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Saturday, February 25, 2012

फिल्‍म समीक्षा : जोड़ी ब्रेकर्स

अनोखी जोड़ी अनोखा रोमांस-अजय ब्रह्मात्‍मज

हाल-फिलहाल में किसी हिंदी फिल्म में ऐसा सामान्य हीरो नहीं दिखा है। अश्रि्वनी चौधरी ने आर माधवन का नायक की भूमिका देकर जोखिम और साहस का काम किया है। आर माधवन ने अश्रि्वनी की दी हुई चुनौती को स्वीकार किया है और गानों से लेर रोमांटिक और चुंबन दृश्यों तक में भी नार्मल रहने और दिखने की कोशिश की है। कुंआरा गीत में उनकी मेहनत दिखाई पड़ती है। फिल्म में उनकी जोड़ी बिपाशा बसु के साथ बनाई गई है। हॉट बिपाशा बसु जोड़ी ब्रेकर्स के कुछ दृश्यों में बेहद सुंदर लगी है।

अपने नाम पर बने गीत में वह जरूरत के मुताबिक देह दर्शन करवाने में भी नहीं झेंपती हैं। अश्रि्वनी चौधरी ने एक अनोखे विषय पर रोमांटिक ड्रामा तैयार किया है। हिंदी फिल्मों में धूप से शुरुआत करने के बाद अश्रि्वनी चौधरी ने अगली फिल्म से राह बदल ली। उन्होंने हिंदी की मसाला फिल्मों की लंबी और भीड़ भरी राह चुनी है। अपनी सोच,संवेदना और राजनीतिक समझ को किनारे रख कर वे मेनस्ट्रीम हिंदी सिनेमा में अपनी पहचान खोज रहे हैं। उनके चुनाव से कोई गुरेज नहीं है। पिछली कुछ फिल्मों के असफल प्रयास के बाद वह जोड़ी ब्रेकर्स में यह साबित कर देते हैं कि उन्होंने कमर्शियल सिनेमा के गुर सीख लिए है। बस उन्हें आजमाने में अभी उतनी सफाई नहीं आ पाई है। कल अगर फिल्म इंडस्ट्री के उत्तम तकनीशियन और सहयोगी उन्हें मिल गए तो वह सभी को चौंका सकते है। जोड़ी ब्रेकर्स से वह इस तरह के सिनेमा के लिए क्वालिफाई करते नजर आते हैं।

जोड़ी ब्रेकर्स की पेंचदार कहानी है। ब्रेकर्स ही बाद में मेकर्स बन जाते हैं और इस दरम्यान उनकी अपनी जोड़ी टूटती और बनती है। ढेर सारे किरदार और अनेक घटनाएं है। इंटरवल के आसपास ऐसा लगता है कि सिर्फ इंजन की आवाज और हार्न ही सुनाई पड़ रहा है,ट्रैफिक खिसक नहीं रही है। तभी मैग्गी के प्रेगनेंट होने की सूचना और हेलन के प्रवेश के साथ दृश्य का ट्रैफिक चालू हो जाता है। उसके बाद कहानी नए मोड़ लेती है और सुखद अंत तक पहुंचती है। लेखक और निर्देशक का कॉमिक सेंस कई दृश्यों में उभरकर आया है। हरियाणवी पहलवान का अपनी बीवी से छ़टकारा पाने का प्रसंग, ऑपरेशन थिएटर में मरीज का उठ कर समझाना,ओमी वैद्य के सीन और सामान्य दृश्यों में भी नायक-नायिका का हंसी-मजाक अश्रि्वनी चौधरी रोमांटिक कॉमेडी या स्लैपस्टिक कॉमेडी बनाएं और उसमें देसी पंच रखें तो वे सफल रहेंगे।

फिल्म अपने ध्येय में सफल रही है। आर माधवन और बिपाशा बसु ने अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया है। आर माधवन का लुक थोड़ा आकर्षक रहता तो प्रभाव बढ़ता। उन्होंने संवाद अदायगी में आवाज ऊंची रखी है। वे फर्राटेदार बोलते हैं। यह खूबी है,लेकिन कई शब्द कानों तक पहुंचने के पहले ही खो जाते हैं। अन्य कलाकारों में ओमी वैद्य,दीपानिता शर्मा,हेलन और प्रदीप खरब उल्लेखनीय हैं। गीत-संगीत में इरशाद कामिल और सलीम-सुलेमान का योगदान फिल्म के अनुकूल है।

*** तीन स्टार

फिल्‍म समीक्षा : तेरे नाल लव हो गया

रियल प्रेमियों का रील रोमांस-अजय ब्रह्मात्‍मज

मनदीप कुमार की फिल्म तेरे नाल लव हो गया की शूटिंग के दरम्यान जेनेलिया का सरनेम डिसूजा ही था। फिल्म के पर्दे पर वह जेनेलिया देशमुख के नाम से आई हैं। दस सालों के रोमांस के बाद रितेश देशमुख और जेनेलिया डिसूजा ने फिल्म की रिलीज के पहले शादी कर ली। रियल लाइफ प्रेमी को उनकी रियल शादी के तुरंत बाद पर्दे पर देखते समय सहज कौतूहल हो सकता है कि पर्दे पर दोनों की केमिस्ट्री कैसी है? हिंदी फिल्मों की प्रेमकहानी के आलोचक मानते हैं कि पर्दे पर नायक-नायिका अंतरंग दृश्यों में भी एक दूरी बनाए रखते हैं। वह दूरी ही प्रेमहानी का प्रभाव कम कर देती है।

तेरे नाल लव हो गया देखते समय ऐसे आलोचकों की धारणा दूर हो सकती है। रितेश देशमुख और जेनेलिया डिसूजा के बीच किसी किस्म की दूरी नहीं है। दोनों ही एक-दूसरे को सपोर्ट करते हैं और पर्दे पर प्रेमियों की अंतरंगता जाहिर करते हैं। तेरे नाल लव हो गया की यह खूबी उसे विशेष बना देती है। पंजाब-हरियाणा के आसपास पूरी कहानी घूमती है। वीरेन को अपने पिता का गैरकानूनी धंधा नहीं भाता।

वह ईमानदारी से पैसे कमा कर अपनी टूरिस्ट कंपनी खोलना चाहता है। वह भट्टी के यहां ऑटो चलाता है। एक दिन वह अपना सपना भट्टी से शेयर करता है। भट्टी उसके सपने को अपना बना लेता है। वीरेन अपने सपने के चकनाचूर होने पर दोस्तों क उकसावे पर आकर भट्टी से भिड़ जाता है। उसी समय भट्टी की बेटी मिनी की अनचाही सगाई हो रही होती है। मिनी वहां मचे हड़बोंग में वीरेन से खुद का अगवा करा लेती है। यहां से शुरू कहानी अगना होकर वीरेन केगांव उसे पिता चौधरी के पास पहुंचती है। उसके बाद इमोशन,कंफ्यूजन और चौधरी की ललकार का ड्रामा चलता है। ईमानदार और सच्चा वीरेन खुद को कायर कहलाना पसंद नहीं करता। वह पहली और आखिरी बार पिता के अगवे के धंधे पर अमल करता है। वह मिनी से शादी कर उसे अगवा कर लेता है।

इस रोमांटिक कामेडी में मनदीप कुमार ने हिंदी फिल्मों के आजमाए पुराने फार्मूले पर ही अमल किया है,इसलिए संभावनाओं और मुख्य कलाकारों के सहयोग के बाद भी फिल्म साधारण ही रह जाती है। रितेश और जेनेलिया अपने रोल में परफेक्ट हैं। लंबे समय के बाद ओम पुरी में संजीदगी नजर आती है। मिनी के मंगेतर बने कलाकार का काम अच्छा है। गूंगे चाचा की मौजूदगी भी याद रहती है। इस फिल्म में ग्रामीण परिवेश को निर्देशक ने अच्छी तरह से फिल्म में उकेरा है। बार-बार यह लगता है कि फिल्म अभी उठेगी,लेकिन हर बार उम्मीद पर परनी फिर जाता है।

**1/2 ढाई स्टार

Friday, February 24, 2012

देवदास के बहाने

देवदास के बहाने

-अजय ब्रह्मात्‍मज

अप्रतिम फिल्म है बिमल राय की देवदास। शरतचंद्र चटर्जी के उपन्यास देवदास पर बनी अनेक फिल्मों में अभी तक बिमल राय की देवदास को ही श्रेष्ठ फिल्म माना जाता है। अनुराग कश्यप ने देव डी में देवदास को बिल्कुल अलग रूप में पेश किया। बहरहाल, देवदास की पूरी पटकथा को किताब के रूप में लाने के दो प्रयास मेरे सामने हैं। 2003 में सुरेश शर्मा ने बिमल राय का देवदास नाम से इसकी पटकथा को राधाकृष्ण प्रकाशन के सौजन्य से प्रकाशित किया था। उस साल इसका विमोचन मुंबई के सोवियत कल्चर सेंटर में वैजयंतीमाला के हाथों हुआ था। बिमल राय की बेटी रिंकी भट्टाचार्य के सौजन्य से सुरेश शर्मा को मूल पटकथा मिली थी। उन्होंने मूल पटकथा को व्यावहारिक तरीके से ऐक्शन और संवाद के साथ प्रकाशित किया है।

