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Tuesday, July 31, 2012

सत्‍यमेव जयते-13 : अकेले व्‍यक्ति की शक्ति-आमिर खान

मैं अकेला क्या कर सकता हूं? एक अरब बीस करोड़ की आबादी में मैं तो बस एक हूं। अगर मैं बदल भी जाता हूं, तो इससे क्या फर्क पड़ेगा? बाकी का क्या होगा? सबको कौन बदलेगा? पहले सबको बदलो, फिर मैं भी बदल जाऊंगा। ये विचार सबसे नकारात्मक विचारों में से हैं। इन सवालों का सबसे सटीक जवाब दशरथ मांझी की कहानी में छिपा है। यह हमें बताती है कि एक अकेला आदमी क्या हासिल कर सकता है? यह हमें एक व्यक्ति की शक्ति से परिचित कराती है। यह हमें बताती है कि आदमी पहाड़ों को हटा सकता है।




बिहार में एक छोटा सा गांव गहलोर पहाड़ों से घिरा है। नजदीकी शहर पहुंचने के लिए गांव वालों को पचास किलोमीटर घूम कर जाना पड़ता था, जबकि उसकी वास्तविक दूरी महज पांच किलोमीटर ही थी। दरअसल, शहर और गांव के बीच में एक पहाड़ पड़ता था, जिसका चक्कर लगाकर ही गांव वाले वहां पहुंच पाते थे। इस पहाड़ ने गहलोर के वासियों का जीवन नरक बना दिया था। एक दिन गांव में दशरथ मांझी नाम के व्यक्ति ने फैसला किया कि वह पर्वत को काटकर उसके बीच से रास्ता निकालेगा। अपनी बकरियां बेचकर उन्होंने एक हथौड़ा और कुदाल खरीदी और अपने अभियान में जुट गये। गांव वाले उन पर हंसने लगे। उनकी खिल्ली उड़ायी और यह कहकर उन्हें रोकने की कोशिश की कि यह संभव ही नहीं है। किंतु दशरथ ने उनकी बात नहीं मानी और काम में जुटे रहे। आखिरकार 22 वर्षो के अथक प्रयास के बाद वह सड़क बनाने में कामयाब हो ही गये।



एक क्षण के लिए जरा कल्पना तो करें कि अपने प्रयास के पहले दिन उन पर क्या बीती होगी। विशाल पर्वत के सामने हथौड़ा और कुदाल लिए एक अदना सा आदमी। पहले दिन कितने घन इंच-पत्थर वह काट पाये होंगे? उस शाम को घर जाते समय उनके दिमाग में क्या घूम रहा होगा? एक सप्ताह के काम के बाद उन्हें क्या लगा होगा? तब उनकी क्या मानसिकता रही होगी? इसमें संदेह नहीं, पहले सप्ताह के अंत में उन्हें यह काम और भी मुश्किल लगा होगा। जब लोगों ने उनकी खिल्ली उड़ायी होगी, उनको हतोत्साहित किया होगा, तो उन पर क्या गुजरी होगी? किस चीज ने उन्हें 22 सालों तक काम में जुटे रहने को प्रेरित किया होगा?



हमें और आपको यह तय करना है कि हम दशरथ मांझी की तरह बनना चाहते हैं या फिर उन गांव वालों की तरह, जिन्होंने उन्हें हतोत्साहित किया, उनका मखौल उड़ाया। हमारे सामने चुनाव स्पष्ट है। दशरथ मांझी जो करने का प्रयास कर रहे थे, वह सबके हित में था। इसके बावजूद उन्हीं के गांव वालों ने उनका मजाक उड़ाया। तो हमें उन गांव वालों की तरह होना चाहिए या फिर दशरथ मांझी की तरह जीना चाहिए, जिन्होंने अकेले अपने दम पर एक असंभव से दिखने वाले काम को अंजाम तक पहुंचा कर ही दम लिया। हममें से हरेक को अपने आप से यह सवाल पूछना चाहिए और हमारे जवाब में ही हमारे भविष्य की सच्‍चाई छिपी है। हमारे जवाब में ही इन सवालों का जवाब छुपा है – क्या मैं राष्ट्र निर्माण में योगदान देना चाहता हूं? मैं आशावादी बनना चाहता हूं या फिर महज आलोचक? मैं अपने सपने पूरे करने के लिए बिना किसी समझौते के अथक प्रयास करना चाहता हूं या फिर हताश-निराश होना चाहता हूं, जो सकारात्मक काम करने वालों को हतोत्साहित करे?



भारत में मेरा विश्वास है। भारत के लोगों में मेरा विश्वास है। मेरा विश्वास है कि प्रत्येक भारतवासी अपने देश को प्यार करता है। मेरा विश्वास है कि भारत बदल रहा है। मुङो विश्वास है कि भारत बदलना चाहता है। मैं उस सपने में यकीन रखता हूं जो हमारे पूर्वजों ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देखा था। एक स्वप्न जिसका जिक्र भारत के संविधान की प्रस्तावना में है – हम भारत के नागरिक ये तय करते हैं… ये वादा करते हैं कि हम हिंदुस्तान को एक स्वतंत्र, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाएंगे, राष्ट्र बनाएंगे। हम हिंदुस्तान के सारे नागरिकों को चार चीजें दिलवाएंगे…



न्याय… सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक।

आजादी… सोच की, बोलने की और अपने-अपने धर्म का पालन करने की।

समानता… यानी सब बराबर हैं, कोई ऊंचा-नीचा नहीं है। और सब नागरिकों को बराबरी मिलेगी अवसर की, मौके की।

और चौथा भाईचारा… हम एकदूसरे में भाईचारा बढ़ाएंगे, हर एक इंसान को इज्‍जत से जीने का हक होगा और अपने देश में हम एकता और अखंडता बढ़ाएंगे, कायम रखेंगे।…

दोस्तो यह था हमारे पूर्वजों के भारत का सपना। यह कहने वाले बहुत से व्यक्ति मिल जाएंगे कि यह सपना टूट गया। पर मैं इससे सहमत नहीं हूं। यह सच है कि सपना पूरा नहीं हो सका है, किंतु इसके साथ यह भी पूरी तरह सच है कि यह अभी टूटा भी नहीं है। आज भी हजारों भारतीय इस सपने को जीते हैं। बहुत से लोगों ने इस सपने को साकार करने में अपना जीवन लगा दिया है। इनमें से बहुत से लोगों को यह भान भी नहीं है कि अपने जीवन में वे भारतीय संविधान में वर्णित सपने को जी रहे हैं, जिसे हमारे पूर्वजों ने देखा था।



मेरा मानना है कि हममें से बहुत से लोग कहीं न कहीं कुछ-कुछ चतुर, व्यावहारिक, हताश, भौतिकवादी और स्वार्थी हो गये हैं। हो सकता है हमें आगे बढ़ने के लिए थोड़े से सहारे की जरूरत हो। हमारे दिल में उम्मीद, आदर्शवाद, भरोसे, आस्था, विश्वास और जुनून के लिए थोड़ी सी जगह होनी चाहिए। अगर एक दशरथ मांझी पहाड़ को हरा सकते हैं, तो कल्पना करो कि 120 करोड़ दशरथ मांझी क्या कर सकते हैं।



सत्यमेव जयते की मेरी यात्रा समाप्त हो रही है, किंतु मेरा विश्वास है कि यह अंत नहीं, बल्कि असल में एक शुरुआत है। और शुरुआत के इस आशा भरे क्षण में, मैं गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर द्वारा सबसे पहले अभिव्यक्त एक प्रार्थना के आगे अपना सिर झुकाना चाहता हूं…



जहां उड़ता फिरे मन बेखौफ

और सर हो शान से उठा हुआ

जहां इल्म हो सबके लिए बेरोक

बिना शर्त रखा हुआ

जहां घर की चौखट से छोटी सरहदों में न बंटा हो जहान

जहां सच से सराबोर हो हर बयान

जहां बाजुएं बिना थके लगी रहें कुछ मुक्कमल तलाशें

जहां सही सोच को धुंधला न पाएं उदास मुर्दा रवायतें

जहां दिलो-दिमाग तलाशे नया खयाल और उन्हें अंजाम दे

ऐसी आजादी की जन्नत में आये खुदा

मेरे वतन की हो नयी सुबह।…

जय हिंद, सत्यमेव जयते!



Saturday, July 28, 2012

फिल्‍म समीक्षा : क्‍या सुपर कूल हैं हम

फूहड़ एडल्ट कामेडी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
सचिन यार्डी की क्या सुपर कूल हैं हम अपने उद्देश्य में स्पष्ट है। उन्होंने घोषित रूप से एक एडल्ट कामेडी बनाई है। एडल्ट कामेडी के लिए जरूरी नटखट व्यवहार,द्विअर्थी संवाद,यौन उत्कंठा बढ़ाने के हंसी-मजाक और अश्लील दृश्य फिल्म में भरे गए हैं। उनके प्रति लेखक-निर्देशक ने किसी प्रकार की झिझक नहीं दिखाई है। पिछले कुछ सालों में इस तरह की फिल्मों के दर्शक भी तैयार हो गए हैं। जस्ट वयस्क हुए युवा दर्शकों के बीच ऐसी फिल्मों का क्रेज किसी लतीफे के तरह प्रचलित हुआ है। संभव है ऐसे दर्शकों को यह फिल्म पर्याप्त मनोरंजन दे।
आदि और सिड संघर्षरत हैं। आदि एक्टर बनना चाहता है और सिड की ख्वाहिश डीजे बनने की है। दोनों अपनी कोशिशों में लगातार असफल हो रहे हैं। कुछ सिक्वेंस के बाद उन्हें अपनी फील्ड में स्ट्रगल की परवाह नहीं रहती। वे लड़कियों के पीछे पड़ जाते हैं। लेखक-निर्देशक उसके बाद से उनके प्रेम की उच्छृंखलताओं में रम जाते हैं। वही इस फिल्म का ध्येय भी है। क्या सुपर कूल हैं हम में स्तरीय कामेडी की उम्मीद करना फिजूल है। फूहड़ता और द्विअर्थी संवादों की झड़ी लगी रहती है। फिल्म के दो नायकों से बात नहीं बनती तो 3जी बाबा के रूप में चंकी पांडे और सनकी बिजनेशमैन मार्लो के रूप में अनुपम खेर को लाया जाता है। मार्लो का नाम हमेशा मारलो पुकारा जाता है। एडल्ट कामेडी के नाम पर नामों के उच्चारण तक में अश्लीलता लाई गई है। फिल्म की संरचना एपिसोडिक रखी गई है। कोशिश है कि हर एपिसोड में हंसने का पर्याप्त मसाला मिले।
फिल्म में रोहित शेट्टी और सुनीता मेनन को रियल किरदारों की तरह दिखाने का अनोखा प्रयास है। दोनों अपनी भूमिकाओं को निभा ले जाते हैं और गरिमा बनाए रखते हैं। तुषार कपूर और रितेश देशमुख ने अपने चरित्रों को बेधड़क तरीके से निभाया है। उन्हें ऊलजलूल हरकतें करने,कपड़े उतारने और चढ्डी सरकाने में शर्म नहीं महसूस होती है। यह नए प्रकार की एक्टिंग है। दोनों अपने चरित्रों को पूरे आत्मविश्वास से निभाते हैं। अनुपम खेर और चंकी पांडे की फूहड़ता दिखाई देती है। नेहा शर्मा और सारा जेन डायस की भूमिकाएं दोनों नायकों के साथ दर्शकों की उत्तेजना बनाए रखने की है। उन्हें वैसे ही दृश्य और कपड़े दिए गए हैं।
फिल्म का गीत-संगीत भी थीम के अनुकूल है। निरर्थक शब्दों को तेज धुनों के साथ पेश कर संगीत का रोमांच पैदा किया गया है,जिसे दोनों मुख्य कलाकार बेशर्मी के साथ पर्दे पर नृत्य की अदाओं में जाहिर करते हैं।
**1/2 ढाई स्टार

फिल्‍म समीक्षा:आलाप

नक्सलवाद का काल्पनिक निदान  -अजय ब्रह्मात्‍मज
नए डायरेक्टर, प्रोड्यूसर, एक्टर की टीम ने मिल कर नए माहौल में आलाप रचने की कोशिश की है। छत्तीसगढ़ के इन नौजवानों की कोशिश की सराहना की जानी चाहिए। उन्होंने स्थानीय प्रतिभाओं के साथ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के कुछ परिचित नामों को जोड़ कर एक फिल्म बनाने का प्रयास किया है।
आलाप नक्सलवाद से प्रभावित इलाकों की कहानी है। इस इलाके के निम्न तबके का एक प्रतिभाशाली युवक पढ़ाई पूरी करने के बाद कुछ खास और अलग करना चाहता था। उसे स्थानीय डीएम से ऐसा करने का प्रोत्साहन भी मिलता है। वह तीन दूसरे युवकों के साथ मिल कर अपनी मंडली बनाता है। वे गीत-संगीत के जरिए समाज में प्रेम और सौहार्द्र फैलाने का काम करते हैं। उनका इलाका नक्सल प्रभावित है। नक्सल और पुलिस की मुठभेड़ में आए दिन निर्दोषों की हत्याएं होती रहती हैं। वे अपने गीतों से मानवता का पाठ पढ़ाते हुए नक्सलियों को भी प्रभावित करना चाहते हैं। इसी उद्देश्य से वे उनके सक्रिय इलाके में प्रवेश करते हैं। चारों अपने बलिदान से नक्सली नेता का हृदय परिव‌र्त्तन करने में सफल रहते हैं।
आलाप में गंभीर राजनीतिक समस्या के काल्पनिक निदान है। इस जटिल समस्या का फिल्म के कुछ किरदारों में सरलीकरण कर लेखक-निर्देशक ने हल खोज लिया है। आलाप की कोशिश अच्छी है। अगर यह स्थानीय रंग में लिपटी रहती तो बेहतरीन फिल्म होती। मुंबई की मसाला हिंदी फिल्मों से प्रभावित आलाप न तो स्थानीय रह पाती है और न मुंबइया मसाला फिल्म बन पाती है। फिल्म के प्रमुख किरदारों का चरित्र निर्वाह मामूली है। नक्सली नेता और पुलिस अधिकारी के चरित्र को भी अच्छी तरह विकसित नहीं किया गया है। हालांकि अभिमन्यु सिंह और मुरली शर्मा ने स्क्रिप्ट की सीमाओं से उठने की कोशिा की है। रघुवीर यादव, ओमकार दास माणिकपुरी और विजय राज जैसे अभिनेताओं का भी सही इस्तेमाल नहीं हुआ है। आलाप एक अनगढ़ फिल्म बनकर रह गई है।
फिल्म का गीत-संगीत प्रभावशाली है। पंछी जालौनवी और अग्नि बैंड ने फिल्म की थीम को समझा और उन्हें उपयुक्त शब्द, स्वर और धुनें दी हैं। फिल्म की आंतरिक बनावट और प्रस्तुति की कमी से गीत-संगीत की विशेषता दब गई है।
** दो स्टार

Friday, July 27, 2012

कैसे याद रखेंगे दिग्गजों को?

