश्य लिखेंगे। शाम में उनका फिर से फोन आया कि उन्होंने लिख लिया है। कल ऑफिस में उनका फैक्स मिलेगा।
      महेश भट्ट सुभाष घई को शो मैन नहीं मानते। कैसा शो मैन और काहे का शो मैन। राजकुमार संतोषी की भी यही राय है। पिछले दिनों हैदराबाद में लज्जा  की शूटिंग के अंतिम चरणों में उनसे मुलाकात हुई। वह उर्मिला मातोंडकर पर आइटम सौंग आइए, आ जाइए, आजी जाइएकी शूटिंग कर रहे थे। रात में डिनर के बाद अनौपचारिक गपशप में उन्होंने कहा कि पत्रकारों और समीक्षकों को सुभाष घई का पर्दाफाश करना चाहिए। फिल्मफेयर की पत्रकार अनुराधा ने तब हां में हां मिलाया। उसी रात राम गोपाल वर्मा का भी जिक्र आया। रोम गोपाल वर्मा किस प्रकार खालिद मोहम्मत से नाराज चल रहे हैं। उसकी वजह क्या है? अनुराधा ने बताया कि हर फिल्म की रिलीज के समय राम गोपाल वर्मा के फोन आने लगते हैं। इस बार लव के लिए कुछ भी करेगा’ - निर्देशक ई निवास पर खालिद का रिव्यू देख कर रामू बहुत नाराज हुए हैं।

1 अगस्त 2001

      आज महेश भट्ट ने सुभाष घई पर लेख भेजा। इसमें उन्होंने जीवन चक्र की बात की है। बताया है कि सुभाष घई नाम का ब्रांड मर रहा है। यादेंकी विस्तृत चर्चा नहीं थी लेख में। महेश भट्ट अपने लेखों में धार का भ्रम पैदा करते हैं। वे गहरे विश्लेषण में नहीं उतरते। उनके पास एक खास दृष्टि है। एक दर्शन भी है। यह उन्हें रजनीश और कृष्णमूत्र्ति की संगत से मिली है। मुझे लगता है कि वे या तो जल्दबाजी में रहते हैं या फिर कई फ्रंट पर एक साथ व्यस्त हैं।
      शाम में कर्मा फिल्म्स प्रेस कांफ्रेंस था। विजय जिंदल ने जी टीवी के साथ मिलकर इसका गठन किया है। यह छोटी फिल्में बनाएगा। पहली फिल्म तिग्मांशु धूलिया की हासिलहै। इसमें जिम्मी शेरगिल और रिशित भट्ट के साथ इरफान और आशुतोष राणा हैं। विजय जिंदल पहले जी टीवी में थे। वहां से निकलने के बाद कुछ समय तक बाहर रहे और अब यह काम - फिल्म निर्माण का। उन्होंने कारपोरेट संस्कृति की बात की है। वह मानते हैं कि फिल्म निर्देशक भी फिल्म का सीइओ होताहै। इस संबंध में पूछने पर तिग्मांशु ने जवाब दिया - निश्चित समय में फिल्म पूरी करना भी एक जिम्मेदारी है। यह जिम्मेदारी बगैर सीइओ का रूख अपराए नहीं निभाई जा सकती।
      तिग्मांशु की फिल्म हासिलकैंपस की पृष्ठभूमि में है। इसमें इलाहाबाद का बैकड्रॉप है। इसे प्रेमकहानी के तौर पर बना रहे हैं तिग्मांशु। उनका इरादा कभी खुशी कभी गमसे टकराने का है। उनकी लगन देखकर लगता है कि वह अवश्य कुछ कर लेंगे।
      इरफान ने बताया कि उन्होंने टीवी का काम बंद कर दिया है। मुझे याद आता है कि जब मैं मुंबई आया था तो गोविंद निहलानी की फिल्म दृष्टिमें वह डिंपल कपाडिय़ा के साथ दिखे थे। कुछ समांतर फिल्में भी की, लेकिन बाद में टीवी में व्यस्त हो गए। अभी फिर से फिल्म में सक्रिय हो रहे हैं।

फट्टा टाकीज

उमेश पंत का यह लेख हम ने गांव कनेक्‍शन से चवन्‍नी के पाठकों के लिए साभार लिया है। 
 
-उमेश पंत 
लखनउ से 14 किलोमीटर उत्तर दिशा में काकोरी नाम का एक छोटा सा कस्बा है। इस कस्बे में संकरी सी रोड पर चलते हुए हैंडपंप के पीछे चूने से पुती हुई एक दीवार पर लकड़ी का एक पटला सा दिखता है। उस पटले पर एक फिल्मी पोस्टर चस्पा है जिसपर लिखा है 'मौत का खेल'। दीवार से सटे हुए गेट के अन्दर जाने पर सामने की दीवार पर रिक्शेवाली और फांदेबाज़ से लेकर रजनीकांत की बाशा और संजय दत्त की अग्निपथ जैसी फिल्मों के पोस्टर एक कतार से लगे हैं। फिल्मी पोस्टरों की कतार के नीचे अग्निशम के लिये दो सिलिन्डर दीवार पर लटके हुए हैं। कुछ आगे बढ़ने पर टीन की दीवारों और काली बरसाती की छत वाला एक बड़ा सा हौल नज़र आता है। यह हौल काकोरी और उसके आस पास के कई गांवों की 13 हज़ार से ज्यादा जनसंख्या के मनोरंजन का एक अहम साधन है। काकोरी और आसपास के इन गांवों में इसे फट्टा टॉकीज़  के नाम से जाना जाता है।

जीनिया वीडियो सिनेमा नाम के इस ग्रामीण मिनी सिनेमा हॉल को पिछले बीस सालों से चलाने वाले नियाज़ अहमद खान बताते हैं "हमने अपनी लड़की के नाम पर इसका नाम रखा। 1993 से यहां फल्में दिखाना शुरु किया।  शुरुआत में दर्शकों से एक फिल्म का 6 रुपये लेते थे। सन 2000 में हमने टिकिट 10 रुपये की कर दी। तब से अब तक हमने टिकट की कीमत नहीं बढ़ाई। हम चाहते हैं कि पब्लिक पे बोझ ना पड़े।"

टीन के बने इस बड़े से हॉल की ड्योढ़ी पर मोटी सी दरी का पर्दा लगा हुआ है।हॉल के अन्दर लगभग 70-80 कुर्सियां हैं । सामने दीवार पर लगे 6 बाई 4 के पर्दे पर फिल्में चलाई जाती हैं। इस हॉल की छत लकड़ी के फट्टों से मिलकर बनी है। यही वजह रही होगी कि इस तरह के मिनी सिनेमा हॉल फट्टा टॉकीज़ नाम से जाने जाते हैं।


इस छोटे से कस्बे में चल रहे फट्टा टॉकीज़ के का आर्थिक ढ़ांचा बड़ा रोचक है। हॉल के पीछे एक छोटा सा कमरा बना है। इस कमरे में बने लकड़ी के रैक पे एक डीवीडी प्लेयर रखा है। " 2008 तक हम रील से फिल्में चलाते थे। उसके बाद डीवीडी प्लेयर पर फिल्में चलाने लगे। डीवीडी प्लेयर के अलावा छोटे लैंस वाला प्रोजेक्टर यूज़ होता है। ये प्रोजेक्टर 30 से 35 हज़ार रुपये का आता है। हर 6 महीने में इस पा्रेजेक्टर का लैंस बदलना होता है। हम 6 महीने में नया प्रोजेक्टर खरीद लेते हैं। पुराने वाला कम दामों में बिक जाता है। दो जनरेटर भी हैं ताकि बिजली जाने पर भी शो चलता रहे। वीडियो पार्लर चलाने के लिए एक साल का लाईसेंस 6 हज़ार रुपये का बनता है।" नियाज़ बताते हैं।

इस छोटे से हॉल का बाकायदा रजिस्ट्रेशन किया गया है। नियाज़ कहते हैं "हम महीने का 12 हज़ार रुपये मनोरंजन कर के रुप में देते हैं। 5 लेबरों को काम पर लगाया है। शहरों में वीडियो पार्लर चलाने के लिए जितना टैक्स लगता है उतना ही यहां देहातों में भी लगाया जाता है। देहात और गांवों में इतना खर्चा कोई उठा नहीं पाता इसलिये फट्टा टॉकीज़ के अब बंद होते जा रहे हैं।"

नियाज़़ अपनी ज़मीन पर ही ये वीडियो पार्लर चलाते हैं। उनका दर्शक वर्ग भी बंधा हुआ है।  "20 से 25 लोग ऐसे हैं जो लगातार आते हैं। गर्मियों में एक दिन के 4 शो चलते हैं। दिन के 12 बजे से रात के बार बजे तक तीन घंटे पर एक शो चलता है। लेकिन जाड़ों में आंखिरी शो नहीं चलता। गर्मियों में काफी भीड़ रहती है। गांवों में नौटंकी भी होती है। नौटंकी देखने आने वाले लोग पहले हमारे यहां नाईट शो देखते हैं और उसके बाद देर रात जब नौटंकी शुरु हो जाती है तो वो नौटंकी देखने चले जाते हैं।"

गांवों में जैसे जैसे डिश टीवी ने अपने कदम बढ़ाये वैसे वैसे इन छोटे छोटे वीडियो पार्लरों के दर्शक भी सिमटते चले गये और इसका सीधा असर काकोरी के इस वीडियो पार्लर पर भी पड़ा। "अब घर घर में टीवी और डीवीडी प्लेयर है इसलिये यहां आने वाले दर्शकों की संख्या में अंतर आया है । अपनी ज़मीन न होती तो हमें कोई मुनाफा ही न होता और हम भी बंद कर देते। मोहनलालगंज में भी हमने शुरुआत की लेकिन वहां अच्छा नहीं चला इसलिये बंद करना पड़ा। सन 2000 में यहां परदे पर सिनेमा देखने का बड़ा क्रेज़ था। 200 से 300 लोग रोज फिल्में देखते थे। अब 40-50 से ज्यादा लोग नहीं आते। पर अब भी काकोरी के आसपास के 65 गांवों से लोग यहां फिल्म देखने आ रहे हैं।" नियाज़ बताते हैं।

