Search This Blog

Monday, January 31, 2011

मजा देगा जोर का झटका

-अजय ब्रह्मात्‍मज

दिल से दिमाग तक या शरीर के किसी भी हिस्से में.. कहींभी लग सकता है 'जोर का झटका'। इमेजिन के नए रिएलिटी शो से एंटरटेनमेंट का झटका देने आ रहे शाहरुख खान

टीवी पर आप क्या देखते हैं?

मुझे व्यक्तिगत तौर पर क्विजिंग, स्पोर्ट्स शो अच्छे लगते हैं। खेल देखने में रोमाच बना रहता है। रिएलिटी शो का अलग मजा है।

आजकल रिएलिटी शो की माग बढ़ गई है। क्या वजह हो सकती है?

मुझे लगता है कि फन, फिक्शन और स्पोर्ट्स के तत्व एक साथ रिएलिटी शो में मिलते हैं, इसलिए लोग ज्यादा पसद करते हैं।

आप कौन से रिएलिटी शो देखना पसद करते हैं?

मुझे डास के शो अच्छे लगते हैं। सब देख पाना मुमकिन नहीं है। फिल्म के प्रोमोशन के समय पता चलता है कि कौन सा देखना है? कुछ शो हैं, जिनमें हम दूसरों की जिंदगी में झाकने की कोशिश करते हैं। मुझे वे अच्छे नहीं लगते। मुझे लगता है कि क्या किसी और की जिंदगी में झाकना? जब अपनी जिंदगी में ही इतने उतार-चढ़ाव हैं।

टीवी काफी तेजी से हमारे जीवन में प्रवेश कर रहा है?

बिल्कुल, यह इंटरेक्टिव होता जा रहा है। कुछ समय के बाद ऐसा होगा कि हम टीवी के होस्ट से सीधी बातचीत कर सकें। यह हमारे घरों में मौजूद है और कुछ भी करते हुए दिखता रहता है। फिक्शन के बारे में दर्शकों को मालूम रहता है कि यह नकली है, जबकि रिएलिटी शो में असली किरदार होते हैं। उन्हें देखने का थ्रिल होता है। इधर सुन रहा हूं कि अब रिएलिटी शो में रिएलिटी नहीं होती। वहा भी परफार्मेस चलने लगा है। शायद एंटरटेनमेंट के लिए वह जरूरी हो गया हो।

'जोर का झटका' सुनते ही सबसे पहले क्या ख्याल आता है?

जीपीएल..जब शो देखेंगे तो इसका मतलब समझ जाएंगे। मैं तो दिल्ली का हूं। उधर यह टर्म चलता है कि बड़ा जोर का झटका लगा। कभी-कभार खूबसूरत हसीना को देखकर लगता है। वैसे काम और खेल में भी लगता है। यह रोजमर्रा की जिंदगी का टर्म है। मैं इसे पॉजिटिव रूप में लेता हूं। एक एनर्जी मिलती है कि चलो कुछ करो। हमारे शो के लिए यह बिल्कुल उपयुक्त है। शुरू में इस शो को देखेंगे तो खूब हंसी आएगी। खासकर जब प्रतियोगियों को झटके लगेंगे। बाद में आप उनसे जुड़ जाएंगे, तो आपको वे ही झटके बुरे लगने लगेंगे। इनके बीच आप को इंसान की फितरत भी देखने को मिलेगी।

आप इस शो के लिए अर्जेटीना नहीं गए। वह एक मुद्दा बन गया है कि बगैर गए आप कैसे होस्ट करेंगे?

इस शो का फॉर्मेट ही ऐसा है। प्रजेंटर और कमेंटेटर शुरू में नहीं जाते। वे प्रतियोगियों से मिलते हैं। दूसरे देशों का नहीं कह सकता। भारत का यही फॉर्मेट है। मुझे लगता है कि दूर रहने से कोई जुड़ाव नहीं बनेगा। मैं वहा उन्हें लगातार देखूं और उनकी मुश्किलों को समझूं, तो उनका मजाक नहीं उड़ा पाऊंगा। को-एंकर सौम्या टंडन थीं, वहा और उनसे मेरी बात हो जाती थी। साथ में रहने पर आप इमोशनली जुड़ सकते हैं।

'वाइप आउट' का भारतीय सस्करण 'जोर का झटका' कितना अलग होगा?

हम लोग इमोशनल व्यक्ति हैं। आप 'बिग बॉस', 'कौन बनेगा करोड़पति' इत्यादि में यह देख चुके हैं। हमारी प्रस्तुति में दर्शक और प्रतियोगियों के बीच एक कनेक्शन रहता है। भारतीय सदर्भ में रिएलिटी शो में फिल्म स्टार बतौर होस्ट आते हैं, तो उसकी पॉपुलैरिटी बनती है। विदेशों में जरूरी नहीं कि होस्ट पॉपुलर फिल्म स्टार हों।


Saturday, January 29, 2011

फिल्‍म समीक्षा :दिल तो बच्चा है जी

-अजय ब्रह्मात्‍मज
दिल तो बच्चा  है जी- रह गई कसर

मधुर भंडारकर मुद्दों पर फिल्में बनाते रहे हैं। चांदनी बार से लेकर जेल तक उन्होंने ज्वलंत विषयों को चुना और उन पर सराहनीय फिल्में बनाईं। दिल तो बच्चा है जी में उन्होंने मुंबई शहर के तीन युवकों के प्रेम की तलाश को हल्के-फुल्के अंदाज में पेश किया है। फिल्म की पटकथा की कमियों के बावजूद मधुर भंडारकर संकेत देते हैं कि वे कॉमेडी में कुछ नया या यों कहें कि हृषिकेश मुखर्जी और बासु चटर्जी की परंपरा में कुछ करना चाहते हैं। उनकी ईमानदार कोशिश का कायल हुआ जा सकता है, लेकिन दिल तो बच्चा है जी अंतिम प्रभाव में ज्यादा हंसा नहीं पाती। खास कर फिल्म का क्लाइमेक्स बचकाना है।

तलाक शुदा नरेन, खिलंदड़ा और आशिक मिजाज अभय और मर्यादा की मिसाल मिलिंद के जीवन की अलग-अलग समस्याएं हैं। तीनों स्वभाव से अलग हैं, जाहिर सी बात है कि प्रेम और विवाह के प्रति उनके अप्रोच अलग हैं। तीनों की एक ही समस्या है कि उनके जीवन में सच्चा प्रेम नहीं है। यहां तक कि आशिक मिजाज अभय को भी जब प्रेम का एहसास होता है तो उसकी प्रेमिका उसे ठुकरा देती है। शहरी समाज में आए परिवर्तन को दिल तो बच्चा है जी प्रेम और विवाह के संदर्भ में टटोलती है। हम पाते हैं कि सचमुच रिश्तों को लेकर हमारी भावनाएं बदल चुकी हैं। मुझे तो यह फिल्म महिला चरित्रों के एंगल से अधिक रोचक लगी। अगर उनकी भूमिकाओं में दमदार कलाकारों को लेकर फिल्म की प्रस्तुति बदल दी जाती तो फिल्म अधिक रोचक और नई हो जाती। हमें जून, गुनगुन और निक्की के रूप में ज्यादा वास्तविक महिला किरदार दिखाई पड़ते हैं, जिनकी जिंदगी में प्रेम और विवाह के मायने बदल गए हैं। फिल्म के तीनों नायकों को लग सकता है कि नायिकाओं ने उन्हें धोखा दिया और इस धोखे के भ्रम में दर्शक भी आ सकते हैं, जबकि जून, गुनगुन और निक्की आज के समाज की तीन प्रतिनिधि लड़कियां हैं, जो अपने तबकों की लड़कियों की सोच में आए बदलाव को जाहिर करती हैं। अफसोस कि हीरो केंद्रित हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में मधुर अपनी फिल्म का एंगल नहीं बदल सके और उनकी ईमानदार कोशिश एक कमजोर फिल्म के रूप में सामने आई।

एक स्तर पर लगता है कि कलाकारों के चुनाव में भी मधुर से गलती हुई है। अभय के रूप में उन्होंने जिस किरदार की कल्पना की है, उसे इमरान हाशमी बखूबी नहीं निभा पाते। नरेन और मिलिंद के किरदारों को अजय देवगन और ओमी वैद्य भी सिर्फ निभा ही पाते हैं। फिल्म की नायिकाएं अभिनय के लिहाज से कमजोर हैं। श्रद्धा दास ने ज्यादा निराश किया है। श्रुति हसन और शाजान पदमसी ठीक लगती हैं। दिल तो बच्चा है जी गुलजार के लोकप्रिय गीत की पंक्ति है, इस गीत का भाव अगर फिल्म में उतर पाता तो फिल्म यादा मनोरंजक हो जाती।

**1/2 ढाई स्टार


Tuesday, January 25, 2011

जिया रजा बनारस-डा चंद्रप्रकाश द्विवेदी

-अजय ब्रह्मात्‍मज

अमृता प्रीतम के उपन्यास 'पिंजर' पर फिल्म बना चुके डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने अगली फिल्म के लिए काशीनाथ सिंह की रचना 'काशी का अस्सी' का चुनाव किया है। उनसे बातचीत के अंश-

[आप लंबे अंतराल के बाद शूटिंग करने जा रहे हैं?]

काम तो लगातार कर रहा हूं। बीते चार सालों में मैंने टीवी के लिए उपनिषद गंगा की शूटिंग की। लिख भी रहा था। हां, फिल्म के सेट पर लंबे समय के बाद जा रहा हूं।

[नई फिल्म की कहानी क्या है?]

बनारस के बैकड्राप में यह पूरे देश की कहानी है। यह व्यंग्य है। हम कुछ मूल्यों को लेकर जीवन जीते हैं। उन मूल्यों के लिए लड़ते रहते हैं, फिर ऐसा मुकाम आता है, जब उन मूल्यों का ही समझौता करना पड़ता है। इसमें बनारसी अक्खड़पन है। मस्ती और चटखीला उल्लास है। यह जीवन के उत्सव की कहानी है। फिल्म के लिए सनी देओल, रवि किशन, निखिल द्विवेदी, मुकेश तिवारी, सौरभ शुक्ला, दयाशंकर पांडे के साथ रंगमंच के अनेक कलाकारों का चुनाव हो चुका है। बनारस की प्रतिभाएं भी दिखेगी।

[तो क्या इस फिल्म की शूटिंग बनारस में भी करेंगे?]