कैसे याद रखेंगे दिग्गजों को?-अजय ब्रह्मात्‍मज 
एक सप्ताह के अंदर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के दो दिग्गज दिवंगत हो गए। पहले दारा सिंह और फिर राजेश खन्ना.., दोनों अपने समय के खास कलाकार थे। अपने-अपने हिसाब से दोनों ने दर्शकों का मनोरंजन किया। उनके निधन के पश्चात पुरानी फिल्मों की तस्वीरों, फुटेज और यादगार लम्हों से उनके करियर और जीवन की जानकारी मिली। सच कहें तो आज के युवा दर्शकों को पहली बार दारा सिंह और राजेश खन्ना के महत्व का पता चला। लोकप्रिय संस्कृति का यह बड़ा दोष है कि वह मुख्य रूप से वर्तमान से संचालित होती है। अभी जो पॉपुलर है, हम उसी के बारे में सब कुछ जानते हैं। दोनों दिग्गजों की मौत के बाद मुमकिन है कि सभी ने महसूस किया हो कि ज्यादातर चैनलों पर उथली जानकारियां ही परोसी जा रही थीं। विकीपीडिया, आईएमडीबी और फिल्मी वेबसाइट से उठाई गई जानकारियों को ही रोचक तरीके से पेश किया जा रहा था।
वैसे कहने को तो देश में हजारों फिल्म पत्रकार हैं और लाखों दर्शक-प्रशंसक सोशल मीडिया नेटवर्क पर अपने विचार प्रकट करते रहते हैं। ज्यादातर विचारों में सोच और संगति नहीं रहती। पूरे देश में एक भी ऐसी लाइब्रेरी, संग्रहालय या डाक्यूमेंटेशन सेंटर नहीं है, जहां लोकप्रिय संस्कृति से जुड़ी हस्तियों के दस्तावेज हों। हम ने समाज में ऐसे एक्सपर्ट और जीवनीकारों को भी बढ़ावा नहीं दिया है। किसी भी प्रमुख हस्ती के निधन के बाद उनकी कमी और सूचनाओं की लाचारगी जाहिर होती है। ले-देकर पूना में एक नेशनल फिल्म आर्काइव है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। पीके नायर सरीखे चंद फिल्म प्रेमियों की मेहनत से वहां कुछ दस्तावेज, फिल्में, फिल्मी सामग्री, पत्र-पत्रिकाएं मिल जाती हैं। भारत सरकार और फिल्म इंडस्ट्री इस आर्काइव की समृद्धि पर ध्यान दे वह बेहतर इंफार्मेशन सेंटर के रूप में डेवलप हो सकता है।
दरअसल, हमारी रुचि दस्तावेजीकरण में नहीं होती। हम पारिवारिक-सामाजिक समारोहों के सिलसिलेवार दस्तावेजीकरण में यकीन ही नहीं करते। डिजिटल युग में मोबाइल और डिजिटल कैमरों से तस्वीरें, आवाजें और वीडियो तो उतार लिए जाते हैं, लेकिन चार-छह महीनों के बाद ही उनका रेकार्ड हमें अपनी निजी लाइब्रेरी में भी नहीं मिल पाता। इस लापरवाही का नतीजा बड़े स्तर पर नुकसानदेह है।
भारतीय सिनेमा के 100 साल पूरे होने को हैं। छोटे-बड़े स्तर पर अनेक आयोजन हो रहे हैं। फिर भी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री या किसी और संस्थान की तरफ से एक केंद्रीय संग्रहालय का प्रस्ताव नहीं आया है। इस दिशा में सरकार और फिल्म इंडस्ट्री को यथाशीघ्र पहल करनी चाहिए। दारा सिंह और राजेश खन्ना पर दिखाए गए टीवी कवरेज ही याद करें तो किसी चैनल के पास उन दोनों दिग्गजों के ताजा तो क्या, बासी इंटरव्यू भी नहीं थे। दारा सिंह की तबीयत दो महीने पहले और राजेश खन्ना की डेढ़ साल पहले बिगड़ी थी। क्या उसके पहले किसी चैनल अधिकारी या फिल्म पत्रकार या किसी संस्थान को उनकी सुध नहीं आई थी? यह सचेत और सक्रिय होने का समय है। हमें जल्दी से जल्दी इस दिशा में ठोस प्लानिंग के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
राजेश खन्ना की इच्छा थी कि उनके बंगले आशीर्वाद को म्यूजियम का रूप दिया जाए। उनकी अंतिम इच्छा का स्वागत करते हुए डिंपल कपाडि़या और अक्षय कुमार पहल कर सकते हैं। अगर आशीर्वाद को संग्रहालय में तब्दील करने की व्यावहारिक दिक्कतें हों तो कम से कम सुपरस्टार राजेश खन्ना की याद में कहीं और तो संग्रहालय स्थापित किया ही जा सकता है। बीते दौर की सभी फिल्मी हस्तियों के साथ समकालीनों के कार्य-कलाप का भी दस्तावेजीकरण और संग्रहण होना चाहिए। लोकप्रिय संस्कृति को जिंदा रखने और उसके अतीत से परिचित होने के लिए यह बहुत जरूरी है। भारतीय सिनेमा के 100वें साल में इसकी शुरुआत तो हो ही जानी चाहिए।

Wednesday, July 25, 2012

Blood and lust-partha chatterjee


partha chatterjee has written this article in Fronline  Volume 29 - Issue 15 :: Jul. 28-Aug. 10, 2012  issue
“Gangs of Wasseypur” typifies the commercial cinema in which paranoia passes for intensity.




 
Director Anurag Kashyap during a road show to promote the film "Gangs of Wasseypur", in Mumbai on June 5.

There is more of the withered state of contemporary India to be found in commercial films, particularly those in Hindi, produced in Mumbai, or Bollywood, than in daily newspapers, magazines or even television news channels. If news channels give you a slice of life, commercial films give you a slice of cake disguised as a slice of life! India’s chaotic economic and political condition gets best reflected in the paranoia that passes for intensity in commercial cinema. A case in point is Gangs of Wasseypur, directed by Anurag Kashyap. He is believed to be one of the leading lights of what might be called the “neo-progressives” among Hindi film-makers of Bollywood. His latest production is a huge hit – his first – and is being compared by neophyte film critics with Francis Ford Coppola’s The Godfather (1972), which chronicles the rise of the Mafia in the social and political life of the United States between the two World Wars in the last century.
Gangs of Wasseypur begins some years before India’s independence from British rule in 1947 and continues into the late 20th century. It is set in the coal belt of Dhanbad in what is now Jharkhand. The film is set in flashback, with hoodlums armed with AK-47 automatic rifles, a weapon meant exclusively for the army and the paramilitary forces, attacking a house in a kasba, an offshoot of a small town.
On hearing the commotion outside, moments before the gunfire begins in earnest, a shopkeeper watching Kyon Ki Saas Bhi Kabhi Bahu Thi, a hugely popular Hindi TV serial, quickly pulls down his shutters. The gangsters apparently wipe out the family of a rival gang leader and, on their way out, butcher an inconvenient police cordon. The parallels with the utterly lawless Bihar come to mind, whether Kashyap wants it or not. Then the film slowly but surely meanders into hero worship, horseplay and, of course, myth-making.
The intention of the director, for all his grandiose posturing, appears to be the manufacture of harmless entertainment; the kind that excites, even titillates, the economically deprived, giving them false hope in the form of Sardar Khan, the son of Shahid Khan, a slain bodyguard of a rising gangster. The son avoids all the pitfalls his father had faced, until overwhelming success in crime goes to his head and his seeming invincibility is put to the test. The structure of the film is misleading, much like the structure of the Indian economy, if one can indulge in a bit of levity. A number of red herrings are thrown at the viewer; there is some chit-chat about the state of coal mines and the deplorable treatment of miners during British rule and how the conditions have not changed in independent India, but nothing develops organically in relation to the narrative. Kashyap and his scriptwriters have somehow sketched in the background to tell the story of Sardar Khan, a gangster.
Coal played a vital role in Bihar’s politics in the second half of the 20th century. There were huge profits to be made. Politicians and the gangsters they employed made huge sums of money and successfully terrorised both colliery workers and lay citizens. The climate of fear brought about by the ruling party and its henchmen kept the party in power in Bihar for a long time, until one fine day the gangsters who worked for them declared “independence” and decided to seize power for themselves and their families.


 
Stills from the movie. Critics have found parallels with Francis Ford Coppolo's "The Godfather", though they are in reality quite superficial.

Sardar Khan is a thoroughly repulsive character; he will kill without any twinge of conscience and fornicate as and when he has the urge. He is the kind of man that every deprived Indian would be proud of; after all, he is a challenge to the authority of the state, if largely at a theoretical level. He is in reality only a pawn and the source of a dream that the poor cling to in the absence of justice, dignity and equity.
Kashyap and his scriptwriters know the box-office value of having a protagonist such as Sardar Khan, what with the prices of vegetables skyrocketing; grain rotting in silos but not given to the starving, teeming poor; and jungles belonging to the tribal people being handed over by the government to gigantic corporations for enormous mutual profit that the mineral wealth under the tribal land might eventually bring. One is not suggesting that Kashyap and Co. made this shrewd move deliberately. It may have been unconscious, for all we know. However, it has paid handsome dividends at the box office and raised his stature in the eyes of a largely apolitical but disgruntled audience.

Utterly nihilistic

Gangs of Wasseypur-Part I is indicative of the fact that it is going to be an ongoing saga. In its intention and politics it appears to be inspired by the Godfather Trilogy (Coppola) and Kill Bill I and II (Quentin Tarantino), both films espousing, of course without intending to, hard-line right-wing politics. The irony suggested is intentional, not many American film-makers have had the guts to be openly political since the McCarthy witch-hunt in the late 1940s. Coppola’s study of the Mafia in The Godfather is not critical enough, and, at times, without intending to, is admiring of the gangsters of Italian origin, who well-nigh pulverised social and political life in the U.S. Tarantino’s Kill Bill is nothing more than a tale of blood, gore and revenge; utterly nihilistic.
It is nihilism that has permeated Indian social (read also religious) life, for the two are entwined, and has brought about an overwhelming desperation among the poor and the middle class. There is an unexpressed feeling that despite godmen fleecing all and sundry and promising prosperity and peace of mind to all the faithful, God, that bribable judge, may after all not deliver. There is also an increasing awareness among the marginalised that the rich and the super rich have robbed them blind to reach where they are. These are some of the considerations that come into play when the success of Gangs of Wasseypur-I is to be analysed. It makes the poor as well as the middle class happy, but for different reasons.
It gives (false) hope to the poor to see a man like Sardar Khan, who has risen from among them, overcome and terrorise all upper-class, upper-caste opposition, symbolised by the equally villainous Ramadhar Singh, who earlier controlled the economic and, therefore, political life in the region. The middle-class people, with their stomachs full and with money to spend even in these times of high inflation, are titillated by a character like Sardar Khan and the tale he inspires. In a perverse way, Sardar Khan makes them feel good! Gangs of Wasseypur manages to kill two birds with one stone.
The English language press has gone overboard in its praise of the film. Critics have found parallels with The Godfather, though they are in reality quite superficial. There is, for instance, the final sequence in which Sardar Khan is betrayed by a phone call made by his second wife and is gunned down at a lonely petrol pump on the highway. This section certainly is a copy of the portion in The Godfather where Sonny Corleone is first set up and then led to his death in a shoot-out. Kashyap’s personal touch can be found in the pseudo folk song in which Sardar Khan is hailed as a hero. There is no irony here as there would be in a Sam Peckinpah film, nor is there a sense of utter futility resulting from a life that has been a misadventure from the start. Some squeamish critics – from the “educated” middle class to be sure – have found the violence in the film to be excessive; one of them even said, “If we were to meet the characters from Gangs of Wasseypur, they will leave us unmoved.”
The absence of knowledge as to what constitutes cinema, its aesthetics, its moral and ethical dimensions, has in recent times led to much confusion, especially among young newspaper and magazine critics of cinema. This is all the more ironic because DVDs of films from all over the world are now as freely available in India as in many other countries. A misreading of the word “globalisation” has led to much confusion. The idea of “anything goes” under the guise of freedom of expression has affected the subconscious and conscious thinking of the young the world over. The young in India have been similarly affected.


