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Sunday, September 18, 2011

मौसम में मुहब्बत है-सोनम कपूर


-अजय ब्रह्मात्‍मज

मौसम को लेकर उत्साहित सोनम कपूर को एहसास है कि वह एक बड़ी फिल्म का हिस्सा हैं। वे मानती हैं कि पंकज कपूर के निर्देशन में उन्हें बहुत कुछ नया सीखने को मिला..

आपके पापा की पहली फिल्म में पंकज कपूर थे और आप उनकी पहली फिल्म में हैं..दो पीढि़यों के इस संयोग पर क्या कहेंगी?

बहुत अच्छा संयोग है। उम्मीद है पापा की तरह मैं भी पंकज जी के सानिध्य में कुछ विशेष दिखूं। मौसम बहुत ही इंटेंस लव स्टोरी है। जब मुझे आयत का किरदार दिया गया तो पंकज सर ने कहा था कि इसके लिए तुम्हें बड़ी तैयारी करनी होगी। पहले वजन कम करना होगा, फिर वजन बढ़ाना होगा। बाडी लैंग्वेज चेंज करनी पड़ेगी। ज्यादा मेकअप नहीं कर सकोगी।

इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया रही?

मैंने कहा कि इतना अच्छा रोल है तो मैं सब कुछ कर लूंगी। इस फिल्म में चार मौसम हैं। मैंने हर सीजन में अलग उम्र को प्ले किया है। इस फिल्म में मैं पहले पतली हुई, फिर मोटी और फिर और मोटी हुई। अभी उसी वजन में हूं। वजन कम नहीं हो रहा है।

वजन का खेल आपके साथ चलता रहा है। पहले ज्यादा फिर कम..।

बार-बार वजन कम-ज्यादा करना बहुत कठिन होता है। पहले तो अपनी लांचिंग फिल्म सांवरिया के लिए वजन कम किया, फिर दिल्ली-6 में वजन बढ़ाया। फिर आएशा और आई हेट लव स्टोरी के लिए कम करना पड़ा..दिक्कत तो होती है, लेकिन कैरेक्टर के हिसाब से करना पड़ता है।

वजन के साथ आपकी भाषा में भी बदलाव आया है। इसकी वजह?

मौसम में मैंने कश्मीरी मुस्लिम लड़की का रोल किया है। वह बहुत ही ठहराव वाली शांत लड़की है। उसमें नजाकत है। वह आज की माडर्न लड़कियों की तरह नहीं है। उसकी जुबान बहुत साफ है। तो जाहिर है कि बॉडी लैंग्वेज और कपड़ों के साथ ही मैंने भाषा पर भी काम किया। मुझे मेडिटेशन भी करना पड़ा। आयत जैसे ठहरे हुए किरदार को निभाना मुश्किल होता है। सही समय पर सही एक्सप्रेशन देना होता है। उछलने-कूदने से कठिन होता है, खुद को संयमित रखना। इस रोल ने मुझे निचोड़ लिया है। मैंने इस किरदार की बड़ी तैयारी की है। भगवान फुर्सत से कुछ अच्छी चीजें बनाता है। पंकज सर ने भी बहुत फुर्सत से यह फिल्म बनाई है।

पंकज कपूर के बारे में क्या कहेंगी?

मैं उनकी जबरदस्त प्रशंसक हूं। मैंने उनकी सारी फिल्में और टीवी धारावाहिक देखे हैं। करमचंद जासूस, जबान संभाल के जैसे टीवी धारावाहिकों से लेकर उनकी फिल्में तक मेरी देखी हुई हैं। बहुत उम्दा और बेहतरीन एक्टर हैं। मैंने तय कर लिया था कि उनसे सिर्फ सीखना है। मैं उन्हें स्कूल की तरह मान कर गई थी। कैसे एक्टिंग करनी है, कैसे एक्सप्रेशन देने हैं..यह सब उन्हें बताना था!

क्या इसे शुद्ध रोमांटिक फिल्म कह सकते हैं? प्यार और रोमांस की फिल्में कम हो रही हैं?

मुझे लगता है इस फिल्म का कनेक्शन दर्शकों से बनेगा। अगर आप किसी क्लासिक फिल्म को देखें तो पाएंगे कि ऐसी फिल्में न सिर्फ पसंद की जाती हैं, बल्कि याद भी रखी जाती हैं। इसमें वह क्वालिटी है। लोग ऐसी फिल्मों को बार-बार देखते हैं। अपने यहां मुगले आजम, पाकीजा और दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे आदि ही देख लें। मौसम का रोमांस भी दर्शकों को पसंद आएगा।

अभी तक केवल अभिषेक ही आपके थोड़े बड़े को-एक्टर रहे हैं। बाकी सब आपकी पीढ़ी के हैं। शाहिद के बारे में क्या कहेंगी?

अभिषेक बहुत बड़े नहीं हैं। हां, वो थोड़ा पहले से काम कर रहे हैं। वे मुझसे केवल पांच साल बड़े हैं। शाहिद बहुत मेहनती हैं। वे अपने पापा की बहुत इज्जत करते हैं। उनकी हर बात मानते हैं। वह बहुत जेंटलमैन हैं। दूसरों को सम्मान और आदर देना जानते हैं। मैं तो चाहूंगी मेरे सारे को-एक्टर ऐसे ही हों।

जोया अख्तर ने एक शो में आपकी बहुत तारीफ की थी और कहा था कि आपके पास एक स्टाइल है? ऐसी राय सुनकर कैसा लगता है?

मैं किसी और के बारे में नहीं सोचती। जो मन में आता है, वही पहनती हूं। मैंने जो रिस्क लिया, वह इतना बुरा या खतरनाक भी नहीं है। कुछ लोगों को अच्छा नहीं लगता है तो न लगे। मैं अपनी धुन में रहती हूं। अगर कोई उसकी तारीफ करे तो अच्छा लगता है। यह उम्मीद जगती है कि कोई और भी पसंद करेगा।

आपका काम देखकर लगता है कि आप फटाफट सब कुछ अचीव करने की होड़ में नहीं हैं..

बिल्कुल सही समझा आपने। मैं यहां खास किस्म का काम करने आई हूं। मैं देख चुकी हूं कि फटाफट आने और जाने का मतलब क्या होता है। आप मेरे पापा को देखें। वे आज भी काम कर रहे हैं। मैं हड़बड़ी में अपनी सोच नहीं बदल सकती।

आपकी 'आएशा' नहीं चली तो काफी छींटाकशी हुई?

आएशा निश्चित ही अलग किस्म की फिल्म थी। मैंने प्रचार पर अधिक ध्यान नहीं दिया। मैं नहीं जानती थी कि क्या-क्या करना चाहिए? आप मानोगे नहीं कि मुझे महिला समीक्षकों ने लगभग 4 स्टार दिए और पुरुष समीक्षक फिल्म को समझ ही नहीं पाए। अब मैं किसी को यह तो नहीं कह सकती थी कि पहले जेन ऑस्टिन का उपन्यास एमा पढि़ए!

मौसम का संगीत अच्छा लग रहा है। आपका प्रिय गीत..?

एक तू ही तू। वह स्लो और सैड है। मुझे स्लो गाने पसंद हैं।

Saturday, September 17, 2011

मुझे हंसी-मजाक करने में मजा आता है-जूही चावला

-अजय ब्रह्मात्‍मज

कलर्स पर आज से बच्चों के लिए जूही चावला लेकर आ रही हैं 'बदमाश कंपनी'। शो में वह नजर आएंगी होस्ट की भूमिका में..

क्या है 'बदमाश कंपनी'?

'बदमाश कंपनी' का टाइटल मुझे अच्छा लगा है। शीर्षक से ही जाहिर है कि यह सीधा-स्वीट प्रोग्राम नहीं है। इसमें शरारत है। इस प्रोग्राम को देखते हुए आप हंसेंगे जरूर। बच्चे कभी-कभी अपनी बातों से हमें शर्मिदा या चौंकने पर मजबूर कर देते हैं। वे कुछ सोच कर वैसा नहीं बोलते। सच्चे मन से बोल रहे होते हैं। वे कभी-कभी ऐसी बातें बोल देते हैं, जो आप सोच भी नहीं सकते। जब वे थोड़े बड़े हो जाते हैं, तो फिर हम उन्हें अपनी तरह बना देते हैं। फिर वे सोच कर बोलते हैं और सही चीजें ही बोलते हैं।

आप इस 'बदमाश कंपनी' में क्या कर रही है?

आप मुझे उनके साथ प्रैंक करते देखेंगे। बंद कमरे में एक सेगमेंट है। फिर एक सेगमेंट बच्चों और पैरेंट्स का है। आपको लगता है कि आप अपने बच्चे को जानते हैं, तो फिर चेक कर लेते हैं कि आप कितना जानते हैं? छोटे-छोटे गेम्स होंगे और फिर हम बच्चों और पैरेंट्स से उनके बारे में पूछेंगे। हमने जवाब पहले से रिकार्ड कर लिए हैं। हम देखेंगे कि जवाब मिलते हैं कि नहीं?

किसी खास उम्र के ही बच्चे रहेंगे या खुली रहेगी यह बदमाश कंपनी?

इसमें मुख्यत: 4-8 साल आयु वर्ग के बच्चे आएंगे। कभी-कभी 9 साल के बच्चे भी होंगे। आठ साल से ज्यादा उम्र के बच्चे तो समझने लगते हैं। उनमें दुनियादारी की समझ विकसित होने लगती है। उनकी मासूमियत लगभग खत्म हो चुकी रहती है।

इस शो को स्वीकार करने की वजह क्या रही?

थोड़ी बदमाशी और थोड़ा फन है इसमें। मैं बच्चों के लिए कोई क्विज शो होस्ट नहीं कर सकती।.. और न ऐसा चाहूंगी कि उनसे केवल सवाल पूछती रहूं। इसमें केवल सरप्राइज है। एक एपिसोड में एक बच्चे को हमने सड़क पर भेज दिया। वह बड़ों से कुछ सवाल करता है। बड़ों को जवाब सुन कर आप हंसे बिना नहीं रहेंगे। यह एक सनसाइन शो है।

यह शो स्क्रिप्टेड है या फ्री किस्म का है?

हमने सिर्फ सेगमेंट डिसाइड किया है। बाकी बच्चों पर छोड़ दिया है। मौज-मस्ती के एपिसोड रहेंगे। सिर्फ बच्चे ही नहीं, कई बार बड़ों से सवाल भी करेंगे। किसी-किसी एपिसोड में हम होनहार बच्चे की खूबियों के बारे में बताएंगे।

आप के अंदर एक बच्चा दिखता है। इसे कैसे बचा रखा है?

मुझे हंसी-मजाक करने में मजा आता है। मेरा यह पहलू लोगों को याद रह जाता है। मेरी हल्की-फुल्की फिल्मों से यह इमेज बनी होगी। निजी जिंदगी में मैं भी भारी और मुश्किल स्थितियों से गुजरी हूं। मुझे अपने हिस्से की तकलीफें मिली हैं।

अभी का बचपन कितना अलग हुआ है?

अभी मीडिया एक्सपोजर बहुत ज्यादा है। बच्चों को पूरी नहीं, तो भी ढेर सारी चीजों की अधूरी जानकारियां हैं। उनके पास काफी सूचनाएं आ गई हैं। कई बार अपने बच्चों के साथ जब होती हूं, तो लगता है कि जब मैं सात-आठ साल की थी, तब मुझे उतना नहीं पता था, जितना वे जानते हैं। वे इस उम्र में जो किताबें पढ़ रहे हैं, उन किताबों को उनसे बड़ी उम्र में हमने पढ़ा था। मेरे समय की 7वीं-8वीं कक्षा की किताब आजकल 5वीं कक्षा में आ गई है। अपने बारे में कहूं, तो 8वीं-9वीं कक्षा के बाद पढ़ाई समझ में आई थी। उसके पहले, तो बस याद कर लेते थे।

कैसे संभालती हैं बच्चों को?

