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Thursday, May 31, 2012

रियल ड्रामा और पॉलिटिक्स है ‘शांघाई’ में

 
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अपनी चौथी फिल्म ‘शांघाई’ की रिलीज तैयारियों में जुटे बाजार और विचार के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी यह फिल्म दिल्ली से बाहर निकली है। उदार आर्थिक नीति के के देश में उनकी फिल्म एक ऐसे शहर की कहानी कहती है, जहां समृद्धि के सपने सक्रिय हैं। तय हआ है कि उसे विशेष आर्थिक क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाएगा। राज्य सरकार और स्थानीय राजनीतिक पार्टियों ने स्थानीय नागरिकों को सपना दिया है कि उनका शहर जल्दी ही शांघाई बन जाएगा। इस राजनीति दांवपेंच में भविष्य की खुशहाली संजोए शहर में तब खलबली मचती है, जब एक सामाजिक कार्यकर्ता की सडक़ दुर्घटना में मौत हो जाती है। ज्यादातर इसे हादसा मानते हैं, लेकिन कुछ लोगों को यह शक है कि यह हत्या है। शक की वजह है कि सामाजिक कार्यकर्ता राजनीतिक स्वार्थ के तहत पोसे जा रहे सपने के यथार्थ से स्थानीय नागरिकों को परिचित कराने की मुहिम में शामिल हैं। माना जाता है कि वे लोगों को भडक़ा रहे हैं और सपने की सच्चाई के प्रति सचेत कर रहे हैं।  
 दिबाकर बनर्जी राजनीतिक पृष्ठभूमि की फिल्म ‘शांघाई’ में हमें नए भारत से परिचित कराते हैं। यहां जोगिन्दर परमार, टीए कृष्णन, डाक्टर अली अहमदी,शालिनी सहाय जैसे किरदार हैं। वे समाज के विभिन्न तबकों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। रियल इंडिया की इस फिल्म में हिंदी फिल्मों के प्रचलित ग्रामर का खयाल नहीं रखा गया है। दिबाकर बनर्जी हमेशा की तरह वास्तविक और विश्वसनीय किरदारों के माध्यम से अपनी कहानी कह रहे हैं। वे स्वीकार करते हैं कि उन्हें बाजार के दबाव के बीच काम करना पड़ रहा है, लेकिन उन्हें बाजार की जरूरतों से कोई गुरेज नहीं है। रिलीज के एक महीने पहले उन्हें इमरान हाशमी के साथ एक गाने की शूटिंग करनी पड़ी है। फिल्म में इसकी जरूरत नहीं थी, फिर भी मार्केटिंग टीम की सलाह पर उन्होंने सूफियाना अंदाज का यह गीत इमरान हाशमी के प्रशंसकों और दर्शकों के लिए रखा। वे कहते हैं, ‘यह गाना मेरी फिल्म के कथ्य को प्रभावित नहीं करेगा और बाजार की जरूरत भी पूरी हो जाएगी।’ 
 ‘शांघाई’ में अभय देओल और इमरान हाशमी का साथ आना रोचक है। दोनों के बीच बमुश्किल चार सीन होंगे, लेकिन उनकी मौजूदगी अलग-अलग समूहों के दर्शकों को फिल्म से जोड़ेगी। दिबाकर कहते हैं, ‘फिल्म में जोगिन्दर परमार के किरदार के लिए उनसे बेहतर एक्टर नहीं हो सकता था। हर छोटे शहर में दो-चार ऐसे शख्य होते हैं। यह किरदार इमरान हाशमी की इमेज के साथ मैच करता है और फिल्म के लिए बिल्कुल उचित है।’ दिबाकर की बातचीत से पता चलता है कि पॉलिटिकल थ्रिलर के तौर पर बनी उनकी ‘शांघाई’ में आम दर्शकों के मनोरंजन का पूरा ख्याल रखा गया है। ‘जिंदगी का रियल ड्रामा किसी फैंटेसी से अधिक इंगेजिंग होता है’, कहते हैं दिबाकर बनर्जी। दिबाकर बनर्जी ने इस बार एक अलग लेवल पर ड्रामा रचा है।  

साथ आना अभय देओल और इमरान हाशमी का

 
-अजय ब्रह्मात्मज
फिल्म देखने के बाद दिबाकर बनर्जी के इस अहम फैसले का परिणाम नजर आएगा। फिलहाल अभय देओल और इमरान हाशमी का एक फिल्म में साथ आना दर्शकों को हैरत में डाल रहा है। फिल्म के प्रोमो से जिज्ञासा भी बढ़ रही है। कुछ धमाल होने की उम्मीद है। अभय देओल हिंदी फिल्मों के विशिष्ट अभिनेता हैं। इमरान हाशमी हिंदी फिल्मों के आम अभिनेता हैं। दोनों के दर्शक और प्रशंसक अलग हैं। दिबाकर बनर्जी ने ‘शांघाई’ में दोनों को साथ लाकर अपनी कास्टिंग से चौंका दिया है।
    ‘सोचा न था’ से अभय देओल की शुरुआत हुई। देओल परिवार के इस हीरो की लांचिंग पर किसी का ध्यान भी नहीं गया। उनके पीठ पीछे सनी देओल के होने के बावजूद फिल्म की साधारण रिलीज हुई। फिर भी अभय देओल ने पहले समीक्षकों और फिर दर्शकों का ध्यान खींचा। कुछ फिल्मों की रिलीज के पहले से ही चर्चा रहती है। ऐसी फिल्म रिलीज के बाद ठंडी पड़ जाती हैं। जिन फिल्मों पर उनकी रिलीज के बाद निगाह जाती है, उन्हें दर्शक और समीक्षकों की सराहना बड़ी कर देती है। ‘सोचा न था’ ऐसी ही फिल्म थी। इस फिल्म ने इंडस्ट्री को तीन प्रतिभाएं दीं - अभय देओल, आएशा और इम्तियाज अली।
    इसके विपरीत भट्ट परिवार से संबद्ध फिल्मों में विक्रम भट्ट के सहायक के तौर पर आए। उनमें महेश भट्ट को कुछ खास दिखा। उन्होंने उन्हें कैमरे के सामने लाकर खड़ा कर दिया। आरंभिक फिल्मों में इमरान हाशमी के लुक, प्रेजेंस और एक्टिंग की तीखी आलोचना हुई, लेकिन महेश भट्ट की बदौलत इमरान हाशमी टिके रहे। भट्ट परिवार उन्हें फिल्म दर फिल्म दोहराता रहा। विशेष प्रयास से उनकी सभी फिल्मों के कुछ गाने पॉपुलर होते गए और उन गानों के सहारे इमरान हाशमी भी देश के चवन्नी छाप दर्शकों के बीच अपनी जगह बनाते गए। ‘मर्डर’ फिल्म की कामयाबी ने इमरान हाशमी को ‘किसिंग स्टार’ का खिताब दिया। इस फिल्म के बाद इमरान हाशमी के पास उन्नति के सिवा कोई चारा नहीं रह गया। वे अपनी रफ्तार से लोकप्रियता की सीढियां चढ़ते गए। उन्होंने लगन, मेहनत और एकाग्रता से खास जगह बना ली।
    दरअसल, इमरान हाशमी की कामयाबी फिल्म अध्येताओं के पाठ और अध्ययन का विषय हो सकती है। देश के बदलते दर्शकों से इमरान हाशमी की लोकप्रियता का सीधा संबंध है। फिल्म ट्रेड में जिसे बी और सी सेंटर कहते हैं, वहां इमरान खासे पॉपुलर हैं। उनकी हर फिल्म बिहार में अच्छा बिजनेश करती है। इसके साथ ही वे पाकिस्तान में हिंदी फिल्मों के खान से पॉपुलर स्टार हैं। फिलहाल, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के तमाम बड़े बैनर उनमें खास रुचि ले रहे हैं। निर्देशकों और दर्शकों की बढ़ती मांग की वजह से उन्हें भट्ट कैंप की चहारदीवारी छलांगनी पड़ी है।
    दूसरी तरफ अभय देओल ने ‘आउट ऑफ बाक्स’ फिल्मों में जगह बनाने के बाद मेनस्ट्रीम फिल्मों में भी प्रवेश किया है। ‘जिंदगी ना मिलेगी दोबारा’ में फरहान अख्तर और रितिक रोशन के साथ उनकी तिगड़ी पसंद की गई। फिलहाल वे प्रकाश झा की ‘चक्रव्यूह’ की शूटिंग कर रहे हैं। अपने दोनों बड़े भाइयों (सनी और बॉबी) से अलग छवि और फिल्मों में उनकी रुचि है। उन्होंने इस धारणा को तोड़ा है कि स्टारसन हमेशा कमर्शिल फिल्मों में कैद रहते हैं।
    अब इन दोनों को साथ लाकर दिबाकर बनर्जी दर्शकों के विशाल समुदाय को ‘शांघाई’ के लिए थिएटर में लाएंगे। दिबाकर बनर्जी की फिल्में अभी तक शहरी दर्शकों के बीच चर्चित और प्रशंसित रही हैं। इस बार उन्होंने इमरान हाशमी के साथ अपना दायरा तोड़ा है। इससे उन्हें फायदा होगा और अप्रत्यक्ष रूप से दर्शक भी फायदे में रहेंगे। इमरान हाशमी के प्रशंसक और दर्शक इसी बहाने दिबाकर बनर्जी की फिल्म से परिचित होंगे।

मेनस्ट्रीम सिनेमा को ट्रिब्यूट है ‘राउडी राठोड़'-संजय लीला भंसाली

-अजय ब्रह्मात्‍मज
अक्षय कुमार और सोनाक्षी सिन्हा की प्रभुदेवा निर्देशित ‘राउडी राठोड़’ के निर्माता संजय लीला भंसाली हैं। ‘खामोशी’ से ‘गुजारिश’ तक खास संवेदना और सौंदर्य की फिल्में निर्देशित कर चुके संजय लीला भंसाली के बैनर से ‘राउडी राठोड़’ का निर्माण चौंकाता है। वे इसे अपने बैनर का स्वाभाविक विस्तार मानते हैं।
  - ‘राउडी राठोड़’ का निर्माण किसी प्रकार का दबाव है या इसे आपकी मुक्ति समझा जाए?
 0 इसे मैं मुक्ति कहूंगा। मेरी सोच, मेरी फिल्म, मेरी शैली ही सब कुछ है ... इन से निकलकर अलग सोच, विषय और विचार से जुडऩा मुक्ति है। मैं जिस तरह की फिल्में खुद नहीं बना सकता, वैसी फिल्मों का बतौर प्रोड्यूसर हिस्सा बनना अच्छा लग रहा है। मैं हर तरह के नए निर्देशकों से मिल रहा हूं। ‘माई फ्रेंड पिंटो’, ‘राउडी राठोड़’,  ‘शीरीं फरहाद की तो निकल पड़ी’ ऐसी ही फिल्में हैं। 
 - आप अलग तरह के सिनेमा के निर्देशक रहे हैं। खास पहचान है आपकी। फिर यह शिफ्ट या आउटिंग क्यों? 0 ‘गुजारिश’ बनाते समय अनोखा अनुभव हुआ। वह फिल्म मौत के बारे में थी, लेकिन उसने मुझे जिंदगी की पॉजीटिव सोच दी। उसने मुझे निर्भीक बना दिया। लगा कि मैं अपनी क्रिएटिविटी के बिखर जाने से डरा हुआ हूं, जबकि ऐसा है नहीं। मैं ‘राउडी राठोड़’ नहीं निर्देशित कर सकता। उस फिल्म को प्रभु देवा अच्छी तरह बना सकते हैं। मैं उसे दर्शकों तक ले जाने का जरिया बन सकता हूं। इसी बहाने मैं ज्यादा से ज्यादा तरह की फिल्मों का हिस्सा होना चाहता हूं। मैं अब पहले की तरह स्वार्थी नहीं रह गया। 
 - ‘राउडी राठोड़’ का संयोग कैसे बना?
 0 मैंने तमिल फिल्म देखी ‘विक्रम्राउकड़ू’। हिंदी में उसके रीमेक के बारे में सोच लिया था कि मैंने कि हिंदी में राउडी फिल्म बनानी है। ‘राउडी राठोड़’ तभी ताम पड़ गया था। प्रभु देवा और अक्षय कुमार मेरे प्रस्ताव से चौंके। मेरे अंदर मेनस्ट्रीम सिनेमा रहा है। अलंकार, मिनर्वा और ग्रांट रोड के आसपास के सिनेमाघरों में बड़े होते समय मेनस्ट्रीम फिल्में देखी थीं। सिनेमा से आकर्षण तो वहीं बना। बाद में एफटीआईआई गया तो सिनेमा के प्रति अप्रोच बदला। उसके प्रभाव में मैंने ‘खामोशी’ बनाई। वैसे मेरे पिताजी ने ‘जहाजी लुटेरा’ बनाई थी। उस तरह की मसाला मेनस्ट्रीम फिल्में दिल में बनी रही हैं। मैं उस मेनस्ट्रीम सिनेमा को एंज्वॉय करना चाहता हूं। इसे मेरा भटकाव न समझें।  
- मेनस्ट्रीम के प्रति यह झुकाव क्यों और कैसे बढ़ा?
 0 मैंने बताया कि वह सिनेमा मेरे अंदर है। देश का दर्शक अभी भी नहीं बदला है। हमारे दर्शकों को फुल एंटरटेनमेंट चाहिए। हमलोग आर्ट सिनेमा, पैरेलल सिनेमा या आउट ऑफ बाक्स सिनेमा भी बनाएं, लेकिन ज्यादा दर्शकों को मेनस्ट्रीम सिनेमा चाहिए। अभी वैसी फिल्में खूब पसंद की जा रही है। उनकी क्वालिटी भी बढ़ी है। ‘राउडी राठोड़’ मेरी किशोरावस्था की याद और मेनस्ट्रीम सिनेमा को ट्ब्यिूट है। यही हमारा क्लासिक सिनेमा है। दर्शक ऐसी फिल्मों  डायलॉग से खुश होते हैं। गानों पर नाचते हैं। ‘मैं फौलाद की औलाद हूं’ सुन कर ढेर सारे दर्शक खुश होंगे। मेरे लिए यह फिल्म कैथारसिस रही। 
 - बाकी फिल्मों में आपकी भागीदारी कितनी और कि स्तर की रहती है? 
मैं स्क्रिप्ट चुनने से लेकर कास्टिंग तक इन्वॉल्व रहता हूं। उसके बाद डायरेक्टर की फिल्म होती है। मैं सेट या शूटिंग पर नहीं जाता। डायरेक्टर पर भरोसा होता है। तभी तो चुनता हूं। और फिर मुझे ही दिन-रात लगा रहना पड़े मैं अपनी फिल्म डायरेक्ट कर लूंगा।  
- इस फिल्म के लिए अक्षय कुमार और सोनाक्षी सिन्हा ही क्यों?
 0 ‘राउडी राठोड़’ का राउडीपना अक्षय कुमार ही ला सकते हैं। एक्शन, रोमांस, कॉमेडी और ड्रामा सभी तरह से वे इस फिल्म के लिए सबसे योग्य थे। सोनाक्षी सिन्हा टैलेंटेड और श्रीदेवी की तरह की हीरोइन हैं। उनमें एक अलग चार्म है। मेरी फिल्म के लिए दोनों फिट रहे।
 -आप की फिल्म कब शुरू होगी?  
 0 मैंने ‘राम लीला’ के बारे में साचा है। मैं अपनी मां के नाम से एक फिल्म बनाना चाहता था। इस फिल्म में रणवीर सिंह और करीना कपूर हैं। दोनों जबरदस्त एक्टर हैं। मेरी फिल्म की शूटिंग अगस्त में शुरू होगी। गुजरात में कच्छ और मुंबई में शूटिंग होनी है। 