बनारस के रंग और छटा के बिना यह फिल्म पूरी नहीं हो सकती। बनारस की विशेषताओं के बिंब फिल्म में लाना चाहता हूं। फिल्म की आधी शूटिंग मुंबई और आधी बनारस में होगी। अभी तक मैंने ज्यादातर नियंत्रित माहौल में काम किया है। इस बार मुझे बनारस के भीड़-भाड़ वाले इलाकों में शूटिंग करनी है। घाट पर शूटिंग करनी है। लोकप्रिय अभिनेताओं की वजह से उमड़ी भीड़ को संभालना बड़ी चुनौती होगी।

[साहित्य पर फिल्म बनाना तलवार की धार पर चलने की तरह है। आप क्या मानते हैं?]

मेरे लिए साहित्य पर फिल्म बनाना चुनौती नहीं रही। अभी तक मैंने गंभीर विषय ही उठाए हैं। इस बार फिल्म का मुख्य स्वर हास्य है। मुझे नहीं लगता कि दर्शक साहित्य से घबराते हैं, दरअसल वे रसहीनता बर्दाश्त नहीं करते। यह पुस्तक हंसने और तनाव से मुक्त होने के लिए लिखी गई है। इस रचना के पीछे बड़ा विचार भी है। काशीनाथ सिंह ने पाठकों को लोटपोट करते हुए कुछ बताने की कोशिश की है।

[फिल्म में काशीनाथ सिंह की कितनी भागीदारी है?]

अमृता प्रीतम ने कहा था कि मैंने किताब के रूप में अपनी कहानी लिख दी, फिल्म में दर्शक आपकी कहानी देखेंगे। काशीनाथ जी ने भी मुझे यह किताब दे दी है और कहा कि अब यह आपकी रचना है। उन्होंने एक ही बात कही है कि रिलीज के पहले मुझे एक बार दिखा देना। मुझे लगता है कि वे अपनी हैरत बचाए रखना चाहते हैं!


Sunday, January 23, 2011

फिल्‍म समीक्षा : धोबी घाट

-अजय ब्रह्मात्‍मज
धोबी घाट: एक शहर, चार किरदार

मुंबई शहर फिल्मकारों को आकर्षित करता रहा है। हिंदी फिल्मों में हर साल इसकी कोई न कोई छवि दिख जाती है। किरण राव ने धोबी घाट में एक अलग नजरिए से इसे देखा है। उन्होंने अरूण, शाय, मुन्ना और यास्मिन के जीवन के प्रसंगों को चुना है। खास समय में ये सारे किरदार एक-दूसरे के संपर्क और दायरे में आते हैं। उनके बीच संबंध विकसित होते हैं और हम उन संबंधों के बीच झांकती मुंबई का दर्शन करते हैं। किरण ने इसे मुंबई डायरी भी कहा है। मुंबई की इस डायरी के कुछ पन्ने हमारे सामने खुलते हैं। उनमें चारों किरदारों की जिंदगी के कुछ हिस्से दर्ज हैं। किरण ने हिंदी फिल्मों के पुराने ढांचे से निकलकर एक ऐसी रोमांटिक और सामाजिक कहानी रची है, जो ध्यान खींचती है।

एकाकी अरूण किसी भी रिश्ते में बंध कर नहीं रहना चाहता। उसकी फोटोग्राफर शाय से अचानक मुलाकात होती है। दोनों साथ में रात बिताते हैं और बगैर किसी अफसोस या लगाव के अपनी-अपनी जिंदगी में मशगूल हो जाते हैं। पेशे से धोबी मुन्ना की भी मुलाकात शाय से होती है। शाय मुन्ना के व्यक्तित्व से आकर्षित होती है। वह उसे अपना एक विषय बना लेती है। उधर मुन्ना खुद को शाय के निकट पाता है। दूर सपने में उसे शाय की निकटता मोहब्बत जैसी लगती है। इधर नए मकान में आया अरूण एक वीडियों के सहारे यास्मिन के बारे में जानने-समझने की कोशिश करता है। मुंबई के ये चारों किरदार अलग-अलग वर्ग और स्तर के हैं। जाहिर सी बात है कि उनके अंतर्संबंधों में लगाव-अलगाव का एक वर्गीय तनाव है। वे न चाहते हुए भी उससे नियमित होते हैं। किरण राव हिंदी फिल्मों के मिथ और दर्शन को इन किरदारों के माध्यम से तोड़ती है। बगैर किसी नारेबाजी या स्पष्ट घोषणा के वह बता जाती हैं कि प्रेम का वर्गीय आधार होता है। यह फिल्म कई स्तरों पर मुंबई शहर की कहानी सुनाती है। फिल्म का शीर्षक एक रूपक है, जो बखूबी फिल्म के भाव को व्यक्त करता है।

किरण राव ने किरदारों के चयन और गठन में भी हिंदी फिल्मों के पुराने समीकरणों का उपयोग नहीं किया है। अरूण, शाय, मुन्ना और यास्मिन जैसे किरदारों का हमने पहले पर्दे पर देखा है, लेकिन वास्तविक चरित्र के रूप में उनकी प्रस्तुति और उनका रियल परिवेश इसे फंतासी का रूप नहीं लेने देता। यहां निम्नवर्गीय मुन्ना का उच्च मध्यवर्गीय शाय से लगाव मोहब्बत में नहीं बदल पाता। उसके लिए किरण कोई नाटकीय स्थिति या ड्रामा नहीं क्त्रिएट करतीं। फिल्म की ज्यादातर शूटिंग नैचुरल लाइट और रियल लोकेशन पर की गई है। अमच्योर किस्म के एक्टर अपने किरदारों को सहत और वास्तविक रहने देते हैं। यहां तक कि आमिर खान भी एक सामान्य किरदार के तौर पर पेश किए गए हैं। धोबी घाट एक सुंदर प्रयोग है। इसकी पटकथा मेंआगे-पीछे छलांग लगाती घटनाएं कई बार चौंकातीे हैं। खास स्टाइल में फ्लैशबैक या लीनियर कहानी देखने के आदी दर्शकों को यह फिल्म अजीब सी लग सकती है। वहीं विश्व सिनेमा से परिचित और अपारंपरिक विषयों के शौकीन दर्शकों को धोबी घाट संतुष्ट करेगी।

धोबी घाट में अरूण के किरदार में आमिर खान को लेकर किरण राव ने जोखिम का काम किया है। इस फिल्म में वे अपने स्टारडम के बगैर हैं। अरूण को पर्दे पर साकार करने में उनकी मेहनत नजर आती है। वे स्वाभाविक नहीं लगते। उसकी वजह यह हो सकती है कि फिल्म देखते समय भारतीय दशर््क और खास कर हिंदी फिल्मों के दर्शक आमिर खान को उनकी इमेज से अलग अरूण के रूप मे नहीं देख पाएंगे। अगर एक सामान्य अभिनेता के तौर पर आमिर खान को देखें तो उन्होंने सहज दिखने और रहने की कोशिश की है। इस फिल्म की उपलब्धि मोनिका डोगरा और कृति मल्होत्रा हैं। दोनों का अपरिचित चेहरा उनके लिए मददगार साबित होता है। हम शाय और यास्मिन को उनके निभाए रूप में स्वीकार लेते हैं। प्रतीक निश्चित ही अपरंपरागत और प्रतिभाशाली अभिनेता हैं। उनमें हिंदी फिल्मों के अभिनेताओं के लटके-झटके नहीं हैं। उन्होंने मुन्ना के मनोभावों को दृश्यों के मुताबिक व्यक्त किया है। कुछ दूश्यों में वे बहुत प्रभावित करते हैं।

धोबी घाट में मुंबई भी एक किरदार है। मुंबई शहर को हम अलग-अलग रूपों में हिंदी फिल्मों में देखते रहे हैं। किरण ने इस फिल्म में न तो उसे सजाया और न उसे विद्रूप किया है। इस फिल्म में मुंबई को उसकी वास्तविकता में देखना अच्छा लगता है।

रेटिंग- *** तीन स्टार


Friday, January 14, 2011

विद्या बालन: भावपूर्ण अभिनेत्री

विद्या बालान: भावपूर्ण अभिनेत्री


विद्या बालान: भावपूर्ण अभिनेत्री

-अजय ब्रह्मात्मज

हिंदी फिल्मों में कामयाबी की हैट्रिक का उल्लेख बार-बार किया जाता है। किसी डायरेक्टर या ऐक्टर की लगातार तीन फिल्में हिट हो जाएं, तो उनके कसीदे पढ़े जाने लगते हैं। इन दिनों फिल्मों की सारी चर्चा उसके करोबार से नियमित होने लगी है। अब फिल्में अच्छी या बुरी नहीं होती हैं। फिल्में हिट या फ्लॉप होती हैं। उनके आधार पर ही ऐक्टरों का मूल्यांकन किया जा रहा है। इस माहौल में विद्या बालन के परफॉर्मेस की हैट्रिक पर अलग से ध्यान देने की जरूरत है। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में नंबर के रेस से बाहर खड़ी विद्या अपनी हर फिल्म से खुद के प्रभाव को गाढ़ा करती जा रही हैं। पहले की फिल्मों के बारे में सभी जानते हैं। सराहना और पुरस्कार पाने के बाद ग्लैमर व‌र्ल्ड की चकाचौंध और शायद गलत सलाह से वे गफलत में पड़ीं और उन्होंने समकालीन हीरोइनों की नकल करने की कोशिश की। इस भटकाव में उन्हें दोहरी मार पड़ी। एक तरफ उनके प्रशंसकों ने अपनी निराशा जताई और दूसरी तरफ उनके आलोचकों को मौका मिल गया। उन दिनों विद्या बेहद आहत और क्षुब्ध थीं। उनमें हीन भावना भी भरती जा रही थी। कहीं न कहीं उन्हें लगने लगा था कि वे अपनी समकालीनों से कमतर हैं। ऐसे वक्त में उनके मित्रों और शुभचिंतकों ने नेक सलाह दी। उन्हें एहसास दिलाया कि वह अपनी मौलिकता में बेहद खूबसूरत हैं। खासकर साड़ी पहनना और उसे संभालना तो कोई उनसे सीखे। साड़ी में उनका नैसर्गिक सौंदर्य निखरता है। वे ज्यादा कॉन्फिडेंट और प्रभावशाली नजर आती हैं। वे रीयल किरदारों में जमती हैं। उन्होंने अपनी भूमिकाओं पर भी ध्यान दिया। पेड़ों के इर्द-गिर्द नाचने और हीरो को लुभाने की रुटीन जरूरतों से खुद को अलग कर लिया।