 
The English language press has gone overboard in its praise of the film and the Indian language press has not been far behind. Those who lavish praise on "Gangs of Wasseypur" ought to pause and think in what ways their hearts and minds are being illuminated by the film, says the author.


Overboard in praise

Those who write film reviews, especially for dailies and magazines in English, resort to a plethora of adjectives to describe a film. They forget that films are about action, about movement in time, and that verbs, rather than adjectives, would prove to be more useful in describing one. A particular critic, unable to find the word “visceral” to describe Gangs of Wasseypur-I, went into a tizzy and used words like “coitus” and “virus” to describe the intensity he felt after watching it. As to its moral and aesthetic possibilities, he is silent. He is, it seems, completely convinced that a film must, above all else, be an “experience”, and to quote a jargon of today, “a value-free” one. He seems to forget that the most amoral book or film has its own system of values, its own aesthetics. In this regard Gangs of Wasseypur-I is an arid exercise, yet the film has been hailed as a path-breaking work by leading English language journalistic publications in the country. The Indian language press has not been far behind in showering praise on the film.
Uncritical praise of a film whose primary objective is to make money does not speak well of the critics who indulge their whims while pretending to understand the medium. They, in their defence, may say cinema in India, or for that matter in the U.S., should only be seen as a purveyor of mere entertainment. These worthies forget that some of the most memorable films ever made were “entertainments”. Perhaps the Hindi word for entertainment, manoranjan – that which paints/illuminates the mind – is more to the point. Those who lavish praise on Gangs of Wasseypur-I ought to pause and think in what ways their hearts and minds are being illuminated by the film. Let them see, if they have not, Bring Me The Head of Alfredo Garcia, a 1974 (political) thriller made by Sam Peckinpah, the last great director to come out of that meat factory called Hollywood, in 50 years or more. The studio bosses who employed Peckinpah did everything possible to derail him; they mangled his films and released truncated versions of them. But nothing could take away from them their fierce intensity and flashes of acute political awareness, a fact most critics in the U.S. were blind to.
Bring Me The Head of Alfredo Garcia is about a down-on-his-luck barroom pianist and his sex worker girlfriend literally chasing the head of a dead gigolo, who made the young daughter of an immensely wealthy Mexican rancher – read warlord – pregnant and disappeared without a trace. The reward for his head is a million dollars, though the rancher’s henchmen offer Benny, the pianist, only $10,000 if he succeeds. Such stories end in tragedy, and this one does. The film has grandeur and a profundity because it is a most perceptive study of capitalism and the greed it engenders both in the rich and the deprived, of course of different kinds.
American critics, for all their high literacy, tend to pigeonhole film-makers; they did that to Peckinpah as well. Of Bring Me The Head of Alfredo Garcia, Roger Ebert, the eminent film critic of Chicago Sun-Times, observed, “The movie is some kind of bizarre masterpiece. It’s probably not a movie that most people would like, but violence, with Peckinpah, becomes a psychic ballet.” The critic from a much smaller newspaper, Cole Smithey of Daily Radar, was much closer to the truth when he wrote, “Fermented in a tragic romanticism placed firmly in a no-man’s land between liberation and capitalism, Sam Peckinpah’s 1974 thriller is a film that sticks in your mind’s eye like a lingering sunspot.”
One may ask why all this talk about Sam Peckinpah while discussing Anurag Kashyap’s Gangs of Wasseypur-I? The answer is that both are products of mainstream cinema of their respective countries, the U.S. and India. Talent in the eyes of the moneybags is the ability to sell tickets in very large numbers, and in today’s context, various other rights connected with the film, such as television screening rights, DVD rights and music rights. Peckinpah’s producers thought they knew more than he and always took a pair of scissors to his films, without rhyme or reason. They, poor apolitical finance men, were always trying to “tighten” his long narratives without once understanding their political or philosophic intent. He was always considered an anarchist who liked to rebel for the heck of it.
Kashyap, on the other hand, is considered a safe proposition. He has made films ‘different’ from the norm, like Black Friday, Dev-D, The Girl In Yellow Boots, and now, Gangs of Wasseypur-I, though how different one wonders.
His politics, like that of most of his colleagues in Bollywood, is conservative and covertly right-wing, despite his claims of once having belonged to the Jana Natya Manch, a leftist theatre group from Delhi founded by Safdar Hashmi, who was martyred at the hands of Congress goons in 1989. Take a scene from Black Friday based on the 1993 bombings in Mumbai following the demolition of the Babri Masjid in Ayodhya by Hindu fanatics on December 6, 1992. There is a scene of a young suspect running for his life from several overweight, middle-aged policemen, for what seems to be an eternity. Against all norms of logic the boy is caught; more so, if one keeps in mind a newspaper report that said a middle-aged policeman, appearing for a physical fitness test prior to promotion, collapsed and died after running a kilometre. The metaphor that Kashyap uses is not cinematic, it is a literal expression of the saying, “Nobody can escape from the long arm of the law.” What exactly is his political or philosophical thesis in this film?
The financiers have realised that his films make money and are a safer commercial proposition, especially if they keep in mind the investment-to-return ratio compared with the average medium- or big-budget Hindi film. Gangs of Wasseypur-I, budgeted at Rs.18.5 crore, has already touched the Rs.50-crore mark in India, and the money is still rolling in. Various overseas rights have not come into consideration as yet. Who has the money to buy expensive cinema tickets – they certainly are expensive in metropolitan India – one may ask? Twenty-three per cent of the Indian population still can, despite murderous inflation, while the remaining 77 per cent goes to bed hungry. These figures are not arbitrary but have been provided by a former economist of the Planning Commission, the late Arjun Sengupta.

Aesthetic reasons

The reason for bringing up Peckinpah’s Bring Me The Head of Alfredo Garcia is also aesthetic. The opening begins like a traditional late 19th century western, when without warning, within the same scene, principal participants in the manhunt that is about to begin drive away in the latest Mercedes Benz car, with horsemen also in the picture. The sequence ends with a commercial jet airliner landing in an airport. Peckinpah acquaints us with the inner and outer structures of a half feudal-half capitalist society with great economy and mastery. In Gangs of Wasseypur-I, the film begins with AK-47 toting ruffians bursting into a lane in a kasba firing crazily, then slowly the film goes backwards in time, to possibly suggest that nothing has changed socially or politically since the British left. But the progression of the story suggests that this attempt at presenting a socio-political backdrop is only a facade. The director, it seems, wants the audience to fall in love with the rogue Sardar Khan despite all his failings, including a penchant for committing murder whenever he runs out of ideas. There is no moral ambiguity here, just a straightforward lust for blood.
He does commit a murder in a lane in broad daylight, most lovingly, by stabbing a man many times, almost at the behest of a choreographer. This scene had a reviewer in paroxysms of delight. What can one say about the taste of contemporary film critics of the English language press who applaud gratuitous violence in films, Indian or any other. Sardar Khan is a one-dimensional character typical of Hindi films; his wonkiness, too, is predictable. He has two wives, one a Muslim and the other a Hindu; he has two sons by the former and one by the latter. There is obvious tension between the two households, and at one point he virtually abandons his first wife and two sons for the second and the son by her, so much so that the young boys from his earlier marriage clean toilets on trains to get by. Then, without warning, he is back with his original family as if nothing has happened. He, however, retains an emotional and sexual affinity for the young Hindu wife and affection for the son, and pays for their upkeep; something he neglected to do in the case of his older family. It is the younger wife who betrays him in the end, fed up perhaps with being the other woman in his life.
Another strand in the narrative is the running feud between the Qureshis (butchers) and the Pathans (presumably warriors) in the area, though one never knows why. Then there is a scene of Shias flogging themselves and being bathed in blood during Mohharam. It is difficult to fathom why Kashyap and his scriptwriters chose to give the viewers vignettes of Muslim cultural life in and around the coal belt in Dhanbad, in what was once Bihar. There are also shots from old black-and-white newsreels and of smoking coalfields that are used as “narrative punctuation”. Do these digressions help to understand better the character of Sardar Khan and that of his associates?
The film is strewn with cliches found in a regular Bollywood film. The son, who had been left to his own devices as a child, has blind devotion to Sardar Khan, and is going to be his unspoken successor in crime. The other cliche is the theme of revenge. There is war between Ramadhar Singh and family and Sardar Khan and family. Sardar Khan’s son kills Yadavjee, the hitman and gun supplier and the killer of his grandfather Shahid Khan, who as Ramadhar Singh’s bodyguard had wanted to take over his employer’s business territory. To add to the confusion is the tale of a young Shahid Khan looting trains in British India masquerading as Sultana, the much-feared bandit!
There is no clarity of vision, and hence purpose, in the making of Gangs of Wasseypur-I. This statement may be challenged by Kashyap, who might say that he was absolutely clear in his mind about making a super hit no matter what the cost. He can claim that he is helping people tired of tightening their purse strings forget their troubles, if only for two hours and 40 minutes! The one claim he cannot make, however, is that a character like Sardar Khan can in any way help make things better for the poor. He is for himself, and his sons shall be like him. There is a similarity between him and Don Corleone in The Godfather, who, of course, was infinitely more ambitious and controlled an empire of crime to match.
Coppola’s The Godfather cannot escape being in awe of its subject because Coppola knew very well the world of the Italian immigrants in the U.S. dominated by the Mafia; indeed his father, who played second flute in the great Arturo Toscanini’s symphony orchestra, had his musical tuition funded by the Mafia. He has gone on record saying that while his machinist grandfather would oil the Tommy guns of the Mafia in the morning, the same weapons would probably be used to kill people afterwards. Anurag Kashyap may or may not be in awe of his lead character in Gangs of Wasseypur-I, but he is certainly rooting for him, though why? One may never know.

Tuesday, July 24, 2012

अब्बा कैफी आजमी को याद कर रही हैं शबाना आजमी

-रघुवेन्‍द्र सिंह

कैफी आजमी बहुत कम उम्र में जाने-माने शायर हो चुके थे. वे मुशायरों में स्टार थे, लेकिन वे पूरी तरह से कम्युनिस्ट पार्टी के लिए समर्पित थे. वे पार्टी के कामों में मशरूफ रहते थे. वे कम्युनिस्ट पार्टी के पेपर कौमी जंग में लिखते थे और ग्रासरूट लेवल पर मजदूर और किसानों के साथ पार्टी का काम भी करते थे. इसके लिए पार्टी उनको माहवार चालीस रूपए देती थी. उसी में घर का खर्च चलता था. उनकी बीवी शौकत आजमी को बच्चा होने वाला था. कम्युनिस्ट पार्टी की हमदर्द और प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन की मेंबर थीं इस्मत चुगतई. उन्होंने अपने शौहर शाहिर लतीफ से कहा कि तुम अपनी फिल्म के लिए कैफी से क्यों नहीं गाने लिखवाते हो. कैफी साहब ने उस वक्त तक कोई गाना नहीं लिखा था. उन्होंने लतीफ साहब से कहा कि मुझे गाना लिखना नहीं आता है. उन्होंने कहा कि तुम फिक्र मत करो. तुम इस बात की फिक्र करो कि तुम्हारी बीवी बच्चे से है और उस बच्चे की सेहत ठीक होनी चाहिए. उस वक्त शौकत आजमी के पेट में जो बच्चा था, वह बड़ा होकर शबाना आजमी बना.

कैफी साहब ने 1951 में पहला गीत बुजदिल फिल्म के लिए लिखा रोते-रोते बदल गई रात. हमको याद करना चाहिए कि कैफी साहब ट्रेडीशनल बिल्कुल नहीं थे. शिया घराने में एक जमींदार के घर में उनकी पैदाइश हुई थी. मर्सिहा शिया के रग-रग में बसा हुआ है. मुहर्रम में मातम के दौरान हजरत अली को जिन अल्फाजों में याद करते हैं, वह शायरी में है. उसकी एक रिद्म है. शिया घरानों में इस चीज की समझ हमेशा से रही है. उसके बाद, वे जिस माहौल में पले-बढ़े, वहां शायरी का बोल-बाला था. गयारह साल की उम्र में उन्होंने लिखा था, ‘‘इतना तो जिंदगी में किसी की खलल पड़े, हंसने से हो सुकूं, न रोने से कल पड़े.’’ गैर मामूली टैलेंट उनमें हमेशा से था. उस जमाने में जो भी फिल्मों से जुड़े, चाहे वह साहिर हों, मजरूह हों, शैलेंद्र हों, कैफी साहब हों, सबने इसे रोजगार का जरिया बनाया. ये सब शायरी करते थे, लेकिन शायरी की वजह सो कोई आमदनी नहीं थी. फिल्म आमदनी का एक जरिया बन गई.

एक नानू भाई वकील थे, जो स्टंट टाइप की फिल्में लिखते थे. उनके लिए भी कैफी साहब ने गीत लिखे. साथ में वे पार्टी का काम भी करते रहते थे. उनको पहला बड़ा ब्रेक मिला 1959 में, फिल्म कागज के फूल में. अबरार अल्वी ने उन्हें गुरूदत्त से मिलवाया. गुरूदत्त से बड़ी जल्दी उनकी अच्छी बन गई. कैफी साब कहते थे, ‘‘उस जमाने में फिल्मों में गाने लिखना एक अजीब ही चीज थी. आम तौर पर पहले ट्यून बनती थी. उसके बाद उसमें शब्द पिरोए जाते थे. ये ठीक ऐसे ही था कि पहले आपने कब्र खोद ली. फिर उसमें मुर्दे को फिट करने की कोशिश करें. तो कभी मुर्दे का पैर बाहर रहता था तो कभी कोई अंग. मेरे बारे में फिल्मकारों को यकीन हो गया कि ये मुर्दे ठीक गाड़ लेता है, इसलिए मुझे काम मिलने लगा.’’ वे यह भी बताते हैं कि कागज के फूल का जो मशहूर गाना है वक्त ने किया क्या हंसीं सितम.. ये यूं ही बन गया था. एस डी बर्मन और कैफी आजमी ने यूं ही यह गाना बना लिया था, जो गुरूदत्त को बेहद पसंद आया. उस गाने के लिए फिल्म में कोई सिचुएशन नहीं थी, लेकिन गुरूदत्त ने कहा कि ये गाना मुझे दे दो. इसे मैं सिचुएशन में फिट कर दूंगा. आज अगर आप कागज के फूल देखें तो ऐसा लगता है कि वह गाना उसी सिचुएशन के लिए बनाया गया है.

