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Wednesday, June 29, 2011

चवन्नी पर बोधिसत्व

बोधिसत्‍व की यह टिप्‍पणी मैंने 3 सितंबर 2007 को पोस्‍ट की थी। आज चवन्‍नी का आखिरी दिन है,लेकिन चवन्‍नी चैप आप की वजह से चलता रहेगा।

चवन्नी को बोधिसत्व की यह टिपण्णी रोचक लगी.वह उसे जस का तस् यहाँ यहाँ प्रस्तुत कर खनक रहा है।आपकी टिपण्णी की प्रतीक्षा रहेगी.- चवन्नी चैप
चवन्नी खतरे में है। कोई उसे चवन्नी छाप कह रहा है तो कोई चवन्नी चैप। वह दुहाई दे रहा है और कह रहा है कि मैं सिर्फ चवन्नी हूँ। बस चवन्नी। पर कोई उसकी बात पर गौर नहीं कर रहा है। और वह खुद पर खतरा आया पा कर छटपटा रहा है। यह खतरा उसने खुद मोल लिया होता तो कोई बात नहीं थी। उसे पता भी नहीं चला और वह खतरे में घिर गया। जब तक इकन्नी, दुअन्नी, एक पैसे दो पैसे , पाँच, दस और बीस पैसे उसके पीछे थे वह इतराता फिरता रहा।उसके निचले तबके के लोग गुम होते रहे, खत्म होते रहे फिर भी उसने उनकी ओर पलट कर भी नहीं देखा। वह अठन्नी से होड़ लेता रहा। वह रुपये का हिस्सेदार था एक चौथाई का हिस्सेदार। पर अचानक वह खतरे के निशान के आस-पास पाया गया। उसे बनाने वालों ने उसकी प्रजाति की पैदावार पर बिना उसे इत्तिला दिए रोक लगाने का ऐलान कर दिया तो वह एक दम बौखला गया। बोला बिना मेरे तुम्हारा काम नहीं चलेगा। पर लोग उसके गुस्से पर मस्त होते रहे। निर्माताओं की हँसी से उसको अपने भाई-बंदों के साथ हुए का अहसास हुआ।अब चवन्नी के गिरने की आवाज बहुत धीमी हो गई है। वह पैर के पास गिरता है तो भी पता भी नहीं चलता। कभी-कभी तो उसे गिरता जान कर जेब खुश होती है कि अच्छा हुआ यह गिर गया। बेवजह मुझे फाड़ने पर लगा था। चवन्नी को ज्यादा दुख इस बात का भी है कि उसे गिरा पाकर कोई खुश नहीं होता। ताँबे का होता तो बच्चों के करधन और गले में नजरिया बन कर बचा लेता खुद को। जस्ते का होता तो बरतन बन कर घरों में घुस लेता। पता नहीं किस धातु से बनाया उसको बनाने वालों ने। वह बार-बार खुद को खुरच कर देखता है और समझ नहीं पाता कि किस मिट्टी का बना है वह।उसे भारत के देहातों ने पहले दुत्कारा। फिर शहरों ने । फिर सबने। वह बेताब होकर एक अच्छी खबर के लिए तरस रहा है। और उसके लिए मुंबई से एक अच्छी खबर है भी। यहाँ की बसों में उसके होने को मंजूरी दे दी गई है। और दक्षिण भारत के किसी मंदिर से उसे और अठन्नी को हर महीने करोड़ो की संख्या में लाया जाएगा। पर उसे बहुत राहत नहीं है। वह अपने नये चमकीले साथियों को न पाकर दुखी है। वह अपनी प्रजाति के पैदाइश पर रोक से हताश है। वह रातों में सोते से जाग उठता है, कि कहीं कल बसों में उसकी खपत बंद हो जाए तो। असल में वह खत्म नहीं होना चाहता । उसे इतिहास में नहीं मौजूदा समाज में अपनी जगह चाहिए। जेबों में गुल्लकों में अपनी खनक सुनना चाहता है चवन्नी। वह अपनों के बीच रहना चाहता है। पर कोई उसके होने और रोने पर विचार ही नहीं कर रहा। कोई उसकी नहीं सुन रहा जबकि वह काफी काम की बात करता सोचता है। उसके विचार अच्छे हैं, उसका नजरिया अच्छा है और उसकी, बातें, बेचैनी और दुख अपने से लगते हैंदोस्तों अपने चवन्नी को देखें- पढ़ें। उसे खुशी होगी और आप को संतोष । चवन्नी इतिहास नहीं वर्तमान में जिंदा रहेगा। हमारे आपके बीच उसकी खनक रहेगी। और खनक हमेशा अच्छी ही होती है अगर उसमें खोट ना हो।