इस आत्म-साक्षात्कार के बाद उनकी पहली फिल्म पा आई। पा में वे प्रोजेरिया से ग्रस्त बच्चे की मां बनीं, जो पति से अलग होने के बाद अपनी मां और बेटे के साथ एकाकी जीवन जीती है। इस रोल में वे अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व का एहसास दिलाती हैं। मां की वह भूमिका सहज और सामान्य नहीं थी। विद्या ने उसे पर्दे पर साकार किया। इस फिल्म से उन्होंने अपने प्रशंसकों को खुश करने के साथ खोई प्रतिष्ठा भी अर्जित कर ली थी। उसके बाद पिछले साल के आरंभ में उनकी इश्किया आई। इस फिल्म में उन्होंने नसीरुद्दीन शाह और अरशद वारसी के साथ अलग भूमिका निभाई। कृष्णा के मिजाज का किरदार दर्शकों ने पर्दे पर पहली बार देखा। कमजोर, नाजुक, कामुक और इंडिपेंडेंट कृष्णा की भूमिका में उन्होंने सभी को चौंकाया। खासकर अंतरंग और प्रणय दृश्यों में बगैर अश्लील हुए उन्होंने उत्तेजना बनाए रखी। इस फिल्म में नसीरुद्दीन शाह के साथ के दृश्यों में उनके अभिनय का निखार देखते ही बनता है।

पिछले साल की कृष्णा को इस साल हमने पिछले ही हफ्ते सबरीना लाल के रूप में देखा। फिल्म में जेसिका लाल की बहन सबरीना रीयल किरदार है। एकदम सामान्य, हमारे आसपास का, फिर भी विशिष्ट और अलग। विद्या बालन ने सबरीना की भूमिका निभाने में जिस संयम और भावों के मितव्यय का परिचय दिया है, वह विशेष रूप से उल्लेखनीय है। फिल्म के अधिकांश दृश्यों में उनकी प्रतिक्रियाएं और खामोश मुद्राएं हैं। विद्या ने जाहिर कर दिया है कि वे किसी भी तरह की भूमिका के लिए तैयार हैं। वास्तव में ऐसी अभिनेत्रियां निर्देशक को चुनौती देती हैं। उन्हें अवसर देती हैं कि वे जटिल और सरल चरित्र गढ़ें। मुझे याद है पिछले दिनों एक डायरेक्टर ने शिकायत की थी कि आज कल हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भावपूर्ण अभिनेत्रियां नहीं हैं, इसलिए दमदार महिला चरित्र नहीं लिखे जा रहे। मेरा यकीन है कि विद्या की पा, इश्किया और नो वन किल्ड जेसिका के बाद उनकी धारणा बदली होगी। वे विद्या के साथ ऐसी फिल्म की योजना बना सकते हैं। मुझे सुजॉय घोष के निर्देशन में बन रही कहानी और मिलन लुथरिया की द डर्टी पिक्चर का इंतजार रहेगा। इन फिल्मों में विद्या बालन के अभिनय के नए आयामों के दर्शन होंगे। वे अधिक समर्थ हों और उन्हें ऐसी चुनौतियां मिलती रहें।


Sunday, January 9, 2011

कहीं हम खुद पर तो नहीं हंस रहे हैं?

-अजय ब्रह्मात्‍मज

छोटे से बड़े पर्दे तक, अखबार से टी.वी. तक, पब्लिक से पार्लियामेंट तक; हर तरफ बिखरी मुश्किलों के बीच भी जिंदगी को आसान कर रही गुदगुदी मौजूद है। बॉलीवुड के फार्मूले पर बात करें तो पहले भी इसकी जरूरत थी, लेकिन आटे में नमक के बराबर। फिल्मों में हंसी और हास्य कलाकारों का एक ट्रैक रखा जाता था। उदास और इंटेंस कहानियों के बीच उनकी हरकतें और दृश्य राहत दे जाते थे। तब कुछ कलाकारों को हम कॉमेडियन के नाम से जानते थे। पारंपरिक सोच से इस श्रेणी के आखिरी कलाकार राजपाल यादव होंगे। उनके बाद कोई भी अपनी खास पहचान नहीं बना पाया और अभिनेताओं की यह प्रजाति लुप्तप्राय हो गई है।

[हीरो की घुसपैठ]

अब यह इतना आसान रह भी नहीं गया है। कॉमेडियन के कोने में भी हीरो ने घुसपैठ कर ली है। अमिताभ बच्चन से यह सिलसिला आरंभ हुआ, जो बाद में बड़ा और मजबूत होकर पूरी फिल्म इंडस्ट्री में पसर गया। पूरी की पूरी फिल्म कॉमेडी होगी तो कॉमेडियन को तो हीरो बनाया नहीं जा सकता। आखिर दर्शकों को भी तो रिझाकर सिनेमाघरों में लाना है। सो, वक्त की जरूरत ने एक्शन स्टार को कॉमिक हीरो बना दिया। आज अक्षय कुमार की रोजी-रोटी ही कॉमेडी से चल रही है। वह यूं ही कॉमेडी के तीस मार खां नहीं बन गए हैं। दबंग के चुलबुल पांडे यानी सलमान खान को भी एक्शन के बीच कॉमेडी करनी पड़ती है।

[बड़ा है बिजनेस]

कॉमेडी के कारोबार का ऐसा दबाव है कि टी.वी. पर कई सालों से लॉफ्टर शो चल रहे हैं। इनमें हर कलाकार विदूषक की भूमिका निभाने के लिए सहज ही तैयार मिलता है। पांच सालों मे लतीफेबाज कॉमेडी स्टार बन गए हैं। हम उनके बोलने के पहले ही हंसने लगते हैं। राजू श्रीवास्तव का घिसा लतीफा भी उनकी पॉपुलर पर्सनैलिटी के दम पर हमसे ठिठोली करता है। अभी तो हंसी की महामारी ऐसी फैली है कि अखबारों में सीरियस खबरों के बीच बॉक्स में लतीफे छापे जाते हैं। खबरों को चटपटा बनाने की कवायद जारी है। बाजार का फरमान है कि पाठक और दर्शक आनंद चाहते हैं। आतंक और महंगाई के इस दौर में हंसी-ठिठोली डेली की सस्ती खुराक बन चुकी है। यह बुरा भी नहीं है।

[किस्म-किस्म की कॉमेडी]

विशेषज्ञ बताते हैं कि अंग्रेजी की वर्णमाला से अधिक कॉमेडी के प्रकार होते हैं। लगभग 29 तो प्रचलित हैं। यह अलग बात है कि लेखकों की कल्पना की गरीबी या दर्शकों की समझ की सीमा से टीवी और फिल्मों में मुख्य रूप से डार्क कॉमेडी, कैरीकेचर, फार्स, आयरनी, मैलोड्रामा, पैरोडी, सटायर, स्टैंडअप कॉमेडी, सीटकॉम, स्लैपस्टिक कॉमेडी और जोक्स का चलन है।

[खो गया उद्देश्य]

कॉमेडी को ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक ले जाने के लिए इतना सरल, मिश्रित और घटिया किया जा रहा है कि हास्य ने अपना उद्देश्य खो दिया है। अब यह मनुष्य और समाज की कमियों और विसंगतियों के प्रति दर्शकों को उदासीन ही करता है। साहित्य और नाटक में हास्य का पहला उद्देश्य कमियों को उजागर कर उन्हें रेखांकित करना और सुधारना होता था। अब कॉमेडी से ऐसी अपेक्षा करने पर स्वयं हंसी का पात्र बन जाने का खतरा है। 21 वीं सदी में हम हंसी का मर्म और धर्म भूल चुके हैं। अभी यह महज अच्छी कमाई का आसान जरिया है। हां, इसी में कभी सुभाष कपूर फंस गए रे ओबामा या अभिषेक शर्मा तेरे बिन लादेन लेकर चले आते हैं तो हास्य के पुराने आयाम की ताकत का परिचय मिलता है।

वास्तव में लेखकों का जीवन से संसर्ग टूट गया है, इसलिए उन्हें अपने समाज की विसंगतियों की जानकारी नहीं रहती। उपभोक्तावादी दौर में विसंगतियों के भी मायने बदल गए हैं। हमें कुछ भी अजीबोगरीब नहीं लगता। मनोरंजन का बाजार हमारी इसी असंवेदनशीलता का फायदा उठा रहा है। वह नित नए अंदाज में कॉमेडी परोस रहा है और हम कंज्यूम करते हुए भी हंस रहे हैं। कहीं हम खुद पर तो नहीं हंस रहे हैं?


Saturday, January 8, 2011

फिल्‍म समीक्षा : नो वन किल्‍ड जेसिका

-अजय ब्रह्मात्‍मज

परिचित घटनाक्रम पर फिल्म बनाना अलग किस्म की चुनौती है। राजकुमार गुप्ता की पहली फिल्म आमिर सच्ची घटनाओं पर काल्पनिक फिल्म थी। नो वन किल्ड जेसिका सच्ची घटनाओं पर वास्तविक फिल्म है, लेकिन यह डाक्यूमेंट्री नहीं है और न ही यह बॉयोपिक की तरह बनायी गयी है। कानूनी अड़चनों से बचने के लिए निर्देशकों ने जेसिका और रूबीना के अलावा बाकी किरदारों के नाम बदल दिए हैं। इस परिवर्तन से प्रभाव में थोड़ा फर्क पड़ा है, जिसे पाटने की राजकुमार गुप्ता ने सार्थक कोशिश की है।

