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Saturday, April 30, 2011

फिल्‍म समीक्षा : आई एम्...

पहचान से जूझते किरदार आई एम..पहचान से जूझते किरदार

-अजय ब्रह्मात्‍मज

*इस फिल्म के लिए पैसे चंदे से जुटाए गए हैं। आई एम.. क्राउड फंडिंग से बनी भारत की पहली फिल्म है। ओनिर और संजय सूरी की मेहनत और कोशिश और एक्टरों के समर्थन से फिल्म तो बन गई। अब यह ढंग से दर्शकों के बीच पहुंच जाए तो बात बने। यहीं फिल्म के ट्रैडिशनल व्यापारी पंगा करते हैं।

*आई एम .. लिंग, जाति, धर्म और प्रदेश से परे व्यक्ति के पहचान और आग्रह की फिल्म है। हम अपनी जिंदगी में विभिन्न मजबूरियों की वजह से खुद को एसर्ट नहीं करते। अपना आग्रह नहीं रखते और पहचान के संकट से बिसूरते रहते हैं।

*आई एम.. में आशु उर्फ अभि (संजय सूरी) से सारे किरदार जुड़ते हैं, लेकिन वे एक कहानी नहीं बनते। नैरेशन का यह शिल्प नया और रोचक है।

*आफिया, मेघा, अभिमन्यु और ओमर के जरिए ओनिर ने आधुनिक औरत के मातृत्व के आग्रह, कश्मीर से विस्थापित पंडित के द्वंद्व, सौतेले पिता के शारीरिक शोषण की पीड़ा और वैकल्पिक सेक्स की दिक्कतों के मुद्दों को संवेदनशील तरीके से चित्रित किया है। फिल्म में इन मुद्दों के ग्राफिक विस्तार में गए बिना ओनिर संकेतों और प्रतीकों में अपना मंतव्य रखते हैं। वे निष्कर्ष नहीं देते।

*आई एम .. के शिल्प में सादगी है, लेकिन इसका कथ्य बेहद महत्वपूर्ण और गहरा है। ओनिर ने किसी भी मुद्दे पर रैडिकल स्टैंड नहीं लिया है। वह धीमे स्वर में पूरी जिद के साथ अपनी मंशा व्यक्त करते हैं। आई एम.. की यही खूबी है कि यह बगैर किसी दावे और शोर कदबे-छिपे सवालों को उजागर करती है।

*अनुराग बसु और अनुराग कश्यप जैसे युवा निर्देशकों ने इस फिल्म में अभिनय किया है। दोनों अपने किरदारों को संजीदगी के साथ निभा ले गए हैं। अनुराग कश्यप अच्छे एक्टर साबित हो सकते हैं। पेशेवर एक्टर में संजय सूरी, राहुल बोस, अभिमन्यु सिंह, जूही चावला और मनीषा कोईराला ने अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है। मनीष कहां हैं? उन्हें और फिल्में करनी चाहिए। मुझे नंदिता दास थोड़ी कमजोर लगीं। वह आफिया की दुविधा और आग्रह को सलीके से नहीं पेश कर सकीं।

*फिल्म में तीन महानगरों और कश्मीर के परिदृश्य हैं, लेकिन इनमें से हर स्थान नए अंदाज में अपनी कुरुपताओं और विसंगतियों के साथ उभरा है। किरदारों की विसंगतियां ही हमें इन स्थानों केउन इलाकों में ले जाती हैं, जो पोस्ट कार्ड इमेज नहीं हैं।

रेटिंग- ***1/2 साढ़े तीन स्टार


फिल्‍म समीक्षा : शोर

मुंबई की सेंट्रल लाइन के सपने शोरमुंबई की सेंट्रल लाइन के सपने

-अजय ब्रह्मात्‍मज

राज निदिमोरू और कृष्णा डीके की शोर छोटे स्केल पर बनी सारगर्भित फिल्म है। बाद में एकता कपूर के जुड़ जाने से फिल्म थोड़ी बड़ी दिखने लगी है। अगर इस फिल्म को एक बड़े निर्माता की फिल्म के तौर पर देखेंगे तो निराशा होगी। राज और कृष्णा की कोशिश के तौर पर इसका आनंद उठा सकते हैं।

*हर फिल्म का अपना मिजाज और स्वरूप होता है। अगर दर्शकों के बीच पहुंचने तक वह आरंभिक सोच और योजना के मुताबिक पहुंचे तो दर्शक भी उसे उसी रूप में स्वीकार कर लेते हैं। इधर एक नया ट्रेंड चल रहा है कि फिल्म बनती किसी और नजरिए से है और उसकी मार्केटिंग का रवैया कुछ और होता है। शोर ऐसे ही दो इरादों के बीच फंसी फिल्म है।

*शोर में तीन कहानियां हैं। एक कहानी में विदेश से आया एक उद्यमी मुंबई में आकर कुछ करना चाहता है। दूसरी कहानी में मुंबई की सेंट्रल लाइन के उपनगर के तीन उठाईगीर हैं, जो कुछ कर गुजरने की लालसा में रिस्क लेते हैं। तीसरी कहानी एक युवा क्रिकेटर की है। तीनों कहानियों के किरदारों का साबका अपराध जगत से होता है। अपराधियों के संसर्ग में आने से उनकी सोच में तब्दीली आती है। परिस्थितियां उन्हें बदल देती हैं।

*हिंदी के आम दर्शकों के लिए विदेश से आए उद्यमी (सेंधिल राममूर्ति) की कहानी अबूझ होगी, क्योंकि वह किरदार मुख्य रूप से अमेरिकी लहजे में अंग्रेजी बोलता है। घटनाओं और प्रसंगों से कहानी का पता चल जाता है, लेकिन संवादों को समझने की कठिनाई रहेगी। दूसरी में तीन दोस्तों की कहानी रोचक है। यही केंद्रीय कहानी है। लेखक-निर्देशक ने इस कहानी पर अधिक मेहनत की है। क्रिकेटर की कहानी छिटकती हुई चलती है।

*तुषार कपूर अपनी छवि से अलग भूमिका में जंचते हैं। उन्हें सरल और सामान्य किरदारों के चुनाव पर ध्यान देना चाहिए। निखिल द्विवेदी फिर से साबित करते हैं कि उन्हें स्पेस और कैरेक्टर मिले तो वे अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल कर सकते हैं। पितोबास हाइपर है। इन दिनों हाइपर अभिनय को बेहतर एक्टिंग मान लेने का फैशन है। दरअसल, ऐसे एक्टर फिल्म में अलग नजर आते हैं। क्रिकेटर की भूमिका निभा रहे एक्टर ने सहज अभिनय किया है। उसकी प्रेमिका बनी अदाकारा ने भी सुंदर काम किया है।

*शोर का शोर अधिक है। मशहूर फिल्म निर्देशकऔर चंद समीक्षक फिल्म की रिलीज के पहले से इसे बेहतर फिल्म बता रहे हैं। फिल्म के प्रचार का यह तरीका शहरी दर्शकों को सीमित स्तर पर प्रभावित करता है। आम दर्शक सही निर्णायक हैं। वे फिल्में सूंघ लेते हैं।

रेटिंग- **1/2 ढाई स्टार


Friday, April 29, 2011

फिल्‍म समीक्षा : चलो दिल्‍ली

मिडिल क्लास की सीख चलो दिल्ली-अजय ब्रह्मात्‍मज

* मध्यवर्ग के मूल्य, आदर्श, प्रेम और उत्सवधर्मिता से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। चलो दिल्ली में निर्देशक शशांत शाह की यह कोशिश रंग लाई है। उन्होंने इस संदेश के लिए एक उच्चवर्गीय और एक मध्यवर्गीय किरदार के साथ जयपुर से दिल्ली का सफर चुना है।

*मनु गुप्ता दिल्ली के चांदनी चौक के निवासी हैं। मनु गुप्ता की करोलबाग में लेडीज आयटम की दुकान है। वे गुटखे के शौकीन हैं और धारीदार अंडरवियर पहनते हैं। मिहिका बनर्जी मुंबई की एक कारपोरेट कंपनी की मालकिन हैं, जिनके अधीन 500 से अधिक लोग काम करते हैं। वह आधुनिक शहरी कारपोरेट कन्या हैं, जिनकी हर बात और काम में सलीका है।

*बात तब बिगड़ती है, जब दोनों परिस्थितिवश एकही सवारी से जयपुर से दिल्ली के लिए निकलते हैं। मनु गुप्ता के लिए कोई भी घटना-दुर्घटना कोई बड़ी बात नहीं है, जबकि मिहिका बनर्जी हर बात पर भिनकती और झिड़कती रहती है। अलग-अलग परिवेश और उसकी वजह से भिन्न स्वभाव के दो व्यक्तियों का हमसफर होना ही हंसी के क्षण जुटाता है।

*जयपुर से दिल्ली के सफर में कई ब्रेक लगते हैं। मनु और मिहिका को इलाके में प्रचलित हर सवारी का सहारा लेना पड़ता है। हम इसी बहाने राजस्थान दर्शन भी करते जाते हैं। रास्ते में मिले लोगों से यह अंदाजा लगता है कि ज्यादातर भ्रष्ट, अपराधी और कुकर्मी हैं। एक ढाबा मालिक ही नेक स्वभाव के मिलते हैं। अपनी सुविधा के लिए सभी राहगीरों को निगेटिव छवि देना ठीक बात नहीं है।

*विनय पाठक इस फिल्म में भेजा फ्राय वाले फार्म में हैं। ऐसे रोल में वे जंचते हैं। अपने भाव और अंदाज से वे मनु गुप्ता के किरदार को बखूबी निभाते हैं। मिहिका बनर्जी के रोल में लारा दत्ता ने उनसे तालमेल बिठाने की भरपूर कोशिश की हैं। वह एक हद तक सफल रही हैं। कहीं-कहीं वह किरदार से बाहर निकल कर लारा दत्ता बन जाती हैं। अब इतनी छूट तो देनी पड़ेगी, क्योंकि वह निर्माताओं में से एक हैं।

*फिल्म के क्लाइमेक्स में एक सरप्राइज भी है। उस के बारे में यहां लिखना ठीक नहीं होगा। और हां, एक पॉपुलर स्टार भी स्वाभाविक रूप में दिखते हैं। वे इस विशेष भूमिका में अपनी पिछली फ्लॉप फिल्मों से बेहतर फार्म में हैं। हल्के-फुल्के अंदाज में बनी यह फिल्म हृषीकेष मुखर्जी और बासु चटर्जी के मिडिल सिनेमा की याद दिलाती है।

रेटिंग- *** तीन स्टार


Monday, April 25, 2011

डायरेक्‍टर डायरी : सत्‍यजित भटकल (22अप्रैल)

