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Wednesday, May 29, 2013

इस पागल दुनिया में सच्‍चा सरल आदमी ही पागल लगता है-किशोर कुमार

कुछ समय पहले यह इंटरव्‍यू अंग्रेजी  में चवन्‍नी पर आ चुका है। अभी यह हिंदी में आया है। मोहल्‍ला लाइव से साधिकार यहां प्रस्‍तुत है 
गायक-अभिनेता किशोर कुमार से पत्रकार प्रीतीश नंदी की बातचीत
Kishore Kumar
यह एक दिलचस्‍प बातचीत है। अपनी तरह के अकेले और बेमिसाल गायक-अभिनेता किशोर कुमार से यह बातचीत पत्रकार प्रीतीश नंदी ने की थी। प्रीतीश के औपचारिक-पेशेवर सवालों का जवाब जितनी खिलंदड़ सहजता के साथ किशोर कुमार दे रहे हैं, उससे पता चलता है कि अपनी चरम लोकप्रियता का कोई बोझ वह अपने साथ लेकर नहीं चलते। इस बातचीत से यह भी पता चलता है कि एक महान रचनात्‍मक आदमी दुनियावी अर्थों में सफल होने के बाद भी अपना असल व्‍यक्तित्‍व नहीं खोता। यह इंटरव्यू पहली बार इलेस्‍ट्रेटेड वीकली के अप्रैल 1985 अंक में छपा था। इसका अनुवाद करके हिंदी में उपलब्‍ध कराने का श्रेय रंगनाथ सिंह को जाता है और सुना है कि ये अहा जिंदगी के जून अंक में प्रकाशित भी हुआ है: मॉडरेटर
मैंने सुना है कि आप बंबई छोड़ कर खंडवा जा रहे हैं…
इस अहमक, मित्रविहीन शहर में कौन रह सकता है, जहां हर आदमी हर वक्त आपका शोषण करना चाहता है? क्या तुम यहां किसी का भरोसा कर सकते हो? क्या कोई भरोसेमंद है यहां? क्या ऐसा कोई दोस्त है यहां जिस पर तुम भरोसा कर सकते हो? मैंने तय कर लिया है कि मैं इस तुच्छ चूहादौड़ से बाहर निकलूंगा और वैसे ही जीऊंगा जैसे मैं जीना चाहता था। अपने पैतृक निवास खंडवा में। अपने पुरखों की जमीन पर। इस बदसूरत शहर में कौन मरना चाहता है!!
आप यहां आये ही क्यों?
मैं अपने भाई अशोक कुमार से मिलने आया था। उन दिनों वो बहुत बड़े स्टार थे। मुझे लगा कि वो मुझे केएल सहगल से मिलवा सकते हैं, जो मेरे सबसे बड़े आदर्श थे। लोग कहते हैं कि वो नाक से गाते थे… लेकिन क्या हुआ? वो एक महान गायक थे। सबसे महान।
ऐसी खबर है कि आप सहगल के प्रसिद्ध गानों का एक एलबम तैयार करने की योजना बना रहे हैं…
मुझसे कहा गया था, मैंने मना कर दिया। उन्हें अप्रचलित करने की कोशिश मुझे क्यों करनी चाहिए? उन्हें हमारी स्मृति में बसे रहने दीजिए। उनके गीतों को उनके गीत ही रहने दीजिए। एक भी व्यक्ति को यह कहने का मौका मत दीजिए कि किशोर कुमार उनसे अच्छा गाता है।
यदि आपको बांबे पसंद नहीं था, तो आप यहां रुके क्यों? प्रसिद्धि के लिए? पैसे के लिए?
मैं यहां फंस गया था। मैं सिर्फ गाना चाहता था। कभी भी अभिनय करना नहीं चाहता था। लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों की कृपा से मुझे अभिनय करने को कहा गया। मुझे हर क्षण इससे नफरत थी और मैंने इससे बचने का हर संभव तरीका आजमाया।
मैं सिरफिरा दिखने के लिए अपनी लाइनें गड़बड़ कर देता था, अपना सिर मुंड़वा दिया, मुसीबत पैदा की, दुखद दृश्यों के बीच मैं बलबलाने लगता था, जो मुझे किसी फिल्म में बीना राय को कहना था वो मैंने एक दूसरी फिल्म में मीना कुमारी को कह दिया – लेकिन फिर भी उन्होंने मुझे जाने नहीं दिया। मैं चीखा, चिल्लाया, बौड़म बन गया। लेकिन किसे परवाह थी? उन्होंने तो बस तय कर लिया था कि मुझे स्टार बनाना है।
क्यों?
क्योंकि मैं दादामुनि का भाई था। और वह महान हीरो थे।
लेकिन आप सफल हुए…
बेशक मैं हुआ। दिलीप कुमार के बाद मैं सबसे ज्यादा कमाई कराने वाला हीरो था। उन दिनों मैं इतनी फिल्में कर रहा था कि मुझे एक सेट से दूसरे सेट पर जाने के बीच ही कपड़ने बदलने होते थे। जरा कल्पना कीजिए। एक सेट से दूसरे सेट तक जाते हुए मेरी शर्ट उड़ रही है, मेरी पैंट गिर रही है, मेरा विग बाहर निकल रहा है। बहुत बार मैं अपनी लाइनें मिला देता था और रुमानियत वाले दृश्य में गुस्सा दिखता था या तेज लड़ाई के बीच रुमानियत। यह बहुत बुरा था और मुझे इससे नफरत थी। इसने स्कूल के दिनों के दुस्वप्न जगा दिये। निर्देशक स्कूल टीचर जैसे ही थे। यह करो। वह करो। यह मत करो। वह मत करो। मुझे इससे डर लगता था। इसीलिए मैं अक्सर भाग जाता था।
खैर, आप अपने निर्देशकों और निर्माताओं को परेशान करने के लिए बदनाम थे। ऐसा क्यों?
बकवास। वे मुझे परेशान करते थे। आप सोचते हैं कि वो मेरी परवाह करते थे? वो मेरी परवाह इसलिए करते थे कि मैं बिकता था। मेरे बुरे दिनों में किसने मेरी परवाह की? इस धंधे में कौन किसी की परवाह करता है?
इसीलिए आप एकांतजीवी हो गये?
देखिए, मैं सिगरेट नहीं पीता, शराब नहीं पीता, घूमता-फिरता नहीं। पार्टियों में नहीं जाता। अगर ये सब मुझे एकांतजीवी बनाता है, तो ठीक है। मैं इसी तरह खुश हूं। मैं काम पर जाता हूं और सीधे घर आता हूं। अपनी भुतहा फिल्में देखने, अपने भूतों के संग खेलने, अपने पेड़ों से बातें करने, गाना गाने। इस लालची संसार में कोई भी रचनात्मक व्यक्ति एकांतजीवी होने के लिए बाध्य है। आप मुझसे यह हक कैसे छीन सकते हैं।
आपके ज्यादा दोस्त नहीं हैं?
एक भी नहीं।
यह तो काफी चालू बात हो गयी।
लोगों से मुझे ऊब होती है। फिल्म के लोग मुझे खासतौर पर बोर करते हैं। मैं पेड़ों से बातें करना पसंद करता हूं।
इसका मतलब आपको प्रकृति पसंद है?
इसीलिए तो मैं खंडवा जाना चाहता हूं। यहां मेरा प्रकृति से सभी संबंध खत्म हो गया है। मैंने अपने बंगले के चारों तरफ नहर खोदने की कोशिश की थी, जिससे मैं उसमें गंडोला चला सकूं। जब मेरे आदमी खुदाई कर रहे थे, तो नगर महापालिका वाले बंदे बैठे रहते थे, देखते थे और ना-ना में अपनी गर्दन हिलाते रहते थे। लेकिन यह काम नहीं आया। एक दिन किसी को एक हाथ का कंकाल मिला – एड़ियां मिलीं। उसके बाद कोई खुदाई करने को तैयार नहीं था। मेरा दूसरा भाई अनूप गंगाजल छिड़कने लगा, मंत्र पढ़ने लगा। उसने सोचा कि यह घर कब्रिस्तान पर बना है। हो सकता हो यह बना हो लेकिन मैंने अपने घर को वेनिस जैसा बनाने का मौका खो दिया।
लोगों ने सोचा होगा कि आप पागल हैं! दरअसल, लोग ऐसा ही सोचते हैं।
कौन कहता है मैं पागल हूं। दुनिया पागल है, मैं नहीं।
आपकी छवि अजीबोगरीब काम करने वाले व्यक्ति की क्यों है?
यह सब तब शुरू हुआ, जब एक लड़की मेरा इंटरव्‍यू लेने आयी। उन दिनों मैं अकेला रहता था। तो उसने कहा : आप जरूर बहुत अकेले होंगे। मैंने कहा नहीं, आओ मैं तुम्हें अपने कुछ दोस्तों से मिलवाता हूं। इसलिए मैं उसे अपने बगीचे में ले गया और अपने कुछ मित्र पेड़ों जनार्दन, रघुनंदन, गंगाधर, जगन्नाथ, बुधुराम, झटपटझटपट से मिलवाया। मैंने कहा, इस निर्दयी संसार में यही मेरे सबसे करीबी दोस्त हैं। उसने जाकर वह घटिया कहानी लिख दी कि मैं पेड़ों को अपनी बांहों में घेरकर शाम गुजारता हूं। आप ही बताइए इसमें गलत क्या है? पेड़ों से दोस्ती करने में गलत क्या है?
कुछ नहीं।
फिर यह इंटीरियर डेकोरेटर आया था। सूटेड-बूटेड, तपती गर्मी में सैविले रो का ऊनी थ्री-पीस सूट पहने हुए … मुझे सौंदर्य, डिजाइन, दृश्य क्षमता इत्यादि के बारे में लेक्चर दे रहा था। करीब आधे घंटे तक उसके अजीब अमेरिकन लहजे वाली अंग्रेजी में उसे सुनने के बाद मैंने उससे कहा कि मुझे अपने सोने वाले कमरे के लिए बहुत साधारण सी चीज चाहिए। कुछ फीट गहरा पानी, जिसमें बड़े सोफे की जगह चारों तरफ छोटी-छोटी नावें तैरें। मैंने कहा, सेंटर टेबल को बीच में अंकुश से बांध देंगे, जिससे उस पर चाय रखी जा सके और हम सब उसके चारों तरफ अपनी-अपनी नाव में बैठकर अपनी चाय पी सकें।
मैंने कहा, लेकिन नाव का संतुलन सही होना चाहिए, नहीं तो हम लोग एक-दूसरे से फुसफुसाते रह जाएंगे और बातचीत करना मुश्किल होगा। वह थोड़ा सावधान दिखने लगा, लेकिन जब मैंने दीवारों की सजावट के बारे में बताना शुरू किया तो उसकी सावधानी गहरे भय में बदल गयी।
मैंने उससे कहा कि मैं कलाकृतियों की जगह जीवित कौओं को दीवार पर टांगना चाहता हूं क्योंकि मुझे प्रकृति बहुत पसंद है। और पंखों की जगह हम ऊपर की दीवार पर पादते हुए बंदर लगा सकते हैं। उसी समय वह अपनी आंखों में विचित्र सा भाव लिये धीरे से खिसक लिया। आखिरी बार मैंने उसे तब देखा था, जब वह बाहर के दरवाजे से ऐसी गति से भाग रहा था कि इलेक्ट्रिक ट्रेन शरमा जाए। तुम ही बताओ, ऐसा लीविंग रूम बनाना क्या पागलपन है? अगर वह प्रचंड गर्मी में ऊनी थ्री पीस सूट पहन सकता है, तो मैं अपनी दीवार पर कौए क्यों नहीं टांग सकता?
आपके विचार काफी मौलिक हैं, लेकिन आपकी फिल्में पिट क्यों रही हैं?
क्योंकि मैंने अपने वितरकों को उनकी अनदेखी करने को कहा है। मैंने उनसे शुरू ही में कह दिया कि फिल्म अधिक से अधिक एक हफ्ता चलेगी। जाहिर है कि वे भाग गये और कभी वापस नहीं आये। आप को ऐसा निर्माता-निर्देशक कहां मिलेगा, जो खुद आपको सावधान करे कि उसकी फिल्म को हाथ मत लगाइए क्योंकि वह खुद भी नहीं समझ सकता कि उसने क्या बनाया है?
फिर आप फिल्म बनाते ही क्यों हैं?
क्योंकि यह भावना मुझे प्रेरित करती है। मुझे लगता है कि मेरे पास कहने के लिए कुछ है और कई बार मेरी फिल्में अच्छा प्रदर्शन भी करती हैं। मुझे अपनी एक फिल्म- ’दूर गगन की छांव में’ याद है, अलंकार हॉल में यह मात्र 10 दर्शकों के साथ शुरू हुई थी। मुझे पता है क्योंकि मैं खुद हॉल में था। पहला शो देखने सिर्फ दस लोग आये थे! यह रिलीज भी विचित्र तरीके से हुई थी। मेरे बहनोई के भाई सुबोध मुखर्जी ने अपनी फिल्म अप्रैल-फूल जिसके बारे सभी जानते थे कि वो ब्लॉक-बस्टर होने जा रही है, के लिए अलंकार हॉल को आठ हफ्तों के लिए बुक करवा लिया था।
मेरी फिल्म के बारे में सभी को विश्वास था कि वो बुरी तरह फ्लॉप होने वाली है। तो उन्होंने अपनी बुकिंग में से एक हफ्ता मुझे देने की पेशकश की। उन्होंने बड़े अंदाज से कहा कि, तुम एक हफ्ते ले लो, मैं सात से ही काम चला लूंगा। आखिकार, फिल्म एक हफ्ते से ज्यादा चलने वाली है नहीं।
मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि यह दो दिन भी नहीं चलेगी। जब पहले शो में दस लोग भी नहीं आये तो उन्होंने मुझे दिलासा देते हुए कहा कि परेशान मत हो, कई बार ऐसा होता है। लेकिन परेशान कौन था? फिर, बात फैल गयी। जंगल की आग की तरह। और कुछ ही दिनों में हॉल भरने लगा। यह अलंकार में पूरे आठ हफ्ते तक हाउसफुल चली!
सुबोध मुखर्जी मुझ पर चिल्लाते रहे लेकिन मैं हॉल को हाथ से कैसे जाने देता? आठ हफ्ते बाद जब बुकिंग खत्म हो गयी, तो फिल्म सुपर हॉल में लगी और वहां फिर 21 हफ्तों तक चली! ये मेरी हिट फिल्म का हाल है। कोई इसकी व्याख्या कैसे करेगा? क्या आप इसकी व्याख्या कर सकते हैं? क्या सुबोध मुखर्जी कर सकते हैं, जिनकी अप्रैल-फूल बुरी तरह फ्लॉप हो गयी?