कैफी साहब के गाने बेइंतेहा मशहूर हुए, लेकिन फिल्म कामयाब नहीं हुई. गुरूदत्त डिप्रेशन में चले गए. उसके बाद कैफी साहब के पास शोला और शबनम फिल्म आई. उसके गाने बहुत मशहूर हुए. जाने क्या ढूंढती हैं ये आंखें मुझमें और जीत ही लेंगे बाजी हम-तुम, लेकिन फिर फिल्म नहीं चली. फिर अपना हाथ जगन्नाथ आई. एक के बाद एक कैफी साहब की काफी फिल्में आईं और सबके गाने मशहूर, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर एक भी फिल्म नहीं चली. शमां जरूर एक फिल्म थी, जिसमें सुरैया थीं, उसके गाने मशहूर हुए और वह पिक्चर भी चली. लेकिन ज्यादातर जिन फिल्मों में इन्होंने गाने लिखे, वह नहीं चलीं. फिर फिल्म इंडस्ट्री ने इनसे पल्ला झाडऩा शुरू कर दिया और लोग यह बात कहने लगे कि कैफी साहब लिखते तो बहुत अच्छा हैं, लेकिन ये अनलकी हैं.

इस माहौल में चेतन आनंद एक दिन हमारे घर में आए. उन्होंने कहा कि कैफी साहब, बहुत दिनों के बाद मैं एक पिक्चर बना रहा हूं. मैं चाहता हूं कि मेरी फिल्म के गाने आप लिखें. कैफी साहब ने कहा कि मुझे इस वक्त काम की बहुत जरूरत है और आपके साथ काम करना मेरे लिए बहुत बड़ी बात है, लेकिन लोग कहते हैं कि मेरे सितारे गर्दिश में हैं. चेतन आनंद ने कहा कि मेरे बारे में भी लोग यही कहते हैं. मैं मनहूस समझा जाता हूं. चलिए, क्या पता दो निगेटिव मिलकर एक पॉजिटिव बन जाए. आप इस बात की फिक्र न करें कि लोग क्या कहते हैं. कर चले हम फिदा जाने तन साथियों.. गाना बना. हकीकत (1964) फिल्म के तमाम गाने और वह पिक्चर बहुत बड़ी हिट हुई. उसके बाद कैफी साहब का कामयाब दौर शुरू हुआ. चेतन आनंद साहब की तमाम फिल्में वो लिखने लगे, जिसके गाने बहुत मशहूर हुए.

हीर रांझा (1970) में कैफी साहब ने एक इतिहास कायम कर दिया. उन्होंने पूरी फिल्म शायरी में लिखी. हिंदी सिनेमा के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ. आप उसका एक-एक शब्द देखें, उसमें शायरी है. उन्होंने इस फिल्म पर बहुत मेहनत की. वह रात भर जागकर लिखते थे. उन्हें हाई ब्लडप्रेशर था. सिगरेट बहुत पीते थे. इसी दौरान उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ और फिर पैरालसिस हो गया. उसके बाद फिर एक नया दौर शुरू हुआ. नए फिल्ममेकर्स कैफी साहब की तरफ अट्रैक होने लगे. उनमें चेतन आनंद के बेटे केतन आनंद थे. उनकी फिल्म टूटे खिलौने के गाने उन्होंने लिखे. उसके बाद उन्होंने मेरी दो-तीन फिल्मों टूटे खिलौने, भावना, अर्थ के गाने लिखे. बीच में सत्यकाम, अनुपमा, दिल की सुनो दुनिया वालों बनीं. ऋषिकेष मुखर्जी के साथ भी उन्होंने काम किया. अर्थ के गाने बहुत पॉपुलर हुए और फिल्म भी बहुत चली.

कैफी साहब का लिखने का अपना अंदाज था. जब डेडलाइन आती थी, तब वे लिखना शुरू करते थे. वो रात को गाने लिखने बैठते थे. उनका एक खास तरह का राइटिंग पैड होता था. वे सिर्फ मॉन्ट ब्लॉक पेन से लिखते थे. बाकी उनकी कोई जरूरत नहीं होती थी. ऐसा नहीं होता था कि बच्चों शोर मत करो, अब्बा लिखना शुरू कर रहे हैं. उनका अपना स्टडी का कमरा था, उसको वो हमेशा खुला रखते थे. हम लोग कूदम-कादी करते रहते थे. रेडियो चलता रहता था, ताश खेला जा रहा होता था. मैं हमेशा अब्बा से यह सवाल पूछती थी कि क्या गाने हकीकत की जिंदगी से प्रेरित होते हैं? अब्बा कहते थे कि शायर के लिए, राइटर के लिए, यह बहुत जरूरी है कि जो घटना घटी है, वह उससे थोड़ा सा अलग हो जाए, तब वह लिख सकता है. फिल्म की जो लिरिक राइटिंग है, वह महदूद होती है. वो सिचुएशन पर डिपेंड होती है. शायर जिंदगी को परखता है. जब आप जिंदगी के दर्द को महसूस करते हैं, जिंदगी से मुहब्बत महसूस करते हैं तब आप अपने अंदर के इमोशन से इन टच रहते हैं.

कैफी साहब ने गर्म हवा (1973) के डायलॉग लिखे, जो जिंदगी से जुड़े हुए थे. जावेद साहब को एक-एक डायलॉग याद हैं. मजेदार बात है कि गर्म हवा में सबको एक किरदार जो याद रहता है वह है बलराज साहनी की मां का, जो कोठरी में जाकर बैठ जाती है और कहती है कि यह घर मैं बिल्कुल नहीं छोड़ूंगी. यह किस्सा मम्मी की नानी के साथ हुआ था, जो उन्होंने कैफी साहब को सुनाया था, जिसे उन्होंने हूबहू लिख दिया था. गीता और बलराज जी के बीच में बहुत सारे सीन हैं. वह मेरे और अब्बा के बीच के रिश्ते से हैं. फारुक और गीता के बीच के सीन मेरे और बाबा के बीच के हैं. वो हमेशा अपने आस-पास की घटनाओं पर नजर रखते थे. मैं आजाद हूं फिल्म के गीत कितने बाजू कितने सर में उनकी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ सक्रियता का असर देखा जा सकता है.

कैफी साहब ने बहुत मुख्तलिफ डायरेक्टरर्स के साथ काम किया. उस वक्त जिन लोगों का बहुत नाम था, जिनमें कैफी साहब, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, जां निसार अख्तर और शैलेंद्र थे, ये सब लेफ्टिस्ट मूवमेंट से जुड़े थे और सब प्रोग्रेसिव राइटर्स थे. उनके पास जुबान की माहिरी थी. उस जमाने में गानों में जो जुबान इस्तेमाल होती थी, वो हिंदुस्तानी थी और उसमें उर्दू बहुत अच्छी तरह से शामिल थी. चाहे आप शैलेंद्र को देख लें, साहिर को देखें, जां निसार अख्तर को देखें या फिर कैफी साहब को, सबके गीतों में बाकायदा शायरी और जिंदगी का एक फलसफा भी होता था.

कैफी साहब के लिखे तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो (अर्थ), कर चले हम फिदा (हकीकत), दो दिन की जिंदगी (सत्यकाम), जरा सी आहट (नौनिहाल), झूम-झूम ढलती रात (कोहरा), ये नैन (अनुपमा) मुझे बहुत पसंद हैं. मैं इन गीतों को बार-बार सुनती हूं. हां, पाकीजा (1972) फिल्म का चलते-चलते कोई यूं ही मिल गया था.. भी मुझे बहुत पसंद है.

आज जिस तरह के गाने लिखे जाते हैं और उनमें जिस तरह के अल्फाज होते हैं, उस पर मुझे बहुत अफसोस है. मैं सोचती हूं कि कहां चले गए वो गाने. आज हम हिंदी फिल्म के गानों को खो रहे हैं. मुझे लगता है कि यह हम गलती कर रहे हैं. जाहिर है कि वक्त के साथ सबको बदलना चाहिए, लेकिन हिंदी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत उसका गाना है. यह उसे दुनिया के सभी सिनेमा से अलग बनाता है. अगर हम उसकी खूबी यानी यूएसपी को निकाल देंगे तो फिर हमारे पास रह क्या जाएगा? मुझे लगता है कि हमें इस दौर से निकलना चाहिए.

आजकल के गानों में अल्फाज सुनाई ही नहीं देते हैं. बिना अल्फाज के मुझे गाने का मतलब ही नहीं समझ में आता है. मैं सोचती हूं कि कब आएगा वह पुराना वक्त? मुझे यकीन है कि वह वक्त आएगा जरूर, क्योंकि आप देखिए जिस जमाने में एक लडक़ी को देखा तो ऐसा लगा.. गाना चल रहा था, उसी जमाने में सरकाई लेओ खटिया जाड़ा लगे भी चला था. ठीक वैसा ही दौर चल रहा है आज. हम लोगों के साथ ज्यादती कर रहे हैं. हम कहते हैं कि उनको अच्छे गीत का टेस्ट नहीं है, लेकिन अगर हम उन्हें वैसे गाने दे ही नहीं रहे हैं तो वो सुनेंगे कहां से? और फिर हम इस गलत नतीजे पर पहुंच जाते हैं कि गाने की कोई अहमियत नहीं होती है. मुझे लगता है कि कैफी साहब की दसवीं सालगिरह पर हमें एक बार फिर कमिट करना चाहिए.. वो इतने बड़े शायर थे, हम उनके काम को उठाएं, संभालें, देखें और युवा लेखकों को प्रेरणा दें ताकि वे कुछ सीखें.

जब फूट-फूटकर रो पड़ीं शबाना


अर्थ
कैफी आजमी द्वारा लिखित अर्थ फिल्म के गीत तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो.. की शूटिंग दो दिन तक हुई थी. इस गीत की शूटिंग के दौरान हर शॉट के बाद शबाना आजमी की आंखों से बरबस आंसू निकल आते थे. बकौल शबाना, ‘‘मेरी आंखों से भर-भरकर आंसू निकल आते थे, क्योंकि वो इतनी नजाकत से लिखे हैं. कैसे बताएं कि वो तन्हा क्यों हैं.. इतनी खूबसूरती से यह गाना लिखा हुआ है.’’



कैफी आजमी के जीवन पर एक नज़र:-

-कैफी आजमी का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में मिजवां ग्राम में 1919 में हुआ था.

-कैफी आजमी की जन्मतिथि उनकी अम्मी को याद नहीं थी. उनके मित्र डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर सुखदेव ने उनकी जन्मतिथि चौदह जनवरी रख दी.

-उन्होंने 1943 में कम्युनिस्ट पार्टी ज्वाइन कर ली. बाद में वे प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन के सक्रिय कार्यकर्ता बने.

-1951 में वे फिल्मों से जुड़े. शाहिद लतीफ की फिल्म बुजदिल में उन्होंने पहली बार गीत लिखे. बाद में उन्होंने हीर रांझा, मंथन और गर्म हवा फिल्मों का लेखन किया.

-कैफी आजमी ने सईद मिर्जा की फिल्म नसीम (1997) में अभिनय किया. यह किरदार पहले दिलीप कुमार निभाने वाले थे.

-कैफी आजमी केवल मॉन्ट ब्लॉक पेन से लिखते थे. उनकी पेन की सर्विसिंग न्यूयॉर्क के फाउंटेन हॉस्पिटल में होती थी. जब उनकी मौत हुई, तो उनके पास अट्ठारह मॉन्ट ब्लॉक पेन थे.

-कैफी आजमी को सात हिंदुस्तानी (1969) के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

-भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया था. इसके अलावा, उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार एवं गर्म हवा (1975) के लिए सर्वश्रेष्ठ कथा, पटकथा एवं संवाद के फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

-कैफी आजमी ने कुल अस्सी हिंदी फिल्मों में गीत लिखे हैं.