पिछले बुधवार की शाम मुंबई के महबूब स्टूडियो में नसरीन मुन्नी कबीर के प्रयास से उनके संपादन में प्रकाशित द डायलॉग ऑफ देवदास का विमोचन हुआ। इस अवसर संजय लीला भंसाली की देवदास के नायक शाहरुख खान आए। उन्होंने इस मौके के लिए लिखे दिलीप कुमार के पत्र को पढ़कर सुनाया। उस पत्र में दिलीप साहब ने देवदास की अपनी स्मृतियों को साझा किया। द डायलॉग ऑफ देवदास को ओम बुक्स और हायफन फिल्म्स ने मिल कर प्रकाशित किया है। इसमें हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू और रोमन हिंदी में संवाद लिखे गए हैं। तस्वीरों से सुसज्जित यह नयनाभिरामी और संग्रहणीय प्रकाशन है। किताब के साथ देवदास फिल्म की डीवीडी भी है। हिंदी और अंग्रेजी में प्रकाशित देवदास की पटकथा और संवादों की दोनों पुस्तकों में उपयोगिता और जानकारी के लिहाज से निस्संदेह सुरेश शर्मा की पुस्तक विमल राय का देवदास उल्लेखनीय है। सुरेश शर्मा ने मूल पटकथा को ही पुस्तक का रूप दिया है। उन्होंने पटकथा में बिमल राय के ऐक्शन और टेकिंग को भी शब्द दिए हैं। फिल्म प्रशिक्षुओं और अध्येताओं के लिए यह पुस्तक इसलिए भी उपयोगी हो जाती है कि वे बिमल राय की शॉट टेकिंग और स्टाइल को भी समझ सकते हैं, जबकि नसरीन मुन्नी कबीर की किताब में मुख्य रूप से संवाद लिखे गए हैं। ऐक्शन पर उनका ध्यान नहीं है। शॉट टेकिंग को कुछ दृश्यों में छिटपुट उल्लेख है। ऐसा लगता है कि नसरीन मुन्नी कबीर की किताब के लिए फिल्म देख और सुन कर संवाद लिखे गए हैं। इसके विपरीत सुरेश शर्मा ने मूल पटकथा में लिखे शब्दों को शब्दश: पुस्तक में लिखा है। सुरेश शर्मा और नसरीन मुन्नी कबीर के इन प्रयासों की सराहना के बावजूद उनकी तुलना नहीं की जा सकती। सुरेश शर्मा के प्रयास की अधिक चर्चा नहीं हो पाई, क्योंकि उनकी पुस्तक हिंदी में है। अब नसरीन मुन्नी कबीर ने उसी फिल्म की उसी पटकथा को नए कलेवर और सज्जा के साथ अंग्रेजी पुस्तक के रूप में पेश किया तो उसके विमोचन के लिए शाहरुख खान आ गए। मैं यकीन के साथ कह सकता हूं कि नसरीन मुन्नी कबीर के योगदान का जोरदार प्रचार होगा, जबकि सुरेश शर्मा के योगदान की सुध भी नहीं ली गई। अंग्रेजी और हिंदी की पुस्तकों के प्रति फिल्म बिरादरी और मीडिया के इस रवैए के कारण हिंदी फिल्मों पर हिंदी में कम काम हो रहा है। अगर कोई हिंदी लेखक इस दिशा में अपनी कोशिशों से पहल करता है तो उसे पर्याप्त समर्थन नहीं मिलता। उसकी चर्चा भी नहीं होती।

devdas 1.jpgनसरीन मुन्नी कबीर को मिल रही तारीफ से किसी को क्या शिकायत हो सकती है? कम से कम वे हिंदी फिल्मों के पाठ और दस्तावेजों को संग्रहीत तो कर रही हैं। इसके एवज में उन्हें पर्याप्त पारिश्रमिक और लाभ भी मिल रहे हैं। हां, अगर हिंदी के प्रकाशक एवं पाठक थोड़ा सचेत और जाग्रत हों तो हिंदी में भी उपयोगी और श्रेष्ठ पुस्तकें तैयार हो सकती हैं। जरूरत है कि पत्र-पत्रिकाएं एवं प्रकाशक हिंदी फिल्मों पर चल रहे गंभीर विमर्श को थोड़ी जगह दें और उनके लेखकों को सम्मान के साथ थोड़ा धन भी दें। अफसोस की बात है कि हिंदी फिल्मों पर दर्जन भर से अधिक लेखक गंभीर लेखन नहीं कर रहे हैं। ज्यादातर अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद ही प्रकाशित हो रहे हैं। हिंदी में जो मूल लेखन कर रहे हैं, उनकी स्थिति इतनी दयनीय है कि एक-दो पुस्तकों के बाद उनका उत्साह मर जाता है। कब खत्म होगी यह उदासीनता और कब कद्र करेंगे हम हिंदी लेखकों की.., खासकर जो सिनेमा पर लिख रहे हैं।

Saturday, February 18, 2012

फेमिनिस्ट नहीं,इंडेपेंडेंट हूं मैं- बिपाशा बसु


-अजय ब्रह्मात्मज

प्यार की परिभाषा सिखाने के लिए बिपाशा बसु को कई दिनों तक रिहर्सल करना पड़ा और 'जोड़ी ब्रेकर्स' के इस गाने की शूटिंग के समय अपने खास कॉस्ट्यूम के कारण घंटों स्टूल पर बैठना पड़ा। यह गाना हॉट किस्म का है और इसमें बिपाशा के नाम का इस्तेमाल किया गया है। अपने नाम के गीत की अनुमति देने से पहले बिपाशा बसु बिदक गई थीं। उन्होंने के निर्देशक अश्विनी चौधरी के प्रस्ताव को सीधे ठुकरा दिया था। अश्विनी चौधरी भी जिद्द पर अड़े थे। उन्होंने गाना तैयार किया। गीत सुनाने के साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि वे इसे किस तरह शूट करेंगे। अश्विनी चौधरी ने आखिरकार उन्हें राजी कर लिया। 'जोड़ी ब्रेकर्स' का यह गीत पॉपुलैरिटी चार्ट पर आ चुका है। बिपाशा बसु ने इस खास मुलाकात में इस गाने का का जिक्र सबसे पहले आ गया। हल्की मुस्कराहट के साथ बधाई स्वीकार करने के बाद उन्होंने उल्टा सवाल किया कि क्या अच्छा लगा?

हॉट बिपाशा पर इस हॉट गीत को उत्तेजक मुद्राओं में शूट किया गया है। पर्दे पर सेक्सुएलिटी को प्रदर्शित करना भी एक कला है, क्योंकि हल्की सी फिसलन या उत्तेजना से वह वल्गर हो सकता है... आप ने उसे वल्गर नहीं होने दिया। इस गाने के शूट के बारे में बताएं?

बिपाशा बताती हैं, 'कई आशंकाएं थीं मेरे मन में। पहले भी कई डायरेक्टर ऐसे आफर लेकर आए थे। वे मेरे नाम पर गीत बताना चाहते थे। वे कैरेक्टर को भी मेरा नाम देना चाहते रहे हैं। मैं हमेशा यही कहती रही कि मेरा असाधारण नाम है। मैं किसी को अपना नाम नहीं दूंगी। अश्विनी ने गाना बना कर दिखाया। मेरी टीम, फैमिली और फ्रेंड्स सभी को यह गाना अच्छा लगा तो मैंने उनकी खुशी के लिए हां कर दी। सभी ने ने समझाया कि अपने नाम के गीत पर खुद परफार्म करें तो अच्छा लगेगा।'

'जोड़ी ब्रेकर्स' अपेक्षाकृत नए निर्देशक अश्विनी चौधरी और नई प्रोडक्शन कंपनी प्रसार की फिल्म है। फिर भी बिपाशा की यह हिस्सेदारी...क्या इस फिल्म में कुछ खास...बिपाशा सवाल पूरा होने के पहले ही बोलना शुरू कर देती हैं, 'बहुत खास है। यह पहली फिल्म है, जिसे मैंने चेज किया है। इस फिल्म के साथ जुड़ी हुई हूं। मैं स्पष्ट कर दूं कि यह गाना रियल बिपाशा को उसके करीबियों के अलावा लोग नहीं जानते। मैं खुली किताब नहीं हूं, लेकिन इतनी जटिल और पर्दानशीं भी नहीं हूं। सरल सी है मेरी जिंदगी...मुझे समझना बहुत मुश्किल काम नहीं है। दो-चार बार मिलें तो आप भी एक धारणा बना सकते हैं।' बिपाशा का परिचय दे पाना या उनकी परिभाषा गढ़ पाना मुश्किल काम है। वह सरल होने के साथ इस मायने में विरल भी हैं कि वह स्वतंत्र स्वभाव की खुली लडक़ी हैं। फिल्मों और संबंधों को लेकर उन्होंने कभी कुछ छिपाने या ढकने की कोशिश नहीं की। पारदर्शी व्यक्तित्व रहा है उनका।

व्यक्तित्व के बारे में पूछने पर बिपाशा बसु स्पष्ट शब्दों में कहती हैं, 'यह झूठ है कि बड़े होने के बाद आप का व्यक्तित्व बनता है। मेरे खयाल में परवरिश, बचपन और अपने माता-पिता से संबंध की प्रगाढ़ता से व्यक्तित्व सजता और शेप लेता हैं। मैं अपने परिवार को अपने व्यक्तित्व का पूरा श्रेय देती हूं। मैं लडक़ी हूं,लेकिन मुझे हमेशा अपनी पसंद से कुछ भी करने की आजादी मिली। मेरे पापा आज भी मुझ पर भरोसा करते हैं, मेरे बारे में कुछ भी लिखा जाए, वे चिंतित नहीं होते। यह मेरा प्राइड है। मेरे पापा मेरी पीठ पर हाथ रखकर कहते हैं कि मेरी बेटी जिम्मेदार लडक़ी है, वह कभी गलत नहीं हो सकती। मैंने अपनी जिंदगी जिस तरह से जी, उसमें शर्मसार होने जैसी बात नहीं रही। मां किसी और मां की तरह थोड़ी चिंतित और परेशान हो जाती हैं...मेरे पापा तो ग्रेट हैं...मेरी तरफ इशारा कर के गर्व से कहते हैं - दैट्स माई डॉटर। मुझे चरित्र का बल अपने माता-पिता से मिला है। मां से मैंने 'लव योरसेल्फ' की फिलॉसफी ली। यह मेरे जीवन का दर्शन है - खुद से प्यार करो। अपने देश में लड़कियां और औरतें सबके के लिए सब कुछ करती हैं...अपनी परवाह नहीं करतीं। मां कहती हैं कि खुद की देखभाल नहीं करो, अपने पैशन और खुशी का खयाल न करो तो दुख खा जाएगा। व्यक्तित्व में कड़वाहट और उदासी आ जाएगी। खुद से प्यार करने पर संतुष्टि आती है और फिर हम ज्यादा दे भी पाते हैं..कर भी पाते हैं।'

बिपाशा के आत्मविश्वास को उनकी कामयाबी और आर्थिक स्वतंत्रता से जोड़ा जा सकता है। अगर बिपाशा फिल्मों में नहीं होतीं तो क्या तब भी ऐसी ही कंफीडेंट और अग्रेसिव रहतीं... वह सहमति में सिर हिलाती हैं... कहती हैं, ‘कंफीडेंस और अग्रेसन... यह बेसिक गुण है मेरी पर्सनैलिटी का। मैं जिंदगी के जिस क्षेत्र में भी रहती इतना तो कह ही सकती हूं कि कमा रही होती। किसी पर निर्भर नहीं रहती। मैं इंटेलिजेंट लडक़ी हूं। स्कूल में नंबर वन रही। किसी भी फील्ड में आगे ही रहती, क्योंकि एकाग्र भाव से अपना काम करती हूं। मैं बहुत महत्वाकांक्षी नहीं हूं। मुझे लगता है कि आज की लड़कियों को आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना चाहिए। बचपन से ही मेरे दिमाग में यह ड्रिल कर दिया गया है कि जो भी करो, खुद का करो। आप किसी के साथ डेट पर जा रहे हो तो आप भी पे करो... ऐसा क्या कि हमेशा लडक़ा ही भुगतान करे? मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है कि कोई मुझ पर खर्च करे। मैं फेमिनिस्ट नहीं हूं, इंडेपेंडेट हूं। इसलिए मैं हमेशा खुश रहती हूं।'

