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Monday, February 28, 2011

गाली तो होगी पर बोली के अंदाज में-सनी देओल

काशी की तिकड़ी फिल्म का आधार हो तो भला गालियों की काशिका का अंदाज कैसे जुदा हो सकता है। लेखक डॉ. काशीनाथ, चरित्र व पटकथा काशी और फिल्मांकन स्थल भी काशी। ऐसे में भले ही कथा का आधार उपन्यास बनारस का बिंदासपन समेटे हो लेकिन आम दर्शकों के लिए पर्दे पर कहानी का रंग ढंग कैसा होगा। कुछ ऐसे ही सवाल रविवार को मोहल्ला अस्सी फिल्म की यूनिट के सामने थे। फिल्मों में गाली-गुस्सा और मुक्का के लिए मशहूर अभिनेता सन्नी देओल ने पर्दा हटाया। बोले-गालियां इमोशन के हिसाब से होती हैं। इसमें भी है लेकिन गाली की तरह नहीं, बोली की तरह। आठ-दस साल में सिनेमा बदल गया है। सफलता के लिए जरूरी नहीं कि मुक्का या वल्गेरिटी हो। फिल्म यूनिट होटल रमादा में पत्रकारों से रूबरू थी। मुद्दे कि कमान निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने संभाली। कहा कि श्लील व अश्लील परसेप्शन है। रही बात गालियों की तो लोगों की उम्मीद से कम होंगी। हवाला दिया-फिल्म की स्कि्रप्ट बेटी पढ़ना चाहती थी। मैंने उसे रोक दिया। कहा कि तुम फिल्म देखना। लिहाजा फिल्म उपन्यास का इडिटेड वर्जन होगी। इसे सभी लोग घर-परिवार के साथ बैठकर देख सकेंगे। हां, उपन्यास की आत्मा के साथ अन्याय नहीं होगा। रही बात व्यावसायिक और गैर व्यावसायिक की तो फिल्म बना रहा हूं।इसका दर्जा फिल्म आने के बाद बाजार व दर्शक तय करेंगे। सन्नी ने इसका समर्थन किया। बोले- फिल्म के कामर्शियल या नान कामर्शियल होने का सवाल नहीं है। जरूरी है कि कौन सी फिल्म दर्शकों का इंटरटेन कर बांधे रखती है। एक्शन हीरो की इमेज से नए रूप पर सवाल उठा तो सन्नी मुस्कुरा उठे। बोले-लीक पर चलने पर सवाल उठते थे, हटने पर भी सवाल हैं। स्पष्ट किया-पापा के दौर में अच्छे विषयों की भरमार थी, लोगों को मौका मिलता था। मैं भी इसी मौके की तलाश में था, कहानी और कैरेक्टर पसंद आते ही दिल ने कहा और मैंने मान लिया। कैरेक्टर को लेकर कुछ डर था जो दो-तीन मीटिंग में दूर हो गया। वैसे भी जब तक डरो नहीं तब तक मजा भी नहीं आता। दामिनी का हवाला देते हुए कहा कि नसीर साहब के लिए कहानी लिखी गई थी, बाद में लोगों ने पसंद की। ऐसे ही मोहल्ला अस्सी भी सभी को पसंद आएगी। फिल्म के आधार यानी काशीनाथ के उपन्यास के चयन की बात पर डॉ. चंद्रप्रकाश बोले-अतीतजीवी होने का आरोप था। वर्ष 1947 तक आ गया था। तलाश थी वर्तमान की। लेकिन काशी का अस्सी 1980 में लिखा गया इतिहास था, जो आज भी वर्तमान है। हालांकि उपन्यास व फिल्म अलग-अलग विधाएं हैं। इसी के आधार पर इसमें कुछ फेरबदल किए गए हैं। रही बात कथाकार की सहमति की तो इसमें पूरा सहयोग मिला। डा. काशीनाथ ने पूरी स्वतंत्रता दी और कहा मैं तो पहला प्रिंट देखूंगा। फिल्म लगने पर सबकुछ स्पष्ट हो जाएगा। फिल्म में कबीर का एक भजन भी शामिल किया गया है। फिल्म में कन्नी गुरु की भूमिका निभा रहे रवि किशन हर हर महादेव के उद्घोष के साथ पत्रकारों से रूबरू हुए। कहा कि बनारस में बनारस पर फिल्मांकन अलग अनुभव है। इसका रूप लोगों को भाएगा। अभिनेत्री साक्षी तंवर से सवाल था फिल्म व उनकी वास्तविक उम्र में दूरी को लेकर। उन्होंने स्पष्ट किया कि-रोल के आगे उम्र का कोई हिसाब किताब नहीं होता है। क्रास वर्ड इंटरटेनमेंट बैनर के तहत बन रही फिल्म में सन्नी धर्मनाथ पांडेय की मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। रवि किशन-कन्नी गुरु, सौरभ शुक्ला उपाध्याय, साक्षी तंवर- धर्मनाथ पांडेय की पत्नी सावित्री, मिथिलेश-गया सिंह, मुकेश तिवारी-राधेश्याम पांडेय की भूमिका में हैं। विनय तिवारी निर्माता

Thursday, February 24, 2011

पहाड़ी नदी है भोजपुरी फिल्में

पहाड़ी नदी है भोजपुरी फिल्में-अजय ब्रह्मात्म


पिछले दिनों पटना में स्वर्णिम भोजपुरी का आयोजन किया गया। फाउंडेशन फोर मीडियाकल्चर ऐंड सिनेमा अवेयरनेस की तरफ से आयोजित स्वर्णिम भोजपुरी में भोजपुरी सिनेमा के अतीत और वर्तमान पर विशेष चर्चा हुई। दो दिनों के सत्र में भोजपुरी सिनेमा के इतिहासकारों, पत्रकारों, समीक्षकों के साथ निर्माता-निर्देशकों और सितारों ने भी हिस्सा लिया। इस आयोजन का यह असर रहा कि टीवी और प्रिंट मीडिया ने भोजपुरी सिनेमा को प्रमुखता से कवरेज दिया। कल तक पढ़े-लिखे तबके के लिए जो सिनेमा हाशिए पर था और जिसकी तरफ ध्यान देने की उसे जरूरत भी नहीं महसूस होती थी, उसके ड्राइंग रूम में टीवी और अखबारों के जरिए भोजपुरी सिनेमा पहुंच गया।

तीन दिनों के विमर्श और गहमागहमी में भोजपुरी सिनेमा पर मुख्य रूप से अश्लीलता और फूहड़ता का आरोप लगा। कहा गया कि फिल्मों के टाइटिल और गाने इतने गंदे होते हैं कि कोई भी परिवार के साथ इन फिल्मों को देखने नहीं जा सकता। फिल्म में द्विअर्थी संवाद होते हैं। हीरो-हीरोइनों के लटकों-झटकों में निर्लज्जता रहती है। इन आरोपों में सच्चाई है, लेकिन भोजपुरी सिनेमा सिर्फ अश्लीलता और फूहड़ता तक सीमित नहीं है। भोजपुरी में भी साफ-सुथरी और पारिवारिक फिल्में बनती हैं। समस्या है कि उन फिल्मों को दर्शक देखने भी नहीं जाते। भोजपुरी सिनेमा पर बात करते समय हमें यह ख्याल रखना चाहिए कि इस फिल्म का दर्शक कौन है? हम अपनी आलोचना और विमर्श में स्थिति-परिस्थिति पर गौर किए बगैर अपनी अपेक्षाएं खोजने लगते हैं। हम आदर्श की कल्पना करते हैं और फिर उसी की मांग करने लगते हैं। आलोचकों का एक तबका इस बात से परेशान है कि पढ़ा-लिखा दर्शक भोजपुरी फिल्में नहीं देखना चाहता। मेरा सवाल है कि हम उन दर्शकों की बातें क्यों नहीं कर रहे हैं, जो भोजपुरी फिल्में देख रहे हैं। उन्होंने भोजपुरी सिनेमा को यह रवानगी दी है। उन अनपढ़, गंवार, अशिक्षित और श्रमिक वर्ग के दर्शकों ने ही भोजपुरी सिनेमा को जिंदा रखा है। अभी का भोजपुरी सिनेमा किसी जंगल की तरह फैल रहा है। इसकी हरियाली से जाहिर है कि भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री उर्वर है। जो जमीन उर्वर हो, वहां मौसम और प्रकृति के अनुसार दूसरे पेड़-पौधे भी उगाए जा सकते हैं।

आज भोजपुरी सिनेमा के दर्शक सिर्फ बिहार और यूपी तक ही सीमित नहीं हैं। पिछले दस-पंद्रह सालों में बिहार और यूपी से रोजगार की तलाश में लाखों श्रमिकों का मुंबई, दिल्ली और पंजाब की तरफ पलायन हुआ है। ये श्रमिक अपने काम से फ्री होने के बाद भोजपुरी सिनेमा के दर्शक हो जाते हैं। इनकी जिंदगी पर कभी विस्तार से शोध हो तो पता चलेगा कि वे किस हाल में महानगरों में रहते हैं। वहां अपनी थकान दूर करने के लिए मनोरंजन के नाम पर उनके पास भोजपुरी फिल्में ही होती हैं। चूंकि पिछले सालों में सामूहिकता का ह्रास हुआ है, इसलिए अब भजन-कीर्तन और बिरहा आदि के आयोजन भी नहीं होते। उनके लिए भोजपुरी सिनेमा मनोरंजन का वरदान है। वे सस्ते में ऐसे सिनेमा से अपना मनोरंजन करते हैं। उन्हें फिल्मों के अशिष्ट टाइटिल आकृष्ट करते हैं और फिल्म के अश्लील गानों में हीरो-हीरोइनों की उत्तेजक मुद्राओं से उनकी अतृप्त इच्छाओं का विरेचन होता है। मेरे ख्याल में भोजपुरी फिल्में अप्रत्यक्ष रूप से उनकी कामेच्छा का शमन करती हैं। अगर यह नहीं हो, तो बिल्डिंगों में वॉचमैन के रूप में कार्य कर रहे अतृप्त और असंतुष्ट जन जबरदस्ती पर उतर आएं। समाजशास्त्रियों को इस प्रकार का अध्ययन करना चाहिए। मुझे लगता है कि वर्तमान भेजपुरी सिनेमा जाने-अनजाने अनेक दायित्वों को निभा रहा है। भोजपुरी सिनेमा की गड़बडि़यां समय के साथ ठीक होंगी। भोजपुरी फिल्में किसी पहाड़ी नदी की तरह कभी वेग तो कभी मंथर गति से बहती रही हैं। अभी यह इंडस्ट्री वेगवान है, इसलिए मि˜ी-पत्थर सब समेटे बह रही है।

-अजय ब्रह्मात्मज

हिंदी फिल्मों से गायब होते संवाद

-अजय ब्रह्मात्मज


हिंदी फिल्म में संवादों की बड़ी भूमिका होती है। इसमें संवादों के जरिये ही चरित्र और दृश्यों का प्रभाव बढ़ाया जाता है। चरित्र के बोले संवादों के माध्यम से हम उनके मनोभाव को समझ पाते हैं। विदेशी फिल्मों से अलग भारतीय फिल्मों, खास कर हिंदी फिल्मों में संवाद लेखक होते हैं। फिल्म देखते समय आप ने गौर किया होगा कि संवाद का क्रेडिट भी आता है। हिंदी फिल्मों की तमाम विचित्रताओं में से एक संवाद भी है। हिंदी फिल्मों की शुरुआत से ही कथा-पटकथा के बाद संवाद लेखकों की जरूरत महसूस हुई। शब्दों का धनी ऐसा लेखक, जो सामान्य बातों को भी नाटकीय अंदाज में पेश कर सके। कहते हैं कि सामान्य तरीके से कही बातों का दर्शकों पर असर नहीं होता।

इधर की फिल्मों पर गौर करें तो युवा निर्देशक फिल्मों को नेचुरल रंग देने और उसे जिंदगी के करीब लाने की नई जिद में हिंदी फिल्मों की इस विशेषता से मुंह मोड़ रहे हैं। फिल्मों में आमफहम भाषा का चलन बढ़ा है। इस भाषा में अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल बढ़ा है। पहले संवादों में शब्दों से रूपक गढ़े जाते थे। बिंब तैयार किए जाते थे। लेखकों की कल्पनाशीलता इन संवादों में अर्थ और भाव की गहराई भरते थे। गीतों की तरह ये संवाद भी मार्मिक और मारक होते थे। ऐसे संवाद हमें याद रह जाते थे। अगर हम याद करने की कोशिश करें तो भी पिछले दस सालों में बोले गए संवाद के उल्लेखनीय अंश नहीं चुन सकते। लगता है फिल्मों से संवाद गायब हो रहे हैं और संवाद अदायगी समाप्त हो रही है।

पिछले दिनों एक गंभीर निर्देशक से बात हो रही थी। वे एक साहित्यिक कृति पर फिल्म बना रहे हैं। उन्होंने हिंदी के एक लोकप्रिय उपन्यास को चुना है। वे अपने अनुभव बता रहे थे कि आज के अभिनेताओं को संवाद याद करने और उन्हें अक्षरश: दोहराने में दिक्कत होती है। इधर के अभिनेताओं की स्मृति कमजोर हो गई है। चार-पांच पंक्तियों से लंबे संवाद हों, तो उन्हें याद करना मुश्किल हो जाता है। गए वे दिन जब कुछ कलाकार चार-पांच सौ शब्दों के संवाद कंठस्थ कर लेते थे और उसे आवश्यक आरोह-अवरोह के साथ बोल कर दर्शकों की भावना को उद्वेलित करते थे। अब संवाद इतने हल्के, साधारण और चालू होते हैं कि हम थिएटर से निकलते ही सब भूल जाते हैं। अगर कभी संवाद या कथित संवाद मिल भी गए तो कलाकारों की संवाद अदायगी उन्हें बेअसर कर देती है। वे उसमें आवश्यक जोश या भाव नहीं भर पाते। पता चलता है कि पूरा संवाद सपाट तरीके से अभिनेता ने बोल दिया।

शोले की खासियतों में एक खासियत संवाद अदायगी थी। क्या गब्बर सिंह को हम उसके संवादों की वजह से याद नहीं रखे हुए हैं? अगर गब्बर सिंह भी अन्य डाकुओं की तरह बोलता, तो वह चंबल के बीहड़ में खो जाता। उसके संवाद ही उसे बीहड़ से निकाल कर आम दर्शकों की जिंदगी में ले आए। शोले के संवादों की एलपी निकली थी। छोटे शहरों में पान की दुकानों और रेस्तरां में ग्राहक जुटाने के काम आते थे शोले के संवाद..। अब ये बातें सिर्फ यादों में रह गई। आज के स्टार तो फिल्म में आमने-सामने आने तक से डरते हैं। उनके दबाव में निर्देशक दृश्य और संवादों की ऐसी बंदरबांट करता है कि दृश्य का मर्म ही मर जाता है। पिछले सालों में रिलीज हुई कई फिल्में सिर्फ स्टारों की भिड़ंत न होने की वजह से कमजोर हो गई।

अभी ज्यादातर अभिनेता अपने दृश्यों के भाव समझ कर अपनी भाषा में दो-चार पंक्तियां बोल देते हैं। कुछ स्टारों के तो होंठ ही नहीं खुलते। वास्तव में वे सावधानी बरतते हैं, क्योंकि अगर मुंह खोलकर संवाद बोले गए और थोड़ी भी गलती हुई, तो वह पकड़ में आएगी। लिपसिंक बिठाना मुश्किल हो जाएगा। एक पॉपुलर स्टार तो संवाद याद करने में इतने कमजोर हैं कि उनकी दो पंक्तियों के संवाद भी बोर्ड पर लिख कर सामने में ऐसे टांगे जाते हैं कि वे उन्हें पढ़ कर बोलते समय भी स्वाभाविक दिखें।

क्या फिर से हिंदी फिल्मों में संवाद लौटेंगे? क्या हम फिर से फिल्मों की डायलॉग बाजी का आनंद उठा पाएंगे? मुझे कम उम्मीद है..।


Sunday, February 20, 2011

गालियों की बाढ़-सुनील दीपक

सच्चाई दिखाने के नाम पर अचानक लगता है कि हिन्दी फ़िल्मों में गालियों की बाढ़ आ रही है.