टीन और तिरपाल से बना फट्टा टॉकीज़   फोटो:उमेश पन्त  
स्थानीय सिनेमा यहां की जनता में ज्यादा लोकप्रिय नहीं है। कम बज़ट की हौरर फिल्में और बालिवुड की नयी फिल्में यहां के दर्शकों की चहेती हैं। नियाज़ बताते हैं "हाल ही में खिलाड़ी 786 और दबंग टू हमने चलाई थी। नई फिल्मों में हाउसफुल रहता है। यहां लोग हौरर फिल्में देखना ज्यादा पसंद करते हैं। पुरानी फिल्में चलती हैं तो उन्हें बुजुर्ग भी देखने आते हैं। मेरे हुज़ूर एक फिल्म चलाई थी उसमें काफी बुजुर्ग देखने आये थे।" नियाज़ हंसते हुए आगे बताते हैं "यहां या तो भूत चलता है या सलमान खान।"

शहरी परिवेश में फिल्मों पर भले ही लाख समीक्षाएं और अध्ययन किये जाते हों, पर यहां फिल्मों को देखने का एक मात्र मकसद मनोरंजन है। अभी अभी फिल्म देखकर लौटे राकेश 25 कहते हैं "हम मजदूरी का काम करते हैं, बीच में एक दो घंटे का टाईम निकलता है तो टाईमपास करने यहां आ जाते हैं। पहली फिल्म अपने पिताजी के साथ यहीं इसी हौल में देखी थी। फिल्म का नाम याद नहीं है। अमिताभ की थी शायद।"

कम संसाधनों के बावजूद ये हॉल अब भी दर्शकों के बीच अपनी जगह बनाये हुए है तो इसकी अपनी वजहें हैं। 10 रुपये के मामूली टिकट उनकी जेब पर कोई बड़ा फर्क नहीं डालता। दूसरा ये भी कि बड़े सिनेमाघर महंगे होने के साथ साथ दूर भी हैं। अवधेश कुमार 22 कहते हैं "लखनउ यहां से बहुत दूर पड़ता है। और उतना पैसा भी नहीं रहता। इसीलिये यहीं आकर देख लेते हैं।"

डी वी डी प्लेयर की मदद से परदे पर चलती हैं फिल्में   फोटो:उमेश पन्त
देश में हर साल सैकड़ों की तादात में फिल्में बनती हैं और सिनेमाई परदों से हफ्ते भर या ज्यादा हुआ तो दो हफ्ते में उतर जाती हैं। ऐसे में पुरानी फिल्मों को इस तरह के छोटे टॉकीज़ ने आज भी जि़न्दा रखा है। तभी तो अवधेश कहते हैं "राजेश खन्ना की रोटी हमें सबसे अच्छी फिल्म लगी। पुराने हीरो की फिल्में देखनी ज्यादा अच्छी लगती हैं। दर्द भरे गीत फिल्म हों तो वो अच्छे लगते हैं।"

गांवों में दिखाया जाने वाला ये सिनेमा बौलीवुड की नई पुरानी फिल्मों के अलावा, हिन्दी में डब की हुई विदेशी फिल्मों से लेकर बी ग्रेड फिल्मों के लिये भी एक बाज़ार पैदा करता है। यहां दिखाई जाने वाली ज्यादातर फिल्मों में मौजूद उत्तेजक दृश्यों की वजहकर महिलाएं और लड़किया आमतौर पर यहां आना पसंद नहीं करती। "साल 2000 तक तो यहां महिलाओं के बैठने के लिये अलग लेडीज़ क्लास भी था। तब लोग भी ज्यादा आते थे। लेकिन अब यहां फिल्में देखने आने वालों में सारे लड़के ही होते हैं। त्यौहारों के मौके पर शादीशुदा लोग अपनी पत्नियों के साथ भी आते हैं पर अमूमन महिलाएं बहुत कम आती हैं।" नियाज़ बताते हैं।

नियाज़ के बेटे फहद खान इस टॉकीज़ को चलाने में उनकी मदद करते हैं। वो बताते हैं कि "फिल्मों के अलावा लोगों को क्रिकेट देखने का भी बहुत शौक है।  मैच के टाईम यहां सबसे ज्यादा भीड़ रहती है। तब हाल फुल रहता है। अभी 20-20 मैच हुए थे तो हमने डिश से जोड़कर बड़े परदे पर मैच चलाया था। दूर दूर से लोग देखने आये थे। फाईव पाईन्ट वन के साउन्ड सिस्टम में मैच देखने का अपना ही मज़ा आता है। वैसे गर्मियों में लोगों के आने की एक और वजह रहती है। गर्मी से परेशान लोग कुछ घंटे कूलर और पंखे की हवा खाने के लिये ही सही यहां आ जाते हैं। कई तो फिल्म देखते देखते सो ही जाते हैं।" फहद मुस्कुराते हुए कहते हैं

देशभर के ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में सिनेमा देखने के ऐसे कई छोटे छोटे ठिकाने हैं जिनका सम्बन्ध बाॅक्स आॅफिस से दूर दूर तक नहीं है। मल्टीप्लेक्स के इस ज़माने में शहरों से सिंगल स्क्रीन भले ही गायब होते जा रहे हों पर बिहार, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखंड जैसे राज्यों में ऐसे छोटे टॉकीज़ अब भी आंखिरी संासें ले रहे हैं। महाराष्ट्रा में ऐसे मिनी सिनेमाघरों का इतिहास 60 साल से ज्यादा पुराना रहा है। वहां के गांवों में बाकायदा ट्रकों पर टैन्ट और फिल्में दिखाने के लिए ज़रुरी संसाधन लादकर एक गांव से दूसरे गांव जाकर फिल्में दिखाने वाले टॉकीज़ आज भी मौजूद हैं। एक वक्त था जब वहां ऐसे 300 से ज्यादा टैन्ट टॉकीज़ हुआ करते थे। अब उनमें से 50 के आसपास बचे रह गये हैं।

जमशेदपुर  में रहने वाले सोहम मित्रा 19, अक्सर काम के सिलसिले में बिहार और झारखंड के सीमावर्ती इलाकों में जाते रहते हैं। वो बताते हैं कि "झारखंड और बिहार की सीमा से लगे इन्टीरियर इलाके खासवान में पहली बार उन्होंने इस तरह के टैंट वाले सिनेमाघर में फिल्म देखी। वहां के लोग इसे गोशाला कहते हैं। मैदान के बीच में एक तम्बू लगा होता है जिसके अन्दर कपड़े के स्क्रीन पर प्रोजेक्टर से फिल्म दिखाई जाती है। 500 मीटर के इलाके में आने वाले लगभग 4 गांवों के लोग इस जगह फिल्म देखने आते हैं। शनिवार और रविवार को इस मैदान में सब्जी मंडी लगती है। इस वजह से इन दिनों फिल्म देखने वालों की संख्या बढ़ जाती है। इस तम्बू में यही कोई 25 सीट होंगी। यहां कुर्सियों पर बैठने के 20 रुपये और ज़मीन पर बैठने के 5 रुपये लगते हैं।" सोहम बताते हैं।


 क्या है तम्बू कीज़ का इतिहास


मुम्बई के तम्बू टॉकीज़ का इतिहास यही कोई 60 साल पुराना रहा है। अमित मधेशिया और सर्ली अब्राहम ने मुम्बई के इन तम्बू टॉकीज़ पर अपनी फोटो डाक्यूमेंट्री और शोध पत्र तैयार किया जिसमें उन्होंने इनके इतिहास में झांकने की कोशिश की। उनके शोध के मुताबिक मुम्बई के एक फुटपाथ पे एक पारसी सेकन्ड हैन्ड प्रोजेक्टर बेच रहा था तो आस पास के कुछ किसानों, वकीलों और बिजली का काम करने वाले लोगों ने मिलकर इन्हें खरीद लिया। इन लोगों ने आस पास के गांवों में टैंट लगाकर इन प्रोजेक्टरों की मदद से आध्यात्मिक फिल्में गांव वालों को दिखाना शुरु किया। इन तम्बुओं के अन्दर जाने से पहले लोगों को अपनी चप्पलें बाहर उतारनी होती थी।

धीरे धीरे इस तरह के माहौल में एक साथ फिल्में देखना उन गांवों की संस्कृति का हिस्सा बनने लगा। आध्यात्मि फिल्मों से अलग इन तम्बुओं में अब बालिवुड फिलमों के साथ साथ स्थानीय सिनेमा भी दिखाया जाने लगा। पूरे महाराष्टा में 300 से ज्यादा तम्बू टाकीज़ चलने लगे। 

इस तरह के टॉकीज़ की संख्या बढ़ने के साथ साथ इनकी आपसी प्रतिस्पर्धा भी बढ़ने लगी। अपनी ओर ध्यान खींचने के लिये इन्होंने सारी तिकड़में भिड़ानी शुरु कर दी। लाउडस्पीकर पर उंची आवाज़ में संगीत बजाने से लेकर, आकर्षक पोस्टरों और बड़े बड़े होर्डिंग्स तक इनके तामझाम का हिस्सा बनने लगे।
इन तम्बू टॉकीज़ की खास बात ये थी कि यहां महिलाएं भी भारी मात्रा में फिल्में देखने आती थी। बल्कि वो दर्शकदीर्घा का एक अहम हिस्सा थीं। 9 से 12 का शो बाकायदा महिलाओं से पटा रहता था।

जब सीडी और डीवीडी ने बाज़ार में दस्तक दी तो तम्बू टॉकीज़ का ये बड़ा बाज़ार सिमटने लगा। और अब देशभर में बहुत कम ऐसे टॉकीज़ बचे हैं और जो बचे भी हैं वो भी अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष ही कर रहे हैं। 

