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Thursday, May 9, 2013

मटरु की बिजली का मंडोला-विनीत कुमार


चवन्नी के पाठकों के लिए विनीत कुमार का यह लेख… 

विशाल भारद्वाज की फिल्म मटरु की बिजली का मंडोला जगह-जगह ऊब और बहुत ही औसत दृश्यांकन के बावजूद बड़े फलक की फिल्म है. लेकिन फिल्म का विस्तार जिस बड़े फलक तक है, ऐसे में ऊब पैदा करनेवाले फ्रेम्स को पीवीआर जैसे थिएटर में बैठकर देखते रहने के बावजूद कोई चाहे तो अर्थशास्त्र या संस्कृति समीक्षा की कक्षाओं में बैठकर व्याख्यायन सुनने के एहसास के साथ बहुत ही सादे ढंग से गुजर सकता है. वैसे भी जहां हर सांस्कृतिक चिन्हों,मानवीय संवेदना और यहां तक कि सरोकार की जमीन को हद तक एक चमकीले उत्पाद में तब्दील किए जाने के बावजूद कुछ चिन्ह अपनी मूल अवस्था में ऊबाउ ही बने रह जाते हैं, इस स्थिति में फिल्म निर्देशक से अतिरिक्त अपेक्षा करने के बजाय हम इसे क्लासरुम के सांस्कृतिक पाठ मानकर ही उससे समझने-गुजरने की कोशिश करें तो इस ऊब में अटके रहने के बजाय बाकी के हिस्सों पर बात कर सकेंगे. ये फिल्म दर्शकों से बीच-बीच में इस मेंटल शिफ्टिंग मांग करती नजर आती है.
 एक तरह से देखें तो मटरु की बिजली का मंडोला के ऊब पैदा करनेवाले दृश्य विषय की उस आदिम अवस्था की ही प्रस्तुति है जो पॉलीथिन की तरह न तो घुलती है, न सड़ती है. मसलन गरीब,किसान,मजदूर की समस्या और पूंजीपतियों/शोषक के चरित्र को ही ले लीजिए. पूरे ढाई घंटे की फिल्म में उनकी समस्याओं को अलग-अलग तरीके से बताने-समझाने की विशाल कोशिश करते रहेंगे तो एक स्थिति तो ऐसी आएगी ही कि दर्शकदीर्घा से सवाल उठने लगे- इसमे नया क्या है, हिन्दुस्तान में आखिर कब ऐसा सुराज आया था जब किसानों को उसका बराबर का हक मिला था, मजदूरों के साथ न्याय होता रहा था जो कि अब नहीं हो रहा..लालबहादुर शास्त्री का जय जवान जय किसान सामाजिक प्रकिया का हिस्सा बनने पाता कि इससे पहले ही सामान्य ज्ञान की परीक्षाओं में वस्तुनिष्ठ सवाल के रुप में कैद हो गया कि ये नारा किसने दिया है ? फिर मुंशी प्रेमचंद रंगभूमि और गोदान में जिस समाज को रेखांकित कर रहा था, उनसे अलग और नया इस फिल्म में क्या है जिसकी क्रेडिट विशाल भारद्वाज को दी जानी चाहिए ? दूसरा कि ऊब की एक दूसरी वजह ये भी है कि माओवाद, उदारवादी अर्थव्यस्था,भूमि अधिग्रहण जैसे शब्द और मुद्दे मुख्यधारा मीडिया में आकर इस कदर घिस चुके हैं कि एकबारगी जब इनसे जुड़े दृश्य हमारे सामने आते हैं तो लगता है समाचार चैनलों की पुरानी फुटेज सिनेमा की शक्ल में दिखाने की कोशिश की जा रही है.