(जनवरी २०१२-फिल्मफेयर)

Monday, July 23, 2012

सत्‍यमेव जयते-12 : हाथ से फिसलते हालात-आमिर खान

जब मानव अंतरिक्ष के बाहर जीवन के लक्षणों की तलाश करता है तो सबसे पहले क्या देखता है? वह देखता है जल का अस्तित्व। किसी भी ग्रह में जल की उपस्थिति से यह संकेत मिलता है कि वहां जीवन संभव है। जाहिर है कि जल का अर्थ जीवन है और जीवन का अर्थ जल। हमारी पृथ्वी का 70 प्रतिशत भाग जल में डूबा है, लेकिन इस जल का अधिकांश हिस्सा खारा है। 97 प्रतिशत जल समुद्र के रूप में है, जो पीने के योग्य नहीं है। शेष तीन प्रतिशत जल ही मीठा है, जो बर्फ के रूप में है। दूसरे शब्दों में कहें तो मात्र एक प्रतिशत जल ही सात अरब की मानव आबादी के लिए पेयजल के रूप में उपलब्ध है। केवल मानव आबादी ही नहीं, बल्कि सभी जीव-जंतुओं के लिए भी यही जल जीने का सहारा है।
भारत के बारे में यह माना जाता है कि यहां पानी पर्याप्त मात्र में उपलब्ध है। इसका अर्थ है कि हम जितना चाहें उतना पानी हासिल कर सकते हैं, लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है कि प्रति वर्ष पानी की यह उपलब्धता घटती जा रही है। अब लगभग पूरे देश में जल संकट की आहट महसूस की जाने लगी है। एक अनुमान के अनुसार ग्रामीण भारत में रहने वाली एक महिला को पानी हासिल करने के लिए वर्ष में 1400 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। यहां तक कि शहरी क्षेत्रों में भी अब कुछ मिनटों की ही जलआपूर्ति एक सामान्य बात हो गई है। अक्सर इसको लेकर लोगों के बीच हिंसक झड़पें होती हैं और कभी-कभी इनमें लोगों को अपनी जान भी गंवानी पड़ती है। देश के अनेक भागों में अब टैंकर संस्कृति पनपने लगी है। यह सब क्यों हो रहा है? जब हमें पर्याप्त पानी मिल रहा है तो यह जा कहां रहा है? परंपरागत रूप से हम इससे परिचित थे कि अपने पानी को कैसे संचित और संरक्षित किया जाए। हमारे देश के प्रत्येक भाग में इस काम के लिए अपने-अपने तरीके थे। इसका अर्थ है कि बारिश के रूप में आसमान से गिरने वाले जल को एक निश्चित ढांचे में इकट्ठा किया जाता ताकि पूरे वर्ष उसका अलग-अलग कामों में इस्तेमाल किया जा सके। अलग-अलग परिस्थितियों के लिहाज से यह तरीका अलग-अलग है। लोग इस पानी को सही तरह से संचित करने के लिए अपना-अपना योगदान देते थे। मतलब टैंक को साफ रखना, दीवारों का समुचित रखरखाव आदि। इसके परिणामस्वरूप पानी से हमारा सीधा संबंध कायम हो गया।
अंग्रेजों के आगमन के साथ पानी पर नियंत्रण और मालिकाना हक सामान्य आदमी के हाथ से निकलकर प्रशासन के पास चला गया। सामुदायिक स्वामित्व के बजाय अब सरकारी विभाग इसका नियंत्रण करने लगे। झील और टैंक सामुदायिक सहयोग के बजाय सरकारी तंत्र द्वारा बनवाए जाने लगे और लोगों से इस काम के लिए टैक्स वसूला जाने लगा। विशेषज्ञ इसे स्थितियों में बदलाव का महत्वपूर्ण बिंदु मानते हैं, क्योंकि इसके बाद रखरखाव के कामों में लापरवाही बरती जाने लगी। अनगिनत टैंक और झीलें धीरे-धीरे बर्बाद हो गईं। शहरी क्षेत्रों में जल निकायों द्वारा अधिग्रहीत की गई जमीनों का दूसरे कामों में इस्तेमाल किया जाने लगा। आजादी के बाद इस प्रवृत्ति में और तेजी आ गई। दिल्ली का ही उदाहरण लें, एक समय यहां 800 झीलें थीं, लेकिन अब दस से भी कम बची हैं। दूसरे शहरों में भी स्थितियां कोई भिन्न नहीं हैं। वर्षा जल के संचयन के इंतजाम ध्वस्त होने का ही दुष्परिणाम यह है कि अब बारिश में हमारे अधिकांश शहर तालाब में बदल जाते हैं और कुछ समय के लिए लोगों का जीवन ठप पड़ जाता है। फिर हमारे शहरों को पानी कहां से मिल रहा है? भारत के बड़े शहरों को पानी उपलब्ध कराने के लिए आस-पास के गांवों से लंबी पाइपलाइन बिछाई गई है, जो वहां के जल को शहरों तक पहुंचाती है। मुंबई जहां हम रहते हैं वहां हर वर्ष भारी बारिश होती है, लेकिन वह सारा पानी बर्बाद हो जाता है और फिर हम अपने दबदबे का फायदा उठाकर आस-पास के क्षेत्रों से बांधों का पानी खींच लेते हैं। इससे बड़ी त्रसदी और क्या होगी कि जो शाहपुर मुंबई को उसकी जरूरत का 52 प्रतिशत पानी उपलब्ध कराता है वहां के लोग अपनी जरूरतों के लिए टैंकरों पर आश्रित हैं।
अगर हम अपने वर्षाजल का सही तरह संचयन नहीं कर पा रहे हैं तो यह भी हकीकत है कि अपने जल संपदा को प्रदूषित करने में भी लगे हैं। देश की अधिकांश नदियां इसीलिए प्रदूषण से कराह रही हैं, क्योंकि हम उन्हें हर तरह की गंदगी बहाने का जरिया मानते हैं। यह निराशाजनक है अनेक नदियां एक प्रकार से मृत हो चुकी हैं। इसका अर्थ है कि उनमें आक्सीजन का स्तर शून्य पर पहुंच गया है। यमुना का 800 किलोमीटर लंबा भाग आधिकारिक रूप से मृत घोषित किया जा चुका है। पवित्र गंगा की कहानी भी कोई अलग नहीं है। कानपुर जैसे शहरों में गंगा का प्रदूषण हद से अधिक बढ़ चुका है और यह तब है जब गंगा को प्रदूषण से मुक्त बनाने के नाम पर अब तक अरबों रुपये फूंके जा चुके हैं।
इस मामले में सबसे अधिक चिंताजनक है कि अनेक उद्योग अपने दूषित जल को साफ-स्वच्छ बनाने में आने वाले खर्च से बचने के लिए गंदा पानी पृथ्वी के बहुत अंदर पहुंचा रहे हैं। इससे वह भूगर्भ जल भी प्रदूषित हो रहा है जिससे सबसे अधिक स्वच्छ माना जाता है। हमें न केवल अपने जल स्नोतों को प्रदूषण से मुक्त बनाने के लिए, बल्कि वर्षा जल की बर्बादी रोकने के लिए भी तत्काल ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। हमें यह समझ लेना चाहिए कि अगर सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो जो पानी आज हमारे पास है वह हमेशा हमारे साथ नहीं रहेगा। हमें खतरे की आहट सुन लेनी चाहिए और जीवन को बचाने के लिए जुट जाना चाहिए।
जय हिंद। सत्यमेव जयते।

Friday, July 20, 2012

फिल्‍म समीक्षा : गट्टू

Review : Gattu
निश्‍छल और मासूम
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
हिंदी में बच्चों पर केंद्रित फिल्में बहुत कम बनती हैं। चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी के सौजन्य से कुछ बनती भी हैं तो रेगुलर थिएटर में रिलीज नहीं हो पातीं। इस लिहाज से राजन खोसा की गट्टू खास फिल्म है। चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी की इस फिल्म को राजश्री ने वितरित किया है।
रुड़की शहर का गट्टू अपने चाचा के साथ रहता है। उसका चाचा उसे लाड़-प्यार देता है, लेकिन अपनी तंगहाली और बदहाली की खीझ में कभी-कभी उसकी पिटाई भी कर देता है। गट्टू को चाचा की मार से फर्क नहीं पड़ता। कबाड़ का काम सीखने में उसका ज्यादा मन नहीं लगता। उसे अपनी उम्र के दूसरे बच्चों की तरह पतंगाबजी का शौक है। वह पतंग उड़ाता है और सपने पालता है कि एक दिन शहर की काली पतंग वह जरूर काटेगा।
काली पतंग उड़ाने वाले की किसी को जानकारी नहीं है। काली पतंग सभी पतंगों को काट कर आसमान में अकेली उड़ती रहती है। गट्टू की समझ में आता है कि शहर की सबसे ऊंची छत से पतंग उड़ाई जाए तो काली पतंग को काटा जा सकता है। बाल दिमाग से वह युक्ति भिड़ाता है और स्कूल में दाखिल हो जाता है। अपने आत्मविश्वास और नेकदिली से अनपढ़ होने के बावजूद वह दोस्तों को अपने साथ कर लेता है।
एक दिन स्कूल की छत पर चढ़कर वह काली पतंग काट ही देता है। इस विजय के बाद उसका भेद खुल जाता है तो वह स्कूल के प्रिंसिपल का सच-सच सारी बात बता देता है। उसकी सच्चाई से प्रिंसिपल प्रभावित होते हैं और उसे स्कूल में दाखिला दे देते हैं।
बालमन की निर्दोष संवेदना पर राजन खोसा ने समान संवेदनात्मक गहराई के साथ फिल्म बनाई है। अमूमन बाल फिल्मों में बड़ों के दृष्टिकोण के हावी होने का खतरा रहता है या फिर फिल्में उपदेशात्मक हो जाती हैं। गट्टू अत्यंत मासूम फिल्म है। गट्टू का बचपन वंचित है, लेकिन उसके उत्साह और जोश में बच्चों की ढीठता है। यही बात इस फिल्म को सुंदर बनाती है। राजन खोसा ने छोटे शहर का माहौल रचने के लिए इसे रुड़की में शूट किया है। किसी भी पूर्वधारणा से बचाने के लिए फिल्म में परिचित कलाकारों को नहीं लिया गया है। सारे कलाकार नए हैं और वे अपने किरदारों में जंचते हैं।
खास कर मोहम्मद समद की तरलता उल्लेखनीय है। वह आसानी से हर सिचुएशन में ढल जाता है। स्कूल के बच्चों ने मोहम्मद समद का पूरा साथ दिया है। लगता है राजन खोसा ने बच्चों के साथ एक्टिंग वर्कशॉप कर उन्हें साधा है। चाचा के किरदार में नरेश कुमार और प्रिंसिपल के रूप में जतिन दास का अभिनय उल्लेखनीय है।
फिल्म की पटकथा और संवाद के लिए लेखकीय टीम राजन खोसा, के डी सत्यम और दिलीप शुक्ला को खास बधाई। उन्होंने दृश्यों और संवादों में बचपना रहने दिया है। कैमरामैन से फिल्म का माहौल रचने में सहायता मिली है। छोटे शहर की गालियां, छतें और विहंगम दृश्य मोहक और विश्वसनीय हैं।
*** 1/2 साढ़े तीन स्टार
चवन्‍नी के पाठकों ने दिए-3.8 स्‍टार 

हौले-हौले आ गया हॉलीवुड

हौले-हौले आ गया हॉलीवुड-अजय ब्रह्मात्‍मज 
बीस जुलाई को बैटमैन की अगली कड़ी भारतीय सिनेमाघरों में रिलीज होगी। अंग्रेजी के साथ हिंदी, तमिल, तेलुगु में रिलीज हो रही इस फिल्म को भी वफादार दर्शकों के साथ कुछ और दर्शक भी मिलेंगे। हॉलीवुड की फिल्में भारतीय फिल्म बाजार में हौले-हौले अपनी जगह बना रही हैं। साधारण से साधारण हॉलीवुड फिल्में भी उल्लेखनीय कलेक्शन कर रही हैं। अगर चर्चित और प्रतीक्षित फिल्म हो तो उसका कलेक्शन हिंदी फिल्मों के समकक्ष या उससे ज्यादा भी होता है। हॉलीवुड की द अमेजिंग स्पाइडरमैन का कलेक्शन पहले ही हफ्ते में 41 करोड़ का आंकड़ा पार कर गया था।
हिंदी के साथ अन्य भारतीय भाषाओं में डब करने का चलन बढ़ने से हॉलीवुड का बाजार बढ़ा है। भारतीय दर्शकों को अपनी भाषा में वहां की फिल्में देखने को मिल रही हैं। हॉलीवुड के निर्माता मामूली खर्च कर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में डबिंग कर लेते हैं। इन फिल्मों का जमकर प्रचार किया जाता है। टीवी प्रोमो से लेकर प्रिंट माध्यम में फिल्म के विज्ञापन चलते-छपते हैं। मिशन इंपॉसिबल-4 के लिए तो खुद टॉम क्रूज भारत आए। यहां अनिल कपूर ने उनकी अगवानी की और पूरी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने उनसे मिलने का उत्साह दिखाया। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के स्टार और निर्माता हॉलीवुड जैसी लोकप्रियता और कमाई की आस में नकल करने से भी नहीं हिचकते।
हॉलीवुड के निर्माता औपनिवेशिक मानसिकता से भले ही निकल गए हों, लेकिन भारतीय मानसिकता में हीन ग्रंथि अभी तक बनी हुई है। तभी तो हॉलीवुड की घटिया और साधारण फिल्में भी हमें श्रेष्ठ लगती हैं। अंग्रेजीदां समीक्षक इस हीन ग्रंथि को बढ़ाने का काम करते हैं। वे हिंदी फिल्मों की समीक्षा करते समय भी अंग्रेजी फिल्मों के साक्ष्य और उदाहरण देने से नहीं हिचकते।
दरअसल, पूरी दुनिया में अकेली भारतीय फिल्म इंडस्ट्री ने ही हॉलीवुड के आगे घुटने नहीं टेके। हम तकनीक और प्रस्तुति में भले ही उनसे पीछे हों, लेकिन अपने दर्शकों का मनोरंजन करने में उनसे बहुत आगे हैं। दर्शकों को भारतीय रुचि का मनोरंजन देने में भारतीय फिल्म इंडस्ट्री का जवाब नहीं। ग्लोबल हो रही दुनिया के इस दौर में स्वाद और मनोरंजन गड्ड-मड्ड हो रहे हैं। फिर भी बचपन से जीभ पर चढ़ा स्वाद और मन पर चढ़ा मनोरंजन जोर मारता है। चंद प्रयोगों के बाद हमें फिर से अपने भोजन और सिनेमा की याद आती है।
स्टीवन स्पिलबर्ग की द जुरासिक पार्क की लोकप्रियता के बाद से हॉलीवुड ने रणनीति के साथ भारतीय बाजार में प्रवेश करना आरंभ किया। देश के दर्शकों का एक हिस्सा हमेशा से हॉलीवुड की फिल्मों का दीवाना रहा। निज भाषा में आने पर यह दीवानगी हिंदी भाषी दर्शकों पर भी असर करती दिखाई पड़ी। अभी तो आलम यह है कि हॉलीवुड की फिल्में औसत कलेक्शन कर ही लेती हैं। हालांकि अभी तक हॉलीवुड की किसी फिल्म ने 100 करोड़ का आंकड़ा पार नहीं किया है, लेकिन ज्यादा देर नहीं लगेगी। अवतार ने 90 करोड़ का कलेक्शन कर इसका संकेत दे दिया है। 2012 ने 65 करोड़ और द एवेंजर ने 47 करोड़ का कलेक्शन किया था। भारतीय दर्शकों की ऑल टाइम फेवरिट टाइटेनिक भी हॉलीवुड की टॉप-5 फिल्मों में शामिल है।
हॉलीवुड की फिल्मों से लड़ने और बचाने का कोई तरीका नहीं है। आने वाले समय में हॉलीवुड फिल्मों की भारतीय बाजार में मौजूदगी बढ़ेगी। अभी दो-चार फिल्में अमेरिका और दूसरे देशों से पहले भारतीय सिनेमाघरों में रिलीज हुई हैं। वह दिन दूर नहीं, जब दशहरा, दीवाली और ईद की छु˜ियां देखकर हॉलीवुड की फिल्में भारत में पहले रिलीज हो जाएं। भारतीय बाजार में हॉलीवुड का कारोबार दोगुना हो गया है। पहले वहां की फिल्मों के कुल कलेक्शन का 3.4 प्रतिशत व्यापार भारत में होता था। अभी यह आंकड़ा 6.8 प्रतिशत हो चुका है। पहले साल मैं 5-6 फिल्में ही डब होकर भारत में रिलीज होती थीं। अगर यह संख्या बढ़कर 50 पार कर चुकी है।

