Search This Blog

Tuesday, April 30, 2013

बांबे टाकीज का शीर्षक गीत



 हिंदी फिल्‍मों के सितारों पर चित्रित बांबे टाकीज का शीर्षक गीत भारतीय सिनेमा तो क्‍या हिंदी सिनेमा को भी परिभाषित नहीं कर रहा है। हां हम जिसे कथित बालीवुड कहते हैं। उसके रूंप-रंग का जरूर बखान करता है यह गीत।
जीना यहां मरना यहां
इसके सिवा जाना कहां अरे हम हैं वहीं, हम थे जहां
सौ बरस का हुआ
फिर भी है जवां अपना सिनेमा
रहेगा सदा ही यह जवां

पर्दे पर चमत्‍कार है

यह चढ़ता सा बुखार है
सर पे जुनून सवार है
ख्‍वाबों का कारोबार है
एक्‍शन इमोशन आप चुन लो
सब हिट है चाहे फ्लॉप सुन लो
दिल का छेड़ेंगे तार सुन लो
देखेंगे बारम्‍बार सुन लो

ये रिश्‍तों का संगम है अपना बांबे टाकीज
बांबे बांबे टाकीज बांबे बांबे टाकीज
सब कहते मायाजाल है
यह जो भी है कमाल है
जो फिल्म ना हो यार सुन लो
तो जीना हो बेकार सुन लो    
हर दिल की धड़कन है अपना बांबे टॉकीज
यह सिखलाती है प्यार सुन लो
ढिशुम ढिशुम मार सुन लो
सेल्‍युलाइट डिजिटल अपना बांबे टॉकीज

टॉकीज टॉकीज टॉकीज टॉकीज
पिक्‍चर की कल्‍चर है अपना बांबे टाकीज

ठुमका है झुमका है अपना बांबे टाकीज
हो लटका है झटका है अपना बांबे टाकीज
रॉकिंग है रोलिंग है अपना बांबे टाकीज
सुपर है डुपर है अपना बांबे टाकीज
सपनों की टकसाल है
यह दुनिया बेमिसाल है   
बांबे टॉकीज, हां बांबे टॉकीज
अपना सिनेमा बांबे टाकीज
सौ बरस का है बांबे टाकीज
देखो रे देखो रे देखो रे देखे रे



हकीकत और फसानों की एक सदी : तब्बसुम




आप उन्हें बेबी तब्बसुम के नाम से जानते हैं. टेलीविजन के इतिहास में शायद ही किसी सेलिब्रिटी टॉक शो को इतनी लोकप्रियता मिली होगी जितनी फूल खिले हैं गुलशन गुलशन को मिली थी. 21 सालों तक लगातार बेबी तब्बसुम के संचालन में इस शो का प्रसारण किया जाता रहा. इस शो की लोकप्रियता की खास वजह यह थी कि इस शो में हिंदी सिनेमा जगत की लगभग सारी हस्तियां शामिल होती थीं और सभी बहुत अनौपचारिक बातें किया करते थे. चूंकि खुद बेबी तब्बसुम भी ढाई साल की उम्र से ही हिंदी सिने जगत का हिस्सा थीं. तब्बसुम ने अपने 67 साल इस इंडस्ट्री को दिये हैं. वे हिंदी सिनेमा की रग रग से वाकिफ हैं. हर सदी से वाकिफ हैं.  ऐसे में जब भारतीय सिनेमा 100वें साल में प्रवेश कर रहा है, तो बेबी तब्बसुम ने बेहतरीन शख्सियत और कौन होतीं. हिंदी सिनेमा व हिंदी सिने जगत की हस्तियों के साथ पली बढ़ी तब्बसुम की जिंदगी सिनेमा में ही रची बसी है. हिंदी सिनेमा के  100 साल के अवसर पर बेबी तब्बसुम ने अपनी यादों के पिटारे में से हस्तियों के व्यक्तिगत जीवन से जुड़े कुछ ऐसी ही दिलचस्प किस्से अनुप्रिया अनंत से सांझा कीं...

आधी इंडस्ट्री की गोद मैं खेली, आधी इंडस्ट्री मेरी गोद में खेली
आप मेरा और हिंदी सिनेमा का रिश्ता कितना गहरा और गाढ़ा है. इसका अनुमान आप  इस बात से लगा सकती हैं कि हिंदी सिनेमा के 100 साल पूरे होने जा रहे हैं. और मैं फिलवक्त 70 साल की हूं. और इस इंडस्ट्री को मैंने 67 साल दे दिये.  लेकिन देखिए मैंने अपनी पहली फिल्म 1946 में साइन की थी. फिल्म का नाम नरगिस ही था. फिर 1951 में ही फिल्म दीदार में मुझे नरगिस आपा के बचपन का किरदार निभाने का मौका मिला था. उस वक्त मुझे नाम मिला बेबी तब्बसुम और आज भी मुझे जब कोई सम्मान मिलता है तो बेबी तब्बसुम के नाम से ही मिलता है. किसी कलाकार को और क्या चाहिए कि सीनियर सीटिजन होने के बाद भी लोग उसे बेबी तब्बसुम के नाम से ही पुकारते हैं.  शायद यही वजह है कि मैं कभी दिल से बुढ़ी नहीं हुई. दरअसल, हकीकत यह है कि आधी इंडस्ट्री की गोद में मैं खेली और आधी इंडस्ट्री को मैंने गोद में खिलाया है. मैं राजकपूर की गोद में खेली हूं और मैंने करीना, करिश्मा रणबीर को अपनी गोद में खिलाया तो इस तरह आप कह सकते हैं कि मैंने सिनेमा की पूरी सदी को जिया है. मैंने ढाई साल की उम्र से ही काम शुरू कर दिया था. तो आप खुद देख लें. मैं पिछले 67 साल से इस इंडस्ट्री का हिस्सा हूं. मेरी पहली फिल्म उस वक्त बीआर चोपड़ा अंकल जर्नलिस्ट थे और मैं उस वक्त लगभग आठ फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में काम कर चुकी थीं. बीआर चोपड़ा आये थे. मेरा इंटरव्यू लेने. उस वक्त उन्होंने मुझसे कहा था कि तुम बहुत टैलेंटेड हो. मैं जब भी फिल्म बनाऊंगा तो तुम्हें जरूर अपनी फिल्म में लूंगा और उन्होंने अपना वादा भी पूरा किया. उन्होंने अपनी पहली फिल्म 1951 में बनायी. अफसाना. उसमें उन्होंने मुझे युवा वीणा का किरदार दिया था. बैजयंतीमाला जी ने भी जब अपने करियर की शुरुआत की थी. उस वक्त तक मैंने
18 फिल्मों में काम कर लिया था.

मधुबाला ने कहा था कभी पार्लर मत जाना
मधुबाला आपा से मैं बेहद करीब थी. मैंने उनके साथ आराम फिल्म में काम किया था. मधुबाला आपा की यह खूबी थी कि वह सुपरस्टार होते हुए भी बहुत डाउन टू अर्थ थी और अपने छोटों बड़ों सबको स्रेह और सम्मान देती थी. एक बार हम यूं ही सेट पर बैठे थे. मैंने उनसे पूछा कि आप इतनी खूबसूरत कैसे हैं. इसका राज तो बताइए तो उन्होंने कहा था कि एक तो तुम कभी भी पार्लर मत जाना, चूंकि जहां तुम पार्लर गयी. समझो तुम्हारी खूबसूरती को ग्रहण लगा. और एक काम हर दिन करना. ककड़ी का जूस पिया करो. हर दिन. और इसे चेहरे पर लगाया करो. तुम हमेशा खूबसूरत दिखोगी और सच ये है कि मैं आज भी उनके इस सीक्रेट को अपनाती हूं. एक दिन मधुबाला आपा ने मुझसे पूछा कि तब्बसुम तू सुंदर भी है. टैलेंटेड भी है. फिर क्यों नहीं तुम कभी लीड हीरोइन बनती. तो मैंने जवाब में कहा पता नहीं तो उन्होंने हंसते हंसते ही इंडस्ट्री की हकीकत बता दी थी कि जब तक तुम अपने माता पिता को लेकर सेट पर आती रहोगी. कभी ये तुम्हें टॉप हीरोइन नहीं बनायेंगे. अब उन्होंने क्यों ऐसा कहा था. आप समझ सकती हैं.मधुबाला आपा ने ही कहा था कि कभी शादी के बाद फिल्मों में मत लौटना. मैं उनकी कंपनी को काफी एंजॉय करती थी. हम खूब हंसते थे और मैं उन्हें खूब चुटकुले भी सुनाती थी.

सुरैया कहती थीं कोई नहीं पूछता कि कैसे गुजार रही हूं
सुरैया आपा भले ही दुनिया की नजरों से दूर हो गयी थीं. लेकिन मेरे दिल के वे हमेशा करीब रहीं. उनके पास पैसे, शोहरत की तो कभी कमी नहीं थीं. लेकिन इसके बावजूद वे हमेशा तन्हां रहीं. उनसे एक दिन फोन पर मैंने पूछा आपा कैसी गुजर रही है...तो उन्होंने एक शेर कहते हुए जवाब दिया तब्बसुम कैसी गुजर रही है, सभी पूछते हैं...कैसे गुजार रही हूं...यह कोई नहीं पूछता. उनके इन्हीं शब्दों में दरअसल, उन्होंने अपने दिल का पूरा हाल बयां किया था कि वे कितनी तन्हां है. दकअसल, सुरैया आपा की यह बात हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की वास्तविक तसवीर दिखलाता है कि हम यहां उगते सूरज को ही सलाम करते हैं. लेकिन फिर कैसे जिंदगी बीतती है कोई नहीं जानता. यह फिल्म इंडस्ट्री की बड़ विडंबना है कि यहां  कोई बीमारी इन्हें खोखला कर जाता है. कोई मुफलिसी में मरता है तो किसी की जान तन्हाई ले लेती है. सुरैया, मधुबाला, मीना कुमारी, राजेश खन्ना को क्या कभी दौलत की कमी रहीं. लेकिन इनकी मौत की वजह तन्हाई रही. नरगिस, बेबी नाज, राज कपूर जैसे शख्सियत बीमारी की वजह से जान खो बैठे. शमशाद बेगम ने भी अपनी मृत्यु से कुछ दिनों पहले कहा था कि तब्बसुम ये इंडस्ट्री मुर्दापरस्त है. यहां मुर्दों की पूछ होती है. मरने के बाद सभी पूछते हैं. जिंदा रहने पर कोई महत्व नहीं देता. बेबी नाज की मौत पर इंडस्ट्री से केवल मैं और अमीन सयानी मौजूद थे.
नरगिस के रहा खास लगाव
मुझे नरगिस आपा से बेहद लगाव रहा. एक बार जब उन्हें मैंने अपने शो फूल खिले हैं गुलशन गुलशन में बुलाया और उनसे उनके रोमांस के किस्सों के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने हंसते हुए कैमरे के सामने मेरी तरफ ईशारा करते हुए जवाब दिया था कि देखो इस लड़की को इसे मैंने गोद में खेलाया है और आज मुझसे मेरे रोमांस के किस्से पूछती है. मैं कहना चाहंूगी कि नरगिस इस दुनिया की उन चूनिंदा लोगों में से थीं, जो वाकई दिल की बहुत साफ महिला थीं. मैं उन्हें भी खूब शेरो-शायरी सुनाया करती थी. मैंने फिल्म दीदार, जोगन में साथ साथ काम किया था. नरगिस की मां जद्दनबाई चाहती थीं कि नरगिस दिलीप कुमार से शादी कर लें. जबकि नरगिस उस वक्त राजकपूर से प्यार करती थीं. नरगिस उन लोगों में से एक थीं, जिन्होंने कभी अपने प्यार के बारे में छुपाने की कोशिश नहीं की. सुनील दत्त साहब से शादी होने के बाद जब मैं सुनील साहब से मिली तो उन्होंने मेरा नाम टैबसम कह कर पुकारा था. मैंने उन्हें टोका कहा कि मेरा नाम तब्बसुम है. फिर वह हंस पड़े थे. नरगिस आपा को खाना बनाने और खिलाने का बेहद शौक था. हम कई बार घर पर खाना बनाया करते थे.

और यूं राज साहब ने रखा निम्मी का नाम
मेरे पापा हिंदू थे. मां मुसलिम थीं. सो, मेरे पापा ने मां को इज्जत देते हुए मेरा नाम तब्बसुम रखा था और मां मुझे पापा को इज्जत देते हुए किरण बाला के नाम से पुकारती थी. और मेरा प्यार का नाम किन्नी था. राज कपूर ने मेरे पापा और मां से कहा कि अरे आपकी बेटी का नाम आप फिल्मों में बेबी तब्बसुम क्यों देते हैं. कितना कठिन है ये नाम. पंजाबी इसे टैबसम कह देंगे...कोई कुछ और कह देगा.तो बेबी किन्नी नाम दिया करो. उस वक्त वे फिल्म बरसात की शूटिंग कर रहे थे. उसमें एक नयी लड़की कास्ट हो रही थी.उस नयी लड़की का नाम नवाब बानो था. राज अंकल ने कहा कि मैं इसका नाम किन्नी रख देता हूं. मैं वही पैर पटक पटक कर रोने लगी कि नहीं अंकल आप मेरा नाम उसे नहीं दे सकते...राज अंकल हंसने लगे और उन्होंने कहा कि चल फिर किन्नी नहीं निम्मी रख देता हूं और इस तरह नवाब बानो से वह निम्मी बनीं. मुझे राज अंकल बड़ीबी बुलाते थे. क्योंकि मेरा उच्चारण अच्छा था और मैं उनके उच्चारण को हमेशा ठीक किया करती थी.

दिलीप साहब के बाल ठीक किये थे मैंने
ैदुनिया के लिए वे दिलीप कुमार थे. मेरे लिए वह दिलीप भईया थे. मैं उस वक्त फिल्म जोगन में काम कर रही थी. हम महाराष्टÑ में ही आप्टे रिवर के पास शूटिंग कर रहे थे. दिलीप भईया अपने बालों को हमेशा गिरा कर रखते थे. और उन्हें पसंद नहीं था कि कोई उनके बाल छूएं. लेकिन मैं उनके बाद छू लिये थे और बालों को ठीक करते हुए कहा था कि बाबूजी बालों का स्टाइल ठीक कर लो वरना, गली के लड़कें आपकी नकल करने लगेंगे. उन्होंने भी उस वक्त कहा था कि किसी की इतनी मजाल नहीं थी. लेकिन बेबी तुमने मेरे बाल छू लिये. वे मुझे सेट पर कई बार चॉकलेट दिया करते थे. मैंने फिल्म मुगलएआजम के लिए भी शूटिंग की थी. मैंने मधुबाला की युवावस्था को निभाया था. लेकिन मेरे भाग कट गये थे फिल्म में. उस सेट पर भी हमने खूब मजे किये थे. दिलीप साहब ने ही के आसिफ से बोल कर सेट पर सबके लिए उनके पसंद के खाने का इंतजाम करवाया था. उस वक्त मधुबाला और दिलीप साहब के लिए मुगलई आता था. दुर्गा खोटे के लिए मराठी व्यंजन, पृथ्वीराज कपूर के लिए पंजाबी डिश आता है. आप बताएं आज के दौर में क्या कोई निर्माता या निर्देशक इतना करेगा किसी फिल्म के सेट पर.
वह दौर प्यार का था अपनत्व का था
मुझे याद है मैंने अमित जी ( अमिताभ) के साथ कई स्टेज शो किये थे. एक बार मेरे पैर में फ्रैक्चर था. और मैं स्टेज पर थी. अचानक शो के दौरान ही आग लग गयी. मैं परेशान थी. चिल्ला रही थी कि मुझे बचाओ. मैंने देखा उस भगदड़ मे ं भी अमित जी ने मेरा हाथ पकड़ रखा था. उनका यही प्यार और अपनत्व उन्हें दरअसल, सुपरस्टार बनाता है. उस दौर में लोग एक दूसरे की मदद के लिए हमेशा आगे आते थे.अब कहां वैसे गाने बनते हैं.
वह दौर शेरो शायरी, गाना बजाना, मौज मस्ती का होता था. सिर्फ फिल्मों से हमारे रिश्ते न जुटते थे न टूटते थे. उस वक्त इस इंडस्ट्री में भी दोस्त बनते थे जो ताउम्र आपका साथ निभाते थे. मधुबाला की मौत के बाद नरगिस और मैं उन लोगों में से थे जो सबसे पहले उनके घर पहुंचे थे. लेकिन इन 100 सालों में इंडस्ट्री खोखली हुई है. यहां अब लोग एक दूसरे से रंजीश रखते हैं. इस बात का दुख रहेगा .