बिपाशा बसु इन दिनों 'राज-3' की शूटिंग कर रही हैं। इमरान हाशमी के साथ बन रही इस फिल्म के निर्देशक विक्रम भट्ट हैं। यह फिल्म महेश भट्ट की देखरेख में बन रही है। इस इंटरव्यू के लिए बिपाशा ने 'राज-3' की शूटिंग से समय निकाला है। स्वाभाविक तौर पर 'राज-3' विक्रम भट्ट और महेश भट्ट सवालों में आ जाते हैं। सभी सवालों को समेटती हुई बिपाशा बताती हैं, 'भट्ट फैमिली मेरे लिए खास रहा है। मैंने 'अजनबी' से शुरुआत की थी, लेकिन 'राज' की शूटिंग के समय एक्टिंग को लेकर सीरियस हुई। महेश भट्ट और विक्रम भट्ट ने मुझे विश्वास दिया कि मैं एक्टिंग कर सकती हूं। फिर उनकी देखरेख में 'जिस्म' आई थी। उस फिल्म से मुझे दमदार सेक्सी इमेज मिली। अपने लिए सेक्सी शब्द सुनना मुझे अच्छा लगता है। 'राज-3' फिर से हॉरर जोनर की फिल्म है। हमलोग थ्रीडी में इसकी शूटिंग कर रहे हैं।'

इन दिनों चर्चा है बिपाशा बसु एक्सपोजर पर उतर आई हैं। अपनी फिल्मों में वह बिकनी पहन रही हैं और बोल्ड दृश्यों में अंगप्रदर्शन कर रही हैं। पूछने पर बिपाशा हंस कर सवाल को टाल देती हैं, 'क्या पूछ रहे हैं आप? मैंने तो 2006 में ही बिकनी पहनी थी। मेरी बोल्ड और सेक्सी इमेज नई नहीं है। मेरे पास ग्रेट बॉडी है ...उसे दिखाने में क्या दिक्कत है। लोग कुछ भी लिखते और बोलते रहते हैं। मैं बता दूं कि मेरी गैंडे की चमड़ी है। कोई करीबी कुछ बोलता है तो चोट लगती है। यह जॉब मुझे पसंद है और मैं करती रहूंगी। मैं आइकॉन या वैक्स स्टैच्यू नहीं बनना चाहती। जरूरी नहीं है कि लोग मुझे याद रखें। अभी एक्टिंग करनी है। लाइफ में सिंगल माइंडेड यही फोकस करना है। कोई डेविएशन नहीं है लाइफ में...एक रिलेशनशिप थी। वह खत्म हो गई तो फिलहाल सिर्फ फिल्में हैं।' रिलेशनशिप खत्म होने से भी बिपाशा के मन में कोई कड़वाहट नहीं है और न लडक़ों के प्रति गुस्सा ... वह जोर देकर कहती हैं, 'एक लडक़े से संबंध खत्म हुआ तो क्या सारे लडक़े खराब हो जाएंगे ... अरे नहीं। मर्द की जात बहुत इंटरेस्टिंग होती है। अभी खबर चलती है कि मैंने इस से दोस्ती कर ली, उसके साथ गई...प्‍लीज... मेरे बहुत सारे लडक़े मेरे दोस्त हैं और कुछ दोस्ती करना चाहते हैं। इसमें मेरा क्या दोष है? मैं बहुत फ्रेंडली मिजाज की लडक़ी हूं, इसलिए जल्दी दोस्ती हो जाती है। मैं एक सवाल पूछती हूं,एक अकेली लडक़ी एक अकेले लडक़े से मिली तो क्या मिलते ही वे ब्वॉयफ्रेंड -गर्लफ्रेंड हो जाएंगे ... कम ऑन थोड़ा तो कॉमन सेंस का इस्तेमाल करो ... रिलेशन बनने में वक्त लगता है। देखें सिंपल प्रोसेस है ... पहले मुलाकात होती है, फिर लडक़ा या लडक़ी एक-दूसरे को चेज करते हैं ... फिर साथ समय बिताते हैं। एक-दूसरे को समझते हैं ... फिर डेटिंग होती हे और फिर लव होता है। आप लोग तो रोज प्रेम करवा देते हैं और फिर वह टूट भी जाता है। थोड़ा तो सांस लेने दो मुझे ... मैं चालू रिलेशन में यकीन नहीं करती। 15 साल की उम्र से मैं अकेली नहीं रही। मैं फिर से लडक़ों से मिलूंगी, किसी से दोस्ती होगी। किसी से प्रेम होगा।'

बिपाशा बसु हैप्पी मूड में हैं। वह अपनी फिल्मों और जीवन से खुश हैं। अकेलापन उन्हें सता नहीं रहा है। कुछ नया और चैलेंजिंग करने का मौका दे रहा है। बिपाशा बसु फिल्म और रिलेशन में एक्सप्लोर करना चाहती हैं। वह अपने व्यक्तित्व के परतों से परिचित होना चाहती हैं।

Friday, February 17, 2012

फिल्‍म समीक्षा :एक दीवाना था

एक दीवाना था-अजय ब्रह्मात्‍मज

देश की भाषायी विविधता का एक बड़ा लाभ है कि किसी एक भाषा में फिल्म सफल हो जाए तो दूसरी भाषाओं में उसे डब या रीमेक कर आप अपनी सफलता दोहरा सकते हैं। पैसे भी कमा सकते हैं। सफल फिल्म को अनेक भाषाओं में बनाना क्रिएटिविटी से अधिक बिजनेस से जुड़ा मामला है। बहरहाल, एक दीवाना था पहले तमिल में बनी, फिर तेलुगू और अब हिंदी में आई है। भाषा बदलने के साथ किरदारों के नाम और पहचान में छोटा बदलाव भर किया गया है। बाकी फिल्म ओरिजनल के आसपास ही है। एक दीवाना था में नए एक्टर? लिए गए हैं - प्रतीक और एमी जैक्सन।

लेखक-निर्देशक गौतम मेनन ने हिंदी रीमेक में मनु ऋषि का सहयोग लिया है। उन्होंने संवादों में हिंदी और दिल्ली का पंच दिया है, जबकि तेरा दीवाना था का संदर्भ मुंबई और केरल से है। हीरो-हीरोइन के आवास की बायीं तरफ अमिताभ बच्चन का बंगला है। मतलब यह जुहू का इलाका है। यहां फिल्म स्टारों के बंगलों के अलावा कितने बंगले बचे हैं? ऊपर से जिनके मालिक मलयाली ईसाई हों और उनके किरदार मराठी कोंकणस्थ ब्राह्मण हो? वास्तविक सी लगने वाली फिल्म में भी वास्तविक सवाल नहीं पूछे जाने चाहिए। गौतम मेनन ने जेसी के रूढि़वादी मलयाली ईसाई परिवार का सटीक चित्रण किया है, लेकिन वैसी ही बारीकी सचिन और उसके परिवार के चित्रण में नहीं है। सचिन का परिवार मुंबई के कॉस्मोपोलिटन कल्चर से प्रभावित हैं।

एक दीवाना था सचिन और जेसी के लव एट फ‌र्स्ट साइट की दास्तान है। अगर आज भी लव एट फ‌र्स्ट साइट हो सकता है तो मलयाली ईसाई परिवार रूढि़वादी क्यों नहीं हो सकता? वैसे अपने प्रेम की वास्तविकता के प्रति नायक-नायिका दोनों ही कंफ्यूज हैं। खास कर नायिका में द्वंद्व और विरोधाभास कुछ ज्यादा है। सचिन को कैमरामैन अनय का निर्देशन, संरक्षण और सहयोग मिलता है। अनय के रूप में फिल्म को एक अच्छा किरदार मिल जाता है। वह अपनी विनोदप्रियता और टिप्पणियों से इस एकरस प्रेम कहानी में हंसी की बौछारें लाता रहता है। मनु ऋषि के बगैर इस फिल्म का क्या हश्र होता? प्रतीक को अभी लंबा सफर तय करना है। उन्हें अपनी डायलॉग डिलीवरी और एक्सप्रेशन पर मेहनत करने की जरूरत है। ऐसा क्यों लगता रहा कि आवाज कहीं से और आ रही है? पाश्‌र्र्व गायन की तरह पाश्‌र्र्व संवाद अदायगी का दौर है यह। जेसी को केरल की बताने के बाद सांवला रंग देने में कई शेड्स इस्तेमाल किए गए हैं। उनकी त्वचा और चेहरे का रंग हर दृश्य के साथ शेड बदलता रहता है। एमी खूबसूरत है, लेकिन एक्टिंग ..??

