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Wednesday, August 31, 2011

फिल्‍म समीक्षा : दैट गर्ल इन येलो बूट्स

साहसी एडल्ट  फिल्म दैट  गर्ल...साहसी एडल्ट फिल्म

-अजय ब्रह्मात्मज

ब्रिटेन से आई रूथ को अपने पिता की तलाश है। उसे यकीन है कि उसके पिता मुंबई या पुणे में हैं। सिर्फ एक चिट्ठी के सहारे पिता की तलाश में भटकती रूथ सतह के नीचे की मुंबई का दर्शन करा जाती है। यह मुंबई गंदी, गलीज, भ्रष्ट और अनैतिक है। हिंदी फिल्मों में अपराध और अंडरव‌र्ल्ड की फिल्मों में भी हम मुंबई को इस रूप में नहीं देख पाए हैं। अगर आप कथित सभ्य और शालीन दर्शक हैं तो आप को उबकाई आ सकती है। गुस्सा आ सकता है अनुराग कश्यप पर ...आखिर अनुराग कश्यप क्या दिखाना और बताना चाहते हैं? 21वीं सदी के विद्रोही और अपारंपरिक फिल्मकार अनुराग कश्यप की फिल्में सचमुच फील बैड फिल्में हैं। इन्हें देखकर सुखद रोमांच नहीं होता। सिहरन होती है। व्यक्ति और समाज दोनों ही किस हद तक विकृत और भ्रष्ट हो गए हैं?

अनुराग कश्यप ने शिल्प और कथ्य दोनों स्तरों पर कुछ नया रचने की कोशिश की है। उन्हें कल्कि समेत अपने सभी कलाकारों का भरपूर सहयोग मिला है। फिल्म देखते समय भ्रम हो सकता है कि कहीं हम कोई स्टिंग ऑपरेशन तो नहीं देख रहे हैं। भाव और संबंध की विकृति संवेदनाओं को छलनी करती है। अपने किरदारों से निर्देशक का रूखा व्यवहार तकलीफ देता है। अनुराग कश्यप मुंबई की तंग गलियों और बाजारों में चल रहे सेक्स और अपराध के बीच रूथ की भावनात्मक खोज को नया अर्थ दे जाते हैं।

दैट गर्ल इन येलो बूट्स एडल्डट फिल्म है। इसके विषय और फिल्म में उसके निरुपण पर यहां अधिक चर्चा नहीं की जा सकती, क्योंकि पूरा कंटेंट एडल्ट है। बेहतर है कि एडल्ट दर्शक इसे स्वयं देखें और हिंदी सिनेमा के साहस से परिचित हों।

रेटिंग- *** तीन स्टार

फिल्‍म समीक्षा : बॉडीगार्ड

फिल्‍म समीक्षा : बॉडीगार्ड

सलमान खान शो बॉडीगार्डसलमान खान शो

-अजय ब्रह्मात्मज

सिद्दिकी मलयालम के मशहूर निर्देशक हैं। उनकी फिल्में खूब पसंद की जाती हैं। प्रियदर्शन ने उनकी कई फिल्मों का हिंदी रिमेक किया है। इस बार सिद्दिकी की शर्त थी कि उसी को हिंदी में रिमेक का अधिकार देंगे, जो उन्हें इसे हिंदी में निर्देशित करने देगा। नतीजा सामने है। सिद्दिकी और सलमान खान ने मिलकर बॉडीगार्ड को हिंदी दर्शकों के लिए फिर से रचा है। इस फिल्म में पूरी तरह से सलमान खान के प्रशंसक दर्शकों का खयाल रखा गया है और हिंदी सिनेमा के मेलोड्रामा का छौंक लगाया गया है। इस छौंक में करीना कपूर काम आ गई हैं।

बॉडीगार्ड सामान्य एक्शन फिल्म नहीं है। यह एक्शन की जबदरस्त फैंटेसी है। रियल लाइफ में ऐसा मुमकिन नहीं है। रील पर अवश्य ही रजनीकांत के साथ ऐसी फैंटेसी क्रिएट की जाती रही है। सलमान खान अकेले ही दर्जनों पर भारी हैं। दुश्मनों की गोलीबारी उन पर बूंदाबादी लगती है। इस फिल्म के एक्शन के लिए हैरतअंगेज से आगे का कोई शब्द खोजना होगा। सिंगल लाइन स्टोरी है बॉडीगार्ड लवली सिंह को दिव्या की सेक्युरिटी की ड्यूटी मिलती है। उसे परेशान करने की कोशिश में दिव्या उससे प्रेम करने लगती है।

लवली सिंह नहीं जानता कि फोन पर उससे प्रेम का इजहार करने वाली छाया वास्तव में उसकी मैडम दिव्या ही हैं। इस प्रेमकहानी के अंत में एक पेंच है, जो दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे और कुछ कुछ होता है की झलक देता है।

तर्क और कारण से परे हिंदी फिल्मों के ऐसे मनोरंजन में सिर्फ स्टार की इमेज का इस्तेमाल किया जाता है। सिद्दिकी ने वही किया है। उन्होंने सलमान खान की भोली सूरत और सुडौल शरीर को ध्यान में रखते हुए सीन लिखे हैं। बैकग्राउंड साउंड की मदद से एक्शन की कोरियोग्राफी रोमांचित करती है। दिल दहलाने वाले एक्शन सिक्वेंस हैं। करीना कपूर सुंदर दिखी हैं। इमोशनल सीन में उन्होंने हमेशा की तरह प्रभावित किया है। लंबे समय के बाद एक मोटे व्यक्ति को हंसी के लिए रखा गया है। फिल्म के संवाद सपाट और भावहीन हैं। एक्शन और इमोशन पर ही निर्देशक का पूरा ध्यान है। बॉडीगार्ड पूरी तरह से सलमान शो है, जिसमें करीना कपूर के चंद सिक्वेंस हैं।

फिल्‍म समीक्षा : बोल

बोल : पाकिस्तान से आई परतदार कहानी-अजय ब्रह्मात्‍मज

पाकिस्तान से आई परतदार कहानी

पाकिस्तानी फिल्मकार शोएब मंसूर की खुदा के लिए कुछ सालों पहले आई थी। आतंकवाद और इस्लाम पर केंद्रित इस फिल्म में शोएब मंसूर ने साहसी दृष्टिकोण रखा था। इस बार उनकी फिल्म बोल पाकिस्तानी समाज में प्रचलित मान्यताओं की बखिया उधेड़ती है और संवेदनशील तरीके से औरतों का पक्ष रखती है। बोल की कहानी परतदार है, इसलिए और भी पहलू जाहिर होते हैं। हिंदी फिल्मों जैसी निर्माण की आधुनिकता बोल में नहीं है, लेकिन अपने मजबूत विषय की वजह से फिल्म बांधे रखती है।

पार्टीशन के समय हकीम साहब का परिवार भारत से पाकिस्तान चला जाता है। वहां उन्हें पाकिस्तान छोड़ आए किसी हिंदू की हवेली में पनाह मिलती है, जिसमें दीवारों और छतों पर हिंदू मोटिफ की चित्रकारी है। हकीम साहब ने बेटे की लालसा में बीवी को बच्चा जनने की मशीन बना रखा है। उनकी चौदह संतानों में से सात बेटियां बचती हैं। रूढि़वादी हकीम साहब अपनी बेटियों को पर्दानशीं रखते हैं। उनकी अगली संतान उभयलिंगी पैदा होती है। बदनामी के डर से वे उसे किन्नरों को नहीं देते। उसे हवेली के एककमरे में बंद कर पाला जाता है। बड़ी बेटी जैनब को अपने अब्बा की हरकतें नागवार गुजरती है और वह बगावत कर बैठती है। वह मजहब के नाम पर चल रही रवायतों पर सवाल उठाती है और उनके साइंटिफिक एवं तार्किक जवाब देती है। लाजवाब होने पर उसके अब्बा हाथ उठा देते हैं। जैनब अपनी बहनों की आजादी के लिए आखिरकार भावावेश में अब्बा की हत्या कर देती है और बगैर सफाई दिए फांसी के तख्ते पर चढ़ना मंजूर करती है। फांसी चढ़ने से पहले वह पाकिस्तान के सदर से खास इजाजत लेकर मीडिया से मुखातिब होती है और अपना किस्सा बयान करती है। फ्लैशबैक में बनी यह फिल्म जैनब के दर्द को उसके सामाजिक परिवेश और पारिवारिक माहौल में पेश करती है।

बोल में जैनब की भूमिका हुमैमा मलिक ने निभायी है। उन्होंने शानदार अभिनय किया है। जैनब की तकदीफ और हिम्मत को उन्होंने पर्दे पर बखूबी उतारा है। हकीम साहब की भूमिका में मंजर सेहबाय ने भी जान डाल दी है। मशहूर गायक आतिफ असलम बोल में एक छोटी भूमिका में हैं। फिल्म पाकिस्तानी समाज के अन्य पहलुओं को भी चलते-चलते उजागर करती है। यह फिल्म टैक्स फ्री कर हिंदुस्तान के सभी दर्शकों को दिखानी चाहिए ताकि हम पाकिस्तान क े एक मुसलमान परिवार की व्यथा समझ सकें।