लेकिन आपको, एक निर्देशक के तौर पर पता होना चाहिए था?
निर्देशक कुछ नहीं जानते। मुझे अच्छे निर्देशकों के साथ काम करने का अवसर नहीं मिला। सत्येन बोस और बिमल रॉय के अलावा किसी को फिल्म निर्माण का “क ख ग घ” भी नहीं पता था। ऐसे निर्देशकों के साथ आप मुझसे अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
एसडी नारंग जैसे निर्देशकों को यह भी नहीं पता था कि कैमरा कहां रखें। वे सिगरेट का लंबा अवसादभरा कश लेते, हर किसी से शांत, शांत, शांत रहने को कहते, बेख्याल से कुछ फर्लांग चलते, कुछ बड़बड़ाते और कैमरामैन से जहां वह चाहे वहां कैमरा रखने को कहते थे।
मेरे लिए उनकी खास लाइन थी : कुछ करो। क्या कुछ? अरे, कुछ भी! अत: मैं अपनी उछलकूद करने लगता था। क्या अभिनय का यही तरीका है? क्या एक फिल्म निर्देशित करने का यही तरीका है? और फिर भी नारंग साहब ने कई हिट फिल्में बनायीं!
आपने अच्छे निर्देशकों के साथ काम करने का प्रस्ताव क्यों नहीं रखा?
प्रस्ताव! मैं बेहद डरा हुआ था। सत्यजित रॉय मेरे पास आये थे और वह चाहते थे कि मैं उनकी प्रसिद्ध कामेडी पारस पत्थर में काम करूं और मैं डरकर भाग गया था। बाद में तुलसी चक्रवर्ती ने वो रोल किया। ये बहुत अच्छा रोल था और इन महान निर्देशकों से इतना डरा हुआ था कि मैं भाग गया।
लेकिन आप सत्यजीत रॉय को जानते थे।
निस्‍संदेह, मैं जानता था। पाथेर पांचाली के वक्त जब वह घोर आर्थिक संकट में थे, तब मैंने उन्हें पांच हजार रुपये दिये थे। हालांकि उन्होंने पूरा पैसा चुका दिया, फिर भी मैंने कभी यह नहीं भूलने दिया कि मैंने उनकी क्लासिक फिल्म बनाने में मदद की थी। मैं अभी भी उन्हें इसे लेकर छेड़ता हूं। मैं उधार दिये हुए पैसे कभी नहीं भूलता!
अच्छा, कुछ लोग सोचते हैं कि आप पैसे को लेकर पागल हैं। अन्य लोग आप को ऐसा जोकर कहते हैं, जो अजीबोगरीब होने का दिखावा करता है, लेकिन असल में बहुत ही चालाक है। कुछ और लोग आपको धूर्त और चालबाज आदमी मानते हैं। इनमें से आपका असली रूप कौन सा है?
अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग समय में मैं अलग-अलग रोल निभाता हूं। इस पागल दुनिया में केवल सच्चा समझदार आदमी ही पागल प्रतीत होता है। मुझे देखो, क्या मैं पागल लगता हूं? क्या तुम्हें लगता है कि मैं चालबाज हूं?
मैं कैसे जान सकता हूं?
बिल्कुल जान सकते हो। किसी आदमी को देखकर उसे जाना जा सकता है। तुम इन फिल्मी लोगों को देखो और तुम इन्हें देखते ही जान लोगे कि ये ठग हैं।
मैं ऐसा मानता हूं।
मैं मानता नहीं, मैं यह जानता हूं। तुम उन पर धुर भर भरोसा नहीं कर सकते। मैं इस चूहादौड़ में इतने लंबे समय से हूं कि मैं मुसीबत को मीलों पहले सूंघ सकता हूं। मैंने मुसीबत को उसी दिन सूंघ लिया था, जिस दिन मैं एक पार्श्व गायक बनने की उम्मीद में बांबे आया लेकिन एक्टिंग में फंसा दिया गया था। मुझे तो पीठ दिखाकर भाग जाना चाहिए था।
आप ने ऐसा क्यों नहीं किया?
हालांकि इसके लिए मैं उसी वक्त से पछता रहा हूं। बूम बूम। बूम्प्टी बूम बूम चिकाचिकाचिक चिक चिक याडले ईईई याडले उउउउउ (जब तक चाय नहीं आ जाती याडलिंग करते हैं। कोई लिविंग रूम से उलटे हुए सोफे की ओर से आता है, थोड़ा दुखी दिख रहा है, उसके हाथ में चूहों द्वारा कुतरी हुई कुछ फाइलें हैं, जो वो किशोर को दिखाने के लिए लिये हुए है।)
ये कैसी फाइलें हैं?
मेरा इनकमटैक्स रिकॉर्ड।
चूहों से कुतरी हुई?
हम इनका प्रयोग चूहे मारने वाली दवाइयों के रूप में करते हैं। ये काफी प्रभावी हैं। इन्हें काटने के बाद चूहे आसानी से मर जाते हैं।
आप इनकम टैक्स वालों को क्या दिखाते हैं, जब वो पेपर मांगते हैं?
मरे हुए चूहे।
समझा…
तुम्हें मरे हुए चूहे पसंद हैं?
कुछ खास नहीं।
दुनिया के कुछ हिस्सों में लोग उन्हें खाते हैं।
मुझे भी लगता है।
Haute cuisine… महंगा भी। बहुत पैसे लगते हैं।
हां?
चूहे, अच्छा धंधा हैं। किसी के पास व्यावसायिक बुद्धि हो तो वह उनसे बहुत से पैसे कमा सकता है।
मुझे लगता है कि आप पैसे को लेकर बहुत ज्यादा हुज्जती हैं। मुझे किसी ने बताया कि एक निर्माता ने आपके आधे पैसे दिये थे, तो आप सेट पर आधा सिर और आधी मूंछ छिलवा कर पहुंचे थे। और आपने उससे कहा था कि जब वह बाकी पैसे दे देगा, तभी आप पहले की तरह शूटिंग करेंगे।
वो मुझे हल्के में क्यों लेंगे? ये लोग कभी पैसा नहीं चुकाते, जब तक कि आप उन्हें सबक न सिखाएं। मुझे लगता है कि वह फिल्म मिस मैरी थी और ये बंदे होटल में पांच दिन तक बिना शूंटिग किये मेरा इंतजार करते रहे। अत: मैं ऊब गया और अपने बाल काटने लगा।
पहले मैंने सिर के दाहिने तरफ के कुछ बाल काटे, फिर उसे बराबर करने के लिए बायीं तरफ के कुछ बाल काटे। गलती से मैंने थोड़ा ज्यादा काट दिया। इसलिए फिर से दाहिने तरफ का कुछ बाल काटना पड़ा। फिर से मैंने ज्यादा काट दिया। तो मुझे बायें तरफ का फिर से काटना पड़ा। ये तब तक चलता रहा जब तक कि मेरे सिर पर कोई बाल नहीं बचा और उसी वक्त उन्होंने मुझे सेट पर बुलाया। मैं जब इस हालत में सेट पर पहुंचा, तो सभी चक्कर खा गये।
इस तरह बांबे तक अफवाह पहुंची। उन्होंने कहा था कि मैं बौरा गया हूं। मुझे ये सब नहीं पता था। जब मैं वापस आया तो देखा कि हर कोई मुझे दूर से बधाई दे रहा है और दस फीट की दूरी से बात कर रहा है।
यहां तक कि जो लोग मुझसे गले मिला करते थे, वो भी दूर से हाथ हिला रहे थे। फिर किसी ने थोड़ा झिझकते हुए मुझसे पूछा कि अब मैं कैसा महसूस कर रहा था। मैंने कहा, बढ़िया। मैंने शायद थोड़ा अटपटे ढंग से कहा था। अचानक मैंने देखा कि वो लौट कर भाग रहा है। मुझसे दूर, बहुत दूर।
लेकिन क्या आप सचमुच पैसे को लेकर इतने हुज्जती हैं?
मुझे टैक्स देना होता है।
मुझे पता चला है कि आपको आयकर से जुड़ी समस्याएं भी हैं।
कौन नहीं जानता? मेरा मूल बकाया बहुत ज्यादा नहीं था लेकिन ब्याज बढ़ता गया। खंडवा जाने से पहले बहुत सी चीजें बेचने का मेरा प्लान है और इस पूरे मामले को मैं हमेशा के लिए हल कर दूंगा।
आपने आपातकाल के दौरान संजय गांधी के लिए गाने को मना कर दिया था और कहा जाता है कि इसीलिए आयकर वाले आपके पीछे पड़े। क्या यह सच है?
कौन जाने वो क्यों आये। लेकिन कोई भी मुझसे वो नहीं करा सकता जो मैं नहीं करना चाहता। मैं किसी और की इच्छा या हुकुम से नहीं गाता। लेकिन समाजसेवा के लिए मैं हमेशा ही गाता हूं।
आपके घरेलू जीवन की मुश्किलें क्‍या हैं? इतनी परेशानियां क्यों?
क्योंकि मैं अकेला छोड़े जाना पसंद करता हूं।
आपकी पहली पत्नी रुमा देवी के संग क्या समस्या हुई?
वो बहुत ही प्रतिभाशाली महिला थीं लेकिन हम साथ नही रह सके क्योंकि हम जिंदगी को अलग-अलग नजरिये से देखते थे। वो एक क्वॉयर और कॅरियर बनाना चाहती थी। मैं चाहता था कि कोई मेरे घर की देखभाल करे। दोनों की पटरी कैसे बैठती?
देखो, मैं एक साधारण दिमाग गांव वाले जैसा हूं। मैं औरतों के करियर बनाने वाली बात समझ नहीं पाता। बीवियों को पहले घर संवारना सीखना चाहिए। और आप दोनों काम कैसे कर सकते हैं? करियर और घर दो भिन्न चीजें हैं। इसीलिए हम दोनों अपने-अपने अलग रास्तों पर चल पड़े।
आपकी दूसरी बीवी, मधुबाला?
वह मामला थोड़ा अलग था। उससे शादी करने से पहले ही मैं जानता था कि वो काफी बीमार है। लेकिन कसम तो कसम होती है। अत: मैंने अपनी बात रखी और उसे पत्नी के रूप में अपने घर ले आया, तब भी जब मैं जानता था कि वह हृदय की जन्मजात बीमारी से मर रही है। नौ सालों तक मैंने उसकी सेवा की। मैंने उसे अपनी आंखों के सामने मरते देखा। तुम इसे नहीं समझ सकते जब तक कि तुम इससे खुद न गुजरो। वह बेहद खूबसूरत महिला थी लेकिन उसकी मृत्यु बहुत दर्दनाक थी।
वह फ्रस्ट्रेशन में चिड़चिड़ाती और चिल्लाती थी। इतना चंचल व्यक्ति किस तरह नौ लंबे सालों तक बिस्तर पर पड़ा रह सकता है। और मुझे हर वक्त उसे हंसाना होता था। मुझसे डॉक्टर ने यही कहा था। उसकी आखिरी सांस तक मैं यही करता रहा। मैं उसके साथ हंसता था, उसके साथ रोता था।
आपकी तीसरी शादी? योगिता बाली के साथ?
वह एक मजाक था। मुझे नहीं लगता कि वह शादी के बारे में गंभीर थी। वह बस अपनी मां को लेकर ऑब्सेस्ड थी। वो यहां कभी नहीं रहना चाहती थी।
लेकिन वो इसलिए कि वह कहती हैं कि आप रात भर जागते और पैसे गिनते थे।
क्या तुम्हें लगता है कि मैं ऐसा कर सकता हूं? क्या तुम्हें लगता है कि मैं पागल हूं? खैर, ये अच्छा हुआ कि हम जल्दी अलग हो गये।
आपकी वर्तमान शादी?
लीना अलग तरह की इंसान है। वह भी उन सभी की तरह अभिने़त्री है लेकिन वह बहुत अलग है। उसने त्रासदी देखी है। उसने दुख का सामना किया है। जब आपके पति को मार दिया जाए, आप बदल जाते हैं। आप जिंदगी को समझने लगते हैं। आप चीजों की क्षणभंगुरता को महसूस करने लगते हैं। अब मैं खुश हूं।
आपकी नयी फिल्म? क्या आप इसमें भी हीरो की भूमिका निभाने जा रहे हैं?
नहीं, नहीं नहीं। मैं केवल निर्माता-निर्देशक हूं। मैं कैमरे के पीछे ही रहूंगा। याद है, मैंने तुम्हें बताया था कि मैं एक्टिंग से कितनी नफरत करता हूं? अधिक से अधिक मैं यही कर सकता हूं एकाध सेकेंड के लिए स्क्रीन पर किसी बूढ़े आदमी या कुछ और बनकर दिखाई दूं।
हिचकॉक की तरह?
हां, मेरे पसंदीदा निर्देशक। मैं दिवाना हूं लेकिन सिर्फ एक चीज का। हॉरर फिल्मों का। मुझे भूत पसंद हैं। वो डरावने मित्रवत लोग होते हैं। अगर तुम्हें उन्हें जानने का मौका मिले तो वास्तव में बहुत ही अच्छे लोग। फिल्मी दुनिया वालों की तरह नहीं। क्या तुम किसी भूत को जानते हो?
बहुत दोस्ताना वाले नहीं।
लेकिन अच्छे, डरावने वाले?
दरअसल नहीं।
लेकिन हमलोग एक दिन ऐसे ही होने वाले हैं। इसकी तरह (एक कंकाल की तरफ इशारा करते हैं जिसे वो सजावट की तरह प्रयोग करते हैं। कंकाल की आंखों से लाल प्रकाश निकलता है) – तुम यह भी नहीं जानते कि यह आदमी है या औरत। लेकिन यह अच्छा है। दोस्ताना भी। देखो, अपनी गायब नाक पर मेरा चश्मा लगा कर ये ज्यादा अच्छा नहीं लगता?
सचमुच, बहुत अच्छा।
तुम एक अच्छे आदमी हो। तुम जिंदगी की असलियत को समझते हो। तुम एक दिन ऐसे ही दिखोगे।

Tuesday, May 28, 2013

The Popular Melodramas of 1950s and their Engagement with the Nehruvian Politics - Prakash K ray

चवन्‍नी के पाठकों के लिए प्रकाश के रे का यह लेख.... 
“..planning does not mean industrialization alone; on the other hand, it embraces the entire national life.”                -Nehru (Nehru’s speech at Delhi University, in The Hindustan Times, 15 February, 1939.)

