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Tuesday, July 31, 2012

सत्‍यमेव जयते-13 : अकेले व्‍यक्ति की शक्ति-आमिर खान

मैं अकेला क्या कर सकता हूं? एक अरब बीस करोड़ की आबादी में मैं तो बस एक हूं। अगर मैं बदल भी जाता हूं, तो इससे क्या फर्क पड़ेगा? बाकी का क्या होगा? सबको कौन बदलेगा? पहले सबको बदलो, फिर मैं भी बदल जाऊंगा। ये विचार सबसे नकारात्मक विचारों में से हैं। इन सवालों का सबसे सटीक जवाब दशरथ मांझी की कहानी में छिपा है। यह हमें बताती है कि एक अकेला आदमी क्या हासिल कर सकता है? यह हमें एक व्यक्ति की शक्ति से परिचित कराती है। यह हमें बताती है कि आदमी पहाड़ों को हटा सकता है।




बिहार में एक छोटा सा गांव गहलोर पहाड़ों से घिरा है। नजदीकी शहर पहुंचने के लिए गांव वालों को पचास किलोमीटर घूम कर जाना पड़ता था, जबकि उसकी वास्तविक दूरी महज पांच किलोमीटर ही थी। दरअसल, शहर और गांव के बीच में एक पहाड़ पड़ता था, जिसका चक्कर लगाकर ही गांव वाले वहां पहुंच पाते थे। इस पहाड़ ने गहलोर के वासियों का जीवन नरक बना दिया था। एक दिन गांव में दशरथ मांझी नाम के व्यक्ति ने फैसला किया कि वह पर्वत को काटकर उसके बीच से रास्ता निकालेगा। अपनी बकरियां बेचकर उन्होंने एक हथौड़ा और कुदाल खरीदी और अपने अभियान में जुट गये। गांव वाले उन पर हंसने लगे। उनकी खिल्ली उड़ायी और यह कहकर उन्हें रोकने की कोशिश की कि यह संभव ही नहीं है। किंतु दशरथ ने उनकी बात नहीं मानी और काम में जुटे रहे। आखिरकार 22 वर्षो के अथक प्रयास के बाद वह सड़क बनाने में कामयाब हो ही गये।



एक क्षण के लिए जरा कल्पना तो करें कि अपने प्रयास के पहले दिन उन पर क्या बीती होगी। विशाल पर्वत के सामने हथौड़ा और कुदाल लिए एक अदना सा आदमी। पहले दिन कितने घन इंच-पत्थर वह काट पाये होंगे? उस शाम को घर जाते समय उनके दिमाग में क्या घूम रहा होगा? एक सप्ताह के काम के बाद उन्हें क्या लगा होगा? तब उनकी क्या मानसिकता रही होगी? इसमें संदेह नहीं, पहले सप्ताह के अंत में उन्हें यह काम और भी मुश्किल लगा होगा। जब लोगों ने उनकी खिल्ली उड़ायी होगी, उनको हतोत्साहित किया होगा, तो उन पर क्या गुजरी होगी? किस चीज ने उन्हें 22 सालों तक काम में जुटे रहने को प्रेरित किया होगा?



हमें और आपको यह तय करना है कि हम दशरथ मांझी की तरह बनना चाहते हैं या फिर उन गांव वालों की तरह, जिन्होंने उन्हें हतोत्साहित किया, उनका मखौल उड़ाया। हमारे सामने चुनाव स्पष्ट है। दशरथ मांझी जो करने का प्रयास कर रहे थे, वह सबके हित में था। इसके बावजूद उन्हीं के गांव वालों ने उनका मजाक उड़ाया। तो हमें उन गांव वालों की तरह होना चाहिए या फिर दशरथ मांझी की तरह जीना चाहिए, जिन्होंने अकेले अपने दम पर एक असंभव से दिखने वाले काम को अंजाम तक पहुंचा कर ही दम लिया। हममें से हरेक को अपने आप से यह सवाल पूछना चाहिए और हमारे जवाब में ही हमारे भविष्य की सच्‍चाई छिपी है। हमारे जवाब में ही इन सवालों का जवाब छुपा है – क्या मैं राष्ट्र निर्माण में योगदान देना चाहता हूं? मैं आशावादी बनना चाहता हूं या फिर महज आलोचक? मैं अपने सपने पूरे करने के लिए बिना किसी समझौते के अथक प्रयास करना चाहता हूं या फिर हताश-निराश होना चाहता हूं, जो सकारात्मक काम करने वालों को हतोत्साहित करे?