**** चार स्टार

Monday, August 29, 2011

गंदा काम नहीं है एडल्ट फिल्म बनाना-अनुराग कश्यप

-अजय ब्रह्मात्मज
लगभग एक साल पहले वेनिस और टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में दिखायी जा चुकी अनुराग कश्यप की फिल्म ‘दैट गर्ल इन यलो बूट्स’ 2 सितंबर को एक साथ भारत और अमेरिका में रिलीज हो रही है।
- आपकी फिल्म तो बहुत पहले तैयार हो गई थी। फिर रिलीज में इतनी देरी क्यों हुई?
0 मैं ‘दैट गर्ल इन यलो बूट्स’ को इंटरनेशनल स्तर पर रिलीज करना चाह रहा था। हमें वितरक खोजने में समय लगा। अब मेरी फिल्म 30 प्रिंट के साथ अमेरिका में रिलीज हो रही है। इस लिहाज से यह मेरी सबसे बड़ी फिल्म है। दक्षिण यूरोप, फिनलैंड, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कोरिया आदि देशों में भी यह रिलीज होगी। मेरा ध्यान अमेरिका और भारत पर था कि दोनों देशों में मेरी फिल्म एक साथ रिलीज हो।
- किस तरह की फिल्म है यह?
0 अलग किस्म की थ्रिलर फिल्म है। इंग्लैंड से एक लडक़ी अपने पिता की तलाश में भारत आयी हुई है। वह किसी रेलीजियस कल्ट में था। यहां आने के बाद वह अंडरवल्र्ड, मसाज पार्लर की दुनिया में बिचरती है। उसे लगता है कि उसके पिता वहां मिलेंगें। हमारे समाज में ये चीजें बेहद एक्टिव हैं, लेकिन हमलोग हमेशा इंकार करते हैं। पिता से मिलने के चार दिन पहले से कहानी शुरू होती है। आखिरी चार दिन में वह किन-किन स्थितियों से गुजरती है ़ ़ ़ यही फिल्म है।
- इस फिल्म को देख चुके आपके कई दोस्तों का सवाल है कि अनुराग ने यह फिल्म बनाई ही क्यों?
0 मैं उन्हें कोई दोष नहीं दूंगा। हमारे सिनेमा के संस्कार ही कुछ ऐसे हैं कि ऐसी फिल्में देखते ही माथा ठनक जाता है। एडल्ट फिल्मों के बारे में हमलोग सहज नहीं हैं। हमें एडल्ट फिल्म का मतलब सेक्स और वायलेंस ही समझ में आता है। मानो वह कोई बुरी बात हो। मेरे ख्याल में एडल्ट का मतलब यह होना चाहिए कि आप कुछ भी सोच, बोल और बता सकें। सभी चीजों को रैशनल तरीके से देख सकें। अपने देश में एडल्ट होने के बाद ही वोट देने और शादी करने के अधिकार मिलते हैं,लेकिन एडल्ट फिल्म बनाना गंदा काम माना जाता है। एडल्ट का मतलब पोर्नोग्राफी हो गया है। माना जाता है कि इसे बनाने और देखने वाले लोग गंदे होते हैं। यह हमारे समाज की नैतिक समस्या है। समाज चाहता है कि हम बच्चे ही बने रहें और सारी फिल्में बच्चों के हिसाब से बनाई जाएं। नैतिक किस्म के लोग इस फिल्म के दूसरे दृश्य से ही उखड़ जाएंगे।
- अपने यहां हर तरह की फिल्म का ढांचा बना हुआ है। आपकी फिल्में हमेशा उस ढांचे को तोड़ती है। ऐसा क्यों?
0 मैं रूटीन काम नहीं करना चाहता। मेरी कोशिश रहती है कि मैं खुद जो पढ़ता-लिखता और सोचता हूं या दुनिया भर की फिल्मों में जो देखता हूं,वैसा कुछ अपने दर्शकों के लिए तैयार करूं। मैं फंतासी की दुनिया में अपने किरदारों को नहीं रखना चाहता। मेरे किरदार हिंदी फिल्मों के बने-बनाए ढांचे में फिट भी नहीं होते। सिस्टम बदलने के लिए तो गालियां सुननी ही पड़ेगी।
- एक सवाल यह भी है कि ‘देव डी’ के बाद अनुराग ने इतनी छोटी फिल्म क्यों की? वह चाहता तो बड़े स्टारों के साथ बड़ी फिल्म बना सकता था।
0 मैं किसी फार्मूले में नहीं फंसना चाहता। मुझे छोटी फिल्म ही बनानी थी। मैं बताना चाहता हूं कि मैं अलग-अलग फिल्में बनाने आया हूं। ‘दैट गर्ल इन यलो बूट््स’ की पूरी लागत साढ़े तीन करोड़ रुपए है। इसमें पब्लिसिटी भी शामिल है। मैं लोगों की अपेक्षाएं तोडऩा चाहता हूं। आप भले ही मुझे मूर्ख कहिए, लेकिन मुझे अकेला छोड़ दीजिए। मुझे अपने ढंग की फिल्में बनाने दीजिए।

Friday, August 26, 2011

हार्दिक मार्मिक बातें सितारों की

हार्दिक मार्मिक बातें सितारों की-अजय ब्रह्मात्‍मज
इन दिनों फिल्मी सितारे आए दिन टीवी पर नजर आते हैं। वे खुद ही अपनी फिल्मों के बारे में बता रहे होते हैं या फिल्म पत्रकारों की जरूरी जिज्ञासाओं के घिसे-पिटे जवाब दे रहे होते हैं। मैं नहीं मानता कि पत्रकारों के सवाल एक जैसे या घिसे-पिटे होते हैं। सच बताएं, तो ज्यादातर फिल्म स्टार एहसान करने के अंदाज में इंटरव्यू देते हैं। वे गौर से सवाल भी नहीं सुनते और पहले से रटे या तैयार किए जवाबों को दोहराते रहते हैं। यही कारण है कि किसी भी फिल्म की रिलीज के समय हर चैनल, अखबार और पत्रिकाओं में फिल्म स्टार एक ही बात दोहराते दिखाई-सुनाई पड़ते हैं।

मामला इतना मतलबी हो चुका है कि वे फिल्म से अलग या ज्यादा कोई भी बात नहीं करना चाहते। प्रचारकों और पीआर कंपनियों पर दबाव रहता है कि कम से कम समय में ज्यादा से ज्यादा इंटरव्यू निबटा दो। नतीजा सभी के सामने होता है। उनके इंटरव्यू सुन, पढ़ या देख कर न तो फिल्म की सही जानकारी मिलती है और न उनकी पर्सनल जिंदगी या सोच के बारे में ज्यादा कुछ पता चलता है। इंटरव्यू देने का रिवाज किसी रूढि़ की तरह चल रहा है। अब तो पत्रकारों की रुचि भी स्टारों के रवैए के कारण इंटरव्यू में कम होती जा रही है। ऐसे में कभी अमिताभ बच्चन या शाहरुख खान या आमिर खान फुरसत में मिल जाते हैं, तो सवालों की कमी हो जाती है। कुछ पत्रकार तो सामूहिक साक्षात्कार के लिए प्रोत्साहित करते हैं। समूह में कुछ पूछना भी नहीं पड़ता और उधार के सवालों से इंटरव्यू अच्छा बन जाता है।

कभी हम फूल खिले हैं गुलशन गुलशन में तबस्सुम के साथ सितारों से मिला करते थे। तबस्सुम की बातचीत में उनके नाम जैसी ही मुस्कराहट रहती थी। फिर निर्देशक बनने से पहले लंबे समय तक कुणाल कोहली ने सितारों की बातचीत परोसने का काम किया। सैटेलाइट चैनलों के आ जाने के बाद छोटे पर्दे पर सितारों की आमद बढ़ी। दोनों ने एक-दूसरे की जरूरत समझी और पूरा सहयोग किया। इसी दौर में सितारों की बातचीत में दर्शकों की दिलचस्पी कम हुई, क्योंकि छिटपुट जवाबों से दर्शकों को संतुष्टि नहीं मिलती थी। याद होगा सैटेलाइट के इसी दौर में राजीव शुक्ला रू-ब-रू लेकर आते थे। करण थापर, प्रीतिश नंदी, वीर सांघवी, प्रणव राय आदि भी कई बार सितारों से रोचक बातें करते थे। फिर सिम्मी गरेवाल रेंदेवू लेकर आई, तो बातचीत का माहौल चकाचक सफेद हो गया। सिम्मी अपने मेहमानों से हमेशा बेदाग बातें करती थीं। चूंकि वे खुद फिल्म इंडस्ट्री की थीं, इसलिए उनके सामने बड़े से बड़े सितारों को मुंह के साथ-साथ दिल खोलने में दिक्कत नहीं होती थी। सिम्मी की कोशिश होती थी कि बातचीत में मेहमानों का गला रुंध जाए या आंखें नम हों या आंसू टपक पड़े। सिम्मी फिर से मोस्ट डिजायरेबल लेकर आई हैं। इसमें वे कुंवारे मेहमानों से बातें करती हैं।

सिम्मी से एक कदम आगे बढ़कर कॉफी विद करण लेकर करण जौहर आए, तो बातचीत जवान, दिलचस्प और रोचक हो गई। बातचीत में अंतरंगता नजर आई और मेहमानों ने अपने जीवन के प्राइवेट प्रसंगों पर भी बातें कीं। आमतौर पर फिल्म सितारे अपनी प्राइवेसी कह कर जिन सवालों से इनकार करते हैं, वैसे सवाल अगर करण पूछ लें, तो उन्हें जवाब देने में हिचक नहीं होती। दरअसल, जब एक समूह के लोग आपस में बातें करते हैं, तो ज्यादा मुखर और मुक्त रहते हैं। उनकी हार्दिक और मार्मिक बातों में मासूम चमक रहती है। हालांकि ऐसी बातचीत में आम दर्शकों की जिज्ञासाओं का समाधान नहीं हो पाता, फिर भी सितारों के मुंह से उनकी ज्ञात जानकारियां भी सुनना अच्छा लगता है।