भारतीय लोकजीवन और लोकगीतों में प्रेम और सेक्स की बातों को स्पष्ट कहने की क्षमता बहुत पहले से थी. गाँवों में हुए कुछ विवाहों में औरतों को गालियाँ में और फ़िर दुल्हे तथा उसके मित्रों के साथ होने वाले हँसीमज़ाक में, शर्म की जगह नहीं होती थी. लेकिन साहित्य में इस तरह की बात नहीं होती थी. पिछले दशकों में पहले भारत में अंग्रेज़ी में लिखने वालों के लेखन में, और अब कुछ सालों में हिन्दी में लिखने वालों के लेखन में सच्चाई के नाम पर वह शब्द जगह पाने लगे हैं जिन्हें पहले आप सड़क पर या मित्रों में ही सुनते थे.

यह आलेख इसी बदलते वातावरण के बारे में है. चूँकि बात गालियों की हो रही है, इसलिए इस आलेख में कुछ अभद्र शब्दों का प्रयोग भी किया गया है, जिनसे अगर आप को बुरा लगे तो मैं उसके लिए क्षमा माँगता हूँ. अगर आप को अभद्र भाषा बुरी लगती है तो आप इस आलेख को आगे न ही पढ़ें तो बेहतर है.

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"नो वन किल्लड जेसिका" (No one killed Jessica) फ़िल्म के प्रारम्भ में जब टीवी पत्रकार मीरा हवाई ज़हाज़ में साथ बैठे कुछ बेवकूफ़ी की बात करने वाले सज्जन को चुप कराने के लिए ज़ोर से कहती है, "वहाँ होते तो गाँड फ़ट कर हाथ में आ जाती", तो उन सज्जन के साथ साथ, ज़हाज़ में आगे पीछे बैठे लोगों के मुँह खुले के खुले रह जाते हैं.

ऐसा तो नहीं है कि उन सज्जन ने या ज़हाज़ में बैठे अन्य लोगों ने "गाँड" शब्द पहले नहीं सुना होगा, तो फ़िर शरीर के आम अंग की बात करने वाले इस शब्द के प्रयोग पर इतना अचरज क्यों?

अंग्रेज़ी उपन्यासों या फ़िल्मों में तो इस तरह के शब्द पिछले पचास साठ वर्षों में आम उपयोग किये जाते हैं. हिन्दी फ़िल्मों या साहित्य में कुछ समय पहले तक इनका प्रयोग शायद केवल फुटपाथ पर बिकने वाली किताबों में ही मिल सकता था. 1970 के आसपास, दिल्ली के कुछ युवा साहित्यकारों ने मिल कर एक पतली सी पत्रिका निकाली थी जिसमें सेक्स के विषय पर कविता, कहानियाँ थीं और शायद उसके पीछे, हिन्दी साहित्य में इन विषयों पर बनी चुप्पी से विद्रोह करना था. क्या नाम था उस पत्रिका का, यह याद नहीं, बस उसका पीले रंग का कागज़ याद है. मेरे विचार में उसमें सब लेखक पुरुष थे, और हालाँकि सेक्स क्रिया के वर्णन उस समय के हिसाब से काफ़ी स्पष्ट थे, पर फ़िर भी उसमें लिंग, यौनी जैसे शब्दों तक ही बात रुक गयी थी, सड़क पर बोले जाने वाले आम शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया था.

भारत में अंग्रेज़ी लिखने बोलने वाले वर्ग ने पिछले बीस पच्चीस सालों में सेक्स से जुड़ी बातों और शब्दों की चुप्पी को बहुत समय से तोड़ दिया था. पुरुष लेखक ही नहीं शोभा डे जैसी लेखिकाओं ने भी एक बार लक्ष्मणरेखा को पार किया तो इनकी बाढ़ सी आ गयी. फ़िल्मों में अंगेज़ी की गालियाँ कभी कभार सुनाई देने लगीं. यानि फक (fuck), एसहोल (asshole), कंट (cunt) और प्रिक (prick) जैसे शब्द कहना अश्लीलता या अभद्रता नहीं थी, यह तो जीवन की सच्चाईयों को स्पष्ट भाषा में कहने का साहस था. पर यह साहस यह भी कहता था कि यह शब्द अंग्रेज़ी में ही कहे जा सकते हैं, हिन्दी में इन्हें कहना तब भी अभद्रता ही लगती थी. कुछ समय पहले सुकेतु मेहता की मेक्सिमम सिटी (Maximum city) में बम्बई में आये देश के विभिन्न भागों से आये लोगों की तरह तरह से गालियाँ देने पर पूरा अध्याय था.

1994 की शेखर कपूर की फ़िल्म बैंडिट क्वीन (Bandit Queen) में पहली बार माँ बहन की गालियाँ थीं, जिनसे फ़िल्म देखने वाले लोग कुछ हैरान से रह गये थे. गालियाँ ही नहीं, बलात्कार और यौनता, दोनो विषयों पर फ़िल्म में वह बातें कहने का साहस था, जिनको इतना स्पष्ट पहले कभी नहीं कहा गया था.

Still from Bandit Queen, by Shekhar Kapoor, 1994

अगर बैंडीट क्वीन में बात चम्बल के गाँवों की थी तो देव बेनेगल की 1999 की फ़िल्म, "स्पलिट वाईड ओपन" (Split wide open) का विषय था बम्बई में पानी की कमी के साथ झोपड़पट्टी के रहने वालों के जीवन, उन्हें पानी बेच कर पैसा कमाने वाले गिरोह. कहानी के दो हिस्से थे, पानी बेचने वाले गिरोह के एक युवक की एक नाबालिग लड़की की तलाश जिसे वह अपनी बहन मानता था और टीवी पर जीवन के उन पहलुँओं पर जीवन कहानियाँ सुनाना जो पहले पर्दे के पीछे छुपी रहती थीं. शहर की गालियों की भाषा, नाबालिग बच्चियों से सेक्स की भाषा, और फ़िल्म का संदेश कि पुरुष और औरत के बीच केवल बेचने खरीदने का धँधा होता है चाहे वह विवाह के नाम से हो या रँडीबाजी से, कठोर और मन को धक्का देने वाले लगे थे.

Still from Split wide open, by Dev Benegal, 1999

"बैंडिट क्वीन" या "स्पलिट वाईड ओपन" में हिन्दी फ़िल्मों की रूमानी तवायफ़ नहीं थी जो "साधना" और "राम तेरी गँगा मैली" से हो कर "चमेली" तक आती थी. मेरे विचार में सिनेमा, साहित्य का काम मनोरँजन करना है तो उतना ही आवश्यक, जीवन के सत्य को दिखाना भी है, और यह सच है कि यौनिक हिँसा भी हमारे जीवन का हिस्सा है.

इन फ़िल्मों को कई अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले थे, लेकिन उस समय इसकी भाषा पर आम अखबारों या पत्रिकाओं में कुछ खास बहस हुई हो, यह मुझे याद नहीं, शायद इसलिए कि "बैंडिट क्वीन" और "स्पलिट वाईड ओपन" को अंग्रेज़ी फ़िल्में या फ़िर आर्ट फ़िल्में समझा गया था और हिन्दी सिनेमा देखने वालों को इनके बारे में अधिक मालूम नहीं था.

खैर "अभद्र शब्द" पिछले दस सालों में हिन्दी साहित्य और फ़िल्मों में जगह पाने लगे हैं. "हँस" जैसी साहित्यक पत्रिका में कभी कभार, कहानी में गालियाँ दिख जाती हैं. यह सच भी है कि आप की कहानी में दलित युवक को गुँडे मार रहे हों, मार कर उस पर मूत रहे हों, तो उस समय उसे "हरामी, कुत्ते, मैं तुम्हारी बहन और माँ की इज़्ज़त लूट लूँगा" नहीं कहेंगे, माँ बहन की गालियाँ ही देंगे, तो लेखक क्यों अपनी कहानी को सच्चे शब्दों में नहीं कहे?

पिछले दिनों जयपुर में हुए साहित्य फैस्टीवल में अंग्रेज़ी में लिखने वाले भारतीय मूल के लेखक जीत थायिल (Jeet Thayil) ने अपनी नयी अंगरेज़ी की किताब के कुछ अंश पढ़े.आप चाहें तो इसे वीडियो में देख सकते हैं. इस अंश में वह हिन्दी के दो शब्दों, "चूत" और "चूतिया", का प्रयोग इतनी बार करते हैं कि गिनती करना कठिन है. उनका यह उपन्यास बम्बई में अफ़ीमचियों और नशेबाजों के बारे में है. पर अगर वह संभ्रांत सभा में पढ़े लिखे लोगों के सामने बैठ कर अपने उपन्यास के इस हिस्से को पढ़ते हैं, तो क्यों? मेरे विचार में इसका ध्येय यह भी है कि समाज में इन शब्दों के पीछे छुपे विषयों पर दिखावे और झूठ का पर्दा पड़ा है, और यह लेखक का विद्रोह है कि वह इस दिखावे और झूठ में साझीदारी नहीं करना चाहता.

पर एक अन्य वजह भी हो सकती है, अचानक इस गालियों की बाढ़ की. चाहे ऊपर से कितना बने और कितना कहें कि यह अभद्र है, यह नहीं होना चाहिये, पर इस बात से कौन इन्कार कर सकता है कि सेक्स बिकता है. शोभा डे जैसे लेखकों के लेखन में कितनी कला है और कितना बिकने वाला सेक्स, इसकी बहस से क्या फायदा?

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हिन्दी फ़िल्मों में गालियों के आने से भाषा अनुवाद के प्रश्न भी खड़े हो रहे हैं. कुछ मास पहले मैं फ़िल्म निर्देशक ओनीर की नयी फ़िल्म, "आई एम" (I am) के सबटाईटल का इतालवी अनुवाद कर रहा था. फिल्म में एक हिस्सा है जिसमें एक पुलिसवाला एक समलैंगिक युगल को पकड़ कर उन्हें बहुत गालियाँ देता है. इसका इतालवी अनुवाद करते समय मैं यह सोच रहा था कि माँ बहन की गालियों जैसे शब्दों का किस तरह अनुवाद करना चाहिये? शाब्दिक अनुवाद करुँ या उन शब्दों का प्रयोग करूँ जो इस तरह के मौके पर इतालवी लोग बोलते हैं?

हिन्दी फ़िल्मों के अंग्रेज़ी के सबटाईटल में अक्सर माँ बहन की गालियों का शाब्दिक अनुवाद किया जाता है, पर मुझे लगता है कि वह गलत है, क्योंकि भारत में भी अंग्रेज़ी में गाली देने वाले, अंग्रेज़ तरीके की गालियाँ ही देते हैं, जो हमने अमरीकी फ़िल्मों और किताबों से सीखी हैं, वह हिन्दी गालियों के अंग्रेज़ी अनुवाद नहीं हैं.

अभी हिन्दी समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में इतना साहस नहीं कि वह इस तरह के शब्दों का प्रयोग कर सकें, पर इसके लिए उन्हें अपने आप को सेंसर करना पड़ेगा. कल बर्लिन फ़िल्म फेस्टीवल का प्रारम्भ हुआ. इस वर्ष फेस्टिवल में एक कलकत्ता के फ़िल्मकार की फ़िल्म भी है जिसका नाम है "गाँडू".

फेस्टिवल की निर्देशिका ने एक साक्षात्कार में कहा है कि भारत से आने वाली फ़िल्मों में यह उनकी नज़र में सबसे साहसी और विचारोत्तेजक फ़िल्म है. अगर इस फ़िल्म को पुरस्कार मिलेगा तो हिन्दी के समाचार पत्र और पत्रिकाएँ और टीवी चैनल इस समाचार को किन शब्दों में देगे? फ़िल्म के नाम पर बीप करेंगे? फ़िल्म के विषय और कहानी को कैसे बतायेंगे? और वह फ़िल्म का भारत में सिनेमा हाल पर दिखायी जायेगी, उसके विज्ञापन अखबारों में छपेंगे तो लोग क्या कहेंगे?

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तो आप का क्या विचार है गालियों के इस खुलेपन के बारे में? क्या यह अच्छी बात है? शब्द तो वही पुराने हैं पर साहित्य में, फ़िल्मों में उन्हें इस तरह दिखाना क्या सही है?

एक तरफ़ से मुझे लगता है कि यौनता हमारे जीवन का अभिन्न अंग है लेकिन सब पर्दों के पीछे छुपा हुआ है. यौनता से जुड़ी किसी बात पर खुल कर बात करना कठिन है. इसलिए मुझे लगता है कि अगर इन शब्दों से यौनता के विषय पर बात करना सरल हो जायेगा, यह विषय पर्दे से बाहर आ जायेगा, तो यह अच्छी बात ही है. यह शब्द हमारे जीवन का अंग हैं, गुस्से में गाली देना या वैसे ही आदत से गाली देना, दोनो जीवन का हिस्सा ही हैं और जीवन के यथार्थ को साहित्य, कला और फ़िल्म में दिखाना आवश्यक है.

दूसरी ओर यह भी लगता है कि जीवन में इतनी हिँसा है, यह शब्द, यह गालियाँ भी उसी हिँसा का हिस्सा बन जायेंगी, इनसे साहित्य या फ़िल्म में यथार्थ नहीं आयेगा, बल्कि यथार्थ उसी हिँसा में दब जायेगा.

शायद यह सब बहस इसीलिए है कि अभी हिन्दी साहित्य और फ़िल्मों में इन शब्दों के सामने आने का नयापन है. साठ सालों से अंग्रेज़ी या इतालवी या अन्य भाषाओं के साहित्य और फ़िल्मों से यह नहीं हुआ कि बिना इन शब्दों के साहित्य और फ़िल्म बनना बँद हो गया हो, हर लेखक, निर्देशक अपनी संवेदना और विषय के स्वरूप ही चुनता है कि किन शब्दों में, किस पढ़ने वाले या देखने वाले के लिए अपनी रचना रचे.