इस फिल्म के प्रचार में जावेद अख्तर और एआर रहमान की म्यूजिकल जोड़ी को रेखांकित किया गया है। इस जोड़ी के बावजूद फिल्म का कोई गीत थिएटर से निकलने के बाद याद नहीं रहता। यहां तक की रहमान की आवाज का जादू भी इस फिल्म में बेअसर हो गया है। हां, होस्साना का फिल्मांकन रोमांचक है। हुई होगी यह फिल्म तमिल और तेलुगू में सफल, हिंदी में यह अपने उद्देश्य में विफल दिख रही है।

और अंत में इसे देखते हुए पुरानी फिल्म जूली और एक दूजे के लिए याद आती रही।

रेटिंग-** दो स्टार


धन्यवाद पाकिस्तान

धन्यवाद पाकिस्तान-अजय ब्रह्मात्‍मज

सूचना आई है कि पाकिस्तान के अधिकारियों ने पेशावर स्थित दिलीप कुमार के पुश्तैनी घर को खरीद लिया है। वे इसे राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर रहे हैं। इरादा है कि दिलीप कुमार के पुश्तैनी घर को म्यूजियम का रूप दे दिया जाए, ताकि स्थानीय लोग अपने गांव की इस महान हस्ती को याद रख सकें और देश-विदेश से आए पर्यटक एवं सिनेप्रेमी दर्शन कर सकें। पेशावर अभी पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में है। वहां के मंत्री इफ्तिखार हुसैन ने दिलीप कुमार के घर को संरक्षित करने में दिलचस्पी दिखाई है। उन्होंने पिछले साल दिसंबर में ही घोषणा की थी कि दिलीप कुमार और राज कपूर के घरों को राष्ट्रीय धरोहर के रूप में संरक्षित किया जाएगा।

पाकिस्तानी अधिकारियों की इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए। भारत सरकार को सबक भी लेना चाहिए। भारतीय सिनेमा के सौ साल होने जा रहे हैं, लेकिन हमारे पास ऐसा कोई राष्ट्रीय संग्रहालय नहीं है जहां हम पॉपुलर कल्चर की विभूतियों से संबंधित सामग्रियों का अवलोकन कर सकें। पूना स्थित फिल्म अभिलेखागार की सीमित भूमिका है। उसके बारे में हमारे फिल्मकार भी नहीं जानते। वे अपनी फिल्मों से संबोधित सामग्रियां और स्मृति चिह्न वहां नहीं भेजते। किसी ने कभी सुझाया भी तो वे रुचि नहीं दिखाते। मुंबई में भी ऐसा कोई स्थान या केंद्र नहीं है, जो पर्यटन की दृष्टि के साथ इतिहास के संरक्षण के लिहाज से स्थापित किया गया हो। महाराष्ट्र सरकार भी इस दिशा में फैसला ले सकती है।

आजादी के आसपास पांचवें दशक के उत्तरा‌र्द्ध में मुंबई फिल्म निर्माण और व्यवसाय के प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा। पूरे देश से प्रतिभाओं ने मुंबई को ठिकाना बनाया। मुंबई में उन्होंने अपना आवास खरीदा, बंगले बनाए और दशकों तक उनमें रहे। शहरीकरण के दबाव के बाद ये पुराने बंगले बहुमंजिली इमारतों में तब्दील हो रहे हैं। सारे बंगले और स्टूडियो टूट रहे हैं। उनके संरक्षण की तरफ किसी का ध्यान नहीं है। दिलीप कुमार का पेशावर स्थित घर तो बचा लिया गया, लेकिन मुंबई के बांद्रा इलाके में पाली हिल स्थित उनका निवास बहुमंजिली इमारतों से घिर गया है। उनके बंगले का एक हिस्सा ऐसी ही इमारत की शक्ल ले चुका है। क्या दिलीप कुमार के बंगले के बचे हिस्से को बचाया और संरक्षित किया जा सकता है? राज कपूर का आर के स्टूडियो अच्छी हालत में नहीं है। कपूर परिवार के रणबीर कपूर और करीना कपूर अपने खानदान की दुहाई देकर दर्शकों का समर्थन हासिल कर लेते हैं, लेकिन क्या कभी अपने दादा के योगदान को पूरी दुनिया के लिए सार्वजनिक करने के बारे में उन्होंने कभी कुछ सोचा? आर के स्टूडियो के एक गोदामनुमा कमरे में राज कपूर की सभी फिल्मों के परिधान रखे हुए हैं। इस स्टूडियो को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जा सकता है। ऐसा ही देव आनंद का बंगला है। आज नहीं तो कल वह भी टूट जाएगा। उनका आनंद स्टूडियो पहले ही इमारत में तब्दील हो चुका है। अमिताभ बच्चन की प्रतीक्षा को भी सरकार अपने कब्जे में ले या उसमें किसी प्रकार के परिवर्तन से रोके। सही में ये सब पॉपुलर कल्चर के अनोखे आधुनिक तीर्थ स्थान हैं।

दिलीप कुमार और राज कपूर के पेशावर स्थित घरों के संरक्षण से याद आया कि हिंदी फिल्मों के विकास में लाहौर की बड़ी भूमिका रही है। आजादी के पहले हिंदी फिल्मों के तीन केंद्र थे -मुंबई, कोलकाता और लाहौर। आजादी के बाद देश के बंटवारे से लाहौर की फिल्म इंडस्ट्री ने पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री का रूप लिया, लेकिन धीरे-धीरे सरकारी उदासीनता से लाहौर की फिल्म इंडस्ट्री ने दम तोड़ दिया। पुराने स्टूडियो टूट गए। जो बचे हैं, उनमें केवल टीवी शो की शूटिंग होती है। अगर पाकिस्तान लाहौर के लुप्त लिंक को जिंदा करे और उसे दुनिया के सामने लाए, तो हिंदी फिल्मों के विकास में लाहौर के महत्वपूर्ण योगदान को समझने में मदद मिलेगी।

फिलहाल पाकिस्तान के उच्चअधिकारियों को बधाई कि उन्होंने हिंदी फिल्मों के दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार के पुश्तैनी घर को भविष्य के लिए सुरक्षित और संरक्षित किया। अब हमें राज कपूर के पुश्तैनी घर के अधिग्रहण की खबर का इंतजार है।

Tuesday, February 14, 2012

जुड़े गांठ पड़ जाए

जुड़े गांठ पड़ जाए-अजय ब्रह्मात्‍मज

अभी पिछले दिनों शिरीष कुंदर ने ट्विट किया है कि झगड़े के बाद हुई सुलह से कुछ रिश्ते ज्यादा मजबूत हो जाते हैं, लेकिन मानव स्वभाव शब्दों के संविधान से निर्देशित नहीं होता। रहीम ने सदियों पहले कहा है, रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाये, टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाये..। यह गांठ और खलिस शिरीष कुदर, फराह खान और मुमकिन है कि शाहरुख खान के मन में भी बनी रहे। शाहरुख और फराह की दोस्ती बहुत पुरानी है। दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे के सेट पर सरोज खान से अनबन होने पर शाहरुख ने फराह को अपने गाने की कोरियोग्राफी के लिए बुलाया था। दिन पलटे। फराह सफल कोरियोग्राफर हो गईं। फिर शाहरुख ने ही उनकी बढ़ती ख्वाहिशों को पर दिए और मैं हूं ना डायरेक्ट करने का मौका दिया। शाहरुख के प्रोडक्शन को पहली बार फायदा हुआ, लेकिन उससे बड़ा फायदा फराह का हुआ। सफल निर्देशक के तौर पर उन्होंने दस्तक दी और शाहरुख के प्रोडक्शन की अगली फिल्म ओम शांति ओम से उनकी योग्यता मुहर लग गई। इसी बीच शिरीष का फराह के जीवन में प्रवेश हुआ। दोनों का विवाह हुआ और इसके गवाह रहे साजिद खान, साजिद नाडियाडवाला और शाहरुख।

शादी के बाद शिरीष ने संबंधों के उस स्पेस में अपने लिए जगह बनाई जो तब तक मुख्य रूप से शाहरुख के अधीन था। देखा गया है कि प्रेम या शादी के बाद सबसे पहले किसी नजदीकी दोस्त से रिश्ता दरकता है। शाहरुख और फराह का रिश्ता पहले सा नहीं रहा। फिल्म निर्माण-निर्देशन से जुड़े शिरीष की ख्वाहिशों ने करवट ली। शाहरुख ने इस बार उसे तरजीह नहीं दी। नतीजा इस रूप में सामने आया कि फराह ने अपने पति की इच्छाओं के लिए नई दोस्ती कर ली। गलतफहमी गाढ़ी हुई और फिर प्रेम का धागा चटक गया। फराह और शाहरुख ने मर्यादित व्यवहार बनाए रखा, लेकिन खार खाए शिरीष की अम्लीय टिप्पणियां सोशल नेटवर्क पर सामने आने लगीं। हद तब हुई, जब रॉ. वन की रिलीज और दर्शकों के रेस्पॉन्स पर शिरीष ने ट्विट किया, सुना 150 करोड़ का पटाखा फुस्स हो गया..। बॉक्स ऑफिस की मार झेल रहे शाहरुख के लिए टिप्पणी शूल साबित हुई। इमोशन लहूलुहान हुए और संबंधों में कड़वाहट आ गई।

यही कड़वाहट पिछले रविवार-सोमवार की रात हाथपाई के तौर पर सामने आई। शिरीष के व्यवहार और स्वभाव के जानकारों के मुताबिक वह पंगे के लिए उतारू थे। शाहरुख के सब्र का बांध टूटा। वे उत्तेजित हुए और उन्होंने हाथ छोड़ दिया। कहना मुश्किल है कि उस खास क्षण में क्या हुआ होगा, लेकिन जो सामने आया वह भद्दा और शर्मनाक था। मीडिया और इंडस्ट्री ने इस मौके पर संयम से काम नहीं लिया। बात को बतंगड़ और तिल को ताड़ बनाने की हर कोशिश की गई। अगले दिन कहते हैं संजय दत्त और साजिद खान की पहल पर शिरीष और फराह मन्नत गए और उन्होंने शाहरुख को मना लिया। फिलहाल ऊपरी तौर पर सुलह हो गई है और शांति दिख रही है, लेकिन दोस्ताने में पड़ी कलह भविष्य में किसी और रूप में जाहिर हो सकती है। सुहल से सब कुछ सुलझ जाए, तो फराह और शाहरुख की जोड़ी फिर से धमाल कर सकती है। थोड़ी फेर-बदल से उनकी स्थापित फिल्म हैप्पी न्यू ईयर आरंभ हो सकती है। फराह लोकप्रिय सिनेमा के तत्वों को बारीकी से समझती हैं और शाहरुख उन्हें बखूबी पर्दे पर उतारते हैं। करीबी बताते हैं कि शाहरुख के कैंप में शिरीष अच्छी तरह फिट नहीं हो पाए हैं। दोस्ती और दांपत्य दो अलग चीजें हो सकती हैं। दोनों रिश्तों को उनकी जरूरतों के साथ काजोल ने निभाया है। काजोल भी शाहरुख के कैंप की सदस्य हैं, जबकि अजय देवगन की इस कैंप से नहीं छनती। फिर भी कभी कोई अभद्र या अशोभनीय घटना आज तक नहीं सुनाई पड़ी।

उम्मीद की जानी चाहिए कि हमारे लोकप्रिय स्टार भविष्य में ऐसी अप्रिय घटनाओं में शामिल न हों। उन्हें अपने सामाजिक व्यवहार ध्यान रखना चाहिए कि वे समाज के आइकॉन हैं। उनसे संयत व्यवहार की उम्मीद की जाती है। आम नागरिक की तरह उनका लड़ना-झगड़ना सही नहीं लगता..।

