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Sunday, May 29, 2011

दबंग के पक्ष में - विनोद अनुपम

सिने सवाद           दबंग के पक्ष में  विनोद अनुपम          भरा पूरा गाँव, ढ़ेर सारे बेतरतीब लोग, जिसमें कुछ को हम पहचान पाते हैं कुछ को नहीं। इनमें पाण्डेय भी हैं, सिंह भी, कुम्हार भी। सबों की अलग-अलग बनावट, अलग-अलग वेषभूषा, अलग-अलग स्वभाव। हद दर्जे का लालची भी, पियक्कड़ भी, मेहनती भी, आलसी भी, हिम्मती भी और डरपोक भी। यही विविध्ता पहचान है किसी हिन्दी समाज की, जो अपनी पूर्णता में प्रतिबिम्बित होता दिखता है 'दबंग' में। यही है जो 'दबंग' को एक विशिष्टता देती है, जिसमें हम अपने आस-पास को दख सकते हैं। ठीक 'शोले' की तरह, जहाँ नायक भले ही ठाकुर होता है, लेकिन गाँव को गाँव बनाने में 'मौसी' की भी उतनी ही भूमिका होती है जितना मौलबी साहब की। 'अनजाना अनजानी' और 'वी आर पफैमिली' के दौर में जब याद करने की कोशिश करते हैं कि पिछली बाद पर्दे पर अपना यह समाज हमने कब देखा था तो 'दबंग' की अहमियत का अहसास होता है। आश्चर्य नहीं कि छपरा, मुंगेर और बलिया जैसे शहरों में जहाँ कहा जाता था लोगों ने सिनेमा द्घर जाना छोड़ दिया है, वहाँ महीने भर तक टिकटों के लिए मारा-मारी होती रही थी। कहीं छुरे निकल रहे थे तो कहीं पुलिस लाठियां बरसा रही थी। १८०० प्रिंट के साथ रिलीज 'दबंग' की लोकप्रियता का यही कमाल था कि पहले ही दिन १७ करोड़ की कमाई कर इसने हिन्दी सिनेमा की कमाई के सारे रिकार्ड तोड़ डाले। यह लोकप्रियता सिर्पफ मार्केटिंग गिमिक्स पर आधरित नहीं थी। जैसे जैसे दिन बीतता गया दर्शकों की बढ़ती भीड़ के साथ यह भी स्पष्ट होता गया। शुक्रवार, शनिवार, रविवार मात्रा तीन दिनों में इसकी कुल कमाई थी लगभग ५० करोड़, अब तक की सबसे बड़ी हिट मानी जाने वाली 'थ्री इडियट्स' से लगभग १२ करोड़ ज्यादा। पिफल्म के टे्रड विश्लेषको के चौंकने की बारी तब थी जब पहले हफ्रते में कुल ८२ करोड़ की कमाई के बावजूद टिकट खिड़की पर दर्शकों की भीड़ कायम थी। जबकि 'लपफंगे परिंदे' और 'अंजाना अंजानी' जैसी बड़े बैनर की बड़े सितारों की पिफल्में पहले दिन भी दर्शकों को सिनेमा द्घरों में नहीं रोक पा रही थी।  क्या कमाल सलमान खान का था, यदि ऐसा होता तो 'युवराज' जैसी भव्य पिफल्म दर्शकों द्वारा नकार नहीं दी जाती। क्या 'मुन्नी' की नाच देखने लोग जा रहे थे, यदि ऐसा होता तो 'आक्रोश' भी हिट होती जहाँ लगभग इसी तरह के गानों को पिफल्माने की कोशिश की गई थी। नवोदित निर्देशक अभिनव सिंह कश्यप और देशी सी लगती नवोदित नायिका सोनाक्षी के नाम में भी दर्शकों को इस कदर खींचने की क्षमता कहा हो सकती थी। दबंग के प्रति दर्शकों के पागलपन की वजह एक ही लगती है वह है उसका लगता अपनापन। वह अपनापन जो हिन्दी सिनेमा से बीते दस व८र्ाों से पूरी तरह से लगभग गुम हो गया है। 'दबंग' की कहानी भी बहुत सीध्ी सी नहीं। ढ़ेर सारे पात्रा और ढ़ेर सारे पेंच है कहानी में, जैसा कि हमारे लोक कथाओं में होते रहे हैं। एक काम्पलेक्स सा परिवार, माँ नैना देवी, माँ का अपना बेटा चुलबुल पाण्डेय, माँ का दूसरा पति प्रजापति पाण्डेय और दोनों का बेटा मक्खी पाण्डेय। 'दबंग' में हालांकि इस पारिवारिक पृष्ठभूमि को जरा भी व्याख्यायित करने की कोशिश नहीं की जाती, लेकिन हिन्दी समाज के बदलते स्वरूप को जिस सहजता से स्थापित करती है वह चकित करता है, जो अपनी कटटर पारंपरिक स्वरूप के लिए कुख्यात रहा है। उस समाज में आज से बीस वर्ष पहले विध्वा विवाह ही नहीं हो रहे थे, उसके बच्चे को भी स्वीकार्य किया जा रहा था, और गाँव में इस विवाह, इस परिवार को प्रतिष्ठा भी मिल रही थी। यह है अपने समाज के बदलाव की पहचान जो निश्चित रूप से किसी चोपड़ा और किसी जौहर या मुम्बई में रमे किसी पिफल्मकार को नहीं मिल सकती। इसके लिए आपको अभिनव सिंह कश्यप या विशाल भारद्वाज या प्रकाश झा होना जरूरी हो जाता है।  चुलबुल पाण्डेय पढ़-लिख कर इंस्पेक्टर बन जाता है लेकिन अपने सौतेले पिता को स्वीकार्य करना उसके लिए मुश्किल रहता है। भाई मक्खी के साथ उसका प्रेम और द्घृणा का रिश्ता बना रहता है। चुलबुल अपने आपको रॉबिन हुड पाण्डेय कहता है। जुझारू इंस्पेक्टर लेकिन नैतिकता से कोई सरोकार नहीं। अपनी दिल की बात सुनता है वह। उसका सामना होता है गाँव की कुम्हारन रज्जो से, और मजबूत कद काठी की हिम्मती लड़की को वह दिल दे बैठता है। रज्जो की अपनी समस्या है उसके पिता पियक्कड़ हैं और दारू के लालच में वह कुछ भी करने को तैयार होता है। रज्जो की जिद है कि जब तक उसके पिता जीवित है वह शादी नहीं कर सकती, क्योंकि उसके पिता की देखभाल कौन करेगा। कहानी की एक पराकाष्ठा यहा भी दिखती है जब चुलबुल से शादी की उम्मीद में रज्जो के पिता अपने आप को अड़चन समझ कर नदी में डूब कर आत्महत्या कर लेते हैं।  'दबंग' में अध्किांश चरित्रा ग्रे शेड में हैं, जैसा की हम होते हैं। किसी पल कोई महानता के शिखर पर होता है तो दूसरे ही पल मानवीय कमजोरियों में डगमग दिखता है। मक्खी निर्मला से प्यार करता है। निर्मला मास्टर के बेटी है, वह मक्खी से शादी की शर्त रखता है, लाख रुपये। मक्खी के पिता प्रजापति पाण्डेय अपनी छोटी सी पैफक्ट्री चलाते हैं वह मक्खी की शादी पर कोई पैसे खर्च करना नहीं चाहते।  इध्र चुलबुल पाण्डेय का सामना छेदी सिंह से हो जाता है, जो एक क्षेत्रिाय पार्टी के छात्रा संध् का अध्यक्ष है। लेकिन राजनीति के नाम पर सारे कुकृत्य करने को तैयार। चुलबुल छेदी के पर कतरने के लिए पार्टी के नेता दयाल बाबू से संपर्क करता है। लेकिन छेदी मक्खी के हाथों बम विस्पफोट करवा कर दयाल बाबू की हत्या करवा देता है। इतना ही नहीं छेदी चुलबुल की मां की हत्या ही नहीं करता उसके पिता के पैफक्ट्री में भी आग लगवा देता है।  कई सारे छोटे-छोटे क्लाइमेक्सों के साथ अंत में कहानी राजी खुशी खत्म होती है। जब चुलबुल और मक्खी दोनों भाई मिल जाते हैं। दोनों को अपनी अपनी प्रेमिकाएँ मिल जाती हैं और जिस पिता से चुलबुल ने जिंदगी भर द्घृणा की उनका प्यार भी उन्हें हासिल हो जाता है। कहानी को इतने विस्तार से बयान करने का अर्थ सिर्पफ इतना भर है कि ये कथा वाचन हिन्दी समाज की परंपरा है। आज अध्किांश पिफल्में 'दे दना-दन' और 'वेलकम' जैसे कॉमेडी की बात छोड़ भी दें तो 'अनजाना अनजानी' और 'वी आर पैफमिली' जैसी पिफल्मों में कहानी के सूत्रा शुरू होते ही समाप्त हो जाते हैं। अध्किांश पिफल्में सिपर्फ दृष्यों का संयोजन होती हैं, अनजाना अनजानी जैसी पिफल्मों की कहानी आप एक पंक्ति में बयान कर दे सकते हैं। न किसी चरित्रा का विस्तार आप देख सकते हैं, न उसके अंतःकरण में झाँकने का अवसर पा सकते हैं। देख सकते हैं तो बस उसके डिजायनर कपड़े, डिजायनर एक्ससेरीज, मेकअप यशपाल की 'दुःख' कहानी को याद करें तो इनके दुख भी इनके खुद के ढोए हुए लगते हैं, जिनके प्रति आप लाख कोशिश करले कतई सहानुभूति नहीं कर सकते। वहाँ कोई समाज नहीं दिखता जिसे आप पहचान सकते, दिखते हैं अमेरिका की सड़कें, बैंकाक की रंगीनियाँ जहाँ आप एकदम अजनबी हो जाते हैं। 'दबंग' में जिन चेहरों को आप नहीं पहचान पाते, वे भी आप को अपने जैसे लगते हैं क्योंकि वे सब मिलकर एक समाज बनाते लगते हैं।  'दबंग' की लोकप्रियता की वजह इसके भदेसपन, इसकी 'मुन्नीबाई' में, इसके सलमान में, ढूँढ़े जाने के पहले इसके कथानक और इसकी प्रस्तुति में ढूँढ़ी जानी चाहिए। संयोग नहीं कि अभिनव सिंह कश्यप और लेखक दिलीप शुक्ला दोनो ही उत्तर प्रदेश से आते हैं जो अपने चरित्राों के साथ जिते रहे हैं। इसी लिए 'दबंग' के चरित्रा लार्जर देन लाइपफ होते हुए भी अपरिचित नहीं लगते। चाहे वह हवाओं में उड़कर मार करने वाला चुलबुल पाण्डेय हो या खुबसूरत कुम्हारन रज्जो। सभी पात्राों के बेहद करीब ले जाते हैं अभिनव। इतना कि आल्हा के सूर में 'हुड़ हुड़ दबंग दबंग' की गुंज के साथ जब चुलबुल की बांहे पफड़कती हैं तो सिनेमा द्घरों में बैठे दर्शकों के भी सीने चौड़े हो जाते है। अपने पात्राों से यह निकटता वह भी महसूस करते हैं जिन्होने वर्षों पहले अपनी माटी को छोड़कर रोजी रोटी के लिए महानगर को आशियाना बनाया और वे भी करते हैं जो अपनी माटी को अभी भी सींच रहे है। शायद इसीलिए दबंग जिस तरह छोटे शहरों के सिंगल थियेटरों में पसंद की गई, उतना ही महानगरों के मल्टीप्लेक्सों में भी। वास्तव में लम्बे अर्से के बाद कोई ऐसी हिन्दी पिफल्म उनके सामने आयी थी जिसमें उनके वजूद पर सवाल नहीं उठाया गया था। 'ओमकारा' हो या 'अपहरण', 'गंगाजल' अपने पर ही शर्म करने को मजबूर करते थे। खुद को सवालों के द्घेरे में खड़ा करते थे। ये पिफल्में अपने 'होने' के प्रति उत्साहित नहीं करती थी। 'दबंग' में भी हिंसा है, यहा भी नकारात्मकता है, राजनीतिक गड़बड़ियाँ यहाँ भी दिखती है, लेकिन यह सब समाज के एक अंश के रूप में दिखता है, जो आश्वस्त करती है कि हम इससे निबट सकते हैं। 'अपहरण' या 'ओमकारा' यह विश्वास दिलाने में सक्षम नहीं होती, इन पिफल्मों को देखते हुए हिन्दी समाज अपराध् का पर्याय लगने लगती है। 'दबंग' को शायद इसीलिए सर आँखों पर स्वीकार्य करते हैं। निश्चित रूप से 'दबंग' कोई क्लासिक पिफल्म नहीं है, क्लासिक 'शोले' भी नहीं थी लेकिन समय ने उसे क्लासिक का दर्जा दिलाया, हो सकता है २५ वर्ष बाद शायद 'दबंग' को भी एक क्लासिक के रूप में याद किया जाय। लेकिन आज यह क्लासिक होने का दावा करते भी नहीं लगती। पिफल्म के संवादों में भदेस शब्दों की भरमार है, वस्त्रा विन्यास में बिहार उत्तरप्रदेश की स्थानियता का खास ध्यान रखा गया है। अभिनय अतिरंजित है किसी ग्रामीण रंगमंच जैसा। यहाँ तक की चुलबुल पाण्डेय के गले में पड़ी माला भी कापफी जानी पहचानी लगती है। िपफल्म की पूरी शूटिंग महाराष्ट्र के वई में की गई, जहां प्रकाश झा भी अपना बिहार सृजित करते है। जाहिर है अभिनव को भी अपना लालगंज सृजित करने में कोई असुविध नहीं होती। वास्तव में हिन्दी सिनेमा ने जिस तरह हमारे सौंदर्यबोध् को तथाकथित रूप से लगातार कोशिश करते हुए हमें अपने ही समाज से अपरिचित करने की कोशिश की है उसमें 'दबंग' को मुखरता से स्वीकार्य करना मुश्किल होता है। लेकिन सच यह भी है कि अपनी सच्चाई, अपनी सहजता, अपनी माटी से मुकरना भी हमारे लिए मुश्किल होता है। इसीलिए 'दबंग' हमें चाहे अनचाहे भी आकर्षित करती है। इसलिए भी की भोजपुरी पिफल्मों की तरह भी अभिनव हिन्दी का स्वभाविक वातावरण रचते हुए भी तकनीकी कुशलता से कहीं समझौता नहीं करते। 'दबंग' में जितनी ही कुशल सिनेमेटोग्रापफी दिखती है उतना ही तीक्ष्ण संपादन, जो कहीं पर भी दर्शकों को 'लालगंज' से निकलने का अवसर नहीं देती। आश्चर्य नहीं कि दबंग हमें सिनेमायी संतुष्टि भी देती है। 'दबंग' की सपफलता वास्तव में हिन्दी सिनेमा में हिन्दी की जीत है। हिन्दी के स्वभाविक सिनेमा की जीत है। जिसमें जीवन के सारे सुर एक साथ मिलते हैं, इमोशन भी, हिंसा भी, परिवार भी, प्रेम भी, द्घृणा भी। लेकिन सारी जद्दोजहद के बीच जीत सच की। वास्तव में हिन्दी सिनेमा में यह सीध्ी सी बात देखने के लिए आँखें तरस गयी थीं। 'दबंग' हिन्दी सिनेमा को एक बार पिफर अपने पुराने व्याकरण की ओर लौटने को प्रेरित कर सकती है, बशर्ते 'दबंग' की सपफलता को संयोग नहीं माने हिन्दी सिनेमा।  ;लेखक पिफल्म समीक्षा के लिए राष्ट्रीय पिफल्म पुरस्कार से सम्मानित हैंद्ध ५३, सचिवालय कॉलोनी, कंकड़बाग, पटना-२०,  मो. ९३३४४०६४४२नेशनल फिल्‍म अवार्ड मिलने के बाद से निरंतर 'दबंग' की चर्चा चल रही है। ज्‍यादातर लोग 'दंबग' को पुरस्‍कार मिलने से दंग हैं। विनोद अनुपम ने 'दबंग' के बारे में यह लेख फिल्‍म की रिलीज के समय ही लिखा था। उसकी प्रासंगिकता देखते हुए हम उसे यहां पोस्‍ट कर रहे हैं...

