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Saturday, September 29, 2012

फिल्‍म समीक्षा : ओह माय गॉड

film review

प्रपंच तोड़ती, आस्था जगाती

-अजय ब्रह्मात्मज
परेश रावल गुजराती और हिंदी में 'कांजी वर्सेस कांजी' नाट सालों से करते आए हैं। उनके शो में हमेशा भीड़ रहती है। हर शो में वे कुछ नया जोड़ते हैं। उसे अद्यतन करत रहते हैं। अब उस पर 'ओह माय गॉड' फिल्म बन गई। इसे उमेश शुक्ला ने निर्देशित किया है। फिल्म की जरूरत के हिसाब से स्क्रिप्ट में थोड़ी तब्दीली की गई है। नाटक देख चुके दर्शकों को फिल्म का अंत अलग लगेगा। वैसे नाटक में इस अंत की संभावना जाहिर की गई है।
उमेश शुक्ल के साथ परेश रावल और अक्षय कुमार के लिए 'ओह माय गॉड' पर फिल्म बनाना साहसी फैसला है। धर्मभीरू देश केदर्शकों के बीच ईश्वर से संबंधित विषयों पर प्रश्नचिह्न लगाना आसान नहीं है। फिल्म बड़े सटीक तरीके से किसी भी धर्म की आस्था पर चोट किए बगैर अपनी बात कहती है। फिल्म का सारा फोकस ईश्वर के नाम पर चल रहे ताम-झाम और ढोंग पर है। धर्मगुरू बने मठाधीशों के धार्मिक प्रपंच को उजागर करती हुई 'ओह माय गॉड' दर्शकों को स्पष्ट संदेश देती है कि ईश्वर की आराधना की रुढि़यों और विधि-विधानों से निकलने की जरूरत है। कांजी भाई घोर नास्तिक व्यक्ति हैं। वे हर मौके पर ईश्वर केनाम पर चल रहे ढोंग का मजाक उड़ाते हैं। वे अपने वाजिब सवालों से ईश्वर की सत्ता को चुनौती देते हैं। उनके सवालों का मुख्य स्वर है कि अगर ईश्वर है तो आखिर क्यों मनुष्य की मुश्किलें बनी हुई हैं? मनुष्य पर हो रहे अत्याचार को अपने चमत्कार से वह क्यों नहीं खत्म नहीं करता? ऐसा लगता है कि फिल्म आस्तिकों व आस्थाओं पर चोट करती है, लेकिन फिल्म का अंतिम संदेश आस्तिकाओं के पक्ष में है। दरअसल, 'ओह माय गॉड'आस्था के तालाब में उग आई रुढि़यों की जलकुंभी की सफाई कर देती है। यह कतई न समझें न कि फिल्म ईश्वर के विरोध में है। यह फिल्म ईश्वर के एजेंट और एजेंसी के खिलाफ है। उसके नाम पर चल रहे प्रपंच का पर्दाफाश करती है। इस फिल्म का संदेश आम दर्शकों तक पहुंचे तो समाज के लिए बेहतर है। फिल्म मुख्य रूप से परेश रावल के किरदार कांजी भाई पर टिकी है। उन्होंने दृश्यों के अनुरूप इसे निभाया है। उनकी पकड़ कहीं भी कमजोर नहीं होती। कृष्ण के रूप में अक्षय कुमार के आगमन के बाद दोनों कलाकारों की संगत फिल्म का आनंद बढ़ा देती है। सुपरबाइक पर शूट पहने हुए कृष्ण के रूप में कृष्ण का आधुनिक रूप खुलता नहीं। लेखक-निर्देशक ने कृष्ण को अच्छी तरह से फिल्म में पिरोया है। अक्षय कुमार ने इस किरदार को जिम्मेदार तरीके से निभाया है। फिल्म के सहयोगी किरदार सिद्धेश्वर, लीलाधर और गोपी रोचक और मजेदार बनाते हैं। मिथुन चक्रवर्ती और गोविंद नामदेव ने अपने संवादों और भावों से फिल्म की रोचकता बढ़ा दी है। दोनों फिल्म में एक ही परिधान और भावमुद्रा में रहे हैं,लेकिन सिद्ध अभिनेता की तरह उन्होंने अपनी भंगिमाओं से बुहत कुछ कह दिया है। कांजीभाई की पत्नी सुशीला की भूमिका में लुबना सलीम जंचती हैं। कांजीभाई के सहयोगी महादेव साथ देते हैं।
ओह माय गॉड की खूबी इसके संवादों और अक्षय-परेश की केमिस्ट्री से निखरी है। किसी भी धर्म और उससे जुड़ी आस्था का निरादर न करते हुए भी फिल्म उपयोगी संदेश देती है। फिल्म में स्पष्ट कहा गया है कि किसी का धर्म छीनोगे तो वे तुम्हें धर्म बना देंगे।
साढ़े तीन स्टार
अवधि-1 2 मिनट

Thursday, September 27, 2012

ईश्वर है तो झगड़े-फसाद क्यों?


-अजय ब्रह्मात्मज
भावेश मांडलिया के नाटक ‘कांजी वर्सेज कांजी’ नाटक पर आधारित उमेश शुक्ला की फिल्म ‘ओह माय गॉड’ में परेश रावल और अक्षय कुमार फिर से साथ आ रहे हैं। दोनों ने अभी तक 32 फिल्मों में एक साथ काम किया है। दोनों की केमिस्ट्री देखते ही बनती है। ‘ओह माय गॉड’ के संदर्भ में अक्षय कुमार ने स्वयं परेश रावल से इस फिल्म के बारे में बात की। कुछ सवाल परेश ने भी अक्षय से पूछे।
अक्षय- परेश, आप को इस नाटक में ऐसी क्या खास बात दिखी कि आपने इसके इतने मंचन किए और अब फिल्म आ रही है?
परेश-बहुत कम मैटेरियल ऐसे होते हैं, जो सोचने पर मजबूर करते हैं। मनोरंजन की दुनिया में हमलोग लोगों को हंसाने-रूलाने का काम करते रहते हैं। यह नाटक और अब फिल्म लोगों को उससे आगे जाकर सोचने पर मजबूर करेगी। इस नाटक के मंचन में मैंने हमेशा कुछ नया जोड़ा है। अभी पिछले शो में एक महत्वपूर्ण दर्शक ने कहा कि मंदिर का मतलब क्या होता है? जो मन के अंदर है, वही मंदिर है।
अक्षय- सही कह रहे हो। जो मन के अंदर है वही मंदिर है। भगवान तो हमारे अंदर बैठा हुआ है। परेश, आप का नाटक देखने के बाद मैंने भगवान को ज्यादा अच्छी तरह समझा। अब मैं अपने गार्डन में बैठकर ही पूजा कर लेता हूं। इस नाटक को देखने के बाद मेरी तो जिंदगी ही बदल गई है। पूजा-पाठ के ढोंग का समय बचाकर अब मैं काम करता हूं। और काम से मिले पैसों से दूसरों की मदद करता हूं। मेरे जीवन का नया मंत्र है- नेकदिली ही प्रार्थना है।
अक्षय- परेश, क्या आप ईश्वर में यकीन रखते हैं?
परेश- मुझे लगता है कि कोई शक्ति जरूर है। अब उस शक्ति को क्या नाम दें, चाहें तो ईश्वर कह सकते हैं। सच कहूं तो मैं हिल गया हूं। जिस तरह गरीबी है। हाहाकार मचा है। लोग मर रहे हैं। ईश्वर के नाम पर एक-दूसरे को मार रहे हैं। मेरा सिंपल सा सवाल है कि अगर आप की बिल्डिंग में आप का नाम लेकर दो पड़ोसी लड़ रहे हों तो आप नीचे उतरकर पूछोगे न कि भई क्या बात है? यह ईश्वर कहां बैठा हुआ है? आकर पूछता क्यों नहीं कि उसके नाम पर झगड़े क्यों चल रहे हैं?
अक्षय- ईश्वर ने लड़ाई-झगड़े के लिए नहीं उकसाया है। मेरे ख्याल में उसने ख्याल रखा हुआ है, तभी तो सारी गड़बडिय़ों के बावजूद दुनिया चल रही है। सभी तरक्की कर रहे हैं। मेरी नजर में यह सद्बुद्धि खुद लानी पड़ती है। भगवान कृष्ण ने कहा है कि मैं रास्ता दिखा सकता हूं, लेकिन लक्ष्य तक तो पहुंचना आप का काम है।
परेश- माफ करें। मैं थोड़ा सिनिकल हो गया हूं। अखबार खोलते ही डिप्रेशन होता है। टीवी खोलते ही फ्रस्टे्रशन होता है। कहीं कोई अच्छी खबर नहीं मिलती।
अक्षय- तू किताबें पढ़ और ज्ञानवद्र्धक चैनल देख। पता चलेगा कि दुनिया कितनी खूबसूरत है। लोग कितने अच्छे हैं। पॉजिटिव रहना सीख।
परेश- मेरी एक ही समस्या है कि उसके नाम पर जो गोरखधंधा चल रहा है, वह सब बंद हो। मुझे तो लगता है ‘आसमां पर है खुदा और जमीं पर हम, इन दिनों इस तरफ वो देखता है कम।’
अक्षय- अगर कुछ लोग गलत हैं तो उसके लिए ईश्वर और पूरी कायनात को क्यों दोषी ठहरा रहे हो? मैं यकीन से कह रहा हूं सही लोग दुनिया में ज्यादा हैं। जिस दिन उनकी संख्या कम हुई, उस दिन सब गड़बड़ हो जाएगा। मैं तो यही कहूंगा कि उम्मीद मत छोड़ो और हिम्मत मत हारो। ‘ओह माय गॉड’ फिर से देखो और सीखो।
परेश-हां भाई। सभी देखें।


धार्मिक प्रतीकों को दोहन


-अजय ब्रह्मात्मज
गणेश भक्त मधुर भंडारकर हमेशा मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर और गणपति पूजा के समय पंडालों में नजर आते हैं। इस बार ‘हीरोइन’ की रिलीज के पहले करीना कपूर के साथ गणपति का आशीर्वाद लेने वे कुछ पंडालों में गए। उन्होंने अपनी फिल्म का म्यूजिक भी सिद्धिविनायक मंदिर में रिलीज किया था। किसी निर्माता-निर्देशक या कलाकार की धार्मिक अभिरुचि से कोई शिकायत नहीं हो सकती, लेकिन जब उसका इस्तेमाल प्रचार और दर्शकों को प्रभावित करने के लिए किया जाने लगे तो कहीं न कहीं इस पूरी प्रक्रिया का पाखंड सामने आ जाता है। सिर्फ मधुर भंडारकर ही नहीं, दूसरे निर्माता-निर्देशक और कलाकार भी आए दिन अपनी निजी धार्मिक भावनाओं का सार्वजनिक प्रदर्शन करते हैं। साथ ही उनकी कोशिश रहती है कि ऐसे इवेंट की तस्वीरें मुख्य पत्र-पत्रिकाओं में जरूर छपें। अभी तक किसी ने धार्मिक प्रतीकों और व्यवहार से प्रभावित हुए दर्शकों का आकलन और अध्ययन नहीं किया है। फिर भी यह कहा जा सकता है कि देश के धर्मभीरू दर्शक ऐसे प्रचार से प्रभावित होते हैं।
    फिल्मों के प्रचार-प्रसार और कंटेंट में धार्मिक प्रतीकों का शुरू से ही इस्तेमाल होता रहा है। कुछ निर्माताओं के बैनरों के प्रतीक के रूप में धार्मिक मूर्तियां देखी जा सकती हैं। एक समय फिल्मों में कीर्तन-भजन और कव्वाली के लिए खास स्पेस निकाला जाता था। मनोज कुमार ने अपनी फिल्मों से शिरडी के साईं बाबा को विश्वप्रसिद्ध कर दिया। उसके बाद साईं बाबा जैसे सेक्युलर संत हिंदू भगवान में तब्दील हो गए। दस साल पहले शिरडी में हिंदू-मुसलमान दोनों धर्मों के लोग समान संख्या में दर्शन के लिए जाते थे। अब नाम मात्र के मुसलमान भक्त नजर आते हैं। हिंदू बहुसंख्यक देश में ज्यादातर प्रतीक हिंदू धर्म से संबंधित ही इस्तेमाल होते हैं। हालांकि अजमेर शरीफ, हाजी अली, निजामुद्दीन औलिया के भी दर्शन फिल्मों में होते रहे हैं।
    फिल्मों के मुख्य किरदारों के धार्मिक व्यवहार के जरिए लेखक और निर्देशक कहीं न कहीं दर्शकों को उस परम सत्ता की शक्ति और दया का एहसास दिलाने के साथ यह पाठ भी पढ़ाते हैं कि हमें धर्मभीरू होना चाहिए। हिंदी फिल्मों ने दर्शकों को धार्मिकता की रूढिय़ों में उलझाए और बहलाए रखने का लगातार प्रयास किया है। कहने के लिए हिंदी फिल्मों का मिजाज सेक्युलर है, लेकिन इसकी मुख्य धारा देश के बहुसंख्यक समुदाय की धार्मिक भावनाओं से प्रभावित है। पांचवे-छठे दशक में मिशनरी, पादरी और नन को किरदारों के रूप में दिखाया जाता था। वे बड़े दयालु और फिल्म के कमजोर किरदारों के हमदर्द होते थे। वास्तव में यह अंग्रेजों के लंबे शासन में फैलाई गई ईसाई दयालुता का असर था। धीरे-धीरे यह प्रभाव कम हुआ।
    गौर करें तो फिल्मों की रिलीज के पहले फिल्म के मुख्य कलाकार मंदिरों, दरगाहों और अन्य धार्मिक प्रतिष्ठानों में सिर झुकाते नजर आते हैं। सोचने की बात है कि ठीक रिलीज के पहले उन्हें आराध्यों की याद क्यों आती है? कुछ निर्माता-निर्देशक तो अपनी फिल्म के प्रिंट तक चढ़ाने ले जाते हैं और उम्मीद करते हैं कि आराध्यों के आशीर्वाद से उनकी फिल्में देखने दर्शक आएंगे। ऐसी गतिविधियों का एक सीधा असर धर्मपारायण दर्शकों पर जरूर होता है। उन्हें अपनी आस्था महत्वपूर्ण लगती है और फिल्म के प्रति वे उदार हो जाते हैं। दरअसल फिल्म बिरादरी रिलीज के समय बहुत डरी रहती है। उसे हर प्रकार के टोटके में यकीन रहता है। सभी इस भ्रम में रहते हैं कि शायद कुछ चमत्कार हो जाए। दैवीय कृपा से उनकी फिल्मों के दर्शक बढ़ जाएं। सच्चाई यह है कि फिल्म आखिरकार अपनी क्वॉलिटी और कंटेंट से चलती है। टोटके और धार्मिक व्यवहार खुद को लुभाने और बहलाने के बहाने भर हैं।
    हद तो ‘राज 3’ के प्रचार में दिखी। इस फिल्म के हिट होने का श्रेय गणपति को दिया गया और उसके पोस्टर तक छापे गए। सेक्युलर महेश भट्ट तक को धार्मिक प्रतीकों के इस दोहन में कोई खोट नजर नहीं आया।