Monday, July 29, 2013

मनोज बाजपेयी से पूछे गए सवाल

फेसबुक पर मैं दोस्‍तों से सवाल मांगता हूं। कभी किसी से मिलने जाता हूं तो दोस्‍तों से भी पूछ लेता हूं। आम तौर पर बेहद साधारण सवाल आते हैं। ज्‍यादातर सवाल गॉसिप से जुढ़े होते हैं और उनमें अनादर भी रहता है। मनोज बाजपेयी से पूछे मैंने दोस्‍तों के सवाल.... 
-अभिनय की परिभाषा क्या है? (मनीष चैरसिया)
0 अभिनय की परिभाषा इसी शब्द में छिपी है। अभी जो नया करें वही अभिनय है। अभिनय का जीवन से गहरा ताल्लुक है।
- ब्लॉग अपडेट क्यों नहीं कर रहे हैं? (anand expt)
0 लंबे समय तक ब्लॉग लिखने के बाद मुझे लगा कि मै खाली हो चुका हूं। अभी के माहौल में मैं खुलकर राजनीतिक बातें नहीं कर सकता। हालांकि यह बात लोकतंत्र लगेगी, लेकिन यही सच्चाई है। अगर खुलकर नहीं लिख सकता तो लिखने का कोई मतलब नहीं है। यह वादा करता हूं कि वापस जरूर आऊंगा।
- आप अपने निभाए तमाम किरदारों को एक कैरी केचर आयडेंटिटी क्यों दे देते हैं? (प्रशांत कश्‍यप)
0  इसे कैरी केचर आयडेंटिटी न कहें। हर किरदार में व्यक्ति अलग होते हैं। व्यक्ति अलग होते हैं तो उनके अलग होने से उनके आचार-विचार, भाव-भंगिमा और बात-व्यवहार में तो फर्क आएगा ही। अगर वो फर्क नहीं करना है और सटल एक्टिंग के नाम पर दुनिया को बेवकूफ बनाना है तो अभिनय करने का कोई मतलब नहीं बनता है। अभिनय की मेरी शिक्षा-दीक्षा के दौरान मेरे टीचर ने कहा था कि अगर अपने किरदार की वजह से तुम जाने जाते हो तो तुम एक्टर नहीं हो। हमेशा एक्टर से किरदार की पहचान होनी चाहिए। हर कैरेक्टर को पहचान देने के लिए ऐसा करता हूं। आप जिसे कैरी केचर आयडेंटिटी कह रहे हैं वास्तव में वह उस कैरेक्टर को पहचान देना है।
- चंपारण में थिएटर एक्टिवीटी के लिए कुछ सोच रहे हैं क्या? (सौरभ संतोष)
0 इस सवाल से मैं सालों से जूझ रहा हूं कि कहां से शुरू करूं? बेतिया, बेलवा की अपनी यात्रा में कभी न कभी मुझे वहां कोई ऐसा समूह मिलेगा जो किसी ग्रुप के लिए तैयार होगा। मैं उनकी आवश्यकता के अनुसार हर प्रकार का सुझाव और निर्देश दूंगा। समस्या है कि छोटे शहरों में ऐसे ग्रुप का जल्दी ही राजनीतिकरण हो जाता है। मैं एक परिषद बनाना चाहता हूं। उस परिषद में साहित्य, नाटक और अन्य विधाओं की बातें हों।
- गांव के मनोज और आज के मनोज बाजपेयी में क्या अंतर है? (राकेश पाठक)
0 दस साल पहले और आज के मनोज में अंतर आ गया है। आप तो गांव की बात कर रहे हैं। पहले मैं बहुत ज्यादा रिएक्ट करता था। अभी ऐसा नहीं करता हूं। अभी मैं चीजों को देखता, समझता और सोचता हूं फिर संभल-संभल कर कुछ कहता हूं। शायद यह उम्र का भी असर है। अब मैं पहले की तरह जवान नहीं रहा। बीवी और बेटी के आने के बाद जिम्मेदारियों के एहसास से मैं अधिक परिपक्व हुआ हूं। आत्मा अभी भी गांव की है, लेकिन बाहरी तौर पर सबकुछ बदल गया है।
- क्या रोमांटिक फिल्में करेंगे? (देव तिवारी)
0 क्यों नहीं। मैं तो रोमांटिक और कॉमेडी दोनों फिल्में करना चाहता हूं। अभी जिस तक के रोमांटिक और कामेडी फिल्में बन रही हैं उनके लिए मैं सक्षम नहीं हूं। मेरे तरीके के रोमांटिक फिल्म मिले तो बात बने। रॉबर्ट डिनोरो और मर्लिन स्ट्रीक की फिल्म ‘फॉलिंग इन लव’ जैसी कोई फिल्म मिले तो बात बने। मैंने अपने जीवन में इससे अच्छी रोमांटिक फिल्म नहीं देखी है। ऐसी कोई फिल्म मिले तो अच्छा लगेगा मुझे।
- दो फिल्मों के प्रमोशन के समय उनकी अभिनेत्रियों ने आपके पांव छूए थे। यह सिर्फ दिखावटी था या कोई और बात थी? (अजीत मैर्या)
0 मुझे यह दिखावटी बात नहीं लगती। पहले से मुझे कुछ भी नहीं मालूम था। तब्बू ने मेरी फिल्म ‘सत्या’ देखी थी। आज से 14 साल पहले उन्होंने ऐसा व्यवहार किया था। कट्रीना कैफ ने ‘राजनीति’ के प्रचार के समय मेरे पांव छू लिए थे। दोनों ने फिल्में देखने के बाद ऐसा किया था। ‘सत्या’ के बारे में तो खैर सभी को मालूम है कि मुझे कैसी सराहना मिली थी। ‘राजनीति’ में कट्रीना साथ काम कर रही थी। कई शॉट्स में हमलोग साथ में थे। उन्हें शूटिंग के समय यह एहसास नहीं था कि सबकुछ पर्दे पर कैसा दिखेगा। फिल्म देखने के बाद वह चौंक गईं। उनकी समझ में आया कि अभिनय की यह अलग प्रक्रिया और आयाम है। यह उन दोनों का बड़पन है। उनका साहस है।
- सामाजिक दायित्वों का निर्वाह अब कैसे करते हैं? उसका स्वरूप कैसा है? (आलोक उपाध्‍याय)
0 थिएटर के दिनों में बच्चों के पुनर्वास के लिए रंगकर्म करता था। उन दिनों थिएटर का भावनात्मक और सामाजिक उपयोग करते थे। हम लोगों ने अनेक एनजीओ के लिए काम किया। मुंबई आने के बाद यह सब छूट गया। अभी फिर से अपनी क्षमता के अनुसार थोड़ा-बहुत कुछ करता हूं।
- आप और शाहरुख खान दोनों बैरी जॉन के शिष्य थे। अभी आप दोनों मुंबई में हैं। फिर भी न तो आप दोनों एक साथ कोई फिल्म की और न एक दूसरे के घर आते-जाते हैं। क्या बात है? (ठाकुर आशीष आनंद)
0 वैनकोवर में शाहरुख ने मुझ से पूछा कि तू घर क्यों नहीं आता है? मेरा यही जवाब था कि तू बुलाएगा तो मैं जरूर आऊंगा। शाहरुख बहुत बड़े स्टार हैं। हमारी मुलाकात के लिए जरूरी है कि वे बुलाएं। अब मैं मन्नत के आगे तो खड़ा नहीं रह सकता। वहां वॉचमैन मुझे अंदर ही नहीं जाने देगा। उसके लिए शाहरुख को शुरुआत करनी पड़ेगी। ऐसे संबंध में जहां पर एक स्टार और एक एक्टर है तो स्टार को ही कदम उठाने पड़ते हैं।

Saturday, July 27, 2013

फिल्‍म समीक्षा : इसक

असंगत प्रेम की असंगत कहानी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
    मनीष तिवारी की ‘इसक’ देखते समय और देख कर निकलने के बाद भी याद नहीं रहता कि फिल्म का मुख्य विषय और उद्देश्य क्या था? प्रचार और घोषणा के मुताबिक बनारस की पृष्ठभूमि में यह शेक्सपियर के ‘रोमियो जूलियट’ पर रची गई फिल्म है। कुछ दृश्यों में ही यह फिल्म रोमांटिक लगी है। कभी दो परिवारों के कलह तो कभी बिजनेश को लेकर चल रही छल-कपट ़ ़ ़इतना ही नहीं बनारस में दक्षिण भारतीय नक्सल नेता के नेतृत्व में लड़ा जा रहा आंदोलन ़ ़ क़ुल मिलाकर ‘इसक’ एक ऐसी खिचड़ी बन गई है, जो हर कौंर में पिछले स्वाद को कुचल देती है। कमजोर फिल्में निराश करती हैं, लेकिन ‘इसक’ तो हताश करती है। क्या मिले हुए मौके को ऐसे गंवाया जा सकता है?
    समस्या यह है कि अभी ठीक ढंग से स्थापित नहीं हो सके विशाल भारद्वाज और अनुराग कश्यप की शैलियों की नकल में मनीष तिवारी अपनी पहली फिल्म ‘दिल दोस्ती एटसेट्रा’ की सादगी और गहराई भी भूल गए हैं। न तो यह फिल्म इश्क की दास्तान है और न ही दो परिवारों के झगड़े की कहानी ़ ़ ़ दाल-भात में मूसलचंद बने रवि किशन के किरदार की यही नियति होनी थी। अपने उम्दा अभिनय के बावजूद रवि किशन भी फिल्म को नहीं संभाल पाते। यह उनका काम भी नहीं था। हां,राजेश्वरी सचदेव ने प्रतिभा के दम पर एकांगी किरदार को अर्थ दे दिया है। वह दमदार अभिनेत्री हैं। अन्य कलाकार सामान्य हैं।
    फिल्म के मुख्य कलाकार प्रतीक और अमायरा दस्तूर ने समान रूप से निराश किया है। प्रतीक की संवाद अदायगी इतनी गड़बड़ है कि कान लगाने पर भी ठीक से संवाद नहीं सुनाई पड़ते। दूसरे एक ही वाक्य में निीर्थ अल्पविराम आते हैं। यों बोलते हैं, ज्यों एहसान कर रहे हों। उन्होंने किरदार पर कोई मेहनत नहीं की है। नायिका उनसे बीस इसलिए ठहरती हैं कि उन्होंने थोड़ी मेहनत की है। कुछ दृश्यों में ही उन्हें इस मेहनत का फल मिला है।
    फिल्म का गीत-संगीत बेहतर है। उसके आनंद के लिए फिल्म देखने की जरूरत नहीं है। किसी ने सही प्रतिक्रिया दी कि उन्हें यूट्यूब पर देख लें।
अवधि-148 मिनट
** दो स्टार

