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Friday, October 28, 2011

अकेली औरत की दो बेटियां

द्वंद्व और संघर्ष के बीच संवारी जिंदगी-अजय ब्रह्मात्‍मज

कभी ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी हिंदी फिल्मों की नंबर वन हीरोइन थीं। उनकी फिल्मों के लाखों-करोड़ों दीवाने थे। हेमा मालिनी ने अपने करियर केउत्कर्ष के दिनों में दर्जनों सहयोगी स्टारों को भी अपना दीवाना बनाया, लेकिन शादी धर्मेन्द्र के साथ की।

धर्मेन्द्र पहले से शादीशुदा थे। उन्होंने सुविधा के लिए धर्म बदल कर हेमा मालिनी से शादी तो कर ली, लेकिन उन्हें अपने घर नहीं ले जा सके। उनकी पहली पत्नी और बेटों ने हेमा मालिनी को परिवार में जगह नहीं दी। हेमा मालिनी शादी के बाद भी अकेली रहीं। अकेली औरत की जिंदगी जी। उन्होंने अपना घर बसाया, जहां धर्मेन्द्र सुविधा या आवश्यकता के अनुसार आते-जाते रहे।

हेमा मालिनी और धर्मेन्द्र की प्रेम कहानी और दांपत्य के बारे में वे दोनों ही बेहतर तरीकेसे बता सकते हैं। बाहर से जो दिखाई पड़ता है, उससे स्पष्ट है कि हेमा मालिनी ने अकेले ही अपनी जिंदगी संवारी और पिता के साये से वंचित बेटियों ऐषा और आहना को पाला। सभी जानते हैं कि आज भी धर्मेन्द्र के परिवार और हेमा मालिनी के परिवार में सार्वजनिक मेलजोल या संबंध नहीं है।

हेमा मालिनी ने अपने अभिनय करियर का उत्कर्ष देखा। बाद में नृत्य नाटिकाओं में उन्होंने अपनी नृत्य साधना के नए आयाम खोजे। पॉलिटिक्स में आई, तो भाजपा से जुड़ीं। भाजपा ने उनकी लोकप्रियता का पूरा उपयोग किया। छोटी-मोटी जिम्मेदारियां दीं और अपनी सांस्कृतिक गतिविधियों में उन्हें व्यस्त रखा। हेमा मालिनी आज भी काफी व्यस्त हैं। उन्होंने अपनी बेटियों को नृत्य का शिक्षा दी और अपने साथ मंच पर उतारा। उनकी नृत्य नाटिकाओं में ऐषा और आहना की सक्रिय भूमिकाएं रहती है। अभी पिछले दिनों ही अपनी बेटियों के साथ उन्होंने न्यूयार्क में डांस परफॉर्मेस दिया।

बेटी ऐषा देओल ने अभिनय में रुचि दिखाई और फिल्मों में आने की उत्सुकता जाहिर की तो मां का सपोर्ट मिला। पिता धर्मेन्द्र नहीं चाहते थे कि ऐषा फिल्मों में आएं। इस पर रिसर्च होना चाहिए कि आखिर क्यों अभिनेता नहीं चाहते कि उनकी बेटियां फिल्म अभिनेत्री बनें, जबकि मां बन चुकी अभिनेत्रियों को इसमें कोई दिक्कत नहीं होती। बहुत कम पिताओं ने बेटियों के फिल्मों में आने का फैसले का समर्थन किया और उन्हें सहयोग दिया। याद नहीं आता कि किसी ने अपनी बेटी को लॉन्च करने के लिए कोई फिल्म बनाई हो, जबकि बेटे की लॉन्चिग का बड़ा हंगामा होता है।

कहीं न कहीं यह हमारी सोच और समाज की विडंबना है। देओल परिवार इसका अपवाद नहीं है। कपूर परिवार, खान परिवार और बच्चन परिवार की बेटियों ने फिल्मों में कोशिश ही नहीं की। सबसे पहले करिश्मा और फिर करीना कपूर ने खानदान के रिवाज को तोड़ा। बहरहाल, ऐषा, आहना और हेमा मालिनी को धर्मेन्द्र और देओल परिवार से केवल सरनेम मिला, बाकी सारा संघर्ष उन्हें खुद करना पड़ा। हेमा मालिनी की जिंदगी इस संदर्भ किसी दूसरी भारतीय औरत से अलग और श्रेष्ठ नहीं है। जुहू के बंगलों के भीतर उन्हें कितने अपमान और ताने सहने पड़े होंगे, उन पर कितनी फब्तियां कसी गई होंगी? उनकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। हेमा मालिनी ने इस सामाजिक द्वंद्व और विडंबना के बीच अपना सिर ऊंचा रखा। पिता के परिवार से समर्थन नहीं मिलने पर भी उन्होंने बेटियों को उनकी मर्जी का काम करने दिया। अभी उन्होंने बेटी ऐषा के लिए टेल मी ओ खुदा का निर्माण और निर्देशन किया है। हालांकि इस फिल्म में धर्मेन्द्र भी हैं, लेकिन साफ दिखता है कि उनकी मौजूदगी महज एक औपचारिक दबाव ही है। इस फिल्म की रिलीज और मार्केटिंग में वे हेमा मालिनी की कोई मदद नहीं कर रहे हैं। उनके होम प्रोडक्शन विजयता फिल्म्स का टेल मी ओ खुदा से कुछ भी लेना-देना नहीं है।

दरअसल, ड्रीम गर्ल के इस द्वंद्व और दर्द को समझने की जरूरत है। मुझे लगता है कि हेमा मालिनी के अस्मिता के इस संघर्ष का मूल्यांकन होना चाहिए और देखना चाहिए कि ग्लैमर, रसूख और लोकप्रियता के बावजूद हेमा मालिनी जैसी औरतें आज भी कितनी आजाद हो सकी हैं?

Monday, October 24, 2011

नए अंदाज का सिनेमा है रा. वन - अनुभव सिन्‍हा

-अजय ब्रह्मात्‍मज

रा. वन में विजुअल इफेक्ट के चार हजार से अधिक शॉट्स हैं। सामान्य फिल्म में दो से ढाई हजार शॉट्स होते हैं। विजुअल इफेक्ट का सीधा सा मतलब है कि जो कैमरे से शूट नहीं किया गया हो, फिर भी पर्दे पर दिखाई पड़ रहा हो। 'रा. वन' से यह साबित होगा कि हम इंटरनेशनल स्टैंडर्ड के विजुअल इफेक्ट कम लागत में भारत में तैयार कर सकते हैं। अगर 'रा. वन' को दर्शकों ने स्वीकार कर लिया और इसका बिजनेस फायदेमद रहा तो भारत में दूसरे निर्माता और स्टार भी ऐसी फिल्म की कोशिश कर पाएंगे।

भारत में 'रा. वन' अपने ढंग की पहली कोशिश है। विश्व सिनेमा में बड़ी कमाई की फिल्मों की लिस्ट बनाएं तो ऊपर की पाच फिल्में विजुअल इफेक्ट की ही मिलेंगी। भारत में 'रा. वन' की सफलता से क्रिएटिव शिफ्ट आएगा। यह भारत में होगा और मुझे पूरा विश्वास है कि यह हिंदी में होगा।

