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Thursday, June 28, 2012

जहर खाने की मजबूरी

मैं उन लोगों में शामिल नहीं हूं जो सब्जियां और खाने-पीने की दूसरी चीजें खरीदने बाजार जाते हैं। दरअसल मेरा मौजूदा पेशा मुङो इस सुविधा की इजाजत नहीं देता, लेकिन मुङो याद है कि जब मैं बच्चा था तो अपनी मम्मी और आंटी के साथ अक्सर बाजार जाता था। मुङो यह भी याद है कि तब मुङो कितनी बोरियत होती थी, क्योंकि मम्मी और आंटी को सब्जियां और फल छांटने में घंटों लगते थे। वे बड़ी रुचि के साथ सब्जियों और खाने-पीने की गुणवत्ता पर बहस करती थीं और खामियों की ओर इशारा करती थीं और सबसे बढ़िया क्वालिटी पर जोर देती थीं। वे लगातार अलग विक्रेताओं की सब्जियों और फलों की तुलना करती रहती थीं। जब यह सब होता था उस समय मेरे दोस्त क्रिकेट खेलने के लिए मेरा इंतजार कर रहे होते थे। आज जब मैं खार मार्केट के पास से गुजरता हूं तब मुङो सब्जियां, फल और खाने-पीने की चीजें खरीद रही महिलाएं ठीक वही करती नजर आती हैं जो तब मेरी मम्मी और आंटी किया करती थीं। उन्हें देखकर मैं अपने पुराने दिनों में लौट जाता हूं जब मुङो भारी-भारी बैग उठाने पड़ते थे। आखिर हमारे घर के बड़े लोगों को कितना समय खाने-पीने की ताजा सामग्री छांटने में खपाना पड़ता है? हम सब शायद ही यह समझ पाते हों कि सब्जियां और खाने-पीने की चीजें कितनी भी ताजी क्यों न हों, उनमें कितना जहर हो सकता है?
हम किसी फल को हाथ में लेकर, सूंघकर, हल्के से दबाकर अथवा दाग-धब्बे जांचकर उसकी ताजगी का अंदाजा लगा सकते हैं, लेकिन हम कैसे जान पाएंगे कि उसके अंदर कितनी कीटनाशक दवाएं भरी हैं? हम खाना क्यों खाते हैं? स्वाभाविक है, इसलिए कि हमारे शरीर को जिंदा रहने के लिए पोषण की जरूरत होती है। पोषक खाना हमारे शारीरिक और मानसिक विकास के लिए जरूरी है। बीमारियों से हम तभी लड़ सकते हैं जब हम अच्छा-पोषक खाना खा रहे हों। लेकिन यदि हम अपने खाने के साथ बड़ी मात्र में कीटनाशक भी खा रहे हों तो इसका स्पष्ट मतलब है कि पोषण के साथ-साथ हम जहर भी खा रहे हैं और इससे खाना खाने का बुनियादी मकसद ही ध्वस्त हो जाता है।
साठ के दशक में भारत कृषि के क्षेत्र में एक क्रांति का गवाह बना, जिसे हरित क्रांति का नाम दिया गया था। उस समय नीति-नियंताओं ने यह महसूस किया था कि बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए हमें रासायनिक खेती को अपनाने की जरूरत है। रासायनिक खेती से प्रति एकड़ उपज बढ़ाने में मदद मिलेगी। इस प्रक्रिया से परंपरागत प्राकृतिक जैविक खाद वाली खेती में कुछ हस्तक्षेप किए गए। इसके तहत रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल शुरू किया गया। कीट और कीड़े-मकोड़े हमारे कृषि उत्पादों को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। लिहाजा उन्हें मारने के लिए हम जिन दवाओं का इस्तेमाल करते हैं उन्हें कीटनाशक दवाएं कहा जाता है। कीटनाशक दवाएं मूल रूप से जहर होती हैं। फसल पर जो कीटनाशक छिड़का जाता है उसका केवल एक प्रतिशत ही कीटों पर गिरता है। शेष 99 प्रतिशत फसल पर पड़ता है और भूमि में समा जाता है अथवा पानी-हवा के जरिए आसपास के कुछ क्षेत्रों तक पहुंच जाता है। इस तरह यह जहर हमारे खाने तक पहुंच जाता है।
प्रकृति अपने तरीकों से चीजों को संतुलित करती है। इसलिए जो कीट हमारी फसल को खाते हैं उन्हें खाने वाले कीट भी हैं। साफ रूप में कहें तो कीट दो तरह के होते हैं। एक शाकाहारी कीट, जो फसल को खाकर जिंदा रहते हैं और दूसरे मांसाहारी कीट जो फसल खाने वाले कीटों को अपना आहार बनाते हैं। कीटनाशक दवाएं इन कीटों में कोई भेद नहीं करती हैं। यह एक जहर है जो दोनों तरह के कीटों को मारता है। लिहाजा अपने मित्र कीटों को मार डालने के बाद हमारे पास ऐसे कीट बच जाते हैं जो कीटनाशकों के हमले से खुद को किसी तरह बचा लेते हैं। इस प्रक्रिया में वे अपने अंदर ऐसी प्रतिरोधक शक्ति विकसित कर लेते हैं कि उन पर कीटनाशक दवाएं असर नहीं करतीं। इसलिए इन कीटों को मारने के लिए आपको और अधिक कीटनाशकों का छिड़काव करना होता है। यह एक खतरनाक चक्र है, जो चलता रहता है। एक ऐसा चक्र जिसमें हम अपने मित्र कीटों को लगातार मार रहे हैं और अपने खाने-पीने में अधिक से अधिक जहर भर रहे हैं।
अगर कीटनाशक हमें प्रभावित कर रहे हैं तो यह सवाल भी उठना चाहिए कि उन किसानों पर इसका क्या असर हो रहा होगा जो इसका इस्तेमाल करते हैं? सच्चाई यह है कि वे सबसे पहले और सबसे अधिक इस खतरे में घिरते हैं। कृषि में लगे लोगों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का यह सबसे बड़ा कारण माना जाता है। इसके साथ ही किसानों के कर्ज के संकट में फंसने की भी यह एक बड़ी वजह है कि उन्हें महंगे कीटनाशक खरीदने पड़ते हैं। आंध्र प्रदेश में कीटनाशकों के बिना खेती का एक प्रयोग कुछ गांवों में 225 एकड़ भूमि में शुरू हुआ और यह प्रयोग इतना सफल रहा कि अब यह 35 लाख एकड़ में फैल गया है। सिक्किम देश का पहला राज्य है जहां पूरी तरह जैविक खाद वाली खेती को अपना लिया गया है। कुछ और राज्य भी सिक्किम की राह पर आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं। मेरे लिए पसंद बिल्कुल साधारण है। व्यक्तिगत रूप से मुङो लगता है कि हमारे पास जैविक खाद वाली खेती की ओर बढ़ने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है और जब तक पूरी तरह ऐसा नहीं होता तब तक हमें एक सरकारी व्यवस्था की जरूरत है जो सभी बाजारों में आने वाली खाद्य सामग्री की मासिक रूप से निगरानी कर सके।
1ी2स्रल्ल2ीAं¬1ंल्ल.ङ्घे
जहर खाने की मजबूरी
मैं उन लोगों में शामिल नहीं हूं जो सब्जियां और खाने-पीने की दूसरी चीजें खरीदने बाजार जाते हैं। दरअसल मेरा मौजूदा पेशा मुङो इस सुविधा की इजाजत नहीं देता, लेकिन मुङो याद है कि जब मैं बच्चा था तो अपनी मम्मी और आंटी के साथ अक्सर बाजार जाता था। मुङो यह भी याद है कि तब मुङो कितनी बोरियत होती थी, क्योंकि मम्मी और आंटी को सब्जियां और फल छांटने में घंटों लगते थे। वे बड़ी रुचि के साथ सब्जियों और खाने-पीने की गुणवत्ता पर बहस करती थीं और खामियों की ओर इशारा करती थीं और सबसे बढ़िया क्वालिटी पर जोर देती थीं। वे लगातार अलग विक्रेताओं की सब्जियों और फलों की तुलना करती रहती थीं। जब यह सब होता था उस समय मेरे दोस्त क्रिकेट खेलने के लिए मेरा इंतजार कर रहे होते थे। आज जब मैं खार मार्केट के पास से गुजरता हूं तब मुङो सब्जियां, फल और खाने-पीने की चीजें खरीद रही महिलाएं ठीक वही करती नजर आती हैं जो तब मेरी मम्मी और आंटी किया करती थीं। उन्हें देखकर मैं अपने पुराने दिनों में लौट जाता हूं जब मुङो भारी-भारी बैग उठाने पड़ते थे। आखिर हमारे घर के बड़े लोगों को कितना समय खाने-पीने की ताजा सामग्री छांटने में खपाना पड़ता है? हम सब शायद ही यह समझ पाते हों कि सब्जियां और खाने-पीने की चीजें कितनी भी ताजी क्यों न हों, उनमें कितना जहर हो सकता है?
हम किसी फल को हाथ में लेकर, सूंघकर, हल्के से दबाकर अथवा दाग-धब्बे जांचकर उसकी ताजगी का अंदाजा लगा सकते हैं, लेकिन हम कैसे जान पाएंगे कि उसके अंदर कितनी कीटनाशक दवाएं भरी हैं? हम खाना क्यों खाते हैं? स्वाभाविक है, इसलिए कि हमारे शरीर को जिंदा रहने के लिए पोषण की जरूरत होती है। पोषक खाना हमारे शारीरिक और मानसिक विकास के लिए जरूरी है। बीमारियों से हम तभी लड़ सकते हैं जब हम अच्छा-पोषक खाना खा रहे हों। लेकिन यदि हम अपने खाने के साथ बड़ी मात्र में कीटनाशक भी खा रहे हों तो इसका स्पष्ट मतलब है कि पोषण के साथ-साथ हम जहर भी खा रहे हैं और इससे खाना खाने का बुनियादी मकसद ही ध्वस्त हो जाता है।
साठ के दशक में भारत कृषि के क्षेत्र में एक क्रांति का गवाह बना, जिसे हरित क्रांति का नाम दिया गया था। उस समय नीति-नियंताओं ने यह महसूस किया था कि बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए हमें रासायनिक खेती को अपनाने की जरूरत है। रासायनिक खेती से प्रति एकड़ उपज बढ़ाने में मदद मिलेगी। इस प्रक्रिया से परंपरागत प्राकृतिक जैविक खाद वाली खेती में कुछ हस्तक्षेप किए गए। इसके तहत रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल शुरू किया गया। कीट और कीड़े-मकोड़े हमारे कृषि उत्पादों को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। लिहाजा उन्हें मारने के लिए हम जिन दवाओं का इस्तेमाल करते हैं उन्हें कीटनाशक दवाएं कहा जाता है। कीटनाशक दवाएं मूल रूप से जहर होती हैं। फसल पर जो कीटनाशक छिड़का जाता है उसका केवल एक प्रतिशत ही कीटों पर गिरता है। शेष 99 प्रतिशत फसल पर पड़ता है और भूमि में समा जाता है अथवा पानी-हवा के जरिए आसपास के कुछ क्षेत्रों तक पहुंच जाता है। इस तरह यह जहर हमारे खाने तक पहुंच जाता है।
प्रकृति अपने तरीकों से चीजों को संतुलित करती है। इसलिए जो कीट हमारी फसल को खाते हैं उन्हें खाने वाले कीट भी हैं। साफ रूप में कहें तो कीट दो तरह के होते हैं। एक शाकाहारी कीट, जो फसल को खाकर जिंदा रहते हैं और दूसरे मांसाहारी कीट जो फसल खाने वाले कीटों को अपना आहार बनाते हैं। कीटनाशक दवाएं इन कीटों में कोई भेद नहीं करती हैं। यह एक जहर है जो दोनों तरह के कीटों को मारता है। लिहाजा अपने मित्र कीटों को मार डालने के बाद हमारे पास ऐसे कीट बच जाते हैं जो कीटनाशकों के हमले से खुद को किसी तरह बचा लेते हैं। इस प्रक्रिया में वे अपने अंदर ऐसी प्रतिरोधक शक्ति विकसित कर लेते हैं कि उन पर कीटनाशक दवाएं असर नहीं करतीं। इसलिए इन कीटों को मारने के लिए आपको और अधिक कीटनाशकों का छिड़काव करना होता है। यह एक खतरनाक चक्र है, जो चलता रहता है। एक ऐसा चक्र जिसमें हम अपने मित्र कीटों को लगातार मार रहे हैं और अपने खाने-पीने में अधिक से अधिक जहर भर रहे हैं।
अगर कीटनाशक हमें प्रभावित कर रहे हैं तो यह सवाल भी उठना चाहिए कि उन किसानों पर इसका क्या असर हो रहा होगा जो इसका इस्तेमाल करते हैं? सच्चाई यह है कि वे सबसे पहले और सबसे अधिक इस खतरे में घिरते हैं। कृषि में लगे लोगों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का यह सबसे बड़ा कारण माना जाता है। इसके साथ ही किसानों के कर्ज के संकट में फंसने की भी यह एक बड़ी वजह है कि उन्हें महंगे कीटनाशक खरीदने पड़ते हैं। आंध्र प्रदेश में कीटनाशकों के बिना खेती का एक प्रयोग कुछ गांवों में 225 एकड़ भूमि में शुरू हुआ और यह प्रयोग इतना सफल रहा कि अब यह 35 लाख एकड़ में फैल गया है। सिक्किम देश का पहला राज्य है जहां पूरी तरह जैविक खाद वाली खेती को अपना लिया गया है। कुछ और राज्य भी सिक्किम की राह पर आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं। मेरे लिए पसंद बिल्कुल साधारण है। व्यक्तिगत रूप से मुङो लगता है कि हमारे पास जैविक खाद वाली खेती की ओर बढ़ने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है और जब तक पूरी तरह ऐसा नहीं होता तब तक हमें एक सरकारी व्यवस्था की जरूरत है जो सभी बाजारों में आने वाली खाद्य सामग्री की मासिक रूप से निगरानी कर सके।
1ी2स्रल्ल2ीAं¬1ंल्ल.ङ्घे
जहर खाने की मजबूरी
मैं उन लोगों में शामिल नहीं हूं जो सब्जियां और खाने-पीने की दूसरी चीजें खरीदने बाजार जाते हैं। दरअसल मेरा मौजूदा पेशा मुङो इस सुविधा की इजाजत नहीं देता, लेकिन मुङो याद है कि जब मैं बच्चा था तो अपनी मम्मी और आंटी के साथ अक्सर बाजार जाता था। मुङो यह भी याद है कि तब मुङो कितनी बोरियत होती थी, क्योंकि मम्मी और आंटी को सब्जियां और फल छांटने में घंटों लगते थे। वे बड़ी रुचि के साथ सब्जियों और खाने-पीने की गुणवत्ता पर बहस करती थीं और खामियों की ओर इशारा करती थीं और सबसे बढ़िया क्वालिटी पर जोर देती थीं। वे लगातार अलग विक्रेताओं की सब्जियों और फलों की तुलना करती रहती थीं। जब यह सब होता था उस समय मेरे दोस्त क्रिकेट खेलने के लिए मेरा इंतजार कर रहे होते थे। आज जब मैं खार मार्केट के पास से गुजरता हूं तब मुङो सब्जियां, फल और खाने-पीने की चीजें खरीद रही महिलाएं ठीक वही करती नजर आती हैं जो तब मेरी मम्मी और आंटी किया करती थीं। उन्हें देखकर मैं अपने पुराने दिनों में लौट जाता हूं जब मुङो भारी-भारी बैग उठाने पड़ते थे। आखिर हमारे घर के बड़े लोगों को कितना समय खाने-पीने की ताजा सामग्री छांटने में खपाना पड़ता है? हम सब शायद ही यह समझ पाते हों कि सब्जियां और खाने-पीने की चीजें कितनी भी ताजी क्यों न हों, उनमें कितना जहर हो सकता है?
हम किसी फल को हाथ में लेकर, सूंघकर, हल्के से दबाकर अथवा दाग-धब्बे जांचकर उसकी ताजगी का अंदाजा लगा सकते हैं, लेकिन हम कैसे जान पाएंगे कि उसके अंदर कितनी कीटनाशक दवाएं भरी हैं? हम खाना क्यों खाते हैं? स्वाभाविक है, इसलिए कि हमारे शरीर को जिंदा रहने के लिए पोषण की जरूरत होती है। पोषक खाना हमारे शारीरिक और मानसिक विकास के लिए जरूरी है। बीमारियों से हम तभी लड़ सकते हैं जब हम अच्छा-पोषक खाना खा रहे हों। लेकिन यदि हम अपने खाने के साथ बड़ी मात्र में कीटनाशक भी खा रहे हों तो इसका स्पष्ट मतलब है कि पोषण के साथ-साथ हम जहर भी खा रहे हैं और इससे खाना खाने का बुनियादी मकसद ही ध्वस्त हो जाता है।
साठ के दशक में भारत कृषि के क्षेत्र में एक क्रांति का गवाह बना, जिसे हरित क्रांति का नाम दिया गया था। उस समय नीति-नियंताओं ने यह महसूस किया था कि बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए हमें रासायनिक खेती को अपनाने की जरूरत है। रासायनिक खेती से प्रति एकड़ उपज बढ़ाने में मदद मिलेगी। इस प्रक्रिया से परंपरागत प्राकृतिक जैविक खाद वाली खेती में कुछ हस्तक्षेप किए गए। इसके तहत रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल शुरू किया गया। कीट और कीड़े-मकोड़े हमारे कृषि उत्पादों को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। लिहाजा उन्हें मारने के लिए हम जिन दवाओं का इस्तेमाल करते हैं उन्हें कीटनाशक दवाएं कहा जाता है। कीटनाशक दवाएं मूल रूप से जहर होती हैं। फसल पर जो कीटनाशक छिड़का जाता है उसका केवल एक प्रतिशत ही कीटों पर गिरता है। शेष 99 प्रतिशत फसल पर पड़ता है और भूमि में समा जाता है अथवा पानी-हवा के जरिए आसपास के कुछ क्षेत्रों तक पहुंच जाता है। इस तरह यह जहर हमारे खाने तक पहुंच जाता है।
प्रकृति अपने तरीकों से चीजों को संतुलित करती है। इसलिए जो कीट हमारी फसल को खाते हैं उन्हें खाने वाले कीट भी हैं। साफ रूप में कहें तो कीट दो तरह के होते हैं। एक शाकाहारी कीट, जो फसल को खाकर जिंदा रहते हैं और दूसरे मांसाहारी कीट जो फसल खाने वाले कीटों को अपना आहार बनाते हैं। कीटनाशक दवाएं इन कीटों में कोई भेद नहीं करती हैं। यह एक जहर है जो दोनों तरह के कीटों को मारता है। लिहाजा अपने मित्र कीटों को मार डालने के बाद हमारे पास ऐसे कीट बच जाते हैं जो कीटनाशकों के हमले से खुद को किसी तरह बचा लेते हैं। इस प्रक्रिया में वे अपने अंदर ऐसी प्रतिरोधक शक्ति विकसित कर लेते हैं कि उन पर कीटनाशक दवाएं असर नहीं करतीं। इसलिए इन कीटों को मारने के लिए आपको और अधिक कीटनाशकों का छिड़काव करना होता है। यह एक खतरनाक चक्र है, जो चलता रहता है। एक ऐसा चक्र जिसमें हम अपने मित्र कीटों को लगातार मार रहे हैं और अपने खाने-पीने में अधिक से अधिक जहर भर रहे हैं।
अगर कीटनाशक हमें प्रभावित कर रहे हैं तो यह सवाल भी उठना चाहिए कि उन किसानों पर इसका क्या असर हो रहा होगा जो इसका इस्तेमाल करते हैं? सच्चाई यह है कि वे सबसे पहले और सबसे अधिक इस खतरे में घिरते हैं। कृषि में लगे लोगों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का यह सबसे बड़ा कारण माना जाता है। इसके साथ ही किसानों के कर्ज के संकट में फंसने की भी यह एक बड़ी वजह है कि उन्हें महंगे कीटनाशक खरीदने पड़ते हैं। आंध्र प्रदेश में कीटनाशकों के बिना खेती का एक प्रयोग कुछ गांवों में 225 एकड़ भूमि में शुरू हुआ और यह प्रयोग इतना सफल रहा कि अब यह 35 लाख एकड़ में फैल गया है। सिक्किम देश का पहला राज्य है जहां पूरी तरह जैविक खाद वाली खेती को अपना लिया गया है। कुछ और राज्य भी सिक्किम की राह पर आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं। मेरे लिए पसंद बिल्कुल साधारण है। व्यक्तिगत रूप से मुङो लगता है कि हमारे पास जैविक खाद वाली खेती की ओर बढ़ने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है और जब तक पूरी तरह ऐसा नहीं होता तब तक हमें एक सरकारी व्यवस्था की जरूरत है जो सभी बाजारों में आने वाली खाद्य सामग्री की मासिक रूप से निगरानी कर सके।
1ी2स्रल्ल2ीAं¬1ंल्ल.ङ्घे
जहर खाने की मजबूरी
मैं उन लोगों में शामिल नहीं हूं जो सब्जियां और खाने-पीने की दूसरी चीजें खरीदने बाजार जाते हैं। दरअसल मेरा मौजूदा पेशा मुङो इस सुविधा की इजाजत नहीं देता, लेकिन मुङो याद है कि जब मैं बच्चा था तो अपनी मम्मी और आंटी के साथ अक्सर बाजार जाता था। मुङो यह भी याद है कि तब मुङो कितनी बोरियत होती थी, क्योंकि मम्मी और आंटी को सब्जियां और फल छांटने में घंटों लगते थे। वे बड़ी रुचि के साथ सब्जियों और खाने-पीने की गुणवत्ता पर बहस करती थीं और खामियों की ओर इशारा करती थीं और सबसे बढ़िया क्वालिटी पर जोर देती थीं। वे लगातार अलग विक्रेताओं की सब्जियों और फलों की तुलना करती रहती थीं। जब यह सब होता था उस समय मेरे दोस्त क्रिकेट खेलने के लिए मेरा इंतजार कर रहे होते थे। आज जब मैं खार मार्केट के पास से गुजरता हूं तब मुङो सब्जियां, फल और खाने-पीने की चीजें खरीद रही महिलाएं ठीक वही करती नजर आती हैं जो तब मेरी मम्मी और आंटी किया करती थीं। उन्हें देखकर मैं अपने पुराने दिनों में लौट जाता हूं जब मुङो भारी-भारी बैग उठाने पड़ते थे। आखिर हमारे घर के बड़े लोगों को कितना समय खाने-पीने की ताजा सामग्री छांटने में खपाना पड़ता है? हम सब शायद ही यह समझ पाते हों कि सब्जियां और खाने-पीने की चीजें कितनी भी ताजी क्यों न हों, उनमें कितना जहर हो सकता है?
हम किसी फल को हाथ में लेकर, सूंघकर, हल्के से दबाकर अथवा दाग-धब्बे जांचकर उसकी ताजगी का अंदाजा लगा सकते हैं, लेकिन हम कैसे जान पाएंगे कि उसके अंदर कितनी कीटनाशक दवाएं भरी हैं? हम खाना क्यों खाते हैं? स्वाभाविक है, इसलिए कि हमारे शरीर को जिंदा रहने के लिए पोषण की जरूरत होती है। पोषक खाना हमारे शारीरिक और मानसिक विकास के लिए जरूरी है। बीमारियों से हम तभी लड़ सकते हैं जब हम अच्छा-पोषक खाना खा रहे हों। लेकिन यदि हम अपने खाने के साथ बड़ी मात्र में कीटनाशक भी खा रहे हों तो इसका स्पष्ट मतलब है कि पोषण के साथ-साथ हम जहर भी खा रहे हैं और इससे खाना खाने का बुनियादी मकसद ही ध्वस्त हो जाता है।
साठ के दशक में भारत कृषि के क्षेत्र में एक क्रांति का गवाह बना, जिसे हरित क्रांति का नाम दिया गया था। उस समय नीति-नियंताओं ने यह महसूस किया था कि बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए हमें रासायनिक खेती को अपनाने की जरूरत है। रासायनिक खेती से प्रति एकड़ उपज बढ़ाने में मदद मिलेगी। इस प्रक्रिया से परंपरागत प्राकृतिक जैविक खाद वाली खेती में कुछ हस्तक्षेप किए गए। इसके तहत रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल शुरू किया गया। कीट और कीड़े-मकोड़े हमारे कृषि उत्पादों को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। लिहाजा उन्हें मारने के लिए हम जिन दवाओं का इस्तेमाल करते हैं उन्हें कीटनाशक दवाएं कहा जाता है। कीटनाशक दवाएं मूल रूप से जहर होती हैं। फसल पर जो कीटनाशक छिड़का जाता है उसका केवल एक प्रतिशत ही कीटों पर गिरता है। शेष 99 प्रतिशत फसल पर पड़ता है और भूमि में समा जाता है अथवा पानी-हवा के जरिए आसपास के कुछ क्षेत्रों तक पहुंच जाता है। इस तरह यह जहर हमारे खाने तक पहुंच जाता है।
प्रकृति अपने तरीकों से चीजों को संतुलित करती है। इसलिए जो कीट हमारी फसल को खाते हैं उन्हें खाने वाले कीट भी हैं। साफ रूप में कहें तो कीट दो तरह के होते हैं। एक शाकाहारी कीट, जो फसल को खाकर जिंदा रहते हैं और दूसरे मांसाहारी कीट जो फसल खाने वाले कीटों को अपना आहार बनाते हैं। कीटनाशक दवाएं इन कीटों में कोई भेद नहीं करती हैं। यह एक जहर है जो दोनों तरह के कीटों को मारता है। लिहाजा अपने मित्र कीटों को मार डालने के बाद हमारे पास ऐसे कीट बच जाते हैं जो कीटनाशकों के हमले से खुद को किसी तरह बचा लेते हैं। इस प्रक्रिया में वे अपने अंदर ऐसी प्रतिरोधक शक्ति विकसित कर लेते हैं कि उन पर कीटनाशक दवाएं असर नहीं करतीं। इसलिए इन कीटों को मारने के लिए आपको और अधिक कीटनाशकों का छिड़काव करना होता है। यह एक खतरनाक चक्र है, जो चलता रहता है। एक ऐसा चक्र जिसमें हम अपने मित्र कीटों को लगातार मार रहे हैं और अपने खाने-पीने में अधिक से अधिक जहर भर रहे हैं।
अगर कीटनाशक हमें प्रभावित कर रहे हैं तो यह सवाल भी उठना चाहिए कि उन किसानों पर इसका क्या असर हो रहा होगा जो इसका इस्तेमाल करते हैं? सच्चाई यह है कि वे सबसे पहले और सबसे अधिक इस खतरे में घिरते हैं। कृषि में लगे लोगों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का यह सबसे बड़ा कारण माना जाता है। इसके साथ ही किसानों के कर्ज के संकट में फंसने की भी यह एक बड़ी वजह है कि उन्हें महंगे कीटनाशक खरीदने पड़ते हैं। आंध्र प्रदेश में कीटनाशकों के बिना खेती का एक प्रयोग कुछ गांवों में 225 एकड़ भूमि में शुरू हुआ और यह प्रयोग इतना सफल रहा कि अब यह 35 लाख एकड़ में फैल गया है। सिक्किम देश का पहला राज्य है जहां पूरी तरह जैविक खाद वाली खेती को अपना लिया गया है। कुछ और राज्य भी सिक्किम की राह पर आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं। मेरे लिए पसंद बिल्कुल साधारण है। व्यक्तिगत रूप से मुङो लगता है कि हमारे पास जैविक खाद वाली खेती की ओर बढ़ने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है और जब तक पूरी तरह ऐसा नहीं होता तब तक हमें एक सरकारी व्यवस्था की जरूरत है जो सभी बाजारों में आने वाली खाद्य सामग्री की मासिक रूप से निगरानी कर सके।