अनुख्‍यान से साभार 

Monday, April 29, 2013

शमशाद बेगम : खामोश हो गयी खनकती शोख आवाज


-अजय ब्रह्मात्मज
    1932 में सिर्फ 13 साल की उम्र में शमशाद बेगम ने गुलाम हैदर के संगीत निर्देशन में पंजाबी गीत ‘हथ जोड़ा पंखिया दा’ गाया था। इसके आठ सालों के बाद उन्होंने पंचोली आर्ट फिल्म की ‘यमला जट’ के लिए पहला पाश्र्व गायन किया। यह प्राण की पहली फिल्म थी। प्राण 3 मई को दादा साहेब फालके पुरस्कार से सम्मानित होंगे। पंचोली की फिल्मों में वह नूरजहां के साथ गाने गाती रहीं। उन दिनों लता मंगेशकर ने शमशाद बेगम के साथ कोरस गायन किया और फिर  मशहूर होने के बाद लता मंगेशकर ने उनके साथ अनेक डुएट (दोगाने) गाए। उनके संरक्षक संगीत निर्देशक गुलाम हैदर को शमशाद बेगम की आवाज में झरने की गति और सहजता दिखती थी तो ओ पी नय्यर को उनकी आवाज मंदिर की घंटी से निकली गूंज की तरह लगती थी। शमशाद की आवाज पतली नहीं थी। वह खुले गले से गाती थीं। किशोर उम्र का चुलबुला कंपन से उनके गाए गीतों के शब्द कानों में अठखेलियां करते थे। आजादी के पहले की वह अकेली आवाज थीं,जो लता मंगेशकर की गायकी का साम्राज्य स्थापित होने पर भी स्वायत्त तरीके से श्रोताओं का चित्त बहलाती रहीं। उन्होंने 1972 में ‘बांके लाल’ के लिए आखिरी गीत ‘हम किस से कहें क्या शिकवा करें’ गाया।
    लंबे समय तक शमशाद बेगम की आवाज ही उनकी पहचान बनी रही। फिल्म इंडस्ट्री के बाहर उन्हें कोई जानता-पहचानता नहीं था। उन्होंने गायकी में कदम रखने के साथ अपने पिता से वादा किया था कि वह कैमरे के सामने कभी नहीं आएंगी। तब गायिकाओं को नायिकाओं के रूप में फिल्में मिलने लगती थीं। शमशाद बेगम के पिता नहीं चाहते थे कि वह अभिनय करें। वजह जो भी रही हो, शमशाद बेगम न तो फिल्म के कैमरे के सामने आईं और न स्टिल कैमरे के ़ ़ ़ आठवें दशक के अंत में संभवत: पिता के निधन के बाद उन्होंने तस्वीरें खींचने की अनुमति दी। तब उनके प्रशंसकों ने उन्हें पहचाना।
    गुलाम हैदर ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को तीन आवाजों का तोहफा दिया - शमशाद बेगम, नूरजहां और तला मंगेशकर। गुलाम हैदर इन गायिकाओं की खूबियों को जानते थे। उन्होंने पंजाबी लोक धुनों पर शमशाद बेगम और नूरजहां की मदमस्त आवाज को परवान दिया। शमशाद की आवाज नटखट होने के साथ कशिश लिए हुई थी। गीत शोखियों से लबरेज हो या गम में डूबा हो ़ ़ ़ शमशाद की आवाज लफ्जों के एहसास को पैदा करने में माहिर थीं। ‘कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना’ की मस्ती,‘कजरा मोहब्बत वाला’ की शोखी, ‘रेशमी सलवार कुर्ता जाली का’ का चुहल, ‘काहे कोयल शोर मचाए रे’ की शिकायत और ‘तेरी महफिल में किस्मत आजमा कर हम भी देखेंगे’ की चुनौती शमशाद बेगम की खासियत रही। गुलाम हैदर, नौशाद और सी रामचंद्र उनके प्रिय संगीतकार रहे। उनकी गायकी से ही नौशाद को आरंभिक कामयाबी मिली। उनके इस एहसान को नौशाद कभी नहीं भूले। यही वजह है कि लता मंगेशकर की शोहरत और जरूरत के दौर में भी वे शमशाद बेगम के लिए गायकी के मौके निकालते रहे।
    शमशाद बेगम भी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की लुप्त हो चुकी कड़ी लाहौर से मुंबई आई थीं। आजादी के पहले 1943 में ही उनकी आवाज का जादू पंजाब से निकल कर मुंबई आ पहुंचा था। तभी तो महबूब ने उन्हें मिन्नतों से मुंबई बुलाया था और ‘तकदीर’ (1943) के आठ गाने गवाए थे। आज के श्रोताओं को अनुमान नहीं होगा, किंतु यह सत्य है कि शमशाद बेगम ने 500 से अधिक फिल्मों में गाने गाए। उनकी गायकी ने हमेशा श्रोताओं को सुकून दिया। लता मंगेशकर के शब्दों में वह बहुत हंसमुख और सीधी-सादी शख्सियत थीं।
    लंबे अर्से तक गुमनाम रहीं शमशाद बेगम की मृत्यु की झूठी खबर 1998 में आई थी। इंटरनेट के शुरुआती दौर में किसी ने भूलवश किसी और शमशाद बेगम की मौत को उनके साथ जोड़ दिया था। इस बार खबर सच्ची है। श्मशाद बेगम सालों से खामोश थीं। वह खामोशी भी अब ठंडी और माटी के सुपुर्द हो गयी।



Friday, April 26, 2013

फिल्म रिव्यू : आशिकी २

  दो दशक पहले आई आशिकी में आशिक की मोहब्बत और जिंदगी का मकसद कुछ और था। अपने उद्दाम प्रेम और सोच से वह सब कुछ हासिल कर सका और विजयी रहा। आशिकी 2 में भी आशिक की मोहब्बत और जिंदगी का एक मकसद है। इस बार भी उद्दाम प्रेम है। यह 21 वीं सदी का दूसरा दशक है। इस समय ऐसी मोहब्बत की हम कल्पना नहीं कर सकते, इसलिए आशिकी 2 स्वाभाविक नहीं लगती। फिल्म की हीरो अपनी हताश हरकतों से हमें निराश करता है। वह विजयी नहीं है। अपनी माशूका के लिए उठाया गया उसका कदम वाजिब तो हरगिज नहीं कहा जा सकता। वह हमें प्रेरित नहीं करता। वह उदास करता है। मोहित सूरी ने 21 वीं सदी में प्रेम की उदास कहानी कही है। इस कहानी में परंपरा में मिले त्याग और बलिदान का टच है, लेकिन क्या आज ऐसा होता है या हो सकता है?
राहुल के करिअर में आया उफान उतार पर है। वह चिड़चिड़ा और तुनकमिजाज हो चुका है। अपनी असुरक्षा में वह हारे हुए कलाकारों की तरह आत्महंता व्यवहार करता है। वह खोई कामयाबी तो चाहता है, लेकिन सृजन के प्रति आवश्यक समर्पण खो चुका है। उसे आरोही की आवाज असरदार लगती है। वह उसे सही मुकाम तक लाने की कोशिश में लग जाता है। फिल्मी किस्म के नाटकीय प्रसंगों के बाद वह अपनी जिद में सफल होता है। इस सफलता के साथ ही उसकी मुश्किलें आरंभ हो जाती है। दो-तीन दृश्यों के लिए अभिमान फिल्म जैसी स्थिति भी आती है। हम देखते हैं कि आरोही अपने प्यार और यार के लिए करिअर को तिलांजलि दे देती है। राहुल को अपनी भूलों का एहसास होता है,लेकिन किसी भी नशेड़ी की तरह वह भी कमजोर क्षणों में डिग जाता है। यहीं आशिकी 2 के नायक से हम कट जाते हैं। उसका आखिरी फैसला हमें नागवार गुजरता है।
मोहित सूरी ने शगुफ्ता रफीक की 21 वीं सदी की इस उदास प्रेम कहानी के लिए आदित्य राय कपूर और श्रद्धा कपूर को चुना है। राहुल और आरोही के किरदारों में उनकी नवीनता से एक नयापन तो आया है। दोनों में आकर्षण है। इंटरवल के बाद हमें राहुल का किरदार निभा रहे आदित्य में कमियां दिखती हैं। वास्तव में यह लेखक और निर्देशक की सफलता है कि हम किरदार की कमियों को कलाकार में देखने लगते हैं। आदित्य के जीवन और सोच की बेतरतीबी हमें निराश करती है। श्रद्धा का समर्पण वास्तविक होने के बावजूद 21 वीं सदी के दूसरे दशक के परिवेश में असहज लगने लगता है। मन में सवाल उठता है कि क्या कामयाबी छू रही कोई लड़की अपने प्रेमी के लिए सब कुछ त्याग सकती है। आशिकी 2 अविश्वसनीय लगती है, लेकिन क्या हर प्रेमकहानी अविश्वसनीय नहीं होती। हिंदी फिल्मों में उदास और दुखांत प्रेमकहानियों की परंपरा रही है। आशिकी 2 भी उसी लीक पर चलती है। इसके साथ ही भट्ट कैंप की फिल्मों के फालतू दृश्यों का दोहराव भी खिन्न करता है।
आशिकी 2 के गीत-संगीत से कहानी को बल मिला है। क्लाइमेक्स के पहले का दूर होना गीत संभावना की पृष्ठभूमि तैयार कर देता है। थीम गीत की तरह बार-बार तुम ही हो की अनुगूंज राहुल और आरोही के प्रेम को रेखांकित करती चलती है।
अवधि-133 मिनट
*** तीन स्टार
-अजय ब्रह्मात्मज

Sunday, April 21, 2013

है सुकून विद्या बालन की जिंदगी में

-अजय ब्रह्मात्मज

    विद्या बालन की शादी हो चुकी है। वह अपने पति सिद्धार्थ राय कपूर के साथ जुहू में समुद्र किनारे के एक अपार्टमेंट में रहती हैं। घर बसाने के बाद वह घर सजा रही हैं। यह उनका अपना बसेरा है। इस बसेरे में सुकून है। अब वह यहीं रहती है। शादी के बाद जिंदगी बदल रही है। रूटीन बदल रहा है। मां-बहन की सिखायी सुनायी बातों के अर्थ अब खुल रहे हैं। किसी और के साथ होने से सोच बदलती है। और उसी के साथ रहने से बहुत कुछ बदल जाता है। आचार, व्यवहार, सोना, जागना, खाना-पीना और भी बहुत कुछ। अभी तक भारतीय समाज में लड़कियां ही अपना घर छोड़ती हैं। एक नए परिवार के साथ रिश्ते बनाती हैं। अगर नवदंपति ने स्वतंत्र और परिवार से अलग रिहाइश रखी तो भी लडक़े के परिवार से अधिक करीबी और भागीदारी होती है। धीरे-धीरे मायका छूट जाता है। लडक़ी एक नए परिवार में प्रत्यारोपित हो जाती है। आरंभिक उलझनों और सामंजस्य के बाद जीवन का नया अध्याय आरंभ होता है।
    विद्या बालन के जीवन का नया अध्याय आरंभ हो चुका है। अब वह नए बसेरे से ही शूटिंग, इवेंट और मेलजोल के लिए निकलती हैं और फिर लौट कर यहीं आती हैं। कुंवारी जिंदगी बंद कमरे की तरह होती है। इस कमरे की रोशनी और अंधेरे का प्रतिशत और संतुलन अपने वश में रहता है। शादी के बाद इस कमरे की खिड़कियां खुल जाती है। नए रोशनदान नजर आने लगते हैं। कुंवारी जिंदगी के बंद कमरे की प्रकाश सज्जा बदल जाती है और नई हो जाती है शादीशुदा जिंदगी।
    आठ सालों से फिल्मों में सक्रिय विद्या बालन का फिल्म करिअर बढ़ी उम्र में आरंभ हुआ। 27 की उम्र में उन्हें पहली फिल्म ‘परिणीता’ मिली। हालांकि उस से दस साल पहले 1995 में अपने धारावाहिक ‘हम पांच’ से वह दर्शकों के बीच आ चुकी थीं, लेकिन वैसे तो हर साल सैकड़ों लड़कियां आती हैं। दो-चार सीरियल में काम करती हैं। कुछ एड में दिखती हैं और फिर हमेशा के लिए गुमनामी के कोहरे में खो जाती हैं। एक तरह से विद्या बालन भी खो चुकी थीं। ‘हम पांच’ के बाद दस साल का लंबा संघर्ष ़ ़ ़ जी हां, संघर्ष ़ ़ ़ क्योंकि ‘परिणीता’ के लिए भी उन्हें 64 ऑडिशन देने पड़े थे। कोफ्त और हताशा की पराकाष्ठा हो चुकी थी। झुंझलाहट भी थी। बावजूद इसके हर ऑडिशन में कुछ बेहतर और परफेक्ट होने की कोशिश काम आई। विधु विनोद चोपड़ा ने प्रदीप सरकार की पसंद पर सहमति जतायी। हमें एक लंबे अंतराल के बाद ऐसी अभिनेत्री मिली, जो किसी फिल्मी परिवार या सौंदर्य प्रतियोगिता से नहीं आई थी। न ही वह रैंप मॉडल थी और न 21वीं सदी में निखर रही मॉडर्न लडक़ी के सौंदर्य के प्रतिमान पर खरी उतरती थी। पहली फिल्म में दशकों पुराने समय की एक बंगाली औरत की भूमिका। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में लोकप्रियता के कायदे-कानूनों से भिन्न शुरुआत के बावजूद विद्या बालन ने पहली ही फिल्म से अपनी जोरदार मौजूदगी दर्ज की और सारे पुरस्कार बटोर ले गईं। अभिनय में निखरने के अभ्यास का ही नतीजा है कि पिछले साल उन्हें ‘द डर्टी पिक्चर’ के लिए नेशनल अवार्ड भी मिला। पिछले साल ही आई ‘कहानी’ की सफलता का वाजिब श्रेय उन्हें मिला। इस साल उन्होंने फिर से सारे पुरस्कार बटोर लिए। विद्या बालन नायिकाओं की किसी कतार या श्रेष्ठ होने की होड़ में नहीं है। बिल्कुल अलग राह है उनकी। उनके लिए किरदार लिखे जा रहे हैं और वह लेखकों-निर्देशकों और दर्शकों की पसंद बनी हुई हैं।
    विद्या बालन खुद को विशेष नहीं मानतीं। अपने समय और उम्र की तमाम लड़कियों में से एक विद्या बालन मानती हैं कि पूरे समाज के साथ फिल्म इंडस्ट्री में भी बदलाव आया है। लड़कियों का महत्व बढ़ा है, क्योंकि समाज में उनकी हिस्सेदारी बढ़ी है। फिल्म इंडस्ट्री में नौ साल पहले इक्की-दुक्की लड़कियां दिखती थीं। अब सेट पर लड़कियां ही लड़कियां दिखती हैं। वे केवल हेयर ड्रेसर या एसिंस्टैंट डायरेक्टर भर नहीं हैं। फिल्म निर्माण के हर क्षेत्र में उनकी दखल बढ़ी है। इसकी वजह से फिल्मों में महिलाओं के चरित्र, निरूपण और प्रस्तुति में भी फर्क आया है। यकीन करें दस साल पहले ‘कहानी’ की उम्मीद नहीं की जा सकती थी।
    ‘कहानी’ के बाद विद्या बालन ने राजकुमार गुप्ता की ‘घनचक्कर’ शुरू कर दी थी, लेकिन अपनी शादी की औपचारिकताओं और व्यस्तताओं की वजह से वह फिल्मों की साइनिंग, शूटिंग आदि से दूर हो गई थीं । कयास लगाए जाने लगे कि शादी के बाद विद्या बालन का एक्टिंग करिअर ठहर गया। आम धारणा है कि हिंदी फिल्मों की हीरोइनें शादी के बाद दर्शकों की चाहत नहीं रह जातीं। लिहाजा निर्माता-निर्देशक भी उनसे किनारा कर लेते हैं। इस सवाल पर विद्या बालन ‘द डर्टी पिक्चर’ की नायिका की तरह बिंदास टिप्पणी करती हैं, ‘आजकल इतने विवाहेतर संबंध बन रहे हैं। शादी हो गई तो क्या? मैं दर्शकों से विवाहेतर संबंध रख सकती हूं। आज के जमाने में किसी और की बीवी की चाहत रखना पाप नहीं नहीं है। दर्शक मुझे पसंद करें? मुझे खुशी होगी।’ मजाक अलग, सीरियस नोट पर विद्या कहती हैं, ‘शादी के बाद भी मेरे एक्टर में कोई बदलाव नहीं आया है। मैं पहले सिंगल थी और एक्टर थी। अभी शादी हो गई है तो भी एक्टर हूं। उम्मीद करती हूं कि मुझे जिंदगी भर काम मिलता रहेगा। जब नानी या दादी बनूंगी तो भी एक्टर ही रहूंगी।’
    सिद्धार्थ राय कपूर से उनकी दोस्ती की खबरें शादी के पहले से आने लगी थीं। सिद्धार्थ से हुई मुलाकात और दोस्ती की बात चलने पर वह बताती हैं, ‘सिद्धार्थ से पहली मुलाकात फिल्मफेअर अवार्ड में हुई थी। मैं ‘पा’ का अवार्ड लेकर निकल रही थी तो किसी ने मेरा परिचय कराया। वह बहुत संक्षिप्त और औपचारिक मुलाकात थी। अगले ही दिन मैं उनकी फिल्म ‘नो वन किल्ड जेसिका’ के लिए जा रही थी। जाने से पहले पांच मिनट की मुलाकात हुई। फिर दो-तीन फिल्मों के सिलसिले में बातें हुईं। चंद मुलाकातों के बाद धीरे-धीरे मुझे पता भी नहीं कब, लेकिन यह लगा कि इनसे दोस्ती होनी चाहिए। उनके व्यक्तित्व में आकर्षण था। सिद्धार्थ में कई बातें  निजी तौर पर अच्छी लगीं। बताने लायक उनका सबसे अच्छा गुण है कि वे नॉन जजमेंटल हैं और सभी का आदर करते हैं। दूसरों का आदर हमारी परवरिश का हिस्सा रहा है।’
    वह आक्षेप, आरोप और अपमान के दिनों को नहीं भूल सकी हैं। कोई रंजिश नहीं है, फिर भी उन्हें लगता था कि उनके साथ कुछ गलत हो रहा है। एक दिन वह अपने पिता के सामने फट पड़ीं, ‘एक दिन मैं सभी को साबित कर के दिखाऊंगी।’ पिता ने समझाया, ‘तुम्हें किसी के लिए कुछ साबित करने की जरूरत नहीं है। हमेशा कुछ लोग तुम्हें निष्कासित और तिरस्कृत करेंगे। तय करो कि तुम क्या चाहती हो? खुद को खुद के लिए साबित करो।’ पिता का यह मंत्र उस दौर में संबल बना। कुछ दोस्तों की मदद मिली। विद्या ने लंबी छलांग मारी और उछल कर कतार से बाहर निकल आईं। अब न उनके आगे कोई है और पीछे से किसी के आगे निकलने का खतरा है। विद्या बालन अपनी पीढ़ी की अलहदा अभिनेत्री हैं। इन दिनों वह ‘शादी के साइड इफेक्ट्स’ की शूटिंग कर रही हैं। उनकी ‘घनचक्कर’ पूरी हो चुकी है। दोनों ही फिल्मों में वह शादीशुदा किरदार है। ‘घनचक्कर’ के ट्रेलर में दिख रही विद्या बालन अभी तक की अपनी इमेज और भूमिकाओं से बिल्कुल अलग हैं। वह फिल्म के निर्देशक को धन्यवाद देती हैं, ‘राजकुमार गुप्ता ने सोचा कि मैं पंजाबी हाउसवाइफ की ऐसी भूमिका कर सकूंगी। सच कहूं तो मुझे यह किरदार निभाने में बहुत मजा आया।’ वह एम एस शुभलक्ष्मी के जीवन पर बन रही फिल्म के प्रति उत्साहित हैं। बचपन में घर में उन्हें सुनती हुई वह बड़ी हुई हैं।
    चलते-चलते विद्या बालन बताती हैं कि पहले वह अनिद्रा की समस्या से त्रस्त थीं। रातों को जल्दी नींद नहीं आती थी। मां की फटकार लगातार मिलती थी, लेकिन नींद कोई बेटी तो है नहीं कि फटकार सुन ले। अब रूटीन बदला है। घर लौटकर साथ खाने के बाद सोने की तैयारी होती है। बारह बजे तक रात के साथ विद्या भी सो जाती हैं। फिर भी मां की फटकार कम नहीं हुई है। वह प्यार के साथ मां को याद करती हुई बताती हैं, ‘मां तो मां है। अब वह कहती हैं कि किसी दिन साढ़े दस बजे तो सो जाओ।’ समझदार पार्टनर हो तो शादी के बाद की जिंदगी के बदलाव में हिचकोले नहीं आते। एक-दूसरे के आगोश में पता ही नहीं चलता कि कब क्या बदला? सुधि आने पर सब कुछ सुहाना और सुंदर लगता है। अभी विद्या बालन संतुष्ट हैं।