जेसिका लाल की हत्या और उसके बाद के घटनाक्रमों से हम सभी वाकिफ हैं। कोर्ट-कचहरी, पॉलिटिक्स और मीडिया की बदलती भूमिकाओं और प्रभाव को इस मामले के जरिए देश ने करीब से समझा। राजकुमार गुप्ता ने जेसिका से संबंधित सामाजिक पाठ को एक कैप्सूल के रूप में रख दिया है। उन्होंने इसे अतिनाटकीय नहीं होने दिया है। फिल्म नारेबाजी या विजय अभियान जैसी मुहिम में भी शामिल नहीं होती। वास्तव में यह मुख्य घटनाक्रम में पहले एकाकी पड़ती सबरीना और उसे संघर्ष से एकाकार होती मीरा की कहानी है। मीरा निश्चित ही फिल्म में एक किरदार है, लेकिन वह उस सामूहिक विचार व चेतना का प्रतिनिधित्व करती है, जिसने अन्याय के खिलाफ सामान्य नागरिकों को लामबंद किया। इस सामूहिकता के दबाव में ही फाइलों में बंद हो चुका मामला फिर से खुला और अपराधियों को सजा मिली। नो वन किल्ड जेसिका भारतीय समाज के निष्क्रिय और सक्रिय पहलुओं को अनजाने ही आमने-सामने खड़ा कर देती है। यह खामोशी से न्याय के साथ खड़ी हो जाती है।

यह फिल्म विद्या के संजीदा और संयमित अभिनय के लिए याद की जाएगी। कम शब्दों में सिर्फ भावों और प्रतिक्रियाओं से किरदार के मनोभाव और मनोदशा को अभिव्यक्त कर देने का कौशल विद्या बालन में है। उन्हें लेखक और निर्देशक का भरपूर सहयोग मिला है। एक अंतराल के बाद रानी मुखर्जी ने जाहिर किया है कि उन्हें सुपरिभाषित किरदार और सही निर्देशन मिले तो वह निराश नहीं करेंगी। हालांकि कुछ दृश्यों में यह फिल्मी नाटकीयता को छूती हैं, फिर भी मीरा के पैशन और जोश को उन्होंने निभाया है। इस फिल्म की खूबी सहयोगी किरदार हैं। चूंकि वे अधिक परिचित नहीं हैं, इसलिए वास्तविक किरदार ही लगते हैं। समाज पर फिल्मों और मीडिया के प्रभाव का सकारात्मक पक्ष इस फिल्म में दिखता है।

हिंदी फिल्मों में आ रहे बदलाव का ताजा उदाहरण है नो वन किल्ड जेसिका रोमांस और नाच-गाने से परे भी रोचक कहानियां हैं। बस, बस जरूरत है कि आत्मविश्वास के साथ उन्हें पर्दे पर पेश किया जाए।

रेटिंग- ***1/2

Friday, January 7, 2011

ताजा उम्मीदें 2011 की

-अजय ब्रह्मात्‍मज

साल बदलने से हाल नहीं बदलता। हिंदी फिल्मों के प्रति निगेटिव रवैया रखने वाले दुखी दर्शकों और सिनेप्रेमियों से यह टिप्पणी सुनने को मिल सकती है। एक तरह से विचार करें तो कैलेंडर की तारीख बदलने मात्र से ही कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। परिवर्तन और बदलाव की प्रक्रिया चलती रहती है। हां, जब कोई प्रवृत्ति या ट्रेंड जोर पकड़ लेता है, तो हम परिवर्तन को एक नाम और तारीख दे देते हैं। इस लिहाज से 2010 छोटी फिल्मों की कामयाबी का निर्णायक साल कहा जा सकता है। सतसइया के दोहों की तरह देखने में छोटी प्रतीत हो रही इन फिल्मों ने बड़ा कमाल किया।

दरअसल.. 2010 में छोटी फिल्मों ने ही हिंदी फिल्मों के कथ्य का विस्तार किया। दबंग, राजनीति और तीस मार खां ने हिंदी फिल्मों के बिजनेस को नई ऊंचाई पर जरूर पहुंचा दिया, किंतु कथ्य, शिल्प और प्रस्तुति में छोटी फिल्मों ने बाजी मारी। उन्होंने आश्वस्त किया कि हिंदी सिनेमा की फार्मूलेबाजी और एकरूपता के आग्रह के बावजूद नई छोटी फिल्मों के प्रयोग से ही दर्शकों के अनुभव और आनंद के दायरे का विस्तार होगा। छोटी फिल्मों में प्रयोग की संभावनाएं ज्यादा रहती हैं। सबसे पहली बात की बजट कम होने से अधिक नुकसान का खतरा नहीं रहता। इसके अलावा दूसरी अहम बात यह है कि निर्माता-निर्देशक के ऊपर पॉपुलर स्टार की इमेज का बैगेज नहीं रहता। मैं ऐसे कई निर्देशकों को जानता हूं कि जिनकी फिल्मों की धार स्टार की वजह से कुंद हो गई। फिल्मों में चमक आ गई। फिल्में बिकीं-चलीं भी, लेकिन मूल कहानी कहीं और छूट गई।

2010 में दर्शकों ने छोटी फिल्मों को सराहा। उसकी वजह से इन फिल्मों के निर्देशकों को बल और संबल मिला। उम्मीद की जानी चाहिए कि 2011 में इन निर्देशकों को और बड़े मौके मिलेंगे। हां, इन निर्देशकों को स्टारों के दबाव और चंगुल से बचना चाहिए। समस्या यह है कि बॉलीवुड का दुष्चक्र हर प्रयोगशील निर्देशक को अपनी गिरफ्त में ले लेता है। इस व्यवसायिक गिरफ्तारी के बाद अधिकांश निर्देशक सोच और सृजन में भ्रष्ट हो जाते हैं। सभी के पास श्याम बेनेगल जैसा आत्मबल और संयम नहीं होता और न सभी अनुराग कश्यप की तरह नेचुरली व्रिदोही होते हैं। हाल ही में विशाल भारद्वाज और शाहरुख खान के साथ काम करने की घोषणा के उदाहरण से लोग इसे समझने की कोशिश करें। निश्चित ही विशाल के लिए शाहरुख के साथ फिल्म बनाना बड़ी बात है, लेकिन डर है कि मकबूल और ओमकारा का निर्देशक न खो जाए। चेतन भगत के उपन्यास पर बन रही फिल्म से कितनी उम्मीदें रखी जा सकती हैं?

मैंने किरण राव की धोबी घाट देखी है। मुझे किरण में भरपूर संभावना दिखती है। वे हिंदी फिल्मों के प्रचलित मिथ और शिल्प को तोड़ती नजर आई हैं। हालांकि उनकी पसंद या मजबूरी से धोबी घाट में आमिर खान भी आ गए हैं, लेकिन यह फिल्म किसी और ऐक्टर के साथ भी उतनी ही कारगर और धारदार होती। मुझे अलंकृता श्रीवास्तव की टर्निग 30 से उम्मीदें हैं। अलंकृता ने एक अलग विषय पर फिल्म बनाने की कोशिश की है। उन्होंने तीस की उम्र छू रही लड़की की दुविधा, चिंता, खुशी और परेशानी को फिल्म का विषय बनाया है। मुझे सचिन करांदे की फिल्म विकल्प से भी उम्मीदें हैं।

निश्चित ही इस साल भी अनेक युवा निर्देशक पर्दे पर उभरेंगे। मुझे लगता है कि बैंड बाजा बारात के मनीष शर्मा को जल्द ही फिल्म मिलना चाहिए। बनारस में शूट की जा रही अनुराग कश्यप की आगामी फिल्म अपने रंग और कथ्य में अलग होगी। यह हिंदी का पहली देसी थ्रिलर होगी। इसी प्रकार डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी की काशी का अस्सी बनारस के ठाठ के साथ वहां के मिजाज को भी बड़े पर्दे पर लाने की कोशिश करेगी। कुछ और निर्देशक भी हैं, जिनकी फिल्में हमारी उम्मीदों को लगातार ताजा करती रहेंगी।


Sunday, January 2, 2011

रिएलिटी शोज : उत्तर भारतीयों का धमाल

-सौम्‍या अपराजिता

रिएलिटी शोज में उत्तर भारत के प्रतिभागियों का जलवा बरकरार है। पिछले दिनों एक ही दिन प्रसारित हुए दो रिएलिटी शोज के फाइनल में विजेता उत्तर भारत के प्रतियोगी रहे। जहां स्टार प्लस के रिएलिटी शो मास्टर शेफ इंडिया में लखनऊ की पंकज भदौरिया के सर विजेता का ताज सजा, वहीं सारेगामापा सिंगिंग सुपरस्टार में पटियाला के कमल खान विजेता घोषित किए गए। रोचक है कि मास्टर शेफ इंडिया में लखनऊ की पंकज का सामना लखनऊ के ही जयनंदन के साथ था। जाहिर है, कि रिएलिटी शो में उत्तर भारत के प्रतियोगियों का जलवा बरकरार है।

[छोटा शहर, बड़ा सपना]

उत्तर भारत के प्रतिभागियों की रिएलिटी शो में बढ़ती धमक ने छोटे शहरों में बड़े सपने देख रहे लोगों का हौसला बढ़ाया है। उनके मन में भी रिएलिटी शो के जरिए लोकप्रियता और सफलता के सोपान छूने की उमंग ने हिलोरे मारना शुरू कर दिया है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड, बिहार, मध्यप्रदेश पंजाब और हरियाणा के लोगों में रिएलिटी शो को लेकर जागरुकता बढ़ी है। उन्हें अहसास हुआ है कि यदि अपनी प्रतिभा को सार्वजनिक करना है, तो रिएलिटी शो से बेहतर माध्यम कुछ नहीं हो सकता। इसी का परिणाम है कि रिएलिटी शोज में उत्तर भारत के प्रतिभागियों की संख्या बढ़ती जा रही है।

इंडियन आइडल 5 के फाइनलिस्ट रहे आगरा के राकेश मैनी कहते हैं,ं 'मैं आगरा जैसे छोटे शहर से हूं। हमारे शहर में लोग इतना ही सोचते हैं कि अच्छा पैसा कमा लें। लोग छोटी-छोटी प्लानिंग करते हैं। मैं भी यही सोचता था कि थोड़ा और पैसा कमा लेता, तो अच्छा होता, पर यह नहीं सोचा था कि इंडियन आइडल के मंच तक पहुंच पाऊंगा। मुझे लगता है कि रिएलिटी शो के माध्यम से छोटे शहरों के लोगों को अपनी प्रतिभा से पूरे देश को परिचित कराने का बेहतरीन मौका मिलता है।'

[इंडियन आइडल से आगाज]