भरा पूरा गाँव, ढ़ेर सारे बेतरतीब लोग, जिसमें कुछ को हम पहचान पाते हैं कुछ को नहीं। इनमें पाण्डेय भी हैं, सिंह भी, कुम्हार भी। सबों की अलग-अलग बनावट, अलग-अलग वेषभूषा, अलग-अलग स्वभाव। हद दर्जे का लालची भी, पियक्कड़ भी, मेहनती भी, आलसी भी, हिम्मती भी और डरपोक भी। यही विविध्ता पहचान है किसी हिन्दी समाज की, जो अपनी पूर्णता में प्रतिबिम्बित होता दिखता है 'दबंग' में। यही है जो 'दबंग' को एक विशिष्टता देती है, जिसमें हम अपने आस-पास को दख सकते हैं। ठीक 'शोले' की तरह, जहाँ नायक भले ही ठाकुर होता है, लेकिन गाँव को गाँव बनाने में 'मौसी' की भी उतनी ही भूमिका होती है जितना मौलबी साहब की। 'अनजाना अनजानी' और 'वी आर पफैमिली' के दौर में जब याद करने की कोशिश करते हैं कि पिछली बाद पर्दे पर अपना यह समाज हमने कब देखा था तो 'दबंग' की अहमियत का अहसास होता है।
आश्चर्य नहीं कि छपरा, मुंगेर और बलिया जैसे शहरों में जहाँ कहा जाता था लोगों ने सिनेमा द्घर जाना छोड़ दिया है, वहाँ महीने भर तक टिकटों के लिए मारा-मारी होती रही थी। कहीं छुरे निकल रहे थे तो कहीं पुलिस लाठियां बरसा रही थी। १८०० प्रिंट के साथ रिलीज 'दबंग' की लोकप्रियता का यही कमाल था कि पहले ही दिन १७ करोड़ की कमाई कर इसने हिन्दी सिनेमा की कमाई के सारे रिकार्ड तोड़ डाले। यह लोकप्रियता सिर्पफ मार्केटिंग गिमिक्स पर आधरित नहीं थी। जैसे जैसे दिन बीतता गया दर्शकों की बढ़ती भीड़ के साथ यह भी स्पष्ट होता गया। शुक्रवार, शनिवार, रविवार मात्रा तीन दिनों में इसकी कुल कमाई थी लगभग ५० करोड़, अब तक की सबसे बड़ी हिट मानी जाने वाली 'थ्री इडियट्स' से लगभग १२ करोड़ ज्यादा। पिफल्म के टे्रड विश्लेषको के चौंकने की बारी तब थी जब पहले हफ्रते में कुल ८२ करोड़ की कमाई के बावजूद टिकट खिड़की पर दर्शकों की भीड़ कायम थी। जबकि 'लपफंगे परिंदे' और 'अंजाना अंजानी' जैसी बड़े बैनर की बड़े सितारों की पिफल्में पहले दिन भी दर्शकों को सिनेमा द्घरों में नहीं रोक पा रही थी।
क्या कमाल सलमान खान का था, यदि ऐसा होता तो 'युवराज' जैसी भव्य पिफल्म दर्शकों द्वारा नकार नहीं दी जाती। क्या 'मुन्नी' की नाच देखने लोग जा रहे थे, यदि ऐसा होता तो 'आक्रोश' भी हिट होती जहाँ लगभग इसी तरह के गानों को पिफल्माने की कोशिश की गई थी। नवोदित निर्देशक अभिनव सिंह कश्यप और देशी सी लगती नवोदित नायिका सोनाक्षी के नाम में भी दर्शकों को इस कदर खींचने की क्षमता कहा हो सकती थी। दबंग के प्रति दर्शकों के पागलपन की वजह एक ही लगती है वह है उसका लगता अपनापन। वह अपनापन जो हिन्दी सिनेमा से बीते दस व८र्ाों से पूरी तरह से लगभग गुम हो गया है।
'दबंग' की कहानी भी बहुत सीध्ी सी नहीं। ढ़ेर सारे पात्रा और ढ़ेर सारे पेंच है कहानी में, जैसा कि हमारे लोक कथाओं में होते रहे हैं। एक काम्पलेक्स सा परिवार, माँ नैना देवी, माँ का अपना बेटा चुलबुल पाण्डेय, माँ का दूसरा पति प्रजापति पाण्डेय और दोनों का बेटा मक्खी पाण्डेय। 'दबंग' में हालांकि इस पारिवारिक पृष्ठभूमि को जरा भी व्याख्यायित करने की कोशिश नहीं की जाती, लेकिन हिन्दी समाज के बदलते स्वरूप को जिस सहजता से स्थापित करती है वह चकित करता है, जो अपनी कटटर पारंपरिक स्वरूप के लिए कुख्यात रहा है। उस समाज में आज से बीस वर्ष पहले विध्वा विवाह ही नहीं हो रहे थे, उसके बच्चे को भी स्वीकार्य किया जा रहा था, और गाँव में इस विवाह, इस परिवार को प्रतिष्ठा भी मिल रही थी। यह है अपने समाज के बदलाव की पहचान जो निश्चित रूप से किसी चोपड़ा और किसी जौहर या मुम्बई में रमे किसी पिफल्मकार को नहीं मिल सकती। इसके लिए आपको अभिनव सिंह कश्यप या विशाल भारद्वाज या प्रकाश झा होना जरूरी हो जाता है।
चुलबुल पाण्डेय पढ़-लिख कर इंस्पेक्टर बन जाता है लेकिन अपने सौतेले पिता को स्वीकार्य करना उसके लिए मुश्किल रहता है। भाई मक्खी के साथ उसका प्रेम और द्घृणा का रिश्ता बना रहता है। चुलबुल अपने आपको रॉबिन हुड पाण्डेय कहता है। जुझारू इंस्पेक्टर लेकिन नैतिकता से कोई सरोकार नहीं। अपनी दिल की बात सुनता है वह। उसका सामना होता है गाँव की कुम्हारन रज्जो से, और मजबूत कद काठी की हिम्मती लड़की को वह दिल दे बैठता है। रज्जो की अपनी समस्या है उसके पिता पियक्कड़ हैं और दारू के लालच में वह कुछ भी करने को तैयार होता है। रज्जो की जिद है कि जब तक उसके पिता जीवित है वह शादी नहीं कर सकती, क्योंकि उसके पिता की देखभाल कौन करेगा। कहानी की एक पराकाष्ठा यहा भी दिखती है जब चुलबुल से शादी की उम्मीद में रज्जो के पिता अपने आप को अड़चन समझ कर नदी में डूब कर आत्महत्या कर लेते हैं।
'दबंग' में अध्किांश चरित्रा ग्रे शेड में हैं, जैसा की हम होते हैं। किसी पल कोई महानता के शिखर पर होता है तो दूसरे ही पल मानवीय कमजोरियों में डगमग दिखता है। मक्खी निर्मला से प्यार करता है। निर्मला मास्टर के बेटी है, वह मक्खी से शादी की शर्त रखता है, लाख रुपये। मक्खी के पिता प्रजापति पाण्डेय अपनी छोटी सी पैफक्ट्री चलाते हैं वह मक्खी की शादी पर कोई पैसे खर्च करना नहीं चाहते।
इध्र चुलबुल पाण्डेय का सामना छेदी सिंह से हो जाता है, जो एक क्षेत्रिाय पार्टी के छात्रा संध् का अध्यक्ष है। लेकिन राजनीति के नाम पर सारे कुकृत्य करने को तैयार। चुलबुल छेदी के पर कतरने के लिए पार्टी के नेता दयाल बाबू से संपर्क करता है। लेकिन छेदी मक्खी के हाथों बम विस्पफोट करवा कर दयाल बाबू की हत्या करवा देता है। इतना ही नहीं छेदी चुलबुल की मां की हत्या ही नहीं करता उसके पिता के पैफक्ट्री में भी आग लगवा देता है।
कई सारे छोटे-छोटे क्लाइमेक्सों के साथ अंत में कहानी राजी खुशी खत्म होती है। जब चुलबुल और मक्खी दोनों भाई मिल जाते हैं। दोनों को अपनी अपनी प्रेमिकाएँ मिल जाती हैं और जिस पिता से चुलबुल ने जिंदगी भर द्घृणा की उनका प्यार भी उन्हें हासिल हो जाता है। कहानी को इतने विस्तार से बयान करने का अर्थ सिर्पफ इतना भर है कि ये कथा वाचन हिन्दी समाज की परंपरा है। आज अध्किांश पिफल्में 'दे दना-दन' और 'वेलकम' जैसे कॉमेडी की बात छोड़ भी दें तो 'अनजाना अनजानी' और 'वी आर पैफमिली' जैसी पिफल्मों में कहानी के सूत्रा शुरू होते ही समाप्त हो जाते हैं। अध्किांश पिफल्में सिपर्फ दृष्यों का संयोजन होती हैं, अनजाना अनजानी जैसी पिफल्मों की कहानी आप एक पंक्ति में बयान कर दे सकते हैं। न किसी चरित्रा का विस्तार आप देख सकते हैं, न उसके अंतःकरण में झाँकने का अवसर पा सकते हैं। देख सकते हैं तो बस उसके डिजायनर कपड़े, डिजायनर एक्ससेरीज, मेकअप यशपाल की 'दुःख' कहानी को याद करें तो इनके दुख भी इनके खुद के ढोए हुए लगते हैं, जिनके प्रति आप लाख कोशिश करले कतई सहानुभूति नहीं कर सकते। वहाँ कोई समाज नहीं दिखता जिसे आप पहचान सकते, दिखते हैं अमेरिका की सड़कें, बैंकाक की रंगीनियाँ जहाँ आप एकदम अजनबी हो जाते हैं। 'दबंग' में जिन चेहरों को आप नहीं पहचान पाते, वे भी आप को अपने जैसे लगते हैं क्योंकि वे सब मिलकर एक समाज बनाते लगते हैं।
'दबंग' की लोकप्रियता की वजह इसके भदेसपन, इसकी 'मुन्नीबाई' में, इसके सलमान में, ढूँढ़े जाने के पहले
इसके कथानक और इसकी प्रस्तुति में ढूँढ़ी जानी चाहिए। संयोग नहीं कि अभिनव सिंह कश्यप और लेखक दिलीप शुक्ला दोनो ही उत्तर प्रदेश से आते हैं जो अपने चरित्राों के साथ जिते रहे हैं। इसी लिए 'दबंग' के चरित्रा लार्जर देन लाइपफ होते हुए भी अपरिचित नहीं लगते। चाहे वह हवाओं में उड़कर मार करने वाला चुलबुल पाण्डेय हो या खुबसूरत कुम्हारन रज्जो। सभी पात्राों के बेहद करीब ले जाते हैं अभिनव। इतना कि आल्हा के सूर में 'हुड़ हुड़ दबंग दबंग' की गुंज के साथ जब चुलबुल की बांहे पफड़कती हैं तो सिनेमा द्घरों में बैठे दर्शकों के भी सीने चौड़े हो जाते है। अपने पात्राों से यह निकटता वह भी महसूस करते हैं जिन्होने वर्षों पहले अपनी माटी को छोड़कर रोजी रोटी के लिए महानगर को आशियाना बनाया और वे भी करते हैं जो अपनी माटी को अभी भी सींच रहे है। शायद इसीलिए दबंग जिस तरह छोटे शहरों के सिंगल थियेटरों में पसंद की गई, उतना ही महानगरों के मल्टीप्लेक्सों में भी। वास्तव में लम्बे अर्से के बाद कोई ऐसी हिन्दी पिफल्म उनके सामने आयी थी जिसमें उनके वजूद पर सवाल नहीं उठाया गया था। 'ओमकारा' हो या 'अपहरण', 'गंगाजल' अपने पर ही शर्म करने को मजबूर करते थे। खुद को सवालों के द्घेरे में खड़ा करते थे। ये पिफल्में अपने 'होने' के प्रति उत्साहित नहीं करती थी। 'दबंग' में भी हिंसा है, यहा भी नकारात्मकता है, राजनीतिक गड़बड़ियाँ यहाँ भी दिखती है, लेकिन यह सब समाज के एक अंश के रूप में दिखता है, जो आश्वस्त करती है कि हम इससे निबट सकते हैं। 'अपहरण' या 'ओमकारा' यह विश्वास दिलाने में सक्षम नहीं होती, इन पिफल्मों को देखते हुए हिन्दी समाज अपराध् का पर्याय लगने लगती है। 'दबंग' को शायद इसीलिए सर आँखों पर स्वीकार्य करते हैं।
निश्चित रूप से 'दबंग' कोई क्लासिक पिफल्म नहीं है, क्लासिक 'शोले' भी नहीं थी लेकिन समय ने उसे क्लासिक का दर्जा दिलाया, हो सकता है २५ वर्ष बाद शायद 'दबंग' को भी एक क्लासिक के रूप में याद किया जाय। लेकिन आज यह क्लासिक होने का दावा करते भी नहीं लगती। पिफल्म के संवादों में भदेस शब्दों की भरमार है, वस्त्रा विन्यास में बिहार उत्तरप्रदेश की स्थानियता का खास ध्यान रखा गया है। अभिनय अतिरंजित है किसी ग्रामीण रंगमंच जैसा। यहाँ तक की चुलबुल पाण्डेय के गले में पड़ी माला भी कापफी जानी पहचानी लगती है। िपफल्म की पूरी शूटिंग महाराष्ट्र के वई में की गई, जहां प्रकाश झा भी अपना बिहार सृजित करते है। जाहिर है अभिनव को भी अपना लालगंज सृजित करने में कोई असुविध नहीं होती। वास्तव में हिन्दी सिनेमा ने जिस तरह हमारे सौंदर्यबोध् को तथाकथित रूप से लगातार कोशिश करते हुए हमें अपने ही समाज से अपरिचित करने की कोशिश की है उसमें 'दबंग' को मुखरता से स्वीकार्य करना मुश्किल होता है। लेकिन सच यह भी है कि अपनी सच्चाई, अपनी सहजता, अपनी माटी से मुकरना भी हमारे लिए मुश्किल होता है। इसीलिए 'दबंग' हमें चाहे अनचाहे भी आकर्षित करती है। इसलिए भी की भोजपुरी पिफल्मों की तरह भी अभिनव हिन्दी का स्वभाविक वातावरण रचते हुए भी तकनीकी कुशलता से कहीं समझौता नहीं करते। 'दबंग' में जितनी ही कुशल सिनेमेटोग्रापफी दिखती है उतना ही तीक्ष्ण संपादन, जो कहीं पर भी दर्शकों को 'लालगंज' से निकलने का अवसर नहीं देती। आश्चर्य नहीं कि दबंग हमें सिनेमायी संतुष्टि भी देती है।
'दबंग' की सपफलता वास्तव में हिन्दी सिनेमा में हिन्दी की जीत है। हिन्दी के स्वभाविक सिनेमा की जीत है। जिसमें जीवन के सारे सुर एक साथ मिलते हैं, इमोशन भी, हिंसा भी, परिवार भी, प्रेम भी, द्घृणा भी। लेकिन सारी जद्दोजहद के बीच जीत सच की। वास्तव में हिन्दी सिनेमा में यह सीध्ी सी बात देखने के लिए आँखें तरस गयी थीं। 'दबंग' हिन्दी सिनेमा को एक बार पिफर अपने पुराने व्याकरण की ओर लौटने को प्रेरित कर सकती है, बशर्ते 'दबंग' की सपफलता को संयोग नहीं माने हिन्दी सिनेमा।