Saturday, April 20, 2013

अफवाहें हंसने के लिए होती हैं- सोनाक्षी सिन्हा

सोनाक्षी सिन्हा की ब्लॉकबस्टर सफलता का सीक्रेट जानने की रघुवेन्द्र सिंह ने कोशिश की
'रामायण' कभी केवल शत्रुघ्न सिन्हा का पता हुआ करता था. इस बंगले का नाम लेते ही लोग आपको उनके घर तक पहुंचा देते थे. मगर वक्त के साथ दो चीजें परिवर्तित हो चुकी हैं. पहली- अब बंगले के स्थान पर एक सात मंजिला आलीशान इमारत खड़ी हो चुकी है और दूसरी- अब इसमें केवल एक नहीं, बल्कि दो स्टार रहते हैं. जुहू स्थित 'रामायण' वर्तमान की लोकप्रिय अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा का भी पता बन चुका है.
शत्रुघ्न सिन्हा ने अपने बेटे लव, कुश और बेटी सोनाक्षी सिन्हा को एक-एक फ्लोर दे दिया है, जिसकी आंतरिक साज-सज्जा आजकल वे स्वेच्छा से करने में जुटे हैं. लिफ्ट के जरिए हम सातवें फ्लोर पर पहुंचते हैं, तो सोनाक्षी की करीबी दोस्त और मैनेजर भक्ति हमारा स्वागत करती हैं. कुछ ही पल के बाद सोनाक्षी हाजिर होती हैं और फिल्मफेयर हिंदी की तरक्की के बारे में चर्चा करती हैं. आपको याद दिला दें कि दबंग गर्ल और अब राउड़ी गर्ल सोनाक्षी सिन्हा फिल्मफेयर हिंदी की पहली कवर गर्ल थीं. अनौपचारिक बातचीत के बाद हमने सवाल पूछना आरंभ किया, तो सोनाक्षी ने सबका जवाब अपनी खिलखिलाती हंसी के साथ दे डाला...

आप जिन फिल्मों का चुनाव करती हैं, वो ब्लॉकबस्टर साबित होती हैं. इसका राज क्या है?
कुछ सीक्रेट नहीं है. आप तो इनकी सफलता का सारा क्रेडिट मुझे ही दे दे रहे हैं (हा-हा-हा). ऐसा नहीं है कि दबंग और राउड़ी राठौड़ सिर्फ मेरी वजह से हिट हुई हैं. मैं अपने आप को बहुत खुशनसीब मानती हूं कि मैं इनका हिस्सा बन सकी. एक दर्शक के तौर पर मैं जैसी फिल्में देखना पसंद करती हूं, वैसी ही फिल्मों का चुनाव मैं काम करने के लिए करती हूं. जब मैंने इन फिल्मों की स्क्रिप्ट पढ़ी, तो मुझे पसंद आईं और मैंने कर लीं. मैंने परवाह नहीं की कि बॉक्स-ऑफिस पर इनका क्या होगा. दबंग ब्लॉकबस्टर हो गई, तो राउड़ी राठौड़ पर हिट होने का प्रेशर आ गया. इसका सफल होना मेरे लिए बहुत खुशी की बात है. मैं इनकी सफलता का क्रेडिट अकेले नहीं ले सकती. यह सबकी डायरेक्टर, को-स्टार, तकनीशियन की मेहनत का नतीजा है, जो ये फिल्में व्यापक स्तर पर दर्शकों को छू गईं.

क्या आप फिल्मकारों के लिए खुद को लकी मानती हैं?
मुझे नहीं पता कि मैं लकी हूं या नहीं. ऐसे टैग हमें मीडिया दे देती है. मेरी दो फिल्में चल गईं, तो मैं लकी हूं और ईश्वर न करें कि कल मेरी कोई फिल्म नहीं चली, तो लकी का टैग मुझसे छीन लिया जाएगा. इसलिए मैं इन चीजों की ओर ध्यान नहीं देती. मैं केवल अपना काम करती हूं.

यानी आप इस चीज के लिए मानसिक रुप से तैयार हैं कि कल यह टैग जा भी सकता है?
हां, क्यों नहीं? इस दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है. उतार-चढ़ाव सबके जीवन में आते हैं. अच्छे-अच्छों के साथ ऐसा हुआ है.

आप मानती हैं कि शोहरत अस्थायी होती है?
बिल्कुल. सब अपने-अपने टाइम की बात होती है. किसी का टाइम अच्छा चल रहा है, तो चल रहा है. कल अच्छा समय नहीं रहा, तो उसके बाद और अच्छा टाइम आएगा.

आपको देखकर बहुत अपनापन लगता है. इस छवि के उलट भी क्या आपका कोई पहलू है, जिसे हम नहीं जानते हैं?
नहीं, मैं जैसी हूं, वैसी सबको दिखती हूं. आप जैसा मुझे देख रहे हैं, मैं हमेशा वैसी ही रहती हूं. दिल में जो है, वो बोल देती हूं. सबके साथ अच्छे से रहती हूं. मैं कैट फाइट नहीं करती हूं. अपने बारे में कैट फाइट की बातें पढ़-पढक़र मैं थक गई हूं. किसी से भी आप इस बारे में पूछेंगे, तो वो हंसेंगे, क्योंकि मैं ऐसी हूं ही नहीं. मैं अपना काम खत्म करती हूं, घर आती हूं और सबके साथ खुशी-खुशी रहती हूं.

ये बातें सुनकर लगता है कि आपको अपने प्लस पॉइंट्स पता हैं.
मुझे अपने प्लस और निगेटिव दोनों पहलू पता हैं और जो मेरे प्लस पॉइंट्स हैं, उसी पर मैं ध्यान देती हूं. मेरी स्क्रीन प्रजेंस अच्छी है, डायलॉग डेलीवरी अच्छी है, वह शायद पापा पर गई है. हिंदी भाषा पर मेरी पकड़ अच्छी है, कॉन्फिडेंस है और वह भी पापा से ही मुझे मिला है. ये मेरे प्लस पॉइंट्स हैं. माइनस पॉइंट्स मेरे हिसाब से है कि मैं इंपल्सिव हूं. मैं जल्दबाजी कभी-कभी करती हूं. मैं कभी-कभार अपना आपा खो देती हूं. मगर मैं अपने निगेटिव पॉइंट्स की ओर ध्यान नहीं देती.

आपके माइनस पॉइंट्स हमें कभी देखने को नहीं मिलते हैं?
और शायद आपको कभी देखने को मिले भी नहीं, क्योंकि ऐसा बहुत कम होता है. अपनी कमजोरियों पर मेरा कंट्रोल रहता है.

आपको क्या बातें नाराज कर देती हैं या अगर कोई आपके साथ बात कर रहा है, तो उसे क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?
बहुत कम चीजें हैं, जो आजकल मुझे नाराज करती हैं, क्योंकि इंडस्ट्री में रहकर आपको इसकी आदत हो जाती है. आप रोज सुबह उठते हैं और कुछ न कुछ अपने बारे में न्यूजपेपर में पढ़ते हैं. यहां ऐसे लोग हैं, जो आपको जानते भी नहीं हैं, वो आपके बारे में कुछ भी लिख सकते हैं. हमें इसकी आदत पड़ जाती है. हां, मेरे काम, प्रोफेशनलिज्म की तारीफ हो, तो मुझे खुशी होती है.

एक्टर्स हमेशा चापलूसों से घिरे रहते हैं. ऐसी स्थिति में उनके लिए जेनुइन और झूठी प्रशंसा के बीच फर्क करना बहुत मुश्किल होता है. आप कैसे करती हैं?
मैं समझ जाती हूं कि कौन मेरी झूठी तारीफ कर रहा है. पता नहीं कुछ लोग कैसे नहीं समझ पाते. मेरे अगल-बगल ऐसे लोग हैं, जिन्हें मैं सालों से जानती हूं. मेरे स्कूल और कॉलेज के दोस्त हैं, फैमिली है. मैं जानती हूं कि ये लोग मेरी झूठी तारीफ नहीं करेंगे. अगर मुझमें कोई खामी है, तो ये खुलकर अच्छे तरीके से बता देंगे.

ग्रामीण लड़कियों की भूमिकाएं निभाते हुए आप उनके प्रति लगाव महसूस करती हैं. क्या आपको लगता है कि ग्रामीण लड़कियों को किसी चीज की कमी है?
ऐसी कोई बात नहीं है. गांव की लड़कियां शहर की लड़कियों की बराबरी कर रही हैं. औरत में जो शक्ति होती है, वो किसी मर्द में नहीं होती. जब मैं कोई किरदार निभा रही होती हूं, तो मेरे दिमाग में ये बातें नहीं आतीं. यह मेरा काम है और मैं उसे कर रही हूं. सेट के माहौल में ये सब बहुत कम सोचने को मिलता है. अगर कुछ दूसरा सेटअप हो, कोई प्रोग्राम हो, जिसमें मुझे डिटेल में रिचर्स करने को मिले, अनुभव करने को मिले, तो शायद मैं सोच पाऊं.

क्या हम आपको किसी ऐसी भूमिका में देखेंगे, जो हीरोइन होते हुए भी फिल्म की हीरो हो?
बिल्कुल, क्यों नहीं? अभी तो मेरी तीसरी फिल्म रिलीज हुई है. आगे जाकर बहुत सारे ऐसे रोल आएंगे, जो हीरोइन के कंधे पर होंगे. मैं ऐसी फिल्म करना चाहूंगी. लुटेरा शायद एक ऐसी फिल्म है, जिसमें लडक़ी का रोल लडक़े के बराबर है. वह शुरुआत होगी.

कई फिल्मों में हीरोइन की भूमिका ना के बराबर होती है. मीडिया में उसकी आलोचना भी होती है. आप फिल्में साइन करते समय इन बातों पर गौर करती हैं?
मैं ऐसा नहीं सोचती हूं. मैं स्क्रिप्ट पढ़ती हूं, तो देखती हूं कि यह फिल्म मुझे दर्शक के तौर पर पसंद आएगी, इसलिए मैं फिल्म करती हूं. रोल छोटा हो या बड़ा, वह काम तो है. अगर मैं वह काम नहीं करुंगी, तो कोई और उसे कर लेगा. अगर उस कैरेक्टर की जरुरत नहीं होती, तो वह फिल्म में होता ही नहीं. मैं नहीं समझ पाती कि मीडिया क्यों ऐसे सोचता है कि अरे, उसके छह डायलॉग थे, सीन कम था. ऐसे नहीं होता. फिल्म का हिस्सा होना अपने आप में अच्छी बात है.


अभिनेत्री होने का एक पहलू यह है कि आपके अफेयर की चर्चा चलती रहती है. जैसे आजकल आपके और रणवीर सिंह के नाम की चर्चा है. इन पर आप कितना ध्यान देती हैं और आप कैसे हैंडल करती हैं इन्हें?
अफवाहें हंसने के लिए होती हैं. मैं हंसकर भूला देती हूं. इन पर जितनी कम प्रतिक्रिया दी जाए, उतना अच्छा होता है. अगर आप रिएक्ट करेंगे, तो कोई और कुछ बोलेगा और फिर वह टेनिस बॉल की तरह हो जाएगा. चुप रहना बेहतर होता है.