Monday, May 28, 2012

सत्‍यमेव जयते- 4:स्वस्थ समाज का सपना-आमिर खान

बेशकीमती हैं बच्चियां
मैं सपने देखना पसंद करता हूं और यह उन कारणों में से एक है कि मैं सत्यमेव जयते शो कर पाया हूं। मेरा सपना है कि एक दिन हम ऐसे देश में रह रहे होंगे जहां चीजें बदली हुई होंगी। मेरा स्वप्न है कि एक दिन अमीर और गरीब एक ही तरह स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाएंगे। बहुत से लोगों को यह दृष्टिकोण पूरी तरह अव्यावहारिक लग सकता है, किंतु यह सपना देखने लायक है। और ऐसा कोई कारण नहीं है कि यह पूरा न हो सके। कोई अमीर हो या गरीब, किसी प्रिय को खोने का दुख, दोनों को बराबर होता है। अगर कोई बच्चा ऐसी बीमारी से ग्रस्त है जिसका इलाज संभव है, किंतु हम पैसे के अभाव में उसका इलाज न करा पाने के कारण उसे अपनी आंखों के सामने मरता हुए देखने को मजबूर हैं तो इससे अधिक त्रासद कुछ नहीं हो सकता। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का डेढ़ फीसदी से भी कम सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च होता है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में बरसों से काम करने वाले और हमारे शो में आए एक मेहमान डॉ. गुलाटी का कहना है कि स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में जीडीपी का कम से कम छह फीसदी खर्च होना चाहिए। मैं न तो अर्थशास्त्री हूं और न ही डॉक्टर, फिर भी मेरी नजर में सही आंकड़ा आठ से दस प्रतिशत होना चाहिए। अगर समाज ही स्वस्थ नहीं होगा तो अधिक जीडीपी का क्या फायदा। आर्थिक समृद्धि तभी हासिल हो सकती है, जब हम स्वस्थ होंगे। स्वास्थ्य राज्य का विषय है और प्रत्येक राज्य केवल अप्रत्यक्ष कर ही इकट्ठा करता है। हमारे पैसे से अधिक अस्पताल क्यों नहीं खोले जाते और इससे भी महत्वपूर्ण यह कि इस पैसे को सार्वजनिक मेडिकल कॉलेज बनाने में खर्च क्यों नहीं किया जाता? देश को बड़ी संख्या में सरकारी मेडिकल कॉलेजों की आवश्यकता है, किंतु केंद्र और राज्य सरकारें इसकी इच्छुक दिखाई नहीं देतीं। इसलिए छात्रों को मजबूरी में निजी कॉलेजों का रुख करना पड़ रहा है, जिनमें से अधिकांश 50 से 60 लाख रुपये प्रति छात्र अनधिकृत रूप से चंदे के रूप में वसूल कर रहे हैं। अधिकांश निजी मेडिकल कॉलेज व्यापार में बदल गए हैं। इनमें से बहुतों के पास ढंग के अस्पताल भी नहीं हैं, जो मेडिकल कॉलेज के लिए अनिवार्य शर्त है। मुझे हैरत होती है कि इन कॉलेजों से निकलने वाले डॉक्टर कितने समर्थ होंगे। हमें केंद्र व राज्य सरकारों पर दबाव डालना चाहिए कि वे अधिक से अधिक सरकारी अस्पताल खोलें जिनके साथ मेडिकल कॉलेज भी जुड़ा हो। निजी अस्पतालों से गुरेज नहीं है, किंतु हमें सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और इसे इतना मजबूत बनाना चाहिए कि निजी अस्पतालों को उनसे होड़ लेने में कड़ी मेहनत करनी पड़े और इस प्रकार हमें बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें। जब एक छात्र एमबीबीएस की परीक्षा में बैठता है और उससे डायबिटीज रोग में रोगी को दी जाने वाली दवा का नाम पूछा जाता है तो वह लिखता है-ग्लाइमपीराइड। यह एक साल्ट है, जो डायबिटीज दवा में अकसर दिया जाता है। जब यही छात्र एक डॉक्टर बन जाता है और डायबिटीज का कोई मरीज उसके पास आता है तो वह किसी ब्रांडेड कंपनी की दवा का नाम लिखता है। तो क्या यह डॉक्टर गलत दवा लिख रहा है। नहीं। यह ग्लाइमपेराइड साल्ट से बनी ब्रांडेड दवा होती है। नाम के अलावा इन दोनों दवाओं में क्या अंतर है? ब्रांडेड कंपनी की दस गोलियों की स्टि्रप की कीमत 125 रुपये है, जबकि साल्ट ग्लाइमपेराइड से बनी 10 गोलियों की कीमत महज दो रुपये है। दोनों की गुणवत्ता में कोई अंतर नहीं है। ब्रांड नेम के कारण हमें दस गोलियों के 123 रुपये अधिक देने पड़ते हैं। कुछ और उदाहरण देखिए-जुकाम एक आम बीमारी है। इसके उपचार के लिए बनी दवा में आम तौर पर सेटरीजाइन साल्ट का इस्तेमाल होता है। इस दवा के निर्माण, पैकेजिंग, ढुलाई आदि के बाद अच्छा-खासा मुनाफा कमाते हुए भी इसकी दस गोलियों की कीमत है एक रुपया बीस पैसा, किंतु इसी साल्ट की ब्रांडेड कंपनी की दवा की दस गोलियों की कीमत है 35 रुपये। मलेरिया के रोगी को लगने वाले तीन इंजेक्शनों की कीमत है 25 रुपये। हालांकि इस साल्ट से बने ब्रांडेड इंजेक्शन की कीमत है 300 से 400 रुपये। इसी प्रकार, हैजे की दवा के साल्ट का नाम डोमपेरिडॉन। और इसकी दस गोलियों की कीमत है महज सवा रुपया, जबकि इस साल्ट से बनी ब्रांडेड दवा 33 रुपये में बेची जाती है। इन हालात में गरीब और कुछ हद तक मध्यम वर्ग के लोग भी इन दवाओं को कैसे खरीद सकते हैं? इसका जवाब है जेनरिक दवाएं। इस संबंध में राजस्थान सरकार के प्रयास सराहनीय हैं। वह पूरे प्रदेश में जेनरिक दवाओं को बेचने के लिए दुकानों की स्थापना कर रही है। भारत में मोटे तौर पर करीब 25 फीसदी लोग आर्थिक तंगी के कारण अपनी बीमारियों का इलाज नहीं करा पाते। जरा सोचिए, जेनरिक दवाएं हर भारतीय के लिए कितना बड़ा बदलाव ला सकती हैं। अगर राजस्थान सरकार यह काम कर सकती है तो अन्य राज्यों की सरकारें क्यों नहीं कर सकतीं? जय हिंद! सत्यमेव जयते!

Saturday, May 26, 2012

फिल्‍म समीक्षा : अर्जुन

Review : Arjun: The Warrior Prince 

योद्धा अर्जुन की झलक 

-अजय ब्रह्मात्‍मज

देश में बन रहे एनीमेशन फिल्मों की एक मूलभूत समस्या है कि उनके टार्गेट दर्शकों के रूप में बच्चों का खयाल रखा जाता है। बाल दर्शकों की वजह से उसे प्रेरक, मर्मस्पर्शी और बाल सुलभ संवेदनाओं तक सीमित रखा जाता है। अभी तक अपने देश में एनीमेशन फिल्में पौराणिक और मिथकीय कथाओं की सीमा से बाहर नहीं निकल पा रही हैं। इन्हीं सीमाओं और उद्देश्य के दबाव में अर्जुन तकनीकी रूप से उत्तम होने के बावजूद प्रभाव में सामान्य फिल्म रह जाती है। अर्नव चौधरी और उनकी टीम अवश्य ही संकेत देती है कि वे तकनीकी रूप से दक्ष हैं। एनीमेशन फिल्म को एक लेवल ऊपर ले आए हैं।
अर्जुन में कौरव-पांडव की प्रचलित कथा में से पांडवों के वनवास और अज्ञातवास के अंशों को चुना गया है। पृष्ठभूमि के तौर पर दुर्योधन के द्वेष का चित्रण है। सुशील और कुलीन पांडव दुर्योधन की साजिशों के शिकार होते हैं। संकेत मिलता है कि कृष्ण उनके साथ हैं और वे मुश्किल क्षणों में उनकी मदद भी करते हैं। पांडवों का अज्ञातवास समाप्त होने वाला है। दुर्योधन किसी भी तरह उनकी जानकारी हासिल कर उन्हें फिर से वनवास के लिए भेजना चाहता है। कुरुक्षेत्र के पहले का युद्ध होता है। हमें योद्धा अर्जुन के शक्तिशाली स्वरूप का दर्शन होता है। यह कुरुक्षेत्र की पूर्व कथा है।
लेखक-निर्देशक ने विराट के राजकुमार को अर्जुन की कहानी बताने की युक्ति से मुख्य कथा में प्रवेश किया है। यह युक्ति बनावटी लगती है। वृहन्नला बने अर्जुन खुद ही अपनी कहानी बताते हैं और फिर युद्ध के दौरान अपने वास्तविक रूप में आ जाते हैं। इसके अलावा चरित्रों का रूप और आकार देने में डिज्नी की शैली का निर्वाह किया गया है। चरित्रों का पहनावा भारतीय है, लेकिन उनकी आंखों और देहयष्टि में भारतीय शरीरिक संरचना से अलगाव नजर आता है। शकुनि को गोलमटोल आकार देना भी पारंपरिक धारणा है। तत्कालीन परिवेश को वास्तुकला से उभारने में पर्याप्त कल्पनाशीलता की झलक मिलती है। कुछ दृश्य रोमांचक और अद्भुत हैं।
एनीमेशन में यह सुविधा है कि परिवेश की बारीकियों के साथ पर्दे पर दिखाया जा सकता है। अर्जुन के संवादों में शुद्ध हिंदी का आग्रह अनावश्यक लगता है। आज के शहरी और मल्टीप्लेक्स दर्शकों को उन्हें समझने में दिक्कत हो सकती है। भाषा सहज और बोधगम्य हो तो एनीमेशन फिल्मों का प्रभाव बढ़ जाता है। चरित्रों को दिए गए स्वर उनके स्वभाव के अनुरूप और उपयुक्त हैं। एनीमेशन फिल्मों की परंपरा में अर्जुन निस्संदेह एक कदम आगे है। ग्राफिक्स, एनीमेशन और अन्य तकनीकी मामलों में यह उल्लेखनीय प्रयास है।
*** 1/2 साढे़ तीन स्टार

फिल्‍म समीक्षा : ये खुला आसमान

review : yeh khula aasmaan 

दादु और पोते का अकेलापन 

- अजय ब्रह्मात्‍मज

माता-पिता को इतनी फुर्सत नहीं कि वे अपने बेटे का फोन भी उठा सकें। मां अपनी आध्यात्मिकता और योग में लीन हैं और पिता भौतिकता और भोग में.. नतीजतन हताश बेटा मुंबई से अपने दादु के पास जाता है। गांव में छूट चुके दादु अपनी ड्योढ़ी में कैद हैं। उन्हें अपने बेटे का इंतजार है, जिसने वादा किया था कि वह हर साल उनसे मिलने आया करेगा। आधुनिक भारत के गांवों से उन्नति, भौतिकता और सुख की तलाश में शहरों और विदेशों की तरफ भाग रही पीढ़ी के द्वंद्व और दुख को गीतांजलि सिन्हा ने ये खुला आसमान में चित्रित करने की कोशिश की है।
वह दादु और पोर्ते के अकेलेपन और निराशा को उभारने में माता-पिता की निगेटिव छवि पेश करती हैं। दोनों बाद में सुधर जाते हैं, फिर भी कहानी में फांक रह जाती है। अविनाश (राज टंडन)को अपने माता-पिता(मंजुषा गोडसे-यशपाल शर्मा) से ढाढस और सराहना के शब्द नहीं मिलते। पढ़ाई में अच्छा करने और ज्यादा अंक हासिल करने के दबाव में वह पिछड़ जाता है। आईआईटी की इंट्रेंस परीक्षा पास नहीं कर पाता। अच्छी बात है कि हताशा में भी वह आत्महत्या जैसा शार्टकट नहीं अपनाता।
वह अपने दादु (रघुवीर यादव)के पास लौटता है। दादु उसे बेहतर परफॉर्म करने की प्रेरणा देते हैं। उसे हां और ना की दुविधा से बाहर निकालते हैं। दादु बताते हैं कि पहले सोच-समझ कर कोई फैसला लो और फिर अपने फैसले पर अटल रहो तो कामयाबी अवश्य मिलेगी। अविनाश की जिंदगी पलटती है। गांव की पतंगबाजी से उसके जीत का अभियान शुरू होता है, जो आखिरकार उसे जीवन में सफल बनाता है। अविनाश भी अपने पिता की तरह करिअर के लिए बाहर निकलता है। फर्क यह है कि वह हर साल गांव लौटता है। गांव से छूटने या जुड़े रहने और बेहतर भविष्य के इस द्वंद्व से ऐसा हर परिवार गुजरता है, जिनके पूर्वजों की जड़ें गांव में हैं।
गीतांजलि सिन्हा ने पीढि़यों की सोच के भेद की कहानी को सादगी से पेश किया है। उनके किरदार सहज और आसपास के हैं। शिल्प में सादगी के साथ विश्वसनीयता भी है, जिसे रघुवीर यादव और यशपाल शर्मा जैसे अनुभवी अभिनेताओं ने मजबूत किया है। किशोर उम्र की नई जोड़ी ने अपने किरदारों का उचित निर्वाह किया है। खास कर मुस्कान की भूमिका में आई अन्या आनंद में स्वाभाविकता और मासूमियत है। उनकी कस्बाई प्रतिक्रियाएं और मुद्राएं मनमोहक हैं। अविनाश और मुस्कान की अंतरंगता चौंकाती है। इसके अलावा पतंगबाजी में वैमनस्य दिखाने के लिए सलीम(आदित्य सिद्धू) को मुस्लिम चरित्र गढ़ना अनावश्यक लगता है।
गांव के हिंदू परिवार का हिंदू युवक रहता तो क्या पतंगबाजी में जीत के लिए रची गई दुश्मनी कम हो जाती क्या? दरअसल, चरित्रों की संकल्पना और गठन में यह फिल्मों से बनी प्रचलित धारणा का ही प्रभाव है। फिर भी सलीम के किरदार को आदित्य सिद्धू ने बहुत अच्छी तरह निभाया है। फिल्मों के निगेटिव किरदारों का असर उस युवक के चाल-ढाल में दिखाई पड़ता है। पतंगबाजी के दृश्य में दोहराव और ढीलापन है। कमंटेटर जब बता रहा कि अब तीन पतंग बचे हैं, तब आकाश में दस से ज्यादा पतंग दिख रहे हैं।
बहरहाल, फिल्म का लोकेशन नया और फिल्म के कस्बाई लुक के मेल में है। अगर फिल्म के संवादों में कस्बाई लहजा होता तो विश्वसनीयता और बढ़ती। यशपाल शर्मा का अंग्रेजी उचारण खटकता है। हां, रघुवीर यादव हर तरह से प्रभावित करते हैं।
**1/2 ढाई स्टार

Friday, May 25, 2012

क्यों बौखलाए हुए हैं शाहरुख खान?



