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Monday, December 26, 2011

शहर-शहर डोलते स्टार

शहर-शहर डोलते स्टार-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले सप्ताह शाहरुख खान पटना नहीं जा सके। उनके न जा पाने की सही वजह के संबंध में कंफ्यूजन है। शाहरुख ने ट्विट किया था कि जिला अधिकारियों ने सुरक्षा कारणों से उन्हें आने से रोका, लेकिन पटना प्रशासन कह रहा है कि हम तो सुरक्षा में चाक-चौबंद थे। अगर हम अमिताभ बच्चन को सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं तो शाहरुख को भी पटना से सुरक्षित भेज सकते हैं। आखिकार शाहरूख खान पटना गए।बहरहाल, शाहरुख ने उम्मीद जताई है कि वे जल्दी ही पटना जाएंगे। पटना के प्रति अचानक शाहरुख की हमदर्दी समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे चलना होगा।

पटना और दूसरे कथित छोटे शहर अब फिल्मों के प्रचार रोडमैप में आ गए हैं। इसकी शुरुआत बहुत पहले महेश भट्ट ने की थी। महेश भट्ट अपनी फिल्मों की टीम के साथ छोटे-छोटे शहरों में घूमते रहे हैं। उन्होंने तमन्ना की टीम के साथ पटना की यात्रा की थी। उसके बाद दैनिक जागरण की पहल पर मनोज बाजपेयी प्रचार के लिए अपनी फिल्म शूल लेकर कानपुर गए थे। छोटे शहरों को हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से जोड़ने की कल्पना और योजना में इन पंक्तियों के लेखक की भी भूमिका रही है। शुरुआती सालों में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अनेक कलाकार अपनी फिल्मों के साथ लखनऊ और कानपुर जाते रहे हैं, जिनमें रितिक रोशन, अभिषेक बच्चन, विवेक ओबेराय, ऐश्वर्या राय बच्चन, माधुरी दीक्षित, अनिल कपूर, सूरज बड़जात्या, बोनी कपूर आदि नाम अभी याद आ रहे हैं। वहीं से मीडिया टाइअप और मीडिया पार्टनरशिप का कॉन्सेप्ट भी उभरा। यह कॉन्सेप्ट अब मीडिया की बड़ी प्रापर्टी बन चुका है।

दरअसल.. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री हमेशा से समीप दृष्टि की शिकार रही है। पहले फिल्मों की रिलीज के समय निर्माताओं की कोशिश रहती थी कि स्टारों के घर के आसपास और जुहू बीच पर अवश्य होर्डिग लग जाए। इससे स्टार के अहं की तुष्टि होती थी। आज भी कमोबेश यही हालत है, मुंबई में लगी होर्डिग और प्रिंट प्रचार का तुरंत असर फोन के रूप में दिखता है। स्टार के परिचित चापलूसी और बाजे दफा सच्ची खुशी में स्टार को बधाई देते हैं तो रिलीज के पहले फिल्म से स्टार का मनोबल बढ़ता है। फिल्म से जुड़े तकनीशियन और बाकी कलाकार भी ऐसे प्रचार से संतुष्ट होते हैं। जाहिर सी बात है कि उनकी नजरों से दूर हो रहा प्रचार उन्हें दिखता नहीं है तो उन्हें उसके प्रभाव का एहसास भी नहीं होता। उनके लिए मुंबई में बोरीवली के आगे दुनिया खत्म हो जाती है।

इधर फिल्मों के कंटेंट के साथ बिजनेस में भी उत्तर भारत का दबदबा बढ़ा है। पिछले कुछ सालों में 100 करोड़ के क्लब में पहुंची फिल्मों के कारोबार के आंकड़े उठाकर देखें तो पता चलेगा कि उन सभी फिल्मों का पचास-साठ प्रतिशत बिजनेस कथित छोटे शहरों और सिंगल स्क्रीन थिएटरों से आया है। फिल्मों के बिजनेस में इन शहरों के दर्शकों की भूमिका बढ़ती जा रही है। यकीन करें यदि उत्तर भारत से बिजनेस का यही प्रवाह बना रहा तो हिंदी फिल्मों के विषय, स्टार और अन्य सौंदर्यानुभूतियों के लिए उत्तर भारत के दर्शकों की रुचि का खयाल बढ़ जाएगा। यह होना ही है। इसकी शुरुआत हो चुकी है। उत्तर भारत के इसी बढ़ते असर को देखते हुए सलमान खान कानपुर, अमिताभ बच्चन पटना और शाहरुख खान नागपुर जा रहे हैं। उन्हें इन इलाकों में बाजार दिख रहा है। इन इलाकों के दर्शकों को चाहिए कि वे अपनी जेबों में मुज्ञि्‍यां भींच लें और सोच-समझकर ही फिल्मों पर पैसे खर्च करें। जिन फिल्मों में उनकी इच्छाएं पूरी हों, उन फिल्मों की सफलता से यह ट्रेंड बढ़ेगा।

बाजार की इसी खोज का एक पहलू टॉम क्रूज का भारत आना है। क्यों अचानक भारत के प्रति उनका प्रेम उमड़ आया? दरअसल, हॉलीवुड की फिल्मों के बिजनेस के फैलाव के लिए भारत और चीन बड़े बाजार के रूप में उभरे हैं। चीन ने अपने देश में हर साल केवल 20 विदेशी फिल्मों के आयात की अनुमति दे रखी है। भारत में अभी ऐसी कोई पाबंदी नहीं है। पिछले एक दशक से हॉलीवुड की फिल्में भारतीय बाजार पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए प्रयासरत हैं। ये फिल्में हिंदी के साथ-साथ तमिल, तेलुगू, बांग्ला और भोजपुरी तक में डब हो रही हैं। कोशिश है कि हर भाषा के दर्शक को उसकी भाषा में मनोरंजन मिले ताकि वह मुज्ञ्‍ी खोल कर पैसे खर्च करें।

अब यह दर्शकों को फैसला करना है कि वे प्रचार के बहकावे में आकर अपने पैसे की फिजूलखर्ची करते हैं या स्टार, निर्माता-निर्देशकों को अपनी संवेदना और आकंक्षा की फिल्में बनाने के लिए मजबूर करते हैं। दर्शकों के स्वीकार और बहिष्कार से यह समझ में आएगा। आखिरकार दर्शक ही मनोरंजन के साम्राज्य के राजा हैं।

Saturday, December 24, 2011

फ‍िल्‍म समीक्षा : डॉन2

नाम बड़े और दर्शन छोटे-अजय ब्रह्मात्‍मज

एशिया में अंडरव‌र्ल्ड साम्राज्य कायम करने के बाद डॉन की नजर अब यूरोप पर है। इसकी भनक योरोप के ड्रग सौदागरों को मिल चुकी है। वे डॉन को खत्म करने की साजिश रचते हैं। हमारा हिंदी फिल्मों का डॉन भी शातिर दिमाग है। अपनी सुरक्षा के लिए वह जेल चला जाता है। वहां से अपने पुराने दुश्मन वरधान को साथ लेता है। मारने आए व्यक्ति जब्बार को अपनी टीम में शामिल करता है और जर्मनी के एक बैंक से यूरो छापने की प्लेट की चोरी की योजना बनाता है।

हंसिए नहीं,एशिया का किंग बन चुका डॉन इस चोरी को अंजाम देने के लिए खुद ही जाता है। मालूम नहीं उसके गुर्गे छुट्टी पर हैं या? हमारा डॉन अकेला ही घूमता है। जरूरत पड़ने पर उसके पास हथियार,गाड़ी और लश्कर चले जाते हैं। जैसे हिंदी फिल्मों का हीरो जब गाता है तो दर्जनों व्यक्ति उसके आगे-पीछे नाचने लगते हैं।

अनगिनत फिल्मों में देखे जा चुके दृश्यों से अटी पड़ी यह फिल्म शाहरुख के अभिनय और अंदाज के दोहराव से भरी हुई है। उनका मुस्कराना,खी-खी कर हंसना,लचकते हुए चलना,भींचे चेहरे और टेढ़ी नजर से तकना उनके प्रशंसकों को भा सकता है,लेकिन कब तक? अफसोस है कि दिल चाहता है से क्रिएटिव शुरुआत कर चुके निर्देशक फरहान लेखन और निर्देशन में निरंतर बेअसर और कमजोर होते जा रहे हैं।

मूलत: अंग्रेजी में सोचे लिखे गए डायलॉग जब हिंदी में अनूदित होते हैं तो उनमें व्याकरण और प्रयोग की गलतियां होती हैं। फरहान को ऐसी गलतियों से बचना चाहिए। बड़े नामों से जुड़ी यह फिल्म रूप-रंगत में इंटरनेशनल फील देने के बावजूद बांधे रखने में असफल रहती है। इंटरवल के पहले धीमी गति की वजह से ऊब पैदा करती है। शाहरुख खान अपनी लोकप्रिय छवि और स्टाइल को रिपीट करते हुए कई द़श्यों में ठीक नहीं लगते हैं। उन पर उम्र का बोझ हावी है, जो क्लोजअप में जाहिर होता है।

एमआई 4 के ठीक एक हफ्ते बाद रिलीज हो रही डॉन 2 के दृश्यों और मेकिंग को लेकर हम हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की स्थिति पर रो ही सकते हैं। हालीवुड की फिल्मों से चोरी की गई दृश्य संरचना को सालों बाद डॉन 2 में देखकर हमें अपने डायरेक्टर और स्टार पर खीझ ही सकते हैं। कलाकारों की बात करें तो ऐसा लगता है कि ओम पुरी को अब अभिनय में आनंद नहीं आता। वे थक चुके हैं। इस बार बोमन ईरानी भी थके और किरदार में मिसफिट नजर आए। निगेटिव होने और दिखने में वे असफल रहे। प्रियंका चोपड़ा के किरदार का कंफ्यूजन उनके परफारमेंस में भी दिखता है। हां,लारा दत्ता अपनी संक्षिप्त मौजूदगी में जिम्मेदारी निभाती हैं। एक सिक्वेंस में आए रितिक रोशन के हिस्से में ज्यादा दृश्य ही नहीं थे।

फरहान अख्तर की डॉन 2 शाहरुख खान की लोकप्रियता को भुनाने में कामयाब नहीं हो पाई है। स्वयं शाहरुख खान अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद दर्शकों को रिझाने में असफल रहते हैं। फिल्म के अंत में आया जंगली बिल्ली गीत तो रोमा और डॉन के संबंधों के समीकरण का घालमेल कर देता है। क्या निर्देशक फरहान अख्तर को इस गीत की कल्पना के समय ख्याल नहीं था कि वे दो घंटे तक रोमा और डॉन को कैसे चित्रित कर रहे थे? फरहान अख्तर डॉन 3 के बारे में न सोचें तो बेहतर...