Sunday, September 23, 2012

रानी मुखर्जी का दिलखोल इंटरव्‍यू

-अजय ब्रह्मात्मज
-‘अय्या’के फर्स्‍ट   लुक को लोगों ने काफी पसंद किया है।आप को कैसी प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं?
0 फर्स्‍ट लुक आने के बाद से मेरे दोनों मोबाइल फोन लगातार बज रहे हैं। फिल्म इंडस्ट्री और देश-विदेश से दोस्तों और परिचितों के फोन आ रहे हैं। वे चीख-चीखकर बता रहे हैं कि उन्हें बहुत हंसी आई। बहुत कम ऐसा होता है कि ट्रेलर देखकर इतना आनंद आए। मेरे दोस्तों ने तो कहा कि उन्होंने लुप में ‘अय्या’ के ट्रेलर देखे। मुझे अभी तक काफी पॉजीटिव रिस्पॉन्स मिले हैं। मीडिया बिरादरी के कई लोगों ने फोन किया। मैंने देखा है कि जब मीडिया के लोग पॉजीटिव रिस्पॉन्स देते हैं, तो फिल्म में कुछ खास बात होती है। ऐसा लग रहा है कि सभी मेरी फिल्म के इंतजार में थे। सोशल नेटवर्किंग साइट पर भी मैंने आम दर्शकों के रिएक्शन देखे। दो प्रतिशत लोगों ने मेरी आलोचना की है। बाकी 98 प्रतिशत को फस्र्ट लुक अच्छा लगा।
- इस पॉजीटिव रिएक्शन की वजह क्या मानते हैं? यह सिर्फ फर्स्‍ट  लुक का कमाल है या रानी मुखर्जी के प्रति लोगों का प्रेम? सलमान खान ने एक बार कहा था कि मेरी फिल्म की झलक देखते समय भी दर्शकों के दिमागमें मेरी पूरी इमेज रहती है। उसी के असर में वे मेरी नई फिल्म को भी चाहने लगते हैं।
0 मेरा मानना है कि लोग जो कुछ देखते हैं, वह एक प्रॉडक्ट होता है। प्रॉडक्ट देखकर वे या तो खुश होते हैं या नाखुश होते हैं। इस प्रॉडक्ट को देखकर लोग खुश हुए हैं, तो इसका श्रेय मैं डायरेक्टर सचिन कुंडलकर और ट्रेलर काटने वाले व्यक्ति को दूंगी। ट्रेलर से फिल्म का माइक्रो व्यू मिल जाता है। ट्रेलर आश्वस्त करता है कि एक मजेदार फिल्म आ रही है। ‘अय्या’ वाकड़ा फिल्म है। इस फिल्म से जब मेरा और अनुराग कश्यप का नाम जुड़ा, तो लोगों के मन में ढेर सारी आशंकाएं थीं। वे अनुमान नहीं लगा पा रहे थे- यह डार्क फिल्म होगी कि थ्रिलर होगी? ‘अय्या’ की झलक देखने के लिए वे बेताब थे। सिर्फ यह बताया था कि यह एक क्वर्की सी फिल्म है। इस फिल्म में नायिका नायक के देहगंध से आकर्षित होकर उससे प्रेम करने लगती है। लोगों को कतई उम्मीद नहीं थी कि ‘अय्या’ कॉमेडी फिल्म होगी। हम इसमें कॉमेडी कर रहे हैं। गाने गा रहे हैं। अनुराग कश्यप की फिल्मों में लिपसिंक गाने नहीं होते। बैकग्राउंड में गाने होते हैं।
-‘अय्या’ केबारे में रानी मुखर्जी खुद क्या कहना चाहेंगी?
0 ‘बंटी और बबली’ के बाद मैं किसी फिल्म में फुल कॉमेडी कर रही हूं। मीनाक्षी देशपांडे फिल्मों की दीवानी है। वह फिल्मों के फैंटेसी वल्र्ड में रहती है। ऐसे रोल में लोगों ने काफी इंतजार के बाद मेरी झलक देखी है। अनुराग कश्यप को मैं बहुत सालों से जानती हूं। वे ‘युवा’ में मणि रत्नम को असिस्ट कर रहे थे। अनुराग मेरे सामने बड़े हुए हैं। मैंने उनका संघर्ष देखा है। कोई उनकी फिल्म खरीद नहीं रहा था। कैसे भी उनकी फिल्म रिलीज हुई तो वे निर्देशक बने। फिर सफल निर्देशक बने और अब तो निर्माता भी बन गए हैं। उनकी प्रगति से खुशी होती थी। वे मेरी कुछ फिल्मों के लेखक भी रहे हैं। अनुराग जब मेरे पास आए तो मैंने सबसे पहले यही कहा था कि मुझे कोई सैड या डार्क फिल्म मत देना। मजे की बात यह है कि उनका आइडिया मुझे अच्छा लगा। उन्होंने एक शॉर्ट फिल्म दिखायी और कहा अगर यह शॉर्ट फिल्म आप को अच्छी लगी तो इसे डेवलप करते हैं। मैंने  उसे देखते ही उन्हें गो अहेड कह दिया और सलाह दी कि इसे पूरी तरह से कमर्शियल फिल्म की तरह बनाएं। मैंने फिल्म के निर्देशक सचिन को सलाह दी कि इसे नेशनल अवार्ड केलिए मत बनाना। इसे जनता के लिए बनाना है। मेरी खुशनसीबी है कि दोनों ने मेरी बात मानी और अब ‘अय्या’ आप के सामने है।
-हिंदी फिल्मों के पर्दे पर जब भी हीरो-हीरोइन के बीच प्रेम की वजह से कल्चरल क्लैश दिखाया जाता है तो दर्शकों को बहुत मजा आता है। आजादी के बाद हम सभी सांस्कृतिक रूप से इतने घुल-मिल गए हैं कि ऐसी फिल्में देखते समय हमें अपने आस-पास के किस्से याद आने लगते हैं। क्या ‘अय्या’ के साथ भी ऐसा ही है?
0 इस तरह का आनंद ‘अय्या’ में भी आएगा। उससे भी बढक़र बताऊं तो यह फिल्म हिंदी में बनी है, लेकिन इसकी नायिका महाराष्ट्र की है और फिल्म का नायक तमिलनाडु का है। इस फिल्म में एकसाथ हिंदी, मराठी और तमिल सुनाई पड़ेगा। इसके बावजूद सबकुछ समझ में आएगा। ‘अय्या’ कॉस्मोपॉलिटन इंडियन फिल्म है। बड़े शहरों में इस तरह का मेल-मिलाप और नोंकझोंक भी आए दिन दिखाई देता है। सचिन कुंडलकर ने दोनों कल्चर की रोजमर्रा जिंदगी को भी चित्रित किया है।
-वाकड़ा का मतलब क्या होता है?
0 यह एक मराठी शब्द है। अंग्रेजी में इसे वैकी कहते हैं। क्वर्की समझिए। ‘अय्या’ की मीनाक्षी देशपांडे वाकड़ी है। हिंदी में सनकी वाकड़ा के करीब का शब्द है। फिल्म में मराठी लडक़ी और तमिल लडक़े का मिलन भी एक वाकड़ा मिलन है।
-सचिन कुंडलकर की यह पहली हिंदी फिल्म है। सुना है कि वे मराठी के साहित्यकार और स्तंभकार हैं। थोड़े बौद्धिक किस्म के प्राणी हैं?
0 इस फिल्म की शूटिंग के दरम्यान सचिन ने एक दिन मुझे कहा कि रानी एक बात बहुत अच्छी हुई है कि फिल्म में आप के आने के बाद मां-बाप की नजरों में मेरी इज्जत बढ़ गई है। घर में मैं काम का आदमी समझा जाने लगा हूं। उन्होंने यह भी कहा कि आप के साथ काम करने के बाद पॉपुलर फिल्म में मेरा यकीन बढ़ गया है।
-हिंदी फिल्मों से आप का लंबा संबंध रहा है। भारतीय सिनेमा के 100 साल हो गए हैं। आप हिंदी फिल्मों को किस तरह से परिभाषित करेंगी?
0 मेरा फिल्मी परिवार रहा है। बचपन से मैं फिल्में देखती रही हूं। छोटी उम्र में अभिनेत्री बन गई। उसके बाद तरह-तरह के निर्देशकों के साथ फिल्में कीं। उन सभी से मैंने सीखा है। उन्होंने मुझे मांजा और हिंदी फिल्मों केबारे में स्पष्ट धारणा बनाने में मेरी मदद की है। मैं एंटरटेनमेंट जॉनर की फिल्में पसंद करती हूं। इसी जॉनर में सेंसिबल फिल्में आ जाएं तो बेहतर हैं। लंबे अनुभव के बाद मैंने अपनी यही राह चुनी है। मैं चाहती हूं कि मेरी फिल्म ज्यादा-से-ज्यादा लोग देखें और थिएटर से निकलते समय उन्हें कुछ याद रह जाए। फिल्म में कोई न कोई तत्व इंटरेस्टिंग हो। फैमिली फिल्में मुझे ज्यादा पसंद हैं। फिल्में देखना फैमिली इवेंट बना रहे। फिर भी कहना चाहूंगी कि ‘नो वन किल्ड जेसिका’ जैसी फिल्म भी बीच-बीच में करती रहूंगी।
- पिछले कुछ सालों से आप के करियर में शिफ्ट दिख रहा है। खासकर ‘ब्लैक’ के बाद आप ने अलग ढंग की फिल्में करनी शुरू कर दी हैं। अभी लोग रानी मुखर्जी की फिल्में देखने जाते हैं। अब फिल्मों में रानी मुखर्जी ‘भी’ नहीं होती, ‘ही’ होती हैं। यह ‘भी’ से ‘ही’ का सफर कैसा रहा?
0 मैं चाहती तो वैसी कमर्शियल मसाला फिल्में करती रह सकती थी। अभी भी ऑफर आते हैं। इस संबंध में मैंने बहुत ज्यादा सोचा नहीं है। यह किसी रणनीति के तहत नहीं है। हां यह जरूर था कि मुझे भीड़ का हिस्सा बने रहना नहीं था। आप मेरा करियर देखें तो मैंने मां के कहने पर छोटी उम्र में फिल्म कर ली। मैं एक्ट्रेस बन गई और धीरे-धीरे सारे लोगों ने रानी मुखर्जी के तौर पर मुझे जान भी लिया। उस समय अगर मम्मी की बात नहीं मानी होती तो यह सब नहीं होता। मैं हमेशा कहती हूं कि सभी को अपनी मम्मी की बात माननी चाहिए। छोटी उम्र में हमें नहीं मालूम होता कि हममें क्या गुण हैं। मां-बाप भांप लेते हैं और सही रास्ते पर गाइड करते हैं। मां-बाप के बाद मुझे ढालने और आगे बढ़ाने में निर्देशकों का हाथ रहा। मैंने योजना बनाकर कभी काम नहीं किया। ‘मुझसे दोस्ती करोगे’ फिल्म करते समय मुझे एहसास हुआ था कि अब ‘भी’ नहीं ‘ही’ होना है। मुझे खास और महत्वपूर्ण किरदारों की फिल्में करनी चाहिए। उसके बाद आठ महीनों तक मैंने कोई फिल्म साइन नहीं की थी। तब पत्र-पत्रिकाओं में लिखा गया था कि रानी मुखर्जी तो चुक गईं। तभी मुझे एहसास हुआ कि अब ऐसी ही फिल्में करनी हैं, जो मेरे किरदार के इर्द-गिर्द हों। मुझे अपने दर्शकों और प्रशंसकों के लिए यह जिम्मेदार चुनाव करना पड़ेगा। उस फैसले के बाद ही राह बदली। फिर कुछ फिल्में चलीं और कुछ नहीं चलीं। मैं फिसली, गिरी और फिर से उठ खड़ी हुई।
-हिंदी फिल्में हीरो से पहचानी जाती हैं। दर्शकों को आदत हो गई है। फिल्म देखने जाने से पहले सभी पूछते हैं कि हीरो कौन है? ‘नो वन किल्ड जेसिका’ और ‘अय्या’ जैसी और कुछ फिल्मों में हीरो गौण है? यह बदलाव हिंदी फिल्मों और अभिनेत्रियों के लिए बहुत अच्छा है।
0 बदलाव दर्शकों और समाज में भी आया है। सिनेमा देखने का ढंग बदल गया है। मल्टीप्लेक्स आने के बाद अलग तरह की फिल्मों कोभी दर्शक मिलने लगे हैं। निर्माताओं का साहस बढ़ा है। मुझे नहीं लगता कि दस साल पहले ‘नो वन किल्ड जेसिका’ जैसी फिल्म कमर्शियल तरीके से बनाई जा सकती थी। ऐसा लगता है कि इस बदलाव में हम लोग कुछ कर रहे हैं। सच कहूं, तो समय के साथ सब कुछ बदल रहा है और हमें उसका लाभ मिल रहा है।
-आप खुद को किस प्रकार की अभिनेत्री मानती हैं?
0 मुझे हॉलीवुड की मेरिल स्ट्रिप बहुत अच्छी लगती हैं। अभी तक वे जिस तरह से फिल्में कर रही हैं, वह प्रशंसनीय है। इस उम्र में भी वह केंद्रीय किरदारों को निभाती हैं। उनकी फिल्में ऑस्कर में नामांकित होती हैं। उन्हें पुरस्कार भी मिलते हैं। जब भी उनकी फिल्म नामांकित होती है तो दूसरी फिल्मों की हीरोइनें मान लेती हैं कि इस बार उन्हें कुछ नहीं मिलेगा। मेरिल स्ट्रिप दुनियाभर की अभिनेत्रियों के लिए आदर्श हैं। मेरी दिली ख्वाहिश है कि मेरा करियर उनकी तरह का हो। उनसे बेहतर हो जाए तो और अच्छा। अपनी उम्र के हिसाब से फिल्में चुनूं। दर्शकों को पसंद आऊं और मेरी फिल्में सफल हों। यही तमन्ना है।
-एकमात्र अमिताभ बच्चन अपवाद हैं। अन्यथा हिंदी फिल्मों में सीनियर कलाकारों के लिए अमूमन केंद्रीय भूमिकाएं नहीं होती हैं। हमारे पास शबाना आजमी जैसी अनुभवी और प्रतिभाशाली अभिनेत्री हैं, लेकिन कोई भी उनके साथ फिल्म नहीं बना रहा।
0 वही तो मैं चाहती हूं। मेरिल स्ट्रिप की तरह ही बड़ी उम्र की अभिनेत्रियों को फिल्में मिलें। उनमें उनकी केंद्रीय भूमिका हो। ऐसा हो तो मुझे ज्यादा चिंता नहीं करनी होगी। धीरे-धीरे स्थितियां बदलेंगी। हिंदी फिल्मों के दर्शक ज्यादातर पुरुष हैं। अगर दर्शकों में स्त्रियों की बराबर की हिस्सेदारी हो जाए तो हमारे लिए भी रोल लिखे जाने लगेंगे।
-अभी दर्शकों तक फिल्मों के पहुंचने के तरीके बदल रहे हैं। कुछ फिल्में होम वीडियो में ज्यादा देखी जाती हैं। ऐसा अनुमान किया जा रहा है कि भविष्य में सिर्फ डीवीडी के जरिए भी फिल्म रिलीज हो सकती हैं। क्या आप कभी ऐसी फिल्म का हिस्सा बनना चाहेंगी?
0 मैं कभी ऐसा नहीं चाहूंगी। मैं हमेशा चाहूंगी कि मेरी फिल्में थिएटर में रिलीज हों। उन्हें लेकर सेलिब्रेशन हो। मैं एकदम स्पष्ट हूं कि जब तक दर्शक चाहेंगे तभी तक पर्दे पर दिखूंगी। उनका संकेत भर मिलेगा तो बोरिया-बिस्तर समेट लूंगी। हमें यह बात समझ में आ जाती है।
-आप की कौन सी ऐसी फिल्म रही है, जिसे दर्शकों ने बिल्कुल नापसंद किया?
0 मेरे ख्याल से ‘थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक’ ऐसी फिल्म थी। वे बहुत निराश हुए थे।
-अपने करियर में कौन सी फिल्मों को मोड़ मानती हैं?
0 करण जौहर की ‘कुछ कुछ होता है’, विक्रम भट्ट की ‘गुलाम’, मणि रत्नम की ‘युवा’, शाद अली की ‘साथिया’ संजय लीला भंसाली की ‘ब्लैक’, शाद अली की ‘बंटी और बबली’, कुणाल कोहली की ‘हम तुम’, राजकुमार गुप्ता की ‘नो वन किल्ड जेसिका’ और अब ‘अय्या’।
- इनमें से सिर्फ पांच फिल्में उपहार के रूप में किसी को देनी हो, तो कौन-कौन सी रह जाएंगी?
0 ‘ब्लैक’, ‘बंटी और बबली’, ‘अय्या’, ‘हम तुम’ और ‘साथिया’। पांच तो बहुत कम हैं। मैं उपहार में और भी पांच फिल्में दे सकती हूं।
- आप की पसंद और उपहार में आरंभिक करियर की फिल्में नहीं हैं?
0 उन फिल्मों में मैं केंद्रीय भूमिका में नहीं थी। जिन फिल्मों के नाम गिनाए, उन सभी में मेरी मुख्य भूमिकाएं रही हैं।
-अभिनेत्री और व्यक्ति रानी मुखर्जी के निर्माण में किन व्यक्तियों का योगदान रहा है?
सीखते तो हम बहुत सारे लोगों से हैं। फिल्म का सेट सबसे बड़ा शिक्षक होता है। मेरे व्यक्तित्व के निर्माण में आमिर खान और शाहरुख खान का बड़ा योगदान है। करण जौहर और विक्रम भट्ट के साथ मैंने काम किया है। उन्होंने मुझे ढाला और बनाया। कमल हासन और मणि रत्नम.. शाद अली, संजय लीला भंसाली, यश चोपड़ा, आदित्य चोपड़ा। इनके अलावा मेरे व्यक्तित्व को निखारने में मां-बाप और आदित्य चोपड़ा का बहुत बड़ा योगदान रहा है। जयदीप साहनी.. जयदीप से मुझे बात करना बहुत अच्छा लगता है। वैभवी मर्चेंट मेरी बहुत करीबी दोस्त है। शाद अली भी हैं।
- आप ने एक्टिंग की कोई ट्रेनिंग नहीं ली क्या?
0 रोशन तनेजा के स्कूल गई थी। मुझे फटाफट फिल्म करनी थी। उसके लिए कुछ बेसिक चीजें सीखनी थीं। उसी समय सरोज खान से डांस सीखा। रोशन तनेजा ने एक ही बात कही थी कि मेरे पास ऐसा कोई इल्म नहीं है, जिससे मैं एक्टिंग सीखा दूं। एक्टिंग सिखाई नहीं जाती है, यह आंतरिक प्रतिभा होती है। इसे खुद ही उभारना होता है। कह नहीं सकती कि मेरे अंदर अभिनेत्री के गुण पिता की तरफ से आए या मां की तरफ सेआए। कुछ तो रहा होगा।
-क्या आप को लगता है कि हिंदी फिल्मों की अभिनेत्रियों की सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ी है?
यह पहले से भी था। समय के साथ इसमें थोड़ा परिवर्तन आता जाता है। प्रतिष्ठा बढ़ी है। समाज में लड़कियों का सम्मान बढ़ा है। फिल्मों के पर्दे पर भी लड़कियों के चित्रण में बदलाव दिख रहा है। वे मॉर्डन लड़कियां हैं। ‘कॉकटेल’ में दीपिका को देख लें या ‘अय्या’ में मुझे देखेंगे। ‘नो वन किल्ड जेसिका’ की मीरा को याद कर लें। एक बार मेरे एक अमेरिकी प्रशंसक ने कहा था कि हिंदी फिल्में देखकर हमें भारत में लड़कियों की स्थिति का अंदाजा हो जाता है।
-सोसायटी के प्रति कितनी जागरूक हैं रानी मुखर्जी?
0 अभी तो मैं अपना घर संभाल लूं तो काफी होगा। हम सभी ऐसे फेज से गुजरते हैं, जब थोड़े बड़े होते हैं तो परिवार की जिम्मेदारी हमारे ऊपर आ जाती है। अभी मैं फैमिली स्टेज में हूं। इससे निकल आऊंगी तो सोसायटी के लिए भी कुछ करूंगी।
-अपना परिवार कब बसा रही हैं? यूं पूछूं कि कब सेटल हो रही हैं? उत्तर भारत में आप जैसी बेटियों के लिए यह कहने का चलन है कि वह बेटे से कम नहीं है। आप ने अपने बंगले का नाम माता-पिता के नाम पर ‘कृष्णा राम’ रखा है।
0 बेटियां किस मायने में बेटों से कम होती हैं। आज जब मैं कन्या भ्रूण हत्या की खबरें सुनती हूं तो बहुत दुख होता है। मुझे आश्चर्य होता है कि ये हत्यारे किस जमाने में रहते हैं। अभी औरत-मर्द का फर्क मिट गया है। हमारी संस्कृति में न जाने कहां से यह बात घुस गई है कि बेटों से ही वंश चलता है। इसी चिंता में माताएं बेटा पैदा करने के चक्कर में रहती हैं। देश के कई परिवारों में प्रगति हुई है। वहां बेटियों के जन्म पर जश्न मनाया जाता है। कुछ परिवार हैं, जहां बेटियां शोक की वजह बन जाती हैं। मैं तो चाहूंगी कि ऐसे पिताओं की संख्या बढ़ जाए, जो बेटियों से खुश होते हैं।
- आप के बचपन में कभी कोई ऐसा भेदभाव नहीं हुआ?
0 मेरी मां मेरे भाई से बहुत ज्यादा अटैच है। उसके कारण अलग हैं। मेरे भाई परिवार की पहली संतान हैं। मैं उनके पांच साल के बाद आई। पहले बच्चे को ज्यादा लाड़-प्यार मिल जाता है। कहते हैं मां का बेटों के साथ ज्यादा अटैचमेंट होता है और पिता का बेटियों से। मैं मुंबई में ही पैदा हुई और पली-बढ़ी। पहले जानकी कुटीर में रहती थी। मानिक कूपर स्कूल जाती थी। मैं जुहू की लडक़ी हूं। पढऩे का मेरा मन था। एसएनडीटी में होम साइंस में एडमिशन भी ले लिया था। मेरा मन इंटीरियर डिजाइन में जाने का था, लेकिन तब पिता के पास इतने पैसे नहीं थे कि मैं वह पढ़ाई कर सकूं। फिर एक्टिंग लाइन में चली आई।
-अभाव के इस बचपन का आज की रानी मुखर्जी पर कितना असर है?
0 लोग मुझसे पूछते हैं कि मैं कभी क्यों असुरक्षित महसूस नहीं करती। असफलताओं से मैं प्रभावित नहीं होती। उन सभी से मैं यही कहती हूं कि मुझे उम्मीद से ज्यादा मिला है। अगर शिकायत करूं तो बेशर्मी होगी। मेरी उपलब्धियां मेरी शुरूआत की तुलना में बहुत ज्यादा हैं।
-ऐसा लगता है कि आप के जीवन में दिया हुआ बहुत कम है, लिया हुआ ज्यादा है? कह सकते हैं कि यह किस्मत नहीं मेहनत का नतीजा है?
0 मैंने मेहनत तो बहुत की है। करियर की शुरूआत में मां-पिता को खुश करने के लिए काम करती थी। अब मैं उन्हें सुखी देखना चाहती हंू। शादी के बाद भी मैं मां-पिता का ऐसा ही ख्याल रखूंगी। यह बंगला भी उन्हीं के लिए बनाया है। वे अपनी बेटी की मेहनत से मिली सफलता का भरपूर आनंद उठाएं। मैंने कुछ युवाओं को देखा है कि एक फिल्म की कामयाबी के बाद बड़े स्टार बन जाते हैं। संबंधों को लेकर उनका रवैया बदल जाता है।
-अगली मुलाकात कब होगी?
‘अय्या’ की सक्सेस पार्टी में मिलूंगी।