It is often argued that the popular melodramas of the 1950s failed to portray the reality of India in an apt manner since the film industry was too busy in projecting the nationalist myths created by the new government under the leadership of Nehru. The Centenary Year of Indian cinema offers an opportune occasion to revisit the cinematic scenario of the Nehruvian era, that is widely considered our cinema's Golden period. Realizing the great potential of mass media, particularly film, the government established various institutions and ordered vast set of rules and regulation. In 1949, the Film Enquiry Committee called upon the film industry to contribute to the responsibility in the course of nation building and strengthen the government. The government expected that Indian cinema will work for ‘national culture, education and healthy entertainment’ towards ‘a national character with its multifaceted aspects.’ The government also tried to control cinema through economic measures and control and of course, censorship. B.V. Keskar, perhaps the longest serving minister (for 10 years) of I&B even stopped the broadcasting of film music on AIR.

I argue that, in spite of these guidelines and restriction, the popular films of 1950s engaged with the Nehru era in a mature manner. I base my paper on these films- Sri 420, Awaara, Do Bigha Zameen, Pyaasa, Mother India and Naya Daur. On one hand, some of these films overtly endorse the nationalist discourse of the state while others bitterly critique it. But I will assert that the endorsement is very careful and positive. In the beginning, I will discuss the ideas of the era which is commonly known as the era of hope. Later, I will examine the narrative structures of the films and their engagement with Nehru’s politics and policies.

The foundation of Nehru’s politics is his work The Discovery of India which is an effort to invent tradition in the realm of modern nationalism. The book claims that the Indian civilization is superior and there is a continuity of thousands of years and despite vast diversity ‘[S]ome kind of a dream of unity has occupied the mind of India since the dawn of civilization.’ 

According to Partha Chatterjee, the ideological reconstruction of Nationalism under Nehru’s leadership ‘is an ideology of which the central organizing principle is the autonomy of the state; the legitimizing principle is a conception of social justice’. In order to provide social justice for all under this nationalism it was needed ‘to create a new framework of institutions which can embody the spirit of progress or, a synonym, modernity’. Nehru writes in 'The Discovery of India'-
“It is the scientific approach, the adventurous, and yet critical temper of science, the search for truth and new knowledge, the refusal to accept anything without testing and trial, the capacity to change previous conclusions in the face of new evidence, the reliance on observed fact and not on preconceived theory, the hard discipline of the mind- all this is necessary, not merely for the application of science but for life itself and the solution of its many problems.”

Nehru, right from the formidable years of struggle for Indian Independence, supported heavy industrialization to solve the problems of poverty and strengthen the political foundations of the independent nation. He asserted ‘any argument as to the relative merits of small-scale and large-scale industry seems strangely irrelevant today, when the world and the dominating facts  of the situation that confront it have decided in favour of the latter.’

Nehru, after meeting a group of peasants in 1920 realized a grave ‘responsibility’ and felt ashamed and , at his ‘own easy-going and comfortable life’ and ‘petty politics of the city’; he also felt distressed at ‘the degradation and overwhelming poverty of India’.

This responsibility directed the policies of his government which were firmly based on scientific and technological projects and concepts.

Nehru’s belief in ‘the spirit of the age’ drove his planning and policies. But Nehru was also open to the challenges. Modifying his earlier views on industrialization, he said, in a Congress meeting in 1957, ‘planning essentially consists in balancing: the balancing between industry and agriculture, the balancing between heavy industry and light industry, the balancing between cottage industry and other industry. If one of them goes wrong then the whole economy is upset.’

To remove the obstacles or thwart the protests against his policies, Nehru was not averse to use force- ‘everything that comes in the way will have to be removed, gently if possible, forcibly if necessary. And there seems to be little doubt that coercion will often be necessary. But… if force is used it should not be in the spirit of hatred or cruelty, but with the dispassionate desire to remove an obstruction.’ So the state violence became a rational instrument for the progress of the new nation.

Sunil Khilnani has opined that the real achievement of Nehru’s rule was the establishment of the state at the core of India’s society. Enlarged state ‘aspired to infiltrate the everyday lives of Indians, proclaiming itself responsible for everything they could desire: jobs ration cards, educational places, security, and cultural recognition. The state thus etched itself into the imagination of Indians in a way that no previous political agency had ever done.

The state and its charismatic leader were convinced and confident about their mission and achievements. Nehru exhorted at the sight of Bhakra-Nangal dam- ‘Probably nowhere else in the world is there a dam as high as this… As I walked round the site I thought that these days the biggest temple and mosque and gurudwara is the place where man works for the good of mankind. Which place can be greater than this, this Bhakra-Nangal?

And this fascination of new temples, mosques and gurudwaras compelled India to fall in love with the concrete in the 1950s.

The ambition of the Nationalist state under Nehru’s leadership to transform Indian society was scripted in the cities and taken to the countryside. This modernity took India and its habitants to an arena of complexities and contradictions. Khilnani observes, ‘India’s cities house the entire historical compass of human labour, from the crudest stone breaking to the most sophisticated financial transactions. Success and failure, marble and mud, are intimately and abruptly praised against one another, and this has made the cities vibrate with agitated experience. All the enticements of the modern world are stacked up here, but it is also here that many Indians discover the mirage-like quality of this modern world. This experience has altered beliefs, generated new politics, and made the cities dramatic scenes of Indian democracy: places where the idea of India is being disputed and defined anew.’

And this changing landscape of the cities compelled the filmmakers to look for complex narratives told in simple fashion of melodrama. It was not only nostalgia for simple and virtuous life in the countryside or in cities but also a quest for the lost innocence and an assertion of an art form for its place in the grand festival of nation building.

It is remarkable that a tramp like hero dressed in clumsy clothes, of Shree 420 represented the politics of Nehru, who was suave, neatly dressed in the most forth right manner. The song ‘Mera Joota Hai Japani’ says:
nikal pade hain khuli sadak par apna seena taane…
hai manzil kahaan, kahaan rukna hai, upar waala jaane…
naadaan hain jo baeth kinaare poochhen raah watan ki
chalna jeewan ki kahani
Rukna maut ki nishaani…

This reminds of the famous speech of Nehru at midnight of 14-15 August, 1947-
“Long years ago we made a tryst with destiny, and now the time comes when we shall redeem our pledge, not wholly or in full measure, but very substantially. At the stroke of the midnight hour, when the world sleeps, India will awake to life and freedom. A moment comes, which comes but rarely in history, when we step out from the old to the new, when an age ends, and when the soul of a nation, long suppressed, finds utterance. It is fitting that at this solemn moment we take the pledge of dedication to the service of India and her people and to the still larger cause of humanity.
At the dawn of history India started on her unending quest, and trackless centuries are filled with her striving and the grandeur of her success and her failures. Through good and ill fortune alike she has never lost sight of that quest or forgotten the ideals which gave her strength. We end today a period of ill fortune and India discovers herself again. The achievement we celebrate today is but a step, an opening of opportunity, to the greater triumphs and achievements that await us. Are we brave enough and wise enough to grasp this opportunity and accept the challenge of the future?”
At the outset the belief about city is reflected through the number 420 written on the milestone. The number in Indian Penal Code is related to bluff, cheating and forgery. The use of this popular metaphor indicates to the common belief about the city, about Bombay in particular, as a crooked place.
In the very first scene, the city is chaotic and in a mess. Seeing everyone rush, Raju exclaims- ‘is everyone residing in Bombay deaf!’ His initial encounters with the city show his uneasiness and his ‘innocence’ looks incompatible with the city culture. It seems that the boy from Allahabad, which is the central city of Indian nationalist movement, and the financial capital of India are incompatible. The beggar places his observation in direct words- ‘these blind and deaf men do not see anything except money. Here, buildings are made of concrete and hearts are made of stones’. Throughout the saga of survival, the film emphasizes the importance of virtue and goodness. The city is alienating but the protagonist is hell-bent to make it own and that too, without loosing his noble sensibility.
Then there are migrant homeless labourer who provide the shelter to the protagonist. Solidarity is made on the basis of shared misery. The provincial solidarity among the migrants is depicted metaphorically as ‘ganga mai ke bachche sab bhai bhai hain’. The name of benevolent old lady, herself a migrant and ‘resident’ of footpath is Ganga. This name evokes two kinds of memory- one, about the native place i.e. the United Province, and another of the shared heritage. It is also a quest for sacredness in the sea of darkness.  The talk among these people dreams of ‘bhookhe nango ka raaj’. The name of the protagonist is Raaj or Raju who brings a new lease of life on the footpath. The song ‘dil ka haal sune dil waala’ talks about the lives of poor people in the city and tells how the rich and the police create hurdles for them. The song and scenes immediately after depict the plight of the homeless.

The female lead, Vidya, is an epitome of virtue. Her modest house has two pictures on the wall apart from her late mother’s- a big framed picture of Nehru and a smaller one of Vivekananda. For the new nation, these two figures are the ideals that the nation is set to follow.

In one sequence, a politician cum corrupt businessman talks about the greatness of swadeshi, dharma, sanskriti, man ki shanti, atma, and desh. But Raju talks about Hindustani dil and the need of bread. This is definitely an endorsement of Nehruvian outlook but it is also one of the main principles of the national movement.

The name of other lady character that is fond of Western/ Modern/ de-cultured is Maya. In the song rammaya vasta vayya, the labourers compare their villages and the city.

The street is the arena where loss, gloom, and also romance find a place to unfold and to get expressed.

The housing is presented as a central problem in the city. The corrupt businessmen try to make money by fooling poor people on the pretext of providing cheap houses. The poor people after realizing this go for cooperative project. The film ends with the image of a new colony which is planned and fit with essential amenities. The end image of the film profoundly asserts Nehru’s planning and his politics of social justice. The film despises the corrupt and anti people elements of the society that were considered the greatest enemy of the country by Nehru.

The tramp of Sri 420 is again present in Awaara with his vision of new India. This film also depicts the slum life and asserts that the lack of basic facilities compels the poor to commit crime. The film also highlights the problem of unemployment in the city. The song ‘awaara hoon…’ presents the everyday happenings in market and streets. Once again the villains are criminal elements and old values. The city of Bombay here, like the previous film, is divided between the haves and the haves not. Using mythological metaphors, Raj kapoor highlights the plight of women in the song ‘zulam sahe bhaari janakdulaari.’

But the films are always not cozy with Nehru’s idea of the new India. Do Bigha Zameen unearths the darker side of the model and its class nexus. The protagonist of the film, like the previous two films, migrates to the city, this time Calcutta, to earn some money. Influenced by rumours of opulence produced by modernity, the lead character says- ‘kalkatta mein paise hawa mein udte hain’. This city is again chaotic and unfriendly to the villager. Homelessness is again the big problem and solidarity among the homeless migrants is highlighted. The vigilance by the government agencies over poor people sleeping on footpath or in public spaces is underlined. This aspect is depicted in Rajkapoor’s films too. Through the fight over water, the film represents the toughness of life in slums. Poverty and alienation of the city is reflected in the words of the lead- ‘paise ke bina saans lena bhi mushkil hai’. The plight of the poor is also represented through the handicapped labourer, old rickshaw-puller, child-workers etc. The film shows the continuous struggle of survival for the weaker sections in the city but, unlike, the previously discussed films, this film does not provide any ‘tryst with destiny’ solution.
Through the song ‘Ghazab teri duniya’ the working class articulates its grievances to god against the powerful. All three films consider the city as pardes and the native place as des. It denotes the uncomfortable relation with the ideas of modernity. 

Another mega hit of the decade is Naya Daur. Its narrative centers on the debate over mechanization of the traditional industries. The film begins with a quote of Mahatma Gandhi praising the labour of man. The film presents a village in its entire colours. The film does not consider the city differently from the above three films. The son of the village industrialist is a city-returned person and obsessed with modernization and profit. He brings trained people to operate machine from the city and now unemployed villagers go to the city in search of jobs. When the son advises them to go to the city for better life, the lead character says- des waalon ko pardes bhejna chahte ho. The presence of the reporter from Bombay is a sane representation from the city while the son represents badness of the city and modernity adopted by the state. The film ends with the call for a balance between the traditional skill and machine. As I have mentioned earlier, by this time, in 1957, Nehru was also considering a balanced approach.