थोड़ी सावधानी रखती हूं। एक तो टीवी से दूर रखती हूं। मैं उनसे कहती हूं कि अपनी उम्र की चीजें देखो। मैं नहीं चाहती कि वे सारी हिंदी फिल्में देखें। हाल-फिलहाल में '3 इडियट' देखने भेजा था। उसमें पढ़ाई के बारे में एक अच्छी बात कही गई थी कि अपनी एक प्रतिभा पहचानो और उसे हासिल करो। मैं खुद उसमें यकीन करती हूं। जब तक मेरी देखभाल में है, तब तक तो ठीक रहें। मुझे याद है कि अपने बचपन में हम किराए पर सायकिल लेकर मुंबई के नवी नगर इलाके में सड़कों पर निकल जाते थे। आज तो मैं बच्चों को ऐसी इजाजत देने के बारे में कभी सोच भी नहीं सकती। डर रहेगा कि ये बच्चे लौट कर आएंगे कि नहीं?

Friday, September 16, 2011

अब बीवी रोती-बिसूरती नहीं है-तिग्‍मांशु धूलिया


-अजय ब्रह्मात्‍मज

साहब बीवी और गैंगस्टर ़ ़ ़ इस फिल्म का नाम सुनते ही गुरुदत्त अभिनीत साहब बीवी और गुलामकी याद आती है। 1962 में बनी इस फिल्म का निर्देशन अबरार अल्वी ने किया था। इस फिल्म में छोटी बहू की भूमिका में मीना कुमारी ने अपनी जिंदगी के दर्द और आवाज को उतार दिया था। उस साल इस फिल्म को चार फिल्मफेअर पुरस्कार मिले थे। यह फिल्म भारत से विदेशी भाषा की कैटगरी में आस्कर के लिए भी भेजी गई थी। इस मशहूर फिल्म के मूल विचार लेकर ही तिग्मांशु धूलिया ने साहब बीवी और गैंगस्टरकी कल्पना की है।

तिग्मांशु धूलिया के शब्दों में, ‘हम ने मूल विचार पुरानी फिल्म से ही लिया है। लेकिन यह रिमेक नहीं है। हम पुरानी फिल्म से कोई छेड़छाड़ नहीं कर रहे हैं। साहब बीवी और गैंगस्टरसंबंधों की कहानी है, जिसमें सेक्स की राजनीति है। यह ख्वाबों की फिल्म है। जरूरी नहीं है कि हर आदमी मुख्यमंत्री बनने का ही ख्वाब देखे। छोटे ख्वाब भी हो सकते हैं। कोई नवाब बनने के भी ख्वाब देख सकता है।

इस फिल्म में गुलाम की जगह गैंगस्टर आ गया है। उसके आते ही यह आंसू और दर्द की कहानी रह जाती है। यह क्राइम और थ्रिलर है, जिसमें सारे किरदार अपने-अपने लाभ के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। तिग्मांशु कहते हैं, ‘वक्त बदल गया है। अब छोटी बहू आंसू नहीं बहाती। बहू का मिजाज बदल गया है। वह अपनी जिंदगी की कमियों के लिए रोती नहीं है। उसे हासिल करना चाहती है। इस चाहत में उसे गैंगस्टर का इस्तेमाल करने में भी हिचक नहीं होती। मैंने अपनी फिल्म को छोटे शहर में रखा है। मैंने किरदारों का पूरा एटीट्यूड बदल दिया है।

वे आगे बताते हैं, ‘मूल फिल्म में अकेलापन है। मेरी फिल्म का परिवेश देखेंगे तो इस अकेलेपन का एहसास होगा। वीराने में एक हवेली है। उसमें कुछ लोग रहते हैं, जिन्हें एक-दूसरे से कोई मतलब नहीं है। कहते ही हैं कि खाली दिमाग शैतान का अड्डा ़ ़ ़ तो अकेला आदमी अपनी परेशानियों से उबरने के लिए अजीब सी हरकतें करता है। मेरी फिल्म की बीवी रोती नहीं है। वह अपना हक लेना जानती है। हक लेने के लिए वह कुछ भी कर सकती है। भूतनाथ यहां पर गैंगस्टर है। नवाब साहब का काम कुछ अलग सा है।

साहब बीवी और गैंगस्टरमें आठ गाने हैं। इन दिनों युवा फिल्मकार अपनी फिल्मों में गाने डालने से बचते हैं। तिग्मांशु की सोच अलग है। वे हिंदी फिल्मों की इस शैली पर फख्र करते हैं, ‘हम गानों का क्यों न इस्तेमाल करें। मैंने साहब बीवी और गैंगस्टरमें आठ गाने रखे हैं। उन्हें अलग-अलग म्यूजिक डायरेक्टर ने संगीतबद्ध किया है। बहुत ही अच्छे और खूबसूरत गाने हैं। दो गाने तो गैरफिल्मी किस्म के हैं। एकअमित स्याल का गीत है। मजेदार बात है कि अमित स्याल की प्रेमिका ने उसे छोड़ दिया। उस गम में उसने गाना लिख दिया। और फिर एक सीडी भी बना दिया। वह इस गाने को गाता रहता है ़ ़ ़ बिछुडऩे की बातें हैं गाने में। मैंने उस गाने को इस फिल्म में रखा। इसी प्रकार सुनील भाटिया का एक गाना है। एक सूफियानी कव्वाली भी है।एक जुगनी भी है।

कलाकारों के चुनाव की बात पूछने पर तिग्मांशु धूलिया स्पष्ट करते हैं, ‘मेरा मानना है कि फिल्में फेल नहीं होतीं। उनका बजट फेल होता है। इस फिल्म में मैं स्टार सिस्टम को भेदना चाहता था। मैंने माही गिल को इस फिल्म का ऑफर दिया। वह जल्दी ही तैयार हो गई। जिमी शेरगिल से मेरा पुराना संबंध है। वे भी राजी हो गए। गैंगस्टर के रोल के लिए रणदीप हुडा को बुलाया। मैंने इस फिल्म को सीमित बजट में बनाया। मैंने पहली बार एलेक्सा कैमरा इस्तेमाल किया।

छोटी फिल्मों की मार्केटिंग और कलेक्शन के सवाल पर तिग्मांशु को गुस्सा आ जाता है। वे पूछते हैं, ‘80 करोड़ की किसी फिल्म के कलेक्शन से मेरी फिल्म की तुलना ट्रेड पंडित क्यों करते हैं? मेरी फिल्म तो 20 प्रतिशत बिजनेश कर भी अपनी कमाई कर लेती है। भाई 4-5 करोड़ के बिजनेश से भी मैं फायदे में आ जाता हूं, लेकिन ट्रेड पंडित लिखते और बताते हैं कि फलां छोटी फिल्म फ्लॉप हो गई। मेरा कहना है कि फिल्मों के टिकट रेट के साथ हिट-फ्लॉप का पैमाना भी बदलना होगा। इस बार देखना है कि क्या होता है?’The

केरल के ममूटी

केरल के ममूटी-अजय ब्रह्मात्‍मज

तीन राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके और बाबा साहेब अंबेडकर की भूमिका निभा चुके ममूटी की तस्वीर दिखाकर भी उनका नाम पूछा जाए, तो उत्तर भारत में बहुत कम फिल्मप्रेमी उन्हें पहचान पाएंगे। हिंदी सिनेमा के दर्शक अपने स्टारों की दुनिया से बाहर नहीं निकल पाते। पत्र-पत्रिकाओं में भी दक्षिण भारत के कन्नड़, तमिल, मलयाली या तेलुगू स्टारों पर हमारा ध्यान नहीं जाता। हम हॉलीवुड की फिल्मों और स्टारों से खुश होते हैं। यह विडंबना है। ममूटी ने दक्षिण के दूसरे पॉपुलर स्टारों की तरह हिंदी में ज्यादा फिल्में नहीं की हैं। हिंदी फिल्मों के निर्देशक उनके लिए भूमिकाएं नहीं चुन पाते। मैंने तो यह भी सुना है कि हिंदी के कुछ पॉपुलर स्टार दक्षिण के प्रतिभाशाली स्टारों के साथ काम करने से घबराते हैं। उन्हें डर रहता है कि उनकी पोल प˜ी खुल जाएगी। उल्लेखनीय है कि दक्षिण के स्टारों के पास अपनी भाषा में ही इतना काम रहता है कि वे हिंदी की तरफ देखते भी नहीं। प्रतिष्ठा, फिल्में और पैसे हर लिहाज से वे संपन्न हैं तो भला क्यों मुंबई आकर प्रतियोगिता में खड़े हों?

बहरहाल, पिछले 7 सितंबर को ममूटी का जन्मदिन था। अब वे साठ के हो गए हैं। इस उम्र में भी उनकी मांग और फिल्म सक्रियता कम नहीं हुई है। पिछले दिनों आई उनकी फिल्म बंबई मार्च 12 ने सभी को चौंका दिया था। तीन राष्ट्रीय पुरस्कारों के साथ उन्होंने केरल सरकार के सात पुरस्कार और फिल्मफेयर के 11 पुरस्कार हासिल किए हैं। इस प्रतिष्ठा के बावजूद उनकी विनम्रता प्रभावित करती है। मुझे उनसे हिंदी फिल्म शफक की शूटिंग के दौरान मिलने का मौका मिला। अफसोस है कि रवीना टंडन के साथ बन रही उनकी यह फिल्म अधूरी रह गई। उन्होंने हिंदी फिल्मों में धरतीपुत्र में काम किया था। उनकी एक-दो और हिंदी फिल्मों का जिक्र होता है, लेकिन वे नामालूम सी हैं।

केरल के वायकोम इलाके में चेंपू गांव में किसान परिवार में पैदा हुए ममूटी की आरंभिक शिक्षा कोच्चि और एर्नाकुलम में हुई। एर्नाकुलम से वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने दो साल इस पेशे में दिल लगाया, लेकिन वे जम नहीं पाए। दरअसल, कॉलेज के दिनों में ही उन्हें फिल्मों का शौक हो गया था। इस शौक के तहत वे फिल्मों में काम भी करने लगे थे। 1971 में बनी फिल्म अनभावंगल पालिचकल और 1973 में बनी फिल्म कालचक्रम में वे ऐसी ही भूमिकाओं में नजर आए। उन्होंने अपना नाम भी बदला, लेकिन 1979 में बनी फिल्म देवलोक में वे फिर से अपने सही नाम के साथ आए। इस फिल्म का निर्देशन एमटी वासुदेवन नायर ने किया था। लेकिन ममूटी की यह फिल्म रिलीज नहीं हो पाई थी। उनकी पहली फिल्म के जी जार्ज निर्देशित मेला मानी जा सकती है। इसके पहले की सारी फिल्मों में वे अपनी प्रतिभा के बावजूद पहचान में नहीं आ सके थे। फिर बीच का एक ऐसा दौर आया जब उन्होंने चंद सालों में ही 150 फिल्मों में काम किया। इनमें से 1986 में ही उनकी 35 फिल्में आई थीं। हिंदी फिल्मों के स्टार एक साल में इतनी फिल्मों की कल्पना ही नहीं कर सकते। ममूटी के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबसूरती है कि मलयाली के सुपरस्टार होने के बावजूद उन्होंने वहां की कला सिनेमा को भी प्रश्रय दिया। अडूर गोपालकृष्णन समेत सभी संवेदनशील डायरेक्टरों के साथ काम किया। हिंदी फिल्म प्रेमियों ने शायद मणिरत्‍‌नम की दलपति और राजीव मेनन की कोदुकोंदेन कोदूकोंदेन का नाम सुना होगा। ममूटी का महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय योगदान बाबा साहेब अंबेडकर है। 1999 में आई इस फिल्म में उन्होंने अंबेडकर की शीर्षक भूमिका निभाई। प्रोस्थेटिक मेकअप से उन्होंने अंबेडकर का रूप ग्रहण किया था। फिल्म में वे अपनी मुद्राओं और भंगिमाओं से जाहिर करते हैं कि वे अंबेडकर ही हैं। चूंकि हम अंबेडकर की चलती-फिरती और स्थिर छवियों से बखूबी परिचित हैं, इसलिए यह साम्यता चकित करती है। काश! हिंदी का कोई फिल्मकार मलयाली के इस प्रतिभाशाली अभिनेता के साथ हिंदी में कोई फिल्म बनाता।

