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Friday, February 3, 2012

इस अवार्ड वेला में


-अजय ब्रह्मात्‍मज

हिंदी फिल्मों के पॉपुलर अवार्ड का सिलसिला चालू है। देश-विदेश में इनके आयोजन हो रहे हैं। स्क्रीन और जी सिने अवार्ड के विजेता मुस्करा रहे हैं। इस स्तंभ के छपने तक फिल्मफेअर अवार्ड समारोह का आयोजन हो चुका रहेगा। पॉपुलर अवार्ड में फिल्मफेअर सबसे पुराना है। इसकी पहले जैसी साख तो अब नहीं, लेकिन पुराना होने का लाभ इसे मिलता है। जून में आईफा अवार्ड के आयोजन तक छोटे-बड़े दर्जन भर अवार्ड समारोह हो चुके होंगे। इनमें बेशर्मी से पुरस्कार बांटे जाएंगे। बांटना शब्द इन पुरस्कारों की सटीक क्रिया है। अन्यथा आप इन अवार्ड समारोहों के विजेताओं के नाम से कैसे सहमत होंगे?

सैटेलाइट चैनलों के आने के बाद सारे पुरस्कार समारोहों ने इवेंट का रूप ले लिया है। आयोजकों की कोशिश रहती है कि सारे लोकप्रिय सितारे कुछ घंटों के लिए ही सही, लेकिन उस शाम समारोह की शोभा बढ़ा दें। इससे इवेंट की दर्शकता बढ़ती है। भले ही शाहरुख खान कोई नीच मजाक कर रहे हों या हरकत.., फिल्म के संवादों से लेकर इवेंट के संभाषणों तक में श्लील-अश्लील का फर्क समाप्त हो गया है। फिल्मों में किरदार अश्लील संवाद या अपशब्द बोलते हैं तो वह परिवेश के अनुकूल होता है, लेकिन जब स्टार अवार्ड समारोहों के मंच से कुछ अनर्गल भी बोलते हैं तो वह प्रभाव के लिए होता है। पूरी कोशिश रहती है कि चालू फिल्मों की तरह इवेंट को भी एंटरटेनमेंट बना दो। पिछले दिनों एक पापुलर फिल्म की नायिका सिल्क बता ही गई है कि दर्शकों को चाहिए एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और एंटरटेनमेंट..

साल खत्म होते-होते हर संस्थान में अवार्ड समारोहों की कवायद शुरू हो जाती है। अभी तक हिंदी में सौ से अधिक फिल्में बन रही हैं। इनमें से 8-10 फिल्में ही विभिन्न कैटगरी में नामांकित होती हैं और पुरस्कारों की घोषणा तक यह संख्या घटकर 3-4 रह जाती है। इस साल के विभिन्न पुरस्कारों पर गौर करें तो सभी द डर्टी पिक्चर, रॉक स्टार और जिंदगी ना मिलेगी दोबारा में ही बंट रहे हैं। शाहरुख खान और सलमान खान को खुश करने के लिए उन्हें किसी न किसी कैटगरी में कोई पुरस्कार दे दिया जाता है। अगर किसी कैटगरी में उनकी फिल्में नहीं आ पातीं तो फटाफट एक नई कैटगरी आरंभ हो जाती है। कई बार तो यह भी सुनने में आता है कि कोई पॉपुलर स्टार अवार्ड समारोह में बगैर सूचना के आ जाए, तो उसे भी खाली हाथ नहीं जाने दिया जाता।

इन अवार्ड समारोहों में रमेश सिप्पी और किरण जुनेजा सरीखे कुछ व्यक्ति जरूर मौजूद रहते हैं। 36 साल पहले रमेश सिप्पी ने शोले बनाई थी, लेकिन उसकी दहक से उनका चेहरा आज भी दमकता रहता है। 5-10 साल पहले वी. शांताराम के बेटे किरण शांताराम सभी समारोहों में दिखाई देते थे। उनके बारे में मशहूर है कि उन्हें पिता की जायदाद के साथ टोपी भी विरासत में मिली थी। उसी टोपी के सहारे वे समारोहों की शान बनते रहे। उनमें फिल्म बनाने की प्रतिभा नहीं थी। सभी अवार्ड समारोहों की लिस्ट बनाई जाए तो कुछ नाम कॉमन मिल जाएंगे। इसके अलावा हर समारोह में मौजूद होने से पॉपुलर स्टारों की चमक धूमिल होती है। इस साल शाहरुख खान, प्रियंका चोपड़ा, कट्रीना कैफ और विद्या बालन हर शो में उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। विद्या बालन तो पॉपुलर कल्चर में गरीब की वह जोरू है, जिसे सभी भौजाई कह कर बुला रहे हैं। मालूम नहीं, विद्या अपने इस दुरुपयोग को समझ पा रही हैं या नहीं? ग्लोबल पॉपुलर कल्चर के अध्येता बता सकते हैं कि किसी और देश में ऐसा चलन है कि नहीं? हमें अमेरिका से जानकारी लेनी चाहिए कि हॉलीवुड में कितने अवार्ड समारोहों का आयोजन होता है। भारत में पॉपुलर स्टार के साल में दस-पंद्रह दिन तो अवार्ड समारोहों में निकल जाते ही जाते होंगे। कम दर्शकों को मालूम होगा कि प्रेजेंस और परफॉर्मेस के लिए ये स्टार पैसे लेते हैं। खास कर अगर किसी कैटगरी में उन्हें पुरस्कार नहीं मिल रहा हो तो फीस बढ़ जाती है। अक्षय कुमार पिछले साल तक सभी समारोहों में परफॉर्म कर करोड़ों कमा लेते थे।

पुरस्कारों की इस भीड़ में यही आग्रह किया जा सकता है कि प्लीज अपने पुरस्कारों को गरिमा प्रदान करें। उन्हें इवेंट का हिस्सा बनाते समय भी ध्यान रखें कि दर्शक पुरस्कार की वजह और जरूरत समझ सकें

2 comments:

राजेश उत्‍साही said...

बात तो आपकी सही है। कलर स्‍क्रीन अवार्ड के मंच से माधुरी दीक्षित के साथ शाहरुख खान जिस तरह बतिया रहे थे,वह सुनकर तो रोना आ रहा था। पर सही बात है पैसे तो माधुरी दीक्षित को भी मिले होंगे।

Ojaswi Kaushal said...

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