Friday, July 26, 2013

फिल्‍म समीक्षा : बजाते रहो

Bajate Raho-अजय ब्रह्मात्‍मज
दिल्ली में ठग रहते हैं। 'दिल्ली का ठग' से लेकर 'बजाते रहो' तक में हम उन्हें अलग-अलग रूपों में हिंदी फिल्मों में देखते रहे हैं। 'बजाते रहो' का ठग सबरवाल एक बैंक का मालिक है। वह चंद सालों में रकम बढ़ाने का झांसा देकर 15 करोड़ रुपए जमा करता है। देनदारी के समय रकम नहीं लौटा पाने की स्थिति में वह साफ मुकर जाता है। गाज एक कर्मचारी पर गिरती है। वे इस बेइज्जती को बर्दाश्त नहीं कर पाते। फिल्म की कहानी यहीं से शुरू होती है।
सबरवाल काइयां, शातिर और मृदुभाषी ठग है। फ्रॉड और झांसे के दम पर उसने अपना बिजनेस फैला रखा है। कर्मचारी का परिवार मुसीबत में आने के बाद अनोखे किस्म से बदला लेता है। परिवार के सभी सदस्य मिल कर सबरवाल को चूना लगाने की युक्ति में जुट जाते हैं। वे अपनी तिकड़मों से इसमें सफल भी होते हैं।
'बजाते रहो' मजेदार कंसेप्ट की फिल्म है, लेकिन लेखक-निर्देशक ने इस कंसेप्ट को अधिक गहराई से नहीं चित्रित किया है। उनके पास समर्थ कलाकारों की अच्छी टीम थी। फिर भी आधे-अधूरे का एहसास बना रह जाता है। किरदारों की विस्तार नहीं दिया गया है, इसलिए वे निखर और उभर नहीं पाए हैं। फिल्म का फील दिल्ली का है। भाषा, लहजा, बात व्यवहार और प्रतिक्रियाओं में 'बजाते रहो' दिल्ली की फिल्म लगती है। यह इसकी खूबी है।
कलाकारों में रवि किशन के इस अंदाज में देखना अच्छा लगता है। ऊपर से सभ्य-सुशील और अंदर से शातिर-शैतान व्यक्ति को उन्होंने अच्छी तरह पर्दे पर उतारा है। इस फिल्म की नायिका डॉली आहलूवालिया हैं। अदायगी की उनकी छटा देखते ही बनती है। अन्य कलाकारों में रणवीर शौरी, विनय पाठक, विशाखा सिंह उल्लेखनीय हैं। बृजेन्द्र काला और राजेन्दर सेठी को हम दिल्ली के किरदारों में लगातार देख रहे हैं। वे सक्षम हैं, लेकिन उन्हें अब अलग मिजाज और मेल के किरदार भी मिलने चाहिए।
'बजाते रहो' उम्दा कंसेप्ट पर बनी एक औसत फिल्म है। फिर भी विषय और अप्रोच की नवीनता से एंटरटेन करती है। कलाकारों ने स्क्रिप्ट की सीमाओं मे भी उम्दा प्रदर्शन किया है।
अवधि-107 मिनट
*** तीन स्‍टार

Thursday, July 25, 2013

सुशांत सिंह राजपूत की 'ब्‍योमकेश बख्‍शी' बनने की तैयारी

-अजय ब्रह्मात्मज
देश में इस साल जबरदस्त मॉनसून आया हुआ है और इसके छींटे कोलकाता की गलियों और सडक़ों को मंगलवार को भीगो रहे थे। ठहरा शहर कुछ और थमकर चल रहा था। शहर की इस मद्धिम चाल के बीच भी ‘पार्क स्ट्रीट’ के पास शरगोशियां चालू थीं। मौका था ‘ब्योमकेश बख्शी’ के नायक सुशांत सिंह राजपूत के मीडिया से रू-ब-रू होने का। सुशांत सिंह राजपूत और दिबाकर बनर्जी ने मीडियाकर्मियों के साथ धरमतल्ला से खिदिरपुर तक की ट्राम यात्रा की। इस फिल्म में कोलकाता से जुड़ी पांच-छह दशक पुरानी कई चीजें देखने को मिलेंगी।
    एक सवाल के जवाब में सुशांत ने बताया कि मैं छह दिन पहले से कोलकाता में हूं। इस दरम्यान वे डिटेक्टिव ब्योमकेश के व्यक्तित्व को साकार करने के लिए स्थानीय लोगों से मिलकर बात-व्यवहार सीख रहे हैं। गौरतलब है कि दिबाकर बनर्जी की फिल्म ब्योमकेश बख्शी में वे पांचवे दशक के आरंभ(1942 के आसपास) के किरदार को निभा रहे हैं। हिंदी दर्शकों के लिए यह किरदार अपरिचित नहीं है। दूरदर्शन से प्रसारित इसी नाम के धारावाहिक में वे किरदार से मिल चुके हैं। सालों बाद दिबाकर बनर्जी को किशोरावस्था में पढ़े शर्दिंदु बनर्जी के किरदार ब्योमकेश की याद आई और उन्होंने इसे बड़े पर्दे पर लाने का फैसला किया। पिछले कुछ सालों में बंगाली में ब्योंमकेश पर अनेक टीवी शो और फिल्में आ चुकी हैं। ऋतुपर्णो घोष भी इसी किरदार को लेकर बंगाली में फिल्म बना रहे थे, जिसमें नायक के रूप में उन्होंने सुजॉय घोष को चुना था।
    दिबाकर बनर्जी के शब्दों में मुझे यह किरदार शुरू से आकर्षित करता रहा है। मुझे इस किरदार को फिल्म में लाने का मौका अभी मिला है। फिल्म सोचने के बाद कोलकाता आने पर मुझे एक और कैरेक्टर मिल गया। पहले  फिल्म में कोलकाता बैकग्राउंड में था। अब वह एक जीवंत कैरेक्टर बन चुका है। इस फिल्म को देखते समय दर्शक महसूस करेंगे कि ब्योमकेश बख्शी का फिल्मांकन कोलकाता के अलावा और कहीं हो नहीं सकता था।
    वे आगे कहते हैं, मैं खुद बंगाली हूं, लेकिन कोलकाता को इतनी अच्छी तरह नहीं जानता था। यहां आने के बाद मैंने देखा कि मॉर्डन कोलकाता में पुराना कोलकाता सांसें ले रहा है। हमने कई लोकेशन तय कर लिए हैं। अब हमारी बड़ी चुनौती है, उन्हें फिल्म में कैसे पिरोया जाए। निश्चित ही, इस फिल्म में वीएफएक्स का सदुपयोग होगा।
    पजामा-कुर्ता में आए सुशांत सिंह राजपूत में ब्योमकेश बख्शी में ढलने की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है। उन्होंने पिछले एक हफ्ते में कोलकाता की गलियों की सैर की है। स्थानीय लोगों से भी वे मिले हैं। बंगाली परिवारों में खाना खाया है और पुराने जमाने की कहानियां सुनी हैं। खाली समय में वे सत्यजीत रॉय समेत दूसरे अनेक बंगाली निर्देशकों की पुरानी फिल्में देख रहे हैं। उस दौर का साहित्य पढ़ रहे हैं। सबसे बड़ी बात कि वे स्वयं ब्योमकेश बख्शी के किरदार को लेकर बहुत उत्साहित हैं।
    दिबाकर बताते हैं, इस साल के आखिर तक वे फिल्म की स्क्रिप्ट पूरी कर लेंगे। जनवरी में शूटिंग आरंभ करेंगे। दिसंबर 2014 में फिल्म की रिलीज की घोषणा की जा चुकी है। ‘ब्योमकेश बख्शी’ यशराज फिल्म्स और दिबाकर बनर्जी का संयुक्त प्रोडक्शन है।

दरअसल : पूरी तैयारी और धैर्य के साथ आएं


-अजय ब्रह्मात्मज
    मुंबई और दूसरे शहरों में फिल्मों में आने और छाने के लिए आतुर महत्वाकांक्षी युवक-युवतियों से भेंट-मुलाकात होती रहती है। लंबे समय से फिल्मों पर लिखने, स्टार एवं डायरेक्टर के इंटरव्यू प्रकाशित होने से पाठकों को लगता है कि फिल्मी हस्तियों से हमारा नजदीकी रिश्ता है। रिश्ता जरूर है, लेकिन यह अधिकांश मामलों में प्रोफेशनल है। कभी उनकी जरूरत तो कभी हमारी चाहत ़ ़ ़ दोनों के बीच मेलजोल चलता रहता है। अगर हम साल में चार बार अमिताभ बच्चन का इंटरव्यू करते हैं तो इसका मतलब यह कतई न समझें कि उनसे हमारा रिश्ता प्रगाढ़ हो गया है। मेरे जैसे और दो दर्जन से अधिक पत्रकार हैं, जिन्हें वे इंटरव्यू देते हैं। हां, कई बार अपने सवालों की वजह से हम उन्हें याद रह जाते हैं। अमिताभ बच्चन तो फिर भी हिंदी पत्र-पत्रिकाएं पढ़ लेते हैं। बाकी फिल्मी हस्तियों का हिंदी से अधिक लेना-देना नहीं रहता। वे पढ़ते नहीं हैं। वे देखते हैं कि हमने उन पर लिखा है। यही वजह है कि निरंतर लिखने के बावजूद हिंदी के फिल्म पत्रकारों की इंडस्ट्री में पैठ नहीं बन पाती। उसके लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है।
    बहरहाल, निरंतर प्रकाशित होने से अनेक महत्वाकांक्षी पाठक हम से मिलना चाहते हैं। फिल्म इंडस्ट्री के तौर-तरीकों से नावाकिफ लोगों के लिए हम एक जरिया होते हैं। वे चाहते और मानते हैं कि किसी भी फिल्मी हस्ती से हम उनका परिचय करवा सकते हैं। उन्हें अपेक्षित काम दिलवा सकते हैं। किसी भी निर्देशक को कह देंगे तो वह उन्हें सहायक बना लेगा या अपनी फिल्म में रोल दे देगा। सच्चाई इस धारणा से कोसों दूर है। मैंने अक्सरहां लोगों को समझाया है कि ऐसा होता नहीं है। अगर कोई भी ऐसा भरोसा दे रहा है तो वह झांसा दे रहा है। अपना उल्लू सीधा करना चाह रहा है। मुंबई के उपनगरों के सस्ते रेस्तरां से लेकर कैफे तक में ऐसे अनेक ठगे कलाकार मिल जाएंगे, जिन्हें किसी ने मौके के अनुसार चूना लगाया हो। वादे टूटने की चपत तो सभी ने खाई है। लोग कहते हुए मिलते हैं कि मेरा सब कुछ तय हो गया था, लेकिन ऐन वक्त पर  ़ ़ ़। जरूरत है कि ठहर कर इस ‘ऐन वक्त’ के बारे में सोचें। फिर आगे की रणनीति तय करें।
    मुंबई आएं। जरूर आएं। यह मायानगरी है। सपनों की नगरी है। इस शहर में सभी के सपने पूरे होते हैं, लेकिन उसके लिए ठोस तैयारी और गहरा धैर्य हो। बगैर तैयारी हर महत्वाकांक्षा खोखली होती है। अगर कुछ करना और बनना है तो उस फील्ड की बारीकियों को सीखना होगा। पढ़-सीख कर आएं तो बेहतर ़ ़ ़ अन्यथा यहां पढऩे-सीखने की ललक बरकरार रखें। अनेक फिल्मकारों और कलाकारों ने काम करते हुए ही सीखा है। औपचारिक प्रशिक्षण से संबंधित क्षेत्र की बेसिक जानकारी मिल जाती है। पुरानी कहावत है कि नींव मजबूत हो तो इमारत भी बुलंद बनती है।
    बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश आदि हिंदीभाषी इलाकों से आ रही प्रतिभाओं को सबसे पहले अपनी भाषा पर ध्यान देना चाहिए। स्थानीय बोली और उच्चारण के प्रभाव से शब्द सामथ्र्य होने के बावजूद भाषा लचर हो जाती है। कहीं भी किसी से मिलते समय सबसे पहले व्यक्तित्व और फिर भाषा का असर होता है। अगर आप पहली नजर में ही नहीं जंचेंगे तो बात आगे कैसे बढ़ेगी? बात आगे बढ़ी तो भ्रष्ट या दोषपूर्ण भाषा की वजह से भी आप छंट सकते हैं। फिल्म निर्माण के किसी भी क्षेत्र में सक्रिय होने के पहले व्यक्तित्व और भाषा को परिष्कृत करें।
    हिंदी फिल्मों के लिए यह सुनहरा दौर है। हर प्रकार की फिल्में बन रही हैं। उनके लिए हर प्रकार की प्रतिभाओं की जरूरत है। ये प्रतिभाएं देश के विभिन्न इलाकों से ही आएगी। मुंबई को जरूरत है आप की, लेकिन क्या आप के पास मौके के अनुकूल तैयारी है?