Saturday, June 25, 2011

फिल्म समीक्षा : डबल धमाल

डबल मलाल
-अजय ब्रह्मात्मज

इन्द्र कुमार की पिछली फिल्म धमाल में फिर भी कुछ तर्क और हंसी मजाक था। इस बार उन्होंने सब कुछ किनारे कर दिया है और लतीफों कि कड़ी जोड़ कर डबल धमाल बनायीं है। पिछली फिल्म के किरदारों के साथ दो लड़कियां जोड़ दी हैं। कहने को उनमें से एक बहन और एक बीवी है, लेकिन उनका इस्तेमाल आइटम ग‌र्ल्स की तरह ही हुआ है। मल्लिका सहरावत और कंगना रानौत क निर्देशक ने भरपूर अश्लील इस्तेमाल किया है। फिल्म हंसाने से ज्यादा यह सोचने पर मजबूर करती है की हिंदी सिनेमा क नानसेंस ड्रामा किस हद तक पतन कि गर्त में जा सकता है। अफसोस तो यह भी हुआ की इस फिल्म को मैंने व‌र्ल्ड प्रीमियर के दौरान टोरंटो में देखा। बात फिल्म से अवांतर हो सकती है, लेकिन यह चिंता जगी की आइफा ने किस आधार पर इसे दुनिया भर के मीडिया और मेहमानों के सामने दिखाने के लिए सोचा। इसे देखते हुए डबल मलाल होता रहा। फिल्म में चार नाकारे दोस्त कबीर को बेवकूफ बनाने की कोशिश करने में लगातार खुद ही बेवकूफ बनते रहते हैं। उनकी हर युक्ति असफल हो जाती है। चारों आला दर्जे के मूर्ख हैं। कबीर भी कोई खास होशियार नहीं हैं, लेकिन जाहिर सी बात है कि वे इन चारों के दांव समझ जाते हैं और हमेशा उनको पछाड़ देते हैं। दर्शकों को फिल्म के अंत में उन्होंने यह सूचना दे दी है कि वे इसकी अगली कड़ी के रूप में टोटल धमाल भी लेकर आयेंगे। दर्शकों ने इस फिल्म को पसंद कर लिया तो उनका मनोबल बढेगा और यह लगेगा कि दर्शक ऐसी ही बेसिर-पैर की फिल्में देखना चाहते हैं। वैसे इधर ऐसी फिल्मों के प्रति निदेशकों और दर्शकों क रुझान बाधा है।

फिल्म के एक ट्रैक में सतीश कौशिक स्वामी बाटानंद बनते हैं। अंडरव‌र्ल्ड के टपोरी के बाबा बनने और टपोरी भाषा में प्रवचन देने का प्रसंग रोचक है। सतीश कौशिक उम्दा अभिनेता हैं। उन्होंने इस भूमिका में प्रभावित किया है। चारों बेवकूफ में रितेश ने अपने रेंज की जानकारी दी है। दु:ख इसी बात का है कि एक साधारण से भी कमतर फिल्म में उन्हें यह मौका मिला है। अरशद वारसी में दोहराव बढ़ गया है। वे एक ही अंदाज में संवाद बोलते हैं। गोलमाल, मुन्नाभाई और धमाल के किरदारों में प्यार फर्क तो रखते।

जावेद जाफरी और आशीष चौधरी के बारे में कुछ भी कहने लायक नहीं है। संजय दत्त ऐसी भूमिकाओं के उस्ताद हो गए हैं, क्या उन्हें ऊब नहीं होती? मल्लिका और कंगना ने खुद को इस्तेमाल होने दिया है, कॉमेडी के नाम पर उनसे अंग प्रदर्शन और द्विअर्थी संवादों क निशाना बनाया गया है। दावा तो यह था कि उनकी वजह से डबल धमाल होगा।

रेटिंग- *1/2 डेढ़ स्टार

Sunday, June 19, 2011

अब वो डायलॉग कहाँ?

-सौम्‍या अपराजिता और रघुवेन्‍द्र सिंह

संवाद अदायगी का अनूठा अंदाज और उसका व्यापक प्रभाव हिंदी फिल्मों की विशेषता रही है, लेकिन वक्त के साथ इस खासियत पर जमने लगी हैं धूल की परतें

मेरे पास मां है.. लगभग एक वर्ष पूर्व ऑस्कर अवॉर्ड के मंच पर हिंदी फिल्मों का यह लोकप्रिय संवाद अपने पारंपरिक अंदाज में गूंजा था। सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का पुरस्कार ग्रहण करने के बाद ए.आर. रहमान ने कहा, ''भारत में एक लोकप्रिय संवाद है- 'मेरे पास मां है।' हिंदी फिल्मों के इस संवाद के साथ मैं अपनी मां को यह अवॉर्ड समर्पित करता हूं।'' जी हाँ, विश्व सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित मंच पर पुरस्कार ग्रहण करने के बाद अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए ए.आर. रहमान को अपने असंख्य गीतों की कोई पंक्ति नहीं, बल्कि दीवार फिल्म का लोकप्रिय संवाद ही सूझा।

