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Saturday, July 30, 2011

फिल्‍म समीक्षा : गांधी टू हिटलर

गांधी टू हिटलर: हारे हिटलर, जीते गांधीहारे हिटलर, जीते गांधी

-अजय ब्रह्मात्‍मज

अलग किस्म और विधा की फिल्म है गांधी टू हिटलर। ऐसी फिल्में हिंदी में तो नहीं बनी हैं। दो विचारों और व्यक्तित्वों की समानांतर कहानी गांधी टू हिटलर लेखक-निर्देशक की नई कोशिश है। वे बधाई के पात्र हैं। उन्होंने हिटलर और गांधी के विचारों को आमने-सामने रखकर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में दिखाने और बताने की कोशिश है कि गांधी श्रेष्ठ हैं। उनका विचार ही विजयी हुआ है।

अपने अतिम दिनों में हिटलर निहायत अकेले हो गए थे। उनके साथी एक-एक कर उन्हें छोड़ रहे थे और द्वितीय विश्व युद्ध में हर मोर्चे पर जर्मनी की पराजय हो रही थी। इसके बावजूद अपनी जिद्द में एकाकी हो रहे हिटलर ने नाजी विचारों नहीं छोड़ा। इस दौर में गांधी ने उन्हें दो पत्र लिखे। इन पत्रों में उन्होंने हिटलर के विचारों की समीक्षा के साथ यह सुझाव भी दिया कि वे युद्ध और हिंसा का मार्ग छोड़ें। इस फिल्म में गांधी के सिर्फ रेफरेंस आते हैं, जबकि हिटलर के जीवन को विस्तार से चित्रित किया गया है।

लेखक-निर्देशक ने उपलब्ध फुटेज और तथ्यों का फिल्म में सुंदर उपयोग किया है। इस फिल्म की खासियत हिटलर की भूमिका में रघुवीर यादव का होना है। रघुवीर यादव ने हिटलर की चारीत्रिक विशेषताओं को पकड़ा है और बहुत उम्दा तरीके से उसके किरदार को जीवंत किया है। हमें हिंदी बोलते हिटलर से कोई परेशानी नहीं होती। रघुवीर यादव हर लिहाज से प्रभावित करते हैं। इवा ब्राउन की संक्षिप्त भूमिका में नेहा धूपिया भी अच्छी लगी हैं।

लेखक-निर्देशक ने अपनी सोच को प्रभावशाली तरीके से पेश करने के लिए कुछ काल्पनिक चरित्रों का भी इस्तेमाल किया है। फिल्म में गीत-संगीत की अधिक संभावना नहीं थी, इसलिए गीतों का समावेश अनावश्यक लगता है। उनके फिल्मांकन में निर्देशक ने अधिक रुचि भी नहीं ली है। गांधी टू हिटलर अनूठा प्रयास है। फिल्म केकमजोर पक्ष भी हैं, गांधी से संबंधित दृश्यों के फिल्मांकन में सावधानी नहीं बरती गई है। चलते-फिरते तरीके से काम चला लिया गया है।

रेटिंग- *** तीन स्टार

फिल्‍म समीक्षा : बबल गम

बबल गम: छोटे शहर की किशोर कहानीछोटे शहर की किशोर कहानी

-अजय ब्रह्मात्‍मज

कहानी थोड़ी पुरानी है। उस दौर की है, जब इंटरनेट और मोबाइल नहीं आया था। छोटे शहरों केकिशोर-किशोरियों के बीच तब भी दोस्ती होती थी। उनके बीच मासूम प्रेम पलता था और लड़ाई-झगड़े भी होते थे। संजीवन लाल ने उस दौर को चंद किशोरों के माध्यम से चित्रित किया है। बबल गम किशोरों के जीवन में झांकने के साथ पैरेंटिंग के पहलू को भी टच करती है।