Saturday, June 23, 2012

फिल्‍म समीक्षा : गैंग्‍स ऑफ वासेपुर-रवीश कुमार

 (चेतावनी- स्टाररहित ये समीक्षा काफी लंबी है समय हो तभी पढ़ें, समीक्षा पढ़ने के बाद फिल्म देखने का फैसला आपका होगा )

डिस्क्लेमर लगा देने से कि फिल्म और किरदार काल्पनिक है,कोई फिल्म काल्पनिक नहीं हो जाती है। गैंग्स आफ वासेपुर एक वास्तविक फिल्म है। जावेद अख़्तरीय लेखन का ज़माना गया कि कहानी ज़हन से का़ग़ज़ पर आ गई। उस प्रक्रिया ने भी दर्शकों को यादगार फिल्में दी हैं। लेकिन तारे ज़मीन पर, ब्लैक, पिपली लाइव,पान सिंह तोमर, विकी डोनर, खोसला का घोसला, चक दे इंडिया और गैंग्स आफ वासेपुर( कई नाम छूट भी सकते हैं) जैसी फिल्में ज़हन में पैदा नहीं होती हैं। वो बारीक रिसर्च से जुटाए गए तमाम पहलुओं से बनती हैं। जो लोग बिहार की राजनीति के कांग्रेसी दौर में पनपे माफिया राज और कोइलरी के किस्से को ज़रा सा भी जानते हैं वो समझ जायेंगे कि गैंग्स आफ वासेपुर पूरी तरह एक राजनीतिक फिल्म है और लाइसेंसी राज से लेकर उदारीकरण के मछलीपालन तक आते आते कार्पोरेट,पोलिटिक्स और गैंग के आदिम रिश्तों की असली कहानी है।

रामाधीर सिंह, सुल्तान, सरदार जैसे किरदारों के ज़रिये अनुराग ने वो भी दिखा दिया है जो इस फिल्म में नहीं दिखाई गई है। हिन्दू मुस्लिम अपराधिकरण के इस गठजोड़ का इस्तमाल राजनीति में सांप्रदायिकरण की मिसालों के रूप में खूब हुआ है। मगर उसके पहले तक यह गठजोड़ सिर्फ धंधा पानी में दावेदारी तक ही सीमित था। गैंग्स आफ वासेपुर एक राजनीतिक दस्तावेज़ है। इस फिल्म को इसलिए नहीं देखा जाना चाहिए कि किस समीक्षक ने कितने स्टार दिये हैं। इस फिल्म को इसलिए भी देख आइये कि ऐसी फिल्में बनने लगी हैं और सेंसर बोर्ड उन्हें पास भी करने लगा है( सेंसर बोर्ड के अफसरों को बधाई,पंकजा ठाकुर से मिला हूं तो उनका नाम लेकर लेकिन बाकी को भी बधाई)। गालियों के लिए नहीं बल्कि उन दृश्यों के लिए जिनके बिना यह फिल्म वास्तविक नहीं बन पाती। बड़े बड़े मांस के लोथड़ों के कटने की जगह से जो आपराधिक मिथक बनते हैं,यह सीन अगर सेंसर बोर्ड काट देता कि लोगों की भावना आहत हो सकती है तो फिल्म आइना बनने से रह जाती। संवादों में कोइलयरी की राजनीति और अपराधिकरण में टाटा थापर का नाम लेकर उस प्रक्रिया को बता देना आसान फैसला नहीं होगा। नूझ लैनल( मैं न्यूज़ चैनल नहीं कहता क्योंकि मुझे ये लैनल ही लगते हैं) में यह औकात है तो बता दीजिए।

अच्छा निर्देशक वो होता है जो अपनी कहानी के समय और उसके रंग को जानता हो। कैमरे की लाइटिंग, दिन और रात के शेड्स,बारिश के क्लोज अप्स,मोहल्ले की गलियां,गलियों के ढलान, कोने, पुराने अखबारों की कटिंग,धूल,बाल इन सबको एक निरंतरता में रखते हुए दृश्य रचता हो। अनुराग मिलते तो पूछता कि मनोज वाजपेयी के लिए गमछा तो मिल गया होगा लेकिन ईनार(कुआं) पर नहाने के वक्त जो अंडर वियर पहना है वो ब्रांडेड है या पटरी से खरीदा था। ईनार पर बाल्टी में फुले हुए कपड़े और गमछा लपेट कर मनोज का चलना कमाल का है। कट्टा का विवरण और चित्रण बेजोड़ है। फट के फ्लावर हो जाता है। ये संवाद रिसर्च से ही आ सकता है। गुल और ज़र्दे के डिब्बे में बम बनाना और फेंकना वास्तविक है। लुंगी पहनने का तरीका और पीछे फंसी हुई लुंगी को हल्के से खींचना यह सब डिटेलिंग पर्दे के दृश्यों को यादगार बनाते हैं। कलाकार को अभिव्यक्ति देते हैं। जिसने भी इस फिल्म की लाइटिंग की है वो कमाल का बंदा या बंदी होगी। अंधेरा कितने शेड्स में उभरता है,लाजवाब है।

मैं कहानी में नहीं जाना चाहता। कसाई के मोहल्लों के बहाने अनुराग ने  पीयूष मिश्रा के नैरेशन से ज़ाहिर कर दिया है कि एक समय था जब ये बस्तियां ठेकेदारों के गुर्गों की खदानें हुआ करती थीं। जिनका नब्बे के दशक में सांप्रदायिक अफवाहों में इस्तमाल किया गया। बिना इस डायनमिक्स के आप इस फिल्म को नहीं पढ़ सकते। फिल्म बनती है वासेपुर में। आज़ादी के पहले से, अंग्रेज़ों के आने और जाने के बीच, ट्रेन के लूटने का लंबा सीन, सरदार के बाप का मरना, सरदार का बनना,उसकी शादी,बच्चे। वो एक सामान्य मर्द है। मनोज वाजपेयी ने ऐसे किरदारों को अपने समाज में खूब देखा होगा,सुना होगा। सत्या में मनोज अपने बेहतरीन अभिनय से काल्पनिक हो जाते हैं तो वासेपुर में अपने शानदार अभिनय से वास्तविक। गिरिडिह गिरिडिह बोलने का अंदाज़, नली वाला मटन पीस चूसना, लड़की को ताकना,कुएं पर दुर्गा के साथ कपड़े धोते वक्त ताल से ताल मिलना,बंगालन का राजनीति में आना यह सब बिहार यूपी के आपराधिक होते समाज के वास्तविक किस्से हैं। आप इन्हें बिंदेश्वरी दूबे, सत्यदेव सिंह सूरजदेव सिंह बीपी सिन्हा जैसे असली नामों में सुन सकते हैं(जिसकी बेहतरीन चर्चा रंजन ऋतुराज ने अपने फेसबुक स्टेटस में की है) या फिर आप अपने स्थानीय मोहल्लों में उभरे ठेकेदारों और उनके गुर्गे की सुनी सुनाई कहानियों में खोज सकते हैं। कोयला माफिया के पनपने की प्रक्रिया के भीतर कितने उप-वृतांत हैं।