इंडियन आइडल के प्रथम संस्करण से ही उत्तर भारतीय प्रतियोगियों की पैंठ बननी शुरू हो गयी थी। इंडियन आइडल-1 के फाइनल तक पहुंचे छत्तीसगढ़ के अमित सना ने उत्तर भारत की प्रतिभाओं को प्रेरित किया। उसके बाद, तो लगभग हर रिएलिटी शो में उत्तर भारत के प्रतिभागियों ने जलवा दिखाना शुरू कर दिया। इंडियन आइडल के दूसरे, तीसरे, चौथे और पांचवे संस्करण में भी उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, झारखंड और उत्तरांचल के प्रतिभागियों की धमक रही। पटना की दीपाली किशोर, धनबाद के मेइयांग चांग, कानपुर की अंकिता मिश्रा, जमशेदपुर के एमॉन चटर्जी, आगरा के राकेश मैनी की लोकप्रियता इसका प्रमाण है।

जी टीवी के शो सारेगामापा के विभिन्न संस्करणों में बनारस के विनीत, लखनऊ की पूनम यादव और ट्विंकल बाजपेयी, छत्तीसगढ़ की सुमेधा, हरियाणा की हिमानी कपूर की लोकप्रियता जगजाहिर है। वहीं, लिटिल चैंप्स में भी पंजाब और उत्तर प्रदेश के नन्हें प्रतिभागियों का जलवा रहा है। पंजाब के रोहनप्रीत, मथुरा के हेमंत बृजवासी और लखनऊ के तन्मय चतुर्वेदी के सुरों की बानगी को भला कौन भूल सकता है। तन्मय और हेमंत क्रमश: लिटिल चैंप्स 2008 और लिटिल चैंप्स 2009 के विजेता रह चुके हैं। स्टार प्लस के म्यूजिकल रिएलिटी शो वॉयस ऑफ इंडिया में उत्तर प्रदेश के हर्षित सक्सेना, पंजाब के इश्मित की उपलब्धि्यां भी उल्लेखनीय है।

[संग नाचा सारा हिंदुस्तान]

डांस बेस्ड रिएलिटी शो में भी उत्तर भारत के प्रतिभागियों ने ऊंचा मुकाम हासिल किया है। जहां डांस इंडिया डांस के पहले और दूसरे संस्करण में रांची की आलिशा और दिल्ली की शक्ति मोहन ने अपनी प्रतिभा से दर्शकों का ध्यान खींचा वहीं, डांस इंडिया डांस लिटिल मास्टर्स में दिल्ली के अतुल और अवनीत ने अपने नन्हे कदमों की थिरकन से दर्शकों का मन मोहा। 'कलर्स' के डांस रिएलिटी शो चक धूम धूम के विजेता रहे स्पर्श ने बता दिया कि आगरा जैसे छोटे शहर में प्रतिभा की कमी नहीं है। बस मौके की तलाश है।

[हम खास हैं बॉस]

सिर्फ डांस और म्यूजिकल रिएलिटी शो में ही नहीं बिग बॉस और रोडीज जैसे रिएलिटी शो में भी उत्तर भारत के प्रतिभागियों ने अपने प्रतिभा का परिचय दिया है। बिग बॉस 1 में रवि किशन, बिग बॉस 2 में सहारनपुर के आशुतोष, बिग बॉस 3 में मेरठ के प्रवेश राणा और बिग बॉस 4 में उत्तर प्रदेश के इटावा की सीमा परिहार, इलाहाबाद की श्वेता तिवारी और बिहार के मनोज तिवारी की असरदार मौजूदगी ने उत्तर भारतीय दर्शकों को गर्व का मौका दिया है। अपने प्रदेश के सितारों को बिग बॉस के घर में देखने का अनुभव उनकी यादों में बस गया। सहारनपुर के आशुतोष कौशिक तो बिग बॉस 2 के विजेता भी रह चुके हैं। एम टीवी के मशहूर रिएलिटी शो रोडीज में पहली बार आशुतोष ने जीत का स्वाद चखा था। रोडीज के विभिन्न संस्करणों के विजेता रहे हैं दिल्ली के रणविजय, चंडीगढ़ के आयुष्मान खुराना, सहारनपुर के आशुतोष कौशिक, दिल्ली की पारुल साही और जमशेदपुर के अनवर सैयद।

[जग जीता पर जड़ें न भूले]

रिएलिटी शो में उत्तर भारत के प्रतिभागी अपने साथ छोटे शहर के संस्कार और छोटी-छोटी खुशियां लेकर आते हैं। वे मायानगरी मुंबई की रंगीनियों में अपनी शख्सियत नहीं खोने देते हैं। सारेगामापा सिंगिंग सुपरस्टार के विजेता कमल खान इसका उदाहरण हैं। पटियाला घराने की विरासत संभालते हुए पंजाबी लोकसंगीत को समृद्ध बनाना उनकी पहली प्राथमिकता है। कमल कहते हैं, 'मेरी जिम्मेदारी है कि मैं पटियाला घराने की प्रतिष्ठा को बरकरार रखूं। पंजाबी हूं, तो पंजाबी लोक संगीत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है मुझपर। हिंदी फिल्मों के लिए भी गाना चाहता हूं, पर मैं उससे पहले मैं पंजाबी गानों को अपनी आवाज देना चाहता हूं।'


Saturday, January 1, 2011

हर फिल्म में अपना आर्टिस्टिक वॉयस मिले: किरण राव

खुद को ढूंढती हूं फिल्ममेकिंग में: किरण राव-अजय ब्रह्मात्मज

किरण राव स्वतंत्र सोच की लेखक और निर्देशक हैं। उनकी पहली फिल्म इसी महीने रिलीज हो रही है। इस इंटरव्यू में किरण राव ने निर्देशन की अपनी तैयारी शेयर की है। लेफ्ट टू द सेंटरसोच की किरण की कोशिश अपने आसपास के लोगों को समझने और उसे बेहतर करने की है। उन्हें लगता है कि इसी कोशिश में किसी दिन वह खुद का पा लेंगी।

- हिंदी फिल्मों से पहला परिचय कब और कैसे हुआ?

0 बचपन मेरा कोलकाता में गुजरा। मेरा परिवार फिल्में नहीं देखता था। हमें हिंदी फिल्मों का कोई शौक नहीं था। वहां हमलोग एक क्लब मे जाकर फिल्में देखते थे। शायद शोलेवगैरह देखी। नौवें दशक के अंत में हमारे घर में वीसीआर आया तो ज्यादा फिल्में देखने लगे। इसे इत्तफाक ही कहेंगे कि पहली फिल्म हमने कयामत से कयामत तकही देखी। । उस तरह के सिनेमा से वह मेरा पहला परिचय था। उसके पहले दूरदर्शन के जरिए ही हिंदी फिल्में देख पाए थे।

- क्या आप के परिवार में फिल्में देखने का चलन ही नहीं था?

0 मेरे परिवार में फिल्मों का कोई शौक नहीं था। वे फिल्मों के खिलाफ नहीं थे, लेकिन उनकी रुचि थिएटर और संगीत में थी। साथ में रहने से उसी दिशा में मेरी रुचि बढ़ी। कोलकाता में चार्ली चैप्लिन आदि की फिल्में देखीं। हमलोग सेंट्रल कोलकाता में कामा स्ट्रीट के पास रहते थे। वहां क्लब में हर हफ्ते फिल्में दिखाई जाती थीं, लेकिन वह मिलने-जुलने का बहाना ही था। वीसीआर आने के बाद ही चुन के फिल्में लाना और देखना आरंभ हुआ।

- स्कूल के दिनों में क्या गतिविधियां रहती थीं आप की। सिर्फ पढ़ाई या उसके साथ कुछ अन्य चीजें भी...

0 पढ़ाई तो थी ही। मैं पढऩे में अच्छी थी। पियानो बजाती थी। ड्रामा, खेल,वाद-विवाद और अन्य कल्चरल गतिविधियों में हिस्सा लेती थी। यही कहूंगी कि फिल्मों की तरफ अधिक ध्यान नहीं था। कॉलेज आने तक थिएटर में जाकर कोई हिंदी फिल्म नहीं देखी मैंने। कुछ अंग्रेजी और बंगाली फिल्में जरूर देखी थीं। थोड़ी-बहुत हिंदी फिल्में मुंबई में सोफाया और दिल्ली में जामिया में पढ़ते समय देखीं। वह भी गिनी-चुनी। आज भी थिएटर में जाकर फिल्में देखने का शौक नहीं है। स्कूल-कॉलेज के दिनों में मेरा ज्यादा समय लायब्रेरी में गुजरता था। कोलकाता के क्लब की अच्छी लायब्रेरी थी। म्यूजिक कंसर्ट में खूब जाते थे। थिएटर का बहुत पैशन था और एक्टिंग का शौक था। स्कूल के दिनों में एक्टिंग करती रही। थिएटर वर्कशॉप में हिस्सा लेती थी।

- मुंबई और दिल्ली प्रवास के बारे में बताएं। उन दिनों फिल्मों से किस प्रकार का रिश्ता बना?

0 सोफाया में हॉस्टल में रहती थी। उसके अपने नियम-कानून थे। ज्यादा निकल नहीं सकते थे। हॉस्टल में एक टीवी पर सौ दर्शक रहते थे तो अपनी पसंद की फिल्म या टीवी शो देखने का मौका नहीं रहता था। मैं मुंबई में 1992 से 1995 के बीच रही। उन दिनों टीवी और फिल्मों से रिश्ता कट गया था। सोफाया में पढ़ाई के दौरान भी म्यूजिक कंसर्ट वगैरह के लिए ही निकलती थी। सोफाया के नाटक देखती थी। वहां के स्टाफ हमलोगों को थिएटर के कोने में घुसने की इजाजत दे देते थे। एनसीपीए, टाटा थिएटर, षणमुखानंद और दादर टीटी के पास के हॉल में जाती थी। हमलोग देर रात के प्रोग्राम में नहीं जा पाते थे। सेंट जेवियर्स में गणतंत्र दिवस के समय लाइव हिंदुस्तानी संगीत समारोह में अवश्य जाती थी। गंगूबाई हंगल,रशीद खान,वीणा सहस्त्रबुद्धेे और अन्य बड़े संगीतज्ञों को उसी में सुना था।

- संगीत के प्रति यह रुझान केवल सुनने भर था या आप स्वयं भी गीत-संगीत का अभ्यास करती थीं?