इन चीजों से क्या पर्सनल लाइफ प्रभावित होती है?
बिल्कुल नहीं. लोगों को लगता है कि अफवाहों से हमारी निजी लाइफ पर असर पड़ता है. ऐसी भी अफवाह आ जाती है कि मेरे पैरेंट्स अपसेट हैं. जबकि किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता. डैड पैंतीस साल से इंडस्ट्री में हैं. उन्हें पता है कि लोग क्या और कैसे लिखते हैं. वे बहुत सारे जर्नलिस्ट्स को जानते हैं. उनको ऐसी बातें पेपर या मैगजीन में पढक़र नहीं पता चलने वाली हैं. वे मुझे यानी अपनी बेटी को अच्छी तरह जानते हैं. 

इंडस्ट्री की लव स्टोरीज सच होती हैं, लेकिन फिर भी स्टार्स छुपाते रहते हैं. जैसे रितेश-जेनिलिया ने नौ साल तक ना-ना कहा और अचानक शादी कर ली. सेलीब्रिटीज प्यार की बात को छुपाते क्यों हैं?
मुझे नहीं पता. सबकी पर्सनल च्वॉइस होती है. अगर आप एक्टर हैं, तो आपका जीवन ऐसे ही पब्लिक के बीच रहता है, लोग आपको देखते हैं, बातें करते हैं. तो ऐसे में आप अपने जीवन की कुछ बातें छुपाकर रख सकते हैं, तो अच्छी बात है.

क्या यह सच है कि स्टार के जीवन का सच हम या दुनिया के लोग कभी नहीं जान पाते?यह स्टार पर निर्भर करता है. अगर कोई स्टार है, जो सब कुछ शेयर करता है, फिर नहीं. शायद हां, कभी नहीं जान पाते.

आपकी ऑन स्क्रीन केमिस्ट्री सलमान खान, अक्षय कुमार और अजय देवगन के साथ जमती है. क्या पर्सनल लाइफ में भी आप ऐसे ही मेच्योर पुरुष को जगह देंगी?
देखते हैं. इतने मेच्योर... पता नहीं... हा-हा-हा. आपके इस सवाल ने मुझे लाजवाब कर दिया. बिल्कुल नहीं. मैं अपनी उम्र के किसी लडक़े को जगह दूंगी... हा-हा-हा. लेट्स सी... हा-हा-हा. मेरे ऑन स्क्रीन रोमांस का मेरे पर्सनल टेस्ट से कोई लेना-देना नहीं है... हा-हा-हा.

हो सकता है कि आपके डैड शत्रुघ्न सिन्हा की स्ट्रान्ग इमेज से आपके हमउम्र लडक़े आपके पास आने से डरते हों?
अभी उनको मौका ही कहां मिलता है. मैं बाहर नहीं जाती हूं, पार्टी नहीं करती हूं. मैं अपने दोस्तों के साथ रहती हूं. काम करती हूं. अभी तक ऐसा मौका किसी को मिला नहीं है. मगर ऐसा नहीं है कि मैं प्यार को अपने जीवन में आने से रोक रही हूं. हो जाए प्यार तो, ठीक है. प्यार जब होना होगा, अपने समय पर ही होगा.

मतलब अभी तक आपको प्यार हुआ ही नहीं है?
ऐसा नहीं है कि मुझे कभी प्यार नहीं हुआ. प्यार हुआ है, लेकिन अभी नहीं है.

शत्रुघ्न सिन्हा अभी अस्पताल में थे और आप लगातार शूटिंग कर रही थीं. आपके लिए यह बहुत मुश्किल वक्त रहा होगा?
जी थोड़ा-बहुत मुश्किल रहा. डैड हमेशा मेरी पहली प्राथमिकता रहते हैं. मैं हर दिन उनके साथ अस्पताल में रहती थी. या तो शूटिंग के पहले या शूटिंग पूरा करने के बाद. शूटिंग के बीच में भी समय मिल गया, तो उनके पास जाकर बैठती थी. अभी वो ठीक हैं.

बच्चन परिवार उनसे मिलने के लिए अस्पताल पहुंचा था. क्या अब दोनों परिवारों के बीच में सब अच्छा है?
जहां तक हमारी बात है, तो हां. हमारे संबंध हमेशा अच्छे रहे हैं. जया (बच्चन) आंटी हमेशा मुझसे अच्छी तरह पेश आई हैं. जब वे अस्पताल में आए थे, तो मैं वहां पर थी. वो लोग डैड से मिले. दोनों परिवारों के बीच सब अच्छा है.

अभिनय की तरह राजनीति भी आपके घर में रही है, तो उस ओर आपकी कभी दिलचस्पी नहीं हुई?
नहीं, सबका अपना-अपना इंट्रेस्ट होता है. मेरी रुचि राजनीति में नहीं है. मैं एक्टिंग में खुश हूं. मैं राजनैतिक मुद्दों के बारे में ज्यादा नहीं सोचती हूं. रोज की बातचीत में थोड़ी-बहुत जानकारी मिलती रहती है. पापा बताते रहते हैं.


अपने डैड को आप पर्दे पर मिस करती हैं?
नहीं, क्योंकि बचपन में भी मैंने उनकी कम फिल्में ही देखी हैं. मैंने उन्हें रोज घर में पापा के रुप में देखा है. मैंने उन्हें कभी एक्टर की तौर पर नहीं देखा है. मैं घर में रोज उनसे बात करती हूं. ऐसी कमी महसूस नहीं होती. हां, उन्हें स्क्रीन पर देखते हैं, तो गर्व महसूस होता है, क्योंकि वो इतने अच्छे कलाकार हैं.

आपने कहा है कि आप इंटीमेट सीन नहीं करेंगी. मगर माना जाता है कि अगर अभिनेत्रियां ऐसे दायरे बनाती हैं, तो उनका करियर छोटा हो जाता है.
देखते हैं कि आगे जाकर क्या होता है. अभी मुझे इसकी परवाह नहीं है, क्योंकि मैं काफी फिल्में कर रही हूं, जिनमें इनकी जरुरत नहीं है. अगर इसकी वजह से मेरा करियर छोटा हो जाएगा, तो हो जाए. देखेंगे. (हा-हा-हा). हम क्या कर सकते हैं.

करीना कपूर ने एक इंटरव्यू में कहा था कि बीइंग फैट इज नॉट सेक्सी. फैट इज आउट. उन्होंने कहा कि हर लडक़ी स्लिम फीगर चाहती है. आप क्या कहना चाहेंगी?
सबका अपना अलग-अलग टेस्ट होता है. इस तरह जनरलाइज नहीं करना चाहिए. काफी लोग हैं, जो ऐसे ही खुश हैं. 'फैट बिल्कुल सेक्सी नहीं है, हां, फिट जरुर सेक्सी हैÓ, उन्होंने ये कहा था. और वे बिल्कुल सही हैं. मैं मानती हूं कि सुंदरता देखने वाले की आंखों में होती है. अगर आप बोल रहे हैं कि आपको कोई सुंदर नहीं लगा, तो ठीक है. सबकी अपनी-अपनी राय होती है.

फराह खान आपको शाहरुख खान के साथ एक फिल्म में साइन करना चाहती हैं. क्या आपसे उन्होंने संपर्क किया है?
उन्होंने आपसे कहा है (हा-हा-हा). मैंने भी रिपोर्ट्स पढ़ी हैं. उन्होंने अभी तक मुझसे संपर्क नहीं किया है. जब तक फराह से आपकी या मेरी बात न हो, हमें कुछ नहीं कहना चाहिए. जोकर फिल्म में मैंने उनके साथ एक कोरियोग्राफर के तौर पर काम किया है और उनके निर्देशन में जरुर काम करना चाहूंगी. वह बहुत अच्छी निर्देशक हैं.

आपके भाई लव और कुश ने फिल्मों में करियर बनाने की कोशिश की, लेकिन आप उनसे आगे निकल गई हैं. वे इसे कैसे लेते हैं?
उन्हें अपनी बहन पर गर्व है. हमारे बीच ऐसी कोई बात नहीं है. डैड ने हमारी परवरिश एक समान की है. हमारे बीच कभी भेद-भाव नहीं किया उन्होंने. मुझे भी कहा गया था कि तुम जो भी करना चाहती हो, करो, हम तुम्हें सपोर्ट करेंगे.

आप अपने भाई की फिल्म में काम करने जा रही हैं. इसका स्पष्टीकरण तो दे सकती हैं, क्योंकि यह आपके घर की बात है?
हां, यह मेरे घर की बात है, लेकिन यह अभी बहुत दूर की बात है. अभी मैं काफी कमिटमेंट्स में बंधी हुई हूं. स्क्रिप्ट का सेशन अभी शुरु होगा. अगर ऐसा कोई मौका मिलेगा, तो मैं जरुर काम करना चाहूंगी.

अक्षय कुमार के साथ आप लगातार फिल्में कर रही हैं. कुछ लोगों का कहना है कि वे आपको अपनी फिल्मों के लिए रिकमेंड कर रहे हैं?
अगर आप एक एक्टर के साथ काम कर रहे हैं, तो लोग वह जोड़ी, केमिस्ट्री, काम करने का तरीका देखकर साइन करते हैं. हम कभी सेट पर देर से नहीं आते हैं. समय पर हमारा काम खत्म हो जाता है. निर्माता को कभी हमसे कोई दिक्कत नहीं होती है. ये सब बातें भी इंडस्ट्री में जाती हैं, इसलिए लोग आपको बार-बार साथ साइन करना चाहते हैं. मुझे नहीं पता कि अक्षय का मुझे रिकमेंड करने वाली बातें सच हैं या नहीं.

अभी आपकी प्राथमिकताएं क्या हैं?
अभी अच्छा काम चल रहा है. इस साल मेरी वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई 2, लुटेरा, दो-तीन और प्रोजेक्ट्स हैं, जो अभी पाइप लाइन में हैं. अगले दो साल के लिए मैं सेट हूं. उसके आगे का अभी मैं नहीं सोच रही हूं. जितना काम है, उसे पहले खत्म करुंगी.

 साभार : FILMFARE

Friday, April 19, 2013

फिल्‍म समीक्षा : एक थी डायन

यह किस्सा है। यह खौफ है। यह विभ्रम है। यह हॉरर फिल्म है। यह सब का मिश्रण है। क्या है 'एक थी डायन' एकता कपूर और विशाल भारद्वाज की प्रस्तुति एक थी डायन के निर्देशक कन्नन अय्यर हैं। इसे लिखा है मुकुल शर्मा और विशाल भारद्वाज ने। उन्होंने भारतीय समाज में प्रचलित डायन कथा को नया आयाम दिया है। मुख्यधारा के चर्चित कलाकारों को प्रमुख भूमिकाएं सौंप कर उन्होंने दर्शकों को भरोसा तो दे ही दिया है कि यह हिंदी में बनी आम हॉरर फिल्म नहीं है। हां,इसमें इमरान हाशमी हैं। उनके साथ कोंकणा सेन शर्मा,कल्कि कोइचलिन और हुमा कुरेशी भी हैं।
संयोग ऐसा हुआ कि इस फिल्म का क्लाइमेक्स मैंने पहले देख लिया और फिर पूरी फिल्म देखी। इसके बावजूद फिल्म में रुचि बनी रही और मैं उस क्षण की प्रतीक्षा करता रहा जहां फिल्म चौंकाती है। अप्रत्याशित घटनाएं हमेशा रोचक और रोमांचक होती हैं। फिल्म जादू“र बोबो इमरान हाशमी के मैजिक शो से आरंभ होती है। बोबो को मतिभ्रम होता है कि उसे कोई अनदेखी शक्ति तंग कर रही है। तार्किक जादूगर अपने मनोवैज्ञानिक मित्र की मदद लेता है। प्निोसिस के जरिए अपने अतीत में पहुंचने पर उसे पता चलता है कि बचपन की स्मृतियां नए सिरे से उसे उलझा रही हैं। मनोचिकित्सक उसकी बाल स्मृतियों को मानसिक ग्रंथि बतलाता है। हमें पता चलता है कि बचपन में डायन कथाएं पढ़ते-पढ़ते बोबो डायन में यकीन करने लगी है। अपने पिता की जिंदगी में आई औरत को वह डायन ही समझता है,जबकि मनोवैज्ञानिक की राय में सौतेली मां को स्वीकार नहीं कर पाने की वजह से उसने ऐसी कहानी अनजाने में रची हो“ी। 'एक थी डायन' की यहां तक की कहानी रोचक और विश्वसनीय लगती है। एहसास होता है कि कन्नन अय्यर हमें हॉरर फिल्मों की नई दुनिया में ले जा रहे हैं। इंटरवल के कुछ बाद तक फिल्म बांधे रखती है।
समस्या इस फिल्म के क्लाइमेक्स में है। जिस सहजता से फिल्म मुंबई के आधुनिक परिवेश में डायन की कथा बुनती है,उसी सहजता के साथ वह अंत तक नहीं पहुंचती। फिल्म अचानक टर्न लेती है और अपने तर्को को ही दरकिनार कर हिंदी फिल्मों के प्रचलित फार्मूले का अनुसरण करती है। इसके बाद फिल्म साधारण हो जाती है। क्या हो सकता था या क्या होना चाहिए था जैसी बातें समीक्षा के दायरे में नहीं आतीं। फिर भी शिकायत रह जाती है,क्यों कि फिल्म अपनी ही कथा का उल्लंघन करती है। इंटरवल से पहले दिए भरोसे को तोड़ देती है।
कलाकारों में हुमा कुरेशी सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं। उन्होंने दृश्यों के अनुसार भावों को जिम्मेदारी से निभाया है। कोंकणा सेन शर्मा तो हैं ही कुशल अभिनेत्री। उन्होंने साबित किया है कि किसी भी तरह की भूमिका में कौशल का इस्तेमाल किया जा सकता है। कल्कि कोइचलिन की भूमिका ढोटी और अस्पष्ट है। उन्हें कुछ पल मिले हैं। इमरान हाशमी अवश्य अलग अंदाज में दिखे। अपनी अन्य फिल्मों से अलग उनमें ठहराव दिखा। उनके प्रशंसकों का बता दें कि उनके किसिंग सीन हैं। फिल्म को विशेष तिवारी,सारा अर्जुन और भावेश बालचंदानी बाल कलाकारों से भरपूर मदद मिली है।
विशाल भारद्वाज और गुलजार की जोड़ी का गीत-संगीत है। उनकी संगत का जादू फिल्म में गूंजता है।
अवधि-135 मिनट
*** तीन स्टार

धारा के खिलाफ इरफान - अनुप्रिया वर्मा

अनुप्रिया वर्मा पीढ़ीगत सीमाओं के बावजूद उत्‍तरोत्‍तर तीक्ष्‍ण और सारगर्भित लिख रही हैं। यह लेख उनके ब्‍लॉग अनुख्‍यान से साधिकार चवन्‍नी के पाठकों कें लिए लिया गया है। कुछ लोग इसे प्रभात खबर में पढ़ चुके होंगे। आप पढ़ें और इस लेख की कमियां बताएं। कमियां न सूझें तो तारीफ जरूर करें। और हां उनके ब्‍लॉग अनुख्‍यान पर यहां से जा सकते हैं।


पान सिंह तोमर के लिए वर्ष 2012 का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्टÑीय पुरस्कार पानेवाले इरफान की अदाकारी की पूरी दुनिया मुरीद है. एक ऐसे समय में जब सिनेमा का आंकलन 100 करोड़ क्लब के आधार पर किया जा रहा है. इरफान हिंदी सिनेमा की उस अल्पसंख्यक बिरादरी के सदस्य के तौर पर हमसे रूबरू होते हैं, जो यहां मुख्यत: कलात्मक कमिटमेंट के कारण टिके हैं. जो कला को सिर्फ पैसे कमाने का जरिया न मानकर अपने आप में उपलब्धि मानते हैं. इरफान की सफलता ऐसे सभी लोगों के लिए खुशी मनाने का मौका है, जो धारा के खिलाफ चलने में विश्वास रखते हैं. जो धारा में बहने नहीं बल्कि धारा बनने में यकीन करते हैं.धारा के खिलाफ नयी धारा गढ़ते इरफान पर यह आवरण कथा. 

