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Sunday, August 25, 2013

लोग कहते हैं कि मैं बिक गया हूं: विक्रमादित्य मोटवाने

उड़ान से गंभीर फिल्मकार के तौर पर स्थापित विक्रमादित्य मोटवाने अब रोमांस की चाशनी में घुली लूटेरा  लेकर आ रहे हैं. रघुवेन्द्र सिंह उनके रोमांटिक पहलू को उजागर कर रहे हैं
आम तौर पर फिल्मकार अपनी फिल्म के पोस्ट प्रोडक्शन के दौरान खुद को दुनिया से काट लेता है. उसका दिन-रात स्टूडियो के स्याह अंधेरे में अपनी फिल्म को सही आकार देने में गुजरता है. लेकिन विक्रमादित्य मोटवाने अपवाद हैं. आजकल आराम नगर 2 का बंगला नंबर 121, जो फैंटम का ऑफिस है, उनका दूसरा घर बना हुआ है. यहां वे दिन-रात लुटेरा को आखिरी शेप देने में जुटे हैं, मगर ताज्जुब की बात यह है कि इस एकांतवास को तोड़ते हुए वह हर वीकेंड सिनेमाहॉल में दिख जाते हैं. जाहिर है इससे उनका ध्यान टूटता होगा. इस मंतव्य का खंडन करते हुए विक्रम कहते हैं, ''पोस्ट प्रोडक्शन के दौरान ब्रेक लेना जरूरी होता है. कई बार एडिट के दौरान आप कहीं अटक जाते हैं. उस समय आपको दूसरे की पिक्चर जाकर देखनी चाहिए. उससे बहुत-सी चीजें आपके दिमाग में क्लीयर हो जाती हैं. क्रिएटिव ड्रिंकिंग जरूरी होती है. मेरा मानना है कि फिल्म की राइटिंग और एडिटिंग के दौरान पिक्चरें देखनी चाहिए या बुक पढऩी चाहिए. प्रेरणा भी तो इन्हीं जगहों से आती है. 
विक्रम ने हाल में आयरन मैन, स्टार ट्रेक, बॉम्बे टॉकीज, गिप्पी, गो गोवा गॉन और औरंगजेब फिल्में देखीं. अपनी पसंद की फिल्म के बारे में वह कहते हैं, ''बॉम्बे टॉकीज में दिबाकर बनर्जी की कहानी मुझे बहुत अच्छी लगी. यह इस साल की बेहतरीन कहानी है. मुझे इस कहानी का हर शॉट याद है. नवाजुद्दीन ने कमाल का काम किया है. गो गोवा गॉन मुझे बहुत अच्छी लगी. मैंने जॉम्बी कॉमेडीज देखी हैं. भारतीय दर्शकों के लिए यह एक नया अनुभव था. अन्य फिल्मों से मनोरंजन के साथ-साथ विक्रम सबक भी लेते रहते हैं. वह कहते हैं, ''पिक्चर देखने से पता चलता है कि उसमें क्या अच्छा और क्या बुरा था. क्या गलती उन्होंने की और मैं क्या गलती कर रहा हूं, तो मैं उसे सुधार सकता हूं. अंत में, कंविक्शन बहुत जरूरी है. इंडस्ट्री में लोग कहते हैं कि हमें यह चीज अच्छी नहीं लग रही, लेकिन दर्शकों को अच्छी लगेगी. मुझे फिल्ममेकिंग का यह गलत तरीका लगता है. 