The film also hits out at religious orthodoxy which comes in the way of development. In the sync with Nehru’s secular and humanist politics, the protagonist opposes the plan to build a temple in the way of the road. He accuses the upper class of using religious and communal feelings for their own vested interests. He emphatically asserts- ‘aadmi ke raste mein bhagwan bhee ayega to bhi main rukunga nahi’. He describes religion as something which shows the way, not the one which obstructs it.

Pyaasa, like Do Bigha Zameen, is bitter. It criticizes the affairs going on around and provides no sweet answer. The gloom of the era is presented through hunger, unemployment, despair at brothel, beggary. The song ‘jinhe naaz hai hind par wo kahan hain..’ directly accuses the power and the society for the miserable condition of prostitute.

The super hit film of the decade, Mother India is considered cinematic translation of the Nehruvian politics. Through the trio of women, farmers and development, the film despises mahazani system and violent rebellion against the oppressive structure of the society. For being so close to the ideals and policies of Nehru, the film is even called ‘ the cinematic Discovery of india’.

While discussing these films, we should also keep the melodramatic characteristics in mind- the indulgence of strong emotionalism, moral polarization, overt villainy, extreme actions and situations, overt expressions and a judgement in favour of virtue. With the polarization of good and evil, the melodrama reveals the presence and operation of good and evil as real forces around us and calls upon to confront and expel the evil to maintain the social order.The use of song and dance and other elements from various artistic tradition also must be underlined.

It is right that the nation was in the owe of Nehru and hoped that a new era would unfold under his leadership but it should also be noted that various political forces were supporting Nehru and also criticizing him when need. The role of left-leaning artists and influence of IPTA should not be overlooked.
The study a person like Nehru who was “greater than his deeds and truer than his surroundings”and the cinematic representation of his policies demand more rigorous language and analysis. It can be said that Nehru’s mission was noble but not the path and cinema engaged with him in solidarity as well as critically. And before going after these films, we must consider the time and the limitation of the medium. If we cut the film from its time and specific context, we may loose the importance of it as an art form and as an instrument in the process of social change.

 
                                                                                                                

Sunday, May 26, 2013

अनुभूति कश्‍यप और श्‍लोक शर्मा की प्रस्‍तुतियां

अनुभूति कश्‍यप की प्रस्‍तुति...मोइ मरजानी



A spirited independent single mother struggles on a daily basis to provide a comfortable life to her son and herself. She runs a small Internet cafe in Patiala, Punjab for a living, and is an Internet user herself. The film highlights a phase in her life when love comes knocking on her door. If only its timing was right!



श्‍लोक शर्मा की प्रस्‍तुति .... हिडेन क्रिकेट




A country that is divided in the name of religion, state, language, caste, economy, profession and even god... breathes together, stands together in the name of CRICKET!

A sport that defines the country. Cricket is in our blood and rules our hearts. A synonym to passion -- cricket redefines enthusiasm, craze, zeal and excitement. We are a nation that loves cricket, lives cricket, beyond conventions and beyond rules, from breaking boundaries to breathtaking highs, a million cheers and a zillion sighs, such is the madness, such is the passion to play it anywhere, any day, all the time, all the way. Cricket is our way of life!

Thursday, May 23, 2013

कान फिल्म फेस्टिवल में गूंजी हिंदी



-अजय ब्रह्मात्मज
    देवियों और सज्जनों, नमस्कार। भारतीय सिनेमा 100 वर्ष पूरे कर चुका है और इस अवसर पर में कान फिल्म फेस्टिवल में अपना आभार प्रकट करता हूं और धन्यवाद देता हूं कि मुझे आज यहां आमंत्रित किया और इतने भव्य समारोह में हमें सम्मानित किया।
    मुख्य रूप से चार मनोभावों को और  ़ ़ ़ और से जोड़ता हिंदी में बोला गया यह लंबा वाक्य अमिताभ बच्चन के आत्मविश्वास को जाहिर करता है। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में फिलहाल अमिताभ बच्चन अकेले ऐसे शख्स हैं, जो निस्संकोच और धाराप्रवाह हिंदी बोलते हैं। आप उनसे हिंदी में सवाल पूछें तो उसका जवाब हिंदी में मिलेगा। आप के सवाल में भले ही आदतन अंग्रेजी के शब्द आ गए हों, लेकिन वे जवाब देते समय अंग्रजी के एक भी शब्द का प्रयोग नहीं करते। उनकी भाषा सातवें-आठवें दशकों के मुहावरे और शब्दों से सनी होती है। हम जिन शब्दों का प्रयोग भूल गए हैं या जिनका अनुचित उपयोग करते हैं। अमिताभ बच्चन उन शब्दों को आज भी पुराने संदर्भ और अर्थ में इस्तेमाल करते हैं।
    अमिताभ बच्चन ने पहली बार हालीवुड की एक फिल्म में काम किया है। ‘द ग्रेट गैट्सबाय’ नामक उनकी फिल्म कुछ ही दिनों पहले अमेरिका में रिलीज हुई थी। कान फिल्म फेस्टिवल की ओपनिंग फिल्म के रूप में चुनी गई इस फिल्म के निर्देशक और सह कलाकारों के साथ अमिताभ बच्चन मंच पर मौजूद रहे। कान फिल्म समारोह के आधिकारिक उद्घाटन के लिए उन्हें लियोनाडो डिकैप्रियो के साथ आमंत्रित किया गया। अमिताभ बच्चन ने पहले अपनी बात अंग्रेजी में रखी और फिर हिंदी में अपने मनोभाव दोहराना नहीं भूले। हिंदी बोलते समय उनकी आंखें चमक रही थीं। किसी भी भाषा के सम्मान के ये क्षण महत्वपूर्ण होते हैं। खास कर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के लिए यह और भी उल्लेखनीय है, क्योंकि यहां हिंदी का चलन दिनोंदिन कम होता जा रहा है। सिर्फ फिल्में हिंदी में बनती हैं। उनके सवांद हिंदी में रहते हैं। बाकी कारोबार और व्यवहार की भाषा अंग्रेजी हो चुकी है।
    हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का यह विचित्र व्यवहार दुनिया में अनोखा है। मुझे नहीं मालूम कि चीनी, कोरियाई, जर्मन, तमिल, तेलुगू और बंगाली फिल्में अपनी भाषाओं में लिखी जाती हैं कि अगे्रजी में ़ ़ ़ या फिर रोमन हिंदी की तरह रोमन चीनी, रोमन कोरियाई, रोमन जर्मन, रोमन तमिल, रोमन तेलुगू और रोमन बंगाली में ़ ़ ़ कितनी शर्म की बात है कि हिंदी फिल्मों का पहला पोस्टर रोमन हिंदी में आता है। हर इवेंट, प्रेस कांफ्रेंस और इंटरव्यू में फिल्म बिरादरी की प्राथमिकता अंग्रेजी रहती है। अगर आप हिंदी पत्र-पत्रिका से जुड़े पत्रकार हैं या हिंदी में सवाल करते हैं तो आप को हेय एवं तुच्छ नजरों से देखा जाता है। चंद हिंदी फिल्म पत्रकारों से मुंबई के कलाकार मुखामुखम बातें करते हैं। ज्यादातर मामलों में सामूहिक साक्षात्कार का सिलसिला चल पड़ा है। अफसोस की बात है कि असुरक्षा भाव की वजह से अखबार और पत्रकार इस सिलसिले का विरोध नहीं करते।
    हम कान फिल्म फेस्टिवल में अमिताभ बच्चन के हिंदी संभाषण की बात कर रहे थे। कान फिल्म फेस्टिवल में इस बार भारतीय सिनेमा 100 साल को रेखांकित किया जा रहा है। कुछ पाठकों को याद होगा कि पहले ही साल कान फिल्म फेस्टिवल में चेतन आनंद की फिल्म ‘नीचा नगर’ को श्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मिला था। इस साल एक अंतराल के बाद भारत की चार फिल्में वहां विभिन्न खंडों में प्रदर्शित की जा रही है। यह भी सुयोग है कि चारों फिल्मों के साथ किसी न किसी रूप में अनुराग कश्यप जुड़े हुए हैं। यहां सचमुच एक उपलब्धि है। हालांकि पहले भी भारत की ऐसी मौजूदगी रही है। फर्क इतना आया है कि अब फेस्टिवल में प्रदर्शित फिल्में आगे-पीछे थिएटर भी पहुंच रही है। आम दर्शक उन्हें देख पा रहे हैं।
    इस साल यह भी उल्लेखनीय है कि विद्या बालन कान फिल्म फिल्म फेस्टिवल के निर्णायक मंडल की सदस्य हैं। एक अलग निर्णायक मंडल में नंदिता दास भी हैं। भारत से अनेक कलाकार, फिल्मकार और तकनीशियन कान फिल्म फेस्टिवल में गए हैं। नया जोश दिख रहा है। कान फिल्म फेस्टिवल में भारत की मौजूदगी और हिंदी की गूंज सालों यार रहेगी। धन्यवाद कान फिल्म फेस्टिवल, प्रणाम अमिताभ बच्चन।