गुम हो रहे हैं संवाद

इसके उलट विडंबना यह है कि अब कम शब्दों में प्रभावी ढंग से लिखे जाने वाले संवादों और उनकी अदायगी की विशिष्ट शैली को अस्वाभाविक माना जाने लगा है। नए रंग-ढंग के सिनेमा के पैरोकारों ने अपनी फिल्मों को स्वाभाविकता और वास्तविकता के रंग में घोलने के लिए प्रभावशाली संवाद के प्रयोग की परंपरा से किनारा करना शुरू कर दिया है।

वह सुनहरा दौर

हिंदी सिनेमा के शैशव काल से संवादों की महत्ता रही है। चरित्र और दृश्यों के प्रभाव को बढ़ाने के लिए प्रभावशाली संवादों का प्रयोग किया जाता रहा है। शोले की सफलता में उसके रोचक और प्रभावशाली संवादों की बड़ी भूमिका रही है। तेरा क्या होगा कालिया..कितने आदमी थे..सो जा बेटा नहीं तो गब्बर आ जाएगा..जैसे संवादों की लोकप्रियता आज भी बरकरार है। जावेद अख्तर बताते हैं, ''लोग मेरे पास आते थे और कहते थे कि आपने कितने अच्छे डायलॉग लिखे हैं, कितने आदमी थे? तेरा क्या होगा कालिया? मैं मन ही मन सोचता कि इसमें क्या बड़ी बात है। ये तो कितनी सरल पंक्तियां हैं। दरअसल, शोले देखने के बाद लोगों पर इन सरल पंक्तियों का भी बेहद गहरा प्रभाव पड़ा था। संवाद लेखक के तौर पर उस दौर में हमारी जिम्मेदारी अपने संवादों के जरिए लोगों के दिलों को जीतने और उन्हें प्रभावित करने की होती थी।'' गौर करें तो हिंदी सिनेमा का संवाद कोष आज भी चार दशक पूर्व प्रदर्शित हुई फिल्मों के लोकप्रिय संवादों से ही पटा पड़ा है। कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं, हम जहां खड़े होते हैं लाइन वहीं से शुरू होती है, अगर मां का दूध पीया है तो सामने आ, भाव और शिल्प से भरपूर इन अनूठे संवादों का जादू आज भी बरकरार है।

कल्पनाशीलता पर पहरा

संवाद लेखन के दौरान सहज और सरल भाषा के प्रयोग के दबाव के कारण मौजूदा दौर के लेखकों की कल्पनाशीलता पर पहरा लग गया है। प्रतिष्ठित संवाद लेखक दिलीप शुक्ला कहते हैं, ''आज की फिल्में पहले की फिल्मों की तुलना में अलग हैं। उनके विषय अलग हैं। मैंने दामिनी फिल्म के संवाद लिखे थे। वह दौर अलग था। दर्शकों को संवादों में पैनापन पसंद आता था, पर आज दर्शकों की पसंद बदल गयी है। लेखकों के साथ विडंबना है कि हमें बदलते वक्त और बदलती पसंद के अनुसार अपनी लेखनी को चलाना पड़ता है।'' दूसरी तरफ लेखकों के पक्ष का खंडन करते हुए और नयी पीढ़ी के निर्देशकों का पक्ष रखते हुए इम्तियाज अली कहते हैं, ''मौजूदा दौर में अच्छे संवाद लेखकों का अभाव है। यही वजह है कि मुझे अपनी फिल्मों के लिए संवाद लिखने पड़े। चूंकि, मैं आम बोलचाल की भाषा जानता हूं, इसलिए मैंने अपनी फिल्मों के लिए ऐसे संवाद लिखे जो रोजमर्रा के जीवन में बोले जाते हैं।''

संवादहीनता का खामियाजा

लेखकों और निर्देशकों के बीच की संवादहीनता का खामियाजा हिंदी फिल्मों में प्रभावशाली संवाद की परंपरा को भुगतना पड़ रहा है। लेखकों को लगता है कि नए दौर के सिनेमा ने उनकी कल्पनाशीलता को सीमित कर दिया है, वहीं नयी पीढ़ी के निर्देशकों को लगता है कि अच्छे संवाद लेखकों के अभाव के कारण हिंदी फिल्मों में बोलचाल की भाषा प्रयोग करने के लिए उन्हें मजबूर होना पड़ रहा है। मौजूदा दौर के दिग्गज पटकथा और संवाद लेखक कमलेश पांडे कहते हैं, ''कहीं-न-कहीं लेखकों की भी गलती है। हमारे पास प्रोफेशनल संवाद लेखकों की संख्या बेहद कम है। कई लेखक बड़े निर्देशकों या अभिनेताओं के उपग्रह की तरह हैं, जो अपने मास्टर को खुश रखने के लिए नियमित नौकरी करते हैं। उनमें कल्पनाशीलता का अभाव होता है।''