डायरेक्‍टर डायरी 9

22 अप्रैल

अखबार पढ़ने के लिए सुबह-सवेरे जगा। रिव्‍यू पढ़ने से पहले तनाव में हूं। स्‍वाति को जगाया। उसने नींद में ही पढ़ने की कोशिश की। मैं पेपर छीन लेता हूं। टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने हमें 3 स्‍टार दिए हैं और अच्‍छी समीक्षा लिखी है। ठीक है, पर दिल चाहता है कि थोड़ा और होता।

सुबह से नेट पर हूं। अपनी फिल्‍म के रिव्‍यू खोज रहा हूं। हालीवुड रिपोर्टर ने मिक्‍स रिव्‍यू दिया है, लेकिन कुल मिलाकर ठीक है। वैरायटी अमेरिकी फिल्‍म बाजार का बायबिल है। उसमें खूब तारीफ छपी है। और क्‍या चाहिए? भारतीय समीक्षाएं उतनी उदार नहीं हैं। कुछ तो बिल्‍कुल विरोधी हैं। इन सभी को पचाने में वक्‍त लगेगा।

मैं थिएटर के लिए निकलता हूं। सस्‍ते थिएटर जेमिनी में 50 दर्शक हैं... ज्‍यादा नहीं है, पर शुक्रवार की सुबह के लिहाज से कम नहीं कहे जा सकते। इंटरवल और फिल्‍म खत्‍म होने के बाद हम कुछ बच्‍चों और उनके अभिभावकों से बातें करते हैं । उन्‍हें फिल्‍म पसंद आई है। चलो अभी तक ठीक है। हम पीवीआर फीनिक्‍स जाते हैं। 250 रुपए का टिकट है। ज्‍यादा दर्शक नहीं हैं, लेकिन बच्‍चे और उनकी मम्मियों को फिल्‍म अच्‍छी लग रही है।

शाम होने तक थक गया हूं। भावनात्‍मक उछाल जारी है। खुद से वादा करता हूं कि कल जोकोमोन का आखिरी दिन होगा। यह लंबी और थकान भरी यात्रा थी। मैंने फिल्‍म और खुद के प्रति ईमानदार रहने की पूरी कोशिश की। इसका मतलब यह भी है कि अब इस सफर का अंत आ गया है।

Saturday, April 23, 2011

डायरेक्‍टर डायरी : सत्‍यजित भटकल (19 अप्रैल)

डायरेक्‍टर डायरी 8

19 अप्रैल

हमलोग चंडीगढ़ में हैं। अपने दोस्‍त शक्ति सिद्धू के निमंत्रण पर सौपिन स्‍कूल आए हैं। हमारे स्‍वागत में बच्‍चों ने शानदार परफार्मेंस दिया। पहले गायन मंडली तारे जमीन पर का टायटल ट्रैक गाती है। फिर एक विशेष बच्‍ची संस्‍कृति हमारे लिए शास्‍त्रीय नृत्‍य करती है... उसके चेहरे की खुशी और उसकी वजह से हमारी खुशी अतुलनीय है। अंत में छात्रों की एक मंडली ने जोकोमोन का झुनझुनमकड़स्‍त्रामा गीत पेश करती है... उन्‍होंने सुंदर नृत्‍य भी किया।

मैं शक्ति से मिलता हूं। स्‍कूल के स्‍थापक सौपिन परिवार के सदस्‍यों से भेंट होती है। मुझे स्‍कूल की अंतरंगता और ऊंर्जा अच्‍छी लगती है। स्‍कूल ने हमारे लिए भोज का आयोजन किया है। थोड़ी देर के लिए मैं भूल जाता हूं कि मैं प्रोमोशन के लिए आया हूं।

हमलोग रेडियो और प्रिंट इंटरव्यू के लिए भास्‍कर के कार्यालय जाते हैं। पत्रकार दर्शील से कुछ मुश्किल सवाल पूछते हैं। स्‍टेनली का डब्‍बा के चाइल्‍ड आर्टिस्‍ट के बारे में उससे पूछा जाता है कि अगर उसने भारत के चाइल्‍ड स्‍टार की जगह ले ली तो उसे कैसा लगेगा? हमलोगों के किसी हस्‍तक्षेप के पहले दर्शील जवाब देता है, वह बच्‍चा अमोल अंकल का बेटा है और हम लोग तारे जमीन पर के सेट पर एक साथ टोमैटो सूप पीते थे। वह मेरा दोस्‍त है। अगर उसने अच्‍छा किया तो मुझे खुशी होगी।

उनके फिल्‍म क्रिकेट गजेन्‍द्र ने मुझ से मुश्किल सवाल पूछे, समाज की समस्‍याओं को सुपरहीरो से सुलझाना कितना उचित है? मुझे सवाल पसंद आया मैं जवाब देना चाहता हूं। जोकोमोन खुद को सोशल एक्‍शन के विकल्‍प के तौर पर नहीं पेश करता। वह बदलाव के लिए समाज को प्रेरित करता है। बहस बढ़ती है। मैं कह सकता हूं कि जोकोमोन पर सबसे अच्‍छी बहस यहीं हुई।

रात में हम मुंबई लौटते हैं है। आकाश से नीचे देखने पर सुनहले और रुपहले रोशनी की चादर बिछी दिखती है। दिन का अवसादपूर्ण दृश्‍य रात की रोशनी में रोमांटिक हो चुका है। शायद मुंबई खुद को इसी रूप में देखती है।

हम शहर को ऐसे ही देखते हैं।

शहरों का दौरा खत्‍म हो चुका है। अंतिम प्रोमोशन मुंबई में है

एक कहानी को दर्शकों और उनके निर्णयों का इंतजार है।

डायरेक्‍टर डायरी : सत्‍यजित भटकल (18अप्रैल)

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18 अप्रैल

हम दिल्‍ली निकलते हैं। आकाश से मुंबई झोंपड़पट्टियों का हुजूम लगती है। दुनिया में ऐसा कोई शहर नहीं है। भारत में भी नहीं है... मुंबई का आकाशीय दर्शन अवसाद से भर देता है। फिर भी यह देश के मनोरंजन उद्योग का केंद्र है। निश्चित ही यह महज संयोग नहीं हो सकता।

हम नोएडा के एक स्‍कूल में जाते हैं। दर्शील को बच्‍चे घेर लेते हैं। मुझे भी बच्‍चों ने घेर लिया है... अजीब लगता है। बच्‍चे एकदम से अपरिचित चेहरे से ऑटोग्राफ मांग रहे हैं। मैं अब भीड़ की मानसिकता पर संदेह करने लगा हूं... खासकर स्‍कूलों की भीड़।

रात में दोस्‍तों के साथ डिनर करता हूं। मेरा ड्रायवर मुझे नोएडा में छोड़कर निकल जाता है। अब मेरे दोस्‍त को डिनर के बाद 50 किलोमीटर की ड्रायविंग का आनंद उठाना होगा। किनारों पर लगे पेड़ों वाली चौड़ी सड़क, चौड़ा फुटपाथ, हर मोड़ पर फुलवारी... मेरी मुंबइया आंखों को दिल्‍ली किसी और देश का शहर लगता है।

ट्रैफिक सिग्‍नल अभी तक काम कर रहे हैं, जबकि रात बारह से ज्‍यादा हो चुके हैं... सड़क पर कोई दूसरी सवारी नहीं है। फिर भी कारें ट्रैफिक सिग्‍नल पर रूक रही हैं। स्‍वीकार कर लें कि हम मुंबईकरों को अभी बहुत कुछ सीखना है।

डायरेक्‍टर डायरी : सत्‍यजित भटकल (17 अप्रैल)

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17 अप्रैल

हमलोगों ने कुछ रेडियो इंटरव्यू किए थे। वहीं सुन रहा था। एक आरजे की कोशिश थी कि किसी तरह कोई कंट्रोवर्सी मिल जाए उसने दर्शील से पूछा क्‍या उसकी कोई गर्लफ्रेंड है? उसका नाम क्‍या है? क्‍या वह एटीट्यूड रखता है... सुन्‍न कर देने वाले सवाल। रेड एफएम की आरजे कंट्रोवर्सी के लिए गिरगिरा रही थी। तब मुझे झुंझलाहट हो रही थी। सुनते समय महसूस कर रहा हूं कि क्‍यों कंट्रोवर्सी से अच्‍छी मीडिया कवरेज मिलती है या यों कहें कि कंट्रोवर्सी के बगैर सुनने में ज्‍यादा मजा नहीं आता।

रात में केतनव में स्‍क्रीनिंग है। केतनव प्रिव्‍यू थिएटर है। यह स्‍क्रीनिंग फिल्‍म इंडस्‍ट्री के दोस्‍तों और एक बच्‍चे के लिए है। मेरे प्रिय दोस्‍त करीम हाजी का बेटा है काशिफ, उसकी प्रतिक्रियाएं एकदम सटीक होती है। मैंने किसी स्‍क्रीनिंग में किसी बच्‍चे को इतने करीब से नहीं देखा। फिल्‍म खत्‍म होती है। काशिफ खुदा है। मैं राहत की सांस लेता हूं।

अब 96 घंटे बचे हैं।

फिल्‍म समीक्षा : जोकोमोन

सुपरहीरो जोकोमोन-अजय ब्रह्मात्‍मज

अपने चाचा देशराज की दया और सहारे पल रहे कुणाल को जब यह एहसास होता है कि वह भी ताकतवर हो सकता है और अपने प्रति हुए अन्याय को ठीक कर सकता है तो मैजिक अंकल की मदद से वह चाइल्ड सुपरहीरो जोकोमोन का रूप ले लेता है। सत्यजित भटकल की ईमानदार दुविधा फिल्म में साफ नजर आती है। वे कुणाल को चमत्कारिक शक्तियों से लैस नहीं करना चाहते। वे उसे साइंटिफिक टेंपर के साथ सुपरहीरो बनाते हैं। उन्होंने कुणाल के अंदरुनी ताकत को दिखाने के लिए कहानी का पारंपरिक ढांचा चुना है। एक लालची और दुष्ट चाचा है, जो अपनी पत्नी की सलाह पर कुणाल से छुटकारा पाकर उसके हिस्से की संपत्ति हड़पना चाहता है। अपनी साजिश में वह गांव के पंडित का सहयोग लेता है। वह अंधविश्वास पर अमल करता है। जोकोमोन बने कुणाल की एक कोशिश यह भी कि वह अपने गांव के लोगों को अंधविश्वास के कुएं से बाहर निकाले। चाचा को तो सबक सिखाना ही है। इन दोनों कामों में उसे मैजिक अंकल की मदद मिलती है। मैजिक अंकल साइंटिस्ट हैं। वे साइंस के सहारे कुणाल के मकसद पूरे करते हैं।