Monday, May 20, 2013

दर्शक बढ़े हैं मेरे-अजय देवगन


-अजय ब्रह्मात्मज

    दो फिल्मों के अंतराल के बाद अजय देवगन और प्रकाश झा फिर से एक साथ आ रहे हैं। पिछले कुछ सालों में दोनों की जोड़ी ने अनेक सारगर्भित और मनोरंजक फिल्में दी हैं। ‘आरक्षण’ के समय यह खबर आई थी कि दोनों के बीच कोई अनबन हो गई है, लेकिन ‘सत्याग्रह’ की शूटिंग के साथ यह खबर बेबुनियाद साबित हुई। दोनों ने हाल ही में भोपाल में ‘सत्याग्रह’ की शूटिंग पूरी की। अजय देवगन ने अजय ब्रह्मात्मज से इस अंतरंग बातचीत में अनेक पहलुओं को उजागर किया।
- ‘दिल क्या करे’ से ‘सत्याग्रह’ तक प्रकाश झा के साथ आपकी सफल पारी रही है। इस परस्पर रिश्ते के बारे में कुछ बताएं?
0 हम दोनों को इस परस्पर रिश्ते से फायदा हुआ है। प्रकाश जी के बारे में सभी जानते हैं। वे पैरेलल सिनेमा के आर्ट फिल्म डायरेक्टर रहे हैं। साथ काम करते हुए उन्होंने एक नई फिल्म भाषा विकसित कर ली है। वास्तविकता के नजदीक रहते हुए उन्होंने व्यावसायिक फिल्म बनाने की तरकीब सीख ली है। ‘गंगाजल’ में हम दानों को सभी ने देखा। व्यावसायिक होने से मेरा मतलब दर्शकों से जुडऩा है। उनके साथ के बाकी फिल्मकार ऐसा नहीं कर पाए। फिल्मों को वास्तविक रखने की कोशिश में वे डाक्यूमेंट्री बना देते हैं। वैसी फिल्में दर्शक पसंद नहीं करते।
- आप दोनों का साथ तो ‘दिल क्या करे’ से आरंभ हुआ?
0 हां, प्रकाश जी ‘दिल क्या करे’ का ऑफर लेकर मेरे पाए आए थे। मुझे फिल्म का आयडिया अच्छा लगा। मैंने कहा कि मैं इसका निर्माण करूंगा। वहां से हमारा एसोसिएशन आरंभ हुआ।
- तब प्रकाश झा के बारे में आपका क्या ख्याल था?
0 याद करें तो उस समय तक मैंने महेश भट्ट की ‘जख्म’ और गोविंद निहलानी की ‘तक्षक’ जैसी फिल्में कर ली थी। सिनेमा के बारे में मेरी भी समझ विकसित हुई थी। यह स्वीकार करने में मुझे कोई दिक्कत नहीं है कि ऐसी फिल्मों से मैंने बहुत कुछ सीखा। मैं दोनों किस्म की फिल्में करता रहा हूं। उनमें से कुछ फिल्में चलीं और कुछ नहीं चली। प्रकाश जी मेरे लिए नए नहीं थे। उनके साथ काम करने में मुझे कोई हिचक नहीं थी। ऐसे निर्देशकों के साथ काम करने से मेरी ग्रोथ थोड़ी अलग हुई। मेरी पीढ़ी के अनेक अभिनेताओं को ऐसे मौके नहीं मिले। कमर्शियल फिल्में करते-करते वे एक सांचे में ढल गए। प्रकाश झा से मिलते समय मैं उनके साथ काम करने के लिए मानसिक रूप से तैयार था।
- फिल्मों के आपके चुनाव और उनकी कामयाबी से इधर यह भ्रम बना है कि अजय देवगन इन दिनों केवल बाक्स आफिस सफलता पर ही ध्यान देते हैं?
0 मैं खुद को अभी बहुत अच्छी स्थिति में पा रहा हूं। मैं दोनों किस्म की फिल्में कर सकता हूं। प्रकाश झा के साथ ‘गंगाजल’ करते समय मैं समझ गया था कि यह एक अलग रास्ता है। उस फिल्म से प्रकाश झा की भी धारा अलग हो गई। बाकी लोग कहीं अटक गए। प्रकाश झा ने एक रास्ता खोजा। उस समय मैं उनके साथ था। उसके बाद मैंने अपनी फिल्मों के चुनाव में दर्शकों, विषयों और सबसे अधिक मनोरंजन का पूरा ख्याल रखा। अब ‘सत्याग्रह’ को ही लें। यह फिल्म मास और क्लास दोनों को पसंद आएगी। एक तरफ यह मुद्दे पर बनी गंभीर फिल्म है तो दूसरी तरफ मैं इसे एक्शन फिल्म भी मानता हूं। ‘जंजीर’ में सिर्फ एक एक्शन सिक्वेंस था, लेकिन उसे एक्शन फिल्म कहते हैं।
- प्रकाश झा की क्या खासियत कहेंगे?
0 प्रकाश झा की हर फिल्म वास्तव में रिश्तों की कहानी होती है। ‘गंगाजल’ और ‘अपहरण’ से लेकर ‘सत्याग्रह’ तक उन्होंने रिश्तों को ही केंद्र में रखा है। वे मुख्य पात्र की पर्सनल कहानी कह रहे होते हैं। दुनिया की हर भाषा में बड़ी फिल्में किसी न किसी की पर्सनल कहानी होती है। हाल ही में आयी ‘जीरो डार्क 30’ की कहानी तो सबको पता है। उसमें डायरेक्टर ने एक पात्र के दृष्टिकोण से पूरी कहानी कही है। वह एक लडक़ी की कहानी है।
- इस दरम्यान अपने विकास को आप किस रूप में देखते हैं?
0 प्रकाश झा जैसे निर्देशकों के साथ काम करते हुए मुझे संतुलन बनाना आ गया है। यह बात समझ में आ गई है कि मुझे किस तरह की फिल्में करनी है। बीच में प्रकाश झा की ‘आरक्षण’ और ‘चक्रव्यूह’ मैंने नहीं की। उसके पीछे कोई मनमुटाव नहीं था। सच तो यह है कि उन फिल्मों में मेरे लायक कोई भूमिका नहीं थी। अभी भी मुझे लगता है कि कहानी पहले नैरेशन में ही मुझे अपील करनी चाहिए। मुद़दा हो,पर साथ में कहानी और मनोरंजन भी हो।
-क्या ऐसा नहीं लगता कि प्रकाश झा ने अपना रास्ता बदल लिया है? आप के साथ काम करते हुए भी माना गया कि वे सही राह पर हैं,लेकिन रणबीर कपूर और कट्रीना जैसे स्टारों के सिलसिले के बाद लोगों को लगा कि वे भी स्टार से प्रभावित हो गए?
0 मुझे ‘राजनीति’ देखते समय अवश्य लगा कि उन्होंने रास्ता बदल लिया है,लेकिन ‘सत्याग्रह’ में वे एक बार फिर अपने रास्ते पर मजबूत कदम के साथ दिखाई पड़ेंगे। कई बार ऐसे भटकाव हो जाते हैं।
- आप से भी शिकायत है कि आप साधारण फिल्मों में अपनी प्रतिभा का दुरुपयोग कर रहे हैं? आज की स्थिति में आप पिक एंड चूज कर सकते हैं,लेकिन ़ ़ ़
0 वैसी स्क्रिप्ट भी तो मिलनी चाहिए। कितने लोग बना रहे हैं। कहां से चूज करें?बहुत कम लोग ऐसे हैं। संतुलन बनाए रखने की मेरी पूरी कोशिश रहती है। कामेडी फिल्मों में कम मेहनत नहीं लगती।
-निश्चित ही कामेडी और डांस करना मुश्किल काम है। आप ने इनमें भी खुद को साबित किया। फिर भी यह सवाल रह जाएगा कि बतौर आर्टिस्ट आप किधर जा रहे हैं?
0 मैं तो इसे अपनी ग्रोथ मानता हूं। पहले मैं डांस नहीं कर पाता था। अब मैं थोड़ी कोशिश कर लेता हूं। लोग कहते हैं कि उतना बुरा भी नहीं लगता। बतौर एक्टर भिन्न किस्म की भूमिकाओं से ग्रोथ होती है। अपने प्रशंसकों से यही कहूंगा कि मैं उनको निराश नहीं करूंगा। ऐसी फिल्मों से मेरे दर्शक बढ़े हैं। मैं इस सवाल से असहमत नहीं हूं,लेकिन मैं कोई सफाई नहीं देना चाहता। मुझे तर्क-वितर्क नहीं करना है। सिंपल सी बात है कि अगर कोई फिल्म 100 करोड़ का बिजनेस करती हैं तो उसे निश्चित ही अधिक दर्शकों ने देखा होगा। मुझे यह हक नहीं है कि मैं सभी दर्शकों को बेवकूफ कह दूं। उन दर्शकों को कुछ तो मिलता होगा। हमारी-आपकी सोच भिन्न भी तो हो सकती है।
-क्या कभी अभिनेता अजय देवगन को कोफ्त नहीं होती? साधारण दृश्यों को करते समय आप की संवेदना आहत नहीं होती?
0 मेरी संवेदना अपनी जगह है। पब्लिक के प्यार के लिए जब कोई फिल्म कर रहा हूं तो अपनी संवेदना भूल जाता हूं। अगर मेरी फिल्में व्यावसायिक तौर पर सफल नहीं होंगी तो न आप इंटरव्यू लेंगे और न पत्र-पत्रिकाओं की मुझ में रुचि होगी।

Sunday, May 19, 2013

फिल्म समीक्षा : औरंगजेब

movie review : film Aurangzeb three and half star-अजय ब्रह्मात्मज 
अरसे बाद अनेक किरदारों के साथ रची गई नाटकीय कहानी पर कोई फिल्म आई है। फिल्म में मुख्य रूप से पुरुष किरदार हैं। स्त्रियां भी हैं, लेकिन करवाचौथ करने और मां बनने के लिए हैं। थोड़ी एक्टिव और जानकार महिलाएं निगेटिव शेड लिए हुए हैं। फिल्म में एक मां भी हैं, जो यश चोपड़ा की फिल्मों की मां [निरुपा राया और वहीदा रहमान] की याद दिलाती हैं। सपनों और अपनों के द्वंद्व और दुविधा पर अतुल सभरवाल ने दिल्ली के गुड़गांव के परिप्रेक्ष्य में क्राइम थ्रिलर पेश किया है।
यशराज फिल्म्स हमेशा से सॉफ्ट रोमांटिक फिल्में बनाता रहा है। यश चोपड़ा और आदित्य चोपड़ा की देखरेख में इधर कुछ सालों में कॉमेडी या रॉमकॉम भी आए, लेकिन अपराध की पृष्ठभूमि पर बनी यशराज फिल्म्स की यह प्रस्तुति नयी और उल्लेखनीय है। अतुल सभरवाल ने हमशक्ल जुड़वां अजय और विशाल के लिए अर्जुन कपूर को चुना है। दूसरी फिल्म में ही डबल रोल करते अर्जुन कपूर के एक्सप्रेशन की सीमाओं को नजरअंदाज कर दें तो उन्होंने एक्शन और मारधाड़ दृश्यों में अच्छा काम किया है। अजय बिगड़ैल और दुष्ट मिजाज का लड़का है और विशाल सौम्य और सभ्य दिमाग का.. एक उद्देश्य से दोनों की अदला-बदली की जाती है। लंब इमोशनल ड्रामा चलता है। इस ड्रामा में बाप, बेटे, मां,रखैल और अन्य किरदार हैं। लेखक-निर्देशक ने सभी किरदारों पर थोड़ा-थोड़ा ध्यान दिया है।
'औरंगजेब' मुगल बादशाह औरंगजेब की मानसिकता को एक विचार के तौर पर पेश करती है। कहते हैं औरंगजेब ने राजगद्दी के लिए अपने भाइयों को कत्ल किया था और पिता शाहजहां को कारागार में डाल दिया था। यहां गुड़गांव में एक नहीं, अनेक औरंगजेब हैं। सभी अपनी हुकूमत और ताकत चाहते हैं। फिल्म का एक दृश्य मजेदार है, जब छह रिवाल्वर अलग-अलग व्यक्तियों पर एक साथ तनते हैं। ऐसा प्रतीत होता है सभी एक-दूसरे की जान के दुश्मन हैं।
'औरंगजेब' में 'त्रिमूर्ति' और अन्य फिल्मों की झलक मिल सकती है, फिर भी अतुल सभरवाल ने इसे किसी फिल्म के रीमेक बनने से बचाया है। उन्होंने बदले और बादशाहत की भावना को आज के संदर्भ में रखा है। समृद्ध और विकसित हो रहे समाज में अपराध के फैले तार को लेखक-निर्देशक ने दिखाया है। फिल्म में भविष्यवाणी की जाती है कि आने वाले समय में देश पॉलिटिशियन और कारपोरेट ही चलाएंगे। पॉलिटिक्स के अकूत पावर और कारपोरेट के बेहिसाब पैसे के दम पर ही दुनिया चलेगी। हर व्यक्ति चाहेगा कि वह दोनों में से किसी एक में सफल हो ताकि वह रूतबे और रौब के साथ समाज में रह सके।
'औरंगजेब' वास्तव में महानगरों के पास उग रहे उपनगरों की पतनगाथा है। पता चलता है कि कैसे अपराधी, पुलिस और पॉलिटिशियन मिल कर आम नागरिक को बेवकूफ बना रहे हैं। हालांकि फिल्म किसी सामाजिक संदेश का दावा नहीं करती, लेकिन हर फिल्म प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में अपने समय का बयान होती है। 'औरंगजेब' ऐसी ही एक दास्तान है,जिसमें नए समाज के औरंगजेबों का चित्रण है।
यह फिल्म ऋषि कपूर और जैकी श्रॉफ के अभिनय के लिए भी देखी जा सकती है। दोनों प्रौढ़ अभिनेताओं ने एक बार फिर अपना साम‌र्थ्य जाहिर किया है। फिल्म में पृथ्वीराज सरप्राइज करते हैं। वे सूत्रधार भी हैं। वे ही फिल्म की कहानी कहते हैं। उन्होंने आर्या के रूप में एक कॉम्प्लेक्स किरदार को सहज ढंग से निभाया है। अर्जुन कपूर सध रहे हैं। पिछली फिल्म से वे काफी आगे बढ़े हैं। साशेह आगा की यह पहली फिल्म है। चंद दृश्यों में उन्हें केवल किसिंग सीन और हम बिस्तर होने के लिए ही रखा गया है। उनके किरदार को ढंग से विकसित नहीं किया गया है। एक अंतराल के बाद अमृता सिंह को देखना सुखद लगा।
अवधि - 139 मिनट
तीन स्टार

Thursday, May 16, 2013

कान फिल्‍म फेस्टिवल में अमिताभ बच्‍चन का हिंदी संभाषण

कान फिल्‍म फेस्टिवल के उद्घाटन समारोह में अमिताभ बच्‍चन का हिंदी संभाषण....



दरअसल ...तकनीकी पक्षों की तारीफ

-अजय ब्रह्मात्मज
    पिछले दिनों देश के एक मशहूर कैमरामैन से बातें हो रही थीं। पिछले बीस सालों से वे सक्रिय हैं। उन्होंने हिंदी में बनी कुछ लोकप्रिय और खूबसूरत फिल्मों की फोटोग्राफी की है। कहने लगे कि एक तो हम तकनीशियनों से कोई बातें नहीं करता। लोकप्रिय फिल्मों की तारीफ में भी हमारा उल्लेख नहीं होता। दर्शक ढंग से नहीं जानते कि किसी भी फिल्म में हमारा क्या योगदान होता है? मैंने बड़े से बड़े समीक्षकों की फिल्म समीक्षा में फिल्म के तकनीकी पक्षों को चंद वाक्यों में निबटाते देखा है। दर्शकों को जो बताया जाएगा,वही तो वे जानेंगे। ज्यादा से ज्यादा एक फिल्म समीक्षक जब फिल्म के छायांकन की तारीफ करता है तो यही लिखता हैं कि दृश्य बेहद खूबसूरत लगे। अब अगर फिल्म की पृष्ठभूमि में काश्मीर है तो वह खूबसूरत होगा ही। कैमरामैन ने इसमें क्या योगदान किया? इसे समझने और समझाने की जरूरत है।
    सिर्फ फोटोग्राफी ही नहीं। हम फिल्मों की समीक्षा या उस पर विमर्श करते समय सिनेमा के तकनीकी पक्षों को आम तौर पर छोड़ देते हैं। हम उनका जिक्र नहीं करते। एडीटिंग,साउंड,कोरियोग्राफी,प्रोडक्शन डिजायनिंग,कास्ट्यूम,मेकअप आदि तकनीकी पक्षों को नजरअंदाज करते हैं। निर्देशक से आरंभ कर लेखक,संवद लेखक,गीतकार और संगीतकार तक आते-आते बात समाप्त हो जाती है। कभी किसी समीक्षा में गायकों का भी उल्लेख नहीं किया जाता। समीक्षकों के इस मौन के पीछे वास्तव में उनकी नासमझी है। मान लिया गया है कि जो दिखाई ओर सुनाई पड़ रहा है,उसे ऊपरी तौर पर ही सराहने से काम चल जाता है। दर्शक फिल्म की कहानी और स्टार के बारे में जानने के लिए उत्सुक होते हैं। उन्हें इसी में जायका मिल जाता है। हिंदी फिल्मों में अभी तक ऐसा नहीं सनने में आया कि किसी तकनीशियन विशेष के लिए दर्शकों ने कोई फिल्म देखी हो। वे टूट पड़े हों।
    सिनेमा के सौ साल बीत गए। हम अभी तक इस दिशा में शिक्षित नहीं हुए हैं। पिछले सालों में रसूल पुट्टाकोटी को ऑस्कर मिल गया तो उनके बारे में कुछ लेख छप गए। उनके इंटरव्यू आ गए। सच्चाई तो यह है कि फिल्मों में आवाज आने के साथ साउंड का महत्व बढ़ा। साउंड अनबोले दृश्यों में भी भाव और अर्थ भर देता है। कभी फिल्मों को म्यूट कर देखें तो पता चलेगा कि हम कई दृश्य समझ ही नहीं पा रहे हैं। इसी प्रकार अन्य तकनीकी पक्षों का भी संदर्भित महत्व है। वकत आ गया है कि हम दर्शकों को सिनेमा के तकनीकी पक्षों से भी परिचित कराएं। उनकी सौंदर्य चेतना को विकसित करें। कई बार लोकप्रिय फिल्मों का तकनीकी पक्ष कमजोर रहता है तो कई बार अचर्चित फिल्मों में तकनीकी कौशल की बारीकियों पर नजर नहीं जा पाती।
    हमें अपनी सोच में विस्तार लाने की जरूरत है। निश्चित ही लोकप्रिय पत्र-पत्रिकाओं में स्पेस की समस्या रहती है। समीक्षा के लिए शब्द निश्चित हैं। उसमें तकनीशियनों पर लिखने की गुंजाइश नहीं बनती। हम इंटरव्यू और लेखों से शुरूआत कर सकते हैं। हम पाठकों को उनके बारे में बताना शुरू करें तो धीरे-धीरे यह स्थिति आएगी कि दर्शक फिल्मों में उनके योगदान को जानने ओर समझने के लिए उत्सुक होंगे। समस्या यह भी है कि देश में फिल्मों पर गंभीर विमश्र होता ही नहीं। विदेशों की तरह भारत में फिल्मों के जर्नल ओर पत्रिकाएं नहीं हैं। हम तकनीशियनों की उपेक्षा से नहरीं तिलमिलाते। दरअसल,हम उनके महत्व और योगदान के बारेे में जानते ही नहीं।
   