Saturday, September 22, 2012

सिनेमा सोल्यूशन नहीं सोच दे सकता है: टीम चक्रव्यूह

- दुर्गेश सिंह


निर्देशक प्रकाश झा ताजातरीन मुद्दों पर आधारित फिल्में बनाने के लिए जाने जाते रहे हैं। जल्द ही वे दर्शकों के सामने नक्सल समस्या पर आधारित फिल्म चक्रव्यूह लेकर हाजिर हो रहे हैं। फिल्म में अर्जुन रामपाल पुलिस अधिकारी की भूमिका में हैं तो अभय देओल और मनोज वाजपेयी नक्सल कमांडर की भूमिका में। फिल्म की लीड स्टारकास्ट से लेकर निर्देशक प्रकाश झा से पैनल बातचीत:


अभय देओल
मैं अपने करियर की शुरुआत से ही ऐक्शन भूमिकाएं निभाना चाहता था लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा कोई किरदार मुझे नहीं मिला। यदि मिला भी तो उसमें ऐक्शन भूमिका का वह स्तर नहीं था। हिंदी सिनेमा में अक्सर ऐसा होता है कि लोग ऐक्शन के बहाने में कहानी लिखते हैं और उसको ऐक्शन फिल्म का नाम दे देते हैं। मुझे ऐसा किरदार बिल्कुल ही नहीं निभाना था। चक्रव्यूह में कहानी के साथ ऐक्शन गूंथा हुआ है। मुझे अभिनय का स्केल भी यहां अन्य फिल्मों से अलग लगा। मुझे यह नहीं पता था कि मेरा लुक कैसा होने वाला है। मैंने कई बार सोचा कि अगर नक्सल बनने वाला हूं तो कौन सी वर्दी पहनूंगा और कितनी फटी हुई होगी। फिर यहीं पर प्रकाश जी अन्य निर्देशकों से अलग हो जाते हैं। मैंने और प्रकाश जी ने बैठकर रीडिंग और डिस्कशन किए। प्रकाश जी की खासियत है कि आप किरदार के बारे में इनकी स्क्रिप्ट पढक़र जान जाते हैं। मसलन नक्सल विचारधारा और सोनी सोरी के बारे में फिल्म की स्क्रिप्ट पढऩे के बाद ही मुझे पता चला।

प्रकाश झा- मैं एक ऐसे राज्य से संबंध रखता हूं जहां के लोगों के लिए यह विचारधारा और इससे जुड़ा आंदोलन नई बात नहीं है। इस आंदोलन से जुड़े लोंगों से मेरी मुलाकात काफी पहले से होती रही है। बिहार और झारखंड में जहां-जहां नक्सल गतिविधियां है उसके बारे में मुझे पता है। 2003 में जब अंजुम रजबअली ने मुझे यह कहानी सुनाई तो मुझे लगा था कि इस पर बिना रिसर्च के फिल्म नहीं बन सकती है। यह कहानी दो ऐसे दोस्तों की कहानी है, जो समान सोच रखते हंै। एक पुलिस अधिकारी है जबकि दूसरा कानून की रेखा के दूसरी ओर जाकर नक्सली बन जाता है। फिल्म में समाज और उसकी व्यवस्था से जुड़े कई सवाल हैं जो आपको सोचने पर मजबूर कर दंगे। साठ साल की आजादी के बाद अब जब लोकतंत्र को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं तो इस तरह के संकेत खतरनाक है।

अर्जुन रामपाल
मैं हिंदू कालेज से पढ़ा हूं, मैंने अपने कई दोस्तों को इस विचारधारा का सपोर्ट करते हुए देखा है। मुंबई आने के बाद मैं कॉमर्शियल सिनेमा करता रहा और महानगर में रहने की वजह से मुझे इतनी जानकारी नहीं थी कि नक्सल क्या होते हैं और क्या करते हैं लेकिन मुझे पता चल गया। दर्शक को भी इस फिल्म के बाद पता चल जाएगा। प्रकाश जी के साथ काम करके एक ट्यूनिंग बन गई है। राजनीति प्रकाश छह साल पहले बनाना चाहते थे लेकिन उसमें देर हुई। छह साल पहले ही वो पृथ्वी के किरदार के लिए मेरे पास आए थे। जब फिल्म बनने लगी तो भी वो किरदार उन्होंने मुझे फिर से इस फिल्म का ऑफर दिया। एक निर्देशक का उम्र के इस पड़ाव में डेडिकेशन देखते बनता है। उनकी स्तर की रिसर्च करने वाले बहुत ही कम निर्देशक हैं हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में। मुझे और अभय को तो उन्होंने कई बाद ऐसी स्थिति में डाल दिया कि अरे यार अब यह कैसे होगा?

मनोज बाजपेयी
मैंने तो इस विचारधारा के साथ जीवन के कई साल बिताए हैं। मेरे लिए नक्सली का किरदार निभाना बहुत मुश्किल नहीं रहा। किरदार का लुक कैसा होगा? किरदार कैसे बोलेगा, हां इस पर जरूर थोड़ी बात हुई। बाकी प्रकाश झा के साथ काम करके अच्छा लगता है। अपने गांव- देश के हैं और दूसरी चीजों को लेकर उनकी समझ एकदम स्पष्ट है। इस मसले पर किसी भी तरह का स्टैंड लेना गलत होगा। जिसकी जमीन छीनी जा रही है, वह अपने हक के लिए लड़ेगा ही जबकि राज्य सत्ता के विरूद्ध जाना प्रजातंत्र के खिलाफ जाना है। हमें इस मसले पर बीच का रास्ता निकालना होगा अन्यथा स्थितियां विकट होती जाएंगी।

प्रकाश झा
फिल्म का काम है समस्या को उजागर करना न कि समाधान बताना। कोई फिल्मकार समाधान कैसे बता सकता है। वह भी एक ऐसी समस्या का जिसकी चपेट में देश के 250 जिले आते हों। शहरों में बैठकर हमें समस्या जितनी सरल लगती है उतनी सरल है नहीं। आजादी के बाद जो कुछ भी हुआ है इस देश में वह लगभग गलत हुआ है। आज साठ साल की आजादी के बाद हम लोकतंत्र पर सवाल उठा ही चुके हैं। पिछले सात-आठ सालों में जितना घूमता रहा हूं उतना ही रिसर्च किया है। गडचिरोली से लेकर बालाघाट तक और झारखंड के इलाकों में उसको देखकर लगता है समस्या इतना सरल नहीं है। मैंने जमीनी रिसर्च को ही कहानी में पिरोने की कोशिश की है। मसलन, नक्सलों की सबसे बड़ी आमदनी वसूली से आती है, पुलिस के फेक इनकाउंटर से लेकर छत्तीसगढ़ सरकार के सलवा जुडूम के गठन तक की कहानी फिल्म की मूल कहानी को कहीं न कहीं इंस्पायर तो करती ही हैं। साथ ही इस फिल्म में गरीब और अमीर के बीच बढ़ती जा रही खाई की वजह से जो हिंसक विचारधारा पनप रही है उसकी भी बात की गई है।

अभय देओल
मुझे लगता है कि यही पटकथा की खासियत है जो प्रकाश जी ने दो दोस्तों के माध्यम से कहने की कोशिश की है। दो दोस्तों की कहानी है जो विचारधारा अलग होने की वजह  से अलग हो जाते हैं और फिर जब उनमें दुश्मनी होती है तो वे कैसे एक दूसरे से पेश आते हैं। दो लाइन में कहूं तो यही फिल्म की कहानी है। नक्सल विचारधारा के साथ् कहानी को कैसे गूंथा जाए, ये प्रकाश जी का कमाल है। वो अपनी फिल्मों का अंत दर्शकों के ऊपर छोड़ देते हैं। एक निर्देशक के तौर पर उन्हें पता है कि क्या गलत है और क्या सही है लेकिन दर्शकों के सामने उनकी किसी भी फिल्म का एक अंत नहीं होता। यह दर्शकों पर होता है कि उन्हें इस फिल्म से क्या सीख लेनी है।

अर्जुन रामपाल
फिल्म में मेरा एक संवाद है कि देश को सीमा पार के दुश्मनों से उतना खतरा नहीं है जितना अंदर बैठे दुश्मनों से है। एक आईपीएस अधिकारी अधिकारी का किरदार निभाने के दौरान मुझे पता लगा कि किसी भी पुलिस अधिकारी को काम करने में कितनी मुश्किल होती होगी। इसका मतलब यह तो नहीं है कि हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। पूरे देश को पता है कि सिस्टम फेल हो रहा है तो क्या सिस्टम को सुधारा ही नहीं जा सकता। करप्शन से पूरा देश परेशान है लेकिन उसका समाधान कैसे होगा? एक लडक़ा अपना हक पाने के लिए नक्सली बनता है लेकिन उसकी विचारधारा की आड़ में भी करप्शन पनप रहा है। ऐसे कई मुद्दे इस फिल्म के माध्यम से उठाए गए हैं। दर्शकों के लिए यह फिल्म एक सीख के तौर पर भी है कि एक फिल्म की कहानी के जरिए देश में घटित हो रही चीजों की भी जानकारी आपको मिल रही है।


प्रकाश झा
लोग कहते हैं कि राजनीति के बाद से मैंने फिल्मों में स्टैंड लेना बंद कर दिया है। मैंने अपनी किसी फिल्म में कभी कोई स्टैंड नहीं लिया है। मैंने अपनी हर  फिल्म में किरदारों या कहानी के जरिए तथ्यों को पेश किया है। मृत्युदंड का उदाहरण लें तो पाएंगे कि तीन औरतें आर्थिक उदारीकरण और मंडल कमीशन के बाद के दौर में जूझ रही हैं लेकिन मैंने वहां भी नहीं बताया कि मंडल कमीशन गलत है या सही या फिर आर्थिक उदारीकरण गलत है या सही। मुझे कहानी के माध्यम से जो समीकरण सही लगता है वही दर्शकों के सामने पेश करता हूं। मैंने आज तक कभी कोई स्टैंड नहीं लिया यहां तक कि दामुल में भी मैंने दर्शकों के सामने स्पष्ट तौर पर कोई निर्णय दिया।

मनोज वाजपेयी
हमारे मुल्क में इतनी विविधताएं हैं और अलग-अलग विचारधाराओं के लोग हैं। आप एक विवादित मसले पर अपना फैसला किसी फिल्म के जरिए नहीं सुना सकते हैं। जिस नक्सल कमांडर का किरदार मैं निभा रहा हूं वह एकबारगी आपको देश के कई नक्सल कमांडरों का मिक्स वर्जन लगेगा लेकिन इसका किरदार ही ऐसा है कि आप किसी एक नाम नक्सल कमांडर से इसको कनेक्ट न कर सकें। हमारे देश में इतने पढ़े- लिखे लोग हैं कि न जाने किसकी विचारधारा कहां से आहत हो जाए? सिनेमा के जरिए स्टैंड लेना मुझे नहीं लगता कि उचित है।