सत्यजित भटकल की तारीफ करनी होगी कि बच्चों के मनोरंजन के उद्देश्य से बन रही माइथोलोजिकल और अतिनाटीयक फिल्मों के घिसे-पिटे माहौल में एक नई कोशिश की है। उन्होनें एक माडर्न और सांइटिफिक टेंपर की कहानी कही है। जोकोमोन में बच्चों के फालतू मनोरंजन की व्यर्थ कोशिश नहीं की गई है, लेकिन इस प्रयास में फिल्म में हल्के-फुल्के प्रसंग कम हो गए हैं। बाल नायकों की फिल्मों में निर्देशक के सामने अनेक चुनौतियां रहती हैं। खास कर भारत में चुनौतियां और बढ़ जाती हैं, क्योंकि चिल्ड्रेन फिल्म के नाम पर ज्यादातर बचकानी फिल्म नहीं है। हां, इसके मनोरंजक होने में कमियां रह गई हैं, लेकिन उसके दूसरे कारण हैं।

कुणाल के साथ किट्ट के प्रसंग का सही निर्वाह नहीं हो सकता है, इसलिए कुणाल की जिंदगी में उसका प्रेरक महत्व होने पर भी वह पूर्ण नहीं लगती। दर्शील ने कुणाल के मनोभावों को सुंदर तरीके से अभिव्यक्त किया है। सुपरहीरो के तौर पर उसका आत्मविश्वास झलकता है। दोहरी भूमिका में अनुपम खेर सराहनीय हैं। कुणाल के बाल सखा प्यारे लगते हैं।

जोकोमोन एक सुंदर और अच्छा प्रयास है।

Friday, April 22, 2011

फिल्‍म समीक्षा : दम मारो दम

दम मारो दम: पुराना कंटेंट, नया  क्राफ्ट पुराना कंटेंट, नया क्राफ्ट

-अजय ब्रह्मात्‍मज

निर्देशक और अभिनेता की दोस्ती और समझदारी से अच्छी फिल्में बनती हैं। दम मारो दम भी अच्छी है, अगर अभिषेक बच्चन की पिछली फिल्मों की पृष्ठभूमि में देखें तो दम मारो दम अपेक्षाकृत अच्छी फिल्म है। रोहन सिप्पी ने अभिषेक बच्चन का बेहतर इस्तेमाल किया है। अन्य फिल्मों की तरह यहां वे बंधे, सिकुड़े, सिमटे और सकुचाए नहीं दिखते। स्क्रिप्ट की अपनी सीमा में उन्होंने निखरा प्रदर्शन किया है। उन्हें सहयोगी कलाकारों का अच्छा साथ मिला है। इसके बावजूद यह फिल्म कई स्तरों पर निराश करती है। दम मारो दम माडर्न मसाला फिल्म है, जिसमें पुराने फार्मूले की छौंक भर है।

फिल्म में तीन मुख्य किरदार हैं, जो वास्तव में एक ही कहानी के हिस्से हैं। तीन कहानियों को एक कहानी में समेटने की संरचना अलग होती है। इस फिल्म में एक ही कहानी को टुकड़ों में बांट कर फिर से बुना गया है। लेखक और निर्देशक की कोशिश इसी बहाने क्राफ्ट में कमाल दिखाने की हो सकती है, लेकिन अगर यह विष्णु कामथ की सीधी कहानी के तौर पर पेश की जाती तो प्रभावशाली होती। विष्णु कामथ अपनी जिंदगी में सब कुछ खो चुका पुलिस अधिकारी है। सब कुछ से यहां मतलब परिवार है। हताशा की कगार पर पहुंचे विष्णु कामथ को गोवा में मादक पदार्थो के धंधे को रोकने की चुनौती के रूप में एक मकसद मिलता है। इस मकसद के लिए वह अपनी जान की परवाह नहीं करता। लॉरी और जोकी इस धंधे को समझाने के दो किरदार हैं। बाकी एक ड्रग लॉर्ड है, जिसे आठवें-नौवें दशक के खलनायकों की तरह खूंखार दिखाने की कोशिश भर की गई है। चूंकि ड्रग लॉर्ड बिस्किट की भूमिका निभा रहे आदित्य पंचोली कमजोर अभिनेता हैं, इसलिए यह किरदार भी कमजोर हो गया है।

फिल्म नई सोच की है। हीरो, हीरोइन, जीत, हार के पारंपरिक ढांचे में न होने की वजह थोड़ी बिखरी, अधूरी और ढीली लगती है। हमें आदत है हीरो और विलेन को लड़ते देखने की। नए किस्म के किरदारों पर अधिक मेहनत नहीं की गई है, इसलिए वे कनविंसिंग नहीं लगते। जोकी और लॉरी को आधे-अधूरे ढंग से पेश किया गया है। अभिनेताओं की बात करें तो प्रतीक की मौजूदगी भर ही अच्छी लगती है। उन्हें अभी बहुत सीखना है। राणा दगुबटी अच्छे लगे हैं, लेकिन उन्हें ज्यादा विस्तार नहीं मिला है। बिपाशा बसु चलताऊ और उन्होंने उसे उसी तरीके से निभा दिया है। आयटम गीत मिट जाए गम में दीपिका के लटकों-झटकों में दम नहीं है। संवाद चुटीले ओर आज की लैंग्वेज में हैं।

रेटिंग- तीन स्टार

भौमिक होने का मतलब

अच्छी फिल्मों के लेखक सचिन भौमिक-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले मंगलवार को अचानक एक पत्रकार मित्र का फोन आया कि सचिन भौमिक नहीं रहे। इस खबर ने मुझे चौंका दिया, क्योंकि मैंने सोच रखा था कि स्क्रिप्ट राइटिंग पर उनसे लंबी बातचीत करनी है। पता चला कि वे बाथरूम में गिर गए थे। वे अस्पताल में थे। वहां से लौटे तो फिर तबियत बिगड़ी और वे दोबारा काम पर नहीं लौट सके। उनके सभी जानकार बताते हैं कि वे लेखन संबंधी किसी भी असाइनमेंट के लिए तत्पर रहते थे। उनकी यह तत्परता दूसरों की मदद में भी दिखती थी।

सचिन भौमिक ने प्रचुर लेखन किया। पिछले पचास सालों में उन्होंने लगभग 135 फिल्में लिखीं। इनके अलावा अनगिनत फिल्मों के लेखन में उनका सहयोग रहा है। हर युवा लेखक की स्क्रिप्ट वे ध्यान से सुनते थे और जरूरी सलाह देते थे। एक जानकार बताते हैं कि उन्होंने दर्जनों स्क्रिप्ट दूसरों के नाम से लिखी या अपनी स्क्रिप्ट औने-पौने दाम में बेच दी। सचिन भौमिक की यह विशेषता थी कि वे किसी भी फिल्म के लेखन में ज्यादा समय नहीं लगाते थे। उनका ध्येय रहता था कि हाथ में ली गई फिल्म जल्दी से पूरी हो जाए तो अगली फिल्म का लेखन आरंभ करें। वे चंद ऐसे लेखकों में शुमार थे, जिनके पास विषय और विचार की कमी नहीं। लेखन की इस अकुलाहट से उनकी फिल्मों में अधिक गहराई और मौलिकता नहीं दिखती। एक लेखक मित्र मजाक में उनके सामने कहा करते थे कि या तो आप भौमिक हो सकते हैं या मौलिक हो सकते हैं। दोनों एक साथ होना मुश्किल है। उनकी मौत के बाद श्रद्धांजलि लिखते समय सभी के सामने उनकी बॉयोग्राफी नहीं मिलने की दिक्कत आ रही थी। गूगल या दूसरे इंटरनेट सर्च में उनका नाम टाइप करने पर केवल उनकी फिल्मों की फेहरिस्त नजर आ रही थी। साथ में काम कर चुके निर्देशकों और लेखकों के पास बताने के लिए इतना ही था कि वे बहुत अच्छे लेखक और व्यक्ति थे। यह कोई नहीं जान सका कि आखिर किन खासियतों की वजह से वे इतनी फिल्में लिख पाए?

गौर करें, तो उन्होंने हमेशा पॉपुलर स्टारों और पॉपुलर किस्म के फिल्मकारों के लिए ही लेखन किया। आरंभिक दशक में उनके लेखन में गंभीरता दिखती है, जिस पर बांग्ला साहित्य के रोमांटिसिज्म का गहरा असर है। उल्लेखनीय है कि वे बंगाल के ही प्रगतिशील लेखन से दूर रहे। वे अपने लेखन में लोकप्रिय भाव और धारणाओं पर ध्यान देते थे। उनके चरित्र सामान्य स्थितियों में सामान्य प्रतिक्रियाएं ही करते थे। उन्होंने हिंदी फिल्मों की मुख्यधारा के स्क्रिप्ट लेखन को प्रचलित और स्वीकृत सांचों में बांधा और उसे मजबूत किया। हिंदी फिल्मों की यह विशेषता है कि हर सिचुएशन में किरदारों की हरकतों का अनुमान दर्शकों को हो जाता है। दर्शक इसका आनंद भी उठाते हैं। सचिन भौमिक ने अपनी फिल्मों में दर्शकों की इस सरल समझ और संवेदना पर अधिक जोर दिया। उनकी अधिकांश फिल्मों में कोई गूढ़ता नहीं है।

सचिन भौमिक की याददाश्त जबरदस्त थी। अंग्रेजी, बांग्ला और अन्य भाषाओं का साहित्य उन्होंने पढ़ रखा था। देखी हुई फिल्मों के सीन उन्हें भलीभांति याद रहते थे। जब भी किसी सीन या कैरेक्टर में उलझाव दिखता, वे किसी न किसी पुरानी कृति के रेफरेंस से उसे सुलझा लेते थे। अपने लेखन के प्रति वे अधिक सम्मोहित नहीं रहते थे। उनके एक मित्र लेखक ने बताया कि अगर उन्हें पता चलता था कि कोई और भी समान विषय पर लिख रहा है, तो वे राय-मशविरा कर दोहराव से बचने के लिए अपनी स्क्रिप्ट रोक देते थे या दूसरे की सहमति के बाद ही अपनी स्क्रिप्ट पूरी करते थे। उनके फिल्मी लेखन की खूबी और सीमा है कि वे कभी मौलिकता के आग्रही नहीं रहे। उनके लेखन का मुख्य उद्देश्य दर्शकों का मनोरंजन करना था। इस मनोरंजन की प्रेरणा कहीं से भी ली जा सकती थी।

Thursday, April 21, 2011

डायरेक्‍टर डायरी : सत्‍यजित भटकल (16 अप्रैल)

डायरेक्‍टर डायरी 5

16 अप्रैल 2011

एक हफ्ते के अंदर फिल्‍म रिलीज होगी। पिछली रात फोन आया कि होर्डिंग लग गए हैं। स्‍वाति मुझे और बच्‍चों से कहती है कि हमलोग चलें और बांद्रा वेस्‍ट में लगी होर्डिंग देख कर आए। शाम का समय है और सड़क पर भारी ट्रैफिक है, लेकिन बच्‍चे उत्‍साहित हैं। मेरी बेटी आलो अपना नया कैमरा ले लेती है और हम निकलते हैं। सड़क पर भारी ट्रैफिक है। मेरा बेटा निशांत कार्टर रोड पर बॉस्किन रॉबिंस आइस्‍क्रीम, डूनट आदि खाने की फरमाईश करता है... तर्क है कि हमें सेलिब्रेट करना चाहिए। सड़क की ट्रैफिक में कार के अंदर बहस चल रही है कि होर्डिंग देखने के बाद हम किस आइस‍क्रीम पार्लर जाएंगे। 20वें मिनट पर मैं किसी सुपरहीरो की तरह उड़़ कर होर्डिंग तक पहुंच जाना चाहता हूं। उसे लगा देना चाहता हूं। काश!