Tuesday, May 14, 2013

दरअसल ... भारतीय जन-जीवन में सिनेमा


-अजय ब्रह्मात्मज
    भारतीय सिनेमा के सौ साल हो गए। सदी बीत गई। सिनेमा ने अगली सदी में प्रवेश कर लिया। भारतीय सिनेमा के इतिहास की इस चाल की धमक हर जगह सुनाई पड़ी। खास कर हिंदी सिनेमा को लेकर ज्यादा चहल-पहल रही। पहुंच और विस्तार में अन्य भारतीय भाषाओं से अधिक विकसित और व्यापक होने की वजह से यह स्वाभाविक है। कमोबेश सभी क्षेत्रों, समुदायों और देश के समस्त नागरिकों को सिनेमा ने प्रभावित किया है। अगर किसी ने अपनी जिंदगी में केवल एक फिल्म देखी है तो भी वह अप्रभावित नहीं रह सका। सिनेमा का जादू कहावत के मुताबिक सिर चढ़ कर बोलता है। कभी यह जादू हमारे बात व्यवहार में दिखता है तो कभी हमें पता भी नहीं चलता और हम अपने व्यवहार, प्रतिक्रिया और संवेदना में फिल्मी दृश्य का अनुकरण कर रहे होते हैं।
    भारतीय परिवेश में सिनेमा हमें बहुत कुछ सिखाता है। प्रेम, संबंध, दोस्ती, नाते-रिश्ते और उनके साथ के अपने व्यवहार में हम फिल्मी चरित्रों की नकल कर रहे होते हैं। प्रेम हिंदी फिल्मों का प्रमुख अवयव है। अपनी जिंदगी में झांक कर देखें तो प्राय: सभी ने किशोर और युवा उम्र में फिल्मी हीरो या हीरोइन की नकल की होगी। छेडऩा, रूठना, मनाना और प्रेम जाहिर करना हम ने फिल्मों से ही सीखा है। हमें परिवार और स्कूल में प्रेम के अलावा हर तरह की शिक्षा दी जाती है। सामाजिक लोकाचार के लिए ज्ञान से लैस किया जाता है। फिर भी कुछ चीजें हम फिल्मों से ही सीखते हैं। भारतीय समाज की अपनी सीमाओं और विशेषताओं के कारण आज भी लडक़ा-लडक़ी की मुलाकात सामान्य नहीं होती। बड़े शहरों से लेकर देहातों तक में लडक़ा हो या लडक़ी प्रेमाकुल होने पर आवश्यक रूप से फिल्म के देखे दृश्यों को दोहराते हैं। कहीं न कहीं रणबीर कपूर,कट्रीना कैफ,इमरान हाशमी और प्रियंका चोपड़ा में खुद को देखने की तमन्ना रहती है। लड़कियों का सजना, धजना, फैशन मूल रूप से फिल्मों से प्रभावित होता है। बड़े होने पर भी यह आदत नहीं जाती। वह हमारे संस्कार में शामिल हो जाता है।
    मल्टीप्लेक्स के दौर में सिनेमा टिकटों की दर आकाश छूने पर भी सिनेमा के दर्शक कम नहीं हुए हैं। किसी की शहर या बाजार को आबाद करने का एक आसान तरीका है कि सिनेमाघर खोल दो। समाजशास्त्री बता सकते हैं कि शहर-दर-शहर खुल रह शॉपिंग मॉल में फिल्मों के प्रदर्शन यानी सिनेमाघर की व्यवस्था क्यों होती है? किसी भी कस्बे या शहर की प्रगति और आधुनिकता का एक मापदंड सिनेमाघर भी है। जिन शहरों में अभी तक मल्टीप्लेक्स नहीं आए हैं, उन शहरों को पिछड़ा माना जाता है। हर शहर में शाम में सिनेमाघरों के आसपास सबसे ज्यादा भीड़ होती है। सिनेमाघर सिर्फ फिल्में ही नहीं दिखाते। वे हमारे मेलजोल और दोस्ती बढ़ाने के सुरक्षित स्थान भी हो गए हैं। अधिकांश प्रेम कहानियां सिनेमाघरों में फिल्में देखते हुए ही डेवलप होती हैं।
    मल्टीप्लेक्स आने के बाद ब्लैक का फैशन खत्म हो गया है। वीक एंड कलेक्शन के इस दौर में नए दर्शकों को मालूम भी नहीं होगा कि कभी फिल्में रजत जयंती, स्वर्ण जयंती और हीरक जयंती भी मनाती थीं। राजेन्द्र कुमार की अधिकांश फिल्में सिल्वर जुबली मनाती थीं, इसलिए उनका नाम जुबली कुमार रख दिया गया था। सिनेमा के ब्लैक की स्थिति यह रही है कि एक रुपए के टिकट दस-दस रुपए तक में दर्शकों ने खरीदे हैं। फस्र्ट डे फस्र्ट शो देखने की यह दीवानगी कम हो गई है। पिछले दिनों लाहौर की फिल्म इंडस्ट्री पर शोध करते समय पता चला कि वहां नए-नए खुले कैपिटल सिनेमाघर में 14 मार्च 1931 को पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’  लगी थी। बोलती फिल्मों के लिए मुंबई से मशीनें मंगाई गई थी। इसकी वजह से दो आने की टिकट की कर दी गई थी। कुछ ने हवाला दिया है कि तब दर्शकों ने 20 रुपए में भी टिकटें खरीदी थी।
    सिनेमा वास्तव में हर भारतीय के जीवन में रच गया है। हम सिनेमा देखना बंद कर दें तो भी सिनेमा हमारे अंदर से नहीं निकलता। मेरे एक मित्र हैं। उन्होंने 1980 के बाद से फिल्में नहीं देखी हैं, लेकिन 1980 से पहले की हर फिल्म उन्हें वर्णमाला और गिनती की तरह याद है। वे आज भी उसी दौर के गीत सुनते-गाते हैं और उसी दौर के स्टारों की बातें करते हैं। अगर सर्वेक्षण करें तो देश का हर नागरिक किसी न किसी फिल्म, फिल्म स्टार या गीत से प्रभावित रहा है। दरअसल, फिल्म हर भारतीय का नया धर्म है। हमारी यादों में बसे गीत किसी भजन की तरह अकेले में होंठों पर आ जाते हैं। हम सिनेमा से बाहर नहीं हो सकते। सिनेमा लगातार हमारे ओर प्रवेश करता रहता है।


औरत हूं तो सवाल पूछते हैं? -माधुरी दीक्षित


-अजय ब्रह्मात्‍मज 
शादी के बाद हिंदी फिल्मों की अभिनेत्रियां धीरे-धीरे अनेक प्रकार के दबावों की वजह से रुपहले पर्दे से गायब होने लगती हैं।निर्माता-निर्देशक और दर्शकों की रुचि उनमें कम होने लगती है। उन्हें हिंदी फिल्मों के अभिनेताओं की तरह लंबी उम्र नहीं मिलती। यही वजह है कि कुंवारी रहने पर उम्र बढऩे के साथ उन्हें तवज्जो नहीं दी जाती। अभिनेत्रियां इसे सहज तौर पर स्वीकार करती हैं। अभिनय क्षेत्र में सक्रिय रहने की लालसा रहन परे उन्हें सहयोगी,चरित्र और मां-बहन की भूमिकाएं ही मिल पाती हैं। कुछ ही अभिनेत्रियां अपवाद बन पाती हैं। उन्हें केंद्रीय किरदार मिलते हैं। उन्हें दर्शक भी पसंद करते हैं। उनकी फिल्मों का इंतजार करते हैं। मााधुरी दीक्षित ऐसी अभिनेत्रियों में से एक हैं। अभी वह निर्माता अनुभव सिन्हा की सौमिक सेन निर्देशित गुलाब गैंग में प्रमुख भूमिका निभा रही हैं।वह अभिषेक चौबे की डेढ़ इश्किया भी कर रही हैं,जिसके निर्माता विशाल भारद्वाज हैं। अभी दो हफ्ते के अंदर 15 मई को अपने जीवन के 46 वसंत पूरे करेंगी। उनकी सक्रियता और समर्पण से अचंभा होता है। सहसा मुंह से निकलता है इस उम्र में भी?
    कभी आप उनके सामने हों तो भूल कर भी न तो ऐसा कहें या पूछें? हम ने यही गलती कर दी थी। वह नवी मुंबई में एक वीरानी सी जगह पर सौमिक सेन की फिल्म गुलाब गैंग की शुटिंग कर रही थीं। दोपहर का समय था। तेज हवा चल रही थी,जो अपने साथ धूल भी उड़ा रही थी। गर्मी और धूल से भरी उस दोपहरी में माधुरी दीक्षित एक्शन दृश्यों की शूटिंग कर रही थीं। फिल्म की खलनायिका जूही चावला के गुडों से उन्हें भिडऩा था। फाइट कोरियोग्राफर कनिष्क शर्मा के निर्देश के मुताबिक वह अपनी सहेलियों के साथ उनसे जूझ रही थीं। इमोशन दृश्यों से अलग डांस और एक्शन के दृश्यों में प्रमुख अभिनेता या अभिनेत्री को बाकी कलाकारों और डांसर फाइटर के साथ संगति बिठानी पड़ती है। एक्शन दृश्यों में पारंगत अभिनेताओं को भी रिटेक देने पड़ते हैं। माधुरी दीक्षित कभी कैमरे,कभी लाइट तो कभी किसी और टेक्नीकल कारण से बार-बार एक्शन दोहरा रही थीं। एक्शन दृश्यों में उनकी संलग्नता और दक्षता दिख रही थी। फाइट कोरियाग्राफर कनिष्क शर्मा ने बताया कि डांसर होने की वजह से माधुरी दीक्षित एक्शन के स्टेप्स आसानी से दोहरा लेती हैं। डांस की तरह एक्शन में भी लय होती है। और उनका समर्पण देखने लायक है। अमूमन ऐसे दृश्यों में बॉडी डबल का इस्तेमाल किया जाता है,लेकिन माधुरी दीक्षित ने स्वयं इन्हें करना पसंद किया।
    उनके इसी समर्पण को देख हम ने कह दिया ़ ़ ़इस उम्र में ़ ़ ़अभी हमारी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि माधुरी पूछ बैठीं। किस उम्र में? मेरी उम्र क्या है? अगर हीरो इस उम्र में एक्शन करें और वे कर भी रहे हैं तो कोई सवाल या आश्चर्य नहीं करता। मैं कर रही हूं तो यह सवाल क्यों? इसलिए न कि मैं औरत हूं। दर्शकों और आम नागरिकों के ऐसे सवालों की के पीछे पुरुष मानसिकता झलकती है। जमाना बदल गया है। समाज के सभी क्षेत्रों में महिलाएं पुरुषों के समकक्ष योगदान कर रही हैं। अब ऐसे सवाल नहीं किए जाने चाहिए। फिल्मों के सेट पर ही देख लें। इस फिल्म के प्रोडक्शन की निगरानी एक लडक़ी कर रही है। दूसरे विभागों को भी लड़कियां संभाल रही हैं। माधुरी यह भी नहीं मानतीं कि उनके करिअर में कोई गैप आया है। उन्होंने कहा, आप देखें तो मैं लगातार काम कर रही हूं। बीच में शादी और बच्चों की वजह से थोड़ी छुट्टी ली थी। मेरी समकालीन अभिनेत्रियां यहां रहते हुए जितना काम कर पा रही हैं। मैं अमेरिका से आकर उतना ही काम कर रही हूं। और जब तय किया कि अब फिल्मों पर अधिक ध्यान देना है तो सपरिवार भारत आ गई।
    भारत आने की वजह पूछने पर उन्होंने दोटूक जवाब दिया,मैं हिंदी फिल्मों की अभिनेत्री हूं। मुझे अपना काम यहीं मिल सकता है। मेरे पति चिकित्सक हैं। दुनिया में कहीं भी उनकी सेवाएं ली जा सकती हैं। हम दोनों ने बहुत सोच-समझ कर यह फैसला लिया। मेरे मां-पिता बुजुर्ग हो गए हैं। उन्हें भी देखभाल की जरूरत है। इन सबसे भी बड़ी बात यह थी कि मैं अपने बेटों को भारतीय संस्कृति से परिचित कराना चाहती थी। किताबों,इंटरनेट या कभी-कभी आने-जाने से मिला परिचय आधा-अधूरा ही रहता। अभी सभी खुश हैं। मैं फिल्में कर रही हूं। मेरे पति भी व्यस्त हैं।
    माधुरी दीक्षित गुलाब गैंग के साथ डेढ़ इश्किया भी कर रही हैं। इस फिल्म में उन्हें नसीरूद्दीन शाह और अरशद वारसी के साथ काम करने का मौका मिला है। गुलाब गैंग में वह जूही चाावला के साथ हैं। जूही के साथ यह उनकी पहली फिल्म होगी। गुलाब गैंग में दोनों अभिनेत्रियां आमने-सामने दिखाई पड़ेंगी। माधुरी दीक्षित ने बताया,गुलाब गैंग धमाकेदार एक्शन फिल्म है। इसके पहले दो फिल्मों में मैंने एक्शन दृश्य किए हैं। दर्शकों को लगता है कि मृत्युदंड में मैंने ज्यादा एक्शन किया था। सच तो यह है कि मैंने उस से ज्यादा एक्शन अंजाम में किया था। गुलाब गैंग बिल्कुल अलग किस्म की एक्शन फिल्म है। सौमिक सेन ने इस फिल्म का निरूपण अनोखे तरीके से किया है। सौकिम सेन ने माधुरी को मुख्य भूमिका देने की वजह पूछने पर कहा,मुझे सिर्फ एक्शन ही नहीं दिखाना है। दस फिल्म में नाटकीय दृश्य भी हैं। कोई सशक्त अभिनेत्री ही इस भूमिका को निभा सकती थी। हम ने माधुरी दीक्षित को राजी किया। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि माधुरी को इस अंदाज में दर्शकों ने अभी तक नहीं देखा है।
    फिल्म के निर्माता अनुभव सिन्हा माधुरी दीक्षित को घोर प्रोफेशनल अभिनेत्री मानते हैं। सौमिक सेन की पसंद से सहमत होने के बारे में पूछने पर उनहोंने कहा,मैंने पंकज पाराशर की फिल्म राजकुमार में असिस्ट किया था। उनसे तभी का परिचय था। गुलाग गैंग की शूटिंग थोड़ी टफ थी,लेकिन मुझे कभी कोई शिकायत सुनने को नहीं मिली। माधुरी पुराने और नए दौर की संधि हैं। उन्होंने दोनों दौर की अच्छी बातों को अपना लिया है। काम के समय वह अपनी इमेज और रुतबे की परवाह नहीं करतीं। उनके लिए फिल्म के दृश्य सबसे अधिक महत्वपूर्ण होते हें?
   