ऐसी फिल्म पहले डायरेक्टर और लेखक के मन में पैदा होती हैं। डायरेक्टर अपनी सोच विजुअल इफेक्ट सुपरवाइजर से शेयर करता है। इसके अलावा विजुअल इफेक्ट प्रोड्यूसर भी रहता है। इस फिल्म में दो सुपरवाइजर हैं। एक लास एंजल्स के हैं और दूसरे यहीं के। आम शूटिंग में जो रोल कैमरामैन प्ले करते हैं, वही रोल विजुअल इफेक्ट सुपरवाइजर का होता है। मान लीजिए, मैंने माग रखी कि मेरा एक कैरेक्टर आग के बीच से आता दिखाई पड़े। अब विजुअल इफेक्ट डायरेक्टर तय करेगा कि कैसे आर्टिस्ट को चलना है, कैसे आग शूट करना है और कैसे दोनों में मेल बिठाना है, ताकि दर्शक आर्टिस्ट को आग के बीच से आते देखकर रोमाचित हों।

विजुअल इफेक्ट दो प्रकार के होते हैं। एक में तो दर्शकों को मालूम रहता है कि यह विजुअल इफेक्ट ही है जैसे कि हवा में उड़ना या ऊंची बिल्डिंग से कूदना, लेकिन आग के बीच से आर्टिस्ट के निकलने के शॉट में पता नहीं चलना चाहिए कि विजुअल इफेक्ट है। 'जुरासिक पार्क' में अगर डायनासोर को देखते समय विजुअल इफेक्ट दिमाग में आ जाता तो मजा चौपट हो जाता।

'रा. वन' एक बाप-बेटे की कहानी है, जिसमें बाप सुपर हीरो बन जाता है। बेसिक इमोशनल फिल्म है। इस फिल्म में सुपरहीरो थोपा नहीं गया है। बच्चा, मा और सुपरहीरो तीनों ही कहानी में गुथे हुए हैं। बाप-बेटे का रिश्ता बहुत उभर कर आया है। सक्षेप में कहूं तो यह भारतीय सुपरहीरो की फिल्म है। उसकी एक फैमिली भी है। फिल्म की कहानी लदन से शुरू होती है, भारत आती है और फिर लदन जाती है।

इस फिल्म में 'रा. वन' को व्यक्तिगत तकलीफ दे दी गई है। वह तबाही पर उतारू है। इस फिल्म के लिए शाहरुख ने न कर दिया होता तो मैं लिखता भी नहीं। मैं तो प्रोड्यूसर शाहरुख खान के पास गया था। मुझे मालूम था कि प्रोड्यूसर मिला तो स्टार मिल ही जाएगा। मुझे कमिटमेंट चाहिए था। वह विजन के साथ जुड़े। तीन साल पहले 2008 में हमने 100 करोड़ की फिल्म की कल्पना की थी। मुझे ऐसा प्रोड्यूसर-एक्टर चाहिए था, जो फिल्म से जुड़े और दिल से जुड़े। इस फिल्म में दुनिया के मशहूर और अनुभवी तकनीशियनों को जोड़ा गया है। उन सभी के योगदान से फिल्म बहुत बड़ी हो गई है।

'रा. वन' शीर्षक की कहानी भी दिलचस्प है। मैं एक ऐसे खलनायक की कल्पना कर रहा था, जो अभी तक के सभी खलनायकों से अधिक खतरनाक हो। मैंने यूं ही कहा कि 10 खूाखार दिमाग मिला दें तो वह तैयार हो। वहीं से 10 सिरों के रावण का ख्याल आया और हमारे विलेन का नाम 'रा. वन' पड़ा। वही बाद में फिल्म का शीर्षक हो गया। हीरो का नाम 'जी. वन' रखने में थोड़ी परेशानी जरुर हुई, क्योंकि जीवन नामक एक्टर निगेटिव भूमिकाएं करते थे। वैसे जीवन मतलब जिंदगी है, इसलिए 'रा. वन' के खिलाफ 'जी. वन' की कल्पना अच्छी लगी।

Tuesday, October 18, 2011

बेटी एषा को निर्देशित किया हेमा मालिनी ने

-अजय ब्रह्मात्‍मज

शाहरुख खान हेमा मालिनी को अपना पहला निर्देशक मानते हैं। पहली बार शाहरुख ने उनकी फिल्म दिल आशना है के लिए ही कैमरा फेस किया था। अब 19 सालों बाद हेमा ने टेल मी ओ खुदा के साथ फिर से निर्देशन की कमान संभाली है। इस बार हेमा के कैमरे के सामने उनकी बड़ी बेटी एषा देओल हैं।

हेमा मालिनी कहती हैं, ''मुझे लगता है कि एषा को उसके टैलेंट के मुताबिक रोल नहीं मिले। वह ट्रेंड डांसर है और इमोशनल सीन भी अच्छी तरह करती है। मणि रत्नम की फिल्म युवा के छोटे से रोल में भी उसने अपनी प्रतिभा दिखाई थी। मैंने जब देखा कि वह गलत फिल्में कर और भी फंसती जा रही है तो मुझे सलाह देनी पड़ी। टेल मी ओ खुदा में एषा को आप नए अंदाज में देखेंगे। इस फिल्म में उसने डांस, एक्शन और इमोशन सीन किए हैं।''

हेमा पहले इस फिल्म से बतौर प्रोड्यूसर जुड़ीं। उन्होंने क्रिएटिव फैसलों में भी दखल रखा, लेकिन निर्देशन के लिए मयूर पुरी को चुना और उन्हें पूरी छूट दी। फिल्म के आरंभिक हिस्से देखने पर हेमा मालिनी को संतुष्टि नहीं मिली और उन्होंने निर्देशन की बागडोर अपने हाथों में ले ली।

टेल मी ओ खुदा एक ऐसी लड़की की कहानी है, जिसे पता चलता है कि वह गोद ली हुई बेटी है। इसके बाद वह अपने पिता की तलाश में देश-दुनिया में भटकती है। इस सफर में वह तीन संभावित प्रौढ़ों से मिलती है। आखिरकार उसकी मुलाकात अपने पिता से होती है, लेकिन वह अपने जीवन में आए पिता सरीखे दूसरे व्यक्तियों को नहीं भूल पाती।

हेमा खुश हैं कि एषा के पिता की भूमिकाओं के लिए उन्हें विनोद खन्ना, फारूख शेख, ऋषि कपूर और धर्मेन्द्र का सहयोग मिला। चूंकि फिल्म अभिनेत्री प्रधान है, इसलिए सहयोगी भूमिकाओं में अपेक्षाकृत छोटे स्टार अर्जन बाजवा और चंदन राय सान्याल का चुनाव किया गया है।

दो फिल्मों के अपने अनुभवों को शेयर करते हुए हेमा मालिनी कहती हैं, ''पहले हम लोग फिल्म बना कर ही अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाते थे। अभी मार्केटिंग और प्रमोशन के लिए भी जूझना पड़ता है।'' उन्हें इस बात की प्रसन्नता है कि फिल्म इंडस्ट्री के भरोसेमंद दोस्तों ने हमेशा उनका साथ दिया। टेल मी ओ खुदा के प्रमोशनल गीत के लिए सलमान खान ने समय दिया तो म्यूजिक लॉन्च के लिए शाहरुख खान आए।