Thursday, July 19, 2012

राजेश खन्‍ना : जिंदगी पर हावी रहा स्टारडम

-अजय ब्रह्मात्‍मज 

राजेश खन्ना के आने की आहट तो फिल्मफेअर टैलेंट हंट में चुने जाने के साथ ही मिल गई थी, जिसे देश के कुछ दर्शकों ने पहली बार ‘आखिरी खत’ में पहचाना। 1969 में आई ‘आराधना’ से पूरा देश उनका दीवाना हो गया। उसके बाद एक-एक कर उनकी फिल्में गोल्डन जुबली और सुपरहिट होती रहीं। एकाएक हमें देव आनंद, राजेंद्र कुमार और शम्मी कपूर का रोमांस पुराना लगने लगा। तिरछी चाल से पर्दे पर आकर दाएं-बाएं गर्दन झटकते हुए दोनों पलकों को झुकाकर आमंत्रित करती उन आंखों ने दर्शकों पर सीधा जादू किया। देश भर के नौजवान राजेश खन्ना बनने और दिखने को बेताब नजर आए और लड़कियों का तो हसीन ख्वाब बन गए राजेश खन्ना। कहते हैं उनकी सफेद गाड़ी शाम में आशीर्वाद लौटती तो दूर से गुलाबी नजर आती थी। गाड़ी के शीशे, बोनट और डिक्की पर लड़कियों के होंठों की लिपस्टिक उतर आती थी।
उनके पहले हिंदी फिल्मों के रूपहले पर्दे पर देव आनंद, राजेंद्र कुमार और शम्मी कपूर की रोमांटिक छवि की धूम थी। तीनों अलग-अलग अंदाज के अभिनेता थे। उन तीनों को पीछे करते हुए राजेश खन्ना अपनी शरारती मुस्कराहट के साथ अवतरित हुए। तब तक हिंदी फिल्मों का हीरो अमर्यादित नहीं हुआ था। वह इशारों और आंखों से ही बातें करता था। झूमते और नाचते समय भी उसकी मर्दानगी साथ रहती थी। साधारण कद-काठी और रूप में दर्शकों को ‘ब्वॉय नेक्स्ट डोर’ मिला था। ऐसा नवयुवक जो महिला दर्शकों के मन में खुद के लिए पति, प्रेमी और पुत्र की चाहत पैदा करे। हिंदी फिल्मों के इतिहास में लड़कियों की यह दीवानगी केवल देव आनंद को हासिल हुई थी। राजेश खन्ना ने उन्मुक्त नायक के रूप में दो कदम आगे बढ़कर उनका दिल लुभाया और अपना दीवाना बना दिया। जब भी वह गर्दन झटक कर पलकें मटकाते थे तो सिनेमाघर में बैठे दर्शकों की सांसें थम जाती थीं। लड़कियां आहें भरती थीं तो लड़के रश्क करते थे। पहली बार राजेश खन्ना कट हेयर स्टाइल और कुर्ते का चलन हुआ।
राजेश खन्ना ने लोकप्रियता की जबरदस्त ऊंचाई हासिल की थी। इस ऊंचाई को छूने के अपने फायदे थे और कुछ निहित नुकसान। नुकसान यह हुआ कि राजेश खन्ना खुद को खुदा समझ बैठे। उनके समकालीन बताते हैं कि वह चापलूस और स्वार्थी निर्माताओं से ऐसा घिर गए थे कि उन्हें अपने अलावा न कुछ सूझता था और न दिखाई पड़ता था। वह श्रेष्ठ गं्रथि के शिकार हो गए थे। तब के एक पत्रकार अली पीटर जॉन ने अपने संस्मरण में एक जगह लिखा है कि अमिताभ बच्चन के आगमन पर राजेश खन्ना की टिप्पणी थी कि ऐसे अटन-बटन आते-जाते रहते हैं। सच या झूठ, लेकिन इस टिप्पणी पर यकीन किया जा सकता है। यह व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं हैं। दरअसल हिंदी फिल्मों का कोई भी स्थापित स्टार किसी नवोदित की धमक को एकबारगी नहीं सुन पाता। राजेश खन्ना के समय का यह सच आज की तीनों खानों के समय भी सुना जा सकता है।
उत्कर्ष के दिनों में राजेश खन्ना पर बीबीसी के संवाददाता जैक पिजे ने ‘बांबे सुपरस्टार’ नामक शॉर्ट फिल्म बनाई थी। पिछले साल इस फिल्म का ऑडियो इंटरनेट पर लीक हुआ था। उसमें राजेश खन्ना का परिचय देते हुए जैक पिजे ने कहा था कि उनमें एक साथ रूडोल्फ वैलेंटिनों का करिश्मा और नेपोलियन की अकड़ है। यहां तक कि उसी इंटरव्यू में उन्हें ‘सुपरस्टार’ का खिताब देने वाली देवयानी चौबल ने स्वीकार किया था कि राजेश खन्ना निहायत तनहा और असुरक्षित व्यक्ति हैं। तनहाई और असुरक्षा ने ही उन्हें आक्रामक बनाया। सुपरस्टार राजेश खन्ना की लोकप्रियता अभूतपूर्व रही, लेकिन उसे लंबी उम्र नहीं मिल सकी। कुछ राजेश खन्ना की भूलें और कुछ बदलते माहौल की जरूरतों ने दर्शकों की पसंद बदल दी।
रोमांस के राजा के नाम से मशहूर राजेश खन्ना की रोमांटिक फिल्मों ने नया अध्याय लिखा। निश्छल प्रेम और मासूम रोमांस के लिए हिंदी फिल्मों को राजेश खन्ना जैसे व्यक्तित्व की जरूरत थी। वक्त अपनी जरूरत के हिसाब से नायक ईजाद कर लेता है। राजेश खन्ना ने स्टारडम के चंद सालों में कामयाबी का कीर्तिमान स्थापित किया। दो साल में 14 हिट गोल्डन जुबली फिल्में देने का रेकॉर्ड उन्हीं के नाम है। दुर्भाग्य यह रहा कि राजेश खन्ना अपने स्टारडम की छवि से कभी बाहर नहीं निकल सके। उनकी व्यक्तिगत जिंदगी पर यह स्टारडम हावी रही और इसी ने उनकी जिंदगी को तनहा और एकाकी बना दिया। वह आत्ममुग्ध और आत्मकेंद्रित होते चले गए। स्टारडम का नशा बरकारार रखने के लिए दूसरे नशों की लत पड़ी। अपने भी पराए लगे।
उन्हें कुछ समय के बाद दर्शकों की बदली पसंद का एहसास तो हुआ, लेकिन तब तक फिल्म इंडस्ट्री का रवैया उनके प्रति बदल चुका था। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि सलीम-जावेद से हुई अनबन की वजह से यश चोपड़ा ने ‘दीवार’ में उन्हें चुनने का फैसला लेने के बाद इरादा बदल दिया था। एक अंतराल के बाद नौवें दशक के आरंभिक सालों में बदली और मैच्योर भूमिकाओं में उनकी कुछ फिल्में दर्शकों ने पसंद कीं, लेकिन वह सिलसिला लंबा नहीं चला। ऋषि कपूर के निर्देशन में बनी ‘आ अब लौट चलें’ में उनकी वापसी असफल रही। उनकी आखिरी फिल्म ‘वफा’ बिल्कुल साधारण फिल्म थी।
आखिरी दिनों में वह जीर्ण-शीर्ण दिखने लगे थे। गंभीर बीमारी ने उन्हें तोड़ दिया था। आईफा में अमिताभ बच्चन के हाथों लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड लेते समय उन्होंने अपना दर्द और द्वंद्व पूरी दुनिया के सामने जाहिर किया था। आखिरी दिनों में तनहाई और बढ़ी, लेकिन ऐसे वक्त में उनकी पत्नी डिंपल कपाड़िया उनके साथ आईं। पारिवारिक मूल्यों और प्रेम का महत्व दिखा।