वेदांत और रतन के बीच ईष्र्या और प्रतियोगिता है कि दोनों में से कौन जेनी को पहले अपनी दोस्त बना लेता है। वेदांत की कोशिशों में मूक और वधिर बड़े भाई विदुर के आने से खलल पड़ती है। मां-बाप चाहते हैं कि वेदांत छुट्टी पर आए अपने भाई विदुर का खयाल रखे। मां-बाप विदुर का अतिरिक्त खयाल रखने की प्रक्रिया में अनजाने ही वेदांत को नाराज कर देते हैं। उसे गलतफहमी होती है कि पूरे परिवार के केंद्र में विदुर है। वह विरोध और प्रतिक्रिया में गलत राह पकड़ लेता है।

उड़ान की तरह जमशेदपुर की पृष्ठभूमि में बनी बबल गम विषयगत विस्तार के कारण धारदार असर नहीं छोड़ पाती। एक साथ कई पहलुओं को लेकर चलने के कारण फिल्म का प्रभाव बिखर गया है। इसी कारण ईमानदार और स्वस्थ कोशिश के बावजूद फिल्म साधारण रह जाती है। खूबी यह है कि संजीवन लाल के कलाकारों की टीम अच्छी है। सारे बच्चे नैचुरल लगते हैं।

रेटिंग- **1/2 ढाई स्टार

फ‍िल्‍म समीक्षा : खाप

खाप : ऑनर  किलिंग  का मुद्दाऑनर किलिंग का मुद्दा

-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले कुछ समय से खबरों में आए खाप और ऑनर किलिंग के विषय पर अजय सिन्हा की खाप जरूरी मुद्दे का छूती है। उत्तर भारत के कुछ इलाकों में प्रचलित खाप व्यवस्था में जारी पुराने रीति-रिवाज को निशाना बनाती पर फिल्म बखूबी स्थापित करती है कि ऑनर किलिंग के नाम पर चल रहा अत्याचार एक जुर्म है। खाप की समस्या है कि कथ्य की आरंभिक सघनता बाद में बरकरार नहीं रहती। गांव से शहर आने के बाद कहानी की तीव्रता कम होती है। और मुद्दा हल्का हो जाता है।

अजय सिन्हा ने सिर्फ सगोत्र विवाह को ऑनर किंलिंग की वजह बताया है, जबकि ऑनर किलिंग ज्यादा बड़ी समस्या है। इसमें अमीर-गरीब, जातियों और धर्मो की भिन्नता आदि भी शामिल हैं। खाप पंचायतों के पक्ष में कही गई बातों से ऐसा लगता है कि निर्देशक संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। फिल्म का कथ्य यहीं कमजोर पड़ जाता है। सामाजिक विसंगति पर आरंभ हुई फिल्म साधारण इमोशनल ड्रामे में बदल जाती है।

खाप मुख्य रूप से सहयोगी कलाकारों के दम पर टिकी है। ओम पुरी, गोविंद नामदेव और मनोज पाहवा ने अपने किरदारों को अच्छी तरह निभाया है। खास कर मनोज पाहवा का अभिनय उल्लेखनीय है। उन्होंने अपनी किरदार को अभिनय से ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। प्रेमी युगल के रूप में सरताज और युविका चौधरी कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाते। हालांकि निर्देशक ने उन्हें पर्याप्त दृश्य और संवाद दिए हैं, लेकिन उनकी असमर्थता साफ दिखती है। फिल्म में नाच-गाना और इंटरनेट प्रेम ठुंसा हुआ लगता है।

रेटिंग- **1/2 ढाई स्टार

Monday, July 25, 2011

New Voices Fellowship for Screenwriters

Voices Fellowship for Screenwriters

Program offers support for Indian film writers

The New Voices Fellowship for Screenwriters will award fellowships to six Indian screenwriters. (Jeezny/Flickr)

The New Voices Fellowship for Screenwriters will award fellowships to six Indian screenwriters. (Jeezny/Flickr)

HOW TO APPLY
ADVISORY COUNCIL & MENTORS
FELLOWS | SCHEDULE
RULES, REGULATIONS & DISCLAIMER
FAQs | CONTACT

Asia Society India Centre announces the launch of the New Voices Fellowship for Screenwriters (NVFS), a program to identify and support a group of six talented independent screenwriters to develop their feature film scripts by working in a dynamic and innovative environment with guidance from eminent filmmakers and screenwriters. Our premise is that screenwriters are seeking to develop powerful, nuanced and well-crafted scripts while exploring new approaches to the art of writing for the cinema. We invite writers from across the country to submit an original story for consideration between July 11 and August 31 for the 2011 Fellowship.