सरदार का अभिनय कमाल का है। मनोज वाजपेयी ने जितना बेहतरीन गुंडई के किरदार को उभारने में किया है उससे कहीं ज्यादा उनका अभिनय औरतों के सापेक्ष एक मर्दाना कमीनगी में दिखता है। मनोज को काफी फोलो किया है। लेकिन इस बार मनोज ने अपने कारतूस से वही निकाले जो हम सब देख चुके हैं। अगर नया वाजपेयी उभरता है तो वो सिर्फ नगमा और दुर्गा के बीच के संबंधों में फंसा मक्कार मनोज है। दानिश को गोली लगते वक्त और अंतिम दृश्य में ठेले पर गिरने का अभिनय काफी अच्छा है। कुएं के पास वो जिस तरह से दुर्गा से बात करते हैं और घर की सफाई करते वक्त जिस तरह से नगमा से बात करते हैं उसका सांस्कृतिक अध्ययन कोई फिल्म वाला करता रहेगा लेकिन हम जिस भोजपुरी समाज से आते हैं उसे देखकर गदगद हो गए। निश्चित रूप से दुर्गा और नगमा के बीच के अवसरों पर मनोज वाजपेयी ने अपने अभिनय को नया मुकाम दिया है। एक सीन में जिस सफाई से मनोज पांव उठाते हुए उठ खड़े होते हैं पता चलता है कि फिल्म में अभिनेता नहीं निर्देशक अभिनय कर रहा है। और बहुत सारे गुमनाम सहायक निर्देशक अपने निर्देशक के साथ खड़े हैं, तैयारी के साथ।

सरदार और औरतों के बीच के संबंध को अलग से देखा जाना चाहिए। नगमा और पीयूष मिश्रा के बीच जो संबंध होते होते रह गया और उससे जो फैज़ल पर असर पड़ा उसके लिए अनुराग ने कैसे आसानी से वक्त निकाल लिया है, शाबासी देने का मन करता है। बिना उस दृश्य के फैज़ल का किरदार पैदा ही नहीं हो सकता था जो शायद दूसरे हिस्से में उभरेगा। मनोज वाजपेयी के पिता का किरदार जिसने भी किया है उसका अभिनय भी नोटिस में लिया जाना चाहिए। कहानी में शुरूआती जान वही डालता है। कोइलरी में पत्थर से मारपीट का सीन प्रभावशाली है।

कसाइयों के मोहल्ले का सुल्तान इस फिल्म में जम गया है। यहां कबूतर भी एक पंख से उड़ता है का संवाद कितनी आसानी से बिना किसी विशेष भाव भंगिमा के उतार देता है। चप्पल उतारकर दांत पीसते हुए दौड़ा कर मारने का सीन। उफ कैसे बताऊं कि एकदम वास्तविक है। मेरे पिताजी ठीक इसी तरह चप्पल खींच लेते थे मारने के लिए। हमारे गांव समाज में चप्पल निकालने का सामंती चलन कैसे आया होगा इसका ज़िक्र करूंगा तो सामंतवाद और जातिवाद में उलझ जाऊंगा। खैर मनोज वाजपेयी ने भी ऐसे वास्तविक दृश्य अपने गांव घरों में देखे होंगे।

सुल्तान को मैंने पहली बार रीमेक वाली अग्निपथ में नोटिस किया था। इस कलाकार का भविष्य उज्ज्वल है। भोजपुरिया ज़ुबान में कहूं तो खंचड़़ा गुर्गा लगा है। इसका किरदार बहुत उभरा नहीं क्योंकि सरदार की बराबरी में नहीं था। सरदार की बराबरी रामाधीर से हो रही थी। क्या आप उस प्रसंग को भूल सकते हैं जब सुल्तान रामाधीर के घर जाता है। पत्नी चीनी मिट्टी वाले बर्तन की बात करती है। मुसलमान आया है। तभी मैं कहता हूं कि इसे आपराधिकरण और सांप्रदायिकरण के बीच की यात्रा के प्रसंगों के रूप में देखा जाना चाहिए। सुल्तान ने क्या एक्टिंग की है।

आप समझ रहे होंगे कि मैं समीक्षा लिख रहा हूं या किताब। कुछ फिल्मों को ऐसे भी देखना चाहिए। इस फिल्म में पीयूष मिश्रा का किरदार बहुत नहीं उभरा। उनकी आवाज़ और गाने ने कमाल का अभिनय किया है। अनुराग पीयूष को और क्रूर बना सकते थे लेकिन शायद स्कोप नहीं रहा होगा। पीयूष का किरदार मनोज के साथ जो लड़का मार काट करता है, वो होना चाहिए था। लेकिन क्या पीयूष के नैरेशन के बिना यह फिल्म पूरी हो पाती। नहीं। हो सकता है कि अनुराग ही पीयूष के रोल को ठीक से समझ न पाये हों। गुलाल में उनके लिए पूरा प्लान था लेकिन गैग्स आफ वासेपुर में पीयूष को लेकर कोई योजना नहीं दिखती है। नगमा और दुर्गा का अभिनय लाजवाब रहा है। दीवार का प्रंसग देखकर लगा कि अनुराग ने सिनेमा के भीतर सिनेमा का इस्तमाल ओम शांति ओम टाइम के भौंडे गाने रचने से हटकर किया है। मुकद्दर का सिकंदर का गाना आहा। सिनेमा देखने की चाह और चाह में बनते किरदार। वाह।

लिखते हुए सोच रहा हूं कि कुछ छूट तो नहीं रहा है। बहुत कुछ छूट रहा है। गानों पर बिल्कुल नहीं लिखा। लेकिन यह फिल्म इसलिए विवाद नहीं पैदा करेगी क्योंकि घटना के समय से बहुत बाद में बनी है। फिर इसका जवाब भी फिल्म में ही है। कैसे माफिया का काम कोयले का चूरा चुराने वाली महिलाएं करने लगीं और माफिया आखिरी दिनों में मछली मारने लगे और रंगदारी के धंधे में आ गए। कुछ नहीं हुआ तो उस रामाधीर सिंह का जिसके पास राजनीतिक सत्ता बची रह जाती है। वही रामाधीर सिंह आज रेड्डी ब्रदर्स लेकर ए राजा तक में बदल गया है।

माफी चाहता हूं बोर समीक्षा के लिए। इस तरह से कोई समीक्षा करे तो फिल्म ही न देखने जाए। मगर आप इस फिल्म को देखिये। काफी मनोरंजन है इसमें । मैं कमज़ोर दिल का आदमी हूं। सोचा था कि बहुत गोली चलेगी तो सिनेमा हाल से चला आऊंगा। बड़ा कलेजा कांपता है महाराज। लेकिन हत्या और गोलीबारी के दृश्य क्रूरतम तरीके से नहीं फिल्माये गए हैं। क्रूरतम से मेरा मतलब वल्गर भी है। सबसे बड़ी बात है कि पूरी फिल्म अनुराग कश्यप की है। निर्देशक ने कहानी पर बराबर की पकड़ बनाए रखी है। किसी किरदार को ज्यादा जगह नहीं दी है। इसीलिए इस फिल्म से आप मनोज वाजपेयी या नवाज़ या पंकज चतुर्वेदी नहीं चुन पायेंगे। जब भी चुनेंगे फिल्म को ही चुनेंगे। अनुराग ने कहानी की ज़रूरत को बहकने नहीं दिया है। हाथ और दिल पर नियंत्रण रखा है। जिसने संपादन किया है उसका नाम तो कोई नहीं जानेगा। उसके परिवारवाले भी स्क्रीन पर नहीं पढ़ पायेंगे मगर वो तारीफ के काबिल है। शायद उसका नाम श्वेता है। इसीलिए कहता हूं कि गैंग्स आफ वासेपुर फिल्म निर्देशकों के लिए चुनौती है। ऐसी बात नहीं है कि इस स्तर की फिल्में नहीं बनी हैं। बनी हैं। मगर आज के मोड़ पर यह फिल्म प्रस्थानबिंदु है। पाथब्रेकिंग।

Friday, June 22, 2012

फिल्‍म समीक्षा : गैंग्‍स ऑफ वासेपुर-गौरव सोलंकी

गौरव सेलंकी के ब्‍नॉग रोटी कपड़ा और सिनेमा से साभार

वासेपुर की हिंसा हम सबकी हिंसा है जिसने कमउम्र फ़ैज़लों से रेलगाड़ियां साफ़ करवाई हैं 

मैं नहीं जानता कि आपके लिए गैंग्स ऑफ वासेपुर गैंग्स की कहानी कितनी है, लेकिन मेरे लिए वह उस छोटे बच्चे में मौज़ूद है, जिसने अपनी माँ को अपने दादा की उम्र के एक आदमी के साथ सोते हुए देख लिया है, और जो उस देखने के बाद कभी ठीक से सो नहीं पाया, जिसके अन्दर इतनी आग जलती रही कि वह काला पड़ता गया, और जब जवान हुआ, तब अपने बड़े भाई से बड़ा दिखता था। फ़िल्म उस बच्चे में भी मौज़ूद है, जिसके ईमानदार अफ़सर पिता को उसी के सामने घर के बगीचे में तब क्रूरता से मार दिया गया, जब पिता उसे सिखा रहे थे कि फूल तोड़ने के लिए नहीं, देखने के लिए होते हैं। थोड़ी उस बच्चे में, जिसकी नज़र से फ़िल्म हमें उसके पिता के अपने ही मज़दूर साथियों को मारने के लिए खड़े होने की कहानी दिखा रही है। थोड़ी उस बच्चे में, जो बस रोए जा रहा है, जब बाहर उसके पिता बदला लेने का जश्न मना रहे हैं। थोड़ी कसाइयों के उस बच्चे में, जिस पर कैमरा ठिठकता है, जब उसके और उसके आसपास के घरों में सरदार ख़ान ने आग लगा दी है। फ़िल्म मेरे लिए उस कोयले की खदान में भी जाकर ठहर गई है, जिसमें बारह घंटे से पहले रुकने पर खाल उधेड़ दी जाएगी, जिसमें रोशनी कम है या हवा, यह ठीक से बताना मुश्किल है, और तब कभी-कभी चमकती रोशनी में काले पड़े शरीर हैं, उस आदमी का चेहरा है, जिसे उस समय के बाद हमेशा के लिए क्रूर हो जाना है, अपने लोगों को मारना है, उनके घर जलाने हैं और शक्ति पानी है। और जब मरना है, तो अपने बेटे को उस आग में छोड़ जाना है, जिसमें वह अपने बाल तभी बढ़ाएगा, जब अपने पिता के हत्यारे से बदला ले लेगा। और बदला नहीं लेगा, कह के लेगा उसकी।
कितनी फ़िल्में होंगी, जो किसी अपराधी की बिना शादी के पैदा हुए बेटे पर इतना भर ठहरेंगी कि जब अब्बू आएं तो वह पढ़ाई छोड़कर दरवाज़े तक दौड़ा जाए और कहे- सलाम अब्बू, और इतने में ही आपको अन्दर कहीं रोना आए। कितनी फ़िल्में होंगी, जो आपको कोयला खदानों के माफ़िया के बारे में बताते हुए उनका इतिहास और वर्तमान बताएंगी, कोयले और लोहे की चोरियां इतनी आम दिखाएंगी कि रात का इंतज़ार नहीं और उन्हीं रास्तों से छोटे छोटे बच्चे लोहा चुराकर लाते हैं जिनसे आईसक्रीम वाला जा रहा है। कितनी फ़िल्में टाटा बिड़ला और थापर में खदानों की बन्दरबाँट की बात करेंगी और कहेंगी कि अंग्रेज तनख़्वाह भी देते थे और छत भी, लेकिन आज़ादी के बाद के अंग्रेज छत तोड़कर-जलाकर सिर्फ़ तनख़्वाह देते हैं, फिर वे कहीं भी जाकर छत डालें। कितनी फ़िल्में उन गरीबों के घर जला रहे आदमी के चेहरे पर ठहरेंगी? उस आदमी के चेहरे की असहजता पर भी, जिसके हुक्म से अभी अभी उसके एक कारिंदे के परिवार को ख़त्म कर दिया गया है? 

इसीलिए गैंग्स ऑफ वासेपुर में भले ही कितनी भी गालियाँ और गोलियाँ हों, कितने ही कटते हुए आदमी और भैंसे हों, लेकिन अपनी भीतर की परत में यह हमारी सामूहिक कहानी है। वासेपुर के अंश हम सबके बीच में हैं। वह हमारी माँ ही है, जो घर के पुरुषों द्वारा रचे जा रहे हत्या के षड्यंत्र के दौरान बैकग्राउंड में दबी आवाज़ में नौकर से कह रही है कि चीनी मिट्टी के बरतन में खाना परोसना, क्योंकि मेहमान मुसलमान है। वे हमारे पिता ही हैं, जो भले ही दुनिया भर का कत्ल करके लौटे हों, लेकिन अपने बेटे को कुछ छर्रे लगने पर पागल हुए जाते हैं। यह हम सब हैं यही है हमारी ज़िन्दगियों का दोहरापन और यह हमारी ही दुनिया की हिंसा है, उसके कसाईख़ाने जिनमें आँख के बदले आँख से पूरी दुनिया अंधी होनी है।
यह ज़रूर है कि बहुत बड़ी और बहुत सारे किरदारों की कहानी होने की वजह से या शायद सबसे इंसाफ़ करने और ख़ुद को कसने की कोशिश में फ़िल्म ऐसे कुछ लम्हे लापरवाही से छोड़ देती है, जो उसके मोती हो सकते थे। इसकी तेज रफ़्तार बहुत सारी डीटेल्स आपके दूसरी बार में देखने के लिए भी छोड़ देती है। लेकिन तब भी, जहाँ जहाँ फ़िल्म ठहरती है अपने किरदारों के दुखों और गुस्से में, वहाँ यह और भी अलग होती जाती है। वैसे पल, जहाँ यह धीमी होती है, कविता जैसी, जब वे कोयले से सिर तक सने लड़ रहे हैं।
यह अपनी घटनाओं के लिए नहीं, अपने किरदारों और हालात पर उनकी प्रतिक्रियाओं के लिए महत्वपूर्ण फ़िल्म है। यह इतनी स्वाभाविक है कि हत्या करके और लूटकर भागते इसके किरदारों की चप्पलें बीच में ही छूट जाती हैं और वे उन्हें लेने लौटते हैं। यह वासेपुर की गली ही है, जिसमें सरदार ख़ान एक पहलवान को दिनदहाड़े छुरे से मार रहा है और पीछे कुछ औरतें और बच्चे दूसरी दिशा में आराम से चले जा रहे हैं। फ़िल्म बार-बार उस हिंसा के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष गवाह बन रहे बच्चों पर ठहरती है, उन बच्चों पर भी, जिन्हें बाद में यही सब करना है, और इसीलिए यह ख़ास है।
फ़िल्म अपने किरदारों, उनकी ज़िन्दगियों, उनके मोहल्लों और उनके शहर की विश्वसनीयता बार-बार अपनी हदों से आगे जाकर भी कायम करती है। कभी 'कसम पैदा करने वाले की', 'कुली' या 'गाइड' के पोस्टरों से, कभी पिस्तौल देखते ही चमत्कारिक ख़ुशी से भर जाने वाले अपने किरदारों के चेहरों से, कभी ऑटोमैटिक पिस्तौलों की उनकी चाह से, और कभी घर में फ़्रिज आने की ख़ुशी से अपने अलग-अलग समय को बताती हुई। कभी यह उन गाँव वालों के साथ बैठी है जो मंत्रीजी के स्वागत में उनके घर के बाहर फलों की टोकरियाँ लेकर बैठे हैं, कभी उनके साथ, जो उनके बेटे के पैरों में गिर रहे हैं। देखिए, क्या होना था लोकतंत्र और मज़दूर विकास पार्टी को क्या करना था?

यूं तो आप इसे सिर्फ़ प्रतिशोध की कहानी भी समझ सकते हैं, लेकिन यह अलग इसलिए है कि अपने गैंगस्टर्स के घरों की रसोइयों में दाखिल होती है, उनके चौबारों पर टहलती है, उनके साथ चाट खाती है, लस्सी पीती है, उनके पास बैठती है जब वे अपनी प्रेमिकाओं के साथ नल पर कपड़े धो रहे हैं, उनके साथ शरमाती है, जब वे किसी पार्क में पहली बार उनके हाथ छू रहे हैं, उनके साथ उनकी शादियों के गीत गाती है और देसी कट्टे से किए फ़ायर से जब उनके हाथ झनझनाते हैं, तो हँसती है। यह आईसक्रीम की चोरी से लेकर कोयले, लोहे, मछली, तालाब, पैट्रोल और पैसे की, वह हर लूट दिखाती है जो वासेपुर में हो रही है।
'इक बगल में चाँद होगा' से 'कह के लूंगा' तक ‘वासेपुर का संगीत उसकी आत्मा है, जिसके बिना फ़िल्म संभव नहीं थी। इसके लिए स्नेहा खानवलकर और उनके साथियों पर अलग से एक लेख लिखा जाना चाहिए। वासेपुर के ऐक्टर उसकी साँसें हैं मनोज वाजपेयी इसलिए कि अपने किरदार की कमीनगी में इतना उतरते हैं कि आपको बार-बार बेहद विकर्षित करते हैं, लेकिन बस इतना ही कि जब वे अपना बदला ले रहे हों तो आप उनके बिल्कुल साथ खड़े हों। जैसा काम उन्होंने यहाँ किया है, वह दुर्लभ है। रिचा चड्ढा अपने उच्चारण, लहजे और रोने-हँसने में वही हैं जो शादी में ढेर सारा अतिरिक्त और फूहड़ मेकअप पुतवाकर आई कोई बेपढ़ी लड़की होगी। उनका किरदार खूब लिखा गया है और उन्होंने इसे खूब जिया भी है। नवाज़ुद्दीन जब आते हैं, फ़िल्म कोई और ही फ़िल्म लगने लगती है। इसी तरह जयदीप अहलावत, तिग्मांशु धूलिया, पीयूष मिश्रा, रीमा सेन, हुमा कुरैशी और बहुत सारे और भी ऐक्टर मिलकर हमें पूरा यक़ीन दिलाते हैं कि हम उनकी कहानी में नहीं, उनके जीवन में हैं।