Saturday, May 28, 2011

फिल्‍म समीक्षा : कुछ लव जैसा

कुछ लव जैसा: उपेक्षित पत्‍‌नी का एडवेंचरउपेक्षित पत्‍‌नी का एडवेंचर
-अजय ब्रह्मात्‍मज

बरनाली राय अपनी पहली कोशिश कुछ लव जैसा में उम्मीद नहीं जग पातीं। विषय और संयोग के स्तर पर बिल्कुल नयी कथाभूमि चुनने के बावजूद उनकी प्रस्तुति में आत्मविश्वास नहीं है।

आत्मविश्वास की इस कमी से स्क्रिप्ट, परफारमेंस और बाकी चीजों में बिखराव नजर आता है। फिल्म अंत तक संभल नहीं पाती।

उच्च मध्यवर्गीय परिवार की उपेक्षित पत्‍‌नी मधु और भगोड़ा अपराधी राघव संयोग से मिलते हैं। पति अपनी व्यस्तता और लापरवाही में पत्‍‌नी का जन्मदिन भूल चुका है। इस तकलीफ से उबरने के लिए पत्‍‌नी मधु एडवेंचर पर निकलती है और अपराधी राघव से टकराती है। राघव के साथ वह पूरा दिन बिताती है। अपनी ऊब से निकलने के लिए वह राघव के साथ हो जाती है। दोनों इस एडवेंचरस संसर्ग में एक-दूसरे के करीब आते है। कहीं न कहीं वे एक-दूसरे को समझते हैं और उनके बीच कुछ पनपता है, जो लव जैसा है। बरनाली राय शुक्ला की दिक्कत इसी लव जैसी फीलिंग से बढ़ गई हैं। अगर उसे लव या लस्ट के रूप में दिखा दिया जाता तो भी फिल्म इंटरेस्टिंग हो जाती है। फिल्म मध्यवर्गीय नैतिकता की हद से नहीं निकल पाती। थोड़ी देर के बाद मधु का एडवेंचर मूर्खतापूर्ण लगने लगता है। पाली हिल के उच्च मध्य वर्गीय परिवार की अघायी औरतों के प्रतिनिधि के रूप में आया यह रोमांटिक एडवेंचर थ्रिल पैदा नहीं कर पाता। दूसरी तरफ अपराधी का हृदय परिवर्तन भी असहज लगता है।

शेफाली शाह सिद्ध अभिनेत्री हैं। वे इस किरदार को जीवंत रखने में सफल रही हैं। उपेक्षित गृहिणी की उद्विग्नता और फिर झटके में कुछ नया करने की उत्कंठा को उन्होंने अपकक्षत ढंग से चित्रित किया है। राहुल बोस को अपने व्यक्तित्व के मेल में किरदार मिल जाए तो वे जंचते हैं और अच्छे अभिनेता होने का भ्रम देते हें। इस फिल्म में अंडरव‌र्ल्ड का किरदार निभाने में वे बिल्कुल असफल रहे हैं। उनकी चाल-ढाल और आवाज में रफनेस नहीं आ पायी है। पति की भूमिका में सुमित राघवन को अधिक कुछ करना ही नहीं था। नीतू चंद्रा निराश करती हैं। वह क्यों लगातार ऐसी भूमिकाएं निभा कर टाइप हो रही हैं। एक संभावनाशील अभिनेत्री की यह चूक समझ में नहीं आती।

रेटिंग- ** दो स्टार

सोनाक्षी सिन्‍हा : डिफरेंट मूड प्रोवोग






Friday, May 27, 2011

स्‍वप्निल तिवारी की नजर में देसवा

स्‍वप्निल तिवारी ने इस लेख का लिंक अमितेश कुमार के लेख की टिप्‍पणी में छोड़ा था। उन्‍होंने 'देसवा' के बारे में अपना नजरिया रखा है। जरूरी नहीं कि हम उनसे सहमत हों,लेकिन ब्‍लॉग की लोकतांत्रिक दुनिया में नजरियों की भिन्‍नता बनी रहे। यही इसकी ताकत है...इसी उद्देश्‍य से हम उस लिंक को यहां प्रकाशित कर रहे हैं....मूल लेख यहां पढ़ सकते हैं...http://vipakshkasvar.blogspot.com/2011/05/blog-post_27.html

देसवा


देसवा क्या है? कैसी है ? इसकी समीक्षा तो आने वाले समय में दर्शक करेंगे, लेकिन चूँकि मै एक ऐसी फिल्म का गवाह बना हूँ जिससे एक बदलाव आने की उम्मीद की जा रही थी इसीलिए इस पर अपना नजरिया रखना ज़रूरी हो गया है. और यह लेख इस फिल्म के प्रति मेरा अपना नजरिया है.

भोजपुरी मेरी मातृ भाषा है इस वजह से इससे एक नैसर्गिक स्नेह है मुझे. लेकिन जितना ही इस भाषा से प्रेम है मुझे उतना ही इस भाषा में बनने वाली फिल्मों से दूरी बनाये रखता हूँ, मुझे डर लगता है कि ये फ़िल्में अपनी विषयवस्तु की वजह से इस भाषा से मेरा मोहभंग कर सकती हैं. 'गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो' को छोड़ कर कोई भी दूसरी फिल्म मुझ पर प्रभाव छोड़ने में असफल रही या ये कहना बेहतर होगा कि बहुत बुरा प्रभाव छोड़ा.

पिछले दिनों भोजपुरी गीत संगीत/ फिल्म उद्योग से जुड़े मेरे कुछ मित्रों नें कहा कि तुम भी इसी क्षेत्र में आ जाओ, अपनी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए मैंने भी उनका आग्रह स्वीकार कर लिया. अब बारी थी भोजपुरी फिल्मों की मेकिंग को समझने की और इस चक्कर में मैंने ४-५ फ़िल्में देख डालीं. उन फिल्मों में कहानी, कैमरा, अभिनय सब कुछ स्तरविहीन था. कैमरे की मूव्मेंट में भी अपनी तरह की एक अश्लीलता थी अभिनय और नृत्य तो दूसरी बातें हो गयीं. मैंने उन लोगों से बात की कि कुछ अच्छी कहानी पर भी फ़िल्में बनायीं जाएँ लेकिन बात बनी नहीं और मैं उस तरह का काम करना नहीं चाहता था इसलिए बात बनी नहीं और मैंने उस बारे में सोचना छोड़ दिया.

