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Friday, October 26, 2012

यश चोपड़ा पर अमिताभ बच्‍च्‍न के भावभीने शब्‍द

44 वर्षों का साथ , जो कि 1968 में शुरू हुआ , 2012 में अचानक और समय से पहले समाप्त हो गया .
इन ४४ वर्षों में , कला के क्षेत्र में यश जी का जो योगदान रहा , देश विदेश में , जग जाहिर है . परन्तु मैंने उन्हें हमेशा एक घनिष्ठ मित्र और एक अद्भुत इंसान के रूप में पाया .
नाम और शोहरत के साथ साथ मित्रता और इन्सानियत को साथ लेकर , अपना जीवन व्यतीत करना , ये कोई सरल काम नहीं है .
लेकिन यश जी में ऐसे ही गुण थे .
मैंने उनके साथ इस लम्बे सफ़र में , बहुत कुछ सीखा और जाना . बहुत से सुखद और दुखद पल बिताये . काम के प्रति जो उनकी लगन , निष्ठा, और उत्साह था , उससे उन्होंने मुझे भिगोया - इसके लिए मैं सदा उनका आभारी रहूँगा .
इतने वर्ष उनकी संगत में रहकर , जो उनमें एक महत्वपूर्ण बात देखी, वो ये कि मैंने उन्हें कभी भी किसी के साथ अपना क्रोध व्यक्त करते नहीं देखा . कभी भी किसी के साथ ऊंचे स्वर में बात करते नहीं देखा . ऊंचा स्वर उनका था , लेकिन अपने काम के प्रति उल्ल्हास व्यक्त करने के लिए होता था , क्रोध नहीं . परिस्थिति चाहे कुछ भी रही हो , उनका स्वभाव हमेशा शांत रहा .
मिलनसार व्यक्ति थे वे .
जितना प्रेम वो अपनी फिल्मों को देते थे , उतना ही प्रेम वो उन्हें भी देते थे, जिनके साथ उनका संपर्क होता था .
प्रेम से उन्हें प्रेम था ...
दुःख की इन अँधेरी घड़ियों में हम उनके निकट परिवार के सभी सदस्यों को अपना शोक प्रकट करते हैं , और केवल इतना कहना चाहेंगे कि ... ' है अँधेरी रात पर दीया जलाना कब मना है '. ये पंक्तियाँ मेरे पूज्य पिताजी की लिखी एक कविता से हैं ... 'है अँधेरी रात पर दिवा जलाना कब मना है '
इसलिए ... भविष्य में , आने वाले दिनों में , आशा और उम्मीद के लाखों करोड़ों दीपों को प्रज्ज्वलित करने के लिए , प्रोत्साहन के रूप में , बाबूजी की ही लिखी पंक्तियों से अपनी बात समाप्त करना चाहूँगा ... कि .... जो बीत गयी सो बात गयी !!

" जो बीत गयी सो बात गयी
जीवन में एक सितारा था ,
माना वो बेहद प्यारा था ,
वो डूब गया तो डूब गया -
अम्बर के आंगन को देखो
कितने इसके तारे टूटे ,
कितने इसके प्यारे छूटे ..
जो छूट गए फिर कहाँ मिले ,
पर बोलो टूटे तारों पर , कब अम्बर शोक मनाता है ..
जो बीत गयी सो बात गयी - "

मुंबई का अपना फिल्म फेस्टिवल

-अजय ब्रह्मात्मज
देश में चल रहे छोटे-बड़े सभी तरह के फिल्म फेस्टिवल को मुंबई फिल्म फेस्टिवल से सीखने की जरूरत है। मुंबई एकेडमी ऑफ मूविंग इमेजेज(मामी) इसे आयोजित करता है। इस फेस्टिवल की खासियत है कि इसके आयोजकों में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की कुछ नामवर हस्तियां जुड़ी हुईं हैं। शुरुआत से इसके चेयरमैन श्याम बेनेगल हैं। उनके मार्गदर्शन में मुंबई फिल्म फेस्टिवल साल-दर-साल मजबूत और बेहतर होता गया है। अभी इसकी इंटरनेशनल पहचान और लोकप्रियता भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा आयोजित इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया से अधिक है। फिल्मों के चयन, उनके प्रदर्शन, ज्यूरी मेंबर और देश-विदेश के आमंत्रित फिल्मकारों की सूची मात्र ही देख लें तो मुंबई फिल्म फेस्टिवल की बढ़ती महत्ता समझ में आ जाती है।
    फिल्म फेस्टिवल किसी भी प्रकार आमदनी का आयोजन नहीं है। इसे सरकारी या गैर-सरकारी आर्थिक सहयोग से ही दक्षतापूर्वक आयोजित किया जा सकता है। मुंबई फिल्म फेस्टिवल को आरंभ से ही रिलायंस का सहयोग मिलता रहा है। एक-दो सालों के व्यवधानों के बावजूद महाराष्ट्र सरकार का समर्थन भी इसे हासिल है। इसके अतिरिक्त मुंबई में स्थित हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के नामचीन फिल्मकार, कलाकार और तकनीशियन इसमें सक्रिय भागीदारी रखते हैं। मुंबई में संघर्षरत और उदीयमान फिल्मकारों के लिए भी यह वार्षिक अड्डे के रूप में विकसित हो रहा है। पिछले दो-तीन सालों से यह देखने में आ रहा है कि देश के फिल्म चिंतक, अध्येता, छात्र और फिल्मकर्मी इन दिनों मुंबई रहने का प्रयास करते हैं। मुंबई फिल्म फेस्टिवल के आयोजक देश के मशहूर फिल्म समीक्षकों को स्वयं आमंत्रित करते हैं। इस वजह से फिल्म फेस्टिवल की प्रासंगिकता, उपयोगिता और महत्व की जानकारी पूरे देश को मिलती है।
    फिल्म फेस्टिवल का महत्व बढ़ाने में एक अहम भूमिका फिल्म और फिल्मकारों को दिए गए पुरस्कारों की होती है। इस लिहाज से भी मुंबई फिल्म फेस्टिवल उल्लेखनीय है, क्योंकि देश-विदेश के फिल्मकारों को पुरस्कार राशि के रूप में लाखों रुपए दिए जाते हैं। इस साल मुंबई फिल्म फेस्टिवल ने पुरस्कारों की श्रेणियां भी बढ़ा दी हैं। अब  देश के फिल्मकारों के लिए अलग से पुरस्कार की व्यवस्था की गई है। पहली फिल्म के निर्देशकों का इंटरनेशनल पुरस्कार भी इंटरनेशनल महत्व का हो गया है। इस साल विश्व के 18 नए फिल्मकार इस प्रतियोगिता में शामिल हो रहे हैं। इसके अतिरिक्त पुरस्कारों की दो और श्रेणियां हैं।
    इस साल फिल्म फेस्टिवल में दुनियाभर से 265फिल्में लाई गईं हैं। इन्हें इंटरनेशनल कंपीटिशन, सेलिब्रेट एज, सेलिब्रेशन ऑफ हंड्रेड ईयर्स ऑफ इंडियन सिनेमा, एबव द कट, सेलिब्रेशन ऑफ इंडियन सिनेमा, काबुल फ्रेश, वल्र्ड सिनेमा, इंडिया गोल्ड 2012, द रीयल रील, पूसान सेलेक्शन, न्यू फेशेज, रीस्टोर्ड सिनेमा के अंतर्गत दिखाया जा रहा है। फिल्मप्रेमियों के लिए सैकड़ों विकल्प हैं। सात दिनों में 265 फिल्मों का यह महोत्सव देश में अपने प्रकार का अनूठा और महत्वपूर्ण आयोजन है।
    14 सालों के बावजूद आयोजन की कुछ खामियां फिल्मप्रेमियों को निराश और उदास करती हैं। फिर भी सात दिनों तक उनका उत्साह देखते ही बनता है। इस साल से मुंबई फिल्म फेस्टिवल शहर के दक्षिणी संपन्न इलाके में होने लगा है। इससे सीटों की संख्या और सहूलियतें बढ़ गईं हैं। साथ ही विदेश से आए मेहमानों को मुंबई के भव्य, साफ-सुथरे और महानगरीय चरित्र की झलक भी मिल जाती है। रिलायंस और महाराष्ट्र सरकार के सहयोग से आयोजित देश का स्वतंत्र फिल्म फेस्टिवल भविष्य में और भी सार्थक भूमिका अदा करेगा। फिलहाल इस फेस्टिवल की मुख्य भाषा अंग्रेजी है। अगर यहां हिंदी और मराठी को थोड़ी जगह और प्रतिष्ठा मिले तो इसका दायरा और महत्व और ज्यादा बढ़ जाएगा। अपने वर्तमान स्वरूप में ही यह सभी फिल्मप्रेमियों की डायरी में स्थान पाने योग्य हो गया है। अगर इस साल आप नहीं आ सके हैं। कोशिश करें कि अगले साल फिल्मों के महोत्सव से आप वंचित न  रहें।