ट्रैफिक की भीड़ और कार में प्रतिद्वंद्वी आइस्‍क्रीम पार्लरों पर चल रही बच्‍चों की बहस की गर्मी के बावजूद होर्डिंग की पहली झलक का जादुई असर होता है। सुंदर तरीके से डिजायन की गई होर्डिंग बस स्‍टाप पर लगी है। बैकलिट रोशनी से चमकीला प्रभाव पड़ रहा है। पब्लिक ट्रांसपोर्ट मुझे कभी इतना रोमांटिक नहीं लगा। खयाल आया... युवा प्रेमी टेक्‍स्‍ट करेंगे... सी यू एट जोकोमोन बस स्‍टॉप

होर्डिंगमें सबसे ज्‍यादा अनरियल क्‍या था? उस पर मेरा नाम लिखा था। पहले के कामों के लिए अखबारों में मेरा नाम खूब छपा था। फिर भी मैं स्‍वीकार करूंगा कि सार्वजनिक स्‍पेस में अपना नाम देखना अनरियल और लार्जर दैन लाइफ एहसास देता है। यह भारत के लिए क्रिकेट टेस्‍ट मैच खेलने जैसा है। आप सेंचुरी मारें या जीरो पर आउट हों, लेकिन आप इतिहास का हिस्‍सा हो गए। बच्‍चों ने बस स्‍टॉप पर मुझे खड़ा कर दिया है। वे जोकोमोन के साथ मेरी तस्‍वीरें उतार रहे हैं... मानो में भी उस होर्डिंग का हिस्‍सा हूं।

लौटते समय हमलोग विशालकाय होर्डिंग देखते हैं... 50 फीट ऊंची... और उसी अनुपात में मेरा नाम..

मैं भयभीत हूं!

एक्शन फिल्म है दम मारो दम

-अजय ब्रह्मात्‍मज

रोहन सिप्पी और अभिषेक बच्चन का साथ पुराना है। 'कुछ न कहो', 'ब्लफ मास्टर' के बाद 'दम मारो दम' उनकी तीसरी फिल्म है। 'दम मारो दम' के बारे में बता रहे हैं रोहन सिप्पी

दम मारो दम एक सस्पेंस थ्रिलर है, जिसमें अभिषेक बच्चन पुलिस अधिकारी की भूमिका निभा रहे हैं। उनके साथ प्रतीक बब्बर और राणा दगुबटी भी हैं। फिल्म में बिपाशा बसु की खास भूमिका है, जबकि दीपिका पादुकोण सिर्फ एक गाने में दिल धड़काती दिखेंगी।

'दम मारो दम' को कॉप स्टोरी कह सकते हैं, लेकिन यह एक सस्पेंस थ्रिलर है। हमने एक नई कोशिश की है। फिल्म में तीन कहानिया हैं, जो एक दूसरे से गुंथी हुई हैं। पहली कहानी प्रतीक की है। वह स्टुडेंट है। एक खास मोड़ पर लालच में वह गलत फैसला ले लेता है। उसकी भिड़ंत एसीपी कामत से होती है। फिर अभिषेक की कहानी आती है। वह एक इंवेस्टीगेशन के सिलसिले में बाकी किरदारों से टकराता है। तीसरी कहानी में राणा और बिपाशा की लव स्टोरी है। राणा भी अभिषेक के रास्ते में आता है।

हमारी कहानी पूरी तरह से फिक्शनल है। खूबसूरती की वजह से हमने गोवा की पृष्ठभूमि रखी। गोवा की छवि के प्रति हम सवेदनशील रहे हैं। फिल्मों के लोकेशन के तौर पर जब कोई शहर चुना जाता है, तो उसके अच्छे-बुरे किरदार वहीं के होते हैं। दर्शकों को मालूम रहता है कि वे फिल्म देख रहे हैं, न कि डाक्यूमेंट्री।

फिल्म के टाइटल का ख्याल मशहूर गाने दम मारो दम से आया था। भारत में ड्रग या नशीले पदार्थो को लेकर कोई भी फिल्म बने, तो उसके रेफरेंस में दम मारो दम आएगा ही। वह बहुत ही खूबसूरत, दमदार और सही इंपैक्ट का गाना है। फिल्म में एक पार्टी की सिचुएशन बनी, तो हम ने वहा यह गाना डाला। दीपिका इस आइटम के लिए राजी हो गईं। 'दम मारो दम' नाम से ही फिल्म का सब्जेक्ट समझ में आ जाएगा। टाइटल का आइडिया लेखक श्रीधर राघवन ने दिया था।

एसीपी कामत के रोल में अभिषेक जंचे हैं, वैसे हम ने पहले उन्हें राणा वाला रोल दिया था। उन्होंने खुद ही पुलिस ऑफिसर का रोल चुना। उनकी तुलना उनके पिता से न करें। हमारी फिल्म के जरूरत के अनुसार उन्होंने बेहतरीन परफार्मेस दिया है। मैं इसे अभिषेक की एक्शन फिल्म कहूंगा। हालाकि अगर फिल्म हिट होती है तो उसका श्रेय सभी कलाकारों को मिलेगा।

सयोग है कि मेरी तीसरी फिल्म अभिषेक के साथ आ रही है। हमलोग बचपन से एक-दूसरे को जानते हैं। स्कूल में वह मुझ से जूनियर थे। काम करने के बाद वह हमारे दोस्त बने हैं।

Wednesday, April 20, 2011

डायरेक्‍टर डायरी : सत्‍यजित भटकल (13 अप्रैल)

डायरेक्‍टर डायरी 4

13 अप्रैल 2011

कल थोड़ा आराम था। जोकोमोन के प्रोमोशन के लिए नहीं निकलना था,केवल एक-दो इंटरव्यू हुए टेलीफोन पर। सुबह-सवेरे अंधेरी में स्थित ईटीसी स्‍टूडियो पहुंचे। दर्शील के पास बताने के लिए बहुत कुछ था। टीवी शो कॉमेडी सर्कस की शूटिंग के किस्‍से...। उससे पूछा गया कि दूसरे सुपरहीरो और उसमें क्‍या अंतर है?

उसने चट से जवाब दिया, मैं अपने कॉस्‍ट्यूम के ऊपर से चड्ढी नहीं पहनता।

और अंदर? सवाल पूछा गया।

दर्शील की हंसी रूकने में एक मिनट लगा।

ईटीसी के बाद हमलोग जुहू के एक होटल गए। वहां इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के सारे इंटरव्यू थे। बैंक्‍वेट रूम में कैमरामैन (सभी पुरुष) एंकर (लगभग सभी लड़कियां) भरे थे। मैं कोई शिकायत नहीं कर रहा हूं। लेकिन टीवी चैनल केवल खूबसूरत लड़कियों को ही क्‍यों चुनते हैं?

चैनलों ने परिचित सवाल पूछे चिल्‍ड्रेन फिल्‍म ही क्‍यों? सुपर‍हीरो की फिल्‍में भारत में नहीं चलतीं, फिर भी सुपर‍हीरो की की फिल्‍म ही क्‍यों? ज्‍यादातर सवाल फिल्‍म की सफलता की संभावनाओं को लेकर होते हैं। जवाब देते समय मैंने महसूस किया कि लिखते समय तो न तो मैंने और न मेरे सहयोगी लेखक लैंसी और स्‍वाति ने इसके बारे में सोचा था... सही या गलत... हम तो कंसेप्‍ट से उत्‍साहित थे। क्‍या होगा जब किसी व्‍यक्ति की कमजोरी ही उसकी ताकत बन जाए... और हम ने उसी पर काम किया। जोकोमोन का जो भी प्रतिसाद मिले, हम खुशी है कि हम अपने विचार पर कायम रहे।

प्रेस कांफ्रेंस में अनुपम खेर जोश में थे। उन्‍होंने जोकोमोन मास्‍क पहन लिया और दबाव डाला कि दर्शील, मंजरी और मैं भी पहन लूं। मैं चिंतित हूं... हमलोग अपनी फिल्‍म का मजाक बना रहे हैं क्‍या? हमलोग कहीं जोकोमोन का रहस्‍य तो नहीं मिटा रहे हैं? पर अनुपम को मना नहीं किया जा सकता। उन्‍हें 400 फिल्‍मों का अनुभव है।

मुझ पर भरोसा करो, वे कहते हैं। अगर आप विश्‍वास के साथ कुछ करेंगे तो दुनिया उसे मानेगी। मैं उनकी बात मान लेता हूं, लेकिन मेरी दुविधा बनी रहती है।

अगले दिन जोकोमोन के मास्‍क में सभी की छवियां चैनलों पर तैर रही हैं। दोस्‍तों फोन कर के बताते हैं कि उन्‍हें बहुत मजा आया।

मैं सीख रहा हूं।

Tuesday, April 19, 2011

बचकानी क्यों हो बच्चों की फिल्म- सत्‍यजित भटकल

-अजय ब्रह्मात्‍मज /रघुवेन्द्र सिंह

सत्यजित भटकल पेशेवर वकील थे। आमिर खान ने बचपन के अपने इस मित्र को लगान फिल्म की निर्माण टीम में शामिल किया और सत्यजित की सिनेमा से घनिष्ठता बढ़ती गई। सत्यजित ने लगान फिल्म की मेकिंग पर द स्पिरिट ऑफ लगान पुस्तक लिखी, जो बहुत सराही गई। दर्शील सफारी अभिनीत जोकोमोन सत्यजित भटकल की निर्देशक के तौर पर पहली कामर्शियल फिल्म है जिसमें कहानी है चाइल्ड सुपरहीरो की।

'जोकोमोन' फिल्म का बीज कैसे पड़ा?

इसका मुख्य किरदार कुणाल नाम का लड़का है, जिसे दर्शील सफारी प्ले कर रहे हैं। कुणाल अनाथ है। वह चाचा के पास रहता है। अपने स्वार्थ के लिए चाचा बड़े शहर ले जाकर छोड़ देते हैं। वह अकेला महसूस करता है। उसकी केयर करने वाला कोई नहीं है। उस परिस्थिति में वह अपनी स्ट्रेंथ को डिस्कवर करता है। किसी भी इंसान की कमजोरी उसकी लाइफ की सबसे बड़ी स्ट्रेंथ बन सकती है। इस विचार से बीज पड़ा कि क्या होगा, अगर वह लड़का अपनी कमजोरी को ताकत बना ले।

क्या हम इसे पूरी तरह से बाल फिल्म कह सकते हैं?

