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Sunday, May 5, 2013

पब्लिक सब जानती है : जॉन अब्राहम


-अजय ब्रह्मात्‍मज 
खान त्रयी और कपूर हीरो सरीखा स्टार कद रखते हैं जॉन अब्राहम। वे मार्केटिंग के स्टूडेंट रहे हैं और उसका बखूबी इस्तेमाल अपनी फिल्मों में कर रहे हैं। बतौर एक्टर तो उन्होंने खुद को स्थापित किया ही है, फिल्ममेकर के तौर पर भी वे एक विश्वसनीय ब्रांड बन चुके हैं।
-अजय ब्रह्मात्मज
इस फिल्म को लेकर आप को नहीं लगता कि आप थोड़े ज्यादा प्रो-मार्केटिंग हो गए हैं?
मैं यह बताना चाहता हूं कि पहले तो इन सारे प्रमोशन में मैं बिलीव नहीं करता। मैं इतना अग्रेसिव हूं या एक्साइटेड हूं, क्योंकि मुझे पता है कि यह फिल्म क्या है? फिल्म इतनी अच्छी बनी है कि मैं जरूरत से ज्यादा अग्रेसिव और एक्साइटेड हो गया हूं। अब उस एक्साइटमेंट में मैं लोगों को इस फिल्म के बारे में बताना चाहता हूं। यह चीज अब प्रमोशन में रुपांतरित हो रही है तो बहुत अच्छी बात है। नहीं हो रहा है तो कोई बात नहीं, क्योंकि मेरे हिसाब से अजय जी और यह फैक्ट है कि पब्लिक डिसीजन पहले ही बना लेती है फिल्म का प्रोमो देखकर। उसके बाद उन्हें फस्र्ट प्रोमो अच्छी लगी हो तो वे फिल्म देखने सिनेमाघर पहुंचते हैं। अगर आप मार्केटिंग और करें तो फिल्म उनके जहन में घूमती रहेगी, जो अच्छी बात है। लेकिन आप का फस्र्ट ट्रेलर जो है, वह ऑडिएंस के साथ क्लिक नहीं हुआ तो आप जितना भी मार्केटिंग करें, उसे बदलना बहुत मुश्किल होगा। मैंने इसे झेला है, पास्ट  में अपनी फिल्मों के साथ। जैसे ‘झूठा ही सही’। नाम ले रहा हूं मैं। ‘आई मी और मैं’, लोगों ने प्रोमो देखा। कहा, ठीक है। जॉन अब्राहम अलग लुक में है, लेकिन जॉन को उस रूप में नहीं देखना है। वहीं ‘रेस 2’, ‘शूटआउट एट वडाला’, ‘फोर्स’ जैसी फिल्मों और किरदारों में देखना पसंद करती है। लोग डिसाइड कर चुके हैं कि जॉन अब्राहम को कैसे देखना है? जाहिर तौर पर अगर ‘शूटआउट एट वडाला’ में लोग मुझे देखना चाहते हैं तो उन्हें फिल्म का ट्रेलर पसंद आना चाहिए और मुझे जो लोगों का फीडबैक मिला है, वह कमाल का है। मतलब पागलपन है। उसी पागलपन में मैं फिल्म की प्रमोशन कर रहा हूं। मैं कैंडी चॉकलेट स्टोर की तरह हूं। जैसे बच्चे किसी वैसे स्टोर में जाते हैं न तो उन्हें पता होता है कि उन्हें हर किस्म की चॉकलेट मिलने वाली है। तो इस कैंडी स्टोर में बच्चों यानी दर्शकों को हर तरह की चॉकलेट मिलने वाली है। अनिल कपूर, मनोज बाजपेयी, प्रियंका चोपड़ा, सनी लियोनी और तुषार कपूर। यह ऐपसल्यूट होलसम एंटरटेनमेंट फिल्म है। होलसम एंटरटेनमेंट की बात करें तो ‘विकी डोनर’ भी होलसम एंटरटेनमेंट फिल्म है। तीन मई को जब मैं विज्ञान भवन दिल्ली में इसके लिए नेशनल अवार्ड हासिल कर रहा हूंगा, ‘शूटआउट एट वडाला’ दुनियाभर में रिलीज हो रही होगी।
-आप की पब्लिक इमेज लार्जर दैन लाइफ वाली है, पर बतौर मेकर आप ‘विकी डोनर’, ‘मद्रास कैफे’ जैसी फिल्में बना रहे हैं। कैसे मैनेज करते हैं इसे?