जल्दी ही प्रीति जिंटा अप क्लोज ऐंड पर्सनल विद पीजी लेकर आ रही हैं। देखने वाली बात यह होगी कि वह सिम्मी और करण से कितनी अलग हो पाती हैं। अगर वह शेखर गुप्ता के वॉक द टॉक का अंदाज और असर ला पाएं, तो बेहतर होगा।

Sunday, August 21, 2011

शुक्रिया दर्शकों का...लौट आया हूं मैं-सलमान खान

-अजय ब्रह्मात्मज
सलमान खान की छवि लापरवाह, मनमौजी और बिगड़ैल स्टार की है। सोचा भी नहीं जा सकता था कि वे नियत समय पर इंटरव्यू के लिए हाजिर हो जाएंगे। पिछले कई मौकों पर उन्होंने लंबा इंतजार करवाया है। लिहाजा, जब उनके सहायक ने पूछा कि आप कहां हैं... सलमान खान आ चुके हैं तो मेरे चौंकने की बारी थी। पहुंचा तो देखा कि सलमान खान ताबड़तोड़ समोसे खाए जा रहे हैं। आश्चर्य हुआ और सहसा सवाल किया मैंने ... ‘समोसे तो सेहत के लिए और खास कर फिल्म स्टार के सेहत के लिए ठीक नहीं माने जाते हैं और आप ...’ मुंह का कौर खत्म करते-करते सलमान को सीधा सा जवाब आया, ‘सर, भूख लगी हो तो आदमी कुछ भी खा ले और उससे कोई नुकसान नहीं होता। मैं तो सब कुछ खाता हूं।’ पता चला कि उन्होंने एक खास फूड चेन का बर्गर मंगवा रखा था। वह आने में देर हुई तो वे खुद को रोक नहीं सके ...
इस बीच बर्गर आया और बातें आरंभ हुई। ‘वांटेड’ और ‘दबंग’ के बाद सलमान खान अलहदा जोश में हैं। दर्शकों से उनका सीधा कनेक्ट बन चुका है। कहा जा रहा है कि सिनेमाघरों से विस्थापित हो चुके दर्शकों का ‘दबंग’ ने पुनर्वास किया। उन्हें फिर से सिनेमाघरों की सीटें दीं। यहां तक कि भोजपुरी सिनेमा को भेद कर सलमान खान दर्शक उठा ले गए। सलमान पूरी बात सुन कर मुस्कराते हैं और अपने अंदाज में बताते हैं, ‘आडिएंस को ही नहीं, मुझे भी सिनेमाघरों से बाहर कर दिया गया था। अपने दर्शकों के साथ मैं भी लौटा हूं। हिंदी फिल्मों का हीरो खो गया था। मैं भी आडिएंस की तरह फिल्में देखता हूं। थिएटर तो नहीं जा पाता ... डीवीडी पर देखता हूं। सबसे पहले देखता हूं कि कवर पर कौन सा स्टार है? और किस टाइप की पिक्चर है। हालीवुड की पिक्चर हैं तो स्टैलोन की या आर्नल्ड की है या नहीं ... मैं रोमांटिक पिक्चर तो नहीं देखूंगा न? मैं देखूंगा उसके इमेज के हिसाब से ... तो हिंदी फिल्मों का हीरो वापस आया। हीरोइज्म खत्म हो गया था। एक्टर के तौर पर मैं भी मिस कर रहा था ...मुझे लगता है कि मेरी तरह ही पूरा हिंदुस्तान मिस कर रहा होगा। कहीं न कही ...सभी को एक हीरो चाहिए।’
क्या ऐसा किसी प्लानिंग के तहत हुआ ... पहले ‘वांटेड’, फिर ‘दबंग’ और ‘रेडी’... अब ‘बाडीगार्ड ’ ? सलमान इसे संयोग कहते हैं। उनके शब्दों में, ‘ऊपरवाले की मेहरबानी है। वह मुझ पर हमेशा मेहरबान रहता है। सब कुछ चल गया। आप देखें तो इस जॉनर की फिल्में मैं करता रहा हूं ... ‘गर्व’, ‘वीरगति’ यहां तक कि ‘वीर’ भी ऐसी ही फिल्म थी। ये सारी फिल्में हीरोइज्म की थी। ऐसी फिल्में करने में मजा आता है। प्रशंसकों को भी लगता है कि अपना हीरो कुछ कर रहा है। आपको बता दूं कि यह सब बड़ा डिफिकल्ट होता है। रिस्क फैक्टर भी रहता है। सारा ताम-झाम ... और उसके साथ सैफ्टी रहती है, लेकिन कुछ भी हो सकता है। आडिएंस को जब वह रिस्क दिखता है तो मजा आता है। हमलोग हर फिल्म में मेहनत करते हैं ... जब मेहनत के साथ स्क्रिप्ट का मेल बैठा जाता है तो सोने पर सुहागा हो जाता है।’
आपकी मौजूदगी में एक जादू है। स्क्रीन पर दिखते ही आप का सम्मोहन सिनेमाघरों में असर करता है ...इस सच्चाई से तो आप वाकिफ होंगे? सलमान पलकें झपकाकर स्वीकार करते हैं और बताते हैं, ‘इसमें मेरा कोई जादू नहीं है। यह दर्शकों और प्रशंसकों की नजर का असर है। मुझे नहीं मालूम कि वे मुझ में क्या देखते हैं? मैं तो अपने आप को रोज देखता हूं। मुझे खुद में ऐसी कोई क्वालिटी नहीं दिखाई देती। मेरे खयाल में हर फिल्म में यूनिट के 50-100 लोगों की मेहनत होती है। उनकी वजह से मैं इस मकाम पर पहुंचा हूं। वे यहां ले आए हैं। मैं मेहनत करना हूं और कोशिश रहती है कि मेहनत राइट डायरेक्शन में हो। दर्शक जब देखते हैं तो आप के सामने बैठा यह सलमान खान ही वहां नहीं होता। उसके साथ प्रेम, राधे, राधे मोहन और चुलबुल पांडे भी उनके दिमाग में आता है ़ ़ ़ सारी इमेज मिलकर सम्मोहन पैदा करती है।’ इमेज और स्टारडम का अध्ययन करने वाले नोट करें कि कैसे और क्यों कोई स्टार पॉपुलर होता है? सलमान आगे कहते हैं, ‘हमारी पिछली फिल्में, हमारी निजी जिंदगी, मीडिया के द्वारा बनी हमारी इमेज ... सब एक साथ दर्शकों पर असर करती हैं। मैं अलग से नहीं समझा पाऊंगा कि दर्शकों से यह रिश्ता क्या, कैसे और क्यों है? वे मेरे प्रशंसक मात्र हैं या परिवार के सदस्य की तरह हैं ... लोग मुझे जानते नहीं, कभी मिले नहीं ... फिर भी इतनी मोहब्बत ...मेरे पास कोई जवाब नहीं। कुछ लोगों ने मुझ से ज्यादा अचीव किया, काम किया, लेकिन उन्हें मेरे जैसी फैन फॉलोइंग नहीं मिली ... फिर भी नहीं बता सकता। ठीक है कि मैं स्टार की तरह रहना पसंद नहीं करता। नार्मल इंसान बना रहता हूं ... लेकिन ऐसे तो और भी स्टार रह चुके हैं ... इसका मुझे इल्म नहीं है। सच कहूं तो मैं जानना भी नहीं चाहता ... जिस दिन पता चल गया कि अच्छा यह कनेक्ट है, उसी दिन से मैं फ्रॉड हो जाऊंगा। फिर वह दिखाई देगा कि यह झूठ हो गया। सलमान ईमानदार नहीं रहा। इसलिए मुझे जानना भी नहीं है। अगर आप ऊपरवाले से पूछ सको तो पूछ कर बताना ... लेकिन अभी मत पूछना। अभी तो आप भी जिंदगी के मजे लो ... नहीं चाहूंगा कि आप अभी पूछने जाओ उनसे।’
ईद के मौके पर सलमान खान की फिल्म ‘बॉडीगार्ड’ रिलीज हो रही है। इसके निर्माता उनके बहन-बहनोई अलवीरा और अतुल अग्निहोत्री हैं। फिल्म की हीरोइन करीना कपूर हैं और निर्देशक हैं सिद्दिकी। कहते हैं कि सिद्दिकी ने इस बार फिल्म के अधिकार देने की शर्त रखी थी कि वे ही फिल्म का निर्देशन करेंगे। पूछने पर सलमान हां या ना कहने के बजाए बताने लगते हैं, ‘किसी और डायरेक्टर के आने पर वह अपना टेक देता। इसे सिद्दिकी ने लिखा भी है, इसलिए उनको लेना ठीक था। फिल्म की मासूमियत बनाए रखी है उन्होंने। हिंदी के हिसाब से बदलाव आया है ़ ़ ़ प्लाट तो वही है, लेकिन स्क्रीनप्ले, डायलॉग, कैनवास सब बदल गया है। कोशिश थी कि हर चीज पिछली पिक्चर से थोड़ी बेटर और बड़ी होनी चाहिए। वही कोशिश है कि एक डिफरेंट लेवल पर क्या लेकर आएं कि आडिएंस थिएटर में एंजॉय करे। अभी इंटेंशन है कि आप आओ, एंज्वॉय करो, हंसो, चीखो, चिल्लाओ, रोओ ़ ़ ़ आप बिजी रहो फिल्म के अंदर। लोग मुझ से पूछते हैं कि फिल्म में मैसेज नहीं देना चाहते? मेरा जवाब होता है कि मैं टेक्स्ट मैसेज भेज दूंगा। ढाई धंटे की फिल्म में ऐसा ब्लास्ट करो कि दर्शक बार-बार देखने आएं। चीखे चिल्लाएं, तालियां बजाएं ़ ़ ़ यह सब करने में बहुत एनर्जी लगती है भैया। और हीरोइज्म से बड़ा मैसेज क्या होगा?’
किस मायने में पिछली फिल्म से एक लेवल आगे है ‘बाडीगार्ड’? सलमान खान सवालिया नजरों से घूरते हैं और फिर हंस देते हैं, ‘इसमें एक्शन एक लेवल आगे है। लवली सिंह मासूम, वफादार और इरादे का पक्का है। उसमें एक बचपना है। वह ईमानदार और भोला है। जैसे अर्जुन को केवल मछली की आंख दिखती थी। वैसे ही लवली सिंह को केवल दिव्या मैडम दिखती है। उसे उनकी जिंदगी बचानी है। वह अपने भोलेपन से कामेडी पैदा करता है। ‘बॉडीगार्ड’ देखते समय आप के चेहरे पर स्माइल आएगी।’
इधर सलमान खान ने किसी खास डायरेक्टर या एक्ट्रेस के साथ कई फिल्मों में काम करना बंद कर दिया है। कभी डेविड धवन ने उनके साथ 7-8 फिल्में बनाई थीं। क्या सलमान नहीं चाहते कि उनकी जोड़ी बने और वह हिट हो? सलमान स्पष्ट कहते हैं, ‘जरूर चाहता हूं, लेकिन कोई दोस्त साधारण स्क्रिप्ट लाएगा तो नहीं करूंगा। कोई नया डायरेक्टर अच्छी स्क्रिप्ट लाएगा तो कर लूंगा ... नए लोगों में नया जोश रहता है। फिल्में बनाने के लिए मैं लोगों को चुनता हूं ... कभी अरबाज, अभी अतुल या कभी कोई और ... अभी आदित्य चोपढ़ा के लिए भी फिल्म कर रहा हूं। ‘बीइंग हयूमन’ के जरिए ‘चिल्लर पार्टी’ पेश कर दी। बच्चों की फिल्म थी, मुझे अच्छी लगी।’ मैं उन्हें बताता हूं कि गेट के बाहर 40-50 बच्चे खड़े हैं कि आप निकलेंगे तो एक एक झलक देख लेंगे। बच्चों के बीच आप की लोकप्रियता अलग किस्म की है ... सलमान बच्चों के अपने रिश्ते के मनोविज्ञान के बारे में बनाते हैं, ‘मां-बाप टीवी देख रहे होते हैं। बच्चा बिस्तर पर लेटा या खेलता अनमने तरीके से मेरी फिल्म देख रहा होता है। उसे कोई एक झलक या चीज अच्छी मिल जाती है। वह दीवाना बन जाता है। इस तरह हर 30 सेकेंड,एक मिनट में एक बच्चा मेरा या किसी और स्टार का फैन बनता है। वह मुझे या आमिर खान को नाम से नहीं जानता। उसे फिल्म का नाम भी मालूम नहीं रहता। कोई गाना, कोई अदा, कोई मोमेंट देख कर वह कनेक्ट हो जाता है। दूसरी तरफ 40-50 की उम्र के लोग भी मुझे देखकर एनर्जी हासिल करते हैं। उन्हें लगता है कि देखो मेरी उम्र का सलमान कैसे मौज-मस्ती कर रहा है। मैं बुजुर्गों को उनकी जवानी में ले आता हूं।’
इधर सलमान खान की फिल्में खूब चल रही हैं। उनका बिजनेश बढ़ा है। लग सकता है कि पैसों के इस कारोबार को वे समझते होंगे, लेकिन पूछने पर वे साफ इंकार कर देते हैं, ‘मुझे तो यह भी पता नहीं कि कितनी टेरिटरी है। डैड सारा काम संभाल लेते हैं। पैसे गिन कर क्या करना है? फिल्में चलें और फिल्में मिलती रहें बस...मुझे बिजनेश में घुसना ही नहीं है। ऐसे ही मेरा दिमाग बहुत बंटता और भटकता रहता है। यह नहीं करना है मुझे। मेरा काम शूटिंग, एडीटिंग और रिलीज तक रहता है। इंडस्ट्री मे लोग पहले कहते थे कि सबकी फिल्म चले, मेरी थोड़ी ज्यादा चले। अभी लोग कहते हैं कि किसी की नचले, केवल मेरी चले। मैं कहता हूं कि आपकी चले और खूब चले ताकि मुझे भी अपना लेवल बढ़ाने का मौका मिले। अगर किसी को मारना है तो काम से ही मारना है।’
एक रहस्य की बात बताऊं? सलमान खान खुद को छोटे शहर की पैदाईश मानते हैं? उनका जन्म इंदौर में हुआ ... वे खुद बताते हैं, ‘16 साल की उम्र तक हर साल 4 महीने इंदौर में ही रहता था। छोटे शहर का प्यार, रोमांस और आदतें हैं मु़झ में ...आप मेरी जबान देख लें ...मैं अरबाज और सोहेल की तरह नहीं बोलता हूं। मेरा लहजा छोटे शहरों का है। अभी छोटे शहरों में आना-जाना कम हो गया है, लेकिन शूटिंग के समय तो रहता हूं। लोगों को आब्जर्व करता हूं। किसी बड़े स्टार की नकल करने से बेहतर किसी अनोखी पर्सनैलिटी की नकल करना है। हर जगह दो-चार ऐसे अनोखे लोग मिल जाते हैं। उसका कैरेक्टर लेकर अपनी तरफ से थोड़ा मिक्स कर नया कैरेक्टर बनता है तो वह अलग हो जाता है। ‘बॉडीगार्ड’ के अंदर अलग चलता हूं। यह मैंने किसी को देखा, आब्जर्व किया और अपने कैरेक्टर में डाल दिया है।’
सलमान खान से और भी बातें हुई ...लेकिन वह कभी किसी और मौके पर आप से शेयर करेंगे। बाहर अभी तक बच्चे खड़े हैं। उन्हें मोबाइल पर सलमान की तस्वीर दिखाता हूं। उनकी आवाज भी सुना देता हूं। बच्चे मुझे घेर लेते हैं। सिर्फ तस्रीर और आवाज पर यह हाल है। स्वयं सलमान होते तो क्या होता? सच्ची सलमान का सीधा कनेक्शन है दर्शकों से।