Time Warner is the Founding Sponsor of the New Voices Fellowship for Screenwriters.

ABOUT THE NEW VOICES FELLOWSHIP FOR SCREENWRITERS

Asia Society recognizes India's exceptional legacy in the field of cinema. The New Voices Fellowship for Screenwriters will host a diverse and talented group of screenwriters who will explore new approaches to storytelling and narrative, provide peer feedback and work with respected professionals in the field. The project will have two phases. Through an open application process, twelve writers will be selected to attend the first workshop to be held in November 2011. At the end of the workshop, six writers will be invited to continue on in an eight-month Fellowship that will provide a focused platform to explore their work and ideas more fully. A second workshop will be held in spring 2012 (dates tbc) and the Fellowship will end in August 2012. The project structure has been created by a group of advisors and mentors who are listed below. Selected Fellows will have a rare opportunity to work with eminent screenwriters to develop their scripts and to attend two workshops.

Each participating Fellow will receive:

  • A stipend of Rs.1,00,000.
  • Regular feedback from the mentors who are eminent screenwriters and directors towards the completion of the feature script.
  • Two five-day-long intensive workshops led by industry professionals and with active participation from peers in a learning community.
  • Recommendations on how to take the scripts to the next phase. This includes conceptualizing strategies and approaches to developing contacts — producers, directors, distributors and festivals.

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HOW TO APPLY

Applications will be accepted between 11th July - 31st August 2011.

The fellowship is only open to Indian citizens residing in India, above 18 years old, who have written one full-length feature script that has been registered with Film Writers Association, Mumbai.

Download the Application Form (PDF)

Download Sample Script (PDF)

Download Story Script Definitions (PDF)

Download and complete the application form and preferably email the required documents. There is also an option of sending the documents by post. This includes:

  • Thematic Intent: In 200 words, provide a summary of the story and its thematic intent. It can be across genres; however, the theme and intent of the story should be clearly defined.
  • An original coherent story in the following format: Word Limit - Between 3000 - 4500, Font - Courier New, Font Size - 12, Spacing - 1.5, Page Width - 6 inch. The story should have the potential to evolve into a feature-length screenplay.
  • A previously written complete script. Include a brief synopsis and ensure that the script is properly formatted. Please enclose a short synopsis of this script.
  • The sample script and the story should be two DIFFERENT concepts. The complete script is to analyze the applicants writing ability and the story is what the applicant (if selected) will have an opportunity to develop into a new full fledged script.
  • The Fellowship is open to all Indian languages, however if the story/sample script is written in any other Indian language other than English/Hindi, then it must be translated to either English/Hindi.
  • Please note that the applicant needs to be a member of the Film Writers Association in Mumbai or any other region in India. Both the previously written feature film script and the original new story need to be registered with any Film Writers Association before sending documents to NVFS. The applicant MUST clearly mention in the NVFS Application Form: FWA Membership No. & Category, FWA location and the registration numbers of both the script and story. Documents required and contact details for FWA, Mumbai are available in the FAQs.
  • The applicant's name, address, phone number or any other identifying information should not appear on the title page or any other page of the story and the previously written script.

All of the above documents must be in English or Hindi. Please send the story and sample script in PDF format if sending the documents by email.

There is no application fee. All applicants with the required writing samples are welcome to apply.

The 12 shortlisted applicants will be notified on 20th October, 2011 and must be available for the first residential workshop from 8th-12th November, 2011 followed by an interview on 13th November where the final six Fellows will be selected for the Fellowship. 12 shortlisted applicants will have an opportunity to be a part of the first screenwriting workshop exclusively designed for the Fellowship.

We will send acknowledgements of your entries by email.

Please read Rules, Regulations & Disclaimer and FAQs for more information.