                                                                          लूटेरा 
अपनी पहली फिल्म उड़ान में विक्रम ने मोहब्बत का जिक्र तक नहीं किया था और उनकी दूसरी पिक्चर लूटेरा प्यार में सराबोर है और यह प्यार 1950 के जमाने का है. पीरियड लव स्टोरी बनाने की वजह विक्रम बताते हैं, ''लूटेरा ओ हेनरी की एक शॉर्ट स्टोरी द लास्ट लीफ पर आधारित है. मुझे इस कहानी की मासूमियत ने आकर्षित किया. यह एक ट्रैजिक लव स्टोरी है, जो अंत में आपके चेहरे पर स्माइल छोड़ जाती है. मैंने अपनी सह-लेखक भवानी अय्यर के साथ मिलकर इसका मॉडर्न अडॉप्टेशन करने की कोशिश की थी, लेकिन मैंने महसूस किया कि मोबाइल व फेसबुक होने की वजह से कहानी में जो रोमांस और मासूमियत है, वह खो रही है. आज आप ब्रेकअप कर लो, तो फेसबुक के जरिए पता चलता रहता है कि सामने वाले की जिंदगी में क्या चल रहा है? फिर पीरियड में एक डायरेक्टर के तौर पर मुझे चैलेंज लगा. उस जमाने को लेकर काफी सालों से पिक्चर नहीं बनी है. द लास्ट लीफ चार पन्ने की कहानी है. उसे एक फिल्म के रूप में ढालने में आई मुश्किलों के बारे में विक्रम ने बताया, ''चार पन्ने की स्टोरी को डेढ़ सौ या एक सौ आठ पन्ने की स्क्रिप्ट बनाने में चैलेंज तो है. लेकिन उसमें एक आजादी भी है कि चार पन्ने को छोडक़र बाकी सब आप क्रिएट कर सकते हैं. जब आप किसी किताब को अडॉप्ट करते हैं, तब आप अटक जाते हैं कि नॉवेल से फलां सीन को कैसे निकालूं. वह बहुत मुश्किल होता है.
द लास्ट लीफ के बारे में विक्रम को उनके एक दोस्त ने 2002 में बताया था. उस वक्त विक्रम बॉम्बे टॉकीज नाम की एक फिल्म बनाने की कोशिश कर रहे थे. वह नहीं बनी, तो इस कहानी पर उन्होंने फिल्म बनाने का फैसला किया. 2005 में उन्होंने स्क्रिप्ट का काम भी समाप्त कर लिया. फिर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि लूटेरा की बजाए उन्होंने उड़ान को अपनी पहली फिल्म के तौर पर क्यों चुना? जवाब विक्रम देते हैं, ''क्योंकि उड़ान कम बजट में बन सकती थी. उस पर प्रेशर नहीं था. स्टार्स आम तौर पर फस्र्ट टाइम डायरेक्टर के साथ काम नहीं करते हैं. हालांकि उनको करना चाहिए, क्योंकि नया डायरेक्टर अपना पूरा पैशन फिल्म में डाल देता है. एक समय आया, जब उड़ान नहीं बन रही थी, तो मैं लुटेरा बनाने में जुट गया. और एक राज को वह उजागर करते हैं, ''2007 में लूटेरा मैं निखिल आडवाणी के साथ बना रहा था. रेकी भी हो चुकी थी. विद्या बालन और जॉन अब्राहम तब लीड में थे. सलाम-ए-इश्क के बाद हम इसे बनाने वाले थे. विद्या को स्क्रिप्ट बहुत पसंद आई थी. लेकिन कुछ कारण वश फिल्म नहीं बन सकी और उड़ान बन गई. विद्या और जॉन को अब फिल्म में कास्ट न करने के बारे में विक्रम कहते हैं, ''वो जमाना निकल गया. हमें यंगर कपल की जरूरत थी.