Thursday, September 15, 2011

स्‍टैंड आउट करेगी 'मौसम'-शाहिद कपूर

-अजय ब्रह्मात्‍मज

समाज के बंधनों को पार करती स्वीट लव स्टोरी है 'मौसम'। मैं हरिंदर सिंह उर्फ हैरी का किरदार निभा रहा हूं। कहानी पंजाब के एक छोटे से गांव से शुरू होती है। हरिंदर की एयरफोर्स में नौकरी लगती है। जैसे-जैसे मैच्योरिटी के ग्राफ में अंतर आता है, आयत से उसका प्यार भी उतना ही खूबसूरत अंदाज लेता जाता है।

ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में 'मौसम' के शुद्ध प्यार से दर्शक जुड़ पाएंगे क्या?

कुछ साल पहले जब मैंने 'विवाह' की थी, तब भी ऐसे सवाल उठे थे कि क्या कोई पति ऐसी पत्नी को स्वीकार करेगा जिसका चेहरा झुलस गया हो? ऐसी फिल्में बननी कम हो गई हैं। मुझे लगता है कि 'मौसम' स्टैंड आउट करेगी। इसमें लड़का-लड़की मिलना चाहते हैं, लेकिन दूसरे कारणों से वे मिल नहीं पाते। दुनिया में कई ऐसी चीजें घटती हैं, जिन पर हमारा नियंत्रण नहीं रहता, लेकिन उनकी वजह से हमारा जीवन प्रभावित होता है।

फिल्म के प्रोमो में आप और सोनम एक-दूसरे को ताकते भर रहते हैं..मिलने की उम्मीद या जुदाई ही दिख रही है?

मिलना और बिछुड़ना दोनों ही हैं फिल्म में। 1992 से 2001 तक दस साल की कहानी है। छोटे शहरों में सत्रह-अठारह साल के लड़के-लड़की का मिल पाना ही बड़ी बात होती है। मुझे पहली बार एक लड़की पसंद आई थी, तो उससे जमकर बात करना मेरे लिए एक इवेंट रहा था। 'मौसम' में रोमांस और प्यार में मिलन के पहलू भी हैं।

दस सालों की इस कहानी में क्या अयोध्या विवाद से लेकर अमेरिका के व‌र्ल्ड ट्रेड सेंटर की घटना तक का बैकड्रॉप है?

आयत और हरेन्द्र के रिश्ते पर्सनल हैं, लेकिन उनके आसपास की घटनाएं हिस्टोरिकल व‌र्ल्ड इवेंट हैं। जिन्हें हम सभी ने महसूस किया है। वे घटनाएं कौन सी हैं..यह अभी नहीं बताऊंगा।

कुछ दृश्यों पर एयरफोर्स ने आपत्ति उठाई थी, उनके बारे में क्या कहते हैं? शूटिंग के दौरान एयरफोर्स बेस में बिताए पल कैसे रहे?

कुछ कम्प्यूटर ग्राफिक्स पोर्शन थे जिन्हें एडिट कर ठीक कर दिया गया है। लव स्टोरी में एयरफोर्स का काफी पोर्शन है। मेरे लिए एयरफोर्स बेस में 10 दिनों की शूटिंग का अनुभव बहुत ही यादगार रहा। ग्वालियर में एयरफोर्स बेस पर हमने शूट किया है। वहां मैंने बहुत कुछ सीखा जो जीवन में आगे काम आएगा। एयरफोर्स का जज्बा काबिले तारीफ है।

विमान उड़ाने का मौका मिला, कैसा अनुभव रहा?

छोटे फाइटर विमान उड़ाने का अनुभव मेरे लिए यादगार है। मुझे मिराज 2000 सिंगल इंजन और एफ-16 उड़ाने का मौका मिला। कमाल का अनुभव हुआ। थोड़े ही समय में एयरफोर्स की कई बारीकियां सीखीं एयरफोर्स में सभी डायनमिक लाइफ जीते हैं।

आप के लिए प्यार क्या है?

हम सभी को सच्चे प्यार की तलाश है। हम जब भी किसी रिश्ते में रहते हैं, तो चाहते हैं कि वह आम जिंदगी से बड़ा हो जाए। वह तलाश रहती है। उसी तलाश में हमारे रिश्ते बनते-बिगड़ते हैं। हम सभी को प्यार की ईमानदारी चाहिए होती है।

इस बीच आप परिपक्व हुए हैं। लुक में भी बदलाव आया है..?

मासूमियत अब भी है। 'कमीने' के समय मुझे मौका मिला कि मैं अपने शरीर पर मेहनत करूं और लुक बदलूं। मैं हर तरह के रोल निभाने के लिए तैयार हूं। उम्मीद है कि जल्दी ही एक मसाला एक्शन फिल्म भी करूंगा।

Monday, September 12, 2011

पहला मंत्र है भाषा की समझ-अमिताभ बच्‍चन

उनकी कला और संवाद अदायगी की कायल है अभिनेताओं की नई पीढ़ी। क्या है इसका रहस्य, बता रहे हैं अमिताभ बच्चन..

अभिषेक समेत नई पीढ़ी के सभी कलाकारों में से कोई भी मुझसे कुछ पूछना, जानना या समझना चाहते हैं तो मैं सबसे पहले कहता हूं कि भाषा समझिए। अगर आपकी भाषा सही होगी तो कला अपने आप आ जाएगी। भाषा सही हो जाए तो शब्दों को आप सही तरीके से पढ़ तो सकते हैं। मैंने ऐसा देखा है कि आजकल की पीढ़ी को भाषा नहीं आती। हिंदी लिखना नहीं आता। हिंदी पढ़ना नहीं आता। पढ़ते भी है तो रोमन में पढ़ते हैं। कुछ तो वह भी नहीं पढ़ सकते। उनके असिस्टैंट पढ़ कर सुनाते हैं। मेरा मानना है कि भाषा पर अधिकार नहीं है तो आपकी कला और अभिनय क्षमता भी बिम्बित नहीं हो पाएगी। आप को पता ही नहीं चलेगा कि भाषा का क्या ग्राफ है? कहां पर उतार आएगा और कहां पर चढ़ाव आएगा? कहां आप रूक सकते हैं और कहां आप जोड़ सकते हैं?

भाषा का ज्ञान नहीं होने पर आप गुलाम हो जाते हैं ... आप लेखक और सहायक की तरफ मदद के लिए देखते हैं। मैं यह नहीं कहता कि लेखक ने गलत लिखा होगा। वे अच्छा लिखते हैं, लेकिन भाषा के जानकार होने पर आप संवाद के मर्म को अपने शब्दों में थोड़े अलग अंदाज में भी कह सकते हैं। आप ऐसा तभी कर सकते हैं, जब आप भाषा जानते हों। नई पीढ़ी के कलाकारों से यही दुख रहता है मुझे।

मैं नहीं कहता कि मेरी भाषा उत्तम है या मैं अपनी भाषा में सब कुछ जानता हूं। उसमें भी कमियां हैं। मैंने हमेशा यह प्रयत्न किया कि भाषा सही रखूं। अगर मैं उचित उच्चारण करूंगा तो उससे मेरा अभिनय भी निखरेगा। मेरे पास कई बार सहयोगी आते हैं कि सर, बारह पंक्तियों का संवाद है। इसे तोड़ देते हैं। छोटे-छोटे टुकड़ों में ले लेंगे। मैं कहता हूं, नहीं एक साथ लेंगे तो वे चौंकते हैं। आप बारह पंक्तियां साथ बोल दें तो तालियां बजने लगती हैं। अब इसमें ताली बजाने लायक क्या बात रहती है। अजीब सा लगता है। अभिनेता के लिए जो जरूरी है, वह कर दो तो भी तालियां बज जाती हैं!

Sunday, September 11, 2011

सुपरहिट फिल्म के पांच फंडे


-मिहिर पांड्या

पिछले दिनों आई फिल्म बॉडीगार्ड को समीक्षकों ने सलमान की कुछ पुरानी सफल फिल्मों की तरह ही ज्यादा भाव नहीं दिया और फिल्म को औसत से ज्यादा रेटिंग नहीं मिली लेकिन फिल्म की बॉक्स-ऑफिस पर सफलता अभूतपूर्व है। दरअसल ऐसी फिल्मों की सफलता का फॉर्म्युला उनकी गुणवत्ता में नहीं, कहीं और है। क्या हैं वे फॉर्म्युले, फिल्म को करीब से देखने-समझने वालों से बातचीत कर बता रहे हैं मिहिर पंड्या :

नायक की वापसी

हिंदी फिल्मों का हीरो कहीं खो गया था। अपनी ऑडियंस के साथ मैं भी थियेटर में लौटा हूं। मैं भी फिल्में देखता हूं। थियेटर नहीं जा पाता तो डीवीडी पर देखता हूं। सबसे पहले यही देखता हूं कि कवर पर कौन-सा स्टार है? किस टाइप की फिल्म है? मैं देखूंगा उसकी इमेज के हिसाब से। हिंदी फिल्मों का हीरो वापस आया है। हीरोइज्म खत्म हो गया था। ऐक्टर के तौर पर मैं भी इसे मिस कर रहा था। मुझे लगता है कि मेरी तरह ही पूरा हिंदुस्तान मिस कर रहा होगा। कहीं-न-कहीं सभी को एक हीरो चाहिए।

- सलमान खान, हालिया साक्षात्कार में।

ऊपर दी गई बातचीत के इंटरव्यूअर और वरिष्ठ सिने पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज सलमान के घर के बाहर अभी निकले ही हैं कि उनका सामना वहां जमा छोटे बच्चों की टोली से हो गई है। ये बच्चे सलमान से मिलने को बेकरार हैं। अजय इन्हें अपने रिकॉर्डर पर सलमान की आवाज सुनवा देते हैं और बच्चे इतना सुनकर ही उन्हें घेर लेते हैं। नायकत्व की इससे बेहतर परीक्षा और क्या होगी?