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ADVISORY COUNCIL & MENTORS

Advisory Council:

Dev Benegal is a director, screenwriter and producer most known for his debut film English, August, which won the National Film Award for Best Feature Film in English. His second film, Split Wide Open (1999), premiered at the Venice International Film festival. Benegal's work represents modern Indian cinema, which is distinct from the realist or popular traditions of Indian cinema. His most recent work is Road, Movie. In addition to his directing career, Benegal is acknowledged as a pioneer in digital technology, having created 24×7 Making Movies and produced over 60 short feature films. Cannes and Variety have acclaimed his films.

Bunty Chand is the Executive Director of Asia Society India Centre. Chand is overseeing the development of Asia Society India Centre and is responsible for fundraising, development of diverse programs and establishing relationships and building support for the Centre with a broad array of corporate and institutions in India She spent ten years with AT&T in the United States and Hong Kong in the areas of Strategy and Business Development, Human Resources, and Training and Development. She has lived and worked in the U.S., the Philippines, Hong Kong and Singapore.

Saket Chaudhary is a writer-director. He began his career as a writer with Movers and Shakers, and has written and directed two popular television shows, Kyon Hota Hai Pyar and Dil Kya Chahta Hai. His film Pyar ke Side Effects received much acclaim and many awards. Chaudhary is currently casting for his next film, Shaadi ke Side Effects, produced by Pritish Nandy Communications.

Rachel Cooper is Director of Culture and Performing Arts at the Asia Society. Cooper has presented and curated film programs from India, Indonesia, China, Iran, Japan, Korea and Thailand as well as producing and presenting performances from throughout Asia. She has co-sponsored and presented various film festivals and film series at the Asia Society, including the Iranian Documentary and Short Film Festival, the Asian American International Film Festival and the IAAC India Film Festival, among others. She has organized major arts and culture initiatives, including Festival of Song: Music of India and Pakistan, Creative Voices of Islam in Asia, Festival of Indonesia and Dance — the Spirit of Cambodia. In addition, she has conducted and published research on international impact of the arts, which resulted in the report Making a Difference through the Arts. In 2006 she was awarded the Dawson Award for Sustained Excellence in Arts Programming.

Nandita Das is an actor and filmmaker. She has acted in over 30 feature films in ten different languages with many eminent directors. Firaaq, her directorial debut feature film, premiered in Toronto and has traveled to many festivals. She was a member of the jury at the Cannes Film Festival in 2005, among other reputable international film festivals. The French government bestowed the honor of Knight of the Order of Arts and Letters, a very prestigious civil award, on her earlier in 2011. Das is currently the Chairperson of the Children's Film Society, India.

Anjum Rajabali is the head of the department of Screenplay Writing in the Film and Television Institute of India (FTII) and The Whistling Woods International. From Drohkaal to his most recent work, Raajneeti, Rajabali has created a niche and new standard for powerful screenwriting in Hindi cinema. He has scripted films like Ghulam, Pukar, The Legend of Bhagat Singh, and many more. His latest film, Aarakshan, is due for release in August 2011. Rajabali is devoted to the progress and development of screenwriting in India and has recently been appointed as a member to the Central Board of Film Certification.

Maithili Rao is a Mumbai-based freelance film critic. She has written extensively for Indian and international publications including South Asian Cinema, Man's World,Hindu, Frontline, Cinema In India, Film Comment,International Film Guide and the British Film Institute website. Rao has served as member of the FIPRESCI jury at Sochi, Mumbai International Film Festival, and International Children's Film Festival. In addition, Rao has contributed to the Encyclopaedia Britannica India on Hindi cinema; Bollywood, Dakini Publications; and on Amitabh Bachchan for Icons, Roli Press.

Jaideep Sahni is a screenwriter and noted lyricist. He has written several notable films including Company,Khosla ka Ghosla, Chak de India and Rocket Singh: Salesman of the Year. Always trying to push boundaries and broaden horizons for storytelling, Sahni has an uncanny knack for resurrecting the common man through his stories, which brings great resonance and reaches out to a large spectrum of people.