वर्ष 2012 में रिलीज हुई फिल्म पान सिंह तोमर देखने के तुरंत बाद थियेटर से निकलते ही  मैंने इरफान को एक मेसेज किया था. मैसेज में मैंने लिखा था... हमने पान सिंह तोमर को वास्तविक जिंदगी में नहीं देखा. लेकिन जिस जीवंतता से आपने इसे परदे पर उतारा है. उससे हम परिकल्पना कर सकते हैं कि पान सिंह तोमर ऐसे ही होंगे. हम भूल गये थे कि हम इरफान को देख रहे हैं. चूंकि पान सिंह तोमर में वे पूरी तरह पान सिंह ही नजर आये...इरफान आपसे ऐसे ही अभिनय की उम्मीद थी...मेसेज पढ़ते ही तुरंत मुझे इरफान का फोन आया था. और उनका पहला सवाल यही था...कि क्या पान सिंह तोमर देखने के बाद आप पान सिंह को अपने साथ घर ले जाती हैं. उनके पूछने का तात्पर्य था कि क्या लोग इस किरदार को याद रख पायेंगे. अगर ऐसा होता है तो यही मेरी सफलता होगी. दरअसल, इरफान का यह एक मात्र सवाल यह दर्शाता देता है कि वे किस तरह के अभिनेता हैं और उन्हें अपने दर्शकों के क्या चाहिए. वे यह अच्छी तरह जानते हैं कि उनका चेहरा उन्हें अभिनेता नहीं, बल्कि उनका काम उन्हें अभिनेता बनाता है और उनके लिए सफलता का मतलब उनके किरदारों का 100 करोड़ दर्शकों के जेहन में जिंदा रहना है न कि 100 करोड़ क्लब में शामिल होना. वर्ष 1987 में जब पहली बार मीरा नायर एनएसडी में अपनी पहली हिंदी फिल्म सलाम बांबे के वर्कशॉप के लिए आयीं तो उनकी नजर एक युवा कलाकार पर गयी.  मीरा नायर की शब्दों में उस युवा कलाकार की जुबां से अधिक उसकी आंखें बोल रही थीं. मीरा उसके पास गयीं और बोली मुझ पर विश्वास करो...और सब छोड़ कर मुंबई आ जाओ. यह शख्स कोई और नहीं इरफान थे. मीरा की सिर्फ एक तसल्ली पर वे बिना कुछ अधिक सोचे आ भी गये मुंबई. आखिर उन्हें अभिनय करने का मौका जो मिल रहा था. एक्टिंग के लिए ही तो वह अपना गांव छोड़ कर एनएसडी आये थे. वरना, पढ़ना लिखना तो उन्हें शुरू से ही नगंवारा था. यह तो दोस्तों ने समझाया था कि एनएसडी में एक्टिंग सिखाई जाती है...एक्टिंग सीखने की ललक और लालच उन्हें एनएसडी ले आयी और उसी ललक ने उन्हें मुंबई भी पहुंचा दिया. सलाम बांबे में उन्हें केवल एक दृश्य करने का मौका मिला. लेकिन उस एक दृश्य में भी उनका अभिनय की प्रति समर्पण नजर आया. उस एक दृश्य में वह चिट्ठी भी जिस शिद्दत से लिखते हैं. वह उनके समर्पित कलाकार होने का प्रमाण देता है. उस लेटर राइटर से अभिनय के सफर की शुरुआत कर आज इरफान राष्टÑीय पुरस्कार  अभिनेता तक के सफर पर आ पहुंचे हैं. आज इरफान हिंदी सिनेमा में  किसी खान सरनेम के या किसी  बादशाहत के मुलाजिम है. स्लो एंड स्टडी हॉर्स विन द रेस के तर्ज पर उन्होंने अपने कई साल अभिनय को समर्पित किया और आज वे अभिनय के पर्यायी कलाकार बन चुके हैं. जिस तरह वे अब केवल अपना नाम इरफान ही रखते हैं. अपने नाम की तरह ही उन्होंने अपनी एकल पहचान बनाई है. उनका अभिनय ही उनका गॉडफादर बना.  इस सफर में उनकी जिंदगी में कई उतार चढ़ाव आये.लेकिन उन्होंने  अभिनय से कभी कोई समझौता नहीं किया.  वे जब भी परदे पर आये. दर्शकों को भाये. फिर चाहे वह द नेमसेक का अशोक गांगुली हो या फिर साहेब बीवी और गैंगस्टर रिटर्नस का  इंद्रजीत प्रताप सिंह. पान सिंह तोमर के अंतिम दृश्यों में पान सिंह दो बूंद पानी के लिए तरस जाते हैं. लेकिन उन्हें पानी नसीब नहीं होता. पान सिंह महसूस करता है कि कुछ अधूरापन है. कुछ बाकी है. दरअसल, इरफान के अंदर का अभिनेता भी कुछ ऐसा ही प्यासा है, जो हर बार अपना सर्वश्रेष्ठ देते हुए भी महसूस करता है कि शायद कहीं कुछ कमी है और फिर उसे अगली फिल्म में एक नया रूप और आकार दे देता है.

जब लौट जानेवाले थे इरफान
10 सालों तक लगातार टेलीविजन पर काम करने के बाद जब वे अपने अंदर के कलाकार को संतुष्ट नहीं कर पा रहे थे.तब उन्होंने निर्णय लिया कि वे वापस लौट जायेंगे. एक दौर ऐसा भी आया था जब वह साइड किरदार करने के लिए तैयार हो चुके थे. उन्होंने सीआइडी जैसे शोज में कई एपिसोड में काम किया. स्टार प्लस पर प्रसारित होनेवाले बेस्ट सेलर कहानियों का भी वे हिस्सा रहे. चंद्रकांता व बनेगी अपनी बात में भी उन्होंने अहम भूमिकाएं निभायीं. टेलीविजन धारावाहिकों के लिए उन्होंने होस्टिंग भी की. पैसे मिल रहे थे. लेकिन वे संतुष्ट नहीं थे, क्योंकि उनके लिए पैसे प्राथमिकता नहीं थे. उन्हें सार्थक अभिनय करना था और वह हो नहीं पा रहा था.  इन सभी बातों से त्रस्त आकर उन्होंने अपने एनएसडी के सबसे करीबी दोस्त तिशू को बताया कि अब वे लौटना चाहते हैं. तिशू ने उनसे कहा कि अरे अभी कहां जाओगे...रुक जाओ राष्टÑीय पुरस्कार ले लो एक दो फिर जाना. उनके दोस्त तिशू को पता था कि इरफान अगर वापस चले जायेंगे तो वह क्या खो देंगे. यह उनका एक कलाकार पर विश्वास था और किस्मत का संयोग भी कि तिग्मांशु ने अपने फिल्मी करियर की शुुरुआत फिल्म हासिल से की और इरफान को पहली बार बेस्ट फिल्मफेयर विलेन का अवार्ड भी इसी फिल्म से मिला. और  उसी दोस्त की फिल्म पान सिंह तोमर ने इरफान को राष्टÑीय पुरस्कार का सम्मान भी दिला दिया. तिग्मांशु धूलिया इरफान को एनएसडी के दौर से जानते थे और वे जानते थे कि इरफान कितने बेहतरीन कलाकार हैं. बतौर निर्देशक व दोस्त ही उन्होंने इरफान के वापस जाने के निर्णय को बदला. वाकई हिंदी सिने जगत को तिग्मांशु का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उनकी वजह से इरफान जैसा समर्पित और किरदार को जीवंत प्रस्तुत करनेवाला कलाकार आज बॉलीवुड में सक्रिय है.एक कहावत है कि जब पहाड़ की ऊंचाईयों पर पहुंचना चाहते हो तो झुक कर चलो न कि दौड़ कर. इरफान ने

संवाद अदायगी व किरदारों का चित्रण 
 हाल ही में रिलीज फिल्म साहेब बीवी गैंगस्टर्स में जब इरफान अपनी मूछों को ताव देते हुए कहते हैं कि  मां कसम आप चाहते हैं न कि जंग हो तो जंग होगी. घमासान होगी. इरफान के इसी ऐलानी संवाद से दर्शकों की रुचि इस फिल्म में बन जाती हैं. चूंकि इरफान की संवाद अदायगी में वह दम है कि वह जब बोलते हैं तो दुनिआ सुनती है.  मीरा ने कहा था कि इरफान की आंखें उनकी जुबां से ज्यादा इंप्रेसिव हैं. हकीकत भी यही है कि इरफान उन अभिनेताओं में से एक हैं, जो अपने शरीर के हर भाग से अभिनय करते हैं. इरफान वर्तमान में हिंदी सिनेमा के उन चूनिंदा कलाकारों में से एक हैं जो हर विधा के किरदार को बखूबी निभा सकते हैं. इरफान जब नेमसेक के अशोक गांगुली के रूप में एक बांग्ला व्यक्ति का किरदार निभाते हैं. उनके पास अधिक संवाद नहीं. लेकिन उनके हाव भाव भी दर्शकों को आश्चर्यचकित करते हैं. फिल्म मकबूल में अपनी संवाद अदायगी से सबको चौंकाते हैं. गौर करें, तो इरफान जब भी संवाद बोलते हैं. उनका अपना एक अलग अंदाज है. वे किसी हड़बड़ी में नहीं होते. एक खास टोन होता है उनके संवाद में. जो कलाकार का ईमानदार अप्रोच दर्शाता है. यह सिर्फ और सिर्फ इरफान ही कर सकते हैं कि जब फिल्म लाइफ इन अ मेट्रो में वह कोंकणा से कुछ अलग मिजाज की बातें कहते हैं. फिर भी वह औंछे या छिछोरे नहीं लगते. फिल्म दिल कबड्डी में द्विअर्थी संवाद बोलते हुए भी वे अश्लील नहीं लगते. यह उनके अभिनय की क्षमता और उनके प्रस्तुतिकरण की ही ताकत है कि दर्शकों ने उन्हें हर रूप में स्वीकारा. पान सिंह तोमर में जब वह बीहड़ की भाषा बोलते हैं तो लगता है कि हम किसी बीहड़ के भागी से ही मिल रहे हैं. दरअसल, इरफान अपनी संवाद अदायगी में अपनी जुबां, अपने चेहरे के एक्सप्रेशन, आंखें और अगर उनकी हाथों में कोई प्रोप्स दिया जाये तो वे सबका इस्तेमाल एक साथ बखूबी करना जानते हैं. और एक कलाकार ऐसा तभी कर सकता है. जब वह अपने किरदारों के प्रति पूरी तरह समर्पित हो. आप इरफान में एक साथ एक चंचल युवा, मस्ती करनेवाला, दूसरों को चकमादेनेवाला गैंगस्टर, एक पारिवारिक व ईमानदार व्यक्ति, एक रुमानी राजकुमार, एक निहत्था आम इंसान, लड़कियों को अपनी मीठी बातों के जाल में फंसानेवाला गैंबलर हर तरह की किरदार की छाप देख सकते हैं. वास्तविक जिंदगी में भी जब आप इरफान से बात करेंगे तो आप महसूस करेंगे कि उनके  अंदर एक साथ एक नटखट बच्चा और एक गंभीर  अनुभवी व्यक्ति दोनों ही छुपा बैठा है. उनके पास जहां एक तरफ कमाल का सेंस आॅफ ह्मुमर है. वही देश दुनिया की फिल्मों की समझ भी वे बारीकी से रखते हैं. उनकी आंखें जितनी शरारती हैं, बातों में उतना ही ज्ञान है. आप उनके हाव भाव में हर बार कुछ बेस्ट करने की बेचैनी को महसूस कर सकते हैं. वे शायरी बोलते हैं तब भी किसी शायर से कम नहीं लगते. इरफान जब पान सिंह तोमर बनते हैं तो वे एक साथ अपनी पत् नी व बच्चों से प्यार करनेवाला एक पारिवारिक व्यक्ति, देश के लिए कुछ कर जानेवाला खिलाड़ी, अपनी बाप दादा की जमीन की हक की लड़ाई लड़ने के लिए बागी बन जाते हैं.  दरअसल, इरफान उन कलाकारों में से भी एक हैं जो अपनी एक ही फिल्म में कई भूमिकाएं निभा जाते हैं और वे सभी उम्दा होते हैं. इरफान के अभिनय में आज भी मुंबईयापन नहीं आया है और शायद यही वजह है कि वे जब थैंक्यू , संडे जैसी मेट्रोपोलिटन फिल्में भी करते हैं तब भी वे अपने ही अंदाज का पुट डालते हैं और एक छोटे शहर के छोरे की तरह की अपनी संवाद अदायगी करते हैं. वे मेट्रो शहर के डूड न बन कर एक छोटे शहर के डंबो बन कर ही लोगों को लुभाने में कामयाब हो जाते हैं और यही खासियत है. और उनकी यही खासियत उन्हें सुपरसितारा फिल्में या मल्टी स्टारर फिल्मों में भी एकल पहचान दिलाती है. फिल्म थैंक्यू में जितनी तारीफ उनके अभिनय की हुई थी शायद ही बॉबी देओल या सुपरस्टार अक्षय की हुई थी. वे अपनी हर फिल्म में छाप छोड़ते हैं. फिल्म संडे में जिस तरह वे रावण बन कर सड़क पर दौड़ते हैं और संवाद बोलते हैं कि यह रावण आज कुत्ते की मौत मरेगा. पूरी फिल्म में उनका यह संवाद दर्शकों के जेहन में रह जाता है. फिल्म नॉक आउट में वे जिस तरह एक टेलीफोन बुथ में डांस करते हैं. वे दर्शकों को हंसने के लिए प्रेरित करता है.फिल्म क्रिटिक अनुपमा चोपड़ा मानती हैं कि भले ही  इरफान की कुछ फिल्में भले ही बॉक्स आॅफिस पर सफल न हों. लेकिन उनका अभिनय हमेशा सफल होता है. वे हर किरदार में याद रह जाते हैं. वे हर बार कुछ नया करते हैं. वे नये नये अवतारों में आपके सामने आते हैं और आपको चौंकाते हैं. किसी कलाकार की इससे बेहतरीन खूबी और क्या होगी.

दुनिया में मकबूल इरफान
यह हमारे हिंदी सिनेमा जगत की विडंबना ही है कि हम किसी कलाकार की कला को तब पहचानते हैं, जब उन्हें देश में नहीं विदेश में पहचान मिले. इरफान के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था. उन्हें द वैरियर से पहले लोग टेलीविजन आर्टिस्ट ही समझते थे. लेकिन पहली बार जब उन्हें जब आशिफ की फिल्म द वैरियर से अंतरराष्टÑीय स्तर पर पहचान मिली. द वैरियर उनके अभिनय करियर का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. इसके बाद हिंदी में उन्हें फिल्में मिलनी शुरू हुई. हासिल, मकबूल, द नेमसेक, न्यूयॉर्क, लाइफ इन मेट्रो जैसी फिल्मों में उन्होंने बेहतरीन अभिनय किया. द वैरियर के दौरान ही उनके संपर्क अंतरराष्टÑीय स्तर के निर्माताओं व निर्देशकों से बढ़े. इरफान यह बखूबी जानते हैं कि विदेशी फिल्मों में हिंदी फिल्मों के कलाकारों को काफी कम मेहनताना मिलता है. लेकिन इरफान का मानना है कि विदेशी निर्देशक अपनी फिल्मों के हर किरदारों को बखूबी पिरोते हैं और उनकी फिल्मों में हर किरदार महत्वपूर्ण होता है. जो कि हिंदी फिल्मों में नहीं होता.सिर्फ यही वजह है कि वे वहां की फिल्मों में काम करना पसंद करते हैं.
इरफान की जिंदगी के अहम लोग
इरफान अपनी पत् नी सुतापा को अपना सबसे बड़ा क्रिटिक मानते हैं. वे बताते हैं कि कैसे शुरुआती दौर में जब वे कई बेहतरीन प्ले करके आते थे और अपनी पत् नी से पूछते कि उन्होंने कैसा किया है तो वे साफ साफ कुछ नहीं कहतीं, क्योंकि वह जानती थी कि इरफान वास्तविक जिंदगी में काफी इमोशनल व्यक्ति हैं. लेकिन फिल्म नेमसेक देखने के बाद उनकी पत् नी सुतापा ने उन्हें गले लगा कर कहा था कि उन्होंने बेहतरीन काम किया है. सुतापा ने हाल ही में एक टेलीविजन टॉक शो के दौरान बताया था कि किस तरह इरफान  जब एक बार उन्हें ट्रेन पर छोड़ने आये थे. उन्होंने उस ट्रेन की तसवीर बना कर अपनी पत् नी को दी थी कि जब वह ट्रेन वहां से जा रही है तो वह कैसा महसूस करेंगे सुतापा के बिना. सुतापा के अनुसार वास्तविक जिंदगी में इरफान जितने इमोशनल हैं उतने ही रोमांटिक भी. वे इन बातों का भी ख्याल रखते हैं कि वे वैसी फिल्में करें जो वे अपने बच्चों को बड़े होने पर दिखा सकें और कह सकें कि यह मेरा काम है. इरफान को जहां पत् नी के रूप में सुतापा जैसी दोस्त का साथ मिला. वही उनकी जिंदगी में कुछ दोस्तों की भी अहम भूमिका रही. रवि, प्रसन्ना, तिग्मांशु धूलिया जैसे दोस्तों ने उन्हें हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया.