स्वाभाविक अभिनय की आड़

नयी पीढ़ी के निर्माता-निर्देशकों का यकीन सरल और सहज संवाद में है, ताकि फिल्म देखने के दौरान दर्शकों को वास्तविकता का बोध हो, दर्शकों को वह उनके बोलचाल की भाषा लगे। जहां पहले कलाकारों को शूटिंग से पूर्व अपने संवादों को कंठस्थ कर कैमरे के सामने एक विशेष शैली में बोलने का निर्देश दिया जाता था, वहीं आज कलाकारों पर ऐसा दबाव नहीं रहता। उन्हें निश्चित आरोह-अवरोह के साथ लंबे-लंबे संवाद याद नहीं करने पड़ते। उन्हें संवाद दे दिए जाते हैं और कहा जाता है कि इन्हें पढ़ लें और अपने अंदाज में कैमरे के सामने बोलें। अभिनेत्री अमृता राव बताती हैं, ''मेरी नयी फिल्म लव यू मिस्टर कलाकार के निर्देशक मनस्वी और निर्माता सूरज बड़जात्या ने मुझ पर कभी यह दबाव नहीं डाला कि संवाद जैसे लिखे हैं मैं वैसे ही कैमरे के सामने बोलूं। मैं पहले पेपर पर लिखे संवाद को पढ़ लेती थी, फिर उन्हें अपने शब्दों के साथ बोलती थी ताकि वह बोलचाल की भाषा लगे। ऐसा करने से स्वाभाविक अभिनय करने में आसानी होती है। आजकल के दर्शकों को भी तो यही पसंद है।''

अल्प है भाषा का ज्ञान

नए रंग-ढंग के सिनेमा में ढल चुके नयी पीढ़ी के कलाकार भाषा ज्ञान के अभाव में लंबे संवाद बोलने में असहज होते हैं। हिंदी की लोकप्रिय साहित्यिक कृति पर आधारित फिल्म मोहल्ला अस्सी का निर्देशन कर रहे चंद्रप्रकाश द्विवेदी कहते हैं, ''आज के अभिनेताओं को संवाद याद करने और उन्हें अक्षरश: दोहराने में तकलीफ होती है।'' अभिनेता सोनू सूद भी इस बात से सहमत हैं कि मौजूदा दौर का अल्प भाषा ज्ञान बेहतरीन संवाद अदायगी के आड़े आता है। वह कहते हैं, ''नयी जेनरेशन हिंदी की जगह हिंग्लिश को ज्यादा महत्व देती है। नयी जेनरेशन के अधिकतर एक्टर की हिंदी पर पकड़ नहीं है। यही वजह है कि वे हिंदी में लिखे लंबे संवाद नहीं याद कर पाते।''

कलाकारों की उदासीनता

ऐसा नहीं है कि दर्शक हिंदी फिल्मों के पारंपरिक संवाद और उसके प्रभाव को भूल गए हैं या नए दौर की फिल्मों में उन्हें स्वीकारना नहीं चाहते। हाल में रिलीज हुई वांटेड, राजनीति और दबंग में एक बार फिर दृश्यों के प्रभाव को बढ़ाने के लिए रोचक संवादों का प्रयोग किया गया जिसे दर्शकों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी, पर उन संवादों का असर अल्प समय के लिए रहा। दरअसल, संवाद अदायगी के प्रति मौजूदा दौर के कलाकारों की लापरवाही को दर्शक पचा नहीं पाते। यही वजह है कि नए दौर की कई फिल्मों में अच्छे संवाद होने के बाद भी वे दर्शकों पर गहरा प्रभाव नहीं डाल पाते। सलमान खान जैसे अभिनेता संवाद अदायगी को बेहद हल्के अंदाज में लेते हैं। उनकी संवाद अदायगी पर बॉडी लैंग्वेज हावी रहती है, जिस कारण गंभीर संवाद भी प्रभावहीन लगते हैं!