मिलते ही प्रशंसक सलाह मांगते हैं -करण कुंद्रा


-अजय ब्रह्मात्मज
- ‘गुमराह’ के सीजन 3 में क्या नया हो रहा है?
0 हमारा शो किशोरों के क्राइम स्टोरी पर आधारित है। यह उन्हें जागरुक करने का काम करता है। फॉर्मेट पुराना ही रहेगा। कुछ नई चीजें हैं। जैसे कि आप खुद तैयार रहें। हमेशा सावधान रहें। अमूमन बुरी घटनाओं पर हमारी यही प्रतिक्रिया होती है कि ऐसा उनके साथ हुआ। हमारे साथ नहीं होगा। हम यही बता रहे हैं कि हमेशा अपरिचित ही अपराध नहीं करते हैं। हमारे परिचित और रिश्तेदार भी हो सकते हैं। खतरा कहीं से भी हो सकता है।
- और क्या?
0 इस बार हम अधिक निडर होकर आ रहे हैं। हम अपनी सीमाएं जानते हैं। फिर भी कोशिशें जारी है।
- सीजन 1  और 2 से क्या सीखा?
0 पहला सीजन प्रयोग के तौर पर शुरू हुआ था। मेरे लिए वह बहुत बड़ा शिफ्ट था। उसके पहले मैं केवल टीवी एक्टर था। मैं युवा दर्शकों के बीच बहुत पॉपुलर था। मेरी पॉपुलैरिटी की एंटरटेनमेंट वैल्यू थी। इस शो के बाद सभी ने मुझे मेरे नाम करण कुंद्रा से पहचाना। अभी उनकी आंखों में आदर दिखता है। अब मिलते ही प्रशंसक सलाह मांगने लगते हैं। मेरे प्रति उनका भरोसा बढ़ गया है। इस वजह से उनके प्रति मेरी जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। छोटी सी बात कहूं कि अब मैं रेड लाइट भी क्रास नहीं करता।
- कह सकते हैं कि करण कुंद्रा का भी विकास हुआ है?
0 दुनिया की समझदारी बढ़ गई है। पहले अपराध कथाओं में अलग किस्म की रुचि रहती थी। अब मैं उनकी जड़ों जाने की कोशिश करता हूं। समझना चाहता हूं कि अपराध क्यों हुआ होगा? कारणों की खोज करता हूं। मैं सभी उम्र के लोगों को थोड़े बेहतर तरीके से समझने लगा हूं। कोई दोस्त भी बदतमीजी करता है तो रिएक्ट करने के बजाए वजह खोजता हूं। निश्चित ही मेरा विकास हुआ है।
- क्या अपने दोस्तों के बीच आप अगोनी फ्रेंड के तौर पर भी जाने जाते हैं?
0 फेसबुक पर मुझे आठ लाख लोग पसंद करते हैं। उनके सवाल आते रहते हैं। इंडस्ट्री में मेरे जुनियर भी मुझसे सवाल पूछते हैं। जरूरत भर मैं मदद करता हूं और विशेषज्ञों से उनका संपर्क करवा देता हूं।
- इस शो के अलावा और क्या कर रहे हैं?
0 अभी जो गैप मिला उसमें मैंने हिंदी फिल्में पूरी कर ली। एक पंजाबी फिल्म भी की है। इस शो ने मुझे अलग लेवल पर पहुंचा दिया है। शो के प्रति मेरी वफादारी बनी रहेगी। इस शो से किसी एक भी व्यक्ति की जिंदगी बच गई हो तो बड़ी बात है। विक्रम भट्ट की फिल्म ‘हॉरर स्टोरी’ पूरी हो गई है। यह सितंबर में रिलीज होगी। इसके अलावा प्रतीक के साथ एक फिल्म कर रहा हूं। अभी शुरुआत कर रहा हूं।
- टीवी शो नहीं कर रहे हैं?
0 एक ‘गुमराह’ ही काफी है। रेगुलर टीवी शो लेने पर महीने के कई दिन शूटिंग में निकल जाते हैं। किसी और चीज के बारे में सोचने का वक्त ही नहीं मिलता। अभी फिल्मों के लिए कोशिश कर रहे हैं।


Monday, July 22, 2013

गायकी और एक्टिंग दोनों में चुनौती है-मोनाली ठाकुर


-अजय ब्रह्मात्मज
अब्बास टायरवाला की निर्माणाधीन फिल्म ‘मैंगो’ की नायिका मोनाली ठाकुर ने गायकी में तेजी से अपना स्थान और नाम बनाया है। उनकी खूबसूरती और प्रतिभा के कायल निर्देशकों ने पहले से ही उन्हें फिल्मों के लिए प्रेरित किया। आखिरकार उन्होंने हां कर दी? इन दिनों वह गोवा में ‘मेंगो’ की शूटिंग कर रही हैं।

- कहां की हैं आप?
0 मैं कोलकाता में पैदा हुई। वहीं पली-बढ़ी। छह साल पहले मैं मुंबई आई।
- मुंबई आने की योजना कब बनी?
0 इंडियन आयडल में भाग लेने के पहले से मुंबई आने का इरादा बन गया था। मुझे फिल्मों में पाश्र्व गायन करना था। उसके लिए तो मु़ंबई ही आना था। गाने तो कोलकाता में भी गाए जा सकते थे, लेकिन मुझे हिंदी फिल्मों में गाना था। हिंदी फिल्मों में गाने से राष्ट्रीय पहचान मिलती है।
- कोलकाता में कहां पढ़ती थीं?
0 मैं फ्यूचर फाउंडेशन स्कूल में पढ़ी हूं। वह पांडिचेरी से जुड़ी संस्था है। कॉलेज की पढ़ाई मैंने सेंट जेवियर्स से की। मैं अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर सकी। मुझे पहले ही कुछ मौके मिल गए और उनके लिए मुझे मुंबई आना पड़ा। कोलकाता के टालीगंज में मेरा घर है।
- स्कूल के दिनों में किन गायकों के गाने गाती थीं?
0 मैं अपने गुरुजी और बड़े गुलाम अली खां के गाने गाती थी। पॉपुलर गानों में लता जी, आशा जी और किशोर कुमार के गाने गाया करती थी। मेरे पापा शक्ति ठाकुर स्वयं गायक रहे हैं। मेरे नाना क्लासिकल आर्टिस्ट थे। मां भी गाती थी। मैंने पंडित जगदीश प्रसाद जैन से गायकी सीखी। वे पटियाला घराना के थे।
- आपकी गायकी अच्छी चल रही है। फिर यह फिल्मों की तरफ आना कैसे हो गया? क्या गायकी तरह फिल्मों में भी आने की योजना थी?
0 मुझे अब्बास टायरवाला ने फिल्मों के लिए प्रेरित किया। और भी दूसरे निर्देशकों ने ऑफर दिए थे। वास्तव में मैं उनके सुझावों का अनादर नहीं करना चाहती थी। फिर भी मैंने वक्त लिया। मैं चाहती थी कि थोड़ी बड़ी हो जाऊं। एक्ट्रेस बनना आसान काम नहीं है। उसके साथ अनेक जिम्मेदारियां आ जाती हैं।
- कैमरे के सामने तो आप गायिका के तौर पर भी आती रही हैं। अभिनेत्री के तौर पर कैमरे के सामने आना कितना अलग रहा?
0 दोनों में थोड़ा फर्क है। पहले रूप में इमोशन नैचुरल और वास्तविक होते हैं। दूसरे रूप में सीन के हिसाब से इमोशन क्रिएट करना पड़ता है। दूसरा रूप अधिक मुश्किल है। मैंने एक्टिंग की अलग कोई पढ़ाई नहीं की है। एक्टिंग मेरे खून में है। मेरे पिता थिएटर एक्टर रहे हैं। दूसरे मैं हिंदी और अंग्रेजी की फिल्में लगातार देखती रही हूं। उन फिल्मों से बहुत कुछ सीखा है। अभी सीन करते समय मैं उन्हीं का अनुकरण करती हूं।
- ‘मैंगो’ कैसी फिल्म है?
0 यह हाई एनर्जी की इमोशनल फिल्म है। यह फन ओरिएंटेड और वायब्रेंट फिल्म है। युवा दर्शकों को ध्यान में रख कर बनाई गई है। इस फिल्म की थीम के अनुसार मुझे हमेशा एनर्जी बनाए रखनी थी। कई बार देर रात को शूट करते समय सुबह की एनर्जी मेंटेन करने में दिक्कत आती थी। इस चुनौती के लिए मैं पहले से तैयार नहीं थी।
- गायकी और एक्टिंग दोनों में अधिक चुनौतीपूर्ण क्या है?
0 दोनों ही हैं।
- क्या आप मुंबई शिफ्ट कर गई हैं?
0 हां, मेरे माता-पिता मेरे साथ ही रहते हैं। उनके बिना मैं नहीं रह सकती। उन्हें भी लगता है कि मैं उनके संरक्षण में रहूं।
- हिंदी फिल्मों में अपनी गायकी के बारे में बताएं?
0 मेरा पहला हिट गाना ‘जरा जरा टच मी टच मी’ है। उसके बाद ‘ख्वाब देखे झूठे-मुठे’ था। ‘अंजाना अंजानी’ का टायटल सौंग गाया था। ‘गोलमाल’ का टायटल ट्रैक मैंने ही गाया था। अभी रिलीज हुई ‘लूटेरा’ का ‘संवार लूं’ गाना है।
- सिंगर एक्टर के तौर पर हिंदी फिल्मों में कौन सबसे अधिक प्रिय हैं?
0 किशोर कुमार।