Monday, October 17, 2011

रा. वन पर लगा शाहरुख खान का दांव

-अजय ब्रह्मात्मज

इन दिनों मुंबई में हर हफ्ते दो-तीन ऐसे इवेंट हो रहे हैं, जिनका 'रा. वन' से कोई न कोई ताल्लुक रहता है। टीवी शो और खबरों में भी शाहरुख खान छाए हुए हैं। कोशिश है कि हर दर्शक के दिमाग में 'रा. वन' की जिज्ञासा ऐसी छप जाए कि वह सिनेमाघरों की तरफ मुखातिब हो।

अभी तक की सबसे महंगी फिल्म 'रा. वन' की लागत 200 करोड़ को छू चुकी है। इस लागत की भरपाई के लिए 250 करोड़ का बिजनेस लाजिमी होगा। इरोस इस फिल्म के 4000 प्रिंट्स जारी करेगा। कोशिश है कि अमेरिका, इंग्लैंड और जर्मनी के पारंपरिक पश्चिमी बाजार के साथ इस बार पूरब के बाजार कोरिया, ताइवान और चीन में भी प्रवेश किया जाए। कोरिया में 'माई नेम इज खान' से मिले मार्केट को बढ़ाने के लिए 100 स्क्रीन पर 'रा. वन' लगाई जाएगी। यूरोप और लैटिन अमेरिका के बाजार पर भी शाहरुख की नजर है।

वैसे शाहरुख के लिए असल चुनौती देसी बाजार में घुसने की है। पिछले महीनों में 100 करोड़ का आंकड़ा पार करने वाली फिल्मों का अधिकांश कलेक्शन सिंगल स्क्रीन थिएटर और छोटे शहरों से आया है। इन दिनों सिंगल स्क्रीन थिएटर के आम दर्शक 60-70 प्रतिशत का योगदान कर रहे हैं। इन आम दर्शकों के बीच शाहरुख खान अधिक पॉपुलर नहीं हैं। उन्होंने अपनी फिल्मों से शहरी हीरो की इमेज हासिल की है। उनकी ब्रांडिंग और एक्टिविटी भी मैट्रो और विदेशों के दर्शकों को ध्यान में रख कर की जाती है। ऐसे में अपेक्षित आंकड़े तक उनका पहुंचना बहुत बड़ी चुनौती होगी।

शाहरुख खान ने इस चुनौती और अघोषित ललकार से बचने का सुरक्षित रास्ता चुना है। वह दूसरे खानों से अपने मुकाबले की बात चलने या बॉक्स ऑफिस कलेक्शन में 100 करोड़ की रकम पार करने के सवाल पर गोल-मोल जवाब देने लगते हैं। वह बिल के बजाए दिल की बातें करने लगते हैं और दावा करते हैं कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के विकास और भारत के गौरव के लिए उन्होंने यह फिल्म बनाई है। वह शुरू से कह रहे हैं कि फिल्म का बजट काफी बढ़ गया है और वह अपना सारा धन इसमें लगा चुके हैं। अपने चुटीले अंदाज में वे यह कहने से भी नहीं चूकते कि अगर 'रा. वन' से लाभ नहीं हो सका तो वे शादी-ब्याह में नाच कर उसकी भरपाई कर लेंगे। शादी का मौसम आने ही वाला है। यूं तो एक ट्रेड पंडित के मुताबिक शादी ब्याह में नाचने के पैसे तभी ज्यादा मिलते हैं, जब आपकी फिल्में चल रही हों। इस क्षेत्र में भी शाहरुख खान का भाव 7 करोड़ से गिर कर 4 करोड़ पर आ गया है।

फिल्म ट्रेड के विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रोडक्ट एंडोर्समेंट, डिजीटल राइट और दूसरे किस्म के एसोसिएशन से 'रा. वन' की लागत की बड़ी रकम वापस आ जाएगी, फिर भी बॉक्स ऑफिस कलेक्शन मायने रखता है। उसी के आधार पर स्टार पावर आंका जाता है। बाजार तो पहले से शाहरुख खान के सपोर्ट में है, लेकिन असल परीक्षा सिनेमाघरों में होगी। यहां आमिर, सलमान और अजय उनसे आगे निकल चुके हैं। शाहरुख खान की फिल्मों के कलेक्शन देखें तो 'रब ने बना दी जोड़ी' ने 87 करोड़, 'ओम शांति ओम' ने 79 करोड़ और 'माई नेम इज खान' ने 72 करोड़ का व्यवसाय किया। अपनी बादशाहत बरकरार रखने के लिए जरूरी हो गया है कि किंग खान की 'रा. वन' पहले ही हफ्ते में जादुई आंकड़ा पार करते हुए जल्द से जल्द 100 करोड़ का बिजनेस करे।

'रा. वन' की तकनीकी और स्पेशल इफेक्ट गुणवत्ता का उल्लेख किया जा रहा है। शाहरुख खान ने एक अच्छा काम किया है कि इतनी बड़ी फिल्म उन्होंने भारत में बनाई। अगर 'रा. वन' दर्शकों को पसंद आती है तो इसे कल्ट और ट्रेंड बनने में समय नहीं लगेगा। फिलहाल सब कुछ 26 अक्टूबर तक अनुमानित है। देखना रोचक होगा कि यह दीवाली शाहरुख खान के कॅरियर में कितनी जगमगाहट ले आती है?

Sunday, October 16, 2011

लौटा हूं यमुना नगर फिल्‍म फेस्टिवल से

-अजय ब्रह्मात्‍मज

यमुनानगर में डीएवी ग‌र्ल्स कॉलेज है। इस कॉलेज में यमुनानगर के अलावा आसपास के शहरों और दूर-दराज के प्रांतों से लड़कियां पढ़ने आती हैं। करीब चार हजार से अधिक छात्राओं का यह कॉलेज पढ़ाई-लिखाई की आधुनिक सुविधाओं से युक्त है। इस ग‌र्ल्स कॉलेज की एक और विशेषता है। यहां पिछले चार सालों से इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का आयोजन हो रहा है। कॉलेज की प्रिंसिपल सुषमा आर्या ने छात्र-छात्रओं में सिने संस्कार डालने का सुंदर प्रयास किया है। उनके इस महत्वाकांक्षी योजना में अजीत राय का सहयोग हासिल है।

सीमित संसाधनों और संपर्को से अजीत राय अपने प्रिय मित्रों और चंद फिल्मकारों की मदद से इसे इंटरनेशनल रंग देने की कोशिश में लगे हैं। डीवीडी के माध्यम से देश-विदेश की फिल्में दिखाई जाती हैं। संबंधित फिल्मकारों से सवाल-जवाब किए जाते हैं। फिल्मों के प्रदर्शन के साथ ही फिल्म एप्रीसिएशन का भी एक कोर्स होता है। निश्चित ही इन सभी गतिविधियों से फेस्टिवल और फिल्म एप्रीसिएशन कोर्स में शामिल छात्र-छात्राओं को फायदा होता है। उन्हें बेहतरीन फिल्में देखने को मौका मिलता है। साथ ही उत्कृष्ट सिनेमा की उनकी समझ बढ़ती है।