अनुराग कश्यप इसलिए भी अलग हैं कि उनकी फ़िल्मों के स्त्री पात्र भले ही थोड़ी देर के लिए आएँ, मामूली जीवन जी रहे हों या कितने भी सताए जा रहे हों, लेकिन हमेशा अपने पूरे आत्मसम्मान और शक्ति के साथ आते हैं। वे हॉल में फ़िल्म देखते हुए सीटियाँ बजाती हैं, चिल्लाकर बच्चन को शादी का प्रस्ताव देती हुई, और बिना उनकी मर्ज़ी के छूने वाले प्रेमी को परमिशन लेने का कहती हैं। वे हमेशा गुस्से में रोती हैं, अबला होकर कभी नहीं। यह उनके यहाँ ही संभव है कि जब उनकी स्त्रियों का बस नहीं चलता कि अपने पतियों को वेश्याओं के पास जाने से रोक सकें, तो डाँटकर उन्हें खूब खाने को कहती हैं कि वहाँ जाकर कम से कम उनकी बेइज़्ज़ती तो न कराए। वे उनसे थप्पड़ खाती हैं और भले ही उल्टा मार न सकें, लेकिन उनके लिए दरवाज़े हमेशा के लिए बन्द कर देती हैं। और अपने गालों पर वे उंगलियाँ कभी भूलती नहीं।  

ट्रेन में, पटरियों पर, धर्मशालाओं-होटलों में, सड़क पर, मुहर्रम के मातम और बनारस के घाटों पर अनुराग कश्यप हमेशा की तरह बेहद सहजता से फ़िल्म को ले जाते हैं। वही उन्हें अलग करता है। पहली बार वे अपनी शहरी स्वभाव की फ़िल्मों से अपनी जड़ों की ओर लौटे हैं। और यह कैसी विडम्बना है कि उनका दबंग किरदार जब घायल होकर गिरता है, उसके लिए कोई एम्बुलैंस नहीं, कोई गाड़ी या मोटरसाइकिल भी नहीं, उसके लिए एक साइकिल रिक्शा है बस, जिस पर किसी दुकानदार जायसवाल का नाम लिखा है। उसे उसी पर गिरना है, रिक्शा को चल पड़ना है और ओझल होते जाना है। वही रिक्शा, जिसे उसके इलाके के कितने ही सरदार ख़ान देश के हर कोने में चलाते हैं और इस तरह देश चलाते हैं, लेकिन कोई कोना उनका नहीं।

यह वह जगह है, जहाँ किसी कलाकार या कलाकृति को अपना स्टैंड लेना होता है, अपने होने की वजह बतानी होती है।
गैंग्स ऑफ वासेपुर यहीं कविता होती है और जिया तू बिहार के लाला का जयघोष करती है।
बात बदले की नहीं है, न वासेपुर की। बात उस हिंसा की है, जिसमें हमारी कितनी पीढ़ियां और नस्लें खप गई हैं, कितने फ़ैज़ल स्कूल छोड़कर ट्रेन के पाखाने साफ़ करने को मज़बूर किए गए हैं, बाद में नशे में डूब जाने को और उसके बाद बदले की आग में। यह उस हिंसा में डूबकर लगातार परेशान भी करती है और हँसती भी रहती है। ख़ुद पर और हम सब पर। यह इसीलिए डेढ़ इंच ऊपर है। 

 

फिल्‍म समीक्षा : गैंग्‍स ऑफ वासेपुर

पर्दे पर आया सिनेमा से वंचित समाज

-अजय ब्रह्मात्‍मज
इस फिल्म का केवल नाम ही अंग्रेजी में है। बाकी सब कुछ देसी है। भाषा, बोली, लहजा, कपड़े, बात-व्यवहार, गाली-ग्लौज, प्यार, रोमांस, झगड़ा, लड़ाई, पॉलिटिक्स और बदला.. बदले की ऐसी कहानी हिंदी फिल्मों में नहीं देखी गई है। जिन दर्शकों का इस देश से संबंध कट गया है। उन्हें इस फिल्म का स्वाद लेने में थोड़ी दिक्कत होगी। उन्हें गैंग्स ऑफ वासेपुर भदेस, धूसर, अश्लील, हिंसक, अनगढ़, अधूरी और अविश्वसनीय लगेगी। इसे अपलक देखना होगा। वरना कोई खास सीन, संवाद, फायरिंग आप मिस कर सकते हैं।
अनुराग कश्यप ने गैंग्स ऑफ वासेपुर में सिनेमा की पारंपरिक और पश्चिमी सोच का गर्दा उड़ा दिया है। हिंदी फिल्में देखते-देखते सो चुके दर्शकों के दिमाग को गैंग्स ऑफ वासेपुर झंकृत करती है। भविष्य के हिंदी सिनेमा की एक दिशा का यह सार्थक संकेत है। देश के कोने-कोने से अपनी कहानी कहने के लिए आतुर आत्माओं को यह फिल्म रास्ता दिखाती है।
इस फिल्म में अनुराग कश्यप ने सिनेमाई साहस का परिचय दिया है। उन्होंने वासेपुर के ठीक सच को उसके खुरदुरेपन के साथ अनगिनत किरदारों के माध्यम से उतारा है। उनकी फिल्म रामाधीर सिंह और सरदार खान की दुश्मनी के बीच ही नहीं उलझी रहती। कहानी के महीन तार वासेपुर की गलियों से जुड़े हैं। एक पूरी तहजीब गैंग्स ऑफ वासेपुर में साकार होती है। जीवन की धड़कन सुनें।
फिल्म के किरदारों के साथ भटकें और हिंदी सिनेमा के पर्दे से दूर किए गए उन वंचितों से मिले जिन्हें अनुराग कश्यप और उनकी टीम ने पूरी संजीदगी के साथ पर्दे पर उतारा है। क्राफ्ट, टेकनीक और सिनेमा के लिहाज से फिल्म कमजोर हो सकती है, लेकिन कथ्य, कंटेंट और काले परिवेश को रचने में अद्भूत मजबूती है। फिल्म के छोटे-बड़े सभी किरदार अपनी छवि छोड़ जाते हैं।
गैंग्स ऑफ वासेपुर की कहानी 2004 में देश के हर घर में देखे जा रहे टीवी सीरियल सास भी कभी बहु थी से आरंभ होती है। छोटे से कमरे में सीरियल देख रहे परिवार पर अचानक हुई गोलीबारी से आफत आती है। टीवी स्क्रीन टूटता है। कहानी अपने परिवेश में आ जाती है और हमें वॉयसओवर से पता चलता है कि यह वासेपुर है, जो कभी बंगाल, फिर बिहार और अब झारखंड का हिस्सा है। मैट्रो और मल्टीप्लेक्स के कई दर्शक झारखंड से अपरिचित हो सकते हैं। देश के इसी हिस्से में अपने पिता शाहिद खान की हत्या पर सरदार खान कसम खाता है कि अब तो जिंदगी का एक ही मकसद है बदला। बदले की यह कहानी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में आती है। फिल्म के अंत में बदले के लिए तैयार हो रही तीसरी पीढ़ी की भी झलक मिल जाती है।
गैंग्स ऑफ वासेपुर का ठोस सामाजिक-ऐतिहासिक संदर्भ है। यह सच्ची घटनाओं पर आधारित काल्पनिक कहानी है। कुछ किरदारों के नाम बदले गए हैं, लेकिन उन किरदारों का चरित्र वैसे ही रखा गया है। अनुराग कश्यप बताते चलते हैं कि समय के साथ वासेपुर के कारोबार में किस तरह के परिवर्तन होते गए। कोयले की चोरी, रेत का धंधा और लोहा-लक्कड़ की चोरी पृष्ठभूमि में चलती और दिखती रहती है। बदले की इस कहानी में केवल खून-खराबा ही नहीं है। मानव स्वभाव के मुताबिक प्रेम-रोमांस, हवस, दंगा-फंसाद की भी गुंजाइश बनी रहती है। पार्टी-पॉलिटिक्स पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है, लेकिन नौकरशाही और पॉलिटिक्स का फिल्म छूती है।
गैंग्स ऑफ वासेपुर में अनुराग कश्यप ने देश के एक हिस्से का स्लाइस निकालकर पर्दे पर परोस दिया है। इस स्लाइस में उस समाज के सतह के ऊपर-नीचे के सभी नमूने आ गए हैं। सब कुछ आम भारतीय समाज की तरह ऊपर से ठंडा,ठहरा, धीमा और शिथिल है,लेकिन थोड़ा खुरचें तो खलबली महसूस होती है। 1941 से 1985 तक पहुंची इस कहानी में देश के उस हिस्से को बखूबी देखा जा सकता है।
सरदार खान की भूमिका में मनोज बाजपेयी ने अभिनय की लंबी लकीर खींच दी है। उनकी परतदार प्रतिभा का अनुराग कश्यप ने प्रभावपूर्ण उपयोग किया है। सरदार खान में कोई भी गुण नहीं है, फिर भी वह रोचक, आत्मीय, करीबी और आसपास का लगता है। क्रूरता से लेकर रोमांस तक के दृश्यों में मनोज बाजपेयी की सहजता मुग्ध करती है। अपनी बीवी नगमा और दूसरी बीवी दुर्गा से सरदार के संबंधों के चित्रण में मनोज बाजपेयी एक साथ हंसाते और हर्षाते हैं। रिचा चड्ढा ने नगमा के किरदार को बहुत अच्छी तरह से निभाया है। वह इस फिल्म की खोज हैं। रीमा सेन को हम मसाला फिल्मों में देखते रहे हैं। यहां उनकी प्रतिभा का इस्तेमाल हुआ है। हुमा कुरेशी फिल्म के अंत में आती हैं। उनकी मौजूदगी आकर्षक है। हुमा कुरेशी और नबाजुद्दीन सिद्दिकी के बीच का कस्बाई रोमांस कोमल और ताजा है।
फैजल के किरदार में नवाजुद्दीन सिद्दिकी का प्रस्फुटन हुआ है। उनके बड़े भाई दानिश की भूमिका में आए विनीत सिंह ने संयमित अभिनय से चौंकाया है। वे प्रभावित करते हैं। साफ पता चलता है कि फिल्म के दूसरे भाग में दानिश और फैजल कमाल करेंगे। जयदीप अहलावत, जमील अहमद, पियूष मिश्रा, पंकज त्रिपाठी समेत सभी कलाकारों ने इस फिल्म को प्रभावशाली बनाया है। रामाधीर सिंह की भूमिका में में तिग्मांशु धूलिया चौंकाते हैं। उन्होंने किरदार के स्वभाव को समझा है और बगैर नाटकीय हुए उसे जी लिया है।
फिल्म का गीत-संगीत और पाश्‌र्र्व संगीत विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वरूण ग्रोवर और पियूष मिश्रा के गीतों में कथ्य के अनुरूप शब्द और भाव हैं और स्नेहा ने उन्हें स्थानीय ध्वनियों से फिल्मों में अच्छी तरह पिरो दिया है। जीवी प्रकाश का पाश्‌र्र्व संगीत फिल्म की कथा को अर्थ और संदर्भ देता है। जीशान कादरी, सचिन और अनुराग कश्यप 44 साल की कहानी को ढाई घंटे में समेटने में सफल रहे हैं। कहीं-कहीं कहानी धीमी और ढीली जरूर पड़ती है, लेकिन संपूर्णता में कोई कमी नहीं रहती। अनुराग कश्यप की संलिप्तता कुछ दृश्यों को लगी करती और दोहराती है। थिएटर में जाकर गैंग्स ऑफ वासेपुर देखना एक अनुभव है। 
**** चार स्टार

फिल्‍म समीक्षा : तेरी मेरी कहानी

review : Teri meri kahani 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
तीन दौर में फैली कुणाल कोहली की तेरी मेरी कहानी मुख्य रूप से आठ किरदारों की कहानी है। दो-दो प्रेम त्रिकोण और एक सामान्य प्रेम कहानी की इस फिल्म का सार और संदेश यही है कि समय चाहे जितना बदल जाए, प्यार अपने रूप-स्वरूप में एक सा ही रहता है। समय के हिसाब से हर काल में उसकी अभिव्यक्ति और लक्षणों में बदलाव आ जाता है, लेकिन प्रेमी युगलों की सोच,धड़कनें, मुश्किलें, भावनाएं, शंकाएं और उम्मीदें नहीं बदल पातीं।
कुणाल कोहली ने तीनों दौर की कहानियों को पेश करने का नया शिल्प चुना है। दोराहे तक लाकर वे तीनों प्रेम कहानियों को छोड़ते हैं और फिर से कहानी को आगे बढ़ाते हुए एक राह चुनते हैं, जो प्रेमी-प्रेमिका का मिलन करवाती है। तीनों दौर में प्रेमी-प्रेमियों के बीच कोई खलनायक नहीं है। उनकी शंकाएं, उलझनें और अपेक्षाएं ही कहानी को आगे बढ़ाती हैं। कहानी के विस्तार में जाने से दर्शकों की जिज्ञासा खत्म होगी।
कुणाल कोहली ने तीनों दौर के प्रेमी-प्रेमिका के रूप में प्रियंका चोपड़ा और शाहिद कपूर को चुना है। हर काल के हिसाब से उनकी भाषा, वेशभूषा और परिवेश में फर्क दिखता है। इस फर्क को बनाए रखने में कुणाल कोहली की टीम ने कामयाब मेहनत की है। खास कर भाषा और परिवेश की भिन्नता उल्लेखनीय है। संवाद लेखक कुणाल कोहली और प्रोडक्शन डिजायनर मुनीश सप्पल का योगदान फिल्म को समृद्ध करता है।
मुनीश सप्पल ने 1910, 1960 और 2012 के काल को वास्तु और वस्तुओं से सजाया है। वास्तु निर्माण में उन्होंने बारीकी का ध्यान रखा है। पृष्ठभूमि में दिख रहा परिवेश फिल्म को जीवंत बनाता है। उनकी योग्यता फिल्म के पर्दे पर एपिक रचने में सक्षम है। उसकी छटा इस साधारण फिल्म में भी दिखती है। योग्य तकनीशियन अपनी प्रतिभा का सदुपयोग कहीं भी कर लेते हैं। संवादों की भाषा में कुणाल कोहली ने काल के भेद अनुसार उर्दू, हिंदी और हिंग्लिश में रखा है। दोनों को बधाई। वेशभूषा में तीनों काल का फर्क बहुत मोटा है।
प्रियंका चोपड़ा और शाहिद कपूर ने 1910 में आराधना-जावेद, 1960 में रुखसार-गोविंद और 2010 में राधा-कृष्ण के किरदार निभाए हैं। दोनों ने काल विशेष के अनुसार लहजा बदला है। पर्दे पर उनकी मेहनत साफ दिखती है। 1910 और 1960 के दौर थोड़े बेहतर बन पड़े हैं। 2012 शायद आज की कहानी होने के कारण ध्यान नहीं बटोर पाती। वह थोड़ी बिखरी भी रहती है। ट्विटर और फेसबुक के दौर में संबंधों की चंचलता तेज हो गई है। प्रियंका चोपड़ा और शाहिद कपूर का अभिनय सामान्य है। शाहिद कपूर जावेद से किरदार में फबते हैं। उसकी वजह किरदार की रंगीनियत है।
प्रसून जोशी के गीत और साजिद-वाजिद का संगीत फिल्म केतीन दौर की कहानी के साथ न्याय नहीं कर सका। एक मुख्तसर ़ ़ ़ गीत के अलावा कोई गीत याद नहीं रहता। पुन:श्च - कुणाल कोहली को विशेष धन्यवाद कि उन्होंने फिल्म के एंड टायटल के समय किसी आयटम गीत के बजाए अपनी फिल्म के तीनों कालों के परिवेश की तस्वीरें रखी हैं। थिएटर से निकलते-निकलते आप उन पर जरूर गौर करें।
*** तीन स्टार