Mentors:

Ashwini Malik is a screenwriter and independent filmmaker. His work includes films like I Am, Sorry, Bhai!, Road Movie, Bas Ek Pal and Clever and Lonely. He has taught at the Film and Television Institute of India (FTII) and currently teaches at Whistling Woods International. He has also been a mentor at many screenwriting workshops in India and abroad.

Sriram Raghavan is a screenwriter and director. Raghavan's films reflect a strong tradition of film noir, which is a delightful addition to narratives in Hindi cinema. His most recent work, Johnny Gaddaar, is a striking example of this. His work includes films like Ek Hasina Thi, and he is currently working on Agent Vinod(unreleased).

Vinay Shukla is a screenplay writer and director whose film Godmother won six National Awards. He has conducted scriptwriting workshops in Lucknow, at the Satyajit Ray Film Institute, Kolkata and was a mentor at Maisha, Kampala in 2006. Shukla lectures in the Screenplay Writing course at the FTII Pune, which he helped set up in 2004, and also at the Whistling Woods International. His most recent written and directed film,Mirch, was released in 2010.

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FELLOWS

The profiles of the six fellows will be available in late November 2011.

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SCHEDULE

Open for applications
11th July–31st August, 2011

Announcement of 12 shortlisted applicants
20th October, 2011

First residential screenplay workshop in Mumbai
8th-12th November, 2011

Interviews of 12 shortlisted applicants
13th November, 2011

Announcement of six Fellows
13th November, 2011

Second residential screenplay workshop in Mumbai
March/April, 2012 (dates TBC)

Closing ceremony
August, 2012 (dates TBC)

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RULES, REGULATIONS & DISCLAIMER

  1. All submission material should be in either English or Hindi. Please refer to "How to Apply."
  2. Collaborative stories by two writers will be accepted. However, the Fellowship will only accept one collaborator per application. Please designate one of the writers as the primary contact. The other collaborator can attend the workshops, but no expenses of second collaborator will be borne by Asia Society.
  3. The six selected Fellows will sign a legal contract with Asia Society so they have a formal undertaking of the Fellowship. However, in case of any unforeseen situation, if a Fellow does not fulfill his or her responsibilities then he/she must return the entire stipend money to Asia Society.
  4. The Fellowship has been designed bearing in mind that the selected candidates may be working professionals and they can therefore maintain their professional responsibilities during the course of the Fellowship.
  5. Selected Fellows will receive a stipend of Rs.1,00,000. 25% of the money will be released at the beginning of the project, 50% on completion of five months and the remaining 25% on successful completion of the Fellowship.
  6. The residential workshop will be held in Mumbai in November 2011 followed by a consecutive workshop in March 2012 (dates TBC).
  7. The travel and accommodation costs for fellows outside of Mumbai will be borne by Asia Society for the second workshop.
  8. The workshops will be held over a period of five days, and Asia Society will ensure that the final dates are announced well in advance so selected fellows can plan accordingly.
  9. The copyrights to the story and sample script will be sole responsibility of the writer. Please do not submit another person's work as your own. In case of copyright infringement, neither Asia Society nor any sponsor will be liable and the application will be rejected.
  10. The applicant should have the rights to all the material used and permission to use the same, if borrowed from any source.
  11. Until and unless the final deliverable, i.e. third draft of complete formatted script with dialogue is submitted to Asia Society at the end of the Fellowship program, the Fellows will not be at liberty to pitch any of the material developed under the Fellowship to any professional producer/director/screenwriter/film financer.
  12. Asia Society acquires no rights to the screenplay developed during the Fellowship program or to the script submitted as writing sample. This Fellowship is an endeavor for aspiring and talented individuals to develop an original, interesting and technically sound screenplay. Neither Asia Society nor any sponsor will participate in its marketing or in any other aspects of the scripts commercial future in connection with the Fellowship Program.
  13. If your contact information or eligibility status changes after having sent the application, please update your contact details with us immediately so you do not miss any Fellowship updates.
  14. The New Voices Fellowship for Screenwriters may not be held concurrently with other fellowships or any other similar program.