इस बिंदु को विशेष तौर पर रेखांकित करते हुए अजय कहते हैं कि नायक की ऐसी छवि की बच्चा-बच्चा आपसे जुड़ाव महसूस करे, अभिनेता का अपने दर्शकों से सीधा रिश्ता बन जाने का निशानी है। ऐसे में कई बार यह होता है कि फिल्म समीक्षकों की राय और फिल्म की सफलता-असफलता में बहुत अंतर दिखाई देता है और बहुत कुछ नायक की दर्शक के बीच निमिर्त इमेज और उसकी संतुष्टि पर निर्भर होता है।

सलमान कहते हैं कि हमारी पिछली फिल्में, हमारी निजी जिंदगी, मीडिया के द्वारा बनी हमारी इमेज, सब एक साथ दर्शकों पर असर डालती है। दर्शक जब बॉडीगार्ड देखने गए होंगे तो उनके सामने बैठा यह सलमान खान ही वहां नहीं होता, बल्कि उनके दिमाग में प्रेम, राधे मोहन और चुलबुल पांडे जैसा किरदार भी होता है। ये सारी इमेजेज मिलकर जो सम्मोहन पैदा करती हैं। दर्शकों से यह रिश्ता क्या, कैसे और क्यों है, वे मेरे प्रशंसक मात्र हैं या परिवार के सदस्य की तरह हैं, लोग मुझे जानते नहीं, कभी मिले नहीं, फिर भी इतनी मोहब्बत!

अजय इसे हिंदी सिनेमा के पर्दे पर नायक की वापसी करार देते हैं। यही वजह है कि सलमान की ही ढेर सारी फिल्मों की याद दिलाने वाले बॉडीगार्ड को लोगों ने सराहा और बॉक्स ऑफिस पर फिल्म ने रेकार्ड कमाई की। दर्शक उस नायक को अब भी बहुत पसंद कर रहे जिसकी छवि लार्जर देन लाइफ हो और हर हालात में वह सेवियर नजर आए।

उत्तर भारतीय हिस्सेदारी

हिंदी सिनेमा पर निगाह रखने वाले एक बड़े तबके का यह भी मानना है कि हिंदी सिनेमा के व्यापक बाजार में बढ़ती उत्तर भारत की हिस्सेदारी ने इसके नायक को विदेश से वापस हिंदुस्तान के गांव-देहात में लौटाया है। नब्बे के दशक में शुरू हुआ सिनेमा का वह दौर जहां करोड़पति नायक विदेशों के अपने आलीशान घरों से हैलीकॉप्टर में बैठ भारत लौटा करते थे, से तुलना करने पर दबंग का मूंछवाला थानेदार चुलबुल पांडे एक बड़े बदलाव की ओर हमारा ध्यान खींचता है। यह नायक सत्तर और अस्सी के दशक के मुख्यधारा नायक की आपको बरबस याद दिलाता है।

नब्बे के दशक जब हिंदी सिनेमा की ऑडियंस में एक बड़ा बदलाव आ रहा था तो उससे फिल्म के विषय और उससे उभरनेवाली नायकीय छवि भी प्रभावित हो रही थी। जैसा पीपली लाइव के सह-निदेर्शक और इतिहासकार महमूद फारुकी का कहना है कि समाज के विभिन्न तबकों की खरीदने की क्षमता जिस अनुपात में बदलती है, उसका असर सिनेमा पर भी दिखता है और यह हिंदी सिनेमा का एक ऐसा दौर है जब सिनेमा बनाने वालों के रेडार में दिल्ली-मुंबई तो रहते हैं, लेकिन गोरखपुर जैसे शहर-कस्बे पूरी तरह गायब हो जाते हैं।

पिछले दिनों आई एक और सफल फिल्म तनु वेड्स मनु के गीतकार राज शेखर इन मास लेवल पर सफल हो रही फिल्मों को उस एलीट एनआरआई पंजाबी कल्चर के प्रति एक विद्रोह के तौर पर भी देखते हैं, जिन्हें नब्बे के दशक में हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा के तौर पर चिह्नित किया गया। बेशक तमाम फॅर्म्युले बाजार को ध्यान में रख ही बनाए जाते हैं और आज भी सबसे ऊपर बॉक्स-ऑफिस के नतीजे ही हैं, ऐसे में इस बदलते सिनेमा को बाजार के बदलते स्वरूप के एक विजिबल फैक्टर के तौर पर चिह्नित किया जाना पूरी तरह गलत भी नहीं। बॉडीगार्ड की सफलता को भी ऐसे ही देखा जाना चाहिए।

ब्लॉकबस्टर नहीं प्रॉडक्ट

लेकिन, इस बाजार में सिनेमा का की जगह अब वो नहीं रही जो आज से दस-बीस साल पहले थी। नई ब्लॉकबस्टर्स पर बात करते हुए वरिष्ठ सिने आलोचक नम्रता जोशी बताती हैं कि आज के मल्टि-प्लेक्स सिनेमाहाल बड़ी-बड़ी मॉल के भीतर होते हैं। एक तरफ ब्रांडेड कपड़े, घडि़यां, पर्स, गहने, मोबाइल बिक रहे हैं और वहीं दूसरी ओर सिनेमाहाल का टिकट काउंटर खुला हुआ है। यह सीधा संकेत है कि अब हमारे लिए सिनेमा भी एक प्रॉडक्ट की तरह है। ऐसे में दर्शक सिनेमा से किसी तरह का सीधा और लंबे समय का रिश्ता नहीं बनाता बल्कि उसे भी वीकेंड पर खरीदे किसी ब्रांडेड प्रॉडक्ट और किसी बड़े रेस्टोरेंट में डिनर की तरह लेता है। तब बड़ा हीरो इस ब्रांड की स्थापना में सबसे बड़ा कारक बनकर उभरता है। इसीलिए करोड़ों की कमाई के बावजूद आज की ब्लॉकबस्टर्स की उमर पहले की सफल फिल्मों की तुलना में बहुत छोटी है। भले ही गजनी या बॉडीगार्ड ने शोले से कहीं ज्यादा पैसे कमाए हों, आप शोले की लोकप्रियता के सामने इन फिल्मों को इसलिए नहीं रख सकते क्योंकि आज की इन ब्लॉकबस्टर्स की उमर हफ्ते-दो-हफ्ते से ज्यादा की नहीं।

नई पीढ़ी की दखल

अभिनेता मनोज बाजपेयी बताते हैं कि न सिर्फ ऑडियंस के स्तर पर, बल्कि नब्बे के दशक में सिनेमा बनाने वाले भी ज्यादातर ऐसे हिस्सों से आते थे जिनका हिन्दुस्तान के गांव-देहातों से सीधा जुड़ाव नहीं था। लेकिन, पिछले दशक में एक पूरी पीढ़ी हिंदी सिनेमा में सक्रिय हुई है जिसकी कहानियां उनके अपने कस्बाई परिवेश से निकलकर आ रही हैं। अभिनव कश्यप से लेकर दिबाकर बनर्जी तक सिनेमा बनाने वालों की यह नई पीढ़ी फॉर्म्युला फिल्मों से लेकर बड़ी गुणवत्ता वाली फिल्में बना रही है, लेकिन देसी छौंक के साथ खुद उनकी पिछली दोनों सफल फिल्मों के निर्देशक प्रकाश झा आज भी अपनी फिल्म का आधार उत्तर भारतीय कस्बों में रखना ही पसंद करते हैं।

महमूद फारुकी ने पिछले दिनों बातचीत में कहा था कि आज का मुंबई का सिनेमा तो दरअसल दिल्ली यूनिवर्सिटी का सिनेमा है। सुधीर मिश्रा से लेकर विशाल भारद्वाज, अनुराग कश्यप, इम्तियाज अली, राजकुमार गुप्ता तक सभी नई पीढ़ी के निर्देशक यहीं से तो होकर निकले हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि ये सभी बरास्ते दिल्ली होते हुए भले ही निकले हों, पर इनमें से ज्यादातर उत्तर भारत के छोटे कस्बों और शहरों की पैदाइश हैं। इनके सिनेमा में दिल्ली भी आती है और अपना छूटा हुआ कस्बाई परिवेश भी। इनके नायक मूंछो वाले हैं और उन्हें नब्बे के दशक में आए मेट्रोसेक्सुअल नायक से किसी भी तरह नहीं जोड़ा जा सकता।

राज शेखर भी इससे सहमति जताते हैं। उनका मानना है कि सिनेमा में अलग-अलग स्तरों पर हिंदी पट्टी से आए नौजवानों ने अपनी जगह बनाई है और अब बाजार में दिखाई देते परिवर्तन के साथ उन्हें अपनी बात कहने का मौका मिल रहा है। चूंकि यह सब बाजार की शर्तों पर ही हो रहा है इसीलिए ऐसी फिल्मों में कहानी को जानबूझकर पुराने ढर्रे पर ही चलाया जाता है।

मार्केटिंग और तकनीकी चमत्कार

बाजार का दबाव अब भी कायम है, बल्कि कहना चाहिए कि उसका प्रभाव बढ़ा ही है। सिनेमा की सफलता अब फिल्म की गुणवत्ता से ज्यादा उसकी प्री-पब्लिसिटी और स्टारकास्ट पर निर्भर होती जा रही है। यह एक ऐसा बाजार समय है जिसमें ब्लॉकबस्टर फिल्मों की किस्मत का फैसला फिल्म के प्रदर्शन के पहले तीन दिनों में ही हो जाता है। ऐसे में सिनेमा बनानेवाले फिल्म में ज्यादा से ज्यादा तकनीकी चमत्कार भर अन्य चीजों को गौण बनाने के फॉर्म्युले पर अमल करते दिख रहे हैं।

एक सवाल के जवाब में मनोज बाजपेयी हालिया प्रदर्शित फिल्म सिंघम, वॉंटेड, और बॉडीगार्ड जैसी ऐक्शन फिल्मों के ट्रेंड को हिंदी सिनेमा में तकनीकी गुणवत्ता के साथ सिनेमा में तकनीकी चमत्कार भर देने को एक प्रवृत्ति के तौर पर भी स्वीकारते हैं। उनका कहना है कि आगे आने वाली फिल्में : रा-वन और कृष-3 के साथ यह ट्रेंड और नए आयाम पर जाने वाला है। ऐसी फिल्में तकनीक पर सबसे ज्यादा भरोसा करती हैं और इनमें कहानी जैसी चीजें गौण हो जाती हैं। फिर इस दौर में जब एक ही हफ्ते पांच-पांच फिल्में रिलीज हो रही हों, दर्शक का एक ही फिल्म से लंबा जुड़ाव संभव नहीं। ऐसे में यह तकनीकी चमत्कार सिनेमा का सबसे मान्य फॉर्म्युला बनकर उभर रहा है।

आज के दौर का सिनेमा अपनी पहचान बचाने के लिए अन्य मनोरंजन माध्यमों से भी लड़ रहा है। ऐसे में टीवी और इंटरनेट की चुनौती के सामने उसे अपना पैमाना और दायरा बड़ा करना भी एक चुनौती है। फिल्में और यादा मंहगी होती जा रही हैं और उनका तकनीकी पहलू भले ही बेहतर हो रहा हो, उनका स्वभाव बदल रहा है।

