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Sunday, July 1, 2012

खुद ही तोड़ दी अपनी इमेज-इमरान हशमी

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
इमरान हाशमी पर महेश भट्ट की टिप्पणी

    (आजादी के बाद पूरे देश में औपनिवेशिक मानसिकता के कुछ ब्राउन समाज के हर क्षेत्र में एक्टिव हैं। वे हर क्षेत्र में मानक तय करते हैं। उनमें से कुछ हिंदी फिल्मों में भी हैं। वे बताते हैं कि किस तरह का हीरो होना चाहिए या अच्छा होता है? ऐसे ब्राउन साहब को इमरान हाशमी अच्छा नहीं गलता था। वे हमेशा उसकी निंदा करते थे। वह अपनी तरह की फिल्मों से खुश था। दर्शकों के एक तबके में पहले से लोकप्रिय था।
    पहली ही फिल्म में डायरेक्टर के साथ काम करते देखते समय मुझे उनमें कुछ खास बात लगी। मैंने उसे सलाह दी कि तुम्हें कैमरे के सामने होना चाहिए। वह बहुत नर्वस था। बाद में उसने ‘मर्डर’, ‘गैंगस्टर’ और ‘जन्नत’ जैसी फिल्में कीं। गिरते-पड़ते उसने सीखा और अपनी एक जगह बनायी। अपनी जगह बनाने के बाद उसने हिम्मत दिखायी और ऑफबीट फिल्मों के लिए राह बदली। तब मैंने उसे रोका था। हिंदी फिल्मों में अधिकांश हीरो अपना चेहरा नहीं बदलना चाहते। अपनी शक्ल बिगाडऩा आसान फैसला नहीं होता। इमरान हाशमी ने पहले ‘वंस अपऑन अ टाइम इन मुंबई’ और फिर ‘शांघाई’ में यह किया। उसने उनकी बोली बोलने की कोशिश की। दोनों ही फिल्मों में दर्शकों और समीक्षकों ने उसे पसंद किया।
    हिंदी फिल्मों में हर हीरो अपनी मुट्ठी बंद रखना चाहता है। उसे लगता है कि मुट्ठी खोलते ही औकात पता चल जाएगी। इमरान हाशमी ने मुट्ठी खोल दी है। ‘शांघाई’ के बाद उसकी ‘राज 3’ आएगी। इमरान हाशमी समझदार लडक़ा है। सोच गहरी है। ऑफबीट फिल्मकारों के साथ वह खुद को रिस्की सिचुएशन में डालता है। उसकी यह कोशिश वास्तव में अपने अधूरेपन को खत्म करने की है।
    एक तरह से देखें तो उसने मेरी तरह ही एक ध्रुव से दूसरे धु्रव तक की यात्रा की है। हमारी यात्रा से विपरीत दिशाओं में दिख सकती है। मैंने ‘सारांश’ से आरंभ किया और ‘मर्डर’ तक आया। उसने ‘मर्डर’ से शुरू किया और ‘शांघाई’ तक आया। मैं तो उसे इस यात्रा के लिए बधाई दूंगा। )