पिछले हफ्ते मैं यमुनानगर में था। पांच सौ छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए मैं उनकी आंखों और चेहरों की चमक देख रहा था। अपने संबोधन के बाद मैंने उनसे पूछा कि क्या उनमें से कोई फिल्मकार भी बनना चाहता है? तकरीबन 25-30 छात्रों ने हाथ उठाया। औपचारिक संबोधन के बाद करीब दर्जन भर छात्रों ने मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में काम मिलने की संभावनाओं के बारे में जिज्ञासा प्रकट की। देश के हर कोने से उभर रहे युवा फिल्मकारों के मन में मुंबई आने और यहां नाम कमाने की आकांक्षा है। मैं इस आकांक्षा के पक्ष में नहीं हूं। मुझे लगता है कि अपने इलाके में रहते हुए भी सीमित संसाधनों के साथ फिल्में बनाई जा सकती हैं। हमें वितरण की नई प्रणाली विकसित करनी होगी। नए वितरक तैयार करने होंगे और अपने-अपने इलाकों के प्रदर्शकों को तैयार करना होगा। स्थानीय टैलेंट का स्थानीय उपयोग हो।

बहरहाल, यमुनानगर जैसे शहरों में आयोजित फिल्म फेस्टिवल अपने उद्देश्य और ध्येय में स्पष्ट नहीं हैं। फेस्टिवल के आयोजकों को अपनी प्राथमिकता तय करनी होगी। अगर नेटवर्क तैयार करना और निजी लाभ के लिए फेस्टिवल का इस्तेमाल करना है तो सारा प्रयास निरर्थक साबित होगा। फेस्टिवल का उद्देश्य और ध्येय तय होगा तो यह संपर्को और मित्रों की चौहद्दी में निकलेगा। इसमें अन्य फिल्मकारों और सिनेप्रेमियों का जुड़ाव होगा। यह अभियान आंदोलन बनेगा और धीरे-धीरे उस बंजर जमीन से नए फिल्मकार आते दिखाई पड़ेंगे। किसी भी फेस्टिवल के लिए चार साल के आयोजन कम नहीं होते। इस बार मोहल्ला लाइव के सहयोग से मनोज बाजपेयी के साथ की गई लंबी बातचीत पे्ररक और अनुकरणीय रही। मोहल्ला लाइव के सहयोग से ऐसे और भी आयोजन हों।

देश के विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और अन्य संस्थाओं के सहयोग से छोटे-छोटे फेस्टिवल आयोजित होने चाहिए। उन्हें सरकारी समर्थन न मिले तो भी स्थानीय सहयोग से इसे संभव किया जा सकता है। शैक्षणिक उद्देश्य से आयोजित ऐसे फेस्टिवल में फिल्मों के डीवीडी प्रदर्शन में कानूनी अड़चनें भी नहीं आतीं। बेहतर होगा कि ऐसे फिल्म फेस्टिवल के नाम से इंटरनेशनल शब्द हटा दिए जाएं। सिर्फ विदेशी फिल्में दिखाने या एक-दो फिल्मकारों को बुलाने से कोई फेस्टिवल इंटरनेशनल नहीं हो जाता। इसे हरियाणा फिल्म फेस्टिवल भी कहें तो उद्देश्य और प्रभाव कम नहीं होगा। सबसे जरूरी यह समझना है कि फेस्टिवल क्या हासिल करना चाहता है और क्या वह इसके काबिल है?

Saturday, October 15, 2011

फिल्‍म समीक्षा : मुझ से फ्रेंडशिप करोगे

फेसबुक एज का रिलेशनशिप-अजय ब्रह्मात्मज

यह फेसबुक के दौर में मुंबई की प्रेमकहानी है। एक कॉलेज के कूल किस्म के कुछ छात्रों के बीच बनते-बिगड़ते और उलझते-सुलझते रिश्तों की इस कहानी के चरित्र शहरी यूथ है। इनकी भाषा, बातचीत, व्यवहार और तौर-तरीके बिल्कुल अलग है। ये बिल्कुल अलग ढंग से खीझते और खुश होते हैं। अपने भावों को स्माइली से जाहिर करते हैं और फेक आइडेंटिटी से अपने प्रेम का खेल रचते हैं।

पूरी फिल्म फेसबुक चैट की तरह ऑनलाइन चलती रहती है। राहुल, प्रीति, विशाल और मालविका आज की पीढ़ी के चार यूथ हैं। प्रीति और विशाल कॉलेज के एक प्रोजेक्ट पर एक साथ काम कर रहे हैं। उन्हें पिछले पच्चीस सालों में कॉलेज में बने 25 जोडि़यों की कहानी लिखनी है। उन कहानियों को लिखने और डाक्युमेंट करने की प्रक्रिया में ही उनका नजरिया भी बदलता जाता है। क्लाइमेक्स सीन में विशाल लिखित संभाषण भूल जाता है और अपने दिल की बात कहता है। उसके कथन का सार है कि पहले का समय और प्रेम सच्चा और सीधा था। जब इंटरनेट और फेसबुक नहीं था तो प्रेम की कठिनाइयां उसके एहसास को बढ़ा देती थीं।

नुपूर अस्थाना पूरी फिल्म में जो दिखती और बताती हैं, उसे खुद ही फिल्म के अंत में इस एहसास से काट देती हैं कि आज का फेसबुकिया प्रेम कृत्रिम और झूठा है। लेखक-निर्देशक की सोच का यह विरोधाभास हालांकि पुराने के प्रति आदर जगाता है, लेकिन आज की लाइफ स्टाइल और सोशल मीडिया नेटवर्क के युग के संबंधों का यह अस्वीकार उचित नहीं लगता। समय बदल रहा है। प्रेम के भाव और एक्सप्रेशन बदल रहे हैं। गौर करें तो पुराने तरीके के प्रति आस्था जाहिर करने पर भी प्रीति और विशाल का प्रेम तो आज के तकनीकी संप्रेषण के युग में ही हुआ है।

मुझ से फ्रेंडशिप करोगे में चारों नए कलाकार सहज और स्वाभाविक हैं। खास कर साकिब सलीम और सबा आजाद उम्मीद जगाते हैं। निशांत दहिया और तारा डिसूजा में आकर्षण है। सहयोगी भूमिकाओं में आए नए कलाकारों का योगदान कम नहीं है।

*** तीन स्टार

फिल्‍म समीक्षा : मोड़

झरने सा कलकल प्रेम -अजय ब्रह्मात्‍मज

झरने सा कलकल प्रेम

नागेश कुकनूर अपनी सहज संवेदना के साथ मोड़ में लौटे हैं। वे सरल कहानियां अच्छी तरह चित्रित करते हैं। मोड़ उनकी संवेदनात्मक फिल्म है। इस फिल्म की प्रेमकहानी पहाड़ी इलाके के चाय बागान की पृष्ठभूमि में है। प्रकृति की मौलिक सुंदरता का आकर्षण इस फिल्म के निर्दोष प्रेम को नया आयाम देता है।

अरण्या इस कस्बे में अपने पिता के साथ रहती है। पिता किशोर कुमार के परम भक्त हैं और मदिराप्रेमी हैं। घर और कस्बा छोड़ कर जा चुकी पत्‍‌नी का वे आज भी इंतजार कर रहे हैं। इंतजार अरण्या को भी है। उसे लगता है कि इस कस्बे में उसे किसी से प्रेम हो जाएगा। प्रेम होता है, लेकिन प्रेमी के खंडित व्यक्तित्व से परिचित होने पर अरण्या का द्वंद्व बढ़ जाता है। राहुल डिसोशिऐटेड आइडेंटिटी डिसआर्डर का मरीज है, जो एंडी बन कर अरण्या से प्रेम करता है और राहुल होते ही अरण्या से घृणा करने लगता है। सच तो यह है किराहुल दिल से अरण्या को चाहता है।