Saturday, February 19, 2011

फिल्‍म समीक्षा : 7 खून माफ

7 खून माफ: नारी मनोविज्ञान का चित्रण-अजय ब्रह्मात्‍मज

विशाल भारद्घाज की हर फिल्म में एक अंधेरा रहता है, यह अंधेरा कभी मन को तो कभी समाज का तो कभी रिश्तों का होता है। 7 खून माफ में उसके मन के स्याहकोतों में दबी ख्वाहिशें और प्रतिकार है। वह अपने हर पति में संपूर्णता चाहती है। प्रेम, समर्पण और बराबरी का भाव चाहती है। वह नहीं मिलता तो अपने बचपन की आदत के मुताबिक वह राह नहीं बदलती, कुत्ते का भेजा उड़ा देती है। वह एक-एक कर अपने पतियों से निजात पाती है। फिल्म के आखिरी दृश्यों में वह अरूण से कहती है कि हर बीवी अपनी शादीशुदा जिंदगी में कभी-न-कभी आपने शौहर से छुटकारा चाहती है। विशाल भारद्घाज की 7 खून माफ थोड़े अलग तरीके से उस औरत की कहानी कह जाती है, जो पुरूष प्रधान समाज में वंचनाओं की शिकार है।

सुजैन एक सामान्य लड़की है। सबसे पहले उसकी शादी मेजर एडविन से होती है। लंग्ड़ा और नपुंसक एडविन सुजैन पर शक करता है। उसकी स्वछंदता पर पाबंदी लगाते हुए सख्त स्वर में कहता है कि तितली बनन े की कोशिश मत करो। सुजैन उसकी हत्या कर देती है, इसी प्रकार जिम्मी, मोहम्मद, कीमत, निकोलाई और मधूसूदन एक-एक कर उसकी जिंदगी में आते हैं। इन सभी के दुर्गुणों और ज्यादती से तंग आकर सुजैन उनकी हत्याएं करती जाती है। उसे मनचाहा पुरूष नहीं मिलता। उसकी जिंदगी में अरूण भी है। अरूण उससे किसी किशोर की तरह प्रेम करता है, लेकिन जब रूस से पढ़कर लौटने के बाद वह सुजैन से मिलता है और सुजैन अपने प्रेम का इजहार करती है तो वह बिदक जाता है। चोट खाई सुजैन आत्महत्या के प्रयास में असफल होती है। बाद में वह अपना जीवन यीशु को समर्पित कर सुजैन की हत्या कर देती है।

ऐसा लगता है कि विशाल भारद्घाज 7 खून माफ में कोई मर्डर मिस्ट्री या सीरियल कीलिंग की कहानी कहेंगे, लेकिन यह फिल्म सुजैन के मनोभाव और मनोदशा के साथ नारी मनोविज्ञान का अच्छा चित्रण करती है। फिल्म में गति और रोमांच बना रहता है। यह लेखक-निर्देशक विशाल भारद्घाज की खूबी है कि हम सुजैन से नफरत नहीं होती। हम उसके साथ जीने लगते हैं। हमें उसके जीवन में आया हर पुरूष बीमार, लालची, कामपिपासु, धोखेबाज और अपूर्ण नजर आता है। विशाल ने सुजैन की जिंदगी में आए पुरूषों के माध्यम से एक खास काल की भी कथा कहते हैं। बहुत खूबसूरती से टीवी, समाचार पत्र और रेडियो के जरिए देश की बड़ी खबरों के कवरेज से वे सुजैन की जिंदगी की घटनाओं का समय निर्धारण भी करते जाते हैं। फिल्म का रंग और शिल्प विशाल की पहली फिल्मों से अधिक अलग नहीं है। वैसे भी विशाल की फिल्मों में तकनीक का चमत्कार नहीं होता. उनकी कहानियां गुंफित रहती हैं, जो आगे-पीछे के क्रम में नहीं आतीं। उनकी हर फिल्म में अनेक किरदार होते हैं, जो मिलकर कहानी पूरी करते हैं। इस फिल्म में प्रियंका चोपड़ा समेत अनेक अभिनेता प्रमुख भूमिकाओं में हैं। नील नितिन मुकेश, इरफान, अनु कपूर और नसीरूद्दीन शाह ने अपने किरदारों में जान भर दी है। इन चारों ने सुजैन के साथ और भिडं़त के दृश्यों में प्रभाव छोड़ा है। फिल्म के सूत्रधार बने अरूण की भूमिका में विवान साधारण रहे हैं। उनकी आवाज ज्यादा असरदार है। अगर वही असर अभिनय में आ जाता तो यह फिल्म उनके लिए भी उल्लेखनीय हो जाती। फिल्म के केन्द्र में प्रियंका चोपड़ा हैं। उन्होंने सुजैन के व्यक्तित्व के दंश, द्घंद्घ और दुविधाओं को बहुत खूबसूरती और बारीक तरीके से अभिव्यक्त किया है। उन्हें निर्देशक का पूरा सहयोग मिला है। मनोगत और एकल दृश्यों में वह उभरी हैं। योग्य और अनुभवी अभिनेताओं के सामने वह ज्यादा निखरी नजर आती हैं।

विशाल भारद्घाज की 7 खून माफ मुख्य रूप से प्रियंका चोपड़ा के अभिनय के लिए याद रखी जाएगी। प्रियंका ने फिर से साबित किया है कि सधा निर्देशक उनके अभिनय को नया आयाम देता है। 7 खून माफ विशाल भारद्घाज के प्रिय लेखक रस्किन बांड भी एक दृश्य में दिखाई पड़ते हैं। यह फिल्म उनकी कहानी सुजैन ज सेवन हस्बैंड्स पर आधारित है।

साढे़ तीन स्टार


हिंदी फिल्मों से गायब होते संवाद

हिंदी फिल्मों से गायब होते संवाद-अजय ब्रह्मात्मज

हिंदी फिल्म में संवादों की बड़ी भूमिका होती है। इसमें संवादों के जरिये ही चरित्र और दृश्यों का प्रभाव बढ़ाया जाता है। चरित्र के बोले संवादों के माध्यम से हम उनके मनोभाव को समझ पाते हैं। विदेशी फिल्मों से अलग भारतीय फिल्मों, खास कर हिंदी फिल्मों में संवाद लेखक होते हैं। फिल्म देखते समय आप ने गौर किया होगा कि संवाद का क्रेडिट भी आता है। हिंदी फिल्मों की तमाम विचित्रताओं में से एक संवाद भी है। हिंदी फिल्मों की शुरुआत से ही कथा-पटकथा के बाद संवाद लेखकों की जरूरत महसूस हुई। शब्दों का धनी ऐसा लेखक, जो सामान्य बातों को भी नाटकीय अंदाज में पेश कर सके। कहते हैं कि सामान्य तरीके से कही बातों का दर्शकों पर असर नहीं होता।

इधर की फिल्मों पर गौर करें तो युवा निर्देशक फिल्मों को नेचुरल रंग देने और उसे जिंदगी के करीब लाने की नई जिद में हिंदी फिल्मों की इस विशेषता से मुंह मोड़ रहे हैं। फिल्मों में आमफहम भाषा का चलन बढ़ा है। इस भाषा में अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल बढ़ा है। पहले संवादों में शब्दों से रूपक गढ़े जाते थे। बिंब तैयार किए जाते थे। लेखकों की कल्पनाशीलता इन संवादों में अर्थ और भाव की गहराई भरते थे। गीतों की तरह ये संवाद भी मार्मिक और मारक होते थे। ऐसे संवाद हमें याद रह जाते थे। अगर हम याद करने की कोशिश करें तो भी पिछले दस सालों में बोले गए संवाद के उल्लेखनीय अंश नहीं चुन सकते। लगता है फिल्मों से संवाद गायब हो रहे हैं और संवाद अदायगी समाप्त हो रही है।

पिछले दिनों एक गंभीर निर्देशक से बात हो रही थी। वे एक साहित्यिक कृति पर फिल्म बना रहे हैं। उन्होंने हिंदी के एक लोकप्रिय उपन्यास को चुना है। वे अपने अनुभव बता रहे थे कि आज के अभिनेताओं को संवाद याद करने और उन्हें अक्षरश: दोहराने में दिक्कत होती है। इधर के अभिनेताओं की स्मृति कमजोर हो गई है। चार-पांच पंक्तियों से लंबे संवाद हों, तो उन्हें याद करना मुश्किल हो जाता है। गए वे दिन जब कुछ कलाकार चार-पांच सौ शब्दों के संवाद कंठस्थ कर लेते थे और उसे आवश्यक आरोह-अवरोह के साथ बोल कर दर्शकों की भावना को उद्वेलित करते थे। अब संवाद इतने हल्के, साधारण और चालू होते हैं कि हम थिएटर से निकलते ही सब भूल जाते हैं। अगर कभी संवाद या कथित संवाद मिल भी गए तो कलाकारों की संवाद अदायगी उन्हें बेअसर कर देती है। वे उसमें आवश्यक जोश या भाव नहीं भर पाते। पता चलता है कि पूरा संवाद सपाट तरीके से अभिनेता ने बोल दिया।

शोले की खासियतों में एक खासियत संवाद अदायगी थी। क्या गब्बर सिंह को हम उसके संवादों की वजह से याद नहीं रखे हुए हैं? अगर गब्बर सिंह भी अन्य डाकुओं की तरह बोलता, तो वह चंबल के बीहड़ में खो जाता। उसके संवाद ही उसे बीहड़ से निकाल कर आम दर्शकों की जिंदगी में ले आए। शोले के संवादों की एलपी निकली थी। छोटे शहरों में पान की दुकानों और रेस्तरां में ग्राहक जुटाने के काम आते थे शोले के संवाद..। अब ये बातें सिर्फ यादों में रह गई। आज के स्टार तो फिल्म में आमने-सामने आने तक से डरते हैं। उनके दबाव में निर्देशक दृश्य और संवादों की ऐसी बंदरबांट करता है कि दृश्य का मर्म ही मर जाता है। पिछले सालों में रिलीज हुई कई फिल्में सिर्फ स्टारों की भिड़ंत न होने की वजह से कमजोर हो गई।

अभी ज्यादातर अभिनेता अपने दृश्यों के भाव समझ कर अपनी भाषा में दो-चार पंक्तियां बोल देते हैं। कुछ स्टारों के तो होंठ ही नहीं खुलते। वास्तव में वे सावधानी बरतते हैं, क्योंकि अगर मुंह खोलकर संवाद बोले गए और थोड़ी भी गलती हुई, तो वह पकड़ में आएगी। लिपसिंक बिठाना मुश्किल हो जाएगा। एक पॉपुलर स्टार तो संवाद याद करने में इतने कमजोर हैं कि उनकी दो पंक्तियों के संवाद भी बोर्ड पर लिख कर सामने में ऐसे टांगे जाते हैं कि वे उन्हें पढ़ कर बोलते समय भी स्वाभाविक दिखें।

क्या फिर से हिंदी फिल्मों में संवाद लौटेंगे? क्या हम फिर से फिल्मों की डायलॉग बाजी का आनंद उठा पाएंगे? मुझे कम उम्मीद है..।


धोबी घाट का एक सबटेक्सचुअल पाठ - राहुल सिंह

युवा कथाकार-आलोचक राहुल सिंह वैसे तो पेशे से प्राध्यापक हैं, लेकिन प्राध्यापकीय मिथ को झुठलाते हुए पढते-लिखते भी हैं। खासकर समसामयिकता राहुल के यहां जरूरी खाद की तरह इस्तेमाल में लायी जाती है। चाहे उनकी कहानियां हों या आलोचना, आप उनकी रचनाशीलता में अपने आसपास की अनुगूंजें साफ सुन सकते हैं। अभी हाल ही में प्रदर्शित ‘धोबीघाट’ पर राहुल ने यह जो आलेख लिखा है, अपने आपमें यह काफी है इस स्थापना के सत्यापन के लिए। आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है, क्या यह अलग से कहना होगा!

धोबी घाट का एक सबटेक्सचुअल पाठ
राहुल सिंह

अरसा बाद किसी फिल्म को देखकर एक उम्दा रचना पढ़ने सरीखा अहसास हुआ। किरण राव के बारे में ज्यादा नहीं जानता लेकिन इस फिल्म को देखने के बाद उनके फिल्म के अवबोध (परसेप्शन) और साहित्यिक संजीदगी (लिटररी सेन्स) का कायल हो गया। मुझे यह एक ‘सबटेक्स्चुअल’ फिल्म लगी जहाँ उसके ‘सबटेक्सट’ को उसके ‘टेक्सट्स’ से कमतर करके देखना एक भारी भूल साबित हो सकती है। मसलन फिल्म का शीर्षक ‘धोबी घाट’ की तुलना में उसका सबटाईटल ‘मुम्बई डायरीज’ ज्यादा मानीखेज है। सनद रहे, डायरी नहीं डायरीज। डायरीज में जो बहुवचनात्मकता (प्लूरालिटी) है वह अपने लिए एक लोकतांत्रिक छूट भी हासिल कर लेता है। किसी एक के अनुभव से नहीं बल्कि ‘कई निगाहों से बनी एक तस्वीर’। फिल्म के कैनवास को पूरा करने में हाशिये पर पड़ी चीजें भी उतना ही अहम रोल अदा करती हैं जितने के वे किरदार जो केन्द्र में हैं। यों तो सतह पर हमें चार ही पात्र नजर आते हैं लेकिन असल में हैं ज्यादा-टैक्सी ड्राइवर, खामोश पड़ोसन, लता बाई, प्रापर्टी ब्रोकर, सलीम, लिफ्ट गार्ड और सलमान खान (चौंकिये मत, सलमान खान की भी दमदार उपस्थिति इस फिल्म में है।) सब मिलकर वह सिम्फनी रचते हैं जिससे मुम्बई का और हमारे समय का भी एक अक्स उभरता है।

जैसे की फिल्म की ओपनिंग सीन जहाँ यास्मीन नूर (कीर्ति मल्होत्रा) टैक्सी में बैठी मरीन ड्राइव से गुजर रही है। टैक्सी के सामने लगी ग्लास पर गिरती बारिश को हटाते वाइपर, चलती टैक्सी और बाहर पीछे छूटते मरीन ड्राइव के किनारे और इनकी मिली-जुली आवाजों के बीच टैक्सी ड्राइवर का यह पूछना कि ‘नयी आयी हैं मुम्बई में ?’ ड्राइवर कैसे ऐसा पूछने का साहस कर सका ? क्योंकि उसकी सवारी (यास्मीन) के हाथ में एक हैंडी कैम है जिससे वह मुम्बई को सहेज रही है। जिससे वह अनुमान लगाता है कि शायद यह मुम्बई में नयी आई है (आगे मुम्बई लोकल में शूट करते हुए भी उसे दो महिलायें टोकती हैं ‘मुम्बई में नयी आयी हो ?’)। फिर उनकी आपसी बात-चीत के क्रम में ही यह मालूम होता है कि वह मलीहाबाद (उत्तर प्रदेश) की रहनेवाली है और ड्राइवर जौनपुर (उत्तर प्रदेश) का। उसी शुरूआती दृश्य में टैक्सी के अंदर डैश बोर्ड में बने बाक्स पर लगे एक स्टिकर पर भी हैंडी कैम पल भर को ठिठकता है जिसमें एक औरत इंतजार कर रही है और उसकी पृष्ठभूमि में एक कार सड़क पर दौड़ रही है, और स्टिकर के नीचे लिखा हैः ‘घर कब आओगे ?’ यह उस ड्राइवर की कहानी बयां करने के लिए काफी है कि वह अपने बीवी-बच्चों को छोड़कर कमाने के लिए मुम्बई आया है। इसके बाद भींगती बारिश में भागती कार से झांकती आँखें मुम्बई की मरीन ड्राइव को देखते हुए जो बयां करती है वह खासा काव्यात्मक है। “... समन्दर की हवा कितनी अलग है, लगता है इसमें लोंगों के अरमानों की महक मिली हुई है।” इस ओपनिंग सीन के बाद कायदे से फिल्म शुरु होती है चार शाट्स हैं पहला किसी निर्माणाधीन इमारत की छत पर भोर में जागते मजदूर का दूसरा उसके समानान्तर भोर की नीन्द में डूबी मुम्बई का तीसरा संभवतः उसी इमारत में निर्माण कार्य में लगे मजदूरों के सीढ़ियों में चढ़ने-उतरने का और चौथा दोपहर में खुले आसमान के नीचे बीड़ी के कश लगाते सुस्ताते मजदूर का। फिल्म के यह शुरुआती चार शाट्स फिल्म के एक दम आखिरी में आये चार शाट्स के साथ जुड़ते हैं। उन आखिरी चार शाट्स में पहला, दोपहर की भीड़ वाली मुम्बई है। दूसरा, शाम को धीरे-धीरे रेंगती मुम्बई और ऊपर बादलों की झांकती टुकड़ियाँ हैं। तीसरा, रात को लैम्प पोस्ट की रोशनी में गुजरनेवाली गाड़ियों का कारवां है और चौथा, देर रात में या भोर के ठीक पहले नींद में अलसाये मुम्बई का शाट्स है। इस तरह फिल्म ठीक उसी शाट्स पर खत्म होती है जहाँ फिल्म कायदे से शुरु हुई थी। एक चक्र पूरा होता है। लेकिन यह शाट्स भी मुम्बई के दो चेहरों को सामने रखता है। ‘अ टेल आव टू सिटीज’। जब एक (सर्वहारा) जाग रहा होता है तो दूसरा (अभिजन) गहरी नींद में होता है और पहला जब सोने की तैयारी कर रहा होता है तो दूसरा के लिए दिन शुरू हो रहा होता है (सलीम जब सोने की तैयारी कर रहा होता है, ठीक उसी वक्त अरूण के चित्रों की प्रदर्शनी का उद्घाटन हो रहा होता है)।