Sunday, May 12, 2013

फिल्म समीक्षा : गो गोवा गॉन

movie review : go goa gone-अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी फिल्मों में इन दिनों अनोखे प्रयोग हो रहे हैं। अच्छी बात तो ये है कि उन्हें समर्थन भी मिल रहा है। निर्माता और दर्शकों के बीच इस नए रिश्ते को प्रयोगवादी निर्देशक मजबूत कर रहे हैं। युवा निर्देशकों की जोड़ी राज-डीके जैसे निर्देशक हैं। अपनी नई कोशिश में उन्होंने जोमकॉम पेश किया है। जोम्बी और कॉमेडी के मिश्रण से तैयार यह फिल्म भारत के लिए नई है। अभी तक हम भूत,प्रेत,चुड़ैल और डायन की फिल्मों से रोमांचित होते रहे हैं। लेकिन अब राज-डीके जोम्बी लेकर आए हैं। विदेशों में जोम्बी फिल्में खूब बनती और चलती हैं। जोम्बी अजीब किस्म के प्राणि होते हैं। देखने में वे आदमी की तरह ही लगते हैं,लेकिन संवेदना शून्य और रक्तपिपासु होते हैं। उन्हें विदेशी जोम्बी फिल्मों में विभिन्न रूपों में दिखाया गया है। राज-डीके की गो गोवा गॉन में ड्रग्स के ओवरडोज से आम इंसान जोम्बी में तब्दील होता है। और फिर कोई जोम्बी किसी सामान्य व्यक्ति को काट खाए तो वह भी जोम्बी बन जाता है। जोम्बी मतलब जिंदा लाशें ़ ़ ़
हार्दिक,लव और बन्नी तीन दोस्त हैं। तीनों नई नौकरियों में कार्यरत हैं। आज के कुछ युवकों की तरह उन्हें भी नशे का शौक है। जीवन में एक्साइटमेंट के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। तीनों दोस्त एक-दूसरे के पूरक और सहायक हैं। एक बार तीनों गोवा जाते हैं। वहां एक लड़की के चक्कर में वे एक द्वीप पर चल रहकुी गुप्त रेव पार्टी में शामिल होते हैं। शुरू में सब ठीक रहता है। सुबह नशा टूटने और जागने पर उन्हें अपने आसपास अजीब किस्म की हरकतें दिखाई पड़ती हैं। बाद में उन्हें पता चलता है कि वे जोम्बी के बीच फंस गए हैं। बोरिस उन्हें इस बात की जानकारी देता है। भारतीय मूल का बोरिस ड्रग माफिया है। ड्रग के कारोबार में उसने रूसी पहचान हासिल कर ली है। वही तीनों दोस्तों की जान भी बचाता है।
राज-डीके ने एक अविश्वसनीय सी कहानी को रोचक और विश्वसनीय बनाने की सफल कोशिश की है। ऊपरी तौर पर यह फिजूल सी फिल्म लगती है,लेकिन अपने कथ्य और प्रस्तुति में यह पूरी तरह से समकालीन फिल्म है। शहरी युवकों के बीच ऐसे किस्से सुने जाते हैं। सच्चाई नहीं होने पर भी किसी फैंटेसी की तरह यह मोहक और उत्तेजक होता है। रात-डीके ने महानगरीय किशोर और युवा दर्शकों के लिए लिए यह फिल्म सोची है। राज-डीके का ह्यूमर कभी-कभी ब्लैक कॉमेडी के करीब जाता है। इस फिल्म के कुछ दृश्यों में भी इसकी झलक मिलती है। हार्दिक,लव और बिन्नी की स्थिति प्रकारांतर से देश के शहरी युवकों के भटकाव और अनिश्चितता को जाहिर करती है। उनकी बातचीत,सपनों और आकांक्षाओं में केवल वर्तमान को भोगने की लालसा है। इस लालसा के दुष्परिणाम से वे नावाकिफ है। अंत तक आते-आते फिल्म संदेश भी दे जाती है।
सैफ अली खान गहरे आत्मविश्वास के साथ सहयोगी किरदार निभाते हैं। फिल्म तीन दोस्तों के सहारे आगे बढ़ती है। लेखक-निर्देशक ने हार्दिक और लव को अधिक तवज्जो दी है,लेकिन अपने भोलेपन से बन्नी से हंसाता है। बन्नी की भूमिका में आनंद तिवारी उल्लेखनीय अभिनय किया है। कुणाल खेमु और वीर दास की जोड़ी की केमिस्ट्री देखते ही बनती है। अभिनेत्रियों के लिए अधिक दृश्य नहीं हैं।
अवधि- 110 मिनट
ढाई स्टार