नागेश कुकनूर ने आयशा टाकिया और रणविजय सिंह के सहयोग से इस मनोवैज्ञानिक और जटिल प्रेमकहानी को मासूमियत के साथ पर्दे पर उतारा है। निश्छल प्रेम की यह भावुक दास्तान है। आयशा और रणविजय दोनों ही नैचुरल और अनाटकीय हैं। उन्हें रघुवीर यादव और तन्वी आजमी का भावपूर्ण साथ मिला है। शहरों के कोलाहल से दूर पनपे इस प्रेम में पहाड़ी झरने का कलकल है। फिल्म की धीमी गति परिवेश के अनुरूप है, लेकिन फास्ट कट के आदी हो चुके दर्शकों को इसमें थोड़ी ऊब हो सकती है।

*** तीन स्टार

फिल्‍म समीक्षा : जो डूबा सो पार

बिहार की लव स्टोरी-अजय ब्रह्मात्‍मज प्रवीण कुमार की प्रेमकहानी का परिवेश बिहार का है। एक ट्रक ड्रायवर का बेटा किशु अपनी बदमाशियों के कारण स्कूल से निकाल दिया जाता है। पिता चाहते हैं कि वह कम से कम ड्राइविंग और ट्रक चलाने के गुर सीख ले। बेटे का मन पिता के साथ काम करने से अधिक दोस्तों के साथ चकल्लस करने में लगता है। इसी बीच कस्बे में एक विदेशी लड़की सपना आती है। सपना को देखते ही किशु उसका दीवाना हो जाता है।

किशु का अवयस्क प्रेम वास्तव में एक आकर्षण है। वह सपना का सामीप्य चाहता है। इसके लिए वह पिता की डांट और सपना के चाचा के गुंडों के हाथों पिटाई खाता है। स्मार्ट किशु फिर भी हिम्मत नहीं हारता। वह अपने वाकचातुर्य से सपना के करीब आता है। अपने प्रेम का इजहार करने के दिन ही उसे पता चलता है कि सपना का एक अमेरिकी ब्वॉय फ्रेंड है। कहानी टर्न लेती है। सपना का अपहरण हो जाता है। किशु अपने दोस्तों के साथ जान पर खेल कर सपना की खोज करता है। इस प्रक्रिया में पुलिस और किडनैपर के रिश्ते बेनकाब होते हैं।

प्रवीण कुमार ने परिवेश अलग चुना है। वे जिसे बिहार बताते हैं, वह हरगिज बिहार नहीं लगता। मधुबनी पेंटिंग्स पर रिसर्च कर रही सपना जिस गांव में पहुंचती है, वह मिथिला का गांव नहीं है। और फिर मिथिला के मधुबनी पेंटिंग्स के इलाकों को खतरनाक बताने की पुलिस अधिकारी की उक्ति अनुचित है। वास्तविकता का आभास देती इस फिल्म में ऐसी लापरवाहियां खटकती हैं। निस्संदेह प्रवीण कुमार हिंदी फिल्मों के दर्शकों को एक नए परिवेश में ले जाते हैं, लेकिन वह अलग होने के बावजूद सही तरीके से स्थापित और परिभाषित नहीं हो पाता। प्रवीण कुमार ने चरित्र गढ़े हैं, लेकिन उन्हें समुचित लोकेशन में नहीं रख पाए हैं। फिल्म इसी घालमेल में कमजोर पड़ जाती है।

आनंद तिवारी का अभिनय, संवादों में देसी लक्षणा-व्यंजना का पुट और सहयोगी चरित्रों में विनय पाठक और पितोबास उल्लेखनीय हैं। जो डूबा सो पार की सीमाएं बजट, प्रोडक्शन और अन्य क्षेत्रों में नजर आती हैं।

** दो स्टार

Thursday, October 13, 2011

बदलाव का नया एटीट्यूड है यह

यह लेख इंडिया टुडे के 'बॉलीवुड का यंगिस्‍तान' 19 अक्‍टूबर 2011 में प्रकाशित हुआ है।

-अजय ब्रह्मात्‍मज

दुनिया की तमाम भाषाओं की फिल्मों की तरह हिंदी सिनेमा में भी दस-बारह सालों में बदलाव की लहर चलती है। यह लहर कभी बाहरी रूप बदल देती है तो कभी उसकी हिलोड़ में सिनेमा में आंतरिक बदलाव भी आता है। पिछले एक दशक में हिंदी सिनेमा का आंतरिक और बाह्य बदलाव स्पष्ट दिखने लगा है, लेकिन हमेशा की तरह हमारे आलसी विश्लेषक इसे कोई नाम नहीं दे पाए हैं। स्‍वयं युवा फिल्मकार अपनी विशेषताओं और पहचान की परिभाषा नहीं गढ़ पा रहे हैं। सभी अपने ढंग से कुछ नया गढ़ रहे हैं।

राम गोपाल वर्मा की कोशिशों और फिल्मों को हम इस बदलाव का प्रस्थान मान सकते हैं। राम गोपाल वर्मा ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के ढांचे,खांचे और सांचे को तोड़ा। दक्षिण से अाए इस प्रतिभाशाली निर्देशक ने हिंदी सिनेमा के लैरेटिव और स्‍टार स्‍ट्रक्‍चर को झकझोर दिया। उनकी फिल्मों और कोशिशों ने परवर्ती युवा फिल्मकारों को अपनी पहचान बनाने की प्रेरणा और ताकत दी। बदलाव के प्रतिनिधि बने आज के अधिकांश युवा फिल्मकार,अभिनेता और तकनीशियन किसी न किसी रूप में राम गोपाल वर्मा से जुड़े या प्रेरित रहे। यह दीगर तथ्य है कि राम गोपाल वर्मा स्वयं बदलाव के अलाव को आग बनाकर उसमें स्वाहा होने के करीब पहुंच चुके हैं। उनके अलावा चंद युवा फिल्मकारों को अपने अंदाज में महेश भट्ट का भी स्पर्श मिला है।

अनुराग कश्यप, विशाल भारद्वाज, इम्तियाज अली, श्रीराम राघवन, अनुराग बसु, विक्रमादित्य मोटवाणे, सुभाष कपूर, अभिषेक चौबे, अभिषेक शर्मा, मनीष तिवारी, निशिकांत कामत, संजय झा, प्रवेश भारद्वाज, अमोल गुप्ते, शिवम नायर, नीरज पांडे, राजकुमार गुप्ता, राज कुमार हिरानी,जयदीप साहनी,संजय चौहान आदि दर्जनों लेखकों और फिल्मकारों की लंबी फेहरिस्त तैयार की जा सकती है। इन सभी फिल्मकारों में एक खास किस्म का एटीट्यूड है, जो उन्हें अपने पूर्वजों और बॉलीवुडके कथित युवा फिल्मकारों से अलग करता है। 21वीं सदी के पहले दशक में आए ये सभी फिल्मकार देश के विभिन्न हिस्सों से अपनी कथाभूमि और सोच लेकर फिल्मों में आए हैं। उन्हें विरासत में अवसर नहीं मिले हैं। फिल्म इंडस्ट्री तक पहुंचने में सभी को अपमान, तिरस्कार और बहिष्‍कार के पृथक अनुभवों से गुजरना पड़ा है। ये सभी हिंदी सिनेमा की विशेषताओं को अपनाते हुए कुछ नया, अलग और समकालीन फिल्मों की कोशिश में लगे हैं।