Thursday, June 21, 2012

नजरअंदाज होने की आदत पड़ गई थी- विनीत सिंह

गैंग्‍स ऑफ वासेपुर के दानिश खान उर्फ विनीत सिंह
बैग में कुछ कपडे और जेहन में सपने लेकर मुंबई आ गया. न रहने का कोई खास जुगाड़ था न किसी को जानता था. शुरूआत ऐसे ही होती है. पहले सपने होते हैं जिसे हम हर रोज़ देखते है,फिर वही सपना हमसे कुछ करवाता है, इसलिए सपना देखना ज़रूरी है. लेकिन सपना देखते वक़्त हम सिर्फ वही देखते हैं जो हम देखना चाहते हैं और जो हमें ख़ुशी देता है इसलिए सब कुछ बड़ा आसान लगता है. पर मुंबई जैसे शहर में जब  हकीकत से से दो-दो हाथ होता है तब काम आती है आपकी तयारी. क्यूंकि  यहाँ किसी डायरेक्‍टर या प्रोड्यूसर से मिलने में ही महीनो लग जाते हैं काम मिलना तो बहुत बाद की बात है.  बताने या कहने में दो-पांच साल एक वाक्य में निकल जाता है लेकिन ज़िन्दगी में ऐसा नहीं होता भाईi, वहां लम्हा-लम्हा करके जीना पड़ता है और मुझे बारह साल लग गए गैंग्स ऑफ़ वासेपुर  तक पहुँचते-पहुँचते. मेरी शुरुआत हुई एक टैलेंट हंट से जिसका नाम ही सुपरस्‍टार था. मै उसके फायनल राउंड का विजेता हुआ तो लगा कि गुरु काम हो गया. अब मेरी गाडी तो निकल पड़ी लेकिन बाहर से आये किसी बन्दे या बंदी के साथ यहाँ सब कुछ इतना आसान नहीं है ये मुझे बाद में पता चला.   मै किसी स्टार का बेटा  तो  हूँ नहीं  कि  कोई एकदम से मुझे लौंच कर दे. टैलेंट हंट में मेरी मुलाकात महेश मांजरेकर से हुई. उन्होंने एक फिल्म में काम करने का मौका दिया लेकिन दुर्भाग्य से वह फिल्म नहीं चली. उसके बाद पागलों के दिन शुरू हो गए.  सुबह से डायरेक्‍टर और प्रोड्यूसर के ऑफिस के चक्कर लगाना शुरू कर देता था और जब तक तक थक के चूर नहीं हो जाता तब तक लगा रहता था. मै एनएसडी या एफटीआईआई से नहीं था इसलिए मेरे कोई सीनियर या दोस्त भी नहीं था कि गम हल्का कर सकू. जो दोस्त मेरे साथ मुंबई आये थे वो यहाँ की हालत देख कर कुछ महीनो या सालों में वापस हो लिए. मै मेडिकल कॉलेज से था इसलिए लोगों को मेरे अभिनय को लेकर भरोसा भी कम था, मज़ेदार बात ये होती थी की कोई काम तो देता नहीं था हाँ ज्ञान ज़रूर दे देता था कि "डॉक्टर हो, वापस चले जाओ....फिल्म के चक्कर में बर्बाद हो जाओगे." कई बार लोगों ने हंसी भी उड़ाई लेकिन अब वही लोग इज्ज़त भी देते हैं, अच्छा लगता है. खैर! पहली फिल्म असफल होने के बाद मैंने महेश मांजरेकर के साथ डायरेक्‍शन में ६-७ फ़िल्में कर डाली. उनके साथ मराठी सीख गया. उम्मीद थी की कभी न कभी महेश जी मुझे लेकर फिल्म बनायेंगे या कोई मज़बूत रोले देंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ.  मेरा सपना अभी भी मुझे उतना ही दूर था. उसके बाद मैंने नए तरह से काम करना शुरू किया.  कई फिल्मों  में एक-दो सीन इस उम्मीद में करता गया कि कभी बड़ा रोल मिलेगा लेकिन वह भी नहीं हुआ बल्कि लोगों ने एक-दो सीन के लिए ही बुलाना शुरू कर दिया. न पैसे अच्छे मिलते थे न रोल. फिर सीरियल में काम किया ताकि अपना खर्च उठा सकूँ. फिर ११ साल बाद  महेश मांजरेकर ने अपनी फिल्म सिटी ऑफ़ गोल्ड में मुझे लीड करने का मौका दिया. यह फिल्म हिंदी और मराठी दो भाषाओ में बनी. लेकिन किस्मत ने यहाँ भी झटका दे दिया......फिल्म अच्छी होने के बावजूद भी नहीं चली क्यूंकि फिल्म में कोई स्टार नहीं था.
 मेरा दिन बदलना शुरू हुआ अनुराग कश्यप की गैंग्स ऑफ़ वासेपुर के साथ. अनुराग कश्‍यप  ने कहा कि तुम अच्छे एक्‍टर हो. उनका ये कहना मेरे लिए ये बड़ी बात थी क्‍योंकि उन्होंने मेरे टूट  रहे भरोसे को एक सहारा दिया, और अपनी फिल्म गैंग्स ऑफ़ वासेपुर में एक महत्वपूर्ण किरदार  के लिए चुन लिया.  फिल्म अभी रिलीज नहीं हुई है लेकिन मुझे उनकी फिल्म में काम करने के बाद कई काम मिल रहे है. गैंग्स ऑफ़ वासेपुर की शूटिंग में मुझे कई सारे अनुभव हुए. मुझे मेरे पसंदीदा एक्टर मनोज बाजपेयी के साथ कई सीन करने का मौका था. मै इस फिल्म में उनके बेटे की भूमिका में हूँ. जिसका नाम दानिश खान है. मुझे याद है जब शूटिंग के ६ महीने पहले अनुराग कश्यप ने कहा की विनीत मुझे तुम्हारे रोल में ऐसा लड़का चाहिए जो एकदम पतला दुबला हो, इसलिए तुम अपना वजन कम करो. तब यहाँ मेरी पढाई काम आई और मैंने वजन कम करने के हिसाब से अपना शेड्यूल बनाया और ६ महीने में मैंने अपना १६ कग वजन कम कर किया. अनुराग कश्यप ने मेरी शूटिंग से  चार दिन पहले  मुझे सेट पर आने को कहा ताकि मै लोगों से घुल मिल सकूँ. मै बनारस आ गया.  जब मै सेट पर पहुंचा  तो यूनिट के लोग  मेरे सामने से आ  जारहे थे लेकिन किसी ने मुझे पहचाना ही नहीं. मुझे इतने सालों में नज़रंदाज़ होने की आदत सी पड़ गई थी, इसलिये मै चुपचाप एक कोने में में बैठ गया और सोचने लगा कि मैंने चार दिन पहले आकर कोई गलती तो नहीं की? फिर मै उठा और सीधे अनुराग कश्यप के पास पहुंचा  और उनको हेलो कहा. उन्होंने मुझे देखा और सरप्राइज  हो गए , पहले उन्होंने गले से लगा लिया और फिर उनका पहला वाक्‍य था कि  "विनीत वजन कैसे कम किया तुम ने? तुम तोह पहचान में ही नहीं आ रहे हो. मुझे यही चाहिए था तुम्हारे किरदार के लिए, वाह"  फिर सभीi लोग इकट्ठे हो गए और सब ने कहा की विनीत भाई आये तो हम लोगों ने पहचाना ही नहीं और ये चुपचाप एक jजगह बैठ गए तो हम लोगों को लगा कि  कोई होगा. तब मैने समझा कि कई बार हमारे पुराने कड़वे अनुभव हमें  गलत सोचने  पर मजबूर कर देते है, jजबकिh कुछ और होता है.
मुझे वासेपुर की शूटिंग में बहुत से सीनियर के साथ काम करने और सीखने का मौका मिला .सभी लोग थिएटर के माने हुए कलाकार हैं जैसे मनोज बाजपेयी नवाजुद्दीन सिद्दिकी,पियूष मिश्रा,तिग्‍मांशु धूलिया,रिख चड्ढा,हुमस कुरेशी,जमील अहमद  सब एक से बढ़ कर एक. मैंने हमेशा लोगों को देख कर ही सीखा है. इसलिए मै रोज़ सेट पर जाता था था ताकि ये समझ सकूँ कि कौन एक्टर किस तरह से अपने किरदार को अप्रोच करता है. और कमाल की बात थी कि मै हर रोज़ सरप्राइज होता था. अनुराग कश्यप के साथ काम करना मेरे लिए बहुत बड़ा मौका था इसलिए मै हमेशा उनकी बात ध्‍यान से सुनता था लेकिन पहले दिन मै बहुत नर्वस था क्यूंकि मुझे एस बात का डर लग रहा था कि क्‍या  मै उनके विश्‍वास पर खरा उतर पाऊंगा?  लेकिन अनुराग कश्यप ने मुझे जिस तरह से सीन समझाया और मुझे लिैक्‍स किया उसे मै भूल नहीं सकता a. पहले दिन की शूटिंग पट्रोल पंप पर थी, सीन मेरा था और सीन में सभी सीनियर एक्‍टर थे जैसे मनोज बाजपेयी नवाजुद्दीन सिद्दिकी,पियूष मिश्रा,,जमील अहमद  और 200 की भीड़. साथ ही उस दिन तीन तीन कैमरे हुए थे. सीन श्‍ुरू हुआ और पूरा सीन एक टे में खत्‍म हो गया...मुझे पता ही नहीं चला कि मै कर गया. सभीi ने तारु की, गले लगाया. वो पल मेरे लिए यादगार है क्यूंकि उसी पल में सभी ने मुझे स्‍वीकार कर  लिया की ये लड़का एनएसडी या किसी प्रोफशनल स्‍कूल l से नहीं है पर अच्छा है. उसके बाद मै सबसे घुल-मिल गया. उसके बाद सब कुछ आसान हो गया.
बनारस का होने के नाते अनुराग कश्‍यप ने एक्‍टर्स की जिम्‍मेदार में डुपर डाल दीi थी इसलिये मुझे सभी के साथ वक़्त गबताने का ज्‍यादा मौका मिला. हम लोग एक साथ दौड़ने जाते थे, घूने जाते थे, बनारस की बलियों में घूते थे लेकिन सोच समझ कर खाना पड़ता था क्यूंकि शूटिंग करीब सीधे तीन महीने तक चलनी थी. जब शूटिंग खत्‍म होने को आई तोह ऐसी कोई मिठाईया चाट नहीं बचा था जिसे लोगों ने खाया न हो. सेट पर मनोज बाजपेयी से एक्टिंग को लेकर खूब चर्चा की और उनके बताए हुए टिप्‍स आज भी मेरे बिस्‍तर के साने दीवार पर लगे हुए हैं. नवाजुद्दीन सिद्दिकी के साथ बहुत वक़्त बिताया. उनसे काफी कुछ सीखने का मौका मिला, वो अद्भुत कलाकार हैं.पियूष मिश्रा ने हमेशा मेरा हौसला बढ़ाया।.  मै गैंग्स ऑफ़ वासेपुर को लेकर बहुत उत्‍साहित हूँ. 22 june को फिल्म सिनेमाघरों में लग रही है. देखिए और दिखइए। फिल्‍म बहुत कमाल की बनी है।

साहब बीबी और गुलाम


- अजय ब्रह्मात्मज
    फिल्मों की स्क्रिप्ट का पुस्तकाकार प्रकाशन हो रहा है। सभी का दावा रहता है कि ओरिजनल स्क्रिप्ट के आधार पर पुस्तक तैयार की गई है। हाल ही में  दिनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी की देखरेख में ‘साहब बीबी और गुलाम’ की स्क्रिप्ट प्रकाशित हुई है। उन्हें ओरिजनल स्क्रिप्ट गुरुदत्त के बेटे अरुण दत्त से मिली है। दिनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी ने चलन के मुताबिक फिल्म के हिंदी संवादों के अंग्रेजी अनुवाद के साथ उसे रोमन हिंदी में भी पेश किया है। संवादों के अंग्रेजी अनुवाद या रोमन लिपि में लिखे जाने से स्पष्ट है कि इस पुस्तक का भी मकसद उन चंद अंग्रेजीदां लोगों के बीच पहुंचना है, जिनकी हिंदी सिनेमा में रुचि बढ़ी हैं। उनकी इस रुचि को ध्यान में रखकर विनोद चोपड़ा फिल्म्स ने ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ और ‘3 इडियट’ के बाद गुरुदत्त की तीन फिल्मों ‘साहब बीवी और गुलाम’, ‘कागज के फूल’ और ‘चौदहवीं का चांद’ के स्क्रिप्ट के प्रकाशन का बीड़ा उठाया है। पिछले दिनों विधु विनोद चोपड़ा ने बताया था कि वे कुछ दूसरी फिल्मों की स्क्रिप्ट भी प्रकाशित करना चाहते हैं।
    दिनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी ने पुस्तकाकार रूप में आई स्क्रिप्ट में पटकथा और संवादों के साथ कुछ इंटरव्यू और लेख भी दिए हैं। पुस्तक के आरंभ में जितेन्द्र कोठारी ने ‘रोमांसिंग द पास्ट’ शीर्षक से भूमिका लिखी है, जिसमें गुरुदत्त के सिनेमा के संक्षिप्त विवरण के साथ ‘साहब बीवी और गुलाम’ का संदर्भ दिया गया है। दिनेश रहेजा ने फिल्म पर लिखे अपने लेख में इसे ढंग से विश्लेषित किया है। उन्होंने छोटी बहू और भूतनाथ के बीच के रिश्ते की पड़ताल की है। दोनों के बीच के ‘प्लूटोनिक लव’ की खासियत बताते हुए दिनेश ने सप्रसंग बताया है कि छोटी बहू और भूतनाथ का यह संबंध हिंदी फिल्मों के लिए अनोखा और पहला है। छोटी बहू के प्रति भूतनाथ के लगाव में प्रेम के साथ आदर और चिंता भी है। छोटी बहू भी भूतनाथ को अपना विश्वस्त और प्रिय मानती हैं। भूतनाथ को देखकर वह खुश होती हैं। दूसरी तरफ भूतनाथ भी छोटी बहू पर अपना अधिकार समझता है। फिल्म के कुछ कोमल और अंतरंग दृश्यों में भूतनाथ छोटी बहू को तुम कहने से भी नहीं हिचकता। छोटी बहू के संबोधन में आए इस परिवर्तन पर दिनेश रहेजा ने अपने लेख में गौर नहीं किया है। अबरार अल्वी या गुरुदत्त जीवित रहते तो बना सकते थे कि भूतनाथ क्यों और कैसे छोटी बहू को ‘आप’ के बदल ‘तुम’ कहने लगता है? भूतनाथ एक नौकर है और छोटी बहू मालकिन है। दोनों के बीच ‘प्लूटोनिक रिश्ता’ है, लेकिन फिल्म के एक दृश्य में हम देखते हैं कि शराब का ग्लास छीनने में जब भूतनाथ अचानक छोटी बहू का हाथ छू लेता है तो वह बिफर उठती हें। वह डांटती हैं कि तुमने एक परायी स्त्री का हाथ छुआ। स्पष्ट है कि तमाम अंतरंगता के बावजूद दोनों के बीच कोई शारीरिक संबंध नहीं है। स्त्री-पुरुष संबंध का ऐसा चित्रण हिंदी में दुर्लभ है। दिनेश रहेजा ने इस पुस्तक में फिल्म के गीतों को उनकी लय में ही अनूदित करने का सुंदर प्रयास किया है। गीतों का यह काव्यात्मक अनुवाद भावपूर्ण है
    इस पुस्तक में गुरुदत्त के कैमरामैन वीके मूर्ति के साथ ही वहीदा रहमान, मीनू मुमताज और श्याम कपूर के भी इंटरव्यू हैं। वीके मूर्ति और वहीदा रहमान की बातचीत से फिल्म के निर्माण की हल्की झलक मिलती है। अगर यह बातचीत और विस्तार में रहती और फिल्म की मेकिंग के अन्य पहलुओं को भी टच करती तो फिल्म के अध्येताओं और छात्रों के लिए पुस्तक अधिक उपयोगी हो जाती। फिर भी जितेन्द्र कोठारी का यह प्रयास सराहनीय है। हिंदी फिल्मों के दस्तावेजी करण पर फिल्म इंडस्ट्री के लोग ही अधिक ध्यान नहीं देते। फिल्मों पर की गई बातचीत के दौरान उनका रवैया बहुत ही कैजुअल, चलताऊ और टरकाऊ रहता है। खास कर फिल्म की रिलीज के बाद वे कोई बात नहीं करने और फिल्म की रिलीज के पहले हर बात इतनी ढकी-छिपी और सामान्य होती है कि उस से फिल्म की रचना प्रक्रिया समझ में नहीं आती। देर से ही स्क्रिप्ट का पुस्तकों के रूप में प्रकाशन के इस अभियान का स्वागत किया जाना चाहिए। हां, थोड़ा इस पर भी ध्यान देना चाहिए कि ओरिजनल स्क्रिप्ट और फिल्म में बोले गए संवाद के फर्क को रेखांकित करते हुए उसका स्पष्टीकरण भी दिया जाना चाहिए।
साहब बीबी और गुलाम
संकलन,अनुवाद,निबंध और इंटरव्यू-दिनेश रहेजा और जितेन्द्र कोठारी
प्रकाशक-ओम बुक्स
मूल्य-595 रु