Friday, September 21, 2012

फिल्‍म समीक्षा : हीरोइन


Film review: Heroin-अजय ब्रह्मात्‍मज
कल तक हीरोइन की हर तरफ चर्चा थी। निर्माण के पहले हीरोइनों की अदला-बदली से विवादों में आ जाने की वजह से फिल्म के प्रति जिज्ञासा भी बढ़ गई थी। और फिर करीना कपूर जिस तरह से जी-जान से फिल्म के प्रचार में जुटी थीं, उस से तो यही लग रहा था कि उन्होंने भी कुछ भांप लिया है। रिलीज के बाद से सारी जिज्ञासाएं काफूर हो गई हैं। मधुर भंडारकर की हीरोइन साधारण और औसत फिल्म निकली। हीरोइन उनकी पिछली फिल्मों की तुलना में कमजोर और एकांगी है। मधुर भंडारकर के विषय भले ही अलग हों,पर उनकी विशेषता ही अब उनकी सीमा बन गई है। वे अपनी बनाई रुढि़यों में ही फस गए हैं। सतही और ऊपरी तौर पर हीरोइन में भी रोमांच और आकर्षण है,लेकिन लेखक-निर्देशक ने गहरे पैठने की कोशिश नहीं की है। हीरोइनों से संबंधित छिटपुट सच्चाईयां हम अन्य फिल्मों में भी देखते रहे हैं। यह फिल्म हीरोइन पर एकाग्र होने के बावजूद हमें उनसे ज्यादा कुछ नहीं बता या दिखा पाती।
हीरोइन कामयाब स्टार माही अरोड़ा की कहानी है। माही मशहूर हैं। शोहरत, ग्लैमर और फिल्मों से भरपूर माही की जिंदगी में कायदे से उलझनें नहीं होनी चाहिए। हमें एक फिल्म पत्रकार बताती है कि टूटे परिवार से आने की वजह से माही बायपोलर सिंड्रम की शिकार है। वह असुरक्षित और संबंधों में अस्थिर है। ऊपर से मां का दबाव..वह अपनी जिंदगी जी ही नहीं पाती। उसके साथी उसके कंफ्यूजन और अस्थिरता को और बढ़ाते हैं। उसके पास किसी दोस्त या रिश्तेदार का ऐसा कंधा नहीं है,जहां वह दो आंसू बहा सके। सिगरेट, शराब और गोलियों में वह अप्राप्य शांति खोजती है। वह रिश्तों को पहचान भी नहीं पाती। अपने करिआ और ग्लैमर की फिक्र में वह सच्चा प्यार भी खो देती है। कहने को वह इंडेपेंडेंट लड़की है, लेकिन अपनी दुरुहताओं में ऐसी घिरी है कि न तो उसे चैन है और सुकून। मधुर भंडारकर की हीरोइन भावनाओं के उद्वेग में लरजती-कांपती कमजोर लड़की है। शंका और अनिर्णय से अपनी पोजीशन बनाए रखने की उसकी हर कोशिश असफल होती है। यह करीना कपूर की अभिनय क्षमता का कमाल है कि वह इस कमजोर किरदार में भी अपनी छाप छोड़ जाती हैं। हीरोइन सिर्फ करीना कपूर की भाव-भंगिमाओं और अदाओं के लिए देखी जा सकती है। करीना ने अपनी पिछली फिल्मों की तुलना में अधिक एक्सपोज किया है। फिल्म में ऐसे एक्सपोजर की खास जरूरत नहीं थी।
सिर्फ माही ही नहीं, हीरोइन के अधिकतर किरदार अधूरे, कंफ्यूज और भटकाव के शिकार हैं। मधुर भंडारकर की फिल्मों में प्रबल ग्रंथिपूर्ण मध्यवर्गीय दृष्टिकोण रहता है,जो सफल और उच्चवर्गीय समूह की जिंदगी को हिकारत की नजर से पेश करता है। ऐसे समूह और समाज के अंधेरों को मधुर मध्यवर्गीय चश्मे से देखते हैं। मध्यवर्गीय मानसिकता के दर्शकों को उनकी फिल्में अच्छी लगती हैं। ऐसे दर्शकों को हीरोइन भी अच्छी लग सकती है। मधुर ने पत्र-पत्रिकाओं में आए दिन छपते किस्सों को ही दृश्य बना दिया है। उन किस्सों की परतों और पृष्ठभूमि में वे नहीं जाते। उनकी पहले की फिल्मों में भी यथार्थ का टच भर रहा है। हीरोइन में यह टच पूर्वाग्रहों और धारणाओं को ही लेकर चलता है। यही कारण है कि माही का द्वंद्व हमें झकझोर नहीं पाता। उसे हमारी हमदर्दी नहीं मिल पाती। हीरोइन में करीना कपूर के अलावा दिव्या दत्ता ने अपने हिस्से के दृश्यों को संजीदगी से निभाया है। माही के सेक्रेटरी बने रशीद भाई की भूमिका में गोविंद नामदेव सटीक अभिनय किया है। अर्जुन रामपाल अपने किरदार की तरह ही बिखरे रहे। रणदीप हुडा छोटी भूमिकाओं में माहिर होते जा रहे हैं। यह फिल्मों के लिए अच्छा है,लेकिन उनके करिअर को आगे नहीं बढ़ाता। हीरोइन फिल्म इंडस्ट्री की अंदरुनी झलक नहीं देती। इंडस्ट्री के इस रूप और रंग-ढंग से फिल्मों के शौकीन दर्शक वाकिफ हैं। मधुर फिल्म पत्रकारों की हमेशा अजीब सी झलक देते हैं।
हीरोइन में सबसे ज्यादा निराश इसके सवादों और गीतों ने किया। टायटल सौंग सारगर्भित हो सकता था,जो हीरोइन की सही तस्वीर पेश करता। इसी प्रकार हलकट जवानी के बोल चालू होने के चक्कर में स्तरहीन हो गए हैं। एक-दो संवादों पर तालियां बज सकती हैं,लेकिन भावों के अनुरूप संवादों की कमी खलती है। ऐसा लगता है कि संवाद पहले अंगे्रजी में लिखे गए हों और फिर उनका हिंदी अनुवाद कर दिया गया हों। संवादों में हिंदी की रवानी नहीं है।
रेटिंग- ** 1/2 ढाई स्टार

Thursday, September 20, 2012

सिंगर प्रियंका चोपड़ा


- अजय ब्रह्मात्मज
फिल्म पत्रकारिता में स्टारों, निर्देशकों और तकनीशियनों से बार-बार की मुलाकात में कुछ आप के प्रिय हो जाते हैं। प्रियंका चोपड़ा उनमें से एक हैं। राज कंवर ने मिस वल्र्ड प्रियंका चोपड़ा और मिस यूनिवर्स लारा दत्ता के साथ ‘अंदाज’ शुरू की थी। उसमें उनके हीरो अक्षय कुमार थे। फिल्मालय स्टूडियो में इस फिल्म के सेट पर उन दिनों प्रियंका चोपड़ा अपने माता-पिता के साथ आती थीं। उनके माता-पिता ने बेटी के करियर के लिए बड़ा फैसला लिया था। वे बेटी को सहारा और आसरा देने के लिए सब कुछ छोडक़र मुंबई आ गए थे।
    उस पहली मुलाकात में ही प्रियंका चोपड़ा ने प्रभावित किया था। एक लगाव सा महसूस हुआ  था। मिडिल क्लास मूल्यों की प्रियंका चोपड़ा की बातों में छोटे शहरों में बिताए दिनों की प्रतिध्वनि सुनी जा सकती थी। मिस वल्र्ड खिताब से मिले एक्सपोजर और अमेरिका में स्कूल की पढ़ाई करने के बाद भी प्रियंका चोपड़ा में एक कस्बाई लडक़ी थी। इसे आप देख सकते हैं। बातें करने, इठलाने, मुस्कुराने, झेंपने, खिलखिलाने और एहसास में उत्फुल्लता नजर आती है। प्रियंका चोपड़ा ने गिरते-पड़ते और आगे बढ़ते हुए ‘बर्फी’ तक का सफर तय किया है। ‘बर्फी’ उनकी बेहतरीन फिल्म है। इस फिल्म की रिलीज के ठीक एक शाम पहले प्रियंका चोपड़ा ने अपना म्यूजिक सिंगल ‘इन माय सिटी’ रिलीज किया।
    प्रियंका चोपड़ा का शुभचिंतक होने के नाते ‘इन माय सिटी’ सुनने के पहले तक मुझे लगता रहा था कि वह म्यूजिक अलबम की कोशिश में अपना समय बर्बाद कर रही हैं। अच्छे-खासे फिल्म करियर के बीच में प्रियंका चोपड़ा का यह विक्षेप जंच नहीं रहा था। पिछले डेढ़-दो सालों की मुलाकातों में हर बार प्रियंका चोपड़ा बताती थीं कि वह कैसे अपने अलबम की तैयारी कर रही हैं। प्रियंका के उत्साह को अपने इंटरव्यू में मैंने कभी तूल नहीं दिया। न कभी ज्यादा चर्चा की कि प्रियंका चोपड़ा की गायिका के रूप में क्या महत्वाकांक्षाएं हैं। मुझे यही लगता रहा कि सफल स्टार मस्ती और कुछ अलग करने के लिए गाने गा लेते हैं। प्रियंका को भी ऐसे ही कुछ प्रायोजक और प्रशंसक मिल गए होंगे। उन्होंने चढ़ा दिया होगा और प्रियंका चोपड़ा ने गायकी में कुछ कर दिखाने का सोच लिया होगा।
    मुझे यही लगता रहा कि प्रियंका चोपड़ा कंफ्यूज हैं। करियर की ऊंचाई पर आए पठार से उकता कर वह घाटियों में उतर रही हैं। इन घाटियों में हरियाली तो मिलेगी, लेकिन क्रिएशन की वही ऊंचाई हासिल नहीं होगी, जो एक्टिंग पर ध्यान देने से आ सकती है। प्रियंका चोपड़ा फिल्मों की शूटिंग से समय निकाल कर लॉस एंजल्स चली जाती थीं। वहां वह कठिन रियाज करती थीं। अपनी आवाज को साधती थीं। उन्होंने अपनी उम्दा टीम बना ली और अपने अलबम पर काम करती रहीं। गायकी के प्रति प्रियंका के इस समर्पण के बारे में हम अधिक नहींं जानते। बस यही सुनते रहे हैं कि उनके पिता को भी गायकी का शौक है और उन्होंने प्रियंका को बचपन में ही गाना सिखाया था।
दरअसल, प्रियंका चोपड़ा के म्यूजिक सिंगल ‘इन माय सिटी’ ने मेरे वहम और आशंका को खत्म कर दिया। पॉप गायकी में यह इंटरनेशनल लेवल की आवाज है। प्रियंका चोपड़ा को अपनी मेहनत और साधना का सही नतीजा मिलता है तो वह इंटरनेशनल मंच पर इंडियन पॉप सिंगर के  तौर पर स्थापित हो सकती हैं। यह एक संभावना है। अब ऐसा लग रहा है कि प्रियंका चोपड़ा यह मुकाम हासिल कर लेंगी। अभिनय और गायिकी में संतुलन बनाए रखना भी प्रियंका का ही फैसला होगा।
    गौर करें तो अपने यहां फिल्म गायकी की लोकप्रियता ने बाकी हर प्रकार के संगीत को नुकसान पहुंचाया है। भारत से अभी तक कोई ऐसा सिंगर-परफार्मर उभर कर नहीं आया, जो भारतीय य महाद्वीप का प्रतिनिधित्व कर सके। मुझे सोनू निगम और सुनिधि चौहान में यह संभावना दिखी थी, लेकिन उनमें इसके लिए आवश्यक एकाग्रता नहीं रही। प्रियंका ने फिलहाल ठोस उम्मीद जगायी है, अब देखना है वह ऐसे अपने इस प्रयास को बढ़ाती हैं और इंटरनेशनल सिंगरकी जमात में शामिल होती हैं। फिलहाल पहले कदम की कामयाबी की शुभकामनाएं।

Monday, September 17, 2012

आइटम नंबर भी गाएंगे : रूना लैला व आबिदा परवीन



-अमित कर्ण
बांग्लादेश की प्रख्यात गायिका रूना लैला और पाकिस्तान की अजीमो-शान आबिदा परवीन अगले कुछ महीनों तक भारत में नजर आने वाली हैं। कलर्स के सिंगिंग रिएलिटी शो ‘सुर-क्षेत्र’ में दोनों आशा भोंसले के संग जज की भूमिका में हैं। इस शो में भारत और पाकिस्तान के प्रतिभागी हिस्सा ले रहे हैं। दोनों का मानना है कि इन दिनों आइटम नंबर का जलवा है, लेकिन लंबी रेस में मेलोडी ही सस्टेन करेगी।
-संगीत क्या है?
रूना:- यह इबादत का, प्यार का पैगाम फैलाने का सबसे नायाब जरिया है। यह समाज, राष्ट्र और दुनिया को जोडऩे वाली कड़ी है। म्यूजिक प्रिचेज लव। इस शो में भी हम वही रखने की कोशिश कर रहे हैं। मौसिकी के जरिए हम सब एक हो सकते हैं। इसकी मिसाल भी क्रॉस-बॉर्डर शो में देखने को मिलते हैं। वहां विभिन्न मुल्कों के प्रतिभागी साथ गा रहे हैं। खाना खा रहे हैं। हंसी-मजाक करते हैं। कोई अंतर महसूस नहीं होता। मेरे ख्याल से संगीत के जरिए हम आपसी कड़वाहट कम कर सकते हैं। सियासी लोगों से एक ही दरख्वास्त है कि संगीत को संगीत ही रहने दें, इसे सियासत का नाम न दें।
आबिदा:- यह मेरे लिए परवरदिगार की ईजाद है। इसके चलते पूरी कायनात जाहिर हुई। आप दुनिया में कहीं चले जाएं।  इन्हीं 12 सुरों के भीतर सारी कायनात की आवाज शामिल है। यह खुदा की कैफियत है। इक हकीकत है। जरिया है, जिसकी मदद से हम खुद को खुदा से जोड़ सकते हैं।
-वक्त के साथ इसमें क्या बदलाव आए हैं? आप को लगता है कि गजल और कव्वाली जैसे गानों के जॉनर से युवा पीढ़ी कनेक्ट हो रही है?
रूना:- गीत-संगीत तो काफी बदला है। एक समय था, जब मैंने ‘एक से बढक़र एक’ के लिए गाना गाया था। यह हेलेन पर फिल्माया गया था, लेकिन आज इस तरह के गाने हीरोइन पर फिल्माए जा रहे हैं। आइटम नंबर ने जोर पकड़ा है। गजल और कव्वाली के प्रति युवाओं का प्रेम बढ़ा है। आज सुरीले संगीत में पिरोया हुआ अर्थपूर्ण गाना युवाओं को बहुत पसंद पड़ता है।

आबिदा:- कोई खास बदलाव नहीं है। गाने कहानी की तरह हैं। जिस तरह दुनिया में आज भी 9 किस्म की कहानियां हैं, वैसे ही सुर 12 ही हैं। 13 न ईजाद हुआ है, न होगा। फिल्मों की बात करें, तो उनमें सूफीयाना संगीत का प्रभाव काफी बढ़ा है। मुझे याद है, जब रब्बी शेरगिल एक बार मेरे पास आए और कहा कि आप की वजह से मैं सूफी संगीत सुनता हूं। यह सुनकर काफी अच्छा लगा। आप के दूसरे सवाल का जवाब भी रब्बी शेरगिल हैं। उनके गानों को सबसे ज्यादा युवाओं ने पसंद किया। आज से सात साल पहले उनका गाया गाना ‘बुल्ला की जाना’ आज भी लोगों को काफी पसंद हैं। कहने का मतलब यह है कि अगर बेहतर संगीत हो, तो गजल और कव्वाली युवाओं को ज्यादा अट्रैक्ट करती है।
-हिंदी फिल्मों के लिए गाने की क्या योजनाएं हैं? इन दिनों आइटम नंबर का दौर है। गाएंगी?
रूना:- मैं अच्छे ऑफर के इंतजार में हूं। आखिरी बार अमिताभ बच्चन की ‘अग्निपथ’ में गाना गाया था। इन दिनों हिंदी फिल्म गीत-संगीत में ढेर सारे प्रयोग हो रहे हैं। पाकिस्तान और दूसरे मुल्क के कलाकार अपना जलवा बिखेर रहे हैं। मौका मिला तो जरूर गाऊंगी। जहां तक, आइटम नंबर का सवाल है, तो उसमें बुरा क्या है? मुझे यह बात समझ में नहीं आती कि लोग उन गानों को गलत नजरों से क्यों देखते हैं। हां, अल्फाज गलत नहीं होने चाहिए। अच्छे लफ्ज से लैस गाने मिलें, तो जरूर गाऊंगी।
आबिदा : शाहरुख ‘रा-वन’ का ऑफर लेकर मेरे पास आए थे। ए आर रहमान मुझे बहुत चाहते हैं। उन्होंने मुझे एक गाना ऑफर किया है। इंशाअल्लाह सही वक्त आने पर मैं जरूर हिंदी फिल्मों के लिए गाऊंगी। आइटम नंबर वाले गानों में एक अलग किस्म की ऊर्जा है। उसे हीन नजरों से नहीं देखा जाना चाहिए। मेरी पसंदीदा गायिका आशा जी ने कई आइटम नंबर को अपनी आवाज दी है।
-अदाकार के लिए एक तय फेज होता है। गायिकी के साथ भी ऐसा ही है न? बेहतरीन आवाज के मालिक कुमार शानु आज कहां हैं किसी को पता नहीं?
रूना:- गायिकी का भी फेज होता है, लेकिन यह अदाकारों के दौर से लंबा चलता है। लता जी और आशा जी की आवाज आज भी उतनी ही प्यारी लगती है, जितनी सातवें और आठवें दशक में लगती थी। यह निर्भर करता है, कि गायिका या गायक विशेष खुद को वक्त के साथ कितना तालमेल बिठाते हैं। मेरा मानना है कि जो बदलते समय के साथ नहीं चलते वे गुम हो जाते हैं। कुमार शानु की स्थिति में भी ऐसा हुआ होगा।
आबिदा:- आप का एक सवाल युवाओं की दिलचस्पी को लेकर था, तो उन्हीं युवाओं की आइडियल मैडोना का हवाला दूंगी, जो आज भी स्टेज पर आती हैं, तो आग लग जाती है। नुसरत फतेह अली खां साहब की आवाज युवा कलाकारों पर भी फिट बैठती थी। अहम यह है कि समय के साथ संतुलन बिठाया जाए। जगजीत सिंह के गाने आमिर खान स्टारर ‘सरफरोश’ तक में आए थे।
-कहते हैं, तानसेन जब गाते थे, तो बारिश होने लगती थी, आग लग जाती थी। आप दोनों ऐसा मानती हैं?
आबिदा:- इसका जवाब पहले मैं दूंगी। ऐसा है। गायिकी में बहुत ताकत है। तानसेन का असल नाम तान हुसैन था। उन पर इमाम हुसैन का हाथ था। मेरे पीर भी ऐसा करते थे। वे जो चाहते, अपनी गायिकी से कर सकते थे।
रूना:- आबिदा जी ने बिल्कुल सही कहा। गीत कई मर्ज की दवा है। यह हमारी एफीसिएंसी बढ़ाती है।