भारत में मेरा विश्वास है। भारत के लोगों में मेरा विश्वास है। मेरा विश्वास है कि प्रत्येक भारतवासी अपने देश को प्यार करता है। मेरा विश्वास है कि भारत बदल रहा है। मुङो विश्वास है कि भारत बदलना चाहता है। मैं उस सपने में यकीन रखता हूं जो हमारे पूर्वजों ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देखा था। एक स्वप्न जिसका जिक्र भारत के संविधान की प्रस्तावना में है – हम भारत के नागरिक ये तय करते हैं… ये वादा करते हैं कि हम हिंदुस्तान को एक स्वतंत्र, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाएंगे, राष्ट्र बनाएंगे। हम हिंदुस्तान के सारे नागरिकों को चार चीजें दिलवाएंगे…



न्याय… सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक।

आजादी… सोच की, बोलने की और अपने-अपने धर्म का पालन करने की।

समानता… यानी सब बराबर हैं, कोई ऊंचा-नीचा नहीं है। और सब नागरिकों को बराबरी मिलेगी अवसर की, मौके की।

और चौथा भाईचारा… हम एकदूसरे में भाईचारा बढ़ाएंगे, हर एक इंसान को इज्‍जत से जीने का हक होगा और अपने देश में हम एकता और अखंडता बढ़ाएंगे, कायम रखेंगे।…

दोस्तो यह था हमारे पूर्वजों के भारत का सपना। यह कहने वाले बहुत से व्यक्ति मिल जाएंगे कि यह सपना टूट गया। पर मैं इससे सहमत नहीं हूं। यह सच है कि सपना पूरा नहीं हो सका है, किंतु इसके साथ यह भी पूरी तरह सच है कि यह अभी टूटा भी नहीं है। आज भी हजारों भारतीय इस सपने को जीते हैं। बहुत से लोगों ने इस सपने को साकार करने में अपना जीवन लगा दिया है। इनमें से बहुत से लोगों को यह भान भी नहीं है कि अपने जीवन में वे भारतीय संविधान में वर्णित सपने को जी रहे हैं, जिसे हमारे पूर्वजों ने देखा था।



मेरा मानना है कि हममें से बहुत से लोग कहीं न कहीं कुछ-कुछ चतुर, व्यावहारिक, हताश, भौतिकवादी और स्वार्थी हो गये हैं। हो सकता है हमें आगे बढ़ने के लिए थोड़े से सहारे की जरूरत हो। हमारे दिल में उम्मीद, आदर्शवाद, भरोसे, आस्था, विश्वास और जुनून के लिए थोड़ी सी जगह होनी चाहिए। अगर एक दशरथ मांझी पहाड़ को हरा सकते हैं, तो कल्पना करो कि 120 करोड़ दशरथ मांझी क्या कर सकते हैं।



सत्यमेव जयते की मेरी यात्रा समाप्त हो रही है, किंतु मेरा विश्वास है कि यह अंत नहीं, बल्कि असल में एक शुरुआत है। और शुरुआत के इस आशा भरे क्षण में, मैं गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर द्वारा सबसे पहले अभिव्यक्त एक प्रार्थना के आगे अपना सिर झुकाना चाहता हूं…



जहां उड़ता फिरे मन बेखौफ

और सर हो शान से उठा हुआ

जहां इल्म हो सबके लिए बेरोक

बिना शर्त रखा हुआ

जहां घर की चौखट से छोटी सरहदों में न बंटा हो जहान

जहां सच से सराबोर हो हर बयान

जहां बाजुएं बिना थके लगी रहें कुछ मुक्कमल तलाशें

जहां सही सोच को धुंधला न पाएं उदास मुर्दा रवायतें

जहां दिलो-दिमाग तलाशे नया खयाल और उन्हें अंजाम दे

ऐसी आजादी की जन्नत में आये खुदा

मेरे वतन की हो नयी सुबह।…

जय हिंद, सत्यमेव जयते!



1 comment:

Satish Chandra Satyarthi said...

अच्छे प्रयासों को प्रोत्साहन तो मिलना ही चाहिए... उनकी नीयत में मीन-मेख निकालने के बजाये कही जा रही बात की प्रासंगिकता को देखा जाना चाहिए... दशरथ मांझी जी की कहानी एक प्रेरणा स्रोत है..