-अजय ब्रह्मात्मज
    बाल मनोविज्ञान के विशेषज्ञ ठीक-ठीक बता सकते हैं कि हाल ही में सुहाना के सामने हुई उनके पिता शाहरुख खान और मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन के अधिकारियों के बीच हुई बाताबाती और झड़प का उन पर क्या असर हुआ होगा? जो भी हुआ, उसे दुखद ही कहा जा सकता है। शाहरुख खान की बौखलाहट की वजह है। वे स्वयं बार-बार कह रहे हैं कि उनके बच्चों के साथ कोई दुव्र्यवहार करेगा तो उनकी नाराजगी लाजिमी है। उन्हें अपनी नाराजगी और गुस्से में कही बातों का कोई अफसोस नहीं है। वे उसे उचित ठहराते हैं। उनके समर्थक भी ट्विटर पर ‘आई स्टैंड बाई एसआरके’ की मुहिम चलाने लगे थे। पूरा मामला तिल से ताड़ बना और अगले दिन अखबारों की सुर्खियां बना। समाचार चैनलों पर तो सुबह से खबरें चल रही थीं। मीडिया को बुला कर शाहरुख खान ने अपना पक्ष भी रखा, लेकिन मामले ने तूल पकड़ लिया।
    पूरे मामले में इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि शाहरुख खान ने शराब नहीं पी रखी थी। मानो शराब पीने से ही मामला संगीन बनता है, वर्ना देश का लोकप्रिय स्टार भडक़ कर ‘यहीं गाड़ देने की’ धमकी दे सकता है। आश्चर्य है कि लोकप्रिय स्टार नाराज होने पर कैसी भाषा और कैसे शब्दों का चुनाव करते हैं? किसी भी सभ्य या सुशील व्यक्ति से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह सार्वजनिक तौर पर अभद्र भाषा का इस्तेमाल करे। खास कर अगर वह सेलिब्रिटी है तो उसे विशेष संयम बरतना चाहिए। सार्वजनिक स्थानों पर उनके मुंह से ऐसे शब्दों और गालियों को सुन कर लगता है कि उनकी लोकप्रियता और छवि केवल मुखौटा भर है। उस मुखौटे के पीछे के व्यक्ति का यही सच है कि वह बेसिक इमोशन में आने पर बदजबान हो जाता है।
    दरअसल, भारतीय समाज में फिल्म स्टार का ओहदा इन दिनों काफी बढ़ गया है। उन्हें सामाजिक स्वीकृति मिल चुकी है। उनका हर मोमेंट और मूवमेंट सुविधाओं से सजा होता है। बगैर संवैधानिक प्रावधान के उन्हें प्राथमिकताएं मिलती हैं। उनकी खुशी और सुविधा में सभी बिछे रहते हैं। निश्चित ही वे हमें खुशी देते हैं। उन्हें देखते ही एक सुखद एहसास होता है, जो चंद क्षणों के लिए हमें अपनी वास्तविक दुनिया से निरपेक्ष कर देता है। बिजली की लहर की तरह यह एहसास हमें झंकृत करता है। वास्तव में यह दक्षिण एशियाई सामाजिक परिघटना है। हम अपने स्टारों का पूजते हैं। ऐसे माहौल में कुछ स्टारों का दिल-ओ-दिमाग हिल जाता है। वे स्वयं को सर्वशक्तिमान समझने लगते हैं। उनकी इस सत्ता को कहीं से भी चुनौती मिलती है तो वे बौखला जाते हैं। यह बौखलाहट अकेले शाहरुख खान में नहीं है। वैसे इस संयोग का भी अध्ययन होना चाहिए कि आखिर क्यों शाहरुख ही बार-बार उत्तेजित मुद्राओं में दिख रहे हैं?
    हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में दबी जबान से यह बात कही जाने लगी है कि तीनों खानों (आमिर, सलमान और शाहरुख) में सबसे कमजोर स्थिति शाहरुख खान की है। पिछले दिनों उनकी फिल्में बाकी दोनों खानों की तुलना में कम चली हैं। दर्शकों ने उनकी फिल्मों के प्रति कम उत्सुकता दिखाई है। उनके ड्रीम प्रोजेक्ट ‘रा ़ वन’ से वितरकों-प्रदर्शकों को नुकसान हुआ और दर्शक निराश हुए। कहीं यह पुरानी लोकप्रियता को फिर से हासिल करने और आगे बने रहने की व्याकुलता तो नहीं है, जो बौखलाहट के रूप में बार-बार सामने आ रही है।
    यह कहना लगत होगा कि शाहरुख खान के दिन लद गए। उनकी एक फिल्म हिट होगी और सब कुछ बदल जाएगा। फिर से तारीफें शुरू हो जाएंगी और गुणगान जारी होगा। फिलहाल बाक्स आफिस और बाजार में शाहरुख खान बाकी दोनों खानों से भले ही पीछे नजर आ रहे हैं, लेकिन निर्माता-निर्देशक और दर्शकों का भरोसा उन्होंने नहीं खोया है। सभी इंतजार में है कि उनकी एक फिल्म हिट हो। उम्मीद की जा रही है कि यश चोपड़ा की अगली फिल्म उन्हें फिर से उस स्थान पर ले जाएगी।

Thursday, May 24, 2012

जुझारू अनुराग कश्यप की सफलता

_Y0K3883.JPG_Y0K3744.JPG-अजय ब्रह्मात्‍मज   
फिल्म फेस्टिवल देख कर फिल्मों में आए अनुराग कश्यप के लिए इस से बड़ी खुशी क्या होगी कि उनकी दो खंडों में बनी ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ विश्व के एक प्रतिष्ठित फिल्म फेस्टिवल के लिए चुनी गई है। 16 मई से आरंभ हो रहे कान फिल्म फेस्टिवल के ‘डायरेक्टर फोर्टनाइट’ सेक्शन में उनकी दोनों फिल्में दिखाई जाएंगी। इसके अलावा उनकी प्रोडक्शन कंपनी अनुराग कश्यप फिल्म्स की वासन वाला निर्देशित ‘पेडलर्स’ भी कान फिल्म फेस्टिवल के क्रिटिक वीक्स के लिए चुनी गई है। इस साल चार फिल्मों को कान फिल्म फेस्टिवल में आधिकारिक एंट्री मिली है। चौथी फिल्म अयिाम आहलूवालिया की ‘मिस लवली’ है। इनमें से तीन फिल्मों से अनुराग कश्यप जुड़े हुए हैं। युवा पीढ़ी के सारे निर्देशक अनुराग कश्यप की इस उपलब्धि से खुश है। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गज खामोश हैं। उन्हें लग रहा है कि बाहर से आया दो टके का छोकरा हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का प्रतिनिधित्व कर रहा है।   इस ऊंचाई तक आने में अनुराग कश्यप की कड़ी मेहनत, लगन और एकाग्रता है। ‘सत्या’ से मिली पहचान के बाद अनुराग कश्यप ने पीछे पलट कर नहीं देखा। मुश्किलों और दिक्कतों में कई बार वे ठिठके और कुछ सालों तक एक कदम भी नहीं बढ़ सके। ‘पांच’ के रिलीज न होने पर उनकी निराशा उन्हें अलकोहल और अराजकता की तरफ ले गई। टूटे हारे अनुराग कश्यप में किसी को कोई उम्मीद नहीं दिख रही थी। फिर भी जिद्दी अनुराग कश्यप मानने को तैयार नहीं थे। उन्होंने ‘ब्लैक फ्रायडे’ बनाई। यह फिल्म प्रतिबंधित कर दी गई। अपनी फिल्मों को दर्शकों तक नहीं ले जा पाने केा दुख बढ़ता गया। निराशा और दुख के उस दौर में भी अनुराग की क्रिएटिविटी खत्म नहीं हुई। बहुत कम लोग जानते हैं कि अनुराग कश्यप को बचाए और बनाए रखने में उनके छोटे भाई और ‘दबंग’ के निर्देशक अभिनव कश्यप का बहुत बड़ा हाथ रहा है। भाई के पैशन को देख कर अभिनव ने सारी पारिवारिक जिम्मेदारियां अपने कंधे पर ले लीं। पैसों के लिए टीवी शो और लेखन किया। बड़े भाई को अपने पांव पर खड़े होने और अपने मन की फिल्म बनाने की राह आसान की।   अनुराग की कई खूबियां हैं। वे सीधे और मुंहफट हैं। उन्हें हिपोक्रेसी बिल्कुल पसंद नहीं है। फिल्मों के लिए वे हर समय किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार रहते हैं। तिनका-तिनका जोड़ कर चिडिय़ा अपना घोंसला बनाती है। अनुराग ने छोटी-छोटी कोशिशों से अपनी प्रोडक्शन कंपनी खड़ी की है। इस कंपनी के तहत वे नए फिल्मकारों को मौके दे रहे हैं। उनकी कोशिश रहती है कि प्रतिभाशाली युवा निर्देशकों उनकी तरह भटकना न पड़े। ठोकरें न खानी पडें। उनका दफ्तर अनेक महत्वाकांक्षी निर्देशकों का डेरा और बसेरा बना रहता है। देश की बड़ी संस्थाओं से पढ़ कर आए लडक़े-लड़कियां उनके साथ काम कर रहे हैं। अनुराग की यह विशेषता है कि वे अपने सहयोगियों की ‘वैयक्तिता’ को नहीं दबाते। उनके दफ्तर में खुली आलोचना  की छूट है। नया प्रशिक्षु सहायक भी अनुराग कश्यप के काम पर उंगली उठा सकता है। उसके प्रति कोई दुराग्रह नहीं पाला जाता। अनुराग के करीबी मानते हैं कि अनुराग अपने आलोचकों को अपना सब से करीबी मानते हैं। उन्हें सीने से लगा कर रखते हैं। वे ‘निंदक नियरे राखिये’ के दर्शन में यकीन करते हैं।  ‘देव डी’ और ‘गुलाल’ की लोकप्रियता से अनुराग कश्यप को मेनस्ट्रीम में पहचान मिली। खास कर ‘देव डी’ की सफलता के बाद उम्मीद की जा रही थी कि वे बड़े बजट की मल्टी स्टारर फिल्म शुरू करेंगे। कई कारपोरेट कंपनियों के ऑफर भी थे, लेकिन अनुराग ने पिछली सफलता से खुद को बाहर कर लिया और ‘लो बजट’ में ‘दैट गर्ल इन येलो बूट््स’ का निर्माण और निर्देशन किया। उनके इस सिरफिरे व्यवहार से सभी को ताज्जुब हुआ, लेकिन अनुराग का निरालापन चालू रहा। अनेक युवा निर्देशकों को सीमित बजट की फिल्में देने के साथ वे खुद ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ बनाने निकले। उन्होंने तय किया कि वे इसे दो खंडों में बनाएंगे ताकि पूरी कहानी कही जा सके। कलाकारों और तकनीशियनों की टीम ने उन्हें समर्थन दिया। अभी ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ पोस्ट प्रोडक्शन के अंतिम चरण में है।   ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की अलग कहानी है। एक दिन सईद जीशान कादरी ने अनुराग कश्यप को संक्षेप में एक कहानी सुनाई। कहानी सुनकर वे हतप्रभ रह गए। उन्होंने पूछा, कहीं तुम मुझे उल्लू तो नहीं बना रहे हो। तुम जो बता रहे हो, वह सचमुच कहीं हुआ है क्या? मैंने उस से यही कहा कि तुम कोई प्रूव दो। वह दो दिनों के बाद अखबार की कतरनें लेकर आया, जिसमें पुश्तैनी दुश्मनी और हत्या की खबरें थी। फिर मैंने अपनी टीम को वहां भेजा। उन्होंने आकर बताया कि ऐसी कहानियां वहां हैं। आए दिन ऐसी घटनाएं होती रही हैं। सईद जीशान कादरी के साथ सचिन लाडिया और आखिलेश जायसवाल लेखक के तौर पर जुड़े। फिर स्क्रिप्ट तैयार हुई।  तीन पीढिय़ों के बदले की यह कहानी 60 सालों तक चलती है। अनुराग कश्प इस फिल्म की शूटिंग वास्तविक लोकेशन पर करना चाहते थे। लेकिन लाजिस्टिक दिक्कतों के कारण उन्होंने मिर्जापुर और बनारस के आस पास मुख्य शूटिंग की। वे धनबाद भी गए। वहां के धूसरित परिवेश को अपनी फिल्मों में लेकर लौटे। 60 सालों की कहानी को पीरियड के हिसाब से शूट किया गया है। फिल्म के पहले हिस्से की शूटिंग में उस दौर की फिल्मों का स्टाइल रखा गया है, जबकि आज की कहानी के लिए डिजिटल कैमरे के साथ आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। हिंदी फिल्मों में उत्तरप्रदेश, बिहार और झारखंड को ओरिजनल रंगों में हीं दिखाया गया है। अनुराग ने अपने जमीनी और वास्तविक किरदारों को उनका वास्तविक परिवेश दिया है। कॉस्ट्यूम, भाषा, प्रोपर्टी सभी आवश्यक तत्वों पर पूरा ध्यान दिया गया।   इस फिल्म में मनोज बाजपेयी, पियूष मिश्रा, नवाजुद्दीन सिद्दिकी के साथ तिग्मांशु धूलिया भी प्रभावशाली भूमिका में दिखेंगे। फिल्म के मूल लेखक सईद जीशान कादरी ने भी एक रोल किया है। उन्होंने रोल मिलने की शर्त पर ही अनुराग कश्यप को कहानी दी थी। इस फिल्म में ऋचा चड्ढा और हूमा कुरैशी भी खास भूमिकाओं में हैं। यशपाल शर्मा ने बैंड गायक की अनोखी भूमिका निभायी है। इसके साथ म्यूजिक डायरेक्टर स्नेहा खानवलकर ने परिवेश के हिसाब से इसमें 25 गाने गूंथे हैं। इस फिल्म के लिए शारदा सिन्हा, मनोज तिवारी समेत स्थानीय गायकों और गृहणियों तक से गाने गवाए गए हैं।   ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के दोनों खंडो को ‘डायरेक्टर्स फोर्टनाइट’ सेक्शन में जगह मिलना बड़ी बात है, इसमें पूरे विश्व के वैसे दिग्गज फिल्मकारों की फिल्मों को चुना जाता है, जिनकी अपनी पहचान है। मौलिक, नए और वैयक्तिक पहचान की फिल्मों का यह सेक्शन कान फिल्म फेस्टिवल में विशेष महत्व रखता है। अनुराग कश्यप और उनकी टीम ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ को अंतिम टच देने में लगी है। भारत में यह फिल्म जून-जुलाई में रिलीज होगी।   बनारस से वाया दिल्ली फिल्मों की नगरी मुंबई पहुंचे अनुराग कश्यप की यह व्यक्तिगत उपलब्धि वास्तव में उनकी टीम की मेहनत का नतीजा है। अनुराग कश्यप की कामयाबी युवा फिल्मकारों को प्रेरित कर रही है। वे अपनी पीढ़ी के अगुआ फिल्मकार बन गए हैं।   

Tuesday, May 22, 2012

वक्‍त के साथ लोकगीत बन जाते हैं फिल्‍मी गीत


राज्‍य सभा में जावेद अख्‍तर ने कापीराइट मामले में मार्मिक बातें रखीं। चवननी के पाठकों से इसे शेयर करना जरूरी लगा।
Mr. Vice-Chairman, Sir, I must immediately declare that whatever I speak here will have something to do with this Bill under consideration, which has something to do with the music industry. I work for the music industry. My relationship with music is like a farmer’s relationship with agriculture, or, a lawyer’s relationship with judiciary. So, I hope, it will not be considered as any kind of conflict of interest.
दूसरी बात मैं यह कहना चाहता हूं कि मैं तीन बरस से यह स्‍पीच तैयार कर रहा था, मेरे पास बहुत नोट्स हैं और बहुत मैटीरियल हैं, लेकिन मैंने उसे फेंक दिया, इसलिए कि जब मैं यहां बैठा था और सुन रहा था, तो मुझे लगा कि कुछ और भी बातें हैं, शायद जो बात मैं कह रहा हूं, उससे भी ज्यादा हैं। मैं एक writer हूं, मैं एक lyricist हूं, लेकिन इन तमाम चीजों से पहले मैं एक हिंदुस्‍तानी हूं और जब मुझे मालूम होता है, यह तो 60-65 साल पहले की बात है कि लकीर पुंछ से खींची गयी है, ये तो हिंदुस्‍तानी हैं, जो वहां trapped हैं। ये कौन लोग हैं?
ये आज से 65 साल पहले तो हिंदुस्‍तानी ही थे। ये वहां घिरे हुए हैं। इनमें और अंगोला में जो हिंदुस्‍तानी हैं, उन दोनों में कोई फर्क नहीं है। हमारा फर्ज है कि हम बहुत संजीदगी से इसके बारे में सोचें, लेकिन मुझे यहां जो बातें सुनने को मिलीं, वे एक आदमी के बारे में, एक incident के बारे में सुनने को मिलीं। Incident और आदमी बड़े मामूली होते हैं, पीछे होता है जहन, पीछे होती है ideology, पीछे होती है thinking, पीछे होता है mindset. पाकिस्‍तान का mindset क्या है? आप किस मुल्‍क से मांग रहे हैं कि वह अपनी minority को सही तरीके से ट्रीट करे? जिस मुल्‍क की बुनियादों में ही नफरत डाली गयी है, जो नफरत की वजह से बना है, आप उससे कह रहे हैं आप अपनी minority को ठीक से ट्रीट करिए। अगर वह अपनी minority के साथ सही सुलूक करे, अगर वह हर इंसान को इंसान समझे, अगर वह हर citizen को बराबर का citizen समझे, तो पाकिस्‍तान क्‍यों बनाया था?
मेरा एक शेर है -
मेरी बुनियादों में कोई टेढ़ थी,
अपनी दीवारों को क्या इल्‍जाम दूं?