कभी-कभी ही दिखता है शहर

-अजय ब्रह्मात्मज

हर शहर की एक भौगोलिक पहचान होती है। अक्षांश और देशांतर रेखाओं की काट के जरिये ग्लोब या नक्शे में उसे खोजा जा सकता है। किताबों में पढ़कर हम उस शहर को जान सकते हैं। उस शहर का अपना इतिहास भी हो सकता है, जिसे इतिहासकार दर्ज करते हैं। किंतु कोई भी शहर महज इतना ही नहीं होता। उसका अपना एक स्वभाव और संस्कार होता है। हम उस शहर में जीते, गुजरते और देखते हुए उसे महसूस कर पाते हैं। जरूरी नहीं कि हर शहरी अपने शहर की विशेषताओं से वाकिफ हो, जबकि उसके अंदर उसका शहर पैबस्त होता है। साहित्यकारों ने अपनी कृतियों में विभिन्न शहरों के मर्म का चित्रण किया है। उनकी धड़कनों को सुना है।

फिल्मों की बात करें, तो हम देश-विदेश के शहरों को देखते रहे हैं। ज्यादातर फिल्मों में शहर का सिर्फ बैकड्रॉप रहता है। शहर का इस्तेमाल किसी प्रापर्टी की तरह होता है। शहरों के प्राचीन और प्रसिद्ध इमारतों, वास्तु और स्थानों को दिखाकर शहर स्थापित कर दिया जाता है। मरीन लाइंस, वीटी स्टेशन, बेस्ट की लाल डबल डेकर, काली-पीली टैक्सियां, स्टाक एक्सचेंज और गेटवे ऑफ इंडिया आदि को देखते ही हम समझ जाते हैं कि फिल्म के किरदार मुंबई में घूम-जी रहे हैं। इसी प्रकार लालकिला, कुतुब मीनार, संसद भवन, इंडिया गेट, कनाट प्लेस आदि देखकर दर्शकों को दिल्ली का अनुमान लग जाता है। विदेशी शहरों के मशहूर चौराहे, इमारतें, पुल और मीनारें देख कर हम सही अंदाजा लगा लेते हैं कि किस शहर में हैं।