खिलाड़ी इरफान
इरफान को शुरू से ही पढ़ने लिखने का शौक नहीं रहा. वे क्रिकेट खेलना बेहद पसंद करते थे. अपनी बातचीत में एक बार उन्होंने कहा था कि मैंने सोचा कि बाप रे बाप पूरे भारत से केवल 11 खिलाड़ी चुने जाते हैं. कितना कठिन काम है ये और एक्टर तो बहुत सारे होते हैं. तो यानी अभिनय क्रिकेट से अधिक आसान काम है तो चलो अभिनय ही कर लेते हैं. इरफान कहते हैं कि अगर वह कलाकार नहीं होते तो निश्चित तौर पर क्रिकेटर ही होते. उन्हें क्रिकेट के अलावा पतंगबाजी, गोल्फ जैसे खेल का भी शौक था. वे इस बात पर आम्दा करते हैं उन्हें तो खेलने से ही आज यह नवाबी मिली है. पढ़ते लिखते तो शायद कुछ नहीं कर पाते.

महत्वपूर्ण निर्देशक
तिग्मांशु ने ही इरफान को अपने किरदारों को एंटरटेनिंग और इंगेजिंग बनाने की कला सिखायी. आशिफ से इरफान ने सीखा कि कम संवाद भी कैसे दर्शकों पर छाप छोड़ सकते हैं. और दर्शकों को किरदार से कैसे जोड़ना चाहिए. मीरा से इरफान ने सीखा कि किस तरह दर्शकों को अपने अभिनय से चौंकाये. विदेशी निर्देशकों में माइकल विंटरबॉटम से इरफान ने सीखा कि किस तरह एक कलाकार निर्देशक के नजरिये से भी अपनी प्रतिभा को दर्शा सकता है.  अनुराग बसु से इरफान ने अपने सेट पर कूल होकर और शांत स्वभाव में काम करने की कला सीखी. इरफान जितना खुद से अपने अभिनय में पुट डालते हैं. उतना ही वह डायरेक्टर्स एक्टर भी हैं. फिल्में करते करते उन्होंने हर निर्देशक से कुछ न कुछ कला सीखी है और यही वजह है कि आज वे विभिन्न किरदार निभा कर भी एक संपूर्ण अभिनेता नजर आते हैं.


तिग्मांशु धूलिया 
एक अच्छा एक्टर लजीज खाने की तरह होता है. कितना भी खाओ. लगता है थोड़ा और खाना चाहिए इरफान उन्हीं कलाकारों में से एक है. उसके साथ जितना भी काम करो, इच्छा होती है कि इरफान के साथ एक और फिल्म तो होनी ही चाहिए.

Thursday, April 18, 2013

आलिया भट्ट

आलिया भट्ट के प्रशंसकों के लिए उनके पिता महेश भट्ट की भेंट...उन्‍होंने आज सुबह ट्विट किया...Not in our wildest dream did we imagine that this 'Sumo wrestler' would transform herself into ALIA BHATT

पिता पुत्र की डबल कामयाबी


-अजय ब्रह्मात्मज
    हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के सबसे पुराने कपूर परिवार की चौथी पीढ़ी के रणबीर कपूर और करीना कपूर लोकप्रिय और सक्रिय हैं। प्रेम और शादी की व्यस्तताओं से करीना कपूर करिअर पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे सकीं तो उनकी पिछली कुछ फिल्मों का बाक्स आफिस प्रदर्शन बुरा हुआ। अभी वह प्रकाश झा की ‘सत्याग्रह’  कर रही हैं। उम्मीद है कि प्रकाश झा की रियलस्टिक सिनेमा में वह ‘चमेली’ और  ‘ओमकारा’ की तरह अपना वास्तविक प्रभाव दिखा सकेंगी। उनके चचेरे भाई रणबीर कपूर इन दिनों दर्शकों के दिलों की धडक़न बने हुए हैं। अभिनय, अपीयरेंस, व्यवहार, बातचीत और विनम्रता से उन्होंने सभी को आकर्षित कर रखा है। अच्छी बात है कि वे अपनी भूमिकाओं में निरंतर प्रयोग कर रहे हैं। ‘रॉकस्टार’ के बाद ‘बर्फी’ की विविधता से उन्होंने प्रशंसा और पुरस्कार दोनों बटोरे। हालांकि ‘बर्फी’ में कुछ विदेशी फिल्मों के दृश्यों की नकल से विवाद उठा, लेकिन रणबीर कपूर के परफारमेंस में किसी को कभी नहीं दिखाई दी।
    रणबीर कपूर और करीना के पिता ऋषि कपूर और रणधीर कपूर अपने समय के लोकप्रिय अभिनेता रहे हैं। ऋषि कपूर ने अभिनय जारी रखा। रणधीर कपूर थोड़े सुस्त निकले। वैसे दोनों भाइयों को ‘हाउसफुल 2’ में देख कर अच्छा लगा था। ऋषि कपूर के करिअर पर गौर करें तो ‘लव आज कल’ के बाद उनकी फिल्मों की संख्या बढ़ गई है। भूमिका बड़ी और खास हो गई हैं। उन्हें पसंद भी किया जा रहा है। ‘अग्निपथ’ में रउफ लाला के किरदार में उन्हें अच्छी सराहना मिली। निगेटिव रोल के लिए उन्हें पुरस्कार भी मिले। हाल ही में रिलीज हुई ‘चश्मे बद्दूर’ में हम ने उन्हें गोवावासी जोसेफ के किरदार में देखा। इस फिल्म में भी उनकी अदाकारी पसंद आई। युवा कलाकारों के साथ डांस सिक्वेंस में वे एनर्जी के स्तर पर जरा भी कमतर नहीं लगे।
    इस एनर्जी, जोश और फोकस से ही वे 60 की उम्र के बाद भी दर्शकों और निर्देशकों के चहेते बने हुए हैं। कामयाब फिल्मों का हिस्सा होने से उनकी मांग भी बढ़ी है। खुद ऋषि कपूर ने बताया कि उनके लिए सीन और किरदार लिखे जाते हैं। उन्हें तरजीह दी जाती है। हाल-फिलहाल में अमिताभ बच्चन के अलावा यह महत्व किसी और को नहीं मिला है। अपने यहां मान लिया गया है कि हीरो की भूमिकाओं में आ चुके अभिनेता बुजुर्ग होने के बाद बेकार हो जाते हैं। इसके दो कारण हैं। एक तो लाइमलाइट में न रहने से उनकी ग्रंथि सेट और सीन में दिखाई पड़ती है। दूसरे, पहले से सक्रिय चरित्र अभिनेताओं के बीच उन्हें जगह बनानी पड़ती है। खुशी की बात है कि ऋषि कपूर ने दोनों वजहों को झुठला दिया है।
    हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का मजेदार तथ्य है कि कुछ पिता-पुत्रों को एक ही समय में फिल्मों में काम करने के मौके मिले हैं। उनमें पहली पिता-पुत्र जोड़ी पृथ्वीराज कपूर और राज कपूर की है। एक अंतराल के बाद वही लोकप्रियता ऋषि कपूर और रणबीर कपूर को मिल रही है। रणबीर के फिल्मों के आने तक ऋषि कपूर ने रिटायरमेंट नहीं ली थी। वे इक्का-दुक्का फिल्म कर रहे थे। रणबीर कपूर के आने के बाद उनकी भी गति बढ़ी है। इस साल उनकी सात फिल्में रिलीज हो जाएंगी। और एक फिल्म में वे अपने बेटे के साथ दिखेंगे। अभिनव कश्यप की ‘बेशर्म’ में वे रणबीर कपूर के साथ एक खास किरदार निभा रहे हैं। इस फिल्म में रणबीर कपूर की मां नीतू सिंह भी हैं।
    हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कपूर परिवार के पिता-पुत्रों के अलावा एक ही समय में सक्रिय अन्य जोडिय़ां देखें तो अमिताभ बच्चन और अभिषेक बच्चन का ध्यान सबसे पहले आता है। अभी दोनों ही सक्रिय हैं। इनके अलावा धर्मेन्द्र-सनी देओल और बॉबी देओल एवं विनोद खन्ना-अक्षय खन्ना, राहुल खन्ना दिखाई पड़ते हैं।

Wednesday, April 17, 2013

हम दोनों हैं जुदा-जुदा... हुमा कुरैशी - साकिब सालिम

रघुवेन्‍द्र सिंह के ब्‍लॉग अक्‍स से चवन्‍नी के पाठकों के लिए साधिकार...

हुमा कुरैशी अपने छोटे भाई साकिब सालिम को तंग करने का एक भी मौका नहीं गंवातीं, तो साकिब भी उनकी टांग खींचने के लिए तैयार रहते हैं. बहन-भाई की शैतानियों की कहानियां बता रहे हैं रघुवेन्द्र सिंह
भाई-बहन को साथ एक फिल्म में कास्ट करना हो, तो कैसी स्क्रिप्ट होनी चाहिए? आप सोचते रहिए... हुमा कुरैशी और साकिब सालिम ने तो सोच लिया है. ''भाई-बहन की ही कहानी होनी चाहिए और अगले पांच मिनट के बाद बहन की फोटो दीवार पर टंगी होनी चाहिए." यह कहकर साकिब ठहाका लगाते हैं. ''हां, क्योंकि अगर मैं उससे ज्यादा देर तक फिल्म में रही, तो तुम्हारा रोल खा जाऊंगी." अपने छोटे भाई की बात का जवाब देकर हुमा भी हंस पड़ती हैं और वे नई कहानी का सुझाव देती हैं, ''भाई-बहन रोड ट्रिप पर जाते हैं... " और ''भाई बहन को मार देता है..." शरारती साकिब हुमा की बात को बीच में ही काट देते हैं और फिर भाई-बहन की खिलखिलाती हंसी गूंजने लगती है.
आप समझ गए होंगे कि हुमा और साकिब के बीच किस तरह का रिश्ता है. दोनों तू-तू, मैं-मैं करते रहते हैं और एक-दूसरे की खिंचाई का मौका हाथ से नहीं निकलने देते. ''हम दोनों बचपन से ऐसे हैं.", हुमा हमारी हैरानी को थोड़ा कम करती हैं. हुमा से दो साल छोटे साकिब खुलासा करते हैं, ''बचपन में हुमा की एक आदत थी. जब भी हम लड़ते थे, ये चिल्ला-चिल्लाकर रोती थीं, ताकि मम्मी-पापा सुनें और मुझे आकर डांटें. मैं इन्हें हैरानी से देखता रहता था कि ओए, तू कितनी बड़ी फ्रॉड है." साकिब एक मजेदार वाकया बताते हैं, ''हम पड़ोस की एक आंटी के घर गए थे. कुछ देर बात आंटी ने देखा कि उनके वॉशरुम के सारे कॉस्मेटिक्स गायब हैं. उसके लिए मुझे खूब डांट पड़ी." कॉस्मेटिक्स गायब कैसे हुए थे, इसका खुलासा उस घटना के पंद्रह साल बाद हुआ. ''कुछ साल पहले वो आंटी डिनर पर घर आईं. उस घटना का जिक्र आया, तो मैंने कहा कि आंटी, कसम से मैंने आपके कॉस्मेटिक्स नहीं गायब किए थे. तभी टेबल के दूसरी ओर से धीमी सी एक आवाज आई- वो ना मैंने किया था." अपनी हंसी रोककर हुमा सच बताती हैं, ''मैं एक्चुअली डर गई थी, इसलिए मैंने सच नहीं बताया था." ''क्या हुआ था कि साकिब सो गया था. मेरे पास करने के लिए कुछ था नहीं, तो मैंने उनके सारे कॉस्मेटिक्स तोड़े और उन्हें खिडक़ी से बाहर फेंक दिए."  
हुमा और साकिब का बचपन दिल्ली के कालकाजी में गुजरा है. दिल्ली का मशहूर रेस्टोरेंट सलीम्स (कबाब के लिए लोकप्रिय) इनके डैड सलीम का है. इनके बड़े भाई नईम और मोइन डैड के बिजनेस में मस्त हैं. हुमा-साकिब के परिवार का फिल्मों से नाता भले न रहा हो, लेकिन उनका परिवार पूरा फिल्मी है. हुमा इस बात को साबित करती हैं, ''हमारे डैड दिल्ली से हैं, लेकिन मम्मी (अमीना) कश्मीर से हैं. दोनों के बीच एपिक-सा रोमांस हुआ था. दोनों घर से भाग गए थे. कई साल तक हमारे नाना ने दोनों से बात नहीं की. फिर हम पैदा हुए और नाना जी का दिल पिघल गया." ''हमारे अंदर ये एक्टिंग के जीन्स कहां से आए हैं? वहीं से तो आए हैं." हंसते हुए साकिब आगे कहते हैं, ''मुझसे कोई पूछता है कि आपने एक्टिंग कहां से सीखी है, तो कहता हूं कि मम्मी को देखकर मैंने एक्टिंग सीखी है. वो बहुत ड्रैमेटिक हैं." हुमा-साकिब के घर में फिल्में देखने की छूट नहीं थी, लेकिन ये दोनों देर रात को सबके सो जाने के बाद चोरी से टीवी पर हॉलीवुड की फिल्में देखा करते थे. 
हुमा-साकिब ने दिल्ली के रयान स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा ली. उसके बाद हुमा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के गार्गी कॉलेज और साकिब ने हिंदू कॉलेज में एडमिशन लिया. ''बारहवीं में मेरे 87 परसेंट माक्र्स आए थे, लेकिन मेरा एडमिशन स्पोर्ट्स कोटे के तहत हुआ था." साकिब बताते हैं. ''हां, साकिब को क्रिकेट का शौक था और मैं बॉस्केट बॉल खेलती थी." हुमा कहती ही हैं कि साकिब अचरज भरी निगाहों से उनकी ओर देखते हैं, ''झूठ मत बोलो यार." जवाब में हुमा कहती हैं, ''मेरे पास सर्टिफिकेट्स हैं." तपाक से साकिब जवाब देते हैं, ''वो नकली हैं." दोनों फिर आपस में लडऩा शुरू कर देते हैं. मैं बीच-बचाव करता हूं और दोनों के अभिनय की ओर आने के बारे में पूछता हूं. साकिब गंभीरता से जवाब देते हैं, ''अगर आप दिल्ली के हमारे घर में आएंगे, तो आपको सौ से भी ज्यादा फिल्मफेयर की कॉपीज मिलेंगी. मुझे फिल्में देखने का शौक था, लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक्टर बनूंगा." और वह बताते हैं, ''कॉलेज डेज में हुमा थिएटर करती थीं. मैं क्रिकेट खेलता था. मैं इन्हें पिकअप करने जाता था, तो इनके रिर्हसल्स देखा करता था." हुमा कॉलेज के थिएटर ग्रुप की प्रेसीडेंट भी थीं. मगर उन्होंने परिजनों से कह रखा था कि वे डॉक्टर बनना चाहती हैं. साकिब उस लम्हे के बारे में बताते हैं, जिसके खुलासे के बाद उनका घर हिल गया था, ''एक दिन कॉलेज से मैं घर लौटा, तो देखा कि मम्मी सिर पर हाथ रखे बैठी हैं कि बेटी ने मेरा सपना तोड़ दिया. दूसरी ओर सोफे पर हुमा फुल सेंटी बैठी थीं कि मम्मा, मैं मेडिकल की पढ़ाई नहीं कर पाऊंगी." हुमा कहती हैं, ''घर वालों ने जब पूछा कि मेडिकल नहीं करोगी, तो क्या करोगी? मैंने जल्दबाजी में कह दिया कि सिविल सर्विस की तैयारी."
हुमा ने मम्मी-पापा से कह तो दिया कि वह सिविल सर्विस की तैयारी करेंगी, लेकिन उनका मन थिएटर में रमता था. उन्होंने दिल्ली का मशहूर थिएटर ग्रुप एक्ट वन भी जॉइन कर लिया था. ये सब देखने के बाद एक दिन उनके डैड ने उनसे पूछा कि आखिर वह क्या करना चाहती हैं, तो जवाब मिला कि डायरेक्टर बनना है. ''क्योंकि मैं जानती थी कि वे मुझे एक्टर बनने की मंजूरी नहीं देंगे. हम दिल्ली की एक कंजर्वेटिव फैमिली से हैं." हुमा कहती हैं. और जब उन्होंने मम्मी-डैडी से बताया कि उन्हें एक्टर बनना है, तब क्या हुआ? साकिब बताते हैं, ''मॉम-डैड ने सोचा कि ज्यादा किताबें पढऩे से हुमा का दिमाग खराब हो गया है." परिवार के सुझाव पर हुमा विदेश जाकर एमबीए करने के लिए तैयार हो गईं, लेकिन बाद में उनके पापा को एहसास हुआ कि वे बेटी की इच्छा का दमन कर रहे हैं. हुमा बताती हैं, ''डैड से जब मैंने कहा कि मैं पूरी जिंदगी यह सोचूंगी कि उनकी वजह से अपना सपना पूरा नहीं कर पाई, तो वे इमोशनल हो गए. दूसरे ही दिन मुंबई का टिकट कटवाया और खुद मुझे लेकर मुंबई आए. उन्होंने कहा कि एक साल में अगर कुछ नहीं हुआ, तो नॉर्मल जिंदगी जीने वापस लौट आना."और हुमा 2008 में मुंबई आ गईं.
उधर साकिब अपनी गर्लफ्रेंड के बार-बार कहने पर मॉडलिंग करने लगे. मॉडलिंग में कई अवॉर्ड्स मिले. फिर किसी दोस्त ने कहा कि तुम मुंबई क्यों नहीं चले जाते. साकिब बताते हैं, ''मैंने हुमा को फोन किया कि सुनो, अगर मैं मुंबई आऊंगा, तो एक्टर बन जाऊंगा क्या? हुमा ने कहा कि हां, थोड़ी सी मेहनत करनी पड़ेगी." साकिब के मुंबई आने के सही कारण का खुलासा हुमा करती हैं, ''साकिब की एक गर्लफ्रेंड थी, जो मॉडल थी. वो मुंबई आ रही थी, तो साकिब भी बेबी के पीछे मुंबई आ गया." उन दिनों साकिब अपने डैड के रेस्टोरेंट के बिजनेस में हाथ बंटा रहे थे. उन्होंने पापा से कहा, ''डैड, मैंने कभी इंडीपेंडेंट लाइफ नहीं जी. मैं मुंबई जाना चाहता हूं और फिर वहां हुमया जी का ध्यान रखने के लिए कोई होना चाहिए न." 2010 में साकिब मुंबई आए, लेकिन जिस गर्लफ्रेंड के लिए वह मुंबई आए थे, उससे अगले दो महीने में ब्रेकअप हो गया. मगर साकिब दिल्ली नहीं लौटना चाहते थे. वे अपने दोस्तों के साथ पीजी में रह रहे थे. ''मैं अपनी लाइफ जीना चाहता था, इसलिए मैंने हुमा के पास न रहने का फैसला किया." साकिब बताते हैं.