Thursday, October 25, 2012

फिल्‍म रिव्‍यू : चक्रव्‍यूह

Really hit the character Chakravyuh-अजय ब्रह्मात्मज
 पैरेलल सिनेमा से उभरे फिल्मकारों में कुछ चूक गए और कुछ छूट गए। अभी तक सक्रिय चंद फिल्मकारों में एक प्रकाश झा हैं। अपनी दूसरी पारी शुरू करते समय 'बंदिश' और 'मृत्युदंड' से उन्हें ऐसे सबक मिले कि उन्होंने राह बदल ली। सामाजिकता, यथार्थ और मुद्दों से उन्होंने मुंह नहीं मोड़ा। उन्होंने शैली और नैरेटिव में बदलाव किया। अपनी कहानी के लिए उन्होंने लोकप्रिय स्टारों को चुना। अजय देवगन के साथ 'गंगाजल' और 'अपहरण' बनाने तक वे गंभीर समीक्षकों के प्रिय बने रहे, क्योंकि अजय देवगन कथित लोकप्रिय स्टार नहीं थे। फिर आई 'राजनीति.' इसमें रणबीर कपूर, अर्जुन रामपाल और कट्रीना कैफ के शामिल होते ही उनके प्रति नजरिया बदला। 'आरक्षण' ने बदले नजरिए को और मजबूत किया। स्वयं प्रकाश झा भी पैरेलल सिनेमा और उसके कथ्य पर बातें करने में अधिक रुचि नहीं लेते। अब आई है 'चक्रव्यूह'।
'चक्रव्यूह' में देश में तेजी से बढ़ रहे अदम्य राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन नक्सलवाद पृष्ठभूमि में है। इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में कुछ किरदार रचे गए हैं। उन किरदारों को पर्दे पर अर्जुन रामपाल, मनोज बाजपेयी, अभय देओल, ईशा गुप्ता, अंजलि पाटिल और ओम पुरी ने निभाया है। किरदारों के दो समूह हैं। नक्सल किरदारों में राजन [मनोज बाजपेयी], गोविंद सूर्यवंशी [ओम पुरी] और जूही [अंजलि पाटिल] हैं। दूसरी तरफ आदिल खान [अर्जुन रामपाल] और रिया मेनन [ईशा गुप्ता] हैं। इन दोनों के बीच कबीर उर्फ आजाद [अभय देओल] हैं। 'चक्रव्यूह' को देखने और समझने की एक कुंजी अभय देओल हैं। उन्हें आदिल खान अपने एजेंट के तौर पर नक्सलों के बीच भेजते हैं। शुरू में कबीर उनकी मदद भी करते हैं, लेकिन नक्सलों के साथ दिन-रात बिताने के बाद उन्हें एहसास होता है कि सत्ता के घिनौने स्वार्थ हैं। उसके हाथ निर्दोषों के खून से रंगे हैं। आदिवासियों पर सचमुच अत्याचार और जुल्म हो रहे हैं। 'महानता' कंपनी स्थापित करने के पीछ सिर्फ विकास का ध्येय नहीं है। कबीर पाला पलटता है और इसके बाद 'चक्रव्यूह' रोमांचक हो जाती है। हिंदी फिल्मों के दो दोस्तों की कहानी। पॉपुलर सिनेमा में अंतर्निहित मनोरंजन का दबाव गंभीर और वैचारिक विषयों में भी विमर्श की गुंजाइश नहीं देता। किरदारों की मुठभेड़ और घटनाओं में विषय का रूपांतरण हो जाता है। मुद्दा कहीं पीछे छूट जाता है और फिल्म कुछ व्यक्तियों इंडिविजुल की कहानी होकर आम हो जाती है। मुमकिन है कि अधिकांश दर्शकों तक पहुंचने का यह आसान तरीका हो, लेकिन जब मुद्दा ही किसी फिल्मी हीरोइन की तरह असहाय हो जाए तो हम मुठभेड़ में भिड़े किरदारों से परिचालित होने लगते हैं। जब चरित्र और पटकथा का निर्वाह घिसे-पिटे फॉर्मूले में घुसता है तो हमें दशकों से चले आ रहे 'आस्तिन का सांप' और 'क्या पता था कि जिसे दूध पिलाया, वही सांप मुझे डंसेगा'..जैसे संवाद सुनाई पड़ते हैं। ऐसा लगने लगता है कि कथ्य कहीं पीछे छूट गया और मनोरंजन हावी हो गया।
यह समय का दबाव हो सकता है। समर्पित और प्रतिबद्ध फिल्मकार से उम्मीद रहती है कि वह ऐसे दबावों के बीच ही कोई नई राह या शैली विकसित करेगा। प्रकाश झा नई राह और शैली की खोज में दिखाई पड़ते हैं। यह कहना उचित नहीं होगा कि उन्होंने कमर्शियल सिनेमा के आगे घुटने टेक दिए हैं। उन्होंने फार्मूले का इस्तेमाल अपनी तरह की फिल्मों के लिए किया है। इस कोशिश में उन्होंने सिनेमा की नई भाषा रची है। उनकी फिल्में इंगेज करती हैं कि हमारे समय की किसी मुद्दे से रू-ब-रू कराती हैं। सिनेमा के आज के लोकप्रिय दौर में यह कोशिश भी उल्लेखनीय है।
मनोज बाजपेयी एक बार फिर साबित करते हैं कि वे समकालीन अभिनेताओं में सबसे उम्दा और योग्य हैं। सघन चरित्र मिलें तो वे उनकी प्रतिभा खिल उठती है। अभय देओल को मिली भूमिका को लेखक और निर्देशक का पूरा सपोर्ट है, लेकिन इस बार वे चूकते नजर आते हैं। ऐसा लगता है कि इतनी बड़ी जिम्मेदारी के लिए वे सक्षम नहीं हैं। अर्जुन रामपाल सामान्य है। ईशा गुप्ता आरंभिक लड़खड़ाहट के बाद संभल जाती हैं। कामकाजी और और गृहिणी की दोहरी सोच से बने अपने किरदार के साथ उन्होंने न्याय किया है। फिल्म में अंजलि पाटिल चकित करती हैं। उनमें इंटेनसिटी और एक्सप्रेशन है। जूही के किरदार को वह विश्वसनीय बनाती हैं। प्रकाश झा की फिल्मों में सहयोगी कलाकारों की भूमिका भी उल्लेखनीय होती है। मुकेश तिवारी, चेतन पंडित, मुरली शर्मा, दयाराम पांडे आदि ने सशक्त सहयोग किया है।
प्रकाश झा की 'चक्रव्यूह' बेहतरीन फिल्म है। समकालीन समाज के कठोर सच को सच्चाई के साथ पेश करती है। साथ ही सावधान भी करती है कि अगर समय रहते निदान नहीं खोजा गया तो देश के 200 जिलों में फैला नक्सलवाद भविष्य में पूरे देश को अपनी चपेट में ले लेगा। राजनीतिक भटकाव के शिकार नहीं हैं नक्सली.. दरअसल, असमान विकास में पीछे छूट गए देशवासियों की जमात और आवाज हैं नक्सल, जो हक की लड़ाई लड़ रहे हैं।
**** [चार स्टार]