   

Saturday, July 20, 2013

फिल्म समीक्षा : शिप ऑफ थीसियस

Ship of theseus-अजय ब्रह्मात्‍मज
आनंद गांधी की 'शिप ऑफ थीसियस' अवांगार्द फिल्म है। उन्होंने जीवन के कुछ पहलुओं को दार्शनिक अंदाज में पेश करने के साथ प्रश्न छोड़ दिया है। यह प्रश्न मनुष्य के जीवन,जीजिविषा और अनुत्तरित प्रसंगों को टच करता है। फिल्मों में कला की अपेक्षा रखने वाले दर्शकों के लिए किरण राव की यह कलात्मक सौगात है। दृश्यबंध और संरचना, शिल्प और मू‌र्त्तन एवं प्रस्तुति में आनंद गांधी हिंदी आर्ट फिल्म निर्देशकों की परंपरा से जुड़ते हैं। उनकी यह साहसिक कोशिश प्रशंसनीय है, क्योंकि फिलहाल हिंदी सिनेमा 'एंटरटेनमेंट एंटरटेनमेंट एंटरटेनमेंट' का पर्याय बन चुका है।
आनंद गांधी ने बीच की राह चुनने का प्रयत्न नहीं किया है। अपनी शैली में वे कलाप्रवृत्त हैं। दर्शकों को रिझाने या बहलाने के लिए इस फिल्म में कुछ भी नहीं है। मूलत: तीन कहानियों को एक सूत्र से जोड़ती यह फिल्म मानव की अस्मिता, अस्तित्व और अस्तित्ववादी प्रश्नों से जूझती है।
आलिया, मैत्रेय और नवीन की कहानी हम देखते हैं। फिल्म के अंत में पता चलता है कि पात्र तो और भी हैं, जिनकी कहानियां अनसुनी रह गई। नित बदल रहे इस संसार में मनुष्य भी तो बदल रहा है। थिर कुछ भी नहीं है,लेकिन सब कुछ अस्थिर भी नहीं है।
थीसियस के जहाज का पुर्जा-पुर्जा बदल देने के बाद यह सवाल उठा था कि क्या यह अब भी थीसियस का जहाज है और क्या उन सभी पुर्जो को जोर नया जहाज बना दिया जाए तो वह थीसियस का ही जहाज होगा? हम अपने जीवन में भाव, विचार और अंग प्रत्यारोपण करते हैं। क्या हम इस प्रक्रिया के बाद वही के वही रहते हैं या कोई नया स्वरूप ले लेते हैं? यदि नया स्वरूप लेते हैं तो क्या उसे मूल की संज्ञा दी जा सकती है?
आनंद गांधी की 'शिप ऑफ थीसियस' तेज रफ्तार दृश्यों के आदी दर्शकों को पसंद नहीं आएगी। इस फिल्म के रसास्वादन के लिए धैर्य और समर्पण आवश्यक है। 'फास्ट एंड फन' केशौकीन दर्शकों को भी यह फिल्म देखनी चाहिए कि स्लो, स्थिर और सौंदर्य के मिश्रण से सृजित कृति कैसा आनंद देती है?
अवधि -140 मिनट
***1/2 साढ़े तीन स्टार

Friday, July 19, 2013

फिल्‍म समीक्षा : डी डे

D Day-अजय ब्रह्मात्‍मज
निखिल आडवाणी की 'डी डे' राष्ट्रीय स्वप्न और भारत का पलटवार के तौर पर प्रचारित की गई है। पड़ोसी देश में छिपे एक मोस्ट वांटेड आतंकवादी को जिंदा भारत लाने की एक फंतासी रची गई है। इस फंतासी में चार मुख्य किरदार भारतीय हैं। वे पाकिस्तान के कराची शहर से आतंकवादी इकबाल उर्फ गोल्डमैन को भारत लाने में जिंदगी और भावनाओं की बाजी लगा देते हैं। उनकी चाहत, मोहब्बत और हिम्मत पर फख्र होता है, लेकिन फिल्म के अंतिम दृश्यों में इकबाल के संवादों से जाहिर हो जाता है है कि फिल्म के लेखक-निर्देशक की सोच क्या है? फिल्म की शुरुआत शानदार है, लेकिन राजनीतिक समझ नहीं होने से अंत तक आते-आते फिल्म फिस्स हो जाती है।
अमेरिकी एंजेंसियों ने मोस्ट वांटेड ओसामा बिन लादेन को मार गिराया और उसके बाद उस पर एक फिल्म बनी 'जीरो डार्क थर्टी'। भारत के मोस्ट वांटेड का हमें कोई सुराग नहीं मिल पाता, लेकिन हम ने उसे भारत लाने या उस पर पलटवार करने की एक फंतासी बना ली और खुश हो लिए। भारत का मोस्ट वांटेड देश की व‌र्त्तमान हालत पर क्या सोचता है? यह क्लाइमेक्स में सुनाई पड़ता है। निश्चित ही यह लेखक-निर्देशक ने तय किया है कि इकबाल क्या बोलेगा? बोलते-बोलते वह बरखा, राजदीप और अर्णब जैसे राजनीतिक टीवी पत्रकारों का भी नाम लेता है। यहां आकर पूरी कोशिश हास्यास्पद और लचर हो जाती है। गनीमत है कि वह वहीं रूक गया। वह यह भी कह सकता था कि फिर मुझ पर एक फिल्म बनेगी और सारे फिल्म समीक्षक रिव्यू लिखेंगे।
'डी डे' एक फंतासी है। भारत के मोस्ट वांटेड को पकड़ कर भारत लाने का राष्ट्रीय स्वप्न (?) निर्देशक निखिल आडवाणी ने फिल्म में पूरा कर दिया है। इस मिशन के लिए रॉ की तरफ से चार व्यक्ति नियुक्त किए जाते हैं। चारो लंबे अर्से से कराची में हैं। वे मोस्ट वांटेड को घेरने और करीब पहुंचने की यत्‍‌न में लगे हैं। अखबार की खबरों को थोड़े उलटफेर से दृश्यों और घटनाओं में बदल दिया गया है। उनमें इन चारों व्यक्तियों को समायोजित किया गया है। कैसा संयोग है कि भारतीय रॉ एजेंट विदेशों में सीक्रेट मिशन पर जाते हैं तो पाकिस्तानी लड़कियों से प्रेम करने लगते हैं। यहां तो कथाभूमि ही पाकिस्तान की है। दोनों नायक प्रेम करते हैं। एक का तो पूरा परिवार बस जाता है और दूसरा एक तवायफ से प्रेम करने लगता है। अपने मिशन में भी वे मोहब्बत को नहीं भूलते। मिशन और इमोशन के द्वंद्व में उलझा कर उनसे एक्टिंग करवाई गई है। इरफान, अर्जुन रामपाल, श्रीस्वरा और श्रुति हसन ने लेखक-निर्देशक की दी इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है। उनके उम्दा अभिनय से ही फिल्म की थीम को नुकसान पहुंचा है, क्योंकि इस स्पाई थ्रिलर में जबरदस्ती रोमांस, कमिटमेंट और प्रेम थोपा गया है। हुमा कुरेशी इसलिए कमजोर पड़ी हैं कि उन्हें इस मिशन में किसी से मोहब्बत करते नहीं दिखाया गया है। उनकी पहले ही शादी करवा इी गई है और बताया गया है कि ड्यूटी की वजह से उनका दांपत्य खतरे में है।
'डी डे' ऐसी उलझनों की वजह से साधारण फिल्म रह गई है। इस साधारण फिल्म में इरफान, अर्जुन रामपाल और अन्य उम्दा कलाकारों की प्रतिभा की फिजूलखर्ची खलती है। सवाल उठता है कि केवल मोस्ट वांटेड को भारत लाने की कहानी दर्शकों को पसंद नहीं आती क्या? लेखक-निर्देशक की दुविधा ही फिल्म को कमजोर करती है।
अवधि-150 मिनट
** 2.5 ढाई स्टार