Monday, February 13, 2012

फिल्म समीक्षा : एक मैं और एक तू

डायनिंग टेबल ड्रामाडायनिंग टेबल ड्रामा

-अजय ब्रह्मात्‍मज

करण जौहर निर्माता के तौर पर एक्टिव हैं। कुछ हफ्ते पहले उनकी अग्निपथ रिलीज हुई। एक्शन से भरी वह फिल्म अधिकांश दर्शकों को पसंद आई। इस बार वे रोमांटिक कामेडी लेकर आए हैं। वसंत का महीना प्यार और रोमांस का माना जाता है। अब तो 14 फरवरी का वेलेंटाइन डे भी मशहूर हो चुका है। इस मौके पर वे करीना कपूर और इमरान खान के डेट रोमांस की फिल्म एक मैं और एक तू किशोर और युवा दर्शकों को ध्यान में रखकर ले आए हैं। करण जौहर की ऐसी फिल्मों की तरह ही इसका लोकेशन भी विदेशी है। वेगास से आरंभ होकर यह फिल्म नायक-नायिका के साथ मुंबई पहुंचती है और डायनिंग टेबल ड्रामा के साथ समाप्त होती है। और हां,इस फिल्म के निर्देशक शकुन बत्रा हैं।

अचानक मुलाकात, हल्की सीे छेडछाड़, साथ में ड्रिंक और फिर अनजाने में हुई शादी बता दें कि कहानी में लड़का थोड़ा दब्बू और लड़की बिंदास है। यूं इस फिल्म की अन्य महिला किरदार भी यौन ग्रंथि की शिकार दिखती हैं। मुमकिन है विदेशों में लड़कियां यौन संबंधों को लेकर अधिक खुली और मुखर हों।

राहुल और रियाना अनजाने में हुई अपनी शादी रद्द करवाने के चक्कर में दो हफ्ते मिलते और साथ रहते हैं। रियाना के संसर्ग में आकर राहुल बदलता ही नहीं है। वह रियाना से प्यार भी करने लगता है। रियाना उसके प्यार का तूल नहीं देती। वह उसे सिर्फ दोस्त समझती है। थोड़े मान-मनौव्वल के बाद दोनों प्यार के बराबर एहसास को महसूस करते हैं।

नयी सोच और भाषा की यह प्रेम कहानी हिंदी फिल्मों के आम दर्शकों के लिए थोड़ी मुश्किल हो सकती है क्योंकि संवादों में अंग्रेजी धड़ल्ले से इस्तेमाल हुई है। शहरी और कॉलेज के युवकों को प्रेमकहानी की यह नई शैली पसंद आ सकती है। शकुन बत्रा ने एक छोटी सी कहानी को लंबा खींचा है। इसलिए इंटरवल के पहले कहानी आगे बढ़ती नहीं लगती। भारत आने के बाद अन्य किरदार जुड़ते हैं और घटनाएं तेजी से घटती हैं। डायनिंग टेबल ड्रामा अच्छी तरह से लिखा और शूट किया गया है।

राहुल का किसी ज्वालामुखी की तरह फटना फिल्म का चरम बिंदु है। इमरान ने दृश्य की जरूरत के मुताबिक मेहनत की है। करीना कपूर का अभिनय प्रवाह देखते ही बनता है। इस फिल्म को देखते हुए जब वी मेट की गीत का खयाल आना स्वाभाविक है, लेकिन दोनों में फर्क है। करीना ने अपने दोनों किरदारों को एक सा नहीं होने दिया है। बाकी कलाकार और किरदार भरपाई के लिए हैं। अमिताभ भट्टाचार्य के एक गीत में पानी का बहुवचन पानियों सुनाई पड़ता है। यह प्रयोग कितना उचित है? अमित त्रिवेदी धुनों की नवीनता केसाथ यहां मौजूद हैं। आंटी जी अमित और अमिताभ का मजेदार म्यूजिकल क्रिएशन है।


*** तीन स्टार

प्रेम-रोमांस : विनाइथंडी वरुवाया ( वीटीवी )



शालिनी मलिक ने तमिल फिल्‍म विनाइथंडी वरुवाया ( वीटीवी ) के बारे में लिखा है। शालिनी मास कम्‍युनिकेशन की पढ़ाई कर रही हैं। उनसे shalini14chaudhry@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।

यहाँ पर विदेशी फिल्मों के बीच मैं एक भारतीय फिल्म विनाइथंडी वरुवाया ( वीटीवी ) की चर्चा करना चाहूंगी। वेलेंनटाइन डे से तीन दिन बाद एक फिल्म आ रही है एक दीवाना था,जिसमें प्रतीक और एमी जैक्‍सन दिखेंगे। मूलरुप से तमिल भाषा की यह फिल्म विनाइथंडी वरुवाया ( वीटीवी ) अब तक तीन भाषाओं में बन चुकी है, हर भाषा में अलग भाव व्यक्त करती....

पर कहते है कि जो बात असल में होती है वह नकल में नही आती। फिल्म वही है कहानी भी वही है पर जो बात वीटीवी की जेसी (नायिका) में है ,वह निराली है। आप इस जेसी और कार्तिक (नायक) की कहानी में खो जाते है। जैसा कि फिल्म का नाम है विनाइथंडी वरुवाया जिसका अर्थ है क्या तुम आसमानों को पार करोगी और आओगी...

फिल्म के नाम में उसकी पूरी कहानी सिमटी हुई है। कहानी एक कट्टर ईसाई प

रिवार की लड़की जेसी और तमिल हिन्दू लड़के कार्तिक के प्यार की है। कार्तिक का प्यार बंदिशो को बहा ले जाता है,पर जेसी अपने प्यार और परिवार के बीच उलझी है। उसे यह उलझन भी है कि वह कार्तिक से उम्र में बड़ी है। वह कार्तिक से प्यार करती है,पर समाज से लड़ना नही चाहती। यह हर उस लड़की की कहानी है जो अपने प्रेम को पाना तो चाहती है पर अपनों को दुख पहुँचाना उसे मंजूर नही और अंत में वह अपने परिवार को चुनकर अपने प्रेम को मन में छुपाकर जिदंगी से समझौता कर लेती है। कार्तिक उसकी मजबूरी का सम्मान करता है। यही उसके प्यार की गहराई है। उसे जेसी से शिकायत नहीं कि वह उसके लिए आसमान को पार नही कर पायी पर उसे पता है कि जेसी उसे मिले ना मिले पर जेसी का प्यार तो उसी का है। प्रेम का यही भाव अमर कहलाता है

फिल्म में जेसी थी त्रिशा और कार्तिक का किरदार निभाया था शिम्बू ने। परदे पर इन्होने अपनी केमस्ट्री से ऐसा जादू जगाया है कि आपको एक पल भी यह नही लगेगा कि आप कोई फिल्म देख रहे है। दोनों ने प्रेम के एहसास को अपने सधे हुए अभिनय से एक सजीव अभिव्यक्ति प्रदान की है। गौतम मेनन जो फिल्म के निर्देशक उन्होंने फिल्म को एक सच्चाई प्रदान की है। यह फिल्म आपको यश चोपड़ा की फिल्‍मो की तरह सपनो की दुनियाँ में नही ले जाती पर आपको प्यार के मीठे दर्द का एहसास कराती है। और प्यार का यह दर्द ही इसकी खासियत है

Sunday, February 12, 2012

दुष्‍ट भी दिख सकते हैं ऋषि कपूर


-अजय ब्रह्मात्‍मज

तारीफ देती है खुशी और खुशी से खिलती हैं बांछें। बांछें खिली हों तो आप की उम्र छह साल हो कि ऋषि कपूर की तरह साठ साल ... वह आप की चाल में नजर आते हैं। उम्र की वजह से बढ़ा वजन भी पैरों पर भार की तरह नहीं लगता। आप महसूस करें ना करें ... दुनिया का नजरिया बदल जाता है। अचानक आप के मोबाइल नंबर की खोज होने लगती है और आप सभी को याद आ जाते हैं। 'अग्निपथकी रिलीज के अगले दिन ही ऋषि कपूर के एक करीबी से उनका नंबर मिला। मैंने इच्छा जाहिर की थी कि बात करना चाहता हूं, क्योंकि रऊफ लाला कि किरदार में ऋषि कपूर ने चौंकाने से अधिक यकीन दिलाया कि अनुभवी अभिनेता किसी भी रंग और रंगत में छा सकता है। एक अंतराल के बाद ऋषि कपूर को यह तारीफ मिली। दोस्त तो हर काम की तारीफ करते हैं। इस बार दोस्तों के दोस्तों ने फोन किए और कुछ ने पल दो पल की मुलाकात की याद दिलाकर दोस्ती गांठ ली। बड़े पर्दे का जादू सिर चढ़ कर बोलता है और अपनी तरफ आकर्षित करता है।

बांद्रा के पाली हिल में ऋषि कपूर का बसेरा है। बेटे रिद्धिमा की शादी हो गई है और बेटा रणबीर हिंदी फिल्मों का 'रॉकस्टार' बना हुआ है। ऋषि कपूर बेटे की कामयाबी और वाहवाही से संतुष्ट हैं। एक ही कमी सालती थी कि रणबीर कपूर की पहचान और चर्चा राज कपूर के पोते के रूप में ज्यादा होती थी। कोई याद नहीं रखता था कि बीच में मैं उसका पापा ऋषि कपूर भी हैं, 'हंसते हुए कहते हैं ऋषि कपूर और बेटे के साथ-साथ मिली खुद की ताजा पहचान का सुख छलकने लगता है। मां और पिता के नाम पर रखा गया है उनके बंगले का नाम - कृष्णा राज। पुराना बंगला है, लेकिन आधुनिक सुविधाओं से पूर्ण। गेट खुलते ही सामने लाल फरारी नजर आती है। फुर्सत मिलने पर रणबीर कपूर इसकी सवारी करते हैं।'

अंदर घुसते ही बताया गया कि आप नीचे चले जाएं। रणबीर कपूर से ऊपर ही मुलाकातें होती रही हैं। ऑफिसनुमा कॉटेज से सटा है बैठकी का दरवाजा और दोनों के बीच से कुछ सीढिय़ां नीचे उतरती हैं। सीधे उतर कर दाहिनी और मुड़ते ही बंगले के पीछे छिपे हरा लॉन नजर आता है। लॉन में बायीं तरफ शीशे की दीवारों से घिरी बैठकी है। अंदर की एक दीवार आई ने की है। बमुश्किल पांच मिनट के इंतजार के बाद ऋषि कपूर अपनी मस्त चाल में बंगले से निकलते हैं। परस्पर अमिवादन महज औपचारिकता नहीं होती। हाथ मिलाने की गर्मजोशी से पता चल जाता है कि मेजबान किसी मूड में हैं? ऋषि कपूर से बातें आरंभ होती हैं। मैं कुछ पूछूं कि वे इशारे से रोक देते हैं। ब्लैकबेरी ने बताया कि कोई मैसेज आया है। चश्मा आंखों पर चढ़ाकर वे मैसेज पढ़ते हैं और जवाब देते हैं। कहते हैं, 'कोई तारीफ कर रहा तो थैंक्यू तो बोलना ही चाहिए ना?’ रात से फोन की घंटी बज रही है। मुझे याद नहीं कि मैंने कभी इतने फोन रिसीव किए या लोगों ने मुझे इस कदर याद किया। 'अग्निपथका रोल लोगों को इंफेक्ट कर गया है। उन्हें पसंद आ गया है। मुझे ताज्जुब हो रहा है, क्योंकि मैंने सोचा नहीं था कि ऐसा कुछ होगा। अचानक चालीस सालों के बाद इस उम्र में सभी का चहेता बन गया हूं।