बहुत अच्छा सवाल है। देखिए जब मैं न्यूकमर था, मुझे खुद की आवाज को सुनाने को मौका नहीं मिला। मेरी जो सेल्फ एक्सप्रेशन फिल्में पसंद हैं, उन्हें करने का मौका मुझे नहीं मिला। तो थोड़ी बहुत जो एक्सपेरिमेंटल फिल्में मुझे मिलीं तो मैंने झट से लपक लिया। चाहे ‘नो स्मोकिंग’, ‘काबुल एक्सप्रेस’, ‘वॉटर’। हालांकि इन्हें यहां तो अवार्ड नहीं मिले, पर ‘काबुल..’ टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट फिल्म करार दी गई। ‘वॉटर’ अकादमी अवार्ड के लिए गया। ‘नो स्मोकिंग’ रोम फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट फिल्म करार दी गई, लेकिन वे कमर्शियली सक्सेसफुल फिल्म नहीं थी। मैं उस वक्त उन फिल्मों का प्रोड्यूसर नहीं था। उस वक्त मैं उन फिल्मों का प्रोड्यूसर होता तो उन्हें समझाता कि फिल्म को उस तरह मार्केट करो। ‘नो स्मोकिंग’ कमर्शियल फिल्म नहीं है। उसे उस रूप में पेश मत करो। ऑडिएंस को बेवकूफ मत बनाओ। यानी मैं उसको ठीक तरीके से टाइम करता। फिर एक अर्से बाद शुजीत और मैं डिसकस कर रहे थे कि हमें एक फिल्म बनानी है। हम ‘जाफना’ जो अब ‘मद्रास कैफे’ है को डिसकस कर रहे थे। यह हमारा पेट प्रोजेक्ट है। अगर आप कोई ग्लोबल लेवल की फिल्म देखो ‘सिरियानो’, ‘आर्गो’ उस किस्म की यह पॉलिटिकल थ्रिलर है।
-कोई इंटरनेशनल पर्सपेक्टिव?
पूरी तरह से है। उसी दौरान जूही चतुर्वेदी, जो हमारी राइटर हैं, उन्होंने कहा कि हमारे पास एक आइडिया है स्पर्म डोनेशन का। मैंने आइडिया सुनते ही कहा, यह हमारी पहली फिल्म होगी। सब डर गए। सब ने मुझसे कहा, मत बनाओ, पर मैंने कहा, नहीं। आज का यूथ इसे पसंद करेगा। आप सही बनाएं। सही तरीके व नॉन ऑफेंसिव तरीके से बनाएं, बिल्कुल चलेगी और मैं शुजीत सरकार और जूही चतुर्वेदी को फिल्म की सफलता का क्रेडिट देना चाहूंगा। जूही चतुर्वेदी इस फिल्म की हीरो हैं। उसके बाद शुजीत और मैंने आयुष्मान को कास्ट किया। अन्नू जी और बाकी स्टार कास्ट को। और अभी आप देख रहे हैं अन्नू जी, डॉली अहलूवालिया सब जगह अवार्ड ले रहे हैं। आयुष्मान स्टैबलिश हो गया। मैं उससे इतना प्यार करता हूं कि पूछें मत। वह बहुत अच्छा लडक़ा है। उसके साथ अच्छा ही होना चाहिए।
-मान्या सुर्वे और ‘शूटआउट...’ के बारे में थोड़ा बताएं?