फिर एक दिन किसी से सुना के देसवा नाम की एक फिल्म बन रही है जो भोजपुरी फिल्मों के परंपरागत ढाँचे से अलग और बढ़िया होगी. उसी वक़्त से फिल्म से एक उम्मीद बंध गयी और ये तय हुआ कि इस फिल्म के प्रीमियर में जरूर जाऊँगा. ऑफिस से समय से पहले निकला और प्रीमियर के समय पर पहुँच गया. नितिन चंद्रा सामने आये और उन्होंने देसवा से जुडी एक जानकारी दी कि यह फिल्म उन्ही की बनाई एक डॉक्युमेंट्री फिल्म का विस्तार है. और फिल्म में यह बात साफ़ नज़र आती है.

बिहार में पूर्व में (फिल्म के मुताबिक ये चीज़ें बिहार में अब नहीं हैं) फैले हुए भ्रष्टाचार, घूसखोरी, अपहरण, छिनैती, अवैध वसूली, अशिक्षा, अस्पतालों का आभाव, ख़राब सड़क, बिहार से नौजवानों का रोज़गार के लिए पलायन, गुवाहाटी में परीक्षा देने गए लोगों की पिटाई, मुंबई में बिहार के लोगों की पिटाई, भोजपुरी गानों /फिल्मों की फूहड़ता आदि चीज़ों को सिलसिलेवार तरीके से छुआ गया है..ध्यान देने लायक बात ये है कि इसे सिर्फ छुआ भर गया है इनकी कोई पड़ताल नहीं की गयी है...तो इन्ही में से कुछ चीज़ों से दुखी होकर फिल्म के नायक पैसा कमाने के लिए अपहरण का रास्ता चुनते हैं और एक बिसनेस-मैन के चक्कर में एक नक्सलवादी नेता को उठा लाते हैं, और यहाँ से फिल्म नक्सल समस्या पर भी एक लेक्चर दे कर अपना रस्ता मोड़ लेती है. किसी और के चक्कर में किसी गुंडे का अपहरण कर लेना, यह कोई नई कहानी नहीं है.

फिल्म में कहानी कहने के लिए ज़रूरत से ज्यादा छूट ली गयी है, नायिका जिस दृश्य में यह जानती है कि नायक अपहरण की साजिश रच रहा है वो दृश्य अति नाटकीयता का शिकार है, ठीक इसी तरह से नक्सली नेता की तस्वीर का बिसनेसमैन की तस्वीर से बदल जाना भी अति नाटकीयता का शिकार है. फिल्म में नायकों को जेल से छुडाने के लिए जान-आन्दोलन होता है, नायक दुखी हैं, मजबूर हैं, गलत कदम वो मजबूरी में उठा रहे हैं लेकिन क्या नक्सली नेता का अपहरण करना और उससे पैसे लेना और जेल चले जाना जनता को इतना उद्वेलित कर सकता है कि वो जन आन्दोलन कर दे? फिल्म का अंत हुआ है बिहार में इन दिनों चल रहे सुशासन को दर्शाते हुए और उस दृश्य को देख कर ऐसा महसूस होता है कि पुराने शासन की कमियाँ दिखाने और वर्तमान शासन को भला बताने के लिए इस फिल्म का निर्माण हुआ है.फिल्म की एडिटिंग और भी बेहतर हो सकती थी, कई दृश्यों के झोल साफ़ नज़र आते हैं.


गीत संगीत का पक्ष वाकई बेहतर है शारदा सिन्हा और भरत शर्मा के गए गए गीत बहुत अच्छे लगे. फिल्म में शंकर नाम के नायक का अपने बड़े भाई से बहस करने का पहला दृश्य बहुत प्रभावित करता है, साथ ही साथ रोजगार समाचार वाले अख़बार में तमंचे को लिपटा हुआ दिखाकर एक दृश्य में बहुत कुछ कह दिया गया.. अभिनय का स्तर भोजपुरी फिल्मों के स्तर से ऊँचा था. भोजपुरी फ़िल्में जिस तरह की होती हैं उसे देखकर तो लगता है कि यह फिल्म ठीक है लेकिन जैसे ही सिर्फ एक फिल्म मान कर सोचना चाहता हूँ यह फिल्म औसत से भी कम लगती है. पटकथा विहीन इस फिल्म से भोजपुरी फिल्म उद्योग में कोई बदलाव आएगा या नहीं यह तो समय बताएगा लेकिन यह फिल्म मुझपर तो प्रभाव छोड़ने में असफल रही. देसवा बनाये जाने का उद्देश्य अच्छा था, लेकिन इस कहानी को चुनने के पीछे क्या उद्देश्य था समझ नहीं आया.

Thursday, May 26, 2011

जवाब नहीं है पुरस्कारों की शेयरिंग

-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले गुरुवार को जेपी दत्ता ने 58वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा की। विजेताओं की सूची देखने पर दो तथ्य स्पष्ट नजर आए। पहला, अनेक श्रेणियों में एक से अधिक विजेताओं को रखा गया था और दूसरा, हिंदी की तीन फिल्मों को कुल जमा छह पुरस्कार मिले। आइए इन पर विस्तार से बातें करते हैं।

पिछले सालों में कई दफा विभिन्न श्रेणियों में से एक से अधिक विजेताओं के नामों की घोषणा होती रही है। ऐसी स्थिति में विजेताओं को पुरस्कार के साथ पुरस्कार राशि भी शेयर करनी पड़ती है। लंबे समय से बहस चल रही है कि देश की भाषाई विविधता को ध्यान में रखें, तो राष्ट्रीय पुरस्कारों में बेहतर फिल्मों और बेहतरीन प्रतिभाओं के साथ न्याय नहीं हो पाता। कई प्रतिभाएं छूट जाती हैं या उन्हें छोड़ना पड़ता है, लेकिन पुरस्कारों की शेयरिंग एक प्रकार से आधे पुरस्कार का अहसास देती है। ऐसा लगता है कि विजेता अपने क्षेत्र की श्रेष्ठतम प्रतिभा नहीं है। खासकर पुरस्कार राशि शेयर करने पर यह अहसास और तीव्र होता है।

जेपी दत्ता की अध्यक्षता में गठित निर्णायक मंडल ने पिछले अनुभवों से सबक लेते हुए इस बार सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से सिफारिश की है कि विजेताओं को समान पुरस्कार राशि देने के साथ अलग-अलग ट्राफी भी दी जाए। सैद्धांतिक तौर पर मंत्रालय ने इसे मान लिया है, लेकिन इसके व्यावहारिक पक्ष पर भी ध्यान देने की जरूरत है। ठीक है कि एक से अधिक प्रतिभाओं को एक ही श्रेणी में पुरस्कृत कर उनका सम्मान किया जाएगा, लेकिन उन विजेताओं को यह अहसास तो होगा ही कि वे अपने क्षेत्र के श्रेष्ठतम नहीं हैं। उनके समकक्ष कोई और भी है। कला जगत की श्रेष्ठता खेल से अलग होती है। यहां कोई स्कोरिंग नहीं होती है कि अंकों के आधार पर विजेता का फैसला किया जा सके। कला की गुणवत्ता ज्यूरी विशेष की व्यक्तिगत अभिरुचि से तय होती है। कई बार देखा गया है कि एक ही फिल्म या प्रतिभा के मूल्यांकन में निर्णायक मंडल के दो सदस्य विरोधी राय रखते हैं। ऐसे मामलों में फिर मतों की गणना होती है। बहुत कम ऐसा होता है कि किसी पुरस्कार पर पूरे निर्णायक मंडल की आम सहमति हो।

राष्ट्रीय पुरस्कारों के संदर्भ में एक से अधिक विजेताओं की घोषणा पर आपत्ति करने वालों का तर्क है कि हमें श्रेष्ठतम का ही चुनाव करना चाहिए। अधिक विजेताओं के होने पर पुरस्कार का मान-सम्मान कम होता है। देश बड़ा होने पर भी खेलों की टीमों में निश्चित संख्या से अधिक खिलाड़ी तो नहीं शामिल किए जाते और न ही कभी एक की जगह दो प्रधानमंत्री चुने जाते हैं। फिर फिल्मों के पुरस्कारों पर ऐसा दबाव क्यों बनता है? आलोचकों का एक सुझाव यह है कि सांत्वना पुरस्कार आरंभ करना चाहिए। दरअसल, सांत्वना पुरस्कार हो या एक से अधिक विजेताओं की घोषणा.., दोनों ही स्थितियों में यह संतुष्टिकरण की नीति का फल है। देश बड़ा है और अनेक भाषाओं में उत्कृष्ट काम हो रहा है। हर राज्य को चाहिए कि वह अपने राज्य की भाषा की फिल्मों को अलग से पुरस्कृत करे। जहां जक हिंदी की बात है, तो सर्वाधिक प्रचलित होने पर भी यह किसी प्रदेश विशेष की भाषा नहीं है। हिंदी फिल्मों में सक्रिय प्रतिभाओं को प्रदेश विशेष भी सम्मानित और पुरस्कृत कर सकते हैं।

रही हिंदी फिल्मों को कम पुरस्कार मिलने की बात, तो यह स्वीकार करना चाहिए कि फिलहाल हिंदी में बेहतरीन फिल्में नहीं बन रही हैं। हम बड़ी फिल्में बना रहे हैं और बड़ा बिजनेस भी कर रहे हैं, लेकिन तकनीक और कंटेंट के मामले में हम अन्य भारतीय भाषाओं से बहुत पीछे चल रहे हैं। हिंदी फिल्मों के ज्यादातर निर्माताओं का ध्यान सिर्फ बिजनेस पर रहता है। कुछ फिल्म स्टार भी बॉक्स ऑफिस कलेक्शन को ही फिल्म की क्वालिटी का फल मानने की भूल करते हैं। अपने इंटरव्यू में बेशर्मी के साथ वे जोर देते हैं कि फिल्म चलनी चाहिए और उसके लिए हर युक्ति जायज है। भले ही उससे सिनेमा का नुकसान हो रहा हो।

Wednesday, May 25, 2011

मजरूह सुल्तानपुरी : युनुस खान

24 मई को मशहूर शायर और गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी की पुण्यतिथि थी. उनके फ़िल्मी गीतों को लेकर प्रस्तुत है एक दिलचस्प लेख, लिखा है संगीतविद युनुस खान ने. साथ में उनके लिखे ५० सर्वश्रेष्ठ गीतों की सूची भी दी गई है.



आमतौर पर लोगों को लगता है कि एक रेडियो-प्रेज़ेन्‍टर के बड़े मज़े होते हैं। दिन भर बस मज़े-से गाने सुनते रहो, सुनाते रहो। लेकिन ये सच नहीं है। अपनी पसंद के गाने सुनने और श्रोताओं की पसंद के गाने सुनवाने में फ़र्क़ होता है। इस हफ्ते में एक दिन मुझे मजरूह सुल्‍तानपुरी के गाने सुनवाने का मौक़ा मिला—और उस दिन वाक़ई मज़ा आ गया। मजरूह मेरे पसंदीदा गीतकार हैं और इसकी कई वजहें हैं।

मजरूह ने फिल्‍म-संगीत को ‘शायरी’ या कहें कि ‘साहित्‍य’ की ऊंचाईयों तक पहुंचाने में महत्‍वपूर्ण योगदान दिया। उनके कई ऐसे गाने हैं जिन्‍हें आप बहुत ही ऊंचे दर्जे की शायरी के लिए याद कर सकते हैं। फिल्‍म ‘तीन देवियां’ (संगीत एस.डी.बर्मन, 1965) के एक बेहद नाज़ुक गीत में वो लिखते हैं---‘मेरे दिल में कौन है तू कि हुआ जहां अंधेरा, वहीं सौ दिए जलाए, तेरे रूख़ की चांदनी ने’। या फिर ‘ऊंचे लोग’ (संगीतकार चित्रगुप्‍त, 1965) में उन्‍होंने लिखा—‘एक परी कुछ शाद सी, नाशाद सी, बैठी हुई शबनम में तेरी याद की, भीग रही होगी कहीं कली-सी गुलज़ार की, जाग दिल-ऐ-दीवाना’। इसी तरह फिल्‍म ‘फिर वही दिल लाया हूं’ में उनका एक बड़ा ही प्‍यारा गाना है—‘आंचल में सजा लेना कलियां, ऐसे ही कभी जब शाम ढले, तो याद हमें भी कर लेना’(संगीतकार ओ.पी.नैयर, 1963)। ये वो गाने हैं जिन्‍हें अगर सुबह-सुबह सुन लिया जाए तो कई दिनों तक ये हमारे होठों पर सजे रहते हैं। असल में ये प्‍यार की फुहार में भीगी नाज़ुक कविताएं हैं। अफ़सोस के साथ आह भरनी पड़ती है कि हाय...कहां गया वो ज़माना....अब ऐसे गीत क्‍यों नहीं आते।