-अजय बह्मात्मज * 1/2 डेढ़ स्टार

दर्शक भी देखने लगे हैं बिजनेस

-अजय ब्रह्मात्‍मज
र हफ्ते फिल्मों की रिलीज के बाद उनके कलेक्शन और मुनाफे के आंकड़े आरंभ हो जाते हैं। कुछ सालों पहले तक हिट और सुपरहिट लिखने भर से काम चल जाता था। अब उतने से ही संतुष्टि नहीं होती। ट्रेड पंडित और विश्लेषक पहले शो से ही कलेक्शन बताने लगते हैं। मल्टीप्लेक्स थिएटरों के आने के बाद आंकड़े जुटाना, दर्शकों का प्रतिशत बनाता और कुल मुनाफा बताना आसान हो गया है। इन दिनों एक सामान्य दर्शक भी नजर रखना चाहे तो इंटरनेट के जरिए मालूम कर सकता है कि कोई फिल्म कैसा बिजनेस कर रही है। फिल्मों के प्रति धारणाएं भी इसी बिजनेस के आधार पर बनने लगी हैं। सामान्य दर्शक के मुंह से भी सुन सकते हैं कि फलां फिल्म ने इतने-इतने करोड़ का व्यापार किया। क्या सचमुच फिल्म के कलेक्शन से फिल्म के रसास्वादन में फर्क पड़ता है? क्या कलेक्शन के ट्रेंड से आम दर्शक प्रभावित होते हैं?

फिल्में देखना और उन पर लिखना मेरा काम है। शुक्रवार को रिलीज हुई फिल्मों की समीक्षा अब शनिवार को अखबारों में आने लगी हैं। इंटरनेट केइस दौर में वो रिव्यू मेल करने के आधे घंटे के अंदर वह ऑनलाइन हो जाती है। इस दबाव में अनेक बार फिल्म के बारे में बनी पहली राय को ही अंतिम राय हो जाती है। मैंने कई दफा महसूस किया है कि भावावेग और जल्दी रिव्यू लिखने के दबाव में फिल्म का उपयुक्त विश्लेषण नहीं हो पाता। इसके अलावा शब्दों की सीमा की भी बाधा रहती है। बहरहाल, इन दिनों पाठकों और प्रशंसकों की जिज्ञासा रहती है कि रिव्यू में फिल्म के चलने या न चलने का भी संकेत मिलें। फिल्मों के प्रिव्यू से निकलने पर मित्रों-परिचितों के प्रश्न होते हैं, कैसी लगी फिल्म? अगर मैंने जवाब दिया अच्छी लगी तो दूसरा सवाल होता है कि चलेगी क्या? इस सवाल से बहुत कोफ्त होती है। किसी फिल्म के चलने या न चलने की भविष्यवाणी कोई समीक्षक कैसे कर सकता है? फिल्म श्रेष्ठ, अच्छी, सामान्य और बुरी के श्रेणी में तो बताई जा सकती है, लेकिन उसके हिट या फ्लॉप होने के बारे में कोई कैसे बता सकता है? हां, ट्रेड पंडित भविष्यवाणियां करते हैं। यह उनका काम है।

फिल्म ट्रेड का असर अब फिल्म पत्रकारिता में बढ़ गया है। टीवी पर जारी फिल्म पत्रकारिता में हिट या फ्लॉप का नजरिया पेश किया जाता है। फिल्म ट्रेड के पंडितों और विश्लेषकों को समीक्षकों के तौर पर पेश किया जाता है। ऐसा घालमेल हो गया है कि ट्रेड विश्लेषक ही क्रिटिक मान लिए गए हैं। फिल्म की गुणवत्ता के आधार पर बात करने वाले समीक्षकों को दोयम दर्जे का समझा जाता है। माना और कहा जाता है कि उन्हें आम दर्शकों की रुचि का कोई अंदाजा नहीं है। फिल्मों को तो आम दर्शक के नजरिए से देखा जाना चाहिए। यही कारण है कि फिल्मों के गंभीर समीक्षकों को खारिज करने का चलन बढ़ा है। इसके अलावा फिल्म इंडस्ट्री में अंग्रेजी के प्रचलन से गैरअंग्रेजी समीक्षकों की राय को ज्यादा तरजीह नहीं दी जाती। दरअसल, निर्माता, निर्देशक और स्टार आम तौर पर न तो हिंदी के अखबार पढ़ते हैं और न ही यह मानते हैं कि भारतीय भाषाओं के कवरेज से फिल्म को फायदा या नुकसान होता है। फिल्म इंडस्ट्री महानगरों की हद से बाहर न तो देख पाती है और न सोच पाती है, जबकि यह सच्चाई सामने आने लगी है कि सुपरहिट होने के लिए हर फिल्म को छोटे शहरों और कस्बों में भी लोकप्रिय होना पड़ेगा। देखें तो इधर 100 करोड़ के क्लब में आई फिल्मों का 40-50 प्रतिशत बिजनेस सिंगल स्क्रीन और छोटे शहरों से आ रहा है।

Thursday, December 22, 2011

टपोरी का किरदार होता है मजेदार-नील नितिन मुकेश

अमित कर्ण

अपनी अगली फिल्म 'प्लेयर्स' में मैं निभा रहा हूं एक हैकर की भूमिका। दरअसल टपोरी टाइप के किरदार मुझे पसद हैं क्योंकि इनमें काफी शेड्स होते हैं

जॉनी गद्दार फिल्म से कॅरियर का शानदार आगाज करने वाले नील नितिन मुकेश इन दिनों अपनी आगामी फिल्म 'प्लेयर्स' के प्रमोशन में व्यस्त हैं। उनसे बातचीत के प्रमुख अंश :

'प्लेयर्स' में आपका क्या किरदार है?

इसमें मेरा स्पाइडर का किरदार है, जो एक हैकर है। वह इंटरनेट का जाल बुनता और काटता है। यह 'इटैलियन जॉब' की आधिकारिक रूप से रीमेक मूवी है। दर्शकों के मनोरंजन के लिए इसमें हर किस्म के मसाले हैं। कॅरियर के आरंभ से ही मेरी तमन्ना थी कि कभी अब्बास-मस्तान के साथ काम करूं। यह सपना अब पूरा हो चुका है। अब मैं गर्व और दावे के साथ कह सकता हूं कि मैं उन दोनों के परिवार का हिस्सा हूं।

कंप्यूटर हैकर्स अपराधी होते हैं। ऐसे में इस फिल्म में आपको कानून से सजा मिलती है..?

हैकर्स तो वाकई अपराधी होते हैं। इस फिल्म में हैकर को सजा मिलती है या नहीं? इसके लिए दर्शकों को पहले यह मूवी देखनी होगी।

'जॉनी गद्दार' से लेकर अब तक कई फिल्मों में आपने टपोरी का किरदार निभाया है। ऐसे रोल आपको ज्यादा भाते हैं क्या?

जी हा। ऐसे किरदार मुझे पसद हैं, क्योंकि इनमें काफी शेड्स होते हैं। ऐसा इंसान हर पल एक अलग किस्म के मूड में होता है। वह कभी रो सकता है, कभी हंस सकता है। कभी किसी पर गुस्सा उतार सकता है। लिहाजा वह एक ही समय कई किरदारों को जी रहा होता है।

यानी टपोरी इंसान बुरे नहीं होते हैं?

इंसान अच्छे या बुरे नहीं होते। उनके हालात उन्हें अच्छा या बुरा बनाते हैं। हम कभी यह सोचकर पैदा नहीं होते कि हमें आगे चलकर अपराधी या फिर समाज सुधारक बनना है।

आपका ड्रीम रोल और ड्रीम डायरेक्टर कौन हैं?

ड्रीम रोल के बारे में तो अभी नहीं सोचा है, पर हा ड्रीम डायरेक्टर कई हैं। दिली ख्वाहिश है कि यश जी, राजकुमार हिरानी और नीरज पाडे के साथ काम करूं।

क्या आप रिएलिटी शो भी करने वाले हैं?

नहीं, इस वक्त तो ऐसा कुछ भी नहीं है। वैसे ऑफर तो ढेर सारे हैं। हाल ही में एक म्यूजिक रिएलिटी शो का ऑफर आया था। मुझे अपने परिवार से सगीत विरासत में मिला है। ऐसे में चद रुपयों के लिए कोई ऐसा सतही काम नहीं करूंगा जिसके लिए मन इजाजत न दे।

आपकी नजर में बेहतरीन अभिनेत्रिया कौन हैं और सबसे सेक्सी ड्रेस आप किसे मानते हैं?