Saturday, October 20, 2012

फिल्‍म समीक्षा : स्टूडेंट ऑफ द ईयर

Review: Student Of The Year-अजय ब्रह्मात्मज
देहरादून में एक स्कूल है-सेंट टेरेसा। उस स्कूल में टाटा(अमीर) और बाटा(मध्यवर्गीय) के बच्चे पढ़ते हैं। उनके बीच फर्क रहता है। दोनों समूहों के बच्चे आपस में मेलजोल नहीं रखते। इस स्कूल के डीन हैं योगेन्द्र वशिष्ठ(ऋषि कपूर)। वे अपने ऑफिस के दराज में रखी मैगजीन पर छपी जॉन अब्राहम की तस्वीर पर समलैंगिक भाव से हाथ फिराते हैं और कोच को देख कर उनक मन में ‘कोच कोच होने लगता है’। करण जौहर की फिल्मों में समलैंगिक किरदारों का चित्रण आम बात हो गई है। कोशिश रहती है कि ऐसे किरदारों को सामाजिक प्रतिष्ठा और पहचान भी मिले। बहरहाल, कहानी बच्चों की है। ये बच्चे भी समलैंगिक मजाक करते हैं। इस स्कूल के लंबे-चौड़े भव्य प्रांगण और आलीशान इमारत को देखकर देश के अनगिनत बच्चों को खुद पर झेंप और शर्म हो सकती है। अब क्या करें? करण जौहर को ऐसी भव्यता पसंद है तो है। उनकी इस फिल्म के लोकेशन और कॉस्ट्युम की महंगी भव्यता आतंकित करती है। कहने को तो फिल्म में टाटा और बाटा के फर्क की बात की जाती है, लेकिन मनीष मल्होत्रा ने टाटा-बाटा के प्रतिनिधि किरदारों को कॉस्ट्युम देने में भेद नहीं रखा है। रोहन और अभिमन्यु के वार्डरोब में एक से कपड़े हैं। फिल्म की नायिका सनाया तो मानो दुनिया के सभी मशहूर ब्रांड की मॉडल है। इस स्कूल में एक पढ़ाई भर नहीं होती,बाकी खेल-कूद,नाच-गाना,लब-शव चलता रहता है। आप गलती से भी भारतभूमि में ऐसे लोकेशन और कैरेक्टर की खोज न करने लगें। स्वागत करें कि करण जौहर विदेश से देश तो आए। भविष्य में वे छोटे शहरों और देहातों में भी पहुंचेगे।
    इस फिल्म की खूबी और कमी पर बात करने से बेहतर है कि हम तीन नए चेहरों की चर्चा करें। करण जौहर ने पहली बार अपनी फिल्म के मुख्य किरदारों में नए चेहरों को मौका देने का साहस दिखाया है। भविष्य में कैरेक्टर और कंटेंट भी देश्ी हो सकते हैं। उनके तीनों चुनाव बेहतर हैं। परफारमेंस के लिहाज से सिद्धार्थ मल्होत्रा बीस ठहरते हैं। फिल्म के लेखक और कहानी का सपोर्ट अभिमन्यु को मिला है, लेकिन उस किरदार में वरुण धवन मेहनत करते दिखते हैं। मुठभेड़, दोस्ती और मौजमस्ती के दृश्यों में सिद्धार्थ और वरुण अच्छे लगते हैं। मनीष मल्होत्रा और सिराज सिद्दिकी ने उन्हें आकर्षक कॉस्ट्युम दिए हैं। फिल्म तो इन दोनों के लिए ही बनाई गई लगती है। इस फिल्म से फैशन का नया ट्रेंड चल सकता है। पहली फिल्म और रोल के हिसाब से आलिया भट्ट निराश नहीं करतीं, लेकिन उनका परफारमेंस साधारण है। आती-जाती और इठलाती हुई वह सुंदर एवं आकर्षक लगती हैं। गानों में भी उन्होंने सही स्टेप्स लिए हैं, लेकिन भावपूर्ण और नाटकीय दृश्यों में उनका कच्चापन जाहिर हो जाता है। फिल्म के सहयोगी कलाकारों का चुनाव उल्लेखनीय है। उन सभी की मदद से फिल्म रोचक बनती है। ऋषि कपूर और रोनित रॉय अपने किरदारों में फिट हैं।
    इस फिल्म के तीनों किरदारों की एंट्री को करण जौहर ने विशेष तरीके से शूट किया है। पुरानी हिंदी फिल्मों के मुखड़े लेकर नए भाव जोड़े गए हैं और उनकी पर्सनैलिटी जाहिर की गई है। फिल्म के गानों में मौलिकता नहीं है। अन्विता दत्त गुप्तन ने पुराने गीतों के मुखड़े लेकर नए शब्दों से अंतरे बनाए हैं। संगीत में भी यही प्रयोग किया गया है। करण जौहर की इस फिल्म में उनकी पुरानी सपनीली मौलिकता भी लुप्त हो गई है। देश के धुरंधर युवा फिल्मकार की कल्पनाशीलता पर कोफ्त होने से भी क्या होगा? इस फिल्म की पैकेजिंग दर्शकों को थिएटर में ला सकती है।
    एक ही अच्छी बात हुई है कि ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ ने कुछ नई और युवा प्रतिभाओं को बड़े पर्दे पर अपना हुनर दिखाने का मौका दिया है। सचमुच हमें हिंदी फिल्मों में नए चेहरों की तलाश है। भले ही वे फिल्मी परिवारों से क्यों न हों?
निर्देशक-करण जौहर, कलाकार- सिद्धार्थ मल्होत्रा, आलिया भट्ट, वरुण धवन, सगीत-विशाल-शेखर, गीत- अन्विता दत्‍त गुप्‍तन,संवाद-निरंजन आयंगार
**१/२ ढाई स्टार
अवधि-146 मिनट