ऋषि कपूर मानते हैं कि दर्शकों को मेरे रोल का नयापन भा गया। वे बताते हैं, 'पच्चीस सालों तक मैं रामांटिक हीरो रहा। लंबी पारी खेली। अब कैरेक्टर रोल करता हूं। कोशिश रहती है कि हर फिल्म में कुछ अलग किरदार करूं। यह किरदार इतना अलग था कि मैंने तो मना कर दिया था। मना इसलिए किया था कि मेरा तो जो होगा सो होगा, दोनों करण की मां पिटेगी। फिल्म को नुकसान हुआ तो मैं भी दोषी माना जाऊंगा।इसी बीच ब्लैकबेरी फिर बजता है ऋषि कपूर किसी मासूम बच्चे की तरह खुशी छिपा नहीं पाते। कहते हैं, 'एक मिनट अरे, यह लंदन से है। मैं कॉल ले लेता हूं।किसी पुराने दोस्त का फोन है भाटिया पंजाबी में बातें होती हैं। फिर ऋषि कपूर अंग्रेजी बोलने लगते हैं, बताते हैं भाटिया का अंग्रेज दोस्त है। वे स्पीकर ऑन कर देते हैं अंग्रेज दोस्त अपने अंदाज में कहता है तू चा (छा) गए …’ मानो किसी ने गुदगुदा दिया हो ऋषि कपूर के पूरा शरीर हंसी से हिलने लगता है। वे खुद ही कहते हैं, 'मैं इसे बंद कर देता हूं। आप से बात ही नहीं हो पाएगी। मैं इसी में उलझा रहूंगा।

ब्लैकबेरी बंद कर वे आसन बदलते हैं। इस बार उनकी आवाज और जवाब में इत्मीनान है, 'मेरे रोल के साथ-साथ मेरी पसंदगी का सेहरा दोनों करण के सिर जाता है। उनकी दृष्टि और समझ का मैं कायल हूं। रऊफ लाला के रोल में मुझ जैस रोमांटिक हीरो की छवि एक्टर को चुनने का साहस उन्होंने किया। मल्होत्रा की यह पहली फिल्म है और जौहर के इसमें पैसे लगे हैं। मुझे डर था कि अगर फेल हुआ तो इंडस्ट्री में मेरी जवाबदेही बनेगी कि तुम ने दोनों बच्चों का खयाल नहीं किया। दोनों मेरे सामने चडढी में खेलते थे। मुझे लगा कि मैं पर्दे पर खराब तो दिख सकता हूं, लेकिन दुष्ट नहीं दिख सकता। खलनायक नहीं लगूंगा। लुक टेस्ट के रिजल्ट देखने के बाद ही मैंने हां की। मैंने दोनों के पिताओं के साथ काम किया है। यश जौहर की 'दुनियावह नहीं चली थी। करण मल्होत्रा के पिता रवि मल्होत्रा के 'झूठा कहीं था’, 'खेल खेल में’, 'राही बदल गएऔर 'हम दोनों... हम तीनों अच्छे मित्र थे। आज दोनों के पिता नहीं हैं। आज मुझे खुशी है कि मैं मित्रों के बेटों के काम आया।ऋषि कपूर जोर देकर कहते हैं कि मेरी खुशी की एक वजह नहीं है ... यह बहुआयामी हो गइ है। वे आगे बताते हैं, 'यह उनका विश्वास था कि मैं पर्दे पर इतना भयंकर दिख सकता हूं। और फिर उन्होंने मुझे जो अल्फाज दिए थे। गाली-गलौज हम भी करते हैं। लेकिन ऐसी नीच जबाव ... भला हो सेंसर का ... उसने मेरे संवाद कटवा दिए। हमें फिर से डब करना पड़ा। कठोर और घिनौने लब्जों को मुलायम करना पड़ा। पियूष मिश्रा ने तो मुझे घिनौना बनाना तय कर लिया था।

'अग्निपथरिलीज के अगले दिन ऋषि कपूर ट्विटर पर ट्रेंड कर रहे थे। ट्विटर हमेशा दस नाम बताता है, जिनकी ट्विटर पर ज्यादा चर्चा हो रही हो। ऋषि कपूर राज खोलते हैं, 'मुझे करण जौहर ने बताया कि मैं ट्रेंड कर रहा हूं। मैं हूं फेसबुक और ट्विटर पर, लेकिन एक्टिव नहीं हूं। इसकी वजह यही लगती है कि मैं चर्चा में नहीं था। मुझ से किसी को उम्मीद नहीं थी। पर्दे पर मुझे देखते ही दर्शक उछल पड़े। मैं उनके दिमाग में रह गया।रऊफ लाला किरदार के लिए अप्रोच के बारे में पूछने पर ऋषि कपूर हंसते हुए जवाब देते हैं, 'आपको कभी लगा कि मैं पढ़ कर या सोच कर कोई रोल करता हूं। मैं मेथड एक्टर नहीं हूं। मैं नैचुरल एक्टर हूं। मेरा बेटा भी नैचुरल एक्टर है। हम कोशिश करते हैं कि किरदारोंं को नैचुरल तरीके से पेश करें। कुछ लोग कहते हैं कि स्टार तो हर फिल्म में स्टार होते हैं तो फिर आप बताएं कि क्या रऊफ लाला ऋषि कपूर है या 'दो दूनी चारमें आपने ऋषि कपूर को देखा था। मेरे लिए कॉमन मैन बनना कितना मुश्किल था। मैं खाता-पिता अमीर घर का आदमी हूं, लेकिन क्या 'दो दूनी चारमें आम आदमी नहीं लगा। रंजीत कपूर 'चिंटू जीहो या निखिल आडवाणी की 'पटियाला हाउस... जोया अख्तर की 'लग बाय चांसमें आपने देखा। मुझे भिन्न-भिन्न चरित्रों को निभाते हुए मजा आ रहा है। मैं चाहूंगा कि यह मजा बना रहे। मैं रेगुलर बाप का रोल करता ही नहीं चाहता। स्क्रिप्ट सुनते ही मना कर देता हूं। 25 सालों तक स्टेटर पहन कर, गले में मफलर बांधे बर्फानी वादियों में लड़कियों को लुभाने के लिए गाने गाता रहा। थक गया था गाते-गाते। अब यह नया दौर है। मेरी अगली फिल्म 'हाउसफुल-2’ 5 अप्रैल को आ रही है। फिर करण जौहर की 'स्टूडैंट ऑफ द ईयरऔर डेविड धवन की 'चश्मे बद्दूरआएगी। मैं मजे के लिए काम कर रहा हूं।

'मैं इस बात से बहुत खुश हूं कि दर्शक मुझे सराह रहे हैं। मैं खुश हूं। एक्टर के तौर पर व्यस्त हूं। मैं काम कर रहा हूं ना। लोग मुझ से बार-बार पूछते हैं कि आर के में क्या हो रहा है? मेरी तरफ से कुछ भी नहीं हो रहा है। वहां अभी कुछ भी अभी नामुमकिन है। और कोई भाई बनाना चाहे तो बनाए। मैं फिलहाल एक्टिंग करता रहूंगा। यह मेरी पहचान है। पहला प्यार है। मैं अपनी फिल्मों में अच्छा-बुरा नहीं कह सकता। फ्लोर और कमजोर फिल्म की भी यादें हैं ... लुत्फ हैं ... मैंने कभी सेफ नहीं खेला। रणबीर भी ऐसा ही है। हर फिल्म में एक्सपेरिमेंट कर रहा है। 'रॉकेट सिंह’ , 'वेकअप सिड’, 'रॉकस्टार... रणबीर वैसी पिक्चर कर रहा है जो ऑफबीट हो। उसने अपनी मां को बहुत पहले कह दिया था कि मैं कावेंशनल हीरो नहीं बनूंगा। जो तिरछी टोपी लगाए नाच रहा हो और पीछे चालीस डांसर हों। मैं अपनी उम्र का रोल करूंगा, उसकी 'राजनीतिदेखिए ... निगेटिव शेड है। ऐसा नहीं है कि मेरा बेटा है, इसलिए तारीफ कर रहा हूं। अभी तो उसने शुरुआत की है। उसे अपने दादा-परदादा का नाम रोशन कर रहा है। अब पचास घंटे फिल्म चल जाए तो काफी है, हर दौर की अपनी मुश्किलें होती हैं। हमलोग धार के की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। मैंने उसे निभाया और अब रणबीर कपूर पूरा न्याय कर रहा है। मैं किसी और की परवाह नहीं करता। किसी को खुश करने के लिए कभी काम नहीं किया, ‘ धाराप्रवाह बताते हैं ऋषि कपूर अपने और रणबीर के बारे में।

उनकी इच्छा है कि कोई अच्छी स्क्रिप्ट मिले तो वे तीनों (ऋषि कपूर, नीतू और रणबीर) साथ में पर्दे पर आएं। विश्वास के साथ ऋषि कपूर कहते हैं, 'कोई न कोई डायरेक्टर लेकर आएगा स्क्रिप्ट और हम जरूर काम करेंगे। अभी उम्र ही क्या हुई है। अभी 60 का भी तो नहीं हुआ।

Saturday, February 11, 2012

ज्ञान का प्रवाह है उपनिषद गगा


-अजय ब्रह्मात्‍मज

दूरदर्शन पर 11 मार्च से आरंभ होगा डॉ. चद्रप्रकाश द्विवेदी लिखित और निर्देशित 'उपनिषद गगा' का प्रसारण। इस धारावाहिक के कथ्य, शिल्प और प्रस्तुति के बारे में बता रहे हैं डॉ. चद्रप्रकाश द्विवेदी