Sunday, September 16, 2012

मुझे फिल्मों में ही आना था- राज कुमार


-अजय ब्रह्मात्मज
उन्होंने अपने नाम से यादव हटा दिया है। आगामी फिल्मों में राज कुमार यादव का नाम अब सिर्फ राज कुमार दिखेगा। इसकी वजह वे बताते हैं, ‘पूरा नाम लिखने पर नाम स्क्रीन के बाहर जाने लगता है या फिर उसके फॉन्ट छोटे करने पड़ते हैं। इसी वजह से मैंने राज कुमार लिखना ही तय किया है। इसके अलावा और कोई बात नहीं है।’ राज कुमार की ताजा फिल्म ‘शाहिद’ इस साल टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में दिखाई गई। पिछले दिनों अनुराग कश्यप की फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर-2’ में उन्होंने शमशाद की जीवंत भूमिका निभाई। उनकी ‘चिटगांव’ जल्दी ही रिलीज होगी। एफटीआईआई से एक्टिंग में ग्रेजुएट राज कुमार ने चंद फिल्मों से ही, अपनी खास पहचान बना ली है। इन दिनों वे ‘काए पो चे’ और ‘क्वीन’ की शूटिंग कर रहे हैं।
    -आप एफटीआईआई के ग्रेजुएट हैं, लेकिन आप की पहचान मुख्य रूप से थिएटर एक्टर की है। ऐसा माना जाता है कि आप भी एनएसडी से आए हैं?
0 इस गलतफहमी से मुझे कोई दिक्कत नहीं होती। दरअसल शुरू में लोग पूछते थे कि आप ने फिल्मों से पहले क्या किया है, तो मेरा जवाब थिएटर होता था। फिल्मों में लोग थिएटर का मतलब एनएसडी ही समझते हैं, इसलिए यह गलतफहमी है। अब धीरे-धीरे लोगों को मालूम हो रहा है कि मैं एफटीआईआई से आया हूं। पिछले दो-तीन सालों में और भी कुछ छात्र आए हैं।
    - एक जमाने में एफटीआईआई से एक्टर की पूरी जमात आई थी। वे सभी आज मशहूर हैं। एक अंतराल के बाद आप लोग उस ट्रेडिशन को आगे बढ़ा रहे हैं। अभी कैसी फैकल्टी है और वहां पढऩे का क्या लाभ हुआ?
0 पेंटल साहब हमारे हेड थे। फैकल्टी काफी अच्छी थी। दो सालों की पढ़ाई में उनलोगों ने एक्टिंग की बारीकियां सिखाईं। वहां थोड़ी आजादी भी दी जाती है। आप ने सही कहा। एक समय एफटीआईआई से काफी एक्टर हिंदी फिल्मों में आए। उन्होंने हिंदी फिल्मों की एक्टिंग को नई दिशा दी। बीच में वहां एक्टिंग की पढ़ाई बंद हो गई थी। अब शुरू हुई है। धीरे-धीरे हमारी तादाद बढ़ेगी।
    - आप ने एफटीआईआई जाने की जरूरत क्यों महसूस की? आप के पहले नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी ने एनएसडी से पढ़ाई पूरी करने के बाद एफटीआईआई से भी अभिनय का प्रशिक्षण लिया। क्या एफटीआईआई में फिल्म एक्टिंग की खास पढ़ाई होती है?
0 मैं दिल्ली में थिएटर कर रहा था। वहां श्रीराम सेंटर से जुड़ा हुआ था। 2004 में जब एफटीआईआई में एक्टिंग का कोर्स चालू हुआ तो एक मित्र वहां गए। उनके बारे में सुनने और जानने के बाद मैंने भी एफटीआईआई में ही जाना उचित समझा। एनएसडी का ख्याल मुझे कभी नहीं आया। मुझे थिएटर करना ही नहीं था। शुरू से स्पष्ट था कि मुझे फिल्मों में एक्टिंग करनी है। मेरे दिमाग में यह बात थी कि एफटीआईआई मुंबई के नजदीक है। एफटीआईआई से निकले काफी लोग फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय हैं। मुझे लगा कि उससे थोड़ी सहूलियत होगी।
    -फिल्मों में एक्टिंग करने का फैसला कब लिया आप ने?
0 सच कहूं तो स्कूल के दिनों में सोच लिया था। स्कूल के वार्षिक समारोहों और सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लिया करता था। दोस्तों और शिक्षकों की प्रशंसा से लगा कि मैं कुछ कर सकता हूं। उन्हीं दिनों यह ख्वाब पैदा हुआ। बाद में डांस सीखा, थिएटर किया, नाटक पढ़े, फिल्में देखी.. और खुद को फिल्मों के लिए तैयार किया।
    - अपनी पृष्ठभूमि के बारे में बताएं?
0 मैं गुडग़ांव का हूं। उस गुडग़ांव का, जो एक गांव हुआ करता था। अभी तो वह सिंगापुर का मुकाबला कर रहा है। हम रात में छतों पर चादर बिछाकर सोया करते थे। ऊपर तारों से सजा आकाश होता था। वहीं कुछ सपने देखे थे। मेरे पिता पटवारी थे। उन्होंने ईमानदार जिंदगी जी और उसी की सीख दी। मैं तीन भाइयों में सबसे छोटा हूं। दोनों बड़े भाई भी एक्टिंग और डांसिंग के शौकीन थे। फिलहाल वे नौकरी कर रहे हैं। मुझे पर्दे पर देखकर उन्हें सबसे ज्यादा खुशी होती है। शायद मैं उनके अधूरे ख्वाबों को भी जी रहा हूं। बहुत संबल मिलता है। बतौर एक्टर मुझे बचपन की सरल और साधारण जिंदगी बहुत मदद करती है। मैंने चेहरे और किरदार पढ़े हैं। वे सभी मेरे अंदर जिंदा हैं। मैंअपने परिवार और परिवेश का शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने मुझे बचपन में ही अनौपचारिक ट्रेनिंग दे दी। मैं संयुक्त परिवार से आता हूं। रिश्तों की रेस्पेक्ट जानता हूं। रहते हम लोग गुडग़ांव में थे, लेकिन दिल्ली आना-जाना लगा रहता था। मुझे एक साथ गांव और शहर दोनों को समझने और जीने का मौका मिला।
    - परिवार का माहौल कैसा था? फिल्मों के प्रति मां-बाप की रुचि थी या नहीं?
0 फिल्मों के प्रति बहुत ज्यादा रूझान नहीं था, लेकिन मेरी मां अमिताभ बच्चन की जबरदस्त प्रशंसक हैं। पिताजी को राजेश खन्ना ज्यादा पसंद थे। उनके गाने वे आज भी गुनगुनाया करते हैं। भाइयों को फिल्मों का शौक था। उन्हीं के साथ मुझे भी फिल्में देखने को मिल जाती थी। मुझे बचपन से पूरी आजादी मिली। फिल्में देखने पर कोई पाबंदी नहीं थी, लेकिन मैंने कभी इसका नाजायज फायदा नहीं उठाया। मेरे ऊपर 90 प्रतिशत अंक लाने का या डॉक्टर-इंजीनियर बनने का दवाब नहीं था। मैं ठीक-ठाक छात्र रहा हूं। परीक्षा के समय पढक़र फस्र्ट क्लास लाया करता था। पिताजी ने बताया था कि वे परीक्षा के दिनों में फिल्में जरूर देखते थे। उनसे यह आदत मैंने भी सीख ली।
    -फिल्मों में काम मिलने में कितनी दिक्कतें हुईं? संघर्ष कितना लंबा और कठिन रहा?
0 मुझे लगभग एक साल कथित स्ट्रगल करना पड़ा। आने के बाद मैंने भी वही तरीका अपनाया कि प्रोडक्शन हाउस में जाकर अपनी तस्वीर छोड़ो और फिर उनके फोन का इंतजार करो। ज्यादातर निराशा ही हाथ लगती थी। मैंने उन्हीं दिनों दोस्तों की मदद से अपना एक शोरील बनाया। डीवीडी के ऊपर अपनी तस्वीर चिपकाई और किसी प्रोफेशनल एक्टर की तरह उन्हें प्रोडक्शन के दफ्तरों में छोड़ा। फिर कहीं अखबार में पढ़ा कि दिबाकर बनर्जी को   ‘लव सेक्स और धोखा’ के लिए नए कलाकार चाहिए। मुझे यकीन हो गया कि मेरे लिए ही उन्होंने यह शर्त रखी है। मैंने उनके कास्टिंग डायरेक्टर से संपर्क किया। संयोग देखें कि मेरा चुनाव हो भी गया। उस एक फिल्म ने हिंदी फिल्मों में मेरा प्रवेश आसान कर दिया। उसके तुरंत बाद  ‘रागिनी एमएमएस’ मिल गई। वैसे  ‘लव सेक्स और धोखा’ की शूटिंग के बाद ही मैंने  ‘चिटगांव’ की शूटिंग शुरू कर दी थी और  ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर 2’ के लिए हां कह दिया था। फिर विजॉय नांबियार ने  ‘शैतान’ में छोटा सा अपीयरेंस दिया। अभी तक के अपने काम से संतुष्ट हूं और मुझे लग रहा है कि सही दिशा में बढ़ रहा हूं।
    -अपनी फिल्म  ‘शाहिद’ के बारे में बताएं?
0 यह मुंबई के वकील शाहिद आजमी के जीवन पर आधारित है। वे ऐसे निर्दोष व्यक्तियों की वकालत करते थे, जिन्हें किसी गलतफहमी या साजिश के तहत गंभीर अपराधों के लिए गिरफ्तार कर लिया गया था। उन्होंने कई निरपराध आरोपियों को बरी कराया। उनके इस रवैए से परेशान होकर असामाजिक तत्वों ने राजनीतिक कारणों से उनकी हत्या कर दी। हंसल मेहता ने उनकी जिंदगी पर बहुत ही संवेदनशील फिल्म बनाई है। मुझे पूरा विश्वास है कि यह फिल्म मेरी क्षमताओं से दर्शकों और समीक्षकों को परिचित कराएगी।
    -आप का करियर अच्छा और सीधा ऊंचाई की ओर बढ़ रहा है। अभी तक की फिल्मों में किस अभिनेता या अभिनेत्री के साथ एक फ्रेम में आने की सबसे ज्यादा खुशी हुई? भविष्य में और किस के साथ आना चाहेंगे?
0  ‘चिटगांव’ में मनोज बाजपेयी के साथ आना मेरे लिए गर्व की बात थी। उनके साथ एक कनेक्शन महसूस करता हूं। वे भी दिल्ली से थिएटर कर मुंबई आए। मैं उन्हीं के पद्चिह्नों पर चल रहा हूं। उसके बाद  ‘तलाश’ की शूटिंग में आमिर खान के साथ काम करने का मौका मिला। आमिर बड़े ही सहज और डेमोक्रेटिक स्टार हैं। उन्होंने फिल्म एक्टिंग की बारीकियां बातों-बातों में सिखा दीं। भविष्य में चाहूंगा कि कभी इरफान के साथ काम करने का मौका मिले। मुझे डर है कि शायद मैं सहज नहीं रह पाऊंगा। मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं और उनके प्रभामंडल से प्रभावित हूं। उन्होंने हिंदी फिल्मों में एक्टिंग की नई परिभाषा गढ़ी है।

Saturday, September 15, 2012

हां हिंदी,ना हिंदी

हां हिंदी ना हिंदी..-अजय ब्रह्मात्मज
 आज हिंदी दिवस है। देश-विदेश की अनेक बैठकों और सभाओं में फिल्मों के संदर्भ में हिंदी की बात होगी। बताया जाएगा कि हिंदी के विकास में हिंदी फिल्मों की बड़ी भूमिका है। जो काम हिंदी के शिक्षक, अध्यापक और प्रचारक नहीं कर पाए, वह काम हिंदी फिल्मों ने कर दिया। ऊपरी तौर पर इसमें पूरी सच्चाई है।
पिछले 70 सालों में हिंदी फिल्मों के संवाद और गाने सुनकर अनेक विदेशी और गैर हिंदी भाषियों ने हिंदी समझनी शुरू कर दी है। हिंदी फिल्मों से हिंदी के प्रति उनकी रुचि जागी और उनमें से कुछ आज हिंदी के क˜र समर्थक हैं। उन्होंने अपने हिंदी ज्ञान का श्रेय भी हिंदी फिल्मों को दिया है।
हिंदी फिल्मों की भाषा ऐसी हिंदी होती है जिसे देश के किसी भी कोने में बैठा दर्शक समझ सके। हिंदी फिल्मों की भाषा वर्गीय दीवारों को तोड़ती है। वह हर तबके के दर्शकों के लिए एक सी होती है। फिल्मों में आवाज आने के साथ संवादों का चलन हुआ और इन संवादों की भाषा को सरल और बोधगम्य बनाने की हर कोशिश की गई। शुरू में रंगमंच और पारसी थिएटर से आए लेखकों ने इसका स्वरूप तय किया। फिर समाज के विकास के साथ भाषायी प्राथमिकता भी बदली। इन दिनों एक साथ अंग्रेजी बहुल हिंदी, मुंबइया हिंदी, स्थानीय लहजे की हिंदी और बोलियों से प्रभावित हिंदी का चलन है।
फिल्मों के परिवेश के हिसाब से संवादों की भाषा तय की जाती है। संवाद लेखक और निर्माता मिलकर इसे तय करते हैं। अंतिम लक्ष्य एक ही होता है कि फिल्म लक्षित दर्शकों की समझ में आ सके। लेकिन हिंदी फिल्मों में हमें जो-जो पर्दे पर दिखाई और सुनाई देता है, वही सच नहीं है। सभी जानते हैं कि भारत में राष्ट्रीय स्तर की राजनीति करनी है तो हिंदी आनी चाहिए, वैसे ही मनोरंजन के बड़े बाजार के लिए हिंदी अनिवार्य हो गई है। टीवी शो, समाचार चैनल और फिल्मों की भाषा हिंदी हो तो दर्शकों का दायरा बढ़ता है। दर्शकों के अनुपात में कमाई भी बढ़ती है। कोशिश होती है कि सहज-सरल हिंदी रखी जाए। इस काम के लिए हिंदी के कॉपी राइटर और डॉयलॉग राइटर रखे जाते हैं। टीवी शो हिंदी में लिखे जाते हैं, लेकिन हिंदी फिल्मों के लिए यह बात नहीं कही जा सकती। हिंदी फिल्मों में हिंदी की स्थिति दयनीय है।
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में हिंदी को अंगे्रजी का लकवा मार गया है। इन दिनों हिंदी फिल्मों की 90 प्रतिशत स्क्रिप्ट अंगे्रजी में लिखी जाती है। उसके संवाद रोमन में लिखे जाते हैं, ताकि उसे आज के अंगे्रजीदां कलाकार व अन्य लोग पढ़ सकें । तर्क यह दिया जाता है कि हिंदी में लिखने की अनेक दिक्कतें हैं। पहली दिक्कत तो यही है कि वे लोग उसे पढ़ नहीं सकते। हिंदी पढ़ने की उनकी क्षमता मिडिल स्कूल के स्तर की होती है और लिखने की क्षमता प्राइमरी स्कूल के स्तर की..। अमिताभ बच्चन अपवाद हैं, जो हिंदी में स्क्रिप्ट मांगते हैं और भाषागत अशुद्धि दिखने पर सुधार भी करते हैं। निर्देशकों में हिंदी प्रदेशों से आए निर्देशक ही हिंदी में लिखना-पढ़ना पसंद करते हैं। नई पीढ़ी के अधिकांश निर्देशक और लेखक स्क्रिप्ट राइटिंग के सॉफ्टवेयर के चलन के बाद अंग्रेजी में ही लिखने में सहूलियत महसूस करते हैं।
सच्चाई यही है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में हिंदी सुनकर समझी जाती है और बोलकर बता दी जाती है। डबिंग के समय कोई सहायक निर्देशक भाषा की मामली शुद्धता का खयाल रखता है। हर एक पंक्ति कलाकार को लहजे के साथ बताई जाती है। कलाकार तत्क्षण उसकी नकल कर बोल देते हैं। दर्शक इठलाते रहते हैं कि उनके प्रिय कलाकार हिंदी बोल रहे हैं। चर्चा होती है कि हिंदी के विकास में हिंदी फिल्में योगदान कर रही हैं। इस योगदान और वास्तविक स्थिति को समझने के लिए ऊपरी और भीतरी सच के फर्क को ध्यान में रखना होगा। फिल्म इंडस्ट्री में हिंदी व्यवहार की भाषा नहीं रह गई है। सिर्फ उसका उपयोग किया जाता है।