जी नहीं। पूरी तरह से भी नहीं और आधी तरह से भी नहीं। मुझे आपत्ति है बाल फिल्म कहने से। कुछ पुराने फिल्ममेकर्स को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर लोगों ने बाल फिल्म के नाम पर बचकानी फिल्में बनाई हैं। जो फिल्में एडल्ट देखते हैं, वह भी बहुत मेच्योर नहीं होतीं। वे बहुत ही बकवास और चाइल्डिश होती हैं। मैं देखता हूं कि अभी चाइल्ड फिल्म वह मानी जा रही है, जिसमें अश्लील गाना न हो, भयंकर वायलेंस न हो, गंदे किस्म का ह्यूंमर न हो। उस व्याख्या से मेरी फिल्म चिल्ड्रेन फिल्म है। दरअसल सबसे खास चीज होती है कि किसी फिल्म की एस्थेटिक क्या है? मेरी यह कोशिश रही है कि फिल्म का कंटेट चाइल्ड हो पर एस्थेटिक मेच्योर रहे। इस फिल्म का कंटेंट यूनिवर्सल ह्यूंमन वैल्यू पर है।

चिल्ड्रेन फिल्में बच्चों से जुड़े किसी गंभीर मुद्दे को डील करने के चक्कर में गंभीर हो जाती हैं या फिर बहुत ही हल्की-फुल्की बनाई जाती हैं। आपकी फिल्म इस मामले में कहां है?

हमारी इंडस्ट्री में मुश्किल से चिल्ड्रेन फिल्म बनती है। तीन-चार फिल्में बच्चों के लिए बनती हैं। मुझे जो चिल्ड्रेन फिल्म याद हैं वह मकड़ी, जजंतरम ममंतरम और ब्लू अंब्रेला हैं। हमारे यहां जनरल आडियंस के लिए जो फिल्में बनती हैं, उसे बच्चे भी देखते हैं। गजनी को ही ले लीजिए।

वजह क्या है बेहतर बाल फिल्में न बनने की?

उस बाजार को अभी एक्सप्लोर किया जाएगा। हॉलीवुड में ट्वेंटीएथ सेंचुरी फिल्म निर्माण कंपनी पर इतना कर्जा था कि वह डूबने वाली थी। तभी पांच मिलियन डॉलर की फिल्म होम अलोन रिलीज हुई। उसने तीन-चार सौ मिलियन डॉलर की कमाई की। उससे चिल्ड्रेन फिल्म के बारे में लोगों का नजरिया बदला। जोकोमोन नहीं तो कोई और फिल्म एक्सप्लोर करेगी इस जॉनर को। मार्केट है ऐसी फिल्म का।

आपकी 'चले चलो' डॉक्यूमेंट्री फिल्म 2002 में आई थी। पहली कामर्शियल फिल्म बनाने में इतना लंबा समय क्यों लगा?

मैंने टीवी के लिए बांबे लॉयर कार्यक्रम बनाया था। उसके बाद जोकोमोन की स्क्रिप्ट पूरी हुई। यह जरूर है कि यह फिल्म बनते-बनते टाइम लगा। मैंने 3-4 स्क्रिप्ट लिखीं। पता नहीं किसी कारण से यह स्क्रिप्ट निकल आई। मैं जहां भी गया इस स्क्रिप्ट पर फिल्म बनाने के लिए लोग तैयार हो गए। मेरे पास च्वाइस थी कि किसके साथ इसे बनाऊं?

आपको अपने बचपन की कौन सी फिल्में पसंद हैं?

हमें फिल्में देखने नहीं दी जाती थीं। कहा जाता था कि वायलेंट हैं। मैंने फिल्में बहुत लेट देखना शुरू किया। मुझे याद है कि शोले देखकर मैं बहुत डर गया था, क्योंकि एक्सपोजर ही नहीं था। मैं और मेरा छोटा भाई थिएटर से भाग जाना चाहते थे। हम लोग नाटक बहुत देखते थे। हम बाल नाट्य देखते थे और उनमें एक्ट भी करते थे। अभी हाल में मेरी तीन-चार साल की बेटी कमरे में बैठकर फिल्म देख रही थी। मैंने देखा कि कोई एक्टर था, उसके चेहरे पर खून था बहुत। मैं परेशान हो गया। रिमोट ढूंढने लगा टीवी बंद करने के लिए। बेटी ने कहा कि पापा डरो मत, वह टोमैटो सॉस है!

बच्चों को फिल्म देखने देना चाहिए?

आप रोक नहीं सकते। बच्चों को च्वाइस देनी चाहिए।

दर्शील सफारी के साथ कैसा अनुभव रहा?

मैंने बहुत से एक्टर के साथ काम किया है। दर्शील बेस्ट एक्टर हैं। बहुत ही इंटेलीजेंट। मैंने उनके साथ बहुत एंज्वॉय किया। बहुत तेज बच्चा है। वह लाइफ में जो भी करेगा, उसमें सफल होगा। उसमें मेच्योरिटी है, लेकिन उसने अपना बचपना खोया नहीं है। दर्शील ने पूरी फिल्म अपने कंधों पर ढोयी है। वह सब कुछ अच्छा करता है। कॉमेडी, ड्रामा, एक्शन करता है। इसमें वह सुपरहीरो बना है!

Monday, April 18, 2011

बातचीत में आत्‍मकथा ए आर रहमान की


-अजय ब्रह्मात्‍मज
इंटरनेट पर अलग-अलग जानकारियां पढ़ने को मिल जाएंगी कि उनका नाम एआर रहमान कैसे पड़ा और पर्दे की दुनिया से उनके जीवन की सच्ची कहानी क्या है? रहमान बताते हैं कि सच है कि अपना यह नाम उन्हें कभी पसंद नहीं आया और उन्हें इसका कारण भी नहीं मालूम? वह बताते हैं कि बस मुझे अपने नाम की ध्वनि अच्छी नहीं लगती थी। उनके मुताबिक महान अभिनेता दिलीप कुमार के प्रति उनका कोई अनादर नहीं है। उन्हें लगता था कि उनकी खुद की छवि के अनुरूप उनका नाम नहीं था। सूफी मत का अनुकरण करने से कुछ समय पहले वह लोग एक ज्योतिषी के पास बहन की जन्मपत्री लेकर गए थे, क्योंकि मां उसकी शादी कर देना चाहती थी। यह उसी समय की बात है, जब वह अपना नाम बदलना चाहते थे और इस बहाने एक नई पहचान पाना चाहते थे। ज्योतिषी ने उनकी तरफ देखा और कहा, इस व्यक्ति में कुछ खास है। उन्होंने अब्दुल रहमान और अब्दुल रहीम नाम सुझाया और कहा कि दोनों में से कोई भी नाम उनके लिए बेहतर रहेगा। उन्हें रहमान नाम एकबारगी में पसंद आ गया। यह भी एक संयोग ही था कि एक हिंदू ज्योतिषी ने उन्हें यह मुस्लिम नाम दिया था। फिर उनकी मां चाहती थी कि वह अपने नाम में अल्लाहरखा जोड़ें। इसका मतलब होता है ऐसा व्यक्ति जो ईश्वर द्वारा रक्षित है। इस तरह उनका नाम एआर रहमान हो गया। यह असामान्य नाम है। वह बताते हैं कि वर्ष 1991 में जब अपनी पहली फिल्म रोजा के लिए मैंने काम शुरू किया तो खयाल आया कि फिल्म और अलबम के क्रेडिट में मेरा नया नाम जाए तो बेहतर हो सकता है। मेरे परामर्शदाता मणि रत्नम और रोजा के निर्माता के बालाचंदर इस प्रस्ताव पर सहज ही राजी हो गए। यह तो एक सवाल का जवाब है और इससे हमें सीधे शब्दों में पूरी जानकारी मिल जाती है कि पहले के दिलीप कुमार का नाम कैसे बाद में एआर रहमान पड़ा। नसरीन मुन्नी कबीर के सवालों में ठोस जिज्ञासा के साथ यह कोशिश भी जुड़ी दिखती है कि जवाबों से रहमान का जीवन क्रम भी बनता जाए। हालांकि नसरीन ने इसे बचपन से अभी तक के सफर के कालक्रम में नहीं रखा है, फिर भी एआर रहमान से उनकी अंतरंग बातचीत में जीवन की झलक मिल ही जाती है। नसरीन कबीर ने उनसे जुड़े सभी असमंजस को साफ करने की कोशिश करती हैं। एआर रहमान के जीवन प्रसंगों की अस्पष्टता इस पुस्तक की बातचीत से खत्म होती है। एआर रहमान के प्रशंसकों, फिल्म संगीत प्रेमियों और फिल्मी हस्तियों में रुचि रखनेवाले पाठकों के लिए यह एक रुचिकर और बेहतरीन पुस्तक है जिसे पढ़ा जाना चाहिए। नसरीन मुन्नी कबीर हिंदी फिल्मों, फिल्म कलाकारों और फिल्म विधा पर नियमित रूप से गवेषणात्मक और गंभीर काम कर रही हैं। वह पॉपुलर कल्चर के प्रभाव से परे जाकर उन बारीक रेखाओं और बिंदुओं पर नजर डालती हैं, जिनसे कोई तस्वीर बनती है। उनकी हर किताब हिंदी फिल्म के इतिहास के किसी पहलू, व्यक्ति या प्रसंग का क्लाजेअप शॉट होता है। उनकी हर पुस्तक में विस्तृत और गहरी विवेचना पढ़ने को मिलती है, जो उनकी लेखन कला के साथ-साथ एक व्यक्तिगत खूबी भी है। वह अनावश्यक विश्लेषण और चीरफाड़ नहीं करतीं। उनकी हर पुस्तक पढ़ने पर ऐसा लगाता है कि अब इस विषय पर इससे ज्यादा जानने की जरूरत नहीं रह गई है। नसरीन मुन्नी कबीर चाहतीं तो एआर रहमान की जीवनी लिख सकती थीं, लेकिन उन्होंने इसे सवाल-जवाब के ढांचे तक ही सीमित रखना ज्यादा उचित समझा। वैसे एआर रहमान संकोची और शर्मीले स्वभाव के व्यक्ति हैं। उनके जवाब कई बार संक्षिप्त और अस्पष्ट होते हैं। प्रचलित फिल्मी इंटरव्यू को वह एक जरूरी काम के तौर पर निबटाते हैं। इस पुस्तक की बातचीत में रहमान शॉर्टकट नहीं लेते और जवाब देने में कोई संकोच भी नहीं दिखते। उन्होंने पिता, मां, पत्नी, बच्चों समेत अपने दोस्तों और हलीबुल्लाह स्ट्रीट के उस घर की भी बात की है, जिसकी छतें चूती थीं। घर के बारे में सोचने पर उन्हें अपना वहीं घर याद आता है। इस पुस्तक में रहमान ने दार्शनिक बनने या अपने अतीत के प्रति नॉस्टेलजिक होने की भी कोशिश नहीं की है। चूंकि हर जवाब में उनके ही शब्द और भाव हैं, इसलिए इस पुस्तक को प्रश्नोत्तरी आत्मकथा कहा जा सकता है। एआर रहमान ने फिल्म संगाीत पर विस्तृत जवाब दिए हैं। वह फिल्म संगीत में आई नई ध्वनियों की पृष्ठभूमि और परिस्थितियों के बारे में भी विस्तार से बताते हैं। इस प्रयत्न में उन्होंने अपने समकालीनों और पूर्वजों के प्रति कहीं भी अनादर व्यक्त नहीं किया है। वह अपनी श्रेष्ठता स्थापित नहीं करते, बल्कि उनकी श्रेष्ठता जाहिर हो जाती है। उन्होंने फिल्मों के बैकग्राउंड स्कोर (पा‌र्श्व संगीत) पर अपनी फिल्मों के संदर्भ व उदाहरणों से सप्रसंग बातें की हैं। निश्चित ही इस पुस्तक को पढ़ने के बाद उन फिल्मों को देखने का आनंद बढ़ जाएगा। ए आर रहमान-द स्पिरिट ऑफ म्यूजिक हमारे वर्तमान के एक सक्रिय और सफल संगीतकार की साधना, सफलता और सफर का विवरण है। उन्हीं के शब्दों में इसे पढ़कर यह अहसास होता है कि रहमान हमीं से बातें कर रहे हैं और हमें सब कुछ बता रहे हैं। इस पुस्तक के साथ उनकी आठ संगीत रचनाओं की एक ऑडियो सीडी भी है