अगर इस फिल्म पर इस सिरे से ही बात करनी हो कि इसमें नया क्या है और पूर्ववर्ती फिल्मकारों और साहित्यकारों से अलग ऐसा क्या बात कर दी कि इसके लिए विशाल भारद्वाज को अलग से क्रेडिट दी जाए तो बेहतर है कि इस फिल्म को साहित्यिक रुपांतरण का हिस्सा मानकर इस पर मेहरबानी कर दी जाए और एक तरह से इसे बख्श दिया जाए. वैसे भी हिन्दी सिनेमा और साहित्यिक रचनाओं में तुलनात्मक अध्ययन और मिलान करने की जो पुरानी रिवायत रही है, इससे जुराबों के जोड़े खोजने-मिलाने के अतिरिक्त( इस फिल्म के संदर्भ में) कुछ नया न हो सकेगा और ऐसा करना बहुत आसान भी है. लेकिन इस फिल्म की क्रेडिट ही इस बात में है कि ये ऊब पैदा करने के खतरे तक जाने के बावजूद मुख्यधारा मीडिया द्वारा जो शब्द रोजमर्रा के धुंआधार पैकेज और स्पेशल स्टोरी में आकर घिस चुके हैं, उन घिसे हुए शब्दों और घटनाओं की पेंदी उलटकर नए अर्थ का प्रकाशन करती है, उनके उन संदर्भों से दर्शकों को अवगत कराती है जो कि अपने खो चुके अर्थों और चालू मौजूदा अर्थों के प्रतिलोम जान पड़ते हैं. यहीं पर आकर हम समझ पाते हैं कि फिल्म की फलक सिर्फ अधिकाधिक मुद्दों के शामिल किए जाने के कारण विस्तार नहीं पाता है बल्कि उसकी आधा से ज्यादा मेहनत घिस चुके शब्दों और घटनाओं की पेंदी उलटकर हमें उसके अर्थ और संदर्भ बताने में लग जाते हैं.
मसलन हममे में जिन दर्शकों ने भी माओवाद को लगातार समाचार चैनलों के जरिए जानने-समझने की कोशिश की है उसके लिए एक माओवादी और आतंकवादी में फर्क करना लगभग असंभव है. राष्ट्रीयता के प्रोजेक्ट में जिस तरह आतंकवाद एक भारी समस्या है, उस समस्या के साथ माओवाद को नत्थी करके देखना कम जरुरी नहीं है. यहां पर आकर मुख्यधारा दी गई ये समझ सरकार द्वारा प्रचारित समझ से अलग नहीं रह जाती बल्कि सरकार की समझ को मुख्यधारा मीडिया प्रोत्साहित करते ही जान पड़ते हैं. आप गौर करें तो इसे लेकर मुख्यधारा मीडिया में खबरों और उसकी प्रस्तुति के जो रुझान होते हैं , आपको शक होगा कि कहीं ये सरकार की प्रेस रिलीज का टीवीयांतरण भर तो नहीं कर देते ? मटरु की बिजली का मंडोला मजबूती से माओवाद और आतंकवाद के बीच की मुख्यधारा मीडिया द्वारा खत्म की जा रही विभाजन रेखा को बचाने का काम करती है. लेकिन ऐसा करते हुए वो उस छद्म मार्क्सवाद को कहीं से क्लीन चिट भी नहीं देती जो सामाजिक बदलवा और सत्ता परिवर्तन के विकल्प शक्तिभोग आटा जैसी कंपनियों के सहयोग और गठजोड़ में जाकर खोजती है. याद कीजिए मटरु की एक माओवादी होकर सामाजिक परिवर्तन की पूरी रणनीति और उसके निजी जिंदगी पर..तीन चीजें बहुत ही मजबूती से रेखांकित होती है- एक तो ये कि मंडोला में रहते हुए भी दिल्ली में बैठे तमाम रसूकदार( शक्तिभोग आटा बस एक प्रतीक भर है) से उसकी चिलम- बीड़ी जैसे संबंध है, दूसरा कि गांव के लोग सामूहिक स्तर पर गोबर बम से हमला करते हैं,जीतते हैं और फिर सामूहिक रुप से बारिश के बीच तैयार फसल,बोरी में बंद अनाज को गेवा बैठते हैं लेकिन इस सामूहिकता के बीच जिसका नायक स्वयं मटरु है, उबरने का उपाय कार्पोरेट में तलाशता