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FREQUENTLY ASKED QUESTIONS

Download the FAQs (PDF)

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CONTACT

Asia Society India Centre
2nd Floor, Ramon House
HT Parekh Marg
169, Backbay Reclamation
Churchgate, Mumbai - 400020
Maharashtra

Email: fellowship@asiasociety.org.in

We assure you that all your queries will be duly answered.
No phone calls, please.

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Friday, July 15, 2011

क्यूँ न "देसवा" को हिंदी फिल्मो की श्रेणी में समझा जाये ?

मुझे यह समीक्षा रविराज पटेल ने भेजी है। वे पटना में रहते हैं और सिनेमा के फ्रंट पर सक्रिय हैं।

-रविराज पटेल

देसवा की पटकथा उस बिहार का दर्शन करवाती है ,जो पिछले दशक में बिहार का चेहरा कुरूप और अपराधिक छवि का परिचायक बन चूका था .शैक्षणिक ,आर्थिक ,सामाजिक एवं मानसिक रूप से विकलांग बिहार हमारी पहचान हो चुकी थी ,और ज़िम्मेदार जन प्रतिनिधिओं के रौब तले रहना हम जनता की मज़बूरी .
मूल रूप से बिहार के बक्सर जिले के युवा निर्देशक नितिन चंद्रा बक्सर जिले में ही वर्ष २००३-२००४ के मध्य घटी वास्तविक घटनाओं को अपनी पहली फिल्म का आधार बनाया है ,जो संपूर्ण बिहार का धोतक प्रतिबिंबित होता है .
चंपारण टॉकीज के बैनर तले निर्मित देसवा के सितारे हैं - क्रांति प्रकाश झा ,आशीष विद्यार्थी ,नीतू चंद्रा ,पंकज झा ,दीपक सिंह ,अजय कुमार ,आरती पूरी ,एन .एन पाण्डेय ,अभिषेक शर्मा ,नवनीत शर्मा एवं डोल्फिन दुबे जबकि सभी भोजपुरी फिल्मों के तरह देसवा में भी आईटम सोंग का तड़का देने से नही चूका गया है , जिसका मुख्य आकर्षण यह है की फिल्म निर्मात्री एवं बिहार बाला मशहूर अभिनेत्री नीतू चंद्रा स्वय यह न. पेश करती नज़र आती है ,जो आजमगढ़ के ओर्केष्ट्र पार्टी की नृत्यांगना अपने लटके झटके से सिटी ताली बटोरने में कामयाब रहती है .नीतू चन्द्रा भोजपुरी फिल्म में पहली बार नज़र आ रही है .
फिल्म में गीत संगीत मनमोहक एवं कर्णप्रिय है ,गीत आशुतोष सिंह एवं अन्य का है .आशुतोष सिंह के ही संगीत निर्देशन में सोनू निगम ,श्रेया घोषाल ,सुनिधि चौहान ,स्वानंद किरकिरे ,मिका ,शारदा सिन्हा ,भारत शर्मा "व्यास" एवं प्रभाकर पाण्डेय के सुमधुर स्वरों से सजाया गया है .
तकनिकी दृष्टीकोण से देसवा आज के भोजपुरी फिल्मों के व्याकरण से भिन्न, काफी अब्बल नज़र आता है . विशेष विषय को दर्शाता कहानी ,छाया ,प्रकाश,संपादन , कला निर्देशन एवं निर्देशन या फिर पटकथा के अनुकूल लोकशन का चुनाव में नितिन चंद्रा एवं क्रूज़ का दक्षता तथा क्षमता प्रवल प्रतीत होता है .लिहाजा, फिल्मों के कई जानकारों के अनुसार -क्यूँ न "देसवा" को हिंदी फिल्मो की श्रेणी में समझा जाये ?
सिनेमा का आरंभ पटना में मार्च २००५ में घटित दंगे के विरोध मार्च के दृश्य से होती है ,उसी क्रम में पटकथा अक्तूबर २००३ की ओर मुड़ जाती है ,जहाँ तत्कालीन बिहार की विभीषिका बयां कर रही दृश्य के साथ सिनेमा का दृश्यारंभ होता है .यह वह समय होता है ,जब बिहार अनेकानेक समस्याओं से जूझ रहा होता है.