अब जरा फिल्मों के जरिये अलग-अलग शहरों को देख चुके दर्शक याद करें, तो पाएंगे कि उन्होंने सभी शहरों को देख कर भी नहीं देखा है। वे उन शहरों को महसूस नहीं कर सके हैं। निर्माता-निर्देशकों की कोशिश भी नहीं रहती कि वे शहरों के डिटेल में जाएं या अपने किरदारों का ऐसा चित्रण करें कि शहर का स्वभाव समझ में आ सके। फिल्मों में वर्णित दृश्यों के आधार पर तो मुंबई की यही धारणा बनेगी कि इस शहर में पांव रखते ही व्यक्ति लुट जाता है। उसकी जेब कट जाती है। आप अंडरव‌र्ल्ड के शिकार हो जाते हैं, जबकि मुंबई में लगभग सवा करोड़ लोग गुजर-बसर कर रहे हैं। वे इस शहर को छोड़ कर भी नहीं जाना चाहते।

दरअसल, ज्यादातर फिल्मों में शहर को किरदार के तौर पर पेश करने की दरकार ही नहीं रहती। अगर शहर को चरित्र बनाया, तो निर्देशक को शहर का चरित्रांकन फिल्म के दूसरे किरदारों की तरह ही करना पड़ता है। कुछ ही फिल्मकार ऐसी कोशिश करते हैं। उदाहरण के लिए रामगोपाल वर्मा की सत्या देखते हुए हम मुंबई शहर के स्वभाव के एक पहलू से बखूबी परिचित होते हैं। यह निर्देशकों की मंशा और समझ पर निर्भर करता है कि वे अपनी फिल्मों में शहर का कौन सा पोट्र्रेट प्रस्तुत करते हैं। कभी यह पॉजीटिव तो कभी निगेटिव होता है।

चूंकि शहरों के चित्रण और उसे स्थापित करने में निर्देशकों को अलग से मेहनत करनी पड़ती है। परिवेश पर ध्यान देना पड़ता है। उसकी कंटीन्यूटी और बाकी कनेक्टिंग सामग्रियों पर भी बारीक नजर रखनी पड़ती है, इसलिए अधिकांश निर्देशक ऐसी मेहनत से बचते हैं। आपने लगभग सभी हिंदी फिल्मों में देखा होगा कि किरदारों का कोई शहर और काल नहीं होता। पता नहीं चलता कि वे किस समय विशेष या स्थान विशेष में रहते हैं। निर्देशक पूरी छूट लेते हैं। वे अपने किरदारों को इस शहर से उस शहर घुमाते रहते हैं। उनका मकसद सिर्फ इतना ही रहता है कि पृष्ठभूमि सुंदर, रंगीन और भव्य हो। वह आकर्षण पैदा करे। पृष्ठभूमि हिंदी फिल्मों की कहानी में अलग से कुछ नहीं जोड़ती।

इधर के फिल्मकारों ने परिवेश और समय पर ध्यान देना शुरू किया है। उसकी वजह से हमें पता चलता है कि हम कहां की और कब की कहानी देख रहे हैं। नो वन किल्ड जेसिका जैसी फिल्म का निर्देशक अगर कोताही बरतेगा तो उसकी फिल्म विश्वसनीय नहीं लगेगी। वही अगर थोड़ी मेहनत करेगा और पृष्ठभूमि को चरित्रों की संगत में ले आएगा तो फिल्म दर्शकों को भा जाएगी। इस फिल्म के साथ यही हुआ भी।

Friday, August 19, 2011

फिल्म समीक्षा:नॉट ए लव स्टोरी

नॉट ए लव स्टोरी: अनचाही हत्या में फंसे प्रेमीअनचाही हत्या में फंसे प्रेमी

-अजय ब्रह्मात्मज

निर्देशक राम गोपाल वर्मा का डिस्क्लेमर है कि यह फिल्म किसी सच्ची घटना या व्यक्ति से प्रभावित नहीं है, लेकिन हम सभी जानते हैं कि यह किस घटना और व्यक्ति से प्रभावित है। राम गोपाल वर्मा ने किरदारों के नाम और पेशे बदल दिए हैं। कहानी वही रखी है। एक महात्वाकांक्षी लड़की हीरोइन बनने के सपने लेकर मुंबई पहुंचती है और अनजाने ही एक क्रूर हादसे का हिस्सा बन जाती है।

राम गोपाल वर्मा ने प्राकृतिक रोशनी में वास्तविक लोकेशन पर अपने कलाकारों को पहुंचा दिया है और डिजिटल कैमरे से सीमित संसाधनों में यह फिल्म पूरी की है। मुंबई से दूर बैठे युवा निर्देशक गौर करें। नॉट ए लव स्टोरी देखकर लगता है कि अगर आप के पास एक पावरफुल कहानी है और सशक्त अभिनेता हैं तो कम से कम लागत में भी फिल्में बनाई जा सकती हैं। राम गोपाल वर्मा ने इस फिल्म के लिए पेशेवर कैमरामैन को भी नहीं चुना। उन्होंने प्रशिक्षित और उत्साही युवा फोटोग्राफरों को यह जिम्मेदारी सौंप कर सुंदर काम निकाला है। रामू की यह फिल्म युवा फिल्मकारों को प्रयोग करने का आश्वासन देती है।

चूंकि फिल्म प्रेम, हत्या और उसके परिणामों पर है, इसलिए दृश्य और घटनाओं का रोमांच बांधे रहता है। इस काम में रामू ने संदीप चौटा की खास मदद ली है। फिल्म में पाश्‌र्र्व संगीत (बैकग्राउंड स्कोर) का विशेष इस्तेमाल किया गया है। कलाकारों में दीपक डोबरियाल और माही गिल ने उल्लेखनीय अभिनय किया है। दीपक डोबरियाल को पर्दे पर देखते समय एहसास नहीं रहता कि इसे निभाया जा रहा है। अभिनय की सहजता से वे अपने किरदारों में वास्तविक लगने लगते हैं। इस फिल्म में रॉबिन के उत्कट प्रेम, आवेश और अफसोस को उन्होंने भावपूर्ण तरीके से प्रदर्शित किया है। माही गिल निरंतर निखर रही हैं। उन्होंने इस फिल्म के भावात्मक विस्फोट के दृश्यों को अतिरेकी नहीं होने दिया है। वह ग्लैमरस दृश्यों में भी अच्छी लगी हैं।

इस फिल्म में रामू ने अपनी ही फिल्म रंगीला के एक गीत का अत्यंत प्रासंगिक उपयोग किया है। वह किरदार की भावनाओं को व्यक्त करता है। साथ ही इस फिल्म के लिए विशेष रूप से लिखे गए गीत की पंक्तियां फिल्म की थीम से मेल खाती हैं। इस फिल्म का अंत सटीक और निर्दोषपूर्ण है।

*** तीन स्टार

कला निर्देशक समीर चंदा-रवि शेखर


समीर चंदा
हैदराबाद फिल्म स्टूडियो.श्याम बेनेगल की पूरी यूनिट पहुंच चुकी है। यंहा एक महीना रह कर हम लोग -हरी भरी फिल्‍म की शूटिंग करने वाले हैं।यहीं सबसे पहले मिलता हूं मैं कला निर्देशक समीर चंदा से.
मैं नया था,पर मैंने समीर चंदा को दोस्त मान लिया था। वे अपने काम में पूरी तरह समर्पित.और दोस्तों के दोस्त।
हम एक महीने लगभग साथ रहे। वे दूसरी फिल्मों का काम देखने के लिए बीच-बीच मैं गायब भी हो जाते थे। फिर वापस आ जाते थे।
उनके पास लोकेशन खोजने के किस्से होते थे जिसे वे दोस्तों को सुनाते थे।
मुझे याद है जब उन्होंने 'दिल से' के छैया छैयां गाने के लिए ट्रेन रूट खोजने का किस्सा सुनाया था। अनेक ट्रेन यात्राएं कीं। ड्राइवर के साथ बैठ कर उन्होंने विडियो शूट किया था।
फिल्म के दर्शक ज्यादातर अभिनेताओं को ही जानते हैं. पर फिल्म प्रेमी जानते हैं की फिल्म के बनाने में निर्देशक और कैमरा मैन का पूरा सहारा होता है कला निर्देशक। यह कला निर्देशक ही है जो फिल्म का वह दृश्य तैयार करता है जिसे कैमरा शूट करता है। दीवार का रंग परदे का रंग भवन निर्माण तक का सारा काम कला निर्देशक के ही देख रेख में उसकी टीम करती है।
याद कीजिये 'दिल से ' के दृश्य। ज्यादातर दर्शक अभिनेता-अभिनेत्रियों को ही याद रखते हैं. पर फिल्म के फिल्म के फ्रेम में जो भी दिखाई पड़ता है उसको डिजाइन कराना या उसे वहां ला के रखना - सारा काम कला निर्देशक का ही होता है।
आइये इस बहाने कुछ फिल्मों की चर्चा करते हैं- जिसके कला निर्देशक थे समीर चंदा.
याद कीजिये - श्‍याम बेनेगल की फिल्म 'मंडी' जिसमे शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल का घर था एक कोठा । 1983 में बनी इस फिल्म में समीर चंदा एक सहायक के रूप में अपने काम की शुरुआत की थी।
इसके बाद काम का जो सिलसिला शुरू हुआ वो लगभग 55 फिल्मों तक चला।