Wednesday, July 18, 2012

राजेश खन्‍ना

बारह साल पहले लिखा गया था यह लेख...
-अजय ब्रह्मात्‍मज
 हिंदी फिल्मों के पहले सुपर स्टार राजेश खन्ना ने लोकप्रियता की वह ऊंचाई हासिल की, जो कभी देव आनंद ने हासिल की थी। बाल काढ़ने की शैली से लेकर पहनावा और बात-व्यवहार तक में युवक इस सुपर स्टार की नकल करते थे। लड़कियां उनकी एक मुस्कान और आंखों की झपकी के लिए घंटों उनके बंगले के आगे खड़ी रहती थीं। राजेश खन्ना ने अपनी इस लोकप्रियता को जी भर कर जिया और जब यह लोकप्रियता हाथों से फिसलने लगी तो समाचार में रहने के लिए पुरानी प्रेमिका अंजू महेन्द्रू को छोड़कर डिंपल कपाडि़या से शादी कर ली। समाचारों में तो वे बने रहे, पर बॉक्स ऑफिस पर उनका जादू फिर से नहीं चल सका। नए सुपर स्टार के 'एक्शन' और 'एंगर' ने राजेश खन्ना को पीछे छोड़ दिया। फिल्में सफल न हों तो नायक का अवसान हो जाता है।
राजेश खन्ना का वास्तविक नाम जतिन खन्ना था। फिल्मों में आने का फैसला उन्होंने बहुत पहले कर लिया था, मगर कोई मौका नहीं मिल रहा था। जतिन खन्ना ने तब रंगमंच पर खुद को मांजना शुरू किया। उन्होंने कई नाटक मंचित किए। वार्डन रोड के भूलाभाई देसाई मेमोरियल इंस्टीयूट में वे नाटकों के रिहर्सल करते थे। उन्हीं दिनों गीताबाली ने वहां अपना दफ्तर खोला था। वह पंजाबी फिल्म 'रानो' की योजना बना रही थीं। गीता बाली ने राजेश खन्ना को अपनी फिल्म में एक भूमिका दी और यह भविष्यवाणी भी कर दी कि तुम एक दिन बड़े स्टार बनोगे। राजेश खन्ना को यकीन नहीं हुआ। वे ज्योतिषी से मिले। ज्योतिषी ने बताया कि अभिनेता के तौर पर उनका कोई भविष्य नहीं है। हां, अगर वे लोखंड (लोहा) का कारोबार करें तो सफल हो सकते हैं। ज्योतिषी की भविष्यवाणी गलत साबित हुई और अभिनेता राजेश खन्ना का लोहा सभी ने माना।
सन् 1969, 1970 और 1971 की सफल फिल्मों की याद करें। निश्चित ही इनमें 'आराधना', 'इत्तफाक', 'दो रास्ते', 'सच्चा झूठा', 'सफर', 'आनंद', 'कटी पतंग', 'अंदाज' और 'हाथी मेरे साथी' का नाम होगा। ये सभी फिल्में राजेश खन्ना की थीं। राजेश खन्ना ने लगातार ग्यारह सफल फिल्में दी थीं। इन फिल्मों की सफलता ने राजेश खन्ना को सभी उम्र के दर्शकों का चहेता स्टार बना दिया। उनकी एक झलक पाने के लिए स्टूडियो के बाहर भीड़ लगी रहती थी। पलकें झपकाकर मुस्कान और सिर हिलाना राजेश खन्ना का खास अंदाज था। पैंट के ऊपर कुर्ता पहनने का फैशन भी राजेश खन्ना से ही चला। वे यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स टैलेंट कंटेस्ट से फिल्मों में आए। 1967 मे बनी 'आखिरी खत' उनकी पहली फिल्म थी। लगातार तीन फिल्में असफल रहीं, मगर निर्माता उन्हें बुलाते रहे। 'आराधना' से मिली पहली सफलता से पहले ही उनके पास चौदह फिल्में थीं। 'आराधना' की सफलता ने निर्माताओं के विश्वास को बल दिया और हिंदी फिल्मों को एक चमकदार सितारा मिल गया।
राजेश खन्ना ने रोमांटिक हीरो को नई छवि दी थी। वे आजादी के बाद की पीढ़ी की युवा भावनाओं को पर्दे पर अभिव्यक्त करने में माहिर थे। सन् 1942 में पैदा हुए राजेश खन्ना आजादी के बाद के परिवेश में जवान हुए थे, इसलिए भावना और अभिव्‍यक्ति के स्तर पर पुरानी पीढ़ी से अलग थे। वे आधुनिक थे। उन्हें फिल्में भी उसी रंग-ढंग की मिलीं। रोमांटिक छवि बना लेने के बाद जब वे दुखांत किस्म की फिल्मों में आए तो भी दर्शकों के दिल को छुआ। 'आनंद' फिल्म के हंसमुख कैंसर मरीज को दर्शक आज भी नहीं भुले हैं। राजेश खन्ना ने 'आराधना', 'सफर', 'अमर प्रेम' और 'प्रेमनगर' में दुखी और त्रासदीपूर्ण किरदारों का मर्मस्पर्शी चित्रण किया।
1972 में उनका कैरिअर अवश्य डगमगाया था, मगर डिंपल कपाडि़या से शादी के बाद उसमें फिर से उफान आया। 'दाग' और 'प्रेमनगर' जैसी फिल्में आईं। अभी लगता है कि वह बुझती लौ का भभकना था, क्योंकि तब तक अमिताभ बच्चन का आगमन हो चुका था और फिल्मों की शैली और प्रवृत्ति बदल गई थी। राजेश खन्ना इसे समझ नहीं पा रहे थे और स्वीकार भी नहीं कर पा रहे थे। लोकप्रियता के शीर्ष पर बैठे कलाकार के लिए धूमिल होने के क्षण बेहद निराशा और उदासी से भरे होते हैं। राजेश खन्ना फिर से चमकने की कोशिश करते रहे। 'थोड़ी सी बेवफाई' जौसी फिल्मों से वे खुद को स्वीकृत नहीं करा सके। उनकी आखिरी सफल फिल्मों में 'सौतन' और 'अवतार' का उल्लेख किया जा सकता है। इन फिल्मों में उनके किरदार से स्पष्ट हो चुका था कि वे अब सफल फिल्मों के केंद्र में नहीं हैं।
राजेश खन्ना का वैवाहिक जीवन सुखी नहीं रहा। जल्दबाजी में की गई शादी कुछ सालों में ही रेशा-रेशा बिखर गई। नि‍श्चित ही राजेश खन्ना ने कैरिअर के अवसान और वैवाहिक संबंध के समापन के क्षणों में खुद को मुल से संभाला होगा। वे फिल्मों से दूर हो गए। बीच में वे राजनीति में सक्रिय हुए और कांग्रेस के सासंद भी चुने गए। सफल अभिनेता सफल राजनीतिज्ञ साबित नहीं हुआ। लंबे समय के बाद ऋषि कपूर निर्देशित 'आ अब लौट चलें' में वे फिर से दिखाई पड़े थे, पर लगता है कि अभिनय के प्रति वे अधिक उत्सुक नहीं हैं। उन्होंने फिल्म निर्माण और निर्देशन में भी सक्रिय होने के बारे में नहीं सोचा। इधर खबर फैली थी कि वे टीवी धारावाहिको का निर्माण करेंगे। राजेश खन्ना और डिंपल कपाडि़या की बेटियां टि्वंकल और रिंकी फिल्मों में आ चुकी हैं।
 राजेश खन्ना ने कुछ समय की कोशिश के बाद फिल्मों में खुद को फिर से स्थापित करने की मंशा त्याग दी। एक तरह से यह निर्णय ठीक ही रहा, क्योंकि दर्शकों की पसंद से दरकिनार कर दिए जाने के बाद कोई भी कलाकार फिर से नहीं चमक सकता। राजेश खन्ना ने 'सुपर स्टार' होने का इतिहास रचा। कह सकते हैं कि उनका फिल्मी कैरिअर अपेक्षाकृत छोटा है, पर इस कम अवधि में ही उन्होंने लोकप्रियता और सफलता की जबरदस्त ऊंचाई हासिल की। यह सौभाग्य विरले ही मिलता है। # जागरण - सहत्राब्दी            

Tuesday, July 17, 2012

दमदार कश्यप बंधु -रघुवेन्‍द्र सिंह

यह आर्टिकल चवन्‍नी के पाठकों के लिए रघुवेन्‍द्र सिंह के ब्‍लॉग अक्‍स-रघुवेन्‍द्र से यहां कट-पेस्‍ट किया गया है....
बड़े भाई ने हिंदी फिल्मों के पारंपरिक ढांचे को ढाह दिया और एक नई सिनेमाई परंपरा की शुरुआत की, और छोटे भाई ने हिंदी सिनेमा की प्रचलित परंपरा की परिधि में रहकर कीर्ति अर्जित की. हिंदी सिनेमा की पाठशाला में दोनों साथ बैठा करते थे, फिर एक क्रांतिकारी और दूसरा अनुयायी कैसे बन गया? चर्चित फिल्मकार बंधुओं अनुराग कश्यप और अभिनव कश्यप के साथ पहली बार उनके रोमांचक अतीत की यात्रा कर रहे हैं रघुवेन्द्र सिंह.


 
अनुराग कश्यप ने अपना वादा निभाया. उन्होंने अपने छोटे भाई अभिनव कश्यप से स्वयं बात की और फिल्मफेयर के लिए इस संयुक्त बातचीत का प्रबंध अपने घर पर किया. कश्यप बंधुओं का एक साथ बातचीत के लिए तैयार होना हमारे लिए प्रसन्नता और उत्साह का विषय था. हमारी इस भावना से जब अनुराग और अभिनव वाकिफ हुए तो दोनों खिलखिलाकर हंस पड़े. अनुराग ने अपनी हंसी पर नियंत्रण किया और बड़े सहज भाव से कहा, ‘‘लोगों को पता नहीं क्यों ऐसा लगता है कि हम आपस में बात नहीं करते. लोगों के बीच हमारी ऐसी छवि कैसे बन गई है? (अभिनव की ओर देखकर)’’ दोनों भाई फिर एक साथ ठहाका मारकर हंस पड़े. फिर अनुराग ने अपने सवाल का जवाब खुद दिया, ‘‘हम दोनों अलग-अलग किस्म की फिल्में बनाते हैं, शायद इसलिए लोगों का ऐसा लगता है.’’

बाजार में स्थापित अपनी छवि के अनुकूल अनुराग और अभिनव ने सानंद फिल्मफेयर के लिए फोटोशूट किया. कभी अनुराग ने अभिनव की जेब से पर्स निकालते हुए, तो कभी दोनों ने आपस में फाइट करते हुए हमारे जोशीले फोटोग्राफर प्रथमेश बांदेकर के लिए खुशी-खुशी पोज किया.इस मजेदार फोटोशूट के पश्चात हमने बातचीत के लिए अनुराग कश्यप के उस विशेष कमरे का रुख किया, जिसकी दीवारें तमाम देशों की फिल्मों की डीवीडी से सजी थीं. कमरे के बीचोबीच रखे सोफे पर बैठते हुए अनुराग ने कहा, ‘‘मैं और कल्की इसी कमरे में बैठकर फिल्में देखते हैं.’’ दोनों भाईयों के संपूर्ण अतीत के बारे में जानने के लिए मेरा मन बेचैन हो रहा था. उनके समक्ष जब यह बात जाहिर हुई तो दोनों ने एक-दूसरे के बचपन का कत्था-चिट्ठा खोलना शुरू कर दिया.

अनुराग से उम्र में अभिनव दो साल छोटे हैं. अपने बड़े भाई के बचपन के यादों की पोटली को अभिनव ने यूं खोला ‘‘अखबार में फिल्म के इस्तेहार आते थे. ये उसे काटते थे और पोस्टर बनाते थे. फिर मनगढंत कहानियां बनाकर हमें सुनाते थे.’’ अनुराग हंसते हुए कहते हैं, ‘‘और इन्हें लगता था कि वो कहानियां सच हैं.’’ बात जारी रखते हुए अनुराग अपने छोटे भाई के बचपन के दिनों को याद करते हैं, ‘‘इनको पैसे का प्रेम बचपन से है. हम नाना-नानी के घर जाते थे. हमें लौटते वक्त सब लोग पैसे देते थे. अभिनव अनेक बहाने बनाकर उनसे डबल पैसा ले लेते थे. फिर मुगलसराय से दो-दो रुपए में चेन वाली रिंग खरीदकर ले आते थे और स्कूल में दस-दस रुपए में उसे बेचते थे.’’ अनुराग अपनी बात खत्म करते कि उससे पहले ही अभिनव ने कहा, ‘‘मुझे गरीब लाइफ शुरु से पसंद नहीं. पॉकेट मनी के लिए सब करना पड़ता था. लेकिन ये हमसे पैसा छीन लेते थे और उन पैसों से कॉमिक्स खरीदकर ले आते थे.’’

नन्हीं उम्र से अनुराग गंभीर स्वभाव के हैं. उनकी तुलना में अभिनव बचपन में अधिक शरारती थे. एक मजेदार वाकया अनुराग बताते हैं, ‘‘अभिनव मुझे बहुत चिढ़ाते थे. मुझे गुस्सा जल्दी आता था. मैं आज भी गुस्सैल हूं. उसका कारण यही हैं. एक दिन मैंने चाकू लेकर इन्हें दौड़ा लिया कि आज या तो तू रहेगा या मैं. इन्हें पूरे घर में मैंने दौड़ाया कि आज तो मैं खून कर दूंगा. (अनुराग ठहाका लगाते हैं). उस वक्त ये तीन साल के थे और मैं पांच साल का था.’’ ïअभिनव जज्बाती लहजे में कहते हैं कि ये मुझसे प्यार भी बहुत करते थे. उसका सबूत इनकी साढ़े नौ उंगलियां हैं. बचपन में ये मुझे झूला झुला रहे थे. इनकी एक उंगली कट गई.

अनुराग और अभिनव की जिंदगी पैरलल चली है. पिताजी की नौकरी ट्रांसफरेबल होने के कारण दोनों का बचपन उत्तर प्रदेश के कई शहरों में गुजरा. अनुराग का जन्म गोरखपुर में हुआ, जबकि अभिनव ने ओबरा की आबोहवा में अपनी आंख खोली. दोनों फैजाबाद के कांवेंट स्कूल में साथ पढऩे जाते थे. उसके बाद अनुराग को देहरादून के ग्रीन स्कूल में भेज दिया गया और अभिनव का एडमिशन टांडा के ललिता शास्त्री मांटेसरी स्कूल में करा दिया गया. दोनों भाई थोड़े समय की जुदाई के बाद फिर एकजुट हुए गवालियर के सिंधिया स्कूल में. यहां दोनों हॉस्टल में रहते थे. अनुराग बताते हैं, ‘‘अभिनव के गणित में सौ में सौ नंबर आते थे. ये कॉमर्स पढ़ते थे. सबको विश्वास था कि बड़ा होकर ये पैसे कमाएगा, और मैं नहीं. मैं हिंदी और भूगोल में अच्छा नंबर लाता था.’’ अनुराग ने कॉलेज की पढ़ाई के लिए दिल्ली के हंसराज कॉलेज में प्रवेश लिया तो कुछ साल बाद अभिनव भी उनके पीछे-पीछे वहां पहुंच गए. अभिनव कहते हैं, ‘‘मैंने जानबूझकर हंसराज में एडमिशन लिया, क्योंकि इनके रहने से मैं वहां सुरक्षित महसूस करता था.’’

अनुराग के फिल्म पोस्टरों और मनगढंत कहानियों ने अभिनव को भी धीरे-धीरे फिल्मों से जोड़ दिया. घर में टीवी नहीं था इसलिए दोनों भाई अपने पड़ोसी के घर में जाकर टीवी पर चित्रहार देखते थे. दोनों मम्मी और पापा के शुक्रगुजार हैं कि वे उन्हें घर में किराए पर वीसीआर लाने की इजाजत दे देते थे. अभिनव बताते हैं, ‘‘महीने में एक बार मम्मी-पापा की परमिशन से हम टीवी और वीसीआर किराए पर लाते थे. हम चार फिल्में लाते थे और रात भर जागकर उन्हें देखते थे.’’ थिएटर में दोनों भाईयों ने बहुत कम फिल्में देखी हैं. अनुराग बताते हैं, ‘‘हमें थिएटर में पिक्चर दिखाने तभी ले जाया जाता था, जब अमिताभ बच्चन या धर्मेन्द्र की फिल्में लगती थीं. जैसे आज की ऑडियंस सिर्फ सलमान खान को देखती है, वैसे ही हम उस वक्त केवल अमिताभ और धर्मेंद्र को देखते थे.’’