मजरूह बाक़ायदा शायर थे। मुशायरे पढ़ा करते थे। पढ़ाई ‘हकीमी’ की कर रखी थी। और एक बार सन 1945 में बंबई आए तो ‘कारदार फिल्‍म्‍स’ के ए.आर.कारदार ने फिल्‍मों में लिखने का न्‍यौ‍ता दिया, मजरूह ने ठुकरा दिया, पर बाद में क़रीबी दोस्‍त और अज़ीम शायर जिगर मुरादाबादी ने ज़ोर दिया तो मान गए। बस उसी साल सहगल की फिल्‍म ‘शाहजहां’ में लिखा—‘उल्‍फत का दिया हमने इस दिल में जलाया था, अरमान के फूलों से इस घर को सजाया था, एक भेदी लूट गया, हम जी के क्‍या करेंगे, जब दिल ही टूट गया’। कोई कह सकता है कि ये सहगल का एकदम शुरूआती गीत है।

मजरूह के शायराना गीतों का सरताज है फिल्‍म ‘दस्‍तक’ का गाना—‘हम हैं मताए-कूचओ बाज़ार की तरह’। इसी तरह अगर आप उनकी साहित्यिक ऊंचाई को देखना चाहें तो फिल्‍म ‘आरती’ का गाना याद कीजिए—‘कभी तो मिलेंगी बहारों की मंजिल राहें’। या फिर फिल्‍म ‘ममता’ का गाना—‘रहें ना रहें हम महका करेंगे’। यहां आपको बता दें कि फिल्‍म ‘चिराग़’ के प्रोड्यूसर ने जब ज़ोर दिया कि फ़ैज़ की नज़्म की एक पंक्ति ‘तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्‍या है’ का इस्‍तेमाल करके गीत रचें तो मजरूह ने ज़ोर दिया कि पहले ‘फ़ैज़’ की इजाज़त लाईये। तब जो गीत बना उसकी दूसरी लाइन है—‘ये उठें शम्‍मां जले, ये झुकें शम्‍मां बुझे’। जबकि फ़ैज़ ने लिखा था—‘तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात/ तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्‍या है’।

मजरूह की सबसे बड़ी ख़ासियत ये रही है कि सन 1945 से लेकर साल 2000 तक वो सक्रिय रहे। और नौशाद से लेकर एकदम नए-नवेले संगीतकारों तक सबके साथ काम किया। बेहद साहित्यिक गीतों से लेकर बहुत ही खिलंदड़ और मस्‍ती-भरे अलबेले बोलों वाले गीत भी मजरूह ने लिखे। जितनी लंबी-सक्रियता और कामयाबी मजरूह की रही है—उसके जोड़ में बस उनसे कहीं जूनियर पर बराबर के प्रतिभाशाली आनंद बख्‍शी ही याद आते हैं। बहरहाल...मजरूह के खिलंदड़ गीतों को याद करें तो ‘
c.a.t. cat cat यानी बिल्‍ली’ (फिल्‍म ‘दिल्‍ली का ठग’, संगीतकार रवि सन 1958) याद आता है। जिसमें मजरूह लिखते हैं---‘अरी बावरी तू बन जा मेरी ज़रा सुन मैं क्‍या कहता हूं/ तुझे है ख़बर ऐ जाने जिगर, तू कौन और मैं क्‍या हूं’ G. O. A. T. GOAT. GOAT माने बकरी, L. I. O. N. LION. LION माने शेर/ अरे मतलब इसका तुम कहो क्‍या हुआ’। ज़रा सोचिए कि नोंक-झोंक वाले गाने की ऐसी बनावट के बारे में क्‍या मजरूह से पहले या बाद में किसी ने सोचा। या फिर ‘गे गे रे गेली ज़रा टिम्‍बकटू’ (फिल्‍म ‘झुमरू’, संगीतकार किशोर कुमार, सन 1961)। इस गाने में मजरूह ने आगे क्‍या लिखा है ज़रा वो भी देखिए—भंवरे को क्‍या रोकेंगी दीवारें/कांटे चमकाएं चम चम तलवारें/पवन जब चली, ओ गोरी कली/मैं आया तेरी गली, कोई क्‍या कहेगा/ मैं हूं लोहा चुंबक तू/ गे गे गेली’। ऊट-पटांग अलफ़ाज़ वाले इस गाने की लाईनें भी कमाल की हैं। हैं कि नहीं। ज़रा फिल्‍म जालसाज़ के गाने पर ग़ौर कीजिए। ‘ये भी हक्‍का वो भी हक्‍का/ हक्‍का बक्‍का/ दुनिया पागल है अलबत्‍ता/ डाली टूटी फल है कच्‍चा/ बाग़ लगाया पक्‍का‘।

यानी मजरूह कैरेक्‍टर के मिज़ाज़ के मुताबिक़ लिखते हुए भी तहज़ीब और शाइस्‍तगी से ज़रा भी नहीं हटते थे। ऐसे गानों की फेहरिस्‍त भी देख ही लीजिए ज़रा। हास्‍य-अभिनेता मेहमूद की पहचान बन चुका ‘दो फूल’ फिल्‍म का गीत ‘मुत्‍तु कुड़ी कवाड़ी हड़ा’। ‘जोड़ी हमारी जमेगा कैसे जानी’ (फिल्‍म ‘औलाद’, चित्रगुप्‍त, सन 1968), ‘तू मूंगड़ा मैं गुड़ की डली’ (फिल्‍म ‘इंकार’, संगीत राजेश रोशन, सन 1978) ‘अंग्रेज़ी में कहते हैं कि आय लव यू’( फिल्‍म ‘ख़ुद्दार’, संगीतकार राजेश रोशन, सन 1982) वग़ैरह।

मैंने पहले भी कहा कि मजरूह ने कभी शालीनता को नहीं छोड़ा। एक मिसाल लीजिए—उनका गाना है—‘आंखों में क्‍या जी, रूपहला बादल’। ये गाना आसानी से अश्‍लील हो सकता था। पर ज़रा देखिए मजरूह ने क्‍या लिखा—‘बादल में क्‍या जी, किसी का आंचल, आंचल में क्‍या जी, अजब-सी हलचल’। कमाल का गाना है ये। फिल्‍म ‘नौ दो ग्यारह’ (सन 1957)।


लेकिन मजरूह की असली ताक़त थे वो गाने जो फिल्‍म की मांग के मुताबिक़ लिखे गए। लेकिन उनमें शायरी के हिसाब से है काफी वज़न। नासिर हुसैन के साथ मजरूह का काफी पुराना नाता था। 1957 में जब नासिर हुसैन ने फिल्‍म ‘पेइंग-गेस्‍ट‘ लिखी तो उसके गीत मजरूह ने ही रचे। ‘चांद फिर निकला मगर तुम ना आए/ जला फिर मेरा दिल करूं क्‍या मैं हाय’ (संगीतकार एस.डी.बर्मन) जैसे गाने थे इस फिल्‍म में। इसके बाद नासिर निर्देशक बने और फिर बने प्रोड्यूसर। मजरूह उनके लिए लगातार लिखते रहे। कहते हैं कि फिल्‍म ‘तीसरी मंजिल’ (सन 1966) के लिए ‘पंचम’ यानी आर.डी.बर्मन के नाम का सुझाव उन्‍हीं ने दिया था। इसी फिल्‍म के एक गाने का जिक्र करना चाहता हूं। ‘तुमने मुझे देखा होकर मेहरबां’। इस गाने में मजरूह लिखते हैं—‘कहीं दर्द के सहरा में रूकते चलते होते/ इन होठों की हसरत में तपते-जलते होते/ मेहरबां हो गयीं ज़ुल्‍फ की बदलियां/ जाने-मन जानेजां/ तुमने मुझे देखा’। मजरूह का एक-एक शब्‍द जैसे धड़क रहा है इस गाने में। इसी फिल्‍म का एक और गीत लीजिए। ‘दीवाना मुझ सा नहीं/ इस अंबर के नीचे/ आगे हैं क़ातिल मेरा/ और मैं पीछे-पीछे’। बाक़यदा उर्दू-शायरी वाला मिज़ाज है इस गाने में। नासिर हुसैन के साथ लंबी फेहरिस्‍त है मजरूह की फिल्‍मों की। फिर वही दिल लाया हूं, तीसरी मंजिल, बहारों के सपने, प्‍यार का मौसम, कारवां, यादों की बारात, हम किसी से कम नहीं, ज़माने को दिखाना है, क़यामत से क़यामत तक, जो जीता वही सिकंदर और अकेले हम अकेले तुम।

आज फिल्‍म-संगीत की जो हालत है, मजरूह इससे काफी दुखी थे। ‘आती क्‍या खंडाला’ जैसे गानों को उन्‍होंने एक समारोह में ‘कलम के साथ वेश्‍यावृत्ति’ कहा था। आज मजरूह साहब बहुत याद आ रहे हैं और हम उनके दीवाने उनकी याद को सलाम कर रहे हैं।

मजरूह के पचास बेमिसाल गानों की फ़ेहरिस्‍त

1. आ महब्‍बत की बस्‍ती बसायेंगे हम / फ़रेब
2. आंचल में सजा लेना कलियां/ फिर वही दिल लाया हूं।
3. दिल पुकारे/ ज्‍वेल थीफ
4. कभी तो मिलेंगी बहारों की मंजिल/ आरती
5. आपने याद दिलाया / आरती
6. आयो कहां से घनश्‍याम/ बुड्ढा मिल गया।
7. नदिया किनारे हिराए आई/ अभिमान
8. अब तो है तुमसे/ अभिमान
9. तेरे मेरे मिलन की ये रैना/ अभिमान
10. ये है बॉम्‍बे/ सी आई डी
11. ऐ दिल कहां तेरी मंजिल/ माया
12. कोई सोने के दिल वाला/ माया
13. जा रे उड़ जा रे पंछी/ माया
14. हम बेखुदी में तुमको/ काला पानी
15. कहीं बेख्‍याल होकर/ तीन देवियां
16. भोर भये पंछी/ आंचल
17. जलते हैं जिसके लिए। सुजाता
18. रहें ना रहें हम/ ममता
19. चल री सजनी अब क्‍या सोचे/ बंबई का बाबू
20. तेरी आंखों के सिवा/ चिराग
21. फिल्‍म दोस्‍ती के सभी गीत
22. हुई शाम उनका / मेरे हमदम मेरे दोस्‍त
23. चांद फिर निकला/ पेइंग गेस्‍ट
24. तुमने मुझे देखा/ तीसरी मंजिल
25. हम हैं राही प्‍यार के/ नौ दो ग्‍यारह
26. दिल जो ना कह सका/ भीगी रात
27. दिल का दिया जला के गया/ आकाशदीप
28. दिल की तमन्‍ना थी/ ग्‍यारह हज़ार लडकियां
29. वादियां मेरा दामन/ अभिलाषा
30. गा मेरे मन गा/ लाजवंती
31. गे गे गेली ज़रा/ झुमरू
32. जाग दिल-ए-दीवाना- ऊंचे लोग
33. हम हैं मताए-कूचओ-दस्‍तक
34. हमसफ़र साथ अपना/ आखिरी दांव
35. ये है रेशमी/ मेरे सनम
36. लाल लाल होंठवा/ लागी नाहीं छूटे रामा
37. पवन दीवानी/ डॉ विद्या
38. ना तुम हमें जानो/ बात एक रात की।
39. भीगी पलकें ना उठा/ दो गुंडे
40. रूक जाना नही/ इम्तिहान
41. संध्‍या जो आए/ फागुन
42. सावन के दिन आए/ भूमिका
43. सुरमां मेरा निराला/ कभी अंधेरा कभी उजाला
44. वो तो है अलबेला/ कभी हां कभी ना
45. हाय रे तेरे चंचल नैनवा/ ऊंचे लोग
46. चांदनी रे झूम/ नौकर
47. आ री निंदिया/ कुंआरा बाप
48. ऐ दिल मुझे ऐसी जगह/ आरज़ू
49. माई री/ दस्‍तक
50. प्‍यार का जहां हो/ जालसाज़

मैं देसवा के साथ क्यों नहीं हूं...-अमितेश कुमार

अमितेश कुमार भोजपुरी फिल्‍मों के सुधी और सचेत दर्शक हैं। उनकी चिंताओं का कुछ लोगों ने मखौल उड़ाया और उन्‍हें हतोत्‍साहित किया। मैंने उनसे आग्रह किया था कि वे अपना पक्ष रखें। यह भोजपुरी समाज,फिल्‍म और प्रकारांतर से 'देसवा' के हित में है। इसी उद्देश्‍य से इसे मैं उनके ब्‍लॉग से लेकर यहां प्रकाशित कर रहा हूं...आपकी प्रतिक्रियाओं का स्‍वागत है।अमितेश के ब्‍लॉग पर लेख का पता... http://pratipakshi.blogspot.com/2011/05/blog-post_25.html

यह देसवा की समीक्षा नहीं है, और वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज की प्रेरणा से लिखी गयी है, इसीलिये उन्हीं को समर्पित. इसमें आवेग और भावना की ध्वनि मिले तो इसके लिये क्षमाप्रार्थी हूं.