मुन्ना (प्रतीक बब्बर) यों तो पहली दुनिया का नागरिक है लेकिन उसके मन में उसी दूसरी दुनिया का नागरिक होने की चाह है, इस कारण वह अपनी नींद बेचकर सपना पूरा करने में लगा है। अरुण (आमिर खान) दूसरी दुनिया का नागरिक है और शॉय (मोनिका डोगरा) एक तीसरी दुनिया की, जो लगातार यह भ्रम पैदा करती है कि वह दूसरी दुनिया की नागरिक है। मतलब यह कि शॉय इनवेस्टमेंट बैंकिंग कन्सल्टेन्ट है दक्षिण एशियाई देशों में निवेश के रूझानों पर विशेषकर लघु और छोटी पूंजी पर आधारित पारंपरिक व्यवसायों की फील्ड सर्वे करके रिपोर्ट तैयार करने के लिए भेजी गई है। फिल्म के अंत की ओर बढ़ते हुए अचानक सिनेमा के पर्दे पर उभरने वाले उन पन्द्रह तस्वीरों की लड़ियों को याद कीजिए जिसमें डेली मार्केट जैसी जगह के स्टिल्स हैं, उन तस्वीरों में कौन लोग हैं इत्र बेचनेवाला, पौधे बेचनेवाला, जूते गाठनेवाला, मसक में पानी ढोनेवाला, रेलवे प्लेटफार्म पर चना-मूंगफली बेचनेवाला, गजरे का फूल बेचनेवाली, घरों में सजा सकनेवालों फूलों को बेचनेवाली, कान का मैल निकालनेवाला, चाकू तेज करनेवाला, मजदूर, पान बेचनेवाली, ताला की चाभी बनानेवाला, रेहड़ी और ठेला पर सामान खींचनेवाला, मछली बेचनेवाली आदि। इस काम के लिए उसे अनुदान मिला है और अनुदान देनेवाली संस्था का मुख्यालय न्यूयार्क (अमेरिका) में है। मैक्डाॅनाल्ड के लगातार खुलते आउटलेट, अलग-अलग ब्राण्ड के उत्पादों का भारत का रुख करने और हर पर्व-त्योहार में भारतीय बाजार में चीन की आतंककारी उपस्थिति को देखते हुए, वायभ्रेन्ट गुजरात की अभूतपूर्व सफलता के मूल मे अनिवासी भारतीयों की भूमिका, भारतीय सरकार द्वारा उनको दी जाने वाली दोहरी नागरिकता, भारतीय इलेक्ट्रानिक और प्रिन्ट मीडिया द्वारा उनके विश्व के ताकतवर लोगों में शुमार किये जाने की खबरों को तरजीह दिये जाने वाले परिवेश में शॉय एक कैरेक्टर मात्र न रह कर मेटाफर बन जाती है। मुन्ना को अगर प्रोलेतेरियत और अरुण को बुर्जुआ मान लें (जिसके पर्याप्त कारण मौजूद हैं) तो शॉय फिनांस कैपिटल की तरह बिहेव करती नजर आती है। खास कर तब जब वह अरुण से लगातार यह बात छिपा रही होती है कि वह मुन्ना को जानती है। मुन्ना और अरुण दोनों तक, जब चाहे पहुँच सकने की छूट शॉय को ही है। शॉय का कला प्रेम लगभग वैसा ही है जैसा सैमसंग का साहित्य प्रेम गत वर्ष हम देख चुके हैं। सभ्यता के विकास का इतिहास पूंजी के विकास का भी इतिहास है। और ज्यों-ज्यों सभ्यता का विकास होता गया त्यों-त्यों मानवीय गुणों में हृास भी देखा गया। इस लिहाज से भी विकास के सबसे निचले पायदान पर खड़ा मुन्ना, अरुण और शॉय की तुलना में ज्यादा मानवीय लगता है। आखिरी दृश्य में जब वह सड़कों पर बेतहाशा दौड़ता हुआ शॉय को अरुण का पता थमाता है, तब वह खुद इस बात की तस्दीक कर रहा होता है कि कुछ देर पहले वह झूठ बोल रहा था। शॉय भी कई जगहों पर झूठ बोलती है, बहाने बनाती है लेकिन न तो पकड़ में आती है और न ही अपराध बोध से ग्रसित नजर आती है।

साम्राज्यवाद के सांस्कृतिक आक्रमण की प्रक्रिया को ‘धोबी घाट’ बेहद बारीकी से उभारती है। और यह महीनी सिर्फ इसी प्रसंग तक सिमट कर नहीं रह गई है। एक चित्रकार के तौर पर अरुण का अपने कला के सम्बन्ध में व्यक्त उद्गार ध्यान देने लायक है। “मेरी कला समर्पित है, राजस्थान, यूपी, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश और अन्य जगहों के उन लोगों का जिन्होंने इस शहर को इस उम्मीद से बनाया था कि एक दिन उन्हंे इस शहर में उनकी आधिकारिक जगह (राइटफुल प्लेस) मिल जायेगी। मेरी कला समर्पित है उस बाम्बे को।” अरुण यहाँ मुम्बई नहीं कहता है बाम्बे कहता है। अगर पूरे संदर्भ में आप बाम्बे संबोधन को देखें तो आप किरण की सिनेमाई चेतना की तारीफ किये बिना नहीं रह सकेंगे। हाल के दिनों में शायद ही किसी फिल्मकार ने शिव सेना की राजनीति का ऐसा मुखर प्रतिरोध करने की हिम्मत और हिमाकत दिखलायी है। प्रतिरोध की ऐसी बारीकी हाल के दिनों में एक आस्ट्रेलियाई निर्देशक Michael Haneke की फिल्म Cache i.e. Hidden (2005) में देखी थी।

मुन्ना, अरुण और शॉय की तुलना में यास्मीन नूर सहजता से किसी खांचे में नहीं आती। कहीं यह मुन्ना के करीब लगती है तो कहीं अरुण और शॉय के। मुन्ना और यास्मीन इस मामले में समान है कि दोनों अल्पसंख्यक वर्ग से तालुक रखते हैं, दोनां हिन्दी भाषी प्रदेश क्रमशः मलीहाबाद (उत्तर प्रदेश) और दरभंगा (बिहार) से हैं, दोनों रोजगार के सिलसिले में मुम्बई आते हैं (यास्मीन निकाह कर के अपने शौहर के साथ मुम्बई आई है। निम्न वर्ग या निम्न वित्तीय अवस्था वाले परिवारांे में लड़कियों के लिए विवाह भी एक कैरियर ही है।) इसके अलावा मुन्ना और शॉय के साथ मुम्बई में एक आउटसाइडर की हैसियत से साथ खड़ी नजर आती है। उसकी संवेदनशीलता उसे अरुण के साथ जोड़ती है। इन सबको जो चीज आपस में जोड़ती है, वह है मुम्बई, जिसकी बारिश और समन्दर ये आपस में साझा करते हैं। आप पायेंगे कि इन सबके जीवन में समन्दर और बारिश के संस्मरण मौजूद हैं। यह उनके एक साझे परिवेश से व्यक्तिगत जुड़ाव को दर्शाता है। यास्मीन के नक्शे कदम पर अरुण समन्दर के पास जाता है। मुन्ना और शॉय साथ-साथ समन्दर के किनारे वक्त बिताते हैं। लेकिन यास्मीन, बारिश और समन्दर जब भी पर्दे पर आते हैं फिल्म में हम कविता को आकार ग्रहण करते देखने लगते हैं। जैसे-“यहाँ की बारिश बिल्कुल अलग है, न कभी कम होती है, न कभी रुकने का नाम लेती है, बस गिरती रहती है, शश्श्श्......., रात को इसकी आवाज जैसे लोरी हो, जो हमें घेर लेती है अपने सीने में।” बारिश के समय अरुण अपनी पेंटिग में लीन हो जाता है तो शॉय अरुण के साथ बिताये गये अपने अंतरंगता के क्षणों में लेकिन इन सब की रोमानियत पर मुन्ना का यथार्थ पानी फेर देता है क्योंकि बारिश के वक्त मुन्ना अपनी चूती छत ठीक कर रहा होता है। इन तमाम समानताओं के बावजूद मुझे यास्मीन मुन्ना के ही नजदीक लगी। वह मारी गई अपनी अतिरिक्त संवेदनशीलता के कारण, पूरी फिल्म उसकी इस अतिरिक्त संवेदनशीलता का साक्षी है चाहे वह दाई का प्रसंग हो या किसी सदमे के कारण खामोश हो चुकी पड़ोसन का या फिर बकरीद के अवसर पर उसके उद्गार। एक लगातार संवेदनशून्य होते समय में संवेदनशीलता को कैसे बचाया जा सकता है। जो बचे रह गये उनकी संवेदनशीलता उतनी शुद्ध या निखालिस नहीं थी। शायद इसलिए यास्मीन की मौत मेरे जेहन में एक कविता के असमय अंत का बिम्ब नक्श कर गई। वैसे यहाँ ‘आप्रेस्ड क्लास’ के साथ ‘जेंडर’ वाला आयाम भी आ जुड़ता है। एक समान परिस्थितियों में भी पितृसत्तात्मक समाज किस कदर पुरुष की तुलना में स्त्री विरोधी साबित होता है। यास्मीन का प्रसंग इस लिए भी दिलचस्प है कि खुद आमिर खान ने अपनी पहली पत्नी को छोड़ने के बाद किरण को अपनी शरीक-ए-हयात बनाया था। फिल्म में इस ऐंगल को शामिल किये जाने मात्र से भी किरण की बोल्डनेस का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस कोण से ही फिल्म का दूसरा सिरा खुलता है जो यास्मीन की उपस्थिति और उसके सांचे में फिट न बैठ सकने की गुत्थी का हल प्रस्तुत करता है। यहीं मुन्ना यास्मीन का विस्तार (एक्सटेंशन) नजर आता है। यास्मीन सिर्फ इस कारण से नहीं मरी कि वह अतिरिक्त संवेदनशील थी वह इसलिए मरी कि उसमें आत्म विश्वास और निर्णय लेने की क्षमता की कमी थी। मुन्ना भी लगभग उन्हीं स्थितियों में पहुँच जाता है जिन परिस्थितियों में यास्मीन ने आत्महत्या की है, (सलीम की हत्या हो चुकी है, शॉय को उसके चूहा मारने के धंधे बारे में मालूम हो गया है, जिस इलाके में वह काम करता था वहाँ से उठा कर जोगेश्वरी के एक अपार्टमेंट में फेंक दिया गया है।)। शुरु में मुन्ना भी उन परिस्थितियों से मुँह चुराकर भागता है। लेकिन फिर सामना करता है। यह जान कर की शॉय अरुण को ढूँढ रही है वह खुद उसको अरुण का पता देता है। आप पायेंगे कि लगभग पिछले मौकों पर मुन्ना आत्म विश्वास और निर्णय लेने की क्षमता का परिचय देता रहा है। जैसे वह शॉय के कपड़े पर नील पड़ जाने के कारण उसके नाराजगी को ज्यादा फैलने का मौका दिये बगैर कहता है “मैडम गलती हो गई दीजिए मैं ठीक करके देता हूँ।” जब शॉय मुफ्त में उसका पोर्टफोलियो अपने ढंग से बाहर नेचुरल तरीके से शूट करना चाहती है तो वह कहता है कि “भाई हमें नहीं चाहिए फ्रेश-व्रेश, आप स्टूडियो में शूट किजीये ना, खर्चा मैं भरता हूँ।” फिर भी ना-नुकुर की स्थिति बनता देख वह सीधा कहता है कि ‘आपको माॅडल्स फोटो लेने हैं कि नहीं! धंधा, मोहब्बत को गंवा कर भी फिल्म के अंत में ‘द लास्ट स्माइल’ की स्थिति में मुन्ना ही है, जो उम्मीद बंधाती है।