लूटेरा में रणवीर सिंह और सोनाक्षी सिन्हा की कास्टिंग का किस्सा दिलचस्प है. रणवीर से अपनी पहली भेंट का श्रेय विक्रम फिल्मफेयर को देते हैं. ''मैं रणवीर से फिल्मफेयर अवॉर्ड की प्री-पार्टी में मिला था. मैंने बैंड बाजा बारात देखी थी और रणवीर ने उड़ान. हम एक-दूसरे की तारीफ करते हुए गले मिले कि क्या पिक्चर बनाई है! रणवीर ने पूछा कि तेरे पास कोई स्क्रिप्ट है? मैंने कहा कि हां है. बातों-बातों में पता चला कि वो भी खार का लडक़ा है, सिंधी है और मैं भी सिंधी हूं, तो एक कनेक्शन बन गया. फिर हमने प्लान बनाया कि किसी दिन सिंधी कढ़ी खाएंगे. सिंधी कढ़ी से आरंभ हुआ वह सिलसिला लूटेरा पर आकर ठहरा. विक्रम ने जब रणवीर को लूटेरा की स्क्रिप्ट दी, तो उन्होंने हैरानी से पूछा, 'यार तू सच्ची में चाहता है कि मैं ये पिक्चर करूं? और फिर रणवीर गायब हो गए. विक्रम बताते हैं, ''पिछले साल सितंबर के अंत में अचानक एक दिन उसका फोन आया कि तुम वो पिक्चर बना रहे हो? मैंने कहा कि बनानी तो है. फिर एक हफ्ते बाद उसका फोन आया कि चलो, करते हैं. लूटेरा की कहानी में सर्दी का मौसम है. सितंबर में रणवीर के हां कहने के बाद विक्रम को दिसंबर तक शूटिंग आरंभ करनी थी. वरना एक साल उन्हें और इंतजार करना पड़ता. अब उनके समक्ष हीरोइन की समस्या थी. ''मेरी पहली और आखिरी पसंद सोनाक्षी थी. मैंने कहीं से उसका नंबर निकाला और मैसेज कर दिया. नैरेशन सुनने के तुरंत बाद उसने हां कह दी. हंसते हुए विक्रम बताते हैं.
                                                              बीवी इशिका के साथ 
उड़ान में विक्रम ने निजी जिंदगी के कई हिस्से-किस्से डाले थे. इस पर सहमति के साथ वह कहते हैं, ''उड़ान में मेरी काफी जिंदगी आ गई थी. मैं नासिक में बड़ा हुआ था. मुझे पता था कि इंडस्ट्रियल एरिया में लोग कैसे रहते हैं. मेरे फादर और उनके फादर के बीच के सीन थे उसमें. बाप बेटे को सिगरेट पीने को बोलता है, वह मेरे साथ हुआ था. लेकिन लूटेरा में मैंने दो-तीन चीजें अपनी जिंदगी से ली हैं. उन चीजों के बारे में विक्रम बताते हैं, ''पाखी का कैरेक्टर अस्थमैटिक है. मेरी बीवी इशिका को यह समस्या है, तो मुझे पता था कि अगर अस्थमा का अटैक आता है, तो इंजेक्शन देना पड़ता है. ट्रेलर से पता चलता है कि लूटेरा में गहरा रोमांस है. आंखों से आंखों का मिलना और पहली बार हाथ से हाथ से टकराना जैसे अनेक एहसास इसमें हैं. अनुमान लगाया जा सकता है कि विक्रम कितने रोमांटिक हैं. उन्होंने स्वयं लव मैरिज की है. इशिका से अपनी मोहब्बत की दास्तान का वह मुस्कुराते हुए खुलासा करते हैं, ''इशिका और मैं बारह साल की उम्र से एक-दूसरे को जानते हैं. हम दोनों जमनाबाई स्कूल में साथ पढ़ते थे. हमारे डिवीजन अलग थे, लेकिन हम क्लास में ऐसी जगह बैठते थे कि एक-दूसरे को देख सकते थे. सबसे खूबसूरत पल वही थे, जब हमने एक-दूसरे को पहली बार देखा था. पहली बार जब थिएटर में हाथ में हाथ पकडक़र पिक्चर देखी थी. मुझे नहीं लगता कि पुराने जमाने के प्यार और आज के प्यार में कोई चेंज आया है. रोमांस का अंदाज बिल्कुल नहीं बदला है. विक्रम हंसते हुए आगे कहते हैं, ''मैं बहुत रोमांटिक हूं. इशिका और मैं तेइस सालों से साथ हैं, लेकिन आज भी एक-दूसरे का हाथ नहीं छोड़ते. हमारे दोस्त कहते भी हैं कि यार अब तो छोड़ दिया करो एक-दूसरे को. हमारी शादी के दौरान एकदम फिल्मी प्रॉब्लम आई थी. इशिका के घर वालों का कहना था कि लडक़ा सिगरेट और दारु पीता है, पंजाबी फैमिली है.