इसकी बुनियाद में टेढ़ है, आप इसकी दीवारों को सीधा करने के लिए कह रहे हैं, ये कैसे सीधी होगी? ये दीवारें तो टूटेंगी ही, और कुछ नहीं होने वाला। दीवार 1971 में टूटी थी, दीवार फिर टूटेगी। ये बड़ा politically correct statement है “We want a stable Pakistan”. मुझे तो politics में नहीं जाना है, न कोई पार्टी join करनी है, न मुझे किसी का वोट चाहिए। I do not want a stable Pakistan because it is not possible, it is beyond any possibility. जिस चीज पर वह बना है, वह stable हो ही नहीं सकती।
आज बलूचिस्‍तान का जो चीफ है, BLA का जो चीफ है, दो बरस पहले उसने एक स्‍टेटमेंट दिया था, edict जारी किया था कि बलूचसि्‍तान में कोई भी हिंदू, कोई भी क्रशि्चियन, कोई भी पारसी is most welcome, लेकिन कोई भी पंजाबी मुसलमान और कोई उर्दू स्‍पीकिंग मुसलमान यानी मुहाजिर हम यहां accept नहीं करेंगे। That much for the religious identity. आप तो मुसलमान तब तक हैं, जब तक हिंदू हैं। जब हिंदू ही खत्म कर दिये, तो आप शिया हो गये, सुन्नी हो गये, पता नहीं क्या-क्या हो गये? पहले तो सब मुसलमान थे, जब पाकिस्‍तान बन रहा था। फिर अहमदिया नहीं रहे, कादियानी नहीं रहे, अब कहते हैं कि शिया, मुसलमान नहीं हैं। दो रवैये हैं जिंदगी के, एक अपनाने के, दूसरा छोड़ने के। जब आदमी छोड़ने के रास्‍ते पर चलता है, तो छोड़ता ही चला जाता है। उसकी कोई हद नहीं है। यह शेर तो इन्हीं के मुल्‍क के एक बहुत बड़े शायर का है…
तुम्‍हारी तहजीब अपने खंजर से आप ही खुदकुशी करे,
जिस शाखे नाजुक पर आशियाना बनेगा ना पायदार।