इसके अलावे पूरी फिल्म के बुनावट में जो बारीकी है वह स्क्रिप्ट और स्क्रीन प्ले में की गई मेहनत को दर्शाती है। जैसे फिल्म के शुरुआती दृश्य में जब यास्मीन खुद के मलीहाबाद की बताती है तो उसकी अहमियत आधी फिल्म खत्म होने के बाद मालूम होती है जब वह इमरान को संबोधित करते हुए अपनी दूसरी चिट्ठी मे यह कहती है कि ‘वहाँ तो आम आ गये होंगे ना, यहाँ के आमों में वह स्वाद कहाँ ?’ मुन्ना की खोली में उसके इर्द-गिर्द रहनेवाली बिल्ली की नोटिस हम तब तक नहीं लेते हैं जब तक मुन्ना अपनी खोली नहीं बदलता। दूसरी बार जब मुन्ना शॉय की नील लगी शर्ट को ठीक करके वापस करने के लिए शॉय के फ्लैट पर जाता है तो शॉय मुन्ना को चाय के लिए भीतर बुलाती है उस वक्त दरवाजे के किनारे खड़ी एग्नेस (नौकरानी) फ्रेम में आती है। उसके फ्रेम में आने का मतलब ठीक अगले ही सीन मे समझ आ जाता है, जब एग्नैस चाय लेकर आती है, एक कप में और दूसरी ग्लास में। आप पायेंगे कि बेहद पहले अवसर पर ही मुन्ना को शॉय के द्वारा मिलने वाले अतिरिक्त भाव को भांपने में वह पल भर की देरी नहीं करती और आगे चलकर इस बारे में अपनी राय भी जाहिर करती है। मुन्ना के बिस्तर के पास लगे सलमान खान के पोस्टर की अहमियत का भान हमें फिल्म के आगे बढ़ने के साथ होता चलता है। मुन्ना की कलाइयों में बंधी मोटी चेन, डम्बल से मसल्स बनाते वक्त सामने आइने पर सलमान की फोटो को हम नजरअंदाज कर जाते हैं। लेकिन तीन मौके और है जब हम फिल्म में सलमान खान की उपस्थिति को नजरअंदाज करते हैं। पहला, जब शॉय मुन्ना से दूसरी बार किसी पीवीआर या मल्टीप्लैक्स में संयोगवश मिलती है। दूसरा, जब वह मुन्ना का पोर्टफोलियो शूट कर रही होती है और तीसरा जब वह अरुण के साथ खुद को देख लिये जाने पर उससे विदा लेकर दौड़ती हुई मुन्ना के पास पहुँच कर कहती है कि आज तुम मुझे नागपाड़ा ले जाने वाले थे और फिल्म दिखाने वाले थे। फिल्म में सलमान खान की जबर्दस्त उपस्थिति को हम नजरअंदाज कर जाते हैं। शरु में ही मुन्ना और सलीम केबल पर प्रसारित होने वाली जिस फिल्म को देखकर ठहाके लगाते हैं, वह सलमान खान अभिनीत हैलो ब्रदर है। फिर जब पीवीआर या मल्टीप्लैक्स में फिल्म देखने के क्रम में शॉय मुन्ना से मिलती है वह फिल्म है ‘युवराज’। मुन्ना अपने पोर्टफोलियो शूट के लिए जो पोज दे रहा होता है अगर सलमान खान के बिकने वाले सस्ते पोस्टकार्ड और पोस्टर को आपने देखा हो तो आप समझ सकते हैं कि मुन्ना उससे कितना मुतास्सिर है और जिस फिल्म को दिखाने की बात की थी मुन्ना ने वह फिल्म थी, ‘हैलो’। हैलो ब्रदर ‘युवराज’ और ‘हैलो’ दोनों फिल्में सलमान खान की है। इन कारणों से बाद में खोली बदलते वक्त मुन्ना द्वारा सावधानी से सलमान खान के पोस्टरों को उतारा जाना एक बेहद जरुरी दृश्य लगता है। लेकिन सिर्फ इस कारण से मैं सलमान खान की उपस्थिति को जबर्दस्त नहीं कह रहा हूँ। इन संदर्भों से जुड़े होने के बावजूद वैसा कहने की वजह दूसरी है। वह यह कि किसी भी फिल्म में यथार्थ के दो बुनियादी आयामः काल और स्थान (टाईम एण्ड स्पेस) को सहजता से पहचान जा सकता है। आम तौर पर हिन्दी सिनेमाई इतिहास में इस किस्म के प्रयोग कम ही देखने को मिले हैं जिसमें शहर को ही मुख्य किरदार के तौर पर प्रोजेक्ट किया गया हो। जाहिर है जब आप शहर को प्रोजेक्ट कर रहे होते हैं तो रियलिटी का स्पेस वाला डाइमेंशन टाईम वाले फैक्टर की तुलना में ज्यादा महŸवपूर्ण हो उठता है। ‘धोबी घाट’ में भी ठीक यही हुआ है। आप मुम्बई को देख रहे हैं लेकिन वह कब की मुम्बई है ? कहें कि आज की तो मैं कहूंगा कि वह अक्टूबर-नवम्बर 2010 के आगे-पीछे की मुम्बई है, इतना स्पेस्फिक कैसे हुआ जा सकता है, इसके संकेत फिल्म में है। ‘धोबी घाट’ उस अंतराल की कहानी कहता है जब सलमान खान की ‘युवराज’ रीलिज हो चुकी थी और ‘हैलो’ चल रही थी और हैलो ब्रदर इतनी पुरानी हो चुकी थी कि उसका प्रसारण केबल पर होने लगा था। सलमान खान मुम्बई के उस स्पेस के टाईम फ्रेम को रिप्रेजेन्ट करता है। बस इससे ज्यादा की जरूरत भी नहीं थी। लेकिन इसके लिए जिस ढ़ंग से सलमान खान का मल्टीपर्पस यूस किया गया है, वह किसी मामूली काबिलियत वाले निर्देशक के बूते की बात नहीं है। शहर को किरदार बनाने की दूसरी कठिनाई यह है कि स्टोरी नरेशन को ग्राफ या स्ट्रक्चर लीनियर नहीं हो सकता उसे सर्कुलर होना पडे़गा। किस्सागोई का यह सर्कुलर स्ट्रक्चर सुनने में जितना आसान है उसे फिल्माना उतना ही मुश्किल है। खासकर भारतीय दर्शक वर्ग जो लीनियर स्ट्रक्चर वाली फिल्मों का इतना अभ्यस्त हो चुका है कि वह उनके सिनेमाई संस्कार का पर्याय हो गया है। हिन्दी सिनेमाई इतिहास में जब से मैंने फिल्में देखनी शुरू की है, किरण राव का यह प्रयास कई मायने में मुझे फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की याद दिला गया। जिस तरह रेणु ने अंचल को नायक बनाकर हिन्दी कथा साहित्य की परती पड़ी जमीन को तोड़ने का काम किया था, किरण ने भी लगभग वैसा ही किया है। इतना ही नहीं रेणु ने अपनी कहानियों को ‘ठुमरीधर्मा’ कहा था। संगीत का मुझे ज्यादा ज्ञान नहीं है लेकिन इतना सुना है कि ठुमरी में कोई एक केन्द्रीय भाव या टेक होती है और बार-बार गाने के क्रम में वहाँ आकर सुस्ताते हैं, स्वरों के तमाम आरोह-अवरोह के बाद उस बुनियादी टेक को नहीं छोड़ते हैं, जिसे उसकी सार या आत्मा कह सकते हैं। ऐसा करते हुए हम उस अनुभूति को ज्यादा घनीभूत या सान्द्रता प्रदान कर रहे होते हैं जो प्रभाव को गाढ़ा करने का काम करता है। इस आवर्तन के जरिये आप उसके केन्द्र या नाभिक को ज्यादा संगत तौर पर उभार पाते हैं। रेणु ने इस शिल्प के जरिये अपनी कहानियों में अंचल की केन्द्रीयता को उभारने में सफलता पाई थी। लगभग वैसा ही शिल्प किरण ने अपनी इस फिल्म के लिए अख्तियार किया है। और यह भी एक दिलचस्प संयोग है कि फिल्म में संभवतः बेगम अख्तर द्वारा गाया गये दो ठुमरी भी बैकग्राउंड स्कोर के तौर पर मौजूद है। एक जब अरुण यास्मीन वाले घर में अपने सामानों को तरतीब दे रहा है और दूसरा जब मुन्ना बारिश में भींग कर शॉय को बाय कर रहा होता है और अरुण अपनी पैग में बारिश के चूते पानी को मिला कर पेन्टिग शुरू कर रहा होता है।

भारत के किसी एक शहर या अंचल को फिल्माना खासा चुनौतिपूर्ण है। उसमें भी मुम्बई जो लगभग एक जीता-जागता मिथ है। मुम्बई के नाम से ही जो बातें तत्काल जेहन में आती हैं उनमें मायानगरी, मुम्बई की लोकल, स्लम्स, गणपति बप्पा, जुहू चैपाटी, पाव-भाजी, भेल-पुरी, अंडरवल्र्ड, शिवसेना आदि तत्काल दिमाग में कौंध जाते हैं। इस सबसे मिलकर मुम्बई का मिथ बना है। फिल्म में यह सब हैं जो मुम्बई के इस मिथ को पुष्ट करता है। तो फिर नया क्या है ? नया इस मिथ को पुष्ट करते हुए उसकी आत्मा को बयां करना है। मुम्बई के इस मिथ या कहें कि स्टीरियोटाईप छवि को किरण निजी अनुभवों (पर्सनल एक्सपिरयेंसेज) के जरिये जाँचती है। अंत में मुन्ना की मुस्कान उस मुम्बईया स्प्रिट की छाप छोड़ जाती है जिसको हम ‘शो मस्ट गो आॅन’ के मुहावरे के तौर पर सुनते आये हैं।


अभिनय की दृष्टि से आमिर को छोड़कर सब बेहतरीन हैं। मोनिका डोगरा ने कुछ दृश्यों में जो इम्प्रोवाइजेशन किया है वह गजब है। चार उदाहरण रख रहा हूँ, एक जब उसके शर्ट पर वाईन गिरती है उस समय का उसका ‘डिलेयड पाॅज एक्सप्रेशन’, दूसरा जब फोटो शूट के वक्त मुन्ना पूछता है कि क्या मैं अपना टी शर्ट उतार दूं तब मोनिका ने जो फेस एक्स्प्रेशन दिया है, वह इससे पूर्व कमल हासन में ही दिखा करता था। तीसरा मुन्ना जब पहली बार कपड़ा देने उसके फ्लैट पर गया है, तब वह अपने हाथ को जिस अंदाज में हिला कर कहती है, ‘अंदर आओ।’ और चैथा जब वह अपने टैरेस पर उठने के ठीक बाद अपनी मां से बात कर रही है। पूरे फिल्म मंे प्रतीक बब्बर की बाॅडी लैंग्वेज ‘मि परफ्ेकशनिस्ट’ पर भारी है। इस पर तो काफी कुछ लिखा जा सकता है लेकिन फिलहाल इतना ही कि एक दृश्य याद कीजिए जहाँ मुन्ना शॉय के साथ फिल्म देख रहा है, शॉय के हाथ के स्पर्श की चाह से उपजा भय, रोमांच और संकोच सब उसके चेहरे पर जिस कदर सिमटा है, वह एक उदाहरण ही काफी जान पड़ता है। ‘जाने तू या जाने ना’ में अपनी छोटी भूमिका की छाप को प्रतीक बब्बर ने इस फिल्म में धुंधलाने नहीं दिया है। सलीम इससे पहले ‘पिपली लाइव’ में भी एक छोटी सी भूमिका निभा चुके हैं। यास्मीन को सिर्फ आवाज और चेहरे के बदलते भावों के द्वारा खुद को कन्वे करना था। और वह जितनी दफा स्क्रीन पर आती है उसकी झरती रंगत मिटती ताजगी को महसूस किया जा सकता है। आमिर के हाथों अरुण का किरदार फिसल जाता है, इसे देखते हुए आमिर के संदर्भ में पहली बार इस बात का अहसास हुआ कि वे एक्टर नहीं स्टार हैं। अरूण कोई ऐसा किरदार नहीं था जिसके गेस्चर और पोस्चर के जरिये उसे कन्वे किया जा सकता था। लगान, मंगल पाण्डेय, तारे जमीन पर, गजनी, थ्री इडियट की तरह सिर्फ वेश-भूषा बदल लेने से ही अरुण पहचान लिया जाता ऐसी बात नहीं थी। अरुण के किरदार को अभिनीत नहीं करना था बल्कि जीना था। आमिर एक्टिंग के नाम पर उन कुछ बाहरी लक्षणों तक ही सिमट कर रह गये जिसे उनकी चिर-परिचित मुद्राओं के तौर पर हम देखते आये हैं। मसलन्, फैलती-सिकुड़ती पुतलियाँ, भवों पर पड़नेवाला अतिरिक्त बल, सर खुजाने और लम्बी सांसे छोड़ना वाला अंदाज आदि। यह लगभग वैसा ही सलूक है जैसा ‘चमेली’ में करीना कपूर ने किया था, उसने भी होंठ रंग कर, पान चबा कर, चमकीली साड़ी और गाली वाली जुबान के कुछ बाहरी लक्षणों के द्वारा चमेली को साकार करना चाहा था। उसी के समानांतर ‘चांदनी बार’ में तब्बू को देखने से किसी किरदार को जीने और अभिनीत करने के अंतर को समझा जा सकता है। बहरहाल इस लिहाज से मोनिका डोगरा सब पर भारी है।

अब अगर बात नेपथ्य की करें तो फिल्म का संगीत और सिनेमेटोग्राफी वाला पहलू बचता है। फिल्म में कोई गाना नहीं है केवल बैकग्राउंड स्कोर है जिसके कम्पोसर हैं, ळनेजंअव ैंदजंवसंससं। इस साल हर फिल्म फेस्टिवल में जिस अर्जेन्टीनियाई फिल्म ‘दी ब्यूटीफूल’ ने सफलता के झंडे गाड़े हैं उसका संगीत भी गुस्ताव ने दिया है लगभग हर अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार अपनी झोली में डाल चुके इस संगीतकार का जादू रह-रह कर थोड़े अंतराल पर ‘धोबी घाट’ में अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है। उन संवादहीन दृश्यों में खासकर जहाँ फिल्म की कहानी सुर-लहरियों पर तिरती आगे बढ़ती है। कहानी साउण्डट्रैक में संचरण करती है। ऐसा कई एक जगहों पर हैं। पर्दे पर आमिर खान प्रोडक्शन के साथ अजान सरीखा एक संगीत है जिसको बीच-बीच में पटरी पर दौड़ती ट्रेन की खट-खट-आहट तोड़ती है, मुन्ना और शॉय जब अंतरंगता के क्षणों में डूब रहे होते हैं। इसके अलावा अकेलापन, उदासी, प्यार जैसी भावनाओं को भी गहराने की कोशिश सुनी जा सकती है। गुस्ताव के साथ ही फिल्म की सिनेमेटोग्राफी भी सराहनीय है। खास कर तुषार कांति रे के वे पन्द्रह-सोलह स्टिल्स, जिसमें शॉय डेली मार्केट को अपनी निगाहों में कैद कर रही है। पर इससे भी ज्यादा प्रभावी वह दृश्य है जिसमें मुन्ना शॉय के साथ समन्दर किनारे बैठ कर डूबते सूरज को देख रहा है और वह डूबता सूरज मुन्ना के पीछे समन्दर के किनारे खड़ी किसी इमारत की उपरी मंजिलों पर लगे शीशे पर प्रतिबिम्बित हो रहा है। शुरू और आखिरी के चार-चार शाट्स की बात तो कर ही चुका हूँ। वैसे सिनेमेटोग्राफी को थोड़ा और सशक्त होना था क्योंकि एक ही साथ विडियो (यास्मीन), पेन्टिंग (अरुण), और फोटोग्राफी (शॉय) तीनों आर्ट फार्म की निगाह से मुम्बई को कैद करने की बात थी।

फिल्म कमजोर लगी आमिर के कारण और एक दूसरी बुनियादी गलती है सलमान खान के फिल्मों के नामोल्लेख के संदर्भ में किरण को करना सिर्फ इतना था कि मुन्ना से शॉय की दूसरी मुलाकात पर उन्हें ‘युवराज’ की जगह ‘हैलो’ देखने जाते हुए दिखलाना था और बाद में मुन्ना उसे ‘युवराज’ दिखाने का वादा कर रहा होता। ऐसा इसलिए कि ‘हैलो’ 10 अक्टूबर 2010 को रिलीज हुई थी और ‘युवराज’ 21 नवम्बर 2010 को। इससे रियलिटी के टाईम वाले डायमेन्सन की संगति भी बैठ जाती। फिलहाल तो इस फिल्म को देखने के बाद जिन बातों की प्रतिक्षा कर रहा हूँ उनमें अनुषा रिजवी और किरण राव की दूसरी फिल्म, ‘पिपली लाइव’ की मलायिका शिनाॅय व नवाजुददीन (राजेश) और ‘धोबी घाट’ की मोनिका डोगरा व प्रतीक बब्बर की अगली भूमिकाओं का इंतजार शामिल है।