Friday, September 14, 2012

फिल्‍म समीक्षा : बर्फी

निश्छल प्रेम सी मीठी बर्फी 

-अजय ब्रह्मात्मज 

अगर फिल्म के शुरू में कही गई पंक्तियों को गौर से सुन लें तो अनुराग बसु की बर्फी को सही संदर्भ और अर्थ में समझने में मदद मिलेगी। चुटीले शब्दों में हिदायत देने के बाद कहा गया है..आज का प्यार ऐसा,टू मिनट नूडल्स जैसा,फेसबुक पर पैदा हुआ,कार में हुआ ये जवां,कोर्ट में जाकर गया मर..आज के प्रेम की शहरी सच्चाई बताने के बाद फिल्म मिसेज सेनगुप्ता के साथ दार्जीलिंग पहुंच जाती है। मिसेज सेनगुप्ता श्रुति हैं। वह बर्फी की कहानी सुनाती हैं। कभी दार्जीलिंग में बर्फी ने पहाड़ी झरने सी अपनी कलकल मासूमियत से उन्हें मोह लिया था। मां के दबाव और प्रभाव में उन्होंने मिस्टर सेनगुप्ता से शादी जरूर कर ली,लेकिन बर्फी का खयाल दिल से कभी नहीं निकाल सकीं। अपने रोमांस के साथ जब वह बर्फी की कहानी सुनाती हैं तो हमारे दिलों की धड़कन भी सामान्य नहीं रह जाती। कभी आंखें भर आती हैं तो कभी हंसी आ जाती है।
बर्फी गूंगा-बहरा है। स्वानंद किरकिरे की पंक्तियों और गायकी आला बर्फी के साथ इंट्रोड्यूस होते ही बर्फी हमारा प्रिय हो जाता है। वह हमें रिझा लेता है। उसके म्यूट ही हंसने और रोने और दिल टूटने पर भी मुस्कराने से हमारा कठोर मन पसीजने लगता है। बगैर कुछ बोले ही बर्फी सारे भाव व्यक्त करता है। कलकत्ता से दार्जीलिंग आई श्रुति को देखते ही बर्फी उस पर लट्टू हो जाता है। वह अपना प्रेम जाहिर करता है। यह पता चलने पर कि श्रुति की सगाई हो चुकी है। वह शहर के टावर की घड़ी की सूइयों का पीछे खिसका कर श्रुति से उन पलों को भूल जाने का निवेदन करता है। दोनों मिलते रहते हैं। श्रुति उसे चाहने लगती है,लेकिन उसकी मां अपने जीवन का दृष्टांत देकर उसे समझा देती हैं कि सारी निश्छलता के बावजूद बर्फी के साथ सुखी जीवन नहीं बिताया जा सकता। बर्फी केजीवन से श्रुति निकलती है और फिर से झिलमिल दाखिल होती है। झिलमिल उसके बचपन की दोस्त है। वह ऑटिस्टिक है। मां-पिता ने उसे ऑटिस्टिक स्कूल में छोड़ रखा है। नाना की जिद पर उसे घर लाया जाता है। एकाकी झिलमिल को बर्फी का साथ अच्छा लगता है। दोनों एक-दूसरे की संगत पसंद करते हैं। उनके बीच का प्रेम अव्यक्त और रुहानी है। मिसेज सेनगुप्ता उन दोनों के प्रेम से रश्क करती हैं,लेकिन सहानुभूति और दया भाव के साथ।
मिसेज सेनगुप्ता की सहानुभूति और दया भाव से फिल्म थोड़ी कमजोर होती है। ऐसा लगता हैकि इस सहानुभूति की कोई जरूरत नहीं थी। बर्फी और झिलमिल का प्रेम दुनियावी है ही नहीं। वे सामान्य इंसान नहीं हैं,इसलिए न तो वे प्रेम का प्रदर्शन करते हैं और न ही उसके दैहिक सुख के लिए व्याकुल हैं। साहचर्य और निकटता भी कई बार प्रेम के सुखद एहसास से तृप्त कर देती है। प्रेम का यह एहसास पर्दे से छलक कर दर्शकों तक आता है। बर्फी निश्छल प्रेम सी मीठी फिल्म है। इसकी मिठास मारक नहीं,प्रेरक है। फिल्म में मुख्य किरदारों की कहानी से परे कई अंतर्कथाएं भी चलती हैं। निर्देशक ने उन पर अलग से टिप्पणी नहीं की है। फिर भी हमें उस माहौल,परिवेश और समाज की जानकारी मिलती है।
बर्फी के किरदार को रणबीर कपूर ने कैरीकेचर नहीं होने दिया है। उनकी और निर्देशक की मंशा नहीं है कि दर्शक उनके प्रति हमदर्दी रखें। निश्चित ही रणबीर कपूर व‌र्त्तमान पीढ़ी के उम्दा अभिनेता हैं। उन्होंने बर्फी की मासूमियत को जीवंत कर दिया है। इस किरदार के चित्रण में रणबीर कपूर ने चार्ली चैप्लिन और राज कपूर के अभिनय की शैलीगत विशेषताओं का वाजिब उपयोग किया है। रणबीर हर तरह की चुनौतीपूर्ण भूमिका के लिए समर्थ अभिनेता हैं। इसे उनकी नकल कहना ठीक नहीं होगा। गौर कीजिएगा कि बर्फी एक-दो बार अपने नाम के अलावा और कुछ बोलने का प्रयास नहीं करता। फिर भी फिल्म में एक भी ऐसा दृश्य नहीं है जो संवादहीन रह गया हो। अनुराग बसु ने साबित किया है कि ऑडियो विजुअल मीडियम में कहानी के लिए हमेशा संवादों के सहारे की जरूरत नहीं है। यहीं शुजीत कोइरी के साउंड डिजाइन और प्रीतम के पाश्‌र्र्व संगीत की तारीफ करनी होगी। उन्होंने बर्फी और झिलमिल की बहुत मदद की है। पीरियड के हिसाब से किरदारों का पहनावा तैयार करने में अकी नरूला और शेफलिना ने काबिलियत दिखाई है।
फिल्म की दोनों नायिकाओं ने अपने किरदारों केसाथ न्याय किया है। पहली बार हिंदी फिल्म के पर्दे पर दिख रही इलियाना डिक्रूज के व्यक्तित्व में किरदार की सादगी और ताजगी है। वही फिल्म की नैरेटर भी हैं। स्पष्ट है कि वह अनुभवी अभिनेत्री हैं। प्रियंका चोपड़ा के लिए झिलमिल केकिरदार में बने रहना मुश्किल काम रहा होगा। उनकी मेहनत दिखाई पड़ती है,इसलिए कई दूश्यों में झिलमिल के आचरण में कृत्रिमता नजर आती हे। प्रियंका चोपड़ा ने सहज अभिनय की भरसक कोशिश की है। यह उनकी उल्लेखनीय फिल्म रहेगी। दिल तो सौरभ शुक्ला जीत लेते हैं। बर्फी के पीछे भगते-भागते उनकी कमर 52 से 42 इंच की हो गई है। वे उकता गए हैं,लेकिन बर्फी के प्रति उनकी हमदर्दी जाहिर हो ही जाती है। वे फिल्म में गति और हंसी दोनों लाते हैं।
अनुराग बसु ने गीत-संगीत का सदुपयोग किया है। उन्हें फिल्म के कथ्य और मर्म के सही एहसास के लिए स्वानंद किरकिरे,नीलेश मिश्र,सईद कादरी और आशीष पंडित के गीतों का सपोर्ट मिला है,जिन्हें प्रीतम ने चलन से बाहर जाकर फिल्म के लिए मधुर धुनों से सजाया है।
**** चार स्टार

 

दोहरी खुशी का वक्त है-प्रियंका चोपड़ा


-अजय ब्रह्मात्मज
-आप की ‘बर्फी’ और म्यूजिक सिंगल लगभग साथ-साथ आ रहा है। क्या कहना चाहेंगी?
‘बर्फी’ मेरे करियर की बेहतरीन फिल्मों में से एक है। परफॉरमेंस के लिहाज से सबसे मुश्किल फिल्म होगी। मैं एक ऑटिस्टिक लडक़ी का रोल प्ले कर रही हूं। बहुत सारे लोग ऑटिस्टिक लोगों के बारे में नहीं जानते हैं।वे बहुत सिंपल,निर्दोष और अपनी दुनिया में मस्त रहते हैं।   मैंने बहुत  संजीदगी से इस रोल को प्ले किया है। मेरे लिए यह बहुत मुश्किल था, लेकिन अनुराग बसु ने यह रोल करवाने में मेरी बहुत मदद की है। उनके पैरों पर मैं इस फिल्म में खड़ी हूं। उम्मीद करती हूं कि यह लोगों को बहुत पसंद आएगा। जहां तक ‘सिंगल’ का सवाल है, तो वह भी नया है। मैंने अपने पैरों पर खड़े होकर परफार्म किया है। मैंने पहले कभी गाया नहीं है। यह अंग्रेजी में होगा। अमेरिका के ब्लैक आइड पीज ग्रुप के साथ मैंने यह गाना गाया है। गाने के बोल हैं, ‘इन माय सिटी’। दरसअल, मैं बचपन से बहुत सारे शहरों को अपने पालन-पोषण का श्रेय देती हूं। बरेली हो, लखनऊ हो, लद्दाख या पुणे और मुंबई। या अमेरिका में बोस्टन हो, न्यूयॉर्क हो, जहां मैं पली-बढ़ी हूं। इसलिए मेरे ‘सिंगल’ का पहला गाना उन सभी शहरों को समर्पित है। मुझे इन शहरों ने गर्मजोशी से वेलकम किया। मुझे इस मुकाम पर पहुंचाया। मेरे लिए यह दोहरी खुशी का वक्त है।
- लेकिन इस गाने में हर शहर की तारीफ होगी या फिर किसी एक शहर को आप श्रेय देंगी?
किसी सिटी का नाम नहीं है। ऐसा मैं कर भी नहीं सकती, क्योंकि मैंने बोला है ‘इन माय सिटी’। इसलिए, कोई भी शहर खुद को इस गाने से कोरिलेट कर सकता है। मेरे दिलो दिमाग में सारे शहर हैं, जहां मैं रही हूं। उनकी वजह से मैं जिस किस्म की इंसान बनी हूं, यह गाना उनके लिए है। यह बहुत सेलिब्रेटिंग गाना है। मेरी जिंदगी, मेरी अपब्रिगिंग को सेलिब्रेट करता है।
-गाने का शौक आप को था पहले से भी और इसकी ट्रेनिंग भी ली थी, लेकिन अचानक से एक ऐसे मोड़ पर जब आप एक्टिंग करियर के बेहतरीन दौर से गुजर रही हैं, आप ने इसका फैसला क्यों लिया? यह कहीं आप को रास्ते से भटकाएगा तो नहीं?
मैं पिछले डेढ़ साल से इस अलबम पर काम कर रही हूं। उस दौरान मैंने चार फिल्में की हैं। उनमें से दो बहुत अच्छी चलीं। एक थोड़ी कम चली और एक रिलीज होने को है। ऐसे में, मैंने दोनों चीजों के बहुत बेहतरीन तरीके से साधा है। अभिनय और गायकी दोनों मेरी जिंदगी के बहुत अहम हिस्से हैं। मैंने पढऩे से पहले गाना सीखा था। अक्षर सीखने से पहले मैंने गाना गाना सीख लिया था, क्योंकि मेरे पापा गाते हैं। इस तरह, गायकी तो मुझे विरासत में मिली है। यह भी लोगों को पसंद आएगा, यही होप करती हूं।
- एक ‘सिंगल’ के लिए डेढ़ साल का समय देना, यह तपस्या ज्यादा बड़ी नहीं लगती आप को?
नहीं, पूरे एलबम पर डेढ़ साल लगे हैं, लेकिन अमेरिका में एक-एक गाने के साथ अलबम रिलीज होती है। पहले एक सिंगल आएगा, दो-तीन महीने चलेगा, फिर दूसरा सिंगल आएगा। इस तरह वहां अलबम को रिलीज किया जाता है।
-झिलमिल के बारे में बताएं। वह ऑटिस्टिक है, लेकिन उसका अपना किरदार क्या है?
झिलमिल एक ऑटिस्टिक लडक़ी है, जिसकी भावनाएं उसके अंदर ही रहती हैं। हम में और उन में यह अंतर होता है कि हम एक साथ कई चीजें कर सकते हैं, वे एक बार में एक ही चीज करते हैं। वे ज्यादा कुछ बोलते नहीं। अपनी ही दुनिया में रहते हैं। झिलमिल कुछ वैसी ही है। बहुत प्योर, बहुत इनोसेंट। एकदम बच्चे की तरह है। जिस तरह एक बच्चा बिना सोचे-समझे, बिना किसी कॉन्सेशनेस के मजाक करते हैं। रोते हैं। गुस्सा होते हैं। एकदम वैसा किरदार है। डीग्लैम तो नहीं कहूंगी। मेकअप भी है, लेकिन मुझे बच्चे की तरह बिहेव करना था, तो उस तरह के गेटअप को अपनाना पड़ा। यह बहुत मुश्किल रहा है, मेरे लिए, लेकिन जब लोग इसे देखेंगे, तो सोचेंगे कि यह प्रियंका चोपड़ा नहीं है झिलमिल है।
-फिर रणबीर कपूर के साथ ‘बर्फी’ का अनुभव कैसा रहा?
रणबीर बहुत बेहतरीन एक्टर हैं। जिस तरह से उन्होंने यह रोल प्ले किया है, शायद ही कोई निभा पाए। उनके साथ मेरी दोस्ती बहुत अच्छी है, क्योंकि हमने ‘अनजाना अनजानी’ की थी। यह फिल्म भी कर रहे हैं। हमारा तालमेल बहुत अच्छा है। एक-दूसरे को अच्छी तरह से समझते हैं। खासकर इस फिल्म में जहां ‘बर्फी’ गूंगा-बहरा है और मैं ऑटिस्टिक, तो हमारे सीन काफी इम्प्रोवाइज करके शूट किए गए थे। अनुराग ने हमें जिस तरह से रोल पेश करने को कहा। हमने उसी तरह से किरदार को निभाया। मुझे गर्व होता है कि मैंने रणबीर जैसे को-स्टार के साथ काम किया।
-दोनों कलाकारों का तालमेल तो अच्छा है, पर मैं दोनों किरदारों के तालमेल की बात पूछंू तो?
किरदारों का तालमेल पिक्चर में बनता है। एक तरह से उनका रिश्ता डेवलप होता है। प्यार होता है। इस तरह दो डिसएबल लोगों की लव स्टोरी को आप कमर्शियल तरीके से बताने की कोशिश करें, तो वह ‘बर्फी’ है। बहुत मनोरंजक फिल्म है। आमतौर पर जब हम डिसएबल लोगों की फिल्म देखते हैं, तो वह सैड नोट की होती है। उनके लिए आप को बुरा लगता है। एक तरह की सिमपैथी आती है आप को, लेकिन यह उस तरह की फिल्म नहीं है। फिल्म के पहले दस मिनट में ही आप भूल जाएंगे कि झिलमिल और बर्फी में किसी किस्म की डिसएबिलिटी है।
- अनुराग बसु के लिए भी ‘बर्फी’ एक बड़ी फिल्म है। वे पहली बार दो बड़े स्टारों के साथ काम कर रहे हैं। अनुराग में ऐसी क्या खास बात लगी आप को?
मैं तो कहूंगी कि फिल्म इंडस्ट्री के सभी एक्टरों को एक बार अनुराग बसु के साथ जरूर काम करना चाहिए। वे कलाकार के भीतर की कोमल संवेदनाओं को उभार कर सामने ले आते हैं। उन्होंने अभी तक चरित्र प्रधान फिल्में बनाईं हैं। पहले उनकी फिल्में थोड़ी डार्क और ग्रे शेड की होती थी। इस बार आप जिंदगी की हरियाली देखेंगे।