जो कमजोर डाली पर आशियाना बनाओगे, तो वह तो गिरने ही वाला है। कमजोर डाली है, मुल्‍क धर्म से नहीं बनते। हमारे मुल्‍क में भी लोगों को सीखना चाहिए कि मुल्‍क धर्म से बनाओगे, तो यह होगा। मुल्‍क बनते हैं कल्‍चर से, मुहब्‍बत से, अपनाइयत से, तमाम चीजें एक-दूसरे से अलग हैं, लेकिन आप जुड़कर रहें, तब मुल्‍क बनता है। मैं फख्र से कहता हूं कि मैं उस मुल्‍क का बाशिंदा हूं कि जिस मुल्‍क में मैं पच्चीस बार आरएसएस के खिलाफ स्‍टेटमेंट दे चुका हूं, लेकिन जब मुझे कॉपीराइट की जरूरत पड़ती है, तो मैं अरुण जेटली साहब के पास जाता हूं और वे मेरी बात सुनते हैं और कहते हैं कि मैं तुम्‍हारी मदद करूंगा। यह है हिंदुस्‍तान!
हिंदुस्‍तान यह है कि मैं आगरा गया और मैंने जब ताजमहल देखा, तो वहां जो पत्तियां बनी थीं, मैंने पूछा कि ये किन लोगों ने बनायी हैं? अब ऐसे लोग क्‍यों नहीं हैं? तो बोले, आइए दिखा देते हैं। हमें ले गये, लड़के एक लाइन से बैठे हुए वहीं संगमरमर की पत्तियां बना रहे थे। मैंने पूछा तो बताया कि गुजरात में एक जैन मंदिर बन रहा है। उनका नाम पूछा तो सब मुसलमान थे। ये है हिंदुस्‍तान! ये क्या करेंगे? इन्‍हें क्या मालूम? ये कुएं के मेंढक हैं, ये वहीं रह जाएंगे। इनका कुछ नहीं होना है। मुझे दुख है, मैं खुशी से नहीं कह रहा हूं।
पाकिस्‍तान में बहुत अच्छे लोग थे। फैज अहमद फैज पाकिस्‍तान के थे और उनकी सोच के बहुत लोग वहां हैं, लेकिन वे minority में हैं, वे कमजोर हैं। उनकी कोई सुनने वाला नहीं है। वहां आम इंसान भी अच्छा है। वह हिंदुस्‍तान की फिल्‍में देखना चाहता है, हिंदुस्‍तान के गाने सुनना चाहता है, हिंदुस्‍तान की इंडस्‍ट्री से impressed है, हिंदुस्‍तान की democracy से impressed है, लेकिन वह कुछ नहीं कर सकता। जिन लोगों के हाथ में ताकत है, जिन लोगों के हाथ में फौज है, जिन लोगों के पास जागीरदारियां हैं और जागीरदारी उन्‍होंने खत्म नहीं कीं, वह लूट बाकी है। जब एक समाज में लूट रहे हों, जहां human rights न हों, जहां equality नहीं हो, तो उसे कवर करने के लिए आपको एक philosophy चाहिए होती है और वह philosophy उन्‍होंने अपने मजहब की अख्तियार की, जिसके नीचे दरअसल economic exploitation है। जिसके नीचे इंसान पर जुल्‍म है, कभी इस बहाने, कभी उस बहाने। आपने एक minority का जिक्र किया, मैं जानता हूं कि वहां ईसाई minority के साथ क्या हो रहा है? तो आप यह सोचें, जरूर आप यह स्‍टेटमेंट दे दीजिए कि आपके Ambassador जाएंगे, वे आएंगे, बात कर लेंगे।
इतिहास का पहिया खुद चलता है। अगर Ambassadors फैसले करके दुनिया बदल सकते तो क्या बात थी। यह वक्‍त का पहिया है और वक्‍त का पहिया गलत स्‍ट्रक्‍चर को तोड़ता है, तो आप इंतजार कीजिए।
अब आइए वापस आते हैं, जिस मुसीबत में मैं हूं और हमारे हजारों लोग हैं।
सर, बड़े जमाने से ये तकलीफें थीं, लेकिन शायद हिंदुस्‍तान के कलाकार समझते थे कि बोलेंगे, तो सुनने वाला कौन है? लेकिन अब वक्‍त बदल रहा है, लोग बदल रहे हैं, हालात बदल रहे हैं। उम्‍मीद करता हूं कि कानून भी बदलेगा और हिंदुस्‍तान के कलाकारों की किस्‍मत भी बदलेगी। तो आज इस यकीन से उनके बारे में बोल रहा हूं कि इस किनारे से उस किनारे तक इस सदन में जितने लोग हैं, वे मेरी बात पूरे ध्यान से सुन रहे हैं, पूरे दिल से सुन रहे हैं और अगर बात हिंदुस्‍तान के संगीतकारों और गीतकारों की है, तो ऐसा ही होना चाहिए, इसलिए कि यह मुल्‍क, यह धरती गीतकारों और संगीतकारों की है। यह बात मैं इसलिए नहीं कह रहा हूं कि सुनने में अच्छी लगती है, बल्कि यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि सच्ची है। दुनिया में कौन सा दूसरा मुल्‍क है, जहां एक मुल्‍क में classical परंपरा की दो traditions सैकड़ों साल पुरानी हैं – हिंदुस्‍तानी और कणार्टक। दुनिया में कौन सा ऐसा मुल्‍क है जहां लोक संगीत के इंद्रधनुष में इतने रंग हों, जितने यहां हैं? कश्‍मीर से कन्याकुमारी तक जाकर देख लीजिए, महाराष्‍ट्र से मणपिुर तक जाकर देख लीजिए, क्या-क्या रंग हैं म्‍यूजिक में? दुनिया में कौन सा ऐसा मुल्‍क है, जहां पवति्र ग्रंथ में भी शायरों का नाम और काम मिलता है? हमारे गुरु ग्रंथ साहबि, हमारे रामचरतिमानस में “रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्राण जाइ पर वचन न जाई” – राजा दशरथ रानी कैकेयी से यह महाकवि तुलसीदास के शब्‍दों में कहते हैं। दुनिया में कहां ऐसा मुल्‍क है, जहां जन्म से लेकर मरण तक कोई जगह नहीं, कोई पल नहीं, कोई क्षण नहीं, जिस पर सैकड़ों गीत न हों? वह एहसास की कोई मंजिल हो, वह भावना की कोई रुत हो, वह ख्याल का कोई रंग हो, आपको सैकड़ों गीत मिल जाएंगे।
फिर हमारे फिल्‍मी गीत हैं, जो रिलीज होते हैं, तो फिल्‍मी गीत हैं, लेकिन कुछ दिनों के बाद वे लोकगीत बन जाते हैं। वक्‍त की छलनी से सब कुछ बह जाता है – एक्टर का चेहरा, फिल्‍म का नाम – और वह अमर गीत रह जाता है, जो आपके अतीत का, आपकी यादों का हसि्‍सा बन जाता है। आज आपके कानों में जब कोई पुराना गीत गूंजता है, तो ऐसा लगता है जैसे लड़कपन के किसी दोस्‍त ने कंधे पर हाथ रख दिया हो और कह रहा हो, बैठो, कहां जा रहे हो, बात करो। यादों का मेला लग जाता है। यह गीत कहां सुना था, कब सुना था, किसके साथ सुना था और कभी-कभी यह भी याद आता है कि किसके लिए सुना था। हैरत होती है और हैरत से ज्यादा गम होता है कि जिस मुल्‍क में संगीत के और शायरी के इतने चिराग रोशन हों, उनके नीचे देखिए तो अंधेरा ही अंधेरा है। जिस अंधेरे में हिंदुस्‍तान के राइटर्स और म्‍यूजिशियंस की जिंदगी बरसों से लाचार और बेबस भटक रही है। लेकिन दिल में एक उम्‍मीद है कि एक दिन आएगा, जब हमारी सुनी जाएगी। एक दिन आएगा जब हमें इंसाफ मिलेगा, एक दिन आएगा जब हमें हमारा अधिकार मिलेगा।
“आएगा आने वाला” बहुत मशहूर गीत था। साठ साल से ज्यादा पुराना गीत है। यह गीत कंपोज किया था, पंडित खेमचंद प्रकाश ने, जो अपने जमाने के बहुत बड़े संगीत विद्वान थे। पिछले दिनों एक अजीब वाकया हुआ। सर, जब एक गाना रिकॉर्ड होता है तो उसमें दो रॉयल्‍टीज जेनरेट होती हैं, एक साउंड रिकॉर्डिंग रॉयल्‍टी कहलाती है जो साउंड रिकॉर्डिंग का मालिक है, प्रोड्यूसर या म्‍यूजिक कंपनी, उसके लिए होती है और एक परफॉर्मिंग होती है जो राइटर और म्‍यूजिशियन के लिए होती है। यहां पर भी यह कानून है – यह अभी नहीं आ रहा है, यह कानून पहले से है – और बाहर भी है। बाहर जरा थोड़ा सा अलग है, वहां सचमुच राइटर और म्‍यूजिशियन को पैसा दे देते हैं। वहां पर कहीं 13-14 हजार रुपये खेमचंद प्रकाश जी के अकांउट में इस गाने के लिए जमा हो गये। वह पैसा यहां भेजा गया। खेमचंद प्रकाश जी तो इस दुनिया में नहीं हैं। जब ढूंढ़ा गया तो उनकी पत्नी मलाड में स्‍टेशन पर भीख मांगती हुई मिल गयीं। यह कोई बहुत हैरत की बात नहीं है, ऐसी बहुत सी कहानियां हैं।
इसी तरह ओपी नैयर साहब थे। मुझे याद है, मैं तब छोटा सा था तो एक फिल्‍म आयी थी – “मुजरिम”, जिसमें शम्‍मी कपूर और पद्मिनी हीरो-हीरोइन थे। उसके पोस्‍टर पर हीरो-हीरोइन की तस्‍वीर नहीं थी बल्कि हारमोनियम लिए ओपी नैयर साहब खड़े थे – सुर के जादूगर, ओपी नैयर। वे ओपी नैयर मुंबई के बाहर नाला सुपारा नाम की एक छोटी सी बस्‍ती है, वहां पर अपनी आखिरी उम्र में एक फैन के घर में छोटे से कमरे में रहे थे और होम्‍योपैथी के इलाज से उन्‍होंने अपनी जिंदगी गुजारी, जबकि उनके सैकड़ों गाने बजते रहे और उसकी रॉयल्‍टी म्‍यूजिक कंपनीज लेती रहीं।
इसी तरह से मजरूह, शैलेंद्र, गुलाम मोहम्‍मद – आपको कितने नाम बताऊं, जिन लोगों ने क्या-क्या कांट्रीब्‍यूट किया है? शैलेंद्र जैसा गीतकार क्या कभी फिर पैदा होगा? क्या बर्बाद ख़ती है? क्‍यों, क्या वजह है? अगर हमारे यहां भी रॉयल्‍टी की इजाजत है, हमारे यहां भी रॉयल्‍टी का कानून है … (व्‍यवधान) … इन शहीदों की बड़ी लंबी लसि्‍ट है, किस-किसका नाम लें? “नाम किस-किस के गिनाऊं, तुझे याद आये।” इसकी क्या वजह है? इसके मुकाबले में दूसरी तरफ चलिए।
69-70 में बीटल्‍स की टीम टूट गयी थी। पिछले साल सिर्फ Paul Mccartney को, जिसने अपनी जिंदगी में 27 गाने लिखे, 16 मिलियन डॉलर गाना लिखने की रॉयल्‍टी मिली है। Elton John, जिसने पांच साल से कोई रिकॉर्ड नहीं बनाया, पिछले साल उसे 22 मिलियन डॉलर्स रॉयल्‍टी मिली है।
हमारे यहां जो रॉयल्‍टी का सिस्‍टम है, हमारे यहां आईपीआरएस है, Indian Performance Rights Society है, आप ही की दुनिया से जमा भी की जाती है। यह कहां चली जाती है? आप इजाजत दें तो मैं एक छोटा सा पैराग्राफ आपको पढ़कर सुनाता हूं। यह एक compulsory move है, जो हर कांट्रैक्‍ट में, वह चाहे भारत रत्न पंडित रवि शंकर के लिए हो या दो ऑस्‍कर के विनर एआर रहमान के लिए हो या मेरे जैसे मामूली आदमी या गुलजार के लिए हो, यह कंडिशन उसमें होती है।
“The rights assigned, included but not restricted to the rights of mechanical, digital, reproduction, in any manner or format or media whether existing or future, publication, broadcasting, reproducing, hiring, granting, translation, adaption, synchronization, making and used in a cinematographic film, performing in public, publishing in any other way, whole or part of the literary work, the rights to grant the mechanical and reproduction, publication, sound and television, broadcasting, transmission over the airways, electronically or through satellite or literary works.” Now, here the plot thickens. ‘Including all forms of communication, transmission, reproduction and exploitation of the literary work that may be discovered or invented in the future. The said work has been assigned by me for good and valuable consideration.’
यह bonded labour नहीं तो क्या है? सिर्फ अंग्रेजी में लिख दिया, है तो bonded labour और इसके ऊपर किसने शिकायत की? भारत रत्न रो रहा है। भारत रत्न मंत्री जी को, LoP को और प्राइम मिनिस्‍टर को लेटर लिख रहा है कि साहब ये रॉयल्‍टी का चेंज करा दीजिए। अगर एआर रहमान और पंडित रवि शंकर को यह शिकायत है, तो बाकियों की हालात सोचिए क्या होगी?
इससे भी ज्यादा एक शर्म की बात यह है कि यह कांट्रेक्ट सिर्फ हिंदुस्‍तानी देसी कंपनियां ही साइन नहीं करवातीं हैं, बल्कि जो जापान की हैं, जो जर्मनी की हैं, जो अमेरिका की हैं, इनकी हिम्‍मत नहीं हो सकती कि जापान में, जर्मनी में या अमेरिका में किसी फनकार को, किसी कलाकार को यह कहें कि इस पर साइन कर दो। क्या फर्क है इनमें और ईस्‍ट इंडिया कंपनी में और क्या फर्क है उन हिंदुस्‍तानी कंपनियों में और मीर जाफर में, जो इनके साथ मिल कर काम कर रही हैं। हमारे कलाकार से, किस-किस से, मैं आपको नाम सुनाऊंगा, ये सिर्फ फिल्‍म की एक प्राब्‍लम नहीं है, हरेक की है। आप इन्‍हें जलील कर रहे हैं और ये सिर्फ पैसे के लिए बात नहीं है, जब इतनी grip होती है, र्माकेटिंग इतनी strong हो जाए, तो creativity pays.
मुझे पिछले दिनों शिव कुमार शर्मा जी मिले, हमें proud होना चाहिए कि हमारे पास एक ऐसा फनकार है, ऐसा कलाकार है। उन्‍हें एक म्‍युजिक कंपनी ने बुलाया। उनसे कहने लगे, देखिए, हम आपका ऐड बनाते हैं, आपका क्या है, आप शुरू बड़ा धीरे-धीरे करते हैं। वह end में जो तेज होता है न, आप उससे शुरू कीजिए, folk चलेगा। यह म्‍यूजिक कंपनी वाला शिव कुमार शर्मा को बता रहा है। उन्‍होंने कहा साहब, मेरे मोहल्‍ले में एक बैंड है, बारातों में जाता है, उसका ऐड बना लीजिए। मुझे माफ करना। एक बार मेरे साथ वाकिया हो चुका है।
एक म्‍युजिक सिटी में था, म्‍युजिक कंपनी के मालिक आ गये। मैंने सोचा शायद मेरे फैन होंगे, सुनने आये हैं मैंने क्या लिखा है। उन्‍होंने मुझे सुना और कहने लगे कि आपने पहली लाइन में एक वर्ड “रूठना” लिखा है, आप यह वर्ड निकाल दीजिए। मैंने कहा, क्‍यों? वे बोले आजकल यह वर्ड चलता नहीं है। मैंने कहा कि कहां नहीं चलता है, बोले नहीं, नहीं। मैंने उन्‍हें कई गाने सुनाये, जिनमें “रूठना” वर्ड आया। उन्‍होंने कहा कि कभी होगा, यह वर्ड आप निकाल दीजिए। मैंने कहा कि भाई, अगर आपको इस तरह से काम करना है, तो मैं तो कर नहीं सकता हूं, आप किसी और को ले लीजिए। वह मेरी बड़ी इज्जत करता था। अगले ही दिन मेरी बात मान गया और किसी और को ले लिया, मुझे निकाल दिया।
जो लोग इस बिल के खिलाफ हैं, वे क्या करें? वे कहते हैं कि देखिए, आपने तो गाना लिखा, किसी ने म्‍युजिक दिया, एक प्रोड्यूसर ने बड़ा पैसा खर्च करके उसे तैयार किया, उस प्रोड्यूसर ने उस गाने को बड़े-बड़े स्‍टार्स पर, बड़ी अजीब-अजीब लोकेशन पर जाकर पिक्चराइज किया, उसमें बड़े-बड़े शॉट डाले, बड़े-बड़े विजुअल डाले, ये सब किस काम के लिए किया, फिल्‍म के लिए किया। ये फिल्‍म प्रोड्यूसर है, यह म्‍युजिक प्रोड्यूसर नहीं है। इसे यह गाना फिल्‍म के लिए चाहिए, यह गाना वह फिल्‍म के लिए record करता है। हम तो फिल्‍म से कुछ नहीं मांग रहे हैं। तुम्‍हारी फिल्‍म सुपरहिट हो जाए, तुम जानो, न चले तुम जानो, हमारा उससे कोई रिश्‍ता नहीं है। फिल्‍म बड़ी से बड़ी हिट हो जाए, मैंने बहुत सुपरहिट फिल्‍में लिखी हैं, मेरे पास तो कोई प्रोड्यूसर आया नहीं कि हजूर, आपने तो शोले लिख दी, दीवार लिख दी, त्रिशूल लिख दी, ये लीजिए, खुशी से आपके लिए लाया हूं, हमने तो नहीं देखा। ये तो पिक्चर के लिए था, हमने पैसा ले लिया, अब आपकी किस्‍मत, आप कैसी पिक्चर बनाते हैं, हम तो उसके लिए जिम्‍मेदार नहीं हैं। अगर हिट है, तो भी आपकी क्रेडिट और फ्लाप है तो भी आपकी क्रेडिट। जब आप इसमें से निकालते हैं और दूसरी जगह इस्‍तेमाल करते हैं, तो वहां भी जो रॉयल्‍टी होती है, जरा देखिए, सरकार ने कानून बनाया था कि वह 50 फीसदी जाएगी आर्टिस्‍टों को और 50 फीसदी हमें जाएगी। हम लोगों ने वहां पर कहा कि नहीं। अचानक ऐसी बात होगी, तो यह अच्छा नहीं लगेगा। आप 75 फीसदी उन्‍हें दे दीजिए और हमारे कहने पर चेंज किया गया, यह शराफत हमारी थी। मगर उनकी शराफत यह है कि उन्‍हें 99 नहीं चाहिए, उन्‍हें 100 चाहिए। यह तो दूसरी जगहों से आ रहा है, अगर यहां भी उनका हक है तो एक काम कीजिए। एक आदमी एक फिल्‍म बनाता है, उसमें शाहरूख खान हीरो है, पिक्चर चली, नहीं चली, कोई बात नहीं, मैं उसमें से चार शॉट निकाल कर, मैं प्रिंट का मालिक हूं, एक ब्‍यूटी के ऐड में इस्‍तेमाल कर लेता हूं। मुझे इसका हक है। वह कहेगा कि मैंने यह शॉट तो फिल्‍म के लिए दिया था, आपने ब्‍यूटी की ऐड में कैसे इस्‍तेमाल कर लिया?
यही मेरा सवाल है कि जहां हमने फिल्‍म के लिए दिया था, वहां हम कोई क्लेम नहीं कर रहे हैं। जब आप उसे फिल्‍म से निकाल कर इस्‍तेमाल करते हैं, तब भी हम कहते हैं आप 75 परसेंट ले लो और आप को साढ़े बारह परसेंट देने में तकलीफ है। यह तो लालच की बात है, बहुत छोटी बात है। एक साहब गुप्‍ता जी हैं, कहने लगे कि साहब यह तो होगा कि आप एलाऊ नहीं करेंगे, आप सारी रॉयल्‍टी ले लेना। यहां इसमें copyright एसाइनमेंट बैन नहीं है। यह सिर्फ discipline किया गया है कि आप उनसे इतनी रॉयल्‍टी नहीं ले सकते या आप नहीं दे सकते। यह पाबंदी प्रोड्यूसर्स पर नहीं है, म्‍यूजिक कंपनीज पर नहीं है, यह पाबंदी तो हम पर है, आर्टिस्‍ट्स पर है, राइटर्स पर है। लेकिन शिकायत उन लोगों को है, हम लोगों को शिकायत नहीं है। हिंदुस्‍तान के सारे कलाकार अपोजिशन की ओर तथा सरकार की ओर हाथ जोड़ रहे हैं कि प्‍लीज इसे 25 परसेंट बोनाफाइड करवा दीजिए। आप इसमें से 75 परसेंट ले रहे हैं, फिर आपको और क्या चाहिए? मगर कहते हैं कि कांट्रेक्‍ट पर हिंड्रेंस है। अच्छा, minimum wages legislation भी कांट्रेक्‍ट पर हिंड्रेंस है? आज हम जहां दिल्‍ली में खड़े हैं, यहां एग्रीक्लचर में skilled labour भी 328 रुपये से कम में काम नहीं कर सकता और unskilled labour 270 रुपये से कम में काम नहीं कर सकता। वे कह रहे हैं कि साहब, मैं डेढ़ सौ रुपये में करने को तैयार हूं। उन लोगों के लिए तो hindrance of contract हो गया।
Dowry Prohibition Act क्या है? एक आदमी है और उसकी बेटी है, वह डावरी देने को तैयार है। उसकी बेटी डावरी के लिए तैयार है, लड़का डावरी लेने के लिए तैयार है और लड़के का बाप भी खुश है। सरकार को क्या एतराज है? सरकार को एतराज यह है कि उसे मालूम है कि यह इक्वल फैसला नहीं हो रहा है, यह मजबूर है। हमें इसको रोकना पड़ेगा। child labour में क्या गड़बड़ है? जो Child Labour (Prohibition and Regulation) Act है, वह क्या है? अरे भाई, मां-बाप अपने बच्‍चों से काम करवाने को तैयार हैं, बच्चा तैयार है और कारखाने वाला भी तैयार है। हमें मालूम है कि यह तैयारी किस हालत में होती है। यह भी देखिए कि पिछले बीस बरस में स्‍टैंडिंग कमेटी ने कहा कि हमें एक कांट्रेक्‍ट लाकर दो, जिसमें राइटर्स ने अपनी पब्लिशिंग राइट तुम्‍हें नहीं दिये। वे नहीं ला सकते, इसलिए है ही नहीं। ये bounded labour हैं। उसके बाद हमदर्दी भी है, कह रहे हैं कि अगर उसको जरूरत पड़ गयी, अचानक सब देखना चाहे, तो आपने तो उसका हाथ बांध दिया। मैं श्री एनके सिंह जी की इजाजत से शेक्सपियर को कोट करना चाहूंगा। मैं समझता हूं कि यहां कम से कम इस हाउस में उनके पास copyright है। …
यह पता नहीं किसका नजरिया है, जब मेरी बारी आयी तो पर्दा गिरा दिया। सर, मैं सिर्फ चार या पाचं मिनट और लूंगा। “It is time to fear when tyrants kiss”. जब जालिम हमदर्दी करे तो डरने का वक्‍त है। जब म्‍यूजिक कंपनीज कह रही हैं कि बेचारे राइटर का क्या होगा अगर इसके बाद ये राइट नहीं हुए तो? इसके खिलाफ कौन लोग हैं, जो खास जनों से कहते हैं कि भाई, यह मत कीजिएगा। आप जरा उनके नाम सुन लीजिए। सारे नाम तो बहुत ज्यादा हैं, मैं सारे नाम तो नहीं बता सकता, लेकिन कुछ नाम अवश्‍य बता देता हूं, पं रवि शंकर, पं शिव कुमार शर्मा, पं हरिप्रसाद चौरसिया, शोभा मुदगल, विशाल भारद्वाज, गुलजार, प्रसून जोशी, जगजीत सिंह, अमजद अली खान, अमान अली खान और अयान अली खान। रवि जी, तो इंतजार में ही चले गये, जगजीत सिंह भी इंतजार में ही चले गये, इनके भी सिग्नेचर हैं। विशाल शेखर … (व्‍यवधान) … वे तो टेलेंटेड थे। इनमें और भी बहुत से नाम हैं। फिल्‍म इंडस्‍ट्री के सारे नाम तो हैं ही, कलाकारों के भी नाम हैं। इनमें जाकिर का नाम है, इनका नाम है, साउथ के सारे बड़े सिंगर्स का नाम है, एआर रहमान का नाम है, बंगाल के सारे बड़े सिंगर्स और म्‍युजिशियंस का नाम है। ये लोग कहते हैं इसको कर दीजिए। क्‍यों भई? अच्छा, एक बात और है, ये कहते हैं कर दीजिए, लेकिन यह पुराने पर नहीं होना चाहिए। यह बात किसी हद तक सही है, किसी हद तक सही नहीं है। मतलब, यदि यह बिल आ जाए और आप कल को यह कहें कि मेरा गाना 1960 से रिलीज हुआ था, आप मुझे उसका हिसाब बताइए, तो यह बेकार बात है, क्‍योंकि कोई भी लॉ रेट्रोस्‍पेक्टिव में नहीं लग सकता है। ऐसा कानून है कि अगर अब वह गाना बजेगा, तो उसकी रॉयल्‍टी होगी, तब, उस वक्‍त, आपने जो कर दिया, वह कर दिया, आप उसको भूल जाइए, हम भी भूल जाएंगे, इसलिए जब तक यह नहीं होता, यही एक तरीका है, क्‍योंकि सारे म्‍युजिशियंस, सारे राइटर्स गलत नहीं हो सकते हैं।
एक तरफ ये हैं और दूसरी तरफ ये मल्‍टीनेशनल्‍स हैं, बड़े-बड़े प्रोड्यूसर्स हैं, जो pretend कर रहे हैं कि प्रोड्यूसर्स का बहुत नुकसान है। दरअसल जो अप फ्रंट मनी होती है, वह तो केवल दस, बारह प्रोड्यूसर्स को मिलती है, बाकियों को एक नया पैसा तक नहीं मिलता है। जब यह बिल आएगा, तब पहली बार उन छोटे प्रोड्यूसर्स को पैसा मिलेगा, वह इसलिए क्‍योंकि पब्लिशिंग हमारे हाथ में होगी और वह पब्लिश होगा, वरना म्‍युजिक कंपनियां सब ले जाती हैं, उसे बेच देती हैं। 90 परसेंट प्रोड्यूसर्स को इससे फायदा ही होना है और सच तो यह है कि 10 परसेंट, जो यह समझ रहे हैं कि उनका नुकसान होगा, उनको भी फायदा ही होगा, क्‍योंकि वे जितने में बेचते हैं, वह कम है। लेकिन जब तक यह बिल पास नहीं होगा, तब तक यह जुल्‍म, यह सितम, यह लूट चलती ही रहेगी। यह एक अंधेरा है, जिसमें हम चल रहे हैं। मुझे वह शेर याद आता है कि…
सियाह रात, नहीं नाम लेती ढलने का,
यही तो वक्‍त है, सूरज तेरे निकलने का

इसलिए यह बिल आज पास होना चाहिए। शुक्रिया।

कुछ बदल तो रहा है...