Saturday, June 18, 2011

फिल्‍म समीक्षा : भिंडी बाजार

भिंडी बाजार: बादशाहत के लिए लड़ते प्यादेबादशाहत के लिए लड़ते प्यादे

-अजय ब्रह्मात्‍मज

इस फिल्म के शीर्षक में आईएनसी यानी इन कारपोरेट शब्द जोड़ा गया है, लेकिन पूरी फिल्म शतरंज की चालों के बीच हिस्सों में चलती रहती है। शतरंज की बिसात पर बादशाहत के लिए प्यादों की लड़ाई चलती रहती है और फिल्म आगे बढ़ती रहती है। मुंबई के अंडरव‌र्ल्ड और उसके चलने-चलाने के तरीके पर राम गोपाल वर्मा ने कंपनी नाम की फिल्म बनाई थी। आगे वे डिपार्टमेंट बनाने जा रहे हैं। अंडरव‌र्ल्ड की कहानी हिंदी फिल्मकारों को आकर्षित करती रहती है, लेकिन ज्यादातर फिल्मों में कोई नई बात नजर नहीं आती। भिंडी बाजार भी उसी दोहराव का शिकार हुई है, जबकि कुछ नए दृश्य रचे गए हैं।

भिंडी बाजार में हिंदू और मुस्लिम सरगनों के जरिए यह भी बता दिया है कि मुंबई में अंडरव‌र्ल्ड धर्म के आधार पर बंटा हुआ है। उनके विस्तार में लेखक-निर्देशक नहीं गए हैं, इसलिए पता नहीं चलता कि इसकी वजह क्या है और दोनों के इंटरेस्ट में कोई फर्क भ ी है क्या? निर्देशक का मुख्य फोकस मुस्लिम अंडरव‌र्ल्ड पर है। यहां चल रही मारकाट और नेतृत्व लेने की ललक में साजिश रचते किरदार सामान्य किस्म के हैं। कलाकारों की भिन्नता ही भिंडी बाजार को दूसरी फिल्मों से अलग करती है,अन्यथा किरदारों के व्यवहार से लगता है कि हम उन्हें पहले भी देख चुके हैं।

प्रशांत नारायण के अभिनय में मौलिकता की कमी है। वे नकलची अभिनेता हैं। पीयूष मिश्रा और पवन मल्होत्रा मामूली किरदारों को भी खास बना देते हैं। दीप्ति नवल का किरदार नाटकीय है। फिल्म में नवीनता नहीं है। हालांकि शुरू में बताया गया है कि सारी लड़ाई भिंडी बाजार से मालाबार हिल पहुंचने की है, लेकिन हम पाते हैं कि सब के सब सिर्फ सरगना बन कर ही खुश हो जाते हैं।

** दो स्टार

Friday, June 17, 2011

फिल्‍म समीक्षा : भेजा फ्राय 2

भेजा फ्राय 2: पिछली से कमजोरपिछली से कमजोर

-अजय ब्रह्मात्‍मज

सिक्वल की महामारी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में फैल चुकी है। भेजा फ्राय 2 उसी से ग्रस्त है। पिछली फिल्म की लोकप्रियता को भुनाने की कोशिश में नई फिल्म विफल रहती है। सीधी वजह है कि मुख्य किरदार भारत भूषण पिछली फिल्म की तरह सहयोगी किरदार को चिढ़ाने और खिझाने में कमजोर पड़ गए हैं। दोनों के बीच का निगेटिव समीकरण इतना स्ट्रांग नहीं है कि दर्शक हंसें।

पिछली फिल्म में विनय पाठक को रजत कपूर और रणवीर शौरी का सहयोग मिला था। इस बार विनय पाठक के कंधों पर अकेली जिम्मेदारी आ गई है। उन्होंने अभिनेता के तौर पर हर तरह से उसे रोचक और जीवंत बनाने की कोशिश की है लेकिन उन्हें लेखक का सपोर्ट नहीं मिल पाया है। के के मेनन को भी लेखक ठीक से गढ़ नहीं पाए है। फिल्म भी कमरे से बाहर निकल गई है,इसलिए किरदारों को अधिक मेहनत करनी पड़ी है। बीच में बर्मन दा के फैन के रूप में जिस किरदार को जोड़ा गया है, वह चिप्पी बन कर रह गया है। फिल्म में और भी कमजोरियां हैं। क्रूज के सारे सीन जबरदस्ती रचे गए लगते हैं। संक्षेप में पिछली फिल्म जितनी नैचुरल लगी थी, यह उतनी ही बनावटी लगी है।

इस फिल्म को देखते हुए हिंदी प्रेमी दुखी हो सकते हैं कि शुद्ध और धाराप्रवाह हिंदी बोलना भी मजाक का विषय बन सकता है। ईमानदार होने का मतलब जोकर होना है। आधुनिक जीवन शैली से अपरिचित व्यक्ति बौड़म होता है। बेचारा भला आदमी रचने के लिए वास्तव में हरिशंकर परसाई की समझ और संवेदनशीलता चाहिए। माफ करें नेक इरादे और कोशिश के बावजूद भेजा फ्राय 2 अपने समय और समाज से पूरी तरह कटी हुई है। ब्लैक कामेडी तो अपने समय का परिहास करे तभी अपील करती है।