Thursday, July 18, 2013

दरअसल : टूटते-जुड़ते सपनों की कहानियां


-अजय ब्रह्मात्मज
    पिछले हफ्ते राकेश ओमप्रकाश मेहरा की ‘भाग मिल्खा भाग’ आई। उसके एक हफ्ते पहले विक्रमादित्य मोटवाणी की ‘लुटेरा’ आई थी। थोड़ा और पीछे जाएं तो पिछले साल तिग्मांशु धूलिया की ‘पान सिंह तोमर’ भी है। तीनों फिल्मों में एक जबरदस्त समानता है। तीनों ही फिल्मों में भारतीय समाज के छठे दशक की कहानियां हैं। यह दशक भारतीय इतिहास में नेहरू युग के नाम से भी जाना जाता है। देश की आजादी के साथ अनेक सपने जागे थे और उन सपनों ने लाखों नागरिकों की महत्वाकांक्षाओं को जगा दिया था।  ऐसे ही चंद युवकों में वास्तविक पान सिंह तोमर और मिल्खा सिंह थे तो काल्पनिक वरुण श्रीवास्तव भी था। तीनों को एक कतार में नहीं रख सकते, लेकिन तीनों छठे दशक के प्रतिनिधि चरित्र हैं। संयोग से पहले दो की पृष्ठभूमि में फौज और खेल का मैदान है। हां, तीसरा ठग है, लेकिन वह भी उसी दशक का एक प्रतिनिधि है।
    समाज और सिनेमा पर नेहरू युग के प्रभाव पर समाजशास्त्री और चिंतक विमर्श करते रहे हैं। नेहरू ने समाजवादी सोच के साथ देश के उत्थान और विकास की कल्पना की थी। उनकी कल्पनाएं साकार हुईं, लेकिन उनके जीवन काल में ही स्वप्नभंग का भी दौर शुरू हो गया था। आजादी के साथ जुड़े सपने सच्चाइयों से टकराकर चकनाचूर हो रहे थे। नेहरू युग से मोहभंग की प्रक्रिया उसी समय आरंभ हो गई थी। मिल्खा सिंह और पान सिंह तोमर की कहानियां उसी दौर के सपनों के बनने और टूटने के बीच की हैं। गौर करें तो छठे दशक के सिनेमा भी निराशा और हताशा का चित्रण मिलता है। गुरुदत्त समेत अनेक फिल्मकार स्वप्नभंग की कहानियां सुना रहे थे। उनके चरित्र काल्पनिक थे, लेकिन उन चरित्रों की कल्पना वास्तविक थी।
    उस दौर की आशा और निराशा से अलग इस दौर में बन रही छठे दशक की फिल्मों के समाज और चरित्र का स्वभाव और चित्रण है। अब हम उस दौर के वास्तविक किरदारों को देख पा रहे हैं। साहित्य और सिनेमा में कभी भी समकालीन चरित्रों और नायकों की कथा नहीं रहती। उनकी प्रेरणा और प्रभाव से चरित्र गढ़े जाते हैं। कुछ दशकों के बाद जब कोई साहित्यकार और फिल्मकार अपने समाज की दुविधाओं के हल खोजने निकलता तो है वह निकट अतीत की यात्रा करता है। अतीत की इस यात्रा में ही उसे अपने भावों के अनुरूपों किरदार मिलते हैं। मुझे तो सुधीर मिश्र, राकेश ओमप्रकाश मेहरा, तिग्मांशु धूलिया, अनुराग कश्यप और विक्रमादित्य मोटवाणी की फिल्मों में गुरुदत्त और बिमल राय की सृजनात्मक छटपटाहट ही दिखती है। इस दृष्टिकोण से युवा फिल्मकारों पर विचार करना शायद जल्दबाजी होगी, लेकिन उनकी फिल्मों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए हमें अपना दृष्टिकोण बदलना पड़ेगा।
    इन दिनों मास मीडिया के स्कूलों और विश्वविद्यालयों में सिनेमा के सामाजिक अध्ययन हो रहे हैं। किसी शोधार्थी और विशेषज्ञ को आज की फिल्मों का राजनीतिक अध्ययन भी करना चाहिए। हालांकि चार दशक पहले की राजनीतिक प्रतिबद्धता आज के फिल्मकारों में नहीं मिलती। सोच के स्तर पर उनके अराजनीतिक घोषणाओं के बावजूद हमें उनकी फिल्मों में राजनीति परिलक्षित होती है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि मनुष्य आखिरकार राजनीतिक प्राणि है। हिंदी फिल्मों में एक तरफ मसाला एंटरटेनमेंट फिल्में बन और चल रही हैं तो दूसरी तरफ ऐसे फिल्मकार भी सक्रिय हैं जो राजनीतिक चेतना के साथ सामाजिक फिल्में बना रहे हैं।
  ‘भाग मिल्खा भाग’ देखने के बाद आए इन विचारों की जमीन अभी कच्ची है। छठे दशक या नेहरू युग पर बनी कुछ फिल्मों के सिलसिलेवार दर्शन और अध्ययन के बाद हम कुछ निष्कर्ष निकाल सकते हैं।

Wednesday, July 17, 2013

हिंदी टाकीज-2 (1) : मैं ही मैं तो हूं सिनेमा में-विभा रानी

एक अर्से के बाद हिंदी टाकीज सीरिज फिर से आरंभ हो रहा है। श्रेय गीताश्री को दूंगा। मुझ आलसी को उन्‍होंने कोंच कर जगाया और पिछली सीरिज में छपे सभी संस्‍मरणों को संयोजित करने की हिदायत के साथ खुशखबरी दी कि यह पुस्‍तक के रूप में भी आएगा। तैयारी चल रही है। इस सीरिज की शुरूआत विभा रानी के संस्‍मरण से। विभा रानी ने  एक अलंग अंदाज में सिनेमा के अनुभव और यादों को समेटा है। उनके ब्‍लॉग छम्‍मकछल्‍लो कहिस से उनके लेखन के बारे में जान सकते हें।
           अब आप सभी से आग्रह है कि इस सीरिज को जिंदा रखें। अपने सिनेमाई अनुभव शेयर करें। इस सीरिज में सिनेमा से पहली मुलाकात,दोस्‍ती,प्रेम और जीवन संबंध के बारे में बताना है।अपने शहर या कस्‍बे की झांकी दें तो और बेहतर....सिनेमाघर का नाम,टिकट दर,प्रमुख फिल्‍मों का भी उल्‍लेख करें। अपने संस्‍मरण brahmatmaj@gmail.com पर मुझे भेजें। साथ में एक अपनी तस्‍वीर जरूर हो। कुछ और संदर्भित तस्‍वीरें हो तो क्‍या कहना ?