Friday, October 19, 2012

फिल्‍म समीक्षा : डेल्‍ही सफारी

Review: Delhi Safari-अजय ब्रह्मात्‍मज
सबसे पहले निखिल आडवाणी को इस साहस के लिए बधाई कि उन्होंने एनीमेशन फिल्म को धार्मिक, पौराणिक और मिथकीय कहानियों से बाहर निकाला। ज्यादातर एनीमेशन फिल्मों के किरदार आम जिंदगी से नहीं होते। 'डेल्ही सफारी' में भी आज के इंसान नहीं हैं। निखिल ने जानवरों को किरदार के रूप में चुना है। उनके माध्यम से उन्होंने विकास की अमानवीय कहानी पर उंगली उठाई है।
मुंबई के सजय गाधी नेशनल पार्क में युवराज पिता सुल्तान और मा के साथ रहता है। जंगल के बाकी जानवर भी आजादी से विचरते हैं। समस्या तब खड़ी होती है, जब एक बिल्डर विकास के नाम पर जंगलों की कटाई आरंभ करता है। बुलडोजर की घरघराहट से जंगल गूंज उठता है। सुल्तान बिल्डर के कारकुनों के हत्थे चढ़ जाता है और मारा जाता है। पिता की मौत से आहत युवराज देश के प्रधानमत्री तक जंगल की आवाज पहुंचाना चाहता है। इसके बाद डेल्ही सफारी शुरू होती है। युवराज और उसकी मा के साथ बग्गा भालू, बजरंगी बदर और एलेक्स तोता समेत कुछ जानवर दिल्ली के लिए निकलते हैं। दिल्ली की रोमाचक यात्रा में बाधाएं आती हैं। सारे जानवर प्रवक्ता के तौर पर एलेक्स तोता को ले जा रहे हैं, क्योंकि वह मनुष्यों की भाषा समझता और बोल सकता है।
निखिल आडवाणी ने सभी जानवरों की आवाजों के लिए अनुभवी कलाकारों को एकत्रित किया है। उनकी वजह से फिल्म का प्रभाव बढ़ जाता है। युवराज की मा के किरदार को उर्मिला मातोडकर और बजरंगी को गोविदा की आवाज मिली है। दोनों ने किरदार के मनोभावों का ख्याल रखा है। बग्गा के लिए बमन ईरानी की आवाज सटीक है। अन्य जानवरों को सौरभ शुक्ला, सुनील शेट्टी, स्वीनी खरा, दीपक डोबरियाल और सजय मिश्र की आवाजें मिली हैं।
एनीमेशन के लिहाज से निखिल आडवाणी की टीम ने सुंदर और प्रभावपूर्ण काम किया है। जानवरों के एक्सप्रेशन और उनके सवादों में तालमेल है। सवाद कथ्य के अनुकूल हैं। निश्चित ही निखिल आडवाणी और गिरीश धमीजा का प्रयास प्रशसनीय है। एक ही बात खटकती है.. जानवरों का नाचना और गाना। मान-मनौव्वल करते हुए सुल्तान का गाना किसी फिल्मी हीरो और साग सिचुएशन की याद दिलाता है। इस एक खोट के अलावा 'डेल्ही सफारी' उल्लेखनीय एनीमेशन फिल्म है।
निर्देशक-निखिल आडवाणी, निर्माता-क्रेयान पिक्चर्स, लेखक- सुरेश नायर और गिरीश धमीजा, सगीत-शकर एहसॉन लाय, गीत- समीर, अवधि-96 मिनट
***1/2