हुमा को मुंबई में अपने हिस्से का संघर्ष करना पड़ा, लेकिन साकिब लकी रहे. हुमा बताती हैं, ''मैं आठ महीने तक मुंबई में किसी से मिली-जुली नहीं. मैं उधेड़बुन में लगी रहती थी कि क्या करना चाहिए. कोई गाइड करने वाला भी नहीं था. मुझे मुंबई को समझने में वक्त लगा. साकिब ओपन परसन है. यह फौरन मुंबई का हो गया." साकिब पहली बार ऑडिशन देने गए और उनको टाटा डोकोमो का वह एड मिल गया. फिल्मों की ओर आने की बाबत साकिब कहते हैं, ''मेरे दोस्त हैं- फैशन डिजाइनर वरुण बहल. उन्होंने मुझसे कहा कि यशराज फिल्म्स की कास्टिंग डायरेक्टर हैं शानू, तुम उनसे जाकर मिल लो. मैं उस वक्त फिल्में नहीं करना चाहता था. मैं बेमन से शानू से मिलकर आ गया."
संयोग देखिए कि हुमा को उधर अनुराग कश्यप की फिल्म गैंगस ऑफ वासेपुर मिली, तो इधर साकिब को वाईआरएफ की फिल्म मुझसे फ्रेंडशिप करोगे. दोनों एक साथ शूटिंग में व्यस्त हो गए. मगर साकिब की फिल्म हुमा की फिल्म से एक साल पहले प्रदर्शित हुई. हुमा बताती हैं, ''जब इसकी फिल्म के प्रोमो टीवी पर चल रहे थे, तो यह बहुत नर्वस था. मैंने इससे कहा कि फिल्म का चाहे जो भी रिजल्ट हो, लेकिन यह याद रखना कि तुम केवल बाइस साल के हो. तुमने यह सब अपने बलबूते किया है. वो तुम्हारा अचीवमेंट." साकिब बताते हैं कि उनके जीवन में बड़ी बहन की क्या जगह है, ''मैंने इनसे कहा कि आप मेरी फिल्म देखो. मुझे फर्क नहीं पड़ता कि क्रिटिक्स क्या कहते हैं. मैंने आपको देखकर थोड़ी-बहुत एक्टिंग सीखी है, जब आप थिएटर में रिहर्सल करते थे." मुझसे फ्रैंडशिप करोगे देखने के बाद हुमा हैरान थीं. ''मुझे यकीन नहीं हुआ कि साकिब इतना ब्रिलिएंट और स्पॉनटेनियस एक्टर है."  
मुंबई शहर ने न सिर्फ हुमा-साकिब को एक पहचान दी है, बल्कि दोनों को एक-दूसरे के करीब भी लाया है. दोनों ने हाल में मुंबई के ओशिवारा में मिलकर एक फ्लैट खरीदा है. ''हम एक-दूसरे से अपनी बातें शेयर करते हैं. साकिब बहुत मेच्योर है, मुझसे भी ज्यादा. मुझे लोगों की समझ नहीं है." हुमा बड़ी साफगोई से कहती हैं. साकिब हामी भरते हैं, ''अगर आप इनसे अच्छे से बात कर लेंगे, तो ये आपको पसंद करने लगेंगी. मैं इन्हें समझाता हूं कि किसी पर इतनी जल्दी विश्वास नहीं करना चाहिए." हुमा बताती हैं. साकिब स्वीकार करते हैं कि यह शहर उन्हें अपनी बड़ी बहन के करीब लाया है. ''पहले हम पर्सनल लाइफ की बातें शेयर नहीं करते थे, लेकिन मुंबई आने के बाद एहसास हुआ कि यहां हम एक-दूसरे पर ही डिपेंड रह सकते हैं. अगर मैं एक्टिंग में नहीं आता, तो हुमया जी को समझ नहीं पाता." हुमा को हुमया जी कहने के बारे में पूछने पर साकिब ने हंसते हुए बताया, ''बचपन में मैं तोतला था. मैं हुमा बाजी को हुमया जी कहता था. लोग समझते हैं कि मैं इन्हें रिस्पेक्ट के लिए जी कहता हूं, जबकि ऐसा कुछ नहीं है."
गैंगस ऑफ वासेपुर और लव शव ते चिकन खुराना जैसी फिल्मों में अपने पॉवरफुल अभिनय की बदौलत हुमा नई पीढ़ी की शीर्ष एक्ट्रेस में शामिल हो गई हैं और साकिब अगली पीढ़ी के हॉट स्टार माने जा रहे हैं. साकिब की दूसरी फिल्म यशराज बैनर की मेरे डैड की मारुति अगले महीने रिलीज हो रही है, जबकि हुमा की डी डे और एक थी डायन इस वर्ष प्रदर्शित होंगी. साकिब कहते हैं, ''जब मुझसे कोई कहता है कि हुमा आपकी बहन हैं? वो कमाल की एक्टर हैं, तो मुझे बहुत खुशी होती है." 
हुमा-साकिब के फ्रेंड्स कॉमन हैं. साकिब हुमा को तंग करते हैं, ''हुमया जी का कोई दोस्त नहीं है." ''हां, साकिब थैंक्यू, तुम्हारी वजह से मैं जिंदा हूं." हुमा जवाब में कहती हैं. बॉयफ्रेंड के मामले में हुमा की पसंद के बारे में साकिब हंसते हुए कहते हैं, ''मेरी बहन अगर किसी कमरे में घुसेगी, तो सबसे छुपकर जो लडक़ा बैठा होगा, कहेगी- दैट्स माय बॉय. इसे पप्पू ही पसंद आते हैं." हुमा उन्हें टोकते हुए कहती हैं, ''तुम्हें लड़कियों का टेस्ट नहीं पता... यह सुनकर साकिब हंस पड़ते हैं, जो फिलहाल एक लडक़ी को डेट कर रहे हैं.
                                                                  मेरे डैड की मारुति
आई हेट यू, बट आई लव यू
साकिब के बारे में हुमा-
पसंद
- साकिब अपने काम और रिलेशनशिप को लेकर बहुत सिंसेयर है. यह बहुत केयरिंग है. मगर कभी-कभी ओवर सेंसिटिव हो जाता है. इसका सेंस ऑफ ह्यूमर कमाल का है.
नापसंद
- यह लेजी है. लेकिन बहुत लकी है. मेरे हिसाब से लक यह है कि आपकी वाइब्स बहुत अच्छी हैं और आप अच्छी चीजों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं.
                                                                    एक थी डायन
हुमा के बारे में साकिब-
पसंद
ये हर चीज को सहेजकर रखती हैं. बहुत सेंसिटिव हैं. बहुत टैलेंटेड हैं. गॉड गिफ्टेड एक्टर हैं.
नापसंद
ये रोंदू हैं. इनमें धैर्य की कमी है. ये किसी चीज को हासिल करने के लिए बहुत मेहनत करेंगी, लेकिन जब उसके करीब पहुंचेंगी, तो कहेंगी कि अरे, नहीं हो रहा है.

साभार: FILMFARE

Monday, April 15, 2013

हिंदी फिल्‍मों का पंजाबीपन

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
हिंदी फिल्म का नायक यदि 'चरण स्पर्श' या 'पिताजी पाय लागूं' कहते हुए पर्दे पर दिखे तो ज्यादातर दर्शक हंस पड़ेंगे। वहीं नायक जब पर्दे पर 'पैरी पौना बाउजीÓ कहता है तो हम विस्मित नहीं होते। यह हमें स्वाभाविक लगता है। दरअसल, हिंदी फिल्मों में पंजाब की निरंतर मौजूदगी से हम पंजाबी लहजे, संगीत और संवाद के आदी हो गए हैं। हिंदी फिल्मों का बड़ा हिस्सा पंजाबी संस्कृति और प्रभाव से आच्छादित है। कभी करीना कपूर का जब वी मेट में पंजाबी स्टाइल देश भर की लड़कियों का जुनून बन गया तो कभी गदर में तारा सिंह की भूमिका में सनी देओल बने गबरू जवानों का पैमाना। यही नहीं, देश में सबसे ज्यादा चलने वाली फिल्म का रिकार्ड भी दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे  के नाम है, जो विशुद्ध रूप से पंजाबी-एनआरआई समीकरण पर आधारित फिल्म थी।  चाहे वह विकी डोनर, बैंड बाजा बारात, पटियाला हाउस, खोसला का घोंसला, दो दूनी चार जैसी मल्टीप्लेक्स फिल्में हों; सिंह इज किंग, दिल बोले हडि़प्पा, यमला पगला दीवाना, सन आफ सरदार जैसी शुद्ध मसाला मूवीज या माचिस और पिंजर जैसी कला फिल्में...बॉलीवुड में जब-जब फिल्मों में पंजाबियत दिखी, वह हिट हुई है।  अब तो हालत यह है कि इधर बॉलीवुड की अधिसंख्य फिल्मों के गीत-संगीत में पंजाबियत का असर कुछ ज्यादा ही दिखाई देने लगा है, भले ही फिल्म में पंजाब की कोई बात दूर-दूर तक न हो। जी हां, फिल्म का परिवेश कोई भी हो, आजकल उसमें एक न एक गीत पंजाबी में होता ही है। अगर पूरा गीत नहीं हो तो कम से कम मुखड़ा, पद या कोई शब्द जरूर होगा।
बुल्ले शाह से बल्ले-बल्ले तक
बीच में एक दौर आया था, जब 'माही' शब्द का चलन तेज हुआ था। अभी तक इस शब्द को हिंदी फिल्मों के गीतों में पिरोया जा रहा है। बुल्ले शाह के गीत हर किस्म के श्रोता को पसंद आते हैं। सिर्फ गीत-संगीत ही नहीं, पारिवारिक महत्व के रीति-रिवाजों में भी पंजाब का उल्लेखनीय असर नजर आता है। खासतौर पर विवाह की रस्मों में हर जगह पंजाबीपन आ गया है। देश में कहीं भी शादी हो रही हो, मेहंदी और संगीत उसका जरूरी हिस्सा बन चुका है। अब फिल्म हो, एलबम हो या फिर कोई पारिवारिक समारोह, पंजाबी गीत-संगीत के बिना मजा ही नहीं आता। बाराती घोड़े पर सवार दूल्हे के आगे-पीछे दोनों हाथ ऊपर उठाकर एक उंगली और एक टांग उठाए किसी पंजाबी धुन पर नाचते दिखते हैं। यहां तक कि गुजरात के गरबा से लेकर बिहार के मेलों तक में पंजाबी धुनों की अनुगूंज सुनाई पड़ती है। 'बल्ले-बल्ले' और 'चक दे फट्टे' खुशी जाहिर करने के आम मुहावरे हो गए हैं।
जुबां को भाया पंजाबी तड़का
हिंदी फिल्मों का यह पंजाबी कनेक्शन आरंभ से नहीं था। देश के विभाजन के बाद पाकिस्तान से आए पंजाबी आजीविका के लिए पूरे देश में फैल गए। विभाजन की त्रासदी से गुजरने के बावजूद उन्होंने अपने लोकसंगीत का जोश नहीं खोया। साथ ही उन्होंने अपने स्वाद को भी बरकरार रखा। ढाबे और रेस्त्रां के जरिए उन्होंने तंदूर और तंदूरी के लाजवाब जायके से सभी प्रदेशों के लोगों को आकृष्ट किया। अपने बुजुर्गों से पूछें तो जानेंगे कि छठे दशक के आरंभ में हर शहर में तेजी से पंजाब, न्यू पंजाब, सरदार नाम से रेस्त्रां खुले थे और राष्ट्रीय राजमार्ग पर प्रमुख पड़ावों के आसपास ढाबा कल्चर ने जन्म लिया था। तंदूरी रोटी और चिकेन से लेकर लस्सी और पटियाला पैग तक को पॉपुलर करने में इन ढाबों और रेस्त्रां की महती भूमिका रही है।
माइग्रेशन के बाद बढ़ा महत्व
फिल्मों में लाहौर से माइग्रेट कर मुंबई आए फिल्मकारों और तकनीशियनों के साथ पंजाब भी मुंबई आ गया। हिंदी फिल्मों में आज भी अधिकांश स्टार, फिल्मकार और तकनीशियन उत्तर-पश्चिम भारत के पंजाब से आए नागरिक ही हैं, चाहे इनके सरनेम खान हों या कपूर। उन्होंने अपनी माटी के खुशबू और संस्कृति को फैलाया। हिंदी फिल्मों में कहानियों, किरदारों और गीत-संगीत के जरिए उसे जन-जन तक पहुंचाया। वह स्वीकृत भी हुआ। जरा गौर करें तो पाएंगे कि हिंदी फिल्मों के नायकों के सरनेम ज्यादातर कपूर, मल्होत्रा, खन्ना और चोपड़ा ही होते हैं। चुलबुल पांडे की अपार लोकप्रियता के बावजूद हिंदी फिल्मों के नायकों के सरनेम पांडे, चौधरी, चौबे, सिंह, श्रीवास्तव, पासवान, यादव आदि नहीं हुए हैं। कितनी बड़ी विडंबना है कि हिंदी फिल्मों में न तो कहानियां हिंदी प्रदेश की होती हैं और न किरदार वहां से आते हैं। हां, दबंग के बाद संभावना बढ़ी है कि शायद भविष्य में हिंदी प्रदेशों के किरदार अपने परिवेश के साथ फिल्मों में आएं।
वक्त से आया नया दौर
हिंदी फिल्मों में बीआर चोपड़ा और यश चोपड़ा के नेतृत्व में पंजाब से आए सभी फिल्मकारों ने अपनी फिल्मों में किसी न किसी रूप में पंजाब को पेश किया। बीआर चोपड़ा की नया दौर की कहानी पंजाब की नहीं थी, लेकिन उसके गीत-संगीत में पंजाबीपन था। उससे भी पहले यश चोपड़ा की वक्त पंजाब की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म थी, जिसमें विभाजन से भाइयों के खोने-बिछुडऩे और फिर मिलने की घटनाएं थीं। यश चोपड़ा ने वक्त से हिंदी फिल्मों को कई फार्मूले दिए। उनमें से एक पंजाबीपन भी था। यश चोपड़ा की लगभग सभी फिल्मों के नायक पंजाब की धरती से आते हैं। यह कतई गलत नहीं है, लेकिन उनकी लोकप्रियता और प्रभाव ने दूसरे फिल्मकारों को भी पंजाब के गीत-संगीत और संवाद फिल्मों में अपनाने के लिए प्रेरित किया। उनकी फिल्मों के सरसों के खेत के दृश्यों को कौन भूल सकता है? खुशहाल और हरे-भरे पंजाब ने हिंदी सिनेमा के पर्दे को उत्साहित किया। नाचने और खुशियां मनाने के जोशीले पंजाबी तरीके में गजब का आकर्षण रहा। भांगड़ा बीट, ढोल और बल्ले-बल्ले की धुन पर पूरा देश थिरकने को मजबूर हुआ।
पंजाब के गीत-संगीत में जबरदस्त रवानी है। उसे बुलंद आवाज में गायक गाते हैं तो आसानी से मस्ती छा जाती है। पैर खुद-ब-खुद थिरकने लगते हैं। सुखविंदर की आवाज किसी भी गीत को ओज और जोश से भर देती है। आजकल मीका सभी के चहेते हैं। दिलेर मेहंदी का दौर भी यादगार है। यह कहना अनुचित होगा कि किसी रणनीति के तहत पंजाब के कलाकारों और फिल्मकारों ने पंजाबीपन को थोपा। वे तो बस अपनी लोकप्रिय संस्कृति की खूबियों को पेश करते गए और आम दर्शक एवं श्रोता उसे स्वीकार करते गए। यह लोकप्रिय संस्कृति अध्ययन और शोध का रोचक विषय हो सकता है। मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में मजाक चलता है कि पंजाबी कल्चर ही हमारा नेशनल कल्चर है!