पुराने जमाने की अभिनेत्रियों में परवीन बॉबी, वहीदा रहमान, नूतन, दिव्या भारती मेरी फेवरेट हैं। आज की बात करूं तो रिमी सेन, प्रियका चोपड़ा सहित मेरी अन्य सभी को-स्टार पसंद है। जहा तक सबसे सेक्सी ड्रेस का सवाल है तो एक हिंदुस्तानी औरत साड़ी में सबसे ज्यादा खूबसूरत दिखती हैं। मैं अपनी बीवी को हमेशा साड़ी में देखना पसद करूंगा। इसमें अपील और शालीनता दोनों का मिश्रण है।

Wednesday, December 21, 2011

जार्डन को जीने की खुशी से मस्‍त रण्‍बीर कपूर

जे जे खुश हुआ-अजय ब्रह्मात्‍मज

अमूमन फिल्म रिलीज होने के बाद न तो डायरेक्टर किसी से मिलते हैं और न ही ऐक्टर.., लेकिन इस बार कुछ अलग हुआ। रॉकस्टार की रिलीज के बाद जेजे यानी जॉर्डन यानी रणबीर कपूर लोगों से मिले। फिल्म की कामयाबी और चर्चा से वे खुश थे। उन्होंने फिल्म की मेकिंग, किरदार, एक्टिंग और इससे संबंधित अनेक मुद्दों पर बातें कीं। बर्फी की शूटिंग के लिए ऊटी निकलने से पहले बांद्रा स्थित अपने बंगले कृष्णराज में हुई मुलाकात में वे अच्छे नंबरों से पास हुए बच्चे की तरह खुश थे। प्रस्तुत हैं उनके ही शब्दों में उनकी बातें..

फिल्म की शूटिंग शुरू करने से पहले के छह महीने हमने और इम्तियाज ने साथ बिताए थे। उस किरदार को समझना बहुत जरूरी था। बॉडी लैंग्वेज और फिजिकल अंदाज तो आ जाएगा। खास कपड़े पहनना, बालों को लंबा करना, दाढ़ी बढ़ाना.. ये सब बड़ी बातें नहीं हैं। किसी किरदार को समझने की एक आंतरिक प्रक्रिया होती है। जॉर्डन की म्यूजिकल क्वालिटी को समझना था। बात करना और चलना भी आ गया था, लेकिन वह अंदर से कैसे सोचता है? एक दो दिनों की शूटिंग के बाद समझ में आ गया। समझ में आने के बाद हम किरदार के साथ एकाकार हो जाते हैं। उसके बाद तो मुश्किल या आसान सीन होते हैं। अच्छे या बुरे दिन होते हैं।

फिल्म जिस क्रम में दिखाई देती है, जरूरी नहीं कि उसी क्रम में शूटिंग हुई हो। हमने लंबे बाल और दाढ़ी के दृश्य पहले किए थे। जनार्दन जाखड़ में मासूमियत है तो जॉर्डन में नाराजगी है। मैं अंदर से नाराज व्यक्ति नहीं हूं और न मुझमें जॉर्डन जैसी इंटेनसिटी है। इस किरदार के जरिए मुझे मौका मिला था यह जाहिर करने का फिल्म में सड्डा हक.. गाने के बाद के फेज में इम्तियाज जो कुछ कहना चाह रहे थे, वह व्यक्त हुआ है। अपने आसपास के समाज के प्रति गुस्सा, पाखंड और दोगलेपन से नाराजगी.. यों समझें कि किसी ने प्लग निकाल दिया हो, फिर भी करंट मौजूद है। जॉर्डन को पता ही नहीं है कि यह सब हीर की वजह से हो रहा है। जॉर्डन वास्तव में एक जीनियस है। आपने किसी जीनियस को करीब से देखा है। वे घबराए और अनिश्चित रहते हैं। इम्तियाज जीनियस हैं। वे जो महसूस कर रहे थे, उसे ही किरदारों के जरिए फिल्म में सजा रहे थे। फिल्म के शुरू में कॉलेज कैंटीन के सीन में खूब मजा आया। पहली बार मुझे किसी भारतीय कॉलेज-यूनिवर्सिटी में जाने और बैठने का मौका मिला। वहां का माहौल और खुशबू.. हॉस्टल देखे। कपड़े-बातचीत.., बिल्कुल अलग दुनिया थी। मैंने न्यूयॉर्क में पढ़ाई की है। यहां के बारे में नहीं जानता था। कैंटीन के सीन में सब रीअल स्टूडेंट्स थे। रीअल लोगों के होने से एक-एक आर्गेनिक फीलिंग आती है। आसपास के सारे लोग रीअल थे, तो मैं भी रीअल हो गया। मेरे अंदर अचानक परिवर्तन हुआ। परफॉर्म करना भूल गया। भूल गया कि मैं ऐक्टर हूं। मैं अपनी उम्र और स्टूडेंट की तरह बातें करने लगा।

इस फिल्म के कुछ दृश्यों में अगर लोगों को राजकपूर की झलक मिली या मैं पापा जैसा लगा, तो वह अनायास था। मैंने किसी की नकल करने की कोशिश नहीं की है। मैंने दादा राजकपूर और पापा की सारी फिल्में देखी हैं। मैं उसी परिवार का सदस्य हूं, तो यह स्वाभाविक है। आप अभिषेक बच्चन की फिल्मों में गौर करेंगे तो कई एंगल और दृश्यों में वे अमिताभ बच्चन की तरह दिखते हैं। अगर मेरे काम में पापा और दादा जी की झलक मिल रही है तो मैं तो इसे शिकायत नहीं, बल्कि कंप्लीमेंट की तरह लूंगा। वैसे मैं बता दूं कि पापा इतने ओरिजनल हैं कि उनकी नकल नहीं हो पाती। जॉनी लीवर स्टेज पर सभी स्टारों की मिमिक्री करते हैं। वे कहते हैं कि ऋषि जी आप की नकल ही नहीं हो पाती। इसकी वजह यही है कि पापा की ऐसी स्टाइल या मैनरिज्म नहीं है।

पापा से प्रेरणा लेकर मैंने फिल्म के गानों पर खास ध्यान दिया। इसे आप शम्मी कपूर जी की प्रेरणा भी कह सकते हैं। वे मोहम्मद रफी के साथ रिकार्डिग में बैठा करते थे। फिल्म में मैं एक संगीतकार हूं, इसलिए पर्दे पर गाते हुए मुझे वास्तविक दिखना चाहिए था। गिटार बनाना भी सही लगे। इस बार मैंने ट्रेनिंग ली है। हर गाने की रिकार्डिग के समय स्टूडियो गया। गाते समय चेहरे के भाव और हाव-भाव पर ध्यान दिया। इस फिल्म के गाने चालू किस्म के नहीं हैं। शुरू में बोल के अर्थ समझ में नहीं आए। इसमें पोएट्री है और अर्थो में गहराई है। इम्तियाज ने मुझे हर शब्द और गाने का मतलब समझाया। जॉर्डन का नजरिया गानों के बोल से समझ में आता है।

जॉर्डन की भूमिका लिए मुझे ढेरों बधाइयां मिलीं। आशीर्वाद मिले, लेकिन दादी का दिया तोहफा तो हमेशा की चीज हो गई। उन्हें बड़े दादा पृथ्वीराज कपूर ने सोने का मेडल किया था। दादी ने मुझे वह भेंट किया और आशीर्वाद दिया कि तुम कपूर परिवार की परंपरा आगे बढ़ा रहे हो। मैं अपने बेटे या पोते-पोतियों में किसी को इसे भेंट करूंगा। सचमुच मैं बहुत खुश हूं और नए जोश और जिम्मेदारी के साथ मेहनत कर रहा हूं।

Tuesday, December 20, 2011

सबकी आन सबकी शान ये है अपना सलमान

सबकी आन सबकी शान ये है अपना सलमान-अजय ब्रह्मात्‍मज

फि ल्मों में अपनी जगह बनाने की गरज से कुछ-कुछ कर रहे सलीम खान ने सुशीला से शादी कर उन्हें सलमा नाम दिया था। पहली संतान के आने की आहट थी। मुंबई में देखभाल का पर्याप्त इंतजाम नहीं था तो उन्हें पुश्तैनी घर इंदौर छोड आए। इंदौर में ही अब्दुल रशीद सलमान खान का जन्म हुआ। बडे होकर वे सलमान खान के नाम से मशहूर हुए।

छोटे शहर का हीरो

27 दिसंबर 1965 को जन्मे सलमान खान अपनी जिंदगी में इंदौर का बडा महत्व मानते हैं। इंदौर में अपनी पैदाइश और बचपन की वजह से सलमान हमेशा कहते हैं कि मैं तो छोटे शहर का लडका हूं। अपने देश को पहचानता हूं। मेरी रगों में छोटा शहर है। शायद इसी वजह से देश के आम दर्शक मुझे अपने करीब पाते हैं। मेरी अदाओं और हरकतों में उन्हें अपनी झलक दिखती है। मेरी शैतानियां उन्हें भाती हैं, क्योंकि मैं उनसे अलग नहीं हूं।

सलमान के बचपन की सनक और शरारतों के जानकार बताते हैं कि सलीम खान को उनसे कोई उम्मीद नहीं थी। तीनों भाइयों में अरबाज खान ज्यादा तेज दिमाग के थे। वे शांत और समझदार भी थे। सलमान सनकी होने के साथ जिद्दी भी थे। किसी बात पर अड गए तो मां के सिवा किसी और की बात नहीं मानते थे। आज भी पिता सलीम और मां सलमा ही सलमान की मर्जी के खिलाफ जा सकते हैं या अपनी बात मनवा सकते हैं। सलमान खान ज्यादा बातें और बहस नहीं करते। घर-परिवार, करियर, दोस्ती, चैरिटी जैसे सभी मामलों में वे गौर से सबकी बातें सुनते हैं और उसे गुनते रहते हैं। बातें खत्म होने पर वे थोडी देर के लिए खामोश रहते हैं। तब उनकी पुतलियां बंद पलकों के अंदर बहुत तेज घूमती हैं। मानो वे आगत फैसले को देख रही हों और फिर सलमान खान संक्षेप में अपनी बात कहते हैं और निकल जाते हैं। सभी जानते हैं कि उसके बाद कुछ भी नहीं बदलता। वह अंतिम फैसला होता है। उस फैसले को बदलने का अधिकार केवल मां या पिता को है, लेकिन अधिकतर मामलों में उन्हें अपने बेटे का फैसला सही लगता है। सलमान खान दुनियावी या व्यावहारिक नहीं हैं। कई बार उन्हें अपने फैसलों का परिणाम भुगतना पडता है। लेकिन वे बाज नहीं आते। हमेशा की तरह दिल की सुनते हैं, मानते हैं, उसी पर अमल करते हैं।