Saturday, February 12, 2011

राजकपूर के जीवन और फिल्मों की अंतरंग झलक

राजकपूर के जीवन और फिल्मों की अंतरंग झलक-अजय ब्रह्मात्‍मज

हिंदी फिल्मों पर हिंदी में अपर्याप्त लेखन हुआ है। प्रकाशकों की उदासीनता से लेखक निष्क्रिय हैं। चंद लेखक अपना महात्वाकांक्षी लेखन समुचित पारिश्रमिक नहीं मिलने की वजह से दरकिनार कर देते हैं। जयप्रकाश चौकसे पिछले कई सालों से हिंदी फिल्मों पर नियमित लेखन कर रहे हैं। दैनिक भास्कर में पर्दे के पीछे नाम से उनका पॉपुलर स्तंभ काफी पढ़ा जाता है। गौर करें तो हिंदी फिल्मों में मुख्य रूप से तीन तरह का लेखन होता है। पहली श्रेणी में सिद्धांतकार लेखक आते हैं। वे देश-विदेश में प्रचलित तकनीकी सिनेमाई सिद्धांतों की अव्यावहारिक खोज करते हैं। दूसरे प्रकार के लेखक फिल्मों का मूल्यांकन साहित्यिक मानदंडों के आधार पर करते हैं। दुर्भाग्य से चंद साहित्यकार इस श्रेणी में चर्चित हैं। वे अजीब किस्म की भावगत आलोचना और विश्लेषण से सिनेमा से सम्यक आकलन नहीं कर पाते। तीसरी श्रेणी जयप्रकाश चौकसे जैसे लेखकों की है, जो हिंदी सिनेमा की वास्तविक समझ रखते हैं और व्यावहारिक लेखन करते हैं।

अगर आप जयप्रकाश चौकसे को नियमित पढ़ते हों तो उनकी सादगी और स्पष्टता के कायल होंगे। चौकसे के पास संस्मरणों का खजाना है। अपनी यादों से वे घटनाओं, व्यक्तियों, प्रसंगों और फिल्मों का अनायास उल्लेख करते हैं और वर्तमान को सार्थक संदर्भ दे जाते हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से उनका घनिष्ठ रिश्ता रहा है। खासकर राजकपूर और कपूर खानदान से वे जुड़े रहे हैं। राजकपूर से उनकी पहली मुलाकात 1965 में ही हुई थी। 1977 से 1988 के ग्यारह सालों में चौकसे राजकपूर के ज्यादा निकट रहे। आर के स्टूडियो में उन्हें जगह मिली थी। राज कपूर के लंबे सान्निध्य के आधार पर ही उन्होंने राजकपूर पर केंद्रित पुस्तक राजकपूर सृजन प्रक्रिया लिखी है। यह पुस्तक न तो राजकपूर की जीवनी है और न ही उनकी फिल्मों का विश्लेषण.., इस पुस्तक में चौकसे ने राजकपूर के मानस को समझने के साथ उनकी सृजन प्रक्रिया पर प्रकाश डाला है। किसी लोकप्रिय अंतरंग मित्र पर लिखते समय दोहराव की संभावना बढ़ जाती है। राजकपूर सृजन प्रक्रिया में चौकसे ने 23 अध्यायों में उनके जीवन और सिने दर्शन को समझने और समझाने की सुंदर कोशिश की है। कई बार बताते-बताते वे पुराने प्रसंग फिर से दोहरा जाते हैं। इस पुस्तक का अध्ययन करते समय हमें राजकपूर कभी फिल्मकार, कभी बेटे, कभी प्रेमी, कभी सजग नागरिक तो कभी दोस्त के रूप में दिखते हैं। उनके जीवन के सभी पक्षों को लेखक ने छुआ है और उससे परिचित कराया है। वास्तव में यह पुस्तक राजकपूर की फिल्मों को आत्मीय तरीके से देखने की समझ देती है। फिल्म में व्यक्त भावों की चीर-फाड़ करने की बजाय उनके प्रवाह का दर्शन कराती है। राजकपूर के सृजन के चार आधारों के रूप में चौकसे ने प्रेम, महत्वाकांक्षा, पिता और धार्मिक आस्था का उल्लेख किया है। इन आधारों को लेकर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इससे पुस्तक में व्यक्त धारणाएं एकांगी नहीं होतीं।

पुस्तक के ग्याहरवें अध्याय विलक्षण अंतरंगता का क्लोजअप में चौकसे ने विस्तार से राजकपूर और नरगिस के संबंधों की व्याख्या की है। दोनों के संबंधों को लेकर मशहूर किंवदंतियों को उन्होंने स्पष्ट करने के साथ यह भी बताया कि दोनों में अलगाव का वास्तविक कारण क्या रहा होगा। वे लिखते हैं, राजकपूर और नरगिस का साथ 8 वर्ष रहा और लगभग 17 फिल्मों में काम किया। उनके अलगाव के अनेक कारण रहे होंगे, परन्तु रिश्ते में पहली दरार उनकी दूसरी सोवियत रूस की यात्रा रही।

आवारा रूस की राष्ट्रीय फिल्म बन चुकी थी और अनेक रूसी लोगों ने अपने बच्चों के नाम आवारा के प्रेमी युगल पर रखे थे। हर सफलता के बाद राजकपूर कहते थे, यस वी हैव डन इट! दूसरी यात्रा के समय राजकपूर के मुंह से बरबस निकला, यस आई हैव डन इट। इस छोटे से वाक्य के एक शब्द में अंतर के कारण रिश्ते में दरार आई।

जयप्रकाश चौकसे ने इस पुस्तक में उन फिल्मों का भी उल्लेख किया है, जिन्हें विभिन्न कारणों से राजकपूर नहीं बना सके। किसी भी फिल्मकार को ज्यादा अच्छी तरह समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि उसकी कितनी योजनाएं और फिल्में अधूरी रह गई। इस लिहाज से हम पाते हैं कि राजकपूर की कई कहानियां अनकही रह गई और वे सभी सामाजिक और समसामयिक थीं। तमाम तस्वीरों की उपलब्धता के बावजूद पुस्तक की सजावट और डिजाइन में मेहनत नहीं की गई है। प्रकाशकों को अच्छी पुस्तकों के प्रोडक्शन पर भी ध्यान देना चाहिए।

किताब- राजकपूर सृजन प्रक्रिया, लेखक- जयप्रकाश चौकसे, प्रकाशक -राजकमल प्रकाशन प्रालि., 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली -110002, मूल्य- 500


Friday, February 11, 2011

फिल्म समीक्षा:पटियाला हाउस

-अजय ब्रह्मात्मज

परगट सिंह कालों उर्फ गट्टू उर्फ काली.. एक ही किरदार के ये तीन नाम हैं। इस किरदार को पटियाला हाउस में अक्षय कुमार ने निभाया है। अक्षय कुमार पिछली कई फिल्मों में खुद को दोहराते और लगभग एक सी भाव-भंगिमा में नजर आते रहे हैं। निर्देशक भले ही प्रियदर्शन, साजिद खान या फराह खान रहे हों, लेकिन उनकी कामेडी फिल्मों का घिसा-पिटा फार्मूला रहा है। पटियाला हाउस में एक अंतराल के बाद अक्षय कुमार कुछ अलग रूप-रंग में नजर आते हैं। उनके प्रशंसकों को यह तब्दीली अच्छी लग सकती है। निर्देशक निखिल आडवाणी ने इस फिल्म में मसालों और फार्मूलों का इस्तेमाल करते हुए एक नई छौंक डाली है। उसकी वजह से पटियाला हाउस नई लगती है।

परगट सिंह कालों साउथ हाल में पला-बढ़ा एक सिख युवक है। क्रिकेट में उसकी रुचि है। किशोर उम्र में ही वह अपने टैलेंट से सभी को चौंकाता है। इंग्लैंड की क्रिकेट टीम में उसका चुना जाना तय है। तभी एक नस्लवाली हमले में साउथ हाल के सम्मानीय बुजुर्ग की हत्या होती है। प्रतिक्रिया में परगट सिंह कालों के बातूनी फैसला सुनाते हैं कि वह इंग्लैंड के लिए नहीं खेलेगा। परगट सिंह कालों अब सिर्फ गट्टू बन कर रह जाता है, जो साउथ हाल में छोटी सी दुकान चलाता है। अपने क्रिकेट प्रेम को जिंदा रखने के लिए वह रात में बॉलिंग की प्रैक्टिस करता रहता है। गट्टू के सपनों को सिमरन उकसाती है। संयोग से तभी इंग्लैंड की क्रिकेट टीम की सलेक्शन कमेडी से भी उसके पास आफर आता है। सिमरन और परिजनों के सहयोग से बाबूजी को अंधेरे में रखकर गट्टू क्रिकेट टीम में शामिल हो जाता है। उसका नाम काली रख दिया जाता है। फिर बाकी फिल्म में गट्टू के सफल क्रिकेटर बनने और बाबूजी के बदलने का भावनात्मक उछाल है। पटियाला हाउस पूरी तरह से मसाला फिल्म है। निखिल आडवाणी ने फार्मूलाबद्ध तरीके से सब कुछ रचा है। नवीनता कथाभूमि में है। इंग्लैंड में बसे भारतवंशी की अस्मिता की लड़ाई और उसे मिल रही पहचान को कहानी में पिरोकर निखिल आडवाणी ने 21वीं सदी के ग्लोबलाइजेशन को छुआ है। साथ ही गुलामी से निकले भारतीय अहं की तुष्टि भी होती है कि हिंदुस्तानी के बगैर अंग्रेज क्रिकेट में जीत हासिल नहीं कर सकते। पटियाला हाउस में विदेशी भूमि में जातीय और राष्ट्रीय पहचान के साथ दुनिया में आ रहे मैत्री भाव को भी सहज तरीके से पेश किया गया है। यह फिल्म खेल भावना, राष्ट्रीय भावना और पिता-पुत्र के प्रेम की त्रिवेणी है। हां, इसमें संयुक्त परिवार की मुश्किलों का भी वर्णन किया गया है, जिसमें व्यक्तिगत सपनों की हत्या होती रहती है। पटियाला हाउस एक काल्पनिक परिवार है, जिसमें लेखक-निर्देशक ने अपनी रुचि और मंतव्य के मुताबिक किरदार गढ़े हैं और उन्हें अपनी मर्जी से विकसित किया है। वास्तविकता के अभाव में वे सहज होने पर भी स्वाभाविक नहीं लगते। क्रिकेट खेलने के लिए गट्टू के राजी होने और उसे बाबूजी से छिपाने का प्रसंग लंबा और बचकाना है। लेकिन क्रिकेट टीम में शामिल होने के बाद काली के भावनात्मक द्वंद्व, जोश और इरादे में गति है। यहां आने के बाद पटियाला हाउस किसी दूसरी स्पोर्ट्स फिल्म की की तरह बांधती है। हम फिल्म के नायक के साथ जुड़ जाते हैं और उसकी तरह हमारी सांसें भी तेज चलने लगती हैं। निखिल आडवाणी ने अंतिम आधे घंटे में अपना कौशल दिखाया है। अगर यही कौशल इंटरवल के पहले अटकी कथा में भी दिखाते तो फिल्म और अधिक रोचक हो जाती।

कलाकारों में ऋषि कपूर बाबूजी के किरदार के साथ पूरा न्याय करते हैं। हमें अमिताभ बच्चन के साथ एक और बुजुर्ग अभिनेता मिला है जो नायक के पैरेलल भूमिकाएं निभाने में सक्षम है। डिंपल कपाडि़या ने उनका सही साथ दिया है और मिले हुए एक दृश्य में ही अपनी प्रतिभा जाहिर की है। सिमरन का चरित्र अच्छी तरह से नहीं गढ़ा गया है, इसी वजह से अनुष्का शर्मा को उसे मोहक बनाने में सीमित सफलता मिली है। संयुक्त परिवार के तमाम सदस्यों के चेहरे भी याद नहीं रह पाते। वे तेजी से आते-जाते हैं। एक-दो चरित्र ही इस आवाजाही में ही अपनी भंगिमाओं से आकर्षित कर पाते हैं।

फिल्म के गीत-संगीत में पंजाबियत है। मौका मिलते ही निखिल आडवाणी नृत्य-गीत डालने से नहीं चूकते। इस लोभ में फिल्म के क्लाइमेक्स के बाद आया गीत फिल्म के प्रभाव को कम कर देता है। हालांकि उस गीत का सुंदर और चपल फिल्मांकन किया गया है।

*** तीन स्टार


Thursday, February 10, 2011

बनारसी अंदाज में सनी देओल

-अजय ब्रह्मात्‍मज

धोती-कमीज में चप्पल पहने बनारस की गलियों में टहलते सनी देओल को देख कर आप चौंक सकते हैं। उनका लुक भी बनारस के पडों की तरह है। वास्तव में सनी देओल ने यह लुक डॉ. चद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म 'मोहल्ला अस्सी' के लिए लिया है। क्रासवर्ड एंटरटेनमेंट के बैनर तले बन रही इस फिल्म के निर्माता लखनऊ के विनय तिवारी हैं। हिंदी प्रदेश के विनय तिवारी की यह पहली फिल्म है। उन्होंने काशीनाथ सिह का उपन्यास 'काशी का अस्सी' पढ़ रखा था, इसलिए जब डॉ. चद्रप्रकाश द्विवेदी ने उनके सामने इसी उपन्यास पर फिल्म बनाने का प्रस्ताव रखा, तो वह सहज ही तैयार हो गए।

मुंबई की फिल्मसिटी में मदिर के सामने 'मोहल्ला अस्सी' का सेट लगा है। पप्पू के चाय की दुकान के अलावा आसपास की गलियों को हूबहू बनारस की तर्ज पर तैयार किया गया है। किसी बनारसी को मुंबई में अस्सी मोहल्ला देखकर एकबारगी आश्चर्य हो सकता है। पिछले दिनों काशीनाथ सिह स्वय सेट पर पहुंचे, तो सेट देख कर दंग रह गए। स्थान की वास्तविकता ने उन्हें आकर्षित किया। अपने उपन्यास के किरदारों को सजीव देखकर वह काफी खुश हुए थे। फिल्म निर्माण की प्रक्रिया से मुग्ध होकर उन्होंने कहा, 'मैंने वास्तविक किरदारों को उपन्यास का चरित्र बनाया। अब ये चरित्र फिर से पर्दे पर सजीव होंगे। मैं रोमाचित हूं।'

डॉ. चद्रप्रकाश द्विवेदी ने बताया कि फिल्म का अगला शेड्यूल बनारस में होगा। 'यमला पगला दीवाना' से दर्शकों के बीच लौटे सनी देओल इस फिल्म को लेकर बहुत उत्साहित हैं। उनका मानना है कि 'मोहल्ला अस्सी' उनके पिता धर्मेन्द्र की फिल्म 'सत्यकाम' की तरह अर्थपूर्ण और मनोरंजक होगी। यह फिल्म करवट ले रही सदी के समय के बनारस का बखान करती है। एक तरह से बदल रहे हिंदुस्तान की भी इस कथा में झलक मिलती है। सनी देओल के साथ साक्षी तवर, सीमा आजमी, रवि किशन, मुकेश तिवारी, राजेन्द्र गुप्ता, सौरभ शुक्ला, अखिलेन्द्र मिश्र आदि इस फिल्म में प्रमुख भूमिकाएं निभा रहे हैं।