Thursday, October 18, 2012

मटरू की बिजली का मन्डोला का नामकरण

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
विशाल भारद्वाज ने मकड़ी,मकबूल और ओमकारा के बाद पहली बार सात खून माफ में तीन शब्दों का टायटल चुना था। इस बार उनकी फिल्म के टायटल में पांच शब्द हैं-मटरू की बिजली का मन्डोला। फिल्म के नाम की पहली घोषणा के बाद से ही इस फिल्म के टाश्टल को लेकर कानाफूसी चालू हो गई थी। एक तो यह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अंगेजीदां सदस्यों के लिए टंग ट्विस्टर थ और दूसरे इसका मानी नहीं समझ में आ रहा था। बहुत समय तक कुछ लोग मटरू को मातृ और मन्डोला को मन डोला पढ़ते रहे। विशाल भारद्वाज ने इस फिल्म के टायटल की वजह बताने के पहले एक किस्सा सुनाया। जावेद अख्तर को यह टायटल पसंद नहीं आया था। उनहोंने विशाल से कहा भी कि यह कोई नाम हुआ। उनकी आपत्ति पर गौर करते हुए विशाल ने फिल्म का नाम खामखां कर दिया। वे अभी नए टायटल की घोषणा करते इसके पहले ही विशाल के पास जावेद साहब का फोन आया- आप ने खामखां नाम जाहिर तो नहीं किया है। मुझे पहला टायटल ही अच्छा लग रहा है। किसी मंत्र का असर है उसमें। आप तो मटरू की बिजली का मन्डोला टायटल ही रखो। इस फिल्म के गीत के लिए जब विशाल अपने गुरू और गॉडफादर गुलजार से मिले तो वे भी चौंके,लेकिन शब्दों के कारीगर को यह टायटल बहुत पसंद आया। उन्होंने तुरंत जोड़ा-पहले मैं बोला,फिर वो बोला,मटरू की बिजली का मन्डोला। अभी यह गीत बन गया है। विशाल ने बताया कि उन्होंने हरियाण में एक दुकान पर मटरू नाम देख था और बिजली शब्द तो उन्हें इतना प्रिय है कि उन्हें बेटी होती तो वे उसका नाम बिजली हीे रखते। हरियाणा में  मन्डोला नाम का एक गांव है। इस तरह विशाल की अगली फिल्म का नाम मटरू की बिजली का मन्डोला पड़ा। और एक खास बात विशाल ने पोस्टर पर केवल नागरी लिपि में यानी हिंदी में फिल्म का नाम डाला है। इस फिल्म में मटरू इमरान खान है और बिजली अनुष्का शर्मा। 

Sunday, October 7, 2012

70 वें जन्मदिन पर अमिताभ बच्चन से अजय ब्रह्मात्मज की बातचीत

-अमिताभ बच्चन का जीवन देश का आदर्श बना हुआ है। पिछले कुछ समय से फादर फिगर का सम्मान आप को मिल रहा है। पोती आराध्या के आने के बाद तो देश के बच्चे आप को अपने परिवार का दादा ही मानने लगे हैं।

0 यह देश के लोगों की उदारता है। उनका प्रेम और स्नेह है। मैंने कभी किसी उपाधि, संबोधन आदि के लिए कोई काम नहीं किया। मैं नहीं चाहता कि लोग किसी खास दिशा या दृष्टिकोण से मुझे देखें। इस तरह से न तो मैंने कभी सोचा और न कभी काम किया। जैसा कि आप कह रहे हैं अगर देश की जनता ऐसा सोचती है या कुछ लोग ऐसा सोचते हैं तो बड़ी विनम्रता से मैं इसे स्वीकार करता हूं।

- लोग कहते हैं कि  आप का वर्तमान अतीत के  फैसलों का परिणाम होता है। आप अपनी जीवन यात्रा और वर्तमान को किस रूप में देखते हैं? निश्चित ही आपने भी कुछ कठोर फैसले लिए होंगे?

0 जीवन में बिना संघर्ष किए कुछ भी हासिल नहीं होता। जीवन में कई बार कठोर और सुखद प्रश्न सामने आते हैं और उसी के अनुसार फैसले लेने पड़ते हैं। जीवन हमेशा सुखद तो होता नहीं है। हम सभी के जीवन में कई पल ऐसे आते हैं, जब कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं। यह उतार-चढ़ाव जीवन में लगा रहता है। मैंने कभी उस ओर कभी ध्यान नहीं दिया। अपने फैसलों के बारे में ज्यादा नहीं सोचा।  पिताजी ने कहा है, जो बीत गई, वह बात गई। और फिर आगे बढ़ें। केवल इतना मुझे ज्ञात है कि जो भी मेरे साथ हुआ वह दुखद रहा हो या सुखद रहा हो, उससे मैंने क्या सीखा। यदि मैं उन संकट के क्षणों से निकल पाया तो यह अवश्य समझने की कोशिश की कि क्यों संकट के वे क्षण मेरे जीवन में आए? उन पर सोच-विचार करने पर ऐसा लगा कि मैंने कुछ सीखा ही। अगर आप मुझसे पूछें कि क्या अपना जीवन दोबारा ऐसे ही जीना चाहेंगे या उसमें परिवर्तन लाना चाहेंगे तो मेरा जवाब होगा, मैं उसे वैसे के वैसे ही जीना चाहूंगा।

- गलतियों, भूलों और संकटों के बावजूद...

0 अगर वे गलतियां नहीं होतीं तो हम कुछ सीखते नहीं। और संभव है कि बाद में मुसीबत ज्यादा बड़ी हो जाती। हम उन गलतियों से जो सीख पाए, वह नहीं हो पाता।

- कुछ लोग कहते हैं  कि स्थितियां ही मनुष्य को बनाती हैं। मुझे लगता है स्थितियां केवल मनुष्य को उद्घाटित करती हैं। कोई जन्मजात वैसा ही नहीं होता, जैसा वह आज है। अमिताभ बच्चन नित नए रूप में उद्घाटित हो रहे हैं?

0 इस दिशा में मैंने कुछ सोचा नहीं। यह तो आप जैसे लोग हैं, जो सोचते और मानते हैं कि एक नया रूप आ रहा है। मैं तो अपने आप को वैसा ही समझता हूं। मैंने अपने आप में न तो कोई परिवर्तन देखा है और न कभी इसकी कोशिश की है।

- दरअसल हम आपसे ही  जानने की कोशिश कर रहे  हैं?