'रावण' ,' कमीने', 'दिल्ली-६', 'ओमकारा', 'कृष', 'गजनी', 'वेल्‍कमे टू सज्जन पुर' , जैसी फिल्म की लम्बी लिस्ट है।
इन सारी फिल्मों के दृश्यों का अपना रंग है। चाहे वो बड़े स्टार वाली फिल्म हो या छोटे कलाकारों वाली फिल्म। कलानिर्देशक के रूप में उनकी जिम्मेदारी हमेशा महत्वपूर्ण होती थी।
अभिनेता समय पर आये या न आये सेट तो तैयार होना ही चाहिए। इस के चलते काम का गहरा दबाव होता है कला निर्देशक पर और लगातार काम मिलने के लिए जरुरी है की आप समय के पाबंद हों.
किसी भी फिल्म के लुक में कला निर्देशक की जबरदस्त भूमिका होती है. और समीर अपने काम में माहिर थे।
बाद में उनसे मेरी मुलाकात हुई श्याम बेनेगल की ही फिल्म 'बोस' के सेट पर. फिल्मसिटी में शूट था। गाँधी जी के आश्रम का सेट लगा था।
इसके भी कला निर्देशक समीर ही थ,. पर आज समीर के हाथ में एक बहुत बड़ा कैमरा था..और वे शूट कर रहे थे.. फिल्म नहीं..अपना सेट.
हम लोग उनकी इस हरकत पर हंस रहे थे क्यों कि कैमरा वो था जिस से उस ज़माने में सीरियल शूट किया जाता था। फिल्मे के छायाकार राजन कोठारी भी उनकी टांग खीच रहे थे।.
इसके अलावा मेरी उनसे कभी मुलाकात नहीं हुई। आने वाली बड़ी बड़ी फिल्मो में उनका नाम देख मैं खुश हो जाता था .
इस उद्योग में अगर आप साथ काम नहीं कर रहे होते तो मिलना - जुलना मुश्किल होता है- यह मैं अच्छी तरह समझता हूँ.
पर जब भी मेरे किसी चित्रकार मित्र को काम की जरूरत होती - मैं उसे समीर चंदा का नंबर दे देता. और उसे काम मिल भी जाता.
आज खबर मिली। समीर चले गए ..ऐसे समझदार कला निर्देशक की कमी को फिल्म वाले महसूस करेंगे और उनके वे सारे साथी भी जो कभी न कभी उनके साथ काम कर चुके हैं।

Thursday, August 18, 2011

बर्फी में रणबीर कपूर और प्रियंका चोपड़ा



अनुराग बसु निर्देशित बर्फी में रणबीर कपूर और प्रियंका चोपड़ा अहम भूमिकाओं में हैं। दोनों को अनुराग ने नए अंदाज में पेश करने की कोशिश की है। इन दिनों इस फिल्‍म की शूटिंग कोलकाता में चल रही है। ये तस्‍वीर इंटरनेट सर्फिंग में दिख गई।

Monday, August 15, 2011

हिंदी फिल्मों के पहले रॉकस्टार थे शम्मी कपूर

-अजय ब्रह्मात्मज
21 अक्टूबर 1931 को मुंबई के कपूर परिवार में पैदा हुए शम्मी कपूर ने 14 अगस्त 2011 को अंतिम सासें लीं। वे किडनी की बीमारी से ग्रस्त थे। उनके निधन पर अमिताभ बच्चन ने ट्विट किया ़ ़ ़ जिंदादिल शम्मी कपूर खामोश हो गए। शम्मी कपूर की पहली ख्वाहिश इंजीनियर बनने की थी। वे वैमानिकी में योगदान करना चाहते थे। उड़ान भरने की उनकी लालसा हिंदी सिनेमा के पर्दे पर पूरी हुई। मैट्रिक पास करने के बाद वे कालेज भी गए,लेकिन दिल फिल्मों की तरफ खिंचता गया। पिता की सलाह पर वे पृथ्वी थिएटर में शामिल हो गए। यह 1948 की बात है। जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर उनकी पगार रखी गई 50 रूपए महीने। 4 सालों तक पृथ्वी थिएटर में सीखने और मंजने के बाद उन्होंने 1952 में पृथ्वी थिएटर छोड़ा तो उनकी पगार 300 रूपए थी।
फिल्मों में उनकी शुरूआत कारदार फिल्म्स की फिल्म जीवन ज्योति से हुई। इस फिल्म के निर्देशक महेश कौल थे और हीरोइन थीं चांद उस्मानी। 1952 से 55 के बीच उन्होंने दर्जन भर से अधिक फिल्मों में मधुबाला,नूतन,सुरैया और नलिनी जयवंत जैसी मशहूर अभिनेत्रियों के साथ काम किया,लेकिन इनमें से किसी फिल्म को उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली। तब उनकी पतली मूंछें थीं और फिल्मों में वे तलवार भांजते ही नजर आते थे। प्रतिष्ठा और पहचान नहीं मिल पा रही थी।
इस बीच 1955 में मशहूर अभिनेत्री गीता बाली से उनकी शादी हुई। गीता बाली ने महसूस किया कि शम्मी कपूर को बेधडक़ और खुले दिल के नौजवान की भूमिका निभानी चाहिए। आज की शब्दावली में उनका मेकओवर हुआ। मूंछें साफ हो गईं। बालों को स्पेशल कट दिया गया। नासिर हुसैन की रोमांटिक कामेडी तुम सा नहीं देखा में पहली बार हिंदी सिनेमा के दर्शकों ने आधुनिक नौजवान युवक को देखा। उललेखनीय है कि राज कपूर,दिलीप कुमार और देव आनंद की स्थापित त्रयी को भेद कर शम्मी कपूर बेपरवाह नायक के रूप में पर्दे पर अवतरित हुए। उनका यह अंदाज बहुत पसंद किया गया। फिर तो एक अलग परंपरा चल निकली। नया नायक अपनी बदमाशियों के साथ प्रेमिकाओं के साथ मर्यादित छेड़खानी करता हुआ दर्शकों को भा गया। बेपरवाह और बदमाश होते हुए भी शम्मी कपूर के निभाए किरदार अश्लील और अमर्यादित नहीं थे। 1957 के बाद शम्मी कपूर की सफल पारी आरंभ हुई। 1961 में उनकी पहली रंगीन फिल्म जंगली आई। इस फिल्म की जबरदस्त कामयाबी ने तो उन्हें अगली कतार में ला खड़ा किया।
शम्मी कपूर की अभिनय शैली बंधनमुक्त रही। उन्होंने अपने समय के पॉपुलर स्टारों की नकल की कोशिश नहीं की। उनके बड़े भाई राज कपूर स्वयं पॉपुलर और प्रभावशाली अभिनेता थे। शम्मी कपूर के लिए बड़ी चुनौती थी कि कैसे वे बड़े भाई से अप्रभावित होकर अपनी पहचान बनाएं। उन्हें नासिर हुसैन जैसे निर्देशकों से मदद मिली। आजादी के बाद शम्मी कपूर के रूप में हिंदी फिल्मों का पहला नायक मिला था,जो किसी बोझ को लेकर नहीं चलता। वह दिलफेंक है। लड़कियों का पीछा करता है और उनका दिल जीतने के लिए अजीबोगरीब हरकतें करने से भी नहीं हिचकता। फिर भी वह छिछोरा नहीं लगता।
नायक के तौर लंबी और सफल पारी खेलने के बाद शम्मी कपूर ने चरित्र भूमिकाओं से दर्शकों का दिल जीता। उन्होंने फिल्म निर्देशन में भी हाथ आजमाया। उनकी निर्देशित मनोरंजन और बंडलबाज पसंद नहीं की गईं। वीडियो का चलन बढ़ा तो उन्होंने शम्मी कपूर प्रेजेंट्स मनोरंजन नाम से वीडियो मैग्जीन पेश की,लेकिन भीड़ बढऩे से 6 वाल्यूम के बाद ही उन्होंन उसे बंद कर दिया। फिर इंटरनेट का दौर आया तो वे सबसे आगे नजर आए। इंटरनेट सर्फिंग उनका प्रिय शगल था। उनकी अंतिम फिल्म इम्तियाज अली की रॉकटार होगी,जिसतें उन्होंन रणवीर कपूर के साथ काम किया है।
शम्मी कपूर के जीवन और कार्य पर फिल्म पत्रकार सुरेश शर्मा ने फिल्म्स डिवीजन के लिए रोमांस के शिखर नाम से एक डाक्यूमेंट्री का निर्देशन किया है।