Tuesday, February 8, 2011

हर फिल्म में होती हूं मैं एक अलग स्त्री: ऐश्वर्या राय बच्चन

-अजय ब्रह्मात्‍मज

हर फिल्म में होती हूं मैं एक अलग स्त्री: ऐश्वर्या राय बच्चनऐश्वर्या राय बच्चन ने इन प्रचलित धारणाओं को झुठला दिया है कि हिंदी फिल्मों में हीरोइनों की उम्र पांच साल से अधिक नहीं होती और शादी के बाद हीरोइनों को फिल्में मिलनी बंद हो जाती हैं। यह भी एक धारणा है कि सफल स्त्रियों का दांपत्य और पारिवारिक जीवन सुखी नहीं होता। वह सार्वजनिक जीवन में एक अभिनेत्री व आइकन के तौर पर नए उदाहरण पेश कर रही हैं। अवसरों को चुनना और उसका सामयिक एवं दूरगामी सदुपयोग करना ही व्यक्ति को विशेष बनाता है। इसी लिए वह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की एक खास स्त्री हैं।

शुरुआती दौर

1994 में मिस व‌र्ल्ड चुने जाने के बाद तय हो चुका था कि करियर के रूप में फिल्मों में ही आना है। तीन साल बाद 1997 में वह मणिरत्नम की तमिल फिल्म इरूवर में आई तो आलोचकों ने कहा कि कोई हिंदी फिल्म नहीं मिली होगी। शुरुआती दिनों के इस फैसले के बारे में ऐश्वर्या बताती हैं, तब यश चोपडा और सुभाष घई मेरे साथ फिल्में करना चाह रहे थे, लेकिन मैंने मणिरत्नम की तमिल फिल्म इरूवर चुनी। मेरे बारे में पूर्वाग्रह थे कि मॉडल है, खूबसूरत चेहरा है, मिस व‌र्ल्ड है और अच्छा डांस करती है। फिल्म से पहले ही मेरे साथ एक स्टारडम जुड गया था। मैंने खुद से जुडे मिथक और पूर्वाग्रहों को तोडने के लिए मणिरत्नम की फिल्म इरूवर चुनी। मणि सर ने स्पष्ट कर दिया था कि इरूवर मेरी लॉन्चिंग या शोकेसिंग फिल्म नहीं होगी, क्योंकि मैं फिल्म की महज एक किरदार हूं। फिल्मों समेत जीवन के अन्य जरूरी चुनावों में भी ऐश्वर्या ने सोच-समझ कर फैसले लिए। मध्यवर्गीय परिवारों से विरासत में मिली व्यावहारिकता उनके फैसलों को प्रभावित करती रही। आज भी वह खुद को मध्यवर्गीय परिवार की कामकाजी लडकी मानती हैं। वह कहती हैं, हालांकि साधारण कामकाजी स्त्रियों की समस्याएं मेरे साथ नहीं हैं, लेकिन व्यापक स्तर पर मेरी जिंदगी देश की दूसरी कामकाजी स्त्रियों से अलग नहीं है। सभी कामकाजी स्त्रियों की जिंदगी में कुछ चीजें समान होती हैं। स्त्री होने के स्वाभाविक गुणों के साथ घर और दफ्तर की जिम्मेदारियों का एहसास और तालमेल ही हमें आधुनिक और सफल बनाता है। आज की तमाम स्त्रियां भारत में यह संतुलन बना कर चल रही हैं। इसी रूप में मैं जिंदगी का आलिंगन करती हूं।

परिवार व करियर का तालमेल

परिवार और करियर की जिम्मेदारियों के एहसास व तालमेल के बारे में अनुभव पूछने पर ऐश्वर्या हंसने लगती हैं। फिर संयत होकर बताती हैं, इस तालमेल का कोई रूल बुक नहीं बनाया जा सकता। इसका एक सेट फार्मूला नहीं है। जिंदगी इतनी रहस्यपूर्ण है कि हर दिन चकित करती है। रोजाना इसकी जरूरतें और प्राथमिकताएं बदलती रहती हैं। शहर और परिवार में अचानक कुछ भी हो सकता है। आखिर में हमें तय करना होता है कि उस क्षण या उस दिन क्या सबसे जरूरी है? इसमें परिवार के अन्य सदस्यों के साथ पति की समझदारी और तरफदारी भी चाहिए होती है। मैं भाग्यशाली हूं कि मुझे ऐसा सहयोगी और इतना समझदार परिवार मिला है। पहले मायके और फिर ससुराल में सभी एक-दूसरे की जरूरतें समझते हैं। हम सभी एक-दूसरे से रोजाना संपर्क में रहते हैं। परिवार हमारे लिए महत्वपूर्ण और प्यारा है। हम लोग बहुत ही सामान्य और सरल चीजें करते हैं। अब जैसे एक ही शहर में हैं तो कम से कम एक बार साथ में भोजन करें। इस एक फैसले से दिन का ढेर सारा समय साथ बीतता है। अगर कोई घर पर है या किसी को छुट्टी मिल गई तो हम अपनी मीटिंग और कार्यक्रम इस हिसाब से तय करते हैं कि साथ रहने का समय मिले। हमारे काम में इतनी ढील और छूट मिल जाती है। सबसे बडी बात है कि परिवार का हर सदस्य दूसरे की जरूरतों और काम को समझते हुए समय निकालता है और सामंजस्य करता है। काम बेहद जरूरी है, पर परिवार उससे कम जरूरी नहीं है। परिवार का संबल ही काम में बल देता है।

जो छूट गया उसका अफसोस नहीं

फिल्म देवदास के बाद मैंने कहना और सोचना बंद कर दिया कि अभी छुट्टी ले लूंगी और आराम करूंगी। काम में ही आराम है। जोधा अकबर और सरकार राज की शूटिंग के दरम्यान ही मेरी शादी हुई। मैंने उसके बाद एक गैप रखा। बीच में अभिषेक और मैं एक-दूसरे की फिल्मों के सेट पर जाकर मिलते रहे। साथ रहने के लिए हमने किसी की फिल्म नहीं रोकी। फिर भी लोगों ने किस्से गढे। दिल्ली-6 के समय कहा गया कि मेरी वजह से काम रुका। हम दोनों ऐक्टर हैं और फिल्मों की जरूरत समझते हैं। यह न भूलें कि हम ऐक्टर होने के साथ पति-पत्नी भी हैं। हमें ससुराल और मायके में भी समय देना पडता है। कोई भी विवाहित महिला मायके और ससुराल के बंधन और दायित्वों को समझ सकती है। ऐसी स्थिति में सामंजस्य और कठिन परिश्रम ही काम आता है। मेरा अनुभव है कि कठिन परिश्रम का कोई विकल्प नहीं है। चूंकि यह क्षेत्र हमने चुना है, इसलिए हमें ही तय करना होगा कि कब, क्या करना है और क्या छोड देना है। कभी कुछ छोड दिया तो उसका अफसोस नहीं किया। ऐसी कई फिल्में हैं, जो मैंने छोडीं, बाद में वे हिट साबित हुई। पर अफसोस नहीं है। जिंदगी को भी समय देना जरूरी है।

करियर और फिल्में

अपने करियर और फिल्मों के चुनाव के बारे में वह बताती हैं कि मैं चाहूं तो एक ही डायरेक्टर के साथ लगातार फिल्में करती रहूं या किसी एक लोकप्रिय अभिनेता के साथ जोडी बना लूं, लेकिन मैं ऐसा नहीं चाहती। आज मैं सुकून से कह सकती हूं कि मैंने अपनी फिल्मों में वरायटी रखी। मेरी फिल्मों के बॉक्स ऑफिस परिणाम की परवाह किए बगैर निर्देशकों ने मुझे फिल्में चुनने के अवसर दिए हैं। दर्शकों और प्रशंसकों का मुझे बराबर सहयोग मिला है। उन्होंने उत्साह के साथ मेरे प्रयोगों का स्वागत किया है। उन्होंने मुझे अनुमति और आजादी दी है कि मैं नई तरह की फिल्में कर सकूं। मेरे दर्शक, निर्देशक और समीक्षक भी मानते हैं कि मेरी संभावनाएं सूखी नहीं हैं। उन्हें लगता है कि मैं आज भी कुछ नया कर देती हूं। उन्हें चौंका देती हूं।

एक अलग स्त्री

हर फिल्म में मैं एक अलग स्त्री होती हूं। समाज की एक विशेष स्त्री। उसकी विशेषताओं को जाहिर करने के लिए हम लोग मिल कर काम करते हैं। हम दिल दे चुके सनम की नंदिनी, मोहब्बतें की मेघा, देवदास की पारो, चोखेर बाली की बिनोदिनी, खाकी की महालक्ष्मी, उमराव जान की अमीरन, धूम-2 की सुनहरी, गुरू की सुजाता, जोधा अकबर की जोधा, रावण की रागिनी, रोबोट की सना और अभी गुजारिश की सोफिया, सभी अलग और स्वतंत्र स्त्रियां हैं। मुझे इन सभी को पर्दे पर साकार करने में आनंद आया।

ऐश की याददाश्त पर आश्चर्य होता है, क्योंकि इन दिनों कम अभिनेत्रियों को अपने किरदारों के नाम याद रहते हैं। पता चलता है कि उन्होंने अपने सभी किरदारों को जिया और उन्हें अपने साथ रखा है। वह बताती हैं कि जब कोई हमें निभाए किरदार के नाम से पुकारता है तो खुशी होती है कि मेहनत सफल हुई।


Monday, February 7, 2011

हमारा काम सिर्फ मनोरंजन करना है: विक्रम भट्ट

हमारा काम सिर्फ मनोरंजन करना है: विक्रम भट्ट-अजय ब्रह्मात्‍मज

आपका जन्म मुंबई का है। फिल्मों से जुडाव कैसे और कब हुआ?

मेरे दादाजी का नाम था विजय भट्ट। वे प्रसिद्ध प्रोडयूसर-डायरेक्टर रहे हैं। हिमालय की गोद में, गूंज उठी शहनाई, हरियाली और रास्ता बैजू बावरा जैसी बडी पिक्चरें बनाई। मेरे पिता प्रवीण भट्ट कैमरामैन थे। मैं डेढ साल की उम्र से ही फिल्म के सेट पर जा रहा था। अंकल अरुण भट्ट डायरेक्टर व स्टोरी राइटर थे, पापा कैमरामैन थे तो दादा डायरेक्टर। घर में दिन-रात फिल्मों की चर्चा होती थी। बचपन से फिल्म इन्फॉर्मेशन और ट्रेड गाइड पत्रिकाएं देखता आ रहा हूं घर में। ऐसे माहौल में फिल्मों से इतर कुछ और सोचने की गुंजाइश थी ही कहां। हालांकि मेरे चचेरे भाई फिल्मों से नहीं जुडे। मुझे शुरू से यह शौक रहा। कहानियां सुनाने का शौक मुझे बहुत था।

सुना है कि कॉलेज के दिनों में आपने और बॉबी देओल ने मिलकर फिल्म बनाई थी?

तब केवल सोलह की उम्र थी मेरी। मैंने निर्देशन दिया और बॉबी ने एक्ट किया।

कब फैसला किया कि डायरेक्टर ही बनना है, एक्टर नहीं?

सात साल का था, तभी फैसला कर लिया था कि डायरेक्टर ही बनूंगा। इतनी कम उम्र में करियर का फैसला कम ही लोग करते हैं शायद। तभी से डायरेक्टर बनने की धुन सवार हो गई थी।

क्या वजह हो सकती है इसकी?

पता नहीं, ठीक-ठीक बताना मुश्किल होगा। मुझे कहानी सुनाने में आनंद मिलता है। मैं डायरेक्टर बना कहानियां सुनाने के लिए.. अलग-अलग कहानियां। लेकिन फिर इस फिल्मी सफर में मैं कहीं खो गया। कहानियां बताना ही बंद कर दिया मैंने, जबकि डायरेक्टर का पहला काम कहानी सुनाना ही है। अब यह काम मैं फिर से कर रहा हूं। मुझे स्कूल के दिनों में काफी सजा मिलती थी। उनसे बचने के लिए कहानियां गढता था।

कैसे स्टूडेंट थे आप?

सामान्य स्टूडेंट था। कोई कमाल का स्टूडेंट नहीं था। लगता था कि नंबर पाने के लिए क्यों पढाई करो। उतना ही पढो कि अगली क्लास में चले जाओ और टीचर और पेरेंट्स से डांट न सुननी पडे। सच कहूं तो पढाई से ज्यादा मेरा मन किस्से-कहानियों में लगता था।

किस्से सुनाना, झूठ बोलना, ये-वो कुछ भी गढना..?

किस्से नहीं, कहानियां सुनाना। संयोग ऐसा था कि मेरे सभी दोस्त सुनते थे। सभी को लगता था कि विक्रम राइटर बनेगा। उसका मन इसी में लगता है। लेकिन सीरियस लिटरेचर की तरफ मेरा ध्यान नहीं था। गुजराती होने के कारण सामान्य साहित्यिक संस्कार जरूर मिले थे।

सेल्यूलाइड पर कहानी लिखना ही फिल्म है। कई मायने में उससे जटिल और बडा काम है। अन्य विधाएं भी जुडती हैं। ट्रेनिंग कैसे की आपने?

सबसे पहले मैं जुडा मुकुल आनंद साहब से, उनका असिस्टेंट बना, तब सिर्फ चौदह साल का था। वे कानून क्या करे बना रहे थे। वह उनकी भी पहली फिल्म थी। उनके साथ मैं छह-सात साल रहा। पढाई भी साथ में चल रही थी। अग्निपथ में मैं उनका चीफ असिस्टेंट था। अग्निपथ के बाद मैंने उन्हें छोड दिया। फिर मैंने शेखर कपूर के साथ काम किया।

कौन सा प्रोजेक्ट था वह?

उनके तीन प्रोजेक्ट थे तब, जो बदकिस्मती से नहीं बन सके। सनी देओल और जैकी श्राफ के साथ हम दुश्मनी कर रहे थे। टाइम मशीन पर भी काम चल रहा था, जो बीच में ही बंद हो गई। बॉबी देओल की फिल्म बरसात थी। बरसात बाद में राजकुमार संतोषी ने पूरी की। फिर दो सालों तक उनके साथ कुछ न कुछ करता रहा। उसके बाद महेश भट्ट साहब के साथ रहा दो साल। उनसे फिल्म के इमोशन की बारीकियां सीखीं। कुल मिला कर मैं तकरीबन ग्यारह सालों तक असिस्टेंट रहा। उसके बाद मुकेश जी ने ब्रेक दिया जानम में। जानम के बाद मदहोश, गुनहगार और बंबई का बाबू आई। किस्मत ऐसी थी कि मेरी चारों फिल्में फ्लॉप हो गई। काम मिलना ही बंद हो गया। मुकेश जी ने एक दिन वापस बुलाया। हिम्मत बंधाई और एक किस्म से मुझे नया जन्म दिया। मैंने फरेब बनाई। उसके बाद अच्छा दौर चला। गुलाम, कसूर, राज और आवारा पागल दीवाना में कामयाबी मिली। उसके बाद फिर एक डरावना दौर भी आया, जब पांच-छह पिक्चरें नहीं चलीं।

भट्ट साहब के साथ किन फिल्मों में आप उनके असिस्टेंट थे?

हम हैं राही प्यार के और जुनून। दोनों ही फिल्मों का अनुभव अच्छा रहा।

मैंने सुना था कि आमिर खान ने आपको गुलाम फिल्म दिलवाई थी। उस समय भट्ट साहब से निर्देशन के मसले पर उनका झगडा हुआ था?