Sunday, April 17, 2011

पाँव जमीं पर नहीं पड़ते मेरे-लारा दत्‍ता

-अजय ब्रह्मात्‍मज

लारा दत्ता के जीवन में उत्साह का संचार हो गया है। हाल ही में महेश भूपति से उनकी शादी हुई है। 16 अप्रैल को उनका जन्मदिन था और इसी महीने 29 अप्रैल को उनके प्रोडक्शन हाउस भीगी बसंती की पहली फिल्म 'चलो दिल्ली' रिलीज हो रही है। उनसे बातचीत के अंश-

इस सुहाने मोड़ पर कितने सुकून, संतोष और जोश में हैं आप?

हर इंसान की जिंदगी में कभी न कभी ऐसा मोड़ आता है, जब वह खुद को सुरक्षित और संतुष्ट महसूस करता है। मैं अभी उसी मोड़ पर हूं। एक औरत होने के नाते कॅरिअर के साथ यह टेंशन बनी रहती है कि शादी तो करनी ही है। वह ठीक से हो जाए। लड़का अच्छा हो। ग्लैमरस कॅरिअर में आने से एक लाइफस्टाइल बन जाती है। हम खुद के लिए उसे तय कर लेते हैं। कोशिश रहती है कि ऐसा लाइफ पार्टनर मिले, जो साथ चल सके। मैं अभी बहुत खुश हूं। मेरी शादी एक ऐसे इंसान से हुई है, जो मुझे कंट्रोल नहीं करता। मेरे कॅरिअर और च्वाइस में उनका भरपूर सपोर्ट मिलता है। अभी लग रहा है कि मैं सब कुछ हासिल कर सकती हूं।

मेरा ऑब्जर्वेशन है कि आपने टैलेंट का सही इस्तेमाल नहीं किया या यों कहें कि फिल्म इंडस्ट्री ने आप को वाजिब मौके नहीं दिए?

इसी वजह से तो प्रोड्यूसर बन गई हूं। अब मैं अपनी मर्जी की फिल्में कर सकती हूं। इंडस्ट्री में बहुत कम ऐसी स्क्रिप्ट मिलती हैं, जहां हम लड़कियों के लिए ठोस काम हो। मैं महिला प्रधान फिल्मों की बात नहीं कर रही और न ही फेमिनिज्म का झंडा बुलंद कर रही हूं। मैं चाहती हूं कि ऐसी फिल्में हों, जिनमें हीरो-हीरोइन के बीच संतुलन बना रहे। अगर दोनों मिल कर जिंदगी चला सकते हैं तो फिल्में क्यों नहीं चला सकते?

पुरुष प्रधान फिल्म इंडस्ट्री में यह मुमकिन है क्या?

मैं मानती हूं कि अपने देश और फिल्म इंडस्ट्री में पुरुषों का वर्चस्व बना हुआ है। हमारे समाज का स्ट्रक्चर ही ऐसा है। फिल्मों की बात करें तो नंबर वन हीरोइन भी अपनी फिल्म से आमिर या शाहरुख जैसे रिटर्न नहीं ला सकतीं। इस सच्चाई से कोई इंकार नहीं कर सकता। मैं ऐसी होपलेस लड़ाई में पड़ना भी नहीं चाहती। मैं तो सिर्फ एंटरटेनिंग कामर्शियल फिल्में करना चाहती हूं, जिनमें औरतों का सिग्निफिकेंट रोल हो। उन्हें सिर्फ सजावट, सेक्स ऑबजेक्ट या सामान की तरह न पेश किया जाए।

'चलो दिल्ली' रोड फिल्म लग रही है?

चूंकि फिल्म में एक जर्नी है, इसलिए रोड फिल्म कह सकते हैं। बहुत ही सिंपल फिल्म है। दो डिफरेंट पर्सनैलिटी के दो व्यक्ति एक साथ सफर कर रहे हैं। मजबूरी में उन्हें एक-दूसरे पर भरोसा करना है। दोनों जयपुर से दिल्ली पहुंचने की कोशिश में हैं। रास्ते में हादसे पर हादसे ही होते रहते हैं। मिहिका मुंबई की अपर क्लास की लड़की है, जबकि मनु गुप्ता (विनय पाठक) चांदनी चौक, दिल्ली का रहने वाला है। करोलबाग में उसकी साड़ी की दुकान है। वह लोअर मिडिल क्लास का है।

ऐसा लगता है कि हल्के-फुल्के अंदाज में दो व्यक्तियों के टेंशन के मजेदार सिक्वेंस रखे गए हैं?

यह रियल इंडिया है। दो अलग-अलग क्लास के लोग सफर में साथ होते हैं। उनकी अपनी ख्वाहिशें और डर हैं। उनके बीच एक इमोशनल रिश्ता भी बनता है। रिलेशनशिप डेवलप होता है। मैं ज्यादा डिटेल में नहीं बता सकती.. प्लीज आप फिल्म देखो और दूसरों को भी देखने के लिए बोलो।

..हिंदी फिल्मों के हीरो-हीरोइन के बीच लव का एंगल तो आ ही जाता है?

मैं अभी नहीं बता सकती.. अब दो लोग साथ होंगे तो उनके बीच कोई न कोई केमिस्ट्री तो बनेगी ही। फिल्म में आप दो घंटे उन्हें साथ देख रहे हो। उनका सफर तो उससे भी लंबा है। साथ ही हादसे और घटनाएं भी हैं। जाहिर सी बात है कि दोनों के बीच एक रिलेशनशिप डेवलप होता है.. अब वह दोस्ती तक रहता है या लव में बदलता है या फिर झगड़े में खत्म होता है.. वह अभी नहीं बताना चाहिए मुझे।

फिल्म के निर्देशक शशांत शाह को आपने इस स्क्रिप्ट की वजह से चुना या उनके साथ फिल्म करना चाहती थीं?

हमारा परिचय इस स्क्रिप्ट की वजह से ही हुआ। शशांत और विनय की पुरानी जोड़ी है। दोनों ने दसविदानिया एक साथ की थी। शशांक चाहते थे कि मैं यह फिल्म करूं। मुझे स्क्रिप्ट अच्छी लगी तो मैंने प्रोड्यूस करने का फैसला ले लिया। महेश को भी फिल्म की स्क्रिप्ट अच्छी लगी तो उन्होंने भी को-प्रोडयूसर बनना पसंद किया। बाद में इरोस कंपनी भी साथ में आ गई। सब कुछ अपने आप रास्ते पर आता चला गया।

तो महेश भूपति के साथ आपकी रिलेशनशिप और यह फिल्म साथ-साथ चली?

अच्छी बातें एक साथ ही होती हैं। मेरी जिंदगी में महेश का आना, इस फिल्म का बनना और मेरा निर्माता बनना सब बगैर किसी बड़ी प्लानिंग के होता चला गया। अब ऐसा लग सकता है कि इसके पीछे हम दोनों की जबरदस्त प्लानिंग रही होगी।

'भीगी बसंती'.. अजीब सा नाम नहीं है प्रोडक्शन कंपनी का?

है तो.. बसंती बड़ा फिल्मी नाम है। शोले में हेमा मालिनी ने इस किरदार को अलग पहचान दे दी थी। बसंती अगर भीगी हुई हो तो कितनी सेक्सी लगेगी। हिंदी फिल्मों में भीगी हीरोइनों को आप देखते रहे हैं। यह नाम वहीं से प्रेरित है।

यह भय नहीं लगता कि प्रोड्यूसर बनने के बाद आप को बाहर से ऑफर मिलने बंद हो जाएंगे?

ऐसा क्यों कह रहे हैं। आज आमिर, शाहरुख, सलमान सभी निर्माता बन गए हैं। वे अपने प्रोडक्शन के साथ बाहर की फिल्में भी कर रहे हैं। अगर लड़की होकर मैंने ऐसा कर दिया तो क्या मेरे लिए दूसरे दरवाजे बंद हो जाएंगे? ऐसा होना तो नहीं चाहिए। सच कहें तो यह बहुत सही फैसला है कि एक मुकाम हासिल करने के बाद अपनी कंपनी खोली जाए और मुनाफे को अपने पास रखा जाए। प्रोडक्शन कंपनी होने से एक फायदा होगा कि मैं यों ही कोई फिल्म साइन नहीं करूंगी।

तो अब आप ब्यूटी एंड ब्रेन का सही तालमेल बिठाने जा रही हैं?

हाँ, अब मेरे पास एक सहयोगी है, जो मेरा पति है। पहले मैं कॅरिअर संबंधी कोई भी सलाह अक्षय कुमार से लेती थी। उन्होंने हमेशा मुझे सही सलाह दी और और जरूरत पड़ने पर मदद की। महेश की कंपनी बेहद सफल है। उनके सहयोग से मेरी कंपनी भी स्थापित हो जाएगी। महेश चाहते हैं कि मैं फिल्मों में काम करती रहूं और अपनी मर्जी के दूसरे वेंचर भी आरंभ करें।

क्या-क्या करने का इरादा है?