अनुराग कश्यप ने एक मुलाकात में कहा था कि सिनेमा में जितना ज्यादा पैसा आता है, उतना ही निर्देशक की आजादी छिनती जाती है। बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्मों के साथ एक समान बात जो इन दिनों देखने में आ रही है वह यही है कि यहां स्टार की इमेज को भुनाने की कोशिश ज्यादा है और कहानी के स्तर पर किसी भी नए प्रयोग की चाहत बहुत कम। फिर भी इतना साफ है कि मुख्यधारा सिनेमा बीते दो-तीन सालों में एक नई दिशा की ओर मुड़ा है, कहानियों में शहर से बाहर का देहात दिखने लगा है और नायक-खलनायक की पुरानी जोड़ियां सिनेमा में वापस आई हैं। अब यह दिशा अच्छे की ओर जाती है या और बुरे की ओर, यह तो आनेवाला वक्त ही बताएगा।पिछले दिनों आई फिल्म बॉडीगार्ड को समीक्षकों ने सलमान की कुछ पुरानी सफल फिल्मों की तरह ही ज्यादा भाव नहीं दिया और फिल्म को औसत से ज्यादा रेटिंग नहीं मिली लेकिन फिल्म की बॉक्स-ऑफिस पर सफलता अभूतपूर्व है। दरअसल ऐसी फिल्मों की सफलता का फॉर्म्युला उनकी गुणवत्ता में नहीं, कहीं और है। क्या हैं वे फॉर्म्युले, फिल्म को करीब से देखने-समझने वालों से बातचीत कर बता रहे हैं मिहिर पंड्या :

नायक की वापसी

हिंदी फिल्मों का हीरो कहीं खो गया था। अपनी ऑडियंस के साथ मैं भी थियेटर में लौटा हूं। मैं भी फिल्में देखता हूं। थियेटर नहीं जा पाता तो डीवीडी पर देखता हूं। सबसे पहले यही देखता हूं कि कवर पर कौन-सा स्टार है? किस टाइप की फिल्म है? मैं देखूंगा उसकी इमेज के हिसाब से। हिंदी फिल्मों का हीरो वापस आया है। हीरोइज्म खत्म हो गया था। ऐक्टर के तौर पर मैं भी इसे मिस कर रहा था। मुझे लगता है कि मेरी तरह ही पूरा हिंदुस्तान मिस कर रहा होगा। कहीं-न-कहीं सभी को एक हीरो चाहिए।

- सलमान खान, हालिया साक्षात्कार में।

ऊपर दी गई बातचीत के इंटरव्यूअर और वरिष्ठ सिने पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज सलमान के घर के बाहर अभी निकले ही हैं कि उनका सामना वहां जमा छोटे बच्चों की टोली से हो गई है। ये बच्चे सलमान से मिलने को बेकरार हैं। अजय इन्हें अपने रिकॉर्डर पर सलमान की आवाज सुनवा देते हैं और बच्चे इतना सुनकर ही उन्हें घेर लेते हैं। नायकत्व की इससे बेहतर परीक्षा और क्या होगी?

इस बिंदु को विशेष तौर पर रेखांकित करते हुए अजय कहते हैं कि नायक की ऐसी छवि की बच्चा-बच्चा आपसे जुड़ाव महसूस करे, अभिनेता का अपने दर्शकों से सीधा रिश्ता बन जाने का निशानी है। ऐसे में कई बार यह होता है कि फिल्म समीक्षकों की राय और फिल्म की सफलता-असफलता में बहुत अंतर दिखाई देता है और बहुत कुछ नायक की दर्शक के बीच निमिर्त इमेज और उसकी संतुष्टि पर निर्भर होता है।

सलमान कहते हैं कि हमारी पिछली फिल्में, हमारी निजी जिंदगी, मीडिया के द्वारा बनी हमारी इमेज, सब एक साथ दर्शकों पर असर डालती है। दर्शक जब बॉडीगार्ड देखने गए होंगे तो उनके सामने बैठा यह सलमान खान ही वहां नहीं होता, बल्कि उनके दिमाग में प्रेम, राधे मोहन और चुलबुल पांडे जैसा किरदार भी होता है। ये सारी इमेजेज मिलकर जो सम्मोहन पैदा करती हैं। दर्शकों से यह रिश्ता क्या, कैसे और क्यों है, वे मेरे प्रशंसक मात्र हैं या परिवार के सदस्य की तरह हैं, लोग मुझे जानते नहीं, कभी मिले नहीं, फिर भी इतनी मोहब्बत!

अजय इसे हिंदी सिनेमा के पर्दे पर नायक की वापसी करार देते हैं। यही वजह है कि सलमान की ही ढेर सारी फिल्मों की याद दिलाने वाले बॉडीगार्ड को लोगों ने सराहा और बॉक्स ऑफिस पर फिल्म ने रेकार्ड कमाई की। दर्शक उस नायक को अब भी बहुत पसंद कर रहे जिसकी छवि लार्जर देन लाइफ हो और हर हालात में वह सेवियर नजर आए।

उत्तर भारतीय हिस्सेदारी

हिंदी सिनेमा पर निगाह रखने वाले एक बड़े तबके का यह भी मानना है कि हिंदी सिनेमा के व्यापक बाजार में बढ़ती उत्तर भारत की हिस्सेदारी ने इसके नायक को विदेश से वापस हिंदुस्तान के गांव-देहात में लौटाया है। नब्बे के दशक में शुरू हुआ सिनेमा का वह दौर जहां करोड़पति नायक विदेशों के अपने आलीशान घरों से हैलीकॉप्टर में बैठ भारत लौटा करते थे, से तुलना करने पर दबंग का मूंछवाला थानेदार चुलबुल पांडे एक बड़े बदलाव की ओर हमारा ध्यान खींचता है। यह नायक सत्तर और अस्सी के दशक के मुख्यधारा नायक की आपको बरबस याद दिलाता है।

नब्बे के दशक जब हिंदी सिनेमा की ऑडियंस में एक बड़ा बदलाव आ रहा था तो उससे फिल्म के विषय और उससे उभरनेवाली नायकीय छवि भी प्रभावित हो रही थी। जैसा पीपली लाइव के सह-निदेर्शक और इतिहासकार महमूद फारुकी का कहना है कि समाज के विभिन्न तबकों की खरीदने की क्षमता जिस अनुपात में बदलती है, उसका असर सिनेमा पर भी दिखता है और यह हिंदी सिनेमा का एक ऐसा दौर है जब सिनेमा बनाने वालों के रेडार में दिल्ली-मुंबई तो रहते हैं, लेकिन गोरखपुर जैसे शहर-कस्बे पूरी तरह गायब हो जाते हैं।

पिछले दिनों आई एक और सफल फिल्म तनु वेड्स मनु के गीतकार राज शेखर इन मास लेवल पर सफल हो रही फिल्मों को उस एलीट एनआरआई पंजाबी कल्चर के प्रति एक विद्रोह के तौर पर भी देखते हैं, जिन्हें नब्बे के दशक में हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा के तौर पर चिह्नित किया गया। बेशक तमाम फॅर्म्युले बाजार को ध्यान में रख ही बनाए जाते हैं और आज भी सबसे ऊपर बॉक्स-ऑफिस के नतीजे ही हैं, ऐसे में इस बदलते सिनेमा को बाजार के बदलते स्वरूप के एक विजिबल फैक्टर के तौर पर चिह्नित किया जाना पूरी तरह गलत भी नहीं। बॉडीगार्ड की सफलता को भी ऐसे ही देखा जाना चाहिए।

ब्लॉकबस्टर नहीं प्रॉडक्ट

लेकिन, इस बाजार में सिनेमा का की जगह अब वो नहीं रही जो आज से दस-बीस साल पहले थी। नई ब्लॉकबस्टर्स पर बात करते हुए वरिष्ठ सिने आलोचक नम्रता जोशी बताती हैं कि आज के मल्टि-प्लेक्स सिनेमाहाल बड़ी-बड़ी मॉल के भीतर होते हैं। एक तरफ ब्रांडेड कपड़े, घडि़यां, पर्स, गहने, मोबाइल बिक रहे हैं और वहीं दूसरी ओर सिनेमाहाल का टिकट काउंटर खुला हुआ है। यह सीधा संकेत है कि अब हमारे लिए सिनेमा भी एक प्रॉडक्ट की तरह है। ऐसे में दर्शक सिनेमा से किसी तरह का सीधा और लंबे समय का रिश्ता नहीं बनाता बल्कि उसे भी वीकेंड पर खरीदे किसी ब्रांडेड प्रॉडक्ट और किसी बड़े रेस्टोरेंट में डिनर की तरह लेता है। तब बड़ा हीरो इस ब्रांड की स्थापना में सबसे बड़ा कारक बनकर उभरता है। इसीलिए करोड़ों की कमाई के बावजूद आज की ब्लॉकबस्टर्स की उमर पहले की सफल फिल्मों की तुलना में बहुत छोटी है। भले ही गजनी या बॉडीगार्ड ने शोले से कहीं ज्यादा पैसे कमाए हों, आप शोले की लोकप्रियता के सामने इन फिल्मों को इसलिए नहीं रख सकते क्योंकि आज की इन ब्लॉकबस्टर्स की उमर हफ्ते-दो-हफ्ते से ज्यादा की नहीं।

नई पीढ़ी की दखल

अभिनेता मनोज बाजपेयी बताते हैं कि न सिर्फ ऑडियंस के स्तर पर, बल्कि नब्बे के दशक में सिनेमा बनाने वाले भी ज्यादातर ऐसे हिस्सों से आते थे जिनका हिन्दुस्तान के गांव-देहातों से सीधा जुड़ाव नहीं था। लेकिन, पिछले दशक में एक पूरी पीढ़ी हिंदी सिनेमा में सक्रिय हुई है जिसकी कहानियां उनके अपने कस्बाई परिवेश से निकलकर आ रही हैं। अभिनव कश्यप से लेकर दिबाकर बनर्जी तक सिनेमा बनाने वालों की यह नई पीढ़ी फॉर्म्युला फिल्मों से लेकर बड़ी गुणवत्ता वाली फिल्में बना रही है, लेकिन देसी छौंक के साथ खुद उनकी पिछली दोनों सफल फिल्मों के निर्देशक प्रकाश झा आज भी अपनी फिल्म का आधार उत्तर भारतीय कस्बों में रखना ही पसंद करते हैं।

महमूद फारुकी ने पिछले दिनों बातचीत में कहा था कि आज का मुंबई का सिनेमा तो दरअसल दिल्ली यूनिवर्सिटी का सिनेमा है। सुधीर मिश्रा से लेकर विशाल भारद्वाज, अनुराग कश्यप, इम्तियाज अली, राजकुमार गुप्ता तक सभी नई पीढ़ी के निर्देशक यहीं से तो होकर निकले हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि ये सभी बरास्ते दिल्ली होते हुए भले ही निकले हों, पर इनमें से ज्यादातर उत्तर भारत के छोटे कस्बों और शहरों की पैदाइश हैं। इनके सिनेमा में दिल्ली भी आती है और अपना छूटा हुआ कस्बाई परिवेश भी। इनके नायक मूंछो वाले हैं और उन्हें नब्बे के दशक में आए मेट्रोसेक्सुअल नायक से किसी भी तरह नहीं जोड़ा जा सकता।

राज शेखर भी इससे सहमति जताते हैं। उनका मानना है कि सिनेमा में अलग-अलग स्तरों पर हिंदी पट्टी से आए नौजवानों ने अपनी जगह बनाई है और अब बाजार में दिखाई देते परिवर्तन के साथ उन्हें अपनी बात कहने का मौका मिल रहा है। चूंकि यह सब बाजार की शर्तों पर ही हो रहा है इसीलिए ऐसी फिल्मों में कहानी को जानबूझकर पुराने ढर्रे पर ही चलाया जाता है।