 फिल्म की कहानी कमाल की है। फिल्म बनने से पहले संजय गुप्ता मुझसे मिलने आए थे। वे एक दूसरी फिल्म के लिए मिलने आए थे। उस फिल्म का नाम था ‘खोटे सिक्के’। मैंने स्क्रिप्ट सुनी। मुझे बहुत अच्छा लगी। संजय ने उस पर दो साल काम किया था। मैं प्रभावित हुआ। उसी वक्त उनके हाथ में एक न्यूज आर्टिकल था। वे एक दूसरे सब्जेक्ट पर भी रिसर्च कर रहे थे। उस आर्टिकल में लिखा था मान्या सुर्वे ने बॉम्बे पुलिस को उनके घुटनों के बल गिराया। मैंने वह न्यूज आर्टिकल पढ़ा तो मैंने संजय से पूछा कि मान्या सुर्वे कौन है? बाद में पता चला कि मान्या एक आम मुंबईकर था, जो इंजीनियर बनना चाहता था। उसे पुलिस ने दफा 302 के इल्जाम में अंदर कर दिया। बाद में वह इल्जाम गलत साबित हुआ और वह जेल से छूट गया। जेल से निकलने के बाद उसके मन में पुलिस वालों के खिलाफ नफरत पैदा हो गई। उसकी जिंदगी का एक ही मकसद था पुलिस वालों से बदला। दूसरा मकसद था कि कास्कर बद्रर्स को कैसे खत्म करें? यह सब पढक़र मैं बहुत इंट्रीग हो गया। मेरे अंदर कौतूहल उत्पन्न हो गया। संजय की भी वही स्थिति थी। हम दोनों ने तय कर लिया था कि इसे बनाना है। अगर इस फिल्म का नाम ‘शूटआउट एट वडाला’ नहीं होती तो ‘लाइफ ऑफ मान्या सुर्वे’ होता, क्योंकि यह फिल्म मान्या सुर्वे की बायोपिक है। फिल्म डिसाइड करने के बाद मिलाप झावेरी आ गए, जो स्क्रिप्ट लिख रहे हैं, उन्होंने चार महीने लिए स्क्रिप्ट की पहली ड्राफ्ट लिखने में। लिखने के बाद उन्होंने मुझे वह ड्राफ्ट दिखाया। उसे पढक़र मैं इतना इंप्रेस्ड हो गया कि मन बना लिया कि अब तो यह फिल्म करनी ही करनी है। वहीं सबको ऑनपेपर ही बता दिया कि यह फिल्म सुपर-डुपर हिट है, लेकिन मान्या सुर्वे मैं कर पाऊंगा कि नहीं, उसको लेकर मैं संशय में था। मैंने संजय से कहा कि यार यह किरदार मैं कर पाऊंगा कि नहीं। इस पर उन्होंने कहा कि मान्या सुर्वे बॉम्बे श्री रहा चुका है। ऐसे में उसके खांचे में तुम ही फिट बैठोगे। मैं बहुत ही कॉन्फिडेंट हूं कि मैं उसे खींच के निकालूंगा। मुझे भी लगा कि यह बहुत बड़ा मौका है, इसे हाथ से नहीं जाने दूंगा, क्योंकि लोगों ने अब तक मुझे कॉमेडी और रोमांस करते हुए देखा है। कॉमेडी मेरा फेवरेट जॉनर है, पर मुझे एक्शन-कॉमेडी बहुत पसंद है।
-जोक्स सुनाना पसंद हैं?
जीं हां। बहुत ज्यादा पसंद हैं। वापस ‘शूटआउट...’ पर लौटना चाहूंगा। मैंने डिसाइड कर लिया कि मैं इस मौके को हाथ से नहीं जाने दूंगा। जी-जान लगा दूंगा। संजय दत्त के साथ ‘वास्तव’ की जो अवधारणा थी, वह पूरी तरह से बदल गई। तो मैंने कहा शायद यह मेरी लाइफ का ‘वास्तव’ है।

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