फैशन लाइन आरंभ करूंगी। ऐसी चीजें जो मिडिल क्लास की लड़कियां खरीद सकें। अभी एक शू कंपनी के साथ बात चल रही है। जल्दी ही शू रेंज लेकर आऊंगी।

..और फिल्मों के फ्रंट पर?

शाहरुख खान के साथ डॉन-2 कर रही हूं। दो और फिल्मों की बात लगभग फाइनल स्टेज पर है। मेरी कंपनी की एक और फिल्म अगस्त में आरंभ होगी।

Saturday, April 16, 2011

डायरेक्‍टर डायरी : सत्‍यजित भटकल (10 अप्रैल)

10 अप्रैल

अगला पड़ाव पुणे है। बिग सिनेमा में दर्शील को देखने भारी भीड़ आ गई है। उसे सभी ने घेर लिया है। एक स्‍टार का पुनर्जन्‍म हुआ है।

मेरे खयाल में प्रेस कांफ्रेंस ठीक ही रहा। ज्‍यादातर मेरी मातृभाषा मराठी में बोल रहे थे। दर्शील और मंजरी भी मराठी बोलते हैं। मंजरी पुणे से है। खास रिश्‍ता है। प्रेस कांफ्रेंस में फिल्‍म से संबंधित सवालों के जवाब देने के अवसर मिलते हैं। बड़ा सवाल है चिल्‍ड्रेन फिल्‍म ही क्‍यों?

जोकोमोन बच्‍चों के लिए है, लेकिन केवल बच्‍चों के लिए नहीं है। आयटम नंबर नहीं होने, हिंसा नहीं होने और द्विअर्थी संवादों के नहीं होने से किसी फिल्‍म के दर्शक सिर्फ बच्‍चे नहीं हो सकते। दरअसल, ऐसा होने पर मां-बाप और दादा-दादी या नाना-नानी भी अपने बच्‍चों के साथ ऐसी फिल्‍मों का बेझिझक आनंद उठा सकते हैं, जो कि आयटम नंबर आ जाने पर थोड़ा कम हो जाता है। हमने अपनी टेस्‍ट स्‍क्रीनिंग में देखा कि बड़े भी बच्‍चों की तरह फिल्‍म देख कर खुश हो रहे थे।

दूसरा सवाल कोई वयस्‍क दर्शक मुख्‍य भूमिका में बच्‍चे को क्‍यों देखना चाहेगा?

बच्‍चे के नायक बनने का मुद्दा इस वजह से है कि हम लड़का-लड़की रोमांस के आदी हो गए हैं। हीरो को हीरोइन मिलेगी कि नहीं और कैसे मिलेगी... यही हमारी फिल्‍मों का केंद्रीय ड्रामा होता है... खास कर हाल मे रिलीज फिल्‍मों में यही देखा गया। लेकिन दर्शक लगातार हमें बता रहे हैं कि कोई फार्मूला नहीं चलता। कोई नहीं जानता कि क्‍या चलता है? दर्शकों ने उन सभी फिल्‍मों को सराहा, जिनमें नवीनता और ताजगी थी... उन्‍होंने स्‍टारों पर गौर ही नहीं किया।

हम हाल ही में खुले इनऑर्बिट मॉल के छोटे स्‍टेज पर चढ़ते हैं। लगभग 5000 की भीड़ जमा है। दर्शील स्‍वत:स्‍फूर्त और चहेता है। वह मंजरी के साथ डांस करता है। वे मुझे भी खींचते हैं। मैं उन्‍हें कहता हूं कि जोकोमोन एडवेंचर ड्रामा है न कि स्‍लैपस्टिक कामेडी। वे नहीं मानते। मैं घबरा कर मंच से कूद जाता हूं।

हम मुंबई लौटते हैं। 9 बजे के लगभग मुंबई पुणे हाई वे से लगे एक रेस्‍तरां में प्रवेश करते हैं। मंजरी ने कातिल कपड़े पहन रखे हैं। उसे देख कर कानाफूसी चल रही है... लोगों ने पहचान लिया है कि वह जाने तू या जाने ना की एक्‍ट्रेस है। कुछ लोग साथ में फोटो खींचवाने का आग्रह करते हैं। वह खुश हैं। और हम भी।

कल न्‍यूज चैनलों के इंटरव्यू है, फिर कामेडी सर्कस के शूट पर जाना है... कारवां आगे बढ़ रहा है। टिकटों की बिक्री होनी है और समय भागता जा रहा है।

Friday, April 15, 2011

फिल्‍म समीक्षा : 3 थे भाई

3 थे भाई: लचर भाषा और कल्पना-अजय ब्रह्मात्‍मज

किसी फिल्म में रोमांस का दबाव नहीं हो तो थोड़ी अलग उम्मीद बंधती है। मृगदीप सिंह लांबा की 3 थे भाई तीन झगड़ालु भाइयों की कहानी है, जिन्हें दादाजी अपनी वसीयत की पेंच में उलझाकर मिला देते हैं। किसी नीति कथा की तरह उद्घाटित होती कथानक रोचक है, लेकिन भाषा, कल्पना और बजट की कमी से फिल्म मनोरंजक नहीं हो पाई है।

चिस्की, हैप्पी और फैंसी तीन भाई है। तीनों के माता-पिता नहीं हैं। उन्हें दादाजी ने पाला है। दादाजी की परवरिश और प्रेम के बावजूद तीनों भाई अलग-अलग राह पर निकल पड़ते हैं। उनमें नहीं निभती है। दादा जी एक ऐसी वसीयत कर जाते हैं, जिसकी शर्तो को पूरी करते समय तीनों भाइयों को अपनी गलतियों का एहसास होता है। उनमें भाईचारा पनपता है और फिल्म खत्म होती है। नैतिकता और पारिवारिक मूल्यों का पाठ पढ़ाती यह फिल्म कई स्तरों पर कमजोर है।

तीनों भाइयों में हैप्पी की भूमिका निभा रहे दीपक डोबरियाल अपनी भूमिका को लेकर केवल संजीदा हैं। उनकी ईमानदारी साफ नजर आती है। ओम पुरी लंबे अनुभव और निरंतर कामयाबी के बाद अब थक से गए हैं। उनकी लापरवाही झलकने लगती है। श्रेयस तलपडे को मिमिक्री का ऐसा छूत लगा है कि वे अपने किरदारों को इससे बचा ही नहीं पाते। यह उनकी सीमा बनती जा रही है। ऊपर से 3 थे भाई में भाषा और संवाद की बारीकियों पर ध्यान नहीं दिया गया। श्रेयस की एंट्री पंजाबी लहजे के संवाद से होती है और फिर वे दृश्य बदलने के साथ लहजा बदलते जाते हैं। संवादों का सरल होना गुण है, लेकिन हर भाव का सरलीकरण हो जाए तो नाटकीयता और प्रभाव पर असर होता है। आखिर हम एक फिल्म देख रहे हैं। दृश्य और भाव के अनुरूप भाषा भी सजी और समृद्ध होनी चाहिए। फिल्म का थीम गीत 3 थे भाई बार-बार तीनों भाइयों के स्वभाव की याद दिलाता है, लेकिन कुछ समय के बाद वही गीत खटकने लगता है।

3 थे भाई में अपेक्षित गति और विस्तार नहीं है। एक कमरे में आ जाने के बाद तीनों भाई बंध जाते हैं। उनके हाथ-पांव बंधना, उनका गिरना-पड़ना और एक-दूसरे को पछाड़ना.. सारी कोशिशों के बवाजूद हंसी की लहर नहीं उठती। बर्फबारी के दृश्यों में लॉजिक नहीं है। घुटने भर जमी बर्फ अगले ही दिन कैसे पिघल जाती है? और हां, अंगवस्त्रों एवं गैस की बीमारी को लेकर गढ़े गए दृश्य फूहड़ और फिजूल हैं। फूहड़ फैशन चल गया है.. किसी के पा.. पर हंसने का।

रेटिंग- * एक स्टार

डायरेक्‍टर डायरी : सत्‍यजित भटकल (९ अप्रैल)

9 अप्रैल 2011
11am

हम इंदौर आ गए हैं। ‘जोकोमन’ के प्रोमोशन के लिए मेरे साथ मंजरी और दर्शील इंदौर में हैं। हम सभी एमेरल्‍ड हाइट स्‍कूल आए हैं। बड़े शहर वाले गहरी सांस लेते हैं। ऐसा स्‍कूल नहीं देखा। 200 एकड़ की जमीन में फैला स्‍कूल, मैदान, स्‍वीमिंग पुल, क्रिकेट के मैदान, किले की डिजायन में बनी इमारते... बेचारी मुंबई... निर्धन मुंबई।

200 बच्‍चे आदर के साथ खड़े हैं। वाह... बच्‍चों को क्‍या हो गया है? हम उनके आधे भी अनुशासित नहीं थे। ‘जोकोमन’ के गीत पर स्‍कूल के बच्‍चे जोश के साथ नाचते हैं (मेरी लालची आंखों में ऐसे और भी दृश्‍य उभरते हैं) ... एक निर्देशक को और क्‍या चाहिए।

दर्शील उनसे मिलता है। हाथ मिलाता है। तस्‍वीरें उतारी जाती हैं। मुझे दर्शील की नैसर्गिक और संतुलित सरलता अच्‍छी लगती है। वह दूसरों को प्रभावित करने की कोशिश नहीं करता।

3pm

हमलोग लोकल रेडियो स्‍टेशन माय एफएम आए हैं। मंजरी का माइक गिर जाता है। रेडियो जौकी मजाक करता है, ‘मैम, माइक भी आप पर फिसल रहा है।’ मंजरी खुश है। एक्‍टर एक्‍टर ही रहेंगे।

6pm

हम एक बड़े मॉल में आए हैं। भारी भीड़ जमा है। दर्शील के फैन की भीड़ है। एमसी जमाा हुई भीड़ से पूछती है, ‘फिल्‍म के म्‍यूजिक डायरेक्‍टर का नाम बताएं?’
‘शंकर एहसान लॉय’ ... पांच लोग पूरे विश्‍वास से चिल्‍लाते हैं। उन्‍हें उपहारों का थैला दिया जाता है।
और भी सवाल पूछे जाते हैं। फिर सवाल आता है, ‘जोकोमोन’ का डायरेक्‍टर कौन है?’
मैं दौड़ कर एमसी के पास जाता हूं, ‘इज्‍जत का फालूदा बनाना है क्‍या?’
वह मेरी बातों पर गौर नहीं करती। भीड़ में खामोशी, छा गई है। एक होशियार बच्‍चा पोस्‍टर पर नाम पढ़ने की कोशिश करता है ‘सत्‍त्‍त्‍यजजजीत भट ट भटक...’ उस बच्‍चे का पढ़ना खत्‍म ही नहीं हो रहा है। मेरे कानों में आवाज टूट कर आ रही है... मेरा नाम पूरा नहीं हो पाएगा। खूबसूरत एमसी मौके को समझ लेती है। वह चिल्‍लाती है। ‘सही जवाब’... खुशी की लहर दौड़ जाती है। अगर आप यह जानते हैं तो आप सब कुछ जानते हैं।