* 1/2 डेढ़ स्टार

फिल्‍म समीक्षा : आलवेज कभी कभी

आलवेज कभी कभी: फिर से जेनरेशन गैपफिर से जेनरेशन गैप

-अजय ब्रह्मात्‍मज

फिल्म के शीर्षक का इस्तेमाल करूं तो मुझे आलवेज कभी कभी आश्चर्य होता है कि अनुभवी और कामयाब स्टारों से भी क्यों ऐसी भूलें होती हैं? शाहरूख खान हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में सफलता के पर्याय हैं। मतलब यह कि वे जानते-समझते होंगे कि अच्छी फिल्मों में क्या-क्या नहीं होना चाहिए? उनके होम प्रोडक्शन की ताजा फिल्म आलवेज कभी कभी निराश करती है। हम लोगों ने अभी हाल ही में तो फालतू देखी थी। वहां भी शिक्षा व्यवस्था और युवकों एवं अभिभावकों के बीच पीढि़यों के अंतर से पैदा हुई गलतफहमियां थीं। 3 इडियट में तो इसे और अच्छे तरीके से चित्रित किया गया था। बहरहाल शाहरूख खान ने पुराने मित्र रोशन अब्बास के निर्देशक बनने की तमन्न ा पूरी कर दी और इस फिल्म में कुछ नए चेहरों को अपना टैलेंट दिखाने का मौका मिला। उम्मीद है उन्हें आगे भी फिल्में मिलेंगी।

फिल्म की शुरूआत में किरदारों के बीच के रिश्ते को स्थापित करने और मूल बात तक आने में लेखक-निर्देशक ने लंबा समय लगा दिया है। इंटरवल के पहले कहानी का सिरा ही पकड़ में नहीं आता। बाद में दो स्तरों पर द्वंद्व उभरता है। बारहवीं के इन छात्रों की समस्या सिर्फ अभिभावकों से ही नहीं है। उनके परस्पर रिश्तों में भी गलतफहमियां हैं। ऊपर से सफल होने का दबाव घर और स्कूल दोनों जगहों से है। हिंदी फिल्मों के शालीन बच्चे सीधे बगावत पर नहीं उतरते। वे रोमियो-जूलियट नाटक का बहाना लेते हैं और शिक्षकों एवं अभिभावकों को दिल की बात बताते हैं। इसी दरम्यान वे अपनी गलतफहमियां भी दूर करते हैं।

फिल्म की शुरूआत बेहद कमजोर है। इंटरवल के बाद फिल्म इंटरेस्टिंग होती है, लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है। यही वजह है कि फिल्म प्रभावित नहीं कर पाती है। कहानी और पटकथा की कमियों के बावजूद नए कलाकार अपनी परफरमेंस में ईमानदारी के कारण अच्छे लगते हैं। फिल्म के अंत में स्वयं शाहरूख खान का आना भी नहीं जंचता। शाहरूख को अपनी फिल्मों पर पूरा भरोसा नहीं रहता। वे अपनी ही वैशाखी लगा देते हैं।

** दो स्टार

मनोरंजन का व्यसन

मनोरंजन का व्यसन-अजय ब्रह्मात्‍मज

पहले वांटेड फिर दबंग और अब रेडी.., इन तीन फिल्मों की कामयाबी ने सलमान खान को अजीब आत्मविश्वास से भर दिया है, जो हिंदी सिनेमा के लिए शुभ नहीं कहा जा सकता। सुना है कि सलमान ने दक्षिण की छह हिट फिल्मों के अधिकार खरीद लिए हैं। वे बगैर जोखिम और शर्म के दक्षिण की हिट फिल्मों के रीमेक पर रीमेक बनाने के लिए तैयार हैं। उन्हें अपनी आलोचना और समीक्षकों की राय की परवाह नहीं है। वे बातचीत में किसी और के सवाल करने से पहले ही सवाल दाग देते हैं कि दर्शक फिल्में देख रहे हैं। वे हिट भी हो रही हैं तो फिर क्यों मैं कुछ और सोचूं या करूं? ट्रेंड सा बनता जा रहा है। हर स्टार इस पॉपुलैरिटी की चाहत में मसाला फिल्मों की तरफ बढ़ या झुक रहा है। मनोरंजन का यह व्यसन हिंदी फिल्मों को गर्त में ले जा रहा है। कोई समझने, मानने और सोचने को तैयार नहीं है कि इन फिल्मों की क्वालिटी खराब है। सिनेमाघरों से एक बार निकलने के बाद इन फिल्मों को शायद ही दर्शक मिल पाएं। भविष्य के दर्शकों की चिंता कौन करे? अभी तो सारा जोर इमिडिएट कमाई पर है। रिलीज होने के तीन दिनों के अंदर फिल्म ने कितना व्यवसाय किया? सोमवार के बाद फिल्म गिर जाए तो भी चलेगा।