है,व्यक्तिगत स्तर पर अपनी इस हार को विश्वविद्यालय में पढ़ाने के पेश के रुप में खोजता है और तीसरा कि मंडोला के हृदय परिवर्तन का इंतजार करता है और ऐसा होते ही उसकी बेटी बिजली के साथ बड़े आराम से जिंदगी बिताने के फैसले लेता है. इस बीच किसान आंदोलन का क्या हुआ, मटरु की एक हांक में हजारों की संख्या में जुटनेवाले किसानों का क्या हुआ, लाल कपड़े पर माओ के संदेश को उंची आवाज में पढ़कर सुनानेवाले किसान का क्या हुआ, सब अधूरे-बिखरे प्रोजेक्ट की तरह जहां का तहां रह गया. आप अगर असल जिंदगी में भी आसपास नजर दौड़ाएं तो दरअसल विशाल भारद्वाज माओवादियों/ मार्क्सवादियों की उस नब्ज पर हाथ रखते हैं जहां ये विचारधारा,सामाजिक परिवर्तन का ये औजार उनके लिए ऐसा करने के बजाय एक सुरक्षित करियर बनकर तब तक सक्रिय और जिंदा रहता है जब तक सामूहिकता के बीच व्यक्तिगत स्तर की जड़ें मजबूत नहीं हो जाती. व्यक्तिगत स्तर की ये जमीन मजबूत हुई नहीं कि सामाजिक परिवर्तन का आंदोलन एक अधूरे प्रोजेक्ट के रुप में आनेवाले कॉमरेड के भरोसे छोड़ दिए जाते हैं. ऐसे में फिल्म का शुक्रिया सिर्फ इस बात के लिए नहीं दिया जाना चाहिए कि वो माओवाद और मार्क्सवाद की को मुख्यधारा मीडिया की बनायी छवि की चपेट से दर्शकों को बाहर लाने की कोशिश करती है बल्कि इनसे संबद्ध लोगों की वैलिडिटी पीरियड की क्रांतिकारिता से बारीकी से अवगत कराती है. इसे विशाल भारद्वाज की मार्क्सवादी दलों के लेकर उथली,सतही या प्रारंभिक स्तर की समझ करार देते हैं तो यकीन मानिए इस समझ की आमलोगों को सख्त जरुरत है.
दूसरी बात कि देश में लोकतंत्र बहाल रहे इसके लिए न्यायपालिका,कार्यपालिका और विधायिका के साथ-साथ पहाड़े की शक्ल में चौथा खंभा मीडिया पढ़ दिया जाता है और ये समझ विकसित करने की कोशिश की जाती है कि इसका काम तीनों संवैधानिक शक्तियों के बीच संतुलन बनाना ही इस मीडिया का काम है, इस फिल्म में मीडिया चौथा खंभा या जनसंचार माध्यम के बजाय उस जोकर की शक्ल में आया है जिसका मूल धर्म दर्शकों को इंगेज रखना है. उसकी मौजूदगी ही समाज का सबसे बड़ा प्रहसन है. मंडोला के हैलीकॉप्टर क्रैश होने की घटना की कवरेज जब हम देख रहे होते हैं तो ये हमारे रोजमर्रा चौबीस गुना सात राष्ट्रीय चैनलों के देखे जाने की घटना से अलग नहीं लगता. कायदे से देखें तो यही वो प्रस्थान बिंदु है जहां से हम आर्थिक उदारीकरण,राष्ट्र हित,विकास,माओवाद,भूमि अधिग्रहण जैसे मुख्याधारा द्वार घिस दिए गए शब्दों के इस फिल्म के जरिए नए अर्थ संदर्भ में देख पाते हैं क्योंकि इस मीडिया की जोकर छवि से हम लगभग मुक्त हो रहे होते हैं और सिनेमा तब अपने तरीके से अर्थ विस्तार की ओर ले जाती है. हम इन शब्दों को समझने में मीडिया से डिक्टेट नहीं हो रहे होते हैं और तब समझ आता है कि समाचार चैनलों के प्राइम टाइम चारा की शक्ल में आनेवाले इन मुद्दों के बावजूद हम ये क्यों नहीं समझ पाते कि जो देश चलाने का काम कर रहे हैं  दरअसल वही कार्पोरेट, उद्योग, ठेकेदारी से लेकर रीयल इस्टेट का धंधा भी चलाने का काम कर रहे हैं. उनका दो-दो प्रोजेक्ट