फिल्म, कहानी के मुख्य तीन किरदारों के मध्य घुमती है ,जिसमे केंद्रीय भूमिका पात्र राजीव कुमार भारतीय प्रशासनिक सेवा का इच्छुक प्रतियोगी है , परन्तु संघ लोक सेवा आयोग की कई परीक्षाएं अनुत्तरिण होने के बाद राजीव अपने गाँव वापस लौट आया है .
फिल्म का दूसरा मुख्य किरदार शंकर पाण्डेय जो एक संघर्षशील, स्वाभिमानी एवं नव स्नातक युवा है और असम के गुवाहाटी में रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षा के दौरान बुरी तरह पीटा जा चूका है .
तीसरा पात्र चंचल स्वाभाव ,निर्मल दिल और स्वप्निल भोजपुरी गायक, नाम है "जींस" , जो आज कल के प्रचलित भोजपुरी गायकों की तरह नाम और पैसा कमाना चाहता है ,जो फूहड़ता पर कटाक्ष नजर आता है.
तीनों पात्र अपने - अपने दशा और दिशा सँवारने की कोशिश कर रहा है ,किन्तु आर्थिक तंगी, बेरोज़गारी, भ्रष्ट तंत्र व्यवस्था ,सामाजिक विषमता ,लुट ,हत्या ,अपहरण अपने प्रदेश से पलायन करने पर मजबूर तथा राज्य के बाहर अन्य प्रदेशों में बिहारी होने का अपमान पीड़ा सहने की लाचारी .
तीनों पात्र अपनी अपनी स्थिति -परिस्थिति सुदृढ़ करने के लिए मेहनत तो करता है ,लेकिन सरकारी तंत्र व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्ट्राचार ,देश में भाषावाद -प्रान्तवाद का भेदभाव ,गाँव समाज में बाहुबलियों का दबंगई ,जातिगत नरसंहारों की काली छाया ,लड़कियों की शादी-विवाह में दहेज़ प्रथा की मार ऊपर से मंगली दोष जैसे अन्धविश्वास को तबज्जो से परेशानी ,नक्सलवाद का फलना फूलना इत्यादि समस्याओं के चलते कैसे युवा पीढ़ी काविल ,शिक्षित ,मेहनती,इमानदार एवं कुछ करने की ज़ज्बा रखते हुए भी उदासीन सरकार का बेलगाम शासन के आगे बेचारापन एवं बद्द से बद्दतर ज़िन्दगी जीने पर मजबूर युवा पीढ़ी जुर्म का रास्ता अपना कर अपनी ज़रूरतों को पूरा करने की कोशिश करता है ,लेकिन जुर्म तो जुर्म होता है ,मसलन एक सुन्दर सपनों को साकार करने के बजाय सलाखों के पीछे जुर्म की सजा कटनी पड़ती है ,नतीजा वह न घर का होता है, न घाट का, "देसवा "इन तमाम समस्याओं को परिभाषित करने मे सफल है .
फिल्म के अंत मे बिहार वर्ष २००३ -०४ से बाहर निकल कर २००५-०६ मे आती है ,और एक नया बिहार ,सुदृढ़ ,समृध औरर सुशासन का राज कायम प्रतीत होता है ,या यूँ कहें की वर्तमान बिहार मे नितीश सरकार को श्रेय दे रहा हो....,जिसे देख कर संतोष ,सुकून एवं सकारात्मक आशाओं का भाव महसूस किया जाता है .
फिल्म के मध्य प्रेम -प्रसंग को भी स्थान दिया गया है ,आज के भोजपुरी अश्लील गानों पर व्यंग और संयुक्त परिवार मे बेरोज़गारी के वज़ह से आपसी कलह को बेबाकी से चित्रण किया गया है .
देसवा मे शत -प्रतिशत (लगभग) कलाकार बिहार के ही हैं ,जिनका कला कौशल किसी मज़े हुए कलाकारों से कम नही दिखती ,फिल्म की अधिकांश शूटिंग भी बिहार के ही विभिन्न स्थानों पर की गई है ,जो पटकथा के अनुकूल है ....