Sunday, August 14, 2011

राष्ट्रीय एकता के पुरस्कार से सम्मानित हिंदी फिल्में

pinjar 4.jpg-अजय ब्रह्मात्मज

अभी न तो हम गुलाम हैं और न ही कोई आजादी की लड़ाई चल रही है। युद्ध और आक्रमण की स्थिति भी नहीं है। हालांकि पड़ोसी देशों से तनाव बना हुआ है और अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से हम अछूते नहीं हैं। फिर भी आजादी के 64 सालों में देश ने काफी प्रगति की है। दुनिया के विकसित देशों में हमारी गिनती होने लगी है। इस माहौल में देश की संप्रभुता बनाए रखने के लिए जरूरी है कि हम राष्ट्रीय एकता पर ध्यान दें। भारत सरकार की राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समिति सन् 1966 से हर साल एक फिल्म को राष्ट्रीय एकता की सर्वोत्तम फिल्म का पुरस्कार देती है। अभी तक हिंदी में बनी पंद्रह फिल्मों को राष्ट्रीय एकता की सर्वोत्तम फिल्मों के रूप में चुना गया है। राष्ट्रीय एकता पुरस्कार आरंभ हुए को पहला पुरस्कार मनोज कुमार अभिनीत ‘शहीद’ को मिला।
1966 - शहीद
1967 - सुभाष चंद्र
1970 - सात हिंदुस्तानी
1974 - गरम हवा
1975 - परिणय
1984 - सूखा
1985 - आदमी और औरत
1988 - तमस
1994 - सरदार
1998 - बोर्डर
1999 - जख्म
2001 - पुकार
2004 - पिंजर
2005 - नेताजी सुभाष चंद्र बोस
2008 - धर्म
2010 - दिल्ली-6
अगर आपने ये फिल्में नहीं देखी हैं तो इन्हें जल्दी से जल्दी डीवीडी के जरिए देखने की कोशिश करें। इन सभी फिल्मों में राष्ट्रीय एकता का स्वर प्रमुख है। देश के समर्थ और संवेदनशील निर्देशकों ने विभिन्न सांप्रदायिक, सामुदायिक, प्रादेशिक, धार्मिक और अन्य सभी प्रकारों के विभेदों से ऊपर उठकर मनुष्यता और राष्ट्रप्रेम की बातें की हैं। सभी का लक्ष्य दर्शकों का मनोरंजन करने के साथ उन्हें जागृत करने का भी रहा है। हम यहां राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समिति द्वारा इन फिल्मों को दी गई प्रशस्ति प्रकाशित कर रहे हैं। ताकि इन फिल्मों के विशेषताओं को समझ कर आप इन्हें देखें और समझें।
शहीद, सुभाष चंद्र, सात हिंदुस्तानी, गरम हवा और परिणय के लिए अलग से प्रशस्ति नहीं लिखी गई है। संभव है 1975 के पहले फिल्मों के विवरण के साथ निर्माता-निर्देशक की जानकारी दे देना ही पर्याप्त होता हो।
1965-शहीद -निर्माता केवल पी कश्यप,निर्देशक एस राम शर्मा
1983 - सूखा -निर्देशक एम एस सथ्यू -मानवीय मूल्यों के चित्रण की ईमानदारी के लिए जो मनुष्य को जोड़ती है।

1984 - आदमी और औरत -निर्देशक तपन सिन्हा- विभिन्न संप्रदायों और समुदायों में मैत्री और प्रेम बनाए रखने की आवश्यकता पर बल देते समय सहज दृष्टिकोण बनाए रखने के लिए।

1987 - तमस - निर्देशक गोविंद निहलानी-देश के विभाजन से पूर्व पंजाब के एक गांव में सांप्रदायिक विनाश के लिए जिम्मेदार दुखद घटनाओं को सच्चाई के साथ साहस पूर्वक चित्रित करने के लिए ।

1993 - सरदार -निर्देशक केतन मेहता - राष्ट्रवाद के उद्देश्यों को बताने के लिए अलग-अलग पड़ी सामग्री को संकलित कर के और उसे महाकाव्य की शैली में भारतीय राष्ट्रवाद की सुसंगत गाथा में ढाल कर संक्रमण काल में भारतीय इतिहास का परिदृश्य प्रस्तुत करने के लिए ।

1998 - जख्म - निर्देशक महेश भट्ट- समकालीन समय में व्याप्त सामाजिक धार्मिक संघर्ष, सांप्रदायिक तनाव, हिंसा और असौहार्द्र के निर्भीक चित्रण के लिए । फिल्म बहुत ही संवेदनशील ढंग से प्रेम और शांति का संदेश देती है।

2000 - पुकार -निर्देशक राजकुमार संतोषी- यह फिल्म आतंकवादियों की घुसपैठ और सेना की जवाबी कार्रवाई को लेकर है और इसमें दिखाया गया है कि सैन्य और असैनिक ताकतें किस प्रकार बाहरी दुश्मन का सामना करती है।

2003 - पिंजर - निर्देशक चंद्रपकाश द्विवेदी- ‘पिंजर’ की कहानी यह बताती है कि मानवीय संबंध एवं अनुभूतियां सामाजिक एवं धार्मिक विच्छेद को किस प्रकार पराजित करने में सक्षम हैं।

2004 - नेताजी सुभाष चंद्र बोस -निर्देशक श्याम बेनेगल- नेताजी आधुनिक भारत के अग्रणी व्यक्तित्व हैं। राष्ट्र के स्वतंत्रता के महान उद्देश्य के लिए वे एक आदर्शवादी से क्रांतिकारी बन गए। फिल्म इस काल का अत्यंत प्रभावी चित्रण करती है।

2007 - धर्म - निर्देशक भावना तलवार-यह संदेश सशक्त ढंग से उजागर करने के लिए मानवता का मूल्य धार्मिकता से अधिक है। एक रूढि़वादी और अंधविश्वासी पुजारी के जीवन में आए परिवत्र्तन को संदुरता के साथ चित्रित किया गया है।

2009 - दिल्ली-6 -निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा- कौमी बंटवारे के खिलाफ, नैतिक दृष्टिकोण तथा इसके निराकरण के मानवीय पहलुओं पर आधारित एक श्रेष्ठ फिल्म

Saturday, August 13, 2011

पेद्रो अलमोदोवार

द टेलीग्राफ में पेद्रो अलमोदोवार की नई फिल्‍म 'द स्किन आई लिव इन' के सिलसिले में डेविड ग्रिटेन ने यह प्रोफाइल और बातचीत लिखी है। पेद्रो अलमोदोवार के प्रशंसकों और उनके बारे में कम या नहीं जानने वालों के लिए मैं इसे वहां से कट-पेस्‍ट कर रहा हूं।

Pedro Almodóvar interview for The Skin I Live In

Over three decades, Pedro Almodóvar has almost single-handedly brought Spain’s film industry to world attention. He talks about his latest release.

My visit to the filmmaker Pedro Almodóvar in Madrid earlier this summer coincided with a turbulent week for Spain. In Barcelona, police and demonstrators engaged in violent clashes outside the Catalan regional parliament. In Valencia, thousands took to the streets to protest against politicians 'selling out' to corporate and banking interests. In Madrid itself, young members of 15-M, a peaceful protest movement disenchanted with all politicians and the two-party system, massed outside the home of an elderly man to prevent a bank from repossessing his home.

Would Almodóvar be commenting publicly about the discontent sweeping Spain? He shot me a baleful look and recalled that he had voiced his opinions about 15-M back in May, at the Cannes Film Festival. 'I said I was all for it, that these young people would teach the politicians a lesson. They'd point out their mistakes and tell them how to put those mistakes right. Unfortunately, because I'm a public figure, whenever I stand up and make that sort of statement, half the country hates me for it. It's horrible. I get crucified. But I can't keep quiet. I have to say what I think.'

Even now, at 61, Almodóvar can divide popular opinion in Spain whenever he opens his mouth in public. Openly gay and a man of the left, he is still remembered with a shudder by older, conservative Spaniards as the creator of a string of emotional, exuberant, scandalous taboo-busters –What Have I Done to Deserve This?, Matador, Tie Me Up! Tie Me Down!,High Heels – in the 1980s and early 1990s. These films were correctly perceived as a deliberate rebuke to the sullen cult of Spanish machismo and to General Franco's long, oppressive rule (which ended with his death in 1975). Those days are long gone, yet the media still hounds him for his thoughts. Once regarded as a punkish rebel, he has become a venerable sage. Almodóvar now occupies a unique position in Spanish life. He is by far the country's best-known filmmaker. Indeed, no major nation in the world has one director who enjoys such dominance over his native industry.

For such a famous, influential figure, Almodóvar maintains a low profile in his daily life. I met him at his production company, El Deseo, in which his brother Agustín has been his partner and producer since 1986. El Deseo (it means 'desire') feels far removed from the bustle of central Madrid; it is situated on a narrow street in a sleepy suburb close to Las Ventas, the city's giant bullring.

From outside, this anonymous block offers no hint of the business conducted there. But inside, it is utterly different: a ground-floor open-plan office, in modishly industrial style. Posters of his films – All About My Mother, Volver, The Skin I Live in – hang from its walls. On the floor above, overlooked by a poster of Bette Davis in All About Eve, Almodóvar greeted me smilingly, dressed casually in a blue check shirt, jeans and cream slip-ons without socks. He is rotund, with a shock of grey hair that flies away in all directions, and a one-day stubble. With sad brown eyes, his default expression is plaintive, but when he flashes his broad smile his entire face lights up. He speaks competent English, but in conversation he gets carried away and switches to long explanations in Spanish; using lightning shorthand, his British translator Claire Godfrey calmly keeps up.

Almodóvar has written and directed 18 films. They are united by subtle parallels with his own life, his penchant for melodrama and complex narratives, and his gift for writing terrific roles for mature women. Whatever it is he does, he is doing something right: he is the planet's most famous and popular filmmaker working in a non-English language. 'Fortunately, my market is the world,' he said. 'I'm happy about that. It's unique in Spanish cinema, because people [abroad] usually don't go to see Spanish films.' He is at a point where his fame renders his first name redundant: the poster of his new film, The Skin I Live in, announces it simply as 'a film by Almodóvar'.

He has the unlikely knack, too, of turning Spanish actors into global movie stars. After appearing in Live Flesh (1997) and All About My Mother(1999), Penélope Cruz could embark on a lucrative, if not always admired Hollywood career. Javier Bardem had a small part in High Heels (1991), but a major one in Live Flesh that established his international profile. Antonio Banderas goes back even further with Almodóvar, who cast him inLabyrinth of Passion (1982), then in Law of Desire (1987), and gave him his big break in the Oscar-nominated black comedy Women on the Verge of a Nervous Breakdown (1988).