युवा पीढ़ी के ज्यादातर फिल्मकारों की कथाभूमि वास्तविक और विश्वसनीय है। वे अपने करीब के परिचित स्थान और परिवेश को फिल्मों में ला रहे हैं। नई फिल्मों के समय, काल और स्थान को हम पहचान सकते हैं। अब पहले की तरह वायवीय या किसी समय किसी स्थान का काल्पनिक चरित्र हमारे सामने नहीं होता। इस बदलाव ने फिल्मों के लार्जर दैन लाइफस्वरूप को हिला दिया है।

युवा फिल्मकार अपनी फिल्मों में प्रेम और रोमांस की अपरिहार्यता से निकल चुके हैं। एक तो इन फिल्मों के प्रमुख चरित्रों पर प्रेम का दबाव नहीं है और दूसरे फिल्मों के कथानक का मुख्य स्वर रोमांस नहीं रह गया है। प्रेम और रोमांस की जकडऩ से निकलने के कारण चरित्रों के आपसी संबंधों का समीकरण बदल गया है। समकालीन फिल्मकारों में आउट ऑफ बॉक्सथीम पर काम करने का साहस बढ़ा है।

समकालीन युवा फिल्मकारों की पहचान और उदाहरण के लिए उड़ानकाफी है। उड़ानकी निर्माण प्रक्रिया और मिली पहचान के विस्तार में जाने पर हम नई कोशिशों को अच्छी तरह समझ सकते हैं। उड़ाननिजी प्रयासों से नए विषय पर बनी एक ऐसी फिल्म थी, जिसे कारपोरेट हाउस का समर्थन मिला। उड़ानएक ओर कान फिल्म फेस्टिवल और दूसरी ओर देश के सिनेमाघरों में आम फिल्मों की तरह रिलीज होकर दर्शकों तक भी पहुंची। उड़ानसंकेत है कि भविष्य का... बशर्ते हमारे फिल्मकार हिंदी फिल्मों के भ्रष्ट आचरण और लोभ के दुष्‍चक्र से बचे रह सकें। दिक्कत यह है कि सीमित पहचान मिलने के साथ ही बड़ी कामयाबी की लालसा में अधिकांश युवा फिल्मकार दिग्‍भ्रमित हो जाते हैं।

युवा फिल्‍मकारों की दुविधा और चुनौतियां बढ़ी हैं। पहली फिल्‍म के लिए निर्माता जुआने के साथ उनका संघर्ष खत्‍म नहीं होता। उन्‍हें हर नयी फिल्‍म के साथ अपनी काबिलियत की परीक्षा देनी होती है। परिवर्त्‍तन के हिमायती फिल्‍मकार अड़चनों और मुश्किलों के बावजूद नवीनता के नैरंतर्य के संवाहक हैं।

Wednesday, October 12, 2011

क्या दबाव में है शाहरुख

क्या दबाव में है शाहरुख-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले हफ्ते सोमवार को शाहरुख खान ने अपनी फिल्म रा. वन के म्यूजिक लॉन्च का बड़ा आयोजन किया। इन दिनों म्यूजिक लॉन्च और रिलीज के कार्यक्रम ज्यादातर होटलों और थिएटरों में होते हैं। फिल्म के प्रमुख कलाकारों को बुलाया जाता है। गीतकार-संगीतकार और निर्माता-निर्देशक रहते हैं। किसी सम्माननीय या लोकप्रिय फिल्मी हस्ती के हाथों म्यूजिक रिलीज कर सभी के साथ तस्वीरें खींच ली जाती हैं। बड़े औपचारिक किस्म के दो-चार सवाल होते हैं। इस प्रकार म्यूजिक लॉन्च की इतिश्री हो जाती है। अमूमन फिल्म रिलीज होने के महीने भर पहले यह आयोजन किया जाता है। डिजिटल युग में अब संगीत के लीक होने या इंटरनेट पर आने में वक्त नहीं लगता, फिर भी म्यूजिक लॉन्च की औपचारिकता का अपना महत्व है।

इस महत्व को शाहरुख ने मूल्यवान बना दिया। उन्होंने एक मनोरंजन चैनल को अधिकार दिए कि वह पूरे इवेंट की अच्छी पैकेजिंग कर एक एंटरटेनमेंट शो बना ले। पिछले रविवार को इस इवेंट का प्रसारण भी हो गया, जिसे देश के करोड़ों दर्शकों ने एक साथ देखा। शाहरुख खान ने अपनी नई पहल और मार्केटिंग से साबित कर दिया कि वह थिएटरों से अनुपस्थित होने के बावजूद किसी से पीछे नहीं हैं। उन्होंने संकेत दिया है कि वे रा. वन के प्रचार के लिए किस हद तक जा सकते हैं। वे नई रणनीतियों से प्रचार की गतिविधियों से भी पैसे कमाने में सफल रहेंगे। अभी तक प्रोडक्शन कंपनियां स्पॉन्सरशिप से प्रचार की लागत या व्यय को कम करती रही हैं। उम्मीद है कि आनेवाले समय में म्यूजिक लॉन्च या फ‌र्स्ट लुक लॉन्च भी एक कॉमर्शियल इवेंट के रूप में विकसित हो। इसकी शुरुआत हो चुकी है।

कहा जा रहा है कि शाहरुख खान पर भारी दबाव है। वे खुद को किंग खान कहते हैं। मतलब कि एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री यानी खास कर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के वे राजा हैं। राजा होने का सीधा मतलब है कि दर्शकों के दिलों पर उनकी हुकूमत चलती है। हम सभी जानते हैं कि पॉपुलर कल्चर की किसी भी इंडस्ट्री में लोकप्रियता स्थायी नहीं होती। जो दिखता और बिकता है, वही लोकप्रिय माना जाता है। उलट कर कहें तो जो लोकप्रिय होता है, वही दिखता और बिकता है। इस पृष्ठभूमि पर ध्यान दें, तो हाल फिलहाल में शाहरुख की कोई फिल्म नहीं आई है, जबकि इस बीच सलमान खान और अजय देवगन की फिल्मों ने अच्छा बिजनेस किया है। शाहरुख के घनघोर प्रतियोगी आमिर खान ने 3 इडियट्स से एक रिकॉर्ड बना कर छोड़ दिया है। अभी तो रितिक रोशन की फिल्म जिंदगी ना मिलेगी दोबारा भी लगभग 100 करोड़ की कमाई के करीब पहुंच चुकी है। शाहरुख खान के लिए जरूरी हो गया है कि उनकी फिल्म को अच्छी ओपनिंग मिले और वह भी 100 करोड़ का कारोबार करे।