अनुराग-अभिनव के बीच उम्र का अंतर कम था इसीलिए उनके बीच भाई से अधिक दोस्त का रिश्ता कायम रहा. दोनों एक-दूसरे के राजदां रहे. कॉलेज के दिनों में एक-दूसरे के अफेयर्स की चर्चा पर अनुराग ने ठहाका लगाया, और कहा कि हमारी ज्यादा लव स्टोरी नहीं थी क्योंकि हम दोनों थके हुए थे. अभिनव बाद में इस मामले में एक्सपर्ट हो गए. अभिनव ने दबे लफ्जों में कहा, ‘‘कहां से एक्सपर्ट होंगे. तेइस साल की उम्र में मेरी शादी हो गई और इनकी पच्चीस की उम्र में. लड़कियों के मामले में हम दोनों गए गुजरे थे.’’ अनुराग और अभिनव की शादी का दिलचस्प किस्सा है. अभिनव अपनी गर्लफ्रेंड चतुरा राव से शादी करके जल्द से जल्द सेटल होना चाहते थे, लेकिन उनके मम्मी-पापा ने कहा कि जब तक बड़े बेटे की शादी नहीं होगी, तुम्हारी शादी नहीं हो सकती. अभिनव ने अनुराग पर दबाव बनाया और अनुराग को हड़बड़ी में अपनी गर्लफ्रेंड आरती बजाज से शादी करनी पड़ी. दोनों भाईयों का रिसेप्शन एक साथ आयोजित हुआ था.

अनुराग-अभिनव को सिनेमा से प्रेम बचपन से था, लेकिन इसे अपनी जिंदगी बनाने का फैसला दोनों ने बहुत बाद में लिया. अनुराग बताते हैं, ‘‘दिल्ली में एक फिल्म फेस्टिवल अटेंड करने के बाद मैंने फिल्ममेंकिंग में जाने का फैसला किया. उसके पहले मैं एक्टर बनना चाहता था. मैं थिएटर करता था.’’ 1992 में अनुराग अपनी मंजिल की खोज में मुंबई आ गए. दो वर्ष पश्चात अभिनव भी अपने भाई के पास आ गए. अभिनव मुंबई एमबीए की पढ़ाई करने के लिए आए थे, लेकिन हमेशा की तरह बड़े भाई के नक्शेकदम पर चलने से वे खुद को रोक नहीं पाए. अभिनव बताते हैं, ‘‘मैंने भी थिएटर ज्वाइन कर लिया. एक प्ले था मिडनाइट समर. उसका हिंदी अडॉप्टेशन था. उसमें मुझे पहले ही दिन कुत्ता बना दिया. मेरा काम था कुत्ते की तरह हांफना. मैं तीसरे दिन थक गया और फिर वहां गया ही नहीं.’’ अनुराग कहते हैं कि नहीं-नहीं, इनका एक्सीडेंट हो गया था. ये दो लोगों के साथ बाइक पर जा रहे थे. इतने थके थे कि बाइक पर सोने लगे और एक्सीडेंट हो गया. अभिनव गर्व के साथ कहते हैं कि मेरे गुरु हमेशा भैया रहे हैं.


अभिनव कभी अपने भाई पर बोझ नहीं बने, बल्कि उन्होंने हमेशा उनके लिए मुश्किलें आसान कीं. अभिनव के मुंबई आने से पूर्व अनुराग का संघर्ष बहुत मुश्किल था. अनुराग के मुताबिक, ‘‘1993-94 तक बहुत कडक़ी थी. अभिनव के आने के बाद कडक़ी चली गई. ये सीरियल वगैरह से पैसे कमाते थे और मैं अपना स्ट्रगल करता रहा.’’ अभिनव हंसते हुए कहते हैं, ‘‘मेरा काम था घर चलाना. मैं दस साल तक टीवी से जुड़ा रहा. उस दौरान मेरी एजुकेशन हो रही थी. सत्या के बाद अनुराग विदेश में फिल्म फेस्टिवल में जाने लगे. दुनिया बहुत घूमी इन्होंने. उस दौरान इनका इंटरऐक्शन जिन लोगों के साथ हुआ, उस हिसाब से इनका ओरिएंटेशन हुआ. मेरी जिंदगी इंडिया में रही. मेरा पहला वल्र्ड ट्रिप दबंग फिल्म के दौरान हुआ. एक गीत की शूटिंग के लिए हम दुबई गए थे.’’ अनुराग जोड़ते हैं कि मुंबई में मेरी मुलाकात श्रीराम राघवन से हो गई. मेरी एक अलग जर्नी शुरू हो गई.

अभिनव दस वर्ष तक अनवरत टेलीविजन के लिए काम करते रहे. अनुराग और अभिनव ने शुरूआती दिनों में टीवी के लिए एक साथ लेखन भी किया है. अभिनव बताते हैं, ‘‘हमने तीन साल साथ डायलॉग लिखा. त्रिकाल और कभी कभी सीरियल हमने साथ लिखा था.’’ अनुराग ने बताया कि डर सीरियल इनकी रचना थी. मैंने सिर्फ अपना नाम जोड़ दिया था. इस खुलासे के बाद अभिनव ने बताया कि वो प्रोड्यूसर डर अनुराग के साथ बनाना चाहते थे और ये बिजी थे. उन्होंने हड़बड़ी में मुझे साइन कर लिया. मैंने लिखा था, लेकिन जब डायरेक्ट करने की बात आई तो उन्होंने कहा कि अगर तुम अपने भाई का नाम इसमें जोड़ दो तो मैं तुम्हे ब्रेक दे दूंगा. मैंने इनको पटाया और राइटिंग में इनका नाम जोड़ दिया.

अभिनव ने 2002 में फिल्म बनाने का पहला प्रयास किया. कुछ दिक्कतें सामने आईं तो वे मणिरत्नम से निर्देशन का गुर सीखने मद्रास चले गए. अभिनव बताते हैं,‘‘मैंने सीरियस सिनेमा बनाने की बहुत कोशिश की, लेकिन मैं जहां भी जाता था, लोग मेरी तुलना अनुराग से करते थे. फिर कहते थे कि एक भाई तो है ही, हमें फिल्म बनानी होगी तो उन्हें लेंगे, आपको क्यों लेंगे?’’ अभिनव की यह बात ध्यान से सुनने के बाद अनुराग ने कहा, ‘‘वक्त कितनी तेजी से बदलता है. अब मैं पब्लिक के बीच जाता हूं तो लोग कहते हैं कि इनके भाई ने दबंग बनाई है. मैं खुश हूं कि अब हमारी अलग-अलग पहचान है. लोग इन्हें अभिनव कश्यप और मुझे अनुराग कश्यप के नाम से जानते हैं.’’ अभिनव ने सफाई देने के अंदाज में कहा कि लोग मुझे अनुराग का भाई कहते थे तो मुझे शर्म नहीं आती थी, लेकिन मैं इनकी परछाई बनकर नहीं रहना चाहता था. मैं संजय कपूर था, ये अनिल कपूर थे. मेरा अपना कोई वजूद नहीं था. मैं अपनी पहचान बनाना चाहता था. और मैंने पहली फिल्म जानबूझकर इनसे अलग नहीं बनाई. सलमान खान के हां कहने के बाद उसे उनके तरीके से ढाला गया.

अनुराग-अभिनव एक-दूसरे की फिल्मों के सबसे बड़े आलोचक और प्रशंसक हैं. अनुराग को अभिनव की पहली फिल्म दबंग बहुत पसंद आई. अनुराग कहते हैं, ‘‘राजकुमार हिरानी और इम्तियाज अली के अलावा हाल के दिनों में मुझे सिर्फ अभिनव का काम पसंद आया. इन्होंने फैमिली और लव स्टोरी को बहुत अच्छी तरह एडिट किया था. मुझे गैंग ऑफ वासेपुर फिल्म में वही काम करने में परेशानी हो रही है. मुझे दबंग का क्लाइमेक्स अविश्वसनीय लगा. विलेन की डेथ मुझे समझ में नहीं आई.’’ अनुराग की फिल्मों के बारे में अभिनव कहते हैं, ‘‘उम्मीद करता हूं कि एक दिन मैं भी इनके जैसा सिनेमा बना पाऊंगा. स्टोरी टेलिंग में इनसे अच्छा फिल्ममेकर इंडिया में इस वक्त नहीं है. मैं इनसे फिल्मों में वॉयलेंस कम करने के लिए कहता रहता हूं. इनकी फिल्मों की एक मजबूरी है कि उनमें स्टार फिट नहीं होते.’’ गौरतलब है कि अनुराग और अभिनव के सिनेमा में पैरेंट्स को अभिनव का सिनेमा ज्यादा पसंद है. अभिनव कहते हैं कि हमारे पैरेंट्स छोटी शहर की टिपीकल ऑडियंस हैं. वो सिनेमा के स्टूडेंट नहीं हैं.

अनुराग ने एक दिलचस्प बात यह बताई कि उनकी फिल्मों की स्क्रीनिंग के बाद अभिनव से दो दिन तक उनकी बात नहीं होती. उसका कारण अभिनव ने बताया, ‘‘मैं निडरता से इनकी फिल्म की खामियां बता देता हूं. मुझे परवाह नहीं रहती कि ये बुरा मान जाएंगे. इन्हें बुरा लगता है, लेकिन बाद में जब इन्हें समझ में आता है कि मेरा पक्ष सही है तो ये नॉर्मल हो जाते हैं.’’ अनुराग बताते हैं कि उनकी फिल्मों देव डी, गुलाल, दैड गर्ल इन यलो बूट्स में अभिनव का बहुत योगदान है. अभिनव के अनुसार, ‘‘मैं चाहता हूं कि ये किसी का नुकसान न करें. अगर फिल्म रुपया कमाएगी, तभी ये फिल्म बनाते रहेंगे.’’

अनुराग जिद्दी स्वभाव के हैं. वे अपनी फिल्म की खातिर किसी प्रकार से झुकने के लिए तैयार नहीं होते थे, लेकिन अब उनकी वह सोच परिवर्तित हो गई है. इस बात का श्रेय अपने छोटे भाई को देते हुए अनुराग कहते हैं, ‘‘मैं पहले किसी की नहीं सुनता था. अब सुनने लगा हूं. अभिनव, कल्की और सुनील बोरा की वजह से मुझमें यह बदलाव आया है. अब मैं जब कोई स्क्रिप्ट लिखता हूं तो दूसरे की राय लेता हूं. मैं आज इतना काम कर पा रहा हूं क्योंकि अभिनव का मुझे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप से सपोर्ट है.’’ अभिनव अपने भैया की सोच और उनके सिनेमा का सम्मान किस कदर करते हैं, इसका अनुमान उनके इस कथन से लगाया जा सकता है, ‘‘अनुराग नए-नए दरवाजे खोलते हैं. भविष्य में हमारा सिनेमा किस दिशा में जाएगा, इसका निर्धारण वही करेंगे.’’

कश्यप बंधु अगर किसी फिल्म के लिए एकजुट होंगे तो निसंदेह वह फिल्म चर्चा का विषय बनेगी और उसकी प्रतीक्षा सिनेप्रेमी बेसब्री से करेंगे. मगर प्रश्न यह है कि क्या कश्यप बंधु किसी फिल्म के लिए एकजुट होंगे. इसका जवाब अभिनव देते हैं, ‘‘हो सकता है कि भविष्य में ये कोई स्क्रिप्ट लिखें और मैं उसे डायरेक्ट करूं.’’ अनुराग कहते हैं कि संभव है कि हम दोनों मिलकर एक बड़ी फिल्म प्रोड्यूस करें. एक दिन हम साथ जरुर आएंगे. पहले हम स्थायी हो जाएं, हमारा दर्शक वर्ग तैयार हो जाए. हम दो सडक़ों की तरह हैं, जो एक दिन जरुर मिलेंगी.

अनुराग की योजना अगले साल अपने बैनर में दस फिल्में प्रोड्यूस करने की है. जबकि अभिनव दबंग के बाद अपनी अगली बड़ी फिल्म बनाने की तैयारी कर रहे हैं. कश्यप बंधुओं को करीब से जानने वालों का कहना है कि आने वाले समय में फिल्म इंडस्ट्री में उनकी ताकत बढ़ेगी. उनका अपना एक पावरफुल कैंप होगा. अनुराग कहते हैं, ‘‘जो लोग ऐसा सोचते हैं, उनके मुंह में घी-शक्कर. लेकिन हम यहां राज करने नहीं आए हैं. बंगला बनाने नहीं आए हैं. हम पिक्चर बनाने आए हैं. किसी प्रकार का समझौता किए बगैर हम अपनी पसंद की फिल्में बनाते रहेंगे.’’ भाई की बात का समर्थन करते हुए अभिनव कहते हैं कि हम किसी तरह की रेस में नहीं हैं. भावी योजनाओं के बारे में पूछने पर अनुराग-अभिनव ने दिलचस्प जवाब दिया. अनुराग ने कहा, ‘‘मैं सिनेमा में कॉमर्स ढूंढने की कोशिश करूंगा.’’ ‘‘और मैं कॉमर्स में सिनेमा ढूंढने की कोशिश करूंगा.’’ जोर का ठहाका लगाते हुए अभिनव ने कहा.

अनुराग कश्यप की पसंदीदा फिल्में
प्यासा, साहिब बीवी और गुलाम, उड़ान.

अभिनव कश्यप की पसंदीदा फिल्में
ब्लैक फ्राइडे, बैंडिट क्वीन और शोले.

अनुराग कश्यप के पसंदीदा निर्देशक
गुरुदत्त, राजकपूर, राजकुमार हिरानी.

अभिनव कश्यप के पसंदीदा निर्देशक\
बिमल रॉय, राजकुमार हिरानी, इम्तियाज अली.



अनुभूति की दस्तक

अनुराग और अभिनव की छोटी बहन अनुभूति अपनी पहली फिल्म निर्देशित करने की तैयारी कर रही हैं. वे गैंग ऑफ वासेपुर में अनुराग की असिस्टेंट थीं. अनुभूति मुंबई में अपने पति के साथ रहती हैं. अनुराग ने उन्हें अपने बैनर में फिल्म बनाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया. अनुराग ने जानकारी दी कि अनुभूति अपना फिल्म बनाने जा रही हैं. वे जिस दिन हमसे मदद मांगेंगी, दोनों भाई उनके लिए खड़े होंगे.