 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 

    सिनेमा के लोकतंत्र में वही पॉपुलर होता है, जिसे दर्शक और समीक्षक पसंद करते हैं। ऑब्जर्वर और उपभोक्ताओं की संयुक्त सराहना से ही सिनेमा के बाजार में प्रतिभाओं की पूछ, मांग और प्रतिष्ठा बढ़ती है। हमेशा से जारी इस प्रक्रिया में केंद्र में मौजूद व्यक्तियों और प्रतिभाओं की स्थिति ज्यादा मजबूत होती है। परिधि से केंद्र की ओर बढ़ रही प्रतिभाओं में से अनेक संघर्ष, धैर्य और साहस की कमी से इस चक्र से बाहर निकल जाते हैं, लेकिन कुछ अपनी जिद्द और मौलिकता से पहचान और प्रतिष्ठा हासिल करते हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की बात करें तो यहां बाहर से आई प्रतिभाओं ने निरंतर कुछ नया और श्रेष्ठ काम किया है। हिंदी फिल्मों को नया आयाम और विस्तार दिया है। वे परिवत्र्तन लाते हैं। हालांकि यह भी सच है कि नई प्रतिभाएं कालांतर में एक नया केंद्र बनती है। फिर से कुछ नए परिधि से अंदर आने की कोशिश में जूझ रहे होते हैं।
    21वीं सदी के आरंभिक वर्षो से ही हम देख रहे हैं कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में देश के सुदूर इलाकों से आई प्रतिभाएं लगातार दस्तक दे रही हैं। उनमें से कुछ के लिए दरवाजे खुले। अब वे सफलता के मुकाम पर पहुंचती नजर आ रही हैं। इधर की तीन खबरों से नई प्रतिभाओं की सार्थक मौजूदगी की पुष्टि होती है। सबसे पहले कान फिल्म समारोह के विभिन्न खंडों में अनुराग कश्यप की तीन फिल्मों का चयन। लगभग सभी जानते हैं कि अनुराग कश्यप की पहली फिल्म ‘पांच’ अभी तक रिलीज नहीं हो पाई है, लेकिन इस दुद्र्धर्ष फिल्मकार ने हार नहीं मानी। ‘गुलाल’ और ‘देव डी’ से मिली पहचान के बाद उनकी स्थिति एक हद तक सुरक्षित और मजबूत हुई। इस बार कान फिल्म समारोह में उनकी निर्देशित ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ (दो खंड) और निर्मित ‘पेडलर्स’ चुनी गई है। यह कोई छोटी खबर नहीं है, फिर भी फिल्म इंडस्ट्री की उदासीनता हैरत में डालती है। फिल्म इंडस्ट्री की छोटी-मोटी इंटरनेशनल उपलब्धियों पर ट्विट और टिप्पणियों की बारिश करने वाले भी खामोश हैं। ऐसा लगता है कि इस खबर से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के कान पर जूं तक नहीं रेंगा है। यह उदासीनता और निरपेक्षता भयावह है, लेकिन युवा प्रतिभाएं डरने और निराश होने के बजाए अपने तई जूझती और लड़ती रहती हैं।
    दूसरी खबर है कि दिबाकर बनर्जी की फिल्म ‘शांघाई’ का सिंगापुर में आयोजित आईफा अवार्ड में प्रीमियर होगा। अभी तक आईफा में स्टारों से लक-दक फिल्में ही प्रीमियर होती रही हैं। कोशिश रहती है कि फिल्म इंडस्ट्री के किसी बड़े निर्देशक, बैनर या स्टार को उपकृत किया जाए। इस बार दिबाकर बनर्जी की ‘शांघाई’ चुन कर आईफा के अधिकारियों ने फिल्म इंडस्ट्री में आ रहे बदलाव को स्वीकार किया है। पहचान की ऐसी मोहरों की अपनी महत्ता होती है।
    तीसरी खबर है कि करीना कपूर युवा निर्देशक तिग्मांशु धूलिया की फिल्म करने के लिए आतुर हैं। पिछले दस सालों से फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय तिग्मांशु धूलिया को आखिरकार ‘पान सिंह तोमर’ की कामयाबी से पहचान मिली। अभी उनके सारे प्रोजेक्ट आरंभ हो रहे हैं। कारपोरेट हाउस को उनमें संभावनाएं दिख रही हैं और स्टारों को उनकी प्रतिभा का एहसास हुआ है। सुना है कि उनकी आगामी फिल्मों में से एक ‘बेगम समरू’ को लेकर करीना कपूर बहुत उत्साहित हैं।
    तात्तपर्य यह है कि जड़ीभूत फिल्म इंडस्ट्री में कुछ बदल रहा है। यह बदलाव महत्वपूर्ण है। इस बदलाव से फिल्म इंडस्ट्री में ताजगी आएगी। दर्शकों को भी कुछ नया देखने को मिलेगा। ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’, ‘शांघाई’ और निर्माणाधीन ‘बेगम समरू’ निश्चित ही इस बदलाव में मील के पत्थर साबित होंगे।
    गहरी और लंबी अंधेरी रात के बाद पौ फट रहा है।

Monday, May 21, 2012

चार तस्‍वीरें : दीपिका पादुकोण




दीपिका पादुकोण काकटेल फिल्‍म में लाल बिकनी पहने समुद्रतट पर लेटी हैं। क्‍या सिर्फ इन तस्‍वीरों की वजह से आप फिल्‍म देखेंगे ?

सत्‍यमेव जयते-3: एक दिन का तमाशा : आमिर खान

बेशकीमती हैं बच्चियां 
विवाह जीवन का बेहद महत्वपूर्ण अंग है। यह साझेदारी है। इस मौके पर आप अपना साथी चुनते हैं, संभवत: जीवन भर के लिए। ऐसा साथी जो आपकी मदद करे, आपका समर्थन करे। हम शादी को जिस नजर से देखते हैं वह बहुत महत्वपूर्ण है। शादी को लेकर हमारा क्या नजरिया है, इस पर हमारा जीवन निर्भर करता है। आज मैं मुख्य रूप से नौजवानों का ध्यान खींचना चाहता हूं। जो शादीशुदा हैं, वे अच्छा या बुरा पहले ही अपना चुनाव कर चुके हैं। भारत में हम शादी के नाम पर कितनी भावनाएं, सोच, कितना समय और कितना धन खर्च करते हैं! विवाह के एक दिन के तमाशे पर हम न केवल अपनी जमापूंजी लुटा देते हैं, बल्कि अकसर कर्ज भी लेना पड़ जाता है, किंतु क्या हम ये सारी भावनाएं, समय, प्रयास और धन विवाह में खर्च करते हैं? मेरे ख्याल से नहीं। असल में, हम इन तमाम संसाधनों को अपने विवाह में नहीं, बल्कि अपने विवाह के दिन पर खर्च करते हैं। बड़े धूमधाम से शादी विवाह के अवसर पर अकसर यह जुमला सुनने को मिलता है। विवाह उत्सव को सफल बनाने के लिए हम तन-मन-धन से जुटे रहते हैं। मैं उस दिन कैसा लगूंगा? समाज मुझे और मेरे साथी को कितना पसंद करेगा? लोग व्यवस्था के बारे में क्या कहेंगे? निमंत्रण पत्र के बारे में क्या कहेंगे? खाने के बारे में लोग क्या कहेंगे? वे कपड़ों के बारे में क्या कहेंगे? ये लोग हमारे दोस्त, नाते-रिश्तेदार और परिजन हैं। इन सबसे हमारी करीबी है और हम इन्हें विवाह में आमंत्रित करते हैं। हमारी ऊर्जा इस खास दिन को सफल बनाने में खप जाती है। यहां तक कि हमारे जीवनसाथी की पसंद भी इस दिन को शानदार बनाने से कहीं न कहीं जुड़ी रहती है। क्या आपने ये बयान नहीं सुने, मेरी बेटी तो इंजीनियर से शादी करेगी। मेरी बेटी तो आइएएस से शादी कर रही है। मेरी बेटी एनआरआइ से शादी कर रही है। हमें लगता है कि लोग ऐसे युवाओं को पसंद करते हैं और उनकी तारीफ से हमें खुशी मिलती है। हम अपने साथी के चुनाव में भी लोगों की पसंद-नापसंद का ध्यान रखते हैं, जबकि कटु सत्य यह है कि वे लोग अपना शेष जीवन वर या वधू के साथ नहीं बिताएंगे। कभी हम खानदान के आधार पर ही चुनाव कर डालते हैं। मेरे बेटे की शादी अमुक व्यक्ति की बेटी से हो रही है। हम वर या वधू के व्यक्तित्व पर ध्यान न देकर उसके परिवार के दर्जे पर लट्टू हो जाते हैं। आइए, हम शादी के कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर गौर करें। समय ऐसा ही पहलू है। दूसरों की चिंता में अपना अधिकांश समय खपाने के बाद हम खाने-पहनने की व्यवस्था में डूब जाते हैं। फार्म हाउस का चुनाव, मेन्यू, मेहमानों की सूची इन सब पर विचार करने में महीनों लग जाते हैं। यह सब समय उस दिन की तैयारी में लगता है, किंतु सबसे महत्वपूर्ण फैसले- सही जीवनसाथी का चुनाव, पर हम कितना समय लगाते हैं! मैं किस लड़की के साथ शादी कर रहा हूं? वह कैसी है जिसके साथ मैं अपना पूरा जीवन गुजारने जा रहा हूं। हमारा साथी एक व्यक्ति के रूप में कैसा है? उसकी आदतें कैसी हैं और सोच क्या है? क्या हमारी सोच से उसकी सोच मिलती है? क्या वह विनोदप्रिय है? क्या वह वही व्यक्ति है जिसके साथ मैं अपना पूरा जीवन बिताना चाहता था। इस नाजुक फैसले को लेने में हम पर्याप्त समय नहीं लगाते। अकसर एक मुलाकात के बाद ही शादी तय हो जाती है। घर वाले चहक कर कहते हैं, चलो, बात पक्की हो गई, मुंह मीठा करो।भारत में अधिकांश शादियां घरवाले तय करते हैं। हम वर-वधू के परिवार, जाति, घर, शिक्षा, आय और रंग-रूप पर ध्यान देते हैं, किंतु ये तमाम पहलू सतही हैं। हम उस व्यक्ति को जानने-समझने पर इतना समय क्यों नहीं लगाते जिसके साथ शेष जीवन गुजारने जा रहे हैं! क्या आप किसी ऐसे व्यक्ति के साथ अपना जीवन गुजारने के लिए तैयार हो जाएंगे कि उसके पास इंजीरियरिंग या डॉक्टरी की डिग्री है। क्या उसकी डिग्री से शादी की जा रही है? साझा रुचियां, समान सोच, स्वभाव, संवेदना, विनोदप्रियता-क्या ये सब मायने नहीं रखते? दूसरा पहलू है धन। हम शादी के दिन भारी धनराशि खर्च करते हैं। अमीरों में एकदूसरे से अधिक खर्च करने की होड़ लगी रहती है। मध्यम वर्गीय और कामकाजी वर्ग अपनी तमाम कमाई और बचत शादी में झोंक देते हैं। अगर आपके पास पैसा है तो खुशी-खुशी तय कर लेते हैं कि हमें इतना खर्च करना है। किंतु जो अमीर नहीं हैं, जिनके लिए एक-एक रुपये की कीमत है, जिनके लिए बेटी की शादी करने का मतलब है अब तक की पूरी जमा-पूंजी खर्च करना वे लोग शादी के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट तुड़वा देते हैं, जमीन-जायदाद बेच डालते हैं और इसके बाद कर्ज लेने को मजबूर हो जाते हैं। विवाहोत्सव पर सारा पैसा फूंक डालने के बजाय आप यह रकम अलग रखकर बेटी को क्यों नहीं दे देते कि पति के साथ नया जीवन शुरू करो। यह राशि उसके नवजीवन में काम आएगी। इसके लिए आपको शादी के तामझाम को तिलांजलि देकर शरबत शादी करनी होगी। शरबत शादी से मतलब है कि मेहमानों को बुलाओ, शरबत पिलाकर उनका स्वागत करो और आने के लिए उनका धन्यवाद करो। मौज-मस्ती करो, खुशी मनाओ किंतु सादगी के साथ। नौजवानों, अपने माता-पिता से कहो, हमें बड़ा फंक्शन नहीं करना। यह राशि हमारे काम आएगी। हमें इस पैसे को अपने सुखी वैवाहिक जीवन की बुनियाद बनाने के काम में लगाने दो। उस खास दिन पर पूरा ध्यान लगाने के बजाय अपने वैवाहिक जीवन के भविष्य के बारे में सोचिए। हमें एक दिन की खुशियों पर अपने शेष जीवन को कुर्बान नहीं करना है। हमारी भावनाएं केवल एक दिन के लिए निवेश न हों, बल्कि शेष जीवन भर के लिए उनका निवेश करें। एक दिन के बजाय पूरे जीवन के बारे में सोचें। अपने शेष जीवन के वित्तीय, भावनात्मक और मानसिक, तीनों पक्षों पर खूब सोच-विचार करो। शादी से जुड़ी एक बुराई है दहेज। यह प्रतिगामी होने के साथ-साथ अवैध भी है। जरा सोचिए, धन और लालच की बुनियाद पर टिके संबंधों में क्या सार्थकता और सुंदरता हो सकती है? क्या हमें अपनी बेटी के दहेज के लिए धन बचाने के लिए इसे उसकी शिक्षा में निवेश नहीं करना चाहिए था। उसे इतना काबिल और स्वतंत्र बनाइए कि वह अपना भविष्य खुद तराश सके और अपनी खुशियों को खुद हासिल कर सके। तब उसे अपने जीवन को पूरा करने के लिए लालची और नाकारा वर की जरूरत नहीं पड़ेगी। उसे ऐसे व्यक्ति से शादी करने दें जो उसकी इज्जत करता हो। उसकी शादी ऐसे व्यक्ति से होनी चाहिए जिसके बारे में वह मानती है कि वह उसके काबिल है। उसी के साथ जीवन बिताकर उसे सच्ची खुशी मिलेगी।