मार्केटिंग और तकनीकी चमत्कार

बाजार का दबाव अब भी कायम है, बल्कि कहना चाहिए कि उसका प्रभाव बढ़ा ही है। सिनेमा की सफलता अब फिल्म की गुणवत्ता से ज्यादा उसकी प्री-पब्लिसिटी और स्टारकास्ट पर निर्भर होती जा रही है। यह एक ऐसा बाजार समय है जिसमें ब्लॉकबस्टर फिल्मों की किस्मत का फैसला फिल्म के प्रदर्शन के पहले तीन दिनों में ही हो जाता है। ऐसे में सिनेमा बनानेवाले फिल्म में ज्यादा से ज्यादा तकनीकी चमत्कार भर अन्य चीजों को गौण बनाने के फॉर्म्युले पर अमल करते दिख रहे हैं।

एक सवाल के जवाब में मनोज बाजपेयी हालिया प्रदर्शित फिल्म सिंघम, वॉंटेड, और बॉडीगार्ड जैसी ऐक्शन फिल्मों के ट्रेंड को हिंदी सिनेमा में तकनीकी गुणवत्ता के साथ सिनेमा में तकनीकी चमत्कार भर देने को एक प्रवृत्ति के तौर पर भी स्वीकारते हैं। उनका कहना है कि आगे आने वाली फिल्में : रा-वन और कृष-3 के साथ यह ट्रेंड और नए आयाम पर जाने वाला है। ऐसी फिल्में तकनीक पर सबसे ज्यादा भरोसा करती हैं और इनमें कहानी जैसी चीजें गौण हो जाती हैं। फिर इस दौर में जब एक ही हफ्ते पांच-पांच फिल्में रिलीज हो रही हों, दर्शक का एक ही फिल्म से लंबा जुड़ाव संभव नहीं। ऐसे में यह तकनीकी चमत्कार सिनेमा का सबसे मान्य फॉर्म्युला बनकर उभर रहा है।

आज के दौर का सिनेमा अपनी पहचान बचाने के लिए अन्य मनोरंजन माध्यमों से भी लड़ रहा है। ऐसे में टीवी और इंटरनेट की चुनौती के सामने उसे अपना पैमाना और दायरा बड़ा करना भी एक चुनौती है। फिल्में और यादा मंहगी होती जा रही हैं और उनका तकनीकी पहलू भले ही बेहतर हो रहा हो, उनका स्वभाव बदल रहा है।

अनुराग कश्यप ने एक मुलाकात में कहा था कि सिनेमा में जितना ज्यादा पैसा आता है, उतना ही निर्देशक की आजादी छिनती जाती है। बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्मों के साथ एक समान बात जो इन दिनों देखने में आ रही है वह यही है कि यहां स्टार की इमेज को भुनाने की कोशिश ज्यादा है और कहानी के स्तर पर किसी भी नए प्रयोग की चाहत बहुत कम। फिर भी इतना साफ है कि मुख्यधारा सिनेमा बीते दो-तीन सालों में एक नई दिशा की ओर मुड़ा है, कहानियों में शहर से बाहर का देहात दिखने लगा है और नायक-खलनायक की पुरानी जोड़ियां सिनेमा में वापस आई हैं। अब यह दिशा अच्छे की ओर जाती है या और बुरे की ओर, यह तो आनेवाला वक्त ही बताएगा।

ये पिक्चर फिल्मी है!

-अजय ब्रह्मात्‍मज

कुछ हफ्ते पहले डर्टी पिक्चर की छवियां और ट्रेलर दर्शकों के बीच आए, तो विद्या बालन की मादक अदाओं को देख कर सभी चौंके। यह फिल्म नौवें दशक की दक्षिण की अभिनेत्री सिल्क स्मिता के जीवन से रेफरेंस लेकर बनी है। भारतीय सिनेमा में वह एक ऐसा दौर था, जब सेक्सी और कामुक किस्म की अभिनेत्रियों के साथ फिल्में बनाई जा रही थीं। हिंदी और दक्षिण भारतीय भाषाओं में ऐसी अभिनेत्रियों को पर्याप्त फिल्में मिल रही थीं। सिल्क स्मिता, डिस्को शांति, नलिनी और दूसरी अभिनेत्रियों ने इस दौर में खूब नाम कमाया। नौवें दशक की ऐसी अभिनेत्रियों को ध्यान में रख कर ही मिलन लुथरिया ने डर्टी पिक्चर की कल्पना की।

डर्टी पिक्चर का निर्माण बालाजी टेलीफिल्म कर रही है। इस प्रोडक्शन कंपनी के प्रभारी तनुज गर्ग स्पष्ट कहते हैं, ''हमारी फिल्म पूरी तरह से कल्पना है। यह किसी अभिनेत्री के जीवन पर आधारित नहीं है। हम ने नौवें दशक की फिल्म इंडस्ट्री की पृष्ठभूमि में एक फिल्म की कल्पना की है। इसमें मुख्य भूमिका में विद्या बालन को इसलिए चुना है कि आम दर्शक इसे फूहड़ या घटिया प्रयास न समझें।''

विद्या बालन की वजह से डर्टी पिक्चर की गरिमा और जिज्ञासा बढ़ गई है। पिछले साल आई इश्किया में विद्या बालन ने अपने इस मादक अंदाज की झलक दी थी, लेकिन तस्वीरों और ट्रेलर के आधार पर साफ दिख रहा है कि डर्टी पिक्चर विद्या बालन की इमेज के विपरीत बोल्ड और ओपन फिल्म है। विद्या बालन डर्टी पिक्चर को अपने कॅरियर की बड़ी चुनौती मानती हैं। वे कहती हैं, ''इस फिल्म के लिए मैंने अपनी झेंप और आशंकाएं खत्म कर दीं। फिल्म के कथ्य से सहमत होने के बाद मुझे कभी कोई दिक्कत नहीं हुई।''

हिंदी फिल्मों की बात करें तो हमारे फिल्मकार जीवनी और बॉयोपिक फिल्मों के निर्माण से बचते रहे हैं। कुछ डाक्यूमेंट्री मिल जाएंगी, लेकिन फीचर फिल्म का घोर अभाव है। कानूनी और संवेदनात्मक समस्याओं के कारण भारत में बहुत कम बॉयोपिक बनती हैं। कुछ ऐतिहासिक हस्तियों पर सरकारी देखरेख में अवश्य फिल्में बनी हैं, लेकिन ज्यादातर फिल्मकार किसी बड़ी हस्ती की जीवनी को फिल्म में ढालने से डरते रहे हैं। अभी तक महात्मा गांधी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस और सरदार पटेल जैसे स्वतंत्रता सेनानियों पर ही फिल्में बनी हैं। आजादी के बाद की चर्चित राजनेता इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी पर फिल्मों की योजनाओं की खबरें आती रहती हैं, लेकिन कोई ठोस प्रगति नजर नहीं आती।

फिल्मों में फिल्म इंडस्ट्री और फिल्मी हस्ती दो प्रकार से आते रहे हैं। कुछ फिल्में फिल्मों की पृष्ठभूमि पर बनी हैं। रंगीला और लक बाई चांस को ऐसी फिल्में मान सकते हैं। ऐसी फिल्मों में स्टार, स्ट्रगलर, डायरेक्टर और अन्य किरदारों के जरिए फिल्म इंडस्ट्री के तनावों, मुश्किलों, संघर्षो और विजय की कहानियां कही जाती हैं। दर्शकों को ऐसी फिल्में अच्छी लगती हैं, क्योंकि फिल्म इंडस्ट्री की कार्यप्रणाली, गतिविधि और अंतर्विरोधों से वे परिचित होते हैं। दूसरी तरफ महेश भट्ट जैसे निर्देशक हैं। उन्होंने अपनी जीवन के अंशों पर अर्थ, जनम, वो लम्हे और जख्म जैसी फिल्मों की कहानियां लिखीं और उन्हें रोचक एवं मनोरंजक तरीके से पेश किया। महेश भट्ट बताते हैं, ''मैं फैशन और ट्रेंड के मुताबिक चालू फिल्में बना कर हार गया था। कहीं कोई राह नहीं दिख रही थी। ऐसे मुश्किल वक्त में मानवीय संवेदना की सारांश और विवाहेतर संबंधों को लेकर अर्थ का मैंने निर्देशन किया। अर्थ पूरी तरह से मेरे और परवीन बॉबी के संबंधों पर आधारित फिल्म थी। अपने जीवन की भावनात्मक समस्या को मैंने फिल्म का रूप दे दिया और उसे विवाहेतर संबंध की शिकार निर्दोष औरत के दृष्टिकोण से पेश किया था। अर्थ दर्शकों को खूब पसंद आई थी।''

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ख्वाहिशों की इंडस्ट्री है। यहां आने के लिए लालायित व्यक्तियों की जिंदगी और संघर्ष को भी कुछ फिल्मकारों ने चित्रित किया है। असरानी की चला मुरारी हीरो बनने और मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूं ऐसी ही फिल्में थीं। इस विधा में और भी कुछ फिल्में आई हैं, लेकिन उतनी चर्चित नहीं हो सकीं। हॉलीवुड बॉलीवुड में दीपा मेहता ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को अलग नजरिए से देखा। फराह खान की ओम शांति ओम भी एक स्ट्रगलर और स्टार की कहानी थी। शाहरुख खान के डबल रोल की यह फिल्म खूब चली।

डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी जीवनी फिल्मों को पीरियड फिल्मों का विस्तार मानते हैं। वे कहते हैं, ''अपने यहां पीरियड पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता। ऐसी फिल्मों के कथ्य विवादास्पद हो जाते है, इसलिए फिल्मकार हाथ लगाने से डरते हैं। इसके अलावा स्टार के परिवेश को भी गढ़ना होता है। मैं डर्टी पिक्चर देखना चाहूंगा। मुझे उम्मीद है कि मिलन लूथरिया ने नौवें दशक के परिवेश को वास्तविक रंग दिया होगा।''

खबर है कि अनुराग बसु किशोर कुमार के जीवन पर एक फिल्म की प्लानिंग कर चुके हैं, जिसमें रणबीर कपूर मुख्य भूमिका निभाएंगे। कुछ समय पहले चर्चा थी कि गुरदत्त के जीवन पर एक फिल्म अनुराग कश्यप लिख रहे हैं। बाद में वह फिल्म अटक गई। अनुराग कश्यप बताते हैं, ''अपने यहां मर्यादा और नैतिकता बड़ी सीमा है। इनकी वजह से जिंदगी की सच्चाइयों को पर्दे पर नहीं लाया जा सकता। हम अपने जीवन के प्रति ही ईमानदारी नहीं रखते।''

युवा फिल्मकार प्रवेश भारद्वाज कहते हैं, ''अपने यहां ईमानदार बायोग्राफी ही नहीं लिखी गई है। किसी के मर जाने पर आप कुछ भी कह लें, उसे काटने या विरोध करने तो कोई नहीं आता। कुछ लोग अपने अतीत के बारे में ऐसे बातें करते हैं, जैसे वे ही सब कुछ डिक्टेट करते थे।'' प्रवेश भारद्वाज फिल्म संबंधी बॉयोपिक फिल्मों में श्याम बेनेगल की भूमिका और परेश मोकाशी की हरिश्चंद्राची फैक्ट्री का उल्लेख करते हैं।

श्याम बेनेगल की भूमिका हंसा वाडकर के जीवन पर आधारित फिल्म थी जिसमें स्मिता पाटिल ने उनकी भूमिका निभायी थी। यह फिल्म हंसा के निजी जीवन के साथ उनके प्रोफेशनल कॅरियर को भी समेटती चलती है। स्मिता पाटिल के भावपूर्ण अभिनय ने इसे विश्वसनीय रूप दिया था। कहते हैं कि इसके प्रीमियर में हंसा वाडकर स्वयं आई थीं और उन्होंने स्मिता पाटिल के अभिनय की तारीफ की थी।

देखना है कि डर्टी पिक्चर के बाद बायोपिक या फिल्म हस्तियों से प्रेरित फिल्मों का ट्रेड बढ़ता है या नहीं!