प्रेम देने में माहिर है बर्फी-रणबीर कपूर


-अजय ब्रह्मात्मज
-कल आप की फिल्म रिलीज हो रही है। क्या कहना चाहेंगे?
0 मैं क्या कहूं? फिल्म के ट्रेलर और गाने बहुत कुछ बोल-बता रहे हैं। यह फिल्म आप को हंसाने और रुलाने के साथ एक नजरिया भी देगी जिंदगी का। अभी इतना ही कह सकता हूं।दर्शक बताएंगे कि पैसा वसूल फिल्म हो पाई कि नहीं?
-बर्फी का किरदार क्या है?
0 मैं गुगा-बहरा हूं,लेकिन दस मिनट के अंदर आप किरदार के साथ हो जाएंगे। हम ने उसके गूंगे-बहरे होने पर ज्यादा जोर नहीं दिया है। बर्फी चालू चैप्लिन है। चार्ली चैप्लिन और मिस्टर बिन हमारी प्रेरणा रहे हैं। इस किरदार को अनुराग बसु ने ऐसे ढाला है कि दर्शकों को वह अपना लगे। हम गूंगे-बहरे होने के तकनीकी और मेडिकल तथ्यों में नहीं उलझे हैं। मुझे भाव-भंगिमाएं बनानी पड़ी हैं। बर्फी के एहसास दर्शक महसूस करेंगे।
-डोंट वरी,बी बर्फी का क्या तुक है?
0 एक मशहूर गीत है ़ ़  ड़ोंट वरी,बी हैप्पी। हमलोगों ने हैप्पी की जगह बर्फी कर दिया है। बर्फी भी खुशी की तरह का सनसाइन है। वह हमेशा खुशी बांटता है। वह प्यार देने में माहिर है। अगर उसे कोई वापस प्यार नहीं करता तो भी उसका दिल नहीं टूटता। वह मुस्कराता रहता है। प्रेरक भले ही चैप्लिन और बिन रहे,लेकिन यह अनुराग बसु का मौलिक क्रिएशन है।
-बर्फी में क्या सचमुच आप ने राज कपूर की नकल की है?
0 बिल्कुल नहीं। मैं उनका पोता हूं। पतली मूंछों और और टोपी की वजह से लोगों को समानता दिख रही होगी। राज कपूर खुद चैप्लिन से प्रेरित थे। दिल में भले ही गम हो,लेकिन चेहरे पर मुस्कराहट। उनकी शुरू की फिल्मों में चैप्लिन का असर देखा जा सकता है।
-आप की फिल्मों की पसंद अलहदा होती है। आप फिल्मी रिवाज से सेफ फिल्मेंक्यों नहीं करते?
0 स्पष्ट कर दूं कि मैं किसी एक्सपेरिमेंट में नहीं लगा हूं। मेरे लिए रॉकस्टार और बर्फी कमर्शियल फिल्में हैं। मैं सच्चाई,गहरी सोच और एहसास की फिल्में चुनता हूं। मेरे सारे निर्देशक अपनी फिल्मों के जरिए कुछ कहना चाहते रहे हैं। मुझे ऐसी फिल्मों के ही ऑफर आते हैं। मैं अलहदा होने की कोशिश नहीं करता हूं। हां,मैं किसी को फॉलो नहीं करना चाहता। किसी सुपरस्टार की कामयाब फिल्मों जैसी फिल्में नहीं करना चाहता। मैं भी कामयाब हीरो और सुपरस्टार बनना चाहता हूं।मैं अपना रास्ता खोज रहा हूं। मेरे लिए बर्फी सुपरहीरो है। उडऩे और विलेन को मुक्का मारने तक ही लुत्फ सीमित नहीं है। बर्फी ने मुझे सिखाया कि साधारण होने मेंं क्या खूबसूरती है। डर भी होता है बर्फी जैसी फिल्में करते समय कि कहीं मैं अपना समय बर्बाद तो नहीं कर रहाहूं।
-अनुराग बसु बदनाम हैं बांडेड स्क्रिप्ट नहीं तैयार करने केलिए। फिर आप कैसे राजी हो गए। सिर्फ आइडिया से या अनुराग बसु के कन्विक्शन से ़ ़ ़
0 बर्फी जैसी फिल्में ऐस ेही बनती हैं।यह फिल्म बनते-बनते बन गई है। मैं,प्रियंका चोपडा़ और इलियाना डिक्रूज सेट पर आते थे और अनुराग बसु के निर्देशों का पालन करते थे। किरदार और कहानी तय थी। बाकी सब इम्पू्रवाइजेशन है। जैसे कि अनुराग दादा आकर बताते थे कि बर्फी झिलमिल से मिलता है। अब मिलना और उस समय अपने हिसाब से एक्ट सोचना हमारा काम होता था। एक मोटा ढांचा रहता था,लेकिन अनुराग हमारी सलाह लेते थे। अनुराग ने आगाह कर दिया था कि मुझे टेक्नीकल और मेथड एक्टिंग नहीं चाहिए। एक ही जरूरत है कि सेट पर तू खुश रहे।
-बर्फी के बाद कौन सी फिल्में आएंगी?
0 इसके बाद अयान मुखर्जी की ये जवानी है दीवानी आएगी। उनके साथ मैंने वेकअप सिड किया था। उसके बाद अभिनव कश्यप की फिल्म बेशर्म शुरू करूंगा। फिर अनुराग कश्यप की बांबे वेलवेट आरंभ होगी।
-खबर थी कि पैसों की वजह से आपने बेशर्म छोड़ दी थी और फिल्म बंद हो गई थी?
0 ऐसी खबरों की सच्चाई आप जानते हैं। मैंने पहले भी कहा था कि मैं पैसों केलिए फिल्मों में काम नहीं करता। मैंने पूरी लाइफ पैसे देखे हैं। पैसों की वजह से कभी कोई फिल्मनहीं छोड़ूंगा या चुनूंगा। मुझे बेशर्म की स्क्रिप्ट पसंद आई है। अभिनव का मोटिवेशन मुझे अच्छा लगा। इस फिल्म में हम एक नई हीरोइन लेकर आएंगे।



Tuesday, September 11, 2012

संग संग: संजय चौहान और सरिता चौहान

संघर्षो के बीच बढ़ता रहा प्यार
स्क्रिप्ट राइटर  संजय चौहान का करियर  शुरू हुआ था पत्रकारिता से। धीरे-धीरे टीवी की दुनिया में और फिर बॉलीवुड में उन्होंने कदम बढाए। उनकी चर्चित फिल्में, पान सिंह तोमर, आई एम कलाम, साहब-बीबी और गैंगस्टर हैं। चित्रकार सरिता से उनकी मुलाकात 20 साल पहले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली में हुई थी। सरिता की कूची और संजय की कलम की जुगलबंदी जल्दी ही हो गई और दोनों ने मुलाकात के दो वर्ष बाद ही शादी कर ली। रचनात्मकता, रिश्तों की शुरुआत और रोज्ाी-रोज्ागार के संघर्ष को लेकर उनसे हुई लंबी बातचीत।
दिल्ली-भोपाल मेल
संजय :  मैं भोपाल का हूं और सरिता दिल्ली की ठेठ पंजाबी। हमारी लव स्टोरी में ट्रेजिक एंगल था कि यहां कोई विरोधी नहीं था। लोग उम्मीद से हमें देखते थे। उन्हें लगता था कि हम दोनों समझदार हैं, परिवार का भरण-पोषण तो कर ही लेंगे। सरिता के एक मामा को अलबत्ता कुछ आपत्ति थी। पंजाबी शादी में मामा का होना ज्ारूरी होता है, लिहाज्ा उन्हें मनाने के लिए काफी पापड बेलने पडे। मैं लगभग बेरोज्ागार था उस समय, लेकिन इनके घर वालों को इससे कोई फर्क नहीं पडता था।
सरिता :  हां, संजय बेरोज्ागार  थे और मेरी पेंटिंग्स से इतना पैसा नहीं आता था कि घर चल सके। शादी के बाद हमने मिल कर इनकी नौकरी के लिए कोशिशें शुरू कीं। दो-एक जगह काम किया तो अच्छा नहीं लगा। फिर पत्रकारिता में आए। कुछ प्रतिष्ठित मीडिया हाउसेज्ा  में काम किया। लिखना इनका शौक था तो लगा कि रचनात्मक क्षेत्र में ही काम करें तो बेहतर होगा।
काम, शौक और नौकरी
संजय :  पत्रकार तो मैं 11वीं कक्षा के बाद ही बन गया था। कॉलेज  के दिनों में एक राष्ट्रीय समाचार-पत्र के परिचर्चा कॉलम में लोगों के विचार इकट्ठा करता था। फिर उसी संस्थान में नौकरी मिल गई। काम के साथ पढाई करना मुश्किल हुआ तो मैंने ग्रेजुएशन  प्राइवेट किया। उसी दौरान मध्य प्रदेश कला परिषद में नौकरी मिली। उसकी पत्रिका की प्रिंटिंग के सिलसिले में मुझे बार-बार मुंबई जाना होता था। भोपाल के भारत भवन का शुरुआती दौर बहुत समृद्ध रहा है। कुमार गंधर्व जैसे लोग यहां परफॉर्मेस दिया करते थे। नीलम महाजन और उदय प्रकाश जैसे लोगों से मैं भारत भवन में ही मिला। ये सब कहते थे कि मुझे पढाई जारी रखनी चाहिए। मैं जेएनयू से हिंदी साहित्य पढना चाहता था। उदय प्रकाश ने मुझे प्रोत्साहित किया। इस तरह जेएनयू से एम.फिल किया, फिर टीचिंग शुरू की। यहीं से फिर पत्रकारिता की भी शुरुआत हुई।
सरिता : मैंने संजय से कहा कि मुझे भी पेंटिंग में आगे बढना है तो संजय ने कहा कि इसे प्रोफेशनली करो। इसके बाद मैंने दिल्ली की कुछ आर्ट गैलरीज्ा  में प्रदर्शनियों की शुरुआत की। हमारी ज्िांदगी  आसान नहीं थी। लेकिन तकलीफ जैसा कोई एहसास नहीं था। दिल्ली में हमारे घर के ऊपर एक कमरा ख्ाली था तो मैंने उसे ही स्टूडियो बनाया और काम शुरू कर दिया। यहीं हमारी बेटी सारा भी दुनिया में आई। आय का कोई नियमित स्रोत नहीं था। मेरे पेरेंट्स नोएडा शिफ्ट हो गए, जबकि मुझे शो के सिलसिले में दिल्ली आना-जाना पडता था। पर उनके कारण मुझे भी नोएडा शिफ्ट होना पडा। तभी हम दोनों ने निर्णय लिया कि संजय को मुंबई जाकर िकस्मत आज्ामानी  चाहिए। पेरेंट्स  ने आर्थिक तौर पर काफी संभाला। यह हमारा निर्णय था कि हमें क्रिएटिव  फील्ड में रहना है, तो किसी से शिकायत नहीं कर सकते थे।
संजय : इसी बीच टीमवर्क  फिल्म्स नामक प्रोडक्शन  कंपनी से एक काम मिला। तरुण तेजपाल ने मुझे टीमवर्क  के संजय रॉय  और मोहित चड्ढा से मिलवाया। मुझे ओ.आर.एस. घोल की स्क्रिप्ट लिखने को कहा गया। सच बताऊं तो मज्ा आया। एक स्क्रिप्ट लिखी तो उन्होंने  दो-तीन और लिखवा लीं। इसके बाद एक चैनल के लिए आइडिया मांगा। धारावाहिक लिखने के बाद मुझे लगा कि इस फील्ड में करियर शुरू कर सकता हूं। तब मैं एक पत्रिका में काम कर रहा था, बॉस को काम के बारे में बताया तो उन्होंने कहा कि कुछ समय छुट्टी लेकर नए काम को देख लूं। वहां बात न बने तो वापस आ जाऊं। ख्ौर,  थोडी दुविधा और थोडी हिम्मत के साथ मैं आगे बढा।
पेशे की पशोपेश
सरिता :  अच्छी-भली नौकरी छोडने का संजय का फैसला लोगों को अजीब लग सकता था, पर मुझे नहीं लगा। मुझे पता है कि शौक को जीविका बनाना मुश्किल है। हमारे रिश्ते में अच्छी बात रही कि हमने एक-दूसरे को कभी कुछ करने से रोका नहीं। संजय ने हमेशा मेरा उत्साह बढाया। संजय मुंबई आ गए। मेरा मन दिल्ली में नहीं लगता था। धीरे-धीरे परिवार का दबाव भी बढा कि इतने लंबे समय तक अलग-अलग रहना ठीक नहीं है। इस तरह वर्ष 2001 में हम मुंबई आए। सारा को यहां सेटल होने में बहुत वक्त लगा, क्योंकि उसकी परवरिश जॉइंट  फेमिली  में हुई थी। दिल्ली के पांच हजार फीट के घर से निकलकर मुंबई के 1बीएचके फ्लैट में एडजस्ट करना मुश्किल था। शुरू में उत्साह कम हुआ, लेकिन मैंने यहां पहली एकल प्रदर्शनी की तो उत्साह बढा। कुछ दोस्त बने तो लगा कि यहां रहा जा सकता है।
संजय :  मुंबई आकर मैं सबसे पहले पुराने दोस्तों से मिला। एक दोस्त ने सिद्धांत सिनेविज्ान  के मालिक मनीष गोस्वामी को मेरा बायोडाटा दिया। उन्हें सुप्रीम कोर्ट के केसेज्ा  को लेकर कहानियों की ज्ारूरत थी। शुरुआत में उन्हीं के फ्लैट में रहा। बहुत मदद की उन्होंने मेरी।
पेरेंटिंग के सबक
संजय:  सरिता का चेहरा बहुत पारदर्शी है। वह अपने एक्सप्रेशन नहीं छिपा पाती हैं। इनके इसी चेहरे से मुझे प्यार हुआ था। सारा के आने के बाद हम दोनों के जीने के मायने ही बदल गए हैं। जब छोटी थी तो हम बचते थे एक-दूसरे से बहस करने से। लेकिन अब जब वह बडी हो गई है तो हम खुल कर एक-दूसरे से बहस करते हैं। झगडे हमारे बीच कभी नहीं हुए हैं। बच्चे सबको जीना सिखा देते हैं। सारा के आने के बाद से मेरे पेरेंट्स  के प्रति भी मेरा नज्ारिया  बदल गया। मैंने उनकी कीमत समझी और मां को फोन करके अपने हर बुरे बर्ताव के लिए उनसे माफी भी मांगी। सचमुच पिता बनने के बाद ही पेरेंट्स की भूमिका का एहसास होता है। बच्चे जिम्मेदारी लेना सिखा देते हैं।
जिदगी को मिली धूप
संजय :  मुझे याद है कि मैंने अपने दोस्त अश्विनी चौधरी की पहली फिल्म धूप लिखी। हम ओम पुरी  साहब को कहानी सुनाने गए। वे अपने कमरे में चले गए। बाद में जब हम उनके कमरे में गए तो वहां चारों ओर टिशू पेपर्स  मिले। उन्होंने कहा, अरे कितना रुलाओगे? मेरे लिए इससे बडा सम्मान नहीं हो सकता। इस तरह फिल्मों के लिए स्क्रिप्ट राइटिंग शुरू हुई।
सरिता : मैं शूटिंग में संजय के साथ नहीं जाती, मुझे पसंद नहीं है। लेकिन आई एम कलाम के लिए जब फिल्मफेयर अवार्ड मिला तो मैं इनके साथ थी। वह दिन मेरे लिए बेहद ख्ास था। संजय मंच पर अवॉर्ड ले रहे थे और मैं दर्शकों के बीच बैठी इन्हें देख रही थी। यह एहसास बहुत बडा था मेरे लिए।
दुर्गेश सिंह

Friday, September 7, 2012

फिल्‍म समीक्षा : राज 3

Review : Raaz 3 

डर के आगे मोहब्बत है 

-अजय ब्रह्मात्मज  

 अच्छी बात है कि इस बार विक्रम भट्ट ने 3डी के जादुई प्रभाव को दिखाने के बजाए एक भावनापूर्ण कहानी चुनी है। इस कहानी में छल-कपट, ईष्र्या, घृणा, बदला और मोहब्बत के साथ काला जादू है। काला जादू के बहाने विक्रम भट्ट ने डर क्रिएट किया है, लेकिन दो प्रेमी (खासकर हीरो) डर से आगे निकल कर मोहब्बत हासिल करता है।

कल तक टॉप पर रही फिल्म स्टार सनाया शेखर अपने स्थान से फिसल चुकी हैं। संजना कृष्ण पिछले दो साल से बेस्ट एक्ट्रेस का अवार्ड ले रही हैं। सनाया किसी भी तरह अपनी खोई हुई पोजीशन हासिल करना चाहती है। पहले तो भगवान और मंत्र के जरिए वह यह कोशिश करती है। सफल नहीं होने पर वह काला जादू और तंत्र के चक्कर में आ जाती है। काला जादू राज-3 में एक तरकीब है डर पैदा करने का, खौफ बढ़ाने का। काला जादू के असर और डर से पैदा खौफनाक और अविश्वसनीय दृश्यों को छोड़ दें, तो यह प्रेमत्रिकोण की भावनात्मक कहानी है। फिसलती और उभरती दो अभिनेत्रियों के बीच फंसा हुआ है निर्देशक आदित्य अरोड़ा। वह सनाया के एहसानों तले दबा है। वह पहले तो उसकी मदद करता है, लेकिन काला जादू के असर से संजना की बढ़ती तकलीफ और अकेलेपन से उसे अपने अपराध का एहसास होता है। वह संजना से प्रेम करने लगता है, उसे बचाने के लिए वह आत्माओं की दुनिया में भी प्रवेश करता है। वह अपनी संजना को बचा कर ले आता है।
विक्रम भट्ट ने सनाया को खलनायिका के तौर पर पेश किया है। वह फिसल रही प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए युक्ति अपनाती है। नाम और शोहरत के आगे वह रिश्तों और मोहब्बत का भी ख्याल नहीं करती। हमें बीच में पता चलता है कि संजना और कोई उसकी सौतेली बहन है। सनाया सिर्फ उसकी तरक्की से ही नहीं जल रही है। उसके दिल और दिमाग में बचपन में पिता के बंटे प्यार की खलिश भी है। शुरू में हमें सनाया से सहानुभूति होती है, लेकिन उसकी करतूतों से पता चलता है कि वह दुष्ट औरत है। फिर संजना की बेचारगी हमें उसका हमदर्द बना देती है। इस हमदर्दी में हीरो भी उसके साथ आता है, इसलिए राज-3 की कहानी भावनात्मक रूप से छूती है।
बिपाशा बसु ने सनाया के ग्रे शेड को अच्छी तरह उभारा है। अभिनय की उनकी सीमाओं के बावजूद विक्रम भट्ट ने उनसे बेहतरीन काम लिया है। नयी अभिनेत्री ईशा गुप्ता उम्मीद जगाती हैं। उन्होंने अपने किरदार के डर को अच्छी तरह चित्रित किया है। इन दोनों के बीच पाला बदलते इमरान हाशमी जंचे हैं। इमरान हाशमी के अभिनय में निखार आया है।
विक्रम भट्ट ने दोनों हीरोइन के साथ लंबे चुंबन दृश्यों को रखकर इमरान हाशमी के दर्शकों को खुश रखने की कोशिश की है। बिपाशा बसु के साथ के अंतरंग दृश्यों के पीछे भी यही उद्देश्य रहा होगा।
तीन स्टार
अवधि-136 मिनट

 