0 जैसे ही मैं उसका वर्णन करना शुरू कर दूंगा तो ऐसा लगेगा कि मैं अपनी ही तारीफ के पुल बांध रहा हूं। देखना, सोचना, समझना और बताना यह आप लोगों का काम है। अगर आप को लगता है कि मुझ में कुछ ऐसी बातें हैं, जिनके बारे में लिखा जाना चाहिए तो लिखें। अपना परिचय या वर्णन मैं अपने आप नहीं कर पाऊंगा। जब भी इस तरह के सवाल आते हैं और मुझ से पीछे पलटकर देखने के लिए कहा जाता है तो मुझे लगने लगता है कि मैं अपनी आत्मकथा लिख रहा हूं। मैं नहीं समझता कि मैं आत्मकथा लिखने के योग्य हूं या मेरे अपने जीवन में ऐसा कुछ है, जो लिखा जाना चाहिए। बाबुजी ने जरूर आत्मकथा लिखी। वह ऐतिहासिक लेखन है।

- फिर भी कुछ क्षण और पल रहे होंगे, जब आप हताश और निराश हुए होंगे। फिल्मों में आने के समय की बात करें तो जिस प्रकार आप को अस्वीकार किया गया। फिर बाद में जिसे वन मैन इंडस्ट्री कहते थे, उसे ही फिल्में न मिलें। इन सारी परिस्थितियों में आप किसी अमरपक्षी की तरह फिर से उड़ान भरते हैं। आप में थोड़ी सी चिंगारी बची रह जाती है, जिससे आप लहलहा उठते हैं।

0 इतनी बारीकी से मैंने अपने आप को नहीं देखा और देखना भी नहीं चाहता।

- सिर्फ यह बता दें कि  आखिर वह कौन सी ऊर्जा है, जो आप को ताकत देती है?

0 शुरू में काम न मिलने का आपने जिक्र किया। इस संबंध में मेरी स्पष्ट राय है कि जब तक आप के गुणों से कोई परिचित नहीं है तो कैसे अपने व्यवसाय में ले ले। धीरे-धीरे परिचय मिलने लगता है तो काम भी मिलने लगता है। काम मिलने के बाद आप के गुण और काबिलियत की चीजें सामने आती हैं। फिर आप का काम और बढ़ता है। हमारी इंडस्ट्री में रूप, कला और बॉक्स ऑफिस तीनों को देखा जाता है। इन्हें समेटकर ही कोई फैसला लिया जाता है। हो सकता है कि मुझ में कुछ त्रुटियां रही हों, जिनकी वजह से मुझे काम न मिला हो। बीच में दो-तीन सालों तक मैंने कोई काम नहीं किया था। हां, जो संन्यास लिया था, वह मुझे नहीं लेना चाहिए था। बाबुजी ने कहा है, अनवरत समय की चक्की चलती रहती है। कई बार ऐसा मन करता है कि उस चक्की से छिटककर कुछ देखें, लेकिन मेरा मानना है कि एक बार चलायमान हो गए तो चलते रहना चाहिए। वह चक्की अपने आप रूक जाए या आप की नाकामयाबी से रूके तो यह दूसरी बात है। अनिश्चय का एक माहौल हमारे व्यवसाय में हमेशा बना रहता है। आगे भी ऐसा ही रहेगा। अब वृद्ध हो गए हम। सत्तर बरस के हो गए। अब मुझे नौजवान भूमिकाएं तो मिलेंगी नहीं। वृद्ध भूमिकाएं सीमित होती हैं। उसी तरह का काम मिलेगा, वही करते रहेंगे।

-बाबुजी ने चार खंडों में आत्मकथा लिखी। उसका एक खंड ‘क्या भूलुं क्या याद करूं’। आप के जीवन में भी कुछ भूलने और याद रखने वाली बातें होंगी। क्या कुछेक सुखद क्षण हमारे पाठकों से शेयर करेंगे?

0 सबसे सुखद बात है कि जनता ने इस व्यवसाय में स्वीकारा मुझे। उनका स्नेह, प्यार, प्रार्थनाएं और दुआएं नहीं होतीं तो हम आज की स्थिति में नहीं होते। माता-पिता का आशीर्वाद.. उन्होंने हमारी जो परवरिश की। बाबुजी का लेखन, उनके लेखन से मिली सीख.. उनके साथ समय बिताने का अवसर मिला। उनका जीवन हमारे लिए उदाहरण बना। यही सब कुछ सुखद बातें हैं।

-पारिवारिक जीवन में  आपने पुत्र, पति, पिता और अब दादा की भूमिकाएं निभाई हैं। अभिषेक के अनुसार आप सारी भूमिकाओं में परफेक्ट रहे हैं।

0 यह मुझे मालूम नहीं है कि मैं कितना परफेक्ट रहा हूं?

-पूरे देश ने आप  की पितृ और मातृ सेवा  देखी है। अपनी व्यस्तताओं के बावजूद आप ने उनकी पूरी देखरेख की। ऐसी सेवा बहुत कम लोग कर पाते हैं। मुझे लगता है कि यह उत्तर भारत के मध्यमवर्गीय परिवार के लोगों का खास गुण है। आपने उसे निभाया और एक आदर्श बने। पारिवारिक मूल्यों के प्रति आप का दृष्टिकोण आप के ब्लॉग लेखन, व्यवहार और प्रतिक्रियाओं में साफ नजर आता है।

0अपने जीवन के दौरान जो भी देखा, सुना, पढ़ा और सीखा मां-बाबुजी से या जिस वातावरण में हम रहे, जिस माहौल में पले-बढ़े, वहीं सब कुछ सीखा। कभी किसी ने बताया या कहा नहीं कि ऐसे करना चाहिए। जो मन में आया हमने किया। जो हमे लगा कि करना चाहिए, वही किया। मुझे लगता है, जिनकी वजह से हमारा जीवन है। जिन्होंने अपनी जिंदगी की तमाम कठिनाइयों के बीच हमें शिक्षा दी। पाला, बड़ा किया... इतना तो हमारा फर्ज बनता है कि जब वे सहायता की स्थिति में हों या चिकित्सा की आवश्यकता हो तो उसे पूरा करें। हर संतान को सब कुछ करना चाहिए। मैं ऐसा मानता हूं और मैंने यही किया। इस वजह से कभी कुछ नहीं किया कि आदर्श बनना है, या मिसाल रखनी है।

-पोती का नाम आराध्या ही है न?

0 हां, आराध्या ही है।

-दादा के रूप में आप आराध्या को कितना समय दे पाते हैं? कहते हैं हर पुरुष पति, पिता और दादा बनने के साथ बदलता है। उसके दृष्टिकोण बदल जाते हैं। इन दिनों ऐसा लग रहा है कि आप सुखी और संतुष्ट हैं। अभी आप किसी चीज के लिए प्रयासरत नहीं दिखते। जो मिल रहा है या जो सामने है, उसका आनंद उठा रहे हैं?

