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Friday, May 3, 2013

फिल्‍म समीक्षा : बॉम्‍बे टाकीज

Movie review- Bombay talkies- अजय ब्रह्मात्‍मज 
भारतीय सिनेमा की सदी के मौके पर मुंबई के चार फिल्मकार एकत्रित हुए हैं। सभी हमउम्र नहीं हैं, लेकिन उन्हें 21वीं सदी के हिंदी सिनेमा का प्रतिनिधि कहा जा सकता है। फिल्म की निर्माता और वायकॉम 18 भविष्य में ऐसी चार-चार लघु फिल्मों की सीरिज बना सकते हैं। जब साधारण और घटिया फिल्मों की फ्रेंचाइजी चल सकती है तो 'बॉम्बे टाकीज' की क्यों नहीं? बहरहाल, यह इरादा और कोशिश ही काबिल-ए-तारीफ है। सिनेमा हमारी जिंदगी को सिर्फ छूता ही नहीं है, वह हमारी जिंदगी का हिस्सा हो जाता है। भारतीय संदर्भ में किसी अन्य कला माध्यम का यह प्रभाव नहीं दिखता। 'बॉम्बे टाकीज' करण जौहर, दिबाकर बनर्जी, जोया अख्तर और अनुराग कश्यप के सिनेमाई अनुभव की संयुक्त अभिव्यक्ति है। चारों फिल्मों में करण जौहर की फिल्म सिनेमा के संदर्भ से कटी हुई है। वह अस्मिता और करण जौहर को निर्देशकीय विस्तार देती रिश्ते की अद्भुत कहानी है।
करण जौहर - भारतीय समाज में समलैंगिकता पाठ, विमर्श और पहचान का विषय बनी हुई है। यह लघु फिल्म अविनाश के माध्यम से समलैंगिक अस्मिता को रेखांकित करने के साथ उसे समझने और उसके प्रति सहृदय होने की जरूरत महसूस कराती है। करण जौहर ने इसे संवेदनशील तरीके से चित्रित किया है। अपनी पिछली फिल्मों की तरह वे किसी और बहाने से समलैंगिकता की बात नहीं करते। यहां उनका फोकस स्पष्ट है। सिर्फ तीन किरदारों के जरिए वे अपनी बात कहने में सफल रहते हैं। अविनाश की भूमिका में साकिब सलीम का आत्मविश्वास प्रभावित करता है। उनके साथ अनुभवी और सधी अभिनेत्री रानी मुखर्जी हैं, फिर भी साकिब सलीम पर्दे पर नहीं डगमगाते। रणदीप हुडा ने देव की जटिल भूमिका को सहजता से पेश किया है।
दिबाकर बनर्जी - दिबाकर बनर्जी ने सत्यजित राय की एक कहानी को मराठी परिवेश में ढाल दिया है। उन्होंने पुरंदर के माध्यम से भारतीय नागरिक के सिनेमाई लगाव को बगैर लाग-लपेट के पेश किया है। नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने पुरंदर की चुनौतीपूर्ण भूमिका को अपनी योग्यता से आसान बना दिया है। इस लघु फिल्म के अधिकांश हिस्से में नवाजुद्दीन सिद्दिकी अपने बॉडी लैंग्वेज से भाव जाहिर करते हैं। उन्हें बोलते या समझाते हम नहीं देखते, फिर भी हम उनकी हर बात समझते हुए उनसे जुड़ जाते हैं। लंबे समय के बाद इस फिल्म में सदाशिव अमरापुरकर की उपस्थिति प्रशंसनीय है। सिनेमा से दर्शकों-नागरिकों के रिश्ते को यह फिल्म अनूठे तरीके से छूती है।
जोया अख्तर - इस फिल्म में जोया अख्तर ने विक्की के माध्यम से करण जौहर की फिल्म में चित्रित समलैंगिकता एवं अस्मिता की दुविधा को छोटी उम्र में दिखाने की कोशिश की है। जोया की फिल्म वास्तव में करण की फिल्म की प्रिक्वल लगती है। विक्की को उसके पिता फुटबॉल खेलने की हिदायत देते रहते हैं। वे चाहते हैं कि लड़का होने की वजह से वह स्पोटर््स में रुचि ले, लेकिन विक्की नर्तक बनना चाहता है। उसे अपनी बहन के कपड़े पहनना पसंद है। वह शीला बनने के सपने देखता है। उसे कट्रीना कैफ की कही बात अच्छी लग जाती है कि अपने सपने को जियो। फिल्म हस्तियां अपने बात-व्यवहार से हमारी जिंदगी की दिशा बदल देती है। जोया अख्तर की यह फिल्म एक तरफ लैंगिक अस्मिता के प्रश्न से जुझती है तो दूसरी ओर फिल्म सेलिब्रिटी के असर को भी दर्शाती है। जोया ने बहुत खूबसूरती से बालमन की दुविधा को दृश्यों में उतारा है।
अनुराग कश्यप - अमिताभ बच्चन के मिथक और असलियत के ताने-बाने से तैयार अनुराग कश्यप की फिल्म को उत्तर भारतीय दर्शक ज्यादा अच्छी तरह समझ सकता है। इलाके या प्रदेश के अभिनेताओं से दर्शकों का सीधा-सच्चा रिश्ता होता है। बात करें तो प्रशंसक अपने स्टारों के बारे में हर छोटी जानकारी रखते हैं, इसलिए मिलते वक्त वे स्टार से रिश्ते और जानकारी की वही गर्मजोशी चाहते हैं। इस फिल्म में अनुराग ने दिलीप कुमार के किस्से और अमिताभ बच्चन के प्रसंग से स्टार और प्रशंसक के रिश्ते की गर्माहट को पेश किया है। यहां शहद और मुरब्बा उस रिश्ते का प्रतीक है। इस फिल्म में विनीत कुमार सिंह ने इलाहाबाद के विजय के किरदार को बखूबी निभाया है। भाषा और भाव पर उनकी पकड़ उल्लेखनीय है। अमिताभ बच्चन की मौजूदगी फिल्म को नया आयाम दे देती है।
निर्माताओं का 'बॉम्बे टाकीज' प्रयास प्रशंसनीय है। इस फिल्म के दो फिल्मकार फिल्म इंडस्ट्री की पैदाइश हैं और दो बाहर से आए फिल्मकार हैं। विषय के चुनाव से लेकर उनकी प्रस्तुति तक से संबंधित फिल्मकारों की समझ और संवेदना जाहिर होती है। करण जौहर और जोया की फिल्म व्यक्ति केंद्रित होने के साथ लैं“िक अस्मिता के इर्द-गिर्द रहती है, जबकि दिबाकर बनर्जी और अनुराग कश्यप की लघु फिल्में व्यक्ति और सिनेमा के रिश्तों को समझने की कोशिश करती हैं।
हां, फिल्म के अंत का गीत और उसका फिल्मांकन 'बॉम्बे टाकीज' के स्वाद को बेमजा कर देता है। इस गीत में फूहड़ कल्पना का भद्दा चित्रांकन हुआ है। गीत के बोल भी सतही और साधारण हैं।
अवधि-120 मिनट
चार स्टार

2 comments:

राजीव तनेजा said...

बढ़िया समीक्षा

संगीता पुरी said...

जानकारी के लिए आभार !!