एक साथ अबाध गति से चलता रहता है ताकि सत्ता और उद्योग दोनों में से कोई एक प्रोजेक्ट फेल हो जाए तो एक-दूसरे की शह से उबर जाएं. आखिर मंडोला( पंकज कपूर) क्या चाहता है राजनीति से बड़ा उद्योग और चौधरी देवी( शबाना आजमी) क्या चाहती है सरकार चलाने के साथ-साथ उद्योग चलानेवाली कुर्सी. ये सिर्फ उद्योग चलानेवालों से कहीं आगे की चीज है जिसमे राजनीतिक आकांक्षाएं और संसाधनों पर कब्जे की भूख एक-दूसरे में इस तरह गड्डमड्ड हो जाती है कि आप इनका विभाजन राजनीतिशास्त्र और दूसरी तरफ पूंजी और बुर्जुआ वर्ग के चश्मे से इसे ठीक-ठीक विश्लेषित ही नहीं कर पाते. और इन दो प्रोजेक्ट के बीच जनता गेंद की तरह उछलायी जाती रहती है जिसके भीतर विकास के सपने भर दिए गए हैं. जाहिर है, सपनों की हवा भर दिए जाने से वो इतना वजन नहीं रख पाती कि लगातार इन पर दवाब बनाए रख सके. वैसे भी अभी तक जनता जब सिर्फ सत्ता से या सिर्फ पूंजीपतियों से अलग-अलग ही नहीं लड़ पायी है तो दोनों के एक हो जाने पर उसकी क्या हालत होगी, समझा जा सकता है. वो सिर्फ लूटनेवाले गाने के पंक्तियां याद रखने या पूंजीपति बाप की बेटी लेकिन सर्वहारा की शक्ल में दिखनेवाली बिजली और माओवादी लेकिन तमाम दुनियादारी और व्यक्तिगत इच्छाओं को सहेजे मटरु के लिए मंगलाचरण ही गाने लायक रह जाए,बहुत है. इस मायने में ये फिल्म सैद्धांतिक तौर पर सरकार के अंगों, कार्पोरेट,उद्योग और साथ में मीडिया के पृथक् रुप में देखे जाने की आदत को सुधारने की अपील करती है लेकिन कोई निष्कर्ष प्रस्तावित नहीं करती. अंत में निष्कर्षतः कहा जा सकता है जैसी समीक्षा की आदत से बाज न आनेवाले फिर भी इसमें निष्कर्ष निकालना चाहें तो बिडंबना ही इसका निष्कर्ष है जिसे कि विशाल ने जहां-तहां प्रहसन की शक्ल देकर रेखांकित करने की खूबसूरत कोशिश की है. खूबसूरत इस अर्थ में कि भैंस का काली से गुलाबी हो जाना सिर्फ प्रहसन भर नहीं है बल्कि उससे कहीं ज्यादा मजबूती से उसी बिडंबना को रेखांकित करना है जहां गुलाबी भैंस शराब का स्थानीय ब्रांड लगातार एक खास संदर्भ बनकर पूरी फिल्म में मौजूद रहता है. इसे हम छवि चरित्र के रुप में चाहें तो स्वतंत्र चरित्र मान सकते हैं. आखिर ये खूबसूरत बिडंबना नही तो और क्या है कि जिस शराब को जनहित में जारी विज्ञापन से लेकर सामाजिक मान्यताओं ने स्वास्थ्य और चरित्र का हवाला देकर सेवन की मनाही जैसे निर्देश देते आए हों, मंडोला पूरी फिल्म में तभी सबसे ज्यादा जेनुइन,संवेदनशील और मानवीय जान पड़ती है जब-जब वो इस गुलाबी भैंस के संदर्भ से जुड़कर आता है. तभी स्थानीय राजनीतिक से बड़े उद्यागपति,दैत्याकार फैक्ट्री और शॉपिंग मॉल के मालिक बनने के सपने के गुलाबी डोरे उसकी आंखों में तैरते हैं जब वो या तो इस शराब की बोतल के साथ होता है या फिर बोतल से जुड़ी स्मृतियों के साथ. यानी यहां विशाल भारद्वाज ने इस बोतल का इस्तेमाल शराब से कहीं आगे पोएटिक जस्टिस( काव्य निर्णय) के रुप में किया है जो कि अपने अभिधात्मक अर्थ को छोड़कर बहुत आगे निकल गयी है. ये बोतल पूरी फिल्म की पोएटिक जस्टिस है.