यहां सिर्फ सलमान खान को ही दोषी क्यों मानें। सभी तो यही कर रहे हैं। सीरियस और अर्थपूर्ण फिल्मों के लिए विख्यात आमिर खान की फना और गजिनी भी तो कमोबेश ऐसी ही फिल्में हैं। इस साल की पहली हिट यमला पगला दीवाना को क्या कहेंगे? अनुपमा, सत्यकाम और चुपके चुपके जैसी फिल्मों में अपनी प्रतिभा दिखा चुके धर्मेन्द्र को प्रहसन में मशगूल होते देख कर कोफ्त होती है। अमिताभ बच्चन की बुड्ढा होगा तेरा बाप के प्रोमो ही बता रहे हैं कि हम एंग्री यंग मैन के ओल्ड एज की मसाला फिल्म देखने जा रहे हैं। इस फिल्म के निर्देशक पुरी जगन्नाथ हैं, जिन्होंने दक्षिण में पोखिरी बनाई थी। पोखिरी की रीमेक वांटेड हम देख चुके हैं। अजय देवगन की सिंघम नए ट्रेंड में बहने का एक और नमूना है। ऐसा लग रहा है कि देर-सवेर सभी लोकप्रियता की इस गंगा में डुबकी लगाएंगे।

पिछले सप्ताह एक ही दिन अमिताभ बच्चन और धर्मेन्द्र दोनों से मिलने का मौका मिला। मनोरंजन के व्यसन के इस नए ट्रेंड के बारे में पूछने पर दोनों के पास ठोस विरोध या जवाब नहीं था। अमिताभ बच्चन हमेशा से मानते रहे हैं कि हिंदी सिनेमा का दर्शक पलायनवादी है। उसे एस्केपिस्ट सिनेमा ही अच्छा लगता है। फिल्मों के एक्सपेरिमेंट बौद्धिक दर्शकों को भाते हैं, लेकिन आम दर्शक का मन तो सपनीली फिल्मों में ही रमता है। वे स्वीकार करते हैं कि इधर की मसाला फिल्मों में अलग किस्म की एकरूपता दिख रही है, फिर भी वे इसे ट्रेंड मानने के लिए तैयार नहीं हैं। दूसरी तरफ धर्मेन्द्र याद करते हैं कि मैं ऋषिकेश मुखर्जी सरीखे डायरेक्टर को मिस करता हूं। क्या करूं, अभी की जरूरत और दर्शकों की मांग के हिसाब से चलना पड़ता है। अगर आप बदले समय के साथ नहीं चलेंगे तो छूट जाएंगे। अफसोस है कि दिग्गज, दमदार और अनुभवी अभिनेता भी बाजार की मांग के आगे घुटने टेक चुके हैं।

मुझे तो यह ट्रेंड बहुत डरावना लग रहा है। ठीक है कि इसे दर्शक मिल रहे हैं। फिल्में व्यवसाय कर रही हैं और फिल्म इंडस्ट्री आर्थिक संकट से उबरती नजर आ रही है, लेकिन इस उत्साह में हम कलात्मक संकट में फंसते जा रहे हैं। कामयाब फिल्मों के साथ निर्माता, निर्देशक और कलाकारों में मिथ्याभिमान बढ़ रहा है। उन्हें लग रहा है कि कामयाबी का फौरी फार्मूला मिल गया है। इस फार्मूले से दर्शकों के ऊबने से पहले छोटे-बड़े सभी सफलता का स्वाद चख लेना चाहते हैं।

Wednesday, June 15, 2011

ऐसे बनी लगान


15 जून 2011 को लगान रिलीज हुई थी। दस साल हो गए। कुछ जानकारियां....

* आशुतोष गोवारीकर ने लगान की कहानी मित्र आमिर खान को सुनाई। कोई निर्माता इसमें पैसा लगाने को तैयार नहीं था। इसी फिल्म के साथ आमिर खान की निर्माता न बनने की सौगंध टूट गई।

* लगान के संवाद अवधी में रखने का सुझाव साहित्यकार केपी सक्सेना का था, जिनका चुनाव आशुतोष गोवारीकर ने संवाद लेखन के लिए किया था। आमिर खान इस बोली में पारंगत नहीं थे। आमिर ने योजना बनाई कि लगान की शूटिंग आरंभ होने से तीन माह पूर्व वे उत्तर प्रदेश के किसी अवधी भाषी क्षेत्र में रहेंगे, लेकिन निर्माता की जिम्मेदारियों से उन्हें फुरसत नहीं मिली। बाद में जावेद अख्तर के सुझाव पर आमिर खान ने लखनऊ के अभिनेता लेखक राजा अवस्थी को अवधी सिखाने के लिए भुज बुलाया।