8.30pm

घर-परिवार के लिए लौटना है। पता चलता है कि जिस जेट लाइट फ्लाइट को 45 मिनट में मुंबई पहुंचना था... अब वह नागपुर होकर जाएगी और हमें तीन घंटे जहाज में रहना होगा। इतने समय में तो हम मिडिल ईस्‍ट पहुंच जाते। मुंबई एयरपोर्ट की भीड़ से हमारी व्‍यथा और बढ़ जाती है। इंदौर से पांच घंटों की यात्रा के बाद घर पहुंचता हूं। लेकिन... कोई शिकायत नहीं है। फिल्‍म बनाने के लिए कोई आपको बाध्‍य नहीं करता।

Thursday, April 14, 2011

जान भी लो यारो

जान भी लो यारोंअभी मैं भ्रष्टाचार को आड़े हाथों लेती फिल्म जाने भी दो यारों की बातें कर रहा हूं। इस फिल्म पर केंद्रित पुस्तक जय अर्जुन सिंह ने लिखी है। सामान्य रूप से फिल्म प्रेमियों और विशेष रूप से जाने भी दो यारों के प्रशंसकों के लिए यह रोचक पाठ है।

12 अगस्त, 1983 को जाने भी दो यारों रिलीज हुई थी। तब से यह फिल्म दर्शकों को हंसाती आ रही है। आज की हास्य (कॉमेडी) फिल्मों की तरह इसमें नॉनसेंस, वल्गर और फिजिकल कॉमेडी नहीं है। जाने भी दो यारों अपने समय की सामाजिक व्यवस्था पर करारा व्यंग्य है। यह फिल्म मुंबई की पृष्ठभूमि में बिल्डर, कानून के रक्षक, उच्च अधिकारी और मीडिया की मिलीभगत से चल रहे भ्रष्ट तंत्र को उजागर करती है। फिल्म में एक गहरा संदेश है, लेकिन उसे उपदेश की तरह नहीं पेश किया गया है। यही कारण है कि फिल्म हंसाने के साथ चोट भी करती है। 18 सालों के बाद भी इस फिल्म का प्रभाव कम नहीं हुआ है। अफसोस की बात है कि हिंदी में दोबारा ऐसी फिल्म नहीं बनी।

जय अर्जुन सिंह ने पूरे मन जाने भी दो यारों की मेकिंग की जानकारियां बटोरी हैं और उन्हें रोचक तरीके से फिल्मी पटकथा की तरह पेश किया है। यह पुस्तक फिल्म निर्माण संबंधी जानकारियों से रोमांचित करती है। जय अर्जुन सिंह ने इस फिल्म निर्माण की बारीकियों को उनके संदर्भो के साथ रखा है। वे कहीं भी फिल्म या फिल्म के निर्देशक से अभिभूत नजर नहीं आते। उन्होंने किसी सधे रिपोर्टर की तरह कुंदन शाह और उनके साथियों की बातों को खास क्रम से रखा है। इस फिल्म के साथ जुड़े लेखक, कलाकार और तकनीशियन आज अपने क्षेत्रों के मशहूर हैं। किताब को पढ़ते हुए हम चकित हो सकते हैं कि कैसे सात लाख रुपये से कम लागत में बनी इस फिल्म से वे जुड़े रहे और उन्होंने एक क्लासिक की रचना की। ऐसा करते समय उन्हें अहसास नहीं रहा होगा कि जाने भी दो यारों कल्ट फिल्म बन जाएगी। हिंदी में ब्लैक कॉमेडी का मानदंड तय कर देगी।

जय अर्जुन सिंह ने इस पुस्तक में विस्तार से कुंदन शाह के मानस को समझने की कोशिश की है। मध्यवर्गीय गुजराती परिवार से आए कुंदन ने तो प्रकाशन व्यवसाय में करियर आरंभ कर दिया था, लेकिन अचानक उन्होंने एफटीआईआई में एडमिशन लिया। वहां से निकलने के बाद जीवनयापन के लिए टाइपिंग की, फिर भी फिल्म बनाने का जुनून जिंदा रखा। उन्होंने अपने दोस्त द्वारा सुनाए गए किस्सों पर आधारित एक कहानी लिखी, जिसे बाद में सुधीर मिश्र, रंजीत कपूर और सतीश कौशिक ने विकसित किया। नसीरुद्दीन शाह के अलावा फिल्म में दूसरा कोई परिचित कलाकार नहीं था। सभी नए थे, लेकिन सभी के अंदर कुछ कर गुजरने का जोश और जज्बा था। जय अर्जुन सिंह ने फिल्म के दृश्यों के विवरणों और संबंधित जानकारियों से रुचि बढ़ा दी है।

इस फिल्म की कहानी 1 अप्रैल, 1981 को फिल्म रायटर्स एसोसिएशन में रजिस्टर कराई गई थी। कुंदन ने पहले से नहीं सोच रखा था कि अप्रैल फूल के दिन ही फिल्म की कहानी रजिस्टर कराएंगे, लेकिन ऐसे संयोग ही रोचकता बढ़ाते हैं। फिल्म के मुख्य किरदारों के नाम विनोद चोपड़ा और सुधीर मिश्र के नाम पर यूं ही रखे गए थे, जो बाद में बदले नहीं जा सके और हां इस फिल्म में अनुपम खेर ने डिस्को किलर की भूमिका निभाई थी, लेकिन उनका पूरा सीन ही फिल्म की लंबाई कम करने के लिए काट दिया गया। यह सारांश के आने के पहले की घटना है। ऐसे अनेक रोचक किस्से और घटनाएं इस फिल्म के प्रभाव को और बढ़ाते हैं।

डायरेक्टर डायरी-सत्‍यजित भटकल



सत्यजित भटकल... जोकोमनके निर्देशक। 'जोकोमन' 22 अप्रैल को रिलीज हो रही है।रिलीज के पहले वे अपनी डायरी लिख रहे हैं। जोकोमनउनकी पहली फीचर फिल्म है। इसके पहले उन्होंने चले चलोनाम से लगानकी मेकिंग पर फिल्म बनाई थी। उन्होंने लगानकी मेकिंग पर द स्पिरिट ऑफ लगानपुस्तक लिखी थी। satyabhatkal@gmail.com

शुक्रवार - 8 अप्रैल

8am

अनिद्रा से जागा... क्या सचमुच ऐसी कोई नींद होती है?

शाम में परिवार और फिल्म के कलाकारों एवं तकनीशियनों के लिए जोकोमनकी स्क्रीनिंग है। असामान्य समूह है। मेरी मौसी, काका, चचेरे-ममेरे-फुफेरे भाई-बहन और फिल्म बिरादरी... जिनके बारे में... बहरहाल! फिल्म बनाना अलग काम है... मैं फिल्म निर्देशित कर रहा हूंकहने-सुनने में एक उत्साह रहता है, लेकिन अपनी फिल्म के लिए मूल्यांकित होना... मैं भयभीत हूं। भयभीत होने पर जो करता हूं, वही कर रहा हूं। स्वाति पर चिल्लाता हूं... सभी घर से दुखी होकर निकले हैं... नम आंखों से चुप... वे समझ रहे हैं - बेचारा... इसने फिल्म बनाई है।

अब मैं ठीक हूं और अकेला

2pm

प्रचार संबंधी कार्यक्रमों के मौके पर पहनने के लिए कपड़े खरीदने निकलता हूं। सच का सामना होता है... स्लिम डिजायन के कपड़ों में अब नहीं अट पाता। हर खरीदारी के समय लगता है कि मुझे नए कपड़ों की जरूरत नहीं है। मुझे नया शरीर चाहिए। आखिर वैसे कपड़े खरीदता हूं, जो बैठने पर खींचे हुए न लगे। दुकानदार यह देख कर हैरान है कि हर कमीज पहनने के बाद मैं बैठ कर देख रहा हूं कि वह खींच तो नहीं रहा... उस पर लकीरें तो नहीं बन रहीं... झेंप होती है, लेकिन क्या कर सकता हूं... मैं ऐसा ही हूं।

5pm

एडलैब जा रहा हूं, अब इसे रिलाएंस मीडिया वक्र्स कहते हैं। मुझे गोरेगांव जाना है। मुंबई की ट्रैफिक में डेढ़ घंटे लगेंगे। गोरेगांव में स्क्रीनिंग रखने का पछतावा हो रहा है... मेरे परिवार के अधिकांश सदस्यों के लिए वह अलग शहर है... लेकिन हर पछतावे की तरह अब देर हो चुकी है!

6.30pm

फिल्म का डिजिटल प्रिंट देखता हूं। शानदार है... टेक्नोलॉजी जिंदाबाद

7pm

अब स्क्रीनिंग शुरू होनी चाहिए, लेकिन अभी तो दर्शकों का आना शुरू हुआ है। मेरे मामा-मामी पहले आने वालों में हैं। मैं घिघियाता हूं। साफ दिख रहा है कि एक घंटे के पहले फिल्म शुरू नहीं हो पाएगी... हमेशा की तरह समय के पाबंदों को सजा मिलेगी। मैं चाय-पानी चालू करवा देता हूं। फिल्म शुरू नहीं हुई तो क्या पार्टी अभी बाकी है।

7.­­45pm

प्रोजेक्टर चालू हो गया। हॉल भरा हुआ है। सभी फिल्म देख रहे हैं। मेरी नजर पर्दे पर नहीं है। मैं दर्शकों को देख रहा हूं... ठीक चल रहा है।

9­­.45pm

आखिरी क्रेडिट चलने के बाद हॉल में रोशनी हो जाती है। एक बच्चा उठ खड़ा हुआ है। वह टीनू आनंद का पोता है, ‘मां, मैं यह फिल्म कल भी देखूंगा।कलाकार और तकनीशियन खुश हो जाते हैं। ईश्वर टीनू आनंद पर कृपा करें। ईश्वर उनके पोते पर खास कृपा करें। एक बदमाश सोच... क्या पूरे भारत के सिनेमाघरों में हम ऐसे बच्चों को बिठा दें!

10.30pm

परिवार के सदस्य रुक गए हैं। फिल्म के सदस्य चले गए हैं। आखिरी व्यक्ति को बाय किया है। सब ने मुझ से कहा कि उन्हें फिल्म अच्छी लगी है। कुछ लोग तो दो घंटे की यात्रा कर यहां आए... अब एक घंटा लौटने में लगेगा... सोच रहा हूं... क्या उनके प्यार जताने का यह एक तरीका है...