Friday, May 18, 2012

फिल्‍म समीक्षा : डिपार्टमेंट

डिपार्टमेंट: कांचदार  हिंसा-अजय ब्रह्मात्‍मज
राम गोपाल वर्मा को अपनी फिल्म डिपार्टमेंट के संवाद चमत्कार को नमस्कार पर अमल करना चाहिए। इस फिल्म को देखते हुए उनके पुराने प्रशंसक एक बार फिर इस चमत्कारी निर्देशक की वर्तमान सोच पर अफसोस कर सकते हैं। रामू ने जब से यह मानना और कहना शुरू किया है कि सिनेमा कंटेंट से ज्यादा तकनीक का मीडियम है, तब से उनकी फिल्म में कहानियां नहीं मिलतीं। डिपार्टमेंट में विचित्र कैमरावर्क है। नए डिजीटल  कैमरों से यह सुविधा बढ़ गई है कि आप एक्सट्रीम  क्लोजअप  में जाकर चलती-फिरती तस्वीरें उतार सकते हैं। यही कारण है कि मुंबई की गलियों में भीड़ में चेहरे ही दिखाई देते हैं। कभी अंगूठे  से शॉट  आरंभ होता है तो कभी चाय के सॉसपैन  से ़ ़ ़ रामू किसी बच्चे  की तरह कैमरे का बेतरतीब इस्तेमाल करते हैं।
डिपार्टमेंट रामू की देखी-सुनी-कही फिल्मों का नया विस्तार है। पुलिस महकमे में अंडरव‌र्ल्ड से निबटने के लिए एक नया डिपार्टमेंट बनता है। संजय दत्त इस डिपार्टमेंट के हेड हैं। वे राणा डग्गुबाती को अपनी टीम में चुनते हैं। दोनों कानून की हद से निकल कर अंडरव‌र्ल्ड के खात्मे का हर पैंतरा इस्तेमाल करते हैं। डिपार्टमेंट में अपराधियों को मारने में कांच का प्रचुर इस्तेमाल होता है। खिड़की, टेबल,  आईना,  दीवार, बोटल आदि कांच की वस्तुओं पर अपराधियों को पटका जाता है। कांच के चमकने  और टूटने से हिंसक पाश्‌र्र्व संगीत भी बनता है। कह सकते हैं कि डिपार्टमेंट में कांचदार  हिंसा है।
डिपार्टमेंट में अमिताभ बच्चन  भी हैं। उनकी कलाई से घंटी बंधी हुई है। वह उनके साक्षात्कार की निशानी है। गौतम बुद्ध को बोधिवृक्ष के नीचे आत्मज्ञान हुआ था। क्या अमिताभ बच्चन  भी आत्मज्ञान और साक्षात्कार शब्दों के भिन्न अर्थ नहीं जानते? उन्हें सही शब्द की सलाह तो देनी चाहिए थी? फिल्म में दो हिंसक किरदारों के रूप में अभिमन्यु सिंह और मधुशालिनी  हैं। दोनों का हिंसक प्रेम जुगुप्सा  पैदा करता है। उन्हें इसी जुगुप्सा के लिए रामू ने रखा होगा, इसलिए वे अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाते हैं। संजय दत्त और अमिताभ बच्चन  की बुरी फिल्मों में डिपार्टमेंट गिनी  जाएगी। राना डग्गुबाती  को अभी हिंदी उच्चारण  पर काफी काम करना होगा। घर और गर में फर्क होता है। रामू, अमिताभ बच्चन  और संजय दत्त के होने के बावजूद यह फिल्म पूरी तरह निराश करती है।
रेटिंग- * एक स्टार

मैं फैशनेबल लड़की हूं: सोनम कपूर

मैं फैशनेबल लड़की हूं: सोनम कपूर-अजय ब्रह्मात्‍मज
सांवरिया से हिंदी फिल्मों में आई सोनम कपूर में नूतन और वहीदा रहमान की छवि देखी जाती है। लोकप्रियता के लिहाज से उनकी फिल्में अगली कतार में नहीं हैं, लेकिन अपनी स्टाइल और इमेज के चलते सोनम कपूर सुर्खियों में रहती हैं। उन्हें स्टाइल आइकन माना जाता है। सोनम से खास बातचीत-
स्टाइल क्या है? आप उसे कैसे देखती हैं?
स्टाइल आपकी अपनी पर्सनैलिटी होती है। आप कपडों और स्टाइल के साथ एक्सपेरिमेंट कर सकते हैं। देव आनंद की टोपी, राजकपूर की छोटी पैंट या मीना कुमारी के लहंगे, मधुबाला की टेढी स्माइल या शाहरुख के स्वेटर, सलमान खान के जींस या बूट..। उनकी स्टाइल ही सिग्नेचर है। लोग मुझे देखते हैं तो कहते हैं कि मैं अजीबोगरीब कपडे पहनती हूं। मैं फैशन करती हूं और बहुत अच्छी लगती हूं, अपने चुने कपडों में। मेरी नजर में स्टाइल अपनी पर्सनैलिटी का एक्सप्रेशन और एक्सपेरिमेंट है। इसी को कुछ लोग फैशन से जोड देते हैं।
पर्सनैलिटी के एक्सप्रेशन का शौक बचपन से था?
मैं लडकी हूं। बचपन से शौक है कि मुझे अच्छे कपडे पहनने हैं, खूबसूरत दिखना है। आपने मेरा पहला इंटरव्यू किया था, तब पूछा था कि मैं भारतीय परिधान क्यों पहनती हूं? मेरा जवाब था कि उनमें मैं कंफर्टेबल महसूस करती हूं। मेरी बॉडी ऐसी नहीं है कि मैं छोटे-छोटे टाइट कपडे पहनूं। मुझे अपनी स्टाइल ऐसी करनी होगी कि कंफर्ट, ग्लैमर और गुड लुक तीनों मेरी पर्सनैलिटी में दिखे। मैं अपने ढंग से कपडे पहनती हूं।
हर कपडे को कैरी कर पाना सब के बस की बात नहीं होती?
सही कह रहे हैं। मुझे लगा कि मैं वेस्टर्न कैरी नहीं कर सकती। मुझे भारतीय परिधान के अलावा वेस्टर्न पहनना पडा तो उसके लिए राह निकालनी पडी। मैंने जिस तरह शरीर के अनुकूल कपडों का चुनाव किया वह बाद में ट्रेंड हो गया। अब सारी लडकियां मेरी तरह ड्रेस पहनने लगी हैं।
आपने किसी की मदद ली या ट्रायल एंड एरर से सीखा?
ट्रायल एंड एरर से ही सीखा है। किसी ने मेरी मदद नहीं की है। हर छह महीने में मेरी डिजाइनर बदल जाती है। वे मेरे साथ काम करती हैं और छह महीने कुछ नया करते हैं। फिर पता चलता है कि वह दूसरी हीरोइनों को वही कपडे पहना रही है तो मैं बदल देती हूं।
आपकी फेवरिट डिजाइनर कौन हैं?
अनामिका खन्ना। वह बेहद खूबसूरत इंडियन कपडे बनाती हैं। फिल्म दिल्ली-6 और मौसम के लिए उन्होंने मेरे ड्रेस बनाए थे। बाहर के डिजाइनर में शनैल मतलब कार्ल लेगरफेल्ड, जो शनैल के हेयर डिजाइनर हैं। डिओर के पुराने डिजाइनर जॉन गैलिआनो.. और भी कई हैं।
क्या आज लडकियां ज्यादा स्टाइल कॉंन्शियस हैं?
हां मैंने शुरुआत की है। अब तो सभी लडकियां मेरे कपडों पर इतना ध्यान देने लगी हैं कि वे खुद भी ऐसे कपडे पहनने लगी हैं।
फैशन सिनारियो आपकी मम्मी के जमाने से कितना बदला है?
हर पीढी की अपनी स्टाइल होती है। आठवें दशक में पलाजो पैंट्स और मैक्सी आए। उस समय हाई वेस्ट पैंट पहनते थे फिर नौवें दशक में सोल्जर पैंट आ गए और फिर सीक्वेंस आ गए। डिस्को जैसे कपडों का चलन बढा। अंतिम दशक में मनीष मल्होत्रा के ट्रेंड बहुत चले। वे हाई स्ट्रीट कपडे लेकर आए। अब हम लोग जो पहनते हैं, वह ट्रेंड बन रहा है।
पहले फैशन फिल्मों से आता था। अब यह निर्भरता कम हुई है। क्या कारण है?
अभी एक्सपोजर बढ गया है। फिल्मों के साथ हम फैशन शो, इवेंट और दूसरी जगहों पर दिखते रहते हैं। मीडिया एक्सपोजर बढ गया है। कहने का मतलब है कि अब दर्शकों को सिर्फ फिल्मों पर निर्भर नहीं रहना पडता।
स्टाइल के लिए बॉडी और एटीट्यूड दोनों में क्या ज्यादा जरूरी है?
दोनों जरूरी है। अगर आप के पैर मोटे हैं तो छोटे कपडे ठीक नहीं लगेंगे, अगर बांह मोटी है तो स्लीवलेस अच्छा नहीं दिखेगा। लेकिन कॉन्फिडेंस हो तो आप सब कुछ पहन सकती हैं। यह पर्सन टु पर्सन बदल जाता है।
खुद को कैसे अपडेट क रती हैं?
मुझे शॉपिंग का शौक है। शॉपिंग करना, मैगजीन पढना, ट्रेंड देखना मैं इनकी शौकीन हूं। इट्स पैशन ऑफ माइंड। अगर आप किसी चीज के लिए पैशनेट हों तो वह आपको आसानी से आ जाती है।
पांच ऐसी चीजें जिनके बिना आप नहीं रह सकतीं?
मेरा हैंड बैग, सेल फोन, फ्लैट जूते, सन ग्लासेस और शॉल।
अपनी मम्मी में क्या पसंद है?
वह बहुत ट्रडिशनल इंडियन कपडे पहनती हैं। मुझे उनकी स्टाइल पसंद है। इंडियन कपडों में मैं कभी एक्सपेरिमेंट नहीं करती।
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में आज सबसे फैशनेबल ऐक्ट्रेस और पहले की अभिनेत्रियों में?
अभी मैं हूं। पहले की अभिनेत्रियों में मीना कुमारी व नूतन। मीना कुमारी के मैंने किस्से सुने हैं कि वह बहुत ही पटिकुलर थीं अपने लुक्स व कपडों के बारे में। उनकी साडियां अलग होती थीं। उनकी एक लट हमेशा ललाट पर रहती थी। इतनी स्टाइलिश थीं वे। देव आनंद तो लंदन से सूट सिलवाते थे। मुझे किसी ने कहा था मीना कुमारी पाकीजा के सेट पर असली इतर की शीशियां रखवाती थीं। ऐसा कौन करता है आजकल?
अगर आप लडका होतीं तो?
बिलकुल नहीं। मुझे लडकियों के कपडे पसंद हैं। लडकी होने पर जिम्मेदारियां भी कम हो जाती हैं। आई एम हैपी फॉर बीइंग अ गर्ल।
आपको लगता है लडकियां इंडस्ट्री या बाकी जगहों पर पुरुषों के बराबर हैं?
अभी उन्हें समझौते करने पडते हैं। आजकल थोडा बेहतर सीन यह है कि लडकियों को मौके मिलने लगे हैं।
सुना है आप बहुत पढती हैं। अपनी फेवरिट किताबों के नाम बताएं, फेवरिट लेखक भी। अभी गिरीश कर्नाड के नाटक पढ रही हूं। देवदत्त पटनायक की राइटिंग बहुत पसंद है। उनकी सारी किताबें पढी हैं मैंने।
अभी कौन सी फिल्में कर रही हैं?
एक तो भाग मिल्खा भाग है और दूसरी है रांझना, यह जून में शुरू होगी। थर्ड पिक्चर अभी तक एनाउंस नहीं की है। लाइफ बिजी हो गई है मई-जून से।
लडकियों को कुछ मेसेज देना चाहती हैं, खासकर उन्हें, जो पारिवारिक और सामाजिक दबाव में रहती हैं?
अपनी जिंदगी स्वयं बनाएं, आगे बढने का यही रास्ता है। दिल्ली 6 में मेरा किरदार इंडियन आइडल बनना चाहती है। उसे लगता है कि इसी से वह जिंदगी में आगे बढ सकती है। उस लडकी में दम था, इसलिए वह लोगों को पसंद आई। आजकल मौके हैं। साहस और आत्मविश्वास की जरूरत है। हिम्मत करें और नया करने की कोशिश करें।

Wednesday, May 16, 2012

फिल्म समीक्षा के भी सौ साल

100 years of film review-अजय ब्रह्मात्‍मज 
पटना के मित्र विनोद अनुपम ने याद दिलाते हुए रेखांकित किया कि भारतीय सिनेमा के 100 साल के आयोजनों में लोग इसे नजरअंदाज कर रहे हैं कि फिल्म समीक्षा के भी 100 साल हो गए हैं।
दादा साहेब फालके की पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र की रिलीज के दो दिन बाद ही बॉम्बे क्रॉनिकल में 5 मई, 1913 को उसका रिव्यू छपा था। निश्चित ही भारतीय संदर्भ में यह गर्व करने के साथ स्मरणीय तथ्य है। पिछले 100 सालों में सिनेमा के विकास के साथ-साथ फिल्म समीक्षा और लेखन का भी विकास होता रहा है, लेकिन जिस विविधता के साथ सिनेमा का विकास हुआ है, वैसी विविधता फिल्म समीक्षा और लेखन में नहीं दिखाई पड़ती। खासकर फिल्मों पर लेखन और उसका दस्तावेजीकरण लगभग नहीं हुआ है।
इधर जो नए प्रयास अंग्रेजी में हो रहे हैं, उनमें अधिकांश लेखकों की कोशिश इंटरनेशनल पाठकों और अध्येताओं को खुश करने की है। हिंदी फिल्मों की समीक्षा के पहले पत्र-पत्रिकाओं ने उपेक्षा की। कला की इस नई अभिव्यक्ति के प्रति सशंकित रहने के कारण यथेष्ट ध्यान नहीं दिया गया। साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में फिल्मों का स्थान न देने की नीति बनी रही।
दरअसल, समाज में सिनेमा की जो स्थिति रही है, वही भाव पत्र-पत्रिकाओं में भी दिखा। अगर आरंभ से ही इस तरफ ध्यान दिया जाता तो निश्चित ही अभी तक एक परंपरा बनी रहती। हिंदी में लिखने-पढ़ने वाले अधिकांश व्यक्तियों का रिश्ता साहित्य से आरंभ होकर साहित्य की सीमा में ही घुट जाता है। जब भी फिल्मों की बात होती है तो एक हेय दृष्टि के साथ उस पर नजर डाली जाती है। रघुवीर सहाय के नेतृत्व में अवश्य ही कुछ बेहतरीन प्रयास हुए, लेकिन उस दौर के ज्यादातर समीक्षकों ने एक विशेष प्रकार के सिनेमा को ही विमर्श के काबिल समझा। उन्होंने मेनस्ट्रीम और लोकप्रिय सिनेमा को अछूत बना दिया। चूंकि आरंभिक प्रस्थान ही भटक गया, इसलिए अभी तक फिल्म समीक्षा और फिल्म लेखन भटकाव का शिकार नजर आता है।
समस्या यह भी है कि विमर्श के लिए स्थान नहीं है। फिल्मों की ऐसी गंभीर पत्रिकाएं और जर्नल नहीं निकलतीं, जहां कोई कुछ लिख सके। पत्र-पत्रिकाओं में शब्दों की सीमा और तात्कालिकता के दबाव में नियमित समीक्षक पूरी बात रख नहीं पाते। मैं अपने अनुभवों की बात करूं तो दैनिक जागरण जैसे अखबार में समीक्षा लिखते समय मेरा पहला दायित्व होता है निश्चित शब्द सीमा में हर उम्र और तबके के पाठकों तक फिल्म का मुख्य भाव और अभिप्रेत रख सकूं। निर्णायक समीक्षा लिखने से बेहतर है कि आप अपनी राय रख दें। उसके बाद पाठक तय करें कि उन्हें उससे क्या मिला? कुछ लोगों को लगता है कि अखबारों के रिव्यू दबाव में लिखे जाते हैं। अन्य अखबारों के बारे में नहीं मालूम, लेकिन दैनिक जागरण में कभी इस प्रकार का दबाव नहीं रहा।
मेरी स्पष्ट धारणा है कि फिल्मों की जानकारी और सूचना देना फिल्म पत्रकारिता का हिस्सा है। वहां संबंधित व्यक्तियों के नजरिए से प्रशंसा हो सकती है। फिल्म समीक्षा एक प्रकार का क्रिएटिव लेखन है, जिसमें समीक्षक के संस्कार, परिवेश, ज्ञान और जानकारी का पता चलता है।
हिंदी में ब्लॉग की लोकप्रियता के बाद फिल्मों पर बहुत अच्छा लिखा जा रहा है। सभी लेखकों को समीक्षक मान लेना उचित नहीं होगा, लेकिन अगर उन सभी ब्लॉग को संकलित किया जाए तो पाठकों की सहज प्रतिक्रिया से फिल्म की समझ बढ़ सकती है। हिंदी में फिल्मों पर लेखन को अधिक बढ़ावा नहीं दिया जाता। यही कारण है कि हिंदी में मौलिक लेखक और समीक्षक फिल्मों के अनुपात में बहुत ही कम हैं।
इसके साथ ही हमें ध्यान देने की जरूरत है कि फिल्मों के बारे में निर्माता, निर्देशक, कलाकार और तकनीशियन खुद कितनी बातें और तथ्य शेयर करना चाहते हैं। अमूमन ज्यादातर प्रचारात्मक सामग्रियां उपलब्ध करवाई जाती हैं। होड़ और प्रतियोगिता में सभी लेखक और समीक्षक एक-दूसरे की नकल करते रहते हैं। जरूरत है कि हम फिल्मों पर भावात्मक, साहित्यिक और एकांतिक लेखन करने की बजाय फिल्मों के सामाजिक संदर्भ के साथ सौंदर्यबोध की दृष्टि से उसकी समीक्षा करें।