आमिर खान, सलमान खान, और अजय देवगन की फिल्मों ने 100 करोड़ के कलेक्शन का आंकड़ा पार कर सचमुच शाहरुख पर दबाव बढ़ा दिया है। बॉक्स ऑफिस की कामयाबी ही उनकी कुर्सी को स्थिर रखेगी। जरूरी है कि शाहरुख की रा. वन देखने के लिए दर्शकों को थिएटर में लाने की हर युक्ति भिड़ाएं और जुगाड़ करें। उनकी फिल्म दीवाली पर रिलीज हो रही है। पारंपरिक तौर पर दीवाली पर रिलीज होने वाली फिल्मों को दर्शक मिलते हैं। खबर है कि शाहरुख भी अपनी फिल्म बुधवार को रिलीज कर पांच दिनों का वीकएंड का फायदा उठाएंगे। अभी बता पाना संभव नहीं है कि वे प्रचार का कौन सा तरीका अपनाएंगे, फिर भी इसमें शक नहीं है कि आगे रहने के लिए कुछ नया और चामत्कारिक प्रयोग करेंगे।

वैसे म्यूजिक लॉन्च के मौके पर 100 करोड़ की कमाई का सवाल पूछने पर शाहरुख खान ने खुले दिन से कहा कि फिल्में दर्शकों के दिलों को टच करने से चलती हैं। उनकी फिल्म रा. वन बाप-बेटे की भावनात्मक कहानी है, जिसमें सुपरहीरो का एंगल है। फिल्म के प्रचार, गानों और दृश्यों को देखने से लग रहा है कि यह सुपरहीरो और हिंदी फिल्मों के हीरो का तालमेल है। साइंस फिक्शन होने के साथ ही इसमें मेलोड्रामा भी है। पूरी कोशिश है कि फिल्म यूथ के साथ ही ट्रैडिशनल दर्शकों को भी संतुष्ट करे।

सितंबर में प्रकाशित

मोबाइल से फिल्‍म बनाएं और दिखाएं

क्‍या आप फिल्‍ममेकर बनना चाहते हैं या और किसी रूप में सिनेमा से जुड़ना चाहते हैं। मन में यह डर है कि यह महंगा शौक है और आप सोच से ही निठलले हो रहे हैं। सक्रिय हों। टॉम क्रूज के साइट पर बहुत सही जानकारी दी गई हैं। चवन्‍नी यहां लिंक दे रहा है...आप खुद पढें और चालू हो जाएं... यह पहला भा्ग है। दूसरा भाग जल्‍दी ही...

Saturday, October 8, 2011

फिल्म समीक्षा : लव ब्रेकअप्‍स जिंदगी

लव ब्रेकअप्स जिंदगी: प्रोफेशन बनाम इमोशनप्रोफेशन बनाम इमोशन

-अजय ब्रह्मात्‍मज

साहिल संघा की इस फिल्म के हीरो-हीरोइन जायद खान और दीया मिर्जा हैं। दोनों फिल्मी टाइप किरदार हैं। उन्हें एक-दूसरे के प्रति प्यार का एहसास होता है और फिल्म के अंत तक अपनी झिझक और झेंप में वे उलझे रहते हैं। लव बेकअप्स और जिंदगी को थोड़े अलग नजरिए से देखें तो ध्रुव (वैभव तिवारी) और (राधिका) पल्लवी शारदा ज्यादा तार्किक और आधुनिक यूथ के रूप में उभरते हैं। अगर उन दोनों को नायक-नायिका के तौर पर पेश किया जाता तो बात ही अलग होती। दोनों इमोशनल होने के साथ समझदार भी हैं, लेकिन हिंदी फिल्मों में नायक-नायिका होने के लिए जरूरी है कि आप रोमांटिक हों। अगर आप व्यावहारिक, तार्किक और प्रोफेशनल हुए तो उसे निगेटिव और ग्रे बनाने-समझाने में हमारे निर्देशक और दर्शक नहीं चूकते।

बहरहाल, साहिल संघा ने रिश्तों और प्रेम की इस कहानी को पारंपरिक ढांचे में ढालने की कोशिश की है। फिल्म इंटरवल के पहले काफी लंबी खिंच गई है। किरदारों को स्थापित करने में इतना समय न लेकर लेखक-निर्देशक सीधे रिश्तों की उलझन और प्रेम के एहसास पर आ जाते तो कहानी सिंपल और सटीक हो जाती। फिल्म में सब कुछ इतना मीठा है कि वह जहरीला होने के करीब पहुंच गया है।

वैभव तिवारी इस फिल्म की उपलब्धि हैं। कथित नायक-नायिका के रूप में जायद खान और दीया मिर्जा को अधिक स्पेस और फुटेज मिला है, लेकिन उनके किरदार ही दमदार नहीं हैं। इस वजह से पर्दे पर उनकी मेहनत बेअसर साबित होती है। टिस्का चोपड़ा शालीन लगती हैं। उर्दू को लेकर किया गया मजाक लेखक-निर्देशक के स्तर को भी जाहिर करता है।

** दो स्टार

फिल्‍म समीक्षा : रासकल्‍स

रास्कल्स: बड़े पर्दे पर बदतमीजी-

बड़े पर्दे पर बदतमीजी

अजय ब्रह्मात्‍मज

सफल निर्देशक अपने करियर की सीढि़यां उतरते समय कितने डगमगाते और डांवाडोल रहते हैं? कम से कम डेविड धवन के उतार को समझने केलिए रास्कल्स देखी जा सकती है। उन्हें संजय दत्त और अजय देवगन जैसे लोकप्रिय अभिनेताओं के साथ कंगना रनौत भी मिली हैं, लेकिन फिल्म भोंडे़पन और अश्लीलता से बाहर नहीं निकल पाती। मुमकिन है डेविड धवन के निर्देशन में ऐसा उतार पहले भी आया हो, लेकिन वे साधारण किस्म की मनोरंजक कामेडी फिल्मों के उस्ताद तो थे।

चेतन और भगत दो ठग हैं। सचमुच पॉपुलर लेखक चेतन भगत फिल्म इंडस्ट्री में मजाक के पात्र बन चुके हैं। इन किरदारों का नाम सलीम और जावेद या जुगल और हंसराज रख दिया जाता तो भी कोई खास फर्क नहीं पड़ता। चेतन और भगत एक-दूसरे को ठगते और क्लाइमेक्स में ठगी में पार्टनर बनते हुए अपने-अपने तरीके से कंगना रनौत को फांसने का प्रयास करते हैं। लतीफे, चुहलबाजी, छेड़खानी और ठगी को लेकर बनी यह फिल्म बड़े पर्दे पर जारी बड़े स्टारों की बदतमीजी का ताजा नमूना है। अनुभवी और सीनियर स्टार संजय दत्त और अजय देवगन की कंगना रनौत के साथ की गई ऊलजलूल और अश्लील हरकतें स्क्रिप्ट से अधिक वास्तविक रूप में नजर आती हैं। ताज्जुब होता है कि कंगना रनौत इस प्रकार की शारीरिक जोर-जबरदस्ती के लिए कैसे राजी हो गई?

रास्कल्स हिंदी में बनी ताजा फूहड़ फिल्म है। पता चलता है कि हमारे स्टारों और स्टार डायरेक्टर की कॉमेडी की सोच कितनी निरर्थक और अश्लील हो चुकी है। रास्कल्स जैसी फूहड़ भूल पर संबंधित व्यक्तियों को शर्मिदा होना चाहिए।

रेटिंग- * एक स्टार

Friday, October 7, 2011

इंडिपेंडेट सिनेमा -अनुराग कश्‍यप

इन दिनों इंडिपेंडेट सिनेमा की काफी बातें चल रही हैं। क्या है स्वतंत्र सिनेमा की वास्तविक स्थिति? बता रहे हैं अनुराग कश्यप..