रोमैंटिक हीरो

पिता सलीम खान बडे लेखक हो गए थे, लेकिन सलमान के फिल्मों में प्रवेश करने के समय उनके लेखन करियर की सांझ चल रही थी। दोनों चाहते भी नहीं थे कि विशेष लांचिंग के लिए किसी की मदद ली जाए। उनकी एक फिल्म बीवी हो तो ऐसी शुरू भी हो चुकी थी। इसी बीच सलमान को पता चला कि राजश्री प्रोडक्शन के सूरज बडजात्या अपनी पहली फिल्म के लिए नए चेहरे की तलाश कर रहे हैं। सूरज मन बना रहे थे कि आशुतोष गोवारीकर व भाग्यश्री को वे अपनी फिल्म में मौका देंगे। तब दोनों का सीरियल धूप छांव टीवी पर आ रहा था। कहते हैं कि जानकारी के बावजूद सलमान खान उनसे मिलने गए। उन्होंने सूरज बडजात्या को इस कदर प्रभावित किया कि आशुतोष की छंटनी हो गई और वे उनकी फिल्म के हीरो हो गए। सूरज बडजात्या की पहली फिल्म मैंने प्यार किया से सलमान ने रोमैंटिक हीरो की पहचान बनाई और प्रेम के नाम से विख्यात हुए। उन्हें अपना यह नाम बहुत पसंद है। कई फिल्मों में वे इसी नाम से आए हैं।

बरकरार है जादू

सलमान खान अपनी फिल्मों और अदाओं से हमेशा दर्शकों के चहेते बने रहे। गौर करें तो उन्होंने कला और कथ्य के लिहाज से कोई उल्लेखनीय फिल्म नहीं की, फिर भी पिछले 22 सालों से वे पॉपुलर हैं। कुछ खास जादू है उनमें, जो पर्दे पर चमत्कार करता है और आम दर्शकों को उनका दीवाना बना देता है। आलोचकों और सुधी दर्शकों ने उन्हें कभी अधिक पसंद नहीं किया, लेकिन उन्हें इसकी फिक्र नहीं है। वे स्पष्ट कहते हैं, मैं दर्शकों का अभिनेता हूं। अगर दो-चार समीक्षकों को मेरी फिल्में नापसंद हैं तो क्या फर्क पडता है? देश के करोडों दर्शक मुझे पसंद कर रहे हैं न! मैं उनका मनोरंजन करता हूं। मुझे इसी बात की संतुष्टि है कि वे मुझे देखकर खुश होते हैं। दर्शकों की खुशी के लिए सलमान कुछ भी करने को तैयार रहते हैं।

निजी मदद करने से भी नहीं हिचकिचाते। यही चैरिटी उन्हें जेब पर भारी पडने लगी तो उन्होंने बीइंग ह्यूमन ट्रस्ट स्थापित किया और अब उसके जरिये जरूरतमंदों की मदद जारी है। दस का दम में बडी उम्मीद से आए एक प्रतियोगी को मौका नहीं मिला तो सलमान ने उसे अपनी तरफ से एक लाख देने में हिचक नहीं की।

संस्कार में है चैरिटी

सलमान पर पिता सलीम खान का अंकुश काम करता है। चैरिटी, मदद और जकात पर वे नजर रखते हैं। अगर छूट दे दी जाए तो सलमान अपनी जरूरत भर के पैसे रख कर सब कुछ दान में दे दें। चैरिटी उनके संस्कार में है। सलमान मानते हैं कि वे जो भी कमाते हैं, उसका 20 प्रतिशत उनके निजी उपयोग के लिए काफी है। बाकी 80 प्रतिशत दान किया जा सकता है। जब उनसे पूछा जाता है कि क्या उन्हें अपने बुढापे की चिंता नहीं है तो उनका कहना होता है, मरते दम तक मैं काम करता रहूंगा। मालूम है कि मैं हमेशा हीरो नहीं रह सकता। उम्रदराज होने पर मैं कैरेक्टर रोल करने लगूंगा, चाचा-ताया की भूमिका में आने लगूंगा। अगर वह भी नहीं मिला तो ऐक्शन डायरेक्टर बन जाऊंगा। मुझे अपनी चिंता नहीं है। अपनी आमदनी के लिए कुछ न कुछ करता रहूंगा।

आम दर्शक सलमान को मुख्य रूप से अभिनेता के तौर पर जानते हैं। लेकिन इन दिनों वे लेखन, ऐक्शन, डांस, संगीत, संवाद जैसे सभी क्रिएटिव क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। वे अपने अनुभवों व दर्शकों की समझ से सब कुछ बदलते हैं। मजेदार तथ्य है कि दबंग की ओरिजनल स्क्रिप्ट अभी तक ज्यों की त्यों बची हुई है। हमने जो फिल्म देखी, वह मूल ढांचे पर सलमान द्वारा तैयार की गई फिल्म है। वांटेड के बाद से सलमान ने तय किया है कि वे फिल्म की क्रिएटिव लगाम अपने हाथों में रखेंगे। नतीजा सभी के सामने है। उनकी फिल्में दर्शकों को पसंद आ रही हैं और वे बिजनेस भी कर रही हैं।

सदाबहार लोकप्रियता

पिछली मुलाकात में मैंने उनसे पूछा था कि दर्शकों से उनका कैसा कनेक्शन है? क्या उसे परिभाषित किया जा सकता है? उनकी पॉपुलैरिटी का विश्लेषण किया जा सकता है? सलमान ने सरल शब्दों में बताया कि दर्शक जब हमारी ताजा फिल्म देखने आते हैं तो उनके मन में हमारी पुरानी छवि रहती है। मेरी पुरानी फिल्में, भूमिकाएं, मेरी निजी जिंदगी, मेरी चैरिटी, मेरा स्वभाव और मेरी इमेज.. इन सभी के सम्मिलित प्रभाव के साथ ही फिल्म का अपना असर होता है। ज्यादातर पॉपुलर और पुराने ऐक्टर के साथ यही बात होती है। यही वजह है कि हम सभी की फिल्मों को ओपनिंग मिलती है। पहले दो-तीन दिन दर्शक पिछले प्रभाव में आते हैं। उसके बाद अगर फिल्म में दम हो तो फिर वह चलती है। हमारा ब्रैंड बडा होता है और हमारी इमेज भी गहरी होती है। दर्शकों को हमारी अगली फिल्म का इंतजार रहता है।

सलमान फिल्म समीक्षकों और इतिहासकारों की समझ और विश्लेषण पर गौर नहीं करते। उनका क्रेज देश के बहुसंख्यक निम्न मध्यमवर्गीय व गरीब तबके के दर्शकों के बीच ज्यादा है। मुंबई में तबेले और चालों के बच्चे उनके नाम की माला जपते हैं। उनकी फिल्मों में एक गैर-इरादतन बदतमीजी रहती है, जो बच्चों, किशोरों और युवकों को बहुत पसंद आती है। उनकी फिल्मों में हीरो-हीरोइन का रिश्ता छेडखानी और बदतमीजी से भरा रहता है, जिसमें हीरो आमतौर पर हीरोइनों से दूर रहने या भागने की कोशिश करता है। हीरो जमीर का पक्का होता है। अपनी कही बातों से मुकरता नहीं और वादा कर लिया तो फिर जान पर खेल कर भी उसे पूरा करता है। हिंदी सिनेमा की गढी गई इस परिकथा को उनकी फिल्में आज भी बखूबी पेश करती हैं और दर्शकों का दिल जीत लेती हैं। बॉडीगार्ड की रिलीज के समय भयंकर दर्द के बावजूद उन्होंने अपने कमिटमेंट पूरे किए और कैमरे के आगे मुस्कराते रहे।

उदारता का आलम

दयालुता का आलम एक परिचित बताते हैं। बांद्रा के एक स्कूल में सलमान पढा करते थे। वहां लंच ब्रेक में बांद्रा से दूर के बच्चों को दिक्कत होती थी। एक टीचर ने सुझाव दिया कि अगर बांद्रा के लडके अपने सहपाठियों को लंच में बारी-बारी साथ ले जाएं तो उन्हें सहूलियत होगी। सलमान दस सहपाठियों को लेकर घर पहुंच गए। मां ने सभी के लिए लंच तैयार किया। यह सिलसिला लगभग दो साल तक चला। खाने-खिलाने के शौकीन सलमान आज भी शूटिंग में घर से लंच मंगवाते हैं। एक खास जीप है, जिसमें टिफिन व कंटेनर लाने-ले जाने का इंतजाम है। कम से कम पंद्रह व्यक्तियों का लंच तैयार होता है। वह ज्यादा नखरैल नहीं हैं। बताते हैं कि रात में देर से लौटने पर वे किसी को तंग नहीं करते। किचन में जाकर बचे-खुचे खाने को पैन में रखते हैं और घी का तडका लेकर स्पेशल मिक्स डिश का आनंद उठाते हैं।

सलमान को पेंटिंग का सलीका अपनी मां से मिला है। शादी के कई सालों बाद तक सलमा पेंटिंग करती रही थीं। सलमान को नींद नहीं आती। रात में जागने और दोस्तों के साथ मौज-मस्ती करने का उन्हें शौक है। कई बार दोस्त नहीं होते या उनका मूड मौज-मस्ती करने का होता है तो वे पेंटिंग करते हैं। सलमान ने अपनी ज्यादातर पेंटिंग्स रात में तैयार की हैं। इसी कारण उनमें एक अलग रंग और छटा दिखाई पडती है। उनकी पेंटिंग में उदासी, एकाकीपन और छटपटाहट जाहिर होती है, जो वास्तव में सलमान का निजी एकांत है। अपनी लोकप्रियता और व्यस्तता के बीच भी निहायत अकेले हैं सलमान खान।