भारत की आध्यात्मिक धरोहर

उपनिषद को मैं भारत की आध्यात्मिक धरोहर मानता हूं। उस समय के चितकों जिन्हें हमलोग ऋषि कहते हैं, उन्हें मैं सामाजिक वैज्ञानिक कहता हूं। उनके विचारों में भारत एक भौगोलिक इकाई के रूप में नहीं रहता। वे समग्र विश्व समुदाय पर विमर्श करते हैं। उनके चितन में सघर्ष-द्वंद्व की समाप्ति और सपूर्ण मानव जाति के सुख के विषय होते थे। पूरे ब्रह्माण्ड में वे एक ऐसी कल्पना को ढूंढ रहे हैं, जिससे उसकी एकात्मता को सिद्ध किया जा सके। यह एकात्मता उनकी कल्पना है या यथार्थ है, इस सदर्भ में ऋषियों का समग्र चितन और चितन के कारण मानवता के समक्ष खड़े प्रश्नों के उत्तार ढूंढने की कोशिश ही वेदात है। वेदात के बाद तमाम लोगों ने उस पर भाष्य और कई चीजें लिखीं, जो एक वृहद प्राचीन भारतीय साहित्य बना। यह साहित्य समय के साथ लुप्त हो रहा है। चिन्मय मिशन की क्रिएटिव विग चिन्मय क्रिएशन ने इसे सरक्षित करने का प्रयास किया है।

गगा शब्द क्यों

मैंने धारावाहिक के लिए उपनिषद गंगा शीर्षक चुना क्योंकि भारत की पूरी वैचारिक धरोहर का विकास गगा के किनारे हुआ है और जैसे गगा का प्रवाह अनवरत है, उसी प्रकार चितन का यह प्रवाह अनवरत है। वैदिक काल के याज्ञवल्क्य हों या मुगल काल के दारा शिकोह हों या आधुनिक युग के रामकृष्ण परमहंस-विवेकानद हों या स्वामी चिन्मयानद हों..सभी उसी से अपनी प्रेरणा पाते हैं और उस विचार को अभिव्यक्त करते हैं। सक्षेप में उपनिषद भारतीय चितन का मूल स्रोत है। चूंकि उसका प्रवाह रुक गया है, इसलिए नए सिरे से कोशिश हो रही है कि प्रवाह जारी रहे। उपनिषद में अवधारणाएं हैं। दृश्य-श्रव्य माध्यम के लिए उसमें पर्याप्त कहानिया नहीं हैं, जिनके माध्यम से उन्हें चित्रित किया जा सके। कुछ कहानिया मिलती हैं। कुछ में प्रारंभ है, कुछ में मध्य है और अंत नहीं है। कुल मिलाकर एक कथाचित्र के लिए जैसी कहानियों की आवश्यकता होती है, उस तरह की कहानिया उसमें नहीं हैं।

नया शिल्प

काफी सोच-विचार करने के बाद मुझे लगा कि क्यों न अवधारणाएं उपनिषदों से ली जाएं और उन अवधारणाओं को व्याख्यायित एव चित्रित करने लायक कहानिया पूरे भारतीय साहित्य से ढूंढी जाएं। इस तरह प्राचीन से वर्तमान भारतीय साहित्य तक ऐसी कहानिया ढूंढी गई। ये अवधारणाएं इतनी गूढ़ हैं कि उनके लिए एक सूत्रधार की आवश्यकता थी। प्राचीन भारतीय नाट्य परंपरा से हमने सूत्रधार, विदूषक, अभिनेत्री और नटी लिए। सस्कृत नाटक की परिपाटी का शिल्प चुना गया। इस परिपाटी में हम सबसे पहले विचार का आह्वान करते हैं, सारे कलाकार मच पर आते हैं। सस्कृत नाटकों में जैसे नादी गायी जाती है, वैसे सारे कलाकार उपनिषद या समवर्ती ग्रंथों से विचार और अवधारणाएं रखते हैं, बाद में नाटक के रूप में उसका विकास होता है और अचानक हम किसी एक बिदु पर वास्तविक जगत में चले जाते हैं। मच की शक्ति के लिए सिनेमा की शक्ति का इस्तेमाल किया गया और मच को सिनेमा के तौर पर ट्रीट किया गया। दो विधाओं का अच्छा योग दर्शक 'उपनिषद गगा' में देखेंगे।

मुश्किल रहा लेखन

पहले मेरे मन में इसको लिखने का कोई इरादा नहीं था। मैंने समकालीन प्रसिद्ध लेखकों को 'उपनिषद गगा' लिखने के लिए आमत्रित किया था, परंतु उनके पास इसे न लिखने के अलग-अलग कारण थे। आखिरकार मुझे लिखना पड़ा। इस काम में पटना के फरीद खान ने मेरा साथ दिया। लेखन का काम मैंने और फरीद खान ने किया है।

इस धारावाहिक के निर्माण में चिन्‍मय मिशन,डॉ.चंद्रप्रकाश द्विवेदी और विस्‍डम ट्री की मंदिरा कश्‍यप का महत्‍वपूर्ण योगदान रहा है।

Wednesday, February 8, 2012

सिनेमा के सौ साल: स्टूडियो,स्टार और कारपोरेट सिस्टम


-अजय ब्रह्मात्‍मज

फिल्म निर्माण टीमवर्क है। माना जाता है कि इस टीम का कप्तान निर्देशक होता है, क्योंकि वह अपनी सोच-समझ से फिल्म के रूप में अपनी दुनिया रचता है। ऊपरी तौर पर यही लक्षित होता है, लेकिन फिल्म व्यवसाय के जानकारों से बात करें तो नियामक शक्ति कुछ और होती है। कभी कोई व्यक्ति तो कभी कोई संस्था, कभी स्टूडियो तो कभी स्टार, कभी कारपोरेट तो कभी डायरेक्टर... समय, परिस्थिति और व्यवसाय से पिछले सौ सालों के भारतीय सिनेमा में हम इस बदलाव को देख सकते हैं।

फालके और उनके व्यक्तिगत प्रयास

दादा साहेब फालके ने पहली भारतीय फिल्म का निर्माण किया। सभी जानते हैं कि इस फिल्म के लिए उन्हें अपनी पत्नी के गहने गिरवी रखने पड़े थे। गहने, घर, संपत्ति गिरवी रख कर धन उगाहने का सिलसिला कमोबेश आज भी चलता रहता है। लेकिन फिल्म इंडस्ट्री को उद्योग का दर्जा मिलने और बीमा कंपनियों के आने से आर्थिक जोखिम कम हुआ है। बहरहाल, फालके के जमाने में फिल्मों को व्यवसाय की दृष्टि से फायदेमंद नहीं माना जाता था। फालके के समय के फिल्म निर्माण को कॉटेज इंडस्ट्री के तौर पर देख सकते हैं। फालके समेत इस दौर के निर्माता व्यक्तिगत संपर्कों और प्रयासों से धन जमा करते थे। फालके ने नासिक में हिंदुस्तान फिल्म कंपनी स्थापित की थी। उनकी इस कंपनी को स्टूडियो का आदिरूप कह सकते हैं। एक ही स्थान पर फिल्म के प्री और पोस्ट प्रोडक्शन का काम होता था। एक्टर और तकनीशियनों की पूरी टीम फालके के साथ थी। इतिहासकार बताते हैं कि फालके अपनी कंपनी को संयुक्त परिवार की तरह चलाते थे, जिसके कर्ता-धर्ता वे खुद थे। फालके ने निर्माण की जरूरतों और स्थायी आधारभूत संरचना तैयार करने की कोशिश नहीं की। उनकी प्रोडक्शन कंपनी या टीम से उनका कोई उत्तराधिकारी उभर कर सामने नहीं आया। आवश्यकता पडऩे पर उन्होंने अपनी फिल्में भी गिरवी रखीं। उन्होंने कपास के व्यापारियों और दलालों से भी पैसे उगाहे। फालके और उनके निवेशकों के बीच आर्थिक लेन-देन की अनियमितता से संबंध कड़वे हुए। इस कड़वाहट और आर्थक तंगी ने फिल्म निर्माताओं को स्टूडियो सिस्टम के लिए प्रेरित किया।

स्टूडियो सिस्टम

प्रथम विश्वयुद्ध के समय ही भारतीय व्यापारियों की समझ में आ गया था कि विश्वस्तरीय आर्थिक तंगी का प्रभाव भारत में भी पड़ेगा। ऐसे दौर में कुछ गुजराती और पारसी व्यवसायी फिल्म निर्माण में उतरे। उन्होंने अपने शौक और शगल में फिल्मों का निर्माण किया और स्टूडियो सिस्टम की नींव डाली। स्टूडियो सिस्टम की शुरुआत की बड़ी वजह यही थी कि निर्माता निर्माण की प्रक्रिया को सुचारू रखना चाहते थे। अनियमित और अनियंत्रित व्यवस्था में उन्हें मूलभूत जरूरतों के लिए भी अपने निवेशकों पर निर्भर करना पड़ता था। इसके अलावा हॉलीवुड की ऊंची क्वालिटी की फिल्में थिएटरों में लगने लगी थीं। हॉलीवुड के मुकाबले की फिल्मों के निर्माण के लिए आवश्यक था कि ऊंची क्वालिटी के उपकरणों का इस्तेमाल हो इसी दौर में फिल्मों में साउंड के उपयोग के लिए तकनीकी व्यवस्था ठीक करनी पड़ी। इंपीरियल स्टूडियो, रणजीत स्टूडियो, वाडिया मूवीटोन जैसे आरंभिक स्टूडियो ने राह दिखाई। बाद में कोलकाता में न्यू थिएटर, पुणे में प्रभात स्टूडियो और मुंबई में बांबे टाकीज तीन प्रमुख और मजबूत स्टूडियो स्थापित हुए। स्टूडियो सिस्टम के दौर में भी इन पर परिवार विशेष का नियंत्रण रहा, लेकिन कर्मचारियों, तकनीशियनों और कलाकारों को नियमित वेतन देने के लिए फिल्म निर्माण और व्यवसाय का नया समीकरण बना। उल्लेखनीय है कि उसी दौर में हालीवुड की यूनिवर्सल पिक्चर कंपनी के दक्षिण एशिया प्रतिनिधि जॉर्ज मूजर ने ब्रिटिश सरकार द्वारा गठित एक कमिटी को बहुमूल्य सुझाव दिए। उन्होंने बताया कि भारत में हालीवुड का कुल बिजनेस केवल 2 प्रतिशत है। उन्होंने स्थानीय इंडस्ट्री के लिए तकनीक, अभिनय और निर्माण के क्षेत्र में कई सुझाव दिए। उन्होंने हालीवुड के तर्ज पर स्टूडियो गठित करने के सुझाव दिए। स्टूडियो सिस्टम ने भारतीय फिल्मों के निर्माण में गति ला दी। नई प्रतिभाओं को मौके मिले और नए विषयों पर फिल्में बनीं।