इमरान हाशमी से हुई बातचीत
- किस मानसिक अवस्था में हैं अभी आप। बिल्कुल अलग भूमिका के बावजूद दर्शकों और समीक्षकों ने आप को ‘शांघाई’ में पसंद किया?
0 बहुत खुश हूं कि सभी ने ‘शांघाई’ को इस तरह स्वीकार किया है। मेरे लिए यह करिअर का टर्निंग पाइंट है। एक्टिंग करिअर में जो तारीफ मुझे आज तक नहीं मिली, वह ‘शांघाई’ ने दे दी। बिल्कुल अलग किरदार था। फिल्में जो में कर चुका हूं और इस फिल्म में जो स्पेस मिला है, वह बहुत रिस्की था। समीक्षक हमेशा कहा करते थे कि मुझे एक्टिंग नहीं आती है। सभी को सरप्राइज पैकेज लगा। ट्रू टू कैरेक्टर लगा। पिछली फिल्मों में जिस इमरान हाशमी को सभी देखते रहे थे, वह इसमें नहीं है। एक्टिंग और कुछ नहीं कैरेक्टर को जीना है। इतने सालों में मुझे ऐसा डायरेक्टर नहीं मिला जो समझदार हो और मेरे साथ प्रयोग कर सके। जोगी परमार कैरीकेचर नहीं है।  दिबाकर ने चैचुरल परफारमेंस निकाला।
- स्क्रिप्ट सुनते समय इल्म हुआ था कि यह किरदार इतना पसंद किया जाएगा?
0 मुझे किरदार पसंद था। यह सोच कर फिल्म नहीं साइन की थी कि इस से मेरा करिअर बदल जाएगा। मुझे दिबाकर बनर्जी के साथ काम करना था। लॉजिकल  इंटेलिजेंट और दर्शकों को सरप्राइज करने वाली फिल्म करनी थी। मेरी कोशिश रहेगी कि जब भी ऐसी फिल्म करूं तो दर्शक सरप्राइज हों। मेरी जो छवि बनी हुई है, उसे ‘वंस अपऑन अ टाइम इन मुंबई’ और ‘शांघाई’ जैसी फिल्में तोड़ती हैं। ‘शांघाईर्’ करते समय कुछ लोगों ने मुझ से पूछा भी कि अभय देओल, दिबाकर बनर्जी और तुम यह कौन सा काम्बिनेशन है।?मुझे लोगों का यह सवाल अच्छा लगा।
- दिबाकर ने इस रोल के बारे में क्या समझाया था?
0 उन्होंने बताया था कि मैं अभी तक जो करता रहा हूं उससे यह कम्पिलीट डिपार्चर है। आप अभी तक जिस रूप में जाने जाते हैं,मैं उसे पूरी तरह तोड़ दूंगा। अभी तक आपने ज्यादातर शहरी किरदार निभाए हैं। यह कस्बाई किरदार है। अपनी फिल्मों में आप बहुत दृढ़ और पक्के इरादे के लगते हैं। जोगी परमार असुरक्षित डरा हुआ किरदार है। शूटिंग के बाद उन्होंने कहा कि आप के एटीट्यूड ने मुझे चौंका दिया। मैं तो सोच रहा था कि आप के रिजर्वेशन होंगे। उनके अनुसार मुझे रोल में फेरबदल करनी पड़ेगी। शुरू में तो केवल वजन बढ़ाने और दांत पीला करने की बात कही थी। शूटिंग के समय किरदार के मिजाज के बारे में उन्होंने बताया और समझाया। उन्हें तो यह भी लगा था कि मैं थिएटर वर्कशॉप नहीं करूंगा। जबकि मैं थिएटर वर्कशॉप के कंसेप्ट से बहुत उत्साहित था। हमारा वर्कशॉप अतुल मोंगे ने लिया था। इस फिल्म में जो भीड़ दिखाई पड़ी उसकी भी कास्टिंग हुई थी। मैंने दस दिन वर्कशॉप अटेंड किया था। पहले तीन तो मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। चौथे दिन से तो मैं एकदम सक्रिय हो गया।
- जोगी परमार का किरदार निभाने में किस तरह की चुनौती थी?
0 ज्यादातर एक्टर आत्ममुग्ध होते हैं। मैं उनसे अलग नहीं हूं। हम अपने बालों, लुक, कपड़े और मेकअप पर बहुत ध्यान देते हैं। जोगी परमार को देखकर घिन आती है। वह आकर्षक भी नहीं है। भद्दा और तोंदियल है। उसके दांत गंदे हैं। कोई सोच भी नहीं सकता कि ऐसा किरदार फिल्म का हीरो हो सकता है। जाहिर सी बात है जब वह हीरो नहीं हो सकता तो कोई भी स्टार उसे क्यों निभाएगा? यह तो दिबाकर की सोच और मेरी कोशिश का नतीजा है। वह फिल्म के आखिरी दृश्य में  हीरो बन जाता है। वह अपनी अतीत की कमजोरियों से निकल आता है।
- इन दिनों हर प्रोडक्शन हाउस में आपकी मांग की जा रही है। आपकी पूछ हो रही है।
0 (हंसते हुए) अभी तो बालाजी की एक फिल्म कर रहा हूं। विशाल भारद्वाज की ‘डायन’ भी करनी है। राजकुमार गुप्ता की ‘घनचक्कर’ भी कुछ दिनों के बाद शुरू होगी। इन सभी फिल्मों के बाद करन जौहर के साथ एक फिल्म कर रहा हूं। सच कहूं तो मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। हर तरफ से मेरे पास आफर आ रहे हैं। मैं अपना दायरा बढ़ा रहा हूं। बाक्स आफिस पर कुछ फिल्में सफल हो तो नंबर गेम की लिस्ट में आपका नाम ऊपर आ जाता है। लोग यह मानते थे कि मुझे दर्शक पसंद करते हैं लेकिन जब से तारीफ मिली है तब से सभी का ध्यान मेरे ऊपर गया है। इधर मेरी कुछ ऐसी फिल्में चली जो मेनस्ट्रीम की नहीं थी।
- मुझे याद है शुरू में आप बहुत नर्वस और असहज रहते थे। कब खुद में आपका विश्वास बढ़ा और आपकी समझ में आया कि एक्टिंग का चुनाव गलत नहीं था।
0 यह आहिस्ता-आहिस्ता ही हुआ। ‘फुटपाथ’ की सात दिनों की शूटिंग के बाद भट्ट साहब, मुकेश भट्ट और विक्रम भट्ट ने फिल्म के रसेज देखे। उसके पहले बड़े पर्दे पर मैंने खुद को नहीं देखा था। थोड़ा अनिश्चित था। लेकिन अपना काम देखने के बाद ऐसा लगा कि मैं कुछ कर सकता हूं। भट्ट साहब ने मेरी पीठ थपथपायी तो हौसला बढ़ गया। इसके बाद ‘मर्डर’ हिट हुई तो विश्वास मजबूत हो गया । भट्ट साहब ने हमेशा मुझे प्रोत्साहित किया। मैं तो कहूंगा कि उनके गाइडेंस में ही मैं यहां तक पहुंचा हूं।




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