नहीं, गुलाम मुझे भट्ट साहब ने ही दिलवाई। आमिर खान के साथ उनका झगडा कभी नहीं हुआ था। आमिर ने उन्हें कहा कि आप फिल्म को पूरा समय दें। और भट्ट साहब का जवाब था कि गुलाम मेरी जिंदगी की अहम पिक्चर नहीं है। फिर उन्होंने कहा कि हमारी कंपनी में दो डायरेक्टर हैं। एक विक्रम भट्ट और दूसरी तनूजा चंद्रा। आप दोनों में से किसके साथ काम करना चाहते हैं? चूंकि आमिर ने मेरे साथ पहले हम हैं राही प्यार के में काम किया था और मैंने मदहोश बनाई थी उनके भाई फैजल खान के साथ, तो वे मुझे अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने कहा कि मैं विक्रम भट्ट के साथ काम करूंगा। गुलाम मुझे मिल गई।

आपके गुरु मुकुल आनंद, शेखर कपूर और महेश भट्ट हुए। तीनों अलग-अलग किस्म के फिल्ममेकर हैं। तीनों की विशेषताएं आपमें आई हैं या आप अलग लीक पर भी चले?

मुकुल आनंद से मैंने टेक्निकल चीजें सीखीं। कैमरा प्लेसिंग, लाइटिंग, ब्लॉक वगैरह..। लेकिन कहानी बनाना मैंने शेखर कपूर के साथ सीखना शुरू किया। महेश भट्ट जी ने मुझे और सिखाया, उनका प्रभाव मुझ पर सबसे ज्यादा है। कुछ लोग मुझे उनका विस्तार मानते हैं।

मेरा सीधा सवाल है कि और कौन-कौन से डायरेक्टर हैं, जिनसे आप प्रभावित रहे? इन तीनों के अलावा भी तो कुछ लोग होंगे?

बात हो रही थी किसी से। उन्होंने पूछा कि आप के फेवरिट डायरेक्टर कौन हैं? मेरा जवाब था, कोई नहीं। हर डायरेक्टर की ही कुछ फिल्में हैं, जो मुझे अच्छी लगती हैं। मुझे लगता है कि हर डायरेक्टर कुछ अच्छा काम करता है तो कुछ बुरा करता है। कपोला की गॉडफादर और ड्रैकुला मुझे पसंद हैं। लेकिन उनकी वन फ्रॉम द हार्ट पसंद नहीं है। भट्ट साहब की सारांश, अर्थ, काश, जख्म, तमन्ना, हम हैं राही प्यार के जैसी फिल्में पसंद हैं, कुछ फिल्में पसंद नहीं हैं। डेविड धवन की शोला और शबनम, कुली नंबर वन, बीवी नंबर वन अच्छी लगी। लेकिन कुछ फिल्में अच्छी नहीं लगीं। जब कोई अच्छा काम देखता हूं तो महसूस होता है कि मैं कितना पीछे रह गया। जे.पी. दत्ता की बॉर्डर देखता हूं तो लगता है कि क्या सचमुच कोई इतनी मेहनत कर सकता है? रामगोपाल वर्मा की सरकार देखता हूं। इतनी नई टेक्नीक के साथ, ऐसी नई फोटोग्राफी के साथ वे फिल्म लेकर आए कि मुझे ईष्र्या होती है। ऐसे लोग मुझे प्रेरित करते हैं।

आपकी ट्रेनिंग फिल्म के सेट पर हुई। क्या कभी इंस्टीटयूट जाने या ट्रेनिंग करने का खयाल नहीं आया? चौदह साल की उम्र में ही आपको मौका मिल गया। अगर कोई बाहर से आना चाह रहा हो तो वह क्या करे?

मुझे लगता है कि यहीं सीखना बेहतर है। कहते हैं, यहां सेटअप बनाना जरूरी है। फिल्म टेक्नीक तो आदमी सीख जाता है। उससे इंडस्ट्री नहीं चलती। इंडस्ट्री के उतार-चढाव कैसे हैं? लोग कैसे हैं? उनसे कैसे बर्ताव होना चाहिए या करना चाहिए? कैसे उठना-बैठना चाहिए? यह सब भी सीखना बहुत जरूरी है।

मैं कहूं कि यहां काम करने से ज्यादा आपको काम निकालना आना चाहिए?

बिलकुल। काम निकालना आता है तो आप काम कर सकते हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ही नहीं, हर बिजनेस में यह जरूरी है। जब तक आप फिल्म न बना लें, डायरेक्टर नहीं बन सकते। थ्योरी जान लेने से क्या होता है?

पहली फिल्म जानम का सेटअप कैसे तैयार हुआ? याद करके बताएं?

पूजा बचपन की दोस्त हैं। मेरे डैडी ने हमेशा महेश भट्ट साहब की पिक्चरें की हैं। राहुल भी दोस्त था। सेटअप बन गया। फिर मदहोश के लिए ताहिर साहब ने मुझे बुलाया। मैं हम हैं राही प्यार के पर काम कर रहा था। उन्हें लगा कि मैं डायरेक्टर बन सकता हूं। आमिर ने भी ग्रीन सिग्नल दिया तो काम मिल गया।

जानम के लिए पहले दिन एक्शन बोला तो मन में क्या चल रहा था?

वास्तव में उसके पहले मैंने भट्ट साहब के लिए काफी शूटिंग की थी। वे सीन देकर जाते थे। गाना हो या एक्शन, भट्ट साहब व्यस्त होते तो मुझसे ही करने को कहते। इस तरह थोडा-बहुत हाथ साफ करने का मौका मिला। जानम की बात करूं तो वर्ली में सत्यम थिएटर हुआ करता था। उसकी कार पार्किग में पहले दिन की मेरी शूटिंग थी। जिंदगी का पहला दिन। पूजा और राहुल रॉय थे उसमें। कार पार्क में एक सीन शूट किया हम लोगों ने। अच्छी तरह याद है। अब सोचता हूं कि कितना बुरा काम किया था हमने।

रिग्रेट फील करते हैं?

कई रिग्रेट हैं, हर रोज ही कुछ न कुछ रिग्रेट करता हूं। लेकिन इंडस्ट्री में आना रिग्रेट नहीं करता। मैंने कई गलतियां की हैं। खुशनसीब हूं कि इसके बावजूद यहां हूं। मुमकिन है कि यहां कोई मुझे पसंद करता है और मेरे लिए फिल्मों का इंतजाम कर देता है। काम मिल ही जाता है।

जो नए लडके आ रहे हैं, उनके लिए क्या कहेंगे आप? अगर उन्हें डायरेक्टर बनना हो तो?

यही कहूंगा कि हर फिल्म ऐसे बनाओ, जैसे पहली फिल्म बना रहे हो। मार्केट के प्रेशर से कभी मत डरो। जो फिल्म बनानी है वही बनाओ। क्योंकि यहां किसी को भी कुछ नहीं मालूम। जो पंडित या समीक्षक हैं, उन्हें भी कुछ नहीं मालूम है। इसलिए अपने दिल की और अपने सोच की पिक्चर बनाओ।

लेकिन ब्रेक कैसे मिले? पहली फिल्म किए बगैर आपको कोई दूसरी फिल्म नहीं देगा?

मैं यह मानता हूं कि हर डायरेक्टर एक नया एंगल लेकर आता है लाइफ का। उसके अनुभव व सोच अलग होते हैं। अब सोचिए कि इंडस्ट्री क्या करती है? हर नई सोच को हमारी यह फिल्म इंडस्ट्री अपने हिसाब से ढालने की कोशिश करती है। ऐसे में नया तो बचता ही नहीं। नए आदमी को नया काम करने दो, तभी तो बात बनेगी।

अगर मैं पूछूं कि आपने या आपकी पीढी ने हिंदी सिनेमा में क्या कंट्रीब्यूट किया तो क्या कहेंगे?

मुझे लगता है कि मेरे सारे कलीग्स ने बहुत अच्छा काम किया है। खासतौर पर आदित्य चोपडा, करण जौहर, सूरज बडजात्या और राम गोपाल वर्मा ने, जो मेरे सीनियर हैं। संजय गुप्ता ने टेक्नीक में काफी अलग-अलग चीजें की हैं। मेरी पीढी ने जितने सुपर स्टार डायरेक्टर देखे हैं, शायद किसी और पीढी ने नहीं देखे होंगे।

फिर बार-बार ये क्यों कहा जाता है कि 50-60 का दौर था ?

ये सब कहने की बातें हैं। लोग हमेशा पुराने को याद करते हैं। मुझे भी बचपन की फिल्में अच्छी लगती हैं। मुझे भी अमित जी की फिल्में नमकहलाल, शोले, और दीवार बहुत अच्छी लगती हैं। मुझसे दस साल छोटे चचेरे भाई को अमर अकबर एंथोनी अच्छी लगती है। कहता है, ऐसी फिल्में क्यों नहीं आतीं अब? जबकि उसके लिए 50-60 का दौर एक इतिहास की तरह ही है। मुझे लगता है कि आदमी हमेशा अपनी जवानी की फिल्मों को याद रखता है। क्योंकि उनसे वह सर्वाधिक प्रेरित होता है। उनसे खुद को जोडता है। मुझे भी युवावस्था में देखी फिल्में अब तक याद हैं और मैं भी सोचता हूं कि अब ऐसी फिल्में क्यों नहीं बनतीं?

क्या शूटिंग करते समय आपको दर्शकों का खयाल रहता है?

ये तो सोचना ही होता है कि अमुक सीन करेंगे तो दर्शक हंसेंगे या ये करेंगे तो दर्शक पसंद नहीं करेंगे। दर्शकों के टेस्ट को तो दिमाग में रखना ही पडता है। एक फार्मूले में रहते हुए ही अलग काम कर सकते हैं। सबसे जरूरी है, दर्शकों का मनोरंजन हो।

शिक्षा या संदेश नहीं होना चाहिए?

शिक्षा और संदेश के लिए किताबें हैं और डिस्कवरी चैनल है। टिकट लेकर कोई पढने क्यों आएगा? मनोरंजन के साथ सबक या सोच मिल जाए तो यह अलग बात है। शायद हम भी यही कर रहे हैं। फिल्में किसी को उत्तेजित कर सकती हैं, उन्हें पल भर के लिए दुनियादारी से दूर कर सकती हैं। हम लोग विशुद्ध एंटरटेनर हैं, हमें मनोरंजन ही करना है, बस और कुछ नहीं।


Saturday, February 5, 2011

सेंसर बोर्ड की चिंताएं

-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले दिनों शर्मिला टैगोर ने मुंबई में फिल्म निर्माताओं के साथ लंबी बैठक की। अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने अपने विचार शेयर किए और निर्माताओं की दिक्कतों को भी समझने की कोशिश की। मोटे तौर पर सेंसर बोर्ड से संबंधित विवादों की वजहों का खुलासा किया। उन्होंने निर्माताओं को उकसाया कि उन्हें सरकार पर दबाव डालना चाहिए ताकि बदलते समय की जरूरत के हिसाब से 1952 के सिनेमेटोग्राफ एक्ट में सुधार किया जा सके। उन्होंने बताया कि उनकी टीम ने विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर दो साल पहले ही कुछ सुझाव दिए थे, किंतु सांसदों के पास इतना वक्त नहीं है कि वे उन सुझावों पर विचार-विमर्श कर सकें। उनके इस कथन पर निर्माताओं को हंसी आ गई।

केंद्र के स्वास्थ्य मंत्रालय ने सीबीएफसी (सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन) को हिदायत दी थी कि किसी भी फिल्म में धूम्रपान के दृश्य हों, तो उसे ए सर्टिफिकेट दिया जाए। सीबीएफसी ने अभी तक इस पर अमल नहीं किया है, क्योंकि सीबीएफसी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन आता है और उसने ऐसी कोई सिफारिश नहीं की है। शर्मिला टैगोर ने उड़ान और नो वन किल्ड जेसिका के उदाहरण देकर समझाया कि कैसे इन फिल्मों में धूम्रपान के दृश्य थे और वे किरदारों के चरित्र निर्वाह की लिहाज से आवश्यक थे। अब अगर उन दृश्यों को काट दिया जाता तो निश्चित ही फिल्म का प्रभाव कम होता। उन्होंने बताया कि समझदार निर्देशक स्वयं ही दिशा निर्देशों का खयाल रखते हैं और संयम से काम लेते हैं।

बैठक में मौजूद आमिर खान ने रोचक सलाह दी कि जिन फिल्मों में हम स्टार धूम्रपान के दृश्य करते हैं, उन फिल्मों के लिए हम 30 सेकेंड का एक संदेश भी डालें कि धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है और इस फिल्म में धूम्रपान के दृश्य चरित्र और कहानी की जरूरत को ध्यान में रखकर डाले गए हैं। उनकी इस नेक सलाह का शर्मिला टैगोर समेत बैठक में मौजूद निर्माताओं ने स्वागत किया। जोया अख्तर ने इस प्रकार की कोशिशों पर ही सवाल उठाया। उनका सवाल था कि अगर धूम्रपान समाज में गैरकानूनी हरकत नहीं है, तो उसे फिल्मों में दिखाने या न दिखाने पर बहस क्यों चलती है? हम क्यों समाज के गार्जियन बन जाते हैं? आज के समाज में किशोरों के एक्सपोजर का लेवल बढ़ गया है। अभी वे अपनी मर्जी से लाइफ स्टाइल चुनते हैं।

राजकुमार हिरानी ने बताया कि लगे रहो मुन्नाभाई लिखते समय वे इस तथ्य को लेकर चिंतित थे कि फिल्म में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का संदर्भ है। मालूम नहीं कि सेंसर बोर्ड के सदस्यों का क्या रवैया हो? हालांकि उन्हें अपनी फिल्म को लेकर कोई दिक्कत नहीं हुई, फिर भी उनका सुझाव था कि अगर सेंसर बोर्ड ऐसी सुविधा प्रदान करे या ऐसी कोई समिति बनाए, जहां लेखक-निर्देशक अपनी शंकाओं का निराकरण कर सकें तो फिल्म बनाने के बाद दृश्य काटने के भारी नुकसान और मेहनत से बचा जा सकता है। उनके इस सुझाव को व्यावहारिक मानने के बावजूद सीबीएफसी के अधिकारियों ने कहा कि फिलहाल यह संभव नहीं है। शायद उन्हें मालूम नहीं कि इन दिनों नाटकों के प्रदर्शन के पहले उनकी स्क्रिप्ट पर अनापत्ति प्रमाणपत्र लेना पड़ता है। अगर कोशिश की जाए तो फिल्मों की स्क्रिप्ट की पड़ताल का तरीका निकाला जा सकता है।

दरअसल, समाज के साथ-साथ सिनेमा भी तेजी से बदल रहा है। अभी हर तरह की फिल्में बन रही हैं। जरूरत है कि संबंधित मंत्रालय और सांसद फिल्म संबंधित सिनेमेटोग्राफ एक्ट में आवश्यक सुधार करें। निर्माताओं को इस दिशा में पहल करनी होगी। उन्हें दर्शकों को भी जागृत करना होगा कि वे वास्तविक स्थितियां समझ सकें। सुधारों के साथ-साथ सरकार को इसका भी खयाल रखना होगा कि सेंसर बोर्ड के प्रमाणन के बाद होने वाली आपत्तियों से वह कानून और व्यवस्था के तहत निपटे। किसी एक व्यक्ति, समुदाय या समूह की आपत्ति से फिल्मों का प्रदर्शन न रुके।