Wednesday, June 20, 2012

शांघाई’ के सर्वहारा-मिहिर पंड्या

Shanghai_Poster
'शांघाई' पर लिखा मिहिर पंड्या का यह लेख उनके  ब्‍लॉग आवारा हूं से चवन्‍नी के पाठकों के लिए यहां पेश किया जा रहा है। 
हम जेएनयू में हैं। छात्रों का हुजूम टेफ़्लास के बाहर कुछ कुर्सियाँ डाले दिबाकर के आने की इन्तज़ार में है। प्रकाश मुख्य आयोजक की भूमिका में शिलादित्य के साथ मिलकर आखिरी बार सब व्यवस्था चाक-चौबंद करते हैं। दिबाकर आने को ही हैं। इस बीच फ़िल्म की पीआर टीम से जुड़ी महिला चाहती हैं कि स्पीकर पर बज रहे फ़िल्म के गाने की आवाज़ थोड़ी बढ़ा दी जाए। लेकिन अब विश्वविद्यालय के अपने कायदे हैं और प्रकाश उन्हें समझाने की कोशिश करते हैं। वे महिला चाहती हैं कि दिबाकर और टीम जब आएं ठीक उस वक़्त अगर “भारत माता की जय” बज रहा हो और वो भी बुलन्द आवाज में तो कितना अच्छा हो। मैं यह बात हेमंत को बताता हूँ तो वह कहता है कि समझो, वे पीआर से हैं, यही उनका ’वन पॉइंट एजेंडा’ है। हेमन्त, जिनकी ’शटलकॉक बॉयज़’ प्रदर्शन के इन्तज़ार में है, जेएनयू के लिए नए हैं। मैं हेमन्त को कहता हूँ कि ये सामने जो तुम सैंकड़ों की भीड़ देख रहे हो ना, ये भी भीड़ भर नहीं। यहाँ भी हर आदमी अपने में अलग किरदार है और हर एक का अपना अलग एजेंडा है।
हम जेएनयू में हैं। घने सवालों के बीच। दिबाकर अपने मुम्बई में ’दोस्ती फ़्लेमिंगोज़’ जैसे किसी अजीब नामवाली इमारत में बसे अपने घर और पड़ोस का किस्सा सुना रहे हैं। परेल का उनका फ़्लैट, वही परेल जहाँ पहले मुम्बई की मशहूर कपड़ा मिलें हुआ करती थीं और जिसकी ऊँची चिमनियाँ आज भी उनके बीसवीं मंज़िल के घर की खिड़की से दिखती हैं। फिर अचानक उनकी कथा में ड्राइवर आ जाते हैं, गार्ड आ जाते हैं और अन्य बहुत सारे कर्मचारीनुमा किरदार। यही सब लोग जो आज उनकी भव्य इमारत में नौकर हैं, उन्हें बताते हैं कि कभी यह जगह उनका घर हुआ करती थी। जहाँ आज उनकी गाड़ी पार्क होती है वहाँ कभी उनकी चाल रही होगी और जहाँ आज इमारत का मुख्य दरवाज़ा है वहाँ कभी चाय की वो दुकान थी जहाँ पूरा मोहल्ला इकठ्ठा होता था। गार्ड बताता है, “इधर मिल थी और इधर बच्चों के खेलने का मैदान हुआ करता था” घर चले गए हाथ से, और आज वे यहाँ नौकर हैं। वे उनसे ’अलग’ हैं जो यहाँ अब रहते हैं। वे ठीक से अंग्रेज़ी बोलना नहीं जानते। बोलते भी हैं तो उनका ’एक्सेंट’ यहाँ के वर्तमान मालिकों जैसा नहीं। यह भेद बताते हुए उनके चेहरे पर कोई गुस्से भरा नकारात्मक भाव नहीं है। लेकिन दिबाकर इस औचक सच्चाई से रूबरू हैं जहाँ किसी जगह का पूर्वमालिक आज ठीक उसी अपने घर की जगह पर सफ़ाई कर्मचारी या गार्ड बना दिया गया है और यह सर्वमान्य ’प्रगति’ है।
अजीब बात बस यही है कि वो ये किस्सा इस सवाल के जवाब में सुना रहे हैं कि उन्हें ’शांघाई’ बनाने का ख्याल कैसे आया? और सिर्फ़ इस जेएनयू की बातचीत में ही नहीं, मैं नोटिस करता हूँ कि उनसे जहाँ-जहाँ भी यह सवाल पूछा गया है, दिबाकर ने यही कथा सुनाई है। फिर पिछले हफ़्ते उनकी फ़िल्म पहली बार देखते हुए मैं नोटिस करता हूँ कि फ़िल्म का मुख्य किरदार मारे जाने के पहले कुछ ऐसा ही बोल रहा है, “प्रगति करो। खूब करो। लेकिन आईबीपी के नाम पे, प्रगति के नाम पे आप भारत नगर वालों को अपने घर से पचास मील दूर फेंक दोगे। फिर उन्हीं भारत नगर वालों को आईबीपी के गेट के सामने गार्ड बनाकर खड़ा कर दोगे। क्या ये प्रगति है? वो यहाँ आपके साथ रह नहीं सकते। काले हैं, कपड़े खराब हैं, इंग्लिश बोल नहीं सकते। ये कैसी प्रगति है भाई? कि सिर्फ़ मर्सिडीज़ चले और साइकिल न चले।“
क्यों भला? आखिर ’शांघाई’ की व्याख्या में यही कहानी ही क्यों? क्या ’शांघाई’ मुम्बई के विस्थापित मूलवासियों के बारे में है? ’शांघाई’ तो एक पॉलिटिकल थ्रिलर है, जिसके केन्द्र में एक राजनीतिक हत्या है। दिबाकर अपने दर्शकों को फिर ’धोखा’ दे गए लगते हैं।
मेरा एक सवाल है। सवाल ’शांघाई’ की दर्शकदीर्घा से है और बड़ा सीधा सा है। ’शांघाई’ देखनेवाले कितने लोग जग्गू (टैम्पो ड्राइवर की भूमिका में अनन्त जोग) से आईडेंटिफ़ाई करते हैं? कितने लोगों को जग्गू में अपना अक्स दिखता है? फ़िल्म उन्हीं से शुरु होती हैं और अन्त में उन्हीं पर ख़त्म, और इस नाते वह फ़िल्म की संरचना में सबसे महत्वपूर्ण किरदार बनकर उभरते हैं। मैं अभी तक ’शांघाई’ पर ऐसी एक दर्जन पोस्ट, कमेंट्स, अपडेट्स पढ़ चुका हूँ जिनमें टी ए कृष्णन (आईएएस ऑफ़िसर की भूमिका में अभय देओल) की भूमिका को ख़ास सराहा गया है और वे उनके किरदार से आईडेंटिफ़ाई करने वाले हैं। लेकिन अभी तक ’जग्गू’ के किरदार से आईडेंटिफ़ाई करने वाला कोई नहीं। ’शांघाई’ में जग्गू और कृष्णन दोनों हैं। लेकिन आज उस फ़िल्म की दर्शक दीर्घा में कृष्णन है, कभी शालिनी भी है, कौल हैं, अरुणा अहमदी हैं, डॉ. अहमदी भी हैं शायद। लेकिन जग्गू नहीं है।
यह कोई निरपेक्ष यथार्थ नहीं। यह हमारे मध्यवर्ग का यथार्थ है। बेशक वास्तविक यथार्थ में प्रतिरोध है, अन्याय को न सहने की जिजीविषा है, आततायी व्यवस्था को पलट देने का जज़्बा है। लेकिन यह वास्तविक यथार्थ क्या हमारे मध्यवर्ग की सीमित दुनिया का यथार्थ भी है? क्या रिश्ता है हमारे वृहत मध्यवर्ग का उस व्यापक यथार्थ से जिसकी परछाईयाँ बस्तर के जंगलों में पसरी हैं। ’शांघाई’ में मध्यवर्ग के भिन्न स्तरों पर खड़े पात्र कथा के केन्द्र में हैं और फ़िल्म ज़्यादातर हिस्से उनकी नज़र से हमें यथार्थ दिखाती है। गौर कीजिए, वही इसके दर्शक भी हैं। असल यथार्थ इसके बीच कहीं-कहीं आता है जग्गू और भग्गू की कथा के रूप में और हमें किसी फ़्लैश लाइट की तरह हिट करता है।
और इसके लिये ’शांघाई’ की पटकथा लेखक उर्मि जुवेकर और संपादक नम्रता राव का कुशल काम रास्ता बनाता है। फ़िल्म यह कहकर नहीं करती, बल्कि बार-बार, हर निर्णायक क्षण में दो समांतर दृश्यों की ’क्रिस-क्रॉस’ एडिटिंग द्वारा इसे संभव बनाती है। देखिए कैसे भग्गू की कथा के दृश्य सत्ता की सौदेबाज़ियों के ठीक बीच में पिरोये गए हैं और आपको बिना कुछ बोले देखने का दूसरा नज़रिया देते हैं। जहाँ हॉस्पिटल में प्रसारित होते अरुणा अहमदी की प्रेस कॉंफ़्रेंस का दृश्य है और केन्द्रीय सत्ता की उनसे सौदेबाज़ी है, वहीं ठीक बीच में एक समांतर दृश्य आता है। जेल में बन्द एक कथित ’हत्यारा’ अपने परिवार का पेट कैसे भरे, इसके अंधेरे रास्तों पर भटक रहा है। आखिर में भी गौरी के घर शालिनी का और हम सबका सच से आत्मसाक्षात्कार पिरोया गया है उस समांतर दृश्य के साथ जहाँ सत्ता की साक्षात प्रतिनिधि मुख्यमंत्री (सुप्रिया पाठक) के गर्भग्रह में सभी सत्ता के लिए असुविधाजनक सवालों को अनुकूलित किया जा रहा है। यही पटकथा और संपादन की कुशल तकनीक फ़िल्म के किसी सामान्य से लगते वार्तालाप को देखने का दूसरा नज़रिया देती है और दृश्य के अर्थ बदल जाते हैं।
दिबाकर का दर्शक कौन है, वे इस तथ्य को जानते हैं और इसीलिए उनका सिनेमा सचेत सिनेमा है। पिछली फ़िल्मों की तरह यहाँ भी वो अपने दर्शक से बाकायदा ’धोखा’ करते हैं और फिर ’पॉलिटिकल थ्रिलर’ कहकर मध्यवर्ग को उसकी ही ज़िन्दगियों के दोगलेपन से रूबरू करवाने लगते हैं। लोगों की दिक्कत उनसे यह है कि वे तो अपने नायकों को भी नहीं बक्शते। चार्टर्ड प्लेन से आया क्रांतिकारी आन्दोलनकर्ता जब शलिनी को जबरन थाने ले जाने की बात कर रहे स्थानीय पुलिसवालों को धमकाता है तो उनका और अपना वर्गभेद साफ़ करता है। बेशक, यहाँ वह सही की तरफ़ खड़ा है लेकिन यहाँ भी एक पावरगेम है जिसे दिबाकर का सिनेमा कभी नज़रअन्दाज़ नहीं करता। अहमदी का किरदार सही की तरफ़ है लेकिन उसमें सदा ’पॉलिटिकली करेक्ट’ होने की चाहत नहीं। और इसीलिए यह ’आदर्श’ नहीं, जीता-जागता किरदार है। और यही अद्भुत नज़रिये में बहुवचन का दिबाकरी खेल हमें उस अंतिम दृश्य तक पहुँचाता है जिसे वरुण ने अपने शानदार आलेख में ’फ़िल्म की आत्मा’ कहा है। इस दृश्य की शुरुआत में एक ओर हमारी नायिका है, हत्यारी व्यवस्था द्वारा शोषित और शिकार तथा दूसरी ओर स्वयं हत्यारा है। और फ़िर फ़िल्म हमें देखने का ’अन्य’ नज़रिया देती है और जैसे सारा नक्शा ही बदल जाता है। फ़िल्म का एक संवाद नज़रिया उलट देता है और उसी दृश्य में जब शालिनी बोलती है ’तुम लोग’, हम शालिनी को शोषणकारी वर्ग का हिस्सा बनते और जग्गू को व्यवस्था के असली शिकार के रूप में देख पाते हैं तो यह दुर्लभ है। यह ’अन्य’ का नज़रिया सिनेमा तो क्या साहित्य और किसी भी रचनात्मक कला में विरल है और जब भी मिलता है रचना को भिन्न स्तर पर ले जाता है।
जग्गू या गौरी या भग्गू फ़िल्म में तभी आते हैं जब वे हमारे किरदारों की कथाओं को ओवरलैप करते हैं। ठीक वैसे जैसे वो हमारी ज़िन्दगियों में आते हैं। किसी उपकथा की तरह। क्या वो इस कथा की उपकथा हैं? नहीं। वो इस कथा की मुख्य कथा हैं। ठीक वैसे ही जैसे अनुषा रिज़वी की ’पीपली लाइव’ में मुख्य कथा मिनट भर को आने वाले होरी की कथा थी। और याद है, उस फ़िल्म में आए मीडिया ने भी कभी उस कथा को मुख्य कथा नहीं माना था। मैंने तब इन्हीं कथादेश के पन्नों पर लिखा था कि ’पीपली लाइव’ में आया मुख्यधारा मीडिया दरअसल हम हैं। इस देश का ’ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास’। ’शांघाई’ में वो महान चिंतित मिडिल क्लास सिनेमा के परदे के सामने बैठा है। वही तय कर रहा है कि इस फ़िल्म में ’जनता’ नहीं है। इस फ़िल्म में ’प्रतिरोध’ नहीं है। इस फ़िल्म में ’विकल्प’ नहीं है। और इसलिए यह फ़िल्म सच्चे अर्थों में एक ’क्रांतिकारी’ फ़िल्म नहीं है।
हाँ, ’शांघाई’ एक क्रांतिकारी फ़िल्म नहीं है। लेकिन कोई मुझे बताए कि जैसा हमारा मध्यवर्ग आज है, जैसा उसका चरित्र है, क्या उसे लेकर कोई क्रांतिकारी फ़िल्म बनाई जा सकती है? ऐसी फ़िल्म जो क्रांति की बात भी करे और ईमानदार भी बनी रहे। आज हम जिस दोगलेपन में जी रहे हैं, अपने ही वृहत्तर समाज से योजनाबद्ध तरीके से जिस अलगाव को हमने निभाया है, हमें सिर्फ़ आईना दिखाया जा सकता है। और वही ’शांघाई’ करती है। और अगर वह आईना सच्चा है तो उसमें ’विकल्प’ नहीं दिखेगा, सिर्फ़ हमारा भद्दा दोमुहाँपन दिखेगा।
’शांघाई’ वो करती है जो उसे करना चाहिए। या जो वो अधिकतम कर सकती है। वो अपने दर्शक को पहचानती है और उसे उसकी असलियत दिखाती है, आईना दिखाती है। एक ’चिंतित दिखने’ का ठोंग करते मध्यवर्ग को बताती है कि तुमने बेशक पढ़ा हो कि तुम्हारे आस-पास कैसा अन्याय हो रहा है, बेशक तुम ’सब जानने’ का दंभ भरते हो, वास्तव में तुम इस व्यवस्था के सबसे प्रिय अंधे हो। इस देश की अस्सी प्रतिशत जनता अपनी ज़िन्दगी में ’रोज़’ क्या झेलती है, इस व्यवस्था का ’असल’ चेहरा कैसा है, तुम्हें धेला पता नहीं है। या शायद यह कि ’पता होना’ और खुद उस स्थिति में होना दो नितांत भिन्न अवस्थाएं हैं और पहली अवस्था दूसरी को समझने में उतनी ही नाकाफ़ी है जितना उस अंतिम ’फ़िल्म की आत्मा’ वाले दृश्य में शालिनी की शहरी नागरिक समाज वाली समझदारी गौरी, जग्गू और उसके परिवार की स्थिति को समझने में नाकाफ़ी साबित होती है।
मैं फ़िर कह रहा हूँ। आज का मुख्यधारा सिनेमा, ’बॉलीवुड’ एक नितांत इकहरी सी व्यवस्था है जहाँ हाशिए के लोगों का प्रवेश अलिखित तौर पर वर्जित है। यह उच्चवर्ग और मध्यवर्ग का सिनेमा है और इससे किसी हाशिए की कथा का वाहक बनने की उम्मीद करना बेमानी है। उससे सर्वहारा पर ’स्वानुभूति’ वाली फ़िल्म की उम्मीद करना बेमानी है। वो होगी भी तो कभी ईमानदार फ़िल्म नहीं हो सकती। यहाँ आप अधिक से अधिक ’प्रेमचंद’ हो सकते हैं (जो शायद दिबाकर हुए हैं), ओमप्रकाश वाल्मिकी कभी नहीं। शायद आगे बने, अभी व्यवस्था में इसकी गुंजाईश नहीं है। इसके मूल में जो आर्थिक व्यवस्था काम कर रही है वो सीधे बाज़ार आधारित है और उसका दर्शक सिर्फ़ इस देश का ऊपरी पन्द्रह-बीस प्रतिशत तबका है। अरे जहाँ हाशिए के समूहों, दलितों, महिलाओं की संख्या गिनती की हो और वो भी व्यवस्था की शर्तों पर हो उस व्यवस्था से हाशिए की कथाओं की उम्मीद कैसे? अगर आपको हाशिए की कथाएं अपनी मूल आवाज़ में सुननी हैं तो मुख्यधारा सिनेमा से बाहर निकलना होगा। वे आपको मिलेंगी उन वृत्तचित्रों में जिन्हें सरकार प्रतिबंधों के तमगे देती है। वे आपको मिलेंगी उन राजनौतिक – सांस्कृतिक समूहों में जिन्हें ’माओवादी’ का ठप्पा लगा ठिकाने लगाने की कोशिश है। वे आपको मिलेंगी उन पर्चों, पैम्फ़लेटों, डायरियों और लघु पत्रिकाओं में जिन्हें लिखने और छापने वाले मानवाधिकार समूह, सांस्कृतिक समूह या तो गिरफ़्तार हैं या अपनी जान बचाते घूम रहे हैं। वे आपको मिलेंगी उन मूल रचनाओं में जिन्हें क्षेत्रीय का तमगा देकर पहले ही किनारे कर दिया गया है।
मुझे खुद दिबाकर का कहा ही याद आता है। जब उन्होंने जेएनयू में कहा था कि “भारतमाता की जय” गीत दरअसल गुस्से से भरा व्यंग्य है और उनके हिसाब से हमारे वर्तमान में गर्व करने लायक कुछ नहीं, तो किसी छात्र ने पलटकर पूछा था कि आखिर आपको यहाँ ’भारत माता’ पर व्यंग्य करने वाला गीत रचने, सुनाने का मौका मिला, ’शांघाई’ जैसी आलोचनात्मक फ़िल्म बनाने, सार्वजनिक रूप से दिखाने का मौका मिल रहा है, क्या यह अपने आप में गर्व की बात नहीं? और उन्होंने जवाब में कहा था कि मैं तो व्यावसायिक फ़िल्मकार हूँ, उन्हें मालूम है कि मैं चाहे अपनी फ़िल्म में कितनी ही क्रांतिकारी बातें कर लूँ, अन्त में मुझे शुक्रवार को कुछ टिकट बिक जाने की कामना में सबकुछ करना है। लेकिन इसी देश में बहुत सी फ़िल्में ऐसी हैं जिन्हें प्रदर्शन से रोका जाता है। इसी देश में बहुत सी किताबें ऐसी हैं जिन्हें प्रतिबंधित किया जाता है। वो महत्वपूर्ण फ़िल्में हैं, वो महत्वपूर्ण किताबें हैं। और यह असल चिंता की बात है। अगर हमें अपनी आज़ादी बचानी है तो उन अंधेरे कोनों पर सदा सवाल उठाते रहना होगा।
गौर से देखिए, ’शांघाई’ में ऐसे कितने दृश्य और प्रसंग हैं जहाँ कथा के बीच ही कोई अप्रासंगिक सा लगता विचलन वाला किरदार है। वो हमारे आईएएस अधिकारी की कार चलाता ड्राइवर है या अस्थायी जांच कमीशन बने सरकारी स्कूल के कमरे को झाड़ता, बरामदे पर पोंचा लगाता सफ़ाई कर्मचारी है या ट्रेडमिल पर भागते अधिकारी की सेवा में पानी की बोतल और फ़्रूट लेकर खड़ा कोई आदमी है या दीवार पर पेंट करता कोई मज़दूरों का जोड़ा है या विशाल और सूखा स्विमिंगपूल बुहारता मज़दूर है। वह सदा कोई सर्वहारा है और वो आपकी कथा में कभी प्रवेश नहीं कर पाता। लेकिन वो सदा वहाँ मौजूद है। यही ’शांघाई’ है। उसे आपकी नज़र चाहिए। कि आप समझें कि जो जाम में फंसा बेनाम ड्राइवर अपने बॉस को बता रहा है कि यहीं हत्या हुई थी और यह मोर्चा वाले हैं और कि वो भी यहीं रहता था लेकिन इन मोर्चा वालों के आने के बाद उसे बहुत दूर जाना पड़ा, वही ड्राइवर इस फ़िल्म की मुख्य कथा है। कि जब हमारी नायिका अपनी नौकरानी को किसी ’अदृश्य बदले’ के तहत कल से काम पर ना आने को कह रही है तो ठीक उसके पीछे एक वृद्धा को उसके घर-चौबारे से बेदखल किया जा रहा है, यही ’शांघाई’ की मुख्य कथा है। कि उस चमत्कारिक फ़्रेम में जहाँ कौल ट्रेडमिल पर दौड़ रहे हैं और सीएम का फ़ोन आता है, वहीं शीशे के तीन प्रतिबिबों में सत्ता के तीन दृश्य-अदृश्य स्तरों के बीच खड़ा वह अनाम सर्वहारा पात्र इस फ़िल्म की मूल कथा है। कि आप उसे पहचानें। कि आप समझें कि इन किरदारों की कहानी असल कहानी है जो इस एक चमचमाती मौत के पीछे लोगों की ज़िन्दगियों में रोज़ घट रही सच्चाई है। इतनी भयावह लेकिन इतनी आम कि उसे हम अब कथा ही नहीं मानते।
मैंने लिखा, फिर कह रहा हूँ, कृष्णन से आईडेंटिफ़ाई करती दर्जन भर पोस्ट, कमेंट, अपडेट्स मैं पढ़ चुका हूँ। लेकिन दिबाकर की सुनाई उस शुरुआती कथा का असल मतलब मैं अब ही समझ पाया हूँ। वो चाबी भी जिसे वे खुद उस कथा के माध्यम से हमें दे रहे हैं इस ’शांघाई’ का ताला खोलने के लिए। लेकिन मैं अभी भी उस पहली पोस्ट के इन्तज़ार में हूँ जो ’शांघाई’ में सदा मौजूद इन सर्वहारा किरदारों की बात करे, इन्हें पहचाने। वे किरदार जो ’शांघाई’ में सदा मौजूद हैं। वे आपसे, हमसे और फ़िल्म की मुख्य कथा लगते मध्यवर्गीय किरदारों से कहीं ज़्यादा अच्छी तरह से इस व्यवस्था को जानते हैं। क्योंकि यह व्यवस्था उनके लिए दैनंदिन का भोगा हुआ यथार्थ है। वे किरदार जो एक ही शहर में तीन-तीन बार विस्थापित किये जाते हैं। उनका एक प्रतिनिधि जग्गू आपके और हमारे सीधे ’मुँह पर’ है और सिर्फ़ इसीलिए हम उसकी बात करते हैं। लेकिन बाक़ी ’अन्य’। क्या यह सच नहीं कि वे अन्य हमारी, हम शहरी मध्यवर्ग की आँख से अब दिखने ही बन्द हो गए हैं? क्योंकि उनका त्रास, उनका विस्थापन हमारी आँखों के सामने ’घटना’ बनकर नहीं आता। अब न वे हमें अपने आस-पास दिखते हैं और न फ़िल्म में। यह सच्चाई है हमारी। ’शांघाई’ सिर्फ़ हमें यह सच्चाई सबूत के साथ बताती है।
अगर अभी तक उस पाठ को फ़िल्म में नहीं पढ़ा गया है तो यह फ़िल्म से ज़्यादा हमारे बारे में, फ़िल्म की दर्शकदीर्घा के बारे में बताता है।