Friday, September 9, 2011

फिल्‍म समीक्षा : मेरे ब्रदर की दुल्‍हन


-अजय ब्रह्मात्‍मज

पंजाब की पृष्ठभूमि से बाहर निकलने की यशराज फिल्म्स की नई कोशिश मेरे ब्रदर की दुल्हन है। इसके पहले बैंड बाजा बारात में उन्होंने दिल्ली की कहानी सफल तरीके से पेश की थी। वही सफलता उन्हें देहरादून के लव-कुश की कहानी में नहीं मिल सकी है। लव-कुश छोटे शहरों से निकले युवक हैं। ने नए इंडिया के यूथ हैं। लव लंदन पहुंच चुका है और कुश मुंबई की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में आ गया है। उल्लेखनीय है कि दोनों का दिल अपने छोटे शहर की लड़कियों पर नहीं आया है। क्राइसिस यह है कि बड़े भाई लव का ब्रेकअप हो गया है और वह एकबारगी चाहता है कि उसे कोई मॉडर्न इंडियन लड़की ही चाहिए। बड़े भाई को यकीन है कि छोटे भाई की पसंद उससे मिलती-जुलती होगी, क्योंकि दोनों को माधुरी दीक्षित पसंद थीं।

किसी युवक की जिंदगी की यह क्राइसिस सच्ची होने के साथ फिल्मी और नकली भी लगती है। बचे होंगे कुछ लव-कुश, जिन पर लेखक-निर्देशक अली अब्बास जफर की नजर पड़ी होगी और जिनका प्रोफाइल यशराज फिल्म्स के आदित्य चोपड़ा को पसंद आया होगा। इस क्राइसिस का आइडिया रोचक लगता है, लेकिन कहानी रचने और चित्रित करने में अली अब्बास जफर ढीले पड़ गए हैं। कहानी की रोचकता बनाए रखने के लिए उनके पास वजह और घटनाएं नहीं थीं। थोड़ी देर के लिए लगता है कि हम टीवी पर चल रहा कोई कामेडी शो देख रहे हैं। इंटरवल के आगे-पीछे कहानी अटक सी गई है। लव-कुश और डिंपल के पिताओं की बकझक और सहमति फिल्म के प्रभाव को और गिराती है।

स्क्रिप्ट में चुस्ती रहती और घटनाएं तेजी से घटतीं तो मेरे ब्रदर की दुल्हन इंटरेस्टिंग रोमांटिक कामेडी हो सकती थी। इस फिल्म की दूसरी बड़ी बाधा इमरान खान हैं। अपनी कोशिशों के बावजूद वह अपने किरदार में केवल मेहनत करते ही नजर आते हैं। कभी संवाद है तो भाव नहीं और कभी भाव के नाम पर अजीबोगरीब मुद्राएं हैं। इमरान खान की सबसे बड़ी समस्या संवाद अदायगी है। उन्हें अपनी भाषा के साथ ही भाव पर ध्यान देना चाहिए। कट्रीना कैफ डिंपल के किरदार में सहज दिखी हैं। वह चुहलबाजी और मस्ती करती हुई अच्छी लगती हैं। उनमें सुधार आया है। अली जफर ने फिर एक बार साबित किया कि वे नैचुरल एक्टर हैं। कुश के दोनों दोस्तों में वह प्रभावित करता है, जिसे दो-चार संवाद मिले हैं।

फिल्म में भरपूर नाच-गाना और मस्ती है। टुकड़ों में यह एंटरटेन भी करती है, लेकिन पूरी फिल्म का प्रभाव ढीला हो गया है। फिल्म फिसल गई है। फिर भी अली अब्बास जफर अपनी संभावनाओं से आश्वस्त करते हैं।

*** तीन स्टार

Thursday, September 8, 2011

प्रोमोशन के दांव-पेंच

-अजय ब्रह्मात्‍मज

खबरों, अपीयरेंस, संगत-सोहबत के अलावा अब आप फिल्मों के ट्रेलर और प्रोमोशन से भी समझ और जान सकते हैं कि इन दिनों हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की किस लॉबी में कौन-कौन हैं? कैसे? पिछले हफ्ते रिलीज हुई बॉडीगार्ड आपने देखी होगी। इस फिल्म के साथ करण जौहर की फिल्म अग्निपथ का ट्रेलर जारी किया गया। चार महीनों के बाद 2012 की जनवरी के दूसरे हफ्ते में यह फिल्म रिलीज होगी, लेकिन करण जौहर ने सुनिश्चित किया कि उनकी फिल्म का ट्रेलर बॉडीगार्ड के साथ जरूर आ जाए। करण जौहर इस फिल्म के निर्माता हैं। उन्होंने इस चाहत के लिए संजय दत्त और रितिक रोशन का इस्तेमाल किया। सलमान खान के साथ उनके संबंधों को पहले दुरुस्त किया और फिर उसका लाभ उठाया। सभी जानते हैं कि करण जौहर और शाहरुख खान के करीबी संबंध हैं, जबकि शाहरुख खान और सलमान खान की खुन्नस के बारे में भी सभी जानते हैं। सलमान खान की फिल्म बॉडीगार्ड ईद के मौके पर रिलीज हुई। जबरदस्त प्रचार और उम्मीद की इस फिल्म के साथ ट्रेलर आने का मतलब अपनी फिल्म के लिए अभी से दर्शकों में उत्सुकता बढ़ाना है।

ईद के दिन रिलीज हुई बॉडीगार्ड के प्रोमोशन के लिए सलमान खान स्वयं मौजूद नहीं थे। आकस्मिक इलाज के सिलसिले में वे अमेरिका चले गए थे। उनकी अनुपस्थिति में इमरान खान ने मुंबई के थिएटरों में जाकर बॉडीगार्ड का प्रचार किया। इसका दोहरा-तिहरा फायदा हुआ। एक तो इमरान खान ने इसी बहाने सलमान खान से अपनी हमदर्दी जाहिर की और उनके एहसानों का बदला चुकाया। सलमान खान अपनी तरफ से इमरान खान और आमिर खान की फिल्मों की तारीफ करने से नहीं चूकते। इस कोशिश में इमरान खान ने अपनी अगली फिल्म मेरे ब्रदर की दुल्हन के लिए भी दर्शक जुटाए। सलमान खान के प्रशंसकों और दर्शकों का एक टुकड़ा उनकी फिल्म का दर्शक बनेगा।

पिछले दिनों रास्कल्स के फ‌र्स्ट लुक के इवेंट में प्रकाश झा और अमिताभ बच्चन पहुंचे। ठीक है कि उनकी फिल्म आरक्षण आ रही थी, लेकिन उन्हें अजय देवगन और संजय दत्त से अपनी नजदीकी भी बतानी थी। राजनीति के समय प्रकाश झा और अजय देवगन के संबंधों में खटास आ गई थी। इसी बहाने उसे थोड़ा मीठा किया गया। संजय दत्त और अजय देवगन से अमिताभ बच्चन के मधुर रिश्ते हैं। दरअसल, फिल्मों के प्रोमोशन में सारे स्टार अपने दोस्तों और हमददरें का भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं। एक-दूसरे की लोकप्रियता को भुनाने का वे कोई मौका नहीं चूकते। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के केंद्र में मौजूद स्टार और डायरेक्टर ही ऐसा नहीं करते। परिधि पर बैठे फिल्मकार भी यह रणनीति अपनाते हैं। नॉट ए लव स्टोरी के साथ दैट गर्ल इन येलो बूट्स का ट्रेलर चला। लंबे समय से एक-दूसरे से मुंह फेरे राम गोपाल वर्मा और अनुराग कश्यप को इसमें कोई दिक्कत नहीं हुई। साहब बीवी और गैंगस्टर को मिल रहे सपोर्ट में भी इसे देखा जा सकता है। प्रोमोशन की पॉलिटिक्स सिर्फ इवेंट, शो या रिलीज तक ही सीमित नहीं है। टीवी शो और सीरियल में फिल्मों के प्रोमोशन में भी लगाव और भेदभाव नजर आता है। शाहिद कपूर और सोनम कपूर की फिल्म मौसम आ रही है। खबर थी कि एकता कपूर ने अपने पॉपुलर सीरियल बड़े अच्छे लगते हैं में इसके प्रोमोशन की अनुमति नहीं दी। वह इस सीरियल में अपनी फिल्म डर्टी पिक्चर्स का ही प्रचार करेंगी।

पहले वितरक और प्रदर्शक तय करते थे कि वे अपनी फिल्मों के साथ किन फिल्मों के ट्रेलर चलाएंगे। आम तौर पर आगामी फिल्मों के ट्रेलर ही नई फिल्मों के साथ जारी किए जाते थे। कोई भेदभाव नहीं रखा जाता था। अभी फिल्मों का बिजनेस तात्कालिक प्रभाव से निर्देशित हो रहा है। पहले वीकएंड में ही फिल्म का कलेक्शन तय हो जाता है, इसलिए प्रोड्यूसर, डायरेक्टर और स्टार की सारी मारामारी और कोशिश इमीडिएट इफेक्ट पर रहती है। प्रोमोशन उसी इंटरेस्ट से संचालित हो रहा है और रिश्तों को भी जाहिर कर रहा है।

Tuesday, September 6, 2011

जाना प्रोडक्शन डिजाइनर समीर चंदा का

जाना प्रोडक्शन डिजाइनर समीर चंदा का-अजय ब्रह्मात्‍मज

हिंदी सिनेमा में पर्दे के पीछे सक्रिय व्यक्तियों में हम डायरेक्टर के अलावा म्यूजिक डायरेक्टर, गीतकार और कहानीकारों को जानते हैं। पिछले कुछ समय से ऐक्शन का जोर बढ़ा है, तो ऐक्शन डायरेक्टर के भी नाम आने लगे हैं। अफसोस की बात यह है कि आर्ट डायरेक्टर या प्रोडक्शन डिजाइनर की हम चर्चा कभी नहीं करते। उनके योगदान को रेखांकित ही नहीं किया जाता। फिल्म समीक्षाओं में भी उनके नामों का उल्लेख नहीं होता। सच्चाई यह है कि इन दिनों फिल्मों की लुक और फील तय करने में प्रोडक्शन डिजाइनर की बड़ी भूमिका होती है। वे फिल्म निर्माण का अहम हिस्सा होते हैं।

दो हफ्ते पहले सक्रिय प्रोडक्शन डिजाइनर समीर चंदा का देहांत हो गया। वे अभी केवल 54 साल के थे। निर्माता-निर्देशकों के प्रिय समीर को कभी किसी ने ऊंची आवाज में बोलते नहीं सुना। आप कैसी भी जिम्मेदारी सौंपें और कितना भी कम समय दें, समीर दा के पास हमेशा कोई न कोई समाधान रहता था। उनसे काम कराने वाले निर्देशक बताते हैं कि वे कम से कम पैसों में उपयोगी सेट तैयार करते थे। उनके सेट की यह विशेषता होती थी कि वे ओरिजिनल जैसी ही लगती थी। उनके देहांत के बाद मशहूर निर्देशक श्याम बेनेगल ने बताया कि समीर की फिल्मों का पुरस्कारों के लिए नामांकन तक नहीं हो पाता था। सभी को यही लगता रहा कि मेरी फिल्में वेलकम टू सज्जनपुर और वेलडन अब्बा की शूटिंग किसी गांव में हुई है। यहां तक कि फिल्म बोस में अफगानिस्तान और जर्मनी के दृश्य भी लोगों को वास्तविक लगे। समीर चंदा ने कभी पुरस्कारों के लिए लॉबिंग नहीं की। चंदा अपना काम ईमानदारी से करते रहे और अपने समूह के लोगों की तारीफ से ही खुश होते रहे।