Tuesday, May 15, 2012

Indian stars go to Cannes as brand ambassadors, not as cine artistes-anurag kashyap

Anurag Kashyap thinks the Indian media has little clue of what global film events are all about
; it keeps playing up 'Red Carpet' branded appearances and doesn't realise, for instance, that 
this year is the biggest ever for Indian cinema at the Cannes Film Festival...

The whole year round, we hear of movies and stars going to, being selected for, and winning awards at various global festivals - but I'm not sure most of us, the writers included, quite understand the comparative relevance or magnitude. At some subconscious level, we club 
all "international" recognition at the same plane, including most of the media...

Forget the media, our industry doesn't have a clue! That whole market works in a certain way; they
don't have a clue how it works.

Right. So you're being talked about in the Cannes context. What's the big deal? What exactly 
is Cannes about?

It's very simple. There are four official sections, which are the competitive ones and the ones where movies are selected on merit (it's rather complex for a layperson to understand). And there's a
common award across all the four categories, which is the Camera d'Or. First-time filmmaker, kisi bhi category mein, Camera d'Or ke liye eligible hota hai, which is the first-time filmmaker award - jo Salaam Bombay ko mila tha, which changed Meera's life. So these are the four categories. And then there's the Market - the Marche du Film. For the Market, anyone can go. A random Kanti Shah can
 also go to a Market. All he has to do is pay money for it, and book a screening, to sell the film. So
India se jo filmein jati hain, hamesha Market mein jaati hain (laughs), which is simply a paid screening.

And we keep saying 'It's been selected for...'

Yes... 'It's been selected for'. And the Red Carpet people go to, which we make so much fuss about, is sponsored by some brands which support the festival; like Chivas supports it, L'Oreal supports it... So that appearance is that kind of a thing.

What you're saying is they're not going as 'film people' in their own right?

They're not; they're going as brand ambassadors. There's a slot for L'Oreal, or Chivas, whosoever they bring, will walk. And they use it for their advertising. Cannes never uses those pictures. You'll never find
 it on the Cannes sites. So yahaan pe kya hota hai, anybody who's going to Cannes, we say, they are walking the Red Carpet. Red Carpet toh, hamare IFFI (International Film Festival of India) mein bhi hota hai (laughs). Carpet ka colour red hota hai! It's all a media thing. Officially, India se, pichle nau saal mein - iss saal chaar jaa rahi hain - aur ek Udaan gayi thi. Aur kabhi koi film hi nahi select hui hai! Officially. Films have been selected by filmmakers of Indian origin or something to do with
India, like Chatrak gayi thi, by a Sri Lankan filmmaker, but shot in India. Partly funded by an Indian.
 So those kinds of things have happened. But a very Indian film has hardly ever gone there.

So there's no correlation between big money, superstars, and recognition at such events, right?

Hum log bohot kam paison mein banate hain. Gangs of Wasseypur studio-funded hai. If I'm directing, I get funded by the studio. If I am producing, newcomers, they don't get funded by the studio. Because of our various festival things, today I don't need a studio to fund an independent movie. I get money from Germany, from France. Like Peddlers, they made it with money on Facebook. We just
put it out that we need partners, giving 10 lakh each. In two days, we had the money that we needed.
So, the movie has become a fund. So that when it goes to Cannes and gets sold, they get returns. And they get a co-producer credit. It's like how Reliance started. That's the only way. Go to like-minded people who want this kind of cinema, to give you money, so that you can keep making this kind of cinema. I
don't need a studio, I don't need a star. We're making a film called Lunchbox; Germany gave us
100,000 Euros. I have learnt this the hard way and we have consistently been delivering. Because we
are representing India on the international platform, with a regularity over the last four years - we have been at every festival. If you look at Cannes, out of the four films selected, three are ours. Udaan was also ours. So the maximum representation is going from us. They trust us. Now we are doing co-production - the man who made No Man's Land, we are co-producing his next film. The Brazilian government is announcing a co-production, which I am co-producing, for a Brazilian filmmaker in Columbia, which is co-produced by Oscar-winning Walter Salus. And I co-produced Michael Winterbottom's Trishna. Now any international film coming to India, they want to work with us. What happens is, most of the festivals, distributors don't want to deal with Indians. Because the first question Indians ask is kitna doge? That's the only question they know how to ask. Inka diaspora ka market
 hai na.

So then this is the biggest year, in that sense, if you're saying four...

Yes. This is the biggest year so far for India in the history of Cannes, because itni filmein ek saath
 kabhi nahin gayin. Jab Ray ki film jaati thi, toh ek Ray ki jaati thi, ya ek Mrinalda ki gayi thi.
 This time, we have Gangs Of Wasseypur, parts one and two, if you count them as two, otherwise it's one. So there's Gangs of Wasseypur, Peddlers, Miss Lovely, and Kalpana restored, Cannes Classic mein. Kalpana jo Martin Scorsese ne restore ki hai, the Indian film of Uday Shankar, 1948 mein
jo bani thi. Yeh print kho gaya tha jo bahar ke aadmi ne sponsor kiya hai (laughs), and actually
 if you see, there's a guy that nobody in media is talking about, is Shivendra Singh Dungarpur, Raj
Singh Dungarpur's son, ad filmmaker, who's become part of the restoration process, who found
Kalpana. He's the one who is funding the restoration of the next Hitchcock film, from his own hard-earned advertising money. He's become part of the organisation. Whose achievement the media
 has completely skipped. Nobody knows. Shivendra Singh Dungarpur has gone ahead and done something nobody's doing. He's restoring old Indian classics. He's got Satyajit Ray's Ghatak, they're
all being restored because of this one man's effort. He's doing something incredibly great. Media
doesn't know what restoration is, media doesn't know how it matters, media doesn't know what it
 takes, how it is done in this one place in Italy. Media doesn't know these things. They'll ask him,
'achha aap restoration kar rahe hain... aap Scorsese se mile?' (laughs).

There is a power hierarchy in the industry?

Absolutely. It's always been there, in any industry. It's everywhere.

Yes, but this is seen as a very loosely structured, organic, symbiotic activity...

Yeah, it is, but the hierarchy, it is in the very nature of our country. It's like growing up, you know, you
talk like that. If your boss' son comes around, he's treated differently. When a girl is looking for a
groom, what matters is whose son it is, what's his surname, which family he belongs to, rather than
what does the groom do? It holds true in every walk of our life. Because if we were not like that, we wouldn't have, you know... If you see, every politician's son often ends up taking the same portfolio
his father did, in this country. And he becomes eligible simply by being his son. So that's the country
 we live in.

So why crib if it happens in cinema?

Yeah. Cinema mein it's just more obvious and every day in the papers. But it's in every walk of life.
You go anywhere. So with somebody like you, whose dad is not there to give you a foothold in the industry, how much longer does it take to make your own niche? In today's time, it might not take long
if you have talent. When I came into the industry, your survival depended entirely on what you were
 doing and what you were achieving. Today, the monies are different, there's a huge amount of money
 in television, people get employed very easily. And the hunger dies out easily. We were starving for a
long time, hence that passion and the drive was much more. Today, the drive is immediately controlled with substance.

The money flows in very quickly...?

Money flows in very quickly, the material satisfaction comes in very fast. So that, hunger is not sustained long enough, that material cannot satisfy it.

You mean they get they get the first BMW and they've arrived...

They get the first car, the first house, very soon, and then they live for the EMIs. The EMIs take over
 their lives. Somehow that sustenance or hunger is not there anymore. And the passion today, be it cinema, be it anything, is about what one can do with a form, but the fact is, 90% of them actually don't have anything to say. They have already decided the form and they're trying to fit into the context.

Especially television?

Especially television. They are thinking from, 'this is an established format, and what do I do within those five different genres, to fit into it.' You're like, ok, 'I also have a story like this back home, I'll put that story.' But it's essentially the same story. So people have less to say today.

But there is money also available for new ideas...

Today the money is available, and today technology has made making a film cheaper. Today, people
are making films in 10 lakh, 2 lakh, 5 lakh. The whole indie movement, which is actually not at the
surface right now. People don't know about it right now because none of it has so far broken through.
 But there's tons of films being made, at such low costs. One film that broke through in the very small
indie festivals was Kshay, which is trying to release on the 15th of June. But made for 15 lakh, 10 lakh, 20 lakh, very powerful films. People are shooting on small go-pro cameras and everything, with actors who are working for free, with 3g and 4g the short film format, there's a huge movement there. People
are making these incredible short films, which they are watching among themselves, and this whole lot of new generation, college students, who are always on YouTube, are passing those films around. I'm just waiting for it to explode. It will explode. The moment it becomes, uhh, broadband, free flow broadband to everywhere, it will break through.

Where's the money in it?

There is right now no money it. Tomorrow, with broadband, the guy who'll create content will be
 king. Abhi unhone piracy band karva diya, now they will slowly start making revenue out of it.
Because of piracy they could not add revenue to it. People will start paying, and they are minuscule amounts. For small amounts, 30 bucks, short films you can watch for 10 rupees, so with that, in
volume, there'll be more people downloading it and keeping it in their digital libraries. It's affordable prices. The price of a small Coke bottle. Today most of these alcohol brands, and all the brands that
are not allowed to advertise, they used music earlier, to advertise themselves - surrogate advertising.
Now they're using
these short films. If you see, all of them. You go on the site of any of these alcohol brands, they have
these short films, using the brand, and they spread it out. So there's a different kind of a democracy
that will start operating there. But most of the Bollywood industry is not thinking about that. There's a
new audience being formed, which will not want to go to a theatre, and (will) watch the film on their laptop. And world over they have already started catering to that audience. In India, they have just
begun, and people who have begun are these tech savvy guys who've got nothing to do with creativity. Which is why it's not working, because there's a big gap there, a big chasm. They have created
formats, they've created platforms, but they don't know how to access these creative people.

You were recently asked that you make very dark cinema, and you replied that when you go international, people tell you that you make very light cinema, and you should go darker!

That's a very relative thing na, it's extremely relative. Because people often ask me, why do you do
 this kind of work? My thing is aap bahar jao, toh aam baat hai, log realistic cinema banate hain. Ham log itna zyada fantasy world create karte hain, ki uske comparison mein I start to seem like too dark and too real. But if you actually compare it to too dark and too real, then you'll suddenly
find a kind of softness in my films! I even use music...

There's a frequent argument one hears, which essentially is that without the five song sequences and the whole melodrama, it's not really Indian... this is 'Indian cinema', so why should we ape the West? So the moment you're making a 'realistic movie'...

... yeah, it becomes aping the West. Matlab, someone tell me, the realistic movie is set in India, it is
shot India, it's about India. How can it be aping the West?

Does that argument, that we should actually celebrate our song and dance model of cinema, hold?

We should! I'm saying we should. But we should not negate what the other things are. Today, what Marathi and Tamil cinema have achieved, it is much more than what Bollywood can achieve. There
 are more Marathi films in a year, that you can talk about, which are represented internationally, than Hindi. There's a whole new wave in Marathi led by these two boys - Girish Kulkarni, the actor/writer,
and Umesh Kulkarni. Mainstream doesn't hear about it. Marathi people are very proud about it.
There's a whole lot of new wave in Tamil. These Madurai filmmakers... my first card in Wasseypur...
my film is dedicated to the Madurai triumvirate. People have changed Tamil cinema, worked against
the system. Bala, Amir Sultan, Rasi Kumar, Vetrimaran - who's won the National Award, they've
made the most extraordinary films in the last two years, and at the national level people don't even
know about it. Kumar Raja, who won the National Award for best debut filmmaker - his film never
 went outside Tamil Nadu. These are the people who are changing things, and they're also very cut off.
So when international scouts come looking for films from India, they never reach Chennai. And those
 guys also don't understand international festivals.

How will that change?

See, things are changing. Till now, distributors have had this very interesting formula of discovering
which film will work, based on who's in it. That's very easy - film mein Akshay Kumar hai, film ki 
utni opening lagegi. So there's a whole lot of journalists and trade people whose survival depends on this system. Now, a Vicky Donor, Paan Singh Tomar works, they suddenly don't know how to do,
what to do, because they can't judge a script. They can't judge a film without knowing who's in it. So
 they feel threatened, so they have to keep that philosophy sustained. So they keep sustaining that, and they are supposed to be the experts...

Ok, so non-star movies working - that will change the equilibrium?

Yes. It'll change the equilibrium. New media houses coming in, new TV channels coming in, they want
a voice from the film industry who's an 'expert', so they often get these same people. So these same people are brought in, and they keep sustaining the philosophy. Koi progress hoga hi nahin. 'Great opening'. Today a common man on the streets talks about 'iss film ki itni opening lagi thi'. Nobody talks about content any more. A man on the streets knows iss film ne sau karod kamaye, toh film
automatically great ho gayi. So common aadmi jab yeh baat karne lag jata hai, it becomes even
 more difficult for the other kind of cinema to survive. Whereas in Tamil Nadu, most of the films that
 have changed things have not had stars, and have been declared hits in the sixth or seventh week. Marathi cinema does not have a star system. It's only content that sells. The director has become the
star - people start trusting a director, ki iski film aayegi.

That is quintessential Hollywood, in a sense...

Yeah, quintessential European, Hollywood, everywhere. The director is the man who makes the film. Usmein the only way you can survive is consistency, and frequency. For me, the only method to
survive was ki consistently ek ke baad ek film banate jaao, saal mein ek-do release honi zaroori 
hai. If I'm not directing, I should at least be producing a film, so then, I'll be on.