* लगान की नायिका गौरी की भूमिका के लिए नम्रता शिरोडकर, अमीषा पटेल, नंदिता दास सहित कई अभिनेत्रियों का ऑडिशन हुआ, लेकिन अंत में इस भूमिका के लिए नई अभिनेत्री ग्रेसी सिंह का चुनाव किया गया।

* कच्छ में स्थानीय लोगों की सहायता से लगान के चंपानेर गांव का सेट बनाया जा सका। शूटिंग खत्म होने के बाद गांव वालों को जमीन लौटाने के लिए लगान के काल्पनिक गांव चंपानेर को ध्वस्त किया गया।

* आमिर खान चाहते थे कि उन्नीसवीं सदी की लगान का भुवन मूंछें रखे, लेकिन आशुतोष इसके पक्ष में नहीं थे।

* लगान में आमिर खान ने एक नई कार्य संस्कृति अपनाई। उन्होंने छह माह के लंबे शेड्यूल में फिल्म की शूटिंग खत्म करने की योजना बनाई। फ‌र्स्ट एडी और सिंक साउंड का इस्तेमाल किया। चार सौ लोगों की यूनिट साढ़े चार माह भुज में डेरा डाले रही। लगान का शूटिंग शेड्यूल 13 मई को खत्म होना था, लेकिन आखिरी शॉट 17 जून 2000 को शाम के पांच बजे लिया गया।

* आशुतोष गोवारीकर ने लगान का बजट नौ करोड़ रुपए आंका था, जो शूटिंग आरंभ होते-होते सोलह करोड़ रुपए और शूटिंग खत्म होते-होते बीस करोड़ रुपए से भी अधिक हो गया।

* आमिर लगान को साढ़े तीन घंटे से भी छोटा करना चाहते थे, पर आशुतोष ने उन्हें लगान को तीन घंटे बयालीस मिनट लंबी बनाने के लिए सहमत कर लिया।

* लगान के क्रिकेट-दृश्यों के लिए 27 फरवरी 2001 को मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में हुए भारत-आस्ट्रेलिया के मैच में भीड़ की तालियों और खुशियों को रिकॉर्ड किया गया था। इस शोर को रिकॉर्ड करने की अनुमति मिलना आसान काम नहीं था। आमिर ने सचिन तेंदुलकर के साथ अपनी दोस्ती का उपयोग किया।

* लगान की पहली स्क्रीनिंग रिलीज से पांच दिन पहले भुज के एक साधारण सिनेमाघर में हुई। चार सौ की क्षमता वाले सिनेमा घर में स्क्रीनिंग के दौरान दोगुनी संख्या में लंदन, मुंबई और कच्छ के लोग भीषण गर्मी के बावजूद उपस्थित थे।

* ढाई साल के लेखन, एक साल के प्री प्रोडक्शन, छह महीनों की शूटिंग और एक साल के पोस्ट प्रोडक्शन के बाद भारत के दो सौ साठ सिनेमाघरों में लगान प्रदर्शित हुई।

* रिलीज के दस सप्ताह बाद तक लगान के टिकट उपलब्ध नहीं थे। वितरक और प्रोडक्शन ऑफिस से मांग थम नहीं रही थी। आमिर दोस्तों के लिए भी टिकट नहीं जुटा पाए थे।

* इंदौर के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्ट्डीज में केस स्टडी के रूप में लगान शामिल हुई। कंपनियों ने आमिर खान और आशुतोष गोवारीकर को टीम गठन पर विचार रखने के लिए आमंत्रित किया।

* मदर इंडिया और सलाम बांबे (1988) के बाद लगान तीसरी भारतीय फिल्म है, जिसे ऑस्कर अवार्ड के लिए नामांकित किया गया। 12 फरवरी 2002 में लगान को सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म वर्ग में नामांकित किया गया।

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Tuesday, June 14, 2011

खोया खोया चांद मार्फत काला बाजार-पवन झा

अभी शैतान रिलीज हुई है। इसमें 'खोया खोया चांद' ट्रैक काफी पसंद किया जा रहा है। इसके पहले सुधीर मिश्र ने 'खोया खोया चांद' शीर्षक से फिल्‍म निर्देशित की थी। जयपुर के फिल्‍म पंडित पवन झा ने कल ट्विटर पर इस गाने और काला बाजार के बारे में रोचक जानकारियां दीं। उन जानकारियों को चवन्‍नी ज्‍यों के त्‍यो शेयर कर रहा है।

Pavan Jha

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