-विभा रानी 
      चौंक गए ना! चौंकिए मत। ध्यान से सुनिए। फिर आप भी कहेंगे कि मैं ही मैं तो हूं सिनेमा में।
हिंदुस्तानियों का सिनेमा से खून-पानी जैसा संबंध है। शायद ही कोई हिंदुस्तानी कहे कि उसने बचपन से लेकर अब तक कोई फिल्म नहीं देखी है। फिर मेरे घर में तो मेरी मां थी - अशोक कुमार- देविका रानी की जबरदस्त फैन। फख्र से कहतीं -मैं इनकी एक भी फिल्म नहीं छोड़ती थी।  उसी मां की हम बेटियों पर फिल्मों की पाबंदी थी- बहुत नहीं. धार्मिक फिल्में तो देखो, मगर बाकी मोहल्लेवालों से सेंसर होकर ही हम तक पहुंचती। वयस्क फिल्में तो सोचना भी पाप। अपन एमए में पहुंचकर भी फिल्में नहीं देख सकते थे पर मुझसे उम्र में छोटी ब्याही लड़कियां देख सकती थीं। एक ही नियम समझ में आया - वयस्क फिल्में देखने के लिए उम्र नहीं, शादी जरूरी है।
      छोटी जगहों में मनोरंजन के उपाय ही क्या थे! वह भी लड़कियों के लिए? किताबें (नो पोर्न) पत्रिकाएं? (सत्यकथा, मनोहर कहानियां, नर-नारी से वंचित)। पार्क जैसी कोई जगह नहीं। स्टेशन और बस अड्डे लड़कियों के लिए कहां? बस ले-देकर कर एक फिल्म। रिलीज से दो-तीन साल पुरानी होकर शहर में पहुंचती और हम उसे नई मानकर लपकने को आतुर। रिक्शे और तांगे पर लाउडस्पीकर लगाकर हर दिन फिल्म का प्रचार। पूजा का पाठ कर रहे होते या परीक्षा का पाठ - ध्यान को तो वहीं भागना होता! भाग ही जाता।
      याद नहीं, कौन सी पहली फिल्म दिखी थी- शायद कण-कण में भगवान  कुछ फिल्में मां ने दिखाईं - घूंघट, इंसानियत, बैजू बाबरा, हमेशा कहतीं- जब भी कभी अछूत कन्या’ (अशोक कुमार-देविका रानी) आएगी, तुम लोगों को जरूर दिखाऊंगी। गुनगुनाती- मैं बन की चिडिय़ा बन के बन-बन डोलूं रे। सिनेमा के नहीं, टीवी के पर्दे पर बहुत बाद में देखी। मैं भी गुनगुनाई -मैं बन की चिडिय़ा...... ।
      कोई फिल्म खराब नहीं लगती। समझ में नहीं आता, लोग कैसे किसी फिल्म को खराब कह देते हैं। मन करता, हर फिल्म देखूं। मगर उसके लिए न तो इजाजत थी, न पैसे। मां पैसे देती नहीं थी। बाउजी से मांगने का सवाल ही नहीं और पॉकेट मनी जैसी कोई अवधारणा नहीं। कभी कहीं से दो-चार पैसे मिले तो उसे गरीब की थाती समझ जुगाए रखते - अगली फिल्म के लिए। चार आने घट जाते तो मां से बड़ी मिन्नतें करते। कभी-कभी तो दस पैसे के लिए। तब टिकट की दर थी- साठ पैसे. बाद में एक रुपए पांच पैसे। पिघलकर मां पैसे दे देती, मगर इजाजत नहीं। हम दिए गए पैसों को ही इजाजत भी मान लेते। हम पैदल ही भागते जाते। रिक्शे से जाएं? उत्ते में दूसरी फिल्म ना देख लें!  
      तब लेडीज क्लास अलग होता। जेन्ट्स क्लास या बालकनी में पुरुषों के साथ आई महिलाएं ही होती। हमारे भी भाग्य खुलते जब कलकत्ता से हमारे जीजाजी आते। तब बालकनी, रिक्शा, इंटरवल में पापड, समोसे सभी के नसीब जागते। हम उस दिन तनिक अकड़े रहते। लेडीज क्लास में हर उम्र, तबके और छोटे से बड़ी उम्र के बच्चे और उनकी माताएं! धीमी गटि का एक पंखा भीड की उमस को और बढाता रहता। गर्मी से बेहाल बच्चे रोने लगते। औरतों के साथ-साथ जेन्ट्स क्लास से भी आवाजें आने लगती- बच्चे को चुप कराओ। मां को अब हॉल से निकलना पड़ेगा। ऐसे में फिल्म छूट जाएगी- इस क्षोभ में मांएं बच्चों को धुमधुमा देती। औरतें फिर चिल्लाती- मारती क्यों हो? बच्चे को लेकर मत आओ या बाहर निकलो!
      मांएं भुनभुनाती- तो क्या एगो ई सिनेमो न देखें? बच्चा को कोन संभालेगा घर पर्?’
मुझे तब भी लगता- क्या बच्चे का बाप या दादा-दादी, चाचा-चाची कोई नहीं कि तीन घंटे बच्चे को संभाल ले और मां तनिक सुकून से एक फिल्म देखकर जीवन का एक पल तनिक हरा-भरा कर ले?’
      मैं थोड़ी पढ़ाकू किसम की घोषित कर दी गई थी। सिनेमा देखने जाते समय इसका भरपूर फायदा उठाती। मेरी बड़ी बहन रीता दी खाना बनाने से लेकर मां से इजाजत लेने तक के सारे काम करती और मैं ऐन उस समय किताब लेकर पढऩे का नाटक करती रहती। फिल्में हम मोहल्ले की दीदियों, भाभियों, चाचियों के साथ अक्सर मैटिनी शो में देखते। रोशनी में आना-जाना। लफंगई से बचाव। मां स्कूल में रहती। शाम को घर पहुंचती, हमें गायब पातीं। समझ तो जाती थीं सुबह से ही हमारी और मोहल्लेवालियों के हलचल से, मगर खामोश रहतीं। शाम को घर लौटकर हमारी हालत खराब। घर में पहले घुसे कौन? इसमें भी बड़ी बहन को ही मजबूरन आगे बढऩा पड़ता। हमें देखते ही मां का बोलना शुरू। डर से अगर हम घर में नहीं घुसते, तो भी बोलना शुरू -इतना ही डर था तो गई क्यों? या अब क्या आरती लेकर घर में बुलाएं?’ हालात थोडी देर बाद सामान्य होते तो हम खाने बैठते और मां शुरु हो जातीं- सिनेमा भी देखेंगीं और खाएंगी भी। हम तो हॉल में पैसेवालों के खरीदे पापड़, समोसे की खुशबू से भूख को और तेज करके घर पहुंचते। सो मां की डांट सुनते जाते और चुपचाप खाते जाते। मन में सिनेमा के सारे सीन्स घूमते रहते। हम खाना खाते हुए भी उत्फुल्ल रहते। न खाने पर भी सुनना पड़ता -अब क्या हाथ-पैर जोड़ कर मनाएं खाने के लिए?’ आज मेरे बच्चे सुनकर हैरान होते हैं।
      मैं मां से अक्सर कहती- आप जिसतरह से अशोक कुमार-देविका रानी की एक भी फिल्म नहीं छोडती थीं, हम भी तो उसी तरह से संजीव कुमार की एक भी फिल्म नहीं छोडना चाहते. मां बस मुस्कुरा देती।
सिनेमा देखते समय मैं हॉल से निकल सीधा स्क्रीन पर पहुंच जाती-परकाया-प्रवेश! नर्गिस से लेकर हेमा मालिनी और हेलेन से लेकर पद्मा खन्ना तक मैं ही मैं रह जाती। हर सीन में मैं- हर संवाद में मैं- रोमांस से मैं, डांस में मैं! राजेश खन्ना आज चाहे जैसे लगने लगे थे, लेकिन उस समय तो हर लडक़े-लडक़ी के मन में उनके लिए क्रेज था - मुमताज के बिंदिया चमकेगी पर मैं ही गाती, हेमा मालिनी के रामा-रामा गजब हुई गवा रेपर मैं ही नाचती। जया भादुड़ी के गुड्डी से अभिमान तक बस मैं ही मैं। शबाना आज़मी आएं तो मधुबनी में ढोल पिट गया- एकदम विभे जैसी लगती है। पता नहीं, ज़ीनत अमान और परवीन बॉबी में भी मैं दिखने लगी. अपन को तो एक और स्टाइल मारने के आ गया। तीन-तीन हीरोइनों जैसी मैं!
      छोटे भैया बाइस्कोप के दीवाने। कोशिश करते रहते फिल्म बनाने, दिखाने की। बाउजी और दोनों भैया अघोषित तौर पर हर फिल्म पहला दिन, पहला शो में देखते। मां भले हमें मना करती रहतीं, भाइयों ने हैरानगी की हद तक कभी मना नहीं किया। बॉबीलगी और हमारे मुहल्ले के सबसे बदचलन व्यक्ति ने मां के कान भर दिए- रीता-विभा को ये फिल्म मत देखने दीजिएगा। अरे, इसमें हीरोइन इतने छोटे-छोटे कपड़े पहने हुए हैं। सारा शहर बॉबीकी घूम से धमधमा रहा था। रेडियो पर मैं माइके चली जाऊंगी और हम तुम कमरे में बंद हो गनगना रहे थे।  पहुंच गए अपन भी। टिकट काउंटर पर मारा- मारी के बीच छोटे भैया हम लोगों के लिए टिकट लेकर आए थे। मेरे मुंह से पडोसी के लिए लम्बी गाली निकली और भैया पर अभिमान हुआ।
      पहली वयस्क फिल्म देखी -सत्यम, शिवम, सुंदरम हमारे पड़ोसी उसके लिए भी मां के कान भर आए थे। भले हम इक्कीस साल के हो गए थे, मगर  शादी नहीं हुई थी। सो मधुबनी में तो इस फिल्म का देखना नामुमकिन था। मेरी एक चाची इलाज कराने पास के शहर दरभंगा जाती थी हर महीने। पहले मां साथ जाती थी, फिर उनके स्कूल होने के कारण मैं जाने लगी। देखा, ‘उमा सिनेमा में फिल्म लगी हुई है। मैंने चाची को तैयार कर लिया। डर रही थी कि इतनी सनातनी चाची कहीं फिल्म से मुझे भी उठा कर न चलती बने। कह भी दे- इसीलिए लडकियों को ज्यादा नहीं पढाना चाहिये। बहिनी जी (मेरी मां) तो कुछ समझबे नहीं करती हैं। इसलिए, हर दूसरे-तीसरे दृश्य पर मैं अपनी ओर से संवाद देती रहती -देखिए चाची। बिचारी बदसूरत लडक़ी का कोई खिवैया नहीं। इस छोटी सी बच्ची (पदमिनी कोल्हापुर) ने कितना अच्छा भजन गाया है ना। सोचिए चाची! शादी की ही रात पति किसी को छोडक़र भाग जाए तो़ क्या बीतेगी उस लडक़ी पर! देखिए, अपने ही पति को वापस लाने के लिए उसे क्या-क्या करना पड़ रहा है। आदि-आदि। फिल्म खत्म हुई। मैंने धडक़ते दिल से चाची को देखा। चाची बोली -बहुत सुंदर फिल्म है। मधुबनी में आएगी तो सुधा-संध्या (उनकी बेटिया) को भी दिखाऊंगी। मैं भर देह मुस्काई। फिल्म के भाव को समझते ही चाची के सामने से ओझल हो गए जीनत अमान की तीन चौथाई खुली देह और उस समय के बोल्ड प्रेम-दृश्य। फिल्मों को इस एंगल से देखा समझा जाए तो मसाला फिल्म मेकर्स भी अच्छी फिल्में बनाने लगेंगे, ऐसा मेरा दावा है।
      हेलेन मुझे आज भी उत्तेजित करती हैं। कैबरे आज भी बहुत अच्छे लगते हैं। फिल्म देखकर आती और फ्रॉक को मोड़ कर सीने पर चढ़ा लेती और नकल करती -महबूबा, महबूबारेशमी उजाला है, मखमली अंधेरा...। हुस्न के लाखों रंग...।’ ‘मेरा नाम है शबनम।  मेरी पहली, आखिरी और अकेली दर्शक होती- मेरी बड़ी बहन- रीता दी।
      हमारी और दो बड़ी बहनें हैं - उषा दी और मीरा दी। ये ससुराल से जब आतीं तो हमें भीतर से खुश होते- अब सिनेमा देखने को मिलेगा। मगर यह खुशी हम जाहिर नहीं होने देते। तब मीरा दी का बेटा नन्हे सात-आठ महीने का था। मैटिनी शो में राजेन्द्र कुमार-माला सिन्हा की फिल्म गीतजाने की तैयारी दोनों बहनों की थी। वे चाहती थीं कि हम बच्चे को देखें, फिल्म नहीं। जाहिर है, हम ये नहीं चाहते थे। आखिर में दीदी ने कहा कि ठीक है, तुम इसे सुला दो। हम उसे सुलाने के लिए बिस्तर पर लेटकर नन्हें को पेट पर लिटाकर थपकने लगे। भरा पेट, भरी दुपहर - नींद ने आखों पर ऐसा धावा बोला कि हम बेहोश। दीदियां नदारद। एक घंटे बाद जैसे किसी ने तमाचा मार कर उठा दिया हो। हम दोनों बहने एक साथ हड़बड़ाकर उठे। शाम के चार बज रहे थे। हम लुटे-पिटे से एक-दूसरे को देख रहे थे। गुस्सा बहनों के साथ-साथ नन्हें पर भी आ रहा था। मन किया, उसे पीट-पीटकर उठा दें या उसे पलंग से खींचकर जमीन पर पटक दें।
      शाम को दोनों बहने मुस्कुराती आई। हम गुस्से से भरे। मां की सहानुभूति हमारे साथ थी, मगर वे जाहिर नहीं होने दे रही थी। दीदी ने हमें पैसे दिए, मगर तब तक सभी मोहल्लेवालियां इसे देख चुकी थीं। और अकेले हम जा नहीं सकते थे। यकीन मानिए, आज तक यह फिल्म हम-दोनों बहने नहीं देख पाई हैं।
      फिल्में आज भी देखती हूं। अब छुपकर देखने जैसी बात नहीं। मना करनेवाला भी कोई नहीं। इसलिए अब वह उत्तेजना भी नहीं। लेकिन फिल्में देखते समय आज भी मैं अपनी सीट से निकलकर स्क्रीन में घुस जाती हूं। तब मीना कुमारी, नन्दा, सायरा बानू, शबाना आजमी, जीनत अमान, परवीन बॉबी बन जाती थी या हेलेन, पद्मा खन्ना जयश्री टी या मीनू मुमताज। आज की नायिकाओं में अब भी घुसती हूं, उसके नृत्य को लेकर। तब भी फिल्में देखकर रोती थी। समाज को बदल डालोफिल्म में तो आंखें सूज गई थीं। इतनी ही आंखें सूजी थी तारे जमीन परदेख कर। लगा, यह दर्शील मैं ही तो हूं। आज भी मुझे जब-तब अपनी बदसूरती पर टिप्पणी मिल जाती है। आप मानसिक रूप से कमजोर हैं तो मेहनत करके चमक सकते हैं। मगर लाख लोग कहें, सुंदरता मन में होती है या देखनेवालों की आंखों में, सच्चाई तो यह है कि सुंदरता है तो। इंग्लिश-विंग्लिशमें श्रीदेवी नहीं, मैं ही हूं- अपनों से तारीफ के एक बोल सुनने को तरसती! आज भी अपने को बेहतर बनाने की कोशिश करती। यही सिनेमा का सच है कि आप उसमें खुद को देखने-पाने लगते हैं। मेरे लिए सिनेमा में सबकुछ है. हर स्तर पर उससे जुड़ती हूं। इसीलिए कहा कि मैं ही मैं तो हूं फिल्मों में। आप भी सोचिए, आप भी मानेंगे कि आप ही आप तो हैं फिल्मों में।
      थिएटर से पूरी तरह जुड़कर लगातार नाटक कर रही हूं। तो यह भी योजना है कि फिल्में भी करूंगी। नाटक में लोगों को मेरा काम पसन्द ही नहीं, बहुत पसन्द आता है तो फिल्मों में भी आएगा, यह यक़ीन है। तब नाटक के मंच जैसी ही अभिव्यक्ति फिल्म में भी दे पाऊंगी। और हां! तब, परकाया प्रवेश नहीं करूंगी। अपनी ही काया में रहूंगी अपने किरदार को जीते हुए।

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