निजता में प्रवेश

उनके पिता कहते भी हैं सलमान खान के जीवन में आई लडकियों में से कोई भी उनके इस एकांत में प्रवेश नहीं कर सकी। कुछ सालों और समय के बाद अपना स्वार्थ पूरा कर सारी लडकियां चलती बनीं। केवल ऐश्वर्या राय से उनका प्रेम गहरा और वास्तविक था, लेकिन सलमान खान ने अपने स्वभाव के भटकाव और अपनी आदतों के कारण उन्हें खो दिया।

अपनी सारी उदारता और दयालुता के बावजूद सलमान खान में एक सामंती पुरुष भी है, जो औरतों को सिर्फ बहन और मां के रूप में ही इज्जत देना जानता है। प्रेमिकाओं से उनके संबंध बराबरी और आदर के कभी नहीं रहे। ऊपरी तौर वे कहते हैं कि शादी बच्चों के लिए की जाती है। मेरे परिवार में पहले से इतने बच्चे हैं कि मुझे शादी की जरूरत ही नहीं है। लेकिन सच्चाई यह है कि सलमान को किसी प्रकार का बंधन एक सीमा के बाद स्वीकार नहीं होता। हालांकि वे अपने भाई-बहनों के लिए कुछ भी कर सकते हैं। फिलहाल तो एक-एक कर वे सभी को सफल निर्माता बना रहे हैं। उनकी फिल्में कर रहे हैं।

बादशाहत का भ्रम

सलमान खान को महेश भट्ट मौलिक शैतान छोकरा कहते हैं। उनके खयाल में सलमान खान की शैतानी कई बार उद्दंडता में बदल जाती है। वास्तव में सलमान खान जिस तरह की सीमित दायरे की जिंदगी जीते हैं, उसमें उन्हें दुनिया के दस्तूर से विशेष मतलब नहीं रहता। ऐसे सफल व्यक्ति खुद को अपनी दुनिया का बादशाह समझने की गलती कर बैठते हैं। उन्हें लगता है कि वे कानूनों, नियमों और बंधनों से परे हैं। ऐसे में उनके परिजनों और परिचितों की मुसीबतें बढती हैं। लोग पूछते हैं कि सलीम-जावेद की जोडी टूटने के बाद से सलीम खान और कुछ क्यों नहीं रच पाए। वास्तव में सलीम खान की पूरी ऊर्जा अपने इस शैतान बेटे को संभालने में ही गुजरती रहती है। सलमान खान सलीम खान की सर्वश्रेष्ठ रचना हैं।

Saturday, December 17, 2011

सच है कि इस इंडस्ट्री में पुरुषों की प्रधानता है-प्रियंका चोपड़ा

लेडी डॉन-अजय ब्रह्मात्‍मज
प्रियंका चोपड़ा की शाहरुख खान अभिनीत फिल्म डॉन-2 आ रही है। इसमें उनकी क्या भूमिका है और वे नया क्या कर रही हैं, बता रही हैं इस बातचीत में..

डॉन-2 की कहानी कितनी बदली और आगे बढ़ी है?

यह सीक्वल है। पिछली फिल्म खत्म होते समय सभी को पता चल गया था कि विजय ही डॉन है। यह फिल्म वहीं से शुरू होती है। चार साल बाद वही कहानी आगे बढ़ती है। रोमा महसूस करती है कि उसके साथ धोखा हुआ। उसे विजय से प्यार हो गया था, लेकिन विजय तो डॉन निकला।

फिर तो रोमा भी नाराज और अग्रेसिव होगी?

बिल्कुल.., बीच के चार सालों में ट्रेनिंग लेकर रोमा पुलिस ऑफिसर बन चुकी है। उसका एक ही मकसद है कि किसी तरह वह डॉन को पकड़े और उसे सीखचों के पीछे लाए। उनका आमना-सामना होता है तो उनके बीच नफरत और मोहब्बत का रिश्ता बनता है। चूंकि विजय ने उसे धोखा दिया है, इसलिए रोमा उससे बहुत नाराज है। पूरी फिल्म में लोग मुझे गुस्से में ही देखेंगे। उस गुस्से में एक मोहब्बत भी है, क्योंकि रोमा को प्यार तो उसी व्यक्ति से हुआ था।

सुना है कि आपने ऐक्शन किया है डॉन-2 में..। क्या हम उम्मीद करें कि द्रोण की तरह आप फिर से ऐक्शन करती दिखेंगी?

उतना ज्यादा तो नहीं है। इस फिल्म का ऐक्शन हाथापाई तक सीमित है। रोमा पुलिस ऑफिसर है तो कुछ तो ऐक्शन होगा ही। दोनों के बीच क्रिमिनल और पुलिस ऑफिसर का भी तो रिलेशनशिप है।

शाहरुख खान हमेशा आपके सपोर्ट में रहे हैं। उनके साथ फिल्म करने का मतलब निश्चित कामयाबी मानी जाती है। आप क्या सोचती हैं?

उनके साथ यह मेरी दूसरी फिल्म है और यह पिछली फिल्म की अगली कड़ी है। आपने सही कहा कि वे अपनी हीरोइनों के लिए लकी होते हैं। हमारी पिछली फिल्म सफल रही थी। इस फिल्म से भी वैसी ही उम्मीद है। शाहरुख की फिल्म को पर्याप्त दर्शक मिल जाते हैं।

और क्या-क्या चल रहा है? सुना है आप गाने भी गा रही हैं? दूसरी तरफ फिल्मों के फ्रंट पर भी बिजी हैं?

अभी तो बहुत कुछ हो रहा है। अग्निपथ पूरी हो चुकी है। जल्दी ही उसका प्रमोशन चालू होगा। उसके बाद बर्फी और कुणाल कोहली की फिल्म खत्म कर रही हूं मैं। मेरी कृष भी शुरू हो रही है। मेरा अंग्रेजी में एलबम आ रहा है।

एलबम के बारे में थोड़ा बताएंगी?

यह अंग्रेजी का एलबम है। विदेश में तैयार हो रहा है। इंटरनेशनल स्तर पर इसे रिलीज किया जाएगा। भारत में भी वह रिलीज होगा। खुद एलबम के गाने लिख रही हूं। गानों की रिकार्डिग के दौरान कई निर्माताओं से मुलाकात हुई। नए ढंग का एक्सपीरिएंस रहा। यह मुख्य रूप से पॉप एलबम है। कुछ लव सॉन्ग भी होंगे।

क्या आपने अपनी म्यूजिक कंपनी बनाई है या किस तरह का अरेंजमेंट हुआ है?

यह अमेरिका की मशहूर म्यूजिक कंपनी है। लेडी गागा, एमएनएम और दूसरे बड़े आर्टिस्ट के एलबम यहां से रिलीज हुए हैं। मुझे लगता है कि किसी इंडियन आर्टिस्ट के लिए यह बड़ा मौका है। मेरे लिए तो बहुत बड़ा अचीवमेंट है।

गाने का शौक कैसे और फिर एलबम लाने का इरादा क्यों हुआ? गाना ही था तो फिल्मों के लिए क्यों नहीं गाया?

सच कहूं तो मैं एक्टिंग के पहले से गीत गा रही हूं। पापा गायक रहे हैं। संगीत से हमारा वास्ता रहा है। उस तरफ ज्यादा ध्यान तब नहीं दे सकी। एक्टिंग में मेरा करियर 17 साल की उम्र में शुरू हो गया था, इसलिए गाने पर ध्यान नहीं गया। मुझे जब यूनिवर्सल से म्यूजिक के लिए अप्रोच किया गया तो मुझे लगा कि एक अच्छा प्लेटफार्म मिल रहा है, मैंने सोचा कि कर लेने में क्या हर्ज है? एक्टिंग तो कर ही रही हूं।

अग्निपथ और बर्फी के बारे में कुछ बताएंगी?

अग्निपथ में मैं काली की भूमिका निभा रही हूं। ओरिजनल फिल्म से यह किरदार बदल गया है। यह एक नया किरदार है। काली एक वेश्या की बेटी है, लेकिन वह वेश्यावृति में नहीं जाना चाहती। उसे विजय से प्यार है। विजय ही उसकी जिंदगी है। इस फिल्म में मैं एक चुलबुली मराठी लड़की का किरदार निभा रही हूं। वह मस्ती पसंद करती है। कुणाल कोहली की फिल्म का टाइटिल अभी तक नहीं मिला है। वह तीन युगों की कहानी है। तीन जन्मों में वह अपने प्रेमी से मिलती है। प्यार के रिश्ते में सात जन्मों की बात की जाती है, लेकिन यह फिल्म तीन जन्मों की है। कृष के बारे में अभी कुछ भी बताना जल्दबाजी होगी। कृष सुपरहीरो है और मैं उसका लव इंटरेस्ट हूं। कह सकती हूं कि अभी मेरे पास पर्याप्त काम है और हां, अनुराग बसु की बर्फी में ऑस्टिक गर्ल की भूमिका में हूं।

लगता है इंडस्ट्री ने हीरोइनों पर ध्यान देना शुरू किया है। इधर द डर्टी पिक्चर भी हिट हुई है और अब हीरोइन बन रही है?

मेरी लाइफ में तो फैशन आ चुकी है। इंडस्ट्री में आए चार साल भी नहीं हुए थे कि वह फिल्म मिली और उसके लिए अवार्ड भी मिले। अभी 7 खून माफ भी मैंने की। ठीक है कि फिल्म नहीं चली, लेकिन लोगों ने मेरे काम की तारीफ की। फिर कोई ऐसी फिल्म मिलेगी, तो जरूर करूंगी। इस बदलाव के बावजूद यह भी सच है कि इस इंडस्ट्री में पुरुषों की प्रधानता है। हमें पैसे कहां मिलते हैं। अगर मुख्य रोल है तो पैसे भी बढ़ने चाहिए। मुझे नहीं लगता कि ऐसी बराबरी कभी हीरोइनों को मिल पाएगी।

अभी की अभिनेत्रियों के लिए कितने काम हो गए हैं। फिल्मों के साथ बाकी सारी चीजें भी करनी पड़ती हैं। कैसे संतुलन बिठाती हैं?