उड़ान के बाद विक्रम से लोगों की उम्मीदें बहुत ज्यादा हैं. फिल्मफेयर की अब तक की सौ बेहतरीन फिल्मों की सूची में भी यह स्थान बनाने में कामयाब हुई है. यह बातें उन पर दबाव बनाती हैं या नहीं? जवाब में विक्रम कहते हैं, ''मैं अपने आप पर प्रेशर डालता रहता हूं. लोग कहते हैं कि लूटेरा क्यों? मैं कहता हूं कि अगर एक फिल्मकार के तौर पर विकास करना है, तो कुछ अलग करना पड़ेगा. मैं पूरी जिंदगी चार-पांच करोड़ की फिल्म नहीं बनाना चाहता. किसी कहानी को बनाने के लिए चालीस करोड़ रुपए चाहिए होते हैं. अगर आप कोशिश नहीं करेंगे, तो लोग आगे चलकर आपको फिल्म बनाने के लिए पैसे नहीं देंगे. लोगों का कहना है कि ये बिक गया है. ये इंडीपेंडेंट था, अब स्टार्स के साथ काम कर रहा है. मेरा मानना है कि लव स्टोरी स्टार्स के साथ देखने में ही मजा आता है.
विक्रम ने अनुराग कश्यप, विकास बहल और मधु मंटेना के साथ मिलकर फैंटम फिल्म निर्माण कंपनी की शुरूआत की है. लूटेरा इस बैनर की पहली फिल्म है. निर्माता बनने के फैसले के बाबत वह कहते हैं, ''हम नहीं चाहते थे कि स्टूडियो हमें बताए कि हमें क्या करना है, बल्कि हम स्टूडियो को बताएं कि हमें क्या करना है. अनुराग, विकास, मधु और मैं दोस्त हैं. हम साथ मिलकर कुछ करना चाहते थे. विकास का यूटीवी में काफी अनुभव हो गया था. उसे क्रेडिट मिलता नहीं है, लेकिन बर्फी! और पान सिंह तोमर उसी की अप्रूव की फिल्में हैं. अनुराग तो अनुराग है. मैं 1994 से संजय लीला भंसाली के साथ काम कर रहा था. हम सब अपने अनुभव का इस्तेमाल मिलकर करना चाहते थे, इसलिए फैंटम की शुरूआत की. और हम बालाजी (लूटेरा), दार (अगली), वायकॉम (क्वीन), धर्मा (हंसी तो फंसी) और फॉक्स (बॉम्बे वेलवेट) के साथ मिलकर काम कर रहे हैं.
विक्रम का मानना है कि सिनेमा में रिस्क लेने का यह सही समय है. आज स्टार्स एक्सपेरिमेंट के लिए तैयार हैं. रणबीर कपूर बर्फी!, तो रणवीर सिंह लूटेरा और इमरान खान वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई अगेन जैसी फिल्मेें कर रहे हैं. ''आज जिंदगी मिलेगी ना दोबारा, कहानी और बर्फी! सौ करोड़ का बिजनेस कर सकती हैं. स्टार अब हर तरह की पिक्चर कर रहे हैं. टाइम बहुत अच्छा चल रहा है. आप रिस्क लो तब भी एक फिल्म के हिट या फ्लॉप होने का चांस है और आप न लो रिस्क, तब भी उतना ही चांस है. कोई गारंटी नहीं है. इसलिए रिस्क लो. अगर पिक्चर नहीं चली तो कम से कम यह तो रहेगा कि हमने रिस्क लिया था. आजकल प्रोजेक्ट बनाते हैं लोग, मुझे बहुत गुस्सा आता है. फैंटम में हम लोग पिक्चर बना रहे हैं. गर्व के साथ विक्रम कहते हैं.

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