Thursday, September 6, 2012

अय्या का पोस्‍टर

सचिन कुंदालकर की पहली फिल्‍म है 'अय्या'। इस फिल्‍म का निर्माण अनुराग कश्‍यप ने किया है। फिल्‍म में रानी मुखर्जी मराठी लड़की  की भूमिका में हैं और पृथ्‍वीराज ने मलयाली लड़केका किरदार निभाया है।

हंगल की अंतिम यात्रा का सन्नाटा


-अजय ब्रह्मात्मज
खूब लिखा गया। अखबारों,चैनलों और सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा इस तथ्य को रेखांकित किया गया कि एके अवतार कृष्ण हंगल की अंतिम यात्रा में फिल्म इंडस्ट्री की नामचीन हस्तियां नहीं आईं। संकेतों में कुछ नामों की तरफ इशारा किया गया। सभी की शिकायत थी कि  जिस कलाकार ने अपनी जिंदगी के लगभग 50 साल इंडस्ट्री को दिए और 200 से अधिक फिल्में कीें। उसकी अंतिम यात्रा के लिए उसकी ही बिरादरी के गणमान्य सदस्यों को फुर्सत नहीं मिल सकी। यह शिकायत उचित होने के बावजूद निरर्थक है। हमें दिवंगत व्यक्ति की जिंदगी पर गौर करना चाहिए। अगर दिवगंत व्यक्ति के करीबी नहीं आते तो सोचने की जरूरत थी। इंडस्ट्री में हर व्यक्ति के निधन पर सभी महत्वपूर्ण व्यक्तियों की मौजूदगी की चाहत वास्तव में इलेक्ट्रानिक मीडिया की जरूरतों से उपजी है। उन्हें अपने चैनलों पर दिखाने के लिए कुछ बड़े नाम,नाटकीय और भव्य अंतिम यात्रा और रंगीन-विवादास्पद जिंदगी चाहिए। उन्हें लगता है कि इससे दर्शकता बढ़ती है। टीवी पर चल रही शिकायतों को देख कर ही पत्र-पत्रिकाओं और सोशल मीडिया नेटवर्क पर सन्नाटे का जिक्र हुआ।
इस सन्नाटे के एहसास का एक संदर्भ है। कुछ ही समय पहले दारा सिंह और राजेश खन्ना के निधन के समय फिल्मी सितारों का हुजूम उनके आवास और श्मशान भूमि में पहुंचा था। टीवी चैनलों ने उनकी चलती-फिरती तस्वीरों का सीधा प्रसारण किया। उनकी अंत्येष्टि में आए सितारों को देखने के बाद जब हंगल की अंतिम यात्रा में जाने-पहचाने सितारे नहीं दिखे तो कुछ लोगों को यह बात खली। उन्हें यही लगा कि हंगल को महत्व नहीं मिला। गौर करें तो यह स्वाभाविक था। हंगल कोई स्टार या मशहूर अभिनेता नहीं थे। निस्संदेह वे बेहतर अभिनेता थे,लेकिन बेहतर और लोकप्रिय होने में फर्क है। उनकी अंतिम यात्रा की तस्वीरें या फुटेज देखें तो उसमें उनके सारी दोस्त मौजूद थे। इप्टा के सदस्यों और रंगकर्मियों ने उन्हें भावभीनी विदाई दी। पूरे देश में रंगकर्मियों और थिएटर के लोगों ने हंगल की याद में स्मृति सभाएं कीं। ऐसी स्वत स्फूर्त स्मृति और श्रद्धांजलि सभाएं तो राजेश खन्ना के लिए भी नहीं हुईं। हंगल को पूरे देश ने याद किया। वे आम दर्शकों के प्रिय अभिनेता साबित हुए। भले ही खास सितारों ने उनकी अंतिम यात्रा में शिरकत नहीं की।
हिंदी फिल्मों में आप स्टार नहीं हैं या किसी स्टार से संबंधित नहीं हैं तो जिंदगी और मौत में यही स्थिति बनती है। इस इंडस्ट्री में केवल स्टार ही प्रथम दर्जे का नागरिक होता है। बाकी सभी दोयम दर्जे के होते हैं। यह सिर्फ इंडस्ट्री का ही रवैया नहीं है। इंडस्ट्री तो इसी समाज का हिस्सा है। गौर करने की बात है कि समाज में भी स्टार का आकर्षण बाकी अभिनेताओं,तकनीशियनों,लेखकों और निर्देशकों से विशेष होता है। इस सच्चाई से आंख मूंदने पर ही हम अपेक्षा करने लगते हैं कि हंगल की अंतिम यात्रा में सितारों को आना चाहिए। क्या वे बी आर इशारा की अंतिम यात्रा में आए थे? या उन्होंने अशोक मेहता की अंतिम यात्रा में शामिल होने की जहमत उठाई थी? जीते जी चरित्र अभिनेता और शेष को सिर टिकाने या शेयर करने के लिए सितारों का कंधा नहीं मिलता और आप मरने के बाद अर्थी को कंधा देने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। किस गलतफहमी में हैं। एके हंगल ने अपनी आत्मकथा में जिक्र किया है कि उनकी पहली फिल्म शागिर्द ने गोल्डन जुबली मनाई थी। गोल्डन जुबली के जश्न में हंगल को नहीं बुलाया गया था। इसे उन्होंने  फिल्म इंडस्ट्री के एक सबक के तौर पर लिया था। वह सबक सही निकला। करिअर की शुरूआत का रवैया ही उनकी मौत में दिखा। ऐसा सिर्फ हंगल के साथ ही नहीं हुआ। सभी के साथ होता है और आगे भी इसमें कोई परिवत्र्तन नहीं आएगा।

Tuesday, September 4, 2012

सलमा आगा की बेटी साशा दिखेंगी औरंगजेब में

साशा और कोई नहीं, जारा आगा हैं। कुछ समय पहले रुसलान मुमताज के साथ उनका एक एमएमएस चर्चा में आया था। उस बदनामी से बचने के लिए सलमा आगा ने बेटी का नाम जारा से बदलकर साशा कर दिया है। वैसे, इंडस्ट्री में शाहिद कपूर केकरीबी उन्हें साशा नाम से ही बुलाते हैं। यह उनका निकनेम है।

Sunday, September 2, 2012

जिंदगी का जश्न है ‘बर्फी’-अनुराग बसु



-अजय ब्रह्मात्मज
अनुराग बसु की ‘बर्फी’ आम हिंदी फिल्मों से अलग दिख रही है। स्वयं अनुराग बसु की पिछली फिल्मों से इसकी जमीन अलग है और किरदार भी। अनुराग बसु खुद बता रहे हैं ‘बर्फी’ के बारे में ़ ़ ़
पहला ट्रेलर आया ताक लगाा कि यह सायलेंट फिल्म है। फिल्म में ताजगी और उल्लास है। गानों के आने के बाद जिज्ञासाएं और बढ़ गईं हैं। क्या है यह फिल्म?
ट्रेलर में फिल्म की सारी बातें क्लियर नहीं की जा सकतीं। एक ही कोशिश रहती है कि फिल्म का सही इमोशन दर्शकों में जेनरेट हो जाए और एक इंटरेस्ट रहे। यह सायलेंट फिल्म तो नहीं है, लेकिन संवाद बहुत कम हैं। मेरी फिल्मों में आप कई बार ऐसे लंबे दृश्य देखेंगे, जिनमें कोई संवाद नहीं होता। ‘गैंगस्टर’ में 20 मिनट का एक ऐसा ही सीन था। ‘बर्फी’ की कहानी लिखते समय चुनौती रही कि कैसे बगैर संवादों को बातें रखी जाए। इसका अलग मजा और नशा है। शब्दों को भाव और एक्सप्रेशन में बदल देना। रणबीर के होने की वजह से मुझे सुविधा हुई। वे कमाल के एक्टर हैं। उनका कैरेक्टर ट्रेलर में भी समझ में आता है। झिलमिल (प्रियंका चोपड़ा) को ऑटिज्म है। वह दुनिया को एकदम अलग तरीके से देखती है। बहुत ही शुद्ध है। श्रुति (इलियाना डिक्रुजा) एक सामान्य लडक़ी है। उसे मालूम नहीं है कि उसे जिंदगी से क्या चाहिए? उसे यह नहीं मालूम है कि छोटी-छोटी बातों में बड़ी खुशियां होती हैं। यह फिल्म 1970 में शुरू होती है। सारे किरदारों की आज तक की जर्नी फिल्म में दिखाई गई है।
-आप की फिल्म पीरियड का फील दे रही है। आप ने बताया भी कि यह 1970 से अभी तक की जर्नी है। हम सभी जानते हैं कि 1970 के बाद के बंगाल में राजनीतिक उथल-पुथल रही है। क्या आप की फिल्म के बैकड्रॉप में ऐसी कोई बात है?
शुरू में हमने सोचा था कि बंगाल की राजनीतिक पृष्ठभूमि का इस्तेमाल करेंगे। कम से कम उसे छूते हुए निकल जाएंगे। बाद में लगा कि फिल्म का मूड थोड़ा अलग है। ‘बर्फी’ वास्तव में जिंदगी का जश्न है। इस फिल्म की कहानी की बहुत छोटी सी शुरुआत हुई थी। लिखते समय किरदारों ने ही इसे ढाला। आज का समय हर लिहाज से इतना प्रदूषित हो चुका है कि ऐसी फिल्म की कल्पना करना भी मुश्किल है। आज कल महानगरों में फेसबुक से प्रेम आरंभ होता है। कार की बैक सीट पर वह जवान होता है और कोर्ट में जाकर वह दम तोड़ देता है। सोशल प्रेशर, क रियर, इगो,आमदनी ़ ़ ़ इन सबके बीच मनुष्य अपनी शुद्धता खो चुका है। ‘बर्फी’ के सारे किरदार इस दुनिया से अलग जिंदगी जीते हैं। मैंने फिल्म में दार्जीलिंग की पृष्ठभूमि रखी है। वैसे ये किरदार कहीं भी हो सकते हैं। दरअसल मैंने इस कहानी की शुरूआत दार्जीलिंग में की थी,इसलिए मेरा हीरो भी वहीं का हो गया। दार्जीलिंग की यह कहानी उत्तर बंगाल से सफर करते हुए कलकत्ते तक आती है।
-आप की फिल्मों में कोई पैटर्न नहीं दिखता। हर फिल्म दूसरी फिल्म से थोड़ी अलग हो जाती है। क्या किसी खास तलाश में हैं आप?
मेरे लिए हर नई फिल्म अंधेरी गुफा में घुसने की तरह होता है। एक हफ्ते की शूटिंग के बाद उसी अंधेरे में चीजें दिखनी लगती हैं और एक राह मिलती है। मेरी ज्यादातर फिल्में बनने के दौरान ही शेप लेती हैं। यही वजह है कि मैं फिल्म की कहानी नहीं सुना पाता। अभी तक मैंने जो फिल्में की थीं, वे ज्यादातर डार्क और इमोशनल कंफ्लिक्ट की फिल्में की। यह फिल्म बिल्कुल अलग है। यहां ताजगी है, रौशनी है और खुशी है। ‘काइट्स’ के बाद जब मैंने यह फिल्म शुरू की तो मेरे दोस्तों ने मुझे डराया भी कि कोई सेफ फिल्म करो। मैं आशंकाओं के बावजूद यही फिल्म करना चाहता था, क्योंकि इसके किरदारों से मुझे प्यार हो गया था। कोई भी फिल्म डेढ़ से दो साल में बनती है। अगर फिल्म के कंटेंट से डायरेक्टर का प्यार न हो तो फिल्म बनाना मुश्किल हो जाए। फिर तो लगेगा यार जल्दी काम खत्म करो और फिल्म को रिलीज कर दो। आखिरी दिन की शूटिंग में भी पहले दिन का जोश दिखे, तो आप मान लीजिए कि आप की फिल्म दर्शकों को पसंद आएगी।
-क्या यूनिट के सभी सदस्यों से आप फिल्म का कंटेंट शेयर करते हैं?
क्या फिल्म बन रही है, यह तो सभी को मालूम रहता है। बाकी नैरेशन देने से मैं बहुत घबराता हूं। इसके लिए बदनाम भी हूं कि मैं प्रोड्युसर और एक्टर को ठीक से कहानी नहीं सुनाता। फिल्म शुरू होने के पहले यूनिट के सारे सदस्यों को एक साथ सारी बात समझा देता हूं। उसके बाद वे अपने काम की जिम्मेदारी और प्लैनिंग खुद ही तय करते हैं। एक्टर को अलग से सुनाना-समझाना और राजी करना होता है। सीन इम्प्रोवाइज करने की मेरी बुरी आदत से सभी परेशान रहते हैं। अब सोचा है कि अगली फिल्म से यह आदत बदल दूंगा। मंै एक्टर के पीछे नहीं पड़ता। उन्हें फील समझा देता हूं। सीन करते समय वे जो भी गरमागरम इमोशन साथ लेकर आएं। मैं मेथर और प्रिपेरेशन में बहुत ज्यादा यकीन नहीं करता।
-आप की फिल्मों के ज्यादातर किरदार अनगढ़ होते हैं। उनमें परफेक्शन की कमी रहती है। हिंदी फिल्मों में हमें किरदारों को ब्लैक एंड ह्वाइट में देखने की आदत रही है। यही कारण है कि आप की फिल्में इंटररेस्टिंग होने के बावजूद नार्मल नहीं लगती?
समाज में ही देख लें, कितने लोग परफेक्ट हैं। हमलोग परफेक्ट होने का ढोंग रचते हैं। मैंने अपनी फिल्मों के किरदारों को इसी समाज से लिया है। मुझसे लोग कहते हैं कि मेरे किरदारों के हाव-भाव से उनके कैरेक्टर का सही अनुमान नहीं लगता। पता नहीं रहता कि वे आगे क्या करने वाले हैं। हम सभी लोग अपनी नार्मल जिंदगी में भी इतने ही अस्पष्ट होते हैं। हमें नहीं मालूम होता कि अगले दस सालों में क्या होगा? हमारे निजी संबंधों में क्या बदलाव आएंगे?

Saturday, September 1, 2012

फिल्‍म समीक्षा : जलपरी

review : Jalpari 

मुद्दे पर बनी मनोरंजक फिल्म 

-अजय ब्रह्मात्‍मज

नीला माधब पांडा की जलपरी श्रेया (लहर खान) के माध्यम से एक सोए हुए गांव की संकीर्णताओं और जड़ मान्यताओं को उजागर करती है। पांडा ने इसे रोचक और मनोरंजक तरीके से पेश किया है। पिछले साल आई उनकी फिल्म आई एम कलाम की तरह इस बार भी फिल्म के मुख्य किरदार बच्चे हैं, लेकिन यह बच्चों की फिल्म नहीं है।
देव(प्रवीण डबास) अपने बेटे-बेटी के साथ शहर में रहते हैं। पत्‍‌नी के निधन के बाद वे अकेले ही बच्चों को पाल रहे हैं। उन्होंने अपने बच्चों पर किसी प्रकार की पाबंदी नहीं लगाई है। उनकी बेटी श्रेया अपनी उम्र के हिसाब से दबंग किस्म की लड़की है। अपनी शैतानियों की वजह से स्कूल और घर में उसे बार-बार फटकार मिलती है, लेकिन उसे पिता देव से छूट मिली हुई है। दरअसल, देव नहीं चाहते कि उनकी बेटी या बेटे किसी प्रकार का अंकुश महसूस करें। देव अपने पैतृक गांव में पत्‍‌नी के नाम पर एक अस्पताल खोलना चाहते हैं। उन्हें पंचायत और सरपंच की रजामंदी मिल गई है, लेकिन गांव के पारंपरिक हकीम को यह बात नागवार गुजरती है। बहरहाल, श्रेया अपने छोटे भाई सैम(कृष्णांग त्रिवेदी) के साथ गांव को एक्सप्लोर करती है। इसी क्रम में उसकी हमउम्र लड़कों से मुठभेड़ होती है। अपने दबंग स्वभाव से वह उन्हें प्रभावित करती है, लेकिन अजीते (हर्ष मेयार) उसे डायन की हवेली में जाने की चुनौती देता है। निर्भीक श्रेया उस हवेली में घुस जाती है। अगली बार इसी कोशिश में वह गांव में चल रही कन्या भ्रूण हत्या को उजागर कर देती है।
नीला माधब पांडा ने कन्या भ्रूण हत्या और जल संरक्षण के मुख्य मुद्दे के अलावा संकेतों में लिंग भेद, अशिक्षा, ग्रामीण जड़ता आदि समस्याओं को भी छुआ है। अच्छी बात है कि फिल्म कहीं भी संदेशपरक या उपदेशात्मक नहीं होती है। फिर भी फिल्म के आखिर में स्पष्ट संदेश मिलता है। जलपरी में लहर खान और हर्ष मेयार का अभिनय उल्लेखनीय है। दोनों सहज,स्वाभाविक और किरदारों के अनुकूल हैं। बाकी बच्चे भी सहयोगी भूमिका में अच्छे लगते हैं। इंपोर्टेड वाइफ की भूमिका में तनिष्ठा चटर्जी फिल्म को मनोरंजक बनाए रखती हैं। ग्रामीण परिवेश और वहां की रूढि़यों की कहानी में अच्छी तरह पिरोया गया है। सविता सिंह के कैमरे ने ग्रामीण परिवेश को उसके सही रंगों के साथ पेश किया है। अन्य किरदारों में राहुल सिंह, सुहासिनी मूले और बीएम वडोला ने प्रशंसनीय अभिनय किया है।
अवधि-98 मिनट
*** तीन स्टार