मेरा मुख्य काम एक्टिंग है। यही मेरा पेशा है। फिल्म रहेंगी और चलेंगी, तभी दूसरी चीजें होती रहेंगी, इसलिए सबसे ज्यादा ध्यान फिल्मों पर देती हूं। बाकी मेरी एक टीम है, जो सभी चीजों और समय का ध्यान रखती है। अभी हमें क्या करना उनके लिए संतुलन बिठाना पड़ता है।

फिल्‍म समीक्षा : पप्‍पू कांट डांस साला

पप्पू कांट डांस साला: सिंपल प्रेम कहानी-अजय ब्रह्मात्‍मज

दो पृष्ठभूमियों से आए विद्याधर और महक संयोग से टकराते हैं। दोनों अपने सपनों के साथ मुंबई आए है। उनके बीच पहले विकर्षण और फिर आकर्षण होता है। सोच और व्यवहार की भिन्नता के कारण उनके बीच झड़प होती रहती है। यह झड़प ही उनके अलगाव का कारण बनता है और फिर उन्हें अपनी तड़प का एहसास होता है। पता चलता है कि वे एक-दूसरे की जिंदगी में दाखिल हो चुके हैं और साथ रहने की संतुष्टि चाहते हैं। ऐसी प्रेमकहानियां हिंदी फिल्मों के लिए नई नहीं हैं। फिर भी सौरभ शुक्ला की फिल्म पप्पू कांट डांस साला चरित्रों के चित्रण, निर्वाह और परिप्रेक्ष्य में नवीनता लेकर आई है।

सौरभ शुक्ला टीवी के समय से ऐसी बेमेल जोडि़यों की कहानियां कह रहे हैं। उनकी कहानियों का यह स्थायी भाव है। नायक थोड़ा दब्बू, पिछड़ा, भिन्न, कुंठित, जटिल होता है। वह नायिका के समकक्ष होने की कोशिश में अपनी विसंगतियों से हंसाता है। इस कोशिश में उसकी वेदना और संवेदना जाहिर होती है। पप्पू कांट डांस साला की मराठी मुलगी महक और बनारसी छोरा विद्याधर में अनेक विषमताएं हैं, लेकिन मुंबई में पहचान बनाने की कोशिश में दोनों समांतर पटरियों पर चले आते हैं। सौरभ शुक्ला ने एक सिंपल सी प्रेमकहानी सहज तरीके से चित्रित की है।

विनय पाठक ऐसे सिंपल चरित्र कई फिल्मों में निभा चुके हैं। अपनी इस इमेज से उन्हें कई फायदे हो जाते हैं। लेखक-निर्देशक भी अतिरिक्त दृश्यों से बच जाते हैं। समस्या वैसे दर्शकों के साथ हो सकती है, जो पहले से विनय पाठक और उनकी फिल्मों को नहीं जानते। नेहा धूपिया ने महक के किरदार को सुंदर तरीके से निभाया है। उन्होंने दृश्य की जरूरतों के मुताबिक बगैर मेकअप के शॉट देने में भी गुरेज नहीं किया है। महक के द्वंद्व और सोच को वह ढंग से अभिव्यक्तकरती हैं। रजत कपूर के किरदार पलाश को विस्तार नहीं मिल पाया है। संजय मिश्रा चंद दृश्यों की झलक में ही अपनी छटा छोड़ जाते हैं। पप्पू कांट डांस साला एक सीधी सरल फिल्म है, जो बासु चटर्जी और हृषीकेश मुखर्जी के दौर की फिल्मों से जुड़ती है।

रेटिंग- *** तीन स्टार

Thursday, December 15, 2011

फ‌र्स्ट लुक और प्रोमो

-अजय ब्रह्मात्‍मज

फर्स्‍ट लुक और प्रोमो....आजकल इसे एक इवेंट का रूप दे दिया जाता है। निर्माता-निर्देशक अपनी फिल्मों का फ‌र्स्ट लुक जारी करने के लिए किसी होटल या थिएटर में मीडिया को आमंत्रित करते हैं और फिर विभिन्न माध्यमों से फिल्म की चर्चा आरंभ होती है। छिटपुट रूप से ऐसी कोशिशें काफी सालों से की जा रही थीं, लेकिन आमिर खान ने गजनी की रिलीज के पहले इसका प्रोमो मीडिया के साथ शेयर किया था। साथ ही अपने विशेष लुक को देश के प्रमुख अखबारों के जरिए दर्शकों तक पहुंचाया था। तब से यह जोरदार तरीके से इंडिपेंडेंट इवेंट के तौर पर प्रचलित हुआ। फ‌र्स्ट लुक जारी करने का इवेंट अब कई स्तरों और रूपों में शुरू हो चुका है। कुछ निर्माता-निर्देशक सोशल मीडिया नेटवर्क का उपयोग कर रहे हैं। फ‌र्स्ट लुक प्रकट होते ही यह वायरस की तरह फैलता है। इसी से दर्शकों की पहली जिज्ञासा बनती है।

याद करें तो पहले पत्र-पत्रिकाओं में तस्वीरें और थिएटर में ट्रेलर चलते थे। पत्र-पत्रिकाओं में निर्देशक और फिल्म के प्रमुख स्टार्स के इंटरव्यू के साथ छपी तस्वीरों से दर्शकों का कयास आरंभ होता है। यहीं से संबंधित फिल्म के दर्शक बनने शुरू हो जाते हैं। कुछ पत्र-पत्रिकाओं में सचित्र फीचर छपते थे। किसी भी फिल्म के प्रति बनी जिज्ञासा का अध्ययन करें तो सबसे पहले घोषणा, फिर कलाकारों का चयन, निष्कासन, फेरबदल, मुहूर्त, शूटिंग की छिटपुट खबरें, सेट पर रोमांस, तनाव और झगड़ों की खबरें, पोस्ट-प्रोडक्शन और डबिंग की सूचनाएं, रिलीज की तारीख की घोषणा और आखिर में फ‌र्स्ट लुक और प्रोमो। जरूरी नहीं कि हर फिल्म के प्रचार अभियान में यही क्रम रखा जाए। फिर भी सारी फिल्में घोषणा से प्रदर्शक के बीच इन पड़ावों से गुजर कर ही दर्शकों तक पहुंचती हैं। दर्शक इस दरम्यान अपना मन बनाते रहते हैं। आदतन पहले दिन पहले शो के दर्शकों की बात छोड़ दें तो ज्यादातर दर्शक फ‌र्स्ट लुक और प्रोमो के आधार पर फिल्म देखने या नहीं देखने का फैसला करते हैं। रिलीज के बाद अखबारों और टीवी चैनलों के रिव्यू भी कई बार दर्शकों की हां या ना को बदलते हैं। कई बार फिल्म की हवा बन जाती है तो दर्शक उमड़ पड़ते हैं।

चूंकि दर्शकों को रिझाने और थिएटर में लाने के लिए फ‌र्स्ट लुक और प्रोमो निहायत जरूरी हो गए हैं। इसलिए अब उनके विशेषज्ञ भी सामने आ गए हैं। फ‌र्स्ट लुक और प्रोमो के लिए निर्माता-निर्देशक उनकी मदद लेते हैं। पब्लिसिटी डिजाइनर और प्रोमो स्पेश्लिस्ट के तौर पर मशहूर ये लोग इस फन में माहिर होते हैं। निर्देशक कई बार प्रोमो विशेषज्ञों के साथ बैठकर फिल्म के डिफरेंट प्रोमो तैयार करते हैं। कई अवसरों पर देखा गया है कि निर्माता प्रोमो के निर्माण में निर्देशक की मदद भी नहीं लेता। वह अपनी फिल्म के हित में दर्शकों को छलता है। इन दिनों दर्शकों को धोखा देने या बहकाने का सिलसिला बढ़ गया है। अक्सर प्रोमो आकर्षक और लुभावना होता है, लेकिन फिल्म घिसी-पिटी और बोरिंग निकलती है।

फिल्मों के विषय और स्टार वैल्यू के आधार पर ही फ‌र्स्ट लुक और प्रोमो तैयार किए जाते हैं। आमतौर पर स्टार, फिल्म का विषय और फिल्म की खासियत को ध्यान में रखा जाता है। कोशिश रहती है कि दर्शकों को कुछ नया दिखे। फिल्म के स्टार भी फ‌र्स्ट लुक और प्रोमो के कॉन्सेप्ट और निर्माण में बराबर का सहयोग देते हैं। फिल्म इंडस्ट्री में तीनों खान खुद तय करते हैं कि उनकी फिल्मों का फ‌र्स्ट लुक कैसा होगा और कौन सा प्रोमो कब चलाया जाएगा? निर्माता के निवेश से अधिक बड़ा दांव उनके स्टारडम का रहता है। वे नहीं चाहते कि कोई कसर रह जाए और एक भी दर्शक-प्रशंसक गुमराह हो।

फ‌र्स्ट लुक और प्रोमो ही दर्शकों को फिल्म देखने का पहला निमंत्रण देते हैं। फिल्म इंडस्ट्री में कहा जाता है कि दर्शक फ‌र्स्ट लुक और प्रोमो से ही सूंघ लेते हैं। उन पर आक्रामक प्रचार का भी असर नहीं होता। वे रिलीज के पहले ही तय कर चुके होते हैं कि फिल्म देखनी है या नहीं देखनी है? फिर भी रिझाने-लुभाने का सिलसिला जारी रहता है।