ये मेरे लिये साल के कुछ उन दिनों में था जिसमें मैं अपने नजदीक होना चाहता हूं, ये एक अजीब प्रवृति है मेरे लिये. उस दिन मेरा जन्मदिन था…गर्मी से लोगो को निज़ात देने के लिये आंधी और बारिश ने मौसम को खुशनुमा बना दिया था. दिन पूरी तरह अकेले बिता देने के बाद शाम को हम चार लोग देसवा देखने निकले. हमारे जरूरी कामों की लिस्ट में ये काम कई दिनों से शामिल था. देसवा के बारे में जानने का मौका लगा था अजय ब्रह्मात्मज जी के फ़ेसबुक पेज पे नितिन चन्द्रा का कमेंट पढ़ के. बाद में देसवा का पेज बन गया. इस फ़िल्म का मंतव्य यह था कि यह भोजपुरी सिनेमा में आये सस्तेपन के बीच एक ऐसा प्रयास है जो यह सिद्ध करेगा कि भोजपुरी में भी स्तरीय सिनेमा बन सकता है. हम आश्वस्त हुए और इस पेज से जुड़े. हमने भी कुछ दिनों पहले से ही भोजपुरी फ़िल्म के बारे में लिखना शुरु किया था. इस सिनेमा के उभार का आकलन करता हुआ मेरा एक लेख भोजपुरी वेबसाईट अंजोरिया में छपा, बाद में सामयिक मीमांसा में भी छपा. साथी मुन्ना कुमार पांडे ने भी अपने ब्लाग और जस्ट ईंडिया मैगजीन में भोजपुरी के क्लासिक फ़िल्मों और गीतों के बारे में लिखा. देसवा ने हमें उत्साहित किया था और कम से कम इसको मेरा समर्थन उस दिन तक जारी रहा. लेकिन देसवा देखने के बाद मुझे निराशा हुई कि जिस फ़िल्म से उतनी उम्मीद कर रहें हैं वह बस एक फ़ार्मुलाबाजी के अतिरिक्त और कुछ नहीं है वैसे तकनीक और अभिनय अच्छा है. देसवा देख के लौटने के बाद मैंने इसके पेज पे एक टिप्पणी की…
बहुत निकले मेरे अरमान फ़िर भी कम निकले...देसवा देख के लौटा हूं जहां से भोजपुरी फ़िल्मों को देखता हूं वहां से देखता हूं तो ठीक लगती है, जहां से फ़िल्मों को देखता हूं वहां से निराश करती है...
इस टिप्पणी के बाद नितिन जी ने फ़ेसबुक पे मुझसे बात की और मेरी निराशा का कारण जानना चाहा मैंने उनको बताया। उसके बाद उन्होंने मेरी पसंद की भोजपुरी की फ़िल्मों की जानकारी ली और इतना जानने के बाद मेरे फ़िल्म ग्यान को कोसने लगे. खैर…एक लम्बी बातचित के बाद उन्होंने मुझे अनफ़्रेंड कर दिया…(ये पूरी बातचीत देसवा की रीलिज के बाद सार्वजनिक की जा सकती है). इसके साथ ही मेरी टिप्पणी को देसवा के पेज से हटा दिया गया. अजय ब्रह्मात्मज के पेज, मुन्ना पांडे के पेज और मोहल्ला लाइव पे की गई मेरी टिप्पणियों पे भी काफ़ी बवाल काटा गया और व्यक्तिगत टिप्पणियां की गईं. इस आपबीति को यहीं छोडिये..
देसवा जिस बात को ले के चलती है वह यह कि भोजपुरी को कुछ लोगो ने बाजारू, अश्लील, बना दिया है. भोजपुरी के ये बलात्कारी भोजपुरी समाज का शोषण और दोहन कर रहें है और अपना स्वार्थ साध रहें है. भोजपुरी का एक बड़ा समाज है जो इन फ़िल्मों को नहीं देखता. साथ ही भोजपुरी का एक अभिजात्य भी है जो भोजपुरी की इस अवधारणा से जुड़ने मे अपना अपमान समझता है. भोजपुरी जो लगभग एक अश्लील संस्कृति का पर्याय बनती जा रही है, देसवा भोजपुरी की इस अवधारणा का विरोध करती है और व्यपाक समाज को फ़िल्म के जरिये ये संदेश देना चाहती है कि भोजपुरी केवल वर्तमान भोजपुरी सिनेमा नहीं है. देसवा एक साफ़ सुथरी विश्व स्तरीय सिनेमा बना के एक व्यापक दर्शक वर्ग और बाजार तैयार करना चाती है. देसवा के फ़ेसबुक पेज पे इसके बारे में लिखा है…
Deswa , Its just the beginning... We are coming up with World Class Films based in Bihar. Bihar has everything we want. We have several beautiful rivers flowing, hills, forests, farms, and above all people who help. Today the theatre actors from Bihar are best in the country. If you want to make films based in rural India, it can only be based in Bihar.


बिहार से पलायन , बिहार के लोगो पे अन्य प्रदेशो मे हमला , बिहार की राजनीति का अपराधीकरण , गरीबी , अशिक्षा , बेकारी ( बेरोजगारी ) जैसे ज्वलंत मुद्दो पे बनी फिल्म " देसवा" अपनी माटी , अपनी भाषा , अपने संस्कार , परम्परा के साथ साथ पुरे राष्ट्र को भोजपुरी से जोडने के लिये एक शुरुवात है ।

एगो साधारण भोजपुरिया खातिर एगो आम बिहारी खातिर , एगो उम्मीद , एगो विश्वास आ एगो पहचान ह " देसवा"

निश्चय ही देसवा कई मौजुं मुदद्दों को उठाती है. भोजपुरी सिनेमा में आये विकृति को लेकर इसकी चिंता जायज है. और ये ऐसे मुद्दे है जिसने कई लोगो को इससे भावनात्मक रूप से जोड़ा है. इसे भोजपुरी अस्मिता का चेहरा बना के इसका प्रचार कार्य च्ल रहा है. मेरा जुड़ाव भी इससे कुछ मुद्दो को लेकर था. फ़िल्म देखने के बाद मैंने देखा कि यह कतई विश्वस्तरीय सिनेमा नहीं है. आप देखिये अंग्रेजी परिचय में और हिन्दी परिचय में जो चीज हटा दी गई है वह है वर्ल्ड क्लास. अब देसवा इसलिये आपसे समर्थन चाहती है क्योंकि वह भोजपुरी फ़िल्मों के लिये रास्ता बनाना चाहती है. इस तर्क के आधार पर इस मुहिम को समर्थन दिया जा सकता है, फ़िल्म को नहीं. फ़िल्म की आलोचना के बाद जो प्रतिक्रिया हुइ वह यह कि अगर आप फ़िल्म की आलोचना (निंदा नहीं) करेंगे तो आप को भोजपुरी अस्मिता का विरोधी मान लिया जायेगा. यह ठीक वहीं तर्क है जहां नितिश कुमार की हर आलोचना को बिहारी अस्मिता के विरोध से जोड़ दिया जाता है, या राष्ट्र के आलोचकों को राष्ट्र विरोधी मान कर उनसे राष्ट्रप्रेमी होने का सबूत मांगा जाता है. यह बताने की जरूरत नहीं है कि यह कौन सी विचारधारा है.
इलिय़ट ने कहा था कि अच्छा कवि परंपरा को अपनी हड्डियों में बसाये होता है. कोई भी चीज एक कालक्रमिक प्रक्रिया में होती है. हर कृति अपने समय और काल में होने के साथ अपनी परंपरा से अविच्छिन्न नहीं होती. देसवा इसी प्रक्रिया का अंग है. और उसका दावा है कि भोजपुरी फ़िल्मों की सफ़ाई का वह अगुआ है. खैर इस सफ़ाई कार्यक्रम में भी कई पेंच है. लेकिन देसवा को अगुआ मान लेने से उन प्रयासों का क्या जो बहुत खामोश हैं. अविजित घोष अपनी किताब सिनेमा भोजपुरी में भोजपुरी सिनेमा के पुनरुत्थान के बारे में बारीकी से लिखते हैं कि कैसे संइया हमार और कन्यादान जैसी फ़िल्मों से बने रूझान को ‘ससुरा बड़ा पईसावाला’ ने गति दे दी. क्या भोजपुरी सिनेमा के इस दौर की कल्पना इस फ़िल्म के बिना की जा सकती है? अनगढ़ और तकनीकी रूप पिछड़ा होने के बावजुद इस फ़िल्म के महत्त्व को खारिज नहीं किया जा सकता. इसी बुरे दौर में कब होई गवना हमार, कब अईबु अंगनवा हमार, बिदाई, हम बाहुबली जैसी फ़िल्म बनी है . ये सिनेमा भोजपुरी सिनेमा में एक बेहतर प्रयास नहीं है. मैं तो देसवा को इसी परंपरा में देखता हूं जो अगर और बेहतर बने और सफ़ल हो तो कईयों को प्रेरित कर सकता है. जिस अश्लीलता के नाम पे कुछ अच्छे प्रयासों को खारिज़ करने की कोशिश देसवा समुदाय के लोग कर रहें हैं, उस अश्लीलता की अवधारणा पे भी बहस की आवश्यक्ता है.
देसवा एक नये दर्शक वर्ग को भोजपुरी सिनेमा से जोड़ने की बात करती है. भोजपुरी का दर्शक कौन है इसी शीर्षक से मैंने भोजपुरी सिनेमा के दर्शक के बारे में पड़ताल की है. भोजपुरी के जिस एलिट या अभिजात्य या मध्यवर्ग को सिनेमा से जोड़ने की बात कर रहें हैं वह वर्ग कब का सिनेमा से कट चुका है. चुंकि उस लेख में मैंने विस्तार से चर्चा की है अतः यहां नहीं दोहरा रहा हूं.
एक आपत्ति मुझे इस अभिजात्य से भी है, हम अभिजात्य की इतनी चिंता क्यों करें ? क्या भोजपुरी का जो सामान्य दर्शक है उसकी चिंता नहीं करना चाहिये. एक अमूर्त दर्शक के बजाय हम मूर्त दर्शक के लिये कुछ करें तो बात बनें. क्यों उन दर्शकों को उन सस्ते सिनेमाघरों और फ़ूहड़ फ़िल्मों के बीच छोड़ दिया जाये ? क्या ये दर्शक हमारे लिये महत्त्वपूर्ण नहीं है. लोकभाषा या लोकबोली हमेशा अभिजात्य से एक दूरी पे होती है अभिजात्य हमेशा उसे हेय दृष्टि से देखता रहा है ऐसा इतिहास है. फ़िर हम इस अभिजात्य के पीछे क्यों भागे. बेहतर काम करें और फ़िर उसका परिणाम देखें. एक समावेशी दर्शक क्यों नहीं बनाना चाहते ? किसी भि भोजपुरी सिनेमा का विश्व स्तरीय होने से पहले यह अपेक्षा रखी जाती है कि वह पहले भोजपुरी का हो.
देसवा अब तीन बार विभिन्न फ़ेस्टिवल में दिखाई जा चुकी है फ़िर भी निर्देशक का कहना है कि यह पब्लिक डोमेन में नहीं आई है. निर्देशक का तर्क यह भी है कि यह व्यावसायिक सफ़लता के लिये नहीं बनी है, फ़िर भी मेरी टिप्पणी इसलिये हटा दी जाती है क्योंकि वह दर्शक को दिग्भर्मित करेगी. एक उम्दा और बेहतरिनी को लेकर आश्वस्त कृति को डर किस बात का है? निर्देशक और देसवा का प्रशंसक समुदाय नहीं चाहता कि फ़िल्म की आफ़िशियल रीलीज से पहले इसकी समीक्षा हो. लेकिन प्रशंसा वह दोनों हाथ से बटोर रहा है. और किसी भी आलोचनात्मक टिप्पणी पे कैसी टिप्पणियां हो रहीं हैं…ये देसवा के फ़ेसबुक पेज पे अनुपम ओझा और अजय ब्रह्मात्मज जी की टिप्पणियों में देखें. बाजार के विरोध में उतरे सिनेमा का यह तरिका कितना बाजारू है. किसी समाज के बौद्धिक स्तर को मापने का एक तरिका यह भी है कि वह अपने आलोचको के प्रति क्या नज़रिया रखता है. देसवा के लोग जो नज़रिया रखते हैं वह चिंताजनक है इसलिये मुझेइस समूह के साथ खड़े होने में परेशानी हो रही है. जबकि मैं चाहता था कि यह फ़िल्म अच्छी बने और व्यावसायिक तौर पे सफ़ल हो. आज भी मेरी शुभकामना इसके साथ है.
अंत में, रही मेरे भोजपुरी प्रेम या इसके बलात्कारियों के खिलाफ़ बोलने की बात तो मैंने २००८ से ही भोजपुरी सिनेमा की पड़ताल शुरु की है. एक अग्यात कुल शील गोत्र का लेखक होने के नाते इस कार्य का किसी की नज़र में नहीं आना, कोई बड़ी बात नहीं. और मैं अपने भोजपुरी प्रेम और इसकी चिंता ना तो प्रमाण पत्र देना चाहता हूं और ना प्रोपगैंडा करना.