Sunday, April 14, 2013

फिल्‍मों की कास्टिंग और मुकेश छाबड़ा

कैमरे के पीछे सक्रिय विभागों में कास्टिंग एक महत्‍वपूर्ण विभाग है। पहले इसे स्‍वतंत्र विभाग का दर्जा और सम्‍मान हासिल नहीं था। पिछले पांच सालों में परिदृश्‍य बदल गया है। कोशिश है कि चवन्‍नी के पाठक इस के बारे में विस्‍तार से जान सकें। 
कास्टिंग परिद्श्‍य
-अजय ब्रह्मात्मज
    फिल्म निर्माण में इस नई जिम्मेदारी को महत्व मिलने लगा है। इधर रिलीज हो रही फिल्मों में कास्टिंग डायरेक्टर के नाम को भी बाइज्जत क्रेडिट दिया जाता है। हाल ही में रिलीज हुई ‘काय पो छे’ की कास्टिंग की काफी चर्चा हुई। इसके मुख्य किरदारों की कास्टिंग नई और उपयुक्त रही। सुशांत सिंह राजपूत, अमित साध, अमृता पुरी, राज कुमार यादव और मानव कौल आदि मुख्य किरदारों में दिखे। सहायक किरदारों में भी परिचित चेहरों के न होने से एक ताजगी बनी रही। कास्टिंग डायरेक्टर के महत्व और भूमिका को अब निर्देशक और निर्माता समझने लगे हैं।
    हालांकि अभी भी निर्माता-निर्देशक स्टारों के चुनाव में कास्टिंग डायरेक्टर के सुझाव को नजरअंदाज करते हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के स्ट्रक्चर में स्टार के पावरफुल और निर्णायक भूमिका (डिसाइडिंग फैक्टर) में होने की वजह से यह निर्भरता बनी हुई है। कह सकते हैं कि अभी तक हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में फिल्में स्टार नहीं चुनतीं। स्टार ही फिल्में चुनते हैं। फिर भी अब हीरो-हीरोइन के अलावा बाकी किरदारों के लिए कलाकारों के चयन में कास्टिंग डायरेक्टर की सलाह, समझदारी और पसंद को प्राथमिकता दी जा रही है।
    50 की उम्र के आसपास पहुंचे पाठको-दर्शकों को याद होगा कि रिचर्ड अटेनबरो की फिल्म ‘गांधी’ के निर्माण के समय बड़े पैमाने पर भारतीय कलाकारों की छोटी-बड़ी भूमिकाओं के कास्टिंग हुई थी। यहां तक भीड़ के लिए भी खास चेहरों को चुना गया था। श्याम बेनेगल ने ‘भारत एक खोज’ धारावाहिक के निर्देशन के समय देश भर से आए सैकड़ों कलाकारों में से खुद के धारावाहिक के लिए उपयुक्त कलाकारों का चुनाव किया था। ‘महाभारत’, ‘रामायण’ और ‘चाणक्य’ में भी कलाकारों की विधिवत कास्टिंग की गई थी। ‘चाणक्य’ की कास्टिंग मीनाक्षी ठाकुर ने की थी।
    फिल्मों में शेखर कपूर ने पहली बार कास्टिंग डायरेक्टर का महत्वपूर्ण इस्तेमाल किया। 1994 में आई उनकी फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ की कास्टिंग आज के चर्चित डायरेक्टर तिग्मांशु धुलिया ने की थी। सीमा विश्वास, निर्मल पांडे, मनोज बाजपेयी, गोविंद नामदेव आदि समेत दर्शनों कलाकारों को पहली बार बड़े पर्दे पर आने का मौका मिला था। नए चेहरों से फिल्म की संप्रेषणीयता प्रभावित होती है। फिल्म की विश्वसनीयता बढ़ती है। परिचित कलाकारों के मैनरिज्म से वाकिफ होने के कारण हमें किरदारों में नयापन नहीं दिखता। हम सीधे तौर पर इसे महसूस नहीं करते, लेकिन फिल्म को नापसंद करने में परिचित चेहरे से पैदा ऊब भी शामिल रहती है।

कास्टिंग डायरेक्टर की भूमिका

    कास्टिंग डायरेक्टर फिल्म के सभी किरदारों के लिए उपयुक्त कलाकारों का चुनाव करता है। निर्माता और निर्देशक के साथ उसे काम करना होता है। किसी भी फिल्म की शुरुआत में निर्माता-निर्देशक के बाद उसके पास ही स्क्रिप्ट आती है। स्क्रिप्ट पढऩे के बाद वह चरित्रों की सूची तैयार करता है। फिर उन चरित्रों के लायक कलाकारों के इंटरव्यू और ऑडिशन करने के बाद वह आरंभिक सेलेक्शन करता है। आम तौर पर हर चरित्र के लिए पहले दो-तीन कलाकारों का विकल्प चुना जाता है। फिर डायरेक्टर की मदद से आखिरी फैसला लिया जाता है। कास्टिंग डायरेक्टर के पास मौजूद कलाकारों का पुष्ट डाटा बैंक रहता है। नए कलाकारों की तलाश में वे दूसरे शहरों की यात्रा करते हैं। विभिन्न प्रकार के नाट्य समारोहों और परफार्मिंग इवेंट देखने जाते हैं।
    फिल्म निर्माण के हर क्षेत्र के समान कास्टिंग डायरेक्शन में आने के लिए विशद अनुभव की जरूरत होती है। उसकी नजर और समझ पारखी हो। वह चमक-दमक या धूल से भ्रमित नहीं हो। वह प्रतिभाओं को परख सके और उनकी योग्यता के अनुसार उन्हें सही भूमिकाएं दे - दिला सके।
    हिंदी फिल्मों में अभी हनी त्रेहन, जोगी, अभिमन्यु रे, शाहिद, अतुल मोंगिया, मुकेश छाबड़ा आदि एक्टिव कास्टिंग डायरेक्टर हैं। फिल्मों में आने को उत्सुक महात्वाकांक्षी युवक-युवती फिल्म निर्माण के इस जरूरी क्षेत्र को भी पेशे के तौर पर चुन सकते हैं।

शूटिंग आरंभ होते ही हमारा काम खत्म हो जाता है-मुकेश छाबड़ा
अभी ‘काय पो छे’  की कास्टिंग की सभी तारीफ कर रहे हैं। ज्यादा लोगों को नहीं मालूम कि इस फिल्म की कास्टिंग मुकेश छाबड़ा ने की है। दिल्ली से आए रंगकर्मी मुकेश छाबड़ा ने सबसे पहले रंजीत कपूर की फिल्म ‘चिंटू जी’ की कास्टिंग की थी। उस फिल्म में उन्हें पूरे मोहल्ले के लिए कलाकारों को चुनना था।  उसके बाद ‘चिल्लर पार्टी’, ‘रॉकस्टार’, ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’, ‘काय पो छे’, ‘तृष्णा’, ‘डी डे’, ‘हाई वे’, ‘पी के’ और ‘बॉम्बे वेलवेट’ जैसी फिल्मों की लंबी कतार है। इनमें से कुछ रिलीज हो चुकी हैं और कुछ अभी फ्लोर पर हैं।
- फिल्मों में कास्टिंग की शुरुआत कब से मानी जा सकती है?
0 कास्टिंग फिल्म निर्माण का जरूरी हिस्सा है। पहले डायरेक्टर और उनके असिस्टेंट अपनी जान पहचान के कलाकारों को विभिन्न भूमिकाओं के लिए चुन लेते थे। पहले फिल्मों में नायक-नायिकाओं के अलावा ज्यादातर भूमिकाओं में हम एक ही कलाकार को देखते थे। आप ने गौर किया होगा कि पुरानी फिल्मों में एक ही एक्टर डॉक्टर या पुलिस इंस्पेक्टर बनता था। यहां तक कि पार्टियों और भीड़ के जूनियर आर्टिस्ट भी पहचान लिए जाते थे। पिछले दस सालों में नए निर्देशकों के आने के बाद पश्चिम के प्रभाव से कास्टिंग पर ध्यान दिया जाने लगा है। मेरे जैसे कुछ तकनीशियनों को काम मिलने लगा है।
- इस फील्ड में आने का ख्याल कैसे आया?
0 मैं दिल्ली रंगमंच से आया हूं। रंगमंच के दिनों में बहुत से कलाकारों को जानता था। यहां आने के बाद कभी-कभार लोगों को सलाह दे दिया करता था। बाद में लगा कि इसे पेशे तौर पर अपनाया जा सकता है। धीरे-धीरे मेरी भी समझदारी बढ़ी है। अब स्क्रिप्ट पढ़ के किरदारों का चेहरा नजर आने लगता है। फिर अपनी याददाश्त और डाटा बैंक के सहारे मैं उन किरदारों के लायक कलाकारों को चुन लेता हूं। एक्टर तो हर जगह हैं। उनमें से कुछ लोग ही मुंबई आ पाते हैं । मेरी कोशिश रहती है कि बाहर के एक्टरों को भी काम मिले।
- कास्टिंग डायरेक्टर का कंसेप्ट कब से चलन में है?
0 मेरी जानकारी में शेखर कपूर ने ‘बैंडिट क्वीन’ में कास्टिंग का काम तिग्मांशु धूलिया को सौंपा था। उसके बाद उन्होंने मणि रत्नम की ‘दिल से’ की भी कास्टिंग की। बाद में वे स्वयं डायरेक्टर बन गए। उनके अलावा कोई और उल्लेखनीय नाम  नहीं दिखता। बाद में यशराज फिल्म्स और नए समय के निर्देशकों ने इस तरफ ध्यान दिया।
- कास्टिंग डायरेक्टर का काम क्या होता है? अपनी कार्य प्रक्रिया के बारे में बताएं?
0 सबसे पहले हमें स्क्रिप्ट दी जाती है। रायटर, डायरेक्टर और प्रोड्यूसर के बाद हमलोग ही स्क्रिप्ट को पढ़ते हैं। कुछ डायरेक्टर स्क्रिप्ट देने के साथ ही ब्रीफ कर देते हैं। स्क्रिप्ट पढऩे के बाद हमें सोचना और खंगालना पड़ता है। सबसे पहले हम खुद ही शॉर्ट लिस्ट करते हैं। ऑडिशन और इंटरव्यू से संतुष्ट होने के बाद हम उन्हें डायरेक्टर से मिलवाते हैं। कई बार हमलोग कुछ एक्टर के लिए अड़ भी जाते हैं। शूटिंग आरंभ होने के साथ ही हमारा काम खत्म हो जाता है। डायरेक्टर तक एक्टर को ले जाने के पहले हम खुद ही उसकी जांच-परख कर लेते हैं। अब तो इतना अनुभव हो गया है कि बातचीत और व्यवहार से सामने वाले की समझ हो जाती है। हम जिन्हें छांट देते हैं,उनकी गालियां भी सुननी पड़ती है। हर फिल्म में मैं नई कास्टिंग करता हूं। बहुत कम एक्टर को दोहराता हूं।
- कुछ फिल्मों के उदाहरण से समझाएं?
0 ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की कास्टिंग नौ महीनों में हुई थी। लगभग 15-20 हजार कलाकारों से मिला। विभिन्न शहरों में जाकर कास्टिंग की। पहली कोशिश यही थी कि उनकी भाषा और बोलने का लहजा फिल्म के अनुकूल हो। मुझ से जितने कलाकार मिलने आते हैं उन सभी की वीडियो रिकॉर्डिंग कर लेता हूं। ‘शाहिद’ फिल्म में राजकुमार यादव की मां के रोल के लिए मैंने हिसार की एक अभिनेत्री को बुलाया था। यहां सभी नाराज हो गए थे कि मुझे मुंबई में एक्टर नहीं मिल रहे हैं। इम्तियाज अली की ‘रॉकस्टार’ में कलाकारों के चार झुंड थे। एक तो रणबीर कपूर का जाट परिवार था। दूसरे रणबीर के कॉलेज के दोस्त थे। इसके अलावा नरगिस के दोस्त और परिवार के सदस्य थे। चौथा नरगिस के पति का प्राग का परिवार था। इम्तियाज छोटी से छोटी भूमिकाओं में भी कायदे के कलाकारों को ही रखते हैं। उनकी फिल्म मेरे लिए ज्यादा चैलेंजिंग थी। मैं मिडिल क्लास का लडक़ा हूं। मुझे नरगिस के परिवार के लिए हाई क्लास में खपने लायक कलाकारों को चुनना था। शुरू में इस काम में थोड़ी दिक्कत हुई। ‘काय पो छे’ की बात करूं तो इसकी कास्टिंग बहुत ही इंटरेस्टिंग रही। मुझे बताया गया था कि तीनों नए कलाकार होने चाहिए। जब अंतिम चुनाव के बाद मैंने सुशांत, अमित और राजकुमार के नाम सुझाए तो सभी चौंके कि इतना नया भी क्या चुनना? उन्हें दिक्कत हो रही थी कि सुशांत टीवी का एक्टर है और राजकुमार हीरो जैसा नहीं लगता है। काफी बहस-मुबाहिसा हुआ। फिर जा कर ये नाम फायनल हुए।
- हिंदी फिल्मों के संदर्भ में कास्टिंग काउच की बहुत चर्चा होती है। आप क्या कहेंगे?
0 (हंसते हुए)मेरे ऑफिस में कोई भी काउच नहीं है। मैंने भी इस तरह की बातें सुनी हैं, लेकिन कोई भी प्रोफेशनल कास्टिंग डायरेक्टर ऐसी हरकत नहीं कर सकता। हमारे ऊपर एक्टर और डायरेक्टर विश्वास करते हैं। मैं अपनी बात करूं तो मेरी एक प्रेमिका हैं। मुझे इधर-उधर झांकने की जरूरत नहीं है।