Thursday, May 9, 2013

मटरु की बिजली का मंडोला-विनीत कुमार


चवन्नी के पाठकों के लिए विनीत कुमार का यह लेख… 

विशाल भारद्वाज की फिल्म मटरु की बिजली का मंडोला जगह-जगह ऊब और बहुत ही औसत दृश्यांकन के बावजूद बड़े फलक की फिल्म है. लेकिन फिल्म का विस्तार जिस बड़े फलक तक है, ऐसे में ऊब पैदा करनेवाले फ्रेम्स को पीवीआर जैसे थिएटर में बैठकर देखते रहने के बावजूद कोई चाहे तो अर्थशास्त्र या संस्कृति समीक्षा की कक्षाओं में बैठकर व्याख्यायन सुनने के एहसास के साथ बहुत ही सादे ढंग से गुजर सकता है. वैसे भी जहां हर सांस्कृतिक चिन्हों,मानवीय संवेदना और यहां तक कि सरोकार की जमीन को हद तक एक चमकीले उत्पाद में तब्दील किए जाने के बावजूद कुछ चिन्ह अपनी मूल अवस्था में ऊबाउ ही बने रह जाते हैं, इस स्थिति में फिल्म निर्देशक से अतिरिक्त अपेक्षा करने के बजाय हम इसे क्लासरुम के सांस्कृतिक पाठ मानकर ही उससे समझने-गुजरने की कोशिश करें तो इस ऊब में अटके रहने के बजाय बाकी के हिस्सों पर बात कर सकेंगे. ये फिल्म दर्शकों से बीच-बीच में इस मेंटल शिफ्टिंग मांग करती नजर आती है.
 एक तरह से देखें तो मटरु की बिजली का मंडोला के ऊब पैदा करनेवाले दृश्य विषय की उस आदिम अवस्था की ही प्रस्तुति है जो पॉलीथिन की तरह न तो घुलती है, न सड़ती है. मसलन गरीब,किसान,मजदूर की समस्या और पूंजीपतियों/शोषक के चरित्र को ही ले लीजिए. पूरे ढाई घंटे की फिल्म में उनकी समस्याओं को अलग-अलग तरीके से बताने-समझाने की विशाल कोशिश करते रहेंगे तो एक स्थिति तो ऐसी आएगी ही कि दर्शकदीर्घा से सवाल उठने लगे- इसमे नया क्या है, हिन्दुस्तान में आखिर कब ऐसा सुराज आया था जब किसानों को उसका बराबर का हक मिला था, मजदूरों के साथ न्याय होता रहा था जो कि अब नहीं हो रहा..लालबहादुर शास्त्री का जय जवान जय किसान सामाजिक प्रकिया का हिस्सा बनने पाता कि इससे पहले ही सामान्य ज्ञान की परीक्षाओं में वस्तुनिष्ठ सवाल के रुप में कैद हो गया कि ये नारा किसने दिया है ? फिर मुंशी प्रेमचंद रंगभूमि और गोदान में जिस समाज को रेखांकित कर रहा था, उनसे अलग और नया इस फिल्म में क्या है जिसकी क्रेडिट विशाल भारद्वाज को दी जानी चाहिए ? दूसरा कि ऊब की एक दूसरी वजह ये भी है कि माओवाद, उदारवादी अर्थव्यस्था,भूमि अधिग्रहण जैसे शब्द और मुद्दे मुख्यधारा मीडिया में आकर इस कदर घिस चुके हैं कि एकबारगी जब इनसे जुड़े दृश्य हमारे सामने आते हैं तो लगता है समाचार चैनलों की पुरानी फुटेज सिनेमा की शक्ल में दिखाने की कोशिश की जा रही है.
अगर इस फिल्म पर इस सिरे से ही बात करनी हो कि इसमें नया क्या है और पूर्ववर्ती फिल्मकारों और साहित्यकारों से अलग ऐसा क्या बात कर दी कि इसके लिए विशाल भारद्वाज को अलग से क्रेडिट दी जाए तो बेहतर है कि इस फिल्म को साहित्यिक रुपांतरण का हिस्सा मानकर इस पर मेहरबानी कर दी जाए और एक तरह से इसे बख्श दिया जाए. वैसे भी हिन्दी सिनेमा और साहित्यिक रचनाओं में तुलनात्मक अध्ययन और मिलान करने की जो पुरानी रिवायत रही है, इससे जुराबों के जोड़े खोजने-मिलाने के अतिरिक्त( इस फिल्म के संदर्भ में) कुछ नया न हो सकेगा और ऐसा करना बहुत आसान भी है. लेकिन इस फिल्म की क्रेडिट ही इस बात में है कि ये ऊब पैदा करने के खतरे तक जाने के बावजूद मुख्यधारा मीडिया द्वारा जो शब्द रोजमर्रा के धुंआधार पैकेज और स्पेशल स्टोरी में आकर घिस चुके हैं, उन घिसे हुए शब्दों और घटनाओं की पेंदी उलटकर नए अर्थ का प्रकाशन करती है, उनके उन संदर्भों से दर्शकों को अवगत कराती है जो कि अपने खो चुके अर्थों और चालू मौजूदा अर्थों के प्रतिलोम जान पड़ते हैं. यहीं पर आकर हम समझ पाते हैं कि फिल्म की फलक सिर्फ अधिकाधिक मुद्दों के शामिल किए जाने के कारण विस्तार नहीं पाता है बल्कि उसकी आधा से ज्यादा मेहनत घिस चुके शब्दों और घटनाओं की पेंदी उलटकर हमें उसके अर्थ और संदर्भ बताने में लग जाते हैं.
मसलन हममे में जिन दर्शकों ने भी माओवाद को लगातार समाचार चैनलों के जरिए जानने-समझने की कोशिश की है उसके लिए एक माओवादी और आतंकवादी में फर्क करना लगभग असंभव है. राष्ट्रीयता के प्रोजेक्ट में जिस तरह आतंकवाद एक भारी समस्या है, उस समस्या के साथ माओवाद को नत्थी करके देखना कम जरुरी नहीं है. यहां पर आकर मुख्यधारा दी गई ये समझ सरकार द्वारा प्रचारित समझ से अलग नहीं रह जाती बल्कि सरकार की समझ को मुख्यधारा मीडिया प्रोत्साहित करते ही जान पड़ते हैं. आप गौर करें तो इसे लेकर मुख्यधारा मीडिया में खबरों और उसकी प्रस्तुति के जो रुझान होते हैं , आपको शक होगा कि कहीं ये सरकार की प्रेस रिलीज का टीवीयांतरण भर तो नहीं कर देते ? मटरु की बिजली का मंडोला मजबूती से माओवाद और आतंकवाद के बीच की मुख्यधारा मीडिया द्वारा खत्म की जा रही विभाजन रेखा को बचाने का काम करती है. लेकिन ऐसा करते हुए वो उस छद्म मार्क्सवाद को कहीं से क्लीन चिट भी नहीं देती जो सामाजिक बदलवा और सत्ता परिवर्तन के विकल्प शक्तिभोग आटा जैसी कंपनियों के सहयोग और गठजोड़ में जाकर खोजती है. याद कीजिए मटरु की एक माओवादी होकर सामाजिक परिवर्तन की पूरी रणनीति और उसके निजी जिंदगी पर..तीन चीजें बहुत ही मजबूती से रेखांकित होती है- एक तो ये कि मंडोला में रहते हुए भी दिल्ली में बैठे तमाम रसूकदार( शक्तिभोग आटा बस एक प्रतीक भर है) से उसकी चिलम- बीड़ी जैसे संबंध है, दूसरा कि गांव के लोग सामूहिक स्तर पर गोबर बम से हमला करते हैं,जीतते हैं और फिर सामूहिक रुप से बारिश के बीच तैयार फसल,बोरी में बंद अनाज को गेवा बैठते हैं लेकिन इस सामूहिकता के बीच जिसका नायक स्वयं मटरु है, उबरने का उपाय कार्पोरेट में तलाशता है,व्यक्तिगत स्तर पर अपनी इस हार को विश्वविद्यालय में पढ़ाने के पेश के रुप में खोजता है और तीसरा कि मंडोला के हृदय परिवर्तन का इंतजार करता है और ऐसा होते ही उसकी बेटी बिजली के साथ बड़े आराम से जिंदगी बिताने के फैसले लेता है. इस बीच किसान आंदोलन का क्या हुआ, मटरु की एक हांक में हजारों की संख्या में जुटनेवाले किसानों का क्या हुआ, लाल कपड़े पर माओ के संदेश को उंची आवाज में पढ़कर सुनानेवाले किसान का क्या हुआ, सब अधूरे-बिखरे प्रोजेक्ट की तरह जहां का तहां रह गया. आप अगर असल जिंदगी में भी आसपास नजर दौड़ाएं तो दरअसल विशाल भारद्वाज माओवादियों/ मार्क्सवादियों की उस नब्ज पर हाथ रखते हैं जहां ये विचारधारा,सामाजिक परिवर्तन का ये औजार उनके लिए ऐसा करने के बजाय एक सुरक्षित करियर बनकर तब तक सक्रिय और जिंदा रहता है जब तक सामूहिकता के बीच व्यक्तिगत स्तर की जड़ें मजबूत नहीं हो जाती. व्यक्तिगत स्तर की ये जमीन मजबूत हुई नहीं कि सामाजिक परिवर्तन का आंदोलन एक अधूरे प्रोजेक्ट के रुप में आनेवाले कॉमरेड के भरोसे छोड़ दिए जाते हैं. ऐसे में फिल्म का शुक्रिया सिर्फ इस बात के लिए नहीं दिया जाना चाहिए कि वो माओवाद और मार्क्सवाद की को मुख्यधारा मीडिया की बनायी छवि की चपेट से दर्शकों को बाहर लाने की कोशिश करती है बल्कि इनसे संबद्ध लोगों की वैलिडिटी पीरियड की क्रांतिकारिता से बारीकी से अवगत कराती है. इसे विशाल भारद्वाज की मार्क्सवादी दलों के लेकर उथली,सतही या प्रारंभिक स्तर की समझ करार देते हैं तो यकीन मानिए इस समझ की आमलोगों को सख्त जरुरत है.
दूसरी बात कि देश में लोकतंत्र बहाल रहे इसके लिए न्यायपालिका,कार्यपालिका और विधायिका के साथ-साथ पहाड़े की शक्ल में चौथा खंभा मीडिया पढ़ दिया जाता है और ये समझ विकसित करने की कोशिश की जाती है कि इसका काम तीनों संवैधानिक शक्तियों के बीच संतुलन बनाना ही इस मीडिया का काम है, इस फिल्म में मीडिया चौथा खंभा या जनसंचार माध्यम के बजाय उस जोकर की शक्ल में आया है जिसका मूल धर्म दर्शकों को इंगेज रखना है. उसकी मौजूदगी ही समाज का सबसे बड़ा प्रहसन है. मंडोला के हैलीकॉप्टर क्रैश होने की घटना की कवरेज जब हम देख रहे होते हैं तो ये हमारे रोजमर्रा चौबीस गुना सात राष्ट्रीय चैनलों के देखे जाने की घटना से अलग नहीं लगता. कायदे से देखें तो यही वो प्रस्थान बिंदु है जहां से हम आर्थिक उदारीकरण,राष्ट्र हित,विकास,माओवाद,भूमि अधिग्रहण जैसे मुख्याधारा द्वार घिस दिए गए शब्दों के इस फिल्म के जरिए नए अर्थ संदर्भ में देख पाते हैं क्योंकि इस मीडिया की जोकर छवि से हम लगभग मुक्त हो रहे होते हैं और सिनेमा तब अपने तरीके से अर्थ विस्तार की ओर ले जाती है. हम इन शब्दों को समझने में मीडिया से डिक्टेट नहीं हो रहे होते हैं और तब समझ आता है कि समाचार चैनलों के प्राइम टाइम चारा की शक्ल में आनेवाले इन मुद्दों के बावजूद हम ये क्यों नहीं समझ पाते कि जो देश चलाने का काम कर रहे हैं  दरअसल वही कार्पोरेट, उद्योग, ठेकेदारी से लेकर रीयल इस्टेट का धंधा भी चलाने का काम कर रहे हैं. उनका दो-दो प्रोजेक्ट एक साथ अबाध गति से चलता रहता है ताकि सत्ता और उद्योग दोनों में से कोई एक प्रोजेक्ट फेल हो जाए तो एक-दूसरे की शह से उबर जाएं. आखिर मंडोला( पंकज कपूर) क्या चाहता है राजनीति से बड़ा उद्योग और चौधरी देवी( शबाना आजमी) क्या चाहती है सरकार चलाने के साथ-साथ उद्योग चलानेवाली कुर्सी. ये सिर्फ उद्योग चलानेवालों से कहीं आगे की चीज है जिसमे राजनीतिक आकांक्षाएं और संसाधनों पर कब्जे की भूख एक-दूसरे में इस तरह गड्डमड्ड हो जाती है कि आप इनका विभाजन राजनीतिशास्त्र और दूसरी तरफ पूंजी और बुर्जुआ वर्ग के चश्मे से इसे ठीक-ठीक विश्लेषित ही नहीं कर पाते. और इन दो प्रोजेक्ट के बीच जनता गेंद की तरह उछलायी जाती रहती है जिसके भीतर विकास के सपने भर दिए गए हैं. जाहिर है, सपनों की हवा भर दिए जाने से वो इतना वजन नहीं रख पाती कि लगातार इन पर दवाब बनाए रख सके. वैसे भी अभी तक जनता जब सिर्फ सत्ता से या सिर्फ पूंजीपतियों से अलग-अलग ही नहीं लड़ पायी है तो दोनों के एक हो जाने पर उसकी क्या हालत होगी, समझा जा सकता है. वो सिर्फ लूटनेवाले गाने के पंक्तियां याद रखने या पूंजीपति बाप की बेटी लेकिन सर्वहारा की शक्ल में दिखनेवाली बिजली और माओवादी लेकिन तमाम दुनियादारी और व्यक्तिगत इच्छाओं को सहेजे मटरु के लिए मंगलाचरण ही गाने लायक रह जाए,बहुत है. इस मायने में ये फिल्म सैद्धांतिक तौर पर सरकार के अंगों, कार्पोरेट,उद्योग और साथ में मीडिया के पृथक् रुप में देखे जाने की आदत को सुधारने की अपील करती है लेकिन कोई निष्कर्ष प्रस्तावित नहीं करती. अंत में निष्कर्षतः कहा जा सकता है जैसी समीक्षा की आदत से बाज न आनेवाले फिर भी इसमें निष्कर्ष निकालना चाहें तो बिडंबना ही इसका निष्कर्ष है जिसे कि विशाल ने जहां-तहां प्रहसन की शक्ल देकर रेखांकित करने की खूबसूरत कोशिश की है. खूबसूरत इस अर्थ में कि भैंस का काली से गुलाबी हो जाना सिर्फ प्रहसन भर नहीं है बल्कि उससे कहीं ज्यादा मजबूती से उसी बिडंबना को रेखांकित करना है जहां गुलाबी भैंस शराब का स्थानीय ब्रांड लगातार एक खास संदर्भ बनकर पूरी फिल्म में मौजूद रहता है. इसे हम छवि चरित्र के रुप में चाहें तो स्वतंत्र चरित्र मान सकते हैं. आखिर ये खूबसूरत बिडंबना नही तो और क्या है कि जिस शराब को जनहित में जारी विज्ञापन से लेकर सामाजिक मान्यताओं ने स्वास्थ्य और चरित्र का हवाला देकर सेवन की मनाही जैसे निर्देश देते आए हों, मंडोला पूरी फिल्म में तभी सबसे ज्यादा जेनुइन,संवेदनशील और मानवीय जान पड़ती है जब-जब वो इस गुलाबी भैंस के संदर्भ से जुड़कर आता है. तभी स्थानीय राजनीतिक से बड़े उद्यागपति,दैत्याकार फैक्ट्री और शॉपिंग मॉल के मालिक बनने के सपने के गुलाबी डोरे उसकी आंखों में तैरते हैं जब वो या तो इस शराब की बोतल के साथ होता है या फिर बोतल से जुड़ी स्मृतियों के साथ. यानी यहां विशाल भारद्वाज ने इस बोतल का इस्तेमाल शराब से कहीं आगे पोएटिक जस्टिस( काव्य निर्णय) के रुप में किया है जो कि अपने अभिधात्मक अर्थ को छोड़कर बहुत आगे निकल गयी है. ये बोतल पूरी फिल्म की पोएटिक जस्टिस है.
मटरु की बिजली का मंडोला के गानों की प्रोमो की शक्ल से अलग खासकर बिजली की कमर के उपरी हिस्से पर लिखी देखो मगर प्यार से के अलावे स्वतंत्र रुप से सुनें तो ये सिनेमा का सहारा लिए बिना भी अपनी एक कहानी रचती है. इन गानों के आधार पर आप उस कहानी तक पहुंच सकते हैं जिसे कि विशाल ने फिल्मायी है. मतलब ये कि फिल्म में बल्कि विशाल की बाकी फिल्मों की तरह ही गाने अपने भीतर कथा प्रस्तावित करने और उसका विस्तार देने का माद्दा रखती है. वो अपने उपर अतिरिक्त दायित्व लेकर चलती है जो कि कोई अजूबा न होकर माध्यम सैद्धांतिकी की उस बुनियादी समझ का इस्तेमाल भर है कि अगर सिनेमा हाइब्रिड विधा है जिसमे कि एक ही साथ अखबार,रेडियो,टेलीविजन और खुद सिनेमा शामिल है तो क्यों न उसका इस्तेमाल उस कथासूत्र की मजबूती में लगा दिए जाएं जिसके कि किसी एक माध्यम के चूक जाने पर उसके कमजोर पड़ जाने की गुंजाइश बन जाती है. आइटम गानों के अभ्यस्त कान इसे भले ही चमत्कार की तरह लें क्योंकि वहां गाने अचानक से आए मोबाईल रिचार्च ऑफर की तरह आते हों लेकिन गानों का इस तरह के प्रयोग सिनेमा को उस दौर की तरफ ले जाते हैं जहां गानों के बीच कहानी के रेशे इस तरह से गुंथे होते थे कि उससे गुजरते हुए उसकी कहानी से गुजरना जैसा रहा है.
लेकिन कहानी और गानों की इन बारीकियों के बीच ये फिल्म कुछ सवालों को गंभीरता से ले जाने के बजाय चमकीली बिंदु( स्पार्किंग प्वाइंट्स) भर बनाकर छोड़ जाती है. मसलन राजनैतिक विचारधारा के तहत काम करनेवाले मटरू और उसके प्रेम में उसके साथ काम करनेवाली बिजली की चैरिटी की प्रकृति एक है ? हम सामाजिक आंदोलन के इस अधूरे प्रोजेक्ट को किस रुप में समझें या फिर इसे एक नीयत पैटर्न मानकर छोड़ दें ? फिल्म में वामपंथ का आना विशाल भारद्वाज की डीयू और जेएनयू कैंपस की वामपंथी छात्र संगठनों के बीच रहकर बनी समझ का हिस्सा है जो उनके छोड़ देने के साथ ही आगे जाकर विकसित ही नहीं हुआ, ये एक तरह से वामपंथ के बजाय कैंपस वामपंथ का फिल्म संस्करण है. इसके साथ ही मटरु और बिजली का विदेश से पढ़ाई करके मंडोला जैसे गांव में अपनी प्रकृति और जीवन शैली से बिल्कुल उलट काम करना फैंटेसी भर है या फिर दिमागी तौर पर हारे हुए प्रवासी भारतीय की वापसी जिसके सपने विदेशों के एन्फ्रास्ट्रक्चर में जाकर उलझ जाते हैं और जो अपनी लाख कोशिशों के बावजूद अपनी चुनी गई विचारधारा का नहीं हो पाता.