Tuesday, May 24, 2011

बोलती तस्‍वीर : यश चोपड़ा और एआर रहमान

इस तस्‍वीर में ऑस्‍कर विजेता एआर रहमान के साथ सालों से फिल्‍म नहीं बना रहे यश चोपड़ा खड़े हैं। रहमान की बॉडी लैंग्‍वेज बहुत कुछ कह रही है। यश चोपड़ा विनम्र से अधिक विवश दिख रहे हैं।क्‍या आप भी कुछ कहना चाहेंगे ?

पहली झलक : बुड्ढा होगा तेरा बाप

http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=Z7g_0naxTjI#at=14

Monday, May 23, 2011

ऑन स्क्रीन,ऑफ स्क्रीन : बिंदास और पारदर्शी बिपाशा बसु

जीनत और परवीन बॉबी का मेल हैं बिपाशा-अजय ब्रह्मात्मज

संबंधों और अपने स्टेटस में पारदर्शिता के लिए मशहूर बिपाशा बसु आजकल नो कमेंट या चुप्पी के मूड में हैं। वजह पूछने पर कहती हैं, पूछे गए सारे सवालों का एक ही सार होता है कि क्या जॉन और मेरे बीच अनबन हो गई है? शुरू से ही अपने संबंधों को लेकर मैं स्पष्ट रही हूं। अब उसी स्पष्टता से दिए गए जवाब लोगों को स्वीकार नहीं हैं। उन्हें तो वही जवाब चाहिए, जो वे सोच रहे हैं या कयास लगा रहे हैं। मुझे यकीन है कि फिल्म रिलीज होगी और तमाम अफवाहें ठंडी हो जाएंगी। बेहतर है कि मैं अपने काम पर ही ध्यान दूं।

अफवाहों की परवाह नहीं

दरअसल, पिछले महीने फिल्म दम मारो दम के अभिनेता राणा दगुबट्टी के साथ उनकी अंतरंगता की चर्चा रही। मुमकिन है, किसी पीआर एक्जीक्यूटिव ने फिल्म के दौरान बने नए रिश्ते के पुराने फॉम्र्युले का इस्तेमाल किया हो और वह फिर से कारगर हो गया हो। हिंदी फिल्मों में रिलीज के समय प्रेम और अंतरंगता की अफवाहें फैलाई जाती हैं। सच्चाई पूछने पर बिपाशा स्पष्ट करती हैं, युवा अभिनेताओं के साथ काम करते समय मेरी कोशिश रहती है कि वे झिझकें नहीं। इसके लिए जरूरी है कि उनसे समान स्तर पर दोस्ती की जाए। बचना ऐ हसीनों में अभिनेता रणबीर कपूर, आ देखें जरा के समय नील नितिन मुकेश और दम मारो दम के दौरान राणा दगुबट्टी के साथ मैंने यही किया। अब किसी ने राणा के साथ फिल्म के लिए शूट किए गए फोटो डालकर अफवाह फैला दी है। फिल्म के दृश्य को कोई वास्तविक समझे तो कुछ नहीं किया जा सकता। बिपाशा के इस स्वभाव का खुलासा उनके निकट सहयोगी करते हैं। एक सहयोगी बताते हैं कि फिल्म बचना ऐ हसीनों की पब्लिसिटी कैंपेन के दौरान अपनी कोलकाता यात्रा में बिपाशा ने रणबीर कपूर का पूरा खयाल रखा था और उन्हें बंगाली खूबियों से परिचित कराया था। नील नितिन मुकेश के साथ भी उनकी घनिष्ठता की खबरें छपी थीं।

प्रोफेशनल नजरिया

सह-कलाकारों, परिवार के सदस्यों और सहयोगियों के प्रति बिपाशा का व्यवहार सरल और सहज रहता है। निर्देशक उनकी साफगोई की कद्र करते हैं और कहते हैं कि बिपाशा किसी प्रोडक्ट, विज्ञापन या मॉडलिंग के लिए हां कहने में थोडा समय भले ही लगा दें, लेकिन एक बार सहमति के बाद वह नखरे नहीं दिखातीं। इसके कारण न तो किसी को कोई दिक्कत होती है और न कभी काम रुकता है। मैंने शूटिंग के दरम्यान देखा है कि उनका सारा ध्यान डायरेक्टर के निर्देशों पर रहता है। सीन तैयार होते ही जब उनकी बुलाहट होती है तो वह देर नहीं करतीं। आमतौर पर आर्टिस्ट पहले-दूसरे बुलावे के आग्रह को नजरअंदाज करते हैं। इस विलंब से उनका अहं भले ही तुष्ट होता हो, लेकिन सेट की एनर्जी में खलल पडता है।

बिपाशा इस बात का भी पूरा खयाल रखती हैं कि फिल्मों के सेट पर किसी और को एंटरटेन न करें। गोवा में आल द बेस्ट की शूटिंग के दौरान उनकी इस आदत के कारण बमुश्किल ही उनसे मेरी बातचीत हो पाई थी। बिपाशा सवालों से परहेज नहीं करतीं। पूछे गए हर सवाल का जवाब देना उनकी फितरत है।

कम उम्र में परिपक्वता

सिर्फ 17 साल की उम्र में बिपाशा बसु सुपर मॉडल बन गई थीं। देश-विदेश की सैर और बडे शहरों में हो रहे आयोजनों में शरीक होने से उनकी झिझक खुलती गई। वह समझदार और दुनियादार हो गई। आरंभिक दिनों में एक इंटरव्यू में उन्होंने मुझसे कहा था, जिस उम्र में लडकियां प्रेमपत्र लिखती हैं या किसी दोस्त की तसवीरें किताबों के बीच छिपाती फिरती हैं, उस उम्र में मैं दुनिया घूम रही थी। तरह-तरह के लोगों से मिल रही थी और देख रही थी कि इस दुनिया में क्या-क्या हासिल किया जा सकता है। मैंने छोटी उम्र से ही कमाना शुरू कर दिया। उसकी वजह से मेरा आत्मविश्वास बढा और मैं अपनी उम्र से कहीं अधिक परिपक्व हो गई।

उनके सामने विकल्प था कि विदेश में रह कर इंटरनेशनल सुपरमॉडल बनें और मॉडलिंग में अपने करियर को नई ऊंचाई पर ले जाएं या भारत लौट कर कुछ करें। बिपाशा ने प्रियजनों के बीच भारत लौटने का फैसला किया और मुंबई को ठिकाना बनाया। फैसला इस सोच पर आधारित था कि माडलिंग के साथ-साथ फिल्मों में भी हाथ आजमाया जाए।

अफेयर और मुश्किलें

उन दिनों डिनो मोरिया उनके दोस्त थे। दोस्ती का यह सिलसिला बाद में थम गया। बिपाशा व्यस्त होती गई। फिल्मी लोगों से मुलाकातों का सिलसिला बढा। विनोद खन्ना ने हिमालय पुत्र में अपने बेटे अक्षय खन्ना के साथ उन्हें पेश करने का प्रस्ताव दिया। कुछ कारणों से बात नहीं बनी। फिर जया बच्चन ने उन्हें अभिषेक बच्चन की जोडी के लिए उपयुक्त समझा। जेपी दत्ता अभिषेक के साथ आखिरी मुगल की तैयारी कर रहे थे। उन्हें भी बिपाशा जंचीं, लेकिन आखिरी मुगल भी फ्लोर पर नहीं जा सकी। जेपी दत्ता ने अभिषेक व करीना कपूर को रिफ्यूजी में लॉन्च किया। बिपाशा के सपनों को ठेस लगी। फिर भी कुछ समय तक वह इस आश्वासन के भरोसे रहीं कि दत्ता उनके साथ फिल्म शुरू करेंगे। यही कारण है कि जब अब्बास मस्तान के साथ तलाश का ऑफर मिला तो उन्होंने मना नहीं किया। इसके बाद फिल्म अजनबी आई। इसमें करीना कपूर, अक्षय कुमार और बॉबी देओल के साथ उन्हें पहला मौका मिला था। इस फिल्म की शूटिंग के दरम्यान उन्हें करीना कपूर की फब्तियां सहनी पडी थीं। फिल्म यूनिट से मिली अवहेलना और अपमान को नजरअंदाज कर बिपाशा ने सिर्फ अपने काम पर ध्यान दिया।

बगैर किसी गॉडफादर के बिपाशा ने इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाई, जहां बाहर से आई हुई लडकियों के ख्वाब दरक जाते हैं, बिपाशा को स्वयं पर विश्वास था। उन्हें अपनी सेक्सी इमेज का एहसास था।

आत्मविश्वास से भरपूर

बिपाशा एक नदी का नाम है। इसका मतलब घनी और गहरी इच्छाएं भी होता है। नदी की तरह कलकल व्यक्तित्व है बिपाशा का। आप गौर करें तो वह कभी सिमटकर नहीं चलतीं। ऊपर से नीचे तक पूरी देह पर उनका नियंत्रण बना रहता है। इस खुलेपन के बावजूद उनकी चाल-ढाल में उच्छृंखलता नहीं हैं। जिस्म में उन्होंने कामुक सोनिया खन्ना का किरदार निभाया था। इसके क्लाइमेक्स में वह बोलती हैं, यह जिस्म प्यार नहीं जानता। जानता है सिर्फ भूख.. तो वह अश्लील या फूहड नहीं लगतीं। इस एक फिल्म ने बिपाशा बसु को खास पहचान दी।

गौर करें तो जीनत अमान और परवीन बॉबी का संयुक्त संस्करण लगती हैं बिपाशा। सेक्सी इमेज के साथ उन्होंने अपनी गरिमा भी बनाए रखी है। दूसरी हीरोइनों की तरह उन्हें बेवजह अंग प्रदर्शन करने या भडकाऊ स्टेटमेंट देने की जरूरत कभी नहीं महसूस हुई। उनकी इस छवि का इस्तेमाल एक तरफ नो एंट्री तो दूसरी ओर ओमकारा जैसी फिल्मों में अलग शैली और शिल्प के फिल्मकारों ने किया। इन फिल्मों में एक अलग ही बिपाशा नजर आई।

अदाओं का जादू

अनीस बज्मी और विशाल भारद्वाज के आयटम गीतों में बिपाशा का व्यक्तित्व ही सबसे बडा आकर्षण है। वह कुशल डांसर नहीं हैं, लेकिन अपनी अदाओं और देहयष्टि से ऐसे गानों में समुचित मादक प्रभाव पैदा कर लेती हैं। बिपाशा स्वीकारती हैं, मैं ट्रेड डांसर नहीं हूं। कोरियोग्राफर की मदद से फिल्मों के लिए आवश्यक लटके-झटके सीख गई हूं। मैं मानती हूं कि पर्दे पर सेक्सी दिखने के लिए यह बिलकुल जरूरी नहीं है कि आप फूहड हरकतें करें।

फिल्मों में काम करते हुए बिपाशा को दस साल हो गए हैं। अजनबी 2001 में आई थी। फिल्मों की संख्या और कामयाबी के लिहाज से उनका करियर उल्लेखनीय नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह अपनी इमेज और सीमाओं के कारण कम ही फिल्मों में जंचती हैं। बीच में उन्होंने कुछ गलत फिल्में चुनीं और उनका खमियाजा भी भुगता।

समझदारी व परिपक्वता

अब बिपाशा बसु समझदार हो चुकी हैं। अपनी इमेज बदलने के लिए उन्होंने प्रकाश झा की अपहरण में मिडिल क्लास की घरेलू लडकी मेघा का किरदार निभाया था। मधुर भंडारकर की कॉरपोरेट में वह दबंग बिजनेस टायकून थीं। उन्होंने लमहा और आक्रोश जैसी फिल्में भी कीं। दोनों में उनकी ग्लैमर-रहित भूमिकाएं थीं। पिछले दिनों हुई मुलाकात में इन फिल्मों के प्रति अपने प्रशंसकों की प्रतिक्रिया शेयर करते हुए उन्होंने अपनी बात रखी, मुझे लगता है कि मेरे प्रशंसक मुझे कमजोर और पराजित किरदारों में नहीं देखना चाहते। उनकी भावनाओं का खयाल रखते हुए मैंने तय किया कि ग्लैमरहीन भूमिकाओं में भी मैं ध्यान रखूंगी कि वे किरदार मजबूत हों। नई फिल्म सिंगुलैरिटी मेरी ऐसी ही एक फिल्म होगी।