Tuesday, June 19, 2012

शांघाई, जबरदस्त पॉलिटिकल थ्रिलर-सौरभ द्विवेदी

हमेशा शिकायत रहती थी कि एक देश भारत, और उसका सिनेमा खासतौर पर बॉलीवुड ऐसा क्यों है। ये देश है, जो आकंठ राजनीति में डूबा है। सुबह उठकर बेटी के कंघी करने से लेकर, रात में लड़के के मच्छर मारने की टिकिया जलाने तक, यहां राजनीति तारी है। मगर ये उतनी ही अदृश्य है, जितनी हवा। बहुत जतन करें तो एक सफेद कमीज पहन लें और पूरे दिन शहर में घूम लें। शाम तक जितनी कालिख चढ़े, उसे समेट फेफड़ों पर मल लें। फिर भी सांस जारी रहेगी और राजनीति लीलने को। ये ताकत मिलती है आदमी को सिनेमा से। ये एक झटके में उसे चाल से स्विट्जरलैंड के उन फोटोशॉप से रंगे हुए से लगते हरे मैदानों में ले जाती है। हीरो भागता हुआ हीरोइन के पास आता है, मगर धड़कनें उसकी नहीं हीरोइन की बेताब हो उठती-बैठती दिखती हैं कैमरे को। ये सिनेमा, जो बुराई दिखाता है, कभी हीरोइन के पिता के रूप में, कभी किसी नेता या गुंडे के रूप में और ज्यादातर बार उसे मारकर हमें भी घुटन से फारिग कर देता है। मगर कमाल की बात है न कि आकंठ राजनीति में डूबे इस देश में सिनेमा राजनैतिक नहीं हो सकता। और होता भी है, मसलन प्रकाश झा की फिल्म राजनीति में, तो ये चालू मसालों में मसला हुआ लगता है।
शंघाई सिनेमा नाम के शहर में पहनी गई सफेद चादर है। कोरी, बाजार की नीयत से कदाचित बची और इसीलिए ये राजनीति की कालिख को भरपूर जगह देती है खुद में। इसमें दाग और भी उजले नजर आते हैं। और ये तो इस फिल्म के डायरेक्टर दिबाकर बैनर्जी की अदा है। खोसला का घोसला, लव सेक्स और धोखा में यही सब तो था, बस रिश्तों, प्यार और मकान की आड़ में छिपा। इस बार पर्दा खुल गया, लाइट जल गई और सब कुछ नजर आ गया। शंघाई पीपली लाइव का शहरी विस्तार है। वहां विकास खैरात में पहुंचता है और यहां सैलाब के रूप में। हर भारत नगर नाम की गंदी बस्ती को एक झटके में चमक के ऐशगाह में, कंक्रीट के बैकुंठ लोक में तब्दील करने की जिद पाले। इसमें सब आते हैं बारी बारी, अपने हिस्से का नंगा नाच करने। कुछ ब्यूरोक्रेट, नेता, भाड़े के गुंडे, उन गुंडों के बीच से गिरी मलाई चाटने को आतुर आम चालाक आदमी और व्यवस्था से लगातार भिड़ते कुछ लोग, जिन्हें बहुमत का बस चले, तो म्यूजियम में सेट कर दिया जाए। मगर फिल्म अंत तक आते आते सबके चेहरों पर वैसे ही कालिख पोतती है, जैसे फिल्म की शुरुआत में एक छुटभैया गुंडा भागू एक दुकानदार के मुंह पर मलता है। ये बिना शोर के हमें घिनौने गटर का ढक्कन खोल दिखा देती है, उस बदबू को, जिसके ऊपर तरक्की का हाईवे बना है।
क्यों देखें ये फिल्म
- जबदस्र्त कास्टिंग के लिए। इमरान को जिन्होंने अब तक चुम्मा स्टार समझा था, वे उसके कत्थे से रंगे दांत और तोंद में फंसी चिकने कपड़े की शर्ट जरूर देखें। उसका दब्बूपन देखें। सिने भाषा का नया मुहावरा गढ़ते हैं वह। अभय ने कंपनी के पुलिस कमिश्नर बन मोहनलाल की याद दिला दी। इस तुलना से बड़ी शाबासी और क्या हो सकती है उनके लिए। सुप्रिया पाठक हों या फारुख शेख, सबके सब अपने किरदार की सिम्तें, चेहरे और डायलॉग से खोलते नजर आते हैं। इससे फिल्म को काली सीली गहराई मिलती है, जिसके बिना इसकी अनुगूंज कुछ कम हो जाती। कल्कि एक बार फिर खुद को दोहराती और इसलिए औसत लगी हैं। पित्तोबाश के बिना ये पैरा अधूरा होगा। भागू का रोल शोर इन द सिटी की तर्ज पर ही गढ़ा गया था, फिर भी इसमें ताजगी थी।
- फिल्म की कहानी 1969 में आई फ्रेंच फिल्म जी से प्रेरित है। ये फ्रेंच फिल्म कितनी उम्दा और असरकारी थी इसका अंदाजा इससे लगाएं कि इसे उस साल बेस्ट फॉरेन फिल्म और बेस्ट पिक्चर, दोनों कैटिगरी में नॉमिनेशन मिले थे। बहरहाल, फिल्म सिर्फ प्रेरित है और भारत के समाज और राजनीति की महीन बातें और उनको ठिकाना देता सांचा इसमें बेतरह और बेहतरीन ढंग से आया है। डायलॉग ड्रैमेटिक नहीं हैं और सीन के साथ चलते हैं।
- कैमरा एक बार फिर आवारा, बदसलूक और इसीलिए लुभाता हुआ है। फर्ज कीजिए कुछ सीन। डॉ. अहमदी अस्पताल में हैं। उनकी बीवी आती है, वॉल ग्लास से भीतर देखती है और उसे ग्लास पर उसे अपने पति के साथ उसके  एक्सिडेंट के वक्त रही औरत का अक्स नजर आता है। या फिर एक लाश किन हालात में सड़क किनारे निपट अकेली खून बहाती है, इसे दिखाने के लिए बरबादियों को घूमते हुए समेटता कैमरा, जो कुछ पल एक बदहवास कॉन्स्टेबल पर ठिठकता है और फिर उस नाली को कोने में जगह देता है, जहां एक भारतीय का कुछ खून बहकर जम गया है।
- फिल्म का म्यूजिक औसत है। अगर अनुराग की भाषा में कहें, तो दोयम दर्जे का है। भारत माता की जय के कितने भी आख्यान गढ़े जाएं, ये एक लोकप्रिय तुकबंदी भर है, दुर्दैव के दृश्य भुनाने की भौंड़ी कोशिश करती। इसमें देश मेरा रंगरेज रे बाबू जैसी गहराई नहीं। इंपोर्टेड कमरिया भी किसी टेरिटरी के डिस्ट्रीब्यूटर के दबाव में ठूंसा गाना लगता है। विशाल शेखर भूल गए कि इस फिल्म के तेवर कैसे हैं। दिबाकर को स्नेहा या उसी के रेंज की किसी ऑरिजिनल कंपोजर के पास लौटना होगा।
क्या है कहानी
किसी राज्य की सत्तारूढ पार्टी भारत नगर नाम के स्लम को हटाकर वहां आईटी पार्क बनाना चाहती है। वहां प्रसिद्ध समाज सेवक डॉ. अहमदी पहुंचते हैं गरीबों को समझाने कि विकास के नाम पर उनसे धोखा किया जा रहा है। सत्ता पक्ष को ये रास नहीं आता और अहमदी को जान से मारने की कोशिश होती है। राजनीति शुरू होती है, जिसके घेरे में आते हैं करप्शन के नाम पर जेल में फंसे जनरल सहाय की बेटी शालिनी, चीप फोटोग्राफर जग्गू और इस मामले की जांच करते आईआईटी पासआउट आईएएस ऑफीसर कृष्णन। कौन आएगा लपेटे में और क्या होगा आखिर में, इसके लिए आप फिल्म देखें और दुआ दें कि ठीक किया नहीं बताया कि आखिर में क्या है।
साढ़े तीन स्टार

जनसंघर्षों के साथ भद्दा मजाक है शांघाई-समर अनार्य

Imageशांघाई शहर नहीं एक सपने का नाम है. उस सपने का जो पूंजीवाद के नवउदारवादी संस्करण के वैश्विक नेताओं की आँखों से धीरे धीरे विकासशील देशों में मजबूत हो रहे दलाल शासक वर्गों की आँखों में उतर आया है. उस सपने का भी जिसने नंदीग्राम, नोएडा और खम्मम जैसे हजारों कस्बों के सादे से नामों को हादसों के मील पत्थर में तब्दील के लिए इन शासक वर्गों ने हरसूद जैसे तमाम जिन्दा कस्बों को जबरिया जल समाधि दे दी.

क्या है यह सपना फिर? यह सपना है हमारे खेतों, खलिहानों के सीने में ऊँची ईमारतों के नश्तर उतार उन्हें पश्चिमी दुनिया की जरूरतों को पूरा करने वाले कारखानों में तब्दील कर देना. यह सपना है हमारे किसानों को सिक्योरिटी गार्ड्स में बदल देने का. यह सपना है हमारे देशों को वैश्विक बाजारवादी व्यवस्था के जूनियर पार्टनर्स में बदल देने का.

पर फिर, दुनिया के अब तक के इतिहास में कोई सपना अकेला सपना नहीं रहा है. हर सपने के बरक्स कुछ और आँखों ने आजादी, अमन और बराबरी के सपने देखे हैं और अपनी जान पे खेल उन्हें पूरा करने के जतन भी किये हैं. वो सपने जो ग्राम्शी को याद करें तो वर्चस्ववाद (हेजेमनी) के खिलाफ खड़े हैं. वे सपने जो लड़ते रहे हैं, रणवीर सेनाओं के खिलाफ खड़े दलित बहुजन भूमिहीन किसानों के सशस्त्र प्रतिरोधों से लेकर नर्मदा बचाओं आंदोलन जैसे अहिंसक लोकतान्त्रिक आन्दोलनों तक की शक्ल में.

बाहर से देखें तो लगेगा इन सपनों और इनके लिए लड़ने वाले जियालों का कुल जमा हासिल तमाम मोर्चों पर हार है. आप नर्मदा घाटी में लड़ते रहें, बाँध ऊंचा होता जाएगा. आप नंदीग्राम में लड़ते रहें, जमीनें छीनी जाती रहेंगी. पर थोड़ा और कुरेदिये और साफ़ दिखेगा कि मोर्चों पर मिली इन्ही हारों से मुस्तकबिल की जीतों के रास्ते भी खुले हैं. उन सवालों की मार्फ़त जो इन लड़ाइयों ने खड़े किये, उस प्रतिरोध की मार्फ़त जिसने हुक्मरानों को अगली बार ऐसा कदम उठाने से पहले दस दस बार सोचने को मजबूर किया. हम भले एक नर्मदा हार आये हों, शासकों की फिर कोई और बाँध बनाने की हिम्मत न होना जीत नहीं तो और क्या है?

यही वह जगह है जहाँ दिबाकर बनर्जी की फिल्म शांघाई न केवल बुरी तरह से चूकती है बल्कि संघर्ष के सपनों के खिलाफ खड़े शांघाई के सपनों के साथ खड़ी दीखती है. इस फिल्म ने भूमि अधिग्रहण, एसईजेड्स जैसे सुलगते सवालों का सतहीकरण भर नहीं बल्कि सजग दर्शकों के साथ एक भद्दा मजाक भी किया है.

याद करें कि हिन्दुस्तान के किस शहर को शांघाई बना देने के सपनों के साथ उस शहर का गरीब तबका खड़ा है? भारतनगर की झुग्गी झोपड़ियों से निकलने वाले भग्गू जैसे लोग किस शहर में रहते हैं भला? हम तो यही जानते हैं कि रायगढ़ हो या सिंगूर इस मुल्क का कोई किसान अपने खेतों, गाँवों, कस्बों की लाश पर शांघाई बनाने के खिलाफ लड़ रहा है, उसके साथ नहीं. फिर बनर्जी साहब का भारतनगर कहाँ है भाई? और अगर कहीं है भी तो इन भग्गुओं के पास कोई वजह भी तो होगी. क्या हैं वह वजहें?

पूछने को तो उन हजार संयोगों पर भी हजार सवाल पूछ सकता हूँ जो इस फिल्म में ठुंसे हुए से हैं. जैसे अहमदी की हत्या की साजिश में शालिनी (उनकी प्रेमिका) की नौकरानी के पति की केन्द्रीय भूमिका होने का संयोग. जैसे जोगी और उसके दोस्त द्वारा इत्तेफाकन अहमदी की हत्या की साजिश रिकार्ड कर लेना, बावजूद इस सच के की जब फोन टेप्स ही प्रामाणिक सबूत नहीं माने जाते तो एक मुख्यमंत्री द्वारा किये गए फोन की रिकार्डिंग इतना बड़ा सबूत कैसे बन जाते हैं.

फिर भी इतना तो पूछना बनता ही है कि कौन है वह एक्टिविस्ट जो चार्टर्ड जहाज से उतरते हैं, वह भी एक सिने तारिका के साथ? क्या इतिहास है उनका? संघर्षों के सर्टिफिकेट भले न बनते हों, संघर्षों की स्मृतियाँ लोकगाथाओं सी तो बन ही जाती हैं. और ये (किस मामले में) जेल भेज दिए गए एक जनरल की रहस्यमयी सी बेटी कौन है? उसे डिपोर्ट करने की नोटिस क्यों आती है? और अगर नोटिस आती है तो काफी ताकतवर से लगते अहमदी साहब के उस ‘हादसे’ में घायल हो जाने के बाद सरकार उसे डिपोर्ट कर क्यों नहीं देती?