कोलकाता से नितीश राय के साथ मुंबई पहुंचे समीर चंदा ने आरंभ में श्याम बेनेगल के धारावाहिक भारत एक खोज में काम किया। इस महान धारावाहिक के निर्माण के समय नितीश राय के दो सहयोगी थे समीर चंदा और नितिन देसाई। नितिन देसाई ने चाणक्य धारावाहिक से स्वतंत्र कार्य करना आरंभ किया। समीर चंदा ने कॉमर्शियल और आर्ट सिनेमा में भेद नहीं किया। वे दोनों तरह की फिल्मों में पूरे मनोयोग से काम करते रहे। उन्होंने सुभाष घई और श्याम बेनेगल दोनों की फिल्में कीं। उनके निर्देशकों की फेहरिस्त लंबी है। इसी प्रकार उनकी फिल्मों की सूची भी काफी लंबी है। ताज्जुब होता है कि वे कैसे अकेले इतना काम कर पाते थे। वे हमेशा मुस्कराते रहते थे। नए लोगों को काम देने और उनसे काम लेने में वे कतई नहीं हिचकते थे। उनके एक फोटोग्राफर मित्र रवि शेखर बताते हैं कि उनके पास कोई चित्रकार काम की तलाश में आता था, तो वे उसे सीधे समीर चंदा के पास भेज देते थे। समीर उनसे पूछते भी नहीं थे कि क्या किसी को भेजा था? वे उस चित्रकार की योग्यता और जरूरत के मुताबिक कुछ काम दे देते थे।

अभी हाल ही में शिरीष कुंदर की फिल्म जोकर की घटना है। इस फिल्म के प्रोडक्शन डिजाइनर पहले कोई और थे। शूटिंग आरंभ होने के दस दिनों पहले वे अचानक गायब हो गए। शिरीष ने हताश होकर समीर चंदा को फोन किया। वे आए। उन्होंने परिस्थिति और जरूरत पर गौर किया। अपने स्वतंत्र हो चुके सहयोगियों को बुलाया और दस दिनों के अंदर पंजाब में शिरीष के लिए जोकर का सेट तैयार कर दिया। उनके इस मददगार स्वभाव की सभी कद्र करते थे। आज उनकी अनुपस्थिति उनके मित्र और निर्देशक महसूस कर रहे हैं। कई प्रोजेक्ट उनकी मौत से ठिठक गए हैं। समीर कहते थे कि भारतीय फिल्मों में आर्ट डायरेक्टर को बढ़ई से ज्यादा नहीं समझा जाता, इसलिए उन्होंने श्याम बेनेगल की सलाह पर खुद को प्रोडक्शन डिजाइनर कहना शुरू किया था। उनके मुताबिक प्रोडक्शन डिजाइनर क्रिएटिव आर्टिस्ट होता है, जो कहानी के मर्म को समझकर उसके परिवेश की दृश्यात्मक संरचना तैयार करता है। समीर की यह खूबी थी कि वे हर फिल्म की स्क्रिप्ट का ढंग से अध्ययन करते थे। उनकी राय में वास्तविकता को ढंग से समझने के बाद ही कोई वास्तविक सेट तैयार कर सकता है। वे हमेशा कहते थे कि एक अच्छा प्रोडक्शन डिजाइनर किसी भी स्थान को कहीं भी क्रिएट कर सकता है। बंगाल में न्यूयार्क बनाया जा सकता है वो राजस्थान में बर्फीली पहाडि़यां खड़ी की जा सकती हैं। उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर एक नोदीर गल्पो का निर्देशन किया। यह बंगाली फिल्म अभी तक रिलीज नहीं हो पाई है। उम्मीद की जानी चाहिए कि उनके मित्र और सहयोगी इस फिल्म को दर्शकों तक ले जाने की व्यवस्था करेंगे।


Sunday, September 4, 2011

खानों से रिश्ता हुआ खास-करीना कपूर

-अजय ब्रह्मात्‍मज

बॉडीगार्ड की रिलीज के बाद उत्साहित हैं करीना कपूर। उन्होंने झंकार से शेयर किए कॅरियर व पर्सनल लाइफ के राज..

बॉडीगार्ड के रिलीज होने की मुझे बहुत खुशी है। इसका सभी को इंतजार था। मेरे लिए भी खास फिल्म थी। इसमें सलमान खान ने पूरे दिल से काम किया है। बहुत प्यारी फिल्म बनी है। बॉडीगार्ड इमोशनल रोमांटिक एक्शन पैक्ड फिल्म है। आम-तौर पर सलमान की फिल्में कॉमेडी या एक्शन होती हैं, इस फिल्म में हर तरह का मसाला है। नहीं देखी है तो देख लें। मैं इसे इमोशनल रोमांटिक ही कहना पसंद करूंगी।

गीत से अलग है दिव्या

कॅरियर के लिहाज से मेरे लिए बॉडीगार्ड का रोल जब वी मेट की टक्कर का है। आप बॉडीगार्ड की दिव्या और जब वी मेट की गीत की तुलना नहीं कर सकते, क्योंकि दोनों अलग-अलग तरह की लड़कियां हैं। सलमान खान की फिल्म में लड़की को इतना काम मिल जाना काफी था। इस फिल्म की यही खूबी रही कि बहुत ही रियल तरीके से इसे शूट किया गया था। ईद के मौके पर रिलीज होने की वजह से सलमान खान और मेरे प्रशंसकों ने इसे खूब पसंद किया। सिद्दीकी ने बहुत सुंदर काम किया।

बिजी हूं खानों के साथ

मैं अभी पांचों खानों के साथ बिजी हूं। आने वाली फिल्मों की बात करूं तो बॉडीगार्ड के बाद शाहरुख खान के साथ रा.वन रिलीज होगी। फिर सैफ के साथ एजेंट विनोद है। आमिर खान की फिल्म धुआं की शूटिंग चली रही है। वह अगले साल रिलीज होगी। करण जौहर की एक फिल्म इमरान खान के साथ की है। वह फरवरी में रिलीज होगी। मैंने हमेशा यह ध्यान रखा कि हर तरह की फिल्में करूं। अब तक की मेरी फिल्मों की लिस्ट देखें तो आप को यही एहसास होगा। हर तरह की फिल्में करने से दर्शक भी खुश रहते हैं और हम भी बोर नहीं होते। मैंने हमेशा अपने काम में संतुलन बनाए रखा है। इमरान खान की फिल्म लव स्टोरी है तो आमिर खान की थ्रिलर है और एजेंट विनोद स्पाइंग थ्रिलर है। बॉडीगार्ड में लोगों ने मुझे मसाला कमर्शियल फिल्म में देखा। यह साल तो खानों को ही समर्पित हो गया। मैं मना भी नहीं कर सकी। जैसे-जैसे फिल्में मिलती गई, मैं करती गई। सारी फिल्में इंटरेस्टिंग हैं।

पांच खान, पांच प्रकार

शाहरुख खान को मैं विजनरी फिल्ममेकर और एक्टर मानती हूं। वे हमेशा आगे के बारे में सोचते हैं। आप रा.वन को ही देखें। यह बहुत आगे की फिल्म है। इस फिल्म को वे पिछले दस सालों से बनाना चाह रहे थे। वे हमेशा बॉलीवुड के बादशाह बने रहेंगे।

आमिर खान जीनियस हैं। रंग दे बसंती से लेकर देल्ही बेली तक उनकी ही चर्चा है। इन सभी फिल्मों को आमिर ने अकेले हिट किया है। मैं उनकी बहुत बड़ी फैन हूं। मुझे 3 इडियट के बाद फिर से उनके साथ काम करने का मौका मिला है। आमिर की फिल्में देखें तो लगातार दो फिल्मों में एक ही हीरोइन नहीं दिखी है। मेरे ख्याल में वह भारत के सर्वोत्तम अभिनेताओं में से एक हैं।

सलमान खान अपने कॅरिअर के सबसे अच्छे दौर में हैं। पिछले बीस सालों में सलमान ने जो मेहनत की है, वह भी रंग दिखा रही है। वह सचमुच टाइगर हैं। आप उनकी फिल्में देखें। उन्हें दर्शक रजनीकांत की तरह मानने लगे हैं।

सैफ अली खान में इंटरनेशनल क्वालिटी है। हिंदी फिल्मों में वह अकेले इंटरनेशनल टाइप एक्टर हैं। आप देखें कि हर फिल्म में वे अलग दिखते हैं। उनका दिमाग प्रोग्रेसिव है। वे रेगुलर हीरो वाले रोल ज्यादा पसंद नहीं करते। खानों में वे अलग खान हैं।

इमरान खान अभी नए हैं। वे अपनी जगह बना रहे हैं। उनकी दौड़ जारी है, लेकिन उनमें आगे बढ़ने की भूख और ख्वाहिश है। मुझे पूरा यकीन है कि वे आगे जाएंगे। वे प्यारे यंगस्टर और कूल एक्टर हैं। शुरुआत में वह थोड़े टेंशन में थे, लेकिन बातें कर मैंने उनका कंफर्ट बढ़ाया। वह कहते हैं कि मैं आपका फैन हूं।

मैं ही हूं हीरोइन

मैंने मधुर भंडारकर की हीरोइन के लिए हां कह दिया है। अभी कैरेक्टर, पैसे और डेट्स पर बात चल रही हैं। मैंने स्क्रिप्ट पढ़ी और हां कह दिया। आप लोग जिस तरह की परफार्मेस की मुझसे मांग करते हैं या जैसी फिल्मों में देखना चाहते हैं..हीरोइन वैसी ही फिल्म है। अगले साल यह मेरी ऐसी ही दमदार फिल्म होगी।

रस्म भर है शादी

मजेदार है कि सैफ और मुझसे अधिक लोगों को चिंता है कि हमारी शादी कब हो रही है। हमें अपनी फिल्मों से ही फुर्सत नहीं है। भाई, हमें तो एनाउंस करने दीजिए, हमारी शादी है तो हमें मौका दीजिए कि हम आपको न्योता दें। ऐसा थोड़े ही होगा कि आप हमारी जबरदस्ती शादी करवा देंगे। मेरे दिमाग में शादी को लेकर कोई मुश्किल नहीं है। शादी कोई बड़ी बात है क्या? हमलोग साथ रहते हैं। अपना-अपना काम करते हैं। ऐसे में शादी एक रस्म भर ही है? कागज के टुकड़े पर हम दोनों सिग्नेचर करेंगे और हमारी शादी हो जाएगी। उसके लिए इतनी हाय-तौबा क्यों? आप हमारी एक्टिंग पर ध्यान दें न कि हमारी शादी पर।

काम और पर्सनल लाइफ में संतुलन

मैंने हमेशा वर्क और पर्सनल लाइफ में संतुलन रखा है। मैं शुरू से आजाद ख्याल रही हूं। अपने फैसले स्वयं लेती हूं। केवल फाइनेंस के फैसले मॉम और करिश्मा लेती हैं। बाकी कॅरियर, फिल्म, पर्सनल रिलेशन यह सब मैं ही तय करती हूं कि क्या करना है और क्या नहीं? मेरा प्रोडक्शन और डायरेक्शन में कोई इंटरेस्ट नहीं है। मुझे केवल एक्टिंग पसंद है।