मटरु की बिजली का मंडोला के गानों की प्रोमो की शक्ल से अलग खासकर बिजली की कमर के उपरी हिस्से पर लिखी देखो मगर प्यार से के अलावे स्वतंत्र रुप से सुनें तो ये सिनेमा का सहारा लिए बिना भी अपनी एक कहानी रचती है. इन गानों के आधार पर आप उस कहानी तक पहुंच सकते हैं जिसे कि विशाल ने फिल्मायी है. मतलब ये कि फिल्म में बल्कि विशाल की बाकी फिल्मों की तरह ही गाने अपने भीतर कथा प्रस्तावित करने और उसका विस्तार देने का माद्दा रखती है. वो अपने उपर अतिरिक्त दायित्व लेकर चलती है जो कि कोई अजूबा न होकर माध्यम सैद्धांतिकी की उस बुनियादी समझ का इस्तेमाल भर है कि अगर सिनेमा हाइब्रिड विधा है जिसमे कि एक ही साथ अखबार,रेडियो,टेलीविजन और खुद सिनेमा शामिल है तो क्यों न उसका इस्तेमाल उस कथासूत्र की मजबूती में लगा दिए जाएं जिसके कि किसी एक माध्यम के चूक जाने पर उसके कमजोर पड़ जाने की गुंजाइश बन जाती है. आइटम गानों के अभ्यस्त कान इसे भले ही चमत्कार की तरह लें क्योंकि वहां गाने अचानक से आए मोबाईल रिचार्च ऑफर की तरह आते हों लेकिन गानों का इस तरह के प्रयोग सिनेमा को उस दौर की तरफ ले जाते हैं जहां गानों के बीच कहानी के रेशे इस तरह से गुंथे होते थे कि उससे गुजरते हुए उसकी कहानी से गुजरना जैसा रहा है.
लेकिन कहानी और गानों की इन बारीकियों के बीच ये फिल्म कुछ सवालों को गंभीरता से ले जाने के बजाय चमकीली बिंदु( स्पार्किंग प्वाइंट्स) भर बनाकर छोड़ जाती है. मसलन राजनैतिक विचारधारा के तहत काम करनेवाले मटरू और उसके प्रेम में उसके साथ काम करनेवाली बिजली की चैरिटी की प्रकृति एक है ? हम सामाजिक आंदोलन के इस अधूरे प्रोजेक्ट को किस रुप में समझें या फिर इसे एक नीयत पैटर्न मानकर छोड़ दें ? फिल्म में वामपंथ का आना विशाल भारद्वाज की डीयू और जेएनयू कैंपस की वामपंथी छात्र संगठनों के बीच रहकर बनी समझ का हिस्सा है जो उनके छोड़ देने के साथ ही आगे जाकर विकसित ही नहीं हुआ, ये एक तरह से वामपंथ के बजाय कैंपस वामपंथ का फिल्म संस्करण है. इसके साथ ही मटरु और बिजली का विदेश से पढ़ाई करके मंडोला जैसे गांव में अपनी प्रकृति और जीवन शैली से बिल्कुल उलट काम करना फैंटेसी भर है या फिर दिमागी तौर पर हारे हुए प्रवासी भारतीय की वापसी जिसके सपने विदेशों के एन्फ्रास्ट्रक्चर में जाकर उलझ जाते हैं और जो अपनी लाख कोशिशों के बावजूद अपनी चुनी गई विचारधारा का नहीं हो पाता. 

1 comment:

shobhit jaiswal said...

अदभुत लेख। बहुत बढिया। सिनेमा पर तत्‍याना षुर्लेई के आर्टिकल के बाद इतना सघन पढने को मिला। बतौर पाठक मैं विनीत कुमार जी को धन्‍यवाद देना चाहूंगा। साथ ही अजय सर को भी।
इतना कुछ लिखा गया है कि कहने को कुछ बाकी नहीं बचा है। निशब्‍द ।