स्टूडियो सिस्टम से निकले स्टार

स्टूडियो सिस्टम के व्यवस्थित, निर्माण, वितरण और प्रदर्शन ने कुछ कलाकारों को स्टार का दर्जा दिया। दर्शकों के बीच मांग बढऩे से स्टारों ने वेतन बढ़ाने की मांग की। वेतन न बढऩे पर उन्होंने फ्रीलांसिंग की राह चुनी। उन्हें स्वतंत्र निर्माताओं का सहारा मिला। धीरे-धीरे स्टार सिस्टम इतना मजबूत और भरोसेमंद हो गया कि उसने स्टूडियो सिस्टम को तोड़ दिया। कुछ स्टूडियो बने रहे, लेकिन उनकी कार्यप्रणाली बदल गई। खुद राज कपूर ने आजादी के बाद आरके स्टूडियो की स्थापना की। महबूब, फिल्मालय, राजकमल, फिल्मिस्तान, कारदार, कमालिस्तान आदि स्टूडियो बने। उनमें से कुछ आज भी चल रहे हैं और कुछ टूट कर बड़ी रिहाइशी अट्टालिकाओं में तब्दील हो गए हैं। स्टार सिस्टम के आने के बाद फिल्मों में निवेश के लिए अतिरिक्त धन की जरूरत पड़ी। आजादी के बाद कालाबाजारी से अमीर हुए रईसों ने तेजी से लाभ के लिए फिल्मों में काले धन का निवेश किया। बीसवीं सदी के अंतिम दशक में काले धन का यह निवेश ज्यादा भ्रष्ट होकर अंडरवल्र्ड की हिस्सेदारी और भागीदारी के रूप में सामने आया। फिल्म जगत और अंडरवल्र्ड का रिश्ता आठवें दशक में हाजी मस्तान के समय से आरंभ हुआ था, जो बाबरी मस्जिद ढहने के बाद हुए मुंबई के सांप्रदायिक दंगों के बाद समाप्त हुआ। उसके बाद अंडरवल्र्ड सरगना राष्ट्रद्रोही माने गए। फिल्म इंडस्ट्री ने अंडरवल्र्ड से अपने संबंध काटे।

स्टार सिस्टम और कारपोरेट सिस्टम की जुगलबंदी

सन् 2000 में फिल्म जगत को इंडस्ट्री का दर्जा मिलने के बाद लेन-देन में पारदर्शिता आई। बैंकों से ऋण की सुविधा हासिल हुई। कई कारपोरेट कंपनियां फिल्म निर्माण में उतरी और उन्होंने अपने अधिकारियों के रूप में एमबीए डिग्रीधारियों को चुना। कहते हैं फिल्म निर्माण पैशन से होता है, पैसों से नहीं। कारपोरेट जगत के पास पर्याप्त पैसे थे, लेकिन पैशन का अभाव था। फिल्म निर्माण के बारीकियों को ठीक से न समझ पाने के कारण कारपोरेट ने स्टारों को मुंहमांगी कीमत दी। फिल्मों की लागत बढ़ा दी। स्टारों का पारिश्रमिक 1 करोड़ से बढक़र 20 करोड़ तक आ गया। उसका नतीजा तुरंत निकला। कई कंपनियां घाटे में चली गई और कुछ बंद हो गई। बंद होने वाली कंपनियों में अमिताभ बच्चन की एबीसीएल भी थी। हालांकि उनकी कंपनी बहुत पहले 1995 में गठित होकर कुछ सालों में ही बंद भी हो गई। फिलहाल कारपोरेट और स्टार की जुगलबंदी से एक नया सिस्टम सक्रिय है जिसमें फिल्म और स्टार वैल्यू के अनुसार रोल बदलते रहते हैं।

आमिर खान ने दिखाई नई राह

लगानके साथ प्रोडक्शन में उतरे आमिर खान ने फिल्म निर्माण की प्रक्रिया को पूरी तरह से प्रभावित किया। एक शेड्यूल में शूटिंग करना, बाइंड स्क्रिप्ट रखना, सिंक साउंड और कॉल शीट पर अमल... साथ ही आमिर खान ने एक बार में एक ही फिल्म करने की प्रथा आरंभ की। इसके अच्छे नतीजे देख कर दूसरे स्टार भी इस लीक पर चले। आमिर खान अभी फिल्मों में अभिनय का कोई पारिश्रमिक नहीं लेते। उन्हें लाभ का 33 प्रतिशत चाहिए होता है। इससे वे लगातार फायदे में रहे और उनके निर्माताओं पर कोई आर्थिक बोझ भी नहीं पड़ा।

Friday, February 3, 2012

इस अवार्ड वेला में


-अजय ब्रह्मात्‍मज

हिंदी फिल्मों के पॉपुलर अवार्ड का सिलसिला चालू है। देश-विदेश में इनके आयोजन हो रहे हैं। स्क्रीन और जी सिने अवार्ड के विजेता मुस्करा रहे हैं। इस स्तंभ के छपने तक फिल्मफेअर अवार्ड समारोह का आयोजन हो चुका रहेगा। पॉपुलर अवार्ड में फिल्मफेअर सबसे पुराना है। इसकी पहले जैसी साख तो अब नहीं, लेकिन पुराना होने का लाभ इसे मिलता है। जून में आईफा अवार्ड के आयोजन तक छोटे-बड़े दर्जन भर अवार्ड समारोह हो चुके होंगे। इनमें बेशर्मी से पुरस्कार बांटे जाएंगे। बांटना शब्द इन पुरस्कारों की सटीक क्रिया है। अन्यथा आप इन अवार्ड समारोहों के विजेताओं के नाम से कैसे सहमत होंगे?

सैटेलाइट चैनलों के आने के बाद सारे पुरस्कार समारोहों ने इवेंट का रूप ले लिया है। आयोजकों की कोशिश रहती है कि सारे लोकप्रिय सितारे कुछ घंटों के लिए ही सही, लेकिन उस शाम समारोह की शोभा बढ़ा दें। इससे इवेंट की दर्शकता बढ़ती है। भले ही शाहरुख खान कोई नीच मजाक कर रहे हों या हरकत.., फिल्म के संवादों से लेकर इवेंट के संभाषणों तक में श्लील-अश्लील का फर्क समाप्त हो गया है। फिल्मों में किरदार अश्लील संवाद या अपशब्द बोलते हैं तो वह परिवेश के अनुकूल होता है, लेकिन जब स्टार अवार्ड समारोहों के मंच से कुछ अनर्गल भी बोलते हैं तो वह प्रभाव के लिए होता है। पूरी कोशिश रहती है कि चालू फिल्मों की तरह इवेंट को भी एंटरटेनमेंट बना दो। पिछले दिनों एक पापुलर फिल्म की नायिका सिल्क बता ही गई है कि दर्शकों को चाहिए एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और एंटरटेनमेंट..

साल खत्म होते-होते हर संस्थान में अवार्ड समारोहों की कवायद शुरू हो जाती है। अभी तक हिंदी में सौ से अधिक फिल्में बन रही हैं। इनमें से 8-10 फिल्में ही विभिन्न कैटगरी में नामांकित होती हैं और पुरस्कारों की घोषणा तक यह संख्या घटकर 3-4 रह जाती है। इस साल के विभिन्न पुरस्कारों पर गौर करें तो सभी द डर्टी पिक्चर, रॉक स्टार और जिंदगी ना मिलेगी दोबारा में ही बंट रहे हैं। शाहरुख खान और सलमान खान को खुश करने के लिए उन्हें किसी न किसी कैटगरी में कोई पुरस्कार दे दिया जाता है। अगर किसी कैटगरी में उनकी फिल्में नहीं आ पातीं तो फटाफट एक नई कैटगरी आरंभ हो जाती है। कई बार तो यह भी सुनने में आता है कि कोई पॉपुलर स्टार अवार्ड समारोह में बगैर सूचना के आ जाए, तो उसे भी खाली हाथ नहीं जाने दिया जाता।

इन अवार्ड समारोहों में रमेश सिप्पी और किरण जुनेजा सरीखे कुछ व्यक्ति जरूर मौजूद रहते हैं। 36 साल पहले रमेश सिप्पी ने शोले बनाई थी, लेकिन उसकी दहक से उनका चेहरा आज भी दमकता रहता है। 5-10 साल पहले वी. शांताराम के बेटे किरण शांताराम सभी समारोहों में दिखाई देते थे। उनके बारे में मशहूर है कि उन्हें पिता की जायदाद के साथ टोपी भी विरासत में मिली थी। उसी टोपी के सहारे वे समारोहों की शान बनते रहे। उनमें फिल्म बनाने की प्रतिभा नहीं थी। सभी अवार्ड समारोहों की लिस्ट बनाई जाए तो कुछ नाम कॉमन मिल जाएंगे। इसके अलावा हर समारोह में मौजूद होने से पॉपुलर स्टारों की चमक धूमिल होती है। इस साल शाहरुख खान, प्रियंका चोपड़ा, कट्रीना कैफ और विद्या बालन हर शो में उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। विद्या बालन तो पॉपुलर कल्चर में गरीब की वह जोरू है, जिसे सभी भौजाई कह कर बुला रहे हैं। मालूम नहीं, विद्या अपने इस दुरुपयोग को समझ पा रही हैं या नहीं? ग्लोबल पॉपुलर कल्चर के अध्येता बता सकते हैं कि किसी और देश में ऐसा चलन है कि नहीं? हमें अमेरिका से जानकारी लेनी चाहिए कि हॉलीवुड में कितने अवार्ड समारोहों का आयोजन होता है। भारत में पॉपुलर स्टार के साल में दस-पंद्रह दिन तो अवार्ड समारोहों में निकल जाते ही जाते होंगे। कम दर्शकों को मालूम होगा कि प्रेजेंस और परफॉर्मेस के लिए ये स्टार पैसे लेते हैं। खास कर अगर किसी कैटगरी में उन्हें पुरस्कार नहीं मिल रहा हो तो फीस बढ़ जाती है। अक्षय कुमार पिछले साल तक सभी समारोहों में परफॉर्म कर करोड़ों कमा लेते थे।

पुरस्कारों की इस भीड़ में यही आग्रह किया जा सकता है कि प्लीज अपने पुरस्कारों को गरिमा प्रदान करें। उन्हें इवेंट का हिस्सा बनाते समय भी ध्यान रखें कि दर्शक पुरस्कार की वजह और जरूरत समझ सकें