जॉन के साथ-साथ

जॉन अब्राहम से उनकी पहली नजदीकी आगे-पीछे बनी ऐतबार व जिस्म के सेट पर हुई थी। नजदीकी दोस्ती और फिर दोस्ती प्रेम में तब्दील हुई। तब से वह जॉन के साथ हैं। दोनों फिल्म इंडस्ट्री के पहले प्रेमी युगल हैं, जिन्होंने विवाह के औपचारिक बंधन में बंधे बगैर ही परस्पर समर्पण और प्रेम का खुलेआम इजहार किया। बिपाशा ने कभी अपने संबंधों पर पर्दा नहीं डाला। वह शुरू से ही अपने संबंधों को लेकर स्पष्ट रही हैं। मुंबई में जॉन और बिपाशा स्थायी तौर पर एक छत के नीचे नहीं रहते। दोनों के पते भी अलग हैं, लेकिन उनका जुडाव और लगाव पति-पत्नी से कम नहीं है।

संबंधों का यह एक नया समीकरण है, जो बाद में फिल्म इंडस्ट्री और समाज में प्रचलित हुआ है। लिव-इन-रिलेशनशिप से अलग आयाम है इस रिश्ते का। न कोई बंधन और न कानूनी जकडन.. दो वयस्क और समझदार व्यक्ति एक-दूसरे से समर्पित प्रेम करने के साथ अपने करियर और परिवार की जिम्मेदारियों का बखूबी निर्वाह कर रहे हैं। पुरुष होने के कारण जॉन अब्राहम के लिए यह सब आसान हो सकता है, लेकिन बिपाशा ने लडकी होने के बावजूद इस तरह के संबंधों में जीने का साहस दिखाया है।

सुंदर दिखना है पसंद

बिपाशा बसु को साज-सिंगार बहुत पसंद है। किसी भी अवसर पर उन्हें बेतरतीब नहीं देखा जा सकता। वह मानती हैं,सार्वजनिक जीवन में होने के कारण यह हमारा दायित्व बनता है कि हम सज-धज कर ही लोगों के सामने आएं। हम सुंदर और आकर्षक दिखते हैं तो प्रशंसकों को खुशी मिलती है। अपने इस आग्रह के बावजूद बिपाशा अपनी फिल्मों में मेकअप और एंगल के लिए बहुत अधिक परेशान नहीं रहतीं। उनके मुताबिक, डायरेक्टर को अच्छी तरह मालूम रहता है कि हमें किस रूप और अंदाज में पेश करना है। किरदार के अनुकूल ही लुक और प्रेजेंटेशन होना चाहिए।

बिपाशा के साथ कई फिल्में कर चुके निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट उनकी तारीफ करते हैं। वह कहते हैं, बंगाल से आई इस सांवली सी लडकी को मालूम है कि पर्दे पर सुंदर दिखने से अधिक जरूरी है अपने किरदार में दिखना। राज में पति के रक्षक के तौर पर आई एक घरेलू औरत और जिस्म की सेक्सी लडकी सोनिया का किरदार बिपाशा ही निभा सकती थी। खासकर जिस्म के किरदार को आत्मसात करना किसी भी अभिनेत्री के लिए बडी चुनौती हो सकती है। इस फिल्म के बोल्ड दृश्यों में भी सिर्फ अपने विश्वास के कारण ही बिपाशा अश्लील नहीं लगतीं।


Sunday, May 22, 2011

दिग्ग्ज फिल्मकार है खामोश

दिग्ग्ज फिल्मकार है खामोश-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछली सदी के आखिरी दशक तक सक्रिय फिल्मकार अचानक निष्क्रिय और खामोश दिखाई पड़ रहे हैं। सच कहें तो उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि वे किस प्रकार की फिल्में बनाएं? उनका सिनेमा पुराना पड़ चुका है और नए सिनेमा को वे समझ नहीं पा रहे हैं। परिणाम यह हुआ किअसमंजस की वजह से उनके प्रोडक्शन हाउस में कोई हलचल नहीं है। सन् 2001 के बाद हिंदी सिनेमा बिल्कुल नए तरीके से विकसित हो रहा है। कहा जा सकता है कि सिनेमा बदल रहा है।

हर पांच-दस साल पर जीवन के दूसरे क्षेत्रों की तरह सिनेमा में भी बदलाव आता है। इस बदलाव के साथ आगे बढ़े फिल्मकार ही सरवाइव कर पाते हैं, क्योंकि दर्शकों की रुचि बदलने से नए मिजाज की फिल्में ही बॉक्स ऑफिस पर बिजनेस कर पाती हैं। हाल-फिलहाल की कामयाब फिल्मों पर नजर डालें तो उनमें से कोई भी पुराने निर्देशकों की फिल्म नहीं है। यश चोपड़ा, सुभाष घई, जेपी दत्ता जैसे दर्जनों दिग्गज अब सिर्फ समारोहों की शोभा बढ़ाते मिलते हैं। इनमें से कुछ ने अपनी कंपनियों की बागडोर युवा वारिसों के हाथ में दे दी है या फिर गैरफिल्मी परिवारों से आए युवकों ने कमान संभाल ली है। अब वे तय कर रहे हैं कि 21वीं सदी के दूसरे दशक का सिनेमा कैसा हो?

दस साल पहले तक हाशिए पर पड़े फिल्मकार ज्यादा एक्टिव हैं। वे लाइमलाइट में हैं, क्योंकि उनकी फिल्में चल रही है। इसके अलावा पिछले दस सालों में हिंदी फिल्मों में युवा टैलेंट की भीड़ आ गई है। युवा फिल्मकारों की फिल्मों पर गौर करें तो वे नए विषयों को आजमाने से नहीं घबराते, जबकि लगभग सारे दिग्गज फिल्मकार आज भी अपनी कामयाबी और फार्मूले से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं कर पाते। आज का दर्शक इंटरनेट और डिजीटल युग में हर देश की फिल्मों से तत्काल वाकिफ हो जाता है। हालांकि देश के अधिकांश दर्शक आज भी फार्मूला और मसाला फिल्में पसंद करते हैं, लेकिन सभी फिल्मों को उस स्केल पर बना पाना असंभव काम है। दर्शक साधारण किस्म की फार्मूला फिल्मों से उकता चुके हैं। वे उन्हें रिजेक्ट कर देते हैं। दूसरी तरफ नए ऐक्टरों को लेकर बनी फिल्में उन्हें विषय और प्रस्तुति की भिन्नता और नवीनता की वजह से पसंद आ जाती हैं। दर्शकों की रुचि में आए इस बदलाव को पारंपरिक निर्माता और कारपोरेट घराने भी समझ रहे हैं, इसलिए कम लागत की प्रयोगवादी फिल्मों में निवेश करने से उन्हें डर नहीं लगता। अगर फिल्म दर्शकों को पसंद नहीं भी आई तो नुकसान का प्रतिशत कम रहता है। दिग्गज निर्देशकों की समस्या है कि वे छोटी फिल्में नहीं बना सकते। नए ऐक्टरों के साथ काम करने में भी उन्हें दिक्कत होती है। उन्हें लगता है कि बड़े स्टारों के साथ काम करने के बाद उन्हें छोटे और नए ऐक्टरों के तरजीह नहीं देनी चाहिए। इस स्थिति में वे न तो इधर के रह गए हैं और न उधर जा पा रहे हैं। दिग्गजों को समझना चाहिए कि आज का दर्शक पुराने तरीके के मनोरंजन से संतुष्ट नहीं होगा। अगर उसे मसाला फिल्में भी परोसनी हैं तो उसमें नई तकनीक या शैली का तड़का देना पड़ेगा। फिल्मों में उनके समय का मेलोड्रामा समाप्त हो चुका है और अब ऐक्टर भी नकली अंदाज में संवाद अदायगी नहीं करते। मसाला फिल्मों पर भी रियलिज्म का दबाव है। फैंटेसी और रियलिज्म के मेल से ही नए किस्म की मसाला फिल्में बनाई जा सकती हैं, जैसा कि अभिनव कश्यप ने दबंग में किया। इन दिनों खबरें तो सुनने में आती हैं कि पुराने दिग्गजों में सुगबुगाहट है। वे कुछ नया और धमाल करने की सोच रहे हैं, लेकिन ये खबरें अभी मू‌र्त्त रूप नहीं ले पा रही हैं। है तो आश्चर्य की बात, लेकिन यही सच्चाई है कि दिग्गज निर्देशक आजकल सहमे हुए हैं। वे जोखिम नहीं उठाना चाहते।

Saturday, May 21, 2011

फिल्‍म समीक्षा :404

दिमाग  में डर 404दिमाग में डर

-अजय ब्रह्मात्‍मज

0 लंबे समय तक राम गोपाल वर्मा के सहयोगी रहे प्रवाल रमण ने डरना मना है और डरना जरूरी है जैसी सामान्य फिल्में निर्देशित कीं। इस बार भी वे डर के आसपास ही हैं, लेकिन 404 देखते समय डरना दर्शकों की मजबूरी नहीं बनती। तात्पर्य यह कि सिर्फ साउंड इफेक्ट या किसी और तकनीकी तरीके से प्रवाल ने डर नहीं पैदा किया है। यह फिल्म दिमागी दुविधा की बात करती है और हम एक इंटेलिजेंट फिल्म देखते हैं।

0 हिंदी फिल्मों में मनोरंजन को नाच-गाना और प्रेम-रोमांस से ऐसा जोड़ दिया गया है कि जिन फिल्मों में ये पारंपरिक तत्व नहीं होते,वे हमें कम मनोरंजक लगती हैं। दर्शकों को ऐसी फिल्म देखते समय पैसा वसूल एक्सपीरिएंस नहीं होता। दर्शक पारंपरिक माइंड सेट से निकलकर नए विषयों के प्रति उत्सुक हों तो उन्हें 404 जैसी फिल्मों में भी मजा आएगा।

0 404 बायपोलर डिस आर्डर पर बनी फिल्म है। इस रोग से ग्रस्त व्यक्ति डिप्रेशन,इल्यूजन और हैल्यूसिनेशन का शिकार होता है। वह अपनी सोच के भंवर में फंस जाता है और कई बार खुद को भी नुकसान पहुंचा देता है। मनुष्य की इस साइकोलोजिकल समस्या को भी फिल्म में रोचक तरीके से पिरोया जा सकता है। प्रवाल की थ्रिलर 404 में कुछ भी मनगढं़त नहीं है।

0 मेडिकल कालेज में एडमिशन लेकर आया अभिमन्यु रैगिंग और कैंपस की घटनाओं से बायपोलर डिसआर्डर से ग्रस्त होता है। उसी कालेज के प्रोफेसर अनिरूद्ध उसे केस स्टडी के रूप में लेते हैं। इन दोनों के अलावा फिल्म में सीनियर, क्लासमेट और टीचर के तौर कुछ और किरदार हैं। कहानी मुख्य रूप से अभिमन्यु, अनिरूद्ध और कृष के इर्द-गिर्द ही घूमती है। चूंकि ऐसे किरदार हिंदी फिल्मों में पहले नहीं दिखे हैं, इसलिए फिल्म देखते समय रोचक नवीनता बनी रहती है। दूसरी फिल्मों की तरह मुख्य किरदारों के व्यवहार का पहले से अनुमान नहीं होता।

0 404 हारर फिल्म नहीं है। इस फिल्म का डर आकस्मिक है, जो किरदारों के हैल्यूसिनेशन की वजह से क्रिएट होता है। प्रवाल ने दर्शकों का डर बढ़ाने के लिए बैकग्राउंड संगीत का इस्तेमाल नहीं किया है। यही वजह है कि डर स्वाभाविक तौर पर पनपता है। फिल्म के मुख्य किरदार रैशनल बुद्धि संगत हैं, इसलिए उनके डर में हमार ी रुचि बढ़ती है। एक स्तर पर उनसे सहानुभूति होती है कि उन्हें इस डर से मुक्ति मिले।

0 नए एक्टर राजवीर अरोड़ा ने अभिमन्यु के किरदार को सहज ढंग से चित्रित किया है। ईमाद शाह और निशिकांत कामथ भी सहज और नैचुरल हैं। निशिकांत कामथ प्रभावित करते हैं। खास चरित्रों के लिए वे उपयुक्त अभिनेता हैं। सहयोगी कलाकरों ने पूरा सहयोग दिया है। एक बात खटकती है कि क्या मेडिकल कालेज में इतने कम लोग दिखाई पड़ते हैं। बैकग्राउंड और पासिंग दृश्यों में हलचल होनी चाहिए थी। लगता है फिल्म के बजट ने निर्देशक की दृश्य संरचना को सीमित और बाधित किया है। उसकी वजह से रियलिस्टिक किस्म की यह फिल्म कुछ जगहों पर अनरियल और नकली लगने लगती है।

0 404 हिंदी फिल्मों चल रहे प्रयोगों का ताजा उदाहरण है। शिल्प और विषय के तौर पर आ रहे बदलाव के शुभ लक्षण इस फिल्म में हैं। ट्रैडिशनल मनोरंजन के इच्छुक दर्शक निराश हो सकते हैं।

रेटिंग- ***1/2 साढ़े तीन स्टार