Banderas, now 50, has returned to Almodóvar's fold for The Skin I Live in, with a sinister yet seductive performance, his best in years. He plays Ledgard, a plastic surgeon whose wife died, having been horribly burnt in a car crash. Holed up in his mansion, where he has a laboratory, he sets about creating a new kind of skin, sensitive to touch, but a shield against burns and other dangers.

Ledgard has a human guinea pig: Vera (Elena Anaya), a beautiful, enigmatic, passive woman whom he keeps prisoner, shielded from the world in an upstairs room, and experiments upon with his patented skin. The plot, with a secret twist, involves a typical grab-bag of Almodóvar motifs: identity, desire, an attempted rape, gender-switching, murder, family ties and revenge.

The film is loosely based on Thierry Jonquet's French novella Mygale(Tarantula). Almodóvar giggled when I called The Skin I Live in an 'unfaithful adaptation', for Mygale is a potboiler – overwrought, indifferently plotted, almost laughable in its eagerness to shock. The younger Pedro, the punkish bad boy of the 1980s, might have embraced its excesses; but the mature Almodóvar concedes reluctantly that he found the book 'gratuitous'.

Thus, while retaining its essential story, he toned it down considerably. 'I decided it was more interesting for the film as a whole for the rape [in the book] not to be fulfilled, not to take place,' he said. He also excised Ledgard's more sadistic acts of vengeance on Vera. It feels most like a horror film, though Almodóvar swiftly qualified: 'Certainly a lot of people who have seen it were completely shaken. But it's not really a horror film like those produced in the States now. There's no blood or gore in it at all.' He shrugged. 'Maybe it's just a horror movie my way.'

Still, by his own admission the film is a departure for Almodóvar. 'Whenever I've shot my previous films, I've felt phantoms of my own cinema past and personal past hovering over me. They accompanied me through those films. But this time I felt completely on my own. For the first time this film did not go hand-in-hand with my memories. The tone is different as well. It's very austere.'

He sees a political dimension to the film, which it probably helps to be Spanish to comprehend. 'It's about the abuse of power. I think a lot about governments that abuse positions of power, using something else to defend the decisions they take.'

Only afterwards did it occur to me that this comment chimed with one of his most controversial public outbursts: in 2004, straight after the terrorist bombings of Madrid trains that killed 191 people, he wondered aloud about rumours that the conservative Popular Party was trying to make political capital out of the outrages. He received hate mail as a result – just as he did in May, when he spoke out in Cannes.

Banderas and Anaya accompanied him to Cannes, and Banderas touchingly paid tribute to his mentor. Working again with Almodóvar was, he said, 'a form of recognition and gratitude. He's in a very important position in my life. He signifies a great deal. He was the beginning of my film career. He gave me an artistic education.'

Elena Anaya was equally effusive. She had a minor part in his film Talk to Her (2002), but now seemed dazed to be the latest actress to benefit from his talent for writing for women. 'So often you just get offered roles as someone's wife or love interest,' she told me. 'It's bull. We women have a lot of things to say, in fiction and in life. I think Pedro understands all sorts of women, and gives them an importance few directors ever do.' It would be no surprise if Anaya, 36 and fluent in English, became a global star like Cruz, Bardem and Banderas. She views her role as Vera as a gift. 'Pedro's an icon to me. He breaks boundaries and we follow him. He's valiente, brave. In Spain before him, it wasn't possible to show certain things on film. But he showed them to this country.'

Pedro Almodóvar was born far from Madrid in a village of 5,000 people called Calzada de Calatrava, in La Mancha, a flat, rural region of Spain that he describes as 'backward, almost 19th century'. Growing up, he recalls, he was raised mainly by female relations. 'The men were out working in the fields.' These women, strong, forthright and superstitious, inspired his 2006 film Volver (it means 'return'), a love letter to La Mancha. It starts with an indelibly lovely image: black-clad widows sweeping leaves from their husbands' graves.

A film fan from the age of nine – 'I would come back from movies and retell their stories to my two sisters' – Almodóvar headed for Madrid when he was 16, hoping he might find some way of getting into the movie business. He sold used items in a flea market, then worked for a spell for the national phone company. Franco had closed down Spain's film schools, so he saved up for a Super 8 camera and began making his own short films. When Franco died, Almodóvar was in the right place at the right time. 'Two years after his death, there was nightlife in Madrid again.' He became part of La Movida, a counter-culture movement dedicated to celebrating Spain's new democracy and stamping on Franco's legacy.

He became half of a parody glam-rock duo, Almodóvar and McNamara, and took to the stage in drag. In 1980 his film career started in earnest with the release of the kitschy, ultra-low-budget Pepi, Luci, Bom and Other Girls, shot at weekends by a crew working for nothing. He was on his way.

He blazed this provocative trail for more than a decade before exploring more sombre, mature material in what he calls his 'trio of transitional films':The Flower of My Secret (1995) starring Marisa Paredes as a bestselling romantic novelist in the throes of a midlife crisis, Live Flesh and All About My Mother. Live Flesh, his 'unfaithful adaptation' of Ruth Rendell's psychological thriller, in his hands becomes a meditation on Spain's emergence from the Franco years to become a functioning democracy. All About My Mother is a self-consciously theatrical story, with homages to Hollywood's post-war 'women's pictures', about a grieving mother who sets out to find the father of her dead son, and stumbles on a curious assortment of female friends: a pregnant nun, a lesbian actress and a transvestite. 'It deals specifically with women who help each other and naturally have solidarity with each other,' Almodóvar told me at the time. It also proved his ability to write rich roles for actresses; he has done it for Carmen Maura, Victoria Abril, Marisa Paredes (for whom he created a role in The Skin I Live in that was not in the original book), and of course Cruz.All About My Mother sealed his global reputation.

For years, a striking aspect of his films has been how beautiful they are to look at. He seems most comfortable with interior scenes; typically his camera hovers lovingly over upscale domestic objects, decor and furniture. The effect is both hyperreal and dreamlike. The veteran cinematographer José Luis Alcaine, who has lit five of them, thinks they offer 'a very particular immersion, almost like a visit to a parallel world'. Over the years Almodóvar has favoured a vivid palette, though for the quasi-Gothic tone ofThe Skin I Live in he asked Alcaine for 'a density, glow and darkness'.

Alcaine told me Almodóvar still likes bright colours. 'But they don't explode on the screen and don't seem to dominate the image as before. I think he no longer sees the world around us with the same optimism, and that the future awaiting us is not at all hopeful, as it was in the 1980s.'

How does Almodóvar achieve the look of his films? It's in the details, he says. 'My directors of photography light my films, but the colours of the sets, furnishings, clothes, hairstyles – that's me. Everything that's in front of the camera, I bring you. I work through intuition, like a painter with a canvas, building it up. All the lights, colours, sets, clothes – they represent elements in the narrative, the story I'm telling. Of course I want my films to look really good, but every single element is chosen for a reason. It's telling something in the story.' He shrugged. 'That may not always be clear for the average spectator. It's more for me.'

His obsessive detail extends to eliciting precise performances from actors. The cast of The Skin I Live in rehearsed for two whole months, a long time for a film. Anaya recalled, 'He's a really good communicator. He works on every little detail and gives you all his ideas. Once he gave me 10 pages of notes [on how to play] a single scene. As a character, every little thing you do, you do for a reason.' She reflected, 'I've come to think all his characters are in some way an extension of himself.'

This autocratic approach answers the question most often asked of him: why has he never worked in Hollywood? It's not for lack of trying on Hollywood's part; he has hordes of admirers among studio executives who have tried to lure him, but in vain. Over the years, he has been offered The First Wives Club, Sister Act – and the Julia Roberts film Runaway Bride, which for a while intrigued him. He took a good hard look at the script ofThe Truman Show. There was talk of him directing a new version of Don Quixote (that other famous man of La Mancha), with Sean Connery in the title role and Robin Williams as Sancho Panza. Nothing came of that, either.

'I'm an artist,' Almodóvar told me years ago, 'and I'm part of every decision in a movie. This is not how they work in Hollywood. There, the director is part of the crew, not the main creator. I'm too old to change now. I wouldn't know how to do it.'

Other things will not change. In a profoundly Catholic country he is agnostic. 'I don't have that religious support that can give me comfort.' And he seems to function contentedly without a significant other. 'The life I live due to my work is difficult to share,' he has said.

Did he feel any kinship with other directors? He named Terrence Malick, Bernardo Bertolucci and Todd Haynes, along with Scorsese and Tarantino. Not a Spaniard among them – and further ammunition for his fellow Spaniards who would question his loyalty. But he denied this. 'I'm part of the Spanish industry,' he insisted. 'I belong to this country. My films are intensely personal, but intensely Spanish too. Going even further, they're from La Mancha – they reflect where I come from. They're a mix of La Mancha and Madrid nightlife, with a big Andy Warhol influence, and my love for American classic movies of the 1940s.' I gestured to his All About Eveposter. 'Ah, yes,' he sighed. 'I think I made movies to have the possibility to work with Bette Davis.'

In truth, he claimed, 'I'm a product of Spanish democracy. Once it was impossible to make movies like mine here. I'm a demonstration that it's a real democracy now. But it needs to evolve as a way of showing it's still alive.' He's clearly angry about the political situation in Spain. Would he like to be out on the streets with the disaffected 15-M kids? 'I miss my youth now and then. But what's important is the future of this movement. These young people are so full of energy. I'm too old to go out and camp out all night with them. But I'd be out there if I was still young.'

'The Skin I Live in' is released on August 26