Tuesday, December 6, 2011

भोजपुरी सिनेमा में बदलाव की आहट


-अजय ब्रह्मात्‍मज

भोजपुरी फिल्मों की गति और स्थिति के बारे में हम सभी जानते हैं। इसी साल फरवरी में स्वर्णिम भोजपुरी समारोह हुआ। इसमें पिछले पचास सालों के इतिहास की झलक देखते समय सभी ने ताजा स्थिति पर शर्मिदगी महसूस की। अपनी क्षमता और लोकप्रियता के बावजूद भोजपुरी सिनेमा फूहड़ता के मकड़जाल में फंसा हुआ है। अच्छी बात यह है कि भोजपुरी सिनेमा के दर्शकों का एक बड़ा वर्ग है। बुरी बात यह है कि भोजपुरी सिनेमा में अच्छी संवेदनशील फिल्में नहीं बन रही हैं। निर्माता और भोजपुरी के पॉपुलर स्टार जाने-अनजाने अपनी सीमाओं में चक्कर लगा रहे हैं। वे निश्चित मुनाफे से ही संतुष्ट हो जाते हैं। वे प्रयोग के लिए तैयार नहीं हैं और मान कर चल रहे हैं कि भोजपुरी सिनेमा के दर्शक स्वस्थ सिनेमा पसंद नहीं करेंगे।

भोजपुरी सिनेमा के निर्माताओं से हुई बातचीत और पॉपुलर स्टार्स की मानसिकता को अगर मैं गलत नहीं समझ रहा तो वे भोजपुरी सिनेमा में आए हालिया उभार के भटकाव को सही दिशा मान रहे हैं। मैंने पॉपुलर स्टार्स को कहते सुना है कि अगर हम सीरियस और स्वस्थ होंगे तो भोजपुरी का आम दर्शक हमें फेंक देगा। सौंदर्य की स्थूलता और दिखावे पर अधिक भरोसा करने के साथ भड़कीले अंदाज को ही पाला-पोसा जाता है। हर फिल्म में कुछ ऐसा जोड़ दिया जाता है, जो अश्लीलता की हदों को आसानी से छूता है। थोड़ी देर के लिए मैं मान सकता हूं कि अधिकांश दर्शक इस अश्लीलता के आनंद के लिए ही भोजपुरी फिल्में देखते हैं, लेकिन इसके साथ ही क्या भोजपुरी सिनेमा उन दर्शकों को नहीं खो रहा है, जो अश्लीलता की वजह से भोजपुरी फिल्में ही नहीं देखते।

पिछले दिनों रामधारी सिंह दिवाकर की कहानी मखान पोखर पर बनी फिल्म सैयां ड्राइवर बीवी खलासी रिलीज हुई। इस फिल्म का शीर्षक आम भोजपुरी फिल्म का एहसास देता है। मखान पोखर में रेणु के बाद के उत्तर बिहार के समाज की आंचलिक झलक है। इस कहानी पर आधारित फिल्म के लेखक निलय उपाध्याय और निर्देशक अंजनी कुमार ने कहानी के मूल भाव को सुरक्षित रखते हुए उसके शीर्षक में चालू फिल्मों का आकर्षण रखा। मुमकिन है उनके ऊपर निर्माता या भोजपुरी सिनेमा के बाजार का दबाव हो, लेकिन उन्होंने फिल्म के कथ्य से समझौता नहीं किया। खबर है कि इस फिल्म को भोजपुरी सिनेमा के आम दर्शक ने अधिक पसंद नहीं किया, लेकिन इसे कुछ नए दर्शक मिले। साथ ही भोजपुरी के उन नियमित दर्शकों को संतुष्टि हुई, जो बेहतरीन सिनेमा की आस में थे।

मैंने हाल ही में देसवा देखी। इस फिल्म के निर्देशक नितिन चंद्रा के वक्तव्यों और बयानों के बावजूद मैं फिल्म के प्रति आशंकित था। नितिन लगातार समकालीन भोजपुरी सिनेमा की भ‌र्त्सना कर रहे थे, लेकिन अपनी फिल्म के बारे में ज्यादा कुछ नहीं बता रहे थे। देसवा को आरंभिक रूप में देख चुके कुछ मित्रों ने इसे पसंद नहीं किया था। अभी देसवा जिस रूप में प्रदर्शित हो रही है, वह अपनी अंतर्निहित सीमाओं के बावजूद आशान्वित करती है कि भोजपुरी में बेहतर सिनेमा की उम्मीद खत्म नहीं हुई है। देसवा भोजपुरी में बनी एक शिष्ट फिल्म है। साथ ही यह अपने निकट अतीत और वर्तमान की बातें करती हैं। भाषा और लोक परंपरा के नाम पर यह भदेस और फूहड़ नहीं हुई है, अभिनय के स्तर पर भी यह फिल्म अन्य भाषाओं की फिल्मों के समकक्ष है। निर्देशक नितिन चंद्रा और निर्माता नीतू चंद्रा के इस महत्वपूर्ण प्रयास की सराहना की जानी चाहिए। भोजपुरी सिनेमा के बाजार को उदारता दिखाते हुए देसवा को जगह देनी चाहिए। देसवा के प्रदर्शन की दिक्कतों को दूर कर उसे आम दर्शकों तक पहुंचने की राह सुगम करनी चाहिए। भोजपुरी में देसवा जैसी फिल्मों की भी जरूरत है

Monday, December 5, 2011

देव आनंद :मौत ने तोड़ दी एक हरी टहनी

-अजय ब्रह्मात्‍मज

किताबों,पत्रिकाओं,फिल्मों और विचारों से भरे दफ्तर के कमरे में बिना नागा हर दिन देव आनंद आते थे। अपना फोन खुद उठाना और खास अंदाज में हलो के साथ स्वागत करना ़ ़ ़मूड न हो तो कह देते थे देव साहब अभी नहीं हैं। बाद में फोन कर लें। अगर आप उनकी आवाज पहचानते हों तो उनके इस इंकार से नाराज नहीं हो सकते थे,क्योंकि वे जब बातें करते थे तो बेहिचक लंबी बातें करते थे।

पिछले कुछ सालों से उन्होंने मिलना-जुलना कम कर दिया था। अपनी फिल्मों की रिलीज के समय वे सभी को बुलाते थे। पत्रकारों को वे नाम से याद रखते थे और उनके संबोधन में एक आत्मीयता रहती थी। बातचीत के दरम्यान वे कई दफा हथेली थाम लेते थे। उनकी पतली जीर्ण होती उंगलियों और नर्म हथेली में गर्मजोशी रहती थी। वे अपनी सक्रियता और संलग्नता की ऊर्जा से प्रभावित करते थे। इस उम्र में भी उनमें एक जादुई सम्मोहन था।

देव आनंद ने अपने बड़े भाई चेतन आनंद से प्रेरित होकर फिल्मों में कदम रखा। आरंभ में उनका संपर्क इप्टा के सक्रिय रंगकर्मियों से रहा। नवकेतन की पहली ही फिल्म अफसर की असफलता से उन्हें हिंदी फिल्मों में मनोरंजन की महत्ता को समझ लिया। बाद में बाजी की सफलता ने उनके विश्वास को पक्का कर दिया। उन्होंने नवकेतन के बैनर तले मनोरंजक फिल्मों का निर्माण किया। अपने समकालीन राज कपूर और दिलीप कुमार से अलग उन्होंने शहरी युवक की ज्यादा भूमिकाएं निभाई। ऐसा शहरी युवक जो समाज के स्याह हाशिए पर रहता है और अपने सरवाइवल के लिए गैरकानूनी काम करने से भी नहीं हिचकता।

आज के स्याह और ग्रे चरित्रों से भिन्न देव आनंद की फिल्मों के नायकों का एक सामाजिक आधार और लॉजिक रहता था। पहनावे,बोलचाल और अंदाज में उन्हें आजादी के बाद शहरों में तेजी से सपनों के साथ बड़े हो रहे युवकों के प्रतिनिधि के तौर पर देखा जा सकता है। उनकी लोकप्रियता का अनुमान आज के पाठक और दर्शकनहीं लगा सकते। वैसी लोकप्रियता के पासंग में केवल राजेश खन्ना और रितिक रोशन पहुंच पाए। श्वेत-श्याम फिल्मों के दौर में देव आनंद के व्यक्तित्व का ऐसा जादू था कि उनके बाहर निकलने और काले कपड़े पहनने पर पाबंदी लगा दी गई थी।

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में किसी जमाने में पॉपुलर रह रात कपूर,दिलीप कुमार और देव आनंद की त्रयी में सबसे लंबी और सक्रिय पारी देव आनंद की ही रही। बतौर एक्टर उन्होंने 114 फिल्मों में काम किया। उन्होंने 31 फिल्मों का निर्माण् किया और 19 फिल्मों के स्वयं निर्देशक रहे। उन्होंने अनेक प्रतिभाओं को पहला मौका दिया और फिल्म इंडस्ट्री में जगह बनाने के अवसर दिए। कभी किसी से बदले में न कुछ मांगा और न लिया। आखिरी दिनों में मशहूर हस्तियां उनकी फिल्मों का हिस्सा बनने से किनारा करने गी थीं तो उनकी मायूसी झलक जाती थी,लेकिन उन्होंने कभी किसी की शिकायत नहीं की और न ही अपनी अपेक्षाओं को जाहिर होने दिया। सुरैया से शादी न कर पाने की कसक ताजिंदगी रही। उन्होंने अभिनेत्रियों से अपने प्रेम और भाव को नहीं छिपाया। अपनी आत्मकथा में जीवन के सभी प्रसंगों को उन्होंने विस्तार से लिखा।