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के व्यापक परिदृश्य पर नजर डालें तो इंडिपेंडेट फिल्ममेकिंग की स्थिति लचर ही है। फिल्म बनने में दिक्कत नहीं है। फिल्में बन रही हैं, लेकिन उनके प्रदर्शन और वितरण की बड़ी समस्या है। आप पिछले दो सालों की फिल्मों की रिलीज पर गौर करें तो पाएंगे कि जब बड़ी और कामर्शियल फिल्में नहीं होती हैं, तभी एक साथ दस इंडिपेंडेट फिल्में रिलीज हो जाती हैं। या फिर जब ऐसा माहौल हो कि बड़ी फिल्में किसी वजह से नहीं आ रही हों तो इकट्ठे सारी स्वतंत्र फिल्में आ जाती हैं। नतीजा यह होता है कि इन फिल्मों को कोई देख नहीं पाता है। दर्शक नहीं मिलते।


आप इतना मान लें कि इंडिपेंडेट फिल्ममेकिंग को मजबूत होना है तो उसे तथाकथित 'बॉलीवुड' के ढांचे से बाहर निकलना होगा। आप आइडिया के तौर पर घिसी-पिटी फिल्में बना रहे हैं तो हिंदी फिल्मों के ट्रेडिशन से कहां अलग हो पाए? सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री के पैसे नहीं लगने या स्टार के नहीं होने से फिल्म इंडिपेंडेट नहीं हो जाती। बॉलीवुड के बर्डन से भी इंडिपेंडेट होना होगा।


देश में इंडिपेंडेट फिल्में बन रही हैं। उत्साही फिल्मकार अपनी मेहनत और लगन से यह काम कर रहे हैं। उन्हें सही एवेन्यू और रेवेन्यू नहीं मिल पा रहा है। अपनी जानकारी के आधार पर बता दूं कि मोटे तौर पर हर साल डेढ़ सौ ऐसी फिल्में बनती हैं, जो रिलीज नहीं हो पाती हैं। आई एम कलाम को ही देखें। यह कब बनी थी और कब रिलीज हुई? डेढ़-दो साल तो लग ही गए। ऐसी ढेर सारी फिल्में हैं। मैं आशावान व्यक्ति हूं। नए उत्साही फिल्ममेकर अपना रास्ता खुद ही खोज रहे हैं। उन्हें माध्यम और माहौल की जानकारी है। वे मुंबई भी नहीं आते। वे पिक्चर बना रहे हैं। इंटरनेट पर अपलोड कर रहे हैं। वे जीरो लागत पर फिल्में बनाते हैं। वे मिल-जुल कर ऐसी कोशिशें कर रहे हैं। आप देखिएगा कि उनके लिए कोई प्लेटफार्म आ खड़ा होगा।

फिल्म समीक्षा : मौसम

कठिन समय में प्रेम मौसमकठिन समय में प्रेम

-अजय ब्रह्मात्मज

पंकज कपूर की मौसम मिलन और वियोग की रोमांटिक कहानी है। हिंदी फिल्मों की प्रेमकहानी में आम तौर पर सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं की पृष्ठभूमि नहीं रहती। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्नातक और गंभीर अभिनेता जब निर्देशक की कुर्सी पर बैठते हैं तो वे अपनी सोच और पक्षधरता से प्रेरित होकर अपनी सृजनात्मक संतुष्टि के साथ महत्वपूर्ण फिल्म बनाने की कोशिश करते हैं। हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय ढांचे और उनकी सोच में सही तालमेल बैठ पाना मुश्किल ही होता है। अनुपम खेर और नसीरुद्दीन शाह के बाद अब पंकज कपूर अपने निर्देशकीय प्रयास में मौसम ले आए हैं।

पंकज कपूर ने इस प्रेमकहानी के लिए 1992 से 2002 के बीच की अवधि चुनी है। इन दस-ग्यारह सालों में हरेन्द्र उर्फ हैरी और आयत तीन बार मिलते और बिछुड़ते हैं। उनका मिलना एक संयोग होता है, लेकिन बिछुड़ने के पीछे कोई न कोई सामाजिक-राजनीतिक घटना होती है। फिल्म में पंकज कपूर ने बाबरी मस्जिद, कारगिल युद्ध और अमेरिका के व‌र्ल्ड ट्रेड सेंटर के आतंकी हमले का जिक्र किया है। पहली घटना में दोनों में से कोई भी शरीक नहीं है। दूसरी घटना में हैरी शरीक है। तीसरी घटना से आयत प्रभावित होती है। आखिरकार अहमदाबाद के दंगे की चौथी घटना में दोनों फंसते हैं और यहीं उनका मिलन भी होता है। पंकज कपूर ने प्रेमकहानी में वियोग का कारण बन रही इन घटनाओं पर कोई सीधी टिप्पणी नहीं की है। अंत में अवश्य ही हैरी कुछ भयानक सायों का उल्लेख करता है, जिनके न चेहरे होते हैं और न नाम। निर्देशक अप्रत्यक्ष तरीकेसे सांप्रदायिकता, घुसपैठ और आतंकवाद के बरक्स हैरी और आयत की अदम्य प्रेमकहानी खड़ी करते हैं।

पंकज कपूर ने पंजाब के हिस्से का बहुत सुंदर चित्रण किया है। हैरी और आयत के बीच पनपते प्रेम को उन्होंने गंवई कोमलता के साथ पेश किया है। गांव के नौजवान प्रेमी के रूप में शाहिद जंचते हैं और सोनम कपूर भी सुंदर एवं भोली लगती हैं। दोनों के बीच का अव्यक्त प्रेम भाता है। दूसरे मौसम में स्काटलैंड में एयरफोर्स ऑफिसर के रूप में भी शाहिद कपूर ने सार्थक मेहनत की है। यहां सोनम कपूर खिल गई हैं। इसके बाद की घटनाओं, प्रसंगों और चरित्रों के निर्वाह में निर्देशक की पकड़ ढीली हो गई है। आरंभिक आकर्षण कम होता गया है। कई दृश्य लंबे और बोझिल हो गए हैं। इंटरवल के बाद के हिस्से में निर्देशक आत्मलिप्त हो गए हैं और अपने सृजन से चिपक गए हैं।

फिल्म के अंतिम दृश्य बनावटी, नकली और फिल्मी हो गए हैं। एक संवेदनशील, भावुक और अदम्य प्रेमकहानी फिल्मी फार्मूले का शिकार हो जाती है। अचानक सामान्य अदम्य प्रेमी हैरी हीरो बन जाता है। यहां पंकज कपूर बुरी तरह से चूक जाते हैं और फिल्म अपने आरंभिक प्रभाव को खो देती है। यह फिल्म पूरी तरह से शाहिद कपूर और सोनम कपूर पर निर्भर करती है। दोनों ने अपने तई निराश नहीं किया है। फिल्म अपने नैरेशन और क्लाइमेक्स में कमजोर पड़ती है।

*** तीन स्टार