0 कोलकाता में मैंने संगीत सीखना आरंभ किया था। लेकिन वह सिलसिला नहीं चल पाया। टीचर पसंद नहीं आई। मैं उस उम्र में थी, जब कई चीजें एक साथ करने का मन करता है। चंचल मन से सब कुछ करती रही। तभी पियानो बजाना सीखा। वेस्टर्न क्लासिक में रॉयल स्कूल म्यूजिक की ग्रेड 2 तक मैंने परीक्षा दी। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत नहीं सीख पाई। मेरी इच्छा है कि कभी कोई गुरू मिले और मैं थोड़ा अभ्यास कर सकूं। मुझे कर्नाटक संगीत का भी शौक है।

- फिर सिनेमा या मास मीडिया में रुचि कैसे जगी। आप ने तो जामिया में यही पढ़ाई की और फिर से मुंबई आईं ...

0 अभी बताती हूं। 1995 में जामिया चली गई। तभी आदित्य चोपड़ा की दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगेआई थी। मुझे अच्छी तरह याद है कि थिएटर में जाकर वही पहली फिल्म देखी थी। मैं उसे अपनी फस्र्ट हिंदी फिल्म कहूंगी। तब मेरी उम्र 22 साल थी।

- कयामत से कयामत तकऔर फिर दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे ... इन दो फिल्मों के आधार पर हिंदी फिल्मों के प्रति आप की क्या धारणा बनी?

0कयामत से कयामत तकदेखते समय मैं पूरी तरह इनवॉल्व हो गई थी। वह फिल्म मेरी उम्र के लिए थी। टीनएजर थी मैं। प्यार और फस्र्ट लव की फीलिंग आने लगी थी। उस फिल्म ने मेरी कल्पना को झकझोर दिया। गाने भी कमाल के थे। मैंने कम से कम 12-15 बार देखी थी फिल्म। बहुत पसंद आई थी। मुझे वह कंटेपररी फिल्म लगी थी। कुछ और फिल्में भी देखी होंगी, लेकिन याद नहीं है। कुछ ही दिनों में वीसीआर का मजा जाता रहा। दो-तीन सालों के बाद केबल टीवी और फिर सैटेलाइट टीवी आ गया तो अपनी पसंद से फिल्में लाने और देखने का चक्कर खत्म हो गया।

- ऐसा लगता है कि आप की देखी फिल्मों को उंगलियों पर गिना जा सकता है?

0 ऐसा भी नहीं है। इतनी कम फिल्में भी नहीं देखी हैं। मैंने हिंदी से ज्यादा वल्र्ड सिनेमा देखा है। अब मैं हिंदी फिल्में देख रही हूं। अपनी पढ़ाई और जानकारी के लिए देखना चाहती हूं। आमिर भी कुछ महान फिल्मों का जिक्र करते हैं। मैं भी प्लान कर रही हूं। हिंदी फिल्मों के ट्रैडीशन को समझना है। ऐसे कौन से फिल्म मेकर और फिल्में हैं, जो देखी जानी चाहिए। दिल्ली में रहते समय विभिन्न दूतावासों में जाकर फिल्में देखती थी। वहां मुफ्त में देख लेते थे। योरोप का सिनेमा खूब देखा। इफ्फी (इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल) पहले दिल्ली में हुआ करता था। उस दरम्यान हमलोग वहीं रहते थे। वहां एक-एक दिन में पांच फिल्में देखते थे। आज की फिल्में कभी-कभार जाकर देख लेती हूं। मैंने पिछले दिनों एलएसडीऔर रावणदेखी। कुछ डायरेक्टर मुझे पसंद हैं तो उनकी फिल्में देखती थी।

- मीडिया की पढ़ाई में अपने इंटरेस्ट के बारे में आप ने नहीं बताया?

0 शुरू से थिएटर में इंटरेस्ट था। पोएट्री और शॉर्ट स्टोरी लिखती थी। मैंने स्कूल और कॉलेज की मैग्जीन भी एडिट की थी। मैं पेंटिंग भी करना चाहती थी, लेकिन उधर ध्यान नहीं लगा सकी। शुरू में इरादा था कि डेवलेपमेंट फिल्ममेकिंग सीखूं।

डेवलपमेंट वर्क में मेरा इंटरेस्ट था। मैंने इकॉनोमिक्स और इंग्लिश में बीए किया था। यही सोचा था कि डेवलपमेंट का काम करूं। उसी में फिल्ममेकिंग करने का इरादा था। कॉलेज खत्म होने के बाद मुझे लगा कि अपने इंटरेस्ट की पढ़ाई करनी चाहिए। तब मेरा इंटरेस्ट आर्ट में था। आप देखें तो सिनेमा में सारे आर्ट समाहित हैं। एक ही मीडियम में सब मौजूद है। तब निश्चित नहीं थी कि डायरेक्टर बनना है। मैंने सोचा कि पता करते हैं। इसी वजह से मैं एफटीआईआई नहीं गई। मैं एडीटिंग या डायरेक्शन की स्पेसफिक पढ़ाई नहीं करना चाहती थी। मॉस कॉम में एडमिशन लेने पर फोटोग्राफी में मेरी रुचि बढ़ गई। तब हमलोग केवल स्टिल फोटोग्राफी करते थे। उसी समय साउंड भी सीखा। उस कोर्स में परफार्मेंस का भी स्कोप था। स्ट्रीट थिएटर, पपेट्री वगैरह भी किया।

- टीचर या साथ के लोग कौन थे?

0 हबीब किदवई डीन थे। जनम के सुधन्वा देशपांडे थिएटर पढ़ाते थे। विजुअल कम्युनिकेशन में राजीव लोचन थे। बहुत इंटरेस्टिंग था वह कोर्स। पपेट्री में वरुण नारायण थे। फोटोग्राफी में मिस्टर खान थे ़ ़ ़ तब फोटोग्राफी में इंटरेस्ट था। सेकेंड ईयर में फिल्म की ट्रेनिंग तो यों लगा कि कोई तार बजा। फिर तय कर लिया कि यही करना है। पहली कुछ फिल्मों में सारा काम हमें ही करना पड़ता था। मुझे इतना मजा आया। ऐसा लगा कि अपने काम की चीज मिल गई। फिल्ममेकिंग में जाना तय कर लिया। अब दुविधा थी कि फिल्ममेकिंग में क्या करना है? शुरू में सिनेमैटोग्राफी में मजा आया। सब कुछ सोचना, अरेंज करना ़ ़ ़ सब अच्छा लगता था। फिर एक प्रोफेसर ने कहा कि नहीं, तुम्हारा ओरियंटेशन तो डायरेक्शन का है। तुम डायरेक्शन ही करो ़ ़ ़ फिर समझ में आया कि डायरेक्टर बनना है।

- वह पहला काम कौन सा था ़ ़ ़ वह कौन सी खास बात हुई?

0 एक घटना या एक क्षण का उल्लेख नहीं कर सकती। पूरे दो साल का असर रहा। मुझे धीरे-धीरे अहसास होने लगा था कि यह मेरा कार्यक्षेत्र हो सकता है। मैं उसमें इस तरह बह कर निकली कि अपनी मंजिल तक पहुंच ही गई। सब कुछ स्वत: होता गया। मैंने अलग से कुछ सीखने, जानने, समझने की कोशिश नहीं की। मैंने कहीं हाथ आजमाने की भी कोशिश नहीं की। पढ़ाई खत्म होते ही वापस मुंबई आ गई कि अब डायरेक्शन में जाना है।

- मुंबई आने के समय क्या सोचा था? फिल्म, टीवी या कुछ और ़ ़ ़ एक तो तरीका होता है कि जो काम मिलेगा, कर लेंगे। फिर अपने मन का काम करेंगे?

0 मैं एकदम स्पष्ट थी कि मुझे टीवी नहीं करना है। मेरे साथ की लड़कियों ने टीवी में काम किया। कुछ लड़कियां तो एनडीटीवी में चली गईं। जामिया से निकला पूरा का पूरा बैच टीवी में गया। उनके लिए अच्छी बात होगी। मेरा टीवी में इंटरेस्ट नहीं था। मुझे पता था कि फिल्म में इंटरेस्ट है और वही करना है। पढ़ाई खत्म होने के एक हफ्ते के बाद मैं मुंबई आ गई थी। यहां एक हफ्ते तक इधर-उधर हाथ मारती रही। किसी से कोई जान-पहचान नहीं थी। मेरे एक-दो दोस्त असिस्टैंट थे। मैं 1998 की बात कर रही हूं। उस वक्त इस तरह की फिल्में भी नहीं बन रही थीं। चूंकि मैं फिल्में देख कर नहीं आई थी तो यह भी ठीक से नहीं मालूम था कि किस डायरेक्टर के साथ काम करना चाहिए। किसे अप्रोच करना चाहिए। फिर काम की तलाश आरंभ हुई। मुंबई में रहने के लिए कुछ तो करना था। मैंने एडवर्टाइजिंग में काम शुरू कर दिया। मुंबई आने के एक हफ्ते के अंदर काम मिल गया। रहने की समस्या खत्म हो गई तो फिर फिल्मों के लिए सोचना शुरू किया।

- एडवल्र्ड में किस तरह के काम किए और कैसे अपने फोकस को बचाए रखा। अमूमन काम के साथ पैसे मिलने लगें तो सुविधाएं अच्छी लगने लगती हैं और हम ठहर या भटक जाते हैं ़ ़ ़

0 फिल्म तो मुझे बनानी ही थी। एड का काम तो खुद को मुंबई में बनाए रखने के लिए था। मैं शुरू में शॉर्ट एंड द डार्क कंपनी के साथ थी। फिर ढेर सारी फ्रीलांसिंग की। हाईलाइट फिल्म्स ़ ़ ़ पोपोय के साथ काम किया। अच्छा एक्सपीरिएंस हो गया।

- फिर फिल्मों की तरफ कैसे छलांग लगी ़ ़ ़ शायद लगानमें आप आशुतोष गोवारीकर की असिस्टैंट थीं?

0 रीमा कागटी ने मुझ से पूछा कि लगानफिल्म बन रही है। वहां सीख सकोगी। काम करना है तो बोलो? तो लगानके लिए मैं भुज चली गई। वह मेरा फस्र्ट एक्सपीरिएंस था। इतना अच्छा एक्सपीरिएंस तो बहुत कम लोगों को मिल पाता है।

- कैसा एक्सपीरिएंस रहा?

0 मेरे लिए बहुत ही एक्साइटिंग एक्सपीरिएंस रहा। एक एडवेंचर की तरह था। हम सब यहां से ट्रेन से गांधीधाम गए। फिर गाड़ी से भुज गए। वह हमारे लिए एक नई दुनिया थी। ऐसा नहीं था कि फिल्मसिटी जा रहे हैं। गए भी तो कच्छ गए। सेट पर सब कुछ जादुई था। सेट पर जाने के पहले मुंबई में एक महीना प्री प्रोडक्शन का काम करते रहे। 2 जनवरी 2000 को हमलोग भुज के लिए निकले। 3 को वहां पहुंचे। मैं वहां तीसरी असिस्टैंट थी। इतना मजा आया। मेरे लिए वह वंडरलैंड ही था। उस समय तक सेट का काम चल रहा था। आशुतोष गोवारीकर से तो मुंबई में मुलाकात हो चुकी थी। वहां कैमरामैन अनिल मेहता से मिले। उन दोनों की बातचीत सुनना और समझना। मैं खुद एक्टर की इंचार्ज थी। मुझे सब पता रखना था कि किस एक्टर को कब क्या करना है, क्या पहनना है? मुझे कंटीन्यूटी का भी रिकॉर्ड रखना था। मुझे 20-25 एक्टर मैनेज करने पड़ते थे। सभी को डेढ़-दो घंटे में तैयार करवाना होता था।

- काम करते हुए आप सीखते हैं तो वह व्यावहारिक प्रशिक्षण होता है। आप यह भी सीख रही होती हैं कि मुझे क्या-क्या नहीं करना है? क्या कुछ शेयर करेंगी?

0 एक तो लगानबड़ी फिल्म थी और बड़े पैमाने पर बनी थी। कई बार ऐसा लगा कि फिल्म नहीं बन पाएगी। कभी डर होता था कि हम कर भी पाएंगे या नहीं? मैं तो यही कहूंगी कि वह जितना चैलैंजिंग था, उतना ही रिवार्डिंग भी था। उस फिल्म से हमें बहुत कुछ मिला। लगानके सेट से मुझे जिंदगी के अविस्मरणीय अनुभव मिले। मैं कभी उन्हें मैं कभी भूल नहीं सकती।

- आप के लिए तो छात्रवृत्ति के साथ प्रशिक्षण हो गया?

0 बिल्कुल ़ ़ ़ अब गाने कैसे शूट किए जाते हैं? एड फिल्म करने से शूटिंग की बेसिक जानकारी हो गई थी, लेकिन फिल्म की शूटिंग तो बिल्कुल नया अनुभव था। घनन घननगाना हर दिन शाम को खास लाइट में शूट होता था। आशु जी से मैंने बहुत कुछ सीखा। एक्टर से काम निकालने का तरीका सीखा। वे बहुत बारीकी और धैर्य से काम लेते हैं। उस फिल्म से क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिएभी अच्छी तरह समझ में आया। हमलोग छह महीने वहां रहे। सभी एक साथ रहते थे। वैसी फिल्म न तो पहले बनी थी और न आगे बन पाएगी।

- लगानके साथ जुडऩे से आप को कम समय में ज्यादा प्रशिक्षण मिल गया। उस अनुभव के बाद क्या सोचा? क्या वह पर्याप्त था या कुछ और सीखने-समझने की जरूरत बाकी रही?

0 मेरे पास कुछ कहने को होगा, तभी मैं फिल्म करूंगी। पहले ऐसा सोचती थी और आज भी ऐसा ही सोचती हूं। सिर्फ फिल्म बनाने के लिए मुझे कोई फिल्म नहीं बनानी है। पैसे तो मैं कैसे भी कमा सकती हूं। मुझे पैसों के लिए फिल्म नहीं बनानी है। मुझे फिल्ममेकिंग के क्रिएटिव प्रोसेस में ज्यादा मजा आता है। उस प्रोसेस में तभी जाऊंगी, जब मैं कुछ कहना चाहूंगी। मुझे अपनी बात एक्साइट करे। मुझे उसमें अपना हिस्सा दिखे। मैं पर्सनलाइज्ड फिल्में बनाना चाहती हूं। मुझे हर फिल्म में अपना आर्टिस्टिक वॉयस मिले। मैं खुद को पा सकूं। मुझे फिल्म तो बनानी थी, लेकिन खुद में ही ढूंढना था कि मुझे क्या बनाना है? मेरी खुद की प्योर क्रिएटिविटी क्या है? मैंने कोशिश शुरू की। शुरू के दिन तो घर चलाने के लिए पैसे कमाने में निकल गए। मैं बांद्रा में फ्लैट लेकर अकेली रहती थी। 2002-3 में मैंने लिखना शुरू कर दिया था। कुछ इंटरेस्टिंग आयडिया पर काम करने लगी। उसके पहले कभी स्क्रिप्ट नहीं लिखी थी तो अभ्यास भी करना था। कुछ विचारों को कागज पर उतारना शुरू किया।

- लगानके बाद किसी फिल्म से आप नहीं जुड़ीं? क्या यह तय कर लिया था कि अब अपनी फिल्म करनी है। अपने आर्टिस्टिक वॉयस को खोजना है?

0लगानके बाद मैंने मानसून वेडिंगमें असिस्ट किया। एक-दो छोटी फिल्में कीं। वहां से लौट कर आने के बाद फिर से एडवर्टाइजिंग का काम किया। दिल चाहता हैमें गोवा की कास्टिंग में मदद की। हाईलाइट फिल्म्स में प्रसून पांडे के साथ काफी काम किया। उससे मेरा गुजर-बसर हो जाता था। सोचती थी कि समय मिलेगा तो कुछ लिखूंगी। फिर 2003 में फैसला कर लिया कि अब लिखना है। तब मुझे मालूम था कि जो लिख रही हूं, उस पर फिल्म नहीं बनानी है। फिर भी प्रैक्टिश के लिए लिखना जरूरी था। ऐसा नहीं होता है कि आप कुछ लिखें और वह मास्टरपीस हो जाए। बगैर लिखे अभ्यास नहीं होता। 75 प्रतिशत तो अभ्यास ही काम आता है।

- स्क्रिप्ट लिखने के पहले आप स्क्रिप्ट लेखन की किताबें या फिल्मों की स्क्रिप्ट नहीं पढ़ी?

0 बिल्कुल नहीं ़ ़ ़ मैंने कोई किताब नहीं पढ़ी। बस, लिखना शुरू किया। जो लिखा, वह अच्छा नहीं लगा। अच्छा था भी नहीं। फिर भी लेखन का प्रैक्टिश हुआ। मैंने स्क्रिप्ट का स्ट्रक्चर समझा या यों कहें कि अपनी बात कागज पर उतारना आया। कैरेक्टर को डेवलप करने के लिए क्या करना पड़ता है? उस दरम्यान मैंने दिल चाहता हैऔर मणि रत्नम की बांबेदेखी। मेरे ऊपर हिंदी फिल्मों का सीधा प्रभाव नहीं था, फिर भी इतना अहसास हो रहा था कि मेरा लिखा हिंदी सिनेमा जैसा नहीं है। मैं समझ तो रही थी। मेरे पास कोई रेफरेंस पाइंट नहीं था। हर लेखक किसी विचार के साथ लिखना शुरू करता है और कहीं पहुंच जाता है।

- ऐसा संभव है क्या कि बगैर किसी रेफरेंस पाइंट के कोई फिल्म की कहानी लिखे और उस पर फिल्म बनाने की सोचे। मुमकिन है आप की सोच आर्गेनिक हो, लेकिन वह भी तो कहीं से बनती है?

- मैंने विदेशी फिल्में काफी देखी हैं। योरोप का सिनेमा देखा है। मुझे किस्लोवस्की की फिल्में अच्छी लगती थीं। हंगरी का भी सिनेमा देखा था। मेरे प्रभाव यहां के नहीं हैं। भारत में बनी कुछ अंग्रेजी फिल्में भी देखीं। डाक्यूमेंट्री फिल्में खूब देखी हैं। --- बहुत अच्छे डाक्यूमेंट्री मेकर हैं। उनका म्यूजिक का ज्ञान बहुत अच्छा है। जामिया फिल्म फेस्टिवल और इधर-उधर की कुछ फिल्में देखीं। ईरान की फिल्मों से प्रभावित रहीं।

- हिंदी फिल्मों की फैंटेसी से आप बची रहीं?

0 मैं उस फैंटेसी में कभी गई ही नहीं। मुझे पता था कि मैं जो लिखने जा रही हूं, वह मेरे अंदर से आना चाहिए। मैंने पहले से कुछ सोचा ही नहीं कि किस दर्शक के लिए और क्या लिखना है? मेरे लिए फिल्ममेकिंग खुद को समझने की कोशिश हैं। खुद को एक्सप्रेस करने के साथ खुद को बेहतर करने की कोशिश है। खुद के विचार को मथने के साथ अपना विकास है। मैं तो आर्ट के सभी क्षेत्रों में इंटरेस्टेड हूं। मैं सबकुछ करना चाहती हूं। म्यूजिक में मेरा मन लगता है। मेरी कोशिश रही कि मैं अपनी रुचि और पसंद की चीजों को जोड़ कर अपने समय के मनुष्य की स्थिति और उनकी भावनाओं को समझूं और उन्हें पर्दे पर पेश करूं। कभी किसी की किताब अच्छी लगी तो उस पर भी फिल्म बना सकती हूं, लेकिन मुझे लिखने का शौक पहले से रहा है। बचपन में कुछ कविताएं प्रकाशित भी हुई थीं। मैंने स्कूल-कॉलेज में मैग्जिन एडिट किए और आर्टिकल भी लिखे। लिखना मेरे लिए फिल्म का बहुत एक्साइटिंग हिस्सा है। चरित्र गढऩे में मुझे मजा आता है। सिनेमा के हर पहलू पर अधिकार पाना चाहती हूं। मुझे अपनी क्षमता का अहसास हो जाता है करते-करते। काम पूरा हो जाने के बाद मुझे साफ दिखता है कि तब जो आशंका थी, अब वह कमी के रूप में सामने दिख रही है।

- धोबी घाटके पहले कितनी स्क्रिप्ट लिखी आप ने? कितना अभ्यास करना पड़ा?

0 एक भी पूरी स्क्रिप्ट नहीं लिखी। मैंने दो कहानियां लिखीं। एक पूरी कर पाई। एक अधूरी रह गई।

अधूरी कहानी सिर्फ मजे के लिए लिखी थी। एक विचार परेशान कर रहा था तो उसे लिख डाला था।

- आप वैचारिक रूप से कितनी संपन्न हैं। अपनी मुलाकातों और बातों में मैंने पाया है कि आप लेफ्ट ऑफ द सेंटरसोच की हैं ़ ़ ़

0 शुरूआती जीवन कोलकाता में बीता है। उसका असर हो सकता है। मैं मानती हूं कि कोलकाता, मेरे माता-पिता की विचारधारा, आर्ट्स में मेरी रुचि, एकाकी रह कर काम करने की आदत ने मुझे गढ़ा है और मेरे विचार तय किए हैं। मैं लेफ्ट ऑफ द सेंटरहूं। मैं डेवलपमेंट वर्क करना चाहती थी। हमारे पास के लोगों की दशा बदले। अलग-अलग लोगों की दुनिया कैसे अलग-अलग होती है और कैसे उनके अनुभव उन्हें बदलते हैं? मेरी जिज्ञासा इस विषय में है। एक ही शहर में रह कर कैसे लोग अलग शहर में रहते हैं।

- फिल्म लेखन और निर्देशन में जो जीवन आप ने जिया है, उसे कैसे ला पाती हैं और फिर उसके प्रति सम्यक दृष्टिकोण कैसे बनती है?

0 यह चुनौती है। जिन किरदारों के चारीत्रिक विशेषताओं के अनुभव मुझे नहीं हैं, उन्हें गढ़ते समय मैं उनसे सहानुभूति रखती हूं। समान परिस्थिति में खुद को डालकर देखती और सोचती हूं कि मेरा अनुभव कैसा रहता? या मैं कैसे रिएक्ट करती? यह सब असर मेरी फिल्म में रहा है। धोबी घाटमेरी जिंदगी, मेरे आउटलुक और मेरी धारणाओं का फिल्म है। यह मेरे बारे में नहीं है, लेकिन मैं पर्सनल फिल्में बनाना चाहती हूं।

- हालांकि आप कोलकाता और दिल्ली जैसे महानगरों में रह चुकी हैं, लेकिन क्या कभी मुंबई ने डराया आप को?

0 बचपन की तो याद नहीं। सिर्फ समुद्र की लहरें याद हैं। बाद में अपनी बहन की शादी में आई थी तो लगा था कि मुझे इसी शहर में रहना चाहिए। इस शहर की इलेक्ट्रिक एनर्जी है। वह जकड़ लेती है आप को। आप शहर छोड़ देते हैं तो भी वह आप के साथ रहती है। कोलकाता और दिल्ली भी मुझे पसंद हैं। मुझे दिल्ली बहुत अच्छी लगती है, लेकिन अब मैं मुंबई गर्ल हूं। मुंबईकर हूं। मेरी अभी तक की आधी जिंदगी यहीं गुजरी है। यहां आने पर मुझे हमेशा लगा कि मैं यहीं की हूं। यों समझें कि मुझे मुंबई में जड़ दिया गया और मैं फिट हो गई। मुझे कभी डर नहीं लगा। कॉलेज के दिनों में मुझे घूमना बहुत पसंद था। मैं पेडर रोड में रहती थी। बहुत घूमती थी।

- तब किसी फिल्म स्टार से मिलने या फिल्म की शूटिंग देखने का मन नहीं किया?

0 बिल्कुल नहीं ़ ़ ़ आश्चर्य है ना? मेरा थिएटर का शौक था। थिएटर देखती थी। सोफाया कालेज के भाभा हॉल में जाकर नाटक देखती थी। वह कंपाउंड के अंदर था, इसलिए कहीं जाने की जरूरत नहीं पड़ती थी।

- धोबी घाटका आइडिया कहां से आया?

0 मुंबई में इतने सालों रही। यह शहर मुझे बहुत प्रभावित करता है। मुझे इस शहर पर ही कोई फिल्म करनी थी। मैं शहर के भिन्न स्तर और लेयर को समझना चाहती थी। उन्हें पर्दे पर लाना चाहती थी। मैंने स्क्रिप्ट लिखनी शुरू की तो दो रफ आइडियाज थे। लिखते-लिखते वे दोनों आइडिया जाकर मिल गए। एक आइडिया यह था कि एक धोबी है, जो अलग-अलग घरों में जाता है। उनसे मिलता है। उनका रहन-सहन देखता है। वह खुद कहीं और रहता है। कैसे वह कई लोगों को जोड़ता है? मैं उसकी कहानी कहना चाहती थी। मुझे यह भी दिखाना था कि इस शहर में हम अपने अतीत को हम भुला सकते हैं। यहां आ कर नया फ्यूचर बना सकते हैं। एक लडक़ी बाहर से आती है। वह इस शहर को फोटो के जरिए डाक्यूमेंट करना चाहती है। दोनों की दोस्ती हो जाती है। क्या उनकी दोस्ती प्यार में बढ़ सकती है? मैं यह देखना चाहती थी कि इस इंटरनेशनल शहर में दो वर्ग के बीच में क्या हो सकता है? यह एक आइडिया था। इसके अलावा जब मैं मुंबई आई थी तो मुझे काफी घर बदलने पड़े थे। ग्यारह महीनों का चक्कर रहता था। सालों तक मैं वैसे ही रही। मैं उस पर एक फिल्म बनाना चाहती थी। उसे मैंने शूट करना शुरू कर दिया था अ सिंगल वीमैन लुकिंग फॉर अ हाउस। मैं जानना चाहती थी कि क्या-क्या होता है? मैं मकान खोजने के प्रोसेस को डाक्यूमेंट कर रही थी। क्या-क्या जगह मिलती है? कैसे सवाल पूछे जाते हैं। वन बीएचके, टू बीएचके ़ ़ ़ लड़कियों के साथ तो और भी पाबंदियां रहती हैं। उस पर फिल्म बना रही थी तो सोचती थी कि हर बार एक नए घर में जाने के बाद अपनी पसंद की चीजें डाल कर उसे अपना घर बनाते हैं। दो हफ्ते पहले वही घर किसी और का होता है। किसी और की पर्सनल जगह थी वह। उनकी समस्याएं और खुशियां थीं। क्या उनके निशान भी वहां होंगे? एक ही मकान को कितने लोग शेयर करते हैं। चाहती थी कि किसी का छोड़ा कुछ मिले और फिर मुझे उस शख्स की जिंदगी का कोई रहस्य मिले ़ ़ ़ यह मेरी स्टोरी का आइडिया था। अगर वे उसे लेने आए तो एक फ्रेंडशिप डेवलप हो सकता है। कैसे मैं उनके प्राब्लम से जुड़ती हूं। यह सेकेंड आइडिया था ़ ़ ़ बाद में दोनों आइडिया फिल्म में जुड़ गए। यह धोबी घाटका स्टार्र्टिंग पाइंट था।

- सारी दुनिया जानती है कि आप आमिर खान की पत्नी हैं। आमिर खान प्रोडक्शन पर आप का हक है, इसलिए धोबी घाटको फ्लोर पर ले जाने में कोई दिक्कत नहीं हुई होगी?

0 आमिर को स्क्रिप्ट पसंद नहीं आती तो फिल्म ही नहीं बनती। सबसे पहले तो उन्हें कहानी सुनानी थी। मैंने आमिर से वक्त मांगा तो उन्होंने कहा कि हमलोग कुन्नूर जा रहे हैं। वहीं मंसूर और टीना के साथ सुनेंगे। बाद में पता चला कि उन्हें डर था कि अच्छी नहीं लगी तो वे मुझे कैसे बताएंगे? अगर मंसूर को भी अच्छी नहीं लगी तो मिलकर बता देंगे। उन्हें कहानी सुनाई तो कहानी पसंद आई। फिल्म तय हो गई तो आमिर ने पूछा कि कैसे बनाना है? मैं छोटी फिल्म चाहती थी। तब मैं चाहती थी कि खुद शूट करूंगी। जल्दी ही वह आइडिया छोड़ दिया। मैंने यही कहा कि मैं पो्रड्यूस करूंगी ़ ़ ़ आप थोड़ा सा पैसा दीजिए। मैंने अपना प्रोडक्शन हाउस खोला था।

- ऐसा क्यों?

0 मैं नहीं चाहती थी कि आमिर खान प्रोडक्शन के नाम से काम करूं। उसकी व्यावहारिक दिक्कतें थीं। मैं नहीं चाहती थी कि बड़ी फिल्म के तौर पर यह प्रचारित हो। अपनी सुविधा के लिए मैं इसे छोटे स्तर पर अलग प्रोडक्शन कंपनी के नाम से बनाना चाहती थी। इसे छोटे बजट में शुरू किया था।

- क्या नाम था प्रोडक्शन हाउस का?

0 सिनेमा 73 ़ ़ ़ वह मेरी पैदाइश का साल है। इसी उद्देश्य से अपना काम शुरू किया। आइडिया था कि पहले फिल्म बना लूंगी। फिर आमिर खान प्रोडक्शन जुड़ेगा और उस बैनर से फिल्म आएगी। आमिर तो मेरे प्रोड्यूसर के साथ मेरे एडवाइजर भी थे। उनको मैं हर चीज दिखाती थी। हर पाइंट पर सलाह लेती थी। उन्हें कास्टिंग और लोकेशन दिखाती थी। फिल्म से वे तब जुड़े जब उनके रोल के लिए कोई नहीं मिला। उनका इंटरेस्ट पहले से था। वे मुन्ना का रोल चाहते थे, लेकिन वह बहुत यंग था उनके लिए। मैं अपनी फिल्म में बड़ा स्टार लेकर फिल्म का कीमत नहीं बढ़ाना चाहती थी। जब उस रोल में कोई मिला ही नहीं तो फिर मैंने उनका आडिशन लिया। उस रोल में बोलना कम था और परफार्मेंस ज्यादा था। उस लेवल का परफार्मर चाहिए थे। बाकी कलाकार तो नए थे। उन्हें उसी वजह से चुना था कि उन्हें कोई नहीं जानता। फिर कोई नहीं मिला तो आमिर ने कहा कि मैं आडिशन करता हूं और बताता हूं कि इन रोल में क्या-क्या हो सकता है। यह बता दूं कि रोल को कहां तक पहुंचाया जा सकता है। उन्होंने टेस्ट दिया तो वे अच्छे लगे। वे परीक्षा में पास हो गए। फिर भी हमने फायनल नहीं किया और सोचने का वक्त मांगा।