ग्लैमर की इस दुनिया में रहने के बावजूद उनका जीवन एकाकी था। कहना मुश्किल है कि उन्होंन साथ छोड़ा या उनक ा हमसफर रहे लोगों ने खुद राह बदल ली,लेकिन सच है कि वे अकेले हो गए थे। वे कहते थे,मैं एकान्त में रहना चाहता हूं। मैं काम करते रहना चाहता हूं।फालतू बातों के लिए वक्त नहीं है मेरे पास। मैं इसे ठीक से नहीं बता सकता। यही मरा स्वभाव है। शायद इसी कारण मैं देव आनंद हूं। फिल्में उनके साथ रहीं और वे फिल्मों में डूबे रहे। अंतिम फिल्म चार्ज शीट की रिलीज के समय उन्होंने कहा था कि मैं चुप नहीं बैठूंगा। मैं एक म्यूजिकल फिल्म बनाना चाहता हूं। साथ ही हरे कृष्णा हरे राम को आज के युवकों के लिए नए रूप में पेश करना चाहता हूं। रोहन सिप्पी की फिल्म दम मरो दम में अपनी फिल्म के गाने के इस्तेमाल से वे दुखी हुए थे। उनका मानना था कि पुरानी फिल्मों और गानों के साथ छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए।

ऐसा लग रहा है कि सदाबहार पेड़ की हरी टहनी किसी ने अचानक तोड़ दी है। इस टहनी के सारे पत्ते हरे हैं और फूल खिले हैं। 88 की उम्र में भी कुछ नया करने के लिए बेताब देव आनंद का दिल हमेशा जवान और हरा रहा। देव आनंद ने अपने ऊपर उम्र की थकान और बीमारी को कभी हावी नहीं होने दिया। उनकी किसी लंबी या गंभीर बीमारी की कभी कोई खबर नहीं आई। पिछली रात नींद में ही उन्होंने हमें अलविदा कह दिया।

उनकी इेमज और बेफिक्र व्यक्तित्व के संबंध में एक पुराने इंटरव्यू के प्रासंगिक अंश ़ ़ ़

-आपका अलहदा बेफिक्र व्यक्तित्व कैसे बना?

यह मैंने सोचा नहंी था। फिल्मों और दर्शकों की प्रतिक्रियाओं से हमारा व्यक्तित्व बनता है। जिद्दी,बाजी और टैक्सी ड्रायवर से शहरी और बेफ्रिक इमेज बनी। दर्शकों को इा रूप में मैं अच्छा लगा तो मैंने और मेरे निर्देशकों ने उसी इमेज के अलग-अलग शेड्स फिल्मों में रखे। मेरी खास इमेज विकसित हुई।

जिद्दी से आपको सफलता और इमेज दोनों मिली। आ ने शहरी और थोड़े निगेटिव किरदार निभाए। आश्चर्य है कि तब भी लोगों ने आपको पसंद किया?

सही बात है कि जिद्दी से सफलता और पहचान दोनेां मिली। बांबे टाकीज की वह फिल्म थी। अशोक कुमार ने वह फिल्म दी थी। जिद्छी के बाद आई बाजी में मेरे लिए रोल लिखा गया। बलराज याहनी ने बाजी लिखी थी। बाजी से मिली इमेज ही आगे बढ़ती गई।टैक्सी ड्रायवर,काला पानी,काला बाजार में भी निगेटिव किरदार थे। जाल में भी गुरूदत्त ने निगेटिव किरदार दिया। आप देखें की गाइड का किरदार भी निगेटिव है। उस समय दूसरे की बीवी के साथ रहना साहसी विषय था।

आप के चरित्र समाज के अंधेरे इलाके से आते थे,लेकिन दिल से वे अच्छे होते थे। यह कोशिश होती थी कि फिल्म के अंत में उनका दिल बदल जाए।

लोग उन चरित्रों से खुद को जोंड़ कर देखते थे। मुझे लगता है कि मैं शहर के स्माट्र और चालाक युवक का प्रतिनिधित्व कर रहा था,जो अपने सरवाइवल के लिए छोटे-मोटे गैरकानूनी काम भी कर लेता है। इसके बावजूद वह दिल का अच्छा और नेक है। यह फिल्म की स्क्रिप्ट पर निर्भर करता था कि उसे कैसे और क्या रूप देना है। यह कहना गलत होगा कि हमें दर्शकों की रुचि मालूम थी। दर्शकों की रुचि मालूम हो तो सारे लोग हिट ही बना दें। हम लोग तो आजमाते रहते थे। कोशिश यह रहती थी कि वे किरदार दर्शकों को अपने करीब के लगें

Friday, December 2, 2011

फिल्‍म समीक्षा : द डर्टी पिक्‍चर


-अजय ब्रह्मात्‍मज

गांव से भागकर मद्रास आई रेशमा की ख्वाहिश है कि वह भी फिल्मों में काम करे। यह किसी भी सामान्य किशोरी की ख्वाहिश हो सकती है। फर्क यह है कि निरंतर छंटनी से रेशमा की समझ में आ जाता है कि उसमें कुछ खास बात होनी चाहिए। जल्दी ही उसे पता चल जाता है कि पुरुषों की इस दुनिया में कामयाब होने के लिए उसके पास एक अस्त्र है.. उसकी अपनी देह। इस एहसास के बाद वह हर शर्म तोड़ देती है। रेशमा से सिल्क बनने में उसे समय नहीं लगता। पुरुषों में अंतर्निहित तन और धन की लोलुपता को वह खूब समझती है। सफलता की सीढि़यां चढ़ती हुई फिल्मों का अनिवार्य हिस्सा बन जाती है।

निर्माता, निर्देशक, स्टार और दर्शक सभी की चहेती सिल्क अपनी कामयाबी के यथार्थ को भी समझती है। उसके अंदर कोई अपराध बोध नहीं है, लेकिन जब मां उसके मुंह पर दरवाजा बंद कर देती है और उसका प्रेमी स्टार अचानक बीवी के आ टपकने पर उसे बाथरूम में भेज देता है तो उसे अपने दोयम दर्जे का भी एहसास होता है।

सिल्क के बहाने द डर्टी पिक्चर फिल्म इंडस्ट्री के एक दौर के पाखंड को उजागर करती है। साथ ही डांसिंग गर्ल में मौजूद औरत के दर्द को भी जाहिर करती है। मिलन लुथरिया ने द डर्टी पिक्चर में विद्या बालन की अद्वितीय प्रतिभा का समुचित उपयोग किया है। हिंदी फिल्मों में हाल-फिलहाल में ऐसी साहसी अभिनेत्री नहीं दिखी है। विद्या बालन ने सिल्क के किरदार में खुद को ढाल दिया है। इन दिनों हर एक्टर कैरेक्टर में ढलने के लिए अपने रंग रूप में परिवर्तन लाते हैं, लेकिन वह ज्यादातर कास्मेटिक चेंज ही होता है। विद्या ने भद्दी दिखने की हद तक खुद को बदला है। यह उनकी अभिनय प्रतिभा और निर्देशक की दृश्य संरचना की खूबी है कि अंग प्रदर्शन और कामुक भाव मुद्राओं के बावजूद विद्या अश्लील नहीं लगतीं। पहले आयटम गीत में दर्शकों को रिझाने के लिए प्रदर्शित उनकी उत्तेजक मुद्राएं भी स्वाभाविक लगती हैं। विद्या की संवेदनशीलता और संलग्नता से अश्लील उद्देश्य से रचे गए दृश्यों में भी स्त्री देह का सौंदर्य दिखता है। ऐसा लगता है कि किसी शिल्पकार ने बड़े यत्‍‌न से कोई सौंदर्य प्रतिभा गढ़ी हो। दरअसल, निर्देशक की मंशा देह दर्शन और प्रदर्शन की नहीं है। वह उस देह में मौजूद औरत को उसे संदर्भो के साथ चित्रित करने में लीन है। विद्या बालन ने निर्देशक मिलन लुथरिया के साथ मिलकर पर्दे पर उस औरत को जीवंत कर दिया है। फिल्म के दौरान विद्या बालन याद नहीं रहती। हमारे सामने सिल्क रहती है, जो दर्शकों को एंटेरटेन करने आई है। विद्या ने इस फिल्म में अभिनय का मापदंड ऊंचा कर दिया है।

द डर्टी पिक्चर निर्देशक-लेखक के संयुक्त प्रयास की सम्मलित सफलता है। मिलन लुथरिया और रजत अरोड़ा की परस्पर समझदारी और सहयोग ने फिल्म को मजबूत आधार दिया है। फिल्म के संवाद बहुत कुछ कह जाते हैं। द डर्टी पिक्चर के संवाद अलग मायने में द्विअर्थी हैं। इसका दूसरा अर्थ मारक है और सीधे चोट करता है और झूठ पाखंड की कलई खोल देता है। उन संवादों को विद्या बालन ने सार्थक ढंग से उचित ठहराव, जोर और भाव के साथ अभिव्यक्त किया है। समकालीन अभिनेत्रियों को विद्या से संवाद अदायगी का सबक लेना चाहिए।

द डर्टी पिक्चर में विद्या बालन के बराबर में नसीरुद्दीन शाह, इमरान हाशमी, तुषार कपूर और अन्य कलाकार हैं। निश्चित ही नसीरुद्दीन शाह ने सूर्यकांत के सटीक चित्रण से सिल्क के किरदार को और मजबूती दी है। इमरान हाशमी और तुषार कपूर अपेक्षाकृत कमजोर अभिनेता हैं और उनकी कमियां इस फिल्म में भी दिखती हैं। सहयोगी कलाकारों की सहजता से फिल्म को विश्वसनीयता मिली है।

मिलन लुथरिया ने इस पीरियड फिल्म में प्रापर्टी और सेट को हावी नहीं होने दिया है। फिल्म के किरदारों के साथ हम तीस साल पहले के परिवेश में जाते हैं। फिल्म का गीत-संगीत भी उसी दौर का है। गीतों के फिल्मांकन में भी मिलन ने उस दौर की प्रवृत्तियों को ध्यान में रखा है। इमरान और विद्या पर फिल्माया गया इश्क सूफियाना अनावश्यक और ठूंसा हुआ लगता है। फिल्म यहीं थोड़ी कमजोर भी पड़ती है, जब दो विरोधी चरित्रों को लेखक-निर्देशक जोड़ने की कोशिश करते हैं। इस फिल्म की खूबी है कि आम और खास दर्शकों को अलग-अलग कारणों से एंटरटेन कर सकती है।

**** चार स्टार