और हाँ, यह भारतनगर हिन्दुस्तान के किस इलाके में पड़ता है जहाँ किसी विपक्षी राजनैतिक दल की प्रतीकात्मक उपस्थिति तक नहीं है. बेशक इस देश में कुछ इलाके ऐसे हैं जहाँ माफिया-राजनैतिक गठजोड़ के चलते प्रतिपक्ष की राजनीति मुश्किल हुई है पर बिलकुल खत्म? यह सिर्फ दिबाकर बनर्जी के भारत नगर में ही हो सकता है. और ये जोगी? वह आदमी जो दूसरी जाति के प्रेमिका के परिवार वालों के दौड़ाने पर लड़ने और भागने में से एक का चुनाव कर इस शहर में पंहुचा है दरअसल कौन है? क्या है जो उसे अंत में लड़ने की, जान पर खेल जाने की प्रेरणा देता है? शालिनी उर्फ कल्कि का यह पूछ लेना कि ‘खत्म हो गयी राजपूत मर्दानगी’?

कोई कह ही सकता है कि फ़िल्में तो बस समाज का सच ही दर्ज करती है पर फिर प्रकाश झा के साधू यादव और तबरेज आलमों की मर्दानगी भी तो याद आ सकती थी शालिनी को? यह सत्या के सत्या जैसी जातिविहीन सी मर्दानगी? फिर उसे राजपूती मर्दानगी ही क्यों याद आई? रही बात जोगी कि तो उसे तो जागना ही था. भले ही वह भाई जैसे दोस्त की मौत की वजह से हो या इस मर्दानगी की वजह से.

एक ईमानदार अफसर भी है इस फिल्म में. वह इतना ईमानदार है कि लगभग बदतमीजी कर रहे पुलिस अधिकारी को डांट भी नहीं पाता. उसे एक के बाद एक हो रही मौतों के तार जुड़ते नहीं दीखते. पर अब उस अफसर को भी क्या कोसना जब इतने बड़े, चार्टर्ड प्लेन से चलने वाले एक्टिविस्ट की ऐसी संदिग्ध अवस्था में हुई मौत की सीबीआई जांच की मांग तक मुश्किल से ही सुनने में आती है. उस देश में, जहाँ किसी भी सामाजिक कार्यकर्ता की हत्या की प्रतिक्रिया इतनी हल्की तो नहीं ही होती.

यह न समझें कि मैंने इस फिल्म को प्रशंसात्मक नजरिये से देखने की कोशिश नहीं की. काफी कोशिश की झोल के अंदर भरी जरा जरा सी कहानी को लिटरेरी डिवाइस, ट्रोप्स, या ऐसे कुछ अन्य सिने सिद्धांतों से भी देखने की कोशिश की, कि कहीं से तारीफ़ के कुछ नुक्ते समझ आयें. आखिर तमाम फिल्म समीक्षक यूं ही तो इस फिल्म को चार, साढ़े चार और पांच स्टार तो नहीं दे रहे होंगे. पर एक तो ऐसा कुछ समझ आया नहीं, और फिर न्याय का रास्ता एक प्रतिद्वंदी कारपोरेट टायकून से निकलता दिखा तो बची खुची हिम्मत भी टूट गयी. लगा कि काश किसी मेधा पाटकर को भी एक अदद जग्गू, एक अदद कृष्णन और एक अदद बड़ा उद्योगपति मिल जाता, फिर तो बस न्याय ही न्याय होता.

तमाम किरदारों के अभिनय के लिए बेशक इस फिल्म की तारीफ़ की जानी चाहिए पर फिर फ़िल्में, वह भी सरोकारी दिखने का प्रयास करने वाली फिल्मों के लिए अभिनय ही तो सब कुछ नहीं होता. खास तौर पर तब जब यह एक व्यावसायिक फिल्म हो और फिर भी इसमें नॅशनल फिल्म डेवेलपमेंट कार्पोरेशन के रास्ते भारतीय करदाताओं का पैसा भी लगा हो.

सत्‍यमेव जयते-7 : घरेलू हिंसा की त्रासदी-आमिर खान

बेशकीमती हैं बच्चियांअगर हमारे समाज का कोई वर्ग दूसरे वर्ग पर हमले करने लगे तो पुलिस इसे दंगा करार देती है, रैपिड एक्शन फोर्स तलब कर ली जाती है और हिंसा के शिकार लोगों की सहायता के लिए उचित कदम उठाते हुए तुरंत सरकारी मशीनरी सक्रिय हो जाती है और जरूरतमंदों को हिंसा से बचाती है। इसके बाद सरकार शरणार्थी शिविर तैयार कर प्रभावितों को पुनस्र्थापित करती है। जब हमने घरेलू हिंसा पर शोध किया तो ठीक यही स्थिति घरों में भी देखने को मिली। हमारे समाज का एक वर्ग दूसरे वर्ग की पिटाई करता है, उस पर हमले करता है। ये गृहयुद्ध सरीखे हालात हैं। अंतर महज इतना है कि घरों में उत्पीड़न का शिकार होने वाली महिलाओं को बचाने के लिए रैपिड एक्शन फोर्स तैनात नहीं की जाती। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा योजना आयोग द्वारा दो अलग-अलग अध्ययनों से खुलासा होता है कि 40 फीसदी से 80 फीसदी के बीच महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हैं। हम इसके औसत को कुछ कम करते हुए 50 फीसदी मान सकते हैं। यह भी विशाल आंकड़ा है। यानी हर दो महिलाओं में से एक महिला की पति या बेटों द्वारा पिटाई होती है। खेद की बात है कि यह आंकड़ा पुरुषों के बारे में कोई अच्छा संदेश नहीं देता। हमारी सोच ऐसी क्यों बनी कि हम महिलाओं की पिटाई को अपना अधिकार मान बैठे हैं? और इस सोच के पीछे क्या कारण है कि वर्षो से पिटती आ रही बड़ी संख्या में महिलाएं इसे अपनी नियति मान स्वीकार कर लेती हैं? फिर से, इसके पीछे पितृसत्तात्मक सोच काम कर रही है। यह तथ्य चौंकाने वाला है कि इस पितृसत्तात्मक सोच के कारण समाज को कितनी परेशानियां झेलनी पड़ती हैं। 
सत्यमेव जयते के दो साल के हमारे शोध और 13 विषयों को समझने की यात्रा में पितृसत्तात्मक सोच एक ऐसा साझा पहलू था, जो बार-बार हमारे सामने खलनायक के रूप में आकर खड़ा हो जाता था। और जैसाकि इस एपिसोड की हमारी विशेषज्ञ कमला भसीन ने रेखांकित किया कि इसी समाज से संबद्ध होने के कारण महिलाएं भी इसी सोच का अंग बन जाती हैं..। पितृसत्तात्मक सोच के अनुसार पुरुष महिलाओं से श्रेष्ठ हैं! पुरुष मालिक हैं! वे तय करेंगे कि महिलाओं के लिए हितकर क्या है! पुरुष अपनी मर्जी से महिलाओं के जीवन को नियंत्रित करेंगे!!! इसी सोच के कारण भ्रूण हत्याएं होती हैं, नवजात लड़कियों की हत्या कर दी जाती है, परवरिश में लड़कियों के साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है, उन्हें शिक्षा से वंचित कर दिया है या फिर उसकी शिक्षा पर कम ध्यान दिया जाता है। इसके बजाय उसे केवल घरेलू कार्य सिखाए जाते हैं और इस दौरान लड़कियां हमेशा मार खाती हैं। 
इसी पितृसत्तात्मक सोच के तहत बाल विवाह, दहेज प्रथा, विधवाओं के साथ भेदभाव और संपत्ति में असमान हिस्सेदारी जैसी समस्याएं भी पैदा होती हैं। महिलाओं का सशक्तीकरण तो छोडि़ए, हम उनका अशक्तीकरण कर रहे हैं और त्रासदी यह है कि यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। आइए, महिलाओं की पिटाई को जायज ठहराने वाले कुछ बहानों पर नजर डालें। मैं बेहद गुस्सैल हूं, जीवन में बड़ी समस्याएं और तनाव है, जिस कारण पत्नी पर हाथ उठ जाता है। अगर ऐसा है तो आप ऑफिस में अपने बॉस पर हाथ क्यों नहीं उठाते? केवल अपनी पत्नी को ही क्यों पीटते हैं। आप अपने बॉस को इसलिए नहीं मारते, क्योंकि अगर आप ऐसा करते हैं तो आपका बॉस आपके खिलाफ उचित कार्रवाई करेगा। क्या महिलाएं इन दलीलों को सुन रही हैं? कुछ पुरुषों की दलील है, मैं अपनी पत्नी की पिटाई इसलिए करता हूं, क्योंकि मैं उसे बेहद प्यार करता हूं। कुल मिलाकर घरों में एक प्रकार के गृहयुद्ध की स्थिति नजर आती है। भाई बहनों को प्रताडि़त कर रहे हैं, पिता अपनी बेटियों को निशाना बना रहे हैं, पति पत्नियों को पीट रहे हैं और हद तो यह है कि कुछ मामलों में बेटे अपनी मां पर हमले कर रहे हैं। हमारे विशेषज्ञ यह बताते हैं कि एक बार जब घरेलू हिंसा आरंभ हो जाती है तो प्रत्येक घटना के बाद यह बद से बदतर होती जाती है और यह सिलसिला तब तक नहीं रुकता जब तक आप खुद इसे न रोकें। महिलाओं को कहना होगा-अब वे इसे बर्दाश्त नहीं कर सकतीं। भारत में घरेलू हिंसा के खिलाफ काफी मजबूत कानून है और यह सभी महिलाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है कि वे इससे परिचित हों कि यह कानून क्या कहता है? घरेलू हिंसा से महिलाओं को संरक्षण देने वाला कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि महिलाओं को उस घर में रहने का पूरा अधिकार है जिसे पारिवारिक घर कहा जाता है। अक्सर महिलाओं के मन में यह साझा भय होता है कि उन्हें उनके घर से निकाल बाहर किया जाएगा। यह कानून इस मामले में महिलाओं को पूरा संरक्षण प्रदान करता है। किसी भी महिला को उसके घर से बेदखल नहीं किया जा सकता-चाहे वह पत्नी हो, माता, बेटी या फिर बहन। तब भी ऐसा नहीं किया जा सकता जब संबंधित घर उसके नाम पर न हो। तकनीकी रूप से वह घर किसी भी सदस्य के नाम हो सकता है, लेकिन उसमें रहने वाली महिला को पूरा अधिकार है कि वह जब तक चाहे उसमें रहे। यह कानून यह भी कहता है कि प्रत्येक राज्य की सरकार को उन महिलाओं के लिए आश्रय स्थल की स्थापना करनी चाहिए जो किसी कारणवश अपने पारिवारिक घर में न रहना चाहती हों। राज्य सरकारों को महिलाओं की सहायता के लिए ऐसे अधिकारियों की नियुक्ति करनी होगी जो पीडि़त महिलाओं और अदालतों के बीच सेतु की भूमिका का निर्वहन करें। इसका अर्थ है कि महिलाओं को अपने अधिकार हासिल करने के लिए कानूनी प्रक्रिया के लिए अपना पैसा खर्च करने की जरूरत नहीं है।
 पुरुष घरेलू हिंसा की समस्या का अंग रहे हैं। लिहाजा यह बिल्कुल सही समय है कि हम पुरुष इस समस्या के समाधान का भी हिस्सा बनें। समाज की इस बुराई को समाप्त के लिए पुरुषों को सक्रिय होना होगा। इसे इस रूप में देखें कि क्या आप ऐसे पुरुष बनना चाहते हैं जिससे घर की महिलाएं और विशेषकर पत्नी भयभीत हो, नफरत करती हो? क्या आप यह चाहते हैं कि आपको घर में महिलाओं से पूरा प्यार, देखभाल और सम्मान मिले? क्या आप चाहते हैं कि घर के बच्चे आपसे दूर-दूर रहें अथवा आपके घर आते ही वे डर के मारे किसी कोने में दुबक जाएं? आप घर बनाने वाले बनना चाहते हैं या घर बिगाड़ने वाले? फैसला आपको करना है। जय हिंद। सत्यमेव जयते!

Sunday, June 17, 2012

फिल्‍म समीक्षा :गैंग्‍स ऑफ वासेपुर- द हालीवुड रिपोर्टर-देबोरा यंग

Bollywood film maker Anurag Kashyap directs this two part gangster thrill ride about vengeance, greed and deep-rooted family rivalries.

An extraordinary ride through Bollywood’s spectacular, over-the-top filmmaking, Gangs of Wasseypur puts Tarantino in a corner with its cool command of cinematically-inspired and referenced violence, ironic characters and breathless pace. All of this bodes well for cross-over audiences in the West.  Split into two parts, as it will be released in India, this epic gangster story spanning 70 years of history clocks in at more than five hours of smartly shot and edited footage, making it extremely difficult to release outside cult and midnight venues. Its bow in Cannes’ Directors Fortnight met with rousing consensus, but it’s still an exotic taste at a delirious length.
Tipping his hat to Scorsese, Sergio Leone and world cinema as well as paying homage to Bollywood, writer-director-producer Anurag Kashyap (Black Friday) fashions a kind of “Once Upon a Time in Bengal”, a piece of violent entertainment that never seems to run out of invention or bullets. Less successful is the screenwriters’ attempt to embed the tale in a historical and political context, which simply doesn’t have room to emerge amid all the mayhem. Though the testosterone level is pumped to the max, there’s still room for funny jokes, fooling around and vibrant film characters that spring to life with mythical deeds and single-minded passions. No moralizing or regrets trouble their consciences, nor are they likely to bother the young male demographic that will account for the lion’s share of the audience.
Vengeance, blind ambition and greed oil the wheels of a long-running blood feud between competing godfathers in the Bengal mining towns of Wasseypur and Dhanbad.  The film opens with a teasing flash-forward to the end of the story, when a gang armed to the teeth with bombs and machine guns blast their way into the palace-fortress of the reigning don, Faizal Khan. The do enough damage to believe him dead, but the audience will be rightly suspicious that his body is not among the rubble.
PHOTOS: Cannes 2012: Opening Night Gala
In the first half of the film, the early history of Faizal’s family is told, beginning with the rise of his grandfather Shahid Khan in the days when coal mines represented wealth and power. An omniscient narrator, who survives throughout the film, explains how, from time immemorial, Muslims have fought other Muslims in the area, not for religious reasons, but out of pure evil. Back in 1941, the mythic robber Sultana Daku looted British trains; he is later imitated by the sadistic Shahid Khan (Jaideep Ahlawat), who is eventually murdered by the young owner of the coal mines, Ramadhir Singh, setting off a power struggle between the two clans that lasts till the final reel.
Shahid’s hot-blooded son Sardar shaves his head, vowing not to grow his hair until he exacts revenge for his father’s death. His passion for two women who will become his wives gives him a human, even comic, side.  There are only four female characters in this boys’ club, all beautiful firebrands whose bloodthirsty ambition for their offspring would put Ma Barker to shame. Nagma, Sardar’s first wife, bears him four sons including the gangsters Faizal, Danish and “Perpendicular” Khan, while his Hindi wife Durga belatedly contributes the fearsome “Definitive” Khan.  Each murderous son stars in a section of the story highlighting his outrageous misdeeds and amorous pursuits.
If the first half of the film sets the background to the present day, Part 2 has moments of humor and is an easier, if certainly no less bloody, watch thanks to its many salutes to popular music and cinema. Sardar’s violence has made him the godfather, a role he keeps until betrayed at a gas station. His body, riddled with bullets, is carted away by his maddened son Danish, who goes on a rampage. But Danish isn’t smart enough to last long, and the family black sheep Faizal (Nawazuddin Siddiqui), a hash smoking pothead, climbs the ladder to power after cutting off his best friend and betrayer’s head. Taking his cue from Michael Corleone, Faizal modernizes the family arsenal and buys some new-fangled pagers that have just come on the market to communicate with his gang. Cell phones will soon be added.
PHOTOS: Cannes Film Festival 2011's Hottest Films
His courtship of Mohsina (Huma Qureshi) is one of the film’s non-violent high points. Addicted to romantic movies, the lovely Mohsina looks like a Brooklyn moll and wears the same Ray Bans as Faizal, by which they recognize they are soul mates. Their sexy dialogue is a hoot, though the most blatant vulgarities are left to the lyrics (duly translated in the subtitles) to Sneha Khanwalkar’s sparkling score, pumped up with drumbeats at the first sign of gunplay.
It is now 2002 and Sardar’s strangely named teenage sons Definitive and Perpendicular are ready start their own violent careers, both defined by the narrator as “more terrifying than Faizal.” Their wanton killing sprees pepper the final scenes with death. Faizal is talked into going into politics, alarming his perennial nemesis Ramadhir Singh, now a corrupt old government minister. Their final reckoning takes place on election day as Faizal and his handful of loyalists lay siege to a hospital.
Kashyap, whose reputation as a screenwriter and controversial director reach a culmination in this film, is the real behind-the-scenes godfather, never losing control over the story-telling or hundreds of actors, and allowing tongue-in-cheek diversions in the second half that confirm his command over the sprawling material. In the spirit of Bollywood, Rajiv Ravi’s lensing is fast on its feet, with a continually moving camera that always seems to be in the right spot to capture the action.
Venue: Cannes Film Festival (Directors Fortnight), May 21, 2012.
A Viacom 18 Motion Pictures presentation of an Anurag Kashyap Films/Jar Pictures production in association with Tipping Point Films, Akfpl, Elle Driver.
Cast: Manoj Bajpayee, Richa Chaddha, Reema Sen, Tigmanshu Dhulia, Jaideep Ahlawat, Piyush Mishra, Mukesh Chhabra, Jameel Khan, Harish Khanna, Aditya Kumar, Murari Kumar, Huma Quershi, Yashpal Sharma, Nawazuddin Siddiqui, Raj Yadav, Raj Kumar Yadav
Director: Anurag Kashyap
Screenwriters: Anurag Kashyap, Zeishan Quadri, Akhilesh Jaiswal, Sachin Ladia
Producers: Anurag Kashyap, Sunil Bohra
Director of photography: Rajiv Ravi
Production Designer: Wasiq Khan
Costumes: Subodh Srivastava
Editor: Shweta Venkat
Music: Sneha Khanwalkar
Sales Agent: Elle Driver
No rating; 320 minutes