0 पहले भी ऐसा ही व्यवहार था मेरा। जो मिलता था, वह करते थे। पहले वाली असुरक्षा आज भी है। पता नहीं कल काम मिलेगा कि नहीं मिलेगा।

-क्या सत्तर साल के  सफल अमिताभ भी असुरक्षित हैं?

0 क्यों नहीं? प्रतिदिन एक भय रहता है कि आज जो काम करना है, वह कैसे होगा? होगा कि नहीं होगा? अभी आप का इंटरव्यू खत्म कर ‘केबीसी’ के सेट पर जाऊंगा। डर लगा रहता है। संघर्ष प्रतिदिन रहेगा हमारे जीवन में। बाबुजी के सामने जब हम अपनी दुविधाएं रखते थे तो वे यही कहते थे कि संघर्ष हमारे साथ रहने वाला है। उन्होंने कहा था कि कभी इत्मीनान नहीं रहता। मुझे नहीं लगता कि यह संभव होगा। यही हम चाहेंगे कि हमारा परिवार और निकट संबंधी सुख-शांति से रहें। हमारे चाहने वालों का स्नेह-प्यार बना रहे, क्योंकि उन्हीं की वजह से हम बने हैं। हम अलग से कोई खास प्रयत्न नहीं करते। जो आ जाता है, उसी में चुन लेते हैं सोच-समझकर कि इसी में रूचि होगी।

- आप अपने  काम में सौ प्रतिशत से  ज्यादा देते हैं। अभिषेक की एक ही शिकायत है कि डैड अपने सेहत का ख्याल रखें और आराम करें?

0 आराम तो एक दिन सभी को करना ही पड़ेगा। शरीर जब नहीं चलेगा तो आराम करना ही पड़ेगा। जब तक शरीर साथ दे रहा है तब तक शरीर चलाते रहेंगे।

- आप के ब्लॉग पर बार-बार उल्लेख आता है कि अब मैं समाप्त करता हूं, नहीं तो परिजन नाराज हो जाएंगे?

0 हां वो होता है।

- वह कौन सी चाहत  है, जो सुबह चार बजे भी ब्लॉग लिखने के लिए मजबूर करती है?

0 यह प्रथा बन गई है। मैं उसमें कोई व्यवधान नहीं आने देना चाहता। मैंने उनसे वादा किया हुआ है कि प्रतिदिन लिखूंगा। अब एक बार जबान या शब्द दे दिया तो उसे पूरा करना चाहिए। हां, यह होता है कि कई बार देर हो जाती है। दिनचर्या में कई सारे काम होते हैं। उन्हें पूरा करने के बाद ही लिखता हूं, लेकिन लिखता अवश्य हूं, ताकि उनसे संपर्क बना रहे।

- कई बार मैंने देखा कि आप अपने पाठकों का पूरा ख्याल रखते हैं। उनकी बात मानते हैं। उन्हें जवाब देते हैं?

0 हां, जवाब देता हूं। यह सुविधा हमने ही ब्लॉग में जोड़ी है कि जो कुछ भी मैं कहता हूं,आप उस टिप्पणी कर सकें। उसके बाद मैं भी उत्तर देता हूं। उन्हें लगता है कि वे भी मेरे आमने-सामने  बैठकर बातें करते हैं। यह सब अच्छा लगता है।

-तमाम कलाकारों के  बीच आप का यूथ कनेक्ट सबसे  ज्यादा और तीव्र है। आप की भाषा, आप की बातचीत। उसमें बड़े-बुजुर्ग होने का एहसास नहीं होता। कोई उपदेश नहीं देते आप?

0 उपदेश, आवे तो देवें(जोरदार ठहाका)।

-अगर मैं सीधे पूछूं कि आप क्यों ट्विट पर हैं, फेसबुक पर हैं, ब्लॉग पर हैं?

0 किसी ने कहा कि आप का वेबसाइट होना चाहिए, जहां पर लोग आप के बारे में जानें। जहां से जनता को आप के बारे में जानकारी मिले। बहुत सारे फेक लोग आप की आईडी और नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं। उसमें गलत चीजें भी छप रही हैं। उसे सीधा और सही करने की जरूरत है।

मैंने कहा कि भाई वेबसाइट कर दो। उन्होंने मुझ से वक्त मांगा। मैंने कहा, मुझे तो कल ही चाहिए। फिर उन्होंने सुझाया कि कल ब्लॉग हो सकता है। मैंने उसे समझा। लगा कि अच्छी चीज है। पहला ब्लॉग लिखा। दो-चार लोगों ने उत्तर दिए। फिर प्रतिदिन करते गए। पाठकों की संख्या बढ़ती गई। फिर उसके बाद पता चला कि एक ट्विटर है। फिर फेसबुक की जानकारी मिली। धीरे-धीरे जो सुविधाएं मिल रही हैं, उन्हें मैं एक बार जरूर देखना और चखना चाहूंगा। एक जिज्ञासा है बस।

- खास बात है कि आप के ब्लॉग में कभी दोहराव नहीं होता?

0 मैं पहले से कुछ भी सोचकर नहीं लिखता। कंप्यूटर खोलने के बाद जो जी में आता है लिख देता हूं। मन में जो बात आती है, वही लिखता हूं। पहले से प्लान नहीं करता कि आज यह लिखूंगा, कल वह लिखूंगा। हां, तस्वीरें मैं डालता हूं। दिन भर की कुछ खिंची यादगार तस्वीरें। मेरा लेखन बहुत ही मामूली है। बस मैं एक लोगों से बातचीत करता हूं।

-अभी तो लोग आप के ब्लॉग पर शोध करेंगे?

0 शोध(एक ठहराव) कहां होने वाला है?

- अभी आप के सबसे अंतरंग मित्र कौन हैं?

0 परिवार के सदस्य हमारे मित्र हैं और कुछ मित्र आते-जाते हैं। मेरे ज्यादा दोस्त हैं नहीं, क्योंकि मैं ज्यादा लोगों से मिलता-जुलता नहीं हूं। 

-कुछ नाम ले सकें?

0 (ठहरकर)... क्या लें। सभी के लिए द्वार खुला हुआ है। जो आ जाए।

- सबसे कीमती  धरोहर क्या है आप के पास?

0 बाबुजी का लेखन.. माता-पिता के साथ बिताए गए क्षण। जो उनके सानिध्य में बीता, वही हमारी धरोहर है।

- अपने बाद  की पीढ़ी को और देश  को क्या धरोहर देना चाहेंगे?

0 इस विषय या लक्ष्य से जीवन जीने पर मैं गलत हो जाऊंगा। मैं यह सोचकर नहीं चलना चाह रहा हूं कि अगली पीढ़ी को कुछ दूंगा। यदि मेरे साथ रहकर उन्होंने कुछ सीखा या समझा तो वही उनकी धरोहर है।

-हम भाग्यशाली हैं कि हमने साक्षात अमिताभ बच्चन को देखा है। आने वाली पीढ़ी निश्चित ही हमसे रश्क करेगी। मुमकिन नहीं लगता कि भविष्य में कोई और अमिताभ बच्चन आएगा। आप सिर्फ एक जीवन नहीं हैं विशेष परिघटना हैं भारत की। देश की युवा पीढ़ी को जीवन का क्या संदेश देना चाहेंगे?

0 पहले तो मुझे  इस पर विश्वास होना चाहिए कि मैं  कोई परिघटना हूं। हमने तो  कभी ऐसे जीवन नहीं बिताया कि उस पर कोई शोध होगा, सर्वे होगा और लोग निष्कर्ष निकालेंगे। ना ही मैंने किसी को कुछ कहने, लिखने और नाम देने से रोका है। मैं सभी को बाबुजी की सीख देना चाहूंगा- मन का हो तो अच्छा, न हो तो ज्यादा अच्छा। जब तक जीवन है, तब तक संघर्ष है। ये छोटी-मोटी बातें हैं।

Saturday, October 6, 2012

यश चोपड़ा का संन्यास

-अजय ब्रह्मात्मज
 अपने 80 वें जन्मदिन पर आयोजित एक विशेष समारोह में यश चोपड़ा ने खुली घोषणा कर दी कि वे जब तक है जान के बाद कोई फिल्म निर्देशित नहीं करेंगे। किसी भी सफल फिल्मकार के लिए यह अहम फैसला होता है कि वह कब संन्यास ले। कुछ नया करने और कहने से ज्यादा पाने की फिक्र में कई दफा चाहकर भी फिल्म बिरादरी के सदस्य अपने काम से अलग नहीं हो पाते। स्टार को लगा रहता है कि अगली फिल्म पिछली फिल्म से श्रेष्ठ, शानदार और बड़ी हिट होगी। निर्माता-निर्देशक कुछ नया पाने और दिखाने की लालसा में जुटे रहते हैं।
फिलहाल, यश चोपड़ा सफल और समर्थ फिल्मकार हैं। हालांकि वे अस्सी के हो चुके हैं, लेकिन इस उम्र में भी उनकी सृजनात्मक तीक्ष्णता बरकरार है। इस उम्र तक पहुंचने पर ज्यादातर व्यक्ति नॉस्टेलजिक और सिनिकल हो जाते हैं। उन्हें अपना जमाना याद रहता है। वे नई पीढ़ी के साथ तालमेल न बिठा पाने पर आत्मान्वेषण करने के बजाय बदले हुए समय, परिवेश और प्रवृत्ति को दोष देने लगते हैं। लेकिन इसके उलट यश चोपड़ा ने हमेशा खुद को नए तरीके से पेश किया। धूल का फूल से लेकर जब तक है जान तक में हम देख सकते हैं कि वे समय के साथ या समय से आगे चलते रहने की कोशिश करते रहे हैं। हर फिल्मकार तरह उनके करियर में भी उतार आया, लेकिन उस समय भी वे ठहरे या थमे नहीं। बेटे आदित्य चोपड़ा के एक्टिव होने के बाद उन्होंने अपनी रफ्तार धीमी की। फिल्मों से जुड़ी संस्थाओं और संगठनों के साथ अपने स्टूडियो की स्थापना के लिए संसाधन जुटाए। आज मुंबई के अंधेरी उपनगर में स्थित उनका स्टूडियो कहीं न कहीं हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की स्टूडियो की जीवित परंपरा का उदाहरण बन गया है। बॉम्बे टॉकीज से लेकर यशराज स्टूडियो तक के लंबे सफर में स्टूडियो की कार्य-प्रणाली से लेकर संरचना तक बदल चुकी है। आज की पीढ़ी के फिल्मकारों में यश चोपड़ा अकेले ऐसे फिल्मकार हैं, जिनका स्टूडियो है। किसी जमाने में हिमांशु राय, राज कपूर, महबूब खान और कमाल अमरोही के स्टूडियो थे। उनमें से आखिरी तीन स्टूडियो आज भी चल रहे हैं, लेकिन महबूब, राज कपूर और कमाल अमरोही के वारिसों में से कोई भी स्वयं फिल्मकार नहीं है।
यशराज स्टूडियो में लगातार फिल्मों और टीवी शो की शूटिंग होती है। फिल्मों से संबंधित समारोह भी होते रहते हैं। यहां आधुनिक तकनीक और सुविधाएं उपलब्ध हैं। यश चोपड़ा ने शाहरुख खान को दिए अपने इंटरव्यू में संकेत दिया कि वे फिल्मों से जुड़े रहेंगे और नई प्रतिभाओं के लिए कुछ नया करेंगे। हम सभी जानते हैं कि यशराज स्टूडियो फिलहाल नए निर्देशकों को फिल्में बनाने का मौका देता है। नए तकनीशियनों, कलाकारों और निर्देशकों की नई ब्रिगेड वहां सक्रिय है। यश चोपड़ा की यह पहल सराहनीय है।
यश चोपड़ा की आखिरी फिल्म जब तक है जान फिर से एक रोमांटिक फिल्म है। शाहरुख खान के साथ अनुष्का शर्मा और कट्रीना कैफ इस फिल्म में दिखेंगी। अपने इंटरव्यू में यश चोपड़ा ने बताया कि यह फिल्म मेरे बेटे आदित्य ने लिखी और तोहफे के रूप में मुझे पेश की है। इस फिल्म की आत्मा तो मेरी है, लेकिन भाषा आदित्य चोपड़ा की है। जब तक है जान परंपरा आर वर्तमान की क्रिएटिविटी का जोड़ है। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि यश चोपड़ा की अंतिम भेंट जब तक है जान उनकी अन्य फिल्मों की तरह शानदार और मनोरंजक होगी। संन्यास उन्होंने निर्देशन से लिया है, लेकिन आशा की जानी चाहिए कि वे नई पीढ़ी को दिशा-निर्देश देते रहेंगे। उनके सान्निध्य और संरक्षण में युवा फिल्मकार उनकी परंपरा में कुछ नया जोड़ते रहेंगे। यशराज की फिल्में